प्रार्थना
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन और संदेश स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे इसका नाम है नीरव साधना
ठाकुर स्वयं माँ काली से दर्शन हेतु प्रार्थना करते हैं, किन्तु अपने भक्तों से कहते हैं कि ईश्वर दर्शन की आकांक्षा रखना अच्छा नहीं है
हमने देखा कि किस तरह से पिछली बार जहां पर हमारे लास्ट क्लास में हमने छोड़ा था कि मां को मां के मन में भी यह एक बात आई कि ठाकुर के जो अन्य संतान है अन्य भक्त है उनमें से किसी-किसी को भाव होता है किसी-किसी को समाधि होती है किसी को कुछ ना कुछ ईश्वर दर्शन होता है तो एक आध्यात्मिक कोई ना कोई अनुभूति ठाकुर के आसपास में जो लोग रहते थे जो लोग आते थे उन सबको होती ही थी कोई ना किसी ना किसी स्वरूप से तो मां के मन में भी आया कि मुझे भी इस तरह की आध्यात्मिक अनुभूति क्यों नहीं होती मुझे भी भाव क्यों नहीं होता मुझे भी दर्शन क्यों नहीं होता हालांकि हमको पता है कि ठाकुर के बारे दर्शन के बारे में ठाकुर के दो मत थे पहली बात तो है कि ठाकुर खुद मां जगदंबा से मां काली से दर्शन की प्रार्थना करते थे ठाकुर ने खुद अपने बहुत सारे भक्तों को स्पर्श करवा करके कोई ना कोई आध्यात्मिक सिद्धि या भाव या दर्शन प्रदान किया था व कल्पतरु के दिन की घटना हमारे सबके सामने वह तो जग जाहिर है तो यह तो एक था साथ में ही किंतु देखिए कि ठाकुर का जिस तरह से हम लीला प्रसंग का पाठ कर रहे हैं उसमें हमने देखा कि ठाकुर बड़े ही स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भाव या दर्शन या इस तरह की कोई आध्यात्मिक अनुभूति जिसमें कि हम हमको ईश्वर का ऐश्वर्य हम हमारे सामने प्रस्फुटित हो ईश्वर का ऐश्वर्य या तो फिर ईश्वर की दिव्य शक्तियां हमारे सामने प्रगट हो यह सब कुछ इस सब कुछ पाने की आकांक्षा करना यह अच्छा नहीं है इससे होगा क्या कि ईश्वर में और हम में एक दूरी आ जाएगी एक आपना आपनी भाव नहीं रहेगा बड़ा सुंदर बंगोली शब्द है परस्पर आत्मीयता का भाव नहीं रहेगा एक तरह का एक हमारे बीच में दरार हो जाएगी हमारे मन में ऐसा लगने लगेगा कि अरे ईश्वर तो इतने बड़े हैं हमारे से इतने दूर है मैं इतना छोटा हूं मैं होता कौन हूं कि उनके साथ में मैं प्रेम का संबंध रखूं जब भी हम देखेंगे कि हमारे परिवार में जिसी के किसी के साथ में अपना बड़ा अच्छा रिलेशन है उनके पास में हम सब तरह की डिमांड करते हैं सब तरह की उनके सामने जिद करते हैं किंतु जिनके साथ में इतना अच्छा संबंध नहीं है उनके सामने हम बड़े रिस्पेक्टफुली पेश तो आएंगे बड़े रिस्पेक्टफुली उनके साथ में बात तो करेंगे किंतु कोई डिमांड करना या तो फिर आत्मीयता का भाव नहीं रहेगा मैं अपने खुद की बात बताता हूं मैं जब छोटा था तब मेरी मां के घर पे वो जाया करता था तो मां का घर यानी कि मां के पिताजी का घर तो मां के पिताजी के घर में जाते हैं तो वहां पर तो मामा फिर यह मासी यह सब तो होते ही है व फिर नाना नानी चाचा चाची सब पूरा एक जॉइंट फैमिली था तो उसमें ऐसा था कि मेरी दो चाच आं थी उसमें से एक के साथ में मेरा बड़ा अच्छा एक उनका मेरे पर प्रेम था और बड़ा स्नेह पूर्ण संबंध था और एक चाची थी जो कि बड़ी उम्र में बड़ी सीनियर थी तो फिर उनके साथ में ऐसा कोई ज्यादा वार्तालाप नहीं होता था तो अभी जिन जिनके साथ में मेरा अच्छा रिलेशन था बड़ा प्रेम पूर्ण स्नेहमयी भी उनके हमारे क्या था वहां पे कि तीन घर थे तीनों घर पासपास में ही थे और बीच में आने जाने का रास्ता था तीनों घरों में यानी कि वह तीन घर तीन भाइयों के तीन घर वैसे सेपरेट है और वैसे एक ही है तो इस तरह से किचन वैसे सेपरेट है किंतु वैसे रात में सभी लोग मिलकर के एक साथ में गप लगाया करते थे तो वहां पर वह उनके किचन में जाकर के मैं कभी ना कभी कोई ना कोई डिमांड किया करता कि आप मेरे लिए यह बना दीजिए मेरे लिए वो बना दीजिए और वह भी हंसती हंसती कोई ना कोई खाना बना देती जो भी मैं डिमांड करता किंतु जिस चाची के साथ में ऐसा कोई मेरा रिलेशन नहीं था उनके कमरे उनके किचन में जाकर के मैं कभी कोई भी डिमांड नहीं करूंगा क्यों क्योंकि हमेशा एक तरह का रिस्पेक्ट है किंतु साथ में दूरी भी है वहां पे डिमांड नहीं चलेगी वहां व पे किसी ना किसी तरह की जीद का कोई प्रश्न नहीं है कि उनके पास में जाकर के मैं जीत करके कहूं कि आप मेरे लिए यह बना दीजिए अदर वाइज जिस चाची के साथ में मेरा अच्छा रिलेशन था तो उन वो जद वो भी कहेगी अभी मेरे पास टाइम नहीं है भागो यहां से तो बच्चे लोग जाकर के बड़े परेशान करते उस उस समय मेरी उम्र मैं फिफ्थ सिक्स्थ स्टैंडर्ड में पढ़ा करता था 1215 साल ऐसी कोई उम्र होगी मेरी तो हम लोग बच्चे ही थे इधर-उधर खेलते रहते थे जब भी इच्छा हुई वहां पर जाकर के कुछ ना कुछ डिमांड कर दी कि आप यह बना दीजिए वो बना दीजिए वो वो कहेगी कभी-कभी नाराज होकर के भागो यहां से बिना मतलब परेशान करने को आते हो बच्चे लोग वगैरह वगैरह किंतु फिर भी देखिए कि बनाए या ना बनाए दैट इज अनदर मैटर किंतु हमारा हक बनता था कि उनके पास में डिमांड करने का तो यहां पर भी ईश्वर के साथ में एक अपना आपनी संबंध जब होता है ईश्वर के पास में आप डिमांड कर सकते हैं कि अच्छा कि माने क्या है कि ईश्वर के पास से से हमको क्या डिमांड करना है जिसका सही सही में यह परस्पर प्रेमा अ परस्पर एक आत्मीयता का संबंध बन ही गया है तो इस तरह का भक्त यह सब कोई दुनियादारी या सांसारिक की डिमांड नहीं करेगा वह ऐसा नहीं कहेगा कि हां मुझे बहुत ज्यादा पैसा दे दीजिए मुझे मिलिनेयर बना दीजिए आजकल की लैंग्वेज में बिलियने बना दीजिए कोई टेक स्टार्टअप का फाउंडर बना दीजिए ना कि सीईओ बना दीजिए ना कि मुझे कोई प्रेसिडेंट बना दीजिए ना कि प्राइम मिनिस्टर बना दीजिए इस तरह की डिमांड यह भक्त नहीं करेगा वो कहेगा कि मेरे मन को शुद्धता निर्मलता और एक तरह की शांति से दिव्य शांति से मेरे मन को भर दो ईश्वर तुम्हारे प्रति हमेशा हमेशा के लिए मेरी एक निष्ठ श्रद्धा एक निष्ठ शरणागति बनी रहे वही आशीर्वाद तुम हमको दो ये जब डिमांड करने की जब कैपेसिटी आती है तो वह भक्त इसी तरह की डिमांड करेगा और कोई डिमांड नहीं करेगा स्वामी जी का फेमस है कि रोटी कपड़ा मकान मांगने के लिए गए तो सही मां काली के पास में किंतु जितनी भी बार गए ज्ञान भक्ति वैराग्य मांग के लौट आए क्योंकि देखिए कि उस समय हालांकि स्वामी जी ने वैसे तो मां काली प इतना विश्वास नहीं था स्वामी जी का अंतरमन इतना शुद्ध था कि जिस क्षण मां काली पे विश्वास जन्मा साथ-साथ में ही यह अपना आपनी भाव प्रकट हो गया फिर यह दूरी वगैरह ऐसा कुछ नहीं ठाकुर के साथ में स्वामी जी की जितनी आत्मीयता थी ठाकुर के साथ में स्वामी जी की नरेंद्र की उस समय के जिदनी जितनी वह जिद कर सकता था उतनी ही जिद से उतनी ही हठ काता पूर्वक उतनी ही डिमांडिंग लैंग्वेज में नरेद मां काली से भी बात कर सकता था स्वामी जी मां काली के साथ बात कर सकते थे किंतु जब वो कैपेसिटी आ गई कि हम डिमांड कर सकते हैं अभी प्रार्थना नहीं करनी प्रार्थना का समय चला गया अभी डिमांड का समय आ गया किंतु आप जब डिमांड के लेवल पर चले जाएंगे तब आप किंतु यह आध्यात्मिकता या मन की शांति या तो फिर यह ज्ञान भक्ति वैराग्य छोड़ कर के और कुछ नहीं मांगेंगे उसके अलावा जो लोग मांगते हैं वे लोग वो अपना अपनी भाव तक पहुंचे ही नहीं है तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं कि वो साइड में वो जो वो आप क्या डिरेल ना हो जाए अपना ट्रेन वो डिरेल का अर्थ क्या है पता है ना ट्रेन पटरी पर चल रही है एकाएक कुछ एक्सीडेंट हुआ तो पटरी से ट्रेल ट्रेन नीचे गिर गई उसको डिरेल कहते हैं तो अपनी यह आध्यात्मिक यात्रा ये अपनी आध्यात्मिक ट्रेन ईश्वर प्राप्ति यह जो चार योग है उन पटरियों पर जो चार पटरियों पर चल रही है वहां से कोई एक्सीडेंट होकर के अपनी ट्रेन नीचे ना गिर जाए डिरेल ना हो जाए इसीलिए इस सब कुछ मांगना नहीं है ईश्वर भाव ईश्वर दर् दशन वगैरह हमेशा ईश्वर अपने आत्मीय ही है अपने हृदय में ही विराजमान है उनको प्राप्त करने के लिए मुझे कोई प्रयास नहीं करना है ईश्वर मेरे हृदय में ही है यह देखिए कि सर्वोच्च यह अद्वैत भाव यहां पर चला आता है दर्शन