प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः मां शारदा का जीवन और उनकी लीला इसका हम पाठ कर रहे हैं स्वामी गंभीरानंद जी महाराज की पुस्तक में से
माँ सारदा की संतान प्राप्ति की इच्छा
ऑलरेडी कल हमने देख लिया कि किस तरह से मां के जीवन में जैसे कि सभी स्त्रियों के हृदय में होता है संतान प्राप्ति की स्प जागृत हो गई है। अभी गंभीरानंद जी महाराज मां के जीवन को दो हिस्सों में बांट के कहते हैं जब छोटी बालिका होती है तो उसके भीतर में वह करुणा तो होती है किंतु बहुत बार ऐसा होता है कि इवन इस बच्ची को भी पता नहीं है कि वह करुणा या ममता या प्रेम जो है वह उसके भविष्य के आने वाले संतान के लिए है। इसलिए यह बच्ची उसके हृदय की जो करुणा है उसके आसपास में चारों ओर जो लोग रहते हैं उन सबके प्रति यह करुणा प्रकाशित होती है और जब एक उम्र आ जाती है जब एक सर्टेन एज होती है तभी यह करुणा उसको संतान प्राप्ति की इच्छा के रूप में उसके हृदय में प्रकट होती है। तो यह बात हमने ऑलरेडी कल देखी और हमने यह भी देख लिया कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज इस पूरी बात को हमारे सामने रखते हैं कि अड़ोस पड़ोस के जो लोग हैं वह मां को कहते हैं कि यदि कोई स्त्री उसको संतान नहीं होता है तो किसी भी तरह के शुभ कार्य में वह आगे पढ़कर के हिस्सा नहीं ले पाएगी। तो यह भी हमने कल देखा और साथ में ही श्यामा सुंदरी देवी श्री मां शारदा देवी की मां उनको यह दुख करते हुए सुना कि मेरी बिटिया शारदा उसको कोई संतान भी नहीं होगा और फिर उसको मां बोलकर के पुकारने वाला भी कोई नहीं होगा। जब इस तरह से श्यामा सुंदरी देवी को बात करते हुए ठाकुर ने सुना तो ठाकुर ने क्या कहा आप इसके लिए थोड़ा सा भी चिंता मत कीजिए मैं आपकी बिटिया शारदा को इस तरह से रत्न छेले अर्थात कि इस तरह से सुंदर मैं सब पुत्र पुत्रियां देकर के जाऊंगा और इतने सारे देकर के जाऊंगा कि सर काटकर के तपस्या करने पर भी इतने बच्चे नहीं मिलते किसी को और इवन एक समय ऐसा आएगा कि मां मां की पुकार सुनकर के मां शारदा अस्थिर हो जाएगी। तो यह सब कहानियां भी हमने कल देखी। अभी थोड़ा सा आगे देखते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं। मां शारदा का ही वचन हम कल देख रहे थे। थोड़ा सा मैं फिर से रिपीट कर देता हूं। लोके कथा सुनते सुनते माय मने की भावे संतान लाभेश प्रहा जागरितो होलो ता तनी स्वयं बोलिया छे लोगों की बात सुनते सुनते किस तरह से मां शारदा के मन में संतान प्राप्ति की आकांक्षा प्रकट हुई जागृत हुई यह बात मां शारदा स्वयं कहती है क्या कहती है मे दे काछे कामार पुुरे आर एकने खाली सुनत स्त्रियों के पास में कामार पुकुर में भी और यहां पे भी लोग जो बोलते थे वह सुनती थी क्या छेलेर मां ना होले कोनो काज से में मानुष कोते पारेना यदि कोई बच्चे की मां ना हो तो वह स्त्री कोई भी कार्य न कर पाएगी बांझ कोनो शुभ काजे एो होते पारेना जो संतान हीन स्त्री है किसी भी शुभ कार्य में आगे बढ़कर के भाग नहीं ले पाएगी आमी तो कौन मैं मानुष छिलू मैं उस समय बच्ची ही थी वही सब कथा सुनते-सुनते अमार मने दुख हो तो यह सब बातें सुनते-सुनते मेरे मन में दुख होता ताई तो एकटा छले वो अमार होबे तभी तो क्या मुझे एक संतान भी नहीं होगा क्या दक्षिणेश्वर गिथाटा एक बार मने पड़े जब मैं दक्षिणेश्वर आई तो एक बार मेरे मन में यह बात प्रकट हुई कि क्या मुझे एक संतान भी नहीं होगा क्या जे दिन मने होबा क के किशु बोली नहीं जिस दिन यह बात मेरे मन में आई थी कि क्या मुझे एक भी संतान नहीं होगा उस दिन मैंने यह बात किसी को बताई नहीं थी। ठाकुर आप ना होते बोल ले। ठाकुर ने अपने से ही बोलना शुरू कर दिया। अभी देखिए ठाकुर तो है अंतर्यामी लोगों के मन की बात को समझते हैं तो उन्होंने यह इमीडिएटली समझ लिया कि हां मां के मन में संतान प्राप्ति की स्पान प्राप्ति की आकांक्षा जागृत हुई है। तो यह अंतर्यामी ठाकुर लोगों के मन को परखने वाले श्री रामकृष्ण उन्होंने यह बात समझ ली और बिना किसी प्र्प आजकल का प्र्प जो होता है ना कि हम एआई को प्र्प करते हैं तो फिर एआई उत्तर देता है तो यहां पे भी किंतु ठाकुर उत्तर देते हैं बिना किसी प्र्प के वो सीधा हमारा मन समझ लेता है तो अपना होते ही अपने से ही बोलने लगे तो भावना की शेर तुमको चिंता किस बात की है तो एम शोभ रत्नो छले दिए जाबो माथा केटे तपस्वी करो मानुष पायना तुमको इतने सब रत्न संतान देकर के जाऊंगा कि सर काटकर के तपस्या करने पर भी मनुष्य इस तरह के संतानों को प्राप्त नहीं करता है। इतने सुलक्षण इतने सुकृतिन इतने सत चरित्रवान इतने सत संस्कारवान पुत्र पुत्रियां मैं तुमको देकर जाऊंगा कि कोई मां जितने जन्मों तक तपस्या करके भी ऐसे संतानों को प्राप्त नहीं करेगी। देखिए भुवनेश्वरी देवी की कथा भुवनेश्वरी देवी को पुत्र संतान चाहिए था। तो उन्होंने फिर वहां पर वीरेश्वर शिव के पास में मन्नत रखवाई थी। तो उससे क्या हुआ? उनको एक पुत्र संतान प्राप्त हुआ जो थे नरेंद्र स्वामी विवेकानंद। तो देखिए कि कितना यह सद्भाग्य था भुवनेश्वरी देवी का। आपका कितना तपस्या होने से, आपके चरित्र की शक्ति होने से, आपके भीतर में सत्व का गुण होने से किसी भी मां-बाप को नरेंद्र जैसा स्वामी विवेकानंद जैसा पुत्र संतान प्राप्त होता है। तो ठाकुर कहते हैं कि देखो भुवनेश्वरी देवी को तो तपस्या करनी पड़ी। तब कहीं जाकर के यह नरेंद्र जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। किंतु मैं तुमको एक नरेंद्र नहीं ऐसे 100 नरेंद्र देकर के जाऊंगा। और बात भी सही है। देखिए कि स्वामी जी है, लाटू महाराज है, फिर यह गंगाधर महाराज है, योगेंद्र महाराज है, हरि महाराज है। और फिर कितने ही बाद में यह क्वालपाड़ा के संतान जो त्यागी संतान मां के पास में आए थे। बेलूर मठ से जब जितने भी सन्यासी हैं सब तो मां को अपनी जननी के रूप में स्वीकार करते थे। उनको श्रद्धा करते थे। तो भुवनेश्वरी देवी को एक नरन प्राप्त हुआ। मां को तो उस तरह के 100 नरन प्राप्त हुए। और इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि सर काटकर के तपस्या करने पर भी मनुष्य को इतने सुंदर सुकृतिन सत चरित्रवान संतान प्राप्त नहीं होंगे इतने संतान मैं तुमको देकर के जाऊंगा पर देखवे बाद में देखना ये तो छेले तो मां बोले डाकबे तो शामलाो भार होए उठवे बाद में देखना इतने सारे पुत्र संतान तुमको मां मां मां बोल के पुकारेंगे कि तुमको इनको संभालना मुश्किल हो जाएगा।
उत्पात मचाने भक्तों के प्रति माँ सारदा की करुणा की कहानियाँ
