प्रार्थना
ओम स्थापकाय यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं। मां के हृदय में मातृत्व की आकांक्षा जब से प्रारंभ हुई प्रकाशित रूप से उस सब कहानियां हम देख रहे थे। अभी आगे पढ़ते हैं। कल ऑलरेडी हमने देख लिया कि किस तरह से मां ठाकुर पहले तो मां अपने मन में सोचती है कि जब मां कामार पुकुर में थी उस समय और तो कोई था नहीं वहां पे। ठाकुर तो पंच महाभूत का जो देह है उसको त्याग करके वह तो चल बसे थे यहां पर मां अकेली है कामार पुकुर में और फिर वह सोच रही थी जैसे कि कोई भी स्त्री के मन में होता है कि अभी तो मैं अकेली हूं मेरी केयर करने वाला भी कोई नहीं है पति भी नहीं है पुत्र भी नहीं है तो फिर अभी मेरे साथ में क्या होगा यह एक सामान्य एक जनरल थिंकिंग जो है कोई भी स्त्री के मन में आ सकता है। तो वैसे ही मां के मन में भी हुआ था। किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि जब ठाकुर ने आकर के एक दिन दर्शन देकर के कहा कि भाप छो केनो चिंता क्यों कर रही हो तुम एकटी छेले चाछो आमी तोमा के ए सब रत्न छेले दिए गू तुम एक पुत्र एक संतान की इच्छा कर रही हो मैं तुमको यह सब रत्न संतान देके गया हूं काले कतोके तोमा के मामा मां बोले डाक बे एक समय आएगा कितने ही भक्त संतान तुम्हारे पास में आएंगे मां मां पुकारते पुकारते तो फिर आखिर में हुआ भी सही ठाकुर की यह भविष्यवाणी किस तरह से फुलफिल हुई थी भविष्य में उसकी तो हमने कुछ-कुछ कहानियां देखी ही देखी किंतु यहां पे गंभीरानंद जी महाराज ठाकुर के रहते रहते ही मां की यह जो अभिलाषा थी मात्र मातृत्व की ठाकुर के रहते रहते कैसे पूर्ण होती है वो हमको कुछ कहानियों से बताते
हिन्दू आध्यात्मिक साहित्य में संस्कृत की महत्ता — और बंगाली रामकृष्ण-विवेकानन्द परम्परा का अमूल्य योगदान
हैं तो उसमें गंभीरानंद जी क्या कहते हैं माय ए अभिलाश एवं ठाकुर ई आश्वास ठाकुर प्रकट लीला काले की परिमाण साफल लाभ करिया छिलो आमरा आपात तो ताई आलोचनाए प्रवृत्त होइया छ मा की यह अभिलाषा एवं ठाकुर का यह आश्वासन ठाकुर की प्रकट लीला के समय में प्रकट लीला काले किस तरह सफलता लाभ किया था उसी के बारे में उसी की आलोचना करने में अभी हम प्रवृत्त हो रहे हैं। ये टिपिकल गंभीरानंद जी महाराज कि ठाकुर की प्रकट लीला काल जिस तरह से गंभीरानंद जी संस्कृत शब्द को यूज कर रहे हैं प्रकट लीला काल अर्थात कि एक तो है कि अदृश्य लीला अप्रकट लीला जबकि ठाकुर की महासमाधि हुई और वो भक्तों के हृदय में रहकर के वो जिस तरह से लीला कर रहे थे वो एक और वो है कि एक प्रकट लीलाकार काल अर्थात कि जबकि वह पंच महाभूत के देह में रहकर के लीला कर रहे थे तो यह एक है प्रकट लीला काल एक है अप्रकट लीला काल देखिए यह सब शब्दों का इस शब्दों को लेकर के हम इतना चिंतन क्यों करते हैं? सीधा-सीधी कह सकते हैं कि ठाकुर के महासमाधि के पहले की लीला और ठाकुर की महासमाधि के बाद की लीला। इतना तो एक सहज सरल रूप से कह ही सकते हैं। इस तरह से बड़े-बड़े हैवी शब्दों यूज़ करने की क्या आवश्यकता है कि प्रकट लीला काल और अप्रकट लीला काल। तो अभी देखिए गंभीरानंद जी का जो भी आशय होगा वह तो अभी मुझे पता नहीं है किंतु जो मैं अपनी खुद की जो व्याख्या है वह मैं करके बता रहा हूं कि देखिए कि यदि जिस तरह से स्वामी जी ने कहा था कि बुद्धिज्म जो है बुद्धिज्म ने अपना जो पूरा लिटरेचर है उस समय का ओरिजिनल लिटरेचर जो है उसको संस्कृत में नहीं ढाला था। उसकी वजह से उनका आशय क्या था कि यह जो वेद, उपनिषद और उसके ऊपर में यह जो सब क्रियाकांड चल रहे हैं, वह एक सामान्य आम नागरिक तक एक आम साधक तक नहीं पहुंच पा रहा है। बोलकर के सहज सरल दिन प्रतिदिन की भाषा में यह सब चीजों को व्यक्त किया जाए। बोलकर के ओरिजिनल उस समय की जो लैंग्वेजेस थी माने प्रचलित लैंग्वेजेस थी उसमें भगवान बुद्ध के ओरिजिनल मैसेजेस को रखा गया था। किंतु फिर स्वामी जी कहते हैं कि वैसे तो बुद्धिज्म का भारत में से जाना उसके पीछे में बहुत सारे रीजंस कारण भूत थे। किंतु एक रीजन यह भी था कि जैसे स्वामी जी स्वयं कहते हैं कि इस बुद्ध भगवान के मैसेज को संस्कृत में नहीं रखा गया था। ओरिजिनल मैसेज को बोलकर के बुद्धिज्म को भारत से जाना पड़ा। तो अभी देखिए कि एक और तो स्वामी जी यह बात कहते हैं कि संस्कृत का बहुल परिमाण माने विषद माने ज्यादातर इस्तेमाल संस्कृत का नहीं किया गया। विस्तृत इस्तेमाल नहीं किया गया। बोलकर के बुद्धिज्म का भारत में से लोप हुआ। क्योंकि भारत में जो धार्मिक साहित्य है हमेशा संस्कृत के आधार पर ही बना रहा है। अभी यही स्वामी विवेकानंद को पता है कि उनका खुद का जो वाणी और रचना है वह आइदर इंग्लिश में है या तो बेंगली में है। ठाकुर की जीवनी जो कि उन्होंने शरद महाराज को लिखने के लिए प्रेरित किया था वह भी बेंगली में ही होने वाली थी और फिर यह जो मास्टर महाशय कथामृत की रचना कर रहे थे वह भी इनिशियली इंग्लिश और बाद में बेंगली में प्रस्तुत हुआ था। तो इवन रामकृष्ण संघ में ठाकुर मां स्वामी जी तीनों की जो जीवन और