देवी स्तुति
ओम स्थापकाायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आज फिर से आगमनी के ऊपर में क्लास करेंगे। आगमनी के कुछ गान देखेंगे। उसके ऊपर में थोड़ी सी चर्चा करेंगे और मां शारदा के जीवन के साथ में कहां पर यह मैचिंग हो रहा है यह कुछ प्रसंग देखेंगे। तो सबसे पहले मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करता हूं देवी स्तुति के साथ में प्रारंभ करें। ओम नमिका ओम मार्कंडे ओम जयम जय भूता बहारी जय सर्वते देवी काल नमोस्तुते जयंती मंगला काली भद्रकाली कपिनी दुर्गा शिवा स्वाहा नमोस्तुते श्री नम रूपम देह जयम देह यशो देहो जह महिषासुर निनाश भक्त नाम सुखदे नम रूपम देवी चम दे यशोदे जम्र निव देवी धर्म का माधारी रूपम देह जयम दे यशोदे किशोरी रक्त बीज प देवी चंड मुंड विनाशनी रूपम देह चरम देह यशो देह विषो निशुभ शुभ निर्नाश चले नम रूपम दे जयम दे यशो देवी यशो जय बंदिता दे सर्वदा रूपम दे जयम दे यशो देह यशो जय चिंता रूप चिते सर्व शत्रु विनाशनी रूपम दे जयम दे यशो देहोजह न्या सर्वदा दुधा रूपम दे जयम दे यशो देह ो सुपम तम चंड नाशिनी रूपम दे जयम दे यशो देह विषोज चिकनी सततम युक्त चती पापनाशनी रूपम दे जयम देह यशो देह यशो जय देह सौभाग्यम आर्यम देवी परम सुखम रूपम देह जयम दे यशो देह विशो जय विदेह कल्याणम विह विपुला शयाम रूपम देह जयम देह यशो देहो विहता नाशम बल रूपम दे जयम यशो देह सुरा सुर शिरो रत्ना चरण रूपम दे जयम दे यशो देहोज विद्याम यशवंतम लक्ष्मी बंधम जमा गुरु रूपम देया यशोदे यशो देवी प्रचंड गंड दत्त द रूपम देह जयम दे यशो देहो जह प्रचंड दने चंड प्रारमे रूपम जय यशोदे चतुरभुज चतुर संस्तुते परमेश्वरी रूपम देह जयम दे यशोदेह कृष्ण संते देवी शक्ति रूपम देह जयम दे यशोदेह इंद्रा सद पाका पूजते परमेश्वरी रूपम देवी जयम यशोदे शो देवी भक्त जनता दानंदिके रूपम देह जयम देह यशोदेहो हरम मन नाम देह मनोसम रूपम देवी जयं दे यशोदे तारणी दुर्ग संसार सास्या रूप रूपम देवी जयम दे यशो देो किम पठितु महा स्तोत्रम पट नर सत्य सती सम्य कर्मा दुर्लभम इदम सोम महा सो सम्य करमा दुर्लभ मलाम वाह खूब भला खूब भला बहुत अच्छा
जब बेटी जाती है ससुराल — माँ के हृदय में उठती करुणा की लहरें
जब बच्चे का जन्म होता है तो मां पिताजी उनके लिए तो वो बच्चा है जैसे कि हृदय का एक टुकड़ा बड़ा इतना प्रेम करते हैं बच्चे को। उनको लगता है कि यह बच्चा ही है जैसे कि उनके जीवन का सब कुछ। जीवन का सर्वस्व धन और बच्चे की रक्षा करना, उसका लालनपालन करना, उसको लाड लड़ाना, उसको प्रेम करना, स्नेह करना, आदर करना, उसके लिए जो कुछ भी अच्छा है, सब कुछ करना यही सब कुछ जैसे कि मां-पिताजी का कर्तव्य हो जाता है। हमने गिरीश घोष की वह कहानी एक बार कही थी। उसके बारे में चर्चा हुई थी हमारी कि गिरीश ठाकुर को कहता है कि आपको मेरे पुत्र संतान के रूप में जन्म लेना होगा क्योंकि मैं तो आपकी सेवा नहीं कर पाया और ठाकुर बीमार थे उस समय की ही बात है मोस्ट प्रोबेबबली तो ठाकुर कहते हैं कि बोए गए छे अमार तो छले होए जन्मावार अर्थात कि तुम्हारा पुत्र होकर के जन्म लेने की मुझे क्या आवश्यकता है ऐसा करके उस समय तो ठाकुर ने बोल दिया था किंतु देखिए देखिए मां शारदा स्वयं यह कहानी हमको कहती है। वो कहती है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में गिरीश को सही में एक पुत्र संतान का जन्म हुआ और वह देखने में इतना सुंदर था और उसके जो व्यवहार उसका जो जो बाल सहज क्रीड़ाएं थी वो इतनी सुमधुर थी और गिरीश घोष जैसे उसको अपने प्राणों के सहित प्रेम करता था। उसके खाने के लिए सब नए बर्तन परचेस कर दिए थे। यह जो चांदी के यह जो बर्तन है और उसके लिए नए वस्त्र वो जिस बर्तन में खाएगा उस उस बर्तन में और कोई नहीं खाएगा। इतना प्रेम पूर्वक गिरीश उसको रखता था। किंतु बच्चे का था कि बच्चा बात नहीं करता था। पता नहीं क्यों वो दो-ती साल का भी हो गया तब तक वह बात नहीं करता है तो ठीक है अभी नहीं करता है तो नहीं करता है क्या करेंगे किंतु गिरीश उसको जिस तरह से प्रेम करता था वह अद्भुत था जिस तरह से उसकी सेवा करता था एक दिन हुआ ऐसा कि मां आई थी कोलकाता और गिरीश ने सोचा कि मैं जाकर के वहां पर दर्शन करने के लिए जाता हूं किंतु मां के सामने नहीं जाऊंगा। हमको पता है यह बात गिरीश को पता था कि उसके पाप नेत्र है। पाप नेत्र से मां का दर्शन नहीं करना है। बोलकर के मां के सामने नहीं जाता था। किंतु अपने बच्चे को लेकर के गया। वहां पर तो सब साधु सन्यासी थे ही थे। मां के सेवक सब लोग तो उनके साथ में गप लगा रहा था। मीनवाइल बच्चे को किसी महाराज के हाथों भेज दिया। जाओ जाकर के मां को प्रणाम करके इसको ले आओ। अभी देखिए यह बच्चा वो महाराज जी उसको लेकर जाते हैं। बच्चे को किसी ने कुछ सिखाया नहीं है। किंतु इसके बावजूद वो जाकर के बड़े ही भक्ति पूर्वक मां के श्री चरणों में प्रणाम करता है। और फिर जब वह वापस आता है गिरीश के पास में तब वो गिरीश का हाथ खींच कर के मां की ओर ले जाता है। तो गिरीश बार-बार कहता है कि अरे भाई मेरे पाप नेत्र है। पापी मेरा चरित्र हूं। मैं पापी हूं। मैं किस मुंह लेकर के किस दृष्टि से मैं किस किस तरह मैं मां के सामने