तो देखिए कि बात भी सही है। बाद में क्वालपाड़ा के दिनों की कहानियां, उद्बोधन की कहानियां, जयराम भाटी की कहानियां जैसे-जैसे हम सुनते जाएंगे, वैसे वैसे पता चलेगा कि मां के पास में यह जो त्यागी संतान है, भक्त संतान है, वह आते थे। आकर के मां के प्रति अपनी श्रद्धा भी जागृत करते थे। किंतु साथ-साथ में ही इस तरह की हरकतें कभी-कभी कर लिया करते थे कि मां को भी उनको संभालना मुश्किल हो जाता। एक दिन की घटना है कि एक लड़का मां के पास में आया। आकर के मां को विनती करके कहता है कि मां मैं तुमसे दीक्षा प्राप्त करना चाहता हूं। आप मुझे दीक्षा दीजिए। तो मां ने पता नहीं उसका संस्कार देखा ना कि क्या देखा। मां ने स्पष्ट मुंह पर बोल दिया कि तुम्हारी दीक्षा नहीं होगी। तुम जाओ यहां से। तो यह लड़का बेचारा इतना आघात उसको हुआ कि मां ने एकदम मुंह पर मना कर दिया। स्पष्ट रूप से मना कर दिया कि मुझे दीक्षा नहीं देगी। क्या मेरा चरित्र इतना खराब है? क्या मेरे संस्कार इतने खराब है? बोलकर के यह लड़का जो है इतना दुखित हो गया। इतना डिस्पर्ड हो गया कि वह मां के घर के सामने जो वरांडा है वहां पर बैठकर के वह रोने लगा और रो रहा है रो रहा है रो रहा है अभी किस संतान की रुलाई जो है वो मां को सहन होगी मां उसकी रोदन सुनकर के उसका रोना सो के सुनकर के मां अस्थिर हो गई और उन्होंने क्या किया मां ने एक त्यागी संतान को बुलाया कहा कि उसको बोलो कि यहां पर बैठा-बठा बेटा रो रहा है। मैंने तो उसको बोल दिया कि दीक्षा नहीं होगी। फिर भी क्यों रो रहा है? बोलो उसको चला जाए यहां से। ऐसा करके मां ने कहा। अभी यह त्यागी संतान है जो कि ये एक्चुअली कहानी बता रहे हैं हमको। तो वह जाकर के इस लड़के को मिलने को गए। जाकर के कहते हैं कि अब अब देखिए वो उनको ड्यूटी क्या दी गई है? ड्यूटी दी गई है उस लड़के को वहां से भगाने की। यह स्पष्ट रूप से मां का आदेश है कि उसकी दीक्षा नहीं होगी। वह बैठे-बैठे रोए और रो के मां को वहां पर अस्थिर करें। ऐसा नहीं चलेगा। वो यहां से जाए। यह बोलने की यह त्यागी संतान की ड्यूटी है। तो यह महाराज जी जाकर के लड़के को बोलने तो गए किंतु यह लड़का इस तरह से रो रहा है। जैसे कि उसका हृदय ही टूट गया है। जैसे कि उसके जीवन का अंत आ गया है। जैसे कि उसके जीवन में अभी अंधेरे के अलावा और कुछ नहीं है। अभी उसके सामने एक ही उपाय है। वह है मृत्यु। ऐसा बोल म इस तरह से यह लड़का रो रहा है तो फिर यह त्यागी संतान है महाराज जी है वह भी उनका भी हृदय विगलित हो गया वो भी बेचारे कुछ बोल नहीं पाए बोले सोचे कि किस तरह से इस लड़के को मैं यहां से भगाऊं तो वह सोच रहे हैं उसी समय उन्होंने देखा कि यह जो लड़का है उसका रोदन सुनकर के उसकी रोने की आवाज सुनकर के मां इतनी अस्थिर हो गई है कि वह अभी अपने कमरे में शांति शांति से बैठ नहीं पाई है। अभी मां ने पहले तो क्या किया था? लड़के ने जब रोना शुरू किया था अपने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था। आप यदि जय राम भाटी गए होंगे तो आपने देखा होगा कि यहां पे मां की वो पुराना घर नया घर नहीं पुराना घर। तो यहां पे मां की कुटिया है। मां की कुटिया के सामने वो दरवाजा है। दरवाजे के सामने वो वरांडा है। तो वो वरांडे में वो बैठकर के लड़का रो रहा है। तो उसको रोते हुए सुनकर के शुरू में तो मां ने दरवाजा बंद कर दिया। जैसे कि वह सुन ना पाए। सुनकर के फिर क्या है कि मां का हृदय है। कुछ भी कर सकती है मां। तो मां ने दरवाजा बंद किया था। वो थोड़ा सा खोल के एक आंख से दरवाजे में से देख रही है। देखिए कितना सुंदर एक दृश्य है कि जिस लड़के को मां ने भगा दिया वो लड़के की रोदन सुर करके रुलाई सुनकर के मां रह नहीं पा रही है। दरवाजा थोड़ा सा खोल कर के जैसे छोटी बच्ची होती है ना छोटी बच्ची को आप ऐसा कहें कि ये खिलौना है या टीवी आजकल के युग में कि उसको बोलेंगे कि टीवी नहीं देखना है जाओ अपने कमरे में जाकर के पढ़ाई लिखाई करो तो ये छोटी बच्ची का जो मन है वो पूरा वो टीवी में जो कार्टून चल रहा है उसके ऊपर में है तो अभी वह बच्ची क्या करेगी उसको आपने उसके कमरे में भेज तो दिया है पढ़ाई लिखाई करने के लिए किंतु जब टीवी चालू है कार्टून चल रहा है तो यह बच्ची थोड़ा सा दरवाजा खोल के एक आंख से वह कार्टून देखेगी। उसकी इच्छा वो पढ़ाई लिखाई में बिल्कुल नहीं है। वो टीवी में जो चल रहा है पूरा उसके ऊपर है। तो ये कितना एक सुंदर दृश्य खड़ा होता है। यहां पे भी मां भी वो अभी अपने कमरे में बैठकर के खाना बनाना है। जो भी घर का काम करना है। उसमें मां का मन स्थिर नहीं हो पा रहा है। अपने कमरे का दरवाजा थोड़ा सा खोल करके एक आंख से वह एकदम स्थिर दृष्टि से उसको देख रही है। बिल्कुल बालिका की तरफ। तो यह त्यागी महाराज जी जो है उन्होंने देख लिया कि मां इसको देख रही है रोतेरोते जो रो रहा है तो महाराज श्री समझ गए कि हां अभी मां का हृदय जो है वह पिगलित हो गया है वह करुणा से द्रवित हो गया है जो भी इस बच्चे के कुस संस्कार होंगे जो कि दीक्षा लेने के लिए आया था उसके जो भी उसके मन की वासनाएं होगी उसके ऊपर में जो भी तमस का आवरण होगा वह सब यह रोते-रोते सब धुल गया है। मां की कृपा प्राप्त करने की उसकी जो आकांक्षा व्याकुलता इतनी प्रचंड है कि उसने इस लड़के के संस्कारों को एकदम शुद्ध निर्मल कर दिया है। तो यह महाराज जी समझ गए तो वह अभी कुछ बोल नहीं रहे हैं। अभी वह वैसे ही उनकी इच्छा नहीं थी कि लड़के को यहां से भगाए और वह भी देख लिए कि अभी मां भी छुप-छुप करके इसको देख रही है। यानी कि अभी वह मामला पलटने वाला है। तो फिर वह त्यागी संतान भी थोड़ा सा दूर चले गए और फिर मां ने उनको वहीं से इशारा करके बुलाया और कहा कि ठीक है एक काम करो लड़के को बोलो कल सुबह तैयार रहे मैं उसको दीक्षा दे दूंगी तो देखिए यह जो ठाकुर जो कहते हैं कि मैं तुमको इतना इतने सारे पुत्र पुत्री संतान देकर के जाऊंगा कि जब आखिर में एक दिन ऐसा आएगा आज तुम यह व्याकुल होकर के आकांक्षा कर रही हो कि कोई मुझे मां करके पुकारे कोई ऐसा संतान हो जिसके प्रति मैं अपना स्नेह है। अपनी करुणा है। उसको मैं धावित कर सकूं। आज तुम ऐसा सोचती हो एक दिन किंतु आएगा। इतने संतान तुमको मां-मा करके पुकारेंगे और ऐसी सब उटपटांग हरकतें करेंगे कि तुम त्रस्त हो जाओगी। उनको संभालना मुश्किल हो जाएगा। तो बाद में इतनी इस तरह की इतनी सारी कहानियां है जो कि हमको सही में लगते हैं। किंतु देखिए एक बात है भले ही चाहे यहां पर ठाकुर कहते हैं कि तुमको अपने संतानों को संभालना मुश्किल हो जाएगा और भले ही चाहे हम इतनी इतनी ही सारी कहानियां पढ़ते भी हो कि जब अपने संतानों की यह जो उटपटांग हरकतों से मां भी थोड़ी सी परेशान हो जाएगी। किंतु आखिर में तो देखिए कि मां का हृदय जो है वह इतना विशाल है कि यह जो लड़के लड़कियां भक्त जो भी है त्यागी संतान है वह आकर के कितना भी उत्पात क्यों ना मचाए कितनी ही परेशानी क्यों ना खड़ी करें आखिर में तो मां के हृदय में सबके लिए स्थान है ही है। एक लड़का जयराम बाटी में आया। मां को बड़ा ही श्रद्धा पूर्ण प्रणाम किया और फिर किंतु इसका दिमाग जो था ना बड़ा ही वो हाई टपर था। फट करके नाराज होता था। फट करके गुस्सा हो जाता था। तो फिर यह लड़का अभी मां के सामने तो उसने ऐसा कुछ गड़बड़ किया नहीं। किंतु मां ने जब कहा कि जाओ कामार पुकुर दर्शन करके आओ। तो एक दो भक्तों के साथ में वह कामार पुकुर गया। कामारपुकुर में ऐसा हुआ कि वहां पर कोई महाराज जी थे तो उसके साथ में इसका कोई छोटी सी बात को लेकर के झगड़ा हो गया। तो जैसे ही झगड़ा हुआ तो यह लड़के का दिमाग तो गर्म था। वो बड़ा ही शॉर्ट टेंपर था। उसने भी चिल्ला चिल्ला करके महाराज जी के साथ में झगड़ा कर दिया और इतना उत्तेजित होकर के यह सब झगड़ा करने लगा। तो अभी यह बात यह वरदा मामा अर्थात कि मां के छोटे भाई तो वर्दा मामा वहां पे थे। उन्होंने कामार पुकुर से जयराम भाटी आकर के मां को बता दी। अभी यह लड़का वापस आया जयराम भाटी। वहां कामारपुर में तो झगड़ा करके आया है। तो जय राम भाटी वापस आया। आकर के फिर वहां पर जगदात्री पूजा थी तो यह अच्छा सु गायक भी था। अच्छा सिंगर था। तो जगधात्री पूजा में उसने मां के सामने गीत गाना शुरू कर दिया। अभी वह गा रहा है, गा रहा है। मां भी यहां पर बैठकर के सुनती है। अभी जब गीत समाप्त हो गया, फिर मां ने इस लड़के को बुलाकर के कहा कि बेटा तुम्हारा बड़ा आनंद का भाव है। मैं देख रही थी। इतना आनंद पूर्वक तुम मां का