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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 25 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र अध्याय का नाम है भार समर्पण इसके बारे में हम देख रहे थे कि किस तरह से श्री रामकृष्ण मां शारदा देवी को भविष्य भविष्य के रामकृष्ण संघ की आध्यात्मिक गुरु दायित्व ग्रहण करने के बारे में उनको तैयार कर रहे हैं। और पिछले क्लास में हमने देखा कि किस तरह से स्वामी प्रेमानंद जी महाराज या तो फिर स्वामी विवेकानंद मां के बारे में क्या कह रहे हैं। तो अभी आगे पढ़ते हैं कि क्या लिखा है इस चैप्टर में।

श्रीरामकृष्ण कामारपुकुर में माँ शारदा की दिव्यता का उल्लेख करते है

श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर स्पष्टतो तो श्री माय देवत्व घोषणा करार पूर्वे कामार पुकुर इहार इंगितो दिया छिलेन दक्षिणेश्वर में श्री मां के देवत्व के बारे में घोषणा करने से पहले कामार पुकुर में ही ठाकुर ने मां का सही स्वरूप क्या था उसके बारे में एक इशारा किया था उसके बारे में एक ऊपर ऊपर से एक स्पष्ट शब्दों में समझा दिया था कि मां का जीवन चरित्र और मां के पृथ्वी पर आगमन इसका क्या औचित्य है? इसका क्या प्राधान्य है? इसका क्या इसकी क्या आवश्यकता है? तो देखिए कि यह कामार पुकुर की घटना अभी मां का जीवन या तो फिर अपने संघ की यह जो टाइमलाइन जो है जिन्होंने स्टडी की होगी उनको पता है कि किस तरह से अराउंड 1858 1898 के आसपास में श्री रामकृष्ण कामार पुकुर गए थे। ठाकुर वहां पर दक्षिणेश्वर में थे। साधना कर रहे थे। तो ठाकुर की साधनाओं की सब अजीबोगरीब बातें वहां पर कामार पुकुर में जाती थी। ठाकुर की मां चंद्रामणि देवी के पास में कि उनका लड़का पागल हो गया है और पता नहीं क्या अजीबोगरीब हरकतें करता है। वह मां के जो मां काली के पुजारी है तो मां काली के लिए जो प्रसाद की लुची या तो पूरी आती है वह बिल्ली को खिला देते हैं वगैरह-वगैरह बातें कामरार पुकुर में जाती थी। तो फिर जैसे होता है गांव में और इवन शहर में भी कि सलाह देने वाले 10 लोग खड़े हो जाते हैं। तो किसी ने सलाह दी मां को मां चंद्रामणि देवी को कि आपके बेटे का विवाह करवा दीजिए। विवाह होगा तो सब ठिकाने हो जाएगा। यह जो मां मां करके जगदंबा मां काली करके घूमता है। संसार का दायित्व एक

कहानी: संसार की जिम्मेदारी

बार सर के ऊपर में आएगा तो फिर यह सब भूल जाएगा। ठाकुर की ही वह कहानी है कि वह जयपुर में गोविंद जी के पुजारी तो राजा ने उनको पुकारा किसी काम से कहा कि आप राज दरबार में आइए ऐसा करके निमंत्रण भेजा तो पुजारी कहते हैं कि राजा को ही बोलिए यहां पे आए। यानी कि क्या है कि पुजारी तो तो गोविंद जी के पुजारी है तो उनका तो एक अपना स्टेटस है। राजा बुलाने से राजमहल में क्यों जाएंगे? राजा को यदि काम है तो मंदिर में ही आ जाइए गोविंद जी के मंदिर में। तो राजा ने सोचा मेरे सामने इतना घमंड दिखाता है तो क्या उपाय किया जाए तो उपाय यह है कि उनकी शादी करवा दो बिना ब्रह्मचारी थे तो ब्रह्मचर्य का तेज होता है साधना का एक तेज होता है और फिर त्यागी यदि संसार की जवाबदारी नहीं होती ब्रह्मचारी है साधना कर रहे हैं पूजा कर रहे हैं तो त्यागी है त्यागी को फिर राजा की क्या आवश्यकता है तो फिर उनकी शादी करवा दी 10 लोगों ने सलाह दी राजा को तो शादी हो गई फिर लड़का भी हुआ। अभी लड़के के लिए तो सब चीजें चाहिए होती है। तो फिर अभी पुजारी ही अपने से ही बीच-बीच में राज दरबार में चले जाएंगे। गोविंद जी का वो वो चरणामृत लेकर के ना कि यह पूजा है उसके लिए निमंत्रण देने के लिए वगैरह-वगैरह। तो जब शादी होती है बच्चे होते हैं बीवी आती है घर में तो ऑटोमेटिकली उनकी संभाल लेने के लिए धन भी चाहिए। पैसा भी चाहिए। फिर उस समय त्याग मैं त्यागी हूं। मैं साधक हूं। वो सब बातें भूल जाते वो भूल जानी पड़ती है। तो यहां पे भी 10 लोगों ने मिलकर के मां को सलाह दी चंद्रामणि देवी को कि अपने बेटे का विवाह करवा दीजिए। तो फिर खैर अभी ठाकुर का विवाह तो हुआ किंतु विवाह हुआ किन से? जगत जननी जगदंबा स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होकर के आई थी उनके साथ में। अभी ठाकुर को तो उनका सही स्वरूप पता है किंतु बाकी सबको मां का सही स्वरूप क्या है वह पता नहीं था। ठाकुर के भीतर में तो वह पहले से ही कामार पुकुर गांव में ठाकुर की बाल्य लीलाओं का अभ्यास करते हैं। उनके बारे में पढ़ते हैं तो हमको पता चलता है कि किस तरह से वहां गांव की स्त्रियां ठाकुर को जैसे कि बाल गोपाल रूप में ही देखती थी। उनको अपने घर में बुलाने के लिए उनके साथ में वार्तालाप करने के लिए उनके श्री कंठ से मधुर संगीत सुनने के लिए वे लोग कितनी आतुर रहती थी। वह सब कहानियां तो है किंतु फिर ठाकुर जिनके साथ में विवाह करेंगे वह भी कोई सामान्य स्त्री तो होगी नहीं। इस तरह से सोचना बहुत कम लोगों के नसीब में था। इन लोगों में जिन लोगों ने इस तरह से सोचा था उनमें बड़ी भाग्यमती थी एक प्रसन्नमई यदि मुझे नाम ठीक याद है तो अभी वह लाहा बाबू की घर की वह एक कन्या थी और ठाकुर के प्रति उनकी बड़ी भक्ति थी किंतु जब वो हमको पता है कि ठाकुर की जब महासमाधि हुई दक्षिण कोलकाता में उसके बाद में ठाकुर ने मां को कहा था कि तुम कामार पुकुर में जाना वहां पर रहना वहां पर अपना घर हमेशा बचा के रखना। तो फिर मां उनके कहने के अनुसार कामार पुकुर जाकर के रहने तो लगी किंतु फिर उस समय के विधवाओं के नियम के अनुसार वो जो सफेद कपड़े पहने हैं। फिर गहने नहीं रखने हैं। फिर वह मस्तक मुंडन करवाना है। वो जो सब और खाने-पीने में बड़ी कठोरता करनी है। तो मां तो फिर वो जो सफेद साड़ी वैसे तो पहनती थी। किंतु लाल किनारी वाली सफेद साड़ी पहनती थी और उनके जो हाथों में चूड़ियां बनाकर दी थी ठाकुर ने वह घटना भी हमको पता है कि जब मां वो सोने की चूड़ी चूड़ियां निकालना प्रयास कर रही थी उसी समय ठाकुर ने आकर के उनका हाथ पकड़ कर के कहा था कि मैं गया कहां पे हूं इस कमरे में से उस कमरे में इतना ही तो तो फिर वह मां ने चीर सधवा उस समय भी कामार पुकुर में भी बहुत सारे लोग मां की निंदा करते थे तो उस समय एक बार मां ने फिर से ठीक किया और यह यह जो घटना है कि मां चूड़ियां निकालने का प्रयास कर रही थी वह तो वहीं पर काशीपुर में ही हो गई बात कि ठाकुर की महासमाधि के बाद की ही बात है किंतु फिर जब मां कामार पुकुर आई उस समय भी बहुत सारे लोग निंदा कर रहे थे तो उस समय भी मां ने इस तरह से दो चूड़ियां निकालने का प्रयास किया तो फिर ठाकुर ने फिर से आकर के कहा कि अरे मैं मर थोड़ी ना गया हूं कि तुम विधवाओं की तरह रहोगी। उसके बाद में ठाकुर कहते हैं कि देखो शाम को यह गौर दासी आएगी। उसको तुम पूछना कृष्ण तंत्र के बारे में। तो फिर मां सोचती है यह क्या है? मुझे तो पता नहीं किंतु खैर उसी शाम को देखिए ठाकुर की जो भविष्यवाणी ठाकुर ने कहा था शाम को गौर दासी आएगी। तो अभी यह गौरी मां उसी दिन शाम को कामार पुकुर पहुंची और फिर जब मां ने उनको पूछा कि यह ठाकुर ने इस तरह से दर्शन देकर के कहा था तब यह गौर दासी कहती है गौरी मां कहती है कि हां नित्य कृष्ण नित्य लीला यह बात वैष्णव तंत्र में है। तो यह वैष्णव तंत्र के अनुसार श्री रामकृष्ण देव का निधन देह से यदि चला गया है। सदेह पृथ्वी पर नहीं है तो उनके जो सूक्ष्म स्वरूप है या तो फिर उनके आशीर्वाद है पृथ्वी पर हमेशा बने रहेंगे। इस हिसाब से मां चीर सधवा है। मां कभी विधवा होगी ही नहीं। तो जब गौर दासी के मुंह से गौरी मां के मुंह से जब मां ने यह बात सुनी तो फिर से उन्होंने चूड़ियां उस समय भी नहीं निकाली थी। किंतु हुआ ऐसा था उस समय कामार पुकुर में कि कुछ कुछ लोगों का ऐसा वह जैसे गांव में होता है रूढ़िच चुस्त गांव में तो कुछ लोग इस तरह से कमेंट करते थे कोई कुछ कहता था वगैरह-वगैरह तो उस समय यह प्रसन्नमई थी उसने कहा था कि गदाई गदायर बहु ओरा देवाशी अर्थात कि गदाई और गदाई की बहू यानी कि श्री मां शारदा देवी यह लोग देवाशी है। देव के अंश से उन्होंने जन्म ग्रहण किया है। वे लोग कभी कोई गलत कार्य कर ही नहीं सकते। तो कामार पुकुर में ज्यादातर लोगों को मां का सही स्वरूप क्या था वो नहीं पता था। किंतु कुछ-कुछ लोग थे कि जिनको कि यह बात पहले से ही समझ में आ गई थी। तो जो भी है किंतु ठाकुर ने उसी समय कामार पुकुर जब कोलकाता से जाते मां उस समय जयराम भाटी में रहती थी। जय राम भाटी से जब भी ठाकुर कामार पुकुर आएंगे मां को बुलाते थे मां भी आती थी कामार पुकुर रहती थी ठाकुर की सेवा करती थी उन दिनों की यह घटना है कि किस तरह से गांव की स्त्रियों को ठाकुर मां के सही स्वरूप के बारे में बताते हैं क्या कहते हैं अशिक्षितो ओ अमार्जितो