जाऊं किंतु बच्चा छोड़ ही नहीं रहा है। गिरीश को खींच रहा है। खींच रहा है और मां की मां जहां पर जिस कमरे में थी वहां की ओर इशारा कर रहा है। तो आखिर में गिरीश से रहा नहीं गया। रोते-रोते बच्चे के पीछेछे गया और जाकर के मां के सामने साष्टांग दंडवत करके कहता है कि मां यह पहली बार मुझे आपका दर्शन करने का सौभाग्य मिला और वह भी मेरे पुत्र संतान की वजह से मेरे पर मैं अपने से तो आपके सामने कभी आता ही नहीं। ऐसा बोलकर के गिरीश ने प्रथम वो मां का दर्शन किया था। तो यहां पर देखिए यह पूरी कहानी मां स्वयं कहती है और फिर मां कहती भी है कि इस घटना के कुछ ही समय के बाद में उस पुत्र संतान का देहांत भी हो गया। तो मां कहती है कि पता नहीं कि ठाकुर स्वयं आए थे कि नहीं किसको पता यह तो भक्त की आदर है। भक्त के आदर भक्त का मान की रक्षा करने के लिए हो सकता है ठाकुर स्वयं आए भी हो। तो देखिए कि जब ईश्वर स्वयं अपने घर में पुत्र या पुत्री कन्या संतान के रूप में जन्म ग्रहण करते हैं तो मां और पिताजी का कितना प्रेम उनके ऊपर में बरसता है। यह वृंदावन की कहानी हमको पता है कि किस तरह से मां यशोदा का अपने लाडले दुलारे ये बाल गोपाल पे प्रेम था। यह गोपियां जब यह कृष्ण कन्हैया थोड़ा सा बड़े हो गए चलना फिरना सीख लिया तो यह सब गोपियां भी गांव में देखेंगे कि सब चाहती थी कि ये कन्हैया मेरे घर में आए। ये कन्हैया मेरे साथ में बात करें तो ये जो लाल जी थे छोटे बाल गोपाल सबका उनके प्रति प्रेम और फिर जब ब्रह्मा ने वो गोप बालकों को अपहरण कर लिया। उन भगवान कृष्ण स्वयं सब गोप बालक हो गए। ये जो वत्सत थे ये जो गायों के बछड़े वो भगवान कृष्ण स्वयं जब हो गए तब क्या हुआ सभी गोपियों का अपने संतानों पे सभी गायों का अपने बछड़ों पे प्रेम कितना बढ़ गया। क्यों? क्योंकि ईश्वर स्वयं उन्होंने पुत्र संतानों का स्वरूप धारण किया था। तो यहां पर देखिए कि मां पार्वती और भगवान शिव की कहानी जब मां पार्वती ने हिमवान और मेना के घर में उन्होंने जब जन्म ग्रहण किया तो पता है कि वो देवी स्वयं पुत्री संतान होकर के जन्म ग्रहण किए तो फिर यह हिमवान और मेना की उनके ऊपर में भक्ति प्रेम आदर लाड इतना ज्यादा था जैसे कि अपने हृदय के टुकड़े की तरह उन्होंने मां पार्वती का जतन किया था। किंतु देखिए कि किस तरह का नसीब है। मां पार्वती का मन आ गया। यह भूत पिशाचों के जो सरदार थे उनके जो ईश्वर थे भगवान शिव के ऊपर में और मां ने उनके भगवान शिव की प्राप्ति करने के लिए तपस्या प्रारंभ कर दी। प्रचंड तपस्या कर रही है। कर रही है। यहां पर भगवान शिव वह स्वयं इंप्रेस हो गए कि अच्छा मेरी प्राप्ति के लिए मां इतनी तपस्या कर रही है। तो फिर उनकी परीक्षा करने के लिए भगवान शिव एक ब्राह्मण का वेश सज करके आए और मां पार्वती को जाकर के उनके सामने जाकर के भगवान शिव की निंदा करना अपने खुद की निंदा करना शुरू कर दिया कि आपको पता नहीं है कि वह श्मशान में रहते हैं। भस्म लगाते हैं। भूत पिशाच उनके सहचर है वगैरह वगैरह आप तो इतने लाड प्रेम में बड़ी हुई है। इतना आपको सम्मान मिला है, अपने जीवन में प्रेम मिला है, आदर मिला है। किस तरह से आप भगवान शिव के साथ में रह पाएगी? किंतु मां पार्वती की शिव जी के ऊपर में जो भक्ति थी, जो उनके प्रति शुद्ध सात्विक प्रेम था, इतना अटल था, अडग था कि उन्होंने यह ब्राह्मण की किसी भी बात को स्वीकार नहीं किया। और ब्राह्मण के वेश में तो शिव जी ही थे। वह प्रसन्न हो गए और फिर उन्होंने ठीक किया वरदान दिया कि हां आप मेरे साथ में विवाह करेंगे। तो अभी देखिए कि जब यह विवाह की बात यह हिमवान और मेना को पता चली मां पार्वती के मां और पिताजी को पहले तो वे लोग खुश ही हुए चलो कि अपनी लाडली कन्या को उसकी इच्छा के अनुसार वर मिला। किंतु फिर भगवान शिव अपनी बारात लेकर के जब विवाह के लिए आए तो वह जो दृश्य था वह सब भूत पिशाच यहां पर किस तरह के वो सब लोग थे ये जो देखकर के वो बेचारे और भी डर गए कि अरे ये किसके साथ में अपनी पुत्री का इतनी लाडली पुत्री का विवाह करवाने को जा रहे हैं। जटाजूट धारी है। शरीर पर भस्म लगाए हैं। व्याघ्र चर्म धारण किए हैं। भूत, प्रेश विशा, पिशाच, बेताल, योगी, किन्नर, गण, गंधर्व वगैरह सब बाराती थे। उसमें से किसी ने हड्डियों की माला पहनी थी तो कोई नगारा बजा रहा था। तो कोई यह अजब तरह का नृत्य कर रहा था। तो इस तरह की बारात देखकर के बेचारे हिमवा और मेना दोनों डर तो गए किंतु फिर ऋषि मुनियों ने कहा कि देखिए नारद मुनि ने कहा कि देखिए यह तो शिव महादेव स्वयं है आदि जो पुरुष है वह स्वयं है और पार्वती जो है वह है आदि शक्ति इन दोनों का चीर मिलन जो है वह तो अवश्यभावी है वही होना ही है सृष्टि को यदि चलना है तो इन दोनों का मिलन होना ही है। तो फिर मां पार्वती का विवाह हुआ। किंतु जो मां उनकी जो मां है मेना वो सब समय इस चिंता में रहती है कि यह जो मेरी लाडली पुत्री है वो वहां पर किस तरह से रहती होगी। किस तरह से शशान में इस तरह से भूत पिशाचों से घिर करके बेचारी मेरी पुत्री का क्या हाल होता होगा? तो यह जो आगमनी गीत है वह बेसिकली क्या है कि यह जो मां पार्वती की मां मेना है वह अपने हृदय की आरती इन सब गीतों के द्वारा