गीत गाते हो। तो इसी तरह से तुम हमेशा आनंद में रहना। और एक बात याद रखना कि कभी भी साधुओं के साथ में उनका अपमान करके बात ना करना। क्योंकि साधु लोग जो होते हैं बड़े पूजनीय होते हैं। यदि उनका अपमान करोगे तो बड़ा ही तुमको तकलीफ का सामना करना पड़ेगा। तो अभी यह स्मृति कथा जो है उस लड़के ने स्वयं लिखी है। तो वह लड़का कहता है कि आखिरी तक मुझे मां की यह बात स्मरण रही है। तो देखिए कि मां को सब तरह के वो झमेलों का सामना करना पड़ता था। यह लड़के यदि आकर के उसको मां को परेशान नहीं करेंगे तो जाकर के और किसी को परेशान करेंगे। तो फिर अभी क्या है देखिए कि साधुओं के साथ में झगड़ा करने से तो फिर भक्त का ही तो अकल्याण होगा। तो फिर उसको उस तरह से भी संभालना है कि तुम मेरे साथ में यदि दुर्व्यवहार ना करो तो इवन साधुओं के साथ में भी मत करो। तो ये सब कुछ मां संभाल लेती थी। आराम से संभाल लेती थी। की मां का जो हृदय है वो इतना विशाल था और एक दिन की घटना है जयराम भाटी की ही बात है कि एक लड़का एक भक्त मां के पास में आया दीक्षा लेने के लिए तो अभी हुआ ऐसा कि उस समय मां बहुत ही बीमार थी और अपने कमरे में लेटी हुई जय राम भाटी की ही बात है। तो अब जैसे यह भक्त आया तो उसने अभी जो बाहर में तो यह सब महाराज जी बैठे होंगे त्यागी संतान बैठे होंगे पहरादारी करने के लिए चौकीदारी करने के लिए तो वह लोग बैठे थे तो यह भक्त ने कहा कि मां के पास जाना है। मां का दर्शन करना है। मां से दीक्षा लेनी है। तो फिर इन्होंने कहा कि देखिए मां बहुत बीमार है। आप एक काम कीजिए कुछ समय के बाद में आइए। तो अभी यह भक्त था वह थोड़ा सा नाराज हो गया। बोला कि मैं इतने दूर से आया हूं। मां का दर्शन करना है। दीक्षा लेनी है। तुम लोग कौन होते हो मुझे यह कहने वाले कि मां मुझे दीक्षा नहीं देगी। मुझे मां का दर्शन करने दीजिए। वो यदि कहेगी नहीं देनी है तो वो तो अलग बात है। अब मुझे मां का दर्शन भी नहीं करने देंगे। यह कौन सी बात हो गई? बोल करके वह चिल्लाने लगा। वो चिल्ला रहा है तो यह त्यागी संतान भी चिल्ला रहे हैं। सामने दोनों का झगड़ा चालू हो गया। अभी देखिए मां अपने कमरे में बीमार होकर के लेटी हुई थी। उसने यह पूरा झगड़ा देखा। तो अभी देखिए जब आदमी बीमार होता है तो पहनने के कपड़े का इतना कुछ ठिकाना नहीं होता। बाल भी इस तरह से बेर बिखेर पड़े होते हैं। उसका जो अपीयरेंस जो होता है, पूरा जो दिखाव होता है, वह भी तो वो जनरली हम सुस्त होते हैं तो स्नान वगैरह करके अपने को प्रॉपर प्रेजेंटेबल स्टेट में रखते हैं। बाल को भी ठीक रखते हैं। कपड़े भी ठीक रखते हैं वगैरह-वगैरह। किंतु जब बीमार होंगे, हाथ पैर हिलाने की भी परिस्थिति नहीं है। कपड़ों का भी कौन ठिकाना रखेगा? चेहरे का भी कौन ठिकाना रखेगा? बाल का भी कौन ठिकाना रखेगा? तो मां बेचारी ऐसी ही पड़ी हुई थी। किंतु जब मां ने बाहर में यह झगड़ा होते हुए सुना तो कष्ट करके खड़ी हुई अपनी बेड में और दरवाजा बंद था। खोलकर के बाहर आई। पूरी अस्त-व्यस्त है। बाल बेर बिखेर है। वस्त्र भी ऐसे हो गए हैं अव्यवस्थित। वो आकर के मां कहती है जो त्यागी संतान झगड़ा कर रहे हैं तो उनके ऊपर में गुस्सा करके कहती है कि तुम लोग क्यों झगड़ा कर रहे हो बिना मतलब वो मुझे मिलने के लिए आया है मेरा दर्शन करने के लिए आया है आने दो मेरे पास में मैं डिसाइड करूंगी कि किसको दीक्षा देनी है नहीं देनी है किसको दर्शन देना है नहीं देना तुम लोग कौन होते हो बीच में आने वाले तुम मानक मां का इस तरह का अपीयरेंस और जो गुस्सा करके वो [हंसी] बोल रही है सब त्यागी संतान चुप हो गए और यह जो भक्त भक्त था। उसने जाकर मां का दर्शन किया। तो देखिए कि भले ही चाहे मां इनको इस तरह से तकलीफ का सामना करना पड़ता हो। भले ही चाहे यह भक्त है वह मां के सामने आकर के उटपटांग हरकतें करते हो। उत्पात मचाते हो। मां को परेशान करते हो। किंतु मां का हृदय है वो इतना विशाल है। मां का जो प्रेम है करुणा है वो महासागर की तरह है। उसके भीतर में ऐसे हजार पत्थर भी डाल दे तो भी मां का जो करुणा रूपी महासागर है उसमें सब समा जाएंगे। तो यह बात ठाकुर के साथ में मां
माँ सारदा के प्रथम शिष्य-संतान -- प्रेम और करुणा की शुरुआत
की हुई। इसके बाद में गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं? अनादि काल हो ते मानुष संतान लाभ जन आकांक्षा चोलिया आशीते छे अनादि काल से संतान प्राप्ति के लिए मनुष्य की यह आकांक्षा चली आ रही है ठाकुर देह त्यागे पूर्वे श्री मां मा डाकेर आशीवाद किछु किछु पया छिलेन शत ठाकुर के देह त्याग से पहले ही श्री मां मां मां शब्द की पुकार उसका आस्वादन जो है थोड़ा थोड़ा सा प्राप्त किया था यह बात सत्य है किंतु ताहा संतान कामना ताहात ते तृप्त होए ना किंतु उनकी संतान कामना है वह इससे तृप्त नहीं हुई थी जब ठाकुर थे पंचमहाभूत के देह में पृथ्वी पर सदेह लीला कर रहे थे उस समय मां जब नहबत में निवास कर रही थी। उस समय मां को मां बोलकर के पुकारने वाले जो जो महिला भक्त है यह त्यागी संतान है। उन्होंने मां को मां पुकार करके बोलना शुरू तो किया था। अब योगेन मां है, गोलाप मां है, बाकी जो स्त्री भक्त है, उसके बाद में यह जो बूढ़ो गोपाल फिर लाटू महाराज जो कि मां के पास में ठाकुर ही उनको ले आए थे। सभी त्यागी संतानों का मां के साथ में इस तरह से वार्तालाप का वैसा कोई रिलेशन नहीं था। किंतु एटलीस्ट लाटू महाराज को तो ठाकुर ले आए मां के पास में कहा था कि ये बड़ा शुद्ध सात्विक लड़का है। रोटी बनाने के लिए जो आटा बनाना है रोटी के लिए वो यह बना देगा तुमको हेल्प करेगा। और बूढ़ो गोपाल महाराज थे स्वामी अद्वैतानंद जी वो मार्केटिंग वगैरह बाजार में जाकर के परचेस कुछ करना है तो वह यह कर देंगे। तो इस तरह से ठाकुर इनको ले आए तो थे किंतु सभी त्यागी संतानों के साथ में मां का वार्तालाप का यह रिलेशन नहीं था। इस बात का प्रमाण हमको उस बात उस कहानी से मिलता है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जब यह वृंदावन वगैरह तीर्थ यात्रा के लिए गई थी तो यह योगेन महाराज है वगैरह काली महाराज वगैरह त्यागी संतान मां के साथ में थे और यह योगेन मां वगैरह स्त्री भक्त भी मां के साथ में थी तो उस समय यह ठाकुर ने मां को स्वप्न में आकर के दर्शन देकर के कहा कि यह छेले जोगिन जो है अभी यह देखिए योगिन महाराज और योगिन मां यह दोनों का तो सेम नाम है। तो मां उनको किस तरह से वो ये करती थी डिफरेंशिएट करती थी छेले जोगेन और मे जोगेन अर्थात कि यह पुत्र योगगेन और कन्या योगेन इस तरह से मां उनको डिफरेंशिएट करती थी। तो ठाकुर ने आकर के कहा कि यह जो योगेन है उसकी दीक्षा अभी नहीं हुई है। तुम उसको दीक्षा दो। तो मां कहती है कि मां ने पहले यह जब सप्न देखा तो मां उसके ऊपर में ज्यादा ध्यान नहीं दिया। क्यों? मां सोच रही है कि अभी तो ठाकुर की महासमाधि हुई है और अभी मैं यदि दीक्षा देना शुरू कर दूंगी तो लोग बोलेंगे कि अभी तो महासमाधि के बाद में फौरन मां ने ही गुरुगिरी शुरू कर दी। ऐसा लोग कहेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा। बोलकर के मां कुछ बोल नहीं रही है। किंतु ठाकुर बार-बार सपने में आकर के मां को बता रहे हैं। तो मां ने सोचा अभी ठाकुर की इच्छा है तो उसको तो पूर्ण करनी पड़ेगी। तो मां ठाकुर को कहती है कि मैं तो उसके साथ बात नहीं करती। तो मैं किस तरह से उसको कहूं? तो ठाकुर ने कहा कि तुम यह जो योगिन मां है मैं योगेन अर्थात कि कन्या योगेन उसको बोलो। वह जाकर के वह जो पुत्र