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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार बिषय राम कृष्णाय ते नम मां की जीवनी में से हम पाठ कर रहे थे कल एक छोटा सा कल एक बड़ा ही सुंदर एक घटना का वर्णन गंभीरानंद जी महाराज ने किया है वह हम ने देखा कि किस तरह से मां अपनी मां को और अपने पिताजी को सब कार्य में सहायता कर रही थी किंतु उनके हाथ तो वैसे छोटी बालिका के हैं तो जब खाना बना दिया तो उसके बाद में से वह जो बर्तन है वह टव के ऊपर में से नीचे लाने है उतारने हैं तो वह बेचारी नहीं कर पाती थी तो अपने पिताजी को बुलाती थी माने हृदय में जगदंबा निवास करती है और हाथ है छोटी बालिका के इतना सुंदर एक एक चित्र हमारे सामने वह होता है ऐसा पढ़ कर के कि इसको हम यदि ध्यान करते करते यह सब चीजों के बारे में हम जैसे कि वह लीला चिंतन अभी तक हम लोगों को पता है कि किस तरह से ठाकुर का मंत्र जाप करते हैं तो दक्षिणेश्वर में जाकर के हम लोग भी बैठे हैं सब डायरेक्ट डिसा पल के साथ में और ठाकुर सामने बैठे हैं अपनी छोटी खट के ऊपर में और यहां का दरवाजा खुला है गंगा की ओर का बड़ा ही सुंदर चांद का प्रकाश आ रहा है रात का समय है कालीवाड़ा धूप जल रहा है तो उसकी सुगंध यहां पर बाग है बागान है उसमें से फूलों की खुशबू यहां पर मां नबत में विराजमान है तो यह सब हम कल्पना करते हैं जब हम ठाकुर का कोई लीला चिंतन करते हैं तो मां का भी ऐसा हम कर सकते हैं कि जयराम बाटी में मां छोटी बालिका है वो अपने भाइयों के साथ में व हम इमेजिन कर सकते हैं कि हम भी मां के छोटे भाई है मां हमको गोद में लेकर घूमती है हमको खिलाती है हमारी केयर करती है वहां पर हमारे लिए खाना बना देती है तो इतना सुंदर एक चिंतन होगा समय कहां पर पसार हो जाएगा मन कैसा आनंद और एक दिव्यता से भर जाएगा वह हम करके थोड़ा सा प्रयास करके वह कर सकते हैं थोड़ा एक्सपेरिमेंट तो सुंदर कल का प्रसंग भी आगे पढ़ता हूं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं मायर वयस जोखन एकादश बर खन ई अचोले भीषण दुर्भिक्ष आविर्भाव होए जब मां की उम्र 11 साल की थी तब उस एरिया में प्रचंड एक दुष्का का आगमन हुआ था फेमिन जिसको कहते हैं बड़ा ही भयानक फेमिन वहां पर हुआ था मायर पिता किंचित धनो तो छलो मां के पिताजी का कुछ धान संचित था थोड़ा सा यह लोग बचा करके रखेंगे थोड़ा सा खाएंगे थोड़ा सा शायद विक्रय करेंगे तो इस तरह से स्टोर में थोड़ा सा धान पड़ा हुआ था खेत में से किया हुआ तिनी निजे दरिद्र होले चारी दिके हाहा कारे ति मात्र विचलित होया पोश्य बोर्गर भविष्यत ना भा बयाई अन्न शत्र खुलिया दिलन वो बत दरिद्र थे किंतु चारों ओर जिस तरह से भूख मरी और यह त्रा ही त्रा ही हाहाकार मच रहा था यह देख कर के उन्होंने पौष वर्ग अर्थात की उनके ऊपर में जो डिपेंडेंट है ऐसे अर्थात उनके ऊपर डिपेंडेंट कौन है तो उनकी पत्नी धर्मपत्नी उनके बच्चे बालिका छोटी सी बच्ची दो दो तीन बच्चे