तो आप उनसे मांगेंगे ना भाव तो आप भाव की प्रार्थना तो आप उनसे करेंगे ना जो कि पर है जो आपके हृदय में ही विराजमान है उनको फिर दर्शन प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने की क्या आवश्य ता है क्या मैं ऐसा कभी कहूंगा मैं अपने से कि तुम अपना खुद का दर्शन करवा दो नहीं मैं जितनी भी बार मेरा खुद का दर्शन करना चाहूं मुझे सिर्फ आईने में देख लेना है बस मुझे अपना चेहरा दिख गया और कोई मुझे मेहनत करनी जरूरत नहीं है मेहनत करने की जरूरत नहीं है तो वैसे ही यदि ईश्वर अपने हृदय में ही विराजमान है तो प्रार्थना करके न कि साधना करके ना कि वो ईश्वर दर्शन की आकांक्षा करके प्राप्त करना वह जरूरत नहीं है मेरे शुद्ध मन रूपी आईने में ईश्वर अपने आप प्रतिबिंबित होंगे तो यह हास्ट अद्वैत वेदांत की बात यहां पर ठाकुर करते हैं और इसी तरह से जब यहां पर मां खुद अपने मन में यह बात चाहती है कि जब ठाकुर के दूसरे भक्त हैं उनको यह दर्शन वगैरह होते हैं भाव होता है तो मुझे क्यों नहीं होता तो वह प्रसंग हम यहां पर वर्णित कर रहे थे अब अभी एक्चुअली बात ऐसी है कि मां के जीवन के साथ में हम रेयरली कभी भाव को एसोसिएट करेंगे भाव समाधि दर्शन इवन स्वामी जी के जीवन में भी यह सब मिनिमम था यदि देखना ही चाहते हैं तो अल्टीमेटली ठाकुर के जीवन में और अप टू एन एक्सटेंट राजा महाराज के जीवन में हमको यह सब देखने को मिलता है किंतु ऐसा नहीं है कि स्वामी जी या मां के जीवन में भाव दर्शन समाधि वगैरह नहीं था वही है कि वे लोग इसको छुपा सकते थे और इसके बारे में हमने खुद ने ज्यादा डिस्कस नहीं किया है तो यहां पर देखिए कि यह नीरव साधना का जो आखिरी प्रसंग हम ले रहे हैं चैप्टर समाप्त होने से पहले वो उसी प्रसंग है उसी प्रसंग को लेकर के गंभीरानंद जी महाराज डिस्कस कर रहे हैं क्या कहते हैं कि किस तरह का भाव मां ने ठाकुर से चाहा था और ठाकुर ने उसका क्या रिप्लाई दिया था यह लास्ट पैराग्राफ वैसे हमने एक बार पढ़ लिया है लास्ट टाइम किंतु फिर भी मैं एक बार पढ़ लेता हूं इसके बाद में नया पहरा स्टार्ट करेंगे
माँ ईश्वर दर्शन करना चाहती है
गंभीरानंद जी क्या लिखते हैं ध्यान भजना आदिर फले श्री मायर मन ज तोई अंतर्मुखी एवम दक्षिणेश्वर ठाकुरे और भक्तो देर म तिनी ज तोई विभिन्न भावे विकास देखीते लागी लेन ततो ताहर निज निज जीवने ओ उहा पाई बार आग्रह बाड़िया चली लो ध्यान और भजन के परिणाम स्वरूप मां का मन जितना ही अंतर्मुखी कि ठाकुर के जो भक्त आते हैं दक्षिणेश्वर में उन सभी के भीतर में किसी ना किसी तरह का विभिन्न भावे विकास विभिन्न तरह के भाव का विकास देख रही थी मां वितना ही मां को ऐसा लगा कि उनके खुद के जीवन में भी मुझे यह सब चाहिए बोलक के यह सब पाने का आग्रह बढ़ता चला विशेष तो गौरी मार भाव प्रेम दर्शन तहारो मने रूप भाव और प्रेम लाभे आकांक्षा जागलो खास करके गौरी मां जो थी उनके जो भाव और प्रेम होता था ईश्वर के प्रति उसको देख कर के मां को भी लगा कि मुझे भी इस तरह का भाव और प्रेम चाहिए श जन्नो एक दिन लखी देवी द्वारा ठाकुर के अनुरोध कोराई लेन इसीलिए मां ने अभी मां खुद तो थोड़ी लज्जा शिला थी ठाकुर को साथ में सीधा जाकर के नहीं कहेगी कि आप मुझे भाव या दर्शन करवा दीजिए इसीलिए उन्होंने लक्ष्मी दीदी के द्वारा यह बात ठाकुर को कलवाई किंतु ठाकुर बोली लेन किंतु ठाकुर ने कहा शे काली घटेर में श उश शोच कोते पार बे गौरी मां से अर्थात की गौरी मां काली घाट कीी स्त्री है काली घाट की लड़की है उसको यह सब सहन हो जाएगा किंतु तार पखे गोपने था का भालो किंतु उसके लिए छुप कर के गोपने रहना ही अच्छा है छुप कर के रहना ही अच्छा है वो अर्थात की मां शारदा उसके बाद में ठाकुर कहते हैं लार बलाय वृद्धि लार बलाय सिद्धि अबला अर्थात की स्त्री देखिए यह किस तरह से प्रास बिठाया है शब्दों की रमत है यहां पे अबोला अर्थात कि स्त्री और अबोला अर्थात कि नहीं बोलना अ बोला बोला अर्थात कि बोलना अ लगाया है यानी कि निषेधात्मक किया है अबला अबला वृद्धि जो अबला है यानी कि जो स्त्री है जो कि बल हीन है अबला बल का दो शब्द बल अर्थात की स्ट्रेंथ बोल अर्थात की बोलना जिसमें स्ट्रेंथ नहीं है वो है अबला को हमेशा एक तरह से अबला कहते हैं अबला दूसरा शब्द है अबोला अर्थात कि नहीं बोलना यानी कि दोनों शब्दों का इस तरह से मेल बिठा कर के ठाकुर कहते हैं अबला अबोला वृद्धि जो अबला स्त्री है उसकी नहीं बोलने में ही उसकी वृद्धि है अबोला अबोला सिद्धि जो स्त्री है उसकी नहीं बोलने में ही सिद्धि है यानी कि छुपके रहना लोगों की नजर के सामने नहीं आना पुरुषों की नजर के सामने ने नहीं आना अपने भाव का प्रकाश नहीं होने देना अपना खुद का एक तरह से वह एक सेल्फ इमेज प्रोजेक्ट नहीं करना वगैरह वगैरह तो अबला अबला अबोला अबला वृद्धि अबोला अलाय सिद्धि स्त्री लोक धीर नम्र भावे थाक बे स्त्री लोग धीर और नम्र भाव से रहेगी लज्जा तार धर्मों लज्जा ही उनका धर्म है नहीं ले लोके ताके निंदा करवे ऐसा नहीं होगा यदि स्त्री निर्लज्ज हो जाएगी तो लोग उनकी निंदा करेंगे अभी यह जब हमने पिछली बार पढ़ा था तो हमने ठाकुर के ही कितने सारे लेडी डिसाइल में से इस तरह के उदाहरण खोजे थे कि जिनके भीतर में भाव का बाह्य प्रकाश होता था और ठाकुर यह इसको मना भी नहीं करते थे ठाकुर जैसे कि यह सब पसंद भी करते थे यानी कि ठाकुर के ही आशीर्वाद से यह सब होता था जिसमें कि एक तो लक्ष्मी दीदी है लक्ष्मी दीदी का हमको ऑलरेडी पता है कि ठाकुर के जो भाई थे उनकी पुत्री यानी कि ठाकुर की नीस जिसको कहते हैं इंग्लिश में भतीजी हुई वह भी उम्र में छोटी थी उसके पति का मृत्यु हो गया था विधवा थी छोटी उम्र से ही विधवा हो गई थी आकर के दक्षिणेश्वर में नहब में वह रहती थी मां शारदा देवी के साथ में तो वो लक्ष्मी दीदी का एक ऐसा नेचर था वो कि वैष्णव भाव कि वह सबके सामने पुरुष भक्त भी जदी होंगे तो नृत्य कीर्तन करना यह वैष्णव पदावली गाते गाते वह जो या तो फिर कोई अ इस तरह को कोई पात्र का अभिनय करना जैसे वह वैष्णव संप्रदाय में होता है तो यह सब करने में उनको कोई लज्जा नहीं होती थी इनफैक्ट उनको बड़ा आनंद ही होता था तो लक्ष्मी दीदी भी है यह गौरी मां के बारे में तो ठाकुर ने पहले ही कह दिया कि वह काली घाट की स्त्री है काली घाट की लड़की है तो या है माहाकाली का थोड़ा सा प्रताप में आ गया होगा तो मां काली को तो कोई लज्जा शलाला कह नहीं सकता है जो रण वेश हैसे हैसे माने जो रण वेश जो रण ये जो होता है युद्ध क्षेत्र युद्ध क्षेत्र में हंसते हंसते जो शत्रुओं का संहार करती है मां काली उनके साथ में तो लज्जा शीला रूपी कोई भी गुण एसोसिएट करना वह तो मूर्खा म है तो वह काली घाट की लड़की है तो वह गौरी मां के लिए यह सब भाव वगैरह हजम हो जाएगा उनके भीतर में वह त्याग कहो ना कि फिर वह शौर्य वीर्य कहो उसकी एक अंश मा काली का आ गया है फिर हमने वह गंगा माई का डिस्कशन बात देखी थी उनकी कहानी देखी थी कि किस तरह से ठाकुर वहां पर गए थे काशीना वृंदावन एग्जैक्ट भूल गया तो वहां पर यह गंगामाई का दर्शन हुआ था फिर गंगामाई को भाव होता था और भाव में वह हृदय की पीठ के ऊपर में चढ़ गई थी तो यह इतने सारे उदाहरण है हमको ऑलरेडी पता है अघो रमणि देवी गोपाल की मां जिसको कि गोपाल के दर्शन होते थे वह अपने घर से दौड़ी दौड़ी आती थी दक्षिणेश्वर में ठाकुर को गोपाल ज्ञान से उनको आहार करवाती थी ठाकुर खुद उनकी गोद में बैठते थे बिल्कुल जैसे कि बाल गोपाल हो इस तरह से तो यह सब काफी उदाहरण है ठाकुर के आसपास में पुरुष भक्तों को तो भाव होता ही था वह नित्य गोपाल वगैरह किंतु साथ साथ में ही देखिए कि ये स्त्री भक्तों को भी भाव होता था किंतु मां के लिए ठाकुर ने जैसे कि भविष्य का एक उनका मां का जो मातृत्व जो है वह सुरक्षित रहे या सिर्फ मातृत्व ही प्रोजेक्ट हो इस तरह से शायद ठाकुर ने मां को इस तरह से घड़ा है तो इसीलिए ठाकुर मां के लिए कहते हैं कि लज्जा ही स्त्री का धर्म है निर्लज्ज होने से लोग स्त्री की निंदा करेंगे अभी आगे देखिए गंभीरानंद जी क्या कहते हैं
मां की ध्यान-तन्मयता और गहन भाव