वाणी है वो कुछ भी उसमें से संस्कृत में नहीं था। हां स्वामी जी ने कुछ-कुछ संस्कृत श्लोकों की स्तोत्रों की रचना की है। एक दो संस्कृत लेटर भी लिखे हैं। बट दैट इज नोवेयर नियर टू कि उनकी क्या एक्सपेक्टेशन है। तो यह जो एक कांसेप्ट है कि संस्कृत के आधार पर ही अपना साहित्य होना चाहिए। धार्मिक साहित्य तभी वह भारत में लंबे समय तक चलेगा। वह एक है। दूसरा है कि यदि संस्कृत में रखेंगे तो आम नागरिक जो है एक आम साधक जो है वह उसको नहीं समझ पाएगा। तो यह दो क्फ्लिक्ट जब इकट्ठा होते हैं तब यहां पर शरद महाराज ने खास करके एक क्या सॉल्यूशन खोज निकाला है? साधु बांग्ला में पूरा लीला प्रसंग लिखना। स्वामी जी की जो चलित बांग्ला जो है खास करके हम स्वामी शिष्य संवाद में या तो फिर स्वामी जी जो अपने गुरु भाइयों को पत्र लिखते हैं उसमें जो देखते हैं वो एकदम जिसको हम बंबैया हिंदी कहते हैं एक तो साहित्यिक हिंदी होगा दूसरा एक बंबईया हिंदी होगा अर्थात कि यह जो बॉलीवुड की जो मूवीज में जिस तरह का वो जो सड़क छाप हिंदी बोला जाता है यहां पे स्वामी जी के बंगाली की अपमान सम्मान करने का कोई आशय नहीं है। सड़क छाप ऐसा कोई उनको निम्न दिखाने का आशय नहीं है। बात वही है कि वह जो चलती बांग्ला थी उस समय की कोलकाता की गलियों की कोलकाता की ये यंग लोगों की वो चलती बांग्ला में स्वामी जी ने बहुत सारी बातें कही है। वो कुछ-कुछ पैसेजेस जो है जो कि हमारी दृष्टि में एकदम आ जाते हैं। स्वामी शिष्य संवाद में ही मोस्ट प्रोबेबबली यह घटना है कि एक लड़का आया स्वामी जी के पास में वह कहता है कि साधु होना है तो स्वामी जी पूछते हैं कि क्यों तुमको शादीवादी नहीं करनी क्या तुमको लड़की पसंद नहीं हुई क्या ये जो घड़ी घड़ी की चैन ये सब जो लेना देना जो है वह सब क्या तुमको पसंद नहीं आया क्या तो यह माने स्वामी जी एक तरह से कटाक्ष करके उसको टेस्ट कर रहे हैं कि अभी वो मरकट वैराग्य तो नहीं है तो उसके भीतर में कि हां अभी शादी करना था बीवी पसंद नहीं है या तो फिर यह जो दहेज जो लेना था बीवी के पास में से उनके घर से तो वो दहेज उसको ठीक नहीं लगा बोलकर के अभी उसके मन में मरकट वैराग्य हो गया है यहां पर साधु होने को आया है तो स्वामी जी ये टेस्ट करने के लिए उसको पूछते हैं तो वो जो उस समय जिस तरह की बेंगली का वो इस्तेमाल करते हैं वो एकदम टिपिकल स्ट्रीट बेंगली है कोलकाता की यह जो गलियों की जो बेंगली जो आप कहेंगे चलित भाषा एग्जजेक्टली उस तरह की है तो क्या है कि इस तरह का जो वाक्य प्रयोग सुनकर के पढ़कर के हमारे हृदय में फट करके एक बैठ जाता है कि हम भी कहीं यह मरकट वैराग्य का आश्रय लेकर के साधु होने के लिए या तो फिर यह अध्यात्म या साधना के पथ पर ना चल तो यह बात चलित बांग्ला जितना स्पष्ट रूप से जितना दृढ़ रूप से जितना स्ट्रेट फॉरवर्ड हमारे हृदय में बिठा सकता है वह किसी भी तरह का श्लोक है या तो साहित्यिक करामत है या तो फिर शब्दों की मायाजाल है कुछ भी इतना स्पष्ट रूप से हमारे मन में नहीं बिठा पाएगा तो वो उसका एक प्रयोजन है तो भगवान बुद्ध ने भी इतनी ही स्पष्ट रूप से ही इतनी सहज सरल रूप से ही त्याग वैराग्य और निर्वाण का संदेश दिया था। यदि वह अटपटी भाषा में देते शब्दों की करामती करते यह शब्दों की ये जो जादुई ये सब हरकतें हैं वो हाथ चालाकी वह सब करते तो ऐसा तो फिर उस समय के वो जो संस्कृत साहित्य था उसमें हजारों हजारों यह सब चीजें भरी हुई थी। यह संस्कृत साहित्य का आम जनता के साथ में संपर्क कट गया था। बोल के ही तो भगवान बुद्ध को आना पड़ा था। यह जो ब्रिज जो है यह ब्रिज बनाने के लिए यह सेतु बनाने के लिए आम साधक है। एक सामान्य नागरिक है और यह आध्यात्मिकता के उच्च तत्व है। दोनों के बीच में सेतु बनने के लिए ही भगवान बुद्ध को आना पड़ा था। अभी आज के युग में भी बात तो वही सही है कि शंकराचार्य का भाष्य देखेंगे या तो फिर उसके बाद की यह जो भी वेदांतिक ट्रेडिशन देखेंगे देखिए कि कितने उच्च भाव तरंग सब हमारे संस्कृत साहित्य में छुपे हुए हैं। किंतु हमको यह भी पता है कि 1000 साल की गुलामी के बाद में भारत की जो प्रचंड अवनति हुई थी, भयावह दुरावस्था हुई थी, अकाल पड़ता है तो पूरे गांव के गांव खत्म हो जाते थे। तो वह जो भयानक भयानक दुष्परिस्थिति भारत में चल रही थी। तो उसका यह जो उपनिषदों उनकी व्याख्या उसके बाद में यह प्रकरण ग्रंथ यह सबका भारत की जनता के साथ में संपूर्ण रूप से विच्छेद हो गया था। तो इन दोनों के बीच में सेतु बनने के लिए श्री रामकृष्ण का अवतरण हुआ और श्री रामकृष्ण ने फिर से वही सहज सरल बंगाली भाषा में लोगों को उसी जो उच्च तत्व है उसका उपदेश दिया। अभी स्वामी जी जब यह सब सोचते हैं तो उनके सामने वही डायलेमा फिर से खड़ा होता है। ठाकुर आए थे आम जनता को उच्च तत्व के साथ में जोड़ने के लिए उच्च आध्यात्मिक दार्शनिक साहित्य के बीच साथ में बीच में सेतु होने के लिए अभी ठाकुर को 100% ये उसी उच्च दार्शनिक वो जो एक फॉर्मेट है उसमें ढाल देंगे तो ठाकुर का और रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा