प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः ठाकुर की अंत्य लीला का पर्व प्रारंभ हो चुका है। श्री मां शारदा देवी की जीवनी का हम पाठ कर रहे हैं। गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध चीर सिमंतिनी चीर सधवा यह चैप्टर हम प्रारंभ किए थे कल।
नित्य श्रीरामकृष्ण, नित्य उनकी लीला
ऑलरेडी हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर अपनी लीला संवरण की ओर आगे बढ़ रहे हैं और धीरे-धीरे करके उनकी जीवनी शक्ति है वह ह्रास हो रही है। उनकी प्रकट लीला है। पंचमहाभूत में जो उन्होंने पंचमहाभूत के देह से बने बने हुए देह से उन्होंने जो लीला की है उस लीला का अभी अंत आ रहा है। अभी इसके बाद में ठाकुर भक्तों के हृदय में विराज करके भक्तों के हृदय में लीला करेंगे। जिस तरह से मां चिर सधवा है तो वैसे ही हम लोग चिर सनाथ है। कल हमने देखा कि अनाथ नाथ जो लोग अनाथ हैं उनके नाथ क्या मां की पुकार नहीं सुनेंगे क्या? मां की आरती नहीं सुनेंगे क्या? तो हम है ठाकुर के संतान। तो जिसके मां-पिताजी नहीं होते हैं, वह होते हैं अनाथ। जिस स्त्री का पति नहीं होता है, या पति का मृत्यु हो जाता है, तो जिस तरह से उस स्त्री को आप विधवा कहेंगे, वैसे ही जिन बच्चों के मां-पिताजी का निधन हो जाता है, उनको आप कहेंगे अनाथ। किंतु जिस तरह से मां कभी विधवा नहीं होगी। क्योंकि ठाकुर यदि स्थूल देह में नहीं है तो सूक्ष्म देह से तो अवश्य लीला कर रहे हैं। तो मां कभी विधवा नहीं हो सकती। मां चीर सधवा ही रहेगी। वैसे ही हम लोग ठाकुर के संतान कभी भी अनाथ नहीं हो सकते। हम लोग चीर सनाथ ही रहेंगे। अर्थात कि हमारे जो पिता है, हमारे जो गुरु हैं, वह हमेशा विद्यमान रहेंगे। हां, एक समय था कि उन्होंने पंचमहाभूत के देह से लीला की थी। पृथ्वी पर हमारे बीच में स्थूल देह से उन्होंने निवास किया था। किंतु उस समय ऐसा था कि ठाकुर का यदि दर्शन प्राप्त करना होता तो उस समय आपको दक्षिणेश्वर जाना पड़ता। कोलकाता जाना पड़ता। अभी मैं रहता हूं कहां यह विशाखापट्टनम में आंध्र प्रदेश में ठाकुर का दर्शन करने के लिए मुझे जाना पड़ेगा वेस्ट बंगाल कोलकाता दक्षिणेश्वर इतना लंबा यात्रा करना पड़ता अब जैसे वो सिंधु देश देश से वो हीरानंद आया था ठाकुर का दर्शन करने के लिए तो ऐसा कहां वो सिंधु देश आजकल का सिंध वो भी पाकिस्तान में चला गया है तो कहां से वह आपको वेस्ट बंगाल यात्रा करनी होगी तो अभी किंतु देखिए ठाकुर स्थूल देह में नहीं है। सूक्ष्म देह में है। हम जहां चाहे ठाकुर का दर्शन कर सकते हैं। यहां पे विशाखापट्टनम में बैठकर के भी यदि मेरे में वह क्षमता है कि थोड़ा बहुत जम करके जब ध्यान कर लूं तो फिर कमर कस के थोड़ा सा साधन भजन कर लूं तो यहां पर बैठ के भी सहज रूप से ठाकुर का हमको दर्शन प्राप्त हो सकता है। यह एक बात है। और यह तो एक थोड़ा सा चलो हायर लेवल पर हो गया। थोड़ा सा हम लोगों के सामान्य लेवल पर सोचते हैं। देखिए ठाकुर कहते हैं ना कि
ठाकुर ने आत्मा को जगाया, माँ ने समाज को जोड़ा, और स्वामीजी ने सभ्यता को दिशा दी - 1
जब तक नरेंद्र के बारे में वह सबके सामने वो दक्षिणेश्वर में ही अपने कमरे में ही वह नरेंद्र बैठा था और फिर बाकी गृहस्थ भक्त बैठे थे और नरेंद्र का नेचर तो पता है ना महावीर हनुमान की तरह है। वह कब माने कौन से भाव में आकर के कौन सा महाकार्य ना कर दे पता नहीं किसी को। तो किंतु ठाकुर के सामने चुपचाप बैठा है। तो ठाकुर फिर नरेंद्र को देख रहे हैं। उसको ऑब्जर्व कर रहे हैं। फिर कुछ समय के बाद में नरेंद्र खड़ा होकर के बाहर चला गया। तो ठाकुर बाकी भक्तों को कहते हैं कि यह सब लड़कों को देखा क्या? वैसे उद्देश्य नरेंद्र की हो रही था। किंतु नरेंद्र का नाम नहीं लेकर के कहते हैं यह सब यंग लड़के हैं। उनको देखा क्या? जब पिताजी के सामने बैठे होते हैं तब चुपचाप शांत होकर के बैठे हैं। किंतु जब चांदनी में खेलने को जाते हैं तो फिर देखिए कि उनका एक नया स्वरूप देखने को मिलता है। तो यहां पर भी देखिए कि मां और स्वामी जी जो दो आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों को ठाकुर तैयार करके गए थे। वह जब तक ठाकुर है तब तक वह ठाकुर के ही संपूर्ण शरणागत ठाकुर के ही संपूर्ण अनुगत ठाकुर के ही सर्व रूप से आज्ञा वह होकर के उनको रहना था। लीला कर रहे हैं ठाकुर और यह दो है उनके संग। किंतु इन दोनों का भी तो इस विश्व में एक मिशन था। हमारा जैसा वह फ्रेमवर्क है फ्लोड फ्रेमवर्क ही है। इंपपरफेक्ट फ्रेमवर्क ही है ठाकुर मां स्वामी जी के जीवन और संदेश को समझने का क्योंकि माया के जगत में कुछ भी परफेक्ट नहीं हो सकता। खास करके जिन मायातीत कासेप्ट को हम अपनी वाणी और अपने मन विचार बुद्धि से प्रकट करने का प्रयास करते हैं वह विचार कभी भी संपूर्ण रूप से एक्यूरेट नहीं हो सकते। सो कीपिंग इन माइंड दिस लिमिटेशन जो हमारी एक फ्रेमवर्क है कि ठाकुर रिप्रेजेंट्स दिस स्पिरिचुअल एस्पेक्ट ऑफ अस ह्यूमंस कि मेरी ईश्वर प्राप्ति की ओर जो गति है ब्रह्म साक्षात्कार की मेरी साधना है ब्रह्म साक्षात्कार की मेरी जो आकांक्षा है वह कैसे पूर्ण हो वह एक रिप्रेजेंट करते हैं वह सिखाते हैं श्री रामकृष्ण एक फैमिली लेवल पर एक कम्युनिटी लेवल पे वो कम्युनिटी चाहे आपका परिवारजन हो ना कि ये हम आश्रम में रह रहे हो ना कि आपका जो वर्क प्लेस है आपकी ऑफिस है वो हो ना कि आपका स्कूल क्लास रूम है वो हो जहां पे भी जाते हैं हम लोग तो लोगों से घिरे हुए रहते हैं तो यह जो एक छोटा सा कम्युनिटी जिस तरह की मल्टीपल कम्युनिटी के हम मेंबर्स हैं तो प्रत्येक कम्युनिटी में किस तरह से रहा जाए किस तरह तरह से 10 तरह के जो पागल लोग रहते हैं प्रत्येक कम्युनिटी में उन लोगों के साथ में कैसे निपटा जाए निपटा जाए उस बंबई या अर्थ में नहीं किंतु इस अर्थ में कि कैसे उनके साथ में उनके सम्मान को बनाए रख के उनके साथ में काम किया जाए। लोगों को इंसल्ट करना आसान है। थोड़ा सा भी पावर आ जाता है। तो मैंने देखा है कि मुंह पे सब समय क्रोध भरी बातें निकलती रहती है। क्यों? क्योंकि अभी मेरे पास में ऑथॉरिटी है। मैं जो चाहे वह करूं, जो चाहे वह बोलूं। किंतु इससे होगा क्या कि जब तक ऑथॉरिटी रहेगी, आपका रिस्पेक्ट रहेगा, जिस दिन ऑथॉरिटी चली जाएगी, आपका रिस्पेक्ट मिट्टी में मिल जाएगा। तो