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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 9 jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे उसका नाम है भार समर्पण

देवी का जननी के रूप में अवतरण का प्रयोजन

इस चैप्टर में एक जो पैसेज है जो कि पढ़ना हमने पिछली बार प्रारंभ किया था अपने लिटरेचर में रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल पैसेज वन ऑफ द मोस्ट प्रोफाउंड एंड मोस्ट फिलॉसोफिकल पैसेज यह यहां पे है। इतना खूबसूरत रूप से लिखा गया है। और इसकी जो दार्शनिक गहनता है फिलोसोफिकल डेप्थ है ये जैसे कि रामकृष्ण संघ के फाउंडेशन फिलॉसोफिकल फाउंडेशन में एक है। तो इस पैसेज को थोड़ा सा हमने लास्ट क्लास में पढ़ा था। मैं फिर से उसको पढ़ता हूं। इसकी पूर्व भूमिका क्या है? हमने देखा कि गंभीरानंद जी महाराज किस तरह से स्टेप बाय स्टेप श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। जय राम भाटी में जन्म हुआ। जय राम भाटी शक्तिपीठ का थोड़ा सा वर्णन हुआ। उसके बाद में कामार पुकुर में श्री रामकृष्ण देव के साथ में विवाह के बाद में श्री मां शारदा देवी का आगमन वहां की कुछ घटनाएं और विवाह के बाद में श्री रामकृष्ण देव का ठाकुर का दक्षिणेश्वर में वापस गमन और फिर लंबा विरह कितने सालों का विरह श्री मां शारदा देवी को सहन करना पड़ा था। 58 1858 के आसपास में मां का विवाह हुआ और फिर 1872 के आसपास में श्री मां शारदा देवी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। यह जैसे कि 14 साल भगवान राम ने जैसे वनवास स्वीकार किया था वैसे ही यहां पर श्री मां शारदा देवी को भी श्री रामकृष्ण देव के साथ में विरह रूपी यंत्रणा का भोग करना पड़ा था कि श्री मां शारदा देवी का जीवन किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं और किस तरह से स्टेप बाय स्टेप उन्होंने श्री मां शारदा देवी को अ जयराम भाटी में किस तरह से प्रसंग हुए कामार पुकुर में क्या हुआ उसके बाद में किस तरह से श्री मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर आई उन दिनों की घटनाओं का वर्णन ऑलरेडी हो चुका है दक्षिणेश्वर में श्री मां शारदा देवी का जीवन और तपस्या खास करके जो एक प्रोफाउंड एक घटना थी हमारे साहित्य में वह थी शोडशी पूजा शोशी पूजा का आधार लेकर के श्री मां श्री रामकृष्ण ने ठाकुर ने किस तरह से मां शारदा देवी में देवित्व का जागरण किया देवत्व का आवाहन किया उसके बाद में किस तरह से ठाकुर की धर्मचक्र प्रवर्तन ठाकुर का धर्मचक्र प्रवर्तन कोलकाता में प्रारंभ हुआ और इसमें मां का क्या कंट्रीब्यूशन था किंतु यह जितनी भी घटनावली श्री मां के जन्म से लेकर के हम पढ़ रहे हैं। उसका पाठ कर रहे हैं। इसके दो तरह से गंभीरानंद जी महाराज हमारे सामने रखते हैं। एक तो कहते हैं कि देखिए कि मां जो थी उन्होंने ठाकुर

ठाकुर और स्वामीजी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की ताकि माँ सारदा उसका संचालन करें

