Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 6 Nov 2023

Transcript

ॐ स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज जैसे हम एक सप्ताह ज्ञान योग और एक सप्ताह मां का जीवनी इस तरह से जो लेते हैं इस सप्ताह बारी है मां के जीवन की पिछली बार हमने ऑलरेडी देखा कि किस तरह से महाराज जी हमको कहते हैं कि वर्तमान मां शारदा देवी के जीवन में हम मातृत्व आदि देव भावे पराकाष्ठा देखीते पाइबो एवं धर्म मार्गर परि पुष्टि जनन उरा केमन कोरिया नव भावे रूपाय तो होया छ तहारो परिचय पाइ जब भी अवतार का अवतार या आध्या शक्ति जन्म धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होते हैं उनमें जो भाव है ऐसा नहीं है कि उनके मन के भीतर में उनका उनके जो रिलेशनशिप से दूसरों के साथ में वह हमारे से डिफरेंट रहती है किंतु हम ही लोगों के जो भाव है उस भावों की पराकाष्ठा वहां पर देखने को मिलते है कोई भी मां है उसको अपने बच्चे के प्रति अत्यधिक प्रेम होगा किंतु मां यशोदा का बालकृष्ण के प्रति जो प्रेम था वह मातृ भाव की पराकाष्ठा थी अभी कोई भी बच्चा होगा वह सरल निर्दोष होगा वह थोड़ा बहुत तूफान मस्ती भी करना चाहेगा और उसके हृदय में हृदय भी उसका बड़ा ही स्वच्छ निर्मल होगा तो किंतु यह कोई भी बच्चा इस तरह से हो और सामने आप बालकृष्ण को रख दीजिए देखिए कि बालकृष्ण जो थे उनका हृदय सरल स्वच्छ निर्मल तो था ही था किंतु साथ में ही धर्म की स्थापना करने के लिए धर्म की स्थापना के प्रति उनके मन में जो प्रचंड एक प्रवाह था वह एक अद्भुत एक अन्य ही एक हायर लेवल पर था जो कि और किसी बच्चे में नहीं देखने को मिलेगा जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि एक बच्चा अपना धोती पहन के जा रहा है तो किसी ने बोला बच्चे को कि अच्छा यह तो बड़ा सुंदर धोती है आओ हमको दे दो तो बच्चा क्या कहेगा कि अरे नहीं यह तो धोती में मेरी मां ने मुझे दी है यह वस्त्र मेरी मा ने दिया है मैं क्यों किसी को देने को जाऊंगा ऐसा करके य बच्चा इधर-उधर घूमता फिरता है नया वस्त्र पहन कर के और फिर सडन उसके मन में क्या हुआ जो कोई भी एक आदमी सामने आ गया उसके हाथ में यह वस्त्र थमा दिया कि यह लो रखो अपने पास में तो बच्चे के मन में ऐसा होता है हाइपोथेटिकल जो केस ठाकुर ने कहा स्वामी जी के जीवन में हम देखिए कि एक भिक्षुक एक आया स्वामी जी जब छोटे थे बिले न जब छोटा था व नरेद के घर पर आया भिक्षुक तो मां ने कहा इसको कुछ देना नहीं है तो नरेद ने क्या किया अपने घर की उनका घर पहली फर्स्ट व फ्लोर प था तो फर्स्ट फ्लोर की खिड़की में से अपने जो वस्त्र है ऊपर में से नीचे फेंक रहे है वो भिक्षु के हाथ में नरेंद्र की वो जो बाल वार्ता है ना स्वामी जी के जीवन की बाल वार्ता उसमें ये चित्र वो प ड्रॉइंग है बड़ा सुंदर ड्राइंग है नीचे में ऐसा भिक्षु ऐसा करके खड़ा है और ऊपर में नर अपने वस्त्र फेंक रहा है उनके हाथ में तो जो भाव सामान्य लोगों में होते हैं उस उसी भावों की पराकाष्ठा अवतार या तो अध्याशक्ति जगदंबा के जीवन में हमको देखने को मिलती है और यही पराकाष्ठा हम जब देखेंगे तब हमको लगेगा कि इसका मनुष्य देह धारण करने का अर्थ ही यही है अदर वाइज क्यों वो देव शरीर धारण करके नहीं आते देव शरीर धारण करके आते तो हम लोग बड़े ही प्रभावित हो जाते अरे ये तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर आए हैं भगवान विष्णु स्वयं है शेष नाग पे शहित है उनके चार हाथ है वो गदा पद्म खड़ग वगैरह अपने हाथ में लिए हुए चलो इनकी पूजा करते हैं ऐसे भगवान का नजर के सामने भगवान को देख कर के हमारे मन में ऑटोमेटिक उनके प्रति श्रद्धा भक्ति जागृत हो जाएगी ऐसा नहीं है कि अभी ठाकुर के प्रति लोग 10 बार सोचेंगे मैं क्यों इनको भगवान के रूप में स्वीकार करूं मैं उनको क्यों उनका उनको मैं अपने जीवन का आदर्श क्यों बनाऊं मैं क्यों अपने जीवन के सुख शांति समृद्धि वह सब सैक्रिफाइस करके रामकृष्ण मिशन में आकर के साधु हो या तो फिर वॉलंटिली मैं यह सब क्यों करूं कभी-कभी किसी को प्रश्न होगा वो तो हमारे ही जैसे दो हाथ दो पैर एक सिर वाले एक सामान्य मनुष्य थे उनको जब कैंसर हो गया था तो खुद की ट्रीटमेंट नहीं कर पाएंगे मेरे लिए क्या