व्यक्त करती है और फिर जब यह जो शारदीय दुर्गा पूजा का अर्थ क्या है कि मां पार्वती अपने पिताजी के घर आती है चार दिनों के लिए उनके साथ में फिर से निवास करती है और फिर जब यह पूजा पूजा समाप्त हो जाती है तो अपने जो शिव जी का घर है वहां पर वापस चली जाती है। तो देखिए कि ये जो पूरा जो ये है कहानी हम सब ने अनुभव की है। प्रत्येक भारतीय के घर में प्रत्येक हिंदू के घर में यही कहानी कि अपनी लाडली बेटी का विवाह करवाया है। यह बेटी अपने पति के घर गई है। इतनी लाडली कन्या अभी पति के घर पता नहीं उसको कोई अच्छे से खाना भी खिला रहा है कि नहीं। वहां पर उसकी संभाल भी ले रहा है कि नहीं और हमको तो पता है कि किस तरह से ससुराल में जो पत्नी नववधु जब आती है तो कितना कष्ट करके उनको रहना पड़ता है। अभी आजकल तो क्या है लिबरलिज्म का युग है। फेमिनिज्म का युग है। स्त्रियों के जो अधिकार है उसके बारे में जनता और सरकार सभी लोग सचेत हो गए हैं। किंतु वह एक युग था कि जब नववधू घर में आती है तो सब तरह की तपस्या उनको करनी पड़ती थी। जो ठाकुर की एक फेमस कहानी कि जब वो एक घर में सास है अर्थात कि मदर इन लॉ वो क्या करती है जो उनकी दो-तीन पुत्रवधुएं थी वो जो उनको खाने में राइस जो है भात जो है थोड़ा सा कम करके देती थी तो अभी एक उनका जो मेजरमेंट करने का यह एक यह भी था पात्र भी था तो उस पात्र में चावल भर करके उनको खाने को देगी अभी इस पात्र थोड़ा थोड़ा सा छोटा था और इन बेचारी पुत्रवधुओं को जितनी भूख लगी है, जितने आहार की आवश्यकता है, उतना आहार उस पात्र में होता नहीं था। तो वह बेचारी थोड़ी दुखी रहती थी। एक दिन क्या हुआ? यह पात्र या कटोरी जो भी है मिट्टी का होगा शायद वो गिरा और टूट गया। तो यह पुत्रवधुएं जो है बड़ी खुश हो गई कि चलो यह छोटा वाला पात्र टूट गया तो हो सकता है नया पात्र बड़ा होगा। तो बड़े पात्र में ज्यादा चावल खाने को मिलेगा। तो उनकी जो सास है मदर इन लॉ है वो कहती है कि वो मैं हमारा हाथर अटकेल अच्छे अर्थात कि मेरे हाथ का मेजरमेंट है। आपको कभी भी मैं ज्यादा चावल खाने को नहीं दूंगी। जो कम है वह कम ही मिलता रहेगा। यह कहानी ठाकुर स्वयं कहते हैं। मां के जीवन में देखिए कि मां को मां के पास में एक बड़ा ही सुंदर आसन था। अभी जहां तक मुझे याद है कि निवेदिता ने ही मां को वह आसन दिया था। तो एक दिन यह कहानी मां के एक त्यागी संतान ने लिखी है। मोस्ट प्रोबेबबली वरदा महाराज। तो यह महाराज जी जाकर के देखते हैं महाराज मां के यह सेवक संतान देखा कि मां एक कैंची लेकर के यह जो आसन है उसके दो टुकड़े कर रही है तो जो कैंची से नहीं वो बंटी जो होती है ना वो सब्जी काटने वाली उसके ऊपर में यह आसन रखकर के उसके दो टुकड़े करने का प्रयास कर रही है तो ये त्यागी संतान जैसे ही गया उसने देखा कि अरे मां इतने सुंदर आसन का दो टुकड़े कर रही है तो उन्होंने पूछा अरे अरे मां क्या कर रही हो? तो मां जैसे कि एकदम घबरा गई। अभी देखिए मां तो जगत जननी स्वयं है। ये पुत्र संतान है। वो तो उनका संतान के समान ही है। त्यागी संतान उनको तो जो आदेश करेंगे वो सब करेंगे। इसके बावजूद जैसे कि मां बालिका की तरह थोड़ा सा घबरा करके कहती है अरे नहीं बेटा कुछ नहीं कुछ नहीं। तो फिर यह त्यागी संतान कहते हैं नहीं मां मैंने देख लिया यह जो सुंदर आसन है उसके आप दो टुकड़े कर रही है। आप ऐसा क्यों कर रही है? आपको तो ठंड में बैठने के लिए काम लगेगा। तब मां जैसे कि बिल्कुल एक बालिका के भाव में आकर के जगत जननी स्वयं एक बालिका के भाव में आकर के अपने ही पुत्र संतान को समझा रही है कि देखो बेटा यह नलिनी है। यह राधु है। जब अपने ससुराल जाती है तो बेचारियों को किस तरह से वहां पर ट्रीटमेंट मिलती होगी। उनकी कोई संभाल भी लेता होगा कि नहीं लेता होगा। उनको बैठने के लिए आसन भी मिलता होगा कि नहीं मिलता होगा किसको पता इसलिए मेरे पास में यह जो आसन है उसके मैं दो टुकड़े कर रही हूं एक राधु को दूंगी एक टुकड़ा दूंगी नलिनी को तो अपने ससुराल जाएगी तो बैठने में उनको सुविधा हो ठंड में उनको जमीन पर ना बैठना पड़े तो यह जो त्यागी संतान थे वह तो अवाक ही हो गए कि मां अपने खुद की कुछ भी फिक्र किए बिना अपने खुद की ये जो नीड्स एंड नेसेसिटीज है उसकी कोई भी चिंता किए बिना इतना सुंदर आसन इसके टुकड़े कर करके यह दो अपनी पुत्रियां भी नहीं है। उसके बावजूद उनको दे रही है। तो देखिए कि यह मां का हृदय है। हमेशा अपनी कन्या के लिए रोता है। तो आगमनी गीत जो है वह वही गीत है। एक के बाद एक आप देखेंगे कि मां के हृदय की व्यथा को वह व्यक्त करते हैं। इतना सुंदर रूप से व्यक्त करते हैं। जैसे कि अभी यह गीत है
माँ में सौंदर्य की पूर्णता, शिव में उन्माद की परम विरक्ति