की अनुगता होकर के ठाकुर की शिष्या हो के ठाकुर के पास में से जो कुछ भी सीखना था इस धर्म के बारे में अध्यात्म साधना के बारे में साथ में ही संसार के बारे में किस तरह से संसार में रहा जाए वह सब कुछ मां ने किस तरह से ठाकुर के पास में सीखा उसका तो वर्णन है ही है किंतु साथ में ही बैकग्राउंड में श्री श्री रामकृष्ण ठाकुर मां को उनका इष्ट और गुरु का पद है। उसको स्वीकार करने के लिए उसके लिए मां को तैयार करने के लिए ठाकुर उसकी भी शिक्षा उनको दे रहे थे। देखिए कि ठाकुर को पता है कि उनका जो जीवन है वह इस पृथ्वी पर लंबा नहीं है। उनके बाद में श्री मां शारदा देवी को ही रामकृष्ण संघ के गुरु और इष्ट का पद धारण करना होगा। मैं पहले जब स्वामी जी का जीवन कथा पढ़ता था। स्वामी जी की बायोग्राफी पढ़ता था। उसमें एक सेंटेंस था, एक ऐसा एक विचार था जो कि मुझे उस समय थोड़ा सा आश्चर्यजनक लगा था। स्वामी जी 1902 में लेस देन 40 इयर्स 40 से भी कम उम्र में उन्होंने महासमाधि ग्रहण कर ली। इसके पीछे का तात्पर्य क्या है? रामकृष्ण संघ का तो अभी प्रारंभ हुआ है। श्री रामकृष्ण देव की भावधारा का यही तो अभी ठीक-ठीक प्रसार होगा। भारत में यह जो स्वतंत्रता संग्राम तो अभी प्रारंभ हुआ है। उस समय भारत को जो मार्गदर्शन चाहिए वह स्वामी जी के अलावा और कौन दे सकता था? किंतु यह मार्गदर्शन नहीं देकर के स्वामी जी ने पृथ्वी से चले जाना पसंद किया। इसके पीछे का क्या रहस्य है? तो कहीं-कहीं पर मैंने ऐसा पढ़ा कि स्वामी जी के गुरु भाई यदि स्वामी जी रहते तो उनकी छाया में अपना विकास न कर पाते। जैसे कि एक बड़ा वटवृक्ष है। वटवृक्ष की छांव में छोटे-छोटे पेड़ रहते हैं। वह कभी भी उनका विकास नहीं होता है। तो वटवृक्ष जब चला जाएगा तब यह जो आसपास के जितने भी छोटे पेड़ हैं उनको भी सूर्य प्रकाश मिलेगा। उनको भी संघर्ष का सामना करना पड़ेगा। अभी तक तो वटवृक्ष की छाया में थे, छांव में थे तो संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा था। तो फिर इस तरह से यदि वटवृक्ष चला जाएगा तो छोटे-छोटे पेड़ उनका भी विकास होगा। तो गुरु भाई अब उनका विकास हो और वह रामकृष्ण संघ को ठीक-ठीक उसका जो संचालन है वह कर पाए। इसलिए स्वामी जी ने पृथ्वी पर से विदाई ले ली। इस तरह का एक विचार मैंने पढ़ा था। किंतु अभी जब मैं श्री रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य को संपूर्ण दृष्टि से देखता हूं तो देखिए कि हमारा जो इतिहास है उसको मेजर तीन भाग में आप बांट सकते हैं। पहला भाग है कि ठाकुर की तपस्या ठाकुर की साधना और फिर ठाकुर का प्रचार प्रसार कोलकाता में घर-घर जाकर के सभी को यह मां काली का नव संदेश सुनाना वह एक पोर्शन है। इसके बाद में देखिए 1886 में ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी विवेकानंद का प्रयाण प्रचार कार्य मिनिस्ट्री यदि यह कैथोलिक लैंग्वेज में कहे तो मिनिस्ट्री ऑफ स्वामी विवेकानंद या तो फिर शंकर दिग्विजय अपनी अद्वैत वेदांती भाषा में कहे तो यह विवेकानंद दिग्विजय ठाकुर के महाप्रयाण के बाद में प्रारंभ होता है और देखिए कि 1886 से लेकर लेकर के 1900 इतना समय स्वामी जी का दिग्विजय या तो फिर यह धर्म चक्र प्रवर्तन या तो फिर वेदांत और योग के प्रचार का कार्य चलता है और साथ में ही यह जो रामकृष्ण संघ का स्थापन और रामकृष्ण के श्री रामकृष्ण देव के साथ में जुड़े हुए जितने भी सन्यासी और यह गृहस्थ भक्त हैं उन सबको एक सूत्र में बांध करके एक साथ में उनको कॉर्पोरेट बॉडी बना करके उनका जो एनर्जी है उनको फोकस करके उनकी साधना को फोकस करके जगत कल्याण के कार्य में लगाना। तो यह यदि स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन है तो 1902 के बाद में श्री मां शारदा देवी का दिग्विजय प्रारंभ होता है। श्री मां शारदा देवी की मिनिस्ट्री प्रारंभ होती है। 1902 से प्रारंभ करके 1920 यह जो 1820 साल है श्री मां शारदा देवी ने उन्होंने जो ठाकुर ने उनको जो कार्य किया था वह कार्य परिसमाप्त करने के लिए वो कार्य को जैसे कि एक आकार देने के लिए उन्होंने अपना जीवन बिताया। किंतु यह कार्य तो देखिए कि यहां पर स्वामी जी के महाप्रयाण का तात्पर्य क्या है? बात सिर्फ यह नहीं है कि राजा महाराज है या शरद महाराज है या शशि महाराज है इस अपने गुरु भाइयों को जैसे कि उनका जो चरित्र और उनकी साधना और उनका रिस्पांसिबिलिटी इसका विकास हो इसलिए स्वामी जी ने चले जाना उन्होंने ठीक किया किंतु इसके अलावा भी एक बहुत बड़ा रीजन यह है कि इसके बाद का जो कार्य है वह इतना महत कार्य है कि स्वामी विवेकानंद ंद स्वयं शायद उसको ना कर पाए। स्वामी जी ने जैसे कि संघ का गठन करके एक स्टेज तैयार करके गए हैं। किंतु इस स्टेज के ऊपर में से इस प्लेटफार्म के इस रंगमंच के ऊपर में से इस जगत को जो दिव्य मधुर संगीत सुनाना है वह तो श्री मां शारदा देवी का कार्य था। उनकी दिव्यता ही जैसे कि इसके बाद का जो फेस था स्वामी विवेकानंद के बाद का फेस वो जैसे कि श्री मां शारदा देवी को ही उसको निभाना था। तो यह जो मां का कार्य क्या था? ऐसा तो क्या कार्य के लिए ठाकुर ने देखिए स्वामी जी को ठाकुर ने तैयार किया कि वह एक कॉरपोरेट बॉडी एक संघ एक रंगमंच बना करके जाए जो कि सिस्टमैटिक स्वरूप से रामकृष्ण भावधारा को एक आयाम दे एक सिस्टमैटिक रूप से इसको डिजाइन करें इसको फॉर्मुलेट करें जो अपना जीवन गठन करना चाहते हैं उनके लिए एक व्यवस्था करके जाए और जो आदर्श है आदर्श को ठीक-ठीक रूप से लोगों में प्रचार हो इसके लिए फार्मूलेशन हो तो एक तो है प्रचार दूसरा है साहित्य और तीसरा है साधना तो साधना साहित्य और प्रचार इन तीनों कार्य के लिए स्वामी जी को संघ बनाने की आवश्यकता थी तो वह संघ तो स्वामी जी ने बना दिया ठाकुर के जो विचार थे उसको मॉडर्न स्वरूप में आधुनिक अंग्रेजी भाषा में मॉडर्न इंग्लिश लैंग्वेज में और मॉडर्न यूरोपियन अमेरिकन फॉर्मुलेशन में स्वामी जी ने जगत के सामने रख भी दिया और इस तरह से एक कॉरपोरेट बॉडी बना के गए जो कि आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच के लिए पृथ्वी पर कार्य कर रही है किंतु यह जो पूरा तैयार करके गए एक ढांचा एक फ्रेमवर्क उसका फिर प्रयोजन क्या होगा उसका फिर अल्टीमेट यूज क्या होगा। यह तो ऐसी बात है कि आपने बहुत सुंदर एक गाड़ी तो बना दी। एक कार तो बना दी। किंतु यह कार लेकर के ड्राइविंग करके आप कहां पे जाएंगे? वह तो ड्राइवर के ऊपर में है ना। इंजीनियर का कार्य है कार बनाना। किंतु वह ड्राइवर का कार्य है कि वह गाड़ी में बैठकर के कार में बैठकर के कहां पर जाना चाहता है? उसका लक्ष्य क्या है? उसका गंतव्य स्थान क्या है? यदि मैं चाहता हूं कि मैं कार ड्राइव करके यहां से कोलकाता जाऊं तो वह मेरे ऊपर में है। वह इंजीनियर ने जो कार बनाई है उसका तो यही कार्य था कि कार इतनी परफेक्ट बने कि जैसे कि मैं इतना लॉन्ग जर्नी करके लॉन्ग ड्राइव करके विशाखापट्टनम से कोलकाता जाता हूं तो रास्ते में कहीं यह ब्रेकडाउन ना हो जाए। तो एफिशिएंटली कार को मैन्युफैक्चर करना यही तो इंजीनियर का कार्य है। किंतु फिर जो मैं ओनर हूं कार का मैं मालिक हूं। मैं ड्राइवर हूं और इस कार में बैठकर के मैं कहां पर ले जाना चाहता हूं तो वह तो मुझे देखना है। तो वैसे ही स्वामी जी ने एक इतना सुंदर इफेक्टिव एफिशिएंट संघ की रचना तो की। रामकृष्ण मिशन का स्थापना तो उन्होंने की किंतु फिर यह रामकृष्ण मिशन कार्य क्या करेगा इसके माध्यम से क्या होगा वह तो रामकृष्ण मिशन की जो मालकीन है यह जो ड्राइवर थी उनको डिसाइड करना है और वह मालकीन या तो फिर यह ड्राइवर कौन थी तो वह थी श्री मां शारदा देवी तो रामकृष्ण मिशन रूपी जो साधन स्वामी जी ने तैयार किया है उस साधन को किस तरह से जगत में उसको कार्य परिणत करना है। वह मां शारदा देवी ठीक करती थी। किंतु फिर मां का कार्य क्या था? यह ब्लूप्रिंट भी तो सब ठाकुर के समय में यह सब ठीक हो चुकी थी। मां का कार्य क्या था? तो यह जो कार्य था वो उसको जो समझना इट इज वन ऑफ द मोस्ट प्रोफाउंड फिलॉसोफिकल इंसाइट इन आवर ऑर्डर। रामकृष्ण संघ में जो दार्शनिक तत्व है या तो जो फिलॉसोफिकल आइडिया है उस आइडियाज में से बहुत सारे हैं। जैसे कि आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च या तो फिर शिव्ञाने जीव सेवा या तो फिर यह जो महावाक्य है अहम ब्रह्मास्मि जो कि सनातन काल से चला आ रहा है। यह तो हमारे फिलॉसोफिकल फाउंडेशन है ही है। किंतु साथ-साथ में ही एक बहुत महत्वपूर्ण फिल कोर फिलॉसोफिकल आइडियाज जो कि केंद्रवर्ती दार्शनिक विचार है रामकृष्ण संघ के उसमें एक सबसे महत्वपूर्ण एक यह है जो कि मां ने कहा था कि ठाकुर ने मुझे जगत में मातृभाव का प्रचार करने के लिए मुझे रख करके गए हैं। किसी ने जब मां को पूछा कि ठाकुर मां

माँ सारदा के गुरुभाव का सारतत्त्व: मातृभाव

ने खुद कहा था कि जब ठाकुर चले गए तो मैं भी सोचती थी कि अभी इस जगत में रहकर के मुझे क्या लाभ है? मुझे क्या करना है? किंतु फिर उनको ठाकुर की यह बात याद आई। ठाकुर ने जो मां को समझाया होगा या तो फिर ठाकुर का जिस तरह से फ्यूचर प्लान होगा जगत में मातृभाव का प्रचार करने के लिए श्री मां शारदा देवी का अवतरण हुआ है। अभी यह मातृभाव क्या है और किस तरह से यह मातृभाव की साधना हम साधक लोग करते हैं। देखिए कि यदि आप स्वामी जी का जो चार योगों का कॉम्बिनेशन देखें कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और राजयोग इसमें आपको पूरे भारत की जितनी भी साधन पद्धतियां हैं या तो फिर जितनी फिलॉसोफीस है उन सबका एक कॉम्बिनेशन तो देखने में आ ही जाएगा। किंतु साथ-साथ में ही एक चीज जो कि मुझे स्वामी जी को पढ़कर के समझ में नहीं आई थी या तो फिर वह मेरी कहेंगे कि शॉर्ट साइटेडनेस थी कि मैं समझ नहीं पाया होगा। व्हाटएवर जिसको कि मुझे मां का साहित्य पढ़कर के समझ में आई है। यह जो रामकृष्ण संघ की यह जो चार साधनाएं हैं कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग और ज्ञान योग उसमें से एक और भी साधना को हम जोड़ सकते हैं। वह है मातृ योग। यह मातृ योग क्या है? मातृ भाव से साधना करना क्या है? आप कह सकते हैं कि भक्ति योग के भीतर में ही तो सभी भाव आ जाते हैं। किंतु फिर भी यह जो मेरा एक पर्सनल विचार है कि यह मातृ योग या तो फिर मातृभाव से साधन यह एक बहुत ही पावरफुल डेवलपमेंट है। इसके बारे में यह जो पूरा पैसेज है जो कि अभी हम इसका पाठ करेंगे। गंभीरानंद जी ने यह जो भार समर्पण इस जो भार स्वीकार इस चैप्टर में जो गंभीरानंद जी महाराज ने इस पैसेज को दिया है। उसका पाठ करेंगे। यह पैसेज जो है वन ऑफ द मोस्ट प्रोफाउंड वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल पैसेज इन आवर लिटरेचर। साहित्य की गंभीरता और साहित्य का माधुर्य दार्शनिक गंभीरता और साहित्य का माधुर्य ये दोनों इस पैसेज में इतना गहन है जो कि इसका थोड़ा सा हम पाठ ऑलरेडी कर चुके हैं। फिर से मैं उसको प्रारंभ से ही पढ़ता हूं और पूरा पैसेज हम पढ़ेंगे और उसके ऊपर में हम विस्तृत आलोचना करेंगे। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी?