उनके लड़के ये इन लोगों की चिंता किए बिना उन्होंने अन्न सत्र खोल दिया अभी कोई भी किसान होगा वह सोचेगा कि अरे फेमिन चल रहा है दुष्का महामारी चल रही है तो मेरे पास में जो थोड़ा धान है मैं बचा करके रखूं जिससे कि मैं अपने बीवी बच्चों का पेट तो भर सकू फिर चाहे लोगों का जो होना है सो क्योंकि उसका सबसे बड़ा जिम्मेदारी तो अपना फैमिली के प्रति है कोई अपने फैमिली को अपने परिवार को इग्नोर करके लोगों को लोगों को मदद करना सहाय करना यह तो किस तरह की बात हो गई कौन कर सकता है दो लोग कर सकते हैं एक तो है कि जिसके कोई सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी नहीं है जैसे बहुत बार ऐसा होता है ना कोई लड़का जब साधु बनने के लिए जाता है तो उसके मित्र आ कर के उसको बोलते हैं अरे भाई तुमको घर की जिम्मेदारी नहीं लेनी है इसलिए क्या तुम घर छोड़ के भाग रहे हो क्या तो फिर व कोई सा किसी किसी का ऐसा हो बहुत सारे लोगों का ऐसा होता है कि अभी मैंने रिसेंटली एक केस सुना था एक लड़का साधु बनने के लिए गया था कहीं पे तो उसके कुछ दिनों के बाद में उसके माताजी पिताजी उस आश्रम में गए और बोलने लगे कि अरे यह लड़का तो हमको घर में ऐसा चिट्ठी लिख के गया है कि मैं सुसाइड करने को जा रहा हूं और चिट्ठी में नीचे में क्या लिखा है कि मेरा इतने इतने लोगों से इतना इतना देना है अर्थात कि उसने पता नहीं स्टूडेंट लोन लिया होगा कि क्या है 5छ लाख का उधार है ऋण है अभी वे लोग उसको धमकी दे रहे हैं कि तुम पैसा दे दो हमको वरना हम तुमको मार देंगे तो इसलिए उसने क्या किया क्या नाटक किया कि घर में ऐसा लिखा कि मैं सुसाइड करने को जा रहा हूं ऐसा बोल कर के आश्रम में चला आया तो अभी यह आशा से कि घर वाले पैसा दे देंगे और वो सब मामला खत्म हो जाएगा उसकी खुद की जिम्मेदारी नहीं रहेगी तो ऐसे बहुत कभी-कभी होता है कि कोई अपने परिवार की जिम्मेदारी छोड़ कर के और कोई मैंने दिखाता है कि अरे मैं तो महत का का करने के लिए जा रहा हूं मैं कोई आश्रम में साधु होने के लिए जा रहा हूं या ऐसा कोई दिखावा जब कोई करता है तो प्रश्न होता है कि इसका जो सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी है वह बिल्कुल जीरो है इसलिए वह परिवार की चिंता नहीं करता वरना तो परिवार की चिंता किए बिना कौन जा सकता है जिसको मने डिवाइन कोल जिसको प्राप्त हुई हो ईश्वर का स्वयं उसको एक अंदर से भीतर से इतना प्रचंड आकर्षण उसको हो कि फिर वह जो मातृ ऋण त्र ऋण देव ऋण गुरु ऋण यह सब ऋण को इग्नोर करके ठुकरा करके फिर वह सन्यास लेने के लिए साधु होने के लिए जा सकता है तो भीतर में से तो वो डिवाइन कोल सुननी होगी तभी तो यह होगा तो वैसे ही परिवार की चिंता नहीं करके गांव को खिला रहे हैं तो क्या है यह सेंस ऑफ इरिस्पांसिबिलिटी है ना कि एक डिवाइन कोल है कि अरे इसके भीतर में भी तो वही आत्मन है मेरे भीतर में भी भी वही आत्मन है उसका दुख मेरा दुख है यह समझ कर के अपना जो छोटा सा