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ओ स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः आज नया चैप्टर मां का जीवन गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित च का नाम है वधु मां के जीवन के बारे में देखा हमने शुरू से लेकर के कि किस तरह से बचपन में जगदंबा रूपिणी बालिका या तो फिर कहेंगे बालिका रूपिणी जगदंबा अपने छोटे-छोटे हाथों से अपने मां और अपने भाइयों की किस तरह से भाइयों की केयर करती थी और माताज और पिता जी का जो कार्य था उसमें हाथ बटा द थी और सिर्फ इतना ही नहीं जब वहां पर दुर्भिक्ष अकाल पड़ा तब अपने छोटे-छोटे हाथों से वह गरम गरम खिचड़ी ठंडा कर दिया करती थी जिससे कि वह जो भूखे लोग हैं उनको खाने में सहायता हो भूख का जो कष्ट है वह सहा नहीं जाता कि गर्म खिचड़ी ठंडी होने की राह नहीं देख पाते तो मां अपने हाथों से हवा करके खिचड़ी को ठंडा करती थी तो सुंदर प्रसंग सब मां के जीवन में देखे किंतु जो मां का आगमन जिस प्रयोजन से हुआ था श्री राम कृष्ण देव की लीला संगीन के रूप में श्री राम कृष्ण देव रूपी अवतार के साथ में शक्ति का जो प्रादुर्भाव यह अवतार और अवतार की शक्ति यथा नेर दहि का शक्ति यह दोनों ने मिलकर के भारत में जो धर्म परिवर्तन या तो फिर कहेंगे कि धर्म का पुनर्जीवन धर्म का पुनर भाव जो प्रकट करना था उसके लिए तो दोनों का आगमन हुआ था बचपन का संसार बचपन में मां का घर यह बहुत सुंदर मधुर लीलाएं तो की किंतु जिस प्रयोजन के लिए मां का सही सही में आगमन हुआ था वह प्रयोजन की शुभ क्षण अभी आकर के उपस्थित हुई है श्री राम कृष्ण देव के साथ में उनका मिलन होने वाला है और इसी मिलन से हम जो उनके छोटे मोटे कच्चे बच्चे हैं हम सभी लोग हमारे माताजी और पिताजी वो जो शुभ क्षण है वोह आकर के उपस्थित हुई है महाराज जी लिखते हैं सिहोड़े श्री राम कृष्ण भागने श्री जुक्तो हृदय राम मुखोपाध्याय गृहो छलो शी होड़ में रामकृष्ण देव के भगने अर्थात की भांजे की मां का भांजे का घर था अभी हमको पता है कि हृदय कौन था हृदय का एक बहुत बहुत ही इंपोर्टेंट कैरेक्टर है एक बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल है श्री रामकृष्ण देव की लीला में भगवान जब दक्षिणेश्वर में लीला कर रहे थे उस समय उनका संपूर्ण मन जो एक एक समय आता है कि साधना किसको कहते हैं वह मनुष्य लोगों को दिखाना है मनुष्यों को दिखाना है अवतार जब आते हैं तो अवतार तो स्वयं सिद्ध है साधना करने की क्या जरूरत है किंतु फिर भी साधना इसलिए कि जिससे कि हम लोग सीखे हम लोग समझे कि सही सही आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना है तो ठाकुर जब दक्षिणेश्वर में साधना कर रहे थे तो उनकी संभाल रखने के लिए तो कोई एक चाहिए होता उनका एक सेवक जो कि उनके जीवन धारण करने के लिए सहाय रूप हो उनके खाने की कपड़ों की रहने की सब तरह की व्यवस्था कर दे क्योंकि ठाकुर तो संपूर्ण रूप से संसार से ये हो गए थे संसार से संपूर्ण वो डिफरेंट हो गए थे संसार के ऊपर में कोई भी उनका शरीर भी धारण करना है उसके ऊपर में भी उनका ख्याल नहीं था तो हृदय था कि जिसकी वजह से ठाकुर को जीना वह उनका जीवन धारण संभव हो पाया तो यही तो हृदय है जो और फिर ठाकुर ने कहा था कि हृदय ने जितनी सेवा की इतना मुझे कष्ट भी दिया था और आखिर में हृदय को कालीवाड़ा भी पड़ा था तो जो भी है वह एक ठाकुर की लीला में हृदय का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है तो वही हृदय ठाकुर का भांजा हृदय उसका घर था सि होड़ में तो ई सूत्रे ठाकुर तथा जाता जात कोरीते तो सि होड़ में इसका घर था भांजे हृदय का तो इसीलिए यह एक ठाकुर का वहां पर संबंध था इसीलिए ठाकुर वहां पर आना जाना करते थे श्री मायर मातुला लय ओ ओई एकही ग्रामे मा का मातुला लय अर्थात की मां की मां का घर श्यामा सुंदरी देवी का घर भी शि होड़ में ही है तद व्यतीत शांतिनाथ शिवे प्राचीन स्थापत्य अनुयाई प्रोर निर्मित मंदिर के केंद्रो कोरिया जे उत्स वादी होई तो तद उपलक्ष किंबा संगति संपन्न गृहस्थ गृहे कीर्तन और जात्रा भिन यादि दर्शनार्थ जय बाटी निवासी अन्नान नोरो नारीर सहीद श्री मायर पिा लयर अनेक मध्य मदे शि होड़ जाते आश पाशे ग्रामर अनेके ओ आशीते य परे पैराग्राफ जितना सेंटेंस क्या