चार नंबर का गीत जाओ जाओ गिरी आनी ते गौरी। यहां पर मां मेना जो है वह अपने पतिदेव है उनको कहती है कि जाइए अपनी जो सुपुत्री है अपनी कन्या है कुछ दिन के लिए अपने घर पर ले आइए क्योंकि मैंने एक दुस्वपन देखा है। तो यह गीत जो है पहले तो मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करूंगा कि यह जो चार नंबर का गीत है उसको गाए एक बार और फिर हम उसके ऊपर में थोड़ा सा चिंतन करते हैं। जा कुमारा के देश [संगीत] से जाओ जाओ तुम्हारा जाओ जाओ मेरी हर के दूरी तुम्हारा आई देखो नारो दो देखो दो मामा से जाओ जा सो श्यामाई को तुम जाओ जाओ मेरी हया से आ देख श्या देख श्या लो तुम बोले तेरे से जाो के देश से जाओ जा कीो वाह खूब भो तो देखिए यह कितना सुंदर गान है। मां के हृदय की जो आरती है, मां के हृदय की जो व्यथा है, कितने सुंदर रूप से इसको व्यक्त किया गया है। मां मेना गाती है। जाओ जाओ गिरी। गिरी अर्थात कि उनके पतिदेव हिमवान हिमालय स्वयं आप जाइए आनी ते गौरी गौरी को लेकर के आइए। उमा ना की बोो कहदे छे यह मेरी हमारी जो पुत्री है हमारी कन्या उमा है वह बहुत ही रो रही है देखे छ शोपोन नारदो बोचन यह मैंने सपने में भी देखा है कि हमारी कन्या रो रही है और नारद मुनि का भी यही वचन है उमा मामा मां बोले कह दे छे हमारी कन्या हमारी लाडली कन्या मां मां बोल के रो रही है सोनार भरणी गौरी आमार यह सुवर्ण के जैसा जिसका अंग का है सुवर्ण की तरह जिनका वर्ण है वो है हमारी गौरी और उसका जो जमाई है हमारा उसका जो पति है कैसा है भांगड़ भिखारी जामाई तोमर यह जो भिखारी है इस तरह का हमारा है जमाई दामाद मायर बशन भूषण शब आवरण मां के जो अर्थात कि हमारी लाडली कन्या है उसके जितने भी आभूषण है ताओ बेचे ना कि भांग खे उसको भी बेच के वो भांग खा रहे हैं। देखिए ये जो कंट्रास्ट है ये कितना सुंदर कंट्रास्ट है कि अपनी जो कन्या है वो सुवर्ण वर्ण की कन्या है। उसका इतना सुंदर चरित्र है। उसमें इतने सुंदर संस्कार है। जिस घर में जाएगी उस घर को उजाला कर देगी किंतु जमाई कैसा है उसकी कंपेयर में कि वो भांगखोर है वो नशाखोर है नशेड़ी है अपनी कन्या के जितने भी आवरण है आभूषण है जो सुवर्ण के जो जवाहरात है वो उनकी जो नशे की ये जो ये है उनका जो इतना आकर्षण है नशे के प्रति कि बाकी जब पैसा नहीं रहता है नशा करने के लिए भांग खरीदने के लिए तो अपनी कन्या के यह आभूषण बेच के वह भांग खरीदता है और भांग का सेवन करता है। देखिए कि बहुत सारी जो मां होती है, पिताजी होती है, पिताजी होते हैं उनके मन में हमेशा यह डर होता ही है कि अपनी जो कन्या है, वह पति के घर जाकर के कैसे रहेगी। देखिए एग्जैक्टली ऐसा जो प्रसंग है एग्जजेक्टली ऐसा कि मां के जीवन में है। हमको पता है गंभीरानंद जी महाराज की जीवनी का पाठ किया था तब हमने यह प्रसंग देखा था बड़ा ही सुमधुर प्रसंग कि जब मां शारदा के साथ में श्री रामकृष्ण देव का विवाह हुआ तो उस समय रिवर्स था। आजकल क्या है? दहेज यह लड़की वाले देते हैं। किंतु उस समय ठाकुर के घर से मां को ₹300 का पण दिया गया था। दहेज दिया गया था। अभी वैसे ही तो यह शिव का संसार है। ठाकुर का घर ऊपर में से इतना रुपया दहेज का दिया गया है। और फिर उसके बाद में जो विवाह का जो खर्चा होता है वह तो है ही है। तो फिर यह मां को पहनाने के लिए आभूषण वगैरह कहां से आएंगे? तो वहां पर गांव के जमींदार लाहाबाबू थे। उनके पास में से मांग करके चंद्रामणि देवी श्री रामकृष्ण देव की माता जी उन्होंने आभूषण यह लाहाबाबू जो कामार पुकुर के जमींदार थे उनके पास में से ले आई और मां शारदा को विवाह के समय सुंदर रूप से सजाया था। अभी विवाह के बाद में मां कामार कुकुर आई ठाकुर के साथ में कुछ दिन रहने के लिए। अभी जिस दिन रात को वह सो गई है, उस दिन चंद्रामणि देवी बड़ी ही दुखित है। बड़ी ही चिंतित है। सोच रही है कि अरे मेरी जो यह लाडली कन्या नई पुत्री मेरे घर में आई है। वो तो इतने सुंदर आभूषण पहनकर के कितनी सुंदर दिख रही है। ठाकुर ने ही तो कहा था ना शारदा सरस्वती ताई साजते भलो बासे शारदा सरस्वती स्वयं है। वो स्वयं देह धारण करके आई है। इसलिए उनको सजना धजना अच्छा लगता है। तो सुवर्ण के अलंकार पहनी हुई ये छोटी सी बालिका छ सात साल की अभी वह कितनी सुंदर दिख रही है। अभी किंतु यह गहने तो वापस करने होंगे ला बाबू को क्योंकि मांग करके लाए हैं उनके पास में से उधार लाए हैं। तो अभी मां बेचारी चंद्रामणि देवी किस मुंह से मां शारदा के पास में गहने वापस मांगेगी? तो वह बड़ी चिंतित थी। तो फिर ठाकुर ने पूछा मां को ठाकुर समझ गए कि मां चिंतित है तो ठाकुर ने पूछा कि मां आप चिंतित क्यों है? तो चंद्रामणि देवी कहती है कि बेटा यह गहने तो लौटाने होंगे किंतु यह इतनी सुंदर पुत्रवधू है मेरी उसको कहने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है। मेरा जी नहीं जा रहा है कि उसके पास में यह गहने मैं मांगू। तो ठाकुर कहते हैं आप चिंता मत कीजिए। जब यह बालिका सो जाएगी तो उनके श्री अंग से मैं कौशल पूर्वक इस तरह से गहने निकाल लूंगा कि उनको पता भी नहीं चलेगा। फिर यह आप गहने वापस कर दीजिएगा। तो हुआ भी वही कि जब मां शारदा शयन की ओर सो गई तब ठाकुर ने बड़े ही कौशल पूर्वक गहने निकाल लिए और मां चंद्रामणि देवी को दे दिए। मां को पता भी नहीं चला। किंतु जब दूसरे दिन मां की नींद खुली और देखा कि जिस गहने जिस आभूषण पहन करके वह सोई थी वह तो सब अदृश्य हो गए हैं। अभी क्या है छोटी बच्ची है उसको तो आभूषण के नाम भी नहीं पता है। किंतु सजना धजना तो अच्छा लगता है। मां सरस्वती का अंश है। आध्या शक्ति स्वयं आई है पृथ्वी पे। तो फिर वह मां चंद्रामणि देवी को अपने अंग पे श्री अंग पर