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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र अभी हमने अभी तक पूर्व भूमिका इसकी अच्छे से देखी और पूर्व भूमिका में हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज हमको वर्णित करते हैं कि मां शक्ति का पृथ्वी पर आगमन का क्या तात्पर्य है क्या महात्म है तो वह पूरा हमने अभी तक देखा अभी जैसे कि यह मां का जीवन है मैं यहां पर भी हमारा आश्रम है आश्रम में मंदिर है और मंदिर के नीचे में एक हॉल है लेक्चर हॉल है तो वहां पर भी मैं यह माका का जीवन ले रहा था उसके क्लासेस तो उस समय मैंने सोचा था कि किस तरह से मां के जीवन का जीवन को भक्तों के सामने रखें यदि मैं सिर्फ किताब ही पढ़ता रहूंगा तो यह तो बड़ा ही बोरिंग हो जाएगा इसके साथ में बड़ा ही डिटेल एक्सप्लेनेशन होने चाहिए और जो परिकर प्रसंग है यह जो प्रसंग यहां पर वर्णित है उसके अनुसार प्रसंग वगैरह होने चाहिए तो उस समय जो मैं एनालिसिस कर रहा था तब मैंने देखा कि जैसे इस किताब में या तो कोई भी जीवन है उसमें तीन इंग्रेडिएंट्स रहते हैं एक तो है फिलोसोफी किस तरह से आप अवतार का जीवन समझने का प्रयत्न करेंगे क्योंकि अवतार का जीवन तो सिर्फ एक प्रसंगों की घटमा नहीं है उसके भीतर में एक डीप फिलोसोफी है इनके पृथ्वी पर जन्म धारण करने का एक तात्पर्य है तो तात्पर्य क्या है और वह तात्पर्य जो मिशन जिसके लिए उन्होंने अवतार ग्रहण किया है वह मिशन उन्होंने किस तरह से फुलफिल किया यह दोनों पार्ट यह जीवन में होते हैं तो एक तो हो गया फिलोसॉफिकल एस्पेक्ट दूसरे हो गए प्रसंग ऑफकोर्स एक के बाद एक मां के जीवन के या तो अवतार के जीवन के जो प्रेरणादाई प्रसंग है हमारे सामने जीवनी का वह हमारे सामने रखते रहेंगे और तीसरा हो गया नरेशन यानी कि सिर्फ एक बैकग्राउंड आपको खड़ा करना है एक जीवन की घटना वली को आपको वर्णित करना है तो अभी फिलोसोफी जो है उसका डिस्कशन तो हम लोग करते हैं थोड़ा सा डिफिकल्ट है किंतु वह डिस्कशन के ऊपर में बेस है प्रसंग जो है प्रसंग हमको प्रसंग अपने आप में बड़े ही मधुर लगते हैं इसलिए उसका कोई दिक्कत नहीं किंतु ये जो नरेशन है जो वर्णना है वो हमको पॉइंट वन से पॉइंट बी की ओर ले जाती है वह वर्णना कभी-कभी हमारे लिए बोरिंग हो जाती है हमको जिन्होंने जीवन पढ़ा है किताब पढ़ी ही है उनके लिए लगेगा कि अरे यह तो सिर्फ रिपीटेशन ही हो रहा है और वर्णना में हमको कोई फिलोसोफी या कोई इस तरह का प्रेरणादाई प्रसंग शायद नहीं मिलेगा तो मैं जब सैटरडे को क्लास ले रहा था तब मैंने ठीक किया था पहले तो फिलोसोफी छेड़ देते हैं क्योंकि फिलोसोफी में उस क्लास में लूंगा तो फिर जो दो तीन लोग आते थे वो भी आना बंद हो जाएंगे तो मैं और वर्णन भी मैंने छोड़ दिया क्योंकि वर्णन सिर्फ पढ़ना उसमें और कुछ नहीं तो क्या है कि लोगों को इतना इंटरेस्ट ना आए मैं सिर्फ प्रसंग लेता था एक के बाद एक प्रेरणादाई प्रसंग है जो कि मैं वहां पर किताब मेरे सामने वैसे खुली रहती थी किंतु प्रसंग का वर्णन में वैसे ही करता था तो लोगों को क्या है कि और थोड़ा सा मसाला डाल कर के और थोड़ा सा इंटरेस्टिंग बना कर के तो लोगों को सुनने का थोड़ा आनंद आया आध्यात्मिक प्रसंग सुनने का तो अभी यहां पर भी मैं जब यह क्लास लेने की शुरुआत की तो मैं सोच रहा था कि यहां पर कैसे करेंगे फिलोसोफी यहां पर ऐड करेंगे ऑफकोर्स क्योंकि यह डेली क्लास है और फिलोसोफी मुझे एक बार तो मेरे खुद के संतोष के लिए उसको बोलना तो था ही प्रेरणादाई प्रसंग ऑफकोर्स हम लेंगे उसमें कोई प्रश्न ही नहीं किंतु ये जो वर्णन है वर्णन क्या क्या करेंगे वर्णन को हम स्किप कर देंगे सीधी फिलोसोफी टू प्रसंग टू प्रसंग टू फिलो ऐसे ही चलेंगे ना कि वर्णन को भी बीच में लेंगे तो मैं सोचा इसके बारे में और फिर मैंने ठीक किया कि नहीं वर्णन को भी बीच-बीच में नरेशन को भी साथ में ले लेते हैं इससे क्या होगा कि एटलीस्ट मैंने इस तरह का तो कोई क्लास लिया कि जहां पर मां का जीवन संपूर्ण रूप से वर्णित विवृत हुआ है भले ही चाहे इसको जितना ही टाइम लगे समाप्त होने में किंतु एटलीस्ट मैंने इस तरह का एक तो क्लास लिया तो तो इस तरह से यदि वर्णन को हमको लेना ही है तो फिर मैंने ठीक किया कि मैं बंगाली में से पढ़ कर के फिर उसका हिंदी करूं उसमें फिर ज्यादा टाइम होगा और वर्णन में इट सेल्फ इतना कुछ यह नहीं है कि मुझे ओरिजिनल बंगाली पढ़ना ही पड़े तो फिर मैं ठीक किया कि ये हिंदी में जो है वर्णन उसका सीधा सधी में हिंदी पाठ कर लूंगा और आपके पास में किताब भी है किताब में आप देख भी सकते हैं और इसमें अपने आप में कुछ नहीं किंतु मां के जीवन का जो बैकग्राउंड फाउंडेशन जो है वो इस तरह के वर्णन इस तरह का नरेशन बनाते हैं तो इस अभी इस तरह से मैंने सोचा है तो आज जो है यह थोड़ा सा वर्णन ही चलेगा शायद बोरिंग लगे शायद हमको रिपिटेटिव भी लगे किंतु इसको हो जाने देते हैं क्योंकि क्या है कि फिलोसोफी और प्रसंग को जोड़ने वाला यह नरेशन है और नरेशन यदि रहता है तो यह क्लास की सीरीज कंप्लीट होगी माने यह मां का जीवन हमने संपूर्ण रूप से पाठ किया और उसके ऊपर मैं चर्चा की इस तरह से एटलीस्ट मुझे एक तरह का संतोष मिलेगा तो इसके लिए मैं यह वर्णन पढ़ता हूं हिंदी में ही पढ़ता हूं और वर्णन समाप्त होने के बाद में शायद हम उसके ऊपर थोड़ा सा डिस्कस करें थोड़ा सा बोरिंग होगा किंतु मां का जीवन जिस तरह से है मां के जीवन के ऊपर में हमको यदि संपूर्ण रूप से श्रद्धा है भक्ति है तो यह वर्णन को भी हमको बहुत ही मतलब हमारे लिए इंपॉर्टेंट इसका होगा इंपॉर्टेंस इसका होगा हम लोगों को सन्यास के बाद में जयराम बाटी कमार पुकुर का टूर होता है आपको तो पता होगा बेलूरमठ में ठाकुर की तिथि पूजा की मध्य रात को सन्यास सेरिमनी होती है बेलूर मठ में मध्य रात के बाद में अर्ली मॉर्निंग कहा जाएगा दूसरे दिन का उस समय सन्यास सेरिमनी होती है सन्यास के बाद में तीन दिन हमको भिक्षा करके खाना है अभी भिक्षा कहा नहीं जाता है भिक्षा है वैसे नॉमिनली कहा जाता है किंतु सभी डिवोटा हों को पता है कि यह साधु