धन्य का भंडार था वो खोल दिया और सबके लिए अन्न सत्र शुरू कर दिया पौष वर्ग महाराज जी लिखते हैं कि उनके ऊपर में जो डिपेंडेंट है उनकी चिंता किए बिना अपना धन्य भंडार खोल के अन्न सत्र शुरू कर दिया तो देखिए कि रामचंद्र मां के पिताजी उनके भीतर में वो माने कहा है ना शुरुआत में ही माने कहा है मां-बाप जद रकम ना थकले की जन्मा है जन्मले माने माने थोड़ा सा वो पहली के रूप में कहा है मां और पिताजी का दिव्य स्वभाव नहीं होने से क्या अवतार जन्म ग्रहण करेंगे नहीं करेंगे व ठाकुर की मां का वो ठाकुर बोलते है सवाई मां के हाड़ो बोलते अर्थात कि अपने मुंह में अपने मन में अपने पेट में कोई बात छुपा करके नहीं रख सकती थी जो भी आएगा उनको सबको अपनी मन की बात बता देती माने हम लोग तो क्या है कि हमारा एक ब बहुत सारे लोग ऐसा कहते हैं हम तो बड़े मैच्योर है हम तो माप तुल करके बात करते हैं किसके साथ में क्या करना क्या किस तरह से बिहेव करना हम बड़े प्रैक्टिकल है किंतु इस बहुत ज्यादा प्रैक्टिकल होने से फिर यह डिवितरा ही दूर हो जाएंगे इस बहुत सारे लोग सोचते हैं कि अरे मैं तो चोरी नहीं करता डकती नहीं करता मेरे में कोई दुर्गुण नहीं है तो फिर यह प्रैक्टिकल होना क्या कोई गलत बात है तो गलत बात तो नहीं है किंतु फिर क्या है कि रास्ते में एक बैरियर की तरह हमेशा आपकी प्रैक्टिलिटी रह जाएगी आपको यदि उच्च आयाम सर करने हैं जैसे आप यहां से हिमालय से जाए और हरिद्वार वहां तक तो ठीक है किंतु फिर वह आपको गंगोत्री है कैलाश मान सरोवर है वहां तक की यात्रा करनी है तो फिर आपको यह प्रैक्टिलिटी को भी छोड़ देना होगा मेरा क्या होगा यह च चता मेरे भविष्य की चिंता यह सब चिंता को छोड़ कर के ठाकुर के ऊपर में संपूर्ण शरणागत होंगे अपने हृदय की जब बात सुनेंगे तब यह दिव्यता के दरवाजे अपने लिए खुलेंगे वरना हम कुछ हद तक जा पाएंगे यदि दुर्गुण है तो हरिद्वार तक जाना भी मुश्किल है किंतु हमारे भीतर में सद्गुण है तो हरिद्वार तक तो हम चले जाएंगे किंतु यदि उससे ऊपर कैलाश मानसरोवर जाना है तो यह प्रैक्टिलिटी यह हमारा भविष्य की चिंता सब छोड़ कर के संपूर्ण श्री राम कृष्ण जो भी इष्ट है आपके उनके चरणों में अपने मन को समाहित कर देना होगा अभी सामने देखा कि अरे इसका कष्ट है तो मेरा क्या होगा यह चिंता छोड़ो उसका कष्ट मेरा कष्ट है बोलकर के सीधा उसको सहाय कर दिया यह मां जब एक एक स्त्री एक एक एक औरत थी जिनके साथ में भाविनी देवी ना कि एटली मैं नाम भूल गया जिनके साथ में ठाकुर के विवाह की बात चल रही थी तो विवाह की बात चलती है तो क्या है पात्र देखे जाते हैं उनके साथ में थोड़ा बहुत डिस्कस होता है तो ऐसे एक स्त्री थी उनके साथ में ठाकुर के विवाह की बात चल रही थी वो किसी ने वो किया होगा वो तो मां चंद्रा मणि देवी तो बड़ी परेशान हो गई थी तो कि ठाकुर दक्षिणेश्वर में पता नहीं क्या-क्या नाटक करते हैं मां के भोग की लची पूरी अपने से खा लेते हैं ऐसा सब बेचारी चंद्रा