प्रार्थना
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध नीरव साधना इस चैप्टर का पाठ कर रहे थे कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मां की रक्षा करते हैं और एक बार हृदय वहां पर गया था नबत में राधाकांत और भवता आरणी के मंदिर का प्रसाद और मिठाई देने के लिए और वहां पर खड़े-खड़े मां के साथ में लक्ष्मी दीदी के साथ में हंसी मजाक कर रहा था गप लगा रहा था तो फिर जब वह वापस आया तो ठाकुर ने उसको डांटा कहा कि जब तुम कुछ भी देने को जाओ तो देना और वापस चले आना तो कल इस बात की चर्चा करने के बाद में अभी
प्रसंग: ठाकुर माँ को साधन भजन में उत्साह देते है
आज गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं ठाकुर ई भावे उपदेश दान एवं श्री मायर धर्म जीवने उपयोगी अवस्था शकर संरक्षण चेस्टार संगे संगे ताहा के धर्म कृत्या दते उत्साह दते ठाकुर इस तरह से इस तरह से यानी कि कल के प्रसंग के उसके अनुसंधान में महाराज कह रहे हैं इस तरह से उपदेश दान तो करते ही थे किंतु साथ-साथ में ही मां के धर्म जीवन में उपयोगी अवस्था संरक्षण की चेष्टा के साथ-साथ में उनको धर्म कृत्य आदि में उत्साह भी देते थे तो धर्म कृत्य वगैरह में उत्साह देना धर्म कृत्य क्या है तो हमारा जप ध्यान साधन भजन एक आंतरिक ईश्वर के ऊपर में निर्भर जीवन तो किस तरह से इस तरह का जीवन बिताया जाए उसके बारे में भी ठाकुर मां को उपदेश दिया करते थे और उनको उह भी देते थे श्री मां बेश हित पारि देन मां बड़ा सुंदर गाना गा सकती थी मैं यह बात हमने बहुत ही रेयरली कहीं पर सुना है कि मां गाना गा रही है मां के सामने भजन कीर्तन चला हो इस तरह के बहुत सारे उदाहरण है जैसे कि वह फेमस प्रसंग है कि गिरीश घोष वगैरह जयराम बाटी गए थे जगत धात्री पूजा थी वहां पर रात में मां के जो आंगन है वहां पे वहां पर भजन कीर्तन चल रहा था और फिर मां भी वहां पर बैठ कर के अपनी सब स्त्री भक्त है उनके परिवार जन है वह सब भजन सुन रही थी तो ऐसा वहां पर वह जो एक भजन गाया गया था सतो बोल शिवानी वोह जो भगवान शिव का और मां पार्वती का जो भजन है कि वह भगवान शिव तो एक समय था कि भगवान शिव स्मशान में रहते थे आज उनके वहां पर द्वार पे द्वारी खड़े हैं तो यह जो उमा है उसका घमंड आज बहुत बढ़ गया है तो मैं भूल गया एग्जैक्ट भजन की लाइन किंतु यह जो भजन जब चल रहा था उस समय यह मां की मां श्यामा सुंदरी देवी वह कहती है कि देखिए कि एक समय था जब कि सभी लोग मां शारदा के अदृष्टवांठा किंतु आज देखिए कि यहीं कलकाता से इतने सारे भक्त यहां पर जयराम बाटी में आते हैं तो इस तरह का भजन गान यह सब मां के सामने बहुत चलता हुआ बहुत जगह पर देखा है किंतु यह कि मां खुद गाती है और बड़ा सरेले बड़े ही सुंदर स्वर से गा सकती थी इस तरह का वर्णन बड़ा ही रेयरली हमको देखने को मिलता है तो यहां पर महाराज कहते हैं कि दक्षिणेश्वर में नबत में मां बड़े ही मृदु स्वर से जिससे कि ज्यादा कोई लोग सुन ना पाए इस तरह से गुनगुन करके भजन गान वगैरा गाया करती थी भाव संबली तो सेही भजन संगीत बेश जमया छलो भाव से भरपूर वह भजन संगीत बड़ा ही सुंदर वह चल रहा था ठाकुर तहा सुनी ते पाइया पौर दिन श्री मां के बोलिया लेन ठाकुर वो सुन पाए थे तो फिर दूसरे दिन उन्होंने मां को कहा था काल ज तो मादर खूब गान हो चलो ता बेश बेश भालो कल तो तुम लोगों का बड़ा सुंदर गान चल रहा था भजन चल रहा था तो अच्छा है अच्छा है सुंदर सुंदर बहुत अच्छा है आर एक दिन बिका ले श्रीमा
प्रसंग: माँ शारदा माँ काली के लिए फूलों की माला बनाती हैं
झुई आर रंगन फुलेर सात लोहर गोड़े माला थिया पाथर बाटी ते झोले राख्या दिलन व तो एक प्रसंग हो गया यहां पर और एक प्रसंग प्रार होता है एक दिन शाम के समय मां ने जुई और रंगन फूल की सात लहर माला बनाई और फिर उसको एक पत्थर की बाटी में पानी में रख दिया परे कुड़ी गुली फुलिया उठीले जगदंबा के पठाई ते जगदंबा के पराई पठाई आ देले उसके बाद में जब यह जो कलियां थी कलियां प्रस्फुटित हुई फूल बन गए तो यह माला भी बड़ी सुंदर हो गई तो मां ने इस माला को मां जगदंबा को भवता आरणी को पहनाने के लिए मंदिर में भेज दी गहना खुलिया कालीरल माला देवा होया छ एमन समय ठाकुर तथा आश लेन एवं शोभा दर्शने आनंदे बिफोर हैया बारंबार बोली ते लागी लेन मां काली के जितने भी गहने हैं उसको खोल करके यह माला वगैरह पहना देने से मां काली का स्वरूप इतना सु सुंदर हो गया कि इसकी शोभा के आनंद में विभोर होकर के ठाकुर वहां पर दर्शन के लिए आए देखा कि इतना सुंदर मां काली की प्रतिमा फूलों की माला से सजी हुई वह बड़े ही आनंद से विभोर हो गए और बारंबार बोली ते लागि लेन बारंबार कहने लगे आहा कालो रंगे की सुंदर मानिए छे काले रंग की प्रतिमा है उसके ऊपर में सफेद कलर की माला कितनी सुंदर दिख रही है जिज्ञासा कररिया जखन जानी लेन ज श्री मां वहा थिया चन तखन एक जन के बोली लेन जब पूछा कि माला किसने बनाई है तो किसी ने उत्तर दिया कि श्री मां शारदा देवी ने बनाई है तो फिर उन्होंने किसी को कहा आहा ताके एक बार डेके निए ो गो माला परे मायर की रूप खुले छ एक बार देखे जा ठाकुर ने कहा आहा यह माला उसको जाकर के बुला के ले आओ मां शारदा देवी को कि माला पहन कर के मां काली का रूप कितना सुंदर लग रहा है रूप कितना खिला है यह आकर के एक बार देख ले मां मां शारदा देवी ने स्वयं माला बनाई थी मां काली के लिए तो अभी मां को तो दिखने देखने के लिए बुलाना होगा इसीलिए ठाकुर ने कहा कि जाकर के उसको बुला कर के लाओ वृंद जी श्री मां के डाकिया आनले तिनी देखिले ज बलराम बाबू सुरेंद्र बाबू प्रवृति मंदिरे दिख जायते छन अभी यह वृंदा जी वहां पर कार्य काम करती थी उसने यह वही वृंदा जो मास्ट महाशय कथामृत में प्रथम दर्शन में जब वह ठाकुर के कमरे में वापस आते हैं देखते हैं कि ठाकुर का कमरा बंद है तो वहां पर यह वृंदा जी अर्थात जी अर्थात की वह काम करने वाली बाई जी का अर्थ जनरली होता है बाई या तो स्त्री तो यह जो यह खड़ी थी तो उसको पूछा कि अच्छा यह साधु अंदर है वो तो कुछ संध्या वगैरह करते होंगे क्या मैं अंदर जा सकता हूं तो वही वृंदा जी ने कहा था कि जाओ ना उसमें क्या है फिर ये माश महाशय ने पूछा कि ये साधु तो बड़ा ही पढ़ाई लिखाई करते होंगे वरना तो इतने विद्वता पूर्ण उपदेश कौन दे सकता है तो वृंदा जी ने कहा था सब तो और मुखे सब तो उनकी जिवा पे सवार है वो कोई पढ़ाई लिखाई करके यह ज्ञान प्राप्त नहीं करते तो यह मास्टर महाशय उस समय ये परीक्षा वीक्षा पास करके आए थे तो बड़े ही आश्चर्य चकित हो गए कि अरे बिना पढ़ाई लिखाई किए क्या कोई इतना विद्वान हो सकता है तो यह वही वृंदा जी व और उसका नेचर भी थोड़ा सा बड़ा ही अग्रेसिव था थोड़ा सा नहीं बड़ा अग्रेसिव था तो फिर यह ठाकुर के वहां पे फल मिठाई वगैरह आती तो क्या होता कि ठाकुर और मातो सबको बांट देते जो भी भक्त आया सबको बांट देते अभ यह वृंदा जी को भी तो थोड़ा सा मिलना चाहिए उस वो भी तो वहां वहां पर काम करती है तो फिर मां एक बार ऐसा हुआ कि य सब फल मिठाई खुट गया तो मां ने थोड़ा डरते डरते कहा य वृंदा को जब वृंदा आई कि अच्छा वह सब तो खत्म हो गया है किंतु और कुछ यहां पर पड़ा है उसको खा लो तो इसका नेचर था ऐसा थोड़ा सा अग्रेसिव किंतु जो भी है वह सेवा भी उसने बड़ी की थी तो वृंदा जी को मां शारदा देवी को बुलाने के लिए भेजा गया अभी मां जब आई तो देखा कि बलराम बाबू सुरेंद्र बाबू वगैरह वे लोग भी मंदिर की ओर जा रहे हैं और अभी देखिए कि हृदय वाले किस्से में भी हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मां की रक्षा करते हैं पुरुषों के सामने आए यह सब ठाकुर को पसंद नहीं था और वैसे भी मां खुद इतनी लज्जा शिला थी कि वह सामने से कभी पुरुषों के सामने पुरुष भक्तों के सामने भी नहीं जाती थी तो अभी जदी आप दक्षिणेश्वर महाकाली के मंदिर में गए होंगे तो आपने देखा होगा कि किस तरह से सामने का एंट्रेंस है वहां से सीढ़ी चढ़ कर के व स्टेप्स उठ कर के आप मंदिर में जा सकते हैं किंतु साथ-साथ में ही साइड के में मंदिर की इस साइड पर भी शिव मंदिर की और कुछ सीढ़ियां है उस सीढ़ी को चढ़ कर के भी आप जा सकते हैं मां के मंदिर में तो मां वह पीछे वाली सीढ़ी से वह चढ़ना शुरू किया उस समय देखिए कि ठाकुर ने उनको देख लिया सुतं तीनी लज्जा आत्म गोपने जन्नो झीर आचल आड़ा ले देहो ढाकिया पश्चात शेण दिया मंदिरे उठते गिलेन अभी ये सुरेंद्र बाबू बलराम बाबू वगैरह को देखा तो मां ने लज्जा से अपने को छुपाने के लिए आत्म गोपने जन्नो झी का आंचल जो है साड़ी उससे अपने देह को ढक करके पीछे की सीढ़ी से मंदिर में उठने के लिए गई यह देखिए मां लज्जा शिला कितनी थी ये दूसरों के पीछे छुप जाना एक बार कुछ भक्त यही त्यागी संतान जयराम बाटी गए थे तो फिर क्या है कि यह बच्चों को तो अच्छा खिलाना पड़ेगा अभी जयराम बाटी में तो ज्यादा कुछ मिलता नहीं है तो मां क्या करेगी कि पास के गांव में से एक बाजार करके आएगी कुछ खरीद करके कि अर्ली सुबह को बड़ी अर्ली मॉर्निंग को