लोग अभी भिक्षा के लिए जाएंगे तो वह बहुत सारे सन्यासियों के माता-पिता और बहुत सारे भक्त लोग वहां बेलूरमठ के गेट के सामने वह भिक्षा लेकर खड़े रहते हैं जैसे ही वह साधु ब्रह्म साधु अभी नव नए बने हुए साधु नए स्या जब वो गेट से बाहर निकलेंगे तो सभी डिवटी लोग उनको भिक्षा देंगे तो जो भी है तीन दिन इस तरह से भिक्षा होती है और इसके बाद में जयराम बाटी कमार पुकुर का टूर होता है तो कमार पुकुर को हमको ले गए थे वहां पर स्मशान में बैठ कर के हम लोगों ने जप किया था ध्यान किया था तो उस समय जब हम उस उस तरीके से अपने मन को एक उच्च कक्षा में स्थापित है उस समय हम यह जब यात्रा करते हैं तो यह जो वर्णन है है उस गांव का उस दिनों का उस परिस्थिति का तो यह वर्णन हमको सहाय करता है कि यहां की महिमा क्या है वो उसका चिंतन मनन करने के लिए मैं हमेशा ऐसा करता था ट्रेनिंग सेंटर में से या तो बाद में भी मैंने हमारे तीर्थ स्थानों की जब भी यात्रा की है तो पहले में यह वर्णन सब पढ़ लेता था जैसे कि पहली बार दक्षिणेश्वर गए थे तो दक्षिणेश्वर जाने से पहले कथामृत में आप देखेंगे कि सबसे पहले वो दक्षिणेश्वर मंदिर टेंपल जो है उसके बहुत ही सुंदर वर्णन है वहां पर हंसपुकुर है झावतला है पंचवटी है नाट मंदिर है विष्णु घर है काली मंदिर है पोस्ता है चांदनी है और आखिर में ठाकुर का घर तो है ही है तो सभी जो स्थान जो कि पवित्र स्थान जहां पर इतनी लीला हुई ईश्वर ने स्वयं आकर के हमारे दुख दर्द दूर करने के लिए हमको आशीर्वाद दिया हमारे साथ में हंसे गाए रोए यह पूरी लीला जहां पर हुई है वो स्थान का वर्णन कथामृत में है बिल्कुल पहले ही आप देखेंगे कि प्रथम दर्शन से पहले ही है तो उस समय जब आप तीर्थ यात्रा को जाते हैं तब यह वर्णन पढ़ के जाना है उनका महिमा पढ़ के जाना है तो हमको और भी ज्यादा वह स्थान पर रहने का स्थान का महिमा ग्रहण करने का वहां पर थोड़ी बहुत साधना करने का और भी ज्यादा आनंद आएगा तो यहां पर महाराज जी ने ने जयराम बाटी ग्राम की महिमा और वर्णन यह हमको शक्तिपीठ अध्याय में कहा है यह पहला अध्याय शायद हम इसको कहेंगे यहां पर नंबर नहीं दिए किंतु पहला अध्याय कहेंगे क्योंकि इससे पहले वह पूर्व भूमिका थी तो यहां पर शक्तिपीठ अध्याय है हिंदी में मैं उसको पढ़ता हूं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं शस्य श्यामला बंगभूमि का बांकुड़ा जिला साधारण तः अभावग्रस्त और दुर्भिक्ष पीड़ होने पर भी इसके दक्षिण पूर्व में स्थित छोटा सा गांव जयराम बाटी लक्ष्मी की कृपा दृष्टि से अन्य ग्रामों की अपेक्षा अधिक समृद्ध है कृषको के अथक एवं अ विश्राम परिश्रम के फल स्वरूप इसके खेत ईख धान गेहूं तथा विविध शाक सब्जियों से हरे भरे होने की वजह से हरे भरे होकर सदा हंसते रहते हैं श्री रामकृष्ण की जन्मभूमि कामा पुकुर से जयराम वाटी लगभग 3 मील पश्चिम की ओर स्थित है यह विष्णुपुर तहसील के अंतर्गत कोतुलपुर या तो फिर कोलपुर थाने के अधीन शिरोमणि पुर नामक पुलिस नाका के अंतर्व के उत्तर पश्चिम कोने से पूर्व की ओर