कहानी: कामारपुकुर में श्रीरामकृष्ण माँ सारदा की महिमा की घोषणा करते है

बुद्धि ग्राम वासिनीरा निश्चय ताहा धारणा करते पारे नाई पहले तो गंभीरानंद जी कहते हैं कि हां पहले ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में ही नहीं कामार पुकुर में भी मां का जो देवत्व है उसके बारे में इंगित दिया था। इशारोंइशारों में कहा था। पहली के रूप में कहा था। किंतु जो अशिक्षित वो अमार्जित बुद्धि जो लोग गांव की जो स्त्रियां अशिक्षित थी और उनकी बुद्धि सुसंस्कृत नहीं थी। इसके लिए उन्होंने ठाकुर के वचनों की ठीक-ठीक धारणा न कर पाई। ठाकुर के वाणी को ठीक से समझ ना पाई। ठाकुर ने क्या कहा था? श्री मां तखन चतुर्दश व्स और बयश का किशोरी मां की उम्र उस समय चतुर्दश वत्सर 14 साल की थी किशोरी थी। ठाकुर जोखन पल्ली रमणी दिग के उपदेश दीते श्री मां शश सुनीते सुनीते माझे माझे घुमया पड़ी तेन ठाकुर उस समय जब पल्ली की यानी कि गांव की स्त्रियों को उपदेश देते तो फिर मां वह सब सुनते-सुनते सो पड़ती अच्छा यह गांव की स्त्रियों को उपदेश देना अर्थात क्या लीला प्रसंग में बड़ा सुंदर वर्णन है यह सब कुछ कि जब ठाकुर काार पुकुर जाते तो अभी जैसे वो जो जैसे जैसे वृंदावन में गोपियां अपने घर छोड़कर के पति को छोड़कर के अपने बच्चों को छोड़कर के जब भी भगवान कृष्ण बंसूरी बजाते हैं कैसी दौड़ी दौड़ी चली जाती थी उनके लिए ही जैसे कि उनका जीवन सर्वस्व है अपना घर अपना परिवार वो सब भूल जाती थी तो कामार पुकुर में भी ऐसा होता था जब भी कोलकाता से ठाकुर आते मतलब जब तक ठाकुर कामार पुकुर में ही थे उस समय की तो बात ही नहीं किंतु जब कोलकाता से भी जब ठाकुर आते तो यह सब स्त्री या ठाकुर के घर पर आकर के उनका जो वरांडा होता है वहां पर बैठी रहती ठाकुर के साथ में बातें करती रहती यहां तक कि जब ठाकुर किसी स्त्री को पूछते हैं कि अच्छा तुम्हारा घर का काम करना है या तो फिर तुम्हारा लड़का है उसका क्या हुआ तब वह स्त्री एकाएक चौंकित हो जाती चमकित हो जाती कहती अरे अरे यह सब काम तो हम भूल ही गए दौड़ना पड़ेगा अभी कोई स्त्री कहती कि ठाकुर को जब दर्शन करने के लिए आती है उनकी बातें सुनने के लिए तो वह कहती कि सुबह से ही घर में खाना सब पका करके करके रखा है। बच्चे को खाने की सब व्यवस्था कर दी है। तब कहीं मैं आकर के यहां पर आई हूं। अब जब तक आप बात करेंगे मैं आपकी बात सुनूंगी। यानी कि अपने परिवार का सब काम छोड़कर के यह स्त्रियां ठाकुर के घर के सामने आकर बैठी रहती। जब तक ठाकुर बातें करते तो वे लोग भी सुनती। तो अभी नेचुरली है कि मां भी वहां पर आई हुई है जय राम भाटी से तो वह भी सब स्त्रियों के साथ में बैठकर के ठाकुर की अमृतमय वाणी सुनती। किंतु होता क्या कि सुनते-सुनते कभी वह सो पड़ती। अभी क्योंकि क्या है कि देखिए गांव की स्त्रियों को तो सब कार्य करना है। सुबह से उठकर के फिर अभी आजकल की तरह जो हम हम जिस चीजों के बारे में संपूर्ण रूप से अभ्यस्त हो गए हैं कि हां घर में पानी आ जाता है। कपड़े वगैरह धोने की सब घर में ही यह जो रनिंग वाटर जिसको कहते हैं प्लंबिंग इलेक्ट्रिसिटी यह सब चीजों ने इतना सारा सुविधा हमको कर दिया है कि इसके बिना का जीवन हम कल्पना भी नहीं कर पाते कि सुबह से ही आपको जलाशय है या कुआं है वहां पर पानी लेने को जाना होगा जब घर में पानी आएगा तब तो कहीं जाकर के कुछ कार्य प्रारंभ होगा तो यह और दूसरा क्या है कि देखिए कि मां अपने पिताजी के घर रहती थी जय राम अंबाटी में अभी जब तक पिताजी के घर मां के घर रहती है तो अपनी बच्ची को तो कोई इतना काम नहीं करने देगा। श्यामा सुंदरी देवी श्री मां शारदा देवी की मां वही तो सब कार्य किया करती थी घर संसार का वो इतना सारा कार्य करती थी। इसके बारे में विवरण भी हमने गंभीरानंद जी महाराज की किताब में पढ़ा है कि उस समय जब यह मां के पिताजी रामचंद्र का निधन हो गया। उसके बाद में जो घर की दुरावस्था थी फाइनेंशियल परिस्थिति जो थी तो मां की मां श्यामा सुंदरी देवी कितने सारे चार 10 छ सात जो चूल्हे एक साथ में जलते रहते थे उसमें वह भात वगैरह बनाती थी और फिर संसार का कितना सारा कार्य अपने हाथों से करती थी गाय को खाना खिलाना फिर वह जो उनका के खेत है खेत में जो मजदूर है किसान जो उनके खेत में काम करते थे खेत मजदूर उनके लिए खाने की व्यवस्था करना सब कुछ यह श्यामा सुंदरी देवी अकेले करती थी। तो मां जब मां शारदा देवी जब जयराम बाटी में होगी तो नेचुरली है कि मां को तो कोई इतना कार्य नहीं करने देगा। हालांकि मां कार्य करती थी। हमको पता है कि खाना वगैरह मां बनाती थी और चूल्ला जो हांडी जिसमें यह भात पकाती थी वह हांडी तो बड़ी हैवी रहेगी। तो मां तो छोटी थी। वह तो बड़े नाजुक हाथ। तो उतने छोटे हाथों से किस तरह से भात की हांडी वो चूल्हे से उतारेगी। तो वो अपने पिताजी को कहती थी कि पिताजी हांडी को उतार दीजिए। तो फिर यह पिताजी आकर के हांडी को चूल्हे से उतारते थे। तो काम करने का अभ्यास था। किंतु जब ससुर गृह में आते हैं जब स्त्री अपने ससुर के या तो पति के घर आती है तो नेचुरली जिम्मा बढ़ जाता है। रिस्पांसिबिलिटी बढ़ जाती है। तो कामार पुकुर में आकर के मां को ज्यादा काम निश्चय करना पड़ता होगा और काम करके अभी वह बालिका है काम करने का इतना अभ्यास नहीं है तो नेचुरली जब बैठने को मिला तो वह जिस तरह से नेचुरली होता है सोप पड़ती थी। तो फिर क्या होता श्री मां से सब सुनीते सुनीते माझे माझी घुमाइया पड़ते ठाकुर की बातें सुनते सुनुनते मां कभी सो पड़ती अन्न मेरा अमनीता के ठेलिया तुलीते चेष्टा करी तो दूसरी स्त्रियां मां को धक्का मार के नींद से उठाने की उठाने का प्रयास करती एवं बलितो और कहती एवोन कोथागुली सुन लेना घूमिए पड़ लो यह सब जो अमृतमई वाणी है ठाकुर की यह सब सुनोगी नहीं सुनी नहीं सो पड़ी क्या ठाकुर बोली ते तब जब उनको नींद में से उठाने का प्रयास करती बाकी सब स्त्रियां उस समय ठाकुर कहते नागो ना ओके तुलोना ना जीना उसको उठाना मत नींद से ओ की साधे घूम छे वो क्या अपनी इच्छा से सो रही है क्या ए सब कथा सुन ले वो एकने थाकबे ना चोचा दौड़ मारबे यह सब बातें सुन जब वह सुनेगी ईश्वर की बातें ईश्वर दर्शन की बातें ईश्वर के स्वरूप की बातें मां जगदंबा के बारे में मां काली के बारे में तो वह यहां पर थोड़ी ना रहेगी चोचा दौड़ मारवे सीधी दौड़ लगाएगी कहां वैुंठ लोक में लक्ष्मी होकर के नारायण के पास में वह रहती थी वह स्वरूप उनको याद आ जाएगा और फिर वह पृथ्वी पर रहेगी नहीं कितनी सुंदर बात देखिए ठाकुर देखिए ठाकुर की जो बात करने की स्टाइल भी कितनी सुंदर है। ए सब कथा सुन ले वह एकने थाकबे ना चोचा दौड़ मारवे यह सब बातें सुनकर के वह यहां पर रहेगी नहीं सीधी दौड़ लगाएगी सीधी वैुंठ लोक में चली जाएगी मेरा पोरे श्री मां के इहा बोलिया छीलो बाद बात बाद में यही सब स्त्रियों ने मां को यह बात बताई थी मां को तो पता नहीं है कि ठाकुर उनके बारे में यह बात कह रहे हैं कि जैसे ही ठाकुर की वाणी सुनेगी सीधी वैुंठ लोक में चली जाएगी वो तो सो रही थी इसलिए इसलिए सब स्त्रियों ने बाद में मां को यह सब बताया था। देखिए अभी यहां पे एक