जाएगी वहां से सब्जी है दूध है वगैरह कुछ ना कुछ खरीद करके आएगी अभी यह जो त्यागी संतान यानी की साधु ब्रह्मचारी वहां पर गए थे जयराम बाटी व उनका भी ऐसा था कि बड़ी ही अर्ली मॉर्निंग को उठ जाएंगे और मां के लिए मां के श्री चरणों में ऑफर करने के लिए पद्म फूल यह कमल के फूल खोजने को निकलेंगे तो वहां पर दो-तीन जलाशय थे तालाब थे उस जलाशय में से फूल कलेक्ट करने के लिए ये लोग जा रहे हैं बड़ा ही मने अर्ली मॉर्निंग है अभी भी उजाला पूरा नहीं हुआ है इस तरह से आधा अंधेरा है वह रास्ते से जा रहे हैं देखा कि दो स्त्रियां जा रही है वापस आ रही है दूसरे किसी गांव से तो इन्होंने सोचा कि इतनी सुबह को यह स्त्रियां बाहर में बाहर से कहां से आ रही होगी ऐसा सोच रहे थे उसमें से उनमें से एक जो थी वह दूसरे के पीछे में छुप गई और फिर ऐसा करके वह उनके सामने से चली गई तो अभी यह जो एक महाराज थे उन्होंने दूसरे महाराज को कहा कि देखा तुमने वह जो स्त्री उनके पीछे छुप गई वह कौन थी तो दूसरे वाले महाराज ने कहा नहीं मैं नहीं पहचान पाया तो पहले वाले महाराज ने कहा वही हमारी मां वह हमारी सुविधा के लिए हमको अच्छा खिलाने के लिए इतना सुबह को दूसरे गांव जाकर के यह सब खरीद करके ला रही है तब यह दोनों महाराज देखिए आश्चर्य चकित हो गए कि मां अपने संतानों को कितना प्रेम करती थी तो यहां पर भी देखिए कि यह बलराम बाबू सुरेश सुरेंद्र बाबू खड़े हैं तो उनके सा साने वोह ना पड़ जाए उनकी नजर में ना आ जाए इसके लिए यह वृंदा झी का जो आंचल है उससे अपने को ढक लिया और पीछे वाली सीढ़ी से मंदिर में जाने के लिए उठ रही है ठाकुर तहा देखी ते पाइया डाकी लेन ठाकुर ने वह देख लिया कि वह यहां पर ये पुरुष भक्त खड़े हैं इसके लिए मां मंदिर के पीछे से उठ रही है सीढ़ियां इसलिए वह उनको पुकार करके कहे उठे ओगो ओई दिक दिए उठो ना अरे व पीछे से तुम सीढ़ी मत चढ़ना शहीदन एक मे छनी उठते गए पा पिछले पड़े मरे छे एक दिन एक मछवा एक और एक महिला उसी पगथला गया और गिरी और मर गई सामनेर दिके दिए य शोना बाहर सामने की यह जो सीढ़ी है उसी से तुम लोग आओ अभी ही को शनिया बलराम बाबू प्रवृति स्वर्या गेले जैसे ही ठाकुर की यह बात सुनी यह पुरुष भक्त समझ गए कि श्री मां आ रही है तो वह फिर वहां से चले गए तो खन श्री मां देवीर सन्मुख दाईया प्राण खुलिया तहां के दर्शन करी लेन जैसे ही पुरुष भक्त चले गए वैसे ही मां ने मां काली के सामने खड़े रह करर के बड़े ही प्राण भर कर के उनका दर्शन किया
प्रसंग: ठाकुर माँ को दीक्षा देते है
श्री मां और लखी देवी उत्तर पश्चिमांचल एक वृद्ध सन्यासी निकट शक्ति मंत्र दिखा लिया लेन श्री मां और लक्ष्मी देवी उत्तर पश्चिमांचल यानी कि यह नॉर्थ इंडिया के कहीं के एक वृद्ध सन्यासी है उनके पास में से शक्ति मंत्र की दीक्षा ली थी उन्होंने सन्नासी बेश मोटा छोटा शांतो और सुपुर छिलने यह सन्यासी जो थे वह बड़े ही वो तंदुरुस्त थे मोटा सोटा यानी कि उनका वेट ज्यादा था मोटे थे शांत और सुपुर थे नाम स्वामी पूर्णानंद उनका नाम था स्वामी पूर्णानंद इनी तो खन कमार पुकुरे गिया लेन यह स्वामी पूर्णानंद उस समय कामर पुकुर आए होंगे तो मां भी थी वहां पर और लक्ष्मी दीदी भी थी दक्षिणेश्वर बासो काले श्री श्री ठाकुर श्री मायर जीवाय एक दिन की लिखिया दले तो अभी यह पहली बार तो उनसे दीक्षा ली थी किंतु फिर ठाकुर ने भी उनको दीक्षा दी है तो जब वह दक्षिणेश्वर में मां थी उस समय मां की जीभ के ऊपर में ठाकुर ने एक मंत्र लिख दिया था श्री मां पौर दिन लखी देवी के बोली लेन काल तीनी आमार जीभ लिखे दिए छन तयो जाना मां ने दूसरे दिन लक्ष्मी दीदी को कहा कि कल ठाकुर ने मेरी जिहुआ के ऊपर में मंत्र लिख दिया है आज तुम भी जाओ तुम भी उनसे दीक्षा लेकर के आ इ हार परे एक दिन श्री रामकृष्ण लखी देवीर जिवा तेव राधा कृष्ण बीज और नाम लिखिया दिया लेन उसके बाद में एक दिन ठाकुर ने लक्ष्मी दीदी की जिवा के ऊपर में भी राधाकृष्ण का बीज और नाम लिख दिया था एवं उहा के शक्ति मंत्र दीक्षिता जानिया बोल्या लेन ता होक आमी ठीक दिए छ और उनको शक्ति मंत्र से दीक्षित होकर है यह जानने के बावजूद ठाकुर ने कहा था कि भले ही शक्ति मंत्र से दीक्षा ली हो मैंने जो राधाकांत का जो राधाकृष्ण का जो मंत्र दिया है वह ठीक ही है अभी देखिए कि लक्ष्मी दीदी का स्वभाव जो था बाद बाद में जिस तरह से वह भजन कीर्तन करना बड़ा ही उनको पसंद था पुरुष जब पुरुष भक्त बैठे होते हैं वहां पर भी वह कीर्तनया का ढंग से य उस नाटकीय अंदाज से वह कीर्तन वगैरह किया करती थी तो यह उनका स्वभाव था उनके जो बाद में उन्होंने कोई एक आश्रम की भी स्थापना की थी और उनके जो पुरुष भक्त है उनके साथ में वह तीर्थ यात्रा वगैरह भी किया करती थी तो उसी समय यानी कि यह जो भक्ति का जो मार्ग है वह भक्ति का मार्ग खास करके यह मधुर भाव वगैरह उनके भीतर में था तो ठाकुर ने किंतु मां शारदा देवी को सावधान करते हुए कहा था कि देखो लक्ष्मी का तो यही स्वभाव है तुम उसके साथ में ताल में ताल मिला कर के अपनी लज्जा मत भांग अर्थात कि लक्ष्मी जिस तरह से पुरुष भक्तों के साथ में बात करती है जिस तरह से उनके साथ में तीर्थ यात्रा वगैरह करने को जाती है जिस तरह से उनके साथ में कीर्तनया के अंदाज में कीर्तन करती है तुम इस तरह से करने को मत जाना तुम अपनी लज्जा हमेशा रक्षा करके चलना और देखिए कि बाद में भी जब भी यह पुरुष भक्तों का आगमन मां के पास में प्रारंभ हुआ यह सन्यासी जितने भी संतान थे मां के मां की कितनी रक्षा करते थे मां बड़ा सा लंबा घुमट टान करके बैठती और यह लोग सब मां को जब प्रणाम करने को जाते तो कमरे में प्रवेश भी नहीं करेंगे बाहर से ही चौखट के ऊपर में से ही प्रणाम करके जाएंगे और यदि वह अपना नाम वगैरह कुछ बताएंगे या कुछ प्रश्न करेंगे तो फिर वो मां ये जो अपनी गोलाप मां है या ऐसा कोई मां के पास में खड़ा रहेगा और फिर जो मां जब उत्तर देगी बड़े ही मृदु स्वर से देगी यानी कि मां की मां के गले का आवाज भी ये लोग सुन ना पाए चेहरा तो नहीं देख पाए चेहरा तो ढका ही है किंतु उनकी आवाज तक ना सुन पाए इस तरह से मां बड़े ही हल्के स्वर में उत्तर देती और फिर यह गोलाप मां जो थी गोलाप मां फिर चिल्ला करके वो जो माने जो प्रश्न उत्तर दिया है वह कहती कि मां यह उत्तर दे रही है आपको चिल्ला करके वह उसे अभी गोलाप मां का भी ऐसा था बड़ी ही अग्रेसिव थी और पुरुषों के सामने उनको किसी तरह का डर नहीं था तो यह सब लोग किंतु इनके साथ में आप मां का कंपेयर कीजिए देखिए कि लज्जा जैसे कि उनका एक आभूषण है यह ये प्रश्न होगा कि आज के आधुनिक समय में आधुनिक स्त्रियों के लिए मां का यह आदर्श किस तरह से किस किस रूप में ग्रहण किया जाए जैसे देखिए कि आजकल तो सब स्त्रियां जॉब भी करती है नौकरी भी करती है साइंटिस्ट भी होती है डॉक्टर भी होती है सब कुछ लॉयर भी होती है और मैंने इतना सभी क्षेत्र में राजनेता है मने राजकारण है पुलिस है आईपीएस ऑफिसर होती है तो सब क्षेत्र में देखिए कि आजकल स्त्रियों का प्रवेश हो रहा है और होना भी चाहिए तो अभी यदि आप आईपीए ऑफिसर है ना कि कोर्ट में लॉयर है और कहेंगे पुरुषों के साथ में बात नहीं करनी यह तो असंभव है तो फिर मां का जो आदर्श है किस तरह से अपने जीवन में उतारा जाए इस सबका एक्चुअली देखिए कि इसका उत्तर कोई पुरुषों को देने की आवश्यकता नहीं है स्त्रियों को ही इसका उत्तर अपने से खोजना है स्वामी जी ने एक बार कहा था स्वामी जी को किसी ने प्रश्न किया अच्छा यह बाल्य विवाह है यह विधवा का विवाह नहीं होता है भारत में स्त्रियों की यह सब समस्या है तो इसका निराकरण इसका उत्तर आप क्या देते हैं तो स्वामी जी ने कहा था कि मैं क्या औरत हूं कि मैं व सब प्रश्न का उत्तर दूंगा स्त्रियों के ऊपर में ही छोड़ दो उनको जिस तरह हमारा कार्य है स्त्रियों को शिक्षित करना एक बार उनको शिक्षा मिले एक बार उनकी खुद की एक एक डिसर्निंग विवेक और कैपेसिटी एक डेवलप हो बुद्धि उनकी प्रखर हो फिर वह अप अपना रास्ता अपने से खोज लेगी हैंड्स ऑफ स्वामी जी कहते हैं कि हमको यह सब जाने की जरूरत नहीं है स्त्रियों को ही इसका उत्तर देने दो तो स्वामी जी ने ऐसा कहा है किंतु फिर भी यदि मैं अपनी ओर से यदि एक बात यहां पे ऐड करूं कि देखिए कि मां को लिटरली फॉलो करना तो आज की स्त्रियों के लिए संभव नहीं है वही नबत की एक छोटी सी कुटिया में रहना पुरुषों के सामने इतना लज्जा शलाला की तरह वर्तन करना यह तो संभव नहीं होगा यदि आप जॉब करती है जदिया इवन आप हाउसवाइफ भी है तो अब यह बच्चों को स्कूल में रखने के लिए जाना पड़ेगा गाड़ी वगैरह स्कूटर वगैरह चलाना पड़ेगा बैंक में जाना पड़ेगा आज की स्त्रियां यदि यह कहेगी कि घर से बाहर नहीं निकलेगी घर का सारा काम पुरुष ही करेंगे बाहर का सारा काम तो वह संभव नहीं है वह होने वाला नहीं है तो फिर उनको इस तरह से रहना है कि यह जो एसेंस है लज्जा का यह पवित्रता का यह एसेंस के रूप में ले लेना है बाहर बाहर से भले ही चाहे सबके साथ में इंटरेक्शन करें बाहर