बहकर स्वच्छ आमोर नदी गांव की उत्तरी सीमा निर्धारित करती हुई टेढ़ मेढ़ चाल से लगभग एक मील तक चली गई है यह हम लोग पहली बार जयराम बाटी गए थे तो व मैंने यह जो अमोदर नदी का जो हमने पढ़ा सुना है मां के जीवन में बार-बार आएगा अमोदर नदी के वहां पर कुछ प्रसंग हुए हैं कुछ घटना हुई है यहां पर भी महाराज जी लिखते हैं कि शरत महाराज वहां पर बैठ कर के गीता पाठ किया करते थे और सुबह को स्नान वगैरह करने के लिए जाते थे वहां पे तो अमोदर नदी का इतना सुंदर वर्णन शुरू करके मैं अपने मन में ये जो गंगा देखी है ना बेलूरमठ के वहां पे तो मैंने सोचा था इतनी कोई विराट नदी होगी मैंने नर्मदा भी देखी है तो इतनी कोई बहुत ही मतलब विस्तृत विराट नदी होगी वहां प जाकर के देखा तो छोटी सी नदी मने उसका जो ये है विड्थ है बहुत कम है तो जो भी है मां इसको अपनी गंगा कहती थी वो गंगा स्नान अमोदर में स्नान करने को मां गंगा स्नान के समान ही गिनती थी और कभी-कभी जैसे कि मैं दक्षिणेश्वर में पहली बार गया था तो मैंने सोचा था यह सब वर्णन पढ़ कर के कि कितनी विराट विस्तृत जगह होगी कहां पर वह पंचवटी होगी कहां पर ठाकुर का कमरा होगा कहां पर दक्षिण मां का मंदिर होगा क्योंकि इतनी सारी घटनाएं सुनकर के हमारे मन में एक ऐसा बैठ जाता है कि यही एक पूरा विश्व ब्रह्मांड है हमारे लिए यही एक पूरा यूनिवर्स है इसके बाहर जैसे कि कुछ है ही नहीं और जब हम सही सही में दक्षिणेश्वर पहली बार गया तो मैंने देखा कि अरे ठाकुर के कमरे से ये सब कुछ मिनट तक चलने से ही सामने ही पंचवटी आ जाता है तो यहां प उनको किस तरह से इतना म प्राइवेसी वो उनको मिला होगा ये तो यहां प लिखते हैं कि वो वहां पे कोई उनको डिस्टरबेंस ना हो कोई खलल ना पहुंचे इसके लिए वहां जाकर साधना करते थे या तो फिर वो पीछे में बैठ कर के वो जहां पर वो थोड़ा सा एक डिप्रेशन जैसा था वहां पर बैठ के साधना करते थे तो यहां पर तो ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता तो दो तीन चीजें हैं पहले तो उस समय झाड़ी जंगल वगैरह इतना था कि वो ऑलरेडी वो बीच-बीच में वो थोड़ा सा एक बेरियर जैसा नेचरली बनता था दूसरा कि आज के जमाने में आज के युग में इतने सारे लोग हम हो गए हैं हमारा जनसंख्या 150 करोड़ के आसपास पहुंच गया है कि जहां पर भी जाएंगे हमको 50 60 200 300 लोग से कम लोग नहीं दिखाई देते तीर्थ स्थानों में तो और भी बहुत ज्यादा तो जब लोग ज्यादा होते हैं तो जगह भी थोड़ी सी छोटी दिखने लगती है तो हो सकता है कि मने उस समय साइकोलॉजिकली यह सब बड़ा दिखता होगा वो पूरे इस पंचवटी और उस एरिया में मुश्किल से ठाकुर और बहुत ज्यादा तो यह हृदय वहां पर जाता होगा किंतु आज देखेंगे कि कितनी भीड़ है कितनी भीड़ बाप रे वहां पर मैं तो रुक ही नहीं सकता तो तो यह अमोदर नदी पीछे वह दक्षिण पूर्व की ओर घूमकर कामर पुकुर के मुकुंदपुर नामक पाड़ की सीमा को प्रक्षित करती हुई दक्षिण की ओर चली गई है संकीर्ण पाठ की और जाड़े में छिछली उस नदी के जल में स्थान स्थान पर छोटी बड़ी भवर हैं संकीर्ण