कहते हैं कि यह तो एक दो संपर्क सूत्र अभी तक सि होड़ के साथ में गंभीरानंद जी महाराज ने बताए सर्वप्रथम तो ठाकुर के भांजे का घर वहां था द्वितीय कि मां की मां का घर वहां पर था और यदि हमको याद हो तो मां वहां पर ही गई थी श्यामा सुंदरी देवी और फिर वहीं से वह सोच के लिए जा रही थी और फिर वह उनके ऊपर में देखा कि वहां वह बेल वृक्ष है बेल वृक्ष में से एक बालिका आकर के उनके गर्भ में प्रवेश कर गई है तो वहीं पर इतने सारे सि होड़ को लेकर के कनेक्शन है तो महाराज जी कीत है कहते हैं तद व्यतीत इसके अलावा शांतिनाथ शिवे प्राचीन स्थापत्य स्थापत्य यु नाई प्रस्तर निर्मित मंदिर के केंद्र करिया वहां पर शांतिनाथ शिव बोलकर के एक सुंदर प्रस्तर निर्मित अ अर्थात की पत्थर से बना हुआ एक मंदिर था और उसमें शिवलिंग था उसको केंद्र करके अर्थात कि यह एक पॉपुलर एक फेमस एक बड़ी ही श्रद्धा और आस्था का स्थान था तो उसको केंद्र करके जे उत्सव वगैरह होता उसके उपलक्ष में अर्थात कि वह शांतिनाथ शिव के आसपास में उस मंदिर में जो उत्सव होता उसमें पार्टिसिपेट करने के लिए उत् समय हिस्सा लेने के लिए भगवान शिव का महादेव का दर्शन करने के लिए जयराम बाटी से काफी लोग आना जाना करते थे और इसके अलावा आसपास के ग्राम के इसके अलावा वहां पर यात्रा अभिनय वगैरह होता था तो यात्रा अभिनय आदि दर्शन करने के लिए उसको देखने के लिए संगति संपन्न अर्थात कि जिनके पास में थोड़ा सा धन है थोड़ा सा उनके पास में कुछ अर्थ है ऐसे लोग वहां पर आना जाना करते थे तो इनके साथ-साथ में ही जयराम बाटी निवासी अन्यान्य नोरो नारी शहीद श्री मायर पिा लयर अनेके मध्य मध्य शि होड़ जाय तेन तो जयराम बाटी निवासी मां के पिलयसेंटर बताए सर्वप्रथम तो ठाकुर के भांजे का घर वहां था दूसरा कि श्यामा सुंदरी देवी का घर वहां था तीसरा कि शांतिनाथ शिव उनकी पत्थर से बना हुआ मंदिर वो भी बड़ा ही श्रद्धा और आस्था का स्थान था उसको केंद्र भूत करके केंद्रित करके बहुत सारे आसपास के गांव वाले वहां पर आना जाना करते थे कोई भी उत्सव हुआ यात्रा अभिनय हुआ बंगोल के गांव में आपको तो पता होगा शायद कि वह यात्रा अर्थात कि कोई पौराणिक विषयों के ऊपर में नाटक का अभिनय होता है ठाकुर के जीवन में हमको पता है कि ठाकुर वहां पर पाठशाला में वो भेज उनको भेजा जाता था घर से कि जाओ पाठशाला में जाकर के पढ़ो किंतु पाठशाला में जाकर के पढ़ने की बजाय ठाकुर क्या करते थे माणिक राजा के अमरकानन में अर्थात कि माणिक राजा के वो वो जो केरी का बागान था आम का बागान था मैंगो ऑर्चर्ड तो वहां पर जाकर के यह सब यात्रा अभिनय करते थे तो कभी वह प्रहलाद का जीवन का अभिनय किया ना कि कोई ध्रुव के जीवन का अभिनय किया इस तरह से वह पौराणिक पात्रों को लेकर के जो कहानी है उसके ऊपर में नाटक मंडलिया बहुत सारी वहां पर थी उसी विस्तार में तो उनका अभिनय ठाकुर खुद किया करते थे तो वैसे ही यह यात्रा यह नाटक मंडलिया वहां पर बड़ी ही पॉपुलर थी उस समय में आजकल तो सभी के पास मोबाइल आ गया है है इसलिए लोग मोबाइल पर यह सब देखते हैं और मोबाइल में भी आपका आकर्षण मन को आकर्षित करने के लिए बहुत सारे डिफरेंट डिफरेंट टॉपिक है किंतु यह जो उस समय का एक क्या कहेंगे कि एक कल्चर था वहां का कि सही सही में इस यात्रा धार्मिक ये अनुष्ठानों में लोगों को जो इंटरेस्ट था वो इतना था कि यात्रा अभिनय देखने के लिए सभी लोग कहां आजूबाजू के गांव से पता चला शिवनाथ के मंदिर में शांतिनाथ मंदिर में में वहां पर इस तरह से कोई अभिनय हो रहा है नाटक हो रहा है यात्रा हो रही है तो कितने आसपास के गांवों से लोग आखर के मिलते थे और इस तरह से नाटक देखा करते थे हृदयर गृह ए रूप संगीता अनुष्ठान कालीन एक कौतुका वह घटना उल्लेख श्री श्री रामकृष्ण पुंथी ते देखीते पावा जाए अभी इसी तरह से हृदय के घर में एक बार कोई संगीत का अनुष्ठान हुआ था भजन कीर्तन का किसी कार्यक्रम का आयोजन हुआ था तो इस कार्यक्रम के आयोजन के उपलक्ष में एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण घटना हुई थी इस घटना का उल्लेख श्री श्री रामकृष्ण पुंथी में पाया जाता है अभी हमको पता है कि अक्षय कुमार घोष बोलकर के ठाकुर के एक शिष्य थे व मास्टर थे टीचर थे और ठाकुर के पास आया करते थे तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में उन्होंने यह कविता के रूप में बांगला में जो चलित जो जो पॉपुलर जो फॉर्म होता है कविता का पुंथी उसके रूप में उन्होंने श्री श्री रामकृष्ण पुंथी लिखा है अर्थात कि काव्यम रूप में ठाकुर की बायोग्राफी शरत महाराज ने वो फिलोसॉफिकल दृष्टि से रामकृष्ण श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंगी की रचना की है और अक्षय कुमार ने उन्होंने एक काव्यात्मक रूप से काव्यात्मक रूप से ठाकुर की जीवनी की रचना की है तो इस रामकृष्ण पुंथी में एक बड़ा ही सुंदर एक बड़ी ही सुंदर घटना का वर्णन हमको मिलता है क्षुद्र बालिका शारदा ई संगीते आशो एक महिला र करोड़े बोशिया छीले छोटी सी बालिका शारदा भजन कीर्तन का जो कार्यक्रम था उसमें एक महिला की गोद में बैठी हुई थी गीत समा पना ई महिला तहा के ददरे जिज्ञासा कोरी लन गीत जब समाप्त हो गया भजन कीर्तन समाप्त हो गया तब इस महिला ने मां को बड़े ही स्नेह से पूछा े ए तो लोक खाने रोए छ ए देर मध्य का के तोर बय करते शाद होए यह जो यहां पर इतने सारे लोग बैठे हैं भजन कीर्तन के कार्यक्रम में तो तुम बताओ कि तुम क्या चाहती हो किसके साथ में तुम विवाह करना चाहती हो जैसे वोह छोटी बच्ची को इस तरह से पूछा जाता है कभी खेल खेल में हंसी मजाक में ओमनी उभय कोर तुल शारदा अधूरे उप बिष्ट श्री राम कृष्ण के दिखाया दिलन जैसे ही मां को पूछा गया छो किसी बालिका शारदा को कि बताओ इतने सारे लोग यहां पर बैठे हैं किसके साथ विवाह करोगी तो वैसे ही माने अपने छोटे-छोटे हाथ उठा कर के सामने ही श्री राम कृष्ण बैठे थे उनके सामने इशारा करके दिखा दिया कि इनके साथ में मैं विवाह करूंगी देखिए अ हमको पता है कि यह जो ठाकुर का जो प्रसंग है कि ठाकुर जब दक्षिणेश्वर में थे साधना में डूब गए थे और ठाकुर के बारे में चित्र विचित्र बातें चंद्रा मणि की देवी के पास में आ रही थी तो उन्होंने ठाकुर को बुलाया किसी ने कहा बच्चे का विवाह कर दो तो माथा ठीक हो जाएगा संसार की जवाबदारी आएगी तो तो माने ठाकुर को बुलाया कामर पुकुर और उनके विवाह की व्यवस्था करने की शुरुआत की उस समय और दो-तीन पात्र हों को देखा गया था कल उस दिन हमने देखा था कि एक पात्री उनमें थी जिसने बाद में कहा था कि मेरा यदि परमहंस महाशय के साथ में विवाह होता तो मां के पास में अभी यह जो फल मिठाई वगैरह आता है वह मेरे पास आता तो जो भी है ऐसे कुछ कुछ लोगों के साथ में शायद बात भी हुई होगी किंतु ठाकुर ने कहा था कि देखो जयराम बाटी ग्राम में जिस जो पात्री है जिनके साथ में मेरा विवाह होने वाला है वह वहां पर सुरक्षित रूप से रखी गई है अर्थात कि हमको यह तो पता है कि ठाकुर ने मां को पहले से ही चिह्नित करके रखा था किंतु यहां पर तो व जो घटना है उससे पहले की घटना की यह बात है कि मां ने खुद ने ठाकुर को नत करके रखा है मैंने ठाकुर जद कहते हैं कि पात्री को वहां पर सुरक्षित रखा गया है तो यहां पर उल्टा है हमको देखने को मिलता है मां ने कहा कि पात्र जो है वो मेरे लिए सुरक्षित रखा गया है कहा वो ठाकुर की महिमा ज्यादा ना कि मां की महिमा ज्यादा ऐसे कभी-कभी हम साधु लोगों में ऐसा एक डिस्कशन जैसा होता है वो जो एक क्या कहते है ह्यूमरस डिस्कशन तो ये देखिए कि ठाकुर कहां मां को चिह्नित करने वाले हैं यहां पर मां ने ही पहले ही ठाकुर को देख कर के बता दिया कि विवाह तो मेरा इन्हीं के साथ में होने वाला है श्री मां ए रूपे ज दिन स्वयंवरा हुया लेन से दिन लोक दृष्टि ते ताहर विवाह शब्द तात्पर्य बोध छलो ना मां जिस दिन इस तरह से स्वयं वरा हुई थी उस दिन मां की उम्र इतनी कम थी कि विवाह शब्द का क्या सांसारिक अर्थ है वह मां को शायद पता भी नहीं था छोटी सी बालिका है जदी उसको पूछा जैसे छोटे बच्चे घर-घर खेलते हैं ना ये ये मां है यह पिताजी है यह छोटे बच्चे ऐसे खिलोने के वो जो सबको बना कर के गुड़िया वो खिलौने लेकर के घर-घर खेलते हैं छोटे बच्चे उनको तो पता भी नहीं होता कि यह विवाह का इसका क्या अर्थ है संसार का वह यह करना संसार करना साथ में मिलकर के यह सब चीजों का उनको तो कोई ज्ञान ही नहीं होता छोटे बच्चों की बुद्धि में किंतु उस समय मां ने ठाकुर को दिखा कर के स्वयंवरा हुई थी देखिए स्वयंवर यह शब्द मां के बारे में महाराज जी ने