मणि देवी को सुनने में आया तो बड़ी परेशा हो करर के ठाकुर को बुलाया कि बच्चे को बुलाओ उसकी शादी कर दे बीवी आएगी तो दिमाग का थोड़ा सा ठिकाना आएगा तो उस समय वो ठाकुर के विवाह की जो बातें चल रही थी तो उनके साथ में भी एक बात की गई तो ऑफकोर्स फिर तो ठाकुर को तो ठाकुर ने कहा कि विवाह पात्र कुटो बांधा आज जयराम बाटी ते अर्थात कि विवाह का जो पात्र है जयराम बाटी में सुरक्षित रखा हुआ है कुटो बांधा अर्थात की कोई पेड़ पर कोई फल आता है तो देवता को प्रथम फल दिया जाता है तो उसको कोई पंखी अपनी नी चाच ना मार ले इसलिए उसको कोई रैपर में बांध कर के सुरक्षित रखा जाता है उसको कुटो बाधा कहते हैं तो ऐसा सुरक्षित पात्र जयराम बाटी में है तो बहुत सालों के बाद में यह स्त्री जिनके साथ में मां के ठाकुर के विवाह की बात चल रही थी वो मां को मिलने के लिए आई तो देखा कि बहुत सारे भक्त लोग मां के लिए बहुत सारा कुछ ला रहे हैं कोई फल ला रहा है कोई मिठाई ला रहा है कोई पैसे अर्पण कर रहा है तो वो बैठ साथ में बैठी थी देख रही थी और बड़ी निराशा की सांस ले रही थी तो किसी ने पूछा अरे क्या हुआ तो उसने कहा कि परमहंस महाशय के साथ में तो मेरा विवाह होने वाला था वो यदि हो जाता तो यह सब फल मिठाई मुझे ही प्राप्त होता तो यह बात सुन कर के मां ने बहुत मां जोर से हंसना शुरू कर दिया और उसने कहा कि मां ने कहा कि अरे तुमको यह सब चाहिए तो ले लो क्या है इसमें तो ले वो कहा किसी सन्यासी को बुला कर के अरे इनको दे दो दे दो ये मिठाई फल उनको दे दो तो ये ये ऐसी जड़ दृष्टि रखने वाले कि फल मिठाई मुझे प्राप्त होगी बोलकर के मैं परमहंस महाशय के साथ में शादी करना यह दृष्टि अभी उन्होंने तो देखिए कि कोई दुर्गुण तो नहीं थे सद्गुण ही थे भारत की महिलाओं में ग्राम्य महिलाओं में खास करके बहुत रेयरली आपको किसी तरह के दुर्गुण देखने को मिलेंगे वो एक समय ही खास करके उस समय ही ऐसा था कि ग्राउंड स्वेल एक आया था ग्रास रूट से एक स्पिरिचुअलिटी का माहौल शुरू हुआ था कहां वह पुराण की कथाएं हो रही है कहां वह नाटक बजाय पौराणिक नाटक यात्रा वगैरह हो रहा है जितने भी स्त्री पुरुष नर नारी थे खास करके यह जयराम बाटी कमार पुकुर जहां पर तो ईश्वर का स्वयं अवतार पृथ्वी पर आगमन होना था तो एक एक आध्यात्मिक माहौल था किसी के भीतर में इस तरह से कोई विजिबल दुर्गुण नहीं था किंतु फिर भी दुर्गुण नहीं है तो आप वहां तक चले जाए ंगे ऋषिकेश तक चले जाएंगे ज्यादा से ज्यादा किंतु उसके बाद की जो सफर है उसके बाद में आपको आपकी प्रैक्टिलिटी है व जो सेंस ऑफ सेफ्टी सिक्योरिटी है सब कुछ विसर्जन कर देना होगा तब कहीं जाकर के आप उच्च आध्यात्मिक रास्ते के पथिक हो सकते हैं तो यहां पर भी रामचंद्र ने क्या किया अपने पौष वर्ग अर्थात कि उनके ऊपर जो डिपेंडेंट थे उनकी धर्म पत्नी उनके बच्चे उन सब की चिंता किए बिना अपना छोटा सा धान्य भंडार था उसका दरवाजा खोल दिया और अ कातर बांगला में शब्द है