योगेन है उसके साथ बात करेगी। तो फिर मां ने ये योगिन मां के थ्रू योगिन महाराज को मैसेज पहुंचाया कि ठाकुर ने मुझे तुमको दीक्षा देने को कहा है। तो योगिन महाराज कहते हैं ठाकुर ने मुझे भी स्वप्न में आकर के यह बात कही है किंतु मुझे आपके साथ में बात करने का साहस नहीं हुआ बोलकर के मैं कुछ बोल नहीं रहा था। तो अब दोनों ओर से यह मिल जाता है कनेक्शन। तो फिर बोल के मां ने योगेन महाराज को दीक्षा दी थी। तो देखिए कि यह जो त्यागी संतान है वैसे तो मां को मां बोलकर के ग्रहण कर लिए थे। उनके प्रति श्रद्धा भक्ति संपूर्ण हो गई थी। ठाकुर के बाद में ही ठाकुर की महासमाधि के बाद में जो गुरु और इष्ट रूपी सिंहासन ठाकुर ने जो खाली किया था उसी सिंहासन पे मां को विराजित किया था। किंतु मां के साथ में ये जो डायरेक्ट वार्तालाप है वो सभी लोग करते नहीं थे। कुछ ही चिन्हित भक्त ही जो कि थे ठाकुर के द्वारा चिन्हित जो कि मां के साथ में आकर के वार्तालाप करते थे। प्रश्न होगा कि त्यागी संतानों को मां के साथ में बात करने से क्या दिक्कत है? किंतु देखिए कि ठाकुर किस तरह से मां का कल भी हमने यह डिस्कस किया था कि एक नरेंद्र है नरेंद्र का जो पूरा ट्रेजेक्टरी है महाशय आपने ईश्वर दर्शन किया है वो प्रश्न पूछने वाला नरेंद्र से वो वही मेरे हाथ कहां है मेरे पैर कहां है वो काशीपुर में जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है वो नरेंद्र तो वो नरेंद्र का जो पूरा ट्रेजेक्टरी है वो सबकी नजरों के सामने वो पसार हुआ है। सबने इसका दर्शन किया है। धन्य हुए हैं। किंतु मां का जो ट्रेजेक्टरी है पूरा कि किस तरह से मां ठाकुर के साथ में विवाह की थी। उस समय मां की छोटी उम्र थी। वहां से प्रारंभ करके वो मां के वो जय राम बाटी के दिन विवाह के बाद के विरह के वो दिन वो दिनों की घटनाएं। फिर दक्षिणेश्वर आकर के यह शोडशी पूजा का यह पूरा यह जो घटनावली उसके बाद की यह जो पूरी वार्ता कहानी कि किस तरह से मां धीरे-धीरे करके अपने संतानों का भार स्वीकार करने के लिए जिम्मा स्वीकार करने के लिए तैयार होती है। यह पूरी घटनावली लोगों की नजर से अलग होकर के लोगों की नजर से बाहर में एक पूरा सीक्रेटिवली यह मां का जीवन जो है ठाकुर घड़ करते थे और इसके पीछे ठाकुर का ही वो एक सेंटेंस है। ठाकुर कहते हैं कि वह शारदा सरस्वती इसीलिए उसको सजना धजना अच्छा लगता है। और इस बार अपने सौंदर्य को ढक करके आई है। छुपा करके आई है। क्यों? क्योंकि जब लोग अशुद्ध नजरों से अशुद्ध मन से मां का दर्शन करेंगे तो उन्हीं का अकल्याण होगा। बोलकर के मां ने अपना सौंदर्य इस बार छुपा के रखा है। तो वो एक बात थी कि भक्तों का अकल्याण ना हो इसके लिए जब तक एक सर्टेन एज नहीं आ जाती है। एक सर्टेन एक मैच्योरिटी एक स्पिरिचुअल स्टेटस मां का स्पिरिचुअल स्टेटस की क्या बात करेंगे? वो तो पहले से ही जन्म से ही नारायणी थी। किंतु क्या है? एक उम्र अपना कार्य करती है। तो एक सर्टेन एज जब आ जाती है तब तक मां को भक्तों के सामने भक्तों के साथ में वार्तालाप करना, भक्तों को जनरली दीक्षा देना यह सब नहीं करना था। बोलकर के ही ठाकुर ने बीच में नरेंद्र को लेकर के आए थे। इसीलिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में नरेंद्र का गुरु भाव पर्व प्रारंभ होता है स्वामी विवेकानंद का और 1902 में स्वामी विवेकानंद की महासमाधि होती है। उसके बाद में ही मां का गुरु भाव पर्व प्रारंभ होता है। 1902 से लेकर के हम कहेंगे 1920 तक की यह घटनावली है मां के गुरु भाव की। तो इसके पीछे में देखिए कि ठाकुर का कितना डीप कैलकुलेशन सब रहता है। तो यहां पे भी देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि यह जिस तरह से ठाकुर ने मां को छुपा करके रखा था। इसकी वजह से ठाकुर के रहते-रहते और इवन स्वामी विवेकानंद के रहते-रहते मां ने मां नाम की पुकार वैसे सुनी तो थी। अल्पसंख्यक संतानों के पास में से किंतु इससे भी उनकी यह जो संतान प्राप्ति की आकांक्षा है वह पूर्ण नहीं हुई थी। संतान प्राप्ति की उनकी इच्छा उनकी आकांक्षा बढ़ती ही जा रही थी और वह आकांक्षा तभी पूर्ण होगी जब स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव समाप्त होगा और मां का गुरु भाव पर्व प्रारंभ होगा। इसके बाद में ही इन जनरल जो संतान वगैरह और उसके बाद में भी देखिए रिस्ट्रिकशंस बहुत सारी थी। जब कोई पुरुष भक्त मां के पास में आते हैं प्रणाम करने के लिए उद्बोधन में खास करके तो वह जब मां को प्रणाम करते हैं और मां को कोई प्रश्न करते हैं और ऐसा था कि मां कमरे के भीतर में बैठी हुई है और वह फिर पुरुष भक्त जितने भी हैं कमरे के बाहर से ही दरवाजे की चौखट से ही प्रणाम करेंगे और यदि उनको कोई प्रश्न है तो वह प्रश्न करेंगे तो गुलाब मां यहां पे वो [हंसी] चौकीदार की तरह खड़ी है वह वहां पर भैरवी की तरह वो वो प्रश्न है वह मां को बताएगी फिर मां बड़े ही मृदु स्वर से उस प्रश्न का उत्तर देगी तो फिर यह गुलाब मां है फिर उच्च स्वर से वो पुरुष भक्त को बताएंगे कि आपका जो प्रश्न है उसका उत्तर मां ने इस तरह से दिया है [हंसी] मां के साथ में इवन दो मां को साक्षात प्रणाम कर भी रहे हैं किंतु मां के साथ में डायरेक्ट वार्तालाप नहीं हो रहा है। जो वार्तालाप हो रहा है, वह गुलाब मां के थ्रू ही हो रहा है। और इसीलिए कुछ-कुछ भक्त समझ गए थे कि यह उद्बोधन में यह सब समस्या है तो यह सिस्टम को गेम करना है। कैसे भी करके मां के साथ में डायरेक्ट वार्तालाप करना है। तो क्या करें? तो कितना ही कष्ट चाहे भले ना हो जय राम भाटी जाएंगे और वहां पर मां के साथ में बात करेंगे। वहां पर मां जैसे अपने घर की मां है वहां पर इस तरह का रिस्ट्रिक्शन नहीं कि हम लोग बात करेंगे फिर प्रश्न करेंगे। फिर मां मृदु स्वर से उत्तर देंगी। फिर और कोई वहां पर खड़ा होगा। वो चिल्ला करके उत्तर देगा। यह सब बीच में कोई इंटरमीडियरी नहीं है। बीच में कोई ट्रांसलेटर नहीं है। बीच में कोई चौकीदार नहीं खड़ा है। मैं हूं और मेरी मां है। तो देखिए कि ये मां का जीवन का यह जो पूरा ट्रेजजेक्टरी है वो ठाकुर ने किस तरह से डिजाइन करके गए थे। तो इसीलिए यहां पे
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद कामारपुकुर में माँ सारदा : तपस्यामय दिन और मातृत्व की आकांक्षा
गंभीरानंद जी कहते हैं कि ठाकुर के देह त्याग के पहले श्री मां मां नाम की पुकार वैसे उन्होंने सुनी तो थी किंतु इससे भी उनकी संतान कामना तृप्त नहीं हुई थी। माए श्री मुखे आमराश अतृप्ति परिचय पाई मां के श्री मुख से ही हम उस अतृप्ति का परिचय प्राप्त करते हैं। क्या कहती है मां जोखन ठाकुर चोले गले एका बोसे भाव तुम जब ठाकुर चल बसे थे ठाकुर की महासमाधि हो गई थी तब मैं अकेली बैठी-बैठी सोच रही थी सोचती थी तखन कामार पुकुरे रहे छ उस समय में कामार पुकुर में थी कामार पुकुर के दिनों की घटना तो हमको पता है कि मां के जीवन के सबसे ज्यादा तपस्यामय दिन जो थे वह कामार पुकुर के थे किंतु यहां पर भी देखना है देखिए यह तपस्या हमको तो बाहर से दिखती है ना भीतर में क्या लीला चल रही है क्या आनंद के स्फूरण हो रहा है किसको पता वो ठाकुर की वो फेमस वो जो इच्छा थी ठाकुर ने एक बार कहा था कि देखिए हम सब की तो एक ये होता है ना ड्रीम होता है कि मुझे किस तरह का एक आइडियल लाइफ व्यतीत करना है। हम सबका एक ड्रीम रहता है। एक समय था मैं एस्ट्रोनॉट होना चाहता था। जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब फिर एक समय था कि मैं आइंस्टाइन