से भले ही चाहे बैंक में जाए गवर्नमेंट ऑफिस में जाए मार्केट में जाए शॉपिंग के लिए जाए रेस्टोरेंट में जाए बाहर से कहीं प भी जाए किंतु भीतर में अपनी लज्जा है या तो अपनी मर्यादा है या तो फिर अपनी यह आबरू है इसकी रक्षा भीतर से आंतरिक रूप से उनको करनी है ये एक मेरा विचार है किंतु जैसे ही स्वामी जी ने कहा कि स्त्रियों को ही इसको सोचना होगा कि आधुनिक जीवन में मां शारदा देवी के आदर्शों को किस तरह से अप्लाई किया जाए और यहां पर दूसरा कि ये मंत्र के बारे में देखिए कि ठाकुर बहुत सारे लोगों की जीभ के ऊपर में मंत्र लिख देते थे इंटरेस्टिंग कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में योगेन महाराज के साथ में मां वृंदावन वगैरह दर्शन करने के लिए गई थी तो फिर उस समय ठाकुर ने मां को स्वप्न में आकर के आदेश दिया कि योगन की दीक्षा हुई नहीं है तुम उसको मंत्र दो तो व अभी पहली बार तो जब मां ने ऐसा देखा ठाकुर का दर्शन तो उन्होंने ज्यादा कोई ध्यान नहीं दिया दो-तीन बार इस तरह से दर्शन होने लगा तो मां भी चिंता में पड़ गई वह सोच रही है कि अभी तो ठाकुर की महासमाधि हुई है अभी से मैं जद दीक्षा वगैरह देना शुरू कर दूंगी तो लोग क्या कहेंगे लोग तो कहेंगे कि मा अभी ठाकुर गए और यहां पर मां गुरु भी बनना शुरू कर दी तो एक लोग लोगों का भी तो एक है कि लोग क्या कहते हैं उसके अनुसार में रहना है तो मां कुछ बोल नहीं रही है किंतु जब दो-तीन बार इस तरह से ठाकुर ने आकर के कहा तो फिर मां ने क्या किया योगेन मां वहां पे थी तो योगेन मां के द्वारा यह योगेन महाराज को पूछ आया कि अच्छा ठाकुर ने मुझे इस तरह से दर्शन दिया है तो तुम्हारी दीक्षा हुई है कि कि नहीं मैं तुमको मंत्र दूं तो तुम लोगे कि नहीं ग्रहण करोगे कि नहीं तो योगेंद्र महाराज को जब यह बात पता चली तो उन्होंने रिप्लाई दिया कि मुझे भी ठाकुर ने आकर के दर्शन दे कर के कहा है कि मैं आपसे दीक्षा लूं किंतु मैं आपके सामने आकर के यह बात करने का साहस नहीं जुटा पाया था इसलिए मैं कुछ बोला नहीं तो जो भी है तो फिर एक दिन ठीक हुआ कि एक दिन मां योगेंद्र महाराज को दीक्षा देगी और इस तरह से योगेंद्र महाराज की दीक्षा हुई मां का प्रथम मंत्र शिष्य इस तरह से योगेन महाराज हुए कोई और भी एक दो लोगों का नाम दिया जाता है मोस्ट प्रोबेबली त्रिगुणा तिता अंद जी महाराज का आई एम नॉट श्यर किंतु यह योगन महाराज की दीक्षा का प्रसंग बड़ा ही इस तरह से प्रसिद्ध है और यह जो मंत्र ठाकुर और भी एक इसके साथ में है कि ठाकुर जिनको मंत्र देते थे तो अ जैसे कि कोई नया डिवोटा उनके सामने आ रहा है या आने वाला है तो ठाकुर देख देख सकते थे कि उनके इष्ट देवता कौन से हैं बहुत बार ऐसा होगा कि कोई सोच रहा है कि मेरा इष्ट यह है किंतु ठाकुर और ही किसी देवता का मंत्र देंगे और फिर इस देवता के मंत्र की जप पूजा करते-करते या जप करते करते उनको पता चलेगा कि नहीं नहीं मेरे सही इष्ट तो यही है यानी कि यह लोग जिनके क्या इष्ट है वह अपनी नजरों से देख सकते थे देख कर के यह लोग मंत्र जब मंत्र दीक्षा देते थे आज कभी-कभी हमको पूछा जाता है कि अच्छा मां काली का मंत्र आप देते हैं कि नहीं या तो इवन मां शारदा देवी का मंत्र देते हैं कि नहीं तो अभी एक समय था कि हमारे गुरु महाराज है परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज वह जिस तरह से जो ट्रेडिशनल आ रही थी राजा महाराज वगैरह की कि किसका क्या इष्ट है उसके अनुसार मंत्र देते थे किंतु आजकल जो है वही सर्व देव देवी स्वरूपाय श्री रामकृष्ण देव का ही मंत्र दिया जाता है उसी मंत्र के आधार पर आप सब कुछ कर सकते हैं यहां तक कि यह काली पूजा शिव पूजा वगैरह भी मां तो कहती है कि ठाकुर के मंत्र से आप सब कुछ कर सकते हैं और फिर यह मंत्र को लेकर के जो कोई कंप्लेन करता कि हां मैं इतना जप कर रहा हूं फिर भी मुझे कोई शांति नहीं मिल रही है तो मां कभी-कभी नाराज हो जाती कहती कि क्या भगवान तुम्हारे लिए जैसे कि तुम्हारी अपेक्षा करके बैठे हैं ये क्या कोई आलू सब्जी खरीदने की तरह है कि मैंने इतना जप किया तो मुझे इतना शांति मिलना चाहिए कभी-कभी कोई आकर के कंप्लेन करता मां के पास में कि मुझे शांति नहीं मिल रही है तो मां उत्तेजित हो कर के कह देती 10 15 हज जप करके देखो देखो कि कैसे शांति नहीं मिलती है करना कुछ नहीं है बस बैठे-बैठे कंप्लेन करते रहना है और किसी ने आकर के कहा मां को पत्र लिखा था कि हां मुझे मैं आपके पास में दर्शन करने के लिए और मंत्र प्राप्त करने के लिए आना चाहता हूं एक दिन में आया था किंतु आप उस समय बीमार थी और आपके सेवक लोगों ने मुझे आपके पास में नहीं आने दिया था तो अभी क्या है कि मैं तो बड़ा दूर रहता हूं और मेरे वहां पे आपके वहां पे आने में मुझे बड़ा कष्ट होता है आई थिंक यह जयराम बाटी की बात है तो आप एक कृपा करके मुझे बताइए कि मैं कौन से दिन आपके वहां पर आऊं जिससे कि मैं मुझे मंत्र दीक्षा मिल जाए तो अभी यह पत्र पढ़ कर के हमको लगता है कि रीजनेबल रिक्वेस्ट है अभी यह बड़ा कष्ट करके लंबी यात्रा करके मां के पास आए पता चला कि मां बीमार है मंत्र दीक्षा नहीं होगी तो फिर कैसे चलेगा तो मां ने एक बड़ा ही सरप्राइजिंग उत्तर दिया है मैंने जब यह पढ़ रहा था तब मैंने सोच लिया कि अभी नेक्स्ट पैराग्राफ में मां वही कहेगी कि उसको कहो कि कैसे भी करके आ जाए बीमार हूं तो क्या है मैं मंत्र दे दूंगी जैसे कि इस तरह के और है भी सही कितने इस तरह के यह उदाहरण है मां के जीवन के आखिरी समय में वह जब मृत्यु शैया प लेटी हुई थी एक लड़का वहां पर आया उद्बोधन की बात है वो चिल्लाने लगा कोई उसको मां के पास नहीं जाने दे रहा है तो बड़ा हटो गोल करने लगा और चिल्ला चीखने चिल्लाने लगा कि मां क्या आपकी अकेले की है मुझे भी मां का दर्शन करना है तो मां अपने शैया प सोई हुई थी ब उठकर के बैठ के खड़ी हुई और कहा कि उसको मेरे पास में आने दो फिर मां ने क्या कहा था ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने के लिए आए हैं यहां पर यानी कि क्या हम आनंद करने के लिए थोड़ी ना आए हैं एटर जन नहीं तो अदरा आशा यह लोगों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के लिए तो हमारा आगमन तो अभी यह सब कहानियां हमने पढ़ कर के रखी है तो यह लड़का जबी पत्र में लिखता है कि आप मुझे कृपा करके बताइए अपॉइंटमेंट दीजिए अपॉइंटमेंट शब्द यूज नहीं हुआ है किंतु कहने का आशय वही है कि जिस कि जिस फिर मैं उसी समय आऊं और उसी समय मुझे मंत्र दीक्षा भी मिल जाए तो मां ने बड़ा सरप्राइजिंगली कहा कि देखो मैं जब बीमार हूं तो किसी को मैं मिलूंगी नहीं किसी को दीक्षा नहीं दूंगी और इस तरह से अपॉइंटमेंट देकर के आना तो संभव नहीं है उसको बोलो कि आए जब उसकी इच्छा हो यदि यहां पर दीक्षा होती है तो होती है नहीं होती है तो नहीं होती है उसके कर्म के फल के अनुसार है तो जब यहां पे मां इस तरह से कहती है वहां पे मां उस तरह से कहती है आश्चर्य होगा कि इन दोनों में विरोधाभास क्यों है तो क्या है देखिए कि यह हमारे संस्कार के ऊपर में हमारी यह जो इंट मुमुक्षु उव जो है उसके ऊपर में डिपेंड करता है बहुत सारे लोग शॉर्टकट अमाना चाहते हैं अपॉइंटमेंट दे दीजिए मैं आ जाऊंगा दीक्षा लेकर चला जाऊंगा मां को शायद ऐसा लगा कि वह सिंसियर नहीं है यदि वह सिंसियर होता तो पहले के जमाने में देखिए कि कहां लोग कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते थे पहले के जमाने में कहां आज भी करते हैं अमरनाथ की यात्रा करते हैं यदि जीवन में इष्ट देवता को प्राप्त करना है जीवन में यदि आध्यात्मिकता आध्यात्मिक विकास करना है तो वह खाटू नहीं खाट ही होवे खाटा ई खाट ही होवे अदर वाइज मने मेहनत करनी ही होगी अदर वाइज यह चलेगा नहीं तो जब मां किसी का यह इंटेंशन समझ लेती कि हां यह शॉर्टकट आजमाना चाहता है या तो फिर मुंह से तो बोलता है बड़ी-बड़ी बातें किंतु भीतर में सब खाली है तो मां इस तरह से कभी-कभी कठोर भी हो जाती थी कि ये अपॉइंटमेंट देकर के आना नहीं होगा उसको कहो जब आना है आए मैं बीमार हूं तो दीक्षा बिल्कुल नहीं होगी और इस तरह से किसी भी तरह का वायदा मेरे से नहीं होगा तो यह एक बात है और किसी ने एक मां को लिखा था कि मुझे शांति नहीं मिल रही है मैं क्या करूं तो उस समय भी मां ने नाराज होक के कह दिया ही संसार कोरे एलो ही कुड़ी गंडा छले बाप होए एलो और ना कि ऐसे बोलचे हम शांति पाई ना अर्थात की किसी ने पूछा मां पत्र लिखा कि मुझे शांति क्यों नहीं मिल रही है तो मां ने नाराज होकर के कहा यह तो संसार करके आए यह तो 20 बच्चों के बाप हो कर के आए और ना कि फिर पत्र में लिखते हैं मुझे शांति नहीं मिल रही है थोड़ा सा तो तपस्या करके देखो थोड़ा सा भी तो साधन भजन करके देखो तभी तो मन में शांति आएगी तो मां के दोनों तरह के स्वरूप थे जबी किसी भक्त के भीतर में उनको सिंसेरिटी देखती थी मां तो फिर सामने से कहती उड़ीसा ना कि वह कहां पे मां थी और एक लड़का मां के पास में आया तो फिर मां ने कहा कि अच्छा एक काम करो तुम दीक्षा लेकर के ही जाओ तो यह लड़का बोलता है मां मुझे पता नहीं है दीक्षा वगैरह क्या है और मेरी ऐसी कोई इच्छा भी नहीं है तो मां सामने से फोर्स करके कहती ना ना तुम दीक्षा लेकर के ही जाओ तुम्हारी दीक्षा हो ही जाएगी तुम लेकर के ही जाओ ऐसा करके उसका ऐसा कोई नहीं था कि मुझे दीक्षा लेनी है दीक्षा क्या है व भी पता नहीं है मां ने जोर करके सामने से चलकर के उसको दीक्षा दी है तो क्या है कि मां किसका हृदय में क्या है वह देख पाती थी वह देख कर के किस तरह से किसको दीक्षा देनी है किसको नहीं देनी है किसको डांटना है किसको भरोसा दिलवाना है यह सब हृदय देख कर के मां कर पाती थी तो यहां पर भी ठाकुर का देखिए कि लक्ष्मी दीदी ने भले ही शक्ति मंत्र में दीक्षा ली हो ठाकुर ने कहा कि भले तुमने शक्ति मंत्र में दीक्षा ली है मैंने तुमको यह जो राधाकृष्ण का जो बीज और म दिया है वह मैंने ठीक ही दिया है तो यह लोगों के हृदय में क्या है उसके अनुसार यह लोग हमको गाइड करते