लिखा है हमको पुराण की कथाएं सुनकर के पता है कि किस तरह से व मां सीता ने जो स्वयंवर होता था राजकुमारियों का ऐसे होता है ना कि पुरुष प्रधान देश ये जो पश्चिम के जितने भी देश थे वो सब पुरुष प्रधान वो पश्चिमी सिविलाइजेशन पुरुष है कि वो स्त्री का वो चयन करेगा स्त्री का सिलेक्शन करेगा भारत में स्त्री प्रधान देश है शक्ति प्रधान देश है हमेशा से आप देखेंगे कि मां का स्थान सबसे ज्यादा है सबसे ऊपर है अपनी सामाजिक व्यवस्था में स्वामी जी ने अपने प्रवचनों में कहा है आप देखिए कि स्त्री के बारे में पश्चिमी सभ्यता में क्या समझा जाता है उनके बारे में उनका क्या ख्याल है क्या कांसेप्ट है और हमारे यहां क्या है वहां पर स्त्री अर्थात की वाइफ जो पत्नी होती है उसको स्त्री का सबसे बड़ा रोल पत्नी का रोल होता है ऐसा वो वहां पर बोलते हैं सोचते हैं और अपने यहां पर सोचते हैं कि स्त्री का सबसे बड़ा रोल जननी का होता है स्त्री का सबसे बड़ा जो कार्य है वह जननी का कार्य है मां का कार्य है मां का स्थान समाज में सर्वोपरि है सर्वश्रेष्ठ है हमारा मातृ प्रधान सभ हमारी सभ्यता हमेशा से मातृ प्रधान सभ्यता रही है वह आप मोहेंजो दड़ोस केवेन है आर्कियोलॉजिकल एक्सक वेशन वहां पर आप देखेंगे कि फर्टिलिटी के रूप में वो स्त्रियों की मूर्तियां वहां पर पाई जाती है अर्थात कि देखिए कि मां का स्थान या तो फिर स्त्री का स्थान वो उसी समय से अपने समाज में सर्वश्रेष्ठ माना गया है तो जब विवाह होता है तो राजकुमार राजकुमारी को नहीं सिलेक्ट करेगा राजकुमारी राजकुमार को सिलेक्ट करेगी ये आप यदि फेरी टेल्स जिसको कहते हैं ना काल्पनिक कहानियां वो पश्चिमी सभ्यता की पढ़ के देख लीजिए और हमारी सभ्यता की पढ़ के देख लीजिए हमेशा से यह डिफरेंस रहेगा तो इसीलिए कि यह राजकुमारी जो है वह अपने वर का स्व चयन करेगी स्वयं वर करेगी तो यहां पर भी देखिए कि वही हमारी आध्यात्मिक पौराणिक परंपरा जिसको कि मां ने निभाया है मां स्वयंवरा हुई है मां ने ही ठाकुर का सबसे पहले सिलेक्शन किया है ठाकुर ने मां का सिलेक्शन वो कहां करने को जाएंगे वो सब तो बात की बातें है पहले ही मां ने ठाकुर को अपने ववर के रूप में अपने पति के रूप में सिलेक्ट करके रख दिया है किंतु यह भी एक बात है जैसे महाराज ने कहा कि जिस दिन मां स्वयंवरा हुई थी उस दिन मां को यह शब्द का अर्थ भी नहीं पता था कि विवाह का क्या अर्थ है परिवार संसार का क्या अर्थ है किंतु जे दैव प्रेरणा तीनी आपन पति के हस्त प्रसारण पूर्वक निर्देश करिया दिलन सेही दैव विधान तहा सत संध मनेर जे अभिलाष को एक बरे म पूर्ण होलो परंतु जिस देव प्रेरणा से माने अपने पति को दोनों हाथ फैला करके निर्देश किया था वही दैव विधान से ही उनका सत्य संध मन जो मन सत्यवादी होता है कभी भी मिथ्या कथा नहीं बोलता व सत्य संध मन अर्थात कि सत्य में प्रतिष्ठित मन की वह अभिलाषा कुछ ही साल के भीतर में परिपूर्ण हुई थी मां को पता नहीं कि विवाह का क्या अर्थ है मां को यह नहीं पता कि संसार का क्या अर्थ है किंतु उनके मन में जो देवी प्रेरणा प्रकट हुई वही देवी प्रेरणा से उन्होंने अपने दोनों छोटे-छोटे हाथ उठा कर के फैला करके ठाकुर को चिह्नित करके रखा था और वही दैव प्रेरणा से मां का जो सत्य संध मन है सत्य में प्रतिष्ठित मन है सत्य में रंगा हुआ जो यह मन है यह मन की जो अभिलाषा यही दैव प्रेरणा ने कुछ सालों के बाद में पूर्ण कर दी कैसे श्री मा तखन पंचम बर्षो अतिक्रम्य ष्ठ बर्ष प्रवेश कोरिया लेन माने पांच साल समाप्त करके छठे साल में प्रवेश किया है आर दि के दक्षिणेश्वर काली मंदिरे श्री रामकृष्ण देह मन अवलंबन जुग धर्म प्रवर्तन उद्योग स्वरूपे साधना प्रबल जंजा बात प्रवाहित होते मां पाच साल समाप्त करके छठे साल में माने प्रवेश किया है और इस और दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में श्री राम कृष्ण देह और मन को अवलंबन करके युग धर्म प्रवर्तन करने के लिए साधना का प्रबल झंझावात प्रसारित हो रहा है प्रवाहित हो रहा है पूरे युग को अधर्म में से धर्म में लाना है कलयुग का समापन होना है सत्य युग का सूर्योदय होना है अपने अकेले हाथों से ठाकुर को पृथ्वी की इस गति को बदलना है तो साधना का जो प्रचंड ं जावाद उनके शरीर और मन के ऊपर में वो बह रहा