श्री मायर ध्यान तन्मयता आमरा बहु बार देखिया च मां की ध्यान तन्मयता के बारे में पहले भी कई चर्चाएं हमने की है ओई संगे अपरे ए मोन की तहर नि जेरो अगोचर भाबे बही प्रकाश होई तो की ना जाना नाई इस किंतु साथ-साथ में ही दूसरे के या तो फिर उनकी हमने यह देखा है कि मां के जीवन में ध्यान तन्मयता काफी है किंतु क्या मां के जीवन में भाव का बाह्य प्रकाश होता था कि नहीं उसके बारे में हमको पता नहीं है यहां पे किंतु गंभीरानंद जी कहते हैं बड़ा इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट यह भाव का बाह्य प्रकाश दूसरों के सामने होता था कि नहीं वो तो हमको नहीं ही पता जिन्होंने देखा है इन्होंने इसके बारे में ज्यादा बात नहीं की है एक दो घटनाएं हैं सिर्फ जो कि हम आगे में पढ़ेंगे किंतु साथ में ही गंभीरानंद जी क्या कह तहर नि जेरो अगोचर मन के मां को खुद को शायद पता नहीं होता था कभी-कभी कि यह भाव का प्रकाश होता है कि नहीं हो सकता है कि मां खुद इतनी भाव तन्मय हो गई है कि मां खुद यह होश गवा बैठी है कि वह भाव का बाह्य प्रकाश अभी उनमें लक्षित हो रहा है तो गंभीरानंद जी कहते हैं कि मां के जीवन में भाव ध्यान तन्मयता तो देखी है किंतु भाव का बाह्य प्रकाश दूसरों के सामने या तो खुद को पता नहीं है इस तरह से क्या होता था कि नहीं इसके बारे में हमको ज्यादा जानकारी नहीं है ताहर पूर्वक तो अनुरोध होई ते बरम मने होय भाव होई लेयो तिनी विधि तो छिले ना किंबा उहा गौरी मा प्रवृति न्याय उद्वेलन ना आगे की जो जो सब माने जिस तरह से रिक्वेस्ट की ठाकुर को इससे हम इस तरह का अनुमान कर सकते हैं मने होए मुझे मन में ऐसा होता है ऐसा लग रहा है कि भाव होले हो तिनी विधि तो छिले ना भाव होने से भी शायद मां को पता नहीं था किंबा गोरी मर प्रभृति न्याय उद्वेलन ना या तो फिर मां का भाव गौरी मां की तरह उछल नहीं पड़ता था भीतर में ही प्रशम हो जाता था यह ठाकुर कहते हैं ना कि छोटा सा जलाशय है उसमें यदि हाथी प्रवेश करे तो जलाशय का पानी चारों ओर उछल उछल करके गिरेगा किंतु एक महा समुंदर के भीतर में हाथी प्रवेश करें तो समुंदर का जो डेप्थ है उसका जो ब्रेथ उसका जो विड्थ है वो इतना विशाल है इतना व्यापक है कि हाथी के चले जाने से भी समुंदर की सतह तो देखेंगे कि शांत और स्थिर ही रहती है तो वैसे ही हमको ऐसा लग रहा है गंभीरानंद जी कहते हैं कि हम लोग अनुमान करके ऐसा कह सकते कि मां को भी शायद यह पता नहीं होता था कि उनमें भाव का प्रकाश हो रहा है या तो भाव का प्रस्फुटन हो रहा है क्योंकि मां का भाव गौरी मां की तरह उछल करके या छलक करके बाहर में नहीं दिखाई पड़ता था उद्वेलन उद्वेलन सुंदर शब्द है उद्वेलित उसमें से उदल अवश्य श्री रामकृष्ण तादुर पख पा अवश श्री राम कृष्ण ओ ता दृश उलता पख पाती छिले ना किंतु भविष्यत जिनी बहु लोकर पथ प्रदर्शित होई बन शही मातृ गुरु देवी शक्ति सम्मिलित प्रतिमा संभव तो अति निवृते होले शुद्ध सात्विक विकास प्रकाश प्रयोजन लो अवश्य श्री राम कृष्ण भी इस तरह का जो उ श्रृंखल है भाव की उ श्रृंखल उसके पक्षपाती नहीं थे किंतु भविष्य में जो बहु बहुत बहुत लोगों की पथ प्रदर्शित होने वाली थी उसी मातृ गुरु और देवी शक्ति की सम्मिलित प्रतिमा जो मां शारदा देवी थी उनके जीवन में अति निवृते होई लेओ अति गोपने अति सीक्रेट होकर के भी शुद्ध सात्विक विकास प्रकाश का प्रयोजन था शुद्ध सात्विक विकार प्रकाश का प्रयोजन था क्या कहना चाहते हैं यहां पर कि ठाकुर खुद नहीं चाहते थे कि मां के जीवन में इस तरह का भाव हो जो कि सबको दिखाई दे पड़े जैसे कि छोटे जलाशय में हाथी प्रवेश करें तो पानी चारों ओर जिस तरह से उछलता है जिस तरह से जवार भाटा चलता है उस तरह से मां के जीवन में भाव का जवार भाटा लोगों की दृश्य में ना आए यह तो ठाकुर जाते ही थे किंतु ऑन दी अदर हैंड और एक बात थी और एक पॉइंट ऑफ व्यू था और एक कंसीडरेशन था जो कि ठाकुर को लगा उस कंसीडरेशन से देख कर के कि ना मां के जीवन में भी भाव का शुद्ध सात्विक बही प्रकाश होना चाहिए क्या कंसीडरेशन था ऐसा तो क्या पॉइंट आ गया ठाकुर की नजरों में जिसकी वजह से ठाकुर ने ऐसा सोचा होगा कि नहीं कभी-कभी शुद्ध सात्विक भाव भले ही दिखाई दे पड़े तो वो था कि भविष्य में मां को बहुत बहुत सार लोगों के आध्यात्मिक जीवन को पथ प्रदर्शित करना था बहुत सारे अध बहुत सारे भक्तों के आध्यात्मिक जीवन को निर्देशित करना था उनके आध्यात्मिक जीवन को गठित करना था उनको साधन पद्धतियां सिखानी थी उनको योग साधनाएं सिखानी थी मंत्र देने थे मंत्र जप किस तरह से किया जाता है आध्यात्मिक जीवन के जो उच्च आयाम है उसको सर करके क्या-क्या अनुभूतियां होती है वह सब मां को अपने भक्तों को बताना था इसीलिए बड़ा ही सुंदर यहां पर एक बात कही है गंभीरानंद जी ने मातृ गुरु देवी शक्ति सम्मिलित प्रतिमा मां कौन है मात्र गुरु और देवी इन तीन शक्तियों की सम्मिलित जो एक उनका जो मूर्ति मंत जो है जो एक मेनिफेस्टेशन है ऐसी मां के जीवन में शायद कभी कभी शुद्ध सात्विक भाव दिखे व तो अच्छा है मां को भी पता चलेगा कि भाव किसको कहते हैं भाव छलक करके जदी बाहर आ जाता है उसका बाह्य प्रकाश जद होता है तो किस तरह से होता है और फिर यह बाह्य प्रकाश को समझ कर के मां भी अपनी बाकी सब स्त्रियों को वही उपदेश दे कि स्त्रियों के लिए लज्जा ही आभूषण है सबके सामने खास कर के पुरुषों के सामने भाव का किसी भी तरह का प्रकाश नाना हो तो सबसे ज्यादा अच्छा है तो मां अपने जो भविष्य में जो स्त्रियां लड़कियां वृद्धा एं जो उनके पास में आने वाली थी उनको जो एक पथ प्रदर्शन करना था उसके लिए मां को यह भी एक चीज समझने की आवश्यकता शायद थी कि भाव किसको कहते हैं पहले तो जो भाव होता था वह सब हृदय के भीतर में ही छुपा हुआ रहता था किंतु हृदय के छुपे हुए भाव को बाहर में जयदिश हो जाता है तो क्या होगा यह मां को समझने की आवश्यकता थी यहां पर और एक जो यह कहा कि मातृ गुरु देवी शक्ति की सम्मिलित प्रतिमा यानी कि देखिए कि मां के जीवन में सब कुछ एक तरह से एक स्त्री जो होती है स्त्री के जो गुण होते हैं सभी तरह के गुण मां के भीतर में है वह मां भी है देवी भी है और फिर वह गुरु भी है य तीनों जो एक फैसेट जो होते हैं तीनों डायमेंशन जो होती है वो तीनों डायमेंशन यहां पर मां के जीवन में दिखती है तो इस तरह से ठाकुर ने इस तरह से सोचा होगा तो फिर आगे महाराज क्या लिखते हैं ताई श्री मायर मने शेष पहा चिरो शांतो ना था किया पुनर्बलन में वह स्पृहा वह इच्छा वह आकांक्षा कि मुझे भी भाव हो वह चिर शांत ना रह करके फिर से जागृत हो उठी अभी माने तो इस तरह से कॉन्शियसली कुछ सोचा नहीं होगा हो सकता है कि ठाकुर ने ही सबकॉन्शियस सुपरकॉन्शियस लेवल पर प्रोमट किया होगा और यही इच्छा मां के मन में फिर से जागृत हो गई पहली बार जब जागृत हुई थी तब मां ने लक्ष्मी दीदी के द्वारा ठाकुर को पूछ वाया था तो ठाकुर ने उस समय मना कर दिया था किंतु यह ठाकुर के मना करने के बाद में भी यह आकांक्षा मां के मन में बनी रही थी और उसका पुनः जागरण हुआ था आर जुग प्रयोजन विधाता बोध होए अनुभवो कोरिया छिले ज ए देवी मूर्ति ते जुग धर्म साधने उपयुक्त प्राण प्रतिष्ठा समय समाग तो होया छ और युग प्रयोजन के लिए विधाता ने भी शायद यह अनुभव किया होगा कि इस देवी मूर्ति के भीतर में युग धर्म साधन के लिए उपयुक्त आवश्यक प्राण प्रतिष्ठा का समय आन पहुंचा है समाग हुआ है आ गया है मने इतना सुंदर मने लिटरेरी दृष्टि से देखें कितना सुंदर स्टेटमेंट है युग फिर से मैं पढ़ता हूं आर जुग प्रयोजन विधाता बोध होय अनुभव करिया लेन युग प्रयोजन के लिए विधाता ने भी शायद यह अनुभव किया होगा जे ई देवी मूर्ति ते जुग धर्म साधने उपयुक्त प्राण प्रतिष्ठा समय समाग तो होया छ इस देवी मूर्ति के भीतर में युग धर्म साधन के लिए उपयुक्त प्राण प्रतिष्ठा का समय समाग हुआ है आन पहुंचा है ईश्वर ने भी शायद सोचा होगा कि यह युग धर्म जबकि स्त्री शक्ति का उन्मेष होने वाला है स्त्री शक्ति का प्रदर्शन पूरे विश्व में जब होने वाला है उस युग धर्म प्रयोजन के लिए यह जो जगत धात्री स्वयं पृथ्वी पर मनुष्य दे धारण करके आई है उनमें प्राण प्रतिष्ठा का समय शायद आ गया है हालांकि हमको पता है कि जदी देवी मूर्ति के भीतर में प्राण प्रतिष्ठा का जो समय था वह तो था वह सड़सी पूजा कि ठाकुर ने स्वयं अपनी समस्त सिद्धियां स्वयं अपनी समस्त आध्यात्मिक शक्तियां मां को अर्पण कर दी थी तो वह तो एक था ही था किंतु क्या है कि समय समय पर उसको एक तरह से बाह्य प्रकाश भी तो कर करना है क्योंकि शोड़ी पूजा के बाद का मां का जीवन देखिए कि इतना ही अंतर्मुखी कि वह हमेशा था किंतु ठाकुर चाहते थे कि धीरे-धीरे करके मां सब भक्तों का जिम्मा अपने सर के ऊपर में ले वह जो एक फेमस