प्रसंग: साधन-भजन में थोड़ा सा भी आलस करने से हम पीछे पड़ जाते है
थे प्रत्य हो राते तिन टाय सज्जा तागे श्रीमान नह बते पश्चिम धारे बारां दई दक्षिण मुखे बोसिया ध्यान करी तेन प्रत्येक दिन रात को न बजे सैया त्याग करके श्री मां नबत के पश्चिम किनारे के जो वरांडा है वहां पर दक्ष ण मुख होक के बैठ कर के ध्यान करती य विषय कोनो व्यतिक्रम होई तो ना इस बात में कभी भी कोई भी परिवर्तन नहीं होता एक दिन शरीर भालो ना थाका ध्यान बसते एकट देरी होई लो किंतु हुआ क्या एक दिन मां का शरीर ठीक नहीं था स्वास्थ्य अच्छा नहीं था तो ध्यान में बैठने में थोड़ी सी देरी हो गई तार पर दिन को एकक दिन आलस्य बस तो ध्यान समय क्रम पिछा जायते लागी लो और जैसे ही एक बार ऐसा हुआ वैसे ही धीरे-धीरे करके दूसरे कुछ दिनों में ध्यान का समय धीरे-धीरे करके पीछे जाने लगा पहले 3:00 बजे नियमित उठती थी एक बार देरी हुई शरीर की अस्वस्थता की वजह से और उसके बाद में यह जैसे ते गेले खूब आंतरिक जत्न और रोख चाहि तब मां को समझ में आया कि अच्छा काम करने के लिए भीतर में से खूब एक डेडिकेशन भी चाहिए और मन का जोर भी चाहिए रोख चाहि मन का जोर चाहिए एक प्रचंड विल पावर चाहिए यदि यह विल पावर नहीं है तो हमारा मन हमेशा किसी ना किसी शॉर्टकट को खोजने के लिए बैठेगा मैं अपना ही उदाहरण दूं तो शाम को आरती के बाद जब मैं अपने कमरे में वापस आता हूं ये एक बड़ा ही सुंदर समय होता है शाम को आरती के बाद का समय या तो फिर सुबह को आरती के बाद का समय हमको मिनिमम दो घंटा ऐसे मिलते हैं जब कोई भी तरह का डिस्टरबेंस नहीं होता किसी भी तरह का डिस्ट्रक्शन नहीं होता किसी भी तरह का बाहर से कोई डिमांड नहीं होती और वैसे ही आरती अटेंड करके हमारा मन वैसे ही शांत और एकाग्र हो चुका है उस समय यदि मैंने यह ठीक किया है कि मैं अपने कमरे में आकर के बैठ कर के या तो जप करूंगा या तो फिर ठाकुर की कोई किताब पढ़ूंगा जिसका नाम है उसकी ही वाणी है तो मेरी दृष्टि से जप करना या कथामृत पढ़ना वह इक्विवेलेंट है कथामृत या ठाकुर मां की कोई भी बातें तो यह मेरे लिए इक्विवेलेंट है तो या तो दो में से एक करूंगा किंतु क्या है कि यह जो भीतर में दूसरे जो विषय की ओर जो एक आकर्षण होता है न्यूज़ पढ़ने की एक इच्छा मेरी बड़ी तीव्र है और फिर यह सोशल मीडिया पर कुछ ना कुछ तो मैसेज आते ही रहते हैं तो फिर आकर के ही पहले तो ऐसा लगता है कि मोबाइल खोल कर के देख ले एक बार कि क्या मैसेज आया है कि क्या अपडेट आई है क्या नोटिफिकेशन आया है तो यदि एक बार उसको मन के लोभ में आकर के खोल दिया और फिर यह सोशल मीडिया इस तरह का एक भयानक ब्लैक होल है कि एक बार उसमें हमने हाथ डाला तो पूरा हमको खींच लेता है तो यह जो उसका एडिक्टिव प्रॉपर्टी है सोशल मीडिया का इतना डेंजरस है कि कभी-कभी ऐसा होता है कि अरे दो घंटे कहां पे पसार हो गए मैं तो सोचता था कि ना कहीं में बैठ कर के जब करूंगा ना ही कोई अच्छी किताब पढ़ूंगा झुठ मुठ का मैंने दो घंटा वेस्ट कर दिया अरे यह मैंने क्या कर दिया तो यह मैंने खुद के साथ में देखा है जो कुछ-कुछ चीजें एडिक्टिव होती है आज का जो जगत है खास कर के यहां पे रजस का जो प्राधान्य है वो रजस का प्राधान्य ऐसा है कि यह सब चीजों में एक बार आप पेर डाले किसी ने मुझे कहा था एक डिवटी ने कि आजकल लोगों को यह स्टॉक मार्केट का यह जो यह होता है ना वह प्राइस स्टॉक की वो देखने का एक ऑब्सेशन हो गया है जो लोग स्टॉक का ट्रेडिंग करते हैं तो सब समय वह लोग 510 मिनट पे वोह मोबाइल खोल करके देखते रहेंगे स्टॉक का क्या प्राइस है उसका क्या शेयर का क्या प्राइस है यह जो प्राइस बड़ा है तो सेल कर दो कम हुआ है तो परचेस कर दो पूरा वो लोग उसमें जैसे कि नशे की तरह वो लोग उसमें घुस जाते हैं यह तो कोई प्रोडक्टिव वर्क तो हुआ नहीं आपने कोई क्रिएट आपने समाज में कंट्रीब्यूट तो कुछ किया नहीं है बस यह स्टॉक का ट्रेडिंग करके आप अपना फाइनेंशियल सिचुएशन को चला रहे हैं यह तो समाज के ऊपर में एक्चुअली एक तरह से देखा जाए तो बर्डन है किंतु खैर जो भी है आज के युग में यह सब है तो यह जो रजस है यह रजस प्रधान युग है एक समय था जबकि भारत तमस प्रधान हुआ करता था और उस समय स्वामी जी हमको अराइज एंड अवेक का उपदेश देते थे आज परिस्थिति रिवर्स हो गई है आज हम इतने राजसिक हो गए हैं कि स्वामी जी जदी आए तो बोलेंगे 510 मिनट बिना काम किए बैठो थोड़ा सा शांति से मन को थोड़ा सा शांत होने दो जो परिस्थिति स्वामी जी ने अमेरिका में एनकाउंटर की थी उस समय कि लोग बड़े ही राजसिक है बड़े ही रेस्टस है बड़े ही इधर-उधर घूमने फिरने वाले हैं एक जगह पर बैठना किसी एक विषय में मन को एकाग्र करना उनके लिए संभव नहीं होता है वही परिस्थिति आज स्वामी जी यदि आते तो भारत में देखने को मिलती और इसीलिए मुझे लगता है कि आज आज क्या है पता है भारत और अमेरिका का रोल रिवर्सल हो गया है एक समय था कि स्वामी जी कहते थे कि भारत में से योगा और वेदांत को अमेरिका में जाना चाहिए और और अमेरिका में से यह साइंस टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रियल इजेशन भारत में आना चाहिए अभी इस तरह का रोल रिवर्सल हो गया है कि अपनी आईआईटी वगैरह में से जो ग्रेजुएट है उसको हम वहां पे एक्सपोर्ट करते हैं और वहां का योगा और वगैरह है वो हम यहां पे इंपोर्ट करते हैं यह देख कर के कि देखो घोरे लोग जद योगा करते हैं तो हमको भी करना चाहिए एक तरह का जैसे कि रोल रिवर्सल हो गया है तो यहां पे भी देखिए कि मां मां के जीवन में भी कि एक दिन थोड़ा सा देरी हो गया तो फिर बाकी के सभी दिन सभी दिन या कुछ दिन तक देरी देरी होती रही तब मां समझ गई कि मन में बड़ा ही रोख चाहिए अर्थात कि मन में बड़ा ही जोर चाहिए बड़ा ही स्ट्रांग विल पावर चाहिए यदि आध्यात्मिक जीवन में हमको प्रगति करनी है तो ताई परे ओई विषय तिनी शतर को होया छ लेन और इसीलिए बाद में मां इसके बारे में बड़ी ही सावधान हो गई थी बड़ी ही तर्क हो
प्रसंग: माँ प्रतिदिन एक लाख जप करती है
गई थी तहर जपर संख्याओ खूब बेसी छलो मां के जब की संख्या भी बहुत ज्यादा थी एक दिन तिनी कथा प्रसंगे नलिनी दीदी के बोलिया लेन आमी तो देर बय से कतो करे छी नलिनी दीदी को उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हारी उम्र की थी तब मैंने कितना काम किया था कितना साधन भजन किया था य सब करयो रोज एक लखो जप कर तुम इतना काम करने के बाद में भी रोज में एक लाख जप करती ई ध्यान जपे संगे तहर मने अभिराम प्रार्थना चली तो इसी ध्यान जप के साथ में मां के मन में अविराम प्रार्थना चलती रहती रात्रे जखन चांद उठी तो तखन गंगार भीतर स्थिर जले ताहर प्रति छब देखिया तिनी सजल नयने भगवान निकट प्रार्थना करतन रात को जब चांद उठता तब यह चांद का प्रतिबिंब गंगा के स्थिर जल के ऊपर में पड़ता तो यह प्रतिबिंब देख कर के वह सजल नयन अश्रु भरे नयनों के साथ में भगवान के पास में प्रार्थना करती चंद्रे कलंक आछे अर मने जेनो कोनो दाग ना थाके चंद्र के भीतर में भी कलंग है हे प्रभु हे ईश्वर किंतु आप मुझे इस तरह का आशीर्वाद दीजिए कि जैसे मेरे मन में किसी भी तरह का दाग ना रह जाए किसी भी तरह का कलंक ना रह जाए मां ने कहा था कि एक समय आया था कि जब मेरी दोष दृष्टि हो गई थी सभी के दोष देखना शुरू कर देती थी तब इसी तरह से मां ने चंद्रमा की ओर देख कर के प्रार्थना करते कहा था कि यह दोष दृष्टि हटा दो और मां के मन में से वह दोष दृष्टि चली गई दूसरों की नींद मतलब दूसरे लोग इस तरह से कुछ गलत कर रहे हैं ये यह गलत कर रहा है ऐसा देखने की ऐसा सोचने की वह जो अभ्यास हो जाता है उसको कहते हैं दोष दृष्टि और यहां पर देखिए कि मां के मां ने इस तरह से जो प्रार्थना की तो इस प्रार्थना का उत्तर भी तो उनको मिला था प्रार्थना का फल भी तो उनको मिला था मां शार अच्छा यह जो
प्रसंग: माँ के जीवन में पागली मामी को श्राप देने वाली घटना क्या सही है? निर्विकल्प समाधी प्राप्त क्या इस तरह की गलती कर सकता है?