कहानी: कुछ महिलाओं ने मां शारदा को ठाकुर को दवा देने के लिए उकसाया ताकि उन्हें बच्चे हो सकें

बात याद रखनी है कि यह जो वैुंठ में चली जाएगी वगैरह-वगैरह यह तो हमारा इंटरप्रिटेशन है। ठाकुर ने इस तरह से तो नहीं कहा ठाकुर की वो जो क्रिप्टोग्राफिकल लैंग्वेज है कि मिनिमम वर्ड्स यूज करके वह बोलते हैं। फिर उसके ऊपर में इंटरप्रिटेशन हमको बिठाना है। अब जिसमें बुद्धि है वह ठीक-ठीक इंटरप्रिटेशन बिठाएगा। जिसमें अकल नहीं है वह फिर गलत इंटरप्रिटेशन बिठाएगा। तो ठाकुर ने एक्चुअली क्या कहा है? वो कश्यप कथा सुन ले एकने थाक में ना चौचा दौड़ मारवे। यह सब बातें सुनकर के वो यहां पर रहेगी नहीं। सीधी दौड़ लगाएगी। अभी जिन लोगों में जैसे कि हम लोग हैं हमको पता है कि मां कहां जाएगी? जाएगी तो वैुंठ लोक में ही तो जाएगी। कैलाश पर्वत पर ही तो जाएगी। इसके अलावा तो और कहीं जाना नहीं है। अभी इन सब स्त्रियों में से जिनको समझ में आया वो आया। जिनको नहीं आया वो लोग सोचेगी कि शायद ठाकुर की यह सब बातें सुनकर के मां जयराम बाटी वापस चली जाएगी। क्योंकि देखिए कि यह तो एक भी एक बात है कि जब आप किसी के साथ में आपका विवाह हुआ है तो जिसके साथ में विवाह हुआ है वह संसार करेगा। यह तो आपकी एक सामान्य अपेक्षा होती है। अदरवाइज आप संसार करेंगे ही क्यों? अभी जैसे जिन दोनों का विवाह हुआ है पतिप का उन दोनों में यदि आपस में अंडरस्टैंडिंग है भी सही तो समाज एक ऐसा है समाज में 10 मुंह से बोलने वाले 10 लोग ऐसे होते हैं कि वह फिर अपना स्पेकुलेशन स्टार्ट कर देते हैं कि अच्छा इसको पुत्र क्यों नहीं हुआ? इसको अभी संतान क्यों नहीं हुआ? और फिर वे लोग आकर के 10 तरह की सलाह भी देते हैं। जिस तरह से चंद्रामणि देवी को सलाह देने वाले ऐसे मुरब्बी लोग थे जो अपने को बुद्धिशाली समझते हैं। ऐसे कि हां बच्चे की शादी कर दो सब ठिकाने आ जाएगा। तो ऐसे ही लोग फिर बाद में मां को भी कहते थे कि संतान हुआ नहीं है कैसे चलेगा वगैरह वगैरह और फिर इस तरह की स्त्री जिसको संतान नहीं होता है उसके बारे में फिर अपने समाज में इतना ही सब कठोर एक तरह का व्यवहार किया जाता है उत्सव जो पूजा वगैरह जो होती है उसमें पार्टिसिपेशन नहीं कर सकती है वगैरह-वगैरह तो यह सब बातें एक्चुअली हुई थी और एक बार दक्षिणेश्वर की बात है। ठाकुर यह सब सुन पाए थे कि यह जो मछुआन वगैरह जो होती है ना मछली पकड़ने जो मछली पकड़ने के लिए आती है उनकी स्त्रियां तो यह सब बातें मां को बता रही थी कि देखिए पुत्र संतान नहीं होता है तो पति को यह यह सब दवाई देने से औषध देने से पुत्र हो सकता है वगैरह-वगैरह। तो ठाकुर ने एक बार अपने कमरे में से यह सब बातें सुन ली थी। तो फिर ठाकुर बड़े चिंतित होकर के मां के पास में जाते हैं। एक बार यह सब स्त्रियां चली गई तो ठाकुर चिंतित होकर के अपने कमरे में से बाहर निकल कर के वहां पर नहबत में जाते हैं। हमको पता है कि दक्षिणेश्वर में यहां पर ठाकुर का कमरा था। पास में ही मां का नहबत था। तो ठाकुर नब में जाकर के कहते हैं मां को कि देखो मेरे पास में सब कुछ मौजूद है। ईश्वर ने मुझे सब कुछ दिया है। ऐसा मत सोचो कि मेरे में कोई शारीरिक कमी है। किंतु मैंने मेरा सब कुछ ईश्वर प्राप्ति के लिए ईश्वर दर्शन के लिए लगा दिया है। तुम मेहरबानी करके यह सब औषध वगैरह मुझे मत देना। ऐसा करके ठाकुर मां को कहते हैं। और कहने की भी जरूरत थी। देखिए ठाकुर का वही संतान हरीश जो ठाकुर के पास में आता था और ठाकुर के पास में त्याग वैराग्य की बातें सुनकर के अपनी पत्नी के साथ में वह संसार नहीं करता था बोलकर के उसकी पत्नी ने इसी तरह की कोई दवाई खाने में डालकर के उसको खिला दी उसके बाद में उसी का मस्तिष्क विकृत हो गया माथा खराब हो गया और जयराम बाटी जाकर के मां शारदा देवी को परेशान करता था मां के पीछे में दौड़ रहा था और मां माने उसको फिर मां तो दो-तीन बार तो फिर वहां पर गोलगोल करके दौड़ी थोड़ी किंतु फिर वो अभी ये पुरुष है उसके सामने आप कितना दौड़ेंगे तो फिर आखिर में मां का सही स्वरूप आन पड़ा मां ने उसको धक्का मार के जमीन पर फेंका उसकी जीभ खींची एक हाथ से और दूसरे हाथ से जोर-जोर से उसके मुंह पर चांटा मारना शुरू किया। मां का जो बगला स्वरूप है वह फिर प्रदर्शित करना पड़ा। तो यह परिस्थिति भी आ सकती है यदि लोगों की बात सुनकर के आप अपने पति को इस तरह की दवाई वगैरह खिलाएंगे तो इसके लिए देखिए कि यह सब कुछ कि लोगों की नजर में संसार क्या है वह 10 बातें बोलने के लिए लोग आएंगे तो ठाकुर पहले से ही इशारोंइशारों में समझा देते हैं कि मां का सही स्वरूप क्या है अभी जो लोग इस सही स्वरूप को समझे होंगे वे लोग धन्य है जो नहीं समझे। उन्होंने यह अपॉर्चुनिटी मिस कर दी। अभी जैसे जो समझे थे उनमें यह प्रसन्नमई लाहा बाबू की यह कन्या तो इस तरह से यह पूरा प्रसंग आगे में महाराज क्या लिखते हैं? ठाकुर ए