जैसा साइंटिस्ट होना चाहता था। तो यह सब मेरे ड्रीम्स थे, एस्पिरेशंस थे। तो यहां पर ठाकुर के भी ड्रीम्स और एस्पिरेशन थे। क्या था ठाकुर का ड्रीम? ठाकुर कहते हैं कि मैं एक लंबे बालों वाली बाल विधवा होना चाहता हूं। मेरे एक छोटे से गांव में रहूंगी। मेरी एक कुटिया होगी और फिर मैं मेरे घर में वह भगवान कृष्ण का एक शराइन होगा। वो भगवान के सामने मैं जो भी है यह भोग वगैरह अर्पण करूंगी। मेरे पास में एक छोटा सा बागान होगा। इस छोटे से बागान में मैं यह जो भोग वगैरह बनाना है उसके लिए सब्जियां उगाऊंगी और वे गाय रहेगी। वह गाय जो है वह दूध देगी खीर बनाने के लिए और फिर एक वृद्धा महिला वहां पर रहेगी क्योंकि क्या है बाल विधवा जो है सामाजिक संबंध तो रखने नहीं है बाहर में जाकर कुछ परचेस करना है या रखवाली करनी है वो चौकीदार का काम करना है तो उसके लिए वह गुलाब मां जैसी एक वृद्ध महिला होगी जो कि बाहर का सब कार्य करेगी मैं यह जो बगीचे में से जो ये सब्जी बनती है फल फल बनते हैं। यह गाय का दूध होता है। उसमें खीर बनती है। मैं अपने कमरे का दरवाजा बंद करके ठाकुर के सामने ईश्वर के सामने यह सब भोग रखूंगी और फिर रोती-रोती उनका स्मरण करूंगी और बस इसी में मेरे दिन पूरे हो जाए। तो यह ठाकुर की इच्छा थी। सम हाउ ठाकुर की यह इच्छा ठाकुर का यह जो ड्रीम है वो मां के कामार पुकुर के दिनों में जैसे कि सत्य होकर के हमको दिखता है। वही मां अकेली कामरार पुकुर में रह रही है। वही एक छोटा सा बागान है। वहां पर अपने लिए सब्जी उगा रही है। मां के पास में गाय थी कि नहीं वह भी मुझे एग्जैक्टली याद नहीं। किंतु यह जैसे वृद्ध महिला जो कि उनकी केयर करें तो वैसे ही वहां पर लाहा बाबू की वहां पर जो थी एक लड़की
धर्मदास लाहा की पुत्री प्रसन्नमयी
नाम भूल गया मैं उसका तो जो भी है वो ला बाबू की लड़की उस समय तो वृद्धा हो गई थी किंतु जब ठाकुर वहां पर थे गदाधर जब बालक था तो उसके साथ में खेला करता था तो यह लड़की की ठाकुर के ऊपर में बड़ी श्रद्धा थी तो प्रसन्नमई मोस्ट प्रोबेबबली प्रसन्नमई तो ये प्रसन्नमई की ठाकुर पे बड़ी श्रद्धा थी तो वो वो एक वृद्ध महिला थी मां की केयर करने के लिए। मां कहती है कि मैं तो ये सफेद कलर की किनारी की साड़ी पहनती थी। तो ये हाथों में चूड़ियां वगैरह पहनी है। बाल लंबे रखे हैं। तो फिर यह गांव वाले बोलते थे ये किस तरह की विधवा है? यह विधवा को तो विधवा की तरह रहती नहीं है। ब्राह्मण की विधवा है। तो फिर यह तो समाज के जितने नीति नियम है उसका भंग कर रही है। तो लोगों में मां के प्रति आक्रोश था। किंतु यह प्रसन्नमई के पास में जब यह बात आई तो उसने इमीडिएटली कहा गदाई और गदायर बऊ अर्थात कि गदाई श्री रामकृष्ण और गदाई की पत्नी यह तो देवांशी है। देव के अंश से उनका जन्म हुआ है। उनके प्रति आप इस तरह का क्रोध या अवमानना मत रखिए। तो जिस दिन प्रसन्नमई ने ऐसा कहा तो उसी दिन से वो उनके जमींदार की लड़की है वो उम्र में बड़ी है प्रतिष्ठित है उसका सोशल एक कैपिटल है तो बोलकर के वो वहां पे कामरार कुकुर में ये सब जो मां के प्रति चल रहा था वो थोड़ा सा कम हो गया यह सब चीजें कभी 100% जाती नहीं है वो किंतु एटलीस्ट जो बाहर बाहर से जो उसका यह मैनिफेस्टेशन था वो सब दिखना बंद हो गया तो यहां पे भी वो जो ठाकुर ने वो जो एक वृद्ध महिला अपनी केयर करने के लिए उनको पता था कि इंडियन सोसाइटी में रहना है तो यह सब आपको चाहिए। तो यहां पर मां के पास में गुलाब मां थी। वहां पर वह प्रसन्नमई थी। तो इस तरह से वहां पर वो प्रसन्नमई थी। मां को जब कुछ प्रॉब्लम होता था तो उसके पास में जाती समाधान निकालने के लिए और फिर मां बिकॉज़ के अकेली रहती थी। तो यह क्या करती थी प्रसन्नमई कि एक काम वाली बाई को मां के घर पर भेज देती थी। रात को जैसे कि मां रात को बिल्कुल अकेली ना पड़ जाए। तो रात को मां के साथ में सोने के लिए किसी एक स्त्री को बेच दिया करते थे। तो देखिए कि और फिर मां वहां पर तपस्या करती ही थी। ठाकुर का नाम लेकर के रोती ही थी। और फिर मन के भीतर में आनंद का जो प्रवाह बहता था उसकी तो बात ही क्या करनी। मां जब यहां पे ऐसा कहती है ना कि मैं कामार पुकुर में थी। अकेली अकेली थी। और फिर क्या कहती है आगे छेले नहीं किु नहीं की होबे? मां कहती है कि पुत्र तो है नहीं और भी तो हाथ में कुछ नहीं है तो फिर मेरा क्या होगा? कोई भी स्त्री के मन में विधवा होने के बाद में अकेली जब पड़ जाती है तो यह तो एक भीतर से एक डिप्रेशन जैसा तो आता ही है। तो मां भी बोलती है कि यह पुत्र भी नहीं है और भी तो कुछ नहीं है। पैसा वगैरह तो कुछ है नहीं। ठाकुर का और मां का संसार तो हमेशा से शिव का संसार था और यह मथुर बाबू वगैरह थे वैसे ठाकुर के बड़े धनी ये सब रसददार ठाकुर को पैसा देने वाले ठाकुर की रक्षा करने वाले ठाकुर को केयर करने वाले किंतु ठाकुर में वो जो वर्ल्डली सेंस तो था नहीं ना कि कैसे इन लोगों का बेनिफिट उठा के एक जमींदारी खड़ी कर दे बैंक बैलेंस खैर उस समय तो बैंक नहीं थी किंतु यह सोना मोहर वगैरह गहने हैं जवाहरात है वगैरह एक बनाकर करके अपना भविष्य सुधार दे। यह प्रैक्टिकल सेंस तो ठाकुर में थी नहीं। तो इसलिए मां कहती है कि पुत्र भी नहीं है और भी कुछ नहीं है। की होबे क्या होगा? उस समय एक दिन ठाकुर दिखा दिए बोलले उस दिन एक एक दिन ठाकुर ने दर्शन देकर के कहा भाप छो केनो चिंता क्यों कर रही हो तुम ही एकटी छेले चाछो आमी तोमा के ए सब रत्न छेले दिए गू तुम क्या एक पुत्र की इच्छा रखती हो मैं तुमको यह सब रत्न पुत्र देकर के गया ये नरेंद्र राजा महाराज योगिन महाराज निरंजन महाराज और फिर तो बेलूर मठ में इतने सारे लोग ज्वाइन करने के लिए आने वाले थे। फिर कितने क्वालपाड़ा जाइन करने वाले आने वाले थे। तुम के एब रत्न छले दिए गम तुमको यह सब रत्न संतान देकर के गया। काले कतो के मां मां बोले डाकबे समय आएगा कितने ही लोग तुमको मां मां करके पुकारेंगे। इस बात से मां का हृदय थोड़ा ठंडा हुआ। यह भी एक बात है और दूसरी भी एक बात मां कहती है कि वही कामार पुकुर के दिनों की कि मैं अकेली रहती थी मन में बड़ा ही डिप्रेशन जैसा था कि ठाकुर नहीं है और भी तो कोई केयर करने वाला नहीं है। यह रामलाल दादा जो कि बाद में अपने संग में काफी प्रतिष्ठित हो गए थे। राजा महाराज राजा महाराज की स्मृति कथाएं आप पढ़ेंगे तो राजा महाराज के सेवक जो संतान है सब लोग बोलते हैं कि जब रामलाल दादा आते हैं बेलूर मठ में तो राजा महाराज बड़े ही खुश हो जाते थे और रामलाल दादा को कहते थे दादा उस दिनों की सब बातें उस दिनों के गीत आप गाइए तो रामलाल दादा भी वो ठाकुर के समय के गीत गाते थे और फिर रामलाल दादा और राजा महाराज दोनों फिर गीत के ऊपर में नृत्य भी करते थे तो फिर लोगों को बड़ा आनंद आता था किंतु यही रामलाल दादा है कि जिन्होंने मां मां को जैसे कि एक तरह से नेगलेक्ट करना शुरू किया था। मां उस समय की घटना तो हम सबको याद है। महासमाधि से पहले ही ठाकुर ने रामलाल दादा को कहा कि तुम मां की संभाल रखना तो कामरार पुकुर में रहेगी तो देखना तुम मां को। तो रामलाल दादा कहते हैं कि उसको जहां पर रहना हो रहा है। तो इमीडिएटली ठाकुर समझ गए कि उनकी इच्छा नहीं है मां की केयर करने की। तो साथ-साथ में ही नाराज होकर के उसको डांटने लगे कि तुम पुरुष किस बात के हुए हो। अपने घर की स्त्रियों की संभाल नहीं रख पाते हो तो तो वह भी एक बात है और बहुत बाद में भी मां को यह बात याद थी उद्बोधन में जब तो रामकृष्ण संघ पूरा प्रतिष्ठित हो गया था