पाट और छिछली यहां पर ऑलरेडी उन्होंने कह दिया है कि उसका जो विड्थ है वह बहुत ज्यादा नहीं है और गर्मी गर्मी के दिनों में या तो फिर शीत के दिनों में पानी सूख जाता है मैं भी जब गया था आई थिंक वैसे विंटर सीजन में ही गया था और बीच में पानी नहीं था तो हमने एक किनारे से निकल कर के नदी क्रॉस करके सामने के किनारे की ओर गए थे वो मुझे याद है यहां का ज गहरा और मछलियों से पूर्ण है कहां पर छोटी बड़ी भंवर हैं नदी में बीच-बीच में वो भंवर या तो लपल इंग्लिश में कहेंगे वो लपु वो गहन रहता है उसमें मछली वगैरह होती है उस भवरो में कभी-कभी छोटे-छोटे घड़ियाल दिखाई पड़ते हैं क्रोकोडाइल भवर में दिखाई देने पड़ते हैं उस वक्र गति वाली नदी ने जयराम बाटी के उत्तरी भाग में एक मनोहर उप द्वीप बनाया है उत्तरी भाग में एक उप द्वीप यानी कि जिसको कहेंगे आइलैंड उस उप द्वीप त्रिभुजाकार और बीच में उभरा घास से हरा भरा एवं बैल मौलसरी आम वट एवं पीपल आदि की शीतल छाया से समन्वित है जन कोलाहल से दूर होने के कारण यह स्थान नीरव शांत है इधर उधर दो एक स्मशान दो एक स्मशान चिन्न रहने के कारण वह वैराग्य उद्दीपक भी है पक्षियों के कलरव से युक्त फल फूल से भरे इस साधना दुकूल मनोरम स्थान के बीच तत्कालीन एक आंवले के पेड़ के नीचे श्रीमती योगिन मा श्रीमती गोलाप मां तथा श्रीमत स्वामी शारदानंद जैसे अनेक विशिष्ट जन अमोदर में स्नान जप ध्यान तथा गीता चंडी के पाठ में बहुत सा समय व्यतीत करते थे श्री माताजी बाल्यकाल में इसी आमदर नदी में विशेष पर्वों के अवसर पर गंगा स्नान किया करती थी मां कहती थी यह हमारी गंगा है और वहां पर जाकर के स्नान को वह गंगा स्नान कहा करती थी जयराम बाटी की प्राकृतिक स्थिति अत्यंत रमणीय है प्रायः चारों ओर खुले मैदान है अमोदर नदी और ग्राम के बीच की भूमि लगभग आधे मिल के परिणाम से परिणाम में परिमाण परिमाण अर्थात कि मेजर परिमाण में खूब ही उर्वरा है यानी कि बहुत ही फर्टाइल है उपर्युक्त भूमि में थोड़े में ही संतुष्ट होने वाले कृषक परिवारों की उपयोगी वस्तुएं धान दाल तरकारी हल्दी आदि पैदा हो जाती है फर्टाइल जमीन है थोड़ी सी ही है किंतु जयराम बाटी के गांव के लोग भी वो इतने क्या कहेंगे संतोष संतोष समान धन नहीं ऐसा वह कहते हैं कि संतोष की तरह और कोई धन नहीं है तो थोड़े में ही संतुष्ट हो जाने वाले कृषक परिवार वहां पर रहते हैं और उनको जो कुछ चाहिए वह सब यही व फर्टाइल जमीन में से वह उपज जाता है उसमें सब पैदा हो जाता है माता जी के बाल्यकाल में कपास की भी खेती होती थी और वहां की तलैयां में यथेष्ट मछलियां भी मिल जाती थी कहा जाता है कि माता जी अभी यहां पर माता जी लिखा है किंतु मां ही ठीक है एक्चुअली मैं यह गुजराती ट्रांसलेशन वगैरह देखता हूं तो सब जगह पर माता जी लिखा है अभी यहां के लिए यहां के कल्चर के अनुसार अनुसार शायद वोह माता जी ठीक लगता होगा किंतु हम लोग जो बंगोली में मां शब्द जो सुनते आए हैं उससे लिए हमको वो मां शब्द ही सबसे ज्यादा अच्छा लगता है कहा जाता है कि मां के जन्म