माँ दाना-काली की पत्नी को आशीर्वाद देती है
कहानी है कि वह अ काली काली पदो काली पदो की स्त्री उसकी पत्नी जब ठाकुर के पास में आई कहा कि मेरे पति मेरे पर बहुत सारा अत्याचार करते हैं बहुत शराब भी पीते हैं और उनका जीवन संपूर्ण रूप से अस्तव्यस्त हो गया है तब ठाकुर ने उनको मां के पास में भेजा तो मां ने सोचा कि मैं इसका क्या करूंगी मैं तो ठाकुर की सेवा करने के लिए यहां पर आई हूं यहां पर रहती हूं मेरे में क्या ऐसी कोई शक्ति है कि मैं उसका जीवन सुधार दूं या तो इसके पति का जीवन संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दूं ना सोच कर के मां ने उसको ठाकुर के पास में वापस भेजा तो ठाकुर ने फिर से उनको मां के पास में भेजा नहीं नहीं उन्हीं के पास में जाओ नबत में जो रहती है वही सब ठीक कर देगी तो मां ने फिर जब वो फिर से आई तो फिर मां दुविधा में पड़ गई वो क्या कर सकती है तो फिर से ठाकुर के पास भेजा तो ठाकुर ने फिर से उनको यहां पर भेजा ऐसा तीन बार हुआ जब तब मां को लगा कि ठाकुर अभी छोड़ने वाले नहीं है तब मां ने बिल्व पत्र के ऊपर में कुछ लिख कर के दे दिया और फिर वह स्त्री जब वापस गई बीच-बीच में आती होगी ठाकुर मां के पास में किंतु जो 12 साल के बाद में वह काली पद और ठाकुर के पास में जब आया तब ठाकुर ने कहा कि देखो वह अपनी पत्नी को 12 साल अत्याचार करने के बाद में वह यहां पर आया है अभी देखिए कि वह उसका अकल ठिकाने आया होगा तभी तो वह ठाकुर के पास आया होगा काली पदो अदर वाइज व ठाकुर के पास आता ही क्यों यानी कि उसकी पत्नी की जो 12 साल की तपस्या थी वह सफल हुई उसका जीवन कुछ ना कुछ ठिकाने आया मन के भीतर में ईश्वर के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई बोलकर के वह दक्षिणेश्वर में आया तो वह झिम्मा तो किंतु वह जो चमत करने वाले थे वह तो ठाकुर नहीं थे वह तो मां स्वयं थी तो देखिए कि मां के पास में भक्तों को भेज कर के खास करके यह बालक भक्त और स्त्री भक्त इनको भेज कर के उनका जिम्मा मां जैसे कि ले यह ठाकुर चाहते थे तो युग धर्म प्रयोजन के लिए देवी के भीतर में जो प्राण प्रतिष्ठा करनी थी वह तो ठाकुर ने ऑलरेडी कर दी थी किंतु शायद यहां पर ऐसा हो सकता है कि ठाकुर के भक्तों में एक तरह का एक माइंड सेट बन गया होगा कि अच्छा ठाकुर तो खुद तो भाव में बार-बार आ जाते हैं उनके जीवन में हम तो समाधि दर्शन इतना दिखता है तो मां कौन है आखिर में मां को हम क्यों पूजे गुरु पत्नी है बोलकर केही क्या सर के ऊपर में चढ़ा है ऐसा तो कोई आवश्यक नहीं है तो ठाकुर को ऐसा लगा होगा शायद यह अभी अपना मेरा खुद का अनुमान है कि लोगों को भी यह पता चले कि हां मां के भीत क्योंकि क्या है कि जब तक शक्ति प्रकाश नहीं होता है लोग आपको स्वीकार नहीं करेंगे यह स्वामी जी ने खुद कहा था जब अमेरिका थे तब उन्होंने कहा था कि अपनी साधु होता है यह अपना त्याग है यह अपना आध्यात्मिक जीवन है वह सब अमेरिका में यदि जाएंगे तो उस सबका कोई कीमत नहीं है चाहिए वहां पर क्या चाहिए लोगों लोग हम लोगों को किस तरह से इंप्रेस कर सकते हैं किस तरह से हम लोगों को आकर्षित कर सकते हैं तो विद्या का तोड़ और वक्त होता की धूम अर्थात कि पांडित्य प्रचंड पांडित्य और प्रचंड वक्त शक्ति यह जदी होगा तो लोग आकर्षित होंगे तब तो कहीं जाकर के एक फाउंडेशन डले बाद में हरि महाराज जैसे ब्राह्मण जदी वहां पे जाए शुद्ध सात्विक एक जगह पर बैठे-बैठे वो शांति आश्रम में बैठे-बैठे अपना जीवन दिखाते रहे बाद में कोई चिंता नहीं है प्रथम तो आपको इस तरह से एक धूम मचा देनी होगी तो वैसे ही यहां पर ठाकुर शायद चाहते होंगे कि मां को किसी ना किसी तरह का एक बाह्य प्रकाश दिखाना होगा चमत्कार दिखाना होगा तो चमत्कार से लोग फिर थोड़ा सा उनको स्वीकार करना शुरू होंगे तो यह शायद एक उनका कैलकुलेशन रहा होगा अच्छा यह जो बैक
माँ सारदा एक भक्त के साथ हास्य-विनोद करती हुई कहती है की गोलाप माँ ही सही "माँ सारदा" है
एंड फोर्थ जो इनके पास में भेजना उनके पास में भेजना उसके ऊपर में से एक इंसिडेंट याद आ गया उस समय मां और अपना ये गोलाप मा गोलाप मा अर्थात कि व जो ही शोका तरा ब्राह्मणी कथामृत की ठाकुर के पास में आती थी फिर ठाकुर के यहां पे मां का फिर उन्होंने मां को ही जैसे कि अपना पूरा जीवन सर्वस्व अर्पण कर दिया था और मां की सेवा में ही उन्होंने जीवन बिताया था हालांकि मां को कष्ट कम नहीं दिया था वह जो कहानी है कि मां को ठाकुर को मिलने का ठाकुर के साथ में वार्तालाप करने का दिन में एक ही मौका मिलता था वह है जब मां खाने का थाली लेकर के खाना पका करके थाली लेकर के ठाकुर के पास में जाती ठाकुर के सामने बैठती और ठाकुर के साथ में बात करती वो एक जो मौका था वह भी जैसे कि एक बार जैसे ठाकुर ने गोलाप मां को कहा होगा किसी कारण से कि जाओ तुम थाली लेकर आ जाओ आज तो उसके दूसरे दिन से गोलाप मां जब भी मां थाली लेके जाती तो उनके हाथ में से थाली छीन लेती कहती कि मां मुझे दो मैं ठाकुर के पास में लेके जाती हूं तो मां का तो वह तो एक ठाकुर के पास जाना बंद हो ही गया किंतु साथ-साथ में ही फिर गोलाप मां ठाकुर के पास में लंबा समय तक बैठी रहती थी तो यहां पे मां को भी गोलाप मां का खाना लेकर के वेट करते रहना पड़ता था हमारी तरह तो नहीं कि खाना ढक करके रख दिया और हम लोग चले गए मां का तो ऐसा नहीं था मां खुद नहीं खाती गुलाप मां का खाना लेकर के वहां पास में बैठी रहती तो वह उनका मातृत्व शक्ति था किंतु एक दिन फिर मां को भी अधिर होकर के कहना पड़ा कि वह जद नहीं खाती है तो नहीं खाती है अभी मैं खाने के पास में नहीं बैठी रहूंगी अभी चाहे कुत्ता या बिल्ली है आकर के उसमें मुंह दे भी दे मार भी दे खाने में तो भी अभी मैं चिंता नहीं करूंगी ऐसा मां को खुद को मने मां का जिसका कि असीम धैर्य था ऐसी मां को अधीर होकर के यह बात जब कहनी पड़ी तो अपने कमरे में ठाकुर ने यह बात सुन ली हमको को दक्षिणेश्वर गए होंगे तो पता ही होगा कि ठाकुर का कमरा और मां का जो नबत है उसमें ज्यादा अंतर नहीं था मां जो यदि कुछ बोलती थी नाराज होक के हो सकता है कि ठाकुर को सुनाने के लिए ही शायद माने ऐसा कुछ उच्च स्वर से बोला होगा तो जो भी है ठाकुर सुन पाए और फिर उन्होंने इमीडिएट गुलाप मां को कहा कि देखो तुम यहां पर बहुत देरी तक बैठी रहती हो तो मां परेशान होती है तो तुम थोड़ा सा पहले यहां से चला जाओ तो गोलाप मा का भी इस तरह से एक थोड़ा सा क्या है सेल्फिश बस जैसा था तो वह कहती है नहीं नहीं मां तो मुझे बहुत प्रेम करती है अपनी बच्ची की तरह अपनी लड़की की तरह मुझे व स्नेह करती है वह मां को कोई चिंता नहीं है उसकी आप चिंता मत कीजिए तो जो भी है यदि शुरू शुरू में उनके जीवन में थोड़ा बहुत आध्यात्मिक स्वार्थ रहा होगा तो बाद में किंतु उन्होंने मां शारदा देवी की सेवा करके वह सब माने व्याज सहित सब उन्होंने चुकता कर दिया होगा कर दिया था तो जो भी है अभी यह दोनों के एक प्रसंग है अ उद्बोधन का है कि कहां का है लोकेशन में भूल गया किंतु एक स्त्री भक्त आती है वहां पे वहां पर देखा कि मां शारदा देवी और गोलाप मां ये दोनों बैठे हुए हैं कुछ-कुछ अंतर पे एक एक यहां पे बैठे हैं कोई उस कॉर्नर में बैठे हैं तो पहले तो यह गई सीधे मां के पास में अभी ये जो स्त्री भक्त थी उसने मां का कभी दर्शन नहीं किया था मां के बारे में सुन कर के ही वह सिर्फ आई थी तो अभी देखा कि दोनों स्त्रियां बैठी है दोनों माने वृद्ध है दोनों ने सफेद साड़ी पहनी है और दोनों के चेहरे पर शांति और इस तरह से एक आध्यात्मिक कोई एक दिख रहा है आध्यात्मिक प्रकाश दिख रहा है गुलाप मां तो भी तो कम जप नहीं करती थी तो य ये दोनों अभी जब बैठी है तो पहले तो व मां के पास गई मां को प्रणाम करके कहा कि मां मैं