वह तो है कि किस तरह से आपके पास में वह ऑथॉरिटी नहीं रहने से भी या तो फिर यदि ऑथॉरिटी है तो भी लोगों को सस्मान कैसे लोगों के साथ में बिहेव किया जाए लोगों को किस तरह से सहाय की जाए वो कम्युनिटी लेवल पर मां हमको सिखाती है और फिर यह पूरा ह्यूमन सिविलाइजेशन है। यह हजारों सालों से भारत ए या तो फिर अन्य जो सब सिविलाइजेशन किस तरह से अपने-अपने कर्म के प्रवाह में चल रही है और किस तरह से इनका भविष्य और किस तरह से बनेगा यह पूरा जो डायनेमिक्स है सिविलाइजेशनल डायनेमिक्स वो स्वामी जी हमको सिखाते हैं। तो अभी ठाकुर की लीला जब तक चलती रहेगी तब तक नहीं मां यह कम्युनिटी लेवल का जो हमको किस तरह से रहना है सो शो शो जे शोए श रोए जे ना शोए श ना रोए अर्थात कि जो सहन कर पाएगा वह रह पाएगा जो सहन नहीं करेगा वह नहीं रह पाएगा यह फोर बियरेंस जिसको कहते हैं ये फोर बियरेंस की कैपेसिटी अपने जो एडवर्सरी भी है हमको जो गाली भी देते हैं हमारी हमारी जो निंदा भी करते हैं उनको भी सतत आशीर्वाद देते रहने की यह जो क्षमता है मां का जीवन हम लोग इस तरह से देखते ही नहीं इस तरह से मां के जीवन का प्रकाश होता ही नहीं हमको सीखने को ही नहीं मिलता
जब आध्यात्मिकता समाज में नहीं उतरती, तब राष्ट्र दुर्बल हो जाता है — भारत में बौद्ध धर्म की ऐतिहासिक चूक
तो यह जो एक क्लासिकल एरर या तो कहेंगे कि पोस्ट बुद्धिज्म यह जो एक मिस्टेक हमारे से हो गई है प्री बुद्धिस्टिक वैदिक युग में देखिए कि यह तीनों एस्पेक्ट को प्रॉपर ली रिप्रेजेंट किया गया है। आप गीता पढ़ेंगे श्रीमद्भगवत गीता तो देखिए कि वहां पर आध्यात्मिक टीचिंग भी है। वहां पर कम्युनिटी लाइफ में किस तरह से रहना है वह भी है और सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग क्या है वह भी है। यह तीनों तरह के टीचिंग्स जो है आपको गीता में मिल जाएंगे। किंतु पोस्ट गीता पोस्ट श्री राम पोस्ट श्री कृष्णा खास करके यह बुद्धिज्म का प्रारंभ हुआ तब से हुआ क्या कि भगवान बुद्ध ने तो सन्यास ग्रहण किया था तो वह जो एक क्षेत्र में वह माहिर थे कि किस तरह से ईश्वर प्राप्ति या तो फिर उनकी उनकी टर्मिनोलॉजी में कहे तो निर्वाण किस तरह से निर्वाण प्राप्त किया जाए वही उनके टीचिंग्स का मुख्य उद्देश्य था वही उनके जीवन का मुख्य सुर था और उसी बात को लेकर के उनके डिसाइपल्स ने उनको चारों ओर उनके उपदेश को फैलाया। यू नो प्रॉब्लम यही हो गया कि देखिए खास करके भारत में हम भारतीय लोग जब जिस धर्म को पकड़ते हैं उसको इतना सीरियसली पकड़ते हैं कि उसको लिटरली फॉलो करने का प्रयास करेंगे। तो हम भारत में वह लिटरल भगवान बुद्ध को फॉलो करने का प्रयास किया। आध्यात्मिक जीवन तो हमारा सक्सेसफुल हुआ। किंतु यह जो कम्युनिटी लाइफ कहो उसमें सब गड़बड़ हो गया। बोलकर के नात जात यह जो सब डिवीजन प्रारंभ हुआ और यह सिविलाइजेशनल हमारा अंडरस्टैंडिंग ही गड़बड़ हो गया। बोलकर के विदेशी आक्रमणों के सामने हम बिल्कुल ही लाचार होकर के बैठ गए। जबकि बुद्धिज्म यह साउथ ईस्ट एशिया या तो चाइना या जापान यह जो वगैरह सब जगह पर गया वहां पर जैसे स्वामी जी कहते हैं ना कि भारत में धर्म ही भारत का मुख्य सुर है। जब बाकी सब देशों में जाएंगे तो वहां का अपना-अपना एक स्टैंडर्ड रहता है। फ्रांस में पॉलिटिक्स है, ब्रिटेन में जैसे कि मर्केंटलिज्म है, अमेरिका में जैसे इंडस्ट्रियलाइजेशन है। तो वैसे ही यह साउथ ईस्ट एशिया या तो फिर कन्फशियस फिलॉसोफी को फॉलो करने वाले जो सब देश हैं जापान, चाइना वगैरह, ताइवान वगैरह, कोरिया वगैरह तो वहां पे क्या है कि यह जो कन्फशियस के जो आइडियाज है फैमिली, ओनर, यह एंपायर, आवर लॉयल्टी टू द एंपरर वगैरह-वगैरह जो है वह बड़ा स्ट्रांग था। तो, एक एस्पेक्ट जो था जो कि बुद्धिज्म में मिसिंग था। बुद्धिज्म एक्चुअली क्या रिप्रेजेंट करता है? मनुष्य की ईश्वर की ओर या तो फिर निर्वाण प्राप्ति की ओर गति या तो फिर साधना आराधना। तो वह जो कन्फशियनिज्म में वो मिसिंग एस्पेक्ट था जो कि बुद्धिज्म ने प्रोवाइड किया और बुद्धिज्म में जो मिसिंग एस्पेक्ट था फैमिली, कम्युनिटी, सिविलाइजेशन वो यह कन्फशियनिज्म ने प्रोवाइड किया। तो यह बुद्धिज्म प्लस कन्फ्यूसनिज्म यह जो परफेक्ट एक कॉम्बिनेशन बैठ गया तो वह कॉम्बिनेशन की वजह से बुद्धिज्म ने यह ईस्ट एशियन कंट्रीज में इतना बड़ा जो तोलफाड़ है जो तोलपाड़ बांग्ला शब्द है हिंदी करेंगे तो तोड़ माने रायट ये जो रायट नहीं मचाया इतना तोलफाड़ यह जो बुद्धिज्म ने ईस्ट एशिया में नहीं किया जो कि उसने भारत में किया क्योंकि हम भारतीय लोगों का है कि बुद्धिज्म को अपनाना है तो चलो वैदिक जितना भी लर्निंग है उसको अभी फिलहाल के लिए भूल जाओ। यह जो भगवान कृष्ण ने गीता में जो कहा अर्जुन को कि तुम्हारी हड्डियां भी तुमसे काम करवाएगी। तुम्हारा राजसिक स्वभाव है। क्षत्रिय का स्वभाव है। वन में भी यदि जाओगे तो ना ही शांति मिलेगी। दूसरा कि यह जो तुम स्वधर्म छोड़कर के परधर्म अपनाने की बात कर रहे हो इससे तुम्हारी जो अखंड कीर्ति आज तक चली आई थी वो कीर्ति मिट्टी में मिल जाएगी। तो यह जो सब भगवान कृष्ण के जो इंपॉर्टेंट टीचिंग्स थे जो कि हमको सिविलाइजेशनल लेवल पर काम लगने वाले थे वो सबको हमने जैसे कि विस्मृत कर दिया और बुद्धिज्म को होलसेल अपना लिया। बोल के भारत में यह जो सब प्रॉब्लम स्टार्ट हुआ था। देखिए कि यह जो
ठाकुर ने आत्मा को जगाया, माँ ने समाज को जोड़ा, और स्वामीजी ने सभ्यता को दिशा दी - 2