भक्त की पूजा ग्रहण करने के लिए जगदम्बा माँ का रूप धारण कर पृथ्वी पर अवतरण करती है

प्रकांत विषय उपलब्ध जनो श्री माय देव ए परिचय आपात जस्टो जिस विषय की हम आलोचना कर रहे हैं अर्थात कि श्री मां का देवित्व उसके बारे में कुछ कुछ घटनाओं का वर्णन हमने ऑलरेडी किया है। हमने ऑलरेडी इसका परिचय दिया है। तो यह परिचय किस तरह से दिया था? ठाकुर के श्री मां शारदा देवी के बारे में क्या वचन थे? तो ठाकुर ने कहा था कि वह शारदा सरस्वती ज्ञान देने के लिए आई है। फिर कहा था वह शारदा है, सरस्वती है। इसलिए उसको सजना धजना अच्छा लगता है। श्रृंगार करना अच्छा लगता है। फिर ऐसा बोलकर के ठाकुर ने मां के लिए चूड़ियां है, तावीज है। यह सब भी सोने की चूड़ियां, सोने का तावीज यह भी गढ़ करके मां को दिया था। फिर ठाकुर के जो कुछ-कुछ प्रसंग थे कि कामार पुकुर में वे जब थे और जब वह धर्म प्रसंग ईश्वरीय तत्वों की आलोचना करते थे उस समय गांव की जो अन्य स्त्रियां उनके सामने बैठकर के यह सब प्रसंग सुना करती थी। उसमें मां भी बैठती थी। किंतु कुछ ही क्षण में वह सो पड़ती थी और जब बाकी स्त्रियां उनको जगाने का प्रयास करती कि अच्छा सुनो इतना सुंदर ईश्वरीय तत्व उसकी आलोचना हो रही है उस समय ठाकुर कहते कि अरे नहीं उसको नींद से मत मत उठाओ यदि वह यह सब सुन लेगी तो चोचा दौड़ मार सीधी दौड़ लगाएगी कहां तो वैुंठ में लक्ष्मी होकर के नारायण के साथ में उनका निवास है या तो फिर पार्वती होकर के भगवान भगवान शिव के साथ में उनका निवास है। कैलाश पर्वत सीधी वहां पर चली जाएगी। इसके लिए उसको यह सब ना वो यह सब ना सुने वही उसके लिए अच्छा है। तो ठाकुर के कुछ वचन मां के देवीत्व का परिचय देते हुए फिर गुरु भाइयों के ठाकुर के त्यागी संतानों के वचन कि किस तरह से योगानंद जी कहते हैं कि यह जो जहर मां ने पचाया है जो कोई भक्त आता है सबको मां खुले हृदय से खुले हाथों से उनको स्वीकार कर लेती है ना जात देखती है ना संस्कार देखती है ना चरित्र देखती है जो आता है सब मां के चरणों में मां के संतान होकर के स्थान पाते हैं। यह किस तरह की दैवी शक्ति है? ऐसा करते हुए तो हमने ठाकुर को भी नहीं देखा था। ठाकुर भी कितना कितना चेकिंग करके, कितनी परीक्षा करके, कितनी जांच पड़ताल करके तब तो कहीं शिष्यों को स्वीकार करते थे। वो जो ठाकुर की एक मेथड है ना पहली पहली बार मैंने पढ़ा था तो मुझे हंसी आती थी। अभी नहीं आती। वो ठाकुर हाथ का वेट करते हैं। हाथ उठा के कहते हैं अपने हाथ में कि देखो तो तुम्हारे हाथ का वजन कितना है। फिर वो केशव सेन को एक बार बोले थे कि अच्छा तुम्हारा हाथ भारी नहीं है। जो जिसका हाथ भारी होता है उसका वेट ज्यादा होता है वो खल दे हाथ ए रकम हो। खल अर्थात कि जो शट है या तो फिर जो दुष्ट है उन लोगों के हाथ भारी होते हैं। तुम्हारा ऐसा नहीं है। तो इस तरह से परीक्षा करते करते ठाकुर लोगों को लेते थे। अपने शिष्य बनाते थे। किंतु मां को तो किसी की परीक्षा करते हुए हमने देखा नहीं है। जो भी मां के पास में आया सब मां के संतान हो गए। और इसके बाद में देखिए कि स्वामी जी क्या कहते हैं मां के बारे में जानंत दुर्गा देखा दुर्गा पूजा दिखाओ तबे अमर नाम ये जीवंत दुर्गा की पूजा में जब दिखाऊंगा तब मेरा नाम देखना और फिर क्या कहते हैं कि को रामः राम कौन थे सीता का महात्म्य ही सर्वश्रेष्ठ है। तो इस तरह से स्वामी विवेकानंद, स्वामी योगानंद वगैरे जो गुरु भाई थे उनकी दृष्टि में भी मां का महमा या तो फिर महत्ता क्या थी? यह सब यहां पर गंभीरानंद जी ने हमारे सामने ऑलरेडी बता दिया है और कहते हैं यह जो परिचय दिया है फिलहाल इतना इनफ है यथेष्ठ है अतः परमरा ए चरित्र आलोचनाए जतई अग्रसर होइबो ततई देखी ते पाइबो जे विविध क्षेत्र विचित्र ते तहार चरित्र विकास होइया थाकिले ओ इहार अनन्य साधारण परिपूर्ति एक विशेष क्षेत्र होइया छिलो तो अभी हम इस चरित्र की आलोचना करने में जितने ही आगे बढ़ेंगे उतना ही देख पाएंगे कि विविध क्षेत्रों में विचित्र रूप से यानी कि विविध रूप से उनके चरित्र का विकास हुआ तो था किंतु मां के जीवन का मां के चरित्र का एक अनन्य साधारण एक बड़ा ही विशिष्ट परिपूर्ति यानी कि अनन्य साधारण परिपूर्ति एक विशेष रूप से जहां पे मां के जीवन की परिसीमा मां या तो फिर सर्वोच्च सिद्धि जिसने लाभ की थी एक विशेष क्षेत्र होइया छो एक विशेष क्षेत्र में मां के जीवन चरित्र का मां के चरित्र का सर्वोच्च जैसे कि शिखर आया था प्राप्त हुआ था तीन देवी होईले तहां लीलार एंश जगतवासी तहां के पाया छिलो जननी रूपे वह देवी होकर के भी उनकी लीला के इस अंश में जगतवासियों ने उनको पाया था जननी के रूप में। मां देवी तो थी किंतु जैसे कि पूर्व समय में उन्होंने मां काली मां दुर्गा या तो फिर चंडी ये जो जिस तरह से दानवों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित अवतरणीता हुई थी। अवतरिता हुई थी। वह एक था उनका स्वरूप शुमंभ निशुमंभ का मर्दन करने के लिए महिषासुर का वध करने के लिए उनका जो आगमन हुआ था भयावह जैसे कि रण योद्धा के रूप में वो एक उनका स्वरूप था। किंतु साथ में ही यह एक स्वरूप है। एक स्निग्ध प्रेम भोबासा से परिपूर्ण एक जननी के रूप में एक मां के रूप में भारत आध्यात्म इतिहास इहा एक गुरुत्वपूर्ण व्यापार भारत के आध्यात्मिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है। श्री राम पूर्वतापनी उपनिषद उक्त होइया छे उपासका नाम कार्यार्थम ब्राह्मणो रूप कल्पना श्री राम पूर्वतापनी उपनिषद में लिखा गया है कि उपासकों के प्रयोजन निर्वाह के लिए निर्गुण निराकार ब्रह्म रूप परिग्रह करते हैं। निर्गुण निराकार ब्रह्म की आप कल्पना करना या तो फिर उनकी आराधना करना मुश्किल है। संभव नहीं है हम जैसे आम साधकों के लिए इसीलिए हमारे प्रयोजन के लिए हमारी आराधना स्वीकार करने के लिए निर्गुण ब्रह्म रूप परिग्रह करते हैं। श्रीमद् भगवत गीता ते आ ये यथामाम प्रपद्यते तान