आपके दर्शन करने के लिए आई हूं तो मां को भी ऐसा वो मां के भीतर में भी थोड़ा बचपना था तो मां ने कहा कि अच्छा तुमको मां का दर्शन करना है ना वो बैठी है मां जाओ वहां पे गुलाब मां की ओर इशारा करके कहा तो यह स्त्री भक्त ने तो कभी मां का दर्शन किया नहीं था तो वो सोच उसने सोचा कि अच्छा हो सकता है गुलाब मां होगी मां तो गुलाब मां को जाकर के प्रणाम कर रही है तो गुलाब मां तो एकदम नाराज हो गई अरे जाओ जाओ यहां से भागो मां तो वो है वो तो मजाक कर रही है जाओ उनके पास जाकर प्रणाम करो तो अभी स्त्री भक्त ने सोचा हो सकता है कि मां ने मजाक किया हो तो फिर से मां के पास में आई तो मां ने फिर से हंस के कहा कि अरे नहीं नहीं मां तो वही है जाओ उनके पास जाकर दर्शन करो तो वो जब वो स्त्री भक्त दूसरी बार आई फिर से गोलाप मां नाराज हो गई अरे मैं क्या मां थोड़ी ना हूं मां वही है जाओ उनके पास में तो तीसरी बार जब आई मां के पास में तीसरी बार मां ने जब गुलाप मां के पास भेजा तब गुलाप मां एकदम क्रोधित होकर के बोल उठी कि तुम्हारे सर में अकल नहीं है क्या ईश्वर का चेहरा और मनुष्य का चेहरा तुमको समझ में नहीं आ रहा है वह देवी स्वयं है मैं जबक इंसान हूं आम आदमी हूं जाओ उनके पास में जाकर दर्शन करो उनका प्रणाम करो तब कहीं जाकर के उस स्त्री को लगा कि हां मतलब यदि आप इस तरह से कहते हैं कि मानवी का चेहरा और देवी का चेहरा तब उन्हें उ फिर से मां की ओर ध्यान से देखा तो पता चला कि वो देवी का चेहरा है देखिए तब कहीं जाकर के मां को प्रणाम किया और मां ने भी हंसते हंसते फिर उसको आशीर्वाद दिया तो ये वो देखिए कि मां के जीवन में भी इस तरह का जो कना ह्यूमर मने मने सब्स्यूम ह्यूमर सटल ह्यूमर उ मां के जीवन में भी बहुत था
पूजा करते करते भाव में मग्न होकर माँ कभी हँसती है और कभी रोती है
तो यहां पे ऐसा हो सकता है कि जिस तरह से मैं गंभीरानंद जी कहते हैं देवी मूर्ति में युग धर्म साधन के लिए उपयुक्त प्राण प्रतिष्ठा का समय समाग हुआ है ताई आमरा देखीते पाई ज श्री मां पुनरा श्री श्री ठाकुरे निकट ई अभिलाष ज्ञापन अर्थे श्री जुक्तो जोगिन मा के बोली ते छेन और इसीलिए हम देखते हैं कि मां फिर से ठाकुर के पास में इस आकांक्षा को प्रार्थना करने के लिए आकांक्षा की प्राप्ति करने के लिए श्री जुक्ता जोगिन मां को फिर से कहती है ओके बलो जाते मार एकट भाव टाव होए उनको जाकर के कहो जिससे कि मुझे थोड़ा सा भाव टाव हो लोक जनेर जन्ना ओके ओ कथा बोलर अमार सुयोग होए उठ छे ना लोग ज लोग बैठे होते हैं तो आसपास में इसकी वजह से उनको यह बात बोलने का सुयोग मुझे नहीं मिल रहा है अभी शायद वह सुयोग ना मिल रहा हो कि फिर मां खुद इतनी लज्जा शलाला थी कि फिर वो बोलना ना चाहती हो जो भी है अभी जब मां ने यह कहा है तो झूठ तो नहीं बोलेगी असत्य तो उनके जीवन में था नहीं तो हम सत्य मान लेते हैं कि लोग बैठे थे बोलकर के मां यह बात नहीं कह पाती थी जो भी है जोगिन मां कथा टा सहज भावे लोई लेन योगिन मां ने इस बात को सामान्य रूप से ही ग्रहण किया ऐसा ज्यादा कुछ सोचा नहीं कि जब ठाकुर की लीला संगिनी स्वयं है और ठाकुर को जद नारायण के रूप में स्वीकार किया है तो उनकी लीला संगी नारायणी ही होनी चाहिए इतनी अ या तो इतना विचार या तो फिर इतनी बुद्धि योगिन माने नहीं लगाई और इस सहज भाव में ही उन्होंने लियानी भाते पारले ना ज श्रीमा और ठाकुरे मध ज सु उच्च अध्यात्म संबंध रहिया छ ताहा के संसार भूमि ते कार्ज करो करि बार जन्नो अपरे मध्यस्थ तार कोनो प्रयोजन नाई व यह सोच भी नहीं पाई कि ठाकुर और मां के बीच में जो सु उच्च अध्या संबंध जो सर्वोच्च अध्यात्मिक संबंध है जो सर्वोच्च आध्यात्मिक रिलेशन आध्यात्मिक एक सेतु जो इन दोनों के बीच में बंधा हुआ है उसको संसार भूमि पर कार्य कर कर करवाने के लिए और किसी की मध्यस्थता का कोई प्रयोजन नहीं है मां सोचती तो सोच के साथ में ही ठाकुर उसको समझ लेते अभी थोड़ा सा मॉडर्न शब्द प्रयोग करें तो दोनों के बीच में टेलीपैथी का संबंध था यदि मा मां के मन में खुशी है या मां के मन में कष्ट है या तो फिर मां के मन में दुख है इमीडिएट ठाकुर समझ लेते थे और साथ-साथ में रिवर्स कि ठाकुर कब समाधि में है ठाकुर के मन में क्या चल रहा है क्या खाना है उनको क्या आवश्यकता है यह सब भी मां समझ लेती थी तो उसमें आपस में वार्तालाप करने के लिए और कोई मध्यस्थ को रखने की आवश्यकता नहीं थी भले ही चाहे वह सामने परस्पर वार्तालाप ना भी कर पाए इतने सारे लोग बैठे हैं तो मां जाकर के उनके सामने बात ना भी कर पाए तो भी कोई मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं थी सोच कर के ही वह अपने थ्रू जो हायर सुपरकॉन्शियस लेवल पर ही वे लोग भाव या विचारों का आदान प्रदान कर सकते थे किंतु जो भी है अब जब मां ने कहा है तो फिर मां का भी तो आज्ञा का पालन करना पड़ेगा तो ज्यादा कुछ नहीं सोच करके फिर व जोगिन मा ने क्या किया अथवा ई कथाओ तहर मने उदी तो होलो ना ज श्रीमा जन्मा बध ए मने उच्च स्तरेड़ी लेयो तीनी सर्वदा भगवत भावे विभोर था केन या तो फिर वह यह नहीं सोच पाई कि मां जन्म से ही इतना उच्चतर अध्यात्मिक आसन पर प्रतिष्ठित है कि दूसरों को नहीं पता होने पर भी वह सर्वदा भगवत भाव में विभोर रहती है दूसरों को नहीं पता चलता कि वह भगवत भाव में विभोर है हो सकता है जिस तरह से गंभीरानंद जी यहां पे स्पेक्युलेटिव कितनी उच्च आसन पे आसिता है तो इसलिए वो जो पता है ना रयान जी ने कहा था कि मां का मन कंठ प्रदेश से नीचे ही नहीं आता है यह जो षट चक्र जो होते हैं उसमें जो कंठ का चक्र है उसके बाद में कपाल का जो चक्र है तो कंठ का जो चक्र है उससे नीचे मां का मन आता ही नहीं है यह उन्होंने कहा था तो यहां पर भी बचपन से ही से ही जगन माता स्वयं जगद धात्री स्वयं वो इतने उच्च आध्यात्मिक आसन पर प्रतिष्ठित थी कि दूसरों को उसके बारे में पता भी नहीं चलता था प्रतिष्ठित भी थी और एकदम सीक्रेट भी इसलिए लोगों को पता नहीं चलता था जोगिन मा सुधु भाब लेन होबे होबा जोगिन मा ने सिर्फ सोचा कि हो भी सकता है मां जोखन बोलन तोख ठाकुर के ई कथा अनुरोध करबो मां ने जब यह बात कही है तब ठाकुर को जाकर के मैं यह बताती हूं पर दिन सकाले ठाकुर एका की ततो पोश बसिया अन देखिया तिनी प्रणा मानते श्री मायर कथा निवेदन करी लेन दूसरे दिन सुबह को जब उन्होंने देखा कि ठाकुर अकेले अपने तख्त के ऊपर में बैठे हुए हैं अपने खाट के ऊपर में बैठे हुए हैं तब उन्होंने प्रणाम करके मां की यह बात उनको निवेदित की बाकी मां की यह बात उनको कही ठाकुर सुनीले किछु किंतु उत्तर दिले ना ठाकुर सुनी लेन किंतु उत्तर ना दिया गंभीर होईया रही लेन ठाकुर ने सुना किंतु उत्तर ना देकर के गंभीर होकर के बैठे रहे तहर रूप अवस्था के हो कथा बोली ते साहस पाई तो ना उनकी जब इस अवस्था होती तो उस समय कोई भी बात करने का साहस नहीं कर पाता काजी जोगिन मा बिना बाको बए पुनरा प्रणाम करिया नह बते फिरिया गले इसी वजह से जोगिन माने बिना और कोई बात किए नाम करके नबत में वापस चली गई देखिए ठाकुर जब गंभीर हो जाते तो ऐसा स्वरूप धारण करते अभी कभी बालक है कभी वह हंसी मजाक कर रहे हैं कभी वोह मास्टर महाशय को तिरस्कार कर रहे हैं कि तुम ज्ञानी हो तुम्हारी स्त्री यदि अज्ञानी है तो तुम क्या ज्ञानी हो तो ऐसा ही मैंने इस तरह की जो भावों का जो परिवर्तन देखा और दूसरे दिन मास्टर महाशय आकर के देखे कि यही ठाकुर बच्चों के साथ में हंसी मजाक कर रहे हैं तो वो सोच रहे थे कि यही ये ठाकुर है जिन्होंने कल मुझे तिरस्कार किया था जिन्होंने कल मुझे यह कहा था कि तुम कलिकता के लोगों का वही एक है कि लोगों को समझा देना लोगों को उपदेश दे देना खुद को कौन समझाए उसका कुछ ठीक नहीं है तो अच्छी-अच्छी जो उच्च आध्यात्मिक बातें करते थे वही ठाकुर आज हंसी मजाक कर रहे हैं तो हम भी यह कह सकते हैं कि यह यही ठाकुर है क्या कि जब वह आध्यात्मिक ऐसी गंभीरता मय एक जब धारण करते गंभीरता धारण करते तो उनके सामने कुछ बोलने का भी जैसे कि हमारा साहस नहीं होता था तो मने ठाकुर के विभिन्न भाव है तो इसीलिए योगिन मा फिर और कुछ कहने का साहस न जुटा पाई और प्रणाम करके नबत में वापस चली आई तीनी जोखन आशी लेन तो खन श्रीमा