पूरे संघ की वर्ल्ड वाइड शक्ति उस समय मां के सामने खड़ी थी मां को हेल्प करने के लिए मां की केयर करने के लिए मां के प्रति श्रद्धा भक्ति रखने के लिए पूरा वर्ल्ड वाइड रामकृष्ण मिशन जब खड़ा था उस दिनों में भी मां को यह बात याद थी और मां किसी एक डिवोटी को कहती है कि यह लोग जो है ना रामलाल दादा और लक्ष्मी आज कहते घूमते हैं सबको कि मां हमारी चिंता नहीं करती मां हमारी केयर नहीं रखती किंतु उस दिन भी वो भी एक दिन थे कि मैं जब कामार पुकुर में थी बिल्कुल अकेली थी मेरे पास में किसी भी तरह की सहाय नहीं थी उस समय ये लोगों ने मुझे बिल्कुल तर छोड़ दिया था इन लोगों ने दोनों ने रामलाल दादा और लक्ष्मी दीदी दोनों ने मुझे कंप्लीटली नेगलेक्ट करना शुरू किया था तो मां उस समय में यह बात कहती है। देखिए जब रामलाल दादा यह कंप्लेन करते हैं कि मां हमको देखती नहीं है। उसमें देखने को क्या है? वह काली मंदिर के पुजारी है। उनको तनख्वाह मिलती है, सैलरी मिलती है। वो लक्ष्मी दीदी के खुद के इतने भक्त हैं। भक्त मंडली बना के बैठी है। तो उन लोगों को किस चीज की कमी है? क्या चाहिए उनको मां से? किंतु मन के भीतर में लोभ है ना कि तनख्वाह जो मिलती है मेरी भक्त मंडली जो है यह बार-बार जो बेलुरमठ आते हैं राजा महाराज के पास में से रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट ठाकुर के मानस पुत्र उनके पास में से इतनी श्रद्धा ग्रहण करते हैं किंतु फिर भी मन को तृप्ति नहीं होती कि मां क्यों हमको यह चीज नहीं देती वो चीज नहीं देती मां क्यों हमको बुला करके और ज्यादा सम्मान नहीं देती यह देखिए ये संसारी और यह त्यागी ठाकुर कहते हैं जरा छिलो आपनार तारा होलो पर जारा छिलो पर तारा होलो आपनार जो मेरे अपने थे वह हो गए पराए और जो थे पराए वह हो गए मेरे यह बात ठाकुर काशीपुर में कहते हैं क्योंकि वो बहुत बार यह हुआ ना बात कि कैंसर क्यों हुआ ठाकुर को लोक बाछाय अर्जन लोगों को फिल्टर करने के लिए ठाकुर के पास में आते तो बहुत सारे लोग थे किंतु जैसे कि अभी राजा महाराज के पिताजी राजा महाराज को खुद को तो कोई प्रश्न ही नहीं है कि वो वो तो ठाकुर के प्रति उनकी जो शरणागति किंतु उनके जो पिताजी थे वह जमींदार थे शुरू शुरू में पसंद नहीं करते थे कि अपना लड़का वो दक्षिणेश्वर के पागल परमहंस के पास में जाए किंतु फिर वो एक दो बार आए और उन्होंने देखा कि ये ठाकुर के पास में ये डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट है। ये हाई स्कूल के ये जो टीचर है, हेड मास्टर है, ये सब गवर्नमेंट ऑफिसर है, यह धनी व्यक्ति है। ऐसे लोग ठाकुर के पैर के पास में बैठे हैं। तो तो फिर यह तो बहुत अच्छी बात है। वो तो जमींदार थे। मामला मुकदमा कोर्ट केस यह वो उसमें तो फंसे रहते थे तो उसमें यह जो बड़े-बड़े जो ठाकुर के लब्ध प्रतिष्ठित वो जो भक्त हैं वह उनको कुछ सलाह देंगे अपना कुछ बेनिफिट हो जाएगा इस आशा से यह राखाल महाराज के राजा महाराज के पिताजी ठाकुर के पास में आते थे। तो देखिए जब कैंसर हुआ तो यह फिल्टर होना शुरू हो गया। जो लोग ऐसा सोचते थे कि ठाकुर के पास में तो इतने सारे रसददार है तो थोड़ा बहुत रोटी का टुकड़ा हमको भी मिल जाएगा। तो ऐसा बोल के जो आने वाले थे उन्होंने जब देखा कि खुद को कैंसर हो गया है। खुद का कुछ ठिकाना नहीं। खुद की संभाल नहीं लग पाए तो फिर हमारी क्या संभाल लेंगे? तो बोल के फिर यह दो भाग हो गए। यह जो बहिरंग थे वह निकल गए। जो अंतरंग थे वह रह गए। तो बहिरंग में यह रामलाल दादा थे। हमको स्पष्ट पता है कि जिस दिन ठाकुर की महासमाधि हुई, जिस रात को महासमाधि हुई, उस समय यह त्यागी संतान जो थे, वह ठीक नहीं कर पा रहे हैं कि एक्चुअली ठाकुर गहरी समाधि में चले गए हैं कि या अंतिम समाधि है। यह महासमाधि है। यह समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि ठाकुर का तो था कि जब बहुत ही गहरी समाधि में चले जाते थे तो देह जो है वो निश्चल जड़वत हो जाता था। तो ठाकुर क्या गहरी समाधि में है ना कि वह महासमाधि में है। तो बोलकर के कोई एक मध्य रात को दक्षिणेश्वर गया रामलाल दादा को बुलाने के लिए कि आप आइए और देखिए कि आपको कुछ समझ में आ रहा है कि नहीं। आपने तो ठाकुर का बिल्कुल पहले से ही संग किया है। सेवा की है। आप उम्र में भी बड़े हैं। तो आप आकर के देखिए। तो फिर रामलाल दादा उस दिन आधी रात को काशीपुर गार्डन में आए थे। अर्थात कि वह ठाकुर के साथ में नहीं रहते थे। जबकि ठाकुर को सही-सही में आवश्यकता थी सेवा की। तो देखिए कि उस उसी समय यह सब डिवीजन होना शुरू हो गया था। मां सही में कामार पुकुर में अकेली थी। बिल्कुल कभी-कभी यह निराश हो जाती थी। तो उस समय ठाकुर ने आकर के यह तो कहा पहला यह दर्शन कि तुम एक संतान के बारे में क्या सोचती हो? मैं तुमको इतने सारे संतान देकर के जाऊंगा। यह भी एक दर्शन हुआ। दूसरा एक दर्शन मां को हुआ था। यही बात इसी तरह की बात मां कहती है कि शुरू शुरू में मैं इतनी निराश हो गई थी कामार पुकुर में किंतु फिर बादबाद में ठाकुर के दर्शन की परंपरा प्रारंभ हो गई और मेरा मन आनंद से भर गया। मां स्पष्ट रूप से अपने खुद के शब्दों में यह बात स्वीकार करती है। तो देखिए कि कामार पुकुर के यह दिन जो है ठाकुर का वह जो सपना है कि एक लंबे बाल वाली विधवा होकर के एक छोटी सी कुटिया में रहना एक वीरान जगह पे जहां पर केयरटेकर के रूप में एक वृद्ध महिला हो वो जो कि बाहर का सब संभाले और फिर मैं भोग बना करके ईश्वर का भगवान का अपने घर का दरवाजा बंद करके भोग धराउंगी और रोते-रोते आनंद से भरपूर होकर के अपने दिन बिताउंगी। ठाकुर का वह जो स्वप्न था एग्जजेक्टली वही स्वप्न जैसे कि कामार पुकुर के दिनों में मां का मां के द्वारा यह स्वप्न ठाकुर का साक्षात हुआ था। इसके बाद जो है वह अभी हम कल डिस्कस करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न : हम सभी साधको के जीवन में साधना और क्रमश: आध्यात्मिक विकास देखते है. किन्तु माँ के जीवन में संतानप्राप्ति की आकांक्षा ही ज्यादा दिखती है. ऐसा क्यों?
ये ये बात एक्चुअली आप जो कह रहे हैं ना कंट्रास्ट बिटवीन दूसरे साधक और मां एक्चुअली देखिए कि भारतीय सनातन परंपरा जो है ना उसके भीतर में ही यह कंट्रास्ट है। अभी जस्ट हमने यह आगमनी के गीतों का देखा कि किस तरह से मां पार्वती के साथ में मां शारदा का मतलब ऑलमोस्ट सब मिल जाता है। तो आगमनी के गीत के वो है कि सदानंदर घोर अन्न शून्य सदा के दिए छे तुम्हार नाम टी अन्नदा सदानंद का घर है हमेशा अन्न शून्य फिर भी तुमको नाम दिया है अन्नदा ये हाउ इज दिस पॉसिबल [हंसी] राइट यहां जो मैना है वो बेचारी दुख करके कह रही है कि कहां वो भांगड़ भिखारी अर्थात कि वो भांग पीने वाला भिखारी श्मशान में रहता है उसके साथ में मेरी बिटिया का विवाह करवाया इतनी स्वर्ण वर्णा लाडली मेरी बिटिया कहां वो भिखारी के वहां पे रह रही है। किंतु वो भिखारी जो है वो तो शिव है। म उसका रहते हैं अमंगल से घिरे हुए। फिर भी उनका नाम है मंगलमय। जो उनको पुकारते हैं वह मंगलमय शिव है। सो वो ट्रेडिशन जो है कंट्रास्ट की इट इज राइट एट द फाउंडेशन ऑफ आवर हिंदूज़्म जो कि मां के जीवन में हमको इस तरह से आधुनिक युग में दिखती है। और इसीलिए जब ये लोग कहते हैं कि भांगते आशे नहीं घोड़ते ऐसे ट्रेडिशन को तोड़ने के लिए नहीं आए। वो जो भगवान शिव पार्वती का जीवन था राधा रानी कृष्ण का जीवन जो हमको दिख रहा है भगवान राम सीता का। अभी सीता देखिए कि जगत जननी स्वयं रावण के वहां पर बंदित होकर के बैठी