होने के पहले गांव में उतनी अधिक समृद्धि नहीं पाई जाती थी उनके आविर्भाव के पश्चात ही गांव की आर्थिक स्थिति में उन्नति हुई उस समय इस छोटे से गांव में कोई भी दुकान नहीं थी तथापि खेतों में उत्पन्न वस्तुओं से संतुष्ट ग्रामवासियों को साधारणतया अन्यों का मोह नहीं ताकना पड़ता था विशेष काम पड़ने पर वे न मील दूर कामर पुकुर के हाट में जाते थे और वहां से मिठाई आदि खरीद लाते थे छह मील उत्तर की ओर कोतुलपुर में उनकी अन्य आवश्यक सामग्रियां जैसे कि वस्त्र नमक मसाला आदि प्राप्त होती थी अथवा पाच छ मील दक्षिण पश्चिम कपाट बदनगंज में जाकर वे हाट बाजार करते थे जयराम बाटी से एक मील पश्चिम सिहोड़े छोटी दुकाने थी और करीब डेढ़ मील की दूरी पर पुकुरे गांव में भी एक मोदी की दुकान थी विशेष अवसरों पर वह भी जयराम बाटी की आवश्यकता की पूर्ति करती थी गांव के उत्तर अमोदर नदी के उस पार विस्तृत मैदान के बाद एक बड़ा भारी गांव देश है उसके पूर्व में भी मील पर विस्तृत धान के खेतों के पश्चात अमोदर नदी है उसे पार कर अमरपुर गांव है जिसके बीच से पैदल कामर पुकुर पहुंचने का मार्ग है आजकल यह मार्ग चौड़ा और सरल बना दिया गया है मार्ग के दोनों ओर वट पीपल आदि के वृक्ष है जिनकी शीतल छाया में थके मादे राही तथा चरवाहे विश्राम करते मां के पितृवचन निवासी थे इन मुखोपाध्याय तथा इनके दो हित्र वंशी बंदोपाध्याय कुल के अतिरिक्त और कोई ब्राह्मण परिवार इस समय नहीं है इनके अतिरिक्त विश्वास मंडल घोष और सामूहिक उपाधि विशिष्ट कई सदगुरूनगर हलवाई एक घर लोहार दो-तीन बागदी परिवार इत्यादि मिलकर लगभग 100 परिवार अपने छोटे-छोटे मिट्टी के घरों में आडंबर हीन ग्राम्य जीवन व्यतीत करते हैं यहां पर देखिए कि सभी का अपनी जाति के अनुसार वर्णन है कोई मंडल है घोष है ग्वाले है नाई है हलवाई है लोहार है बाग दी है तो आजकल इस तरह का वर्णन हम लोग थोड़ा सा अवॉइड ही करते हैं क्योंकि मनु यह हम जिस घर में जन्म ग्रहण किए हैं उस उसी परिवार के या तो फिर उसी वंशानुगत गण गुण या तो गुण व क्या कहेंगे कि हमारे कैरेक्टरिस्टिक इस तरह का होगा ऐसा कुछ नहीं है आजकल तो यह कोई गरीब परिवार है उसमें से भी आईएएस आईपीएस ऑफिसर जन्म ग्रहण करते हैं तो उसमें तो क्या कोई बड़ी बात है कल 261 का वो यह था वो एनिवर्सरी कल परसों दिन तो मैं वह थोड़ा सा पढ़ रहा था कि उस दिन क्या हुआ तो एक लेडी इंस्पेक्टर का इंटरव्यू मैंने देखा तो वह बता रही है कि किस तरह से यह जो क्रिमिनल थे उस समय के सिर्फ 2611 वाला नहीं इन जनरल जो क्रिमिनल जो हुआ करते थे उनके ऊपर में आईबी की किस तरह से वोह तीक्षण दृष्टि रहती थी और किस तरह से उनके टेलीफोन है वोह टेप किया करते थे तो ये जो लेडी इंस्पेक्टर है वो बता रही है कि हम लोग उनकी जो ये डिस्कशन उनका जो परिवार के साथ में बात सुनते थे क्रिमिनल लोगों का तो क्या वो सब कभी-कभी कोई विचित्र चीज हमको माने एक इंसाइट होती है ना य ह्यूमन नेचर में ऐसा कुछ जानने को मिलता था जैसे कि उस समय का एक बहुत बड़ा क्रिमिनल उसने नाम बोला मैं भूल