कर पाएंगे अपनी खुद की ट्रीटमेंट नहीं कर पाए थे तो मेरे लिए क्या कर पाएंगे ऐसा एक प्रश्न होता है जबकि यदि ईश्वर स्वयं आ जाता है भगवान विष्णु स्वयं आ जाएंगे फादर इन हेवन जो कि क्रिश्चन लोग जिनको कहते हैं वो स्वयं यदि पृथ्वी पे आ जाएंगे तो वो स्वतः ही हमारे मन में उनके प्रति श्रद्धा भक्ति होगा अभी यह चारों ओर युद्ध चल रहा है भगवान आ कर के बोलेंगे युद्ध बंद कर दो तो सभी लोग फटाक करके युद्ध बंद कर देंगे भगवान की बात का असम मान करने का साहस किसमें है अभी खड़े-खड़े ही उनको पनिशमेंट मिल जाएगी जो अच्छा काम कर रहा है उसको सबके सामने उसको रिवर्ड मिल जाएगा आजकल तो जो आदमी अच्छा करने को प्रयत्न करता है उसको इतना कष्ट सहन करना पड़ता है और बुरे लोग जो भी होते हैं सब बढ़िया मजे से रहते हैं हमको तो यही दिखता है चारों ओ जो न्यूज़पेपर में पढ़ते हैं ये समाज में चारों ओर देखते हैं कि बुरा काम करेंगे गलत तरीकों से पैसे कमाएंगे फिर आप बढ़िया मजे से रहिए फिर आप मंदिर में भी जाएंगे तो पुजारी लोग आपका बड़ी स्तुति करना शुरू कर देंगे अरे वाह यहां पर इतना बड़ा दान दिया है वे लोग नहीं देखेंगे कि आपने दो नंबर के काम करके पैसे इकट्ठा किए हैं धन इकट्ठा किया है उसके बाद में हम मंदिर भी खरीद ले सकते हैं और पुजारी को भी खरीद ले सकते हैं भगवान की मूर्ति को भी खरीद ले सकते हैं धन दो नंबर के धन का यह प्रभाव है तो अभ यह प्रश्न होगा कि धर्म का पालन करने के लिए अवतार यदि पृथ्वी पर आता है तो पहले तो हमारी उनके ऊपर में श्रद्धा भक्ति प्रकट करनी पड़ती है और वह प्रकट तभी होती है जबकि उनका जो भाव है उसके साथ में अपना तादाद आए गए इतना बड़ा विश्व है 700 करोड़ लोग यहां पर इस पृथ्वी पर रहते हैं 700 800 करोड़ लोग उसमें से यदि सात आठ करोड़ लोग भी ठाकुर को यदि सम्मान देते होंगे तो बहुत बड़ी बात होगी हमारे दीक्षित भक्त कितने होंगे मुझे नहीं लगता कि 60 70 लाख से ज्यादा हो 60 7 लाख भी मैं बहुत बड़ी संख्या कह रहा हूं मुझे नहीं लगता कि 10 12 लाख से ज्यादा हो और यदि हमारे एडमायब्रांड भक्ति प्रकट करके फिर वे लोग हमारा जीवन ट्रांसफॉर्म करना चाहते हैं क्या ये डिफिकल्ट रास्ता नहीं है इससे आसान तरीके बहुत सारे हैं यदि ईश्वर खुद आ गए उनके इतने सारे अस्त्र शस्त्र है जो अच्छा काम करेगा उसको वहीं का वहीं रिवर्ड मिल जाएगा बुरा काम करेगा उसको वहीं का वही पनिशमेंट भी मिल जाएगा क्यों हम जन्म जन्मांतर तक अपेक्षा करें कि आज जिसने बुरा काम करके धन अर्जन किया है तो इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में अगले नहीं तो उसके बाद के जन्म में उसको पनिशमेंट मिलेगा कर्म का फल मिलेगा जबकि इस जन्म में जो जो साधना कर रहा है वह चाहे जितना ही गरीब भी क्यों ना हो आज नहीं ना कल वो उसको उसका जो समृद्धि है साधना की समृद्धि द रिचस ऑफ हिज प्रैक्टिस स्पिरिचुअल प्रैक्टिस इट विल रिफ्लेक्ट इन इ मटेरियल प्रोस्पेरिटी उस साधना की जो शक्ति है वो संपत्ति धन सुख उसमें कभी ना कभी कहीं जाकर परिणत होगी या तो फिर उसके मन में इतना संतोष आ जाएगा कि वह धन और सुख उसकी उसको कोई स्प्र नहीं रहेगी ऐसा कहीं जाकर के इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में होगा प्रश्न है इतना लंबा रास्ता यह लोग क्यों यूज करते हैं पता नहीं इसका उत्तर पता नहीं किंतु यह पक्का पता है कि इनका मैकेनिज्म क्या है यह लोग यहां पर आकर के हमारा मन को हमारे मन को किस तरह से प्रलोभन करते हैं प्रलोभन करते हैं हम जिन भावों को श्रेष्ठ भाव स्वीकार करते हैं जैसे कि मातृ भाव भाव जैसे कि यह शांत भाव जैसे कि यह दस्य भाव जैसे कि यह बालक संतान भाव यह सब भावों की पराकाष्ठा हमको उनके जीवन में दिखती है और इस पराकाष्ठा को हम जब श्रद्धा भक्ति पूर्वक स्वीकार करते हैं तो उनके साथ में हमारे हृदय का तादाद का हार्मोनाइजेशन होता है और फिर हमारा जीवन धीरे-धीरे करके ट्रांसफॉर्म होने की शुरुआत होती है तो यह मैकेनिज्म है धर्म मार्ग की परिपट्स तरह से नव भाव से रूपाय होते हैं उसका भी परिचय पाएंगे नव भाव से रूपाय होना यानी कि ऐसा नहीं है कि जो भाव नहीं था ऐसा कोई लेकर के आए जो भाव है ही ऑलरेडी इस जगत में उसको पुनर्जीवित