एरर है, यह जो सीरियस मिस्टेक है, वो श्री रामकृष्ण रूपी अवतार में नहीं होने वाली थी। और इसीलिए भगवान बुद्ध गए तो फिर उनके लेवल का उनके समकक्ष खड़ा रह के कोई नया एक एस्पेक्ट बुद्ध के जीवन में बुद्ध के भगवान बुद्ध के उपदेश में ऐड कर सके ऐसा कोई नहीं था। जबकि श्री रामकृष्ण अवतार का यह नूतनत्व है। यह एक नावीन्य है। यह एक नोवेल्टी है कि भगवान श्री रामकृष्ण के जाने के बाद भी स्थूल देह त्याग करने के बाद में भी दो ऐसी महाशक्ति थी कि जो ठाकुर के ही समकक्ष खड़ी रहकर के एक नया एस्पेक्ट ठाकुर के टीचिंग में ऐड कर सके। एक-एक नया एस्पेक्ट ऐड कर सके। ऑब्वियसली यहां पे ऐसा कहने का बिल्कुल आशय नहीं है कि जिस तरह से हम लोग कहते हैं कि उपनिषद के अलावा और कुछ ठाकुर ने कहा हो यह बात उचित नहीं है कहना तो सिमिलरली मां या स्वामी जी ठाकुर के उपदेश के अलावा कुछ नया कहा हो यह कहना बिल्कुल उचित नहीं है। बस वही बात है कि आप कौन से पार्ट को आप हाईलाइट करते हैं। कौन से पार्ट को आप यह करते हैं? रिप्रेजेंट करते हैं। कौन से पार्ट को आप एक आपको देख कर के ही अब जैसे कि देखिए बहुत बार ऐसा होता है कि जो चश्मे पहनता है। मैं अपनी स्कूल के दिनों की बात कर रहा हूं। एक लड़का था वो दुबला पतला था। चश्मे पहनता था और किसी के साथ ज्यादा बात नहीं करता था। तो उसको देखकर के ही मुझे ऐसा लगा कि काफी इंटेलिजेंट है क्योंकि एक इंटेलिजेंट लड़का ऐसा बोलने से मेरे माइंड में कौन सा चित्र खड़ा होता है तो एग्जजेक्टली वो चित्र खड़ा जो होता है उसमें वो लड़का फिट हो जाता था तो यह बड़ा इंटेलिजेंट है। फिर और एक लड़का था वो उसका हाइट भी अच्छा था, बॉडी भी अच्छा था और बहुत बकबक करता रहता था और हर जगह पे वह दौड़ादौड़ी करेगा। स्पोर्ट में आगे टीचर के साथ में बात करने में आगे फिर वो मित्र मंडल बनाने में आगे सब जगह पे आ गए तो उसको देख के लगेगा हां ठीक है लड़का तो अच्छा है किंतु बुद्धि इतना ज्यादा नहीं होगा उसका किंतु जब परीक्षा का रिजल्ट आया तो मैंने देखा कि यह जो लड़का था जो कि काफी फिजिकली फिट था हैंडसम था अग्रेसिव टाइप का था उसका फर्स्ट नंबर आया है और यह जो लड़का दुबला पतला चश्मा पहनता है उसका आया है टॉप 10 में नहीं उसका इतना बुद्धि ही नहीं कि टॉप 10 में आ सके। तो मुझे उस समय मुझे अभी भी याद है इस बात को देख के कि मुझे इतना आश्चर्य हुआ था कि अपना एक टिपिकल एक रहता है ना हम क्या एक्सपेक्ट करते हैं किसको देखकर के। इसका दिखाव इस तरह का है। इसका चाल चलन ढंग इस तरह का है। तो उसका नेचर भी इस तरह का होगा। उसकी क्षमता भी इस तरह की होगी। बट नॉट नेसेसरी। राइट? तो दिखावा कोई बहुत माने आपका चरित्र को रिप्रेजेंट नहीं करता। किंतु फिर भी देखिए कि मेरे माइंड में यह बात आई कहां से कि यह दुबला पतला है, चश्मा पहनता है बोल के वह विद्वान है और वह जो हट्टाकट्टा है, फिजिकली फिट है। बहुत बकबक करता रहता है। उसकी बुद्धि ज्यादा नहीं होगी। यह बात आई कहां से? तो यह बात आई कि जो पूरा समाज को हम देख रहे हैं यहां पर इस तरह के कुछ कुछ ये कैरी केचर्स बना दिए जाते हैं कि हां यह इस तरह का आदमी है बोल के इसका इसका स्वभाव इस तरह का होगा। यह इस तरह का आदमी है बोल के इसका स्वभाव इस तरह का होगा। तो यह सब कैरीचर्स हम बना देते हैं और यह कैरीचर्स या तो फिर यह जो कैरेक्टर्स कहो वो हमारे माइंड में बैठ जाते हैं। अभी देखिए कि सिविलाइजेशनल स्केल जो अंडरस्टैंडिंग देना है या तो फिर यह फैमिली लेवल पर जो अंडरस्टैंडिंग देना है। आप इन तीनों को ठाकुर मां स्वामी जी तीनों के फोटो को आप शाइन में रखते हुए देखे तो है ही है। क्या ठाकुर को देखकर ऐसा लगता है कि वह वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जाएंगे और वहां पर इंग्लिश में लेक्चर देंगे और सब लोगों का मन लुभा लेंगे। वो एक रेमिनेशंस है जब प्रवचन समाप्त हुआ स्वामी जी का तो हजारों महिलाएं अमेरिकन महिलाएं वो स्टेज की ओर दौड़ रही है। स्वामी जी के साथ में हैंडशेक करेंगे। स्वामी जी के साथ में स्वामी जी अपने को स्वामी जी को इंट्रोड्यूस करवाएगी। तो यह पूरा जो महिलाओं का आक्रमण था वह देखकर के और एक लेडी वहां पर उपस्थित थी। उसने बाद में रेमिनेशंस लिखा है। वह अपना वो रेमिसेंस ऑफ स्वामी विवेकानंद वो किताब है उसमें है भी सही। तो यह लेडी लिखती है कि देखो बेटा तुम यह जो आक्रमण है ना उसके सामने खड़े रह पाओगे तो मैं मानूंगी कि तुम सही-सही साधु हो। तो देखिए कि यह जो एक तरह का अब देखिए स्वामी जी को हम इस तरह के ऑफ कोर्स स्वामी जी ने माने इस तरह का जो टेंप्टेशन आता है उसको रेजिस्ट करने में तो स्वामी जी माहिर ही थे। हमने कुछ ही समय पहले एक रेमिनेशंस देखा था कि अमेरिका का वेस्टर्न वर्ल्ड का संपूर्ण कार्यक्रम समाप्त करके जब स्वामी जी वहां पर गए थे। अह जो कैलिफोर्निया में कैम टेलर माने उनके वेस्टर्न वर्ल्ड के कार्य का और ऑलमोस्ट समापन ऑलमोस्ट नहीं पूरा हो ही चुका था समापन तो कैम टेलर में स्वामी जी रह रहे हैं तो उस समय देखा स्वामी जी ने कि यह जो सब उनके सामने जो दो-तीन डिसाइपल बैठे हैं तो इस तरह की सब बातें चलती होगी स्वामी जी ने शायद कहा होगा कि मेरा मिशन जो है अभी समाप्त हो गया है समाप्ति की ओर जा रहा है तो फिर उन्होंने शायद शायद कहा होगा कि इतना कम समय में आपने जो इतनी बड़ी उपलब्धि की है वह बहुत अच्छी बात है। तो वगैरह सब यह सब बातें चलती होगी। उस समय किंतु स्वामी जी ने कहा कि आपको पता है क्या कि मैं इतने अल्प समय में इतनी जो प्रसिद्धि प्राप्त कर पाया हूं। यह जो एक ही प्रवचन मैंने वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में दिया। उसमें से मैं इतना सफल हो पाया हूं। इसके पीछे का रहस्य क्या है? आपको क्या ऐसा लगता है कि मेरे पास में कोई स्पेशल पावर होगा? कोई मिरेकुलस पावर होगा? क्या आपको ऐसा लगता है? तो वह डिसाइपल सोच रहे हैं कि स्वामी जी ऐसा कह रहे हैं। यानी कि कुछ ना कुछ तो रहस्य उद्घाटन करना चाहते हैं। कुछ ना कुछ रिवील करना चाहते हैं। और यह वेस्टर्न लोगों का तो है ना कि इस तरह के मिस्टिकल पावर्स के प्रति उनका आकर्षण सभी का होता है। वेस्टर्न का हम लोगों का भी रहता है। तो वह लोग बड़े एकदम तत्परता पूर्वक सुन रहे हैं कि स्वामी जी अभी क्या रिवील कर रहे हैं। तो स्वामी जी ने कहा कि देखिए कि मेरे पास में सही में इस तरह की एक शक्ति है। वह है ब्रह्मचर्य की शक्ति। मेरे पूरे जीवन में मैंने एक बार भी किसी भी स्त्री के प्रति काम भाव से देखा नहीं। किसी भी मेरे मन के भीतर में एक भी कामुक विचार मैंने नहीं प्रकट होने दिया। एक आम आदमी यह जो सब क्षेत्र में अपनी शक्तियों को व्यय करता है उन सब शक्तियों को बांध करके एक डैम बना करके अब जैसे वो डैम का वैसे आप नदी को खुला छोड़ दें तो नदी का पूरा पानी समुंदर में बह जाएगा किंतु उसके ऊपर में डैम बना करके उसके बाद में से डैम में से यह सब चैनल्स निकालेंगे तो किसानों के खेत में जाएगा खेत को सिंचित करेगा अच्छी सी फसल होगी तो वैसे ही मैंने इसको डैम करके यह जो एनर्जी है उसको चैनलाइज किया है और इसी चैनलाइज करके जो मुझे प्रचंड शक्ति प्राप्त होती