है और किसी के शरीर में ऐसा होता जिसका वन पर भी साधना का झंझावात यदि होता तो उसका शरीर मन कहां टूट जाता वो काशीपुर की एक सुंदर घटना है स्वामी जी के मन में ऐसा एक त्याग और तपस्या का एक प्रचंड एक झंझावात प्रारंभ हुआ था कि जब दिन में सोते पूरा दिन खाते पीते सब समय स्वामी जी के मन में वह हरि नाम चलता रहता था दिन रात वह ध्यान में मग्न रहते थे तो उनको देख कर के स्वामी जी के जो बाकी सब त्यागी गुरु भाई है वे लोग भी बड़े ही प्रभावित हो गए थे तो उनमें से किसी किसी ने ठाकुर को कहा था कि देखिए कि नरेंद्र के भीतर में क्या साधना का प्रवाह क्या साधना का झंझावात प्रसारित हो रहा है उस समय ठाकुर ने क्या कहा था ठाकुर ने कहा कि हां यह बात ठीक है कि उसके भीतर में इस तरह से ईश्वर प्रेरणा ईश्वर प्राप्त करने की अभिलाषा प्रकट हो रही है इतने प्रचंड स्वरूप में किंतु एखाने ठाकुर तो मैं मेरा ऐसा शब्द प्रयोग नहीं करते थे तो अपनी ओर दिखा कर के अपनी ओर अंगुली निर्देश करके कहते थे यहां के लिए या तो यहां पे या तो फिर इस जगह पे ऐसा करके ठाकुर अपने को चिन्हित करते थे तो ठाकुर ने कहा यहां पे किंतु जो साधना का प्रचंड जंजावत बहा है उसके सामने नरे नेर एक सिकेर एक शिके ओना नरेंद्र का एक से एक पैसे का एक पैसा हिस्सा भी नहीं है 100 के सवा भाग भी नहीं है नरेंद्र के वितर में ऐसा ठाकुर ने कहा जब ठाकुर ने ऐसा कहा तो शरत महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं कहते हैं कि हम लोग तो बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए कि अरे नरेण की ये जो साधन प्रबलता है न की ये जो ईश्वरा इच्छा है ईश्वर प्राप्त करने की अभिलाषा है यह मुमुक्षु है इसको देख कर के हमको तो लगता है कि पूरे विश्व में ऐसा कोई होगा ही नहीं जो ईश्वर को इतना हृदय मन प्राण से चाहता हो इस तरह से धीन रात तपस्या करता हो जब ध्यान करता हो तो नरेंद्र का जदी ठाकुर का स से भी सवा भाग भी नहीं है तो ठाकुर के जीवन में किस तरह का प्रचंड झंझावात साधना के समय बीता होगा यह तो तो हम कल्पना या अनुमान ही कर सकते हैं ऐसा शरत महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं तो यही ठाकुर यहां पर मां छोटी सी बालिका पांचवे साल खत्म समाप्त होकर के छठे साल में उन्होंने पैर रखे हैं अपने छोटे से और यहां पर ठाकुर पूरे सत्य युग का प्रारंभ करने के लिए कलयुग का अस्त करने के लिए सत्य युग का उदय करने के लिए प्रचंड साधना में मग्न है निमग्न है अयो भक्ति खन भाबत छ जे तहर मोन से प्रबल णता घण वात्या केंद्र भ्रष्ट उद्भ्रांत होया पड़िया छ अज्ञ व्यक्ति अर्थात की मूरख लोग अज्ञानी लोग यह समझते हैं कि ठाकुर का मन प्रबल णता घण वात्या ण वात्या अर्थात की प्रचंड झंझावात से केंद्र भ्रष्ट वो उद्भ्रांत हुईया पढ़िया से उनका मन खिसक गया है और वह भ्रमित हो गए हैं पागलपन का उनके ऊपर में दोरा पड़ा है क्योंकि ठाकुर हरकतें ही ऐसी किया करते थे जाकर के वोह मां का मां को शयन करवाने के लिए ले जा रहे हैं देखा कि मां फिर मां के साथ में बात करते हैं और हृदय सब देख रहा है हृदय देखता है कि ठाकुर मां को शयन करवाने के लिए ले जा रहा है और फिर बोलते हैं मां को बोलते हैं अच्छा मां तू क्या कहती है मैं तुम्हारे साथ में सूं अच्छा ठीक है जैसे छोटा बच्चा अपनी मां के साथ में सोता है मां के बगल में तो वैसा ही छोटे बच्चे की तरह ठाकुर मां का जो शयन करने के लिए जो खाट रखा है उसके ऊपर में जाकर के सो गए तो हृदय तो ऐसा बेचारा भयभीत हो गया था अरे देवता के लिए जो खाट है उनके लिए जो सोने की शयन कक्ष सोने की जो व्यवस्था है उसमें सोना यह तो कोई पुजारी इस तरह का साहस नहीं करेगा देवता के लिए तो सब कुछ मां के लिए जो बर्तन है जि जिसमें मां के लिए भोग दिया जा रहा है उस बर्तन में से ठाकुर ने खाना शुरू कर दिया बाप रे यह तो कितना बड़ा पाप किंतु हृदय ऐसा जब भी ठाकुर ये मां के साथ में बात करते थे पूजा करते थे तो हृदय कहता है लीला प्रसंग में इसका वर्णन है हृदय कहता है कि जब लोग इस तरह की बातें फैलना शुरू हो गई कालीवाड़ा भट्टाचार जो महाशय अर्थात की ठाकुर के बड़े भाई का नाम था भट्टाचार्य महाशय ऐसा करके पुकारते थे तो उनकी देहांत के बाद में जब ठाकुर ने पूजा करने की शुरुआत