किया है आमरा देखी बो तहर जीवने दहित भगिनी वधु पत्नी गृहिणी नारी जनो चित संबंध और अवस्था विशेष आदर्शो स्थापित होया छ हम लोग देखेंगे कि मां के जीवन में दहित अर्थात की पुत्री भगिनी अर्थात की बहन वधु यानी कि पत्नी और गृहिणी यानी कि जो घर की संभाल करती है वह गृहिणी यह सब भाव यह सब नारी जन उचित संबंध नारियों के जो संबंध है पूरे समाज के साथ में घर परिवार जनों के साथ में व अवस्था विशेष आदर्शों स्थापित होया छ ये संबंध जितने भी है एक आदर्श पुत्री किस तरह से वो रहेगी एक आदर्श बहन एक आदर्श पत्नी एक आदर्श गृहिणी एक आदर्श मां यह किस तरह से होनी चाहिए यह आदर्श मां के जीवन में हमको देखने को मिलता है साथ में ही देखने को मिलता है अवस्था विशेष कोई पार्टिकुलर सिचुएशन आ जाए उसमें किस तरह से स्त्रियों को बिहेव करना चाहिए उसका भी पराकाष्ठा मां के जीवन में देखने को मिलता है जैसे कि ठाकुर मां को किस तरह से ट्रेन करते थे कभी-कभी बलराम बाबू बलराम बाबू की पत्नी वो बीमार हो गई तो ठाकुर ने एक दिन मा मां को कहा कि अरे जाओ जाकर के उनको मिलकर के आओ उनकी खबर लेकर के आओ देखो मेरा तो इतना डेडिकेटेड शिष्य है बलराम तो मेरा इतना अच्छा भक्त है उसकी बीवी को बीमार होना वो तो मुझे भी इतना कष्ट हो रहा है जाओ तुम उसको मिल करर के आओ उसकी खबर लेकर के आओ अभी मां सोच रही है कि वह किस तरह से वो कलकाता जाएगी ना ही कोई वाहन है ना ही कुछ है तो मां ने जब यह विरोध प्रकट किया यह संशय प्रकट किया कि मैं कैसे कोलकाता जाऊंगी तो ठाकुर ने कहा पैदल चल के जाओ किंतु जाओ जाकर के खबर लेक आओ तो देखिए कि वो चल कर के वहां पर गई खबर लेकर के आई अभी वो चल के गई थी कि नहीं एगजैक्टली पता नहीं क्या कोई सवारी मिल गई थी किंतु ठाकुर ने उनको कहा था कि उस समय के समाज की जो ठाकुर देखिए मॉडर्न भी है और कंजरवेटिव भी है मां जिस तरह से नबत में रहती थी किसी की नजर के सामने नहीं आती थी कितने ही अपने को एक संयमित जीवन में रखती थी ऑन वन हैंड ऑन द अदर हैंड बलराम की पत्नी को मिलने को जा रही है रास्ते से चल कर के जा रही है वह कोई दिक्कत नहीं है जाकर के मिल करर के आना है वह एक धर्म है अपने को संयम में रखना वह भी एक धर्म है जो भक्त है भक्त के परिवार जनों की खबर लेनी है उनका उनको सहारा देना है उनको इनकरेजमेंट देना है उनको आशीर्वाद देना है यह भी एक धर्म है तो धर्म के पालन के लिए आपको जो करना पड़े वो करना है कंजरवेटिज्म या मॉडर्निस्ट म अपने आप में कोई धय नहीं है धय हायर है कंजरवेटिज्म या मॉडर्निस्ट म सिर्फ एक रास्ता है एक हायर धय को प्राप्त करने के लिए पुराने समय के जो संस्कार है उसको तोड़ भी नहीं देना है नव संस्कार जो है उसकी भी उपस्प्रिंग जब काशी में थे प्र मदा दस मित्र के साथ में संस्कृत शास्त्र यह सब लेकर के कितने ही उच्च कक्षा की चर्चा विचारणा हो रही थी समाचार आया कि बलराम बसु का यही बलराम बाबू का देहांत हो गया है स्वामी जीी जी ने कहा मुझे कलकाता जाना पड़ेगा तो अभी यह एक बात थी कि प्रम दास मित्र थोड़े कंजरवेटिव थे और स्वामी जी से थोड़े-थोड़े उनका डिफरेंस ऑफ ओपिनियन दिखना शुरू हो चुका था हालांकि स्वामी जी ठाकुर के मत के अनुसार कंजरवेटिव भी थे मॉडर्निस्ट भी थे जहां पर जो अप्लाई होना है वह होना है ब्लाइंड कंजरवेटिज्म उनको बस फॉलो नहीं करने थे उनको तो जब तो प्रम द दास को थोड़ा सा यह बात सुन कर के कि एक गुरु भाई है वह भी गृहस्थ है उनके मृत्यु का समाचार सुनकर के यह काशी में तपस्या कर रहे हैं शास्त्र चर्चा कर रहे हैं वो छोड़ कर के कलकाता चले जाएंगे उनकी खबर ले उनके परिवार जनों को सध्या देने के लिए यहां तो हमने लिखा है कि ये जो पंच महाभूत का शरीर है वह तो आता है जाता है इसके पीछे जो आत्मन है ब्रह्मण है वही अजर अमर अनश्वर है उसी के भीतर में तो सर्व सार है ये पंच जो पंच महाभूत का ये शरीर उसमें क्या कुछ सार है वो तो पसार है तो ऐसा सोच कर के वो प्रम द दस ने ऐसा कोई कटाक्ष पूर्ण कमेंट कर दिया कि आप क्यों एक गुरु भ्राता वो भी गृहस्थ गुरु भ्राता के देहांत पर उनके परिवार जनों को सांत्वना देने के लिए या तो फिर वहां पर जा रहे हैं आप तो स्वामी जी इसका प्रश्न का क्या उत्तर देते उन्होंने तो