मां के जीवन में किसी भी तरह का कलंक ना हो मां के जीव मन में किसी भी तरह का दाग ना हो इसके बारे में ना अभी मैंने रिसेंटली एक बड़े ही सीनियर किसी के पास में से एक व्यक्ति के व्यक्ति ने ऐसा कुछ कहा ऐसा मुझे सुनने को आया यह जो व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूं उन्होंने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का बड़ा ही अभ्यास किया है शास्त्र के भी माहिर है और बड़े अच्छे वक्ता भी है और बड़े प्रसिद्ध भी है इस व्यक्ति ने एक बार कहीं पर ऐसा कहा कि देखिए यह जो मां के जीवन में वह जो घटना आती है ईशाना नंद जी ने इस घटना को लिखा है कि यह पागली मामी एक बार मां को मारने के लिए आई तो मां क्रोधित होकर के बोल उठी कि तुम्हारा जो तो हाथ खोश पड़े अर्थात कि यह जो तुम्हारा हाथ है वह गलत वो गल जाएगा तो अब जैसे ही मां ने ये शराप दिया साथ में ही मां एकदम शहर शिहोर उठी लिखा है यानी कि बड़ी ही म धुज नहीं लगी मां ने कहा कि अरे यह मैंने क्या कर दिया पश्चाताप के मारे मेरे मुंह में से इस तरह की बात क्यों निकल गई अभी देखिए कि मां के भी मां के मुंह से ये शराब तो निकल ही गया है तो जब मां की महासमाधि हुई थी इसके बाद में इसी यह जो पागली मामी उनको कुष्ठ रोग हो गया था लेप्रोसी हो गई थी और सही सही में उनकी उंगलियां गल गई थी तो इस तरह से मां का श्राप था वो फलीभूत हुआ था अभी यह जो व्यक्ति है जो बड़े ही विद्वान भी है बड़े ही जानेमाने भी है उन्होंने एक जगह पर ऐसा कहा कि ईशाना नंद जी महाराज ने यह प्रसंग लिखा है वो गलत है उन्होंने इस बात को ठीक-ठीक नहीं लिखा है क्यों क्योंकि ठाकुर ने खुद ने कहा है कि जिनको की निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है या तो फिर जिनके ऊपर में ईश्वर के आशीर्वाद आते हैं वह गलती से भी कोई गलत काम नहीं कर पाएंगे तो यदि गलती से भी गलत काम जिससे ना हो जिन्होंने पूर्णता प्राप्त कर दी है तो मां के मुंह से यह शराप निकल कैसे गया यह शराप वाली जो पूरी बात है वही गलत है उसको हमारे साहित्य में होनी ही नहीं चाहिए मैंने जब यह बात सुनी तो मैं तो बड़ा ही आश्चर्य चकित हो गया क्योंकि इस व्यक्ति के ऊपर में मेरी भी थोड़ी सी यह है इस तरह से मैं उनको समझता हूं कि उन्होंने अपने साहित्य को बड़ा अच्छे से समझा है तो इस तरह का व्यक्ति यदि इस तरह की बात करेगा कि यह मां का जो प्रसंग है वह गलत है मां कभी श्रप दे ही नहीं पाएगी मैं इतना आश्चर्य चकित हो गया क्योंकि देखिए कि जिन्होंने अपने साहित्य का अभ्यास किया है अपने साहित्य में इस बात को कितना भार पूर्वक कहा गया है कि इनका देवी और मानवत्वम ठाकुर और मां में देवी देवता का या देवी त्व का भाव और यह मनुष्य भाव दोनों पैरेलल एजिस्ट करते थे एक ठाकुर कभी-कभी लोगों पर नाराज हो जाते थे गाली गलोज दे बैठते थे हृदय के साथ में तो हमको पता है कि जब रामलाल दादा देखते थे कि वह हृदय कुछ कहता है तो ठाकुर ऐसे नाराज हो गए इस तरह की गाली देना शुरू किया कि उस गाली को आप कहीं पर लिख नहीं पाएंगे अ जो गृहस्थ लोगों के सामने आप बोल नहीं पाएंगे ऐसी गाली देते थे और सिर्फ गाली ही नहीं सामने जो कुछ भी आया वो मेरे जो झाड़ू आया ना कि जूता आया उठा कर के फटाफट ये हृदय को मारना शुरू कर देते थे तो रामलाल दादा कहते हैं कि मैं यह देख करके सोच रहा था कि अभी यह दोनों का बिगड़ा है अभी यह जो इन दोनों का रिलेशन टूटेगा कभी ठीक नहीं होगा किंतु देखता था 510 मिनट के बाद में ही दोनों हंसी मजाक कर रहे हैं व दोनों आपस में वो वार्तालाप कर रहे हैं तो तो देखिए कि ये मां और ठाकुर दोनों ये देवी या तो देवत्व और मनुष्यवकाशा कि मां का हृदय इतना विशाल था मां मां के भीतर में सही सही मातृभ्यूशन भजन करने के बारे में प्रेरणा ही नहीं पाते यहां पे मां जो बार-बार कह रही है यह नलिनी दीदी को कहती है कि तुम्हारी उम्र जब थी मेरी तब मैं इतना सारा काम करती थी तब भी इसके बावजूद में 1 लाख जप प्रतिदिन किया करती थी यह जो बात हुई कि मुझे 3:00 बजे उठना ही है और एक दो दिन यदि शरीर खराब होने की वजह से मां नहीं उठ पाई तो बाद में धीरे-धीरे करके देरी होने लगी तब मां बड़ी ही अलर्ट हो गई कह रही है कि देखिए कि मन में प्रचंड विल पावर चाहिए इच्छा शक्ति चाहिए संकल्प शक्ति चाहिए वरना तो फिर इस तरह से आध्यात्मिक जीवन में हम विकास नहीं कर पाएंगे तो देखिए कि हमारी दृष्टि में या तो फिर अपने साहित्य में मां को संपूर्ण 100% परफेक्ट करके दिखाया गया होगा तो मां की यह जो बात है कि तुम क्यों नहीं प्रतिदिन एक लाख जप करते क्यों नहीं प्रतिदिन 3:00 बजे उठते क्यों नहीं अपनी लज्जा की रक्षा करते यह जो महापुरुष भक्तों के सामने आती नहीं थी नौबत में जब रहती थी शौच के लिए जाना होता था तो वही 3:00 बजे से पहले उठकर शौच वगैरह समाप्त कर देती थी क्यों क्योंकि दिन के समय में पुरुष भक्त भी इधर-उधर रहेंगे और मां जद नबत से बाहर आएगी तो उनकी दृष्टि में पड़ना जैसा हो गया तो इसके लिए जब दिन के समय में शौच का वेग आने से भी उस वेग को धारण करके रखती थी ऐसा करके करके पेट में उनको बीमारी हो गई तो यह जो परफेक्शन एक तरह से यदि हमको दिखता है तो यदि 1 % या 01 पर अपूर्णता इसमें नहीं रहेगी तो फिर हम लोग क्या सोचना शुरू कर देंगे कि अरे यह तो देवता ही है मां जगदंबा मां आध्या शक्ति स्वयं देह धारण करके पृथ्वी पर आई है उनकी तरह ना ही हमारे से जब ध्यान होने वाला है ना ही उनकी तरह अर्ली मॉर्निंग हम उठने वाले हैं ना ही उनकी तरह कोई तपस्या होने वाली है ना ही हम अपने चरित्र को इतनी रक्षा करने वाले हैं हम तो सामान्य आदमी है सामान्य आदमी की तरह ही रहेंगे आज बीमार हो गए ज मैं राजकोट में था दीक्षा होती थी तो मैं एक दो भक्तों को कभी-कभी पूछा करता था दीक्षा होने के दूसरे दिन कि क्या रे कितना जब किया आज तो बोला बड़ा ही उत्साह देगा कि महाराज मैंने आज 1008 जप कर लिए दीक्षा का दूसरा दिन है तो तो और फिर बोलता है कि अभी 1008 ही हुआ है कल से तो मैं अभी 2000 3000 करना शुरू करूंगा तो मैं हंस के बोलता था अच्छा ठीक है एक सप्ताह के बाद में पिर से पूछता हूं तो एक सप्ताह के बाद में पूछा कि आज जाए आज कितना जप हुआ तो बोला कि महाराज अभी वो बेचारा उत्तर देने दे शर्मा रहा है तो बोला न दिन से तो हुआ ही नहीं है फिर एक दिन यहां प जाना हुआ एक दिन वहां प जाना हुआ 108 करके छोड़ दिया उसके एक सप्ताह के बाद में पूछेंगे तो बोला कि अभी तो समय ही नहीं मिल रहा है तो देखिए कि हम लोगों का जैसे है कि दीक्षा मिली तो शुरू शुरू में उत्साह करके जो प्रारंभ किया बाद में सब खत्म हो गया रेयरली आपको कोई डिवटी मिलेगा कि दीक्षा लेने के 5 साल के बाद में 10 साल के बाद में आप पूछेंगे तो वह कहेगा कि हां मैं नहीं नियमित रूप से अभी भी जप कर रहा हूं 90 पर होंगे इस तरह के कि जिन्होंने यदि सप्ताह में एक बार जप कर पाए तो बहुत बड़ी बात है तो देखिए कि हम लोग इस तरह का अपना यह जो संकल्प शक्ति जीरो है पूरा यह अपने चरित्र को मेंटेन करने की जो शक्ति है वह भी नवत है इस तरह का जीवन लेकर के हम इनके पास में आए और फिर ये लोग जब ऐसा कहे कि क्यों 3:00 बजे नहीं उठ पाओगे क्यों एक लाख जप नहीं होगा क्यों अपने चत्र की रक्षा नहीं कर पाते हो तो फिर हम तो मन में ही मन में वही कहेंगे ना कि आपको तो और कोई काम धाम नहीं था मुझे तो पूरा संसार लेकर रहना है मैं यह सब कैसे करो तो देखिए कि जब हम इन लोगों में थोड़ी सी जब अपूर्णता देखते हैं मां ने श्राप दे दिया ठाकुर य हृदय को पिटाई करते थे या गाली देते थे यह सब कुछ हम जब देखेंगे तब हमको भी लगेगा कि देखिए यह लोग संपूर्ण ईश्वर तो नहीं है मनुष्यवकाशा उनके भीतर में भी है और एक अंश मनुष्य का लेकर के संसार का पूरा झमेला अपने सर पर रख कर के मां जदी कुछ कर सकती है एक लाख जब तो मैं प्रतिदिन 1008 क्यों ना कर पाऊं इतना तो मुझसे होगा इतना तो मैं प्रयास करके देखूं तो मेरी दृष्टि से यदि आपको साधना करनी है किसी इष्ट से प्रेरित होकर के तो वह इष्ट में अपूर्णता दिखनी चाहिए तभी तो हम लोग साहस पाएंगे तो आप यदि ऐसा कहेंगे कि जिनको समाधि मिल गई है उनके भीतर में किसी तरह की गलती हो ही नहीं सकती वे लोग गलती से भी गलती नहीं कर पाएंगे इस बात से हालांकि ठाकुर ने खुद ने कहा है इस बात को किंतु मुझे ऐसा लगता है कि इसका इंटरप्रिटेशन हमको और एक तरीके से करना होगा यदि ठाकुर यह कहते हैं कि सिद्ध महापुरुष है गलती से भी गलती नहीं कर पाएंगे इसका अर्थ मुझे ऐसा लग रहा है कि यह अभी जैसे देखिए कि यहां पे पागली मामी का ही संस्कार था कि उसका जो यह कर्म का प्रवाह था उसको इस श्राप की ओर ले गया मां ने श्राप दिया है उसको इस दृष्टि से नहीं देख कर के इस दृष्टि से देखना चाहिए कि उसका चरित्र और उसके कर्म के फल की वजह से उसको इस श्राप का भोग बनना पड़ा इसमें मां का कोई दायित्व नहीं है पागली मामी का ही पूरा दायित्व है किंतु फिर भी ये एक पैराडॉक्स है जिसको कि हमको सोचना पड़ेगा बहुत सारे सोल्यूशन हो सकते हैं और कोई भी सॉल्यूशन काम भी करेगा या नहीं करेगा कितना एक्यूरेट है वह तो ईश्वर ही जाने किंतु यह पैराडॉक्स है और मैं तो एकदम स्पष्ट मानता हूं कि अपूर्णता होगी तभी हम लोग इनको सही सही फॉलो कर पाएंगे अदर वाइज हम उनकी पूजा करेंगे मंदिर में बिठा करके किंतु इनके आदेश का पालन हमसे नहीं होगा मेरी दृष्टि से माने इस पागली मामी को जो श्राप दिया वह उनके अवतार क्व की जगत मातृत्व की पहचान है अदर वाइज तो वह मां दुर्गा की तरह एकदम मने मंदिर में ही बैठ कर के रहती तो हम उनकी आराधना करने के अलावा कुछ नहीं करते उनके आदेश के अनुसार साधन भजन कभी नहीं कर पाएंगे तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण
प्रश्न: मैं समझ नहीं पाया कि मंत्र जीभ पर कैसे लिखा जा सकता है?
मस्तु ना ना ना उंगली से ही लिख देंगे उंगली ही जिप के ऊपर में लिख देंगे व मां कहती है ना कि मा मानुष गुरु मंत्र दे काने सिद्ध गुरु मंत्र दे प्राण मनुष्य गुरु जो होता है वह मंत्र देता है कान में और जो सिद्ध गुरु होता है मंत्र देता है प्राण में यानी कि वह मंत्र के द्वारा मंत्र की यह गुरु की शक्ति य शिष्य में प्रसारित होती है तो जीवा पर मंत्र लिखने से यह डायरेक्ट गुरु शक्ति हमारे में प्रसारित होगी किंतु आजकल ऐसा नहीं होता अभी तो हमारे गुरु महाराज जो होते हैं वह आपको माइक पर ही बता देंगे अभी वह सब प्रथाएं अभी ऑलमोस्ट हमारे संग में से चली गई है व सब
प्रश्न: आजकल मंत्र माइक पर दिए जाते हैं। क्या इससे मंत्र की शक्ति कम हो जाती है?