की तो उनको ये लोग बोलते थे छोटो भट्टाचार्य महाशय अर्थात की छोटे भट्टाचार्य महाशय तो वो किस तरह से पागल की तरह पूजा करते हैं यह बात सब कालीवाड़ा शुरू हुई तो हृदय कहता है कि मैंने जाकर के अवलोकन करना शुरू किया कि ठाकुर सही सही में क्या कहते हैं तो देखा कि जो बात है वो तो सही है उससे भी ज्यादा ठाकुर का कि पागल की तरह वर्तन है तो हृदय कहता है कि मैं उनको बताने को गया उनको सचेत करने को गया कि अरे आप यह जो कर रहे हैं उससे इस गलत गलत बातें फैलती है मथुर बाबू के पास में जाएगी तो वह आपको शायद नौकरी से निकाल ना दे तो ऐसा साव चत करने को गया हृदय कहता है कि तब मेरे मन में एकाएक ऐसा एक भयावह डर प्रवेश हो गया कि अपना मुंह खोल कर के ठाकुर को कुछ बताने का मेरे में साहस ही नहीं रहा तो ऐसा क्यों हुआ क्योंकि मां स्वयं जहां पर प्रकट हुई है मां स्वयं जहां पर पृथ्वी पर अवतरित हुई है उसके साथ में ठाकुर बात कर रहा है तो ठाकुर को तो आप शायद कुछ कहने का साहस करेंगे किंतु मां ऐसा मां जहां पर स्वयं अवतरित है वहां पर जिनका स्वयं आविर्भाव हुआ है तो मां को मां के सामने मां के बच्चे को इस तरह से डराना धमकाना क्या संभव है तो हृदय कहता था कि मैं बार-बार जाकर के देखा कि ठाकुर यह सब कर रहे हैं किंतु कभी भी मेरे मन में यह साहस ना हुआ कि मैं ठाकुर को साव चत करूं या ठाकुर को कहूं कि आपके बारे में लोग ऐसी बातें कर रहे हैं ठाकुर इतना संपूर्ण रूप से मां के भीतर में डूब गए थे और मां का सही सही आविर्भाव हुआ था हृदय तो क्या हृदय तो ठाकुर का भांजा था यह खजांची वगैरा लोग इ किसी का साहस नहीं था कि ठाकुर को जाकर के कुछ बोले आज आप आज की दृष्टि से देखिए कोई एक बड़ा मंदिर है मंदिर का कोई पूजा कोई अधिकारी है या तो वहां प जो मालिक है उसकी मालिक के मंदिर में इस तरह से पागलपन वाली हरकत कोई पुजारी करेगा तो सबके सामने यह अधिकारी लोग उस पुजारी को डांट देंगे तो उस समय भी तो यह कर सकते थे किंतु किसी का साहस नहीं था दो चीज एक तो मां का आविर्भाव था दूसरा कि मथुर बाबू का मथुर बाबू संपूर्ण रूप से ठाकुर के शरणागत है एक बार ठाकुर शिव महिमन स्तोत्र का पाठ करते करते इतने भावा विष्टि शिव मंदिर है वहां सामने खड़े-खड़े रोना शुरू कर दिया और शिव के साथ में आलाप करना शुरू कर दिया तो यह देख करर के कालीवाड़ा हो गए बोले कि अरे छोटू भट्टाचार्य जो क्या सब पागलपन का दौरा पड़ा है इनको पकड़ करके उनमें रूम उनके रूम में ले जाओ कमरे में ले जाओ वहां पर थोड़ा सा बिठा करके शांत हो किंतु जैसे ही मथुर बाबू को पता चला मथुर बाबू वैसे कोलकाता अर्थात कि कोलकाता में रहते थे किंतु उस समय वह दक्षिणेश्वर आए हुए थे तो जैसे ही उनको पता चला कि ऐसा कुछ गड़बड़ गड़बड़ हो रहा है वो खुद दौड़े आए और देखा कि ठाकुर भाव में आकर के शिव का स्तोत्र पाठ कर रहे हैं तब उन्होंने अपनी तलवार निकाली और सबको कहा खबरदार जो कोई एक कदम भी ठाकुर की ओर आगे बढ़ाएगा तो इसका सर उसके धड़ से में कलम कर दूंगा उसका सर मैं काट दूंगा तो यहां पर मथुर बाबू संपूर्ण रूप से ठाकुर के शरणागत है और दूसरी ओर मां का स्वयं जगदंबा का स्वयं आविर्भाव हुआ था तो ठाकुर के मुंह पर तो किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं था किंतु पीछे पीछे जैसे होता है वो ईशान वित लोगों की तो पीछे पीछे से बहुत सारी बातें ठाकुर के बारे में फैलाई जाती थी तो अज्ञ व्यक्ति मने यहां पर महाराज लिखते हैं कि अज्ञानी व्यक्ति सोचता है कि ठाकुर के मन और शरीर के ऊपर में तपस्या का जो प्रचंड झंझावात बह रहा है उससे वो केंद्र भ्रष्ट और उद्भ्रांत दो शब्द उन्होंने यूज किए केंद्र भ्रष्ट अर्थात कि उनकी जो एक मानसिक स्थिरता है वह स्थिरता वह चली गई है अस्थिर हो गए हैं मानसिक रूप से और उद्भ्रांत अर्थात की भ्रांति में डूब गए हैं जो चीज नहीं है ऐसी चीज जिसको कि लुसने कहते हैं नरन कहता था ना कि यह जो दर्शन वगैरह है सब आपका मन का भ्रम है तोय हेलस सिनेशन उनको हो रहा है ऐसा अज्ञ व्यक्ति लोग ऐसा मानना शुरू कर दिए थे वायु रोग ग्रस्त आचरण वत तहर कार्जा बली अति रंजीता कारे अति रंजिता कारे कमार पुकुरे ताहर माता श्री जुक्ता चंद्रमणि कोण पहुची ले जेष्ठ पुत्र राम कुमारे वियोग दुख कातरा जननी स्नेहो भजन कनिष्ठ पुत्रे ए रूप अस्थ विवरण सच करते ना पारिया तहा के चीरे आपन शका से आनाई लेन एवं आति सजन और बंधु बांधव परामर्श अनु सारे औषध प्रयोग शांति स्वसन झाड़ फूक चं ना मानो इत्यादि विविध उपाय संतान के प्रकृति कोराते सचे होले बा वायु ग्रस्त हो गए हैं वायु रोग ग्रस्त हो गए हैं ठाकुर और फिर उनका आचरण है वह अतिरंजित कार्य माने आचरण जो है उसमें और सब दुनिया भर का मसाला बना डाल कर के कामर पुकुर में उनकी माता श्री जुक्ता चंद्रमणि के कान में पहुंची लोग जब बातें फैलाते हैं तो हमेशा अपना मसाला ऐड कर देते हैं लोगों को तो क्या है कि वो वो ऐसा है ना ठाकुर का एक सुंदर एक प्रसंग है वो अखंडानंद जी ने वर्णित किया है अपनी आत्मकथा में एक बार ठाकुर वो अखंडानंद जी गए हैं वहां दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर ने कहा ठाकुर के कमरे में जाने से ही ठाकुर ने कहा चलो हम लोग चांदनी के घाट चलते हैं स्नान करके आते हैं तो ऐसा करके चांदनी के घाट में गए वो थोड़ा सा कमर भर पानी में उतरे गंगा का सुंदर पवित्र पानी उसमें उतरे और स्नान कर रहे हैं अपने चेहरे पर अपनी बाहु हों पर पानी गंगा का पवित्र जल डाल रहे है उस समय देखा कि वहां घाट के ऊपर में एक ब्राह्मण बैठा हुआ है वो ब्राह्मण बैठ कर के वहां का जो एक खजांची है वो खजांची अर्थात कि जो वहां का पदाधिकारी मेन जो एडमिनिस्ट्रेटर होता है चीफ एडमिनिस्ट्रेटर ऑफिसर या तो फिर कहेंगे सीईओ आज का जो सीईओ होता है तो वैसे ही ये खजांची वहां का सीईओ था तो वो खजांची वहां पे वो भी उस समय गंगा में स्नान करने के लिए आया था तो एक ब्राह्मण एक पंडित वहां पर आया कहीं से बाहर से और घाट के ऊपर में बैठ कर के खजान जी के साथ में वा तालाब करने लगा कि अच्छा यह बताइए कि यहां पर कितने भक्त लोग आते हैं यहां पर गाय कितनी रहे कितने लोग यहां पे भोजन करते हैं यहां पे व्यवस्था किस तरह की है यह जो बागान है आपका यहां पे उसमें जो फल आते हैं उसका विक्रय जो करते हैं उससे कितना रुपया प्राप्त होता है आपको तो य ठाकुर यहां पर स्नान कर रहे थे व वो सब सुन रहे थे और सुन कर के वो इतने नाराज हो गए और ी अभी मुंह से तो कुछ बोले नहीं किंतु वक्र दृष्टि से अपनी आंखों की कोने से बार-बार वो पंडित के सामने देख रहे जैसे कि बड़े ही नाराज है इस तरह के पवित्र गंगा का घाट इस तरह से पवित्र मां का मंदिर वहां पर आकर के गंगा के घाट पर बैठ के ना को थोड़ा सा जब ध्यान करेगा ना कि पूरा संसार की बातें कौन कहां है क्या कर रहा है सब पूछ रहा है तो ठाकुर बड़े नाराज हो गए उसके बाद में ठाकुर अपने कमरे में आए वो ब्राह्मण को तो कुछ बोला नहीं संसारी लोगों को बोलने से कोई लाभ नहीं है अपने कमरे में आकर के बैठे हैं उसी समय वो वो जो ब्राह्मण ये सब बेकार की बातें संसारी बातें कर रहा था ठाकुर के पीछे पीछे उनके कमरे में आया और आकर के पूछा कि अच्छा मैं किसी एक व्यक्ति से मिलना चाहता हूं वो व्यक्ति मुझे कहां मिलेगा वो क्या यहां पर रहता है तो अब तक ठाकुर का जो संयम का बांध था वो टूट पड़ा और उन्होंने बड़े ही नाराज होकर के ब्राह्मण को बोला कि अरे तुमको शर्म नहीं आती है सीधा डांट दिया उसको को कि वो काली मंदिर में आकर के गंगा के किनारे बैठ कर के जितनी बेत की बातें करते हो ना ही थोड़ा सा भगवान का नाम लेते हैं ना कि ये सब फालतू की बातें करते ठाकुर ने ऐसा उसको जो डांटा है तो बेचारा वो ब्राह्मण बड़ा ही नाराज होकर के वहां से चला गया तो ठाकुर ने अखंडानंद जी को बोला गंगाधर उनका उस समय का नाम तो गंगाधर को बोला कि यहां पर डालो गंगा गंगाजल डालो जहां पर वो ब्राह्मण खड़ा था उसके खड़े रहने से साथ हाथ माटी उसके नीचे की अपवित्र हो गई है गंगाजल और इस कमरे को पवित्र करो तो ऐसे संसारी लोगों को ऐसा होता है कि हमेशा देखिए कि कहां ठाकुर सामने खड़े हैं युगा वतार स्वयं मां का आविर्भाव हुआ है पवित्र गंगा का घाट तो इस सबसे प्रभावित होकर के उसके जो हृदय के भीतर में कहीं वो सोह वो एक अनाहत नाद एक अखंड मंत्र का जाप वो चलना शुरू हो ना कि वो जितनी संसार की बात है तो ऐसे संसारी लोग हर जगह पर रहते हैं है और उनको तो मसाला चाहिए बातें करने का तो ठाकुर यहां पर पागलपन कर रहे हैं उसमें जो दो-तीन घटनाएं उनको सुनाई दी होगी उसमें