सिर्फ इतना कहा कि इसी तरह से ठाकुर ने हमको गढ़ा है हमारे आध्यात्मिक जीवन को और हमारे संघ को इसी तरह से ठाकुर ने बनाया है तो देख कि ये नव भाव का एक आदर्श भी यहां पर स्थापित करना है साथ में जो पुराने भाव है उसको भी बचा करके रखना है मां के खुद के जीवन में देखिए कि नबत में जिस तरह से रहती थी उसके बावजूद मां को लिखाई पढ़ाई के प्रति कितना ही आकर्षण था उसके प्रति मां को मां ने खुद ने लिखना सीखना चाहा था पढ़ना सीखना चाहा था हृदय ने जब उनके हाथ में से किताब छीन ली जब वह पढ़ रही थी कहा कि अरे यह किताब पढ़ कर के क्या फिर आखिर में नाटक नोवल पढ़ें क्या पढ़ाई लिखाई सीख कर के तब कहीं जाकर के मां ने क्या कहा लक्ष्मी दीदी तो थी वो थोड़ी अग्रेसिव थी उनके पास में आप किताब नहीं छीन सकते तो वह जाकर के पाठशाला में पढ़ कर के आती थी फिर मां को आकर के सिखाती थी और उसके बाद में भी दक्षिणेश्वर में ठाकुर उस समय नए नए वहां पर गए थे श्याम पुकुर शुरू में मां उनके साथ में नहीं थी बाद में मां को भी बलाया मां की सेवा करने के लिए या तो मां खुद वहां पर गई तो ठाकुर जब वहां पर नहीं थे ट्रीटमेंट के लिए कुछ समय के लिए अकेले कलकता में थे तब वह एक स्त्री आती थी वहां पर गंगा के किनारे व स्नान वगैरह करने के लिए वह आ कर के मां को फिर थोड़ा बहुत और अक्षर ज्ञान थोड़ा देती थी तो मां ने फिर मां की बायोग्राफी में लिखा है कि मां अपना नाम ज्यादा लिख तो नहीं पाती थी किंतु पढ़ना अच्छे से माने सीखा था तो यह ऑन वन हैंड एंड एक नए भाव को उन्होंने ग्रहण किया है पुराने भाव को एक हाथ से पकड़ करके रखा है और यह आदर्श है नए जमाने का अभी हमको इसमें से क्या लेना है हमको इस तरह से नहीं लेना कि अरे भाई मां इस तरह से छोटे से नबत में रहती थी मां कभी पुरुषों के सामने नहीं जाती थी तो आज की स्त्रियां भी यह जॉब करती है या जो बाहर में जाकर के टीचर होती है लॉयर होती है सोल्जर होती है फाइटर पायलट होती है तो यह सब बंद करके वही एक छोटे से कमरे में अपने को बंद करके रखना है ना ही आपको इंजीनियरिंग सीखना है ना ही पीएचडी सीखना है ये इसरो के स्पे स्पेस लच हम जितनी भी बार देखते हैं देखते हैं इतनी सारी महिला इंजीनियर वहां पर है और उनकी कितनी सिद्धी है मतलब कितने ब बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स वे लोग सक्सेसफुली स्पेस प्रोजेक्ट वे लोग अप्लाई कर इंप्लीमेंट करती है तो क्या मां के जीवन के साथ में इसका कोई कंफ्लेक्स आज के भाव को भी ग्रहण करना है और ट्रेडिशनल जो भाव थे पुत्री पुत्री यानी कि दहित अर्थात की लड़की पुत्री फिर बहन या तो फिर पत्नी या तो फिर गृहिणी यह सब भाव जो है उसको भी बना कर के रखना है या ऐसा करने को यदि हम गए कि चलो आजकल खास करके अमेरिका में इस कुछ कुछ इस तरह की मूवमेंट है फेमिनिज्म का एक इस तरह का एक नया एक चालू हुआ है कि स्त्रियों को जद बाहर में जाकर के जॉब करती है तो घर में उनका जो रोल होता है या तो एज ए मां एज ए बहन या तो एज ए पत्नी एज ए वाइफ वो उसको करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि शी इज बिकम इंडिपेंडेंट तो इस तरह के सोचने से क्या होता है फैमिली का जो एक स्ट्रक्चर जो होता है वो वीक हो जाता है फैमिली को बना कर के रखने वाली तो स्त्रियां ही है हमेशा से यह सत्य था और हमेशा से यह सत्य रहने वाला है बाहर में जाकर के उनकी कितनी ही सक्सेस क्यों ना हो फैमिली ठीक तरह से एक उसकी जड़ उसकी मूल सब एक साथ में बनकर रहे उसमें स्त्रियों का ही सबसे बड़ा हिस्सा होता है वह मां ही अपने बच्चों को ठीक से ट्रेन कर सकती है संस्कार दे सकती है आप कितनी ही अच्छी स्कूल में बच्चों को भेजे मां जिस तरह से बच्चे को संस्कार दे सकती है उस इस तरह के संस्कार किसी भी स्कूल में कोई भी टीचर नहीं दे पाएगा क्योंकि एक टीचर को 10 बच्चों की संभाल रखनी है व एक बच्चे के मन में संशय होता है वह रोता है वह कोई प्रश्न करता है तो सभी को इंडिविजुअली कोई टीचर को अटेंशन नहीं देने वाला प्लस टीचर के खुद के बच्चे हैं उसका आधा अटेंशन अपने खुद के बच्चों प होगा तो यह जो इमोशनल सस्टेन देना चाहिए वो एक मां ही अपने बच्चे को दे सकती है और एक स्वस्थ्य परिवार होता है