इशारा करके पूछ रही है कि मैंने यहां यहां पर यह जो सब गहने पहने हुए थे वह कहां गए? तो मां चंद्रामणि देवी की आंखों में से आंसू आ जाते हैं और छोटी बच्ची शारदा को अपनी बाहों में भर के कहती है कि बिटिया अभी तो हमारा यह हमारी यह शक्ति नहीं है कि तुमको सोने के गहने से सजाए किंतु एक दिन अवश्य आएगा कि जब मेरा बेटा रामकृष्ण तुमको जितने चाहे उतने आभूषण दे देगा। तो देखिए कि यह जो बात चंद्रामणि देवी ने कही थी वो भविष्य में किस तरह से सच होती है। किंतु वो तो भविष्य की बात है। अभी उसके उसी दिन किंतु हुआ ऐसा कि जयराम बाटी से मां के एक चाचा उनको देखने के लिए आए और जैसे ही आकर के देखा कि हमारी इतनी लाडली बेटियां उनको इतने सुंदर गहनों से सजाया गया था। सब गहने उन्होंने वापस ले लिए हैं। तो वह बड़े ही क्रोधित हो गए और फिर मां शारदा को अपनी गोद में उठा के जयराम भाटी वापस ले गए। तो देखिए कि यह वही कहानी मेना को जो चिंता हो रही थी कि यह भगवान शिव मां पार्वती के गहने बेचकर के भांग खाते हैं। यहां पर ये भगवान रामकृष्ण वो भांग तो नहीं खाते। इस अर्थ में कि वह जो नशे वाला चीज है किंतु भांग से भी जो सुपर भांग होती है वह सब समय भाव में रहते थे। भगवान शिव भांग खाते थे तो भगवान रामकृष्ण भाव खाते थे। तो ये भाव में जिस तरह से रहते थे इस भाव में रहकर के उन्होंने जगत तो छोड़ दिया। किंतु इस तरह के सोने के संतानों को उन्होंने अपने भाव के माध्यम से प्रसव किया। यही राखाल यही स्वामी जी यही अपने एक के बाद एक शरद महाराज शशि महाराज उन्होंने रामकृष्ण संघ की रचना की और फिर देखिए कि किस तरह से चंद्रामणि देवी का जो वचन है वह सत्य हुआ है कि जब राधु का विवाह हुआ उस समय वो ताजपुर का जमींदार का घर था। अभी उन लोगों के घर विवाह देना है तो मां का भी तो शिव का ही संसार था। मां के भाइयों का कहां वो राधु को गहने से सजाएंगे। किंतु बाय दैट टाइम मां के पीछे में समग्र रामकृष्ण मिशन खड़ा था और फिर कोलकाता के भक्तों ने इतने सारे गहने लाए वहां पे जय राम बाटी में और राधु को सजाया कि जो कि त्यागी संतान मां के यह कहानी लिखते हैं। वह कहते हैं कि राधु ने इतने सारे गहने पहने थे। सर के ऊपर में सोने का मुकुट पहना था। सोने के इतने सारे गहने थे कि राधु को बेचारी को चलने में तकलीफ हो रही थी। इतने सोने के गहने उसको पहनाए गए थे। तो देखिए कि वही जो अपनी जो चंद्रामणि देवी की ये जो प्रॉमिस था वो किस तरह से इस तरह से फुलफिल होता है। तो देखिए कि ये भगवान शिव उनके बारे में कहते क्या है? शिव महिमन स्तोत्र में लिखा गया है। स्मशानेवा क्रीडा स्मरहर पिशाचाहा सरचरा स्मशान में क्रीडा करते हैं। पिशाच है उनके सहचर चिता भस्मा लेप त्रगपी नुकर रोटी परिककर चिता की भस्म से आलेपित है और नरमुंड की माला धारण किए हुए हैं। अमंगल्यम शिलम तव जिनका समग्र स्वभाव जिनका स्वांग अमंगलमय है अमंगल्यम शिलम तव भवतु नाम एवं अखिलम आपका समग्र जो कुछ है सब कुछ अमंगलमय है स्मशान पिशाच चिता की भस्म नरमुंड की माला सब कुछ अशुभ है अमंगलमय है किंतु तथापि स्मरत णा वरद परम मंगलमसी जो लोग आपकी स्मरण करते हैं उनके लिए आप परम मंगलमय है। तो यह जो ड्यूल नेचर है भगवान शिव का वैसा ही ड्यूल नेचर है भगवान रामकृष्ण का। घर में खाने के लिए कुछ नहीं है। किंतु इस तरह से अपने संतानों को आशीर्वाद देते हैं। देखिए आज का रामकृष्ण मिशन आज के ठाकुर के गृहस्थ भक्त सब लोगों के घर में खाने-पीने का कोई अभाव नहीं है। तो यह कि एक और तो है मां की यह पीड़ा और दूसरी और है कि यह वास्तविकता इस तरह की वास्तविकता कि जिसको हम पहली नजर से नहीं समझ पाते जैसे-जैसे उनको स्मरण करते जाएंगे वैसे ही उनका जो दूसरा स्वरूप है वह प्रकट होगा। तो देखिए
शिव के विचित्र आचरण से लोग माँ की निंदा करने लगे
यह जो तीन नंबर का गीत है एबार अमार उमा एले यह यह गीत में भी इसी तरह का एक भाव व्यक्त किया गया है। मां मेना वह सोचती है कि इस इस बार जब मेरी पुत्री घर वापस आएगी तो फिर मैं उसको फिर से उसके जमाई मेरे जमाई के घर वापस नहीं भेजूंगी। तो यह तीसरा गीत मैं रिक्वेस्ट करता हूं कि उसको भी गाया जाए। मा बोल मुथा सुनो गोविंदा जो बार को जो तू माने बाए माई जी को छा माई जी को छा माई जी को छा जा राम जो राम प्रसाद पाए हे दुखों के प्राण दीजो राम प्रसाद पाए हे दुख की प्राण शशाने मा शरे शिव शश मा श तेरे शिव शशानी मा शरे भावना आ माथा हो ना तुम्हारा माथा हो ना मन को तुम्हारा माथा वाह खूब भो महा श्वेता दी खूब भो देखिए देखिए कि ए बार आार उमा एले आर उमाय पाठाबोना इस बार जब मेरी कन्या उमा घर वापस आएगी मायके वापस आएगी तो फिर उसके ससुराल उसको मैं नहीं भेजूंगी यह मैना है मां पार्वती की मां इस गीत को गा रही है बोले बोलबे लोके मंदो कारो कथा सुनो नाम अभी ये विवाहिता कन्या है मायके रख दिया है उसको अपनी मां के घर में पिताजी के घर में तो लोग तो निंदा करेंगे ही कि उसको तो पति के घर जाना चाहिए मां पिताजी के घर क्या कर रही है करने दो लोगों को निंदा मैं किसी की बात नहीं सुनेगी सुनूंगी यदि ऐसे मृत्युंजय अभी उनके जो पति है मृत्युंजय स्वयं भगवान शिव वो यदि आएंगे अपनी पत्नी को वापस लेने के लिए उमा ने बार