पूजा कोरीते छन दरजा त उन्मुक्त वह जब वापस आई उस समय मां पूजा कर रही थी दरवाजा जो आधा खुला था वई दिया तीनी देखी लेन मा खूब हसते छन ई हसते छन आबार एकू परी काते छन उसी जो दरवाजा थोड़ा सा खुला था उसी गैप में से उन्होंने नजर डाल के देखा कि मां हंस रही है बड़ी हंस रही है खूब हसी ते छन य हसी ते छन आ बार एकट परे काते छन यह हंस रही है और फिर थोड़ी ही देर के बाद में रो रही है दई चखे धारा और विराम नहीं दोनों आंखों से अश्रु धारा अविरा बहती रहती है अभिराम बहती रहती है दोनों आंखों में धारा का विराम नहीं है कतो भावे था किया क्रम स्थिर होया गलन एके बारे समाधि कितनी देर तक इस तरह से हुआ कभी रोती है तो कभी हंसती है किंतु कुछ बहुत देर के बाद में बिल्कुल स्थिर हो गई क्रम स्थिर होया गले धीरे-धीरे करके स्थिर हो गई एके बारे समाधि तो संपूर्ण रूप से समाधि स्थ तखन जोगिन मा दर्जा बंद करिया चलिया गले तब जोगिन माने दरवाजा बंद क्रिया और वहां से चली गई अनेक खण परे आबार शेखाने आशी ले श्री मां बोली लेन ले बहुत क्षण के बाद में जब वह वापस आई तब मां ने कहा यह वापस आई यानी कि जो ठाकुर के पास में गई थी तो ठाकुर के पास में से क्या भी आई जोगिन मा श जोग पाया बोली लेन अभी जब योगिन मां को मिला है मौका तब उन्होंने कहा तबे मां तुम्हार ना की भाव होई ना तो मां तुम कहती हो कि तुम्हारा भाव नहीं होता ऐसा जब पूछा श्री मां लज्जा पाइया हसते लागी लेन जब ऐसा पूछा मां लज्जित होकर के हंसने लगी देखिए कि कितना सुंदर यह दृश्य है मां पूजा कर रही है और पूजा करते करते हंस रही है और कभी-कभी फिर से ही रो रही है कितनी ही देर तक ऐसा हंसना और रोना चला फिर धीरे-धीरे करके हंसना और रोना दोनों शांत हो गए और संपूर्ण रूप से मां समाधि स्त हो गई अभी इसकी व्याख्या कौन कर करेगा और कैसे करें कि किस उच्च आध्यात्मिक अनुभूति के वह पूरा जवार भाटा मां के हृदय में वह चल रहा होगा तो उसकी वजह से इतना सब कुछ हमको दिखाई दिया सोच कर के देखिए वैसे ही मां का मन कितना आध्यात्मिकता से भरपूर था उस आध्यात्मिकता से भरपूर होने पर भी जब कोई भी बाहर का लक्षण नहीं दिखता बाहर में उसका कोई भी लक्षण नहीं दिखता था तो जब बाहर में लक्षण दिखना शुरू हो जाए तब भीतर की आध्यात्मिकता कितनी बढ़ जाएगी वो जो फिफ्थ गियर ना कि सिक्स्थ गियर टॉप गियर प जब गाड़ी चलाते हैं तो वो जो आपका वो जो एक्सीलरेटर का वो जो कांटा होता है वो कैसा रेड में चला जाता है वो जो जो लोग गाड़ी चलाते होंगे उन्होंने देखा होगा वो जो स्पीडोमीटर जो होता है वो वहां पे एक रेड एरिया होता है यानी कि आप जितना भी गाड़ी स्पीड से चलाइए आपका वह कांटा वो रेड एरिया में ना जाना चाहिए किंतु यहां पे मां का आध्यात्मिकता इतना फुल स्पीड से चल रहा था कि कांटा वो सीधा वो रेड के ऊपर में जाकर अटका था तो यहां पर भी देखिए कि जब योगिन मा को मौका मिला तो योगिन मां फिर मां को कहती है कि क्या मां तुम्हारा तुमको तो क्यों तुमको तो लगता है कि भाव नहीं होता है तुम्हार ना की भाव होई ना तो फिर मां इस प्रश्न होकर के जब सुना तो लज्जित होकर के हंसने
दक्षिणेश्वर में रात को बंसी सुनकर माँ भाव-मग्न हो हँसती है
लगी जोगिन मा कखन कखन रात्रे दक्षिणेश्वर थाकी तेन योगी मा कभी-कभी रात को दक्ष ेश्वर में रह जाती तिनी पृथक ई सुया थाकी लेओ श्री मा तहा के टानिया लोया निज पार्श्व सवाई तेन वह थोड़ी सी दूर भी जदी सोती रहती तो मां उनको खींच करके अपने पास में ले आती और अपने पास में उनको शयन करवाती एक रात्र के बासी बजाते छलो एक रात को कौन बंसी बजा रहा था बाशी स्व श्री मायर भाव होलो तिनी थाकि थाकि हसी ते लागी लेन बंसी के स्वर से मां को भाव हुआ और तिनी रह रहे करके हंसने लगी जोगिन मा स संकोच बिछाना एक कोण बसिया रही लेन योगिन मा संकोच पूर्वक आव बिछाना यानी कि बिस्तर के एक कोने में जाकर के बैठी रही भाभी लेन सोचा आमी संसारी मानुष के ही समय छब ना मैं तो संसारी हूं उनको इस समय में स्पर्श नहीं करूंगी इतने उच्च भाव में रहती है तो ठाकुर का तो हमने देखा है भाव में जब रहते हैं कोई अशुद्ध व्यक्ति उनको स्पर्श करता है तो ठाकुर को कितना कष्ट होता था तो यह सब जोगिन मां ने देखा था इसलिए वह मां से दूर जाकर के बैठ गई कि मां को जब भाव हुआ है तो इस अवस्था में मुझे उनको स्पर्श नहीं करना है अनेक खण परे मायर भाबे उपशम होलो बहुत समय के बाद में मां के भाव का उपशम हुआ श्री मां निजे बोलिया लेन अच्छा यह तो हो गया प्रसंग समाप्त उसके बाद में श्री मां ने खुद ने कहा था तो खन अर मन एमन छलो उस समय मेरा मन ऐसा था यह बाद की बात है वो उद्बोधन में ना कि जयराम बाटी में माने यह बात कही होगी उसी दक्षिणेश्वर के दिनों के बारे में कि उस समय मेरा मन ऐसा था दक्षिणेश्वर रहते के बांसी बाजा तो दक्षिणेश्वर में रात को कौन बांसी बजाता सुनते सुनते मन व्याकुल होए उठ तो मने होतो साक्षात भगवान बासी बाजा छन सुनते सुनते मेरा मन व्याकुल हो उठता मन में लगता कि साक्षात भगवान बंसी बजा रहे हैं अमनी समाधि होए ज तो वैसे ही समाधि हो जाती और यही मां फिर कहती है योगिन मां की भाषा में यदि हम कंप्लेन करें यही मां कहती है कि मुझे भाव नहीं होता ठाकुर के पास जाकर के भाव मांग लो दर्शन मांग लो तो यह था मां के भाव और आध्यात्मिकता भरा जीवन तो इसके साथ में यह चैप्टर समाप्त होता है कल से नया चैप्टर स्टार्ट करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु ना इसमें सीक्रेट कुछ नहीं है भाव
प्रश्न: भाव-प्रकाश हमारे संघ से क्यों गायब हो गया है? हम इसे अपने साधुओं में क्यों नहीं देखते?
को धारण करने के लिए ब्रह्मचर्य चाहिए वह जो फेमस घटना है व त्य गोपाल की कि वह स्वामी जी ने इन्वेस्टिगेट करके देखा था वह जितना भाव में ऊपर उठता था उतना ही वह बाद में नीचे गिरता था विषय वासना में तो इस तरह के बहुत सारे बहुत सारे तो नहीं किंतु कुछ कुछ वेल नोन एग्जांपल हो चुके हैं अपने यहां पर तो इसलिए ठाकुर ने कहा साधु सावधान कि क्या है कि ब्रह्मचर्य होगा तब यह भाव आप धारण कर पाएंगे वरना तो फिर वह ये जो जो जवार भाटा जो है ना वो ऐसा भयानक एक खेल खेलता है मन के ऊपर में कि मन फिर वो जिस लेवल पर था उससे भी नीचे जाकर गिरेगा तो बेटर है कि पहले ब्रह्मचर्य साधित करो बाद में यह सब भाव उठाओ वो तो अपने से आता रहेगा उसके लिए अलग से साधना करने की जरूरत नहीं है और ऐसा नहीं है कि फिर साधुओं के जीवन में भाव नहीं है वही है कि व उसको छुपा के रखते हैं ठाकुर ने जो अबला अबला सिद्धि अबला अबला सिद्धि यह जो कहा कि जो अबला है नारी है उसको सब छुपा करके ही रखना चाहिए तो साधुओं के बारे में भी अप टू एन एक्सटेंट यह बात ठीक है ये हमारे जितने भी यह बड़े-बड़े साधु थे जो काफी रिस्पेक्टेड है भूतेशानंद जी है आत्मस्थानंद जी है रंगनाथ आनंद जी है उससे पहले शंकरा अंद जी शुद्ध जी विरजानंद जी प्रभु महाराज तो सबके जीवन में ऐसा नहीं था कि भाव नहीं था उनके सेवकों के साथ में बात करेंगे तो पता चलेगा रंग नाथा आनंद जी के बारे में फेमस पता है कि उनका एक तरह का एक एथे इस्ट थे एक तरह के कि वो भक्ति वगैरह की वजह वो जैसे एक आत्म श्रद्धा आत्मनिर्भरता स्वामी जी वाला जो भाव था उस परे वह ज्यादा जोर देते थे तो उनके एक उनके एक सेवक महाराज से मैंने पढ़ा है इसको सेवक महाराज ने लिखा है कि ऐसा नहीं है कि हम लोग रंगनाथ नंद जी को मंदिर में नहीं ले जाते थे वो जब वह बेलूरमठ में रहते थे उस समय होता ऐसा था कि रंगनाथ आनंद जी एक बार मंदिर में जाएंगे तो फिर वो पुष्पांजलि देते देते इतना समय वहां पर बिता देंगे वो हिले गे ही नहीं वहां से कि फिर वो तो तो प्रेसिडेंट है ना उस समय तो पूरा एंगेजमेंट रहता है वह वीआईपी आते रहते हैं मीटिंग होती रहती है इधर उधर जाना होता है तो वो शेड्यूल फिर वो भंग हो जाता था बोलक के हम उनको मंदिर में जाने का अवॉइड करते थे तो [हंसी]
प्रश्न: ठाकुर कहते हैं कि स्त्रीओ को नीरव रहना चाहिए, लज्जा ही उनका आभूषण है। लेकिन स्वामीजी कहते हैं कि स्त्रीओ को नए भारत के निर्माण में समान जिम्मेदारी लेनी होगी। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि स्वामीजी ने अमेरिका - यूरोप यात्रा की थी?