बच्चे के संस्कारों का गठन होता है तो उस देश का भविष्य सुरक्षित रहता है वरना यह जो कंफ्लेक्स जितने भी है जहां पर भी युद्ध होता है जहां पर यह टेररिज्म रम पंट है बहुत कंटीन्यूअस टेररिज्म होता है जहां पर यह फैमिली स्ट्रक्चर वीक हो गया होता है वहां के लड़कों में देखेंगे कि संस्कार की बजाय पशुव्रूला की शिक्षा देते हैं बचपन से ही उनको मर्डर करना सिखाते इस तरह की ये बात हो गई समझ में नहीं आती छोटा बच्चा ना कि खिलौने से खेलेगा पढ़ाई लिखाई सीखेगा ना कि वह बंदूक चलाना सीखेगा ये समाज का जब अध पतन होता है सोशल फैब्रिक संपूर्ण रूप से डिसइंटीग्रेट हो जाता है तब बच्चों के ऊपर में सबसे ज्यादा अत्याचार वहां पर होता है यह अफगानिस्तान में बच्चों के साथ में क्या होता है नाम देकर बोलना उचित नहीं है जो अ विभिन्न आप लोग तो न्यूज़पेपर में पढ़ते ही होंगे जहां-जहां पर भी इस तरह के कंफ्लेक्स सबसे पहले सफर करने वाले जो लोग हैं सबसे पहले जिनको आघात होता है सबसे पहले जिनका जीवन अफेक्ट होता है वह बच्चों का ही होता है तो परिवार समाज फैमिली यह सबको पकड़ कर के रखने वाली इनको नरेश करने वाली इनको उनको पोषण करने वाली वह तो स्त्रियां ही है मां ही है तो मां का जो भाव है व भी ऑन वन हैंड होना चाहिए और दूसरे हाथ पे यह जो नव भाव है फाइटर पायलट होंगी या कि इसरो में इंजीनियर होंगी वो भाव को भी ग्रहण करना है प्रश्न यह है कि पुरुष की अपेक्षा स्त्रियों को यह बड़ा ही दो भाव दो उनके मन में विचारधारा साथ में चल रही पुरुष को तो क्या है घर छोड़ के निकल गए तो फिर निकल गए घर का इतना टेंशन नहीं रहता है तो यह है कि स्त्रियों के लिए यह ज्यादा थोड़ा कठिन है और इसीलिए ये परिवार का रिस्पांसिबिलिटी दोनों दोनों का समान होना चाहिए पुरुष का भी और स्त्री का भी मां का भी और पिता का भी तभी कहीं जाकर के आज के जमाने में स्त्रियों को फ्रीडम मिलेगा वरना ऐसा होगा कि वह पहले एक समय होता था कि जो पुरुष है वो बाहर में ही घूमते रहेंगे बाहर का ही काम करेंगे स्त्रियां बैठ कर के घर का ही काम करेगी खाना पना बनाएगी बच्चों की संभाल लेगी यदि इस तरह का रहेगा तो यह बात नहीं बनने वाली आज के मॉडर्न युग में मां और पिता दोनों को घर की इक्वल रिस्पांसिबिलिटी लेनी होगी बच्चों के लालन पालन में या तो खाना बनाने में या तो घर की साफ सफाई करने में शॉपिंग करने में रिलेटिव्स को मैनेज करने में कहीं गेस्ट आ गए हैं तो उनकी आप्या यान उनका आदर सत्कार करने के लिए सोशल ऑब्लिगेशंस जो रहते हैं उसको फुलफिल करने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों का इक्वल हिस्सा होना चाहिए तभी जाकर के स्त्रियों को इतना फ्रीडम मिलेगा कि वह बाहर जाकर के कुछ सक्सेसफुल वो हो पाए तो यह नव समाज का नव भाव है जो कि आज के युग में उसको इंप्लीमेंट करना है नव भाव तो लिया ही है साथ में जो पुराना जो भाव है मां का भाव है पुत्री का भाव है बहन का भाव है गृहिणी का भाव है उसको भी मेंटेन करके चलना है तो यह दोनों जब इकट्ठा होंगे तब कहीं जाकर के मां के आदर्श को स्त्रियां हम अच्छे से समझ पाएगी फिर से एक बार पढ़ लेता हूं आमरा देखीबो तहर जीवने दहित भगिनी वधु पत्नी गृहिणी प्रवृति नारी जनो चित संबंध ओ अवस्था विशेष आदर्श स्थापित होया छ मां के जीवन में देखेंगे कि पुत्री बहन वधु पत्नी गृहिणी वगैरह नारी जन के नारियों के जो भाव है संबंध है व और अवस्था विशेष डिफरेंट डिफरेंट तरह की सिचुएशन जब खड़ी हो जाती है उसके आदर्श का स्थापना हुआ है उस तरह के आदर्श की स्थापना हुई है यह जो अवस्था विशेष की जो बात कही है घर में जो स्त्रियों का रोल जो है वह तो है ही है साथ में अवस्था विशेष यानी कि एक नए युग के लिए स्त्रियों का एक नया रोल उसके बारे में दोनों की आदर्श की स्थापना यहां पर हुई है प्रश्न होगा कि आज की स्त्रियों के लिए मा मां ने किस तरह से आदर्श स्थापित कि तो हमको पता है कि मां ने कहा था वो एक डिवटी आ गई कहा कि मेरी बच्ची इतनी बड़ी हो गई है 10 11 साल की अभी भी शादी नहीं हो पा रही है तो मैंने क्या कहा कि व निवेदिता के स्कूल में उसको भर्ती करा दो वह अच्छा कुछ पढ़ाई लिखाई सीखे गी परिवार समाज का कुछ कल्याण करेगी निवेदिता के प्रति