तथैव भजाम्यहम श्रीमद्भगवत गीता में है जो भक्त जिस तरह से मेरा स्मरण करता है मैं उसी भाव का अवलंबन करके उसका अभीष्ट पूर्ण करता हूं उसकी मनोवांछा पूर्ण करता हूं श्री चंडी ते ऋषि बोलिते छन श्री चंडी में भी ऋषि ने कहा है एवं भगवती देवी सानित्यापी पुनः पुनः संभव कुरते भूप जगत परिपालनम हे राजन हे भगवती जन्मादि शून्य होकर के भी पुनः पुनः इस तरह से आविर्भूत होकर के आविर्भूत होकर के जगत का परिपालन करती है। जिनका ना ही जन्म है ना ही मृत्यु है ना ही जरा ना ही व्याधि वे भी जन्म धारण करके पंचमहाभूत का यह शरीर देह धारण करके इस जगत का परिपालन करती है ताई अति प्राचीन काल हो ते ए देश देवी विविध विग्रह बाको प्रचलितो आ पूजितो होते छे इसीलिए बड़े ही प्राचीन काल से इस देश में देवी के विविध विग्रह विविध मूर्तियां या तो फिर प्रतीक प्रचलित है और पूजा प्राप्त कर रहे हैं। देवीर स्तवस्त स्तुति असंखो देवी की स्तवस्त स्तुति भी असंख्य है। देवी के आमरा पाया छ विविध रूपे विविध भावे देवी को हमने पाया है विविध रूप में विविध भाव में तीन लक्ष्मी सरस्वती शीतला मनसा चंडी दुर्गा इत्यादि वह लक्ष्मी है सरस्वती है शीतला है मनसा है चंडी है दुर्गा है वगह तिनी धनदात्री विद्यादात्री निरामय करत्री त्राणकारिणी असुर संहारिणी वो धन धनदात्री है, विद्याद दात्री है, निरामय करत्री है, त्राणकारिणी है और असुर संहारिणी है। चंडी ते ताहा के समस्त विद्या रूपणी और समस्त नारी रूपणी बोला होया छ। चंडी में उनको समस्त विद्या रूपणी और समस्त नारी रूपणी कहा गया है। जैसे कि हम लोग स्तव करते हैं सर्वदेव देवी स्वरूपाय श्री रामकृष्ण अर्थात कि सर्व देव और देवी के स्वरूप सभी देव और देवियां श्री रामकृष्ण मय स्वरूप के भीतर में विराजमान है। वैसे ही समस्त विद्या और समस्त नारी शक्तियां श्री मां शारदा देवी के भीतर में विराजमान है। तुष्ट होया तनी भक्ति मुक्ति प्रदान करें आबा रुष्ट होया तनी अधार्मिक अनाचारी दंड विधान करेन यदि वह हमारे पर आशीर्वाद हमारे पर खुश होगी हमारे पर तुष्ट होगी तो वह भक्ति और मुक्ति प्रदान करेगी और रुष्ट होगी यदि नाराज होगी तो अधार्मिक और अनाचारियों को दंड करेगी नारी रूपे शक्ति रूपे देवी रूपे मातृ रूपे आमरा अनादि काल हो ते तहार पूजा करिया आशीते जी नारी रूप में, शक्ति रूप में, देवी रूप में और मातृ रूप में हम अनादि काल से उनकी पूजा करते आ रहे हैं। राम प्रसाद कमला कांतो और राजा रामकृष्ण प्रभुतिर भक्ति ते मुग्धो तिनी आभार स्वर्गेर ऐश्वर जो छाड़िया मरतेर कुटीरे पदार्पण करेन राम प्रसाद कमलाकांत और राजा रामप्रसाद जैसे साधकों की भक्ति से मुक्त होकर के वही फिर से स्वर्ग का ऐश्वर्य छोड़कर के गरीब की कुटिया में पदार्पण करती है। ऐन की तिनी भक्त भांगा बेड़ा बांधिया जान भक्त की भांगी हुई कुटिया है उसको भी वह बाना करके जाती है। कन्या बेशे जननी बेशे तनी शोके दुखे सांत्वना प्रदान करेन कन्या के रूप में जननी के वेश में वह शोक में दुख में सांत्वना प्रदान करती है। स्वर्ग देवीर शंगे बंगाली एमई कोरिया आत्मीयता पाताया छेन स्वर्ग की देवी के साथ में बंगाली ने इसी तरह से आत्मीयता बनाई है किंतु देवी तब देवी था क्या गलेन किंतु इतनी आत्मीयता पूर्वक उनके साथ में रहने के बावजूद इतनी आत्मीयता पूर्वक उनकी उपासना करने के बावजूद देवी देवी ही रह गई मानुषेर मतो मानुषेर शरीरे तखनो विग्रह परिग्रह कर लेना मनुष्य की तरह मनुष्य के शरीर में तब तक उन्होंने विग्रह यानी कि देह धारण नहीं किया था श्री माय जीने आमरा देवी ए अवतरण धारा रोई चरम परिणति देखी ते पाई श्री मां के जीवन में हम देवी के इस अवतरण धारा जो है एक के बाद एक उन्होंने पृथ्वी पर अवतरण किया है उसकी चरम परिणति हमको को मां शारदा देवी के जीवन में देखने को मिलती है। देवी एकने साक्षात शचोला रक्तमानशर देहो विशिष्टा देवी है यहां पे साक्षात सचल रक्त मांस के देह की बनी हुई श्री रामकृष्ण पूजिता भवतारिणी ओ शय गर्भधारिणी शहीन शहितो अभिन्ना श्री मां श्री रामकृष्ण की पूजिता है भवतारिणी और उनकी जन्मदात्री मां के साथ में मां अभिन्ना है उनके साथ में एकाकार कार की हुई है। देखिए कितना सुंदर पैसेज है कि किस तरह से बंगालियों ने देवी के साथ में इतना आत्मीयता का संबंध बनाया है। देवी का बार-बार पृथ्वी पर अवतरण होता रहा है। किंतु उस अवतरण धारा कितना सुंदर शब्द प्रयोग है। अवतरण धारा यानी कि जो अवतरण करने का जो प्रवाह है एक के बाद एक पृथ्वी पर आई है। उसका किंतु यदि सेंट्रल थीम देखा जाए तो वह क्या है? असुर संहार के लिए। हां भक्त की आराधना स्वीकार करती तो है। भक्त की उपासना भक्त की मनो उपासना स्वीकार करती है। उसकी मनोवांछा पूर्ण तो करती है। किंतु उनका जो सेंट्रल थीम होता है असुर संहार के लिए आती है। किंतु आप असुर संहार करने के लिए जो देवी अवतरित हुई है उनके साथ में कितना ही आत्मीयता का संबंध बनाइए। जब तक आप उनको पंचमहाभूत के देह में नहीं दर्शन करेंगे। इस रक्त मांस के देह में उनका दर्शन नहीं करेंगे तब तक उनके साथ में जो एक घनिष्ठ आत्मीयता बननी चाहिए वो नहीं बनेगी। देखिए जैसे कि यह वैष्णव भाव है। वैष्णव साधना है। भगवान कृष्ण इस पंच महाभूत के देह में अवतरित हुए हैं और उनके साथ में एक के बाद एक सभी ने एक विशेष भाव के द्वारा संबंध स्थापित किया है। यह जो उनके सखा थे सुदामा उन्होंने भगवान कृष्ण के साथ में सख्य भाव का संबंध बनाया। उनके यह जो गोप बालक बालिकाएं थी जो गोप बालक थे उन्होंने भगवान कृष्ण के साथ में मित्र भाव से सखा भाव से संबंध बनाया फिर यह जो गोपिकाएं थी राधा थी उन्होंने कृष्ण के साथ में मधुर भाव का संबंध फिर यह यशोदा थी उनका कृष्ण के साथ में था वात्सल्य भाव से संबंध फिर यह इवन जो जो शत्रु थे जो दानव जो थे शिशुपाल वगैरह उनका श्री कृष्ण के साथ में शत्रु भाव से संबंध था। तो यह शांत भाव, दास्य भाव, जननी भाव, संतान भाव या तो फिर कहेंगे कि