अका अर्थात कि बिना हृदय में कोई भी संकोच रखे हुए मुक्त हस्त से वह अन्न सत्र खोल दिया ए घटना विवरण श्री मायर भाषा रूप पाई इस घटना का विवरण मां की भाषा में इस तरह से मिलता है मां क्या कहती एक बार शेखाने की दुर्भिक्ष लागलो एक बार शेखाने अर्थात की जयराम बाटी में क्या दुर्भिक्ष हुआ था अर्थात की क्या फेमिन हुआ था कतो लोग ज खेते ना पे आमा देर बाड़िया तो कितने लोगों को खाना नहीं मिलता था तो हमारे घर आते थे आदर आगेर बछर धान मड़ाई बांधा लो हमारा अगले साल का धान थोड़ा सा हमारे स्टोर में पड़ा था बाबा श शब धाने चाल कोरिय कोलार डाल दिए हांडी हांडी खिचड़ी रा दिए रखते बाबा अर्थात की मां के पिताजी उस सब धान का वो चाल बना करके उसमें कढाई की दाल मिला कर के उसमें से हांडी हांडी खिचड़ी अर्थात कि पात्र पात्र भर कर के खिचड़ी बना कर के रख देते थे बोलते कहते बाड़ी सोबाई खाब पिताजी कहते घर में जितने भी लोग है वह सब यह खिचड़ी खाएंगे आर जे आश बे ताके व देवे और जो आएंगे भिक्षा प्राप्त करने के लिए उनको भी देंगे आर शरदार जन्नो खाली भालो चाले दटी भात करवे मेरी शारदा के लिए सिर्फ अच्छे चावल का थोड़ा सा भात करके रखना शे अमार ताई खावे वो मेरी पुत्री मेरी लड़की वही खाएगी देखिए किंतु एक मने कहेंगे कि अपने पौष वर्ग की चिंता किए बिना अपना धान का भंडार तो खोल दिया किंतु जगदंबा की तो चिंता करनी पड़ेगी यह छोटे-छोटे हाथ जगदंबा के कल वही लाखों लाखों भक्तों को आशीर्वाद देने वाले हैं तो मां शारदा की तो चिंता करनी पड़ेगी बाकी सबका फिर सभी लोग खिचड़ी खाएंगे मां के लिए अच्छे चावल का थोड़ा सा भात बना केर रखेंगे मेरी शारदा क्या कहते हैं हमार शारदा शही खावे मेरी शारदा वही खाएगी एक एक दिन एमन होतो य तो लोग ऐसे पड़तो जे खिचड़ी ते कुल तो ना एक एक दिन ऐसा होता कि इतने लोग खाने के लिए आ जाते कि खिचड़ी खत्म हो जाती खिचड़ी से होता नहीं तो खोनी आबार चौड़ा हो तो जैसे ही खिचड़ी खत्म हो गई वैसे ही नई खिचड़ी बनाने के लिए हांडी या तो फिर पात्र को टव पर चढ़ाया जाता था आर से गरम खिचड़ी शब ज ढेले द तो शिगर जुड़े बोले आमी दुई हाते बताश करतु और जैसे वह गरम खिचड़ी वो जो भिक्षा प्राप्त करने के लिए आए हैं भिक्षु ग्राम वास जो भी है भूखे हारे थके उनके पात्र में खिचड़ी डाल दी जाती तो अभी तो बहुत ही शुदा प्राप्त हुई है बहुत ही भूख लगी है तो गर्म खिचड़ी ठंडी होने की भी बेचारी राह नहीं देख सकते इतने शुदा तर है इतने बेचारे परेशान है बोलकर के ही तो रामचंद्र के घर आए हैं तो मां क्या करती अपने छोटे-छोटे हाथों से वो इस तरह से हवा नाती कि जिस तरह से खिचड़ी ठंडी हो जाए आहा खिदर ज्वाला सोकोले खाब जन्नो बोसे आछ मां कहती है आहा भूख के मारे सभी लोग खिचड़ी ठंडी होती है या तो नई खिचड़ी बनती है उसकी राह देखते बैठे हुए हैं एक दिन एकटी बागदी ना डोमर में ऐसे छ एक दिन एक बागदी या डोम की लड़की आई है अभी क्या है कि वैसे ही तो एक जात नाथ का का यह सब