का जनता के साथ में संपर्क ही समाप्त हो जाएगा तो फिर अभी अभी करना क्या है? व्हाट इज द मिडिल ग्राउंड? तो मिडिल ग्राउंड जैसे कि यह शरद महाराज का लीला प्रसंग है कि उसमें उन्होंने लिखा तो बेंगली में है किंतु यह जो शब्द प्रयोग है ऑलमोस्ट संस्कृत साहित्य के ही उन्होंने किए हैं। जिससे कि क्या होगा? एक समय जब आएगा भारत में संस्कृत साहित्य का विस्तृत प्रचार होना शुरू होगा। आज तो हम हमारी मातृभाषा भूल ही चुके हैं। हमारी मातृभाषा कोई भी भारतीय हो उसकी मातृभाषा तो संस्कृत ही होनी चाहिए। तो हम लोग अपनी मातृभाषा भाषा ही विस्मरित हो चुके हैं। संस्कृत हम सभी लोग शायद पढ़ते होंगे तो भी वह ऊपर ऊपर से थोड़ा बहुत एक दो शब्द हमको समझ में आ जाते होंगे। तो बस वही तक है संस्कृत के जो शब्द हमारी वर्नेकुलर लैंग्वेज में जो चलते हैं हमारी यह जो स्टेट लैंग्वेज जो है आजकल की उसमें जो चलते हैं वही शब्द हमको समझ में आएंगे। तो अभी क्या है कि भविष्य का एक नया भारत का गठन होगा। जबकि यह इंग्लिश की वजह संस्कृत एक यूनिवर्सल लैंग्वेज रहेगी। हमारे जितने भी भारतीय विद्यार्थी गण हैं वही संस्कृत में ही यह कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करेंगे। संस्कृत में ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलप करेंगे। संस्कृत में ही यह मैसेज लिख के चांद पे यह जो मंगल ग्रह है उसके ऊपर में भेजेंगे। यह जो एक स्वामी जी का एक विज़न था। स्वामी जी का नहीं था। मेरा ही है क्योंकि स्वामी जी के समय में एआई तो था नहीं। किंतु खैर स्वामी जी के विज़न के ही पैरेलल मैं इस तरह से सोच रहा हूं कि आज हायर एजुकेशन की लैंग्वेज है इंग्लिश। यदि आपको कोई भी हायर एजुकेशन का फील्ड है वो चाहे वह आपको मैनेजमेंट है ना कि चाहे आपका इंजीनियरिंग है सिविल डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग ना मैकेनिकल इंजीनियरिंग ना इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग ना कि ये फिजिक्स ना ये मेडिकल साइंस कोई भी साइंस से कोई भी टेक्नोलॉजिकल इंजीनियरिंग ब्रांच है आपको यदि उसमें आपको आगे बढ़ना है तो बिना इंग्लिश का सहारा लिए आप आगे नहीं बढ़ सकते। क्यों? क्यों? क्योंकि पिछले अब ये रेनेसा जब से आया है आप 13th 14th सेंचुरी से प्रारंभ करके कहें तो अप टू आवर प्रेजेंट एज पिछले 600 700 सालों से जो भी साइंटिफिक टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट हुआ है वह सब वेस्टर्न कंट्रीज में ही हुआ है। बोलकर के वेस्टर्न लैंग्वेज जो है वह हमको सीखने की आवश्यकता पड़ गई है। किंतु एक समय भी ऐसा आएगा कि यह जो टॉर्च है सिविलाइज़ेशन की, यह जो वैन गार्ड जो है सिविलाइज़ेशन के वो सब भारत में होंगे। यह जो कटिंग एज, रिसर्च एंड डेवलपमेंट भारत में होगा और वह भी होगा संस्कृत भाषा में। तो वह समय जब आएगा क्योंकि क्या है कि देखिए अभी आज के युग में बहुत सारे लोग बोलते हैं कि संस्कृत को पॉपुलर करो, संस्कृत का प्रचार करो। हमारे यहां पे भी आश्रम में संस्कृत के क्लासेस चलते हैं। किंतु संस्कृत के क्लासेस में इंटरेस्टेड कौन है? जो कुछ रिटायर्ड लोग हैं जो कि अच्छी पोजीशन से रिटायर हुए हैं। घर वगैरह सब सेटल हो गया है। अपने वो जो बच्चे वगैरह है उन्होंने अपनी-अपनी रिस्पांसिबिलिटीज ले ली है। तो बोल के अभी उनके पास में फ्री टाइम है। तो ये लोग सोचते हैं चलो अभी थोड़ा बहुत स्पोकन संस् कर ले। उसका थोड़ा स्टडी कर ले। बोल के वे लोग आते हैं। किंतु यह जो यंगर जनरेशन जो है वाइड स्प्रेड उसको यूज करना उसका संस्कृत का प्रचार करना है तो तभी होगा जब कि संस्कृत को इकोनॉमिक ओपोरर्चुनिटी के साथ में कनेक्ट किया जाए। जब तक यह नहीं होगा तब तक संस्कृत का प्रचार प्रसार ज्यादा होने वाला नहीं है। तो यदि हम यह एम रखें कि हां इंग्लिश आज जितना एसेंशियल है फॉर द सेक ऑफ हायर लर्निंग फॉर द सेक ऑफ इकोनॉमिकल अपॉर्चुनिटीज उतना ही इंपॉर्टेंट संस्कृत का हो तो फिर संस्कृत में यह सब साइंस टेक्नोलॉजी इनोवेशन यह सब डालना होगा तभी यह बात संभव हो पाएगी कि संस्कृत का वाइड स्प्रेड उसका प्रचार हो। यह मेरा एक विजन है। मान लीजिए कि यदि यह संभव नहीं है तो इन दैट केस स्पिरिचुअलिटी जो है, रिलीजन जो है उसमें तो एब्सोल्यूट संस्कृत का होल्ड होना ही चाहिए। तो इससे होगा क्या कि अब जितने भी धर्म है, जितने भी ये रिलीजियस स्कूल्स है, जितनी भी साधन पद्धतियां है, वो सब अभी अपने-अपने विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न परिस्थितियों में, विभिन्न जगहों पे विभिन्न साधकों, विभिन्न इंस्टीटशंस में बंटी हुई है। रामकृष्ण मिशन या तो फिर रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा यह जो हम लोग यह सभी जो जितनी भी रिलीजियस स्कूल्स है रिलीजियस दार्शनिक पद्धतियां है उन सबको सिंथेसाइज करके एक साइंस ऑफ स्पिरिचुअलिटी यदि डेवलप करें आज से 700 साल पहले फिजिक्स जो था वो बेसिकली एक तरह की मेटाफिजिक्स ही था एक तरह की सुपरस्टिश ियस सेट ऑफ बिलीफ्स ही था। इसके बाद में किंतु एवर सिंस रहने सा फिजिक्स को साइंटिफिक बेसिस पे रखा गया। आज हम देखेंगे कि धर्म में बहुत सारा कुछ एक तरह की मान्यता अंधश्रद्धा अंधविश्वास इस तरह और या तो फिर यह लोकल जो देश काल पात्र रिलेटेड जो कस्टम है उसी के ऊपर में आधारित है। एक यूनिवर्सल फ्रेमवर्क नहीं है। तो यदि एक यूनिवर्सल फ्रेमवर्क ऑफ स्पिरिचुअल साइंस यह रेडी किया जाए और यह यदि संस्कृत भाषा में हो तो फिर यह एक दूसरा इंसेंटिव बनता है कि यदि आपको कैरियर बनानी है तो भले चाहे इंग्लिश का इस्तेमाल कीजिए किंतु यदि आपको स्पिरिचुअल होना है तो आपको बिना संस्कृत का स्टडी किए हुए नहीं चलेगा। तो ये जो ह्यूमैनिटी के जो दो एसेंशियल एस्पेक्ट है एक तो है अपना इनर एस्पेक्ट दूसरा है एक्सटर्नल एस्पेक्ट या तो फिर जैसे ठाकुर मास्वामी जी की फ्रेमवर्क में हम लोग कहते हैं एक तो है कॉन्शियसनेस एस्पेक्ट दूसरा है कम्युनिटी एस्पेक्ट और तीसरा है सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट तो सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट को स्टडी करने के लिए उसमें कंट्रीब्यूट करने के लिए भले ही चाहे है आप इंग्लिश का इस्तेमाल करें। किंतु जहां तक यह स्पिरिचुअल और कम्युनिटी एस्पेक्ट है उसको स्टडी या उसमें आगे जाने के लिए अब कम्युनिटी एस्पेक्ट को आप यदि अपनी वर्नाकुलर लैंग्वेज के साथ में जोड़ते हैं तो फिर एटलीस्ट स्पिरिचुअल एस्पेक्ट के साथ में संस्कृत बहुत ही गहन रूप से जुड़ा होना चाहिए। देखिए तीन एस्पेक्ट है। आप तीन लैंग्वेज में उसको एक्सप्रेस कर सकते हैं। स्पिरिचुअलिटी हैज़ टू बी एक्सप्रेस्ड और अंडरस्टुड बाय संस्कृत। संस्कृत के माध्यम से ही हमारी आध्यात्मिक यात्रा को समझा जा सकता है। अह अपनी यह जो कम्युनिटी लाइफ है, अपनी ये जो फैमिली लाइफ है, उसको हमारी जो भी ये जो वर्नाकुलर लैंग्वेजेस है गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु वगैरह उसके माध्यम से आप उसको एक्सप्रेस कर सकते हैं, पार्टिसिपेट कर सकते हैं। और सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग के लिए है इंग्लिश। तो यह तीन एस्पेक्ट और तीन लैंग्वेज इस अर्थ में हमको संस्कृत को एक एसेंशियल स्पिरिचुअल लैंग्वेज बनाना होगा। यदि यह हमारा भविष्य का विजन है, यदि यह हमारा भविष्य का एक आईडिया और प्लान है, तो देखिए कि किस तरह से शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी ने जो लीला प्रसंग लिखी है और किस तरह से गंभीरानंद जी ने यह युगनायक और मां की जीवनी लिखी है। यह तीनों किताबें हैं। वह भविष्य की चिंता करके यह बनी है। अभी तो लिखा गया है उसको वर्नेकुलर बेंगली लैंग्वेज में जिससे कि बेंगोली जो लोग हैं उसको इजीली समझ पाए। किंतु इसमें इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया गया है जो कि इतने संस्कृत बेस है कि जब आप उसको संस्कृत में ट्रांसलेट करने का प्रयास करेंगे। संस्कृत में ट्रांसलेट करने का प्रारंभ करेंगे। तब आप देखेंगे कि इसी शब्दों को एज इट इज उठा के आप यूज कर सके। उसके बाद में आपको कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है कि यह जो टेक्निकल वर्ड यहां पे इस तरह से शब्द प्रयोग किया गया है तो इसका ट्रांसलेशन किस तरह से करें। जितने भी टेक्निकल वर्ड्स हैं ऑलरेडी संस्कृताइज ही किए गए हैं। आपको बस यह वर्ब वगैरह जो है उसी को संस्कृताइज करना है। बाकी ये जो नाउंस ज्यादातर उसमें भी टेक्निकल नाउंस जितने भी है ऑलरेडी वो संस्कृताइज हो ही चुके हैं। तो इसीलिए देखिए कि यहां पे गंभीरानंद जी कहते हैं कि ठाकुर की प्रकट लीला काल है। अर्थात कि ठाकुर की ठाकुर के जीवंत रहते रहते मां का मातृत्व जिस तरह से एक्सप्रेस हुआ है जिस तरह से ठाकुर की यह अभयवाणी कि तुमको मैं इतने सारे रत्न संतान देकर के जाऊंगा यह अभयवाणी ठाकुर के रहते रहते ही किस तरह से सफल हुई इसके बारे में अभी हम डिस्कस करेंगे तो यहां पर देखिए कि यदि इसको संस्कृताइज करना है संस्कृत में ट्रांसलेट करना है तो प्रकट लीला काल इसको फिर आपको अलग से उसके लिए शब्द खोजने की जरूरत नहीं है। इसी शब्द को आप एज इट इज संस्कृत में लिख एज इट इज उठा के आप वहां पर ले सकते हैं। इंटरेस्टिंगली कि मैं जब राजकोट में था तब एक प्रपोजल आया था बेलूर मठ से कि स्वामी जी का राजयोग जो है उसको संस्कृत में ट्रांसलेट किया जाए। तो हमारे यहां पर राजकोट में एक संस्कृत के प्रोफेसर आते थे। उन्होंने ऑलरेडी संस्कृत में काफी किताबें लिखी है और वो जो चोखंबा पब्लिकेशन जो कि संस्कृत का एक स्टैंडर्ड संस्कृत और स्क्रिप्चर का एक स्टैंडर्ड पब्लिकेशन है वे लोग इनकी शास्त्री जी उनका नाम तो शास्त्री जी की किताबें वे लोग पब्लिश करते थे। तो ये शास्त्री जी ने राजयोग को संस्कृत में ट्रांसलेट किया और फिर यह मेरा सद्भाग्य कि वह राजकोट आश्रम की ओर से मैंने उसको पब्लिश किया है। मेरा सिर्फ इतना ही कंट्रीब्यूशन है कि मैंने उसके लिए पेपर परचेस किए हैं और वह किताब उठा के अपने हाथों से मैं वो