माँ सारदा का पृथ्वी पे अवतरण का युगप्रयोजन

कथागुली की और थे बोलिया छिले त जाने ठाकुर यह बात किस अर्थ में कहे थे वह तो वही जानेंगे हो तो तनी ए रूप आभास दिया छिले जे श्री माय मन शोभाई ए रूप उर्ध्वगामी जे नरो लीलार उपजोगी परिबेश परिबेश रचनार पूर्वे इृश्य उच्च तत्व करण गोचर होइले मायावलंबने शकार जो साधने पूर्वे तनी एमोन गंभीर समाधि निमग्न होइया पड़ते पारेन जे लीला विग्रह धारण व्यर्थ होइया जावेन बाप रे एक पूरे पैराग्राफ जैसा सेंटेंस है पूरे लीला प्रसंग में शरद महाराज की कॉपी मारी है हो सकता अभी देखिए पहले तो हमने अपना मैंने अपना इंटरप्रिटेशन कह दिया अभी यहां पे महाराज क्या लिखते हैं कहते हैं कि ठाकुर किस अर्थ में यह बात बोले थे वह तो ठाकुर ही जाने किंतु हो सकता है कि ठाकुर ने यह आभास दिया था कि श्री मां का मन स्वभावतई अर्थात कि स्वाभाविक रूप से इतना उर्ध्वगामी था कि नर लीला के उपयोगी परिवेश रचना के पूर्व ही यानी कि नर लीला जो ठाकुर की पृथ्वी पर हो रही है उसके लिए एक परिवेश रचना करना पड़ेगा। उसके लिए समय के साथ में भक्तों को जुगाना पड़ेगा। भक्तों को इकट्ठा करना पड़ेगा। भक्तों को ईश्वर साधना के बारे में सिखाना पड़ेगा। धर्म चक्र प्रवर्तन करना पड़ेगा। नव युग में नव संदेश नव अवतार का पृथ्वी पर फैलाना पड़ेगा। और उसके लिए जो परिवेश रचना करनी होती है हो सकता है कि उससे पूर्व ही उससे पहले ही इस तरह की ईश्वर तत्व सब जब कानों में जब जाएगा तो माया अवलंबन को माया अवलंबन के द्वारा स्वकार्य साधन के पहले ही मां शारदा देवी इस तरह की गंभीर समाधि में निमग्न हो जाएगी कि लीला परिग्र लीला विग्रह धारण व्यर्थ हो जाएगा। जाएगा। देखिए सब बड़े-बड़े शब्द माया अवलंबने स्वकारज साधन माया को अवलंबन करके इन्होंने यह स्वकार्य साधन स्वकार्य अपना अपना कार्य जो करने के लिए साधन साधित करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। उसके पहले ही गंभीर समाधि में निमग्न हो जाएगा और लीला विग्रह धारण ये लीला विग्रह उन्होंने धारण किया है वह व्यर्थ हो जाएगा। नर देह धारण करके पृथ्वी पर आए हैं। कार्य क्या है? पृथ्वी पे नवयुग में नव अवतार की नवलीला नव संदेश का प्रचार करना है। युगोपयोगी किस तरह से धर्म साधित किया जाए। ठाकुर कहते थे कली में अन्नगत प्राण सतयुग की तरह के इवन त्रेता या द्वापर की तरह आज का मनुष्य साधन भजन तपस्या नहीं कर पाएगा। तो हमारे लिए है नाम मात्र शरणम। यह केवल नाम मात्र शरणम ही हमारे लिए सबसे बड़ा धर्म है। तो जितना ही हम नाम जप करते जाएंगे और नाम जप के साथ में अवतार की लीला में जितना मग्न होते जाएंगे उतना ही हमारा कर्मों का यह फल है, कर्मों के संस्कार है, वह कर्म का जो बोझा है, वह लाघव होता जाएगा, हल्का होता जाएगा। तो यह कार्य करने से पहले ही यदि उच्च सब तत्वों के बारे में सुन लिया और मां समाधि में यदि मग्न हो गई गंभीर समाधि निमग्न महाराज लिखते हैं गंभीर समाधि में निमग्न हो गई तो यह लीला विग्रह धारण व्यर्थ हो जाएगा। देखिए कि मां को माया स्वीकार करनी पड़ी थी। तब कहीं जाकर के मां ने यह सब कार्य किया था। हमको पता है कि अपना जो 100 साल का हिस्ट्री है इसको यदि हम पढ़ेंगे तो जब ठाकुर ने मां की शोशी पूजा की उसके बाद में आनंद पर्व प्रारंभ होता है। अभी यह आनंद पर्व में ठाकुर मां की शक्ति की सहाय से कोलकाता में घर-घर जाकर के ईश्वर चिंतन, ईश्वर लीला और ईश्वर के उपासना का मैसेज फैलाते थे। वह आनंद पर्व में सब कुछ हो तो गया। किंतु उस समय देखिए कि मां की जो माया थी अर्थात किस माया को स्वीकार करके मां देह धारण करके रहती थी तो ठाकुर के प्रति उनकी श्रद्धा थी ठाकुर की सेवा करनी थी इस माया को स्वीकार करके आनंद पर्व में मां शारदा देवी थी। उसके बाद में जब ठाकुर की महासमाधि हुई और जब यह तपस पर्व प्रारंभ हुआ। यह तपस पर्व में देखिए कि मां ने कितनी ही बार यह सोचा होगा कि मैं विधवा का स्वांग रचूं या तो विधवाओं की तरह रहूं या तो फिर यह देह धारण ना करूं। किंतु जितनी ही बार मां के मन में यह सब बातें आती उतनी ही बार ठाकुर उनको दर्शन देकर के कैसे न कैसे तरह के उनका जो विरह है उस विरह व्यथा को तृप्त करते रहते थे। यह जब ठाकुर की महासमाधि के फौरन बाद जब मां वहां पर वृंदावन में गई शुरू-शुर में तो बड़े ही कष्ट में थी किंतु फिर बाद में गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि ठाकुर के नित्य दर्शन उनको मिलने लगा। ठाकुर के नित्य दर्शन उनको प्राप्त होने लगे। तो ये नित्य दर्शन की सहाय से मां ने कैसे भी करके अपना जीवन टिका करके रखा था। इसके बाद में तपस पर्व के अंत में फिर विजय पर्व प्रारंभ होता है। विजय पर्व में स्वामी जी अमेरिका जाकर के वेदांत का जो मैसेज फैलाते हैं तो उससे रामकृष्ण और रामकृष्ण संघ जैसे कि पूरे विश्व में प्रख्यात हो जाता है। उसके बाद में स्वामी जी भारत आते हैं नवोदय पर्व कि भारत का संपूर्ण भारत का नवजागरण होता है। किंतु इस नवोदय पर्व के अंत में 1902 में जब स्वामी जी महासमाधि धारण करते हैं, तब मां के लिए स्टेज तैयार हो जाता है। ठाकुर और स्वामी जी दोनों ने रामकृष्ण संघ की स्थापना करके अपने से वहां से चले गए हैं और पूरा स्टेज राज सिंहासन मां के लिए खाली करके उन्होंने रेडी करके तैयार करके रखा है। किंतु यह राज सिंहासन पर बैठने से पहले मां को तो एक माया स्वीकार करना होगा। अदरवाइज उनका जो उर्ध्वगामी मन है वो किस तरह से इस पृथ्वी पर रहेगा। किस तरह से भक्तों के प्रति उनका मन रहेगा। भक्तों को वो आशीर्वाद दे पाएगी। दीक्षा शिक्षा दे पाएगी। तो वो माया थी। फिर आखिर में राधा रानी राधु जो कि मां के भाई की पुत्री थी और फिर उनको उनका उनका अवलंबन करके राधु का अवलंबन करके मां ने देह धारण करके रखा था और देखिए कि मां की जब आखिरी बीमारी जब चल रही थी मातृ पर्व के अंत में 1920 के आसपास में उस समय अब हमेशा ऐसा होता था कि मां सब समय राधु के लिए आतुर रहती थी वह क्या करती है क्या नहीं करती। वह सब उसके ऊपर में नजर रहती थी। कुछ गलती होने से शिक्षा देती थी। या तो फिर उसको आध्यात्मिकता के बारे में बताती थी वगैरह-वगैरह। किंतु अपने आखिरी समय में मां ने कहा कि यह उसको राधु को यहां से ले जाओ। मैं उसका चेहरा भी नहीं देखना चाहती। तो राधु, नलिनी, माकू, राधु का पुत्र यह सब उस समय उद्बोधन में मां के साथ में था। मां के साथ में थे। उस समय किंतु जब शरद महाराज को यह बात पता चली कि मां कहती है कि इन सबको जय राम बाटी भेज दो। मैं इनका चेहरा भी नहीं देखना चाहती। तब शरद महाराज बड़े चिंतित हो गए थे। क्यों? क्योंकि उनको पता था कि जिस समय मां का मन राधु के ऊपर में से उठ जाएगा उस समय मां के अंतिम महाप्रयाण का प्रारंभ हो जाएगा। और उसी समय शरद महाराज कहते हैं कि तो फिर लगता है कि इस बार मां ने देहत्याग करने के बारे में ठान ही लिया है। तो यह देखिए कि यहां पर जब ठाकुर कहते हैं कि वह क्यों सो रही है तो अपनी इच्छा से नहीं सो रही। जिस महाशक्ति का अंश धारण करके मां ने पृथ्वी पर जन्म लिया है, वही महाशक्ति जबरन जैसे कि मां को सुला दे रही है क्योंकि यह सब उच्च तत्वों की बातें सुनेगी तो पृथ्वी पर शायद रहेगी ही नहीं। इतनी गंभीर समाधि में निमग्न हो जाएगी कि जिस कार्य साधन के लिए जो परिवेश रचना करनी है उपयोगी परिवेश रचना उसके पूर्व ही वो समाधि में मग्न होकर के देह त्याग कर देगी। तो इस पूरे एक ही प्रसंग में हमको बताया गया कि किस तरह से ठाकुर ने कामार पुकुर में भी इस बात को इशारोंइशारों में कह दिया था कि मां का सही स्वरूप क्या है।