देखिए वह जो फेमस फोटो है ना मां और निवेदिता सामने सामने बैठे हैं एजेक्ट जो आप कंट्रक्शन बोल रहे हैं उने कंट्रक्शन पिक्चर में जैसे कि ले ली है कहा मां वो नबत के बाहर नहीं निकलती थी कहां वो निवेदिता पूरा जगत घूम लिया स्वामी जी के साथ में वाद विवाद करती थी बाद में वो भारत यात्रा ना कि भारत ऐसा ही कुछ वो ऐसा वो भारत में घूमी थी पूरे भारत में स्वामी जी की महासमाधि की बाद है वह संघ छोड़ने के बाद में व जितने भी फ्रीडम फाइटर थे लोकल राजा थे वह सब जगदीश बोस जैसे वोह जितने भी साइंटिस्ट थे उनको प्रेरणा देने के लिए तो वह वड़ोदरा भी आई थी अपने वो जो गायकवाड़ से उनसे भी मिली थी गायकवाड़ को इतना वो इंस्पायर किया था तो वो कहां वो निवेदिता कि एकदम वो जो मर्दानगी वाला उसका भाव था माने बड़ा इतना अग्रेसिव था वो और कहां वो मां तो एगजैक्टली वो पिक्चर में कंट्रक्शन वो कैसा वो एकदम लगता है सो यू आर राइट कि वो मां का जीवन अभी जैसे कि किसी को कहना है आज की आधुनिक नारी को श्वर की साइंटिस्ट है मान लीजिए उसके सामने आप वो मां का जीवन रखते हैं तो आप इसको किसे रखेंगे ये इस की जो लेडी साइंटिस्ट है वो तो अपना स्पेस प्रोजेक्ट का वो तो मने दे आर द मने वी आर प्राउड ऑफ देम कि उनकी इतनी सिद्धियां है स्पेस प्रोजेक्ट में राइट तो अभी इंटरेस्टिंग स्टेटिस्टिक्स जो होती है जो कॉमर्शियल जेट लाइनर चलाते हैं व जो पायलट का लाइसेंस दिया जाता है तो लेडी पायलट उसमें ज्यादातर तो जेंस ही होते हैं किंतु जो लेडी पायलट का परसेंटेज है वो हाईएस्ट इंडिया में है माने 10 टाइम्स ग्रेटर देन वर्ल्ड एवरेज इवन अमेरिका में भी इतने लेडी पायलट नहीं है जितना कि इंडिया में है व्हिच इज समथिंग टू बी प्राउड ऑफ फॉर अस इंडियंस राइट तो वहां पे यह लेडी पायलट है वो जो कमर्शियल जेट लाइन चलाती है यहां पे इसरो के साइंटिस्ट है और कितनी ही लेडीज तो टीचर है लॉयर है ना सोल्जर है अभी वो जो जो अपना नेशनल डे वो जो रिपब्लिक डे परेड होता है वो जो लेडीज का वो पूरा एक कंटिजेंट होता है उनकी कैप्टन होती है वो सैल्यूट करते हैं प्राइम मिनिस्टर को गेस्ट को सो वी आर प्राउड ऑफ देम राइट तो फिर उनके सामने मां का जीवन किस तरह से प्रोजेक्ट करें वो क्वेश्चन हो सकता है वो दैट इज अ वेरी लेजिटिमेसी है अगेन ये अपना सामान्य बुद्धि से एनालिसिस होता है तो मेरा जो किंतु एनालिसिस है कि कोई भी स्त्री हो ना कि पुरुष चरित्र का जो स्ट्रेंथ है दैट फॉर्म्स 90 पर कि 90 पर है कि आपका चरित्र का स्ट्रेंथ है बाकी 10 पर से आपको जो करना है वो कीजिए तो वो जो 90 पर रिप्रेजेंटेशन जैसे कि मां को करना था बोलकर के मां के जीवन को इस तरह से पवित्रता स्वरूप पीणी के रूप में मां को प्रोजेक्ट किया गया है ठाकुर को खुद को देखिए कि कोई भी व्यक्ति हो अभी वह स्त्री हो ना कि पुरुष 90 पर कैपेसिटी उनकी आध्यात्मिक होनी चाहिए तो व आध्यात्मिकता इसलिए ठाकुर का पूरा जीवन कंप्लीट डेडिकेटेड टू स्पिरिचुअलिटी वही दक्षिणेश्वर में रहे वही साधना करके हजार पद्धतियों से साधना करके ईश्वर दर्शन किए वो जैसे वोह स्वामी जी ने कहा पिछले 100 हज साल की जो भारत की आध्यात्मिकता है वह सब जैसे कि ठकुर ने अपने एक जीवन काल में उन्होंने सिद्ध करके दिखा दिया सो हिज लाइफ वाज एग्जांपलर लाइफ जो कि आपको एक एज मॉडल के रूप में आध्यात्मिकता के मॉडल के रूप में लेनी है व्हिच फॉर्म्स 90 पर ऑफ अवर कैरेक्टर ठाकुर सभी स्त्री पुरुषों के लिए मां का जीवन स्पेसिफिकली स्त्रियों के लिए वो 90 पर आप मां के जीवन की जो पवित्रता है उसको देखे गठित कीजिए देन 10 पर विद द 10 पर ऑफ योर टैलेंट 10 पर ऑफ योर कैपेसिटी यू कैन बी आइर इसरो साइंटिस्ट यू कैन आइर बी जेट लाइनर पायलट यू कैन आइर बी अ सोल्जर फाइटर पायलट यू कैन बी एनीथिंग इन द वर्ल्ड यू कैन बी अ पॉलिटिशियन चीफ मिनिस्टर इवन प्राइम मिनिस्टर बट दैट फॉर्म्स ओनली 10 पर ऑफ योर पर्सनालिटी और 10 पर ऑफ योर कैपेसिटी दैट 90 पर ऑफ दैट शुड बिलोंग टू स्पिरिचुअलिटी आइडियल स्पीकिंग तो वो जो स्पिरिचुअलिटी इन अ प्योर फॉर्म वो एक्सप्रेस हो इसलिए ठाकुर ने इस तरह का कुछ किया होगा उनका खुद का लाइफ और मां का लाइफ दे बोथ फॉर्म 9090 पर ऑफ अवर अ रिस्पेक्ट कैरेक्टरिस्टिक सो एम्पल बनाने के लिए शायद उन्होंने ऐसा किया हो बट वी हैव टू टेक इट ना ना आई एग्री विथ यू मेरे खुद के माइंड में यह सब क्वेश्चंस थे अभी भी है मेरे पास में भी इसका कोई परफेक्ट सोल्यूशन नहीं है दिस इज अनदर ऑफ दैट कोन कि इसका उत्तर मिलने से इनलाइटनमेंट मिल [हंसी] जाएगा आत्म श्रद्धा उनका बला यहां प आत्म श्रद्धा गौरी दुर्गा मां के जीवन में भी वो बगला मूर्ति का प्रकाश तो देखने को मिला है हमको [हंसी] वैसे वो मां के जीवन में है कि वो किसी ने
माँ की आधुनिक विचारसरणी के उदाहरण
आकर के वो तो बाल बाल्य विवाह की प्रथा थी तो तो किसी ने आकर के कहा कि लड़की बड़ी हो रही है बड़ी यानी कि वह 10 12 15 साल की शादी नहीं हो रही है तो मां ने कहा कि अरे उसको निवेदिता के स्कूल में भर्ती करवा दो ना तो वहां पर देखो कितनी सुंदर बच्चियों का वन गठन होता है तो राधू राधू स्कूल में जाना चाहती है एकदम वो इसने उन्होंने अपनी गोलाप मा ही वो सब जगह प वो एक उनका एक व कंट्रा कैरेक्टर होता है जिसे कि हमको सीखने को मिले तो गोलाप मा आ करके चिल्लाती है कि अरे इतनी बड़ी लड़की हो गई स्कूल में जाएगी उसकी शादी होने का समय हो गया तो राधू रोने लगी उसको तो स्कूल में जाना था हो 10 12 साल की तो मां ने कहा नहीं नहीं अरे जाए ना वो भी स्कूल में जाए वो भी सीखे तो मां हेड मेनी फॉरवर्ड लुकिंग आइडियाज निवेदिता देखिए निवेदिता जोसेफाइन मैक्लाउड और सारा ओली बुल अभी इनसे ज्यादा फॉरवर्ड थिंकिंग उस समय कौन थे निवेदिता जोसेफाइन मेकला मने ऑल थ्री ऑफ देम ऑल तीन का आप देख लीजिए लाइफ कितना मतलब जो स्वामी जी कहते थे स्त्रियों को जिस तरह से होना चाहिए जब वो आ कर के मां के शरणागत होती है तो तो हमको समझना चाहिए कि उन्होंने मां मां के भीतर में क्या देखा जद वो वही एस्पेक्ट देखती कि वो ये वाला नबत वाला एस्पेक्ट कि नबत के बाहर ही नहीं निकलना है तो तो वो मां को एक्सेप्ट नहीं कर पाती और यह तीनों के पास में ऐसा कुछ नहीं है देखिए हम इंडियन लोगों को शायद ऐसा कोई एक स्वार्थ वगैरह छुपा हो ऐसा हो सकता है ठाकुर के भक्तों में कि यदि ठाकुर की कृपा चाहिए होगी तो मां की कृपा चाहिए मां के माध्यम से ठाकुर को प्राप्त करें ऐसा वो लोकल भक्तों के मन में एक स्वार्थ भावना हो कर के मां के प्रति इतनी श्रद्धा नहीं भी है तो शायद दिखाने को जाए वैसा मैंने 1 पर 01 पर ऐसा चांस है इन तीनों में तो ऐसा कुछ नहीं है मैंने दे हैव नो वेस्टेड इंटरेस्ट माने वो तो राइट मने ये गुलाम भारत ये गुलाम भारतीय है उनसे क्या अपेक्षा रखनी है तो इस दृष्टि से जो लोग आए थे यहां पर वे लोग जद मां को इतना श्रद्धा करें देन वी हैव टू से के उन्होंने मां में क्या देखा होगा वो जो आपने कहा ना कि ठाकुर ने स्वामी जी ने कहा कि तुम लोगों का जो छोटा दृष्टि है उसमें से निकल कर के ठाकुर को मैं पूरे जगत में छोड़ दूंगा तो यह एक जिसको कि कहते हैं रिप्रेजेंटेशनल बायस वो लिटरेचर में वो होता होता है जो लिखता है उसका एक बयाज होता है तो वो कहीं ना कहीं से वो बयाज इसमें प्रकाशित हो ही जाता है अ ठाकुर के जीवन में देखिए कि वो बायस को तोड़ने वाले थे स्वामी जी स्वामी जी के खुद के जीवन में देखिए कि निवेदिता का जो राइटिंग है स्वामी जी के प्रति व्हिच गिव्स अ कंपलीटली न्यू लाइट ऑन स्वामी जीज टीचिंग्स एंड कैरेक्टर तो सिमिलरली अभी मां के जीवन का मां का जीवन नेसेसरीली इतना कंजर्वेशन था कि ऐसा कोई रेडिकल पर्सन उनके ऑर्बिट में नहीं था उनके पास नहीं आता था कि वो मां के रेवोल्यूशन या रेडिकल आइडियाज को प्रोजेक्ट करें किंतु यह तीन तो थी मने एक इनडायरेक्टली हमको एक ऐसा मिलता है कि जहां पर वह धुआ है वहां पर आगुण होना ही चाहिए वो जो एक कहते हैं ना तर्क तर्क शास्त्र में है तो इन तीनों ने जद जिनको स्वीकार किया है उनके भीतर में रेडिकल आइडियाज ना हो ऐसा हो ही नहीं [हंसी] सकता आपको जद पढ़ना है ना निवेदिता को तो