कथा कह यदि कहेंगे कि उमा को वापस दे दो तो क्या करेंगे माए जिए करबो झगड़ा मां और पुत्री कन्या दोनों झगड़ा करेंगे उनके पति के साथ में जामाई बोले मानबो ना यदि दामाद कहते हैं कि कन्या को वापस दे दो तो भी बात सुनेंगे नहीं द्विज राम प्रसाद कोई ए दुखों की प्राण सोए राम प्रसाद कहता है कि क्या यह दुख हमारे प्राण में सहन होगा जामाइश मौशाने मोशाने ने फिरे घरे भावना भावे ना बेचारी मेरी पुत्री की क्या हालत है ये जमाई है दामाद है वह सब समय श्मशान फसान में घूमता रहता है और घर की तो चिंता करता नहीं है इस बार मेरी उमा आएगी शशाने फिरे घरे भावना भावे नाम कि वो श्मशान श्मशान में घूमता रहता है और घर की चिंता नहीं करता है तो देखिए कि यह एक मां के हृदय में इस तरह का जमाई प्राप्त होने से दामाद प्राप्त होने से यह हाल है या एग्जजेक्टली आप देखिए कि खास करके यह बोले बोलबे लोके मंदो ये जो लोग निंदा करते हैं जब इस तरह से पुत्री का विवाह होता है इस तरह के दामाद के साथ में जिसके बारे में सब तरह की बातें चलती रहती है। तो देखिए कि जब विवाह के बाद में मां शारदा देवी जयराम भाटी में रह रही है तो जयराम भाटी में सब तरह की यह सब कहानियां फैल रही है। पहले तो वो बीच-बीच में समाचार आता है दक्षिणेश्वर से कि वो जो रामकृष्ण है अपनी ये जो शारदा के पति वो वहां पर पता नहीं क्या सब करते रहते हैं। दिगंबर होकर के रहते हैं। कभी मां-मां बोलकर के रोते रहते हैं। कभी वो समाधि में चले जाते हैं। जड़ हो जाते हैं। जो मां काली को खिलाने का जो आहार है, मां काली को ऑफर करने का जो भोग है, बिल्ली को खिला देते हैं। यह पता नहीं किस तरह का पागलपन उनके सर पर सवार हो गया है। बीच-बीच में बेहोश हो जाते हैं। पता नहीं नशा करते हैं कि क्या करते हैं। इस तरह की सब तरह की कहानियां जय राम भाटी में चलती है और मां की ओर इशारा करके सब लोग कहते हैं कि देखिए यह पागलेर स्त्री एक पागल की पत्नी है और फिर जैसे अपना दुख जताने के लिए किंतु ये लोगों का ऐसा होता है ना कि दूसरों का दुख देखकर के किसी किसी को आनंद आता है तो किंतु वो लोग करेंगे क्या मुंह से दुख दिखाने के तो जाएंगे किंतु भीतर भीतर से उनको आनंद आनंद आता रहेगा तो वे लोग मुंह से बोलेंगे तो सही सहानुभूति के वचन कि यह श्यामार मेर खेपा जामायर शंगे बे होए छ श्यामा अर्थात कि श्यामा सुंदरी देवी मां के मां की मां तो यह श्यामा की कन्या का एक पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है। इस तरह की बातें मुंह से तो बोलेंगे भीतर भीतर में हो सकता है कि आनंद आता हो। तो मां जब मां शारदा यह सब कुछ देखती थी तो बेचारी दुखी हो जाती थी। किस हिसाब से वह अपने पति की निंदा सहन करें। यह मां सती का भी तो वही था। दक्ष अपने पिताजी है। वहां पर यज्ञ में गई थी। देखा कि पिताजी सबके सामने उनके पतिदेव की निंदा कर रही है। तो सहन न कर पाई और अग्नि में अपने देह की आहुति दे दी। तो यहां पे मां शारदा भी बेचारी अपने पति की निंदा कैसे सहन कर पाएंगी? तो वह अकेली-अकेली रहती थी और कहीं जाती नहीं थी। बस वो एक भानु पीसी बोल कर के एक उनकी ये जो ये थी सहृदया उनके घर पे वो रहती थी। उनके घर का जो वरांडा है वहां पर जाकर के वो अपना आंचल बिछा के कभी-कभी सोई रहती थी। अभी देखिए कि यह भानु पीसी वो वही है जिन्होंने श्री रामकृष्ण देव का जो सही स्वरूप है वह पहचाना था और इसीलिए उन्होंने यह मां शारदा को कहा था कि यह हर गौरी की कहानी याद करके एक गान के छल में गान के भाव से माध्यम से कहा था नातनी तूई जेमन सुूपा तोर बोर जुटे छे नटा खेपा नातनी अर्थात कि यह मेरी कन्या तुम जितनी सुूपा हो तुम जितनी सुंदर हो तो वैसा ही तुम्हारा वर मिला है नटा खेपा नगटा अर्थात कि नंगा खेपा अर्थात कि पागल ये पागल दिगंबर आपको तुमको तुम जितनी सुूपा हो जितनी सुवर्ण वर्णा तुम्हारा देह है जितनी सुंदर हो देखने में उतना ही ये पागल दिगंबर तुम्हारा जमाई तुम्हारा पति तुमको मिला है तो किंतु देखिए कि ये भानुपीसी सी थी वो किंतु समझती थी येटा खेपा ये पागल दिगंबर कौन है शिव स्वयं है तो वो एक थी कि जिनकी मां के प्रति सहानुभूति थी किंतु बाकी सबका देखिए कि मां के प्रति या तो फिर कटाक्ष भाव था या तो फिर यह फेक सिंपथी वे लोग दिखाते थे। तो जिस तरह से मां पार्वती को इस तरह से लोगों की यह बातें सहन करनी पड़ती थी। उनकी माताजी जो है मेना उनको लोगों के यह जो टाने हैं वह सहन करने पड़ते थे। वैसे ही मां शारदा देवी को भी यह सब कुछ सहन करना पड़ता था। और यह सब कुछ सहन करने के बावजूद जो एक बात मां सती मां पार्वती में थी वह मां शारदा में अपने पतिदेव के ऊपर में कभी भी संदेह नहीं किया। कभी भी शक नहीं किया। कभी भी डाउट नहीं किया। और इसीलिए जब समय आया शिव और पार्वती के मिलन का शिव और शक्ति के मिलन का तब मां शारदा के मन में स्वयं यह बात जागृत हुई कि चलो मैं खुद अपनी नजरों से भगवान का दर्शन करके आती हूं मेरे पतिदेव का कि यह लोग जो सब बोल रहे हैं कि वह पागल है। पागलों की हरकत करते हैं तो यह सब सही है कि नहीं। मैं खुद दक्षिणेश्वर कोलकाता जाऊंगी। अपनी नजरों से उनका दर्शन करूंगी। और फिर यह बात उन्होंने जब उनके पिताजी को पता