गया तो वह अपनी बीवी के साथ में बात कर रहा है टेलीफोन पे और आईबी वाले टेलीफोन टैप कर रहे हैं वो लेडी इंस्पेक्टर सुन रही है आईपीएस ऑफिसर वो ये जो आदमी है क्रिमिनल वो वो अपनी बीवी को पूछता है कि उसकी तीन लड़कियां क्या कर रही है फिर वो छोटी थी स्कूल में पढ़ती थी अब यह क्रिमिनल जो है वो अपनी बीवी को बोलता है बार-बार बोलता है देखो तुम उसको अच्छे से पढ़ाई करवाना वो मैं चाहता हूं बड़ी हो के आईपीएस ऑफिसर बने बार-बार ऐसा बोल रहा है कि उसका ट्यूशन जो है उसका जो खर्च है स्कूल है वगैरह देखो कि वो होमवर्क ठीक से करती है कि नहीं मैं चाहता हूं कि वो आईपीएस बने तो दो चीजें वो क्रिमिनल ये लेडी आईपीएस ऑफिसर को पहचानता था तो उसे इतना इंप्रेस हो गया था उसको खुद को पता है कि मेरा जीवन जो है वो जैसे भी बीता हो किंतु मैं अपनी लड़कियों को यह जो आईपीएस ऑफिसर जिसने जो मेरे पे केस कर रही है जिस जो जो कि उसको गिरफ्तार कर रही है वो मैं मैं चाहता हूं कि मेरी लड़कियां उसके जैसी हो तो देखिए कि किस तरह से यह ह्यूमन नेचर है हमको लगता है कि यह बहुत बड़ा क्रिमिनल है इतने बुरे काम उसने किए हैं कि अभी उसका जीवन तो खत्म ही हो गया किंतु उसके भीतर में भी उसके मन के भीतर में भी एक ऐसा एक एक है कि नहीं मुझे अच्छा जीवन बिताना है व समझता है कि एक पढ़ाई लिखाई करके एक अच्छा इंसान होना वो सर्वश्रेष्ठ है भले मैं नहीं कर पाया तो मैं चाहता हूं कि मेरी लड़कियां ये जो आईपीएस ऑफिसर जिसके जो जो जो उसके ऊपर जो उसके पीछे लगी थी वो जिसके ऊपर में केस कर रही थी इन्वेस्टिगेशन कर रही थी मेरी लड़कियां उसके जैसी बना तो ये आईपीएस ऑफिसर कहती है कि मैं तो सुन कर के ही आश्चर्य चकित हो गई कि यह इतना हार्डन क्रिमिनल उसके पकड़ना उसका जो नेटवर्क है उसको व एक के बाद एक टेक डाउन करना बस्ट करना यह इतना डिफिकल्ट काम है किंतु उसके भीतर में भी ऐसा है कि वह एक अच्छा इंसान वोह नहीं हो सका तो उसकी लड़कियों को बनाना चाहता है तो वैसे ही ये खैर वो क्रिमिनल एक चीज हो गया ये और यह एक दूसरा चीज हो गया यहां पर जो वर्णन है उस समय की जो समाज व्यवस्था थी उसके अनुसार सभी लोग अपना अपना काम करते थे और संतुष्ट रहते थे कि फिर भी आजकल हमको इस तरह का वर्णन और कहीं पर भी हमको देखने को नहीं मिलता इलेक्शन के समय होता है थोड़ा किंतु व एक दूसरा बात है गांव के नाम की उत्पत्ति के संबंध में कोई निश्चित मत हमें विदित नहीं है संभव है कि गांव का नामकरण किसी आराध्य देवता अथवा पूर्व पुरुषों में किसी के नाम के साथ हुआ होगा ग्राम के दक्षिणी भाग में ताड़ के वृक्षों से घिरे बैनर्जी ताला में ग्राम निवासी स्नान करते थे और वहीं से पीने का जल भी लेते थे देखिए आज तो इसको कितना डेंजरस माना जाएगा मां को जो बार-बार बीमारी होती थी बार-बार ज्वर होता था तो इसी के कारण जिस तालाब में स्नान करते हैं जिस तालाब में कपड़े धोते होंगे वहीं से यह पीने का पानी लाते हैं व एक सेंस ऑफ हाइजीन स्वामी जी जब अमेरिका से लेटर लिखते हैं उस समय में आई थिंक आलम