प्रश्न: स्वामीजी के बारे में निवेदिता क्या कहती है वह पढ़ना है
निवेदिता के लेटर्स है उद्बोधन अद्वैता आश्रम से हुए रिसेंटली पब्लिश मुझे पता है कैसे मिले उस समय तो कहीं पे अवेलेबल नहीं थे वह शंकरी प्रसाद बसू ने उसका कलेक्शन पब्लिश किया था जो कि कंप्लीट आउट ऑफ यह था आउट ऑफ स्टॉक था तो मैं मैं जब बेलूरमठ में था तो पूरा कोलकात्ता घूम-घूम करके मैं सब रेर किताबें इकट्ठा करता था मुझे कहीं पे भी निवेदिता के लेटर्स नहीं मिले तो मैं थोड़ा सा निराश हो कर के मेरा टीसी के बाद में पोस्टिंग हुआ लीमड़ी तभी वहां से वो राजकोट जाना हुआ एक बार तो वो मेरा ही बैचमेट वहां पे बुक स्टोल में बैठा था तो अभी मैंने सोचा कि एक लॉन्ग शॉट लगा देते हैं वो पूरे कोलकाता में कहीं नहीं मिला बंगोल में इतना खचा मुझे निविता के लेटर नहीं मिले तो यहां पे कहां मिलने वाला है तो फिर भी एक लॉन्ग शॉट के रूप में बिकॉज की मेरा बैचमेट था बिकॉज की हम बातें कर रहे थे मैंने कहा कि अरे भाई मुझे निवेदिता के लेटर कहीं नहीं मिल रहे हैं तो तुमको जद दिखे तो बोलना तो बोला कि अरे हमारे पास में है एक कॉपी जो पड़ा हुआ है बहुत सालों से बिक नहीं रहा है पड़ा है ऐसा एक मैंने कहा अच्छा दिखाओ तो कहां वो भीतर में वो गो डाउन में ले गया जहां पे कितनी पुरानी ने किताबें पढ़ी थी उसमें से दो दो वॉल्यूम का सेट है वह पुराना निकाला धूल मिट्टी लग गया था वो कीड़े खा गए थे आधी इस तरह की किताब उसने लाके मेरे हाथ में दी मुझे लगा जैसे भगवान मिल गए मैंने कहा अभी तो उधत आश्रम ने पब्लिश कर दिए हैं वो लेटर पढ़िए व पेंसिल लेकर के या मार्कर लेकर के बैठिए फर्स्ट रीडिंग आप थोड़ा रेपिडली कर दीजिए स्वामी जी के बारे में जो निवेदिता कहती है उसको सबको अंडरलाइन कर दीजिए पहले में तो उसके बाद में सेकंड रीडिंग कीजिए वही पढ़िए जो कि स्वामी जी के बारे में कहती है तो वो जब आप पढ़ेंगे ना अद्भुत अद्भुत आपको दिखने को मिलेगा और इसको मैंने ट्रांसलेट करवा करके यही जो कंपाइलेशन व थोड़ा बहुत करके मैंने वह जत में भी दिया है तो निवेदिता के पत्र तो ऑनलाइन तो अभी जोत अवेलेबल है आई होप अभी होगा तो उसमें भी आप जद सर्च करना चाहे तो मिल जाएगा
प्रश्न: दाना-काली की पत्नीने माँ से आशीर्वाद लेकर १२ साल तक श्रद्धा बनाये रखी की एक न एक दिन उसका पति सुधर जायेगा। हम भी लम्बे समय तक श्रद्धा कैसे बनाये रखे?
आपको देखिए उन्होंने पेशेंस रखा वोह एक बात है दूसरी बात थे कि उनके पास में पेशेंस रखने के अलावा ऑप्शन नहीं था जिस तरह से जो सामाजिक प्रथा थी डाइवोर्स लेना वो वो तो इतना बड़ा टैबू था कि आज के युग में जदी हस्बैंड और वाइफ में जदी हस्बैंड थोड़ा सा भी अत्याचार करेगा तो फट करके वह डाइवोर्स तक इमीडिएट बात आ जाएगी अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे पास में एक ऐसा केस आया था कि एक एक लेडी ने मुझे कहा कि उसका हस्बैंड उसको मारता है तो मैं तो इतना आश्चर्य चकित हो गया मैंने सामने से इमीडिएट प्रपोज किया कि उसके डाइवोर्स ले लो उसके साथ रहने का क्या रीजन है मने क्या जरूरत है तो इवन मुझे भी एकदम इमीडिएट ऐसा कहना पड़ा तो क्या है कि वह सामाजिक सिचुएशन ऐसी थी कि आपको साथ में रहना ही पड़ेगा चाहे जितना भी एब्यूज हो जाए डोमेस्टिक एब्यूज आपके पास में डाइवोर्स इज नॉट ए बेटर ऑप्शन तो वह तो एक प्रश्न था दूसरा है कि प्रश्न हो सकता है कि इस तरह की रिस्ट्रिक्टेड सोशल सिस्टम का जन्म हुआ ही क्यों अभी रीजन बहुत सारे हैं वह आक्रमण बाकी आक्रमणों की वजह से सोसाइटी को सुरक्षित रखने के लिए वह सब डाइवोर्स प्रथा के ऊपर में थोड़ी नाराजगी थी लोगों की वोह एक्सेप्ट नहीं था किंतु दूसरी दृष्टि से देखिए कि एक युग था ना कि जबकि वह ध्रुव है एक पैर पर खड़े रहकर हजार साल तक तपस्या करता है तब कहीं जाकर के ईश्वर प्राप्ति होती है आज के युग में क्या है कि हम लोग इस तरह की तपस्या करने के लिए शरीर और मन का गठन हुआ ही नहीं है ठाकुर जैसे बार-बार कहते हैं अनगतला है यदि आप एक पेर प 10 मिनट भी खड़े रहेंगे तो अभी तो पसीना हो जाएगा वो 10000 साल ना कितना वो ध्रुव का है पीरियड वो कहां हम खड़े रहने वाले हैं तो एक तो बात है कि देखिए कि ईश्वर प्राप्ति के लिए या तो फिर चरित्र के नव निर्माण के लिए समय तो लगेगा ही वो जो ठाकुर की वो कहानी है कि दो ऋषि मुनि पेड़ के नीचे बैठ के वो जप कर रहे हैं वो नारद मुनि मिले बोला कहां जा रहे हैं तो बोला मैं स्वर्ग में जा रहा हूं तो नारायण से पूछेगा कितना हमको कितना और देरी लगेगा ईश्वर प्राप्ति में तो वो जब नारायण नारद मुनि वापस आए कहा कि ईश्वर का नारायण का कहना है कि इस पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने जन्म लगेंगे तो उसमें से एक ऋषि नाचने लगे एक रोने लगे एक ने कहा कि अरे और इतना साल लगेगा इतना जन्म लगेगा दूसरे ने कहा कि एटलीस्ट चलो एक तो आशा तो है कि इतने जन्म के बाद में मिलेगा तो वह तो यात्रा तो है बड़ी लंबी तो मुझे ऐसा लग रहा है कि यह जो रिस्ट्रिक्टेड सोशल सिस्टम बनाया ही इस तरह से था कि यह जो सोशल सिस्टम हमारे से तपस्या करवा लेगी कि अदर वाइज तो वह जो लेडी को डाइवोर्स गया होता या वह अपने फादर के घर में जाकर के रहती तो तो ऐसा तो नहीं है कि फिर वह आध्यात्मिक जीवन में अपना समय बिताने वाली थी कभी-कभी ऐसा होता है ना कि शुरू में ही ईश्वर कुछ दे देते हैं उसके बाद में आपसे वेट करवाते हैं कि आपको और ज्यादा चाहिए तो भी आप वेट कीजिए मने या तो फिर आप तपस्या कीजिए एक तो पहले तो वो आप वो होता है ना आजकल वो ड्रग्स लेते हैं ना तो पहला वाला ड्रग्स आपको फ्री में देते हैं क्यों क्यों एक बार हैबिट हो जाएगा फिर आप जितना चाहे रुपया मांगेगा उतना आप देंगे तो ऐसा ही जब पहला जो एक आशीर्वाद फ्री में मिल जाता है कि हां यह संभावना है इस तरह की शांति इस तरह का आनंद इस तरह का अनुभूति हो सकता है बट नाउ फॉर द सेकंड स्टेज यू विल हैव टू डू तपस्या अभी मैं मैं खुद का जो मैंने कहा था ना कि मैं जब यहां पर आया था आई वाज इन सच अ टर्मल कि क्या करूं ना करूं तो उसी समय वह जयराम बाटी जाना हुआ था वो मां के घर के सामने में बैठा था और एक ऐसा एक अनुभव हुआ कि मुझे लगा कि ना यह तो मतलब देर इज समथिंग डीपर हियर अभी उसके बाद में ऐसा कोई अनुभव फिर से हुआ नहीं बट दैट अनुभव इ स्टिल देयर इन माय माइंड वो 20 साल से वो मैं इस तरह से आशा में हूं कि वो फिर से हो जाएगा वो यदि पहला वाला फ्री में नहीं मिलता तो आई डू नॉट नो कि मैं ये 20 साल टिक पाता कि नहीं ये नरेंद जो पहले ही दिन आया था पहले दिन हाथ पकड़ कर के उसको जो अनुभूति हो गई वो चिल्ला उठा मेरे मां है मेरे बाबा है किंतु देखिए कि नरेंद्र का जो इतना स्केप्टिसिजम था इन स्पाइट ऑफ दैट उसको पहला अनुभव याद था कि ठाकुर स्पर्श करके क्या कर सकते हैं तो वो चाहे जितना ही स्केप्टिसिजम हो कितना ही ठाकुर को परीक्षा करता हो ठाकुर का कितना ही वह उसके साथ में जीत करता हो ही न्यू वेरी वेल कि ठाकुर के पास में जादुई शक्तियां तो है ही है और उसके जैसे स्ट्रांग विल वाले आ आदमी का माइंड पकड़ करके वह खिलौना की तरह खेल सकता है जो आदमी उसके भीतर में कुछ ना कुछ तो है फिर वह क्या है समझने के लिए पूरा जीवन चला गया किंतु अनुभव तो हो गया कि वह पावर है कुछ ना कुछ तो मिला होगा पहली ही मुलाकात में कि जिससे कि उसका फैद टिका होगा