है। अभी ये म सीता को तो छोड़ ही दीजिए। उसकी जो निश्वास है उससे अब जैसे ये कहते हैं ना कि ऐसा इतना बड़ा पराक्रमी रावण तो एक बंदर ने जाकर के वो लंका का दहन कैसे कर दिया? तो लंका का दहन रावण ने नहीं किया। मां सीता के निश्वास से लंका का दहन हो चुका था। बस उन्होंने उसमें यह जलता हुआ चिंगारी डाला है महावीर ने। तो है यहां पर जगत जननी रावण के वहां पर बंदी होकर के बैठी है। सो ऑल दिस कंट्रास्ट आर ऑलवेज देयर विद इन आवर हिंदूइज़्म जो कि ठाकुर और मां के जीवन में इस तरह से दिखते हैं। ठाकुर अधीर हो जाते हैं बीच-बीच में। यह नरन ऐसा बोलता है यह चमगादड़ है। चातक पक्षी नहीं है। वो मां के पास मां काली के पास में जाते हैं। रोते-रोते कंप्लेन करते हैं कि नरेंद्र तो बोल रहा है यह चमगादड़ है। तो क्या तुमने मुझे एक सीधा साधा सरल बालक समझ कर के मां काली तुम मुझे मूर्ख बना रही थी क्या? तो मां ने क्या उत्तर दिया? उसको पता नहीं है। समय आएगा वो भी समझ लेगा। उसकी भी अकल ठिकाने आ जाएगी। बोले रियली ठाकुर स्वामी जी की अक्ल ठिकाने आ गई थी। वो मां काली को स्वीकार कर लिया था। सो दिस कंट्रास्ट इज सो डिलीशियस। देखिए लीला का अर्थ क्या है? सब कुछ यदि एकदम परफेक्ट अबव बोर्ड चलता तो फिर क्या है? इस लीला का ना आस्वादन नहीं आता। हम लीला का चिंतन ही नहीं करेंगे। ठाकुर कहते हैं ना कि जटिला कुटीला क्यों रगड़ होई बोले लीला पुष्टाई होई बोले। अर्थात कि ये जटिला कुटीला क्यों है? जिससे कि क्या होती है? आनंद आता है। टू थिकन द प्लॉट। लीला पुष्टाई का वो इंग्लिश किया है टू थिकन द प्लॉट माने आनंद प्रकट करने के लिए एक तरह का आप मूवी भी देखेंगे उसमें आप विलेन को रखना पड़ेगा कितना ही अच्छा हीरो हो यदि विलेन नहीं है फाइटिंग नहीं होगी तो फिर वो मूवी जो है सक्सेसफुल नहीं होगी। सो दिस इज़ आवर ह्यूमन हार्ट, आवर ह्यूमन साइकोलॉजी कि जहां पे कंफ्लिक्ट दिखता है, जहां पे कंट्राडिक्शन दिखता है और ये कंट्राडिक्शन जब एक डिलीशियस दिखता है तो हमारा मन उसके ऊपर में इजीली आ जाता है। अभी एक डॉक्यूमेंट्री देखिए और एक मूवी देखिए जहां पे हीरो और विलन फाइट कर रहे हैं। हमारा मन किस पे ज्यादा जाएगा? डॉक्यूमेंट्री इज अ फुल ऑफ इंफॉर्मेशन। कि आपको पूरा हिस्ट्री बता रहा है। अब जब रिसेंटली ही मैं एक मथुरा का डॉक्यूमेंट्री देख रहा था। हिस्ट्री चैनल का। अभी उसको मैं देख इसलिए रहा था क्योंकि फोटोग्राफी है बड़ी ही आकर्षक थी। यह विदेशी लोग आजकल ड्रोन से फोटो लेते हैं ना ये वीग्राफी करते हैं। बड़ा सुंदर लगता है। तो वो मैं देख रहा था। कैन जस्ट इमेजिन कि आप मथुरा पे इस तरह का हिस्ट्री चैनल का डॉक्यूमेंट्री देखिए और यह भगवान कृष्ण की लीला का वर्णन सुनिए। महाभारत वो टीवी सीरीज थी। किसका व्यूअरशिप ज्यादा होगा? वो टीवी सीरीज का हजार गुना ज्यादा होगा। रेदर देन द मथुरा के ऊपर में डॉक्यूमेंट्री वहां पर महाभारत का युद्ध है। यहां पर सिर्फ आपको एक ड्राई इंफॉर्मेशन मिल रही है। तो एक्चुअली क्या है? धर्मशास्त्र जो है एज ए इंस्ट्रक्शन मैनुअल हम उसको देखेंगे ना तो प्रॉब्लम क्या है? हमारे में वो क्षमता ही नहीं है इंस्ट्रक्शन का पालन करने की। अभी यह साधन चतुष्टय आपको बता दिया गया है। यह मुमुक्षुत्व है। फिर यह अमूत्र फल भोग विराग है। समाधि षटक संपत्ति है। वो अब अब ठीक है। हमने पढ़ लिया कि थोड़ी ना अपनी कैपेसिटी है उस पर पालन करने की। हमको क्या चाहिए यह लीला का मधुर आस्वादन जिसको कि हम करते जाए करते जाए अपना हृदय निर्मल होता रहे। सो दैट इज व्हाई कि इस तरह का डिलीशियस कंट्राडिक्शन लीला के भीतर में है।
प्रश्न : ठाकुर या स्वामीजी की तरह माँ की साधना का विस्तृत विवरण नहीं मिलता है. अर्थात हम उनके ऊपर ध्यान कर सकते है किन्तु उनकी साधना से कुछ सिख नहीं सकते।
दो बात है। पहले तो जैसे हमने आज देखा कि मां का जो लाइफ है ना बहुत सारा सीक्रेटिव है। उसमें जो मां की जर्नी है वो यदि होगी भी ना तो उसको इतना प्रॉपर एनुमरेशन नहीं किया गया है। जिस तरह से ठाकुर का है। ऑब्वियसली ठाकुर खुद अपनी साधना के बारे में बहुत सारा वर्णन करते हैं और बहुत सारा वर्णन हमको यह हृदय है या वह जो दक्षिणेश्वर के पुराने लोग थे उनसे मिलता है। स्वामी जी का जो ट्रेजेक्टरी है वो जग जाहिर सबकी नजर के सामने वो वर्कआउट हुआ है। जबकि मां को ठाकुर ने पहले से ही इस तरह से वो पर्दे में रखा है कि एक तो जर्नी हमको यदि है भी तो पता नहीं है। प्रॉपर्ली एनुमरेट नहीं हुई है। और सेकंड कि हमको ऑब्वियसली पता है कि तीनों का एक-एक रोल था। ठाकुर का एक अह स्पिरिचुअल फील्ड में मां का कम्युनिटी लाइफ और स्वामी जी का सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट। सो विद इन दिस कम्युनिटी लाइफ मां को एक आइडियल दिखाना था। तो अभी आप एक लेडी को देखिए। अब अब जैसे मैं अपनी मां को ही देखता हूं। मेरी मां का लाइफ क्या है? वह शादी करके वह अब आई अपने घर पे पिताजी के घर। फिर उसका तो वही लाइफ है ना कि बच्चे हुए बच्चों की संभाल लेते-लेते उसका पूरा लाइफ बीता है। किचन में काम किया है। बच्चों की संभाल ली है। एक ट्रेडिशनल हिंदू एक मदर का जो रोल होता है। मां शारदा को वो आइडियल दिखाना था। अभी मेरी मां के लिए यह कोई ऑप्शन नहीं है कि वो साधना करके सिद्धि प्राप्त करें। उसके सामने ऑलरेडी रिस्पांसिबिलिटी आ चुकी है। देखिए ठाकुर के पास में रिस्पांसिबिलिटी कब आई? त्यागी संतानों की संभाल रखने की जबकि उन्होंने साधना में सिद्धि प्राप्त की तब तो वो मथुर बाबू के घर के ऊपर में जाकर के वो पुकार करके कहते हैं तोरा कोथा या चिश आई रे तुम लोग कहां पे हो आओ स्वामी जी को कब यह रिस्पांसिबिलिटी आई जबकि उन्होंने निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर ली ठाकुर की महासमाधि हुई फिर तो यह मठ का जिम्मा उनके सर पर आया जबकि मां को है कि कोई भी किसी की भी मां हो इवन अपनी मां भी कि छोटी उम्र में ही फिर संतान तो हो ही जाते हैं 20 22 साल में वो जो ट्रेडिशनल थी अभी आज की मैं बात नहीं कर रहा जो ट्रेडिशनल हिंदू फैमिली की बात कर रहा हूं तो 20 22 साल में तो संतान हो ही जाते हैं अभी इज इट पॉसिबल फॉर देम कि वो साधना करके सिद्धि प्राप्त करें बच्चों की संभाल कौन रखेगा राइट मेरा एक डिवोटी के साथ में बात हो रहा है एक्चुअली शी इज़ आवर फर्स्ट स्टूडेंट अपना क्लास जो है उसी की वजह से स्टार्ट हुआ तो मैं जब राजकोट में था वो स्वामी जी के वो जो कार्ड कार्ड है कोटेशन मैं सबके साथ शेयर करता था तो वो भी उसको पढ़ती थी वो बीच-बीच में मुझे कॉल करके पूछती थी इसका क्या अर्थ है उसका क्या अर्थ है तो फिर मैंने उसको कहा कि हम थोड़ा सा रेगुलर क्लास करते हैं जिससे कि तुमको अपना उत्तर मिल जाएगा सो दैट वास हाउ आवर क्लास स्टार्टेड अभी उसका क्या प्रॉब्लम है शी इज़ अ मैरिड वूमन उसके दो बच्चे हैं और हमेशा उसके घर में एक डोमेस्टिक प्रॉब्लम चल रहा है डोमेस्टिक प्रॉब्लम जैसे सबके घर में होता है तो अभी वो मुझे बोलती है कि मैं चाहती हूं कि किसी आश्रम में चली चली जाऊं। किंतु मेरे तो दो लड़के हैं। एक बच्चा है, एक बच्ची है। मैं क्या करूं? अभी तो संभव ही नहीं है कि मैं कोई अपनी आध्यात्मिक जीवन में बहुत ज्यादा डीप जा पाऊं। क्योंकि बच्चे का रिस्पांसिबिलिटी ही मेरे सर पर इतना बड़ा है। तो देखिए कि भारत में हिंदू घर में सब तरह की महिलाओं के साथ में यही एक प्रॉब्लम है। आप आध्यात्मिक जीवन का इवन एक कॉन्शियसनेस भी प्रारंभ होता है ना आपका मैरिज