अपने समाज में था था ही छोटा सा थोड़ा बहुत तो बागदी या डोम जो जाती है वो थोड़ी सी नीच जाति कही जाती है नीच शब्द भी कहा नहीं जाएगा आजकल यह शब्द यूज करना बड़ा ही गलत है आज के भारत में इस तरह की बातें हम बिल्कुल नहीं करते किंतु उस समय की हिस्टोरिकल रियलिटी है तो उस समय के दिनों की जब बात हम करेंगे तो थोड़ी बहुत हिस्टोरिकल कांटेक्ट में हमको यह बात कहनी पड़ती है तो उस समय के हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट में जिनको कि निम्न जाति के कहे जाएंगे उसी एक लड़की वहां पर आई अभी इन लोगों का जीवन तो वैसे ही अनिश्चित है वैसे ही कभी खाना मिला ना मिला गरीबी यह तो फिर ब्रिटिश गवर्नमेंट का राज था उच्च जो कुल के लोग हैं जिनको कि हम उच्च जात के लोग कह रहे हैं उन लोगों को भी तो सब समय खाना नहीं म नसीब होता था तो जिनको निम्न जाति का कहा जाए तो उनकी तो क्या परिस्थिति होगी तो निम्न जाति की वैसे ही तो मने आर्थिक स्थिति सब अनिश्चित है उसमें भी अकाल पड़ा है तो बेचारी लड़की की क्या पर अवस्था होगी सोच के देखिए तो इस तरह की एक लड़की वहां पर आई माथार चूल कोलो झांकड़ा झांकड़ा होए गछ सर के बाल झांकड़ा झांकड़ा अर्थात की मेटेड वो जटा जिसको कहते हैं ना वो बाल में अब बहुत दिनों से आप पानी डाल कर के धोएंगे नहीं थोड़ा बहुत तेल नहीं डालेंगे तो कैसे वो जटा की तरह हो जाते हैं तो इस तरह से हो गए हैं बाल के बाल सर के बाल तेलर अभाब माने तेल के अभाव में इस तरह से हो जाते हैं चोख उन्मा देर मतो माने रोई होंगी बेचारी खाना नहीं मिला होगा माताज पिताजी जीवित भी होंगे कि अकाल में मृत्यु हो गया होगा उनका किसको पता छोटी बच्ची को तो समझ में भी नहीं आता उसको तो ये इस तरह से मेरा यह जगत में उसके साथ में अन्याय क्यों कर रहा है यह बात ही उसको समझ में नहीं आती छोटी बच्ची है बेचारी कितना रोई होगी कितना इधर-उधर घूमी होगी भटकी होगी तो आंख पूरी लाल लाल हो गई है छूटे ऐसे गरूर डाबा जे कुंडो भेजन छलो ताई खेते आरंभ कोरे छे दौड़ती हुई आई बेचारी और गाय के लिए जो थोड़ा सा पुआल भिजा के रखा था पानी में वही खाना आरंभ कर दिया य तो जे सोकोले डाक छ सभी लोग बुला रहे हैं अरे अरे बाड़ी भीतर ऐसे खिचड़ी खा ता आर धैर जो मान छे ना मा मां की मां ने देखा होगा या तो फिर मां ने देखा होगा तो बोला रहे हैं अरे तुम घर के भीतर आओ खिचड़ी खाओ यह तो गाय के लिए जो खाना रखा है उसको क्यों खा रही हो किंतु भूख का जो कष्ट है हम लोगों को तो दो टाइम तीन टाइम चार टाइम आराम से खाना मिलता है दिन रात जो खाना चाहे हमको मिल जाता है तो हमको तो पता नहीं चलता कि भूख का कष्ट क्या है यह बेचारी भूख के कष्ट के मारे यह राह नहीं देख पा रही कि दो कदम चलकर घर के भीतर में जाए और गर्म खिचड़ी खाए यह सेंस उसकी चली गई है माने यह पूरी पशु एक उसका अवस्था में आ गई है तो उस घर में सभी लोग बोल रहे अरे घर के भीतर आओ खिचड़ी खा ता आर धैर जो मान छे ना उसका सहन