शत्रु भाव और फिर मधुर भाव एक भाव के माध्यम से श्री कृष्ण के साथ में उन्होंने संबंध बनाया है। भाव के माध्यम से उन्होंने श्री कृष्ण की उपासना की है। यहां पर किंतु देखिए कि जन देवी का आगमन जब-जब भी हुआ है तो देवी शरीर में आगमन हुआ है। पंचमहाभूत के देह में आगमन हुआ हो इस तरह और फिर उस आगमन को फिर हम किसी ना किसी एक भाव के साथ में जोड़ें और फिर उसकी आराधना करें। यह एक बड़ा ही विशिष्ट माइलस्टोन है। इससे पहले श्री राधा रानी के रूप में, श्री मां सीता के रूप में, श्री मां पार्वती के रूप में देवी अवश्य अवतीर्ण हुई थी। किंतु यह जो श्री मां शारदा देवी के रूप में जो अवतीर्ण हुई है वह है हमारी साधना की परिसमाप्ति करने के लिए साधना का जो अंतिम चरम लक्ष्य भाव है जननी भाव और संतान भाव उसको जैसे कि हमको सिखाने के लिए मां शारदा देवी के रूप में उनका जन्म धारण हुआ है। देखिए कि वैष्णव आप साधना देखेंगे तो भगवान कृष्ण के साथ में जो भाव बांधा जाता है उसमें चरम भाव क्या है? तो चरम भाव है मधुर भाव या तो फिर महाभाव। यहां पे मां के साथ में जो हम भाव बना के जो आत्मीयता बनाकर के उपासना करेंगे उसमें चरम भाव क्या होगा? तो हम मां संतान है और मां हमारी जननी है। यह मातृभाव है वह है देवी के साथ में भाव साधना का चरम भाव। तो यह चरम जननी भाव सिखाने के लिए संतान भाव सिखाने के लिए मां शारदा का पृथ्वी पर आगमन हुआ है। मानुष देवी के ए भावे चाहिले चाहिल केनो आर भगवती बा से अभिलाष पूर्ण कर लेन केनो मनुष्य ने देवी को इस भाव से क्यों प्राप्त करना चाहा और भगवती ने भी हमारे मन की अभिलाषा हमारे मन की वांछा इच्छा पूर्ण क्यों की आमरा बोलिया छ ए मातृति ते आविर्भाव ना होले अध्यात्म जगत एकटा अपूर्णणीय अभाव ताक्या ज तो हमने कहा है इस मातृति में यदि मां का आविर्भाव ना होता शक्ति का देवित्व का देवी का आविर्भाव ना होता तो आध्यात्म जगत में एक अपूरणीय अभाव रह जाता एक इतना बड़ा अवकाश रह जाता एक इतना बड़ा गैप रह जाता जिसको कि आप कभी पूर्ण नहीं कर पाएंगे पूर्व ज्ञात वस्तु भाषा भाबेर सहाज्य मानुष उच्चतर सत्य परिचय पाए। एक जो पूर्वज्ञात वस्तु है उसी के माध्यम से भाषा और भाव के माध्यम से मनुष्य उच्चतर सत्य का परिचय पाता है। जैसे कि यह सेंटेंस थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड लगता है। किंतु है बड़ा सहज। यहां पर गंभीरानंद जी क्या कहना चाहते हैं? जो चीज हमको ऑलरेडी पता है, जिस तरह का भाव हम जिसके जिस तरह के भाव के साथ में हम ऑलरेडी माहितगार हैं, उस तरह का भाव भाषा या उस तरह की घटनावली का अवलंबन करेंगे तो ईश्वरीय तत्व जो कि समझना मुश्किल है सहज रूप से समझ में आ जाएगा। तो यह किस तरह से तो ठाकुर जिस तरह देखिए ठाकुर ने इस बात को बड़ा अच्छे से समझा है। कोई भी ईश्वरीय तत्व सिखाने के पहले या तो सिखाने के समय ठाकुर हमको उपमा देते हैं। जैसे कि उस उपमा को समझ करके हम उस ईश्वरीय तत्व को समझ लें। कैसे? इस तरह की उपमा देंगे। जिस इस तरह की घटना का वर्णन करेंगे जिसके साथ में हम सभी लोग फमिलियर है। जैसे कि ठाकुर कहते हैं जब दांत में दुखता है, दर्द होता है तो हमारा पूरा मन उस दांत के ऊपर में रहता है। फिर हम जगत में कितना ही कार्य क्यों ना करें हमारा मन पड़े रहे पड़ा रहेगा दांत के दर्द के ऊपर में। तो अभी यह ऐसे ही जैसे आपका मन दांत के दर्द के ऊपर में रहता है वैसे ही आप जगत का कितना ही कार्य क्यों ना करें आपका मन ईश्वर में रहना चाहिए तो इस बात के साथ में हम सभी लोग मोर और लेस फमिलियर है जिसजिसने जिसको दांत का दर्द हुआ है पता है कि आप होमवर्क करते हैं कि जॉब करते हैं कि रोटी बनाते हैं कि बच्चे का लालनपालन करते हैं कुछ भी करते हैं पिकनिक पर गए हैं आपका मन तो उसी दांत के दर्द के ऊपर में ही रहेगा तो वैसे ही आप जगत में जो कुछ भी कार्य करें आपका मन रहना चाहिए ईश्वर के ऊपर में। जैसे कि वह एक काम वाली का नौकरानी का उदाहरण ठाकुर देते हैं। वह शहर में आती तो है अपने जिस जिस घर में वह काम तो करती है। जो उसका जो सेठ है उसका लड़के को अपना लड़का बोलकर के उसका पालन तो करती है किंतु मन में मन में उसको पता है कि उसका खुद का घर है गांव में और उसका खुद का बच्चा गांव में रह रहा है। वैसे ही आप जगत में आप कितना ही कार्य करें मन पड़ा रहना चाहिए वैुंठ लोक में ईश्वर के पास में तो यह उपमा देकर के जब ईश्वर तत्व सिखाते हैं तो वह सीखना बड़ा सहज हो जाता है। तो वैसे ही यहां पर गंभीरानंद जी कहते हैं, पहले तो प्रश्न खड़ा करते हैं कि मनुष्य देवी को मातृ रूप में जननी के रूप में क्यों देखना चाहता है? और फिर यह देवी भी यह अभिलाषा या तो फिर यह मन की इच्छा पूर्ण क्यों करती है? तो इसलिए करती है क्योंकि मनुष्य जननी के साथ में मां के साथ में बड़ा ही परिचित है। कोई भी बच्चा ऐसा नहीं होगा। रेयरली होंगे ऐसे बच्चे जिन्होंने मां का स्नेह मां का प्रेम प्राप्त ना किया हो। तो यदि यह मां का प्रेम है, मां के प्रति हमारा प्रेम, मां के प्रति हमारी श्रद्धा जो है, उसको हम देवी के ऊपर में आरोप करेंगे तो देवी के ऊपर में हमारा प्रेम, श्रद्धा, आत्मीयता, भलोभासा इतना बढ़ जाएगा कि हम सहज रूप से देवी की आराधना करके, उपासना करके देवी का दर्शन प्राप्त कर पाएंगे। देवी का आशीर्वाद प्राप्त कर पाएंगे। तो यह जननी के साथ में हमारा जो संबंध है उसी संबंध को हमको देवी के साथ में देवी के प्रति रिडायरेक्ट कर देना है। ठाकुर कहते हैं ना काम क्रोध वगैरह जाएगा नहीं तो पड़ा रहे साला वो ईश्वर की ओर मुड़ के उसको पड़े रहने दो। यह यदि अहंकार करना है, अभिमान करना है तो यह अभिमान करो कि मैं ईश्वर का सबसे बड़ा सबसे श्रद्धावान संतान हूं। यदि ईर्ष्या करनी है तो इस तरह से ईर्ष्या करो कि मेरा जो मित्र है वह 10,000 जप कर रहा है और मैं मुश्किल से 1000 जप कर रहा हूं तो मुझे भी जप की संख्या बढ़ानी होगी। ये वराह नगर की सुंदर