हो जाता है। बच्चे हो जाते हैं। अब ठाकुर के जितने भी महिला संतान भक्त हैं सिर्फ उसमें गौर दासी एक ऐसी थी कि जो कि अनमैरिड थी और मोनेस्टिक लाइफ उन्होंने ली थी। बाकी जितने भी आप लेडी डिवोटी ठाकुर की देखिए सब लोग मैरिड है, विधवा है, बच्चे हैं, घर संसार किया हुआ है। उसी के भीतर में उनको रहना है। घर की जवाबदारी लेकर के आध्यात्मिकता करनी है। दिस इज 50% ऑफ इंडियन पपुलेशन। तो उनको भी तो आपको एक कुछ देना है ना। सब यदि ठाकुर और स्वामी जी इनको फॉलो करने वाले पुरुष ही है जो कि उनको फॉलो कर पाएंगे। आप देखिए ना शारदा मठ में आज जाकर के कितनी कम संख्या है वहां पर स्त्रियों की क्योंकि जिस तरह से हिंदू समाज बना है स्त्रियों की एक डेफिनेट एक रोल बना दिया गया है इस रोल के भीतर में उनको आध्यात्मिक जीवन जीना है। सो हु इज देयर रोल मॉडल? ये स्वामी जी और ठाकुर हो ही नहीं सकते कि सब छोड़कर के तपस्या करें, साधना करें और फिर सिद्धि प्राप्त करें, फिर कुछ संसार करें। दिस इज़ सिंपली नॉट पॉसिबल फॉर देम। सो दैट इज व्हाई कि मां रूपी एक रोल मॉडल चाहिए था इन लोगों के लिए। आप अपने घर में ही अपनी ही मां को देखिए। सोच लीजिए कि उससे क्या इस तरह की तपस्या करके फिर हमारी संभाल ले पाती। ये संभव ही नहीं है। देखिए गवर्नमेंट का गवर्नमेंट की जितनी भी स्कीम है वो उसमें क्या कहते हैं कि आप एक लड़के को पढ़ाएंगे तो आप सिर्फ एक लड़के को ही पढ़ाएंगे। आप लड़की को पढ़ाएंगे तो पूरे परिवार को पढ़ाएंगे। कि गवर्नमेंट की सिम ये सब कहती है। देखिए फैमिली मींस लेडी स्त्री है तो फैमिली है। पुरुष लोग तो इधर-उधर अब मां के ही जीवन में सुंदर घटना है। मां जय राम भाटी में है। बीच-बीच में बात चल रही है। कोलकाता जाना है। शरद महाराज पुकार रहे हैं। तो अभी डिबेट चल रहा है मां के सब त्यागी संतानों में। तो एक लड़का बोलता है मां को। मां चलिए ना जाते हैंक जाते हैं। महाराज बुला रहे हैं शरद महाराज। तो माने उसके मुंह पर तो कुछ नहीं बोला किंतु बाद में कहती है एरा होलो नटो सन्यासी उठ बल्ले उठ लो बोलले बोस लो आमा के तो ये सब माया ये थकते हुए माने ये लोग है सब नंगे सन्यासी वो उठा उठ कहने से उठ गए बैठ कहने से बैठ गए तो मुझे तो ये पूरा संसार का झमेला लेकर के देखना है कि यहां से कामर कोलकाता जाऊंगी तो ये राधु है माकू है नलिनी है वो पागली मामी है सबको लेकर के जाना है सबको ले आना है मैं थोड़ी ना फटा करके कि यहां से कोलकाता कोलकाता से जय राम भाटी जाऊंगी।
प्रश्न : माँ सारदा का मातृत्व बनाम आज का feminism
देखिए अभी यह जो पूरा फेमिनिस्ट मूवमेंट है उसका इनडायरेक्ट नेगेटिव इंपैक्ट क्या है? स्त्रियों को पुरुष जैसा होना है। ओके। आप कहेंगे यहां तक तो कोई दिक्कत नहीं है। किंतु अभी आज का जो पूरा जेंडर आईडियोलॉजी है वो भी तो इसी बात पर बना है। यदि स्त्री पुरुष हो सकती है तो पुरुष स्त्री क्यों नहीं हो सकता? अब जैसे ही आपने एक पुरुष ने स्त्री के कपड़े पहन लिए वो उसको स्त्री की बाथरूम में भी जा सकता है। वो स्त्री के प्रजनन में भी जा सकता है। वो स्त्रियों के लिए जो एक्सक्लूसिव स्पेस रखी है, वो पुरुष ने स्त्रियों के कपड़े पहन करके ही डिक्लेअर कर दिया कि मैं अभी फीमेल हूं। मुझे फीमेल एक्सक्लूसिव स्पेस में जाना है। अभी स्त्रियों के लिए बोलने के लिए भी तो ज्यादा कुछ नहीं बचा। उन्होंने ही तो यह फाइट किया है ना कि हमको पुरुष एक्सक्लूसिव स्पेस है। उसमें एंट्रेंस चाहिए। अभी पुरुषों को यहां पे क्यों नहीं एंट्रेंस मिलेगा? ये तो दोनों ओर से होना चाहिए। तो ये जेंडर आईडियोलॉजी इतनी डिस्ट्रक्टिव है कि उसने ये ट्रंप को जन्म दिया। अब डेमोक्रेट अमेरिका में देखिए कि डेमोक्रेट के पास में मुंह दिखाने के लिए कुछ नहीं बचा है। स्त्रियों के स्पोर्ट है। उसमें पुरुष घुस गए हैं। तो अभी इसका जो बैकलेश है उसकी वजह से तो ये ट्रंप जैसा पागल आ गया है ना सबके सर के ऊपर में आकर बैठा है। सो वी विल परफेक्टली राइट कि ये आप ऐसा कहेंगे कि पुरुष एक्सक्लूसिव स्पेस में स्त्रियों को जगह चाहिए। सो रिवर्स विल आल्सो हैपन। यू विल नॉट बी एबल टू से एनीथिंग।
माँ की महिमा - भक्ति का प्राधान्य
और शक्ति को शक्ति ही समझा सकती है। देखिए हम लोग पुरुष लोग जितना ही बातें करें विल ऑलवेज बी अब जैसे अभी डिस्कस जो हुआ हम लोगों का ना एक बायास व्यू रहेगा पुरुषों का हमेशा एक बायास व्यू रहेगा। एक शक्ति ही शक्ति को समझ सकती है। अब जैसे हम लोग स्वामी जी पर जितना कॉन्फिडेंटली बात कर पाएंगे उतना मां के बारे में नहीं कर पाएंगे। व्हिच इज ऑब्वियस। तो आप ही लोगों में से फिर किसी को भविष्य में यह सब जिम्मा लेना होगा। देखिए अनफॉर्चूनेटली मैंने शारदा मठ की कोई भी माता जी को मां के ऊपर में इतना ऑथॉरिटेटिवली बोलते हुए नहीं सुना। दिव्यानंद प्राणा माता जी जो इतनी फेमस है शी ऑलवेज स्पीक्स ऑन वेदांत। वेदांत को छोड़कर के मां के बारे में इतना ज्यादा नहीं बोलती है। व्हिच इज अनफॉर्चूनेट कि वो माताजी को ये लेना चाहिए स्टेप कि मां के जीवन के ऊपर में सिस्टमेटिक रूप से वो एक रिसोर्सेज खड़ा करें व्हिच विल बी फार मोर ऑथेंटिक जो हम लोग करेंगे उससे हजार गुना ज्यादा ऑथेंटिक रहेगा। किंतु देखिए हम लोगों का जो नेचर है कि वह बिंदास बोलते हैं। यही हम [हंसी] बोल के हम बोल देते हैं। तो एक गीत है साध कोरे सीखे छिलाम काव्य रोशो जो कालार पीते पड़े होलाम सब होतो मने साध करके सीखा था जितना काव्य रस काली की प्रीत में पड़कर के होला सब हुआ सब सत्यानाश [हंसी] मेहनत करके जो काव्य रस सीखा था एक बार काली की प्रीत में पड़ा सब हवा उड़ गया हवा में उड़ गया [हंसी] स्वामी जी कहते हैं कि ठाकुर वाज भक्ति आउटसाइड बट ज्ञान इनसाइड एंड आई एम ज्ञान आउटसाइड बट भक्ति इनसाइड यानी कि स्वामी जी को पता है कि ट्रिक क्या है यहां पे ठाकुर को अनुसरण करने से नहीं चलेगा मां को पकड़ना होगा [हंसी] भीतर में तो ज्ञान ही चाहिए आप बाहर में जितना ही भीतर में तो भक्ति ही चाहिए। बाहर में जितना ज्ञान दिखा दे। [हंसी] देखिए अपने ऑर्डर में ज्ञानी और कर्मी ऐसा एक बड़ा नाम देखना है आपको तो एक बहुत बड़ा नाम आपको दिखेगा रंगनाथानंद जी का। माने ज्ञान और कर्मा कौन है जो कि आज रिसेंट हिस्ट्री में रंगनाथानंद जी के साथ में खड़ा है। तो उनके सेवक महाराज एक बार कह रहे हैं कि बहुत लोग बोलते हैं कि रंगनाथानंद जी मंदिर में नहीं जाते। वो पूरा अपने कमरे में जब बेलूर मठ में होते हैं अपने कमरे में ही बैठकर पढ़ाई लिखाई वगैरह करते हैं। वो मंदिर नहीं जाते हैं। किंतु यहां पर सीक्रेट क्या है पता है कि हम ही लोग उनको मंदिर में नहीं ले जाना चाहते। क्यों? क्योंकि एक बार रंगनाथानंद जी को वो लोग मंदिर में ले जाएंगे ना तो फिर वह वहां से बाहर ही नहीं निकलना चाहेंगे। ऐसा हाथ जोड़कर के ऐसा खड़े रहेंगे। समय अवकाश सब भूल जाएंगे। और प्रॉब्लम क्या है? वह तो उस समय प्रेसिडेंट थे। तो प्रॉब्लम यह है कि प्रेसिडेंट का शेड्यूल तो एकदम टाइट रहता है। आपको एक के बाद एक डिग्निटरीज आना शुरू हो जाते हैं। साधु लोग भक्त लोग प्रणाम करने के लिए आते हैं। तो वो शेड्यूल फिर पूरा उनका अस्त-व्यस्त हो जाएगा। फिर उनको आप महाराज को कितना ही रिमाइंड करवाइए ना कि महाराज अभी जनरल सेक्रेटरी महाराज आ रहे हैं। वो कोई डिग्निटरी आ रहे हैं आपको मिलने के लिए। महाराज मंदिर में से निकलना ही नहीं चाहेंगे। इसलिए हम लोग उनको जानबूझ के मंदिर में नहीं ले जाते। यह सीक्रेट है। उनके सेवक महाराज कहते हैं। ओम