पावर कम हो जाए ऐसा नहीं होगा वही तो पूछ रहे थे देखिए कि अभी क्या है कि समय के अनुसार तो हमको चलना होगा ठाकुर के पास में वही वो दिन में एक दो भक्त आते थे और कभी-कभी तोय मास्टर महाशय वगैरह जाकर देखते थे ठाकुर अकेले खाट के ऊपर में बैठे हैं आन साधन भजन में विभोर है तो उस समय की बात अलग है और अभी ऐसा है कि देखिए कि तीन चार अभी पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज और तीन-चार पूजनीय वाइस प्रेसिडेंट महाराज होते हैं यह लोग दीक्षा देने को आते हैं यहां पर जैसे विशाखापटनम में आए थे तो प्रतिदिन उनको 8080 लोगों को दीक्षा हो देनी होती थी तो अभी तो यदि ये महाराज यदि एक-एक को बुला कर के उनके कान में मंत्र बोले या वन टू वन जद मंत्र दे वो तो संभव ही नहीं तो इसके लिए समय के अनुसार यह सब करना पड़ता है किंतु देखिए कि हमको एक बात अपने संघ में जो प्रचलित है कि हमारे सही गुरु है श्री राम कृष्ण यह जो मंत्र आता है डायरेक्ट भगवान राम कृष्ण के पास में से ही आता है पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज या वाइस प्रेसिडेंट महाराज तो एक निमित्त मात्र है और ठाकुर की ठाकुर को ही प्रार्थना करनी है ठाकुर ने मंत्र दिया है ऐसा ही हमको ख्याल में रखना है तो इस तरह से समय के अनुसार यह सब परिस्थितियां है अभी विदेश में देखिए विदेश में इस तरह से अभी भी है अभी यह आप एक सेंटर में महाराज जी बैठे हुए हैं सेंटर में 1015 लोग मुश्किल से आते होंगे अभी उनको दीक्षा लेनी है तो वह तो एक अकेले बिठा कर के ही उसको दीक्षा देंगे तो वह यदि आपको अनुभव लेना है तो आप विदेश के सेंटर में जा सकते हैं ठीक ठीक मैंने जब दीक्षा ली थी रंगनाथ आनंद जी वैसे ही उनकी वो आखिरी टूर थी उस उसके बाद में उन्होंने बेलूरमठ में ही दीक्षा दी थी तो आखिरी टूर में मेरा नंबर लग गया था उनका तो अभी नेचरली मैंने जब यह सुनी यह बात मैं
प्रश्न: ईश्वर असुर संहार करते है परन्तु अवतार आते है हमारे लिए आदर्श की स्थापना करने के लिए.
इतना आश्चर्य चकित हो गया था मैंने सोचा कि इस लेवल का व्यक्ति इस तरह की बात कर सकता है दैट मींस व्हाट मैंने देखिए प्रश्न यह है कि फिर मैं गलत तो नहीं हूं वो भी तो एक हो जाता है ना बात कि उनका जो कहना है वही सही है कहीं मैं तो गलत गलत नहीं हूं किंतु मैंने जिस तरह से अभ्यास किया है अपने अपने लिटरेचर का और यह देखिए कि हम कंटीन्यूअस अभी यह लीला प्रसंग को भी पढ़ रहे हैं कि ठाकुर की अपूर्णता या तो मनुष्यवकाशा की आपको आवश्यकता ही नहीं है क्यों झूठ मुट का घर छोड़ कर के मां-बाप को रुला करके वहां पर मठ में जाकर के बैठेंगे एक बार मास्टर महाशय वरा नगर गए थे तो शशि महाराज के पिताजी आए तो शशि महाराज तो वहां से भाग लिए पिताजी वहां पर खड़े हैं देखा कि ये मास्टर महाशय लगा थोड़े वो मैच्योर है व थोड़े समझदार है तो मास्टर महाशय के साथ बात कर रहे हैं तो मास्टर महाशय ने कहा कि हम मैं तो घर पर रहता हूं जॉब करता हूं कि यहां पर आता हूं बीच-बीच में तो शशि महाराज के पिताजी बड़े खुश होकर बोले देखो मैं भी तो मेरे लड़के को यही कहता हूं तुम गए जॉब करो मां की सेवा करो फिर बीच में यहां पे आओ ना उसको रुला कर के यहां पे आ रहे हो मां की चिंता नहीं है ऐसा करके इतने नाराज हो गए मास्टर महाशय लिखते हैं मैं तो बड़ा दुखित हो गया मैं क्या उत्तर दूं अभी उनको कि हम लोगों का लाइफ अलग है इन लोगों का लाइफ अलग है तो मां को रुला करके यहां पे आना क्यों हम यह सब करते हैं जद वो सब कुछ पूर्ण ही है साधन भजन की जरूरत नहीं है तो हम जिस ट्रेडिशनल बड़े हैं यहां पर तो हमको यही लगता है कि उनको देख कर के साधन भजन की प्रेरणा लेनी है आशीर्वाद है प्रार्थना है सब कुछ है किंतु साधन भजन इज एन इंटीग्रल पार्ट ऑफ रामकृष्ण मूवमेंट और यह तभी हो सकता है जब यह लोग अपूर्ण थे किसी ना किसी तरह की अपूर्णता थी ट मेक्स साधन भजन मोर रिलेवेंट यह जो शरद महाराज का लीला प्रसंग अभी हम पढ़ रहे हैं देखिए कि अपूर्णता की ही बात चल रही है अपूर्णता ना होती तो वे लोग क्यों साधन भजन करते हैं वे लोग साधन भजन करेंगे तभी तो हम लोग करेंगे तो यह पूरा सब कुछ इंटी आप ऐसा नहीं कह सकते कि इनमें अपूर्णता नहीं है और यह अपूर्णता दूर करके फिर साधन भजन करो दिस इज नेवर गोइंग टू
प्रश्न: अवतार में अपूर्णता होने से हमारा प्रेम अवतार पे और भी बढ़ जाता है. परन्तु भक्त शुरू शुरू में अपूर्णता देखने से भाग जाएगा. इसी लिए नए आए हुए भक्तो के सामने अपूर्णता की बात नहीं की जानी चाहिए
हैपन तो फिर व मन मुख एक नहीं करना हो गया तो आपने झूठ बोल दिया ना व तो व दो आर भी बड़ा अपराध है यदि आप अपने मन में ऐसा नहीं मानते हैं मुंह से यदि ऐसा बोलते हैं तो और भी बड़ा अपराध हो गया यह झाड़ू था
प्रश्न: ठाकुर ह्रदय को मारते थे पहली बार सुना. और ऐसे कितने सीक्रेट है उनके?
जूता है जो सामने आया उठा के दे दिया ठाकुर मॉर्निंग वक के लिए जाते थे पता है ना रामलाल दादा के साथ में ना हां वो भी है मॉर्निंग वॉक के लिए जाते थे तो वो जो ग्रांड ट्रंक रोड है ना जीटी रोड वहां पे तो वो ग्रांड ट्रंक रोड सीधा जाता है तो वो ठाकुर उनके साथ में जाते थे कभी रामलाल दादा के साथ में तो कहते थे कि ये सीधा रास्ता देख कर के ना साधु के मन की ऐसा होता है उद्दीपन होता है ऐसा लगता है कि मैं साधु के मन को देख रहा हूं क्योंकि साधु का मन भी ऐसा सीधा जाता है वो गोल गोल घूमता नहीं है और सर के ऊपर में टोपी बोपी पहन लेंगे वह थोड़ा स्वेटर जैसा पहन लेंगे और वो रामलाल दादा के साथ में जाएंगे किंतु देखिए कि जिनको चाटा पड़ा है
प्रश्न: एक साधु से सुना है -- राणी रासमणि का मन भजन सुनते सुनते और कही भटकने लगा तो ठाकुर ने उनको चाटा मार दिया. हम भी मन लगाके जप करे वरना हमें भी ठाकुर का चाटा पड़ेगा.
वह कितना भाग्यशाली है जन्म जन्मांतर के कर्मा कट [हंसी] गए किंतु वो चाटा खाने के लिए भी तो आपको भाग्य चाहिए हर किसी को तो ठाकुर जाकर चाटा नहीं मारने वाले हैं वहां तो ठाकुर स्पष्ट ही कहते हैं कि यह जो जितने भी यह वहां पर खजांची वगैरह है एडमिनिस्ट्रेटर वह सबकी कोई ना कोई एक औरत को रखा हुआ है एक अलग से तो ये तो मुंह पर ठाकुर बोलते थे तो उनको तो जाकर के ठाकुर कभी चाटा नहीं मारने वाले क्योंकि वह उस लेवल प ही नहीं पहुंचे हैं कि उनको यह लगे उनको यह सब तो वह भी तो है कि रास मणि का भाग्य कितना है उस लेवल पर पहुंच गई है कि ठाकुर खुद उनको ने डिसिप्लिन करने के लिए और इंस्पायर करने के लिए बैठे हैं बीज मंत्र
प्रश्न: बीज मन्त्र क्या है ?