बाजार में मड शिफ्ट हुआ था जब स्वामी जी को पता चला कि ये मठ नई जगह पर शिफ्ट हुआ है तो उन्होंने कहा बहुत अच्छा ब अच्छा किया फिर ये हेल्थ और हाइजीन के ऊपर में उन्होंने पूरा अपने लेटर में लिखा है तो मैं सोचता था कि आज हम जिस चीज को इतना सहज मानते हैं कि पानी को उबाल करके पीना या तो फर फिल्टर करके पीना तो उस समय स्वामी जी को अमेरिका से गुरु भाइयों को लिखना पड़ा था कि पानी को फिल्टर करके पीना है तो मैंने ये जो वाटर बोन डिसीज जो होते हैं उसका शायद पता भी नहीं होता लोगों को ये आजकल का मॉडर्न साइंस देखिए कि कितना साइलेंटली हमारे लिए काम कर रहा है इस तालाब के दक्षिण में कमलों से शोभित एक सुंदर प्राचीन तालाब है ग्राम के पश्चिमी भाग में कृषकों की सिंचाई का सहारा आर नामक बृहद जलाशय है एवं लगभग मध्य भाग में पुण्य पुकुर नामक पुराना तालाब है पुण्य पुकुर के पश्चिमी तट के दक्षिणी भाग में मां का नया घर है मां का घर बना था 1916 में उसी के किनारे के उत्तरी भाग में एक झोपड़ी है यहीं मुखर्जी वंश का एक प्राचीन देवालय है उसी की एक कोठरी में सुंदर नारायण नामक कछुए की आकृति विशिष्ट विशिष्ट धर्म ठाकुर विराजित है अभी तक मुखर्जी लोग उनकी पूजा बारी-बारी से करते आ रहे हैं दूसरी कोठरी को काली माड़ो या मंडप कहते हैं जिसमें प्रतिवर्ष काली पूजा अनुष्ठा हुआ करती थी इसी के एक क्रम कमरे में ग्राम्य पाठशाला थी ग्राम के बालक बालिकाएं आंचल में लाई बांध और बगल में ताड़ के पत्ते दाब पड़ने के लिए दोनों समय वहां एकत्र होते थे उत्तर पश्चिमी कोने में दीवार से लगा हुआ काले पत्थर का षष्टि देवी का एक प्रतीक था नवविवाहित वरव ु को यहां आकर प्रणाम करना पड़ता था श्री रामकृष्ण और श्री मां को भी अवश्य यहां आना पड़ा होगा पुण्य पुकुर के दक्षिण ओर से जो पगदी गई है उसके दक्षिण में मदल पाड़ा स्थित मोडल पाड़ा स्थित है उसी के दक्षिण में सिंहवाहिनी देवी का मंडप है जिसके पुरोहित मुखर्जी लोग हैं हम जिस समय की बात लिख रहे हैं उस समय देवी एक फूस के छाजन में स्थापित थी अब पक्की नीव के ऊपर टीन के छाजन में है पुण्य पुकुर के तट पर श्री मां का नया मकान है और उत्तर दक्षिण की ओर प्रधान ग्राम मार्ग है उसी के दक्षिण में कुछ आगे बढ़ने पर मां के जन्मस्थान के ऊपर ईंटों से बना हुआ एक मंदिर दिखाई देता है मुखर्जी लोग पहले इसी भूमि खंड में निवास करते थे किंतु वंश वृद्धि के साथ-साथ वे लोग दक्षिण पश्चिम की ओर फैल गए पूर्व उक्त ग्राम मार्ग के पश्चिम में उनके घर आज भी विराजमान है प्राचीन घरों के पूर्व की ओर एक फूस का घर था उसके बीच में दीवार थी एक ओर बैठक खाना और दूसरी ओर भीतरी भाग था दक्षिण की ओर रसोई घर ढेंकी शाला आदि थी तो आज यही तक करते हैं कल फिर से मिलते ये पूरा जो वर्णन है हमारा यह मैं पढ़ लूंगा एक बार और इसके बाद में वह प्रसंग स्टार्ट हो गए जब प्रसंग स्टार्ट होंगे और बीच-बीच में जब फिलोसोफी आएगी तो उस परे हमारा काफी डिस्कशन होगा तो कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु जय मा