प्रिंटर के वहां पर जाकर के देकर आया हूं। किंतु इतना तो मुझे सद्भाग्य मिला है। कथामृत भी संस्कृत में ट्रांसलेट हुआ है और मैं जब वहां पर था तो हमने ऐसा सोचा था कि बेलूर मठ ने भी परमिशन दे दिया था कि अपने जितने भी बेसिक किताबें हैं कथामृत स्वामी जी का चार योग वगैरह सबको संस्कृत में ट्रांसलेट करके पब्लिश किया जाए क्योंकि हमारे पास में यह शास्त्री जी जैसे अच्छे रिसोर्सेज थे और हमारा जो पब्लिकेशन हाउस है वह काफी एफिशिएंटली कार्य कर रहा था उस समय यह जो टाइपिंग करने की, प्रूफ रीडिंग करने की सब तरह की सुविधाएं थी क्योंकि संस्कृत में टाइप करना भी ना थोड़ा सा मुश्किल है। आप हिंदी आप यदि टाइप करेंगे आपके पास में जो फोंट जिसको हम कहते हैं हिंदी के लिए तो ठीक है। हिंदी में बहुत ज्यादा जॉइंट लेटर्स नहीं है। जुड़वा अक्षर किंतु संयुक्ताक्षर जिसको कहते हैं। किंतु संस्कृत में ना संयुक्ताक्षर इतने सारे हैं और इतने विचित्र है कि आपको स्पेशल संस्कृत फॉनट खोजनी पड़ती है और आपको आपके पास में जो टाइपिस्ट है उसको ट्रेन करना पड़ता है कि एग्जैक्टली उसी तरह से वो शब्द टाइप हो जैसा कि स्टैंडर्ड पब्लिकेशन चौखंबा जैसे पब्लिकेशन है वे लोग जिस तरह से टाइप करते हैं। तो मैंने वह पूरा सेटअप डेवलप किया था राजकोट में। वह एकदम पावरफुल संस्कृत फोंट भी और उस समय की बात है। आज आज तो यह जो सब Google वगैरह जो टाइपिंग टूल है इतने इजीली अवेलेबल है। वहां पे उस समय इतना इजीली अवेलेबल नहीं था। वो बहुत मेहनत करके यह सब सेटअप करना पड़ा था। वो टाइपिस्ट को ट्रेन करना पड़ा था। फोंट रेडी करनी पड़ी थी। वो सेट वो जो जिसको यह कहते हैं फॉर्मेटिंग वगैरह हम लोगों को सीखना पड़ा था। किंतु सेटअप हो गया था रेडी और मेरी खास करके इच्छा थी कि यह राजयोग तो बहुत अच्छे से हुआ और राजयोग बहुत ही डिफिकल्ट था माने तो यदि राजयोग को हम संस्कृत में ट्रांसलेट कर सकते हैं। उसको टाइप करके प्रूफ रीड करवा करके प्रिंट करवा सकते हैं। तो बाकी जो किताबें हैं तो हम इजीली कर लेंगे। तो वह था मेरा एक डिजायर किंतु अनफॉर्चूनेटली हुआ नहीं फुलफिल। तो जो भी है भविष्य में यदि इस तरह से पूरा प्लान होता है कि हमारा लिटरेचर को पूरे-पूरा संस्कृत में ट्रांसलेट करके उसी को स्टैंडर्डाइज वर्जन के रूप में यूज किया जाए। तो फिर क्या है कि जिस तरह से यह लीला प्रसंग या युगनायक या तो मां का जीवनी लिखा गया है उसमें से संस्कृत ट्रांसलेट करना बहुत ही आसान
मधुर भाव में डूबी एक स्त्री और श्रीरामकृष्ण की अनोखी लीला
होगा। तो यहां पर गंभीरानंद लिखते हैं गंभीरानंद जी कि ठाकुर की प्रकट लीला काले किस परिमाण मां की यह इच्छा अभिलाषा साफल्य लाभ उसने किया था सफलता लाभ किया था वही आपातत फिलहाल हम इसी की आलोचना में प्रवृत्त होते हैं। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? स्टोरी वो जो एक पागली एक पागली आती थी ठाकुर के पास में तो ठाकुर के प्रति उसका मधुर भाव था वही स्टोरी वहां पर अभी कह रहे हैं कि इस घटना के माध्यम से मां का मातृभाव किस तरह से प्रदर्शित होता है दक्षिणेश्वरे आगो तो अल्पबयोश को भक्तो दिग के श्री मां निज संताने मतोई देखते दक्षिणेश्वर में जो अल्प वयस्क भक्त आते थे उनको मां अपने खुद के संतान की तरह ही देखती एवं ताहा देर प्रति एक अनुपम आकर्षण बोध करते और उनके प्रति एक अनुपम आकर्षण वो बोध करती प्रयोजन स्थले जननी अपेक्षाओ शोजत ने ओ आपनार ज्ञाने ताहादे रखणा बेण कोतेन प्रयोजन स्थले आवश्यकता आन पड़ने पर जननीस की अपेक्षा भी जननी जननी अपेक्षा ओ माने कि मां की मां आपका जितना रक्षण करेगी उससे भी ज्यादा जननी अपेक्षा ओ जननी की जननी से भी ज्यादा शतने ओ आपनार ज्ञाने ताहा दे रक्षणा बेण कर तेन सयत्न और आपनार ज्ञाने अपने ज्ञान से उनकी रक्षण करती देखिए कि कितना सुंदर रूप से कहा गया है कि दक्षिणेश्वर में जितने भी यह कम उम्र के यह त्यागी संतान है भविष्य के या तो और भी जितने कम उम्र के यह जो सब पुत्र कन्याएं आते थे भक्त के रूप में उन सबका मां इस तरह से उनकी चिंता करती इस तरह से उनकी देखभाल करती इस तरह से उनकी केयर करती कि उनकी खुद की जननी उनकी खुद की मां भी इतना केयर ना करती हो। यह जो हमको काल काली कृष्ण महाराज विरजानंद जी महाराज की वो स्मृति कथा फेमस स्मृति कथा कि वो शरद महाराज के साथ में जय राम भाटी गए थे मां का जो प्रेम प्राप्त हुआ था उसका तो हमने दो-तीन बार चिंतन किया ही है। हमको याद है कि जब काली कृष्ण महाराज भविष्य के वीरानंद जी जय राम भाटी छोड़कर के कोलकाता वापस आ रहे हैं तो देखा कि मां वो बैलगाड़ी के पीछेछे आ रही है। आ चल ही रही है। चल ही रही है। यह लोग बोल रहे हैं कि मां आप वापस जाइए। फिर भी मां वापस नहीं जाती है। वो गांव के बाहर में एक तालाब था। वहां तक मां पैदल चल के गाड़ी के पीछे में आई। जैसे कि वह गाड़ी को यह बैलगाड़ी को रोक करके अपने त्यागी संतानों को फिर से अपने घर ले जाकर के फिर से जैसे कि अपने ममत्व के आंचल में उनको बांध के रखना चाहती है। तो मां की आंखों में