मां का इतना स्नेह भाव था निवेदिता जब मां को मिलने के लिए आई तो मां ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है तो वो निवेदिता स्वरूपानंद जी महाराज थे शायद साथ में तो ट्रांसलेट करके सुन सुना रहे था निने कहा कि मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल तो माने कहा कि इतना लंबा नाम तो मैं नहीं याद रख पाऊंगी मैं तुमको खुकी करके बुलाऊंगा कि बच्ची लड़की दिकरी बेटी तो यह सुनकर के निवेदिता बड़ी ही खुश हो गई और स्वामी जी को जाकर के कहती है मां मुझे अपनी बेटी करके पुकारेगी तो देखिए कि निवेदिता इतनी उसका अग्रेसिव नेचर था ब्रिटिश थी और एजुकेशन के में उसका बहुत ही अच्छा एक थिंकिंग था एक उसको कोई स्कूल एजुकेशन इंस्टिट्यूट चलाने के लिए उसके बहुत सारे आइडियाज थे एजुकेशन को लेकर के डेवलपमेंट को लेकर के स्वामी जी को इतना परेशान कर देती थी प्रश्न करके करके तो उस निवेदिता को मां ने अपनी पुत्री के रूप में ग्रहण किया था यह बताता है कि यदि आज की स्त्रियों का निवेदिता की जिस तरह का आदर्श होना है माने उसी निवेदिता को अपनी पुत्री के रूप में ग्रहण किया था यानी कि नव भाव अवस्था विशेष और वो ट्रेडिशनल भाव दोनों ही मां के जीवन में अपने को देखने को मिलते हैं एवम तहर अमल धबंग के आकर्षण पूर्वक चिर दे वस्तु रूपे विराजित रहिया छ माका अमल धवल लीला विलास पूरा शुद्ध चरित्र पूरा एक छोटी बच्ची की तरह मां कभी-कभी बिहेव करती थी यह जो लीला विला लीला विलास कितना सुंदर शब्द है ये मां का जीवन चरित्र वो मानव मन को आकर्षण करता है मां का यह बिहेवियर देखते हैं मन को इतना आकर्षण करता है कि वह हमारे चीर धय होकर के रहती है यदि मां के बारे में ऐसा सोचेंगे कि भगवान कहीं आकाश में बैठे हैं और भक्तों की मनो वांछना पूर्ण कर रहे हैं तो ठीक है वो भी एक भाव है किंतु इस तरह का भाव सब समय मन में रखना शायद थोड़ा कष्ट करर होगा किंतु एक अमल धवल लीला विलास एक शुद्ध फटिक की तरह निर्मल बच्ची की तरह नादान एक उनकी लीला जब पृथ्वी पर हम देखेंगे तो हमारे मन को इतना लुभा देगी स्वतः ही हमारे मन में मां का चिंतन मनन होता रहेगा य वो एक कहानी मैंने पहले भी एक दो बार कही है मां रोटी बेल रही है वो साथ में गौरेश्वर आनंद जी महाराज राम राममय महाराज वोह भी रोटी बना रहे हैं बात ऐसी थी कि कुछ भक्त दो एक दंपति पति और पत्नी वहां पर जयराम बाटी आए थे तो पत्नी जो थी वह ट्रेडिशनल जिस तरह से वह घंटा ताने गी तो मां ने देखा कि राममय महाराज के सामने भी गुमटा तान रही है तो मां ने कहा अरे यह तो राममय तो मेरी पुत्री की तरह है वो लड़की की तरह है माने राममय महाराज का मन और देह इतना शुद्ध था तो उनके सा सामने घुटा तानने की जरूरत नहीं है तो फिर वह पत्नी थी उन्होंने उनको फिर राममय महाराज के साथ में मित्रता भी हो गई वो दोनों साथ में बैठ कर के रोटी भी बनाते हैं तो देखा राममय महाराज ने कि यह जो उनको बहुदी बोलते थे यानी कि दीदी देखा कि वो दो दो तीन-तीन रोटी एक साथ में बनाती है तो रामय महाराज ने पूछा दीदी मुझे भी सिखा दो ये तीन रोटी किस तरह से साथ में बेलती हो तो उन्होंने दिखाया कि वो जो होता है वो आटे का वो जो बनाते हैं गुजराती में बोलते हैं गोएना मुझे पता नहीं और वो हिंदी में क्या बोलते हैं तो उसको रखना है एक बार जिसके ऊपर में आप रोटी बेलते हैं उसके ऊपर में आटा डालना है फिर दूसरा वो गोएना रखना है उसके ऊपर में आटा डालना है तीसरा रखना है उसके ऊपर आटा डालना है फिर वो बेलन से उसको बेलना है अब जैसे-जैसे वो रोटी की तरह बनता जाएगा देखेंगे बीच में आटा है तो वो चिपक नहीं जाते हैं तीनों आराम से आप सेपरेट कर सकते हैं तीनों के लेयर सेपरेट ही रहेंगे आटे की वजह से अदर वाइज वो गीला आटा तो उसको आप ऐसा करके बनाएंगे रोटी की तरह तो दो तीन एक साथ में रखे तो चिपक जाएगा और मोटा रोटी हो जाएगा किंतु बीच में आटा है तो वो एधे सिवनेश उसका जो है वो कम हो जाता है तो राममय महाराज ने शुरू शुरू में तो देखा कि नहीं ठीक से हो रहा है वो चिपक जा रहा है बीच-बीच में फिर वो सर्कल जो प्रॉपर सर्कल होना है प्रॉपर उसको गोलाकार उसका स्वरूप होना है वो भी नहीं हो पा रहा है किंतु धीरे-धीरे करके वो उन्होंने