है इसकी वजह से मैं यहां पर सक्सेसफुल हुआ हूं। तो स्वामी जी का जो पर्सनालिटी है, स्वामी जी का जो शक्ति है, वह देखकर के ही लगता है कि ही विल बी मोस्ट सक्सेसफुल इन वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन। ठाकुर वहां पर खड़े होते हैं तो खड़े होने के साथ में ही समाधि में चले जाते। फिर कौन किसको बोलेगा क्या पता? तो सिमिलरली अब फैमिली लेवल पर है। परिवारजनों के साथ में रहना है। उनको खाना खिलाना है। उनकी संभाल रखनी है। ये राधु, माकू, नलिनी, पागली मामी ऐसे सब पागल लोगों के साथ में डीएल करना है। तो ठाकुर बिल्कुल त्रस्त होकर के वहां से भाग जाते हैं। वो जो हृदय ने थोड़ा बहुत क्या ठाकुर को बोल दिया था। ठाकुर बोलते हैं मैं गंगा में झंपलाने के लिए गया था। डूब लगाने के लिए गया था। मैं आत्महत्या कर लूंगा। यह तो एक बार ऐसा सोच लिया था तो क्या है कि हृदय की ही वजह से ठाकुर इतने परेशान हो गए थे तो 10 हृदय मां के साथ में जितने भी लोग रहते थे कोई हृदय से कम नहीं था तो हृदय यानी कि ठाकुर का भांजा जिसने कि ठाकुर की बहुत सेवा की थी तो इस हृदय के जैसे एक हृदय से ठाकुर त्रस्त हो गए थे अपने एक भांजे से मां के साथ में ऐसे 10 लोग रहते थे तो सबके साथ में वह रहना सो क्या है कि सबका अपना-अपना एक स्पेशलिटी होता है। ठाकुर के टीचिंग्स में आपको सब मिल जाएगा। एक सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग भी मिल जाएगी। फैमिली लेवल पर कैसे रहना है वह भी मिल जाएगा। यदि आप ठीक-ठीक से ठाकुर को पढ़े। किंतु जब एक रिप्रेजेंटेशन की बात आती है। हम आंख बंद करके जब सोचेंगे कि फैमिली लेवल पर अच्छे से कौन रह पाएगा? तो हमको ठाकुर बिल्कुल याद नहीं आएंगे। स्वामी जी बिल्कुल याद नहीं आएंगे। स्वामी जी कहां परिवराजक है? कहां झूला उठाया निकल पड़े और ठाकुर है बड़े वैरागी। थोड़ा बहुत किसी ने कुछ बोल दिया तो वह भी अपना एक ठाकुर को तो झूला बोला लेने की भी जरूरत नहीं है। कुछ भी नहीं। गमछा कंधे पर लगाया और वहां से निकल पड़े। वो तो काली मंदिर में था ना कि वो त्रैलोक्य नाथ। उसने पहले तो हृदय को भगा दिया और फिर कहा कि ठाकुर को भी जाने को बोलो। तो ठाकुर ने जैसे ही सुना गमछा कंधे में डाला और निकलना शुरू कर दिए। फिर उसने वो दूर से देखा त्रैलोकनाथ ने दौड़ा दौड़ा आया बोला कि आपको किसने जाने को कहा आपको तो जाने को मैंने नहीं कहा तो देखिए कि ठाकुर को ऐसा गमछा कंधे पे डाल के निकल लेना वो ठाकुर के लिए कुछ नहीं था वो सहज बात थी जबकि संसार की एक रिस्पांसिबिलिटी अपने सर पर लेकर के सबकी कल्याण कामना करना कितना ही चाहे ये सब तकलीफ पड़ जाए देखिए बिल्कुल आखिरी समय में मां की महासमाधि के कुछ ही दिन बाकी ही थे। उस समय एकाएक एक दिन मां ने कहा माने बिल्कुल अभी देह जो है अस्थि चर्मसार हो गया है। कंकालवत हो गया है। बिल्कुल आखिरी दिन चल रहे हैं। अभी कुछ ही दिनों के बाद में महासमाधि होने वाली है। उस समय मां ने एकाएक एक दिन कहा कि यह राधु है। यह राधु का लड़का है। यह मां नलिनी उनको ले जाओ यहां से। अभी मैं उनका चेहरा नहीं देखना चाहती। तो यह समाचार जैसे ही शरद महाराज को मिला साथ-साथ में ही शरद महाराज ने कहा तो मुझे लगता है कि अभी मां अपना देह रखना नहीं चाहती। देखिए जहां तक ये फैमिली का माया जाल लेकर के मां रह रही थी तब तक मां का शरीर धारण था। जैसे ही यह मायाजाल कट गई कि साथ-साथ में ही देह भी अभी विलीन होने वाला है। और यह बात कि इन सबको अभी ले जाऊं मेरे पास में से। अभी मैं इनका चेहरा भी नहीं देख पाती हूं। वो कब कही थी मां ने बिल्कुल मृत्यु शैया पर कही थी। वरना तो इन लोगों ने मां को जिस तरह से परेशान किया था ठाकुर या स्वामी जी होते तो कब का इन लोगों को भगा देते किसको पता तो देखिए कि यह एक-एक एस्पेक्ट को रिप्रेजेंट करने के लिए आपको एक-एक कैरेक्टर चाहिए। तो इसलिए जो हमारा जो फ्रेमवर्क है कि कम्युनिटी लेवल पे मां, सिविलाइजेशनल स्केल पे स्वामी जी और इनर जो स्पिरिचुअल लाइफ है इसके रिप्रेजेंटेटिव के रूप में ठाकुर। तो यह जो ठाकुर की लीला का अवसान हो रहा था, ठाकुर की लीला का जो अंत आ रहा था, इस समय आप देखिए कि दो महाशक्तियों को ठाकुर रखकर के जाने वाले थे, वह हो गए स्वामी जी और मां। और इन दोनों की लीला अभी प्रारंभ होने वाली थी। बोल कर के देखिए कि ठाकुर की लीला का अवसान आवश्यक था। वह एक प्रश्न एक बात हो गई। दूसरा कि यह बुद्धिज्म कि
भारत क्यों गिरा? जब क्षत्रिय की अपार करुणा और ब्राह्मण की मेधाशक्ति में विभाजन हो गया
बुद्ध अवतार में जो गलती हो गई है वह गलती की जो हमको यह सजा है पिछले 1000 साल से हमको भुगतनी पड़ रही है। वह गलती फिर रामकृष्ण अवतार में नहीं हुई। और देखिए भगवान बुद्ध बुद्ध अवतार में गलती हुई। यह कहना भी उचित नहीं है। अवतार कभी कोई गलती करने के लिए, मिस्टेक करने के लिए पृथ्वी पर आते नहीं है। वह उनका उस समय की जो आवश्यकता थी, उस आवश्यकता को उनको फुलफिल करना था। अभी युग परिवर्तन हो गया है। आज के युग की आवश्यकताएं चेंज हो गई है। बुद्ध अवतार में देखिए कि बुद्धिज्म जब ईस्ट एशिया में गया तो वहां जो बुद्धिज्म का जो यह जो था कि बुद्धिज्म में जो मिसिंग था सिविलाइजेशन और कम्युनिटी वो वहां पे कन्फ्यूसियनिज्म में उपस्थित था। वो भरा पड़ा हुआ था। तो फिर कन्फशियनिज्म और यह बुद्धिज्म दोनों को इकट्ठा करके ईस्ट एशिया को चलना था। भारत में भी देखिए कि वैदिक प्रथाएं तो पूरी अकबंद थी जब भगवान बुद्ध थे। तो यह बुद्धिज्म और यह भगवान बुद्ध का आध्यात्मिक संदेश और यह जो वैदिक प्रथाएं हैं, उस समय का कम्युनिटी लाइफ और यह सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग यह दोनों को मिलकर के काफी समय तो काम चला था। भगवान बुद्ध का आगमन हुआ था ढाई हजार साल पहले और भारत की सब समस्याएं चालू हुई 1000 साल पहले तो फिर देखिए कि भगवान बुद्ध और यह जो वैदिक प्रथा है यानी कि निर्वाण प्राप्ति के लिए जो साधना है वो और सामाजिक लेवल पर राष्ट्रीय लेवल पर यह जो वैदिक प्रथाएं वैदिक सिस्टम है वह उसने 1500 साल तो आराम से खींच निकाले 1500 साल तक तो कोई प्रॉब्लम हुआ ही नहीं इसके बाद में जो प्रॉब्लम जो स्टार्ट हुआ ना यह जो स्प्लिट हो गया दोनों के बीच में। स्वामी जी ने कहा है बहुत बड़ा इनसाइट है स्वामी जी