दुनिया भर का मसाला डाल कर के चंद्रा मणि देवी को जाकर के सुना रहे हैं कमार पुकुर में श्री जुक्ता चंद्रा मणि के श्रीमती चंद्रा मणि के कान में पहुंचने से अपने जो बड़ा पुत्र है रामकुमार उसका तो मृत्यु हो चुका है और बेचारी वैसे ही बड़ी दुखित है और उसमें छोटा बच्चा उनका पागल हो गया है यह समाचार आएगा तो तो बेचारी चंद्रा मणि के हृदय के ऊपर में सीने के ऊपर में क्या सब बता होगा वह हम अनुमान करके सोच सकते हैं तो बड़ा पुत्र रामकुमार का वियोग दुख कातरा वियोग के दुख से कातर जननी स्नेहो भाजन स्नेह का परम आदर का कनिष्ठ पुत्र अर्थात की छोटा बच्चा उनका उनकी यह अवस्था का विवरण सहय न करने की वजह से उसको बड़ा ही जल्दी अपने पास में कमार पुकुर में बुलाया और आत्मीय स्वजन और बंधु बांधव के परामर्श के अनुसार जो आत्मीय स्वजन रहते हैं ना यह सब चीजों में उपदेश देने के लिए सलाह देने के लिए बड़े ही रेडी रहते हैं आजकल तो क्या है यह सामाजिक बंड अपना सोसाइटी में से चला गया है किसके पड़ोसी के घर में क्या हो रहा है आपको पता ही नहीं चलता वो मैंने पड़ोसी कौन है आपका यही नहीं पता चलता किंतु वो पहले का हमारा सोशल बंड इतना स्ट्रांग था कि गांव में कहीं किसके घर क्या हो रहा है सबको नजर रहती थी और कुछ भी होने से अच्छा बुरा सत प्रसंग असत प्रसंग कुछ भी होने से वह सब लोग इकट्ठा हो जाते थे तो उसका अच्छा भी है बुरा भी है अच्छा इस तरह से कि आप कभी भी अपने को अकेला नहीं महसूस करेंगे आजकल ये लोनलीनेस है वो बड़ा ही डेंजरस एक एक एंडेमिक जिसको कहते हैं एपिडेमिक की तरह लोनलीनेस फैल रहा है इस सोसाइटी में किंतु उस समय था आपको लोनलीनेस नहीं महसूस होगा किंतु साथ-साथ में ही समाज में रूढ़ि चुस्त हो जाएगी आप कुछ भी करना चाहते हैं तो आपको 10 बार सोचना होगा कि अरे लोग क्या कहेंगे लोग कहेंगे उसके अनुसार मुझे चलना है वरना तो फिर लोग मुझे गांव में से वह एक आइसोलेट कर देंगे नात बाहर निकाल देंगे तो यह एक बड़ा डर वहां पर रहता था तो ऐसे लोगों को महा आत्मीय स्वजन और बंधु बांधव वो परामर्श देने के लिए इकट्ठा हो गए और इन लोगों का जो परामर्श होता है औषध प्रयोग वो कोई वैद्य को बुला कर के उनके लिए कोई औषध शांति स्वस्थ किसी ज्योतिष है कोई वो कोई विधि करता है पूजा करता है उसको बुला कर के शांति और स्वस्थ येन रूपी विधि और पूजा करवाई झाड़ फूंक कोई ओझा होता है कोई वो जो इस तरह से वो तांत्रिक होता है उसको बुला कर के झाड़ फूंक अर्थात कि उनके सर पर कोई भूत तो नहीं आ गया उनके सर पर कोई राक्षस तो नहीं सवार हो गया तो झाड़ फूंक जो जैसे वो पहले होता था चंड ना मानो अर्थात कि चं बोलक के कोई दैत्य उनके सर पर बैठ गया है क्या तो चं जो अपने सर के ऊपर से उतारते हैं चंड नामानंदी वो ऐसा सुमधुर माने जो पूरे तीन लो के जो स्वामी है उनके सर के ऊपर में भूत प्रेत कहां बैठ सकता है शिव स्वयं भूतों के राजाधिराज शिव स्वयं भूतों और राक्षसों के देवता शिव स्वयं ठाकुर उनके ऊपर में क्या कोई भूत अपना प्रभाव डाल सकता है क्या किंतु मां का हृदय है देखिए जैसे हमने यहां पर देखा कि मां शारदा के जीवन में उनके माताजी पिताजी को पता है कि कभी-कभी एकदम फड़ा करके के झलक जाता है उनका कि हां यह तो देवी है किंतु दूसरे ही क्षण देवी नहीं रह कर के मानवी का स्वरूप धारण कर लेती थी मां तो हृदय में तो पता है व उनके माताजी और पिताजी को कि हां यह देवी है किंतु बालिका समझ कर के बालिका के रूप में ही उनके साथ में व्यवहार करते थे तो यहां पे भी चंद्रा मणि देवी को वैसे तो पता है कि हां तीनों लोगों के स्वामी स्वयं उनके घर में पुत्र के रूप में अवता धारण किया है अवतरण किए हैं किंतु फिर भी मां का हृदय है तो मां का हृदय उनको यह सब अरे मेरा बच्चा पागल हो गया मेरा बेटा क्या हो गया है उसके साथ में तो कहां वह शांति स्वस्थ यन किसी ओझा को बुलाएंगे कोई झाड़ फूंक करने वाले को बुलाएंगे किसी वैद्य को बुलाएंगे क्या-क्या सब विधि विधान वगैरह करके संतान को प्रकृति स्थ कराते सचे होलेन अर्थात की संतान को थोड़ा उसका दिमाग ठीक हो थोड़ा शांत हो थोड़ा सामान्य हो उसके लिए उन्होंने सचे अर्थात की चेष्टा करना प्रारंभ किया तो आज यही तक कल फिर से मिलते ओम शांति शांति शांति हरि ओम श्री राम कृष्ण h