माँ सारदा के अवतारत्व का एक अनोखा पहलू: उनका जननी स्वरूप और उनका मातृभाव

जहां हो जो भी है प्रक्रांतो विषय उपलब्धि जनो श्री माय देवित्व ए टुकु परिचय आपातो जथेष्टो जिस बात के बारे में हम बात कर रहे हैं जिस विषय के बारे में उसकी उपलब्धि के लिए उसको समझने के लिए मां के देवित्व का इतना परिचय फिलहाल इनफ है जथेष्ठ है अतः पर हमरा ए चरित्र आलोचनाएं जतोई अग्रसर होइबो ततोई देखते पबो जे विविध क्षेत्र विचित्र ते ता चरित्र विकास होइया थाकीले ओ इहार अनन्य साधारण परिपूर्ति एकटा विशेष क्षेत्र होइया छिलो इसके बाद में हम इस चरित्र आलोचना में जितने ही आगे बढ़ेंगे उतना ही देख पाएंगे कि विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूप से उनके चरित्र का विकास भले ही चाहे हुआ था किंतु इसकी अनन्य साधारण परिपूर्ति एक विशेष रूप से उसका जो विकास था वह एक विशेष क्षेत्र में हुआ था। जितना ही मां का चरित्र पढ़ेंगे उतना ही समझेंगे कि बहुत सारे क्षेत्रों में मां का चरित्र मां की यह जो दिव्यत्व है वह परिस्फुट होता हुआ दिखाई देता था। किंतु इन सभी क्षेत्र में भी एक क्षेत्र ऐसा है कि जहां पे मां का देवित्व विशेष रूप से प्रकाशित हुआ था। भारत तनी देवी होले तार लीला एश जगत दासी तहां के पया छिले जननी रूपे मां देवी होकर के भी उनकी इस उनकी लीला के इस अंश में जगतवासी जगत के लोग उनको पाए थे जननी के रूप में देखिए कि मां का देवित्व साधन भजन के क्षेत्र में गुरु रूप से दीक्षा गुरु के रूप में देत्व के रूप में घर संसार की जितनी बातें हैं उन सब में उपदेश जो स्त्रियों को देती थी उन सब विभिन्न रूप से उनका देत्व का प्रकाश तो हुआ ही था किंतु इस लीला में इस पार्टिकुलर जैसे पहले पहले जब शुंभ निशुंभ का विनाश करने के लिए देवी ने जन्म धारण किया था। इस युग में उनका जन्म धारण करने का एक सबसे बड़ा एक जो विशेष क्षेत्र था वह जननी रूप से उन्होंने प्रकट किया था। जगतवासी जगत के लोग उनको प्राप्त किए थे जननी के रूप में। भारत अध्यात्म इतिहास इहा एक गुरुत्वपूर्ण व्यापार। भारत के अध्यात्म जगत में यह एक गुरुत्वपूर्ण यह बात है। श्री राम पूर्व तापनी उपनिषद उक्त होइया छे उपासक नाम कार्यार्थम ब्राह्मणो रूप कल्पना श्री राम पूर्व तापनी उपनिषद में लिखा है उपासका नाम कार्यार्थम जो उपासक है उसके कार्य के लिए ब्राह्मणो रूप कल्पना ब्रह्म रूप की कल्पना करते हैं। जो उपासक है ब्रह्म के वह जब निर्विकल्प जो निराकार निर्गुण जो समय और अवकाश के परे हैं। इस तरह के ब्रह्म की कल्पना कैसे कर पाएंगे? क्योंकि जैसे ठाकुर ने कहा कि इस जगत में सब कुछ एठा हो गया है। एठो होए गए छ शुद्ध ब्रह्म एठो होए नहीं। अर्थात कि जगत में सब कुछ झूठा हो गया है। मुंह के द्वारा उसको बोला गया है। मन के द्वारा उसके बारे में चिंतन किया गया है। किंतु ब्रह्मा के बारे में ना ही मुंह से आप बोल सकते हैं ना ही मन के द्वारा उनको चिंतन कर सकते हैं। तो जब साधन की प्रारंभिक अवस्था होती है तो हमको यही वाणी, यही कर्ण, यही चक्षु और यही मन इसी के ऊपर में तो भरोसा करके साधना करनी है। तो क्या हम सुनेंगे ब्रह्मण के बारे में? ब्रह्मन के बारे में हम क्या बोलेंगे? ब्रह्मन का हम दर्शन कैसे करेंगे? ब्राह्मण का स्मरण मनन निध्यासन कैसे करेंगे? तो इसके लिए उपासक नाम कार्यार्थम उपासकों के भले के लिए ब्राह्मणों रूप कल्पना ब्रह्म रूप की कल्पना करते हैं। उपासक प्रयोजन निर्बाहिर जन निर्गुण निराकार ब्रह्म रूप परिग्रह करिया थाकेन उपासकों के प्रयोजन के लिए निर्गुण निराकार ब्रह्म रूप परिग्रह करते हैं। श्रीमद्भगवत गीता ते आ ये यथामाम प्रपद्यते तान तथैव भजाम्यहम जो श्रीमद् भगवत गीता में भी है कि यह जो जिस तरह से मेरी भजना करता है मैं उन्हीं के भाव का आश्रय करके उनके सामने मैं अपने को प्रकट करता हूं जो भक्त जे रूपे आार स्मरण लया थाके आमी शेरू भाव अवलंबने ताहार अभीष्टो पूर्ण करी जो भक्त जिस तरह से मेरा स्मरण करता है मैं उसी भाव का अवलंबन करके उनकी अभीष्ट उनकी इच्छा पूर्ण करता हूं। श्री चंडी ते ऋषि बोलते छ चंडी में भी ऋषि ने कहा है एवं भगवती देवी सान नित्यापि पुनः पुनः संभय कुरते भूप जगत परिपालनम हे राजन से भगवती जन्मादि शून्य होइले ओ पुनः पुनः ए रूपे आविर्भूत होइया जगत परिपालन करें हे राजन वही भगवती जन्म आदि शून्य जिनका ना ही जन्म है ना ही मृत्यु है ना ही जरा है ना ही व्याधि है जरा मृत्यु जन्म व्याधि इनके परे होकर के भी पुनः पुनः इस तरह से आविर्भूत होकर के जगत का परिपालन करती है ताई अति प्राचीन काल होते ही ए देश देवीर विविध विग्रह बा प्रती को प्रचलित आ पूजित होते छे इसीलिए अति प्राचीन काल से ही भारत देश में देवी के विभिन्न विग्रह या प्रतीक प्रचलित है और इनकी पूजा होती है। देवी स्तवस्तुति ओ अशंखो देवी की स्तवस्तुति भी असंख्य है। देवी के अमरा पयाची विविध रूपे विविध भावे देवी को हमने पाया है विविध रूप से विविध भावों में तीन लक्ष्मी सरस्वती शीतला मनसा चंडी दुर्गा इत्यादि देवी है लक्ष्मी सरस्वती शीतला मनसा चंडी दुर्गा वगैरह तिनी धनदात्री विद्यादात्री निरामय करत्री त्राणकारिणी असुर संहारिणी वो हे धनदात्री विद्यादात्री निरामय करत्री त्राणकारिणी और असुर संहारिणी ये धनदात्री और विद्यादात्री तो समझ में आता है निरामय करत्री अर्थात कि अपने रास्ते में जितने भी यह सब अशुभ या तो फिर जितने भी शोक संताप है उनका निरामय करती और त्राणकारिणी यानी कि हमारे जीवन में जितने भी यह सब समस्याएं हैं उसका संहार करती हुई असुर संहारणी असुरों का संहार करती हुई चंडीते तहां के समस्त विद्या रूपणी और समस्त नारी रूपणी बोला होया छे चंडी में उनको समस्त विद्या की सर्वदेव देवी स्वरूपाय श्री रामकृष्ण ऐसा कहते हैं ना श्री रामकृष्ण कौन है सर्वदेव और देवी स्वरूप तो यहां पे भी उनको समस्त विद्या रूपणी समस्त नारी रूपणी जितनी भी विद्या है जितनी भी स्त्री शक्तियां हैं उनकी मूर्तिमंत स्वरूप देवी को कहा गया है तुष्ट होया तिनी भक्ति मुक्ति प्रदान कोरेन आबा रुष्ट होइया तनी अधार्मिक अनाचारी दंड विधान कोरेन यदि वह तुष्ट होगी तो भक्ति और मुक्ति प्रदान करेगी और जो रुष्ट होगी तो अधार्मिक और अनाचारी को दंड करेगी नारी रूपे शक्ति रूपे देवी रूपे मातृ रूपे आमरा अनादि काल हो तेई तहार पूजा कोरिया आशीते छ नारी रूप में शक्ति रूप में देवी रूप में मातृ रूप में हम लोग अनादि काल से अनंत समय से उनकी पूजा करते आ रहे हैं। राम प्रसाद कमला कांतो ओ राजा रामकृष्ण प्रभुतिर भक्ति ते मुग्ध तिनी या बार स्वर्ग ऐश्वर जो छाड़िया मोर तेर कुटीरे पदार्पण करेन राम प्रसाद कमलाकांत और राजा रामकृष्ण वगैरे कवियों की भक्ति से मुक्त होकर के वही फिर से फिर स्वर्ग का ऐश्वर्य छोड़कर के मर्त्य लोक में एक पर्ण कुटीर में पदार्पण करती है। मर्त्य लोक अर्थात कि पृथ्वी लोक यहां पे गरीबी में जो श्रद्धालु है इस तरह के श्रद्धालुओं के घर में देह धारण करती है ऐन की तिनी भक्त भांगा बेड़ा बांधिया दिया जान यहां तक कि जो भक्त है उसका टूटा हुआ घर है वह भी वह बांध करके जाती है नवनिर्माण करके जाती है कुना बेशे जननी बेश तनी शोके दुखे शांत्वना प्रदान कोरेन कन्यावेश में जननी के रूप में वह शोक दुख में सांत्वना प्रदान करती है। स्वर्ग देवी शंगे बंगाली एमो नहीं कोरिया आत्मीयता पाताया छ स्वर्ग की देवी के साथ में बंगाली प्रजा ने ऐसा ही करके