से आंसू निकल रहे हैं। वहां पर वो जो बैलगाड़ी में यह जो वीरानंद जी बैठे हैं उनकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं। फिर जब वो तालाब के पास में आकर के मां खड़ी रह गई और अभी नहीं चल पा रही है। वृद्ध शरीर था बहुत ज्यादा तो चल नहीं पाएगी और यह गाड़ी जब जा रही है दूर से दूर जा रही है तो फिर काली कृष्ण महाराज उस समय सोचते हैं कि मां के बारे में सुना तो था किंतु मां यह इस तरह की मां कि जो कि मेरी खुद की मां मेरी खुद की जो गर्भधारिणी जननी है उससे भी इतना ज्यादा प्रेम मुझे कर सकती है। यह तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। तो यहां पर भी देखिए कि गंभीरानंद जी कहते हैं कि दक्षिणेश्वर में जितने भी यह संतान कन्या पुत्र उनके पास आते थे उनको मां उनकी खुद की जननी से भी ज्यादा उनकी केयर करती थी। दक्षिणेश्वर एक पागली ठाकुर निकट जाता करी तो दक्षिणेश्वर में एक पागली ठाकुर के पास में आना जाना करती। प्रथमे शकले ताहा के शुध अप्रकृतिष् बोलिया जानतेन शुरू शुरू में तो सभी लोग उसको अप्रकृति अर्थात कि उसका मस्तिष्क जो है थोड़ा सा विकृत हो गया है अप्रकृत हो गया है बोलकर के ही समझते थे उसको एवं श्री रामकृष्ण प्रभुति शकले अति सहानुभूति सहित आलापादि करतेन और यदि यह समझ में आता है कि किसी का मन जो है वह विकृत हो गया है तो भी क्या है कि एक तरह की सहानुभूति तो रहती ही है तो श्री रामकृष्ण वगैरह सभी उसके साथ में सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करते पर प्रकाश पाइलो किंतु बाद में पता चला से मधुर भावे साधिका वो मधुर भाव की साधिका है ए के श्री रामकृष्ण स्वभावत श्री श्री जगदंबार प्रति मातृ भापनो वो थी मधुर भाव की साधिका यहां पे श्री रामकृष्ण है स्वाभावतः माने बाय डिफॉल्ट इंस्टिंक्टिवली श्री श्री जगद जगदंबा के प्रति मातृ भावापन्न श्री श्री जगदंबा के प्रति उनका संतान भाव था शक्ति मात्र को स्त्री मात्र को वो अपनी जननी के रूप में देखते थे। वो भैरवी ब्राह्मणी की कहानी कि भैरवी ब्राह्मणी के साथ में ठाकुर का वैसे तो संतान भाव था और ठाकुर के प्रति उसका जननी भाव था किंतु कभी-कभी वह मधुर भाव पूर्वक वो गीत वगैरह जो है वह गाती थी। उस समय किंतु ठाकुर उसको स्पष्ट रूप से वह चेतावनी देते थे कि मेरा इस तरह का भाव नहीं है। वो वीर भाव पूर्वक भैरवी ब्राह्मणी के साथ में किसी भी तरह का संबंध नहीं रखना चाहते। जब ठाकुर स्पष्ट रूप से यह बात करते तो फिर भैरवी ब्राह्मणी अपना मधुर भाव है। उसको फिर वह अपने उसको छोड़ देती। उससे वो निरस हो जाती निरस्त हो जाती। तो यहां पर भी देखिए कि यह पागली वैसे तो आती थी। सबके सबकी उसके प्रति सहानुभूति तो थी ही थी। किंतु जब बाद में पता चला कि वह मधुर भाव की साधिका है। अब ठाकुर थे जगदंबा के प्रति सभी स्त्रियों के प्रति मातृ भावापन्ना पागली अतो शतो ना भाबिया जे दिन तहार अंतर कथा ठाकुर के खुलिया बोलीलो से दिन ए बिजियो भाबेरा घाते श्री रामकृष्ण शिशु मन विद्रोही होए उठिलो पागली ने यह सब बिना सोचे समझे अतो शतो ना भाबिया इतना सब आगे पीछे सोचे बिना कि ठाकुर का जन स्त्रियों के प्रति मातृभाव है वगैरह बिना सोचे बिना समझे जिस दिन उसने अपने अंतर की बात ठाकुर को खुलकर कही। उस दिन यह विजातीय भाव के आघात से ठाकुर का शिशु मन विद्रोही हो उठा। ठाकुर के शिशु मन में यह जो विजातीय यानी कि यह विरोधी भाव जब वे बांगली के कहने से प्रवेश किया कि आपके प्रति मेरा मधुर भाव है तो ठाकुर का शिशु मन विद्रोही हो उठा। ततणात आसन त्याग कोरिया खिप प्राय कखो मध्य घरिया बेड़ाते लागी लेन ठाकुर ने ततक्षणात इमीडिएटली आसन को त्याग करके आग बबूले होकर के क्षिप्त प्राय अर्थात कि आघात प्राप्त किए हुए या तो कहेंगे आग बबूले होकर के अपने कमरे में बेड़ाने लगे घूमने लगे घरिया बेड़ाते लागी लेन वॉकिंग करने लगे टहलने लगे ग्राम भाषा ए विपरीत संबंध निंदा करते थाकी लेन ग्राम्य भाषा में इस विपरीत संबंध की निंदा करने लगे एवं तहार परिधेय वस्त्र खुशिया पि लो और उनका जो परिधेय पहना हुआ वस्त्र था वो खिस गया वो अपने से ही निकल गया देखिए गंभीरानंद जी ने संस्कृत में जो कहा है उसको ठाकुर ने ग्राम्य भाषा में कहा है अभी संस्कृत में तो आप वो ठाकुर की ग्राम्य भाषा व्यवहार नहीं कर सकते। अर्थात एक्चुअली ठाकुर ने जिस भाषा का प्रयोग किया वो हम समझ ही सकते हैं। ठाकुर गुस्से से आग बबूला होकर के गाली देना शुरू कर दिया होगा। और ठाकुर की गालियां तो हमको पता है कि वह गांव की सब गालियां यानी कि पूरी मसाले से भरी हुई। जब ठाकुर आग बबूले हो जाते थे। वो जो कहानी है ठाकुर ने हृदय को कहा था कि जब तुम मेरे पर नाराज हो तो तुम जो कुछ भी बोलोगे मैं सहन कर लूंगा और जब मैं तुम्हारे पर नाराज होता हूं उस समय तुम मैं जो कुछ बोलता हूं सब कुछ तुम सहन कर लेना। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमको यह जो खजानची है उसको बुलाना पड़ेगा। हमारे बीच में मध्यस्थता करने के लिए हमारे बीच में यह शांति सुलह करवाने के लिए। तो यहां पे भी यह जो ठाकुर जब गाली देते थे, जब ठाकुर नाराज हो जाते थे, तो किस तरह की ग्राम्य भाषा का प्रयोग करते होंगे, वह तो अभी हमारे को हमको अनुमान ही करना होगा। ठाकुर की सिर्फ एक ही गाली है जो कि हमको पता है, वह है साला। वो कथामृत में उसका प्रयोग होता है। तो उसको छोड़कर के मुझे याद नहीं आ रहा कि ठाकुर ने और कोई गाली जो दी है उसको यहां पे अपने साहित्य में लिखा गया है। तो यहां पे गंभीरानंद जी एकदम डिग्निफाइड वे में यह ठाकुर की भाषा को प्रस्तुत करना है। तो इसलिए उन्होंने लिखा है कि ग्राम्य भाषा में ऐसा नहीं लिखा कि ठाकुर ने गाली देना शुरू कर दिया। ऐसा लिखा है कि ग्राम्य भाषा में इस विपरीत संबंध की निंदा करने लगे और साथ में ही जैसे होता है छोटे बच्चे के साथ में बिल्कुल छोटा सा शिशु है और उसको ना ही कोई लाज शर्म है लज्जा घृणा भय ठाकुर कहते हैं ना तीन थकते नोए लज्जा घृणा और भय यह तीन रहतेरहते होगा नहीं तो यह जो अष्टपाश है लज्जा घृणा भय और फिर यह जाति कुलशील मान और अभिमान इस सभी अष्टपाशों से ठाकुर मुक्त हो चुके थे। ठाकुर उदाहरण देते हैं और ये मुक्त हो गए थे बोलकर के नाराज हो जाने से छोटे बच्चे ने जो धोती पहना है वह कैसे खिसक करके निकल जाती है। तो वैसे ही ठाकुर की धोती भी इस तरह से निकल गई। अब जस्ट इमेजिन कि दिगंबर ठाकुर कमरे में टहल रहे हैं और जोर-जोर से गाली दे रहे हैं। किस तरह का यह सुमधुर दृश्य बना होगा। देखिए यह विरूप या तो विकृत दृश्य नहीं है क्योंकि ठाकुर के ऊपर में यह शिशु भाव का आरोप हुआ है। आज और कोई भी पुरुष है ठाकुर की उम्र का वो यदि इस तरह से दिगंबर होकर के गाली देना शुरू करें तो वह दृश्य है कितना ही वो विकृत लगेगा। किंतु ठाकुर के भीतर में दिव्य बालक भाव का वो प्रकट प्रकाश हुआ था। प्राकट्य हुआ था। बोल के ठाकुर जो कुछ भी लीला कर रहे हैं इतनी सुंदर सुमधुर हुई होगी। मैं तो कहता हूं कि यह पागली जिसने ठाकुर का यह रूप दर्शन किया उसी से उसके जन्म जन्मांतर के जितने भी कुसंस्कार है वह कट गए होंगे और इसी जन्म में उसको मुक्ति मिल चुकी होगी। तो यहां पे देखिए कि किस तरह से जब भाव का आरोप होता है, भाव का उद्रेक होता है, भाव का जिस तरह से एक तरह से कहे तो एसेंशन होता है अपने मन में। उस समय यह जो लज्जा, घृणा, भय रहता नहीं है। ठाकुर उदाहरण देकर कहते हैं कि एक छोटा बच्चा है वह जब शौच जाता है उसके बाद में वो शौच स्थान वो परिष्कार करता है। साफ करता है और फिर सबको उल्टा घूम करके दिखाता है। अच्छा देखो तो मैंने ठीक से परिष्कार किया कि नहीं? मैंने ठीक से धोया कि नहीं? तो क्या है कि बच्चे को यह सब हम लोग ऐसा सपने में भी सोचेंगे नहीं करने को। किंतु बच्चे के मन में इस तरह का लज्जा होता ही नहीं है। दूसरे लोग क्या कहेंगे उसको यह पड़ी नहीं है। और दूसरे लोग भी बच्चे को ऐसा कर करता हुआ देखकर के उनको घृणा नहीं होगी। उनको हंसी ही आएगी कि यह छोटा बच्चा है नादान है असमझ है तो इस तरह की हरकत कर रहा है तो वैसे ही यह एकदम छोटे बच्चे का शिशु सरल सरल स्वच्छ मन का सुपवित्र मन का शिशु बालक यही भाव ठाकुर के ऊपर में उस समय जैसे कि आसीन हो गया आग बबूले हो गए वह ग्राम्य भाषा में गाली देना शुरू कर दिया और उनके जो परिधेय वस्त्र था जो धोती पहनी हुई थी वह किसक करके गिर गई श्री मां नबत होते शबई सुनीते छिले मां नहबत में से सब कुछ सुन रही थी कन्नार अपमाने लज्जाए मर्यागिया तिनी गोलाप मां के बोली ले कन्या के अपमान से लज्जा से मर करके उन्होंने गोलाप मां को कहा देखिए आप किसी भी स्त्री के सामने इस तरह से दिगंबर होना और इस तरह तरह से एकदम गंदी गालियां देना। यह तो किसी भी स्त्री का अपमान ही है। अभी हमको तो पता है कि ठाकुर तो दिव्य भाव में आसित दिव्य बालक है। वो जिस जिसके सामने इस तरह की लीला करेंगे उसका तो माने उसकी सात पीढ़ियां धन्य हो जाएगी। सभी लोग उसको आगे पीछे जितने भी है सात पीढ़ी उसको मुक्ति प्राप्त हो जाएगी। हमको तो यह स्पष्ट पता है। किंतु देखिए मां का तो यह सब लोगों के प्रति जननी भाव था ना मातृभाव था। वो जब ठाकुर दिगंबर होकर के अपनी कन्या के सामने उसी को गाली देते हुए घूमे तो मां से मां से किस तरह से यह सहन होगा। तो इसलिए वो लज्जा से शर्मिंदा होकर के उन्होंने गोलाप मां को कहा देखो देखी देखो तो से जो अविवेचनार कथा बोले ही थाके तो आमार काछे पाठी दिल ही तो हो वो यदि अविवेचना पूर्ण बात कर ही रही है तो उसको तो मेरे पास में भेज देने से ही तो हो गया पागली जब उटपटांग बातें करती है माने अत [हंसी] अपश माने जो विपरीत भाव की बात करती है मधुर भाव की तो ज्यादा से ज्यादा ठाकुर को क्या करना था? वही करना था कि जाओ मां के पास में नौबत में बैठी है मां जाओ जाकर के उसके साथ में बात करो। ऐसा करके उसको तो भगा ही देना था वहां से उसके सामने दिगंबर होकर के गाली फाली देने की क्या जरूरत है? ए भाे गाली करा कैनो इस तरह से गालागाली करने की क्या जरूरत है? देखिए मां शब्दों को इस तरह से ऊपर नीचे नहीं करती। मां संस्कृताइज नहीं करती