का कि यह जो ब्राह्मी का ब्रेन और यह जो भगवान बुद्ध का हार्ट इन दोनों में जो स्प्लिट हुआ है ना उसने ही भारत को तोड़ करके रख दिया है। तो यह स्प्लिट जो है ना वह भगवान बुद्ध के रहते रहते या तो बुद्धिज्म के प्रथम 1500 साल तक नहीं हुआ था। यह पिछले 1000 साल में ही यह स्प्लिट हुआ है। तो यह जो दोनों के बीच में जो विभाजन हो गया इसी की वजह से भारत 1000 साल पहले डूबा था। हमको फिर से उगने में फिर से अपने को एक महासत्ता के रूप में प्रोजेक्ट होने में 1000 साल लगे। तो फिर देखिए कि वही जो स्वामी जी का इनसाइट था कि ब्राह्मणिक ब्रेन या तो फिर उपनिषद की जो मेधा शक्ति ये उपनिषद का जो यह सर्वव्यापी भाव भले ही चाहे उपनिषद कहते हो उपनिषद का प्रतिपाद्य विषय जो है जीव ब्रह्म ऐक्य तो इसके साथ में ही यह भी कनेक्टेड है कि सर्वम खलवम इदम ब्रह्म इस जगत में जो कुछ भी देख रहे हैं सब कुछ ब्रह्म है। यह ओरिजिनल उपनिषद कोई वर्ल्ड नेगेटिंग फिलॉसोफी नहीं थी। ओरिजिनल उपनिषद कोई एस्केपिज्म नहीं था। वह सब जो एस्केपिज्म जो उपनिषद के साथ में या तो फिर यह ब्रह्मविद्या के साथ में जो बात बाद बात बाद बात बादबाद में जोड़ दिया गया है वह सब बाद की ये पैदाइश है। यह सब बात का यह सब विकृति म्यूटेशन है। ओरिजिनल उपनिषद में तो यह म्यूटेशन था ही नहीं किंतु साथ-साथ में ही बुद्ध के आगमन के 1500 साल तक यह म्यूटेशन बना नहीं था। बुद्ध के आगमन के 1500 साल तक यह जो प्रिस्टाइन मैसेज है उपनिषद का और साथ में यह उसका प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है निर्वाण प्राप्ति का दोनों पैरेलल चले हैं। दोनों ने भारत को ठीक ही रखा है। वही एक 1000 साल पहले पता नहीं किस तरह का पागलपन हम में प्रवेश किया कि यह जो उपनिषद का मैसेज है उसमें कहां से एक म्यूटेशन प्रवेश कर दिया और यह बुद्धिज्म और यह उपनिषद के बीच का स्प्लिट हो गया और फिर यह ब्राह्मी ब्रेन और यह बुद्धिस्ट हार्ट इन दोनों में जो स्प्लिट जो हुआ अभी तक चल रहा था। अभी यह देखिए कि रामकृष्ण अवतार में यह स्प्लिट को फिर से भर दिया गया है। यहां पर देखिए कि यह जो मां का हृदय, स्वामी जी का ब्रेन और यह ठाकुर की उपलब्धि यह तीनों को फिर से इकट्ठा होना है और यह तीनों फिर से इकट्ठा होकर के नए भारत का निर्माण
ठाकुर ने आत्मा को जगाया, माँ ने समाज को जोड़ा, और स्वामीजी ने सभ्यता को दिशा दी - 3
करेंगे। तो यह जो है रामकृष्ण देव के लीला अवसान या तो फिर उनकी जो अंत्य लीला है उसके यह सब डीप अंडर करंट है वह चल रहे हैं। तीनों एस्पेक्ट को धीरे-धीरे करके डेवलप होना है। तीनों एस्पेक्ट का यह भावधारा में अपना-अपना स्थान है। तीनों एस्पेक्ट को फुल एक रंगमंच मिलना चाहिए। डेवलप होने के लिए जब ठाकुर की लीला चल रही थी तब यह मां और स्वामी जी दोनों की लीला इनके बैकग्राउंड में चल रही थी। फोरग्राउंड में रंग मंच के ऊपर में स्टेज के ऊपर में तो ठाकुर ही थे। मां और स्वामी जी दोनों थे बैक स्टेज में। अब जब यह ठाकुर की महासमाधि के बाद में सर्वप्रथम लीला प्रारंभ हुई स्वामी विवेकानंद की। यह जो 1886 जो ठाकुर की महासमाधि हुई उसके बाद में जो वराह नगर मठ की स्थापना फिर यह प्रवरज्या फिर अमेरिका जाना वगैरह जो स्वामी जी की लीला है चलती है 1902 तक तो यह 1886 1886 टू 192 स्वामी विवेकानंद की लीला चलती है और इस समय ठाकुर तो अंतर्ध्य हो ही चुके थे किंतु मां भी जैसे कि बैक स्टेज में थी। स्टेज के ऊपर में स्वामी जी ही दिख रहे हैं। मां उस समय जैसे कि अपने को अदृश्य करके रखा था। क्यों? क्योंकि जब ठाकुर की लीला चल रही है तो उसी को ठाकुर की लीला को ही पूर्ण एक सब पूरा फोकस जो है वहीं पर रहना चाहिए। कोई स्प्लिट नहीं हो जाना चाहिए अपना फोकस। तो ठाकुर की लीला पे ही पूरा फोकस था। सभी भक्तों का जब स्वामी जी की लीला चल रही है पूरा फोकस स्वामी जी की लीला पर ही है। वरना तो फिर जैसे ठाकुर ने स्वामी जी ने बाबूराम महाराज को कहा था कि देखो तुम ना दीक्षा मत देना। क्यों? वरना तुम दीक्षा दोगे ना तो तुमको तो अभी कोई दिक्कत नहीं है। किंतु फिर अभी तो राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी भी दीक्षा दे रहे हैं। वह भी एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है। बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद वो भी एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है। स्वामी जी कहते हैं देखो जो प्रेसिडेंट है उन्हीं को दीक्षा देने दो। तुम यदि दीक्षा दोगे ना तो बाद में क्या होगा कि तुम्हारे चेले और राजा महाराज के चेले दोनों लेठाठी को माने लाठी लेकर के आपस में लड़ेंगे। तो मेरा गुरु महान है। वह बोलेगा मेरा गुरु महान है। यह चेलों का तो यही एक नेचर रहता है। तो अपना खुद का प्रतिपादित करना है महात्म। तो वो कैसे महात्म प्रतिपादित करेंगे? तो मेरे गुरु तुम्हारे गुरु से बड़े हैं। पहले तो यह प्रूव करना होगा। उसके बाद में कहेंगे कि जो महान गुरु होता है उसके चेले भी महान होते हैं। तो क्या है? ये चेलों का नेचर ही ऐसा होता है। तो दीक्षा देगा जो कोई तो वो राजा महाराज को ही दीक्षा देने। बाबूराम महाराज ने दीक्षा दी होगी। मां किंतु क्या है वह बहुत ही अल्प इवन स्वामी जी ने ज्यादा दीक्षा नहीं दी थी। जहां दीक्षा देने का काम मां ने ही किया है वह राजा महाराज ने ही किया है। ठाकुर के जाने के बाद में मुख्यत्व रूप से। तो देखिए कि एक जब रंग मंच के ऊपर में एक ही लीला चलनी चाहिए। दो-तीन लीला साथ में चलती है तो यह दर्शक लोग भी कंफ्यूज हो जाएंगे। और फिर इस तरह के जो लोग होते हैं कि वह अपना एक सत्ता बनाना चाहते हैं अथॉरिटी अपना एक डोमिनेशन तो वे लोग फिर इसको गुरुवाद को लेकर के वे लोग चालू करेंगे एक नया कुछ तो देखिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में 1886 से लेकर के 192 स्वामी जी की लीला चली और जब स्वामी जी की लीला अवसान हुई 192 तब कहीं जाकर के मां धीरे-धीरे करके के प्रकाश में आना शुरू हुई और मां की लीला तब से लेकर के प्रकाशय लीला माने बैकग्राउंड में तो लीला चल ही रही है। वह शोडशी पूजा और उससे भी पहले से जिस दिन वो मां को किसी ने पूछा था कामार पुकुर में मां छोटी थी दो-तीन साल की ही थी। वह कामार पुकुर सीहोड़ सिहोड़ गई थी। वहां पर कुछ धार्मिक यात्रा चल रही होगी तो वहां पर सब बैठे थे। गांव वालों गांव वाले बैठे थे। वहां किसी महिला ने पूछा छोटी बच्ची शारदा उनकी गोद में बैठी है तो इसने पूछा कि अच्छा बताओ तो इतने सामने लड़के बैठे हैं किसके साथ में तुम विवाह करोगी तो मां ने जैसा विवरण है अपने छोटे-छोटे दोनों बहुओं को उठा के सामने जो श्री रामकृष्ण बैठे थे उन्हीं को इशारा करके बोल दिया कि इन्हीं के साथ विवाह करना है तो मां की लीला तो तभी से प्रारंभ हो गई थी कि ठाकुर के पीछे में मां की ही शक्ति है जैसे किंतु तब से लेकर के स्वामी जी की महास समाधि तक मां का जो जो आगमन जो हुआ है भूमि पे 1852 ऑलमोस्ट यही साल में आगमन हुआ है और यह जो सिहोड़ वाली घटना होगी शायद 1854 55 की होगी मैं अनुमान करके कह रहा हूं। उस समय शायद यह ठाकुर कोलकाता आए नहीं होंगे। तो उसके पहले की यह बात है 53 की आसपास की ही होगी। 54 जो भी है। तो वहां से लेकर के यह 192 मां की लीला जो चली है पूरी बैकग्राउंड में चली है। भक्तों की नजर से अदृश्य होकर के चली है। जो कुछ अंतरंग भक्त थे उन्हीं को पता है कि मां की महिमा क्या है? मां के भीतर में कौन सी महाशक्ति विराज कर रही है। कुछ अंतरंग को पता था। ज्यादातर लोगों को नहीं पता था। वह जो लीला जो है उनकी जो महाशक्ति है वो धीरे-धीरे करके प्रकाश में आना प्रारंभ हुई 192 के बाद में 1920 तक मां की लीला चलिए तो देखिए कि ये हम आज उस समय जो लोग जीवित होंगे यह ठाकुर मां स्वामी जी की लीला का दर्शन करने का जिनको भी सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा उन लोगों को भी मुझे नहीं लगता कि शायद इतना डेप्थ जो है इन तीनों की लीला का किस तरह से सिंक्रोनाइज हो रहा है। किस तरह से यह लोग तीनों आपस में प्लान करके यह सब कर रहे हैं। पर तीनों का प्लान नहीं कह के कहेंगे कि मां काली का किस तरह का यह फ्रेमवर्क है। तो शायद लगता है कि उस समय भी जो जीवित रह के अपनी नजरों से अपने चक्षुओं से जो देख रहे हैं शायद उनको भी नहीं पता चला होगा कि इसके भीतर में कितना डेप्थ है। अभी आज हम विथ द हेल्प ऑफ़ द इन अह इंसाइड हसाइड जिसको कहते हैं। तो लक थोड़ा बहुत पता चल रहा है। माने ये महासागर में वो जो ये रहता है ना आइसबर्ग आइसबर्ग में 23/3 नीचे रहता है। पानी के भीतर में वन थर्ड ऊपर दिखता है। यहां पे तो क्या है ना कि वन थर्ट पार्ट ही ऊपर में है समुंदर की सतह पे। बाकी का जितना भी है सब समुंदर की सतह से नीचे है। वह जब तक आप आध्यात्मिक जीवन में बहुत ही उच्च गति नहीं करेंगे तब तक कुछ समझ में नहीं आने वाला। तो एक सरफेस के ऊपर में जो हमको दिख रहा है यह हम इस तरह से देख रहे हैं कि ठाकुर का लीला अवसान आवश्यक था जिससे कि स्वामी जी को एक फलक मिले। एक स्टेज मिले। स्वामी जी की लीला प्रारंभ हो क्योंकि भविष्य के भारत के लिए सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग इस सिविलाइजेशनल डायनेमिक्स को समझना उसको अप्लाई करना बहुत ही आवश्यक था। जो 1000 साल की पिछली जो गलती है उसको हमको मिटाना था और फिर स्वामी जी के लीला अवसान के बाद में जो फैमिली लाइफ है, कम्युनिटी लाइफ है, उसको भी हमको यह तगड़ा बनाना है। अदरवाइज तो फिर यह क्या है? आपके पास में 1000 न्यूक्लियर वेपन है किंतु आपके पास में एक भी मित्र नहीं है। पता नहीं इस तरह के आदमी की क्या हालत होती होगी। तो यह बेटर है कि ये भी एक लीला मां की इनके बाद में प्रारंभ हो। तो यह पूरा जो मैपिंग है वह धीरे-धीरे करके एक के बाद एक स्टेजेस पार हो रहा है। तो कल हमने जो पढ़ा था
तारकेश्वर महादेव के सामने हत्या देने की कहानी: श्रीरामकृष्ण की रोगमुक्ति के लिए माँ सारदा का जीवन-दाँव
उसका सिर्फ एक पैराग्राफ आज फिर से पढ़ लेते हैं। आज क्या वही अनाथनाथ इस संकट काल में मुख उठा के क्या नहीं देखेंगे? यानी कि जो मां ने तो सिंह वाहिनी देवी की करुणा उपलब्धि की ही थी। उनका तो प्रूफ मिला ही था कि देवी के सामने हत्या देने से देवी अवश्य अपनी मनोकामना पूर्ण करती है। और यह जो हत्या देना यानी कि बिना खाए पिए उपवास करके देवी के सामने पड़े रहना यदि देवी मनोकामना पूर्ण करती है तो अच्छा है। तभी हम फिर से आहार करेंगे और मनोकामना पूर्ण नहीं करते हैं तो वही उपवास करके ही देवी के सामने ही देह त्याग देंगे। तो यह एक हत्या देने का अर्थ है। तो मां ने हत्या देने का ऑलरेडी सिंह वाहिनी के सामने सिंह वाहिनी की देवी की करुणा उपलब्ध मां ने कर ली थी। और हमको यह भी पता है कि बिना मतलब वो झूठमठ का जाकर के देवी के सामने इस तरह से पड़े रहना वह भी कोई देवी को पसंद नहीं है। मां के ही एक चाचा की कहानी कि वहां पर पड़े थे। तो देवी ने आकर के श्यामा सुंदरी को बोल दिया मां की मां को कि उसको बोलो कि हटे जाए वहां से वह ब्राह्मण का लड़का है पता नहीं मेरे विश्राम में वो इस तरह की बाधा उत्पन्न कर रहा है तो श्यामा सुंदरी कहती है कि देवी ने आकर के इतना सब कुछ बोला तो एक औषध ही बता दिया होता तो भी तो काम चल जाता तो माने किनको किनकी वासना पूर्ण करनी है किनकी इच्छा पूर्ण करनी है वो भी तो देवी ठीक करती है तो मां को ऑलरेडी यह प्रूफ मिल चुका था कि यह जगत धात्री उनकी बात सुनती है तो क्या फिर से आज मां फिर से जाकर के इस तरह से किसी देवी या देवता के सामने हत्या दे तो क्या वो नहीं सुनेंगे क्या वो अनाथनाथ इस संकट काल में क्या कृपा दृष्टि इन पर नहीं डालेंगे क्या श्री रामकृष्ण गत प्राणा सती की आंखों में आंसू जब आते हैं तो देवता का हृदय क्या नहीं पिघलेगा बहुत कुछ सोच समझ करके मां ने ठीक किया कि सर्व जीव के सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी तारककेश्वर महादेव के मंदिर में हत्या देनी होगी। एटलीस्ट एक बार तो प्रयास करके देखना होगा कि यह विधि के द्वारा परिचालित नियति चक्र इसकी गति परिवर्तित होती है कि नहीं। ईश्वर का संकल्प और आर का क्रंदन इससे क्या यह विधि परिचालित चक्र विचलित होता है कि नहीं? तो यह सोच के मां वहां पर जाने वाली है तारकेश्वर और फिर तारकेश्वर जाकर के क्या मां को अनुभूति हुई वह अभी हम अपने नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: स्टीरियोटाइपिंग के बारे में — शरत महाराज का स्वामीजी से पहली भेंट का प्रसंग कितना रोचक है। पहली नज़र में उन्हें लगा कि स्वामीजी अत्यंत अहंकारी हैं!