चली रामचंद्र को तो उन्होंने कहा कि चलो मैं ही तुमको ले जाता हूं। तो वह जो प्रथम यात्रा थी जयराम भाटी से दक्षिणेश्वर जाने की वो पूरी तपस्या से भरपूर थी। हमको पता है कि किस तरह से रास्ते में मां को बुखार आ गया और वह बुखार भी ऐसा कि कुछ समय के लिए तो प्राण का संदेह हो गया। तो वहीं पर बुखार में मां बेचारी पड़ी हुई है। उनके पिताजी बड़े मायूस है। वह वहां पर और इस रास्ते में तो कहां डॉक्टर वगैरह मिलने वाले हैं। तो वह भी बेचारे ईश्वर के सामने अपनी पुत्री की प्राणों की रक्षा करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। यहां पर मां बेहोश होकर के पड़ी है। उस समय एक दर्शन हुआ कि एक श्याम वर्णा स्त्री उनके सामने आकर के बैठी और उनके देह के ऊपर में अपना शीतल हाथ रखा। तो जैसे ही यह शीतल हाथों का स्पर्श हुआ, यह बुखार की जो ज्वाला है, बुखार का यह जो हीट है, गर्मी है, वह धीरे-धीरे करके शीतल होने लगा। तब फिर मां शारदा ने पूछा कि तुम कहां से आई हो? तो यह श्याम वर्णा स्त्री ने कहा मैं दक्षिणेश्वर से आई हूं। तो फिर मां आश्चर्यचकित होकर के कहती है अच्छा मैं भी तो दक्षिणेश्वर ही जा रही हूं। सोचता सोची था मैंने सोचा था कि वहां पर जाऊंगी। अपनी आंखों से अपने चक्षुओं से उनका दर्शन करूंगी। अपने हाथों से उनकी सेवा करूंगी। किंतु कहां अभी जो परिस्थिति है मुझे नहीं लगता कि मैं वहां पर जा पाऊंगी। तो फिर यह श्याम वर्णा स्त्री क्या कहती है? तुम अवश्य वहां पर जाओगी और तुम्हारे लिए ही तो मैंने उनको वहां पर अटका करके रखा है। तो देखिए वो स्त्री कौन थी और कोई नहीं भवतारिणी काली स्वयं जिनकी आराधना भगवान रामकृष्ण देव किया करते थे। तो फिर दूसरे दिन देखा गया कि मां शारदा का बुखार है वह ठीक हो गया है। वो फिर से स्वस्थ हो गई है और फिर दूसरे दिन से उन्होंने चलना शुरू किया। तो धीरे-धीरे करके वे लोग दक्षिणेश्वर पहुंच गए। दक्षिणेश्वर जाकर के देखा जैसे ही भगवान रामकृष्ण देव का दर्शन किया उन्होंने इतने आदर के साथ में इतने स्नेह और प्रेम के साथ में उनका स्वागत किया कि मां के मन में जो कुछ भी संदेह की एक रेखा भी यदि उसने जन्म ली होगी। मां के मन में जो यह एक विमर्श भाव होगा वह सब कट गया और अपने पतिदेव के प्रति फिर से वही श्रद्धा और आदर वो पुनः जागृत हो गया। तो यह देखिए कि मां पार्वती की कहानी और मां शारदा की कहानी इसके बाद का जो कुछ गीत है उसमें धीरे-धीरे करके ये जो मां के दूसरे स्वरूप है वो धीरे-धीरे करके प्रकट होते जाएंगे। जिसको कि अभी हम कल देखते हैं। आज यम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
कहाँ आकर एक सूत्र में बँधती हैं शिव-पार्वती और ठाकुर-माँ की कथाएँ?
हम लोगों का तो सब कुछ आखिर में मां के साथ में ही तो जुड़ा है ना। अभी पौराणिक जितनी भी कहानियां है तो वही तो नारायण और नारायणी फिर से आए हैं लीला करने के लिए तो यह लीला तो सब समान ही है उस वैदिक युग में जो एदेर जीवन और महात्म्य तो इन लोगों के जीवन का जो महात्म्य है ठाकुर और मां का वो तभी तो समझ में आएगा। अभी देखिए दुर्गा है या मां काली है उनका महात्म्य सहज गम्य है। सहज स्पष्ट है। किस अर्थ में कि दानवों का संहार किया है। तो वो तो एकदम नजर से दिख जाता है कि हां वो शुम निशुम रक्त बीज ये वो सब राक्षसों का संहार किया तो फिर चलो अभी उनकी महिमा है। किंतु मां और ठाकुर उन्होंने वैसे कोई राक्षसों का संहार तो किया नहीं और ऐसा नहीं था कि राक्षस की कमी थी। ये जो ब्रिटिश राज था भारत में इस तरह से भारतीयों का शोषण करता था कि हम लोगों की जो आज की दुरावस्था है वो उसी के दिनों की प्रारंभ हुई है। तो हो सकता है कि उन्होंने पौराणिक रूप यदि धारण किया होता तो यह ब्रिटिश गवर्नमेंट के जितने भी सेना है ये जितने भी उनकी गन बोट है उसको मार के भगा दिया होता। किंतु ऐसा नहीं करके ठाकुर वो दक्षिणेश्वर में बैठे थे। मां वो जय राम भाटी कोलपाड़ा यहां कोलकाता में आकर के उद्बोधन मायरबाड़ी भक्तों को आशीर्वाद देने के अलावा और कुछ नहीं किया माने ऊपर ऊपर से ऐसा लगता है तो फिर प्रश्न होगा कि भगवान शिव और मां पार्वती या तो फिर यह नारायण और नारायणी इनकी जो हम आराधना उपासना करते हैं तो वही आराधना उपासना हम ठाकुर और मां की क्यों करें? उन्होंने कौन से राक्षसों का संहार किया है? उन्होंने कौन से महाभारत का युद्ध जीत लिया है? उन्होंने कौन से 10 सर वाले वो रावण का वध किया है। तो एक्चुअली उन्होंने संशय राक्षस का वध किया है। आज के युग में जो हमारे हृदय में संशय है कि हां चलो दिखावे के लिए मंदिर में जाते हैं। किंतु हृदय से तो ऐसा कोई भाव नहीं आता है। जो झूठ बोलना जो चीटिंग करना डिसऑनेस्टी रखना अपने जीवन में वही चलता ही रहता है। मंदिर में आने के बाद में भी जाने से आने के बाद में भी तो फिर क्या है वह संदेह है हमारे हृदय में उसका वध किया है तो अभी यह महात्म ठीक-ठीक समझना होगा ना तो यह पौराणिक जितने भी पात्र हैं उनके जीवन के साथ में ठाकुर और मां के जीवन का मेल बिठाना होगा तब अच्छे से आप समझ पाएंगे कि कहां पे क्या मैच हो रहा है।
मैंने एक दूसरे महाराज से जप के अलग नियम सुने हैं; अब कौन-से नियम का पालन करूँ?