आपने जद बीज मंत्र लिया होगा हमने आपने मंत्र जो लिया होगा उसमें बीज मंत्र आता है जैसे कि ओम नमः शिवाय तो यह जो नमः है वो वो इसका बीज मंत्र है मंत्र जो होता है उसके तीन पार्ट होते हैं एक तो प्रणव एक बीज और एक नाम तो ओम ये हो गया प्रणव नमः ये हो गया बीज और शिवाय हो गया नाम ओम नमः शिवाय कोई भी मंत्र होता है तो उसके तीन पार्ट होने ही चाहिए प्रणव होना चाहिए बीज होना चाहिए नाम होना चाहिए हां इष्ट का नाम है बीज मंत्र का एक पूरा बहुत बड़ा एक है यह शक्ति साधना में इसके बारे में तो इतना डिटेल अभी मुझे भी नहीं पता है थोड़ा एक्सप्लोर करना होगा मां का एक मंत्र है बीज मंत्र ठाकुर का एक बीज मंत्र है इस तरह से सभी देवताओं के अपने अपने बीज मंत्र होते हैं वह लिस्ट भी आपको वैसे मिल जाएगा तो इस तरह से शक्ति साधना में यह सब आता है हां हां हां हां हां हां हां यस यस हां रीम राम रम रोम रिंग रिंग क्लिंग यह सब बीज मंत्र है ना आई एग्री विथ यू देखिए कि
प्रश्न: महिला सशक्तिकरण बहुत अच्छी बात है। लेकिन हम महिलाओं को पुरुषों जैसा बनाने की कोशिश कर रहे हैं - यह गलत लगता है। महिलाओं को मातृत्व जैसे स्त्रियोचित गुणों को विकसित करने दें। उन्हें अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पुरुषों जैसा बनने की आवश्यकता नहीं है।
एक समय था आप जद हिस्ट्री पढ़ेंगे तो एक फीमेल फर्टिलिटी फिगर्स फिगराइंस जिसको कहते हैं वह सब समय आपको मिलती है एक्सक वेशन करके आर्कियोलॉजिकल डिस्कवरीज में क्यों क्योंकि उस समय जैसे कि मटियार की थी बाद बाद में जिस तरह से ट्रियर की हो गई तो उस समय मेटियर की थी जब फैमिली में सबसे इंपॉर्टेंट स्थान था स्त्री का मां का और फिर मा को सब लोग सुनते थे क्यों क्योंकि वे लोग क्या है कि स्पिरिचुअल सोसाइटीज थी कृषि प्रधान सोसाइटीज थी बाद में यह जो वॉर फाइटिंग जब से स्टार्ट हुआ तब से यह फिजिकल स्ट्रेंथ का महिमा ऐसे बढ़ गया कि अभी यह सोसाइटी जो है वो पेट्रिया कल सोसाइटीज हो गई पुरुष प्रधान सोसाइटीज हो गई तो ये जो मैट्रिया कल टू पे मर्कल यह जो ट्रांजीशन हुआ है तो उसमें मैं जब यह पढ़ रहा था मुझे सबसे पहले आश्चर्य तो यही हुआ कि हाउ वाज ए मैट्रिया कल सोसाइटी वास डेवलप पहले तो यह बताइए माने यदि जंगल में रहते थे जंगल का कानून यदि चलता है तो स्त्रियां फैमिली में ज्यादा सुपीरियर मानी ही कैसे जाएगी किंतु ऐसा है कि देखिए कि हम लोग ना अभी भी अपनी हिस्ट्री को इतना ठीक तरह से समझ नहीं पाए हैं जिसको कि हम सोसाइटल इवोल्यूशन या तो फिर सिविलाइजेशनल डेवलपमेंट कहते हैं हम लोग मानते हैं कि वह एक तो ट्राइबल एसिस्टेंसिया करके जीते थे फिर सडन कुछ चमत्कार हुआ कि हम लोगों ने एक सेटल्ड लाइफ जीना शुरू किया फार्मिंग करना शुरू किया किंतु यहां पे यदि हमको आर्कियोलॉजिकल एविडेंस मिलते हैं यह हंटर गैदरर्स और ट्राइबल एजिस्ट हैंस से यह रूरल एग्रीकल्चरल जो अ ट्रांजिशन हुआ फिजिकल एविडेंस तो हमको यहां तक ही कहते हैं किंतु आप साइकोलॉजिकल इवोल्यूशन को देखेंगे तो यह सेटल डाउन होने के लिए ना आपको स्पिरिचुअलिटी चाहिए विदाउट स्पिरिचुअलिटी आप ये ये जो वांडरिंग एजिस्ट हैंस है उसको आप सेटल डाउन एक्जिस्टेंस में कन्वर्ट होंगे ही नहीं होंगे दिस इज इंपॉसिबल यह मेरी दृष्टि से यह मेरा एनालिसिस है तो यह स्पिरिचुलाइजेशन जैसे जैसे डेवलप हुआ वैसे ही यह सेटल डाउन होना शुरू हुआ और मैट्रिया कल सोसाइटी स्टार्ट हुई ये मैट्रिया कल फैमिली है जहां पर स्त्री का सबसे ज्यादा सम्मान है जो स्त्री कहेगी वही य सबको सुनना पड़ेगा व दैट वाज अ गोल्डन पीरियड इन ह्यूमन सिविलाइजेशन आज यदि हम जो ये कहते हैं ना गोल्डन एज या तो फिर ये जो अपने वेद में लिखा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र रमंते की पूजा होती है वहां पर देवताओं का निवास होता है तो ये मैट्रिया कल सोसाइटी थी एक समय में जो कि ह्यूमन सिविलाइजेशन का गोल्डन ए था अनफॉर्चूनेटली यह वॉर फेयर वगैरह में फिर सेटल लाइफ के साथ में यह वॉर फेयर भी आता है यह जमीन पर मेरा कब्जा है इसके जो नेचुरल रिसोर्सेस है इसके पर मेरा कब्जा है तो जो सोसाइटी मेहनत करके नेचुरल रिसोर्सेस को डेवलप करती है उसके ऊपर में जो बिना काम की सोसाइटीज है वे लोग आक्रमण करके वह धन संपत्ति को छीन लेते हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि बाद में यह यह जो फिजिकल पावर और स्पिरिचुअल पावर यह जो स्प्लिट जैसे हो गया ना यह स्प्लिट इसी वजह से हुआ है जब तक मैट्रिया कल सोसाइटी थी तब इस तरह का स्प्लिट नहीं होगा कि हां यह अभी ऐसा नहीं है कि स्त्रियां जाकर के युद्ध करती है इसलिए उनका बड़ा नाम था बट बिकॉज दैट सोसाइटी इ सो स्पिरिचुअल दैट वैल्यूज हैव उ देर इंपॉर्टेंस यदि आप वॉर फाइटिंग या स्ट्रेंथ को इंपॉर्टेंस देंगे तो पुरुष प्रधान सोसाइटी होगी किंतु वैल्यूज को जद आप इंपॉर्टेंस देंगे चरित्र को इंपॉर्टेंस देंगे स्पिरिचुअलिटी को इंपोर्टेंस देंगे तो स्त्रियां नेचुरली इसमें सुपीरियर होगी साबित तो मुझे ऐसा लगता है कि स्पिरिचुअलिटी में से यह मटेरियल ट्रांजीशन हमारा हुआ है स्पिरिचुअलिटी को जो एक कॉर्नर में कर दिया गया है तो दैट इज अ ग्रेट माने कहेंगे कि एक डिजास्टर फॉर ह्यूमन सिविलाइजेशन वहां से हमको ऐसा लगेगा कि भले ही चाहे मटेरियल साइंटिफिकली टेक्नोलॉजिकल हमने डेवलपमेंट किया है तो सिविलाइजेशनल हमने डिटन ही किया है फ्रॉम दोस अर्ली मैट्रिया कल डेज और यदि सोसाइटी को फिर से उसी गोल्डन एज में जाना है अगेन ट मैट्रिया कल सोसाइटी हैज टू रिटर्न देन ओनली वी कैन कंप्लीट दिस सर्कल टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट आप हजार कर ले इट्स नेवर गोइंग टू कम टुवर्ड्स नियर टुवर्ड्स दिस मैटकल स्पिरिचुअल सोशल स्ट्रक्चर यह जो स्वामी जी जो बार-बार कह रहे हैं कि स्त्रियों का मठ पहले बाद में भाइयों का मठ पुरुषों का मठ इसके पीछे क्या माजरा था कि स्पिच लिटी और मेट्री आर्की यह दोनों साथ-साथ चलती है और तभी जब यह दोनों जब एस्टेब्लिश होंगे तभी हम गोल्डन एज में वापस जाएंगे ठाकुर के खुद के जीवन में देखिए कि एक स्त्री उनकी गुरु थी एक स्त्री की उन्होंने आराधना की थी मां काली की भैरवी ब्राह्मणी की और एक स्त्री को अपना पूरा वारसा देक के गए मां शारदा देवी को ठाकुर के जाने के बाद में मां ही संघ जननी थी तो यह स्त्रियों का जो प्राधान्य शक्ति का प्राधान्य इतना प्राधान्य और किसी अवतार के जीवन में देखने को नहीं मिलता है सो दिस इज यूनिकनेक्ट
प्रश्न: रामकृष्ण मिशन की तुलना में शारदा मिशन अभी भी बहुत पीछे है?
का डेवलपमेंट तब तक नहीं होगा जब तक समाज ट्रांसफॉर्म नहीं होगा क्योंकि वह अपने से तो कुछ नहीं कर पाएंगे दे आर पार्ट एंड पार्सल ऑफ द सोसाइटी तो सोसाइटी जिस तरह से चलेगी उस तरह उनको रहना है तो दैट इज ट्रू के सोसाइटल ट्रांसफॉर्मेशन सिविलाइजेशनल इवोल्यूशन जब तक ना हो अब तक तो यह सब थोड़ा मुश्किल है उन लोगों के लिए देखिए स्पिरिचुअलिटी को आप डे टू डे लाइफ में जद प्रवेश करवाते हैं ना देखिए कि एवरी एस्पेक्ट ऑफ द सोसाइटी विल बी ट्रांसफॉर्म विल बी मेटामैनेजर पोरेट स्ट्रक्चर हो गवर्निंग स्ट्रक्चर हो फिर यह जुडिशियस हो ये सोसाइटल सिस्टम्स हो ये मैरिज के ये जो इंस्टिट्यूशन है फैमिली लाइफ जो है एवरी एस्पेक्ट ऑफ द सोसाइटी विल बी ट्रांसफॉर्म यदि हम स्पिरिचुअलिटी को यहां पर प्रवेश करवाते हैं यह जो ये जो स्पिरिचुअलिटी और सेकुलर लाइफ ये स्प्लिट जो है ना दैट स्प्लिट इज रियली डेंजरस और दैट स्प्लिट वी हैव टू मने हमको गैप को फुल करना मैंने फिल करना है ऐसा ना हो जाए जैसे स्वामी जी कहते हैं कि स्पिरिचुअलिटी का अर्थ फिर यह भी नहीं है कि प्रत्येक गांव की जितनी भी सुपरस्टिशन है सबको अपने सर पर उठा कर के बिठा दें वो भी एक नहीं होना चाहिए जो कि एक खतरा हमको आजकल दिख रहा है कि रिलीजन के नाम पर एक धर्म जनून और य यह भाव भी एक आ गया है तो रियल स्पिरिचुअलिटी के सामने बहुत सारे डेंजर है एक और आप जद चले जाएंगे तो यह स्प्लिट हो जाएगा रिलीजन और सोसाइटी के बीच में दूसरी ओर बहुत चले जाएंगे तो अंधश्रद्धा यह धर्म जनून आकर के घिर लेगा ट्रू स्पिरिचुअलिटी उसको एस्टेब्लिश करना मने सही में मुश्किल है य
प्रश्न: निवेदिता कहती हैं कि विवेकानंद ने आध्यात्मिकता और भौतिक-जगत के बीच के विभाजन को खत्म कर दिया। आंतरिक और बाहरी दुनिया का यह सामंजस्य एक संतुलित विकास के लिए आवश्यक है।
हां ज निवेदिता ने कहा कि यह जो स्पिरिचुअल और सेकुलर के बीच की जो भेद रेखा है वह स्वामी जी ने मिटा दी है सो इस सब परफेक्ट और निवेदिता हर सेल्फ इज अ बेस्ट एग्जांपल कि जद आपको एक एक्सटर्नल ने कर्म वरता जदी है तो साथ में ही स्पिरिचुअलिटी भी है स्त्री के भीतर में तो दैट निवेदिता हर सेल्फ इज अ बेस्ट एग्जांपल नो डाउट अबाउट दैट किंतु यदि सही सही में वह आपको फिर से वैदिक युग को वापस लाना है मेट्रियल सोसाइटी फिर से जद वापस लानी है हमको बड़ा लंबा सफर काटना है यह जो फिजिकल स्ट्रेंथ या तो फिर यह इंटेलेक्ट इट सेल्फ चच ज बिकन बिकम जैसे कि कहेंगे कि मानदंड हो गया है मेजरमेंट हो गया है सोसाइटल प्रोग्रेस का सो एंटायस हैज टू चेंज कंपलीटली व होगा वैसे बट देखिए स्पिरिचुअलिटी गिव्स अस इवन ग्रेटर स्ट्रेंथ हम लोग जो यह स्पिरिचुअलिटी को डिस्मिस करते थे ना गुजराती में जैसे कहते हैं वेदियो मने आप बहुत धार्मिक छ तो वेदियो छ माने वो बहुत ज्यादा धार्मिक है तो मूर्ख आदमी है कमजोर आदमी है ऐसा एक हमारे सर में बैठ गया है जो धार्मिक है मूर्ख भी है कमजोर भी है ऐसा नहीं है इफ यू आर रियली स्पिरिचुअल देन यू विल बिकम फार मोर स्ट्रांग पर आपको यदि युद्ध भी करना है तो स्पिरिचुअलिटी विल गिव यू मच ग्रेटर पावर वो किस तरह से स्ट्रेटेजी डेवलप करनी किस तरह से मिनिमल फोर्स यूज करके मैक्सिमम उसका यह जो डिस्ट्रक्टिव पावर उसका डेवलप करना एवरीथिंग कैन कम फ्रॉम स्पिरिचुअलिटी इट सेल्फ ओनली थिंग इज दैट वी हैव टू अप्लाई फर्स्ट ऑफ ऑल डेवलप द स्पिरिचुअलिटी एंड देन टू अप्लाई इट इन डे टू डे लाइफ जैसे हमारी कल जो बात हो रही थी आपने कहा कि जद नौकरी कर रहे हैं सेल्स का टारगेट दे दिया है और मैं यदि इसके बारे में 24 घंटे नहीं सोचूंगा तो क्या होगा किंतु जस्ट थिंक ऑफ इट कि ठीक-ठीक मेडिटेशन कर पाते हैं तो वोह किस तरह से सेल्स डेवलप करना है दैट आइडियाज विल कम फ्रॉम अ सुपर कॉशस लेवल यदि पॉलिटिक्स हो रहा है वहां पर वर्क प्लेस में तो सामने वाले प्रतिद्वंदी को कैसे हरा देना इवन दोस आइडियाज विल कम फ्रॉम देयर एनी फील्ड यू अप्लाई योर कंसंट्रेशन दैट फील्ड यू विल मास्टर सो इवन दैट फील्ड इ धनुर्वेद य आयुर्वेद वरफेन एनी फील्ड इज देयर यू अप्लाई इट एंड यू विल मास्टर इट सो ट पॉसिबिलिटी इ देयर इन स्पिरिचुअलिटी ओनली थिंग इज दैट वी हैव टू डेवलप