कहानी: लाटू महाराज छुप कर जप करते है

घटना है कि एक बार शरद महाराज वहां पर तो सभी गुरु भाई एक ही होल में रात में सो जाते थे मिलकर के तो वहां पे एक दिन रात को शरद महाराज ने देखा कि आधी रात को खटखट करके शब्द हो रहा है तो उन्होंने जग सो जग गए सोचा कि स्थाय चूहा आया है किंतु वो जो लटन वगैरह है उसको जला करके देखा प्रकाश में तो चूहा वगैरह कुछ नहीं दिख रहा है और जैसे वो उठे वैसे ही यह शब्द भी बंद हो गया खटखट जो शब्द हो रहा था तो फिर शरद महाराज ने सोचा कि चूहा भाग गया होगा। फिर वह लेट गए। थोड़ी देर के बाद में फिर से यह खटखट करके आवाज हो रहा है। वो फिर से शरद महाराज ने जग करके चारों ओर देखा। देखा कुछ नहीं है। आवाज भी बंद हो गया। सब कुछ शांत है। फिर वह सो गए। फिर से आवाज हुआ। तब शरद महाराज समझ गए कि लाटू महाराज जो है वह जब सब लोग सो जाते हैं तब बैठकर के जप करते हैं माला के ऊपर में और इसका यह आवाज हो रहा है और इतना निरवता से यह जो ठाकुर कहते हैं ना मन में वन में और कोने में साधना करनी है। लोगों को पता नहीं लगना चाहिए कि हम साधना कर रहे हैं। साधना का दिखावा कभी नहीं करना है। तो लाटू महाराज भी जैसे ही शरद महाराज जग जाते हैं तो वैसे ही जपमाला ब साइड में रख के लेट जाते हैं। और जैसे ही शरद महाराज लेट गए फिर से खड़े होकर बैठकर के वह जप कर रहा है। तो शरद महाराज दूसरे दिन कहते हैं कि लाटू साला अभी वो उनकी जो बोलने की स्टाइल थी यह साला लाटू दिन रात भर जप करता है और सोचता है कि हम लोग सोते रहेंगे तो हमसे आगे निकल जाएगा। तब रे साला देखो मैं भी रात को बैठकर के जप करता हूं। तो देखिए यह जप करने में कंपटीशन रात को सोना नहीं है। रात को जप करना है तो आपके भीतर में यदि ईर्ष्या का भाव है, कंपटीशन का भाव है तो फिर इसको आध्यात्मिकता की ओर आप मोड़ लीजिए। तो वैसे ही यह जो भाव हमारे भीतर में ऑलरेडी है इसको ईश्वर अभिमुख कर देना है। जननी के प्रति हमारा प्रेम है। आत्मीयता है तो वही प्रेम और आत्मीयता को हमको देवी के रूप में देवी के प्रति हमको रिीडायरेक्ट कर देना है। मां संतान के गर्भ धारण करेंन एवं प्रस प्रसवते क्रोड़े तुल्या स्तनपान करान मां संतान को गर्भ में धारण करती है और प्रसव होने के बाद में शिशु को अपनी गोद में उठाकर के स्तनपान कराती है। शिशु चखु मेल्या मां के पाए स्नेहो पुष्टि तुष्टि सौंदर्य पालन प्रवृत्ति गुण राशि एकमात्र आकर रूपे शिशु जब आंख खोलता है तब वह मां को प्राप्त करता है स्नेह पुष्टि तुष्टि सौंदर्य और पालन प्रवृत्ति गुण राशि के एकमात्र मूर्तिमंत रूप में शिशु को खाना भी तो मां ही खिलाती है। शिशु को स्नेह भी मां करती है। शिशु का लालनपालन भी मां करती है। उसको शिक्षा भी वही देती है। उसको डांटती भी वही है। शिशु के लिए जो सबसे सौंदर्यवान कोई है तो वह अपनी मां ही है। तो यह जितने भी गुण है स्नेह, तुष्टि, पुष्टि, सौंदर्य, पालन यह सभी गुण जैसे कि शिशु को अपनी मां के भीतर में मूर्ति मंत देखने को मिलते हैं। साधन क्षेत्र साधक ताई जगदंबा के देखी ते चाय इ हारई पराकाष्ठा रूपे साधन क्षेत्र में इसीलिए साधक देखना चाहता है जगदंबा को इन सब गुणों की पराकाष्ठा के रूप में मां जगदंबा ही हमारा लालनपालन करती है। उनके स्नेह से ही हमारा आध्यात्मिक विकास होगा। वही हमारा आध्यात्मिक परिपोषण करती है। वही हमको काम, कांचन, तमस, रजस रूपी जो राक्षस है उनसे हमारा बचाव करती है। उनसे हमारी रक्षा करती है। तो यह जितने और हमारे लिए मां का सौंदर्य ही देवी का सौंदर्य ही सबसे बड़ा सौंदर्य है। तो यह जो सर्वश्रेष्ठ गुण है वह सब हम देवी के रूप में जननी रूपी देवी के रूप में देखना चाहते हैं। श्री रामकृष्ण बोलिया छे मातृभाव साधन शेष को था। श्री रामकृष्ण ने कहा है मातृभाव है साधना की आखिरी बात या तो फिर साधना का सर्वोच्च माइलस्टोन सर्वोच्च पड़ाव स्वामी विवेकानंदो ताहार कर्म जोगे बोलिया छे स्वामी विवेकानंद ने भी उनके कर्म योग में कहा है जगते माय स्थान शुक्ले ऊपरे कारण केवल ए अवस्थाए मानुष चरम निस्वार्थ परता आजत करते ओ कारजे प्रकाश करते पारे जगत में मां का स्थान सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसी अवस्था में मनुष्य चरम निस्वार्थता प्राप्त करके और कार्य में प्रकाश कर सकता है। इस जगत में सबसे ज्यादा निस्वार्थ कौन होगा? तो जननी होगी। जननी का संतान के साथ में जो संबंध है, जननी अपने से भूखी रहेगी। संतान को भूखा नहीं रखेगी। जननी अपने से सब कष्ट सहन करेगी किंतु अपने संतान को सभी तरह की सुख सुविधा में लालनपालन करना चाहेगी। जननी संसार के जितने भी ताप है ये सफरिंग्स है वह अपने पर ले लेगी जिससे कि उनका उसका संतान इस शीतल छांव में वह बड़ा हो और उसका विकास हो। तो जननी का संतान के प्रति जो भाव है निस्वार्थता की चरम सीमा है आमी आार बुद्धि के इष्ट विलय पूर्वक एकांत विश्वासो तदाश्रयता सहाय माधुरम चिद्रश आस्वादन करा ज साधके काम होय तबे ईश्वरीय मातृत से अभष्ट प्रदान अमोग शक्ति निहित रहया छे आमी और आार मैं और मेरा इस बुद्धि को इष्ट में विलय करके इष्ट में जिसको कि समर्पित करके एकांत विश्वास और ईश्वर के प्रति आश्रय का सहारा लेकर केुर्यमय रस का आस्वादन करना यदि साधक चाहे तो ईश्वर के मातृत्व भाव में अभीष्ट प्रदान अमोग शक्ति निहित रहया छे इस तरह का रसपान करना चाहे तो ईश्वरीय मातृत्व में यह आशीर्वाद देने की अमोग शक्ति रही है शांतो दास्य बाशलाद ते यथामे अधिकाधिक आत्मीयता बोधे विकास हो शतो किंतु मात्र बखा शितो एकांत निर्भर शिशु तन्मयता बोध ए समस्त के अतिक्रम करिया जाए शांत दास्य और वात्सल्य इन सब में धीरे-धीरे करके आत्मीयता का विकास तो होता ही है किंतु मातु के मां के कोले मां की गोद में बैठा हुआ एकांत संपूर्ण रूप से निर्भर निर्भरशील शिशु की तन्मयता जो है इस सबको अतिक्रम कर जाती है। यहां पे यदि हम एक ऐसे संतान का भाव हम अपने पर आरोप करें जो कि मां की गोद में बैठा हुआ है। मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से वह भरोसा करके संपूर्ण रूप से आश्रित होकर के रह रहा है। जिसको जगत में किसी तरह का चिंता नहीं है। ठाकुर जो

कहानी: माँ भले ही नौकरानी है, पर लड़का उस के पास सुरक्षा चाहता है

उदाहरण देते हैं ना कि वो जो एक सेठ है, एक मालिक है और उसके घर में एक दास है। तो वो जो दास जो है दासी जो है उसका लड़का और मालिक का लड़का इन दोनों में झगड़ा होता है। तो दासी का लड़का कहता है कि मैं अपनी मां को कह दूंगा यदि तुम मुझे मारोगे तो। अभी देखो कि बच्चे को यह समझ में नहीं आता कि उसकी मां जो है वह तो दासी ही है वहां पे। वह सोचता है कि उसकी मां उसको सर्व तरह की आपत्ति से रक्षा करने के लिए समर्थ है। तो यह जो संपूर्ण निर्भरता है, वह संपूर्ण निर्भरता बाकी जितने भी भाव है, इवन वात्सल्य भाव हम यदि बालकृष्ण या रामलल्ला की जो आराधना करेंगे वात्सल्य भाव से इससे भी बढ़कर के जो भाव है हम खुद यदि ये रामल्ला या तो फिर बालकृष्ण होकर के मां यशोदा के गोद में बैठकर के यदि हम उनके ऊपर में संपूर्ण निर्भरशील होकर रहे तो यह संपूर्ण संपूर्ण निर्भरशीलता, संपूर्ण श्रद्धा का जो भाव है उन सबसे सर्वश्रेष्ठ है। यह पैसेज और भी बहुत लंबा है और इस पैसेज को लेकर के और भी बहुत सारा डिस्कशन करना है जो कि अभी हम आने वाले क्लास में करेंगे। जी ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: नौकरानी के बेटे को जल्द ही एहसास हो जाएगा कि उसकी माँ उसकी रक्षा नहीं कर सकती। इसलिए वह जल्द ही निराश हो जाएगा।

एक्चुअली मैं कहूंगा कि नौकरानी वाला जो उदाहरण है ना इट्स अ परफेक्ट फिट किस तरह से क्योंकि गंभीरानंद जी आगे कहते हैं कि जिस भाव के साथ में हम फमिलियर है उसी भाव को हमको देवी पे आरोप करना है तो वह हमारी साधना में बड़ा ही सहायक होगा। अभी हम मान लीजिए कि मैं इवन सेठानी का लड़का हूं तो मुझे एक बात तो समझ में एक समय तो मुझे यह समझ में आना चाहिए कि यह जो मेरी मां है जागतिक जगत में कितनी ही पावरफुल होगी। आध्यात्मिक जगत में वह मेरी बहुत ज्यादा सहाय नहीं करने वाली है। तो उस समय उनके ऊपर में से मेरी जो यह जो आराधना का जो प्रवाह है वो मेरी जो दे गर्भधारिणी मां है उससे हटाकर के मुझे यह जो देवी मां है मां शारदा देवी मां काली उनके प्रति प्रवाहित करना होगा। यह कब होगा? जबकि मुझे यह समझ में आएगा कि मेरी मां की जो देहधारणी गर्भ दायिनी मां जो है उसकी एक लिमिटेशन है। वो लिमिटेशन जब तक मुझे समझ में नहीं आएगी तब तक मैं अपनी जो श्रद्धा है उसको रीडायरेक्ट नहीं कर पाऊंगा। यह जो काम क्रोध है ठाकुर कहते हैं काम क्रोध को रीडायरेक्ट कर दो। किंतु वो मैं कब करूंगा? तो मुझे वो तब जब समझ में आएगा तब तो करूंगा कि यह काम क्रोध मेरे लिए खतरनाक है। वो यदि समझ में नहीं आएगा। मैं यदि राजा का लड़का हूं। मैं यदि गुस्सा करता हूं तो देखोगे कि राजा का लड़का गुस्सा करता है तो उसको कोई कुछ कहने नहीं सकता है। उसको कोई डिसिप्लिन नहीं करने वाला है। उसका जो बेड टेंपर है वह बढ़ता ही जाएगा। बढ़ता ही जाएगा। ये जो हम इतिहास में पढ़ते हैं ना जितने भी मुगल राजा हुए क्या किया? अपने पिता का वध करके राजा हो गए हैं। क्यों? क्योंकि वो जो काम, क्रोध ये जो डिजायर है इतने स्ट्रांग हो गए हैं कि उसको कंट्रोल करने वाला कोई नहीं। इस काम क्रोध के वश में आकर के अपने आत्मीय जन का भी वध करने को यह लोग तैयार हैं। तो हमको तो सबसे पहले यह समझ में आना चाहिए काम क्रोध गलत है तभी तो मैं उसको रीडायरेक्ट करूंगा। तो जब तक मुझे यह नहीं समझ में आएगा कि मेरी मां की लिमिटेशन है तब तक मैं उसको देवी के प्रति रीडायरेक्ट ही नहीं करूंगा। इन दैट सेंस अह शेठानी का लड़का होना इट इज़ अ इन अ वे लायबिलिटी क्योंकि बहुत लंबा समय लग जाएगा यह सो समझने में कि मेरे मां-पिताजी धनवान चाहे कितने भी हो परलोक जो है उसमें वो कुछ काम का नहीं है। इन दैट सेंस जो नौकरानी का लड़का है। बड़ा जल्दी उसको समझ में आ जाने वाला है कि मेरी मां जदा रक्षा नहीं करने वाली है। यदि रक्षा चाहिए मुझे तो राजराजेश्वरी त्रिभुवन की जो देवी है उनके पास में मुझे जाना होगा। सो दैट इज वन