ये स्वामी जी जब अमेरिका गए थे ना तो स्वामी जी को किसी ने पूछा कि आप तो धार्मिक प्रचारक है। आप इतना हंसते क्यों रहते हैं? हमारे यहां पे तो कैथोलिक प्रचारक है। एकदम सीरियस चेहरा बना के गंभीर हो के घूमते हैं। आपको तो जब देखते हैं हंसी मजाक करते रहते हैं। हंसते रहते हैं। ये क्या माजरा क्या है? आप थोड़ी ना धार्मिक प्रचारक हैं। तो स्वामी जी ने कहा मेरे पेट में क्या दर्द हो रहा है कि मैं सब समय मुंह चढ़ा करके घूमता रहूं। मुझे पेट में दर्द होगा तब मैं मुंह गंभीर करूंगा। अदरवाइज मैं क्यों गंभीर होकर बैठूं?
प्रश्न: बौद्ध युग में हुई एक ऐतिहासिक भूल का दुष्परिणाम हम आज भी भुगत रहे हैं
मैं और एक बात ऐड क्या करूंगा? पता है कि देखिए जब इंडिपेंडेंस का यह जो अपना दौर चल रहा था ना फ्रीडम फ्रीडम फाइटिंग का दौर जब चल रहा था तब तो फिर भी हमारा यह सब रिकंसिलिएशन हो चुका था। माने जितने भी आप प्रथम पंक्ति के फ्रीडम फाइटर्स को देखे ना वो स्वामी जी के साथ में ही उनका माइंड चल रहा था कि एक और आध्यात्मिकता लेनी है दूसरा और सामाजिक उत्थान करना है। हमारा प्रॉब्लम पता है आज का जो प्रॉब्लम है यह जो ये इंदिरा ने ये जो वो रशिया के साथ में मिलकर के जो एक ये है ना क्या सेक्युलरिज्म वो जब भारत में घुसाया है ना तब से ये एक नया भयानक डेंजर स्टार्ट हुआ है। लेफ्टिस्ट सेकुलर टाइप का जो थिंकिंग है जो कि कहता है कि जो भारतीय धर्म है पूरा गलत है। तो दैट प्रॉब्लम आज हमको सही में परेशान कर रहा है। ये आज का रिसेंट फिनोमिना है। हमारा आज का जो प्रॉब्लम है वरना आप देखिए ना बाल गंगाधर तिलक ये आचार्य कृपलानी महात्मा गांधी ये जो सरदार पटेल म इवन सुभाष चंद्र बोस आप कौन से भी स्टेट के को नेशनल लेवल के स्टेट लेवल के आप फ्रीडम फाइटर्स को देख लीजिए वो सभी लोग स्वामी जी के साथ में इंस्टिंक्टिवली एग्री हो जाए देखिए इतना सूक्ष्म फिलोसोफिकली ना भी सोचे और बोलेंगे कि आई आई आई रिस्पेक्ट स्वामी जी या तो आई अंडरस्टैंड ह आइडियाज एंड तो दैट मींस कि सब कुछ हो गया। फिर यदि आप स्वामी जी को अब गंगाधर बाल गंगाधर तिलक वो जो पुणे में जो उनके साथ में जब वार्तालाप हुआ था तो उन्होंने तो एकदम एकदम स्वामी जी से इतने इंप्रेस हो गए थे कि स्वामी जी के जो आइडियाज है व्हिच आर नेसेसरी फॉर मॉडर्न एज। अभी उन आइडियाज के पीछे में थिंकिंग क्या है? वो यदि समझ में आया ना आया स्वीकार किया ना किया किंतु ठाकुर कहते हैं ना कि वह मीठी रोटी आप सीधी करके खाओ ना कि आड़ी करके खाओ तो मीठी लगने वाली है। हां फर्क नहीं पड़ता। एस लॉन्ग एस यू आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच।
प्रश्न: शंकराचार्य ने भी बौद्ध युग में हुई ऐतिहासिक भूल को दोहराया - आध्यात्मिक मेधाशक्ति के साथ जन-साधारण के कल्याण को नहीं जोड़ा।
देखिए मैं क्या कहूंगा पता है यहां पे कि शंकराचार्य के कॉम्प्लीमेंट्री के रूप में हमको चैतन्य महाप्रभु को रखना चाहिए। जैसे ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को इकट्ठा करके आपको यह भावधारा लेनी है। आप सिर्फ स्वामी जी को फॉलो करेंगे तो आप हो सकता है कि गड़बड़ हो जाए क्योंकि केरीिकचर है ना कि स्वामी जी रिप्रेजेंट्स उठो जागो। अभी स्वामी जी स्वामी जी के जीवन में आध्यात्मिकता इतनी भरी हुई थी वो नहीं दिखेगी। कैरी केचर ही हमको दिखता है। तो स्वामी जी यानी उठो जागो मां है यानी कि अशो एसो बसो खाओ माने आओ बैठो खाओ और ठाकुर है कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या अब ये केरी केचर अपने माइंड में बैठ गया है तो इसलिए क्या है कि ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को लेना है सिमिलरली शंकराचार्य जब आए थे उन्होंने प्योर वेदांत की बात की तो यहां पे आठ चंडाल को हृदय में लगाने वाले उन्हें वो जो आलिंगन करने वाले तो चैतन्य महाप्रभु भी तो थे उसी समय आए थे तो दोनों को एज ए कॉम्प्लीमेंट्री लेते ना तो चल जाता अपना काम हमारे यह जो पिछले 1000 साल में प्रॉब्लम क्या हो गया ना कि यह स्प्लिट जो होने लगा दैट इज द प्रॉब्लम। अभी आप शंकराचार्य पे हम क्यों बिठाए यह सब जब जिस भाग्य विधाता ने शंकराचार्य को भेजा है तो वही भारत के भाग्य विधाता ने तो चैतन्य महाप्रभु को भी भेजा है। तो अपनी ये अकल यदि नहीं है कि दोनों को एज ए कॉम्प्लीमेंट्री टू ईच अदर लेना तो फिर गलती किसका है? म यह अभी हमारी गलती है ना ही शंकराचार्य चैतन्य महाप्रभु की निंदा करेंगे ना ही चैतन्य महाप्रभु शंकराचार्य की करेंगे यह एक दूसरे और इसीलिए स्वामी जी ने कहा ना बाबूराम महाराज को तुम दीक्षा मत देना वरना तुम्हारे चेले ना लाठा लाठी करेंगे अभी रिसेंटली ये जो आत्मस्थानंद जी की जो सेंचुरी जो जन्म शताब्दी जो सेलिब्रेट हुई तो सेलिब्रेशन एक पूरा डिवोटी की कमेट है उसने किया साधु लोगों का हेल्प है किंतु ऑफिशियली हम लोग कभी नहीं करेंगे। यह जो उनके रेमिनेशंस पब्लिश हुए और जितने भी रेमिनेशन गहिनानंद जी के उससे पहले ये रंगनाथानंद जी के वह सब उनकी कमिटीज के द्वारा हुए। हमने बेलून मठ ने कभी यानी अपने ऑफिशियल प्रकाशन विभाग ने कभी नहीं किया।
प्रश्न: गीता में भी इसी तरह विभिन्न मत का समन्वय है
इसीलिए भगवान कृष्ण को ओरिजिनल समन्वयाचार्य कहते हैं। यदि समन्वय करने की आवश्यकता नहीं पड़ती तो यह शब्द ही नहीं खोजा जाता।
धार्मिक कट्टरता आज के भारत के लिए एक बड़ा ख़तरा है