प्रैक्टिस करके सीख लिए कि वो प्रॉपर रोटी गोल भी होता है और तीन रोटियों को एक साथ में बेलते हैं तो आटे की मात्रा कितनी रखनी है जिससे कि मतलब वो जिससे कि वो रोटियां तीन बेलने के बाद में सेपरेट भी हो जाए अच्छा सीख तो लिया फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मां के साथ में बैठ कर के रोटी बेलने का एक मौका आ गया कुछ भक्त ज्यादा थे और कोई थे नहीं तो मां ने कहा कि मैं और राममय मिलकर के रोटी बेलते हैं और नलिनी दीदी को बोला कि तुम रोटी को सेको तो अभी देखा कि रामय महाराज एक साथ में तीन-तीन रोटी बना रहे हैं और मां तो है बेचारी वो एक ही रोटी बनाएगी और यह भी ठीक है और रामई महाराज की रोटी जो है वो नलिनी ने थोड़ी देर के बाद में बोल दिया कि रामय महाराज की जो रोटी है वो बड़ी ही अच्छे से शकती है मां तुम्हारे से भी अच्छे से एकदम गोल होती है यह जैसा ही मां ने सुना वो मां बड़ी नाराज हो गई बोला कि मैं आमी रोटी बेलते बेलते होए गला मैं रोटी बेलते बेलते बूढ़ी हो गई और यह दो दिन का लड़का उसका गला दबाए गे तो मुंह में से दूध निकलेगा छोटे बच्चे दूध पीते हैं तो तो बांगला में ऐसा कहा जाता है छोटे बच्चे का किस तरह से वर्णन करेंगे उसका गला दबाए तो दूध निकलेगा मुंह से क्योंकि अभी तक उसने दूध दूध ही पिया है पूरे जीवन ये छोटा बच्चे की तरह वो अभी रोटी मिलना सिखा है मैं रोटी बनाते बनाते बूढ़ी हो गई और उसकी रोटी मेरे से अच्छी हो रही है अच्छा ठीक है जाओ मैं रोटी नहीं मिलूंगी ऐसा करके नाराज हो कर के मा छोड़ दिया रोटी बनाना ये देख कर के रामय महाराज भी बड़े परेशान हो गए अरे इतने डिवटी आए हैं सबके लिए रोटी बनानी है खाने का समय हो जा रहा है मां जद रोटी नहीं मिलेगी तो नहीं चलेगा ये तो एक बात है फिर मां को नाराज करना ये तो ठीक नहीं है तो फिर राम महाराज ने नलिनी दीदी को डांटा अरे तुमको कैसे पता कि हम दोनों साथ में रोटी बेल करके तुमको दे रहे हैं तुमको कैसे पता मेरी मेरी रोटी कौन सी है मां की रोटी कौन सी है क्यों इस तरह की बेतुकी बातें करते हो फिर मां को बोला अरे नहीं मां तुम्हारी भी रोटी बहुत अच्छी हो रही है तो ऐसा करके वो मां को फिर मां थोड़ी प्रसन्न हुई फिर से रोटी बनाने की शुरुआत देखिए बिल्कुल छोटी बच्ची की तरह मां बिहेव कर रही है छोटी बच्चियों को ऐसा होता है ना कि वह आपस आपस में झगड़ है तो फिर नाराज हो जाती है जाकर के अपनी मां के पास में कंप्लेन करती है रूठ जाती है फिर मां पिता उनके मित्र दादा दादी उसको मनाते हैं तब कहीं जाकर के वह फिर प्रसन्न होती है तो वैसे ही छोटी बच्ची की तरह रूठना छोटी बच्ची की तरह हास्य करना छोटी बच्ची की तरह उनका मन हृदय एकदम सरल पवित्र होना यह लीला विलास अमल धवल लीला विलास कितना सुंदर शब्द गंभीरानंद जी ने प्रयोग किया है शुद्ध पवित्र लीला विलास जब हम मां का देखेंगे तब उसकी वजह से हमारा मन उनके प्रति आकर्षित होगा यह सब प्रसंग हम पढ़ेंगे सुनेंगे हमारे मन में चलते रहेंगे ध्यान जब करेंगे तब यह नहीं सोचेंगे कि मां दुर्गा के रूप में आठ हाथ है आठों हाथों में एक एक अस्त्र है जैसे बेलूर मठ में वह दुर्गा प्रतिमा जो होती है दुर्गा पूजा के स साथ में जया विजया है गणेश कार्तिक है और उनकी पूजा हो रही है वो ठीक है वोह एक स्वरूप है किंतु यह एक मां का जीवंत स्वरूप ठाकुर स्वामी जी ने पत्र लिखा एक बार बाबूराम महाराज की मां मातंगिनी देवी दुर्गा पूजा कर रही है आठुर में तो स्वामी जी ने पत्र में लिखा व बढ़ बूढ़ो वयस से बाबूराम मायर मति भ्रम हो मने बूढ़ी उम्र में वृद्धावस्था में बाबूराम महाराज की मां को मतिभ्रम हुआ है जंत दुर्गा के छेड़े माटी प्रतिमा पूजो करछ जंत दुर्गा जीवंत दुर्गा को छोड़ कर के माटी की प्रतिमा की पूजा कर रही है जंत दुर्गा यानी कि जीवंत दुर्गा कौन मां शारदा स्वयं मां शारदा का मां तो उस समय सदेव विराजमान थी सदेव जीवित थी उनकी पूजा नहीं करके वो मिट्टी की प्रतिमा बना कर के उसकी पूजा कर रहे हैं क्या ये पागलपन है क्या है तो यदि हम सही सही लीला चिंतन जब ध्यान करने के समय किस चीज के ऊपर में अपने मन को केंद्रित करेंगे अभी कुछ दिन पहले एक लड़का आया था उसके साथ में मेरी बातें होती रहती है बड़ा धार्मिक