प्रश्न: ईश्वर के आध्यात्मिक ऐश्वर्य को समझे बिना हम स्वयं को उसकी आराधना करने के लिए कैसे प्रेरित कर सकते हैं?

थिंग। दूसरा कि आपने जो कहा ऐश्वर्य का चिंतन इन अ वे मैं इसको ऐश्वर्य का चिंतन नहीं कह के क्योंकि क्या है ना वो तो फिर वो तो ऐसा हो गया कि मेरी कामना वासनाओं की पूर्ति मेरी मां नहीं कर पा रही है। तो मैं देवी के पास में जाता हूं। तो आध्यात्मिक जगत में भी वही भाव लेकर के मैं जाता हूं। तो वह तो किसी काम का नहीं है। यह रीडायरेक्ट जो है दोनों तरह से होना चाहिए। एक तो मुझे यह अंदाज एक समझ में आनी चाहिए बात कि मेरे मां-पिता इस जगत में चाहे मेरी कितनी भी संभाल रखे परलोक में संभाल नहीं रख पाएंगे। यह एक अंडरस्टैंड मतलब डीपली समझ में आना चाहिए। दूसरा है कि मैं ईश्वर के पास में से वही चीजें नहीं मांग रहा हूं जो कि मैं मेरे जागतिक जो रिलेटिव है उनके पास में से मांग रहा हूं। ईश्वर के पास में मैं ज्ञान भक्ति वैराग्य मांग रहा हूं। तो यह जो ज्ञान, भक्ति, वैराग्य की इच्छा जब तक मेरे मन में ना आए तब तक वह आध्यात्मिकता के रास्ते पर मैंने कदम लगाया ही नहीं है। यह बहुत अब जैसे बहुत सारे जगह पे आप जाएंगे वो श्रीफल वो ऑफर करते हैं। वो दोरा धागा ऑफर करते हैं। पूजा ऑफर करते हैं मंदिरों में। क्यों? कामना पूर्ति के लिए। अभीष्ट पूर्ति के लिए। अभीष्ट पूर्ण के लिए कि घर में बीमारी है ठीक हो जाए। प्रमोशन चाहिए वो मिल जाए। शत्रु है उसका कुछ बुरा हो जाए। यह करना है, वो करना है। यही सब अब अब जैसे देखिए थोड़ा सा कंट्रोवर्शियल मैं कहूंगा एक बात कि जो कि हमारे पॉपुलर तीर्थ स्थान है वहां पे लोग ज्यादातर लोग क्यों जाते हैं कि बहुत आप देखेंगे कि यह कोई तीर्थ स्थान है। लाखों हजारों हजारों भक्त आए हैं। क्यों? क्योंकि सुना जाता है कि उस तीर्थ स्थान पर जाकर के हम जो मांगते हैं मिल जाता है। इसलिए वहां पर जाते हैं। जबकि ऐसे तीर्थ है जैसे कि मैं एक उदाहरण देता हूं नागपुर के पास में रामटेक बोलकर के एक जगह है। तो वहां पे एक बार हम लोग गए थे पहाड़ जैसा है और भगवान राम ने वहां पे निश्चय किया था कि टेक यानी कि प्रतिज्ञा ली थी मां सीता को छुड़ाने की रावण के चंगुल से। एक यही स्टोरी है मोस्ट प्रोबेबबली। तो उसके वजह से वहां का नाम है रामटेक। तो वहां पे कुछ-कुछ जगह मैंने देखी एकदम वीरान सी है। छोटा सा मंदिर है वगैरह। कोई ऐसा कोई आता जाता नहीं है। और वहां पे बैठ के मैं थोड़ा सा ईश्वर चिंतन करता था। मुझे इतना अच्छा लगता था। अभी वहां पे कोई नहीं जाएगा। क्यों? वहां पे यदि आप जाना है तो आपके मन का भाव यह चाहिए कि मुझे ईश्वर पे सिर्फ श्रद्धा भक्ति चाहिए और कुछ नहीं। राइट? तो आप देखिए कि पॉपुलर तीर्थ स्थान है जिसकी महिमा या तो फिर जिसके ऐश्वर्य के बारे में सबको पता है वे लोग जाएंगे तो सही किंतु एक दूसरे भाव से जाएंगे। सो दोनों से हमको मुक्ति पानी है। ईश्वर का जो ऐश्वर्य है उसका चिंतन जब तक नहीं छोड़ेंगे तब तक हम आध्यात्मिकता के रास्ते पे आगे बढ़े ही नहीं है। दैट इज ट्रू। दैट इज ट्रू। देखिए कि ठाकुर के पास में इतने कम लोग क्यों आते हैं? कंपेयर टू आपने कहा ना कि दूसरी दूसरे जगह पर जाते हैं तो इतने सारे लोग होते हैं क्योंकि ठाकुर का जो ईश्वर्य है ठाकुर मां स्वामी जी का तो अभी छोड़ दे अभी एटलीस्ट ठाकुर और मां का जो आध्यात्मिक ऐश्वर्य है उसके बारे में जनसाधारण में इतनी जागृति नहीं है बोलकर के यहां पर कम लोग आते हैं किंतु जो लोग एक बार आते हैं तो वे लोग यदि कंपैरेटिव एनालिसिस करेंगे तो समझ जाएंगे कि यहां पे जो आध्यात्मिकता की डेप्थ है वो कितनी गहन है। देखिए मुझे भी यह सब प्रश्न एक बार कभी-कभी होते थे कि यहां पे ज्यादा लोग क्यों नहीं आते? स्पेशली बीइंग ए गुजराती किंतु आप बेंगल में जाएंगे जहां पे ये ऐश्वर्य आध्यात्मिक ऐश्वर्य का प्रचार अच्छे से हुआ है। वहां पे मैंने जैसे कहा तीन फेस्टिवल है। एक तो कुमारी पूजा है। एक तो अपना कल्पतरु उत्सव है। वहां पे काशीपुर में कुमारी पूजा बेलूर मठ में और ठाकुर का पब्लिक सेलिब्रेशन वो भी बेलूर मठ में। यह तीन उत्सव आप देखिए कितने हजारों हजारों लोग आते हैं। 1 लाख से ज्यादा हो जाएंगे लोग। सो वहां पर क्योंकि ठाकुर और मां बंगाली थे। बंगाल में ज्यादा उनका ऐश्वर्य का प्रचार है बोल के आते हैं। यह देखिए कि ठाकुर और मां को प्रॉपर ट्रांसलेट करना प्रॉपर लोकल लैंग्वेज में इसको बताना यह भी एक बहुत बड़ी बात है।

प्रश्न: स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक पहलू पर कोई बात क्यों नहीं करना चाहता?