देखिए अभी अब कल ही मैं हमारे यहां पे संस्कृत क्लास 10 दिन का स्टार्ट हुआ तो मैं इनके सामने में द इंट्रोडक्शन के रूप में मुझे बुलाया बोलने के लिए। तो मैंने उनको कल ही कहा कि देखिए कि पिछले ये 30-40 साल का जो गलती है ना अपना वो इतना सीरियस है कि आज ना हम जितने भी यंग लोगों को मिलेंगे ना उनके सबके मन में ये आइदर यह सेक्युलरिस्ट फिलॉसोफी बैठी हुई है और जो रिलीजियस है ना उनके माइंड में ऐसा बैठा हुआ है कि सेकुलर नॉलेज किसी काम का नहीं। बट स्वामी जी कांसेप्ट क्या है? टेक द बेस्ट फ्रॉम द ईस्ट एंड टेक द बेस्ट फ्रॉम द वेस्ट एंड देन फ्यूज देम टू क्रिएट अ न्यू सिविलाइजेशन। तो माने देखिए कि आज से 40 साल पहले पेंडुलम एक डायरेक्शन में गया। बहुत ज्यादा सेुलर हो गए। अभी मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह रिवर्स डायरेक्शन में जा रहा है कि माने धर्म को इस अर्थ में हम फिर से इंटरप्रेट करना शुरू कर दे रहे हैं जो कि हमने 1000 साल पहले किया था कि प्रत्येक छोटा-छोटा जो वाक्य है उसको लिटरली लेकर के उसके ऊपर में अप्लाई करना तो फिर ये नात जात फिर से बढ़ेगा। आज आप इलेक्शन में देखिए कि इलेक्शन कास्ट के ऊपर में ही सब कुछ है। तो यदि इतना पावरफुल कास्टिज्म आज भी है तो फिर भारत का भविष्य कहां पे है? वह एक प्रश्न हो सकता है। सो एवरीडे आई फील कि न्यू अर्जेंसी कि स्वामी जी ठाकुर मां का जो मैसेज है हाउेंट इट इज फॉर इंडिया। अभी मैं रिसेंटली पढ़ रहा था ऑक्सफोर्ड का वर्ड ऑफ ईयर ऐसा एक डिक्लेअ किया है रेज बेड। व्हाट इज रेज बेड? रेज माने क्रोध गुस्सा। तो ऐसी पोस्ट सोशल मीडिया पे चलाओ जो कि लोगों में गुस्सा प्रकट करे। अब इस मुस्लिम ने हिंदुओं पे अत्याचार किया। ऐसा कुछ चलाओ तो हिंदुओं में फटाफट करके वो लोग क्लिक करेंगे उसके ऊपर और वहां पाकिस्तान पाकिस्तान में चलाओ कि हिंदू लोग इंडिया में कश्मीर में मुसलमानों पे अत्याचार कर रहे तो वे लोग फटाफट करके क्लिक करेंगे। सो क्लिक यदि आपको चाहिए तो रेज प्रकट करो। क्रोध प्रकट करो। लोग फटाफट करके उसको ले लेंगे। सो रेज बेट दिस इज अ वर्ड ऑफ द ईयर। 90 के नीचे चला गया है। रोज न्यूज़ पेपर खोलते हैं। कुछ ना कुछ आघात लगता है। अरे बाप रे ये क्या हो गया? मेरा जो आंसर होगा वो जैसे है ना ब्रह्मा का एक दिन और हमारा एक करोड़ दिन और तो क्या है वो सतयुग के हिसाब से जो गणना की गई है ना अब ये कलयुग का वो जो है एक-एक दिन ना हजार दिन का सफरिंग हो जाता है। तो वो 4 लाख का जो कलयुग है वो 5 हजार में खत्म हो गया। वो जो मैंने चेतनानंद जी की बात बताई थी ना वो एक ठाकुर ने कहा 100 साल के बाद आऊंगा वर्धमान के रास्ते से आऊंगा फिर ये बाउल लोगों का मेला है वहां पे वो बाउल सज के आऊंगा तो एक अमेरिकन डिवोटी लेडी डिवोटी अभी अमेरिकन लोगों का क्या है जो पकड़ेंगे बड़ा सीरियसली पकड़ेंगे तो ठाकुर ने बोला है तो बड़ा सीरियस ले लिया तो ये ऑलमोस्ट आई थिंक 1886 की बात है 1986 ठाकुर की महासमाधि के 100 साल के बाद तो ये लेडी डिवोटी जाके चेतनानंद जी को कहती है कि मैं जा रही हूं हूं वर्धमान बाउल के मेले में ठाकुर आएंगे तो पहला दर्शन मैं करूंगी। तो अभी चेतनानंद जी को पता है वो डिसपॉइंट हो के आएगी अब बिना मतलब तो फिर उन्होंने कहा कि देखिए ठाकुर का गणित तो अच्छा नहीं था। उन्होंने कहा 100 साल इसका अर्थ है 100-100 साल। अभी कितने 100 साल अभी आप समझिए। और फिर ऊपर में रैशनलाइजेशन भी कर देंगे। ठाकुर को कहां गणित आता था? ना देखिए इसीलिए भारत में ना धर्म बहुत ही ज्यादा प्रैक्टिकल है। आप धर्म को बिल्कुल लिटरली लेंगे तो आप कुछ नहीं कर पाएंगे। किंतु बिकॉज़ के धर्म हमारे एकदम अस्थि मज्जाओं तक प्रवेश कर गया। डीएनए तक चला गया। हमको धर्म को प्रैक्टिकल करना पड़ेगा। वो उन लोगों को अभी नहीं आता है। वे लोग अभी थ्योरेटिकल लेवल पर तो सब कुछ लिटरली ले लेते हैं।
प्रश्न: रामकृष्ण संघ में आध्यात्मिकता और प्रैक्टिकल का कितना मधुर संगम है!
किंतु यहां पे देखिए जो सांसारिक संबंध है उसको मां ने तोड़ा। यह जो पारमार्थिक संबंध है उसको नहीं तोड़ा। बिल्कुल आखिरी समय में वो जो लड़का आया था हल्लागुल्ला कर रहा है। मां का दर्शन करना है। मां मृत्युशैया पे सोई है। फिर भी वह खड़ी होकर के बैठ के कहा कि उसको बुलाओ मेरे पास। हम लोगों का जन्म क्या रसगुल्ला खाने के लिए हुआ है। सो वो पारमार्थिक संबंध को तो मां ने अकेली तक नहीं तोड़ा। जो सांसारिक संबंध था वो तोड़ दिया है मां ने। सो दैट इज वन डिस्टिंशन। तो वो जो ठाकुर की कहानी है ना कि वो मृत्यु शैया पे आदमी बैठा है। वो कहता है दीवे की वाट को थोड़ा कम करो। बहुत ज्यादा तेल जल रहा है। किंतु देखिए यहां पे मैं और एक बात कहूं क्या? अभी माने खास करके हमारे जो अभी के जो प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज उनका मैंने देखा सबके लाइफ में ना एक प्रैक्टिकिटी सॉलिड प्रैक्टिकिटी है। ऑन वन हैंड जैसे कि ब्रह्म ज्ञान को ऑलमोस्ट स्पर्श कर दिया है। ऑन दी अदर हैंड संघ को चलाने का जो जिम्मा और जो दायित्व और उनका जो एक्सपर्टाइज है ना वह उनको इतना प्रैक्टिकल कर देता है कि आपको दोनों चीजों को इतना सुमधुर संगम देखने को मिलेगा। अपने आजकल के जो टॉप लेवल पर जो बैठे हुए हैं इन लोगों का सो वे लोग भी ऐसी ही बात कर सकते हैं कि अभी आप सेवा प्रतिष्ठान में गए हैं बोला कि ये वो महाराज कहां है तो ये रहे दूसरे महाराज कहां है वो ये रहे तीसरे कहां है वो रहे तो फिर वो मिशन ऑफिस में कौन बैठा है बोल सकते हैं दिस इज एंटायरली पॉसिबल और फॉर देम देखिए एक हाथ से ब्रह्म ज्ञान पकड़ा है तो दूसरे हाथ से ये जिम्मा लिया है सो इतना सुंदर उनमें ये संगम देखने को मिलेगा वो श्रीधरानंद जी वो तो लखनऊ का इतना बड़ा मंदिर तैयार किया। जैसे ही मंदिर हो गया बोला जाओ ऑस्ट्रेलिया। दूसरे दिन पहने पहने हुए कपड़े पहन के ऑस्ट्रेलिया चले गए। फिर ऐसा नहीं कि ये मंदिर मैंने तैयार किया तो मैं ही एडमिनिस्टर करूंगा। सिमिलरली आत्मस्थान जी राजकोट का मंदिर जैसे ही तैयार हुआ बोला जाओ अभी बेलूर मठ। तो ऐसा नहीं कि ये मंदिर मैंने तैयार किया तो मैं यहां पे रहूंगा। जैसे ही बोला वैसे ही निकलो। बस बात खत्म हो गया। आप राजकोट का देखिए ना राजकोट का आज का जो प्रोस्पेरिटी है भक्तों में जो प्रेस्टीज है वह भूतेशानंद जी तो थे ही थे किंतु भूतेशानंद जी को जाए हुए बहुत साल हो गए थे। अभी आजकल के जो पूरा फाउंडेशन है वह पूरा आत्मस्थानंद जी का ही है। ओम