प्रश्न: मेरा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट मित्र है। वह कहता है कि “विवेक” उसके अकाउंट संबंधी काम में बहुत मदद करता है।
इट यहां पर वह हमार कंप्यूटर क्लासेस चलते हैं तो मैं उनके साथ में डेली क्लास लेता हूं स्टूडेंट्स का तो मैंने कल परसों ही इनको कहा कि मैंने कहा आपको पता है ना यहां पर आप आकर के जो कुछ भी सीखते हैं सब कुछ अभी ऑब्सोलेटे हो गया है यहां पर हम जो डिजाइनिंग सिखाते हैं कोडिंग सिखाते हैं प्रोग्रामिंग सिखाते हैं अभी एआई आ गया है वह सीधा-सीधा आपको उसको प्रोमट दे दीजिए सब कुछ कर देगा यह google3 माइक्रोसॉफ्ट जो बड़ी-बड़ी जो मल्टीनेशनल कंपनियां कितने हजारों कंप्यूटर्स को अभी निकाल दे रही है एक समय था कि कंप्यूटर इंजीनियर होना दैट इज अ पिनेकल ऑफ योर मतलब आपकी डिग्री और आपका प्रोफेशनलिज्म आज उनका कार्य यह एआई कर दे रहा है तो आपका रिलेवेंट कहां पे है यह सर्वप्रिया नंद जी ने एक बात कही बड़ी सुंदर मुझे लगी वो कल्चर में लेक्चर दे रहे थे बोले कि एक एआई है वह भी पोयम लिखता है और एक ह्यूमन पोएट है वह भी पोयम लिखता है अभी आप उसका पोयम का क्वालिटी कैसा है वो तो आपके ऊपर है किसी को एआई की पोयम अच्छी लगे किसी को यह ह्यूमन की अच्छी लगे तो यहां तक तो चलो हम इक्विवेलेंट मान लेते हैं दोनों को क्वालिटी में किंतु एआई एक ऐसा कार्य कर सकता है जो कि ह्यूमन पोएट कभी नहीं कर पाएगा तो क्या तो ह्यूमन पोएट एट द मोस्ट अपने जीवन में ज्यादा से ज्यादा उसका प्रोडक्टिविटी होगा तो 100 200 पोयम लिख के जाएगा पूरा लाइफ टाइम में जबकि एआई है 100 200 पोयम एक सेकंड में लिख लेगा तो यह जो डिफरेंस है वो कभी भी अभी ब्रिज नहीं होने वाला है दैट मींस फ्रॉम दिस पॉइंट ऑनवर्ड एआई इज ऑलवेज गोइंग टू प्रोग्रेस और हमको भीर अभी स्टेप अप करना है यदि अभी जैसे यह पाकिस्तान अफगानिस्तान यह बांग्लादेश जैसे कंट्री है वो अभी तक तो वह किसी भी करके उन्होंने काम निकाल लिया किंतु ये जो इन द एज ऑफ एआई अभी आप यह सब अडॉप्ट नहीं करेंगे कटिंग एज टेक्नोलॉजी तो ये तो खत्म ही हो जाएगा आपका सिविलाइज भारत के साथ में क्या हुआ 1000 साल हमने टेक्नोलॉजी छोड़ दी और यह विदेशी लोग जब आए तो एकदम जैसे हाथी मच्छर को मारता है इस तरह से उन्होंने हमारे पर राज करना शुरू कर दिया हज 2000 अंग्रेज 30 करोड़ के देश पर राज कर रहे हैं क्यों क्योंकि बिल्कुल टेक्नोलॉजी यहां पे नहीं थी जबकि वे लोग टेक्नोलॉजी के पिनेकल प बैठे थे तो अभी आजकल हम लोग कहते हैं ना कि हम लोग ये सेटी बोलकर के एक ऑर्गेनाइजेशन है सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरियल एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रे इंटेलिजेंस यानी कि जो दूसरे ग्रह पे मनुष्य माने कोई इंटेलिजेंट ऑर्गेनिस्ट म है तो उसका खोज करते हैं ऐसा बोल कर के वे लोग स्पेस में मैसेज भेजते हैं कि हां यह पृथ्वी ग्रह है हमारे यहां पे इस तरह से लिविंग ऑर्गेनिस्ट सम इंटेलिजेंस है वगैरह वगैरह तो कि किसी ने कहा किसी एक साइंटिस्ट ने कहा कि देखिए आपको याद है ना कि ये यूरोपियन सेटलर्स जब यह अमेरिका में जब आए तो एबोरिजिनल का क्या हालत हुआ टेक्नोलॉजिकल गैप इतना बड़ा था कि ये स्थानिक लोगों का सफाया हो गया ये यूरोपियन सेटलर्स के आने की वजह से तो आप इस तरह से जो दूसरे ग्रह के यदि इंटेलिजेंट यदि किसी को मिल जाए और उसने आपका मैसेज पढ़ कर के यहां पर आए वो हमारे से 1 मिलियन ईयर ना कि ऐसा एडवांस हो तो मान लीजिए कि हमको वो चींटियों की तरह खत्म कर देंगे यानी यह टेक्नोलॉजिकल गैप जो होता है ना जैसे-जैसे बढ़ता जाता है ना वैसे-वैसे ही जो अंडर डेवलप सोसाइटी उसको लोग किड़ी मकोड़े की तरह ही ट्रीट करते हैं जो लोग टेक्नोलॉजिकल एडवांस होते हैं आज देखिए कि चाइना में एआई डेवलपमेंट कैसा हो रहा है वो डीप सिक जैसे ही रिलीज हुआ वह अमेरिका का आधे ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कैप तोड़ दिया एनविया का वगैरह का तो जद यह कीप अप करना है आपको टू द लेटेस्ट टेक्नोलॉजी इसके साथ में दूसरा कि ज लेटेस्ट टेक्नोलॉजी हमारी जॉब ना ले जाए इसलिए मैं जिस फील्ड में हूं य चाहे मैं चार्टर्ड अकाउंटेंट हूं न कि चाहे मैं म्यूजिशियन हूं ना कि चाहे मैं प्रोग्रामर हूं मुझे क्रिएटिविटी चाहिए यदि मेरे पास में क्रिएटिविटी नहीं रहेगी तो यह क्रिएटिविटी है वो क्रिएटिविटी कब आएगी जबकि हमारे पास में वह क्रिएटिविटी का कोई फाउंटेन मतलब एक सोर्स हो एंड व्हाट इज द सोर्स ऑफ क्रिएटिविटी दैट इज मेडिटेशन दैट इज स्पिरिचुअलिटी जद हम मने इन टू इन ऑर्डर टू सरवाइव इन मॉडर्न वर्ल्ड कि वह वही रेड डि एंड वाली हालत हमारे साथ में ना हो जाए वही इंडिया के साथ में जो 1000 साल हुआ वही हालत हमारे साथ फिर से ना हो जाए वी हैव टू कीप अप विथ टेक्नोलॉजी वी हैव टू कीप अप विद क्रिएटिविटी एंड ओनली वे दिस इज पॉसिबल इज थ्रू स्पिरिचुअलिटी हां मैंने देखिए कि इवन
प्रश्न: ऐसा लगता है कि AI हमारी नौकरियाँ छीन लेगा। अब हमारे पास अध्यात्म के लिए ज़्यादा समय होगा। विज्ञान और टेक्नोलॉजी में हर नए विकास के साथ, हम आगे बढ़े हैं। इसलिए आशा अमर है।
सोसाइटी में भी देखिए कि हमारे पास में लेजर टाइम होता है इफ वी आर नॉट कंज्यूम बाय अवर टू डे सर्वाइवल कि मुझे आज नौकरी करनी ही होगी 925 928 व्हाट एवर एक कंटीन्यूअस मुझे ग्रंड जो होता है डेली लाइफ का उसमें से यदि मैं बचता हूं आई कैन बिकम मच मोर क्रिएटिव जहां-जहां जिस सोसाइटी में लेजर टाइम बढा है उस सोसाइटी में आर्ट है कल्चर है क्रिएटिविटी है सब कुछ पनपा है अभी ये जब हम हंटर गैदरर थे तो प्रत्येक व्यक्ति को बूढ़ा हो ना कि बच्चा हो स्त्री हो ना कि पुरुष हो अपने सर्वाइव के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है किंतु जब फार्मिंग सोसाइटी हुई तो क्या हुआ कि यह डिवीजन ऑफ वर्क होने लगा मुझे अपना अभी मैं जदी मैं जद यह यह बनाता हूं कपड़े सिलता हूं तो मुझे इतना ही करना है फिर मुझे अभी मेडिसिन मेरी खुद की मेडिसिन की चिंता नहीं करनी मैं कपड़े जो बनाए हैं उसको सेल करके पैसा आता है वोह दे कर के मैं डॉक्टर की जो सेवा है ले पाऊंगा सो डिवीजन ऑफ लेबर जो है दिस क्रिएट स्पेशलाइजेशन तो स्पेशलाइजेशन वंस द स्पेशलाइजेशन इज क्रिएटेड्रॉअर्नेविगेटर सोसाइटी तो फिर एक इस तरह का क्लास खड़ा हु साइंटिस्ट साइंटिस्ट का अपने जीवन के दौरान कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है आर्टिस्ट उसका कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है पेंटर पोएट राइटर इनका कंट्रीब्यूशन क्या है सही में देखा जाए तो कुछ नहीं है बट दे एनरिच द सोसाइटी ओवरऑल मने ओवरऑल जद देखे तो ट कंट्रीब्यूशन इज मच ग्रेटर किंतु यदि वही हंटर गैदरर की माइंड सेट से सोचे वो शिकार करता है नहीं करता है खेती करता है नहीं करता है खाना बनाता है नहीं बनाता है तो फिर क्या करेगा वो तो तो दिस इज व्ट डिवीजन ऑफ लेबर क्रिएट स्पेशलाइजेशन स्पेशलाइजेशन क्रिएट्स वेल्थ वेल्थ क्रिएट्स लेजर क्लास फिलोसोफर है वो कुछ नहीं करता वो प्लेटो एरिस्टोटल की कहानी वो जो गांव में गांव था वहां पर वह टहल रहता था जो भी उसको मिल जाता था इतने अनकंफर्ट बल क्वेश्चन करता था कि वह आदमी सोचने को मजबूर हो जाए कि व्हाट इज द मीनिंग ऑफ लाइफ व्हाट एम आई डूइंग व्हाट इज द पर्पस ऑफ माय ला एक्जिस्टेंस दिस इज अ लेजर क्लास जब क्रिएट होता है तब एक हायर थिंकिंग डेवलप होता है लोग आंख बंद करके रात को सो जाएंगे यदि थके हुए आएंगे तो न खेती करके ना शिकार करके किंतु फिर इस तरह के लोग भी थे कि जो रात में आकाश को तारे को देखते रहते थे और इतना लंबे समय तक तारों को देखा कि उनको प्लॉटिंग करना शुरू किया यह जोडियक वगैरह बनाया जो नाइन प्लेनेट है पता चला कि प्लेनेट तारों से ज्यादा स्पीड से चल रही है ये जो चांद है सूर्य की गति को मेजर करना शुरू किया है जो एस्ट्रोनॉमी साइंस इस उसका सही में बताए तो ऐसा कोई कंट्रीब्यूशन नहीं है किंतु फिर भी अपनी सोसाइटी को कितना एनरिच करता है सो दिस एनरिचमेंट जद हमको लेजर टाइम मिलता है मान लीजिए अभी रोबोट्स डेवलप होना शुरू हो गए एआई ने कोडिंग वगैरह डे टू डे वर्क उठा लिया तो फिर आईडियली स्पीकिंग कि हमारे पास में लेजर टाइम मिलेगा और आइडियल स्पीकिंग लेजर टाइम का ठीक यूज करेंगे वी कैन एनरिच अवर सोसाइटी ग्रेटली किंतु डेंजर क्या है लेजर टाइम में यदि एडिक्शन में घुस गए तो पूरा मन और बॉडी को करप्ट कर देगा तो लेजर इज अ वेरी डेंजरस थिंग माने कहा है ना मन ना की मतो हस्ती सब समय काज निय थकते हुए मन है ना कि पागल हाथी है सब समय काम को लेकर के रहना है थोड़ा सा भी काम छोड़ा तो 10 तरह के एमटी माइंड इज डेविल्स वर्कशॉप जो खाली दिमाग है शैतान की वो मैंने ये है वर्कशॉप है सो इट कट्स बोथ वेज लेजर टाइम इफ यू आर स्पिरिचुअल देन इट विल एनरिच द सोसाइटी इफ यू आर नॉट स्पिरिचुअल इट विल टेक अस इन टू एडिक्शन ये सोशल मीडिया का एडिक्शन ये टेक्नोलॉजी का एडिक्शन हाउ डज इट वर्क
प्रश्न: पहले हम रात को तारे देखते थे, अब हम रात में मोबाइल देखते हैं
मोबाइल पे तारे देखते हैं