लड़का है व अनमैरिड है जॉब करता है और बड़ा ही शार्प है इंटेलेक्चुअल है सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तो आकर के उसको जब ध्यान करने का उसका बड़ा उसको मैंने उसके प्रति उसकी यह स्पू हा है तो मुझे पूछ रहा है कि किस तरह से जब अप ना हो उसमें अपना मन बैठे किस तरह से हमारा मन विक्षेपित ना हो मैंने उसको कहा कि देखो एक हाथ में तुम कथामृत पकड़ो और दूसरे हाथ से जप करना माला है उसके पास में माला से जप करता है तो एक हाथ में कथामृत रखो एक हाथ में जप माला रखो दोनों साथ में करो देखोगे कि जब तुम्हारे जप के ऊपर में से ध्यान भंग हो जाता है तो कथामृत के ऊपर में ठाकुर के प्रसंगों को पढ़ने के ऊपर में तुम्हारा मन बैठेगा और थोड़ी देर के बाद देख देखोगे कि तुम्हारा मन फिर से जप में चला गया है फिर वहां से ध्यान भंग होगा तो कथामृत में ले आना कथामृत के ठाकुर के प्रसंग पढ़ते पढ़ते फिर से यदि बोरिंग लगना लगे या तो फिर तुमको मन विक्षेपित होने लगे तो व जप के ऊपर ले आओ तोसे जप और प्रसंगों का चिंतन दोनों साथ में करो देखो कि तुम लंबे टाइम तक बैठ पाओगे अभी ऐसा होता है कि 51 मिनट जप किया और फिर मन भटकना शुरू हो गया तो इस तरह से तुम यदि करोगे तोय एटलीस्ट आधे घंटे पौने घंटे तक तो तुम आराम से बैठ पाओगे उसके बाद में तो प्रैक्टिस का प्रश्न है उसके बाद में तो भगवान ठाकुर की कृपा के ऊपर में सब कुछ आ जाता है किंतु यह एक आसान तरीका है जप और लीला चिंतन यह लीला विलास यह दोनों यदि साथ में चले तो देखेंगे कि आपके बैठने का समय एक्सटेंड होगा धीरे-धीरे करके यदि मैं 10 मिनट बैठ पाता हूं सिर्फ जप और ध्यान करके तो मां ठाकुर और मां खास करके स्वामी जी थोड़े राजसिक हो जाते हैं कभी-कभी तो ठाकुर और मां के जीवन के प्रसंग जो कि इस तरह से हमारे हृदय को सांत्वना देते हैं हमारे हृदय में हर्षो फलता उल्लास प्रकट करते हैं इस तरह के प्रसंगों की कोई किताब साथ में रखिए एक हाथ से जप करते जाइए और जप करते करते मन में विक्षेप होता है तो किताब पढ़िए किताब पढ़ते पढ़ते फिर मन भटकने लगता है तो उसको जप में लेकर आइए कभी-कभी ऐसा होगा कि दोनों साथ में चलेगा कभी-कभी ऐसा होगा कि जब के ऊपर में ही आपका मन बैठ गया कभी-कभी ऐसा होगा कि प्रसंगों का पाठ करने में मन लग गया और कभी-कभी ऐसा होगा दोनों चले जाएंगे आपका मन स्थिर होकर के कहां उड़ना शुरू कर देगा जैसे ऐसा लगेगा कि वह प्रसंग हो रहा है मैं वहां पर बैठा हूं मेरे मन में सतत जप चल रहा है इस तरह की अनुभूति भी होगी बड़ी सहज है इस तरह की अनुभूति प्राप्त करना कोई बड़ा कठिन बात नहीं है थोड़ा सा टेक्निक सीख लेना है क्योंकि ठाकुर महा स्वामी जी के आने का प्रयोजन ही तो वही है बात यह नहीं है कि हमको कोई इतना कठिन कुछ समझा दे जैसे कि हमको समझ में नहीं आए परेशान होकर के घूमते रहे एक छोटा बच्चा भी समझ सकता है इस तरह से उन्होंने आध्यात्मिकता सिखाई है इस तरह से उन्होंने एक के बाद एक मेथड उन्होंने हमारे लिए प्रकट की है प्रकाशित की है उसको भी हमको देख लेना है और जब गंभीरानंद जी महाराज को पढ़ते हैं एक-एक शब्द देखिए अमल धवल लीला विलास शब्द पढ़ कर के ही मन को शांति मिलती है इसी एक शब्द के ऊपर में आप कितना ही चिंतन मनन स्मरण कर सकते हैं इसी शब्द को लेकर के आप अपने आध्यात्मिक जीवन को एक नया एक डायरेक्शन दे सकते हैं आध्यात्मिक जीवन को एक नई एनर्जी आप दे सकते हैं तो मां की जीवन की यह लीला है मां के जीवन की यह एक के मां के जीवन के प्रसंग है मां और ठाकुर और डायरेक्ट डिसाइल इंक्लूडिंग स्वामी जी ये जो जी वन के जो प्रसंग है उनका चिंतन मनन हम जितना ही करेंगे उतना ही हमारे जप ध्यान में आध्यात्मिक जीवन में वो सहायक होंगे उतना ही हमारे मन को एकाग्र करने में वो बहुत ही बड़ा रोल बहुत बड़ी भूमिका वे लोग बज वो अप्लाई करेंगे और इसीलिए मैं दो टॉपिक एक साथ में क्यों लेता हूं फिलोसोफी ऑन वन हैंड और जीवन के प्रसंग ऑन दी अदर हैंड जिससे कि क्या हो कि फिलोसोफी जो है उसका प्रैक्टिकल इंप्लीमेंटेशन क्या हो रहा है किस तरह से हो रहा है वह दोनों हमको साथ-साथ में समझ में आए तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस श्री राम कृष्णर्पण मस्तु