आत्मीयता का बंधन बांधा है। देखिए कि यह बंगाल में देवी पूजा जो है वह एक विशेष रूप से देवी का वहां पर एक प्रचलन है जो कि मैंने और कहीं पर इतना नहीं देखा है। गुजरात में भी नहीं देखा और यहां पे साउथ इंडिया में भी इस तरह से नहीं है। वहां हर जगह पे देवी या शक्ति की आराधना तो होती है किंतु बंगाल में जो तंत्र का प्राधान्य था, शक्ति पूजा का प्राधान्य था, उसकी वजह से देवी के साथ में बंगालियों का एक विशेष संबंध है। तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मां बंगाल में जन्म धारण की थी। तो इसीलिए स्वर्ग की देवी के साथ में बंगालियों ने इसी तरह से आत्मीयता प्रस्तुत की है। किंतु देवी तब देवी था गलेन किंतु आप देवी के साथ में कितनी ही आत्मीयता बनाइए ना क्यों किंतु देवी देवी ही रह गई। क्योंकि जितनी भी देवियों का वर्णन है वह चाहे लक्ष्मी हो, सरस्वती हो, शीतला हो, मनसा हो, चंडी हो, दुर्गा हो, धनदात्री हो, विद्यादात्री हो, निरामय करत्री हो, त्राणकारिणी हो, असुर संहारिणी हो, वह सब देवी के रूप में ही प्रकट होकर के इन्होंने यह सब किया है। किंतु जो विशेष रूप से मनुष्य देह धारण करके जननी और संतान का संबंध है, वह इसके पहले शक्ति साधना के ग्रंथों में नहीं देखा गया था। राधा रूपणी जब वो वाप पृथ्वी पर अवतरित हुई थी तो मधुर भाव या महाभाव उन्होंने प्रदर्शित किया था। किंतु जो जननी भाव है भले ही चाहे यशोदा में हो किंतु उसका एक विशेष रूप से प्रकाश होना था। वह अभी तक नहीं हुआ था। इसलिए महाराज कहते हैं किंतु देवी तब देवी ही था गले देवी किंतु देवी ही होकर के रह गई। मानुष मतो मानुष शरीरे तखनो विग्रह परिग्रह कर रेना मनुष्य की तरह मनुष्य के शरीर में तभी तक उन्होंने विग्रह धारण नहीं किया था। श्री माय जीवन आमरा देवी ए अवतरण धारा रही चरम परिणति देखते पाई श्री मां के जीवन में हम देवी की यह अवतरण धारा है उसकी चरम परिणति यानी कि उसका सर्वोच्च एक्सप्रेशन सर्वोच्च उसका जो मैनिफेस्टेशन है वह हम देख सकते हैं। देवी एकने साक्षात शचला रक्त मानशर देहो विशिशिष्टा देवी यहां पे साक्षात रूप से अवतरित हुई है सचल है अचल नहीं है रक्त मांस देह विशिष्टा पंच महाभूत का देह धारण करके अवतरित हुई है श्री राम कृष्ण पूजिता भवतारिणी ओ शय गर्भधारिणी सहित अभिन्ना श्रीमान श्री राम कृष्ण के द्वारा पूजित भवतारिणी भवतारिणी यानी कि भवतारिणी काली जिनके नाम से यह काली मंदिर दक्षिणेश्वर का बना था तो यह श्री रामकृष्ण की पूजिता भवतारिणी और शय गर्भधारिणी सहित अभिन्ना और जिन्होंने मां को जन्म दिया था उनके साथ में अभिन्ना है यह श्री मां शारदा देवी देखिए यह बड़ा ही एक इंपॉर्टेंट फिलॉसोफिकल पॉइंट यहां पे गंभीर जी महाराज हमारे सामने रखते हैं। इस तरह का एक और डिस्कशन उन्होंने पहले भी किया है। अवतरणिका में इंट्रोडक्टरी चैप्टर जो है इस पुस्तक का इसमें गंभीरानंद जी महाराज ने बड़े ही विस्तृत रूप से हमको समझाया कि देवी के देह धारण करने का प्रयोजन क्या है? पहले तो वह दुर्गा रूप से चंडी रूप से असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर आती थी। किंतु अभी इस युग में उन्होंने असुरों का संहार तो किया नहीं है और ऐसा नहीं है कि इस युग में असुर नहीं है। यह ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके बाद में ब्रिटिश राज इन्होंने भारत का जिस तरह से शोषण किया है। भारत देश जैसे कि हजार साल भूतकाल में चला गया है। तो इन असुरों का संहार तो उन्होंने किया नहीं है। झांसी की रानी की तरह मां भी तो अवतरित हो सकती थी। झांसी की रानी की तरह वह पूरा सैन्य लेकर के वह ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में से भगा दे सकती थी। वह भी तो सामर्थ्य मां का था। किंतु उस तरह से जन्म नहीं लेकर के एक छोटे से गांव में एक छोटी सी कुटीर में एक भक्त परिवार के वहां पर जन्म लिया है। उनके खुद के जीवन काल के दरमियान बहुत ही अल्प लोग उनकी महत्ता को समझ पाए थे। श्री रामकृष्ण स्वयं जिनकी महत्ता का गुणगान गाते थे तो इस तरह से लज्जा पटावृता जननी के रूप में माने देह क्यों धारण किया तो इसका उत्तर गंभीरानंद जी हमको इस अवतरणिका में इंट्रोडक्टरी चैप्टर में कहते हैं कि इस जन्म में उनको मनुष्य के हृदय के भीतर में संशय राक्षस है संदेह रूपी जो दानव है उसका संहार करने के लिए मां अवतरित हुई थी। तो, वह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट उन्होंने बड़े ही विस्तृत रूप से उसमें डिस्कस किया है और हम लोग भी उसको काफी विस्तृत रूप से देखे हैं। यहां पे इसी तरह का फिलॉसोफी फिर से महाराज जी बताते हैं और इसमें और एक नया पॉइंट ऐड करते हैं कि इस बार जैसे कि हृदय के भीतर के शत्रुओं का संहार करने के लिए जब मां आई है तो साथ-साथ में ही इस बार की उनकी यह जो दिव्यता की जो आभा है सबसे ज्यादा कहां पर प्रकाशित हुई है? किस क्षेत्र में तो वो क्षेत्र है जननी का। मातृ रूप में मां ने अपना जो भाव प्रकाशित किया है वो यूनिक है। ये पूरे बंगाल की शक्ति साधना का इतिहास पे एक नजर डालकर के विहंगावलोकन करके गंभीरानंद जी महाराज हमको यह बात बताते हैं और यह महाराज जी का जो शास्त्र के ऊपर में उनका जो ज्ञान था वो अगाध था। हम सबको पता है कि उन्होंने यह जो उपनिषद है उनका अंग्रेजी में अनुवाद किया है शंकर भाष्य का और वो जो गंभीरानंद जी महाराज का अंग्रेजी अनुवाद शंकर भाष्य का वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एज ए सिलेबस उनकी पुस्तक को पढ़ाया जाता है। पाठ्य पुस्तक के रूप में उनको पढ़ाया जाता है। तो महाराज का जो शास्त्र के बारे में उनकी जो पकड़ थी, शास्त्र की जो जानकारी थी, नॉलेज था, वह तो अद्भुत था। तो शक्ति साधना के जो पूरे इतिहास पर उन्होंने नजर डाल के आखिर में यह बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट हमारे सामने रखा है कि अभी तक तो देवी के रूप में चंडी के रूप में दुर्गा के रूप में असुर संहारिणी के रूप में मनुष्य के पाप ताप संहार करने वाली के रूप में हम देवी के रूप में उनकी आराधना तो की राधा भाव से हमने उनके भीतर में महाभाव मधुर भाव तो देखा किंतु आखिर में जो एक भाव जिसका कि सर्वोच्च अभिव्यक्ति अभी तक देवी के जीवन में नहीं हुआ था। मां यशोदा के रूप में हमको एक आभास जिसका मिला था जो कि अभी सर्वांग संपूर्ण रूप से खिला हुआ है। वह है जननी का भाव। जननी रूपी मां शारदा देवी हम संतानों पर किस तरह से दया करती है। किस तरह से हमको स्नेह प्रेम करती है। वो भाव अभी तक यह पूरे शक्ति साधना के इतिहास में देवी के अवतरण में प्रकटित नहीं हुआ था। 100% रूप से वह अभी इस जन्म में उसकी परिसमाप्ति हुई है। भवतारिणी और शय गर्भधारिणी सहित अभिन्ना श्री मां देवी यहां पर साक्षात है। सचल है। पंचमहाभूत के देह से गठित है। श्री रामकृष्ण की पूजिता है और भवधारिणी के साथ में वह अभिन्न है। इस तरह की श्री मां शारदा देवी उनके जीवन के अभी गंभीरानंद जी की जीवन को अभी तक का जो एनालिसिस किया जाए तो दो मुख्य पॉइंट हमको मिलते हैं। एक तो है मां के जीवन का तात्पर्य कि हृदय के भीतर में संदेह राक्षस है उसका संहार करना और दूसरा कि जननी भाव क्या है? मातृभाव क्या है? वह हमको बताना। तो यहां पर यह पूरा महाराज जी का एनालिसिस अभी और भी कुछ है जिसको कि अभी हम मां के नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम

प्रश्न: ठाकुर का संतान भाव है और माँ का मातृ भाव है!

कृष्णपणमस्तु मां फिर ठाकुर को कभी-कभी बच्चे की तरह ट्रीट भी करती थी। वो अभी वो ठाकुर का कंप्लेन करते थे कि उसके हाथ से खाना क्यों भेजा? तो फिर मां कहती थी कि अभी जो आज ये बड़ा सुंदर उदाहरण है इसके बारे में। एक बार मां जय राम भाटी जा रहे थे ये सब भक्तगण मां के साथ में तो हुआ ऐसा कि रास्ते में लोग रुके हैं और अभी क्या है कि आजकल की तरह वो रास्ते में धर्मशाला वगैरह तो नहीं था। तो एक छोटा सा एक उसको चोटी कहते हैं। यानी कि इस तरह से जो यात्रालु होते हैं उनको रहने के लिए एक धर्मशाला जैसा बनाया जाता है। वहां पे कोई रहता नहीं है। वहां पे आप ही को जाकर के वहां पे रुकना होगा। खाना बनाना है तो अपने साथ में यह सीधा सामान लेकर आना है और वहीं पर खाना बनाना है। तो वहां पे यह लोग रुके और फिर मां ने क्या किया कि मां ने वहां पे भात रंधा तो सब व्यवस्था यह लोग साथ में करके गए थे कि जयराम बाटी की लंबी यात्रा है कोलकाता से तो रास्ते में रुकना पड़ेगा। थोड़ा चावल वगैरह ले लेना है। बर्तन हांडी वगैरह ले लेना है जिसमें भात रंधेगा। तो यह सब बनाया है। वहां पर चूल्हा जलाया गया है। चूल्हे पर हांडी रखी है। हांडी में भात पका रहा है। मां ने भात पकाया। अभी हुआ ऐसा कि चूल्हे पर से जैसे हांडी उतारने का समय आया वैसे ही हांडी टूट गई और पूरा भात जमीन पर बिखर गया। तो अभी तो सभी लोग बड़े ही किंग कर्तव्य विमूढ़ हो गए। क्या करें? क्या ना करें। भात तो सब जमीन पर गिर गया और अभी दूसरी बार भात बनाने के लिए शायद चावल भी नहीं होंगे तो भूखा रहना पड़ेगा लंबी यात्रा भूखा रख के करनी पड़ेगी वगैरह-वगैरह तो अभी क्या करेंगे तो सब लोग सोच रहे हैं उसी समय उन्होंने देखा मां ने क्या किया देखिए भात यदि जमीन पर गिरा है तो जो भात का जो दाना जमीन को मिट्टी को स्पर्श किया है वही तो बिगड़ जाएगा ना उसके ऊपर में जो भात है तो ऊपर ऊपर से माने क्या किया कि वह किसी चीज से उन्होंने ऊपर ऊपर का भात समेट लिया जो कि मिट्टी को नहीं लगा था और इस तरह का ऊपर ऊपर से भात ले लिया और फिर इसी भात को एक पात्र में रख के और ठाकुर मां के पास में क्या होता था एक डिब्बा रहता था डिब्बे में वो ठाकुर का वो एक फोटोग्राफ रखती थी तो रास्ते में जब भी जाना है तो खाना खाना है तो ठाकुर को तो पहले भोग लगाना पड़ेगा तो डिब्बा खोल करके उसमें जो फोटोग्राफ है उसमें ठाकुर के सामने भोग लगाती थी तो मां ने इसी तरह से वो वो जमीन पर गिरा हुआ चावल ऊपर ऊपर से इकट्ठा करके उसमें एक पात्र में लेकर के ठाकुर के सामने रखा फोटोग्राफ के सामने और क्या कहती है आज के एमनी में पे छो शिगिर शीघ्र दुटो खे ना हो आज कोई आज आज आपको यही मिलने वाला है जल्दी-जल्दी थोड़ा सा खा लो तो फिर आप खा लोगे तो बाकी सब खाना खाएंगे तो फिर वो जिस महाराज ने यह बात लिखी है वो कहते हैं कि हम सब लोग हंसना शुरू कर दिए मां का माय एक कांडो देखे मां का यह जो स्वभाव यह जो उन्होंने किया उसको उसको देखकर के हम सब लोग हंसने लगे। कारण कि देखिए छोटा बच्चा जब मां के पास में आकर जीिद करता है तो मां क्या कहती है कि आज ऐसा ही खाना बनेगा आज फटाफट खा लो। ऐसा करके जो मां बच्चे को जिस तरह से कहती है उसी तरह एग्जजेक्टली जैसे कि मां ठाकुर को कह रही है आज के एमनी में पेच हो। आज यही आपको मिलने वाला है। शीघ्र शीघ्र दुटो ना जल्दी-जल्दी थोड़ा सा खा लो। इस तरह से बहुत सारे उदाहरण है। जय राम बाटी में एक भक्त गया है। देखा कि मां अभी ठाकुर को भोग वहां पे क्या था कि वहां पे ठाकुर को भोग एक थाली में रख के एक आसन बिछाया गया है। वो ठाकुर का चित्र यहां पे है पटचित्र। तो फोटोग्राफ के सामने मां कहती है चलो कि खाना खाने के लिए चलते हैं। तो यह भक्त लिखता है कि बाल गोपाल ये ठाकुर वगैरह सब जैसे कि मां के पीछेछे में चल रहे हैं और मां जैसे उनको यह रसोई घर में जाकर के खाना खिलाने वाली है। यह हमको ऐसा एक्चुअली प्रतीत हुआ। वह योगेन माना कि किसी ने देखा कि मां पान बना रही है। दो तरह के पान बना रही है। एक तो ऐसे बना दिया जिस तरह से नॉर्मली होता है। दूसरे पान में वो जो इलायची डाल के और यह जो लविंग डाल के बड़े अच्छे से मेहनत करके सजा करके पान बना रही है। तो उन्होंने पूछा मां ये दो तरह के पान है तो यह वाला अच्छे से बनाया हुआ पान किसके लिए? वह जो साधारण पान है वह किसके लिए? तो अभी उन्होंने ऐसा शायद सोचा होगा जो अच्छे से बनाया वो ठाकुर के लिए है। तो मां ने उल्टा उत्तर दिया। कहा कि यह जो साधारण पान है वह ठाकुर के लिए है। क्यों? क्योंकि वह तो अपने ही है। उनके लिए ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। किंतु यह भक्त लोगों को हमको प्रेम करके अपना बना लेना है। इसलिए यह विशेष रूप से पान बनाया वो भक्तों के लिए है। वो मास्टर महाशय के साथ में ऐसा हुआ था। अपने ठाकुर को लेके वहां पे गए विद्यासागर के वहां पे तो विद्यासागर सबको मिठाई खिला रहा है तो ठाकुर को थोड़ा सा दिया फिर और जो साथ में जो एक दो लोग गए थे उनको थोड़ा-थोड़ा मिला फिर वो मिठाई का डिब्बा लेके मास्टर महाशय के पास में आते हैं तो विद्यासागर कहते हैं अरे वो तो घर का ही लड़का है उसको देने की जरूरत नहीं है बोले मिठाई उसको निवेदिता लिखती है कि जब स्वामी जी वापस आते हैं नाउ ही इज ओल्ड मदर हर एग्जैक्ट वर्ड नाउ ह ओल्ड मदर ऑल द टाइम ही इस टॉकिंग अबाउट मदर तो नेचुरली कि वो खीर भवानी और यह अमरनाथ यह जो यात्रा थी स्वामी जी के जीवन की तो इस अ मेजर टर्निंग पॉइंट वहां पे ही ठाकुर स्वामी जी को उस समय इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था अमरनाथ की गुफा में ही और उस समय उससे पहले वाले जो स्वामी जी उनके मन में यह जो प्रचंड एक था कि हां जगत को तोलपाड़ कर देना है विद्या बुद्धि और प्रवचन के माध्यम से वेदांत को फैलाना है। वह स्वभाव परिवर्तन स्वामी जी का अमरनाथ यात्रा से ही प्रारंभ हुआ। वही अमरनाथ वो कश्मीर यात्रा जो है उनके जीवन का बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट है। उसके बाद में धीरे-धीरे करके स्वामी जी के भीतर में वो स्पिरिचुअल मैच्योरिटी है जिसको वो छुपा करके रखते थे। जैसे आपने कहा कि वो भीतर का बाहर आ जाता है। कभी-कभी आप छुपा करके भी छुपा नहीं पाते। जब वो स्वामी जी उस समय बेलूर मठ वापस आए तो किसी के साथ बात नहीं करते थे। तो यह राजा महाराज वगैरह बड़े टेंशन में आ गए थे कि सही स्वरूप समझ में आ गया तो चले जाएंगे। तो फिर शरदचंद्र चक्रवर्ती आता है तो वह स्वामी शिष्य संवाद वाला तो राजा महाराज उसको कहते हैं जाओ स्वामी जी के साथ में थोड़ा सा बातें करो। देखो एकदम मौन होकर के बैठे हैं। हम लोगों का तो साहस ही नहीं होता उनके पास जाने का। तो यह वहां पर गया स्वामी जी के पास में और फिर उसको देखकर के फिर स्वामी जी उन्होंने थोड़ा बहुत बातें करना शुरू किया। तब वह यह सीक्रेट बताते हैं पहली बार कि मुझे वहां पर इच्छा मृत्यु का वरदान मिला है अमरनाथ गुफा में। सो दैट वास अ बिग टर्निंग पॉइंट इन हिज लाइफ।

प्रश्न: माँ का बालिका भाव भी था

इसका जो सबसे बड़ा उदाहरण है आखिरी आखिरी समय में एकदम बालिका स्वभाव हो गया था बीमारी की वजह से और मतलब यह जो जैसा आपने कहा ना कि बिल्कुल ठीक कि जब बीमारी आती है आखिरी समय आता है तो वह सब जो मास्क पहना होता है ना जगत के लिए वह सब चला जाता है मां वो कहती है वो भारती प्राणा माता जी भविष्य की उस समय की सरला देवी तो उनकी सेविका थी तो उस समय मां कहती है तो देव शुद्ध यही एक यही खाओ मतलब वो जो इस तरह तरह का खाना वो डाइट जो उनको अच्छा नहीं लगता था और ये बगल काठी दाओ माने बगल में वह थर्मामीटर लगाओ टेंपरेचर मां को सतत बुखार रहता था तो यही खाओ वही बगल काठी दा ये सब करबो ना मैं ये सब करूंगी नहीं तो उस समय ऐसा होता मां इस तरह से जब जिद करती ना तो वो सरला देवी कहती कि मैं शरद महाराज को पुकारू तो शरद महाराज का नाम लेने से फिर मां ठीक अच्छा ठीक है अभी उन्हें जैसे वो बच्ची अपने पिताजी से किस तरह से डरती है किंतु उस दिन कहा कि अच्छा बुलाओ शरद को देखती हूं क्या शरद कहता है तो शब्द जब शरद महाराज आए ऊपर में तो मोटे-सोटे थे तो ऐसे धीरे-धीरे करके चढ़ते चढ़ते ऊपर में आए मां के पास में बैठे और मां को कहा कि मां क्या हुआ है तो फिर मां सब बच्ची की तरह कंप्लेन करने लगी ये लोगों का यही एक है इसी तरह का खाना खिलाते हैं इसी तरह से बार-बार टेंपरेचर लेते रहते हैं मैं खाऊंगी नहीं यह नहीं करूंगी तो फिर शरद महाराज कहते हैं मां क्या मैं खिलाऊं क्या तो फिर मां कहती है अच्छा ठीक है तो फिर शरद महाराज अपने हाथों से वो फीडिंग कप जो होता है बच्चों के लिए उससे वो चम्मच से उनको खिला रहे हैं और फिर कहते हैं कि मां एक टू जिरिए खान म बंगाली में कहते हैं मां थोड़ा सा अच्छे से खाओ जीए खान मुझे पता नहीं किंतु उसका मतलब उसका भाव समझ में धीरेधी धीरेधी धीरे-धीरे अच्छा अच्छा मा टू जीरिए खान तो मां कहती है कि देखो तो अच्छा तुम ये तो भलो करे बोलते पारशो म तुम इतना अच्छे से कह सकते हो धीरे-धीरे खाओ वे लोग क्या ऐसा नहीं कह सकते हैं क्या और फिर थोड़ा देर खिलाया फिर मां कहती है अच्छा ठीक है जाओ मैंने तुमको बड़ा परेशान किया तुम्हारी नींद मैंने उसमें वह व्याघात पहुंचाया जाओ अभी तुम जाकर सो जाओ। तो आखिर आखिर में मां का बिल्कुल बाली का स्वभाव हो गया