देखिए इसमें क्या है कि जितने भी टीचर हैं उन सबका अपना-अपना एक थिंकिंग रहता है। भारतीय आध्यात्मिकता बहुत विराट है। उसमें सब तरह की संभावनाएं निहित है। आप यदि एक टीचर को फॉलो करते हैं तो उनको करते जाइए। उनके ऊपर में श्रद्धा रख करके। फिर एक टीचर की बात दूसरे को करके उनका ओपिनियन पूछना। उससे क्या होगा कि आप ना ही उनको फॉलो कर पाएंगे ना ही इनको ठीक से फॉलो कर पाएंगे। तो सबका अपना मंतव्य है। जिसके ऊपर में अपनी श्रद्धा बैठे उनको आप फॉलो कीजिए। रामकृष्ण संघ में मंत्र के बारे में ऐसे कोई कठिन नियम नहीं है। ऐसा नहीं है कि इसी परिस्थिति में करना है या उसी परिस्थिति में करना है। देखिए ठाकुर मां का बनाया हुआ आहार करते थे तो ठाकुर स्वस्थ रहते थे। तो फिर ठाकुर एक बार उन्होंने देखा कि फिर महीने में तीन दिन जो है मां आहार नहीं बनाती। तो फिर ठाकुर ने मां को कहा कि यह जो तीन दिन तुम आहार नहीं बनाती हो मेरे लिए खाना नहीं बनाती तो मेरा देह जो है मेरा स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। तो तुम एक काम करो वो तीन दिन भी तुम ही मेरे लिए खाना बनाना। यह काली मंदिर का जो प्रसाद आता है उसमें इतना मसाला फसाला डाला है मेरे से सहन नहीं होता। मेरा हेल्थ बिगड़ जाता है। तो मां ने कहा कि ये तीन दिन तो स्त्रियां खाना नहीं बना कोई भी शुभ कार्य नहीं कर पाएंगी। तो मैं किस तरह आपके लिए खाना बनाऊं? तो ठाकुर कहते हैं कि देखो मैं खाऊंगा मेरे लिए बनाओ। मैं कहता हूं तुम बनाओ। इससे कोई कुछ दिक्कत नहीं होने वाली। तो फिर मां इस तरह से ठाकुर के लिए खाना बनाती है और ठाकुर खाकर के सुस्त रहते हैं और फिर वो मां को कहते भी है देखो तुम जो खाना बनाती हो तो खाकर के मैं कैसा सुस्त रहता हूं। तो क्या है कि रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा बड़ी लिबरल है। ऐसा कोई हार्ड एंड फास्ट रूल अपने यहां पर नहीं होता। एक जनरल पवित्रता मेंटेन करनी होती है। जितना नियम आप बढ़ाते जाएंगे उतना ही हमारे सर पर ये कंस्ट्रेंट बैठती जाएगी।
मैंने बंगाली कैसे सीखी
मैं जब जॉइ करने के लिए आया था ना तो चेन्नई टी नगर सेंटर में गया था। सबसे पहली बार जॉइ करने के लिए जो आया था तो कमलानंद जी थे वहां पर हेड तो अभी मैं उनको पहचानता नहीं था तो किंतु वहां पर और एक दूसरे महाराज थे तो उनका नाम किसी ने मुझे दिया था कहा कि तुम जाकर के उनसे बात करना तो अभी यह खाने का समय हो गया था खाना शायद चल रहा था तो जिन महाराज को मैं मिलने के लिए गया था वह खाना खा रहे थे तो मैं किसी ने कहा कि तुम यहां पर थोड़ा वेट करो अभी यह लोग आते हैं तो मैं वहां पर वेट कर रहा हूं ऑफिस में तो दूसरे एक महाराज आए तो मैंने उनको प्रणाम किया देखा काफी सीनियर है तो मैंने कहा आप वही महाराज है क्या जिनको मैं मिलने के लिए आया हूं तो वो कहते हैं नहीं नहीं वो अभी आ रहे हैं तो ठीक है थोड़ा बैठो थोड़ा वेट करो फिर उन्होंने मेरे साथ में बात करना शुरू किया अभी मुझे यह नहीं पता था कि वो उस आश्रम के हेड थे कमलानंद जी तो अभी कमलानंद जी मुझे बताए बिना कि वो कौन है मेरे साथ में बात कर रहे हैं पूछ रहे हैं कहां से आया हूं क्या हूं क्या कर रहा हूं वगैरह वगैरह तो एक प्रश्न प्रश्न मुझे पूछा कि तुम्हारी मदर टंग क्या है? अभी मैं तो चेन्नई में था। हम लोग इंग्लिश में बात कर रहे हैं। तो मुझे पूछा तुम्हारी मातृभाषा क्या है? व्हाट इज योर मदर टंग? तो मैंने कहा गुजराती तो उन्होंने कहा कि तो उन्होंने थोड़ा सोचा फिर मुझे पूछा अच्छा तुम्हारी मां कौन है? तो अभी का प्रश्न तो मैंने कहा मां शारदा मैं तो जॉइ करने के लिए आया हूं। साधु होने को आया हूं। तो एकदम स्पष्ट उत्तर होना चाहिए। मां शारदा वही तो अभी तो हमारी मां है। घर की मां जो थी उनके साथ में जो संबंध था जिस दिन आप ज्वाइन करने को आए तभी से तो सब संबंध समाप्त हो जाना चाहिए। तो जैसे ही मैंने कहा मां शारदा तो मुझे सामने पूछते हैं तो अच्छा अभी बताओ तुम्हारी मातृभाषा कौन सी हुई? तो मैंने कहा बंगाली वो हंसने लगे। बोला कि तुम बंगाली सीखना शुरू कर दो। तो देखिए कि तभी से मैं प्रयास कर रहा हूं बंगाली जितना हो सके इतना सीखने का। ओम