देखिए स्वामी जी के बारे में कोई बोलना नहीं चाहता। ऐसा नहीं है। प्रॉब्लम यह है ना कि स्वामी जी ओवर एक्सपोज हो गए हैं। देखिए मैं आपको एक फनी इंसिडेंट बताता हूं। एक महाराज जी के साथ में मेरा डिस्कशन हो रहा था। उस समय मैं राजकोट में था और पब्लिकेशन मेरे हाथ में था तो मैंने सोचा कि स्वामी जी ने जो आध्यात्मिक जो उनके जो चिंतन है खास करके वेदांत योग और स्पिरिचुअल माने नॉट फिलॉसोफिकल बट स्पिरिचुअल इन जनरल जो कि हमको ठाकुर और मां के बारे में देखने को मिलता है फनी एंड स्पिरिचुअल माने आनंददायक वगैरह-वगैरह ऐसा एक कंपाइलेशन में करूं तो मैं एक स्वामी जी के साथ में मैं बात कर रहा था तो उन्होंने मुझे बताया तुमको ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा ऐसा देखो उनका तो ज्यादा ज्यादा पेटियोटिक और इंडिया के रिलेटेड ही ज्यादा है तो तुमको ऐसा मिलेगा नहीं बहुत कुछ तो तुम्हारा किताब तो छोटा ही बनेगा। मैंने कहा महाराज क्या बात कर रहा है? ऑलरेडी मैंने स्वामी जी के 1000 कोटेशन कलेक्ट किए हैं। उसमें वन थर्ड आर रिलेटेड टू दिस सॉर्ट ऑफ हायर स्पिरिचुअल आइडियाज। तो वो आश्चर्यचकित हो गए। अच्छा वन थर्ड 1000 तुमने जो कलेक्ट किए तो तुमने कोई पर्टिकुलर किताब में से किए होंगे। इसलिए जैसे कि स्पिरिचुअल टॉक्स है या तो फिर स्वामी शिष्य संवाद जिसमें कि इस तरह का स्पिरिचुअलिटी ज्यादा देखने को मिलता है। इसलिए मैंने कहा नहीं रैंडमली मैंने चैप्टर सिलेलेक्ट किए कर्म योग में से दो चैप्टर ज्ञान योग में से दो कर्म लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में से दो यानी लेटर्स कुछ 15 20 हमने कॉम्प्रहेंसिव सिलेक्शन किया है स्वामी जी के वर्क्स का उसमें से मैंने देखा कि वन थर्ड के आसपास में प्योर स्पिरिचुअलिटी के ऊपर में स्वामी जी के विचार है। सो महाराज इतने आश्चर्यचकित हो गए थे। तो ये ये जो बात है ना कि स्वामी जी इस ओवर एक्सपोज्ड एज अ प्रोफेट पेट्रियोट। किंतु स्वामी जी एज अ स्पिरिचुअल साधक स्वामी जी एज अ ऋषि यह बात आपकी सही है कि यह पार्ट भी उसको अच्छे से हमको एक्सपोज करना चाहिए।

प्रश्न: आमतौर पर हम शक्ति को अवतार के अधीन मानते हैं।

यह जो आपका बात है ना आई एग्री विद यू। देखिए मैंने जैसे शुरू में से ही कहा था कि यह जो पैसेज है ना गंभीरानंद जी का जिसको कि अभी हमको पूरा पढ़ना बाकी है और काफी डिस्कशन करना है। इसका जो हार्ट यही है कि मां शारदा देवी को हम उस परंपरा से वैष्णव परंपरा से नहीं देखते। वैष्णव साहित्य में जिस तरह से मां सीता का स्थान है, मां राधा का स्थान है या तो जनरली इन दोनों का राम और कृष्ण अवतार में यह स्थान शायद अगेन यह अपना स्पेकुलेशन है। ठाकुर के बारे में कुछ भी डेफिनेटिवली कहना माने वो बहुत सारे वो आपको केवियाट लगाने पड़ते हैं। बहुत सारी आपको वो डिस्क्लेमर देने पड़ते हैं। तो विथ ऑल दोस डिस्क्लेमर्स इन प्लेस मेरा जो पर्सनल मानना है कि मां का स्थान रामकृष्ण संघ में वह वाला नहीं है जो मां सीता या मां राधा का था। यहां पे हम परंपरा जो हम फॉलो कर रहे हैं वो शक्ति परंपरा है। जैसे मां काली या मां दुर्गा का जो पृथ्वी पर अवतरण हुआ उसको आप किसी भगवान के साथ में पुरुष के साथ में आप नहीं जोड़ेंगे। वो एक इंडिपेंडेंट अवतरण था। तो मैं जभी मेरा जो पर्सनल एक कन्विक्शन हुआ है डेवलप अभी पिछले कुछ सालों में कि आप रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास कीजिए। देखिए कि पहला पीरियड है ठाकुर का 1836 से 1886 और उसके बाद में स्वामी जी का। किंतु बाद में अंतिम पीरियड आता है मां शारदा देवी का। जैसे कि मां शारदा के लिए स्वामी जी और ठाकुर ने पूरा एक मैकेनिज्म बना करके गए हैं। जिसको कि मां कंट्रोल करेगी। रामकृष्ण संघ का जो मतलब चरम जो है शिखर उस पे मां शारदा देवी विराजमान है। मां का जो 20 साल है उसने रामकृष्ण संघ को फॉर्म किया है। नहीं के स्वामी जी या तो ठाकुर के आइडियाज ने। आप देख लीजिए कि रामकृष्ण संघ के साधुओं का हमारा जीवन ठाकुर और स्वामी जी के जीवन के साथ में कहीं पर मेल नहीं खा रहा है। ना ही हम ठाकुर की तरह तपस्या करते हैं ना ही स्वामी जी की तरह वो जो गांव-गांव शहर-शहर जाकर के वेदांत प्रचार करते हैं। हमारा लाइफ क्या है? एक आश्रम में रहते हैं। विद इन दैट आश्रम एक ब्रदरहुड है। इस ब्रदरहुड को लेकर के हमको रहना है। यह जो सोशल लाइफ है रामकृष्ण मिशन का यह हमारा फाउंडेशन है। फिर आप इधर-उधर जाइए, भाव प्रचार कीजिए। किंतु मेनली है कि एक ऑर्गेनाइजेशन है। एक कॉरपोरेट बॉडी है। ये कॉरपोरेट बॉडी एक अब एक एंटी इंडिपेंडेंट एंटिटी के रूप में कार्य करती है। तो ये हु रिप्रेजेंट दिस सोशल बॉडी? जैसे हमने डिस्कस किया कि मनुष्य की ईश्वर के साथ में जो ये जो है रिलेशन द इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी इट इज रिप्रेजेंटेड बाय श्री रामकृष्ण। ये जो सिविलाइजेशनल स्टडी है हायर फिलॉसोफिकल थिंकिंग आर्ट कल्चर क्रिएटिविटी इट इज़ रिप्रेजेंटेड बाय स्वामी जी। बट द सोशल एस्पेक्ट इट इज रिप्रेजेंटेड बाय श्री मां शारदा देवी। आज हमारे जीवन में सबसे बड़ा तथ्य क्या है? व्हाट इज द बिगेस्ट फैक्ट इन माय लाइफ? एज ऑफ टुडे ना ही मैं ठाकुर की तरह प्रचंड साधना करता हूं। ना ही स्वामी जी की तरह बुद्धिमत्ता है ना ही उनकी तरह मैं पूरे विश्व में जाकर के यह सब कर रहा हूं। मेरा फैक्ट ऑफ लाइफ है यह संघ संघ में मुझे जो स्थान है जो मुझे रोल दिया गया है वह मुझे प्ले करना है और मेरे साथ में जो रहते हैं यहां के जो बड़े महाराज हैं या तो फिर मेरे जो मेरे साथ वाले जो साधु हैं मेरे जो जूनियर है उनके साथ में जो मेरा रिलेशन है बहुत हद तक मेरी पीस ऑफ माइंड डिटरमाइन करते हैं। यदि उनके साथ में अच्छा नहीं बनेगा तो मेरी पीस ऑफ माइंड गायब हो जाएगी। फिर वो ठाकुर और स्वामी जी वहां पर हेल्प करने को नहीं आने वाले हैं। सो यह जो डे टू डे लाइफ है हम लोगों का इट इज कंप्लीटली डिटरमाइन डिटरमाइंड बाय श्री मां शारदा देवी इन दैट सेंस कि मां का जो जीवन है मां का जो कार्य है उसको हमको एक ये काली और दुर्गा यह जो पूरी भावधारा है शक्ति साधना उसके माध्यम से देखना होगा नहीं कि वैष्णव भावधारा के माध्यम से कि यहां पर मां का स्थान इस सबोर्डिनेट टू श्री रामकृष्णा इसके बारे में और भी बहुत सारे विचार है कि किस तरह से यह भाव डेवलप हुआ। खास करके हिस्टोरिकल जो कि हम करेंगे। मेरा भी इतना कोई नॉलेज नहीं है। मैं भी धीरे-धीरे इसको एक्सप्लोर कर रहा हूं। क्योंकि क्या है कि हम सभी लोग जो हैं खास करके जो नॉन बेंगली है हमने वैष्णव भाव तो हमको समझ में आता है कि अवतार आते हैं गीता पढ़ी है थोड़ा बहुत भागवत थोड़ा बहुत रामायण देख लिया है वो टीवी के ऊपर में वगैरह-वगैरह तो वो तो आईडिया समझ में आते हैं किंतु ये शक्ति साधना का जो डेवलपमेंट है उसमें भी मां का जो रोल है इट इज समथिंग यूनिक कि जिसको कि हमको समझना होगा तो