प्रश्न: शरत महाराज मां की पूजा देवी के रूप में करते थे और उन्हें उन्हें सांत्वना भी देनी पड़ती थी, मानो वह कोई बच्ची हों। उनके लिए यह कितना कठिन रहा होगा!

था। साधना जब आप करते हैं साधना करते हैं तो देवी के विभिन्न रूपों का आपको दर्शन होता है, धारणा होती है। तो बिना साधना के आप समझ नहीं पाएंगे ये सब चीजों को। वो चंदन को आप जितना घिसेंगे ना उतना ही खुशबू आती जाएगी।

प्रश्न: ठाकुर जी, माँ, स्वामीजी ने कभी भी कर्म-काण्ड को हाथ से बाहर नहीं जाने दिया। कुछ लोगों के लिए कर्म-काण्ड ही सब कुछ है।

इसमें जो होता है वैध भक्ति और रागात्मिका भक्ति। अभी रागात्मिका भक्ति या तो फिर भाव इसका प्राधान्य अवश्य ज्यादा है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु एक बात याद रखनी है कि वैदिक भक्ति की अपनी एक आवश्यकता है। क्यों? क्योंकि सभी लोग तो रागात्मिका भक्ति या तो भाव के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाएंगे। या तो फिर एक लंबा जर्नी है। उनको मैच्योरिटी होनी पड़ेगी स्पिरिचुअल। तो जब तक वह नहीं होता है तब तक यह वैध भक्ति आवश्यक है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अपनी गोपाल की मां अघोरमणि देवी। तो विधवा थी बड़ी ही निष्ठा पूर्वक जप किया करती थी। जप करने में कभी कोई भी प्रकार का वो यह नहीं करती थी कि आलस आ गई या यह वो कुछ नहीं। समय के अनुसार जप करना ही करना है। तो जप करते-करते आखिर जब जप की मैच्योरिटी जब हुई तब उनको बाल गोपाल का दर्शन होने लगा और फिर वो हमको वो फेमस सब घटनाएं कि वो दौड़ी दौड़ी दक्षिणेश्वर जाती है और ठाकुर को कहती है कि देखिए गोपाल को मैं अपनी गोद में ले आई हूं। मुझे उसके छोटे-छोटे पैर दिख रहे हैं मेरी वो इसके ऊपर में वो झूलते हुए। तो यह सब वो हुआ। आखिर में फिर ठाकुर ने क्या कहा कि देखो अभी तुमको यह सब जप करने की जरूरत नहीं है। जिनका जप करती थी वह तो अभी तुम सदेह तुम्हारे सामने है तो फिर जप छोड़ दो। तो उस समय गोपाल की मां ने क्या किया कि जप की माला गंगा में डाल दी कि मतलब देखिए कि जो निष्ठा पूर्वक जप करते-करते आखिर में गोपाल का दर्शन हुआ तो वैदी भक्ति की वहीं परिसमाप्ति हुई। माला विसर्जन कर दी। यह दिस इज़ अ सिंबॉलिक एक्ट। हालांकि फिर ठाकुर की महासमाधि के बाद में उन्होंने सोचा कि फिर मैं सब कुछ तो कर रही हूं जीतेजीते यानी खाना भी पकाना है, रहना भी है, कपड़े भी धोने हैं। सब कुछ करने हैं तो फिर जप भी क्यों ना करूं? तो फिर ठाकुर ने कहा कि अच्छा मेरे कल्याण के लिए या तो फिर मेरे मुझे समर्पित करके तुम जप करो। तो फिर उन्होंने दूसरी माला ली और फिर जप कर रही है। किंतु अभी जप सब कुछ समर्पित है ठाकुर को। तो यह वैध भक्ति परिणत होती है रागात्मिका भक्ति में तो वैध भक्ति आप निष्ठा पूर्वक करेंगे तो उसका परिणाम निश्चय आएगा किंतु जैसे आपने कहा कि वो सिद्धि विनायक अभी ठाकुर का ही उदाहरण है कुछ-कुछ वैष्णव लोग वो जो झोली में माला ऐसा माला घुमाते घुमाते वो मछली बाजार में जाते हैं और फिर माला करते-करते मुंह से बोलना नहीं है। नियम ऐसा है तो उंगली से इशारा करके कहते हैं वो मछली दे दो वो मछली दे दो। ठाकुर कहते हैं कोलकाता लोग लाखों लाखों जप कर खान की परजन तो जप करे कोलकाता में लोग लाखों लाखों जप करते हैं ये वैश्या भी जप कर लेती है किंतु फल कुछ नहीं

प्रश्न: गोपाल माँ बार-बार स्वामीजी से पूछती हैं कि क्या उनके दर्शन भ्रमपूर्ण हैं या वास्तविक हैं?

मिलता ये अघोरमणि देवी भी रो रही है रोते-रोते पूछ रही है स्वामी जी भी रोते-रोते उत्तर देते हैं हां मां आपको जो दर्शन होते हैं वह सब सही है वो दोनों रो रहे हैं माने इससे यह जो आपका जो ट्रेडिशन एंड एंड मॉडर्निटी ये जो मिलन ये जो बहुत बार हमने देखा ना मथुर बाबू और ठाकुर मथुर बाबू ठाकुर और स्वामी जी तो वैसे ही ये स्वामी जी और ये अोरमणि देवी मां और निवेदिता दीज़ आर द मीटिंग पॉइंट्स ये संगम में ये है

प्रश्न: ह्रदय और दिमाग के बीच की लड़ाई में ह्रदय हमेशा जीतता है. स्वामीजी को रोते हुए देखकर हमें अच्छा महसूस होता है, क्योंकि भक्ति हमेशा ज्ञान पर विजय प्राप्त करती है.

किंतु अपने ऑर्डर में है ज्ञान मिश्रा भक्ति जो भाव कब जीतता है जबकि वह त्याग के द्वारा आवृत होता है। इसीलिए जो शंकराचार्य का प्राधान्य अपने ऑर्डर में क्यों है? बहुत सारे लोग कहते हैं अरे शंकराचार्य क्यों? हम तो मतलब भक्ति भी तो है। ठाकुर ने स्वयं ऐसा नहीं कहा कभी कि अद्वैत इज बेटर देन द्वैत। किंतु फिर भी स्वामी जी का यह इंट्रोडक्शन है शंकराचार्य। क्यों? क्योंकि अद्वैत वेदांत संपूर्ण रूप से त्याग के ऊपर में बना है। जबकि यह भाव भक्ति शास्त्र जितने भी है वहां पर शरणागति का महात्म सर्वोच्च है। सो शरणागति तभी आपकी फलीभूत होगी फ्रूटफुल होगी जबकि इट इज बट्रेस बाय त्याग। अदरवाइज सिर्फ भाव होगा तो इट विल बी वेरी डेंजरस। माने इवेंचुअली उसमें जो पतन होता है वह बड़ा डेंजरस होता है। तो स्वामी जी रो पाए थे। क्यों? क्योंकि वो त्याग की भावना इतनी प्रचंड थी कि वह सीधी हृदय को उनका हृदय फिर एकदम ओपन हो गया था। त्याग यदि नहीं होता तो हृदय फिर ये ग्रहण करने के लिए तैयार भी तो नहीं होता।

प्रश्न: गोपाल माँ भी त्याग से भरी थीं

यस यस यस ये वैध भक्ति देखिए वैध भक्ति इतनी उन्होंने एकदम ठीक-ठीक की थी। विधवाओं के जितने भी नियम थे, जप के जितने भी नियम थे, इतने ठीक-ठीक पालन किए थे कि त्याग के फाउंडेशन पे उन्होंने भक्ति बनाई थी। अभी देखिए कि यह दोनों जो त्याग तक पहुंचे हैं ना स्वामी जी बुद्धिमत्ता से त्याग तक पहुंचे हैं। अघोरमणि देवी अपने हृदय की श्रद्धा से त्याग तक पहुंची है। तो वो भी एक देखने वाली बात है कि कितने अब डिफरेंट पाथ है त्याग को स्वीकारने के लिए वि इज आल्सो वेरी इंटरेस्टिंग।

प्रश्न: गोपाल माँ ने भी ठाकुर की सेवा की थी. उनके लिए खाना पकाती थी

अोरमणि देवी कहती थी यह क्या खा जैसे ही मैं आती हूं वैसे ही ठाकुर खाने का नाम दे देते हैं। वो वहां पर बलराम मंदिर में गए अोरमणि देवी ठाकुर कहते हैं अच्छा वो जो वो जब अच्छे से फोड़न डाल के वो वघार करके वो सब्जी बनाओ तो