शब्दों को वह स्पष्ट रूप से कहती है कि गाला गाली देने की यह गाली प्रयोग करने की क्या आवश्यकता है पागली के डाकिया आब बार जनोतिनी गोलाप मा के अभिलंबे पाठाई ले इस पागली को नहबत में ले आने के लिए उन्होंने तुरंत ही अविलंबे बिना किसी विलंब के गोलाप मां को भेजा एवं से निकटे आशीले स्नेहो भोरे बोलीलेन और जब पागली उनके निकट आई तो मां ने स्नेह पूर्ण शब्दों से कहा स्नेह भर के कहा बाछा उननी तो माई देखे जोखन बिरक्त होन तखन नाई बागेले शेखाने बिटिया जब वह तुमको देखकर के नाराज हो जाते हैं तो वहां पे तुम भले ही नहीं गई वहां पर जाने की क्या जरूरत है आमार काछे एले ही तो पारो मेरे पास में तो आ ही सकती हो मेरे पास में ही आओ ठाकुर के पास में जाने की क्या जरूरत है? यदि तुमको देखकर के ठाकुर नाराज हो जाते हैं तो बोलकर के मां ने इस तरह से अपनी पागली कन्या की रक्षा की। देखिए ऐसा भी तो हो सकता था। हाइपोथेटिकली यदि सोचे और कोई स्त्री यदि अपने एक पत्नी है। वह ऐसा देखे कि उसके पति के सामने और कोई स्त्री जाकर के मधुर भाव की बातें कर रही है। तो यह पत्नी के हृदय में सर्वप्रथम तो ईर्ष्या का ही आविर्भाव होगा। वो जेलसी के मारे वो तो आग बबूली ही हो जाएगी। कोई भी पत्नी है। ये तो एक जनरल टेंडेंसी है। एक जनरल ह्यूमन नेचर है। ये हस्बैंड और वाइफ इन दोनों के बीच में जब और कोई तीसरा आ जाता है तो जो वो जो यदि पत्नी है वो दूसरे पर पुरुष के साथ में इस तरह से बात करेगी तो पति नाराज हो जाएगा। पति जब और कोई स्त्री के साथ में इस तरह से बात करेगा तो पत्नी नाराज हो जाएगी। यह तो एक सामान्य ह्यूमन रिएक्शन है। किंतु इस तरह से कोई ह्यूमन रिएक्शन देने की वजह इस पागली के ऊपर में सहानुभूति का एक तरह से प्रागट्य होना वो भी तो मां की एक महानता है। देखिए कि एक जो नॉर्मल ह्यूमन रिएक्शंस है उसके कहां ऊपर में मां चली गई है। मां ने कहा ना कि वह नबत में बैठी-बैठी जब ध्यान कर रही है तो चंद्रमा के सामने वो देखकर के कहती है कि आपकी चांदनी की तरह ही मेरा अंतर्मन है वह निर्मल कर दो। यह लोगों के दोष देखने की एक मेरी हैबिट हो गई थी एक समय तो मेरा दोष देखना संपूर्ण रूप से मिट जाए ऐसा मेरे साथ में कर दो। वो जो मां इस तरह की जो प्रार्थना करती थी। हालांकि ऑफ कोर्स नारायणी जगदंबा को ऐसा प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं किंतु फिर भी क्या है कि तमस का एक अंश तमस और रजस का एक अंश जो सत्व के साथ में मिला है बोल करके ही तो देह धारण तो देह धारण जब किया है। तमस और रजस का जो एक अंश है तो उससे तो मुक्ति प्राप्त करनी ही होगी। बोल करके देखिए कि जो हम कल बात कर रहे थे ना कि मां की यह जो ट्रेजेजरी है साधना की वो हमको नहीं दिखती क्योंकि मां का दो रीजन है कि मां के लिए वो सब था भी नहीं। दूसरा कि मां की जो जर्नी थी बहुत हद तक वो सीक्रेटिव जर्नी थी। ठाकुर ने और इवन मां ने भी इसके बारे में बहुत ज्यादा कुछ नहीं कहा। किंतु यह दो घटनाओं को पासपास में रखने से हमको स्पष्ट समझ में आता है कि एक समय तो था मां अपने मुंह से स्वीकार करती है कि लोगों को दोष देखने की लोगों के दोष बुनने की मेरी हैबिट हो गई थी। फिर इस तरह से प्रार्थना करके करके यह हैबिट जो है मेरी वह चली गई थी। तो जब से मां एक समय था कि दोष देख रही थी मां फिर एक समय आया कि मां ने प्रार्थना की दोष दृष्टि दूर करने के लिए और फिर एक समय ऐसा आया कि एक स्त्री उनके पति के सामने जाकर के मधुर भाव की बातें करती है तो उसका दोष देखने की वजह उसके ऊपर में नाराज होने की वजह उसके प्रति ईर्षान्वित होने की वजह मां का उसके प्रति मातृभाव ही प्रकट होता है। तो यह एक जर्नी हमको मां की दिखाई देती है। इसके बाद की जो कहानी है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु यहां पे साइक्लोन चल रहा है। ओ सुबह तीन दिन से इतना जोरों से बारिश हो रही है और इतना जोरों से हवा चल रही है। ये आश्रम में दो-तीन पैर गिर पेड़ जो है वह गिर गया है। मैं कल समुंदर देखने को गया था। हमारा जो बिल्डिंग है लाइब्रेरी बिल्डिंग समुंदर के एग्जैक्ट सामने है तो उसकी छत से मैं समुंदर को देख रहा था। और माने मैं तो प्रतिदिन समुंदर को देखता हूं तो आप किनारे पर आएंगे तो सब वो लहरें दिखाई देगी। किंतु आज जितना दूर जाएंगे ना समुंदर एकदम शांत स्थिर दिखेगा। तो कल देखा कि ऐसा लगा कि पूरा जो समुंदर है वह ऊपर नीचे हो रहा है। जैसे कि बड़ा भयावह दृश्य था और किनारे पर जो लहरें देखेंगे ना जोर-जोर से आकर के टकरा रही है। बाप रे [हंसी] किंतु एक बात है ना वो जो जैसे वो योगी लोग जो श्मशान में बैठ के ध्यान करते हैं ना तो वे लोग है ना प्रकृति के इस तरह के रुद्र रूप की ही कल्पना करते हैं। तो मैं भी आज सुबह को ऐसा ध्यान करने के समय यह जो आवाज तो आएगी जोर-जोर से पेड़ जो है उसके भीतर में से जो हवा चल रही है तो वो भयानक आवाज वो फिर यह गर्जन हो रहा है बादलों का तो वो आवाज जो आ रही थी ना भयावह आवाज मैंने सोचा उसी पे ध्यान किया जाए देखते अच्छा लगेगा [हंसी]