शक्ति इस हद तक खत्म हो गया था भूख की ज्वाला में कि वह धैर्य उसका इतना नहीं रहा कि घर के भीतर जाए और खिचड़ी खाए खानि कुडो खे तबे तार कथा तबे कोथा तार काने गेलो जो गायिका गाय के लिए खाना रखा था वो थोड़ा सा खाया तब कहीं जाकर के उसका यह जो एक उन्माद वत अवस्था हो गई थी थोड़ी शांत हुई और जो उसको सब लोग बुला रहे हैं अरे आओ भीतर में खिचड़ी खाओ यह बात उसके कान में गई ये जो ठाकुर स्वामी जी का ये जो कॉस्मस माइक्रो कजम हम देख रहे थे स्वामी जी कहते हैं कि कान है जो आवाज के सब किरण आवाज के साउंड वेव्स ग्रहण करते हैं किंतु यदि मन नहीं है तो क्या सुन रहे हैं उसका कोई पता नहीं है यदि आंखें सब देख रही है किंतु मन नहीं है तो आंखें क्या देख रही है वह पता ही नहीं चलेगा तो उसका परफेक्ट उदाहरण उसके आंख है कान है देख रही है सुन रही है कि सभी लोग बुला रहे हैं कह रहे हैं कि घर के भीतर आओ खिचड़ी खाओ किंतु उसका मन वो जो गाय के लिए पानी में भिजा करके वह पुवाल वगैरह जो रखा है उस परे इतना केंद्रित हो गया है भूख के मारे उसको लगा कि अरे यह रहा थोड़ा बहुत खाना तो भूख का जो प्रचंड वेग है उसके कान और आंख दोनों को बंद कर दिया है आंखों से देख रही है कानों से सुन रही है किंतु फिर भी उसका मन गाय के आहार पर है तो उसके सर के भीतर में ब्रेन के भीतर में जा ही नहीं पा रहा किंतु थोड़ा सा वह खाया वह पुआल जो भी है तब कहीं जाकर के उसका मन शांत हुआ फिर उसको बाद में सुनाई दिया कि घर में सब लोग क्या कह रहे हैं एमन भीषण दुर्भिक्ष हो मां कहती है कि ऐसा भीषण ये अकाल था सेही बछर दुख पे तबे लो के धान मराए रखते आरंभ करले उस साल इस तरह से कष्ट देखा तब कहीं लोग धान को थोड़ा बहुत प्रोसेस करके स्टोर करना आरंभ किया है इस हम लोग एक बेलूर मट से हम लोगों की टूर होती है जयराम बाटी कमरपुकुर जाते हैं तो वहां पर मैंने देखा था तो विशाल खेत ही तो है एकदम फ्लैट लैंड्स है जहां पे भी जाए खेत के खेत हरियाले खेत और कहां सुदूर दूर में वह सूर्यास्त हो रहा है मुझे याद है हम लोग गाड़ी में जा रहे थे तो यह दृश्य परफेक्ट मेरे मेमोरी में बैठा हुआ है कि मैं खिड़की के पास में हमें मैं ट्रेवल करूंगा तो मैं खिड़की के पास में ही बैठूंगा किसी के साथ बात नहीं करूंगा और ग्राम्य दृश्य देखता रहूंगा तो याद है कि इतने खेत के बाद खेत हरी हरियाली है और देखे कि वह धान को स्टोर करने के लिए वह लंबे लंबे वो जो आते है ना वो स्टोर जिसको कहते हैं स्टोरेज वो है तो देखा कि मैंने कि वहां पर इस तरह से अभी हर कुछ कुछ अंतर पर कुछ कुछ डिस्टेंस पर इस तरह के वो आलू को स्टोर करने के लिए सब्जी को स्टोर करने के लिए धान को स्टोर करने के लिए यह स्टोरेज बनाए गए हैं तो क्या है उस समय कि इस तरह से अकाल हुआ तब कहीं लोगों को हुआ कि धान को मराए रखते आरंभ कोले अभी यह कोई प्रोसेस होगी मुझे नहीं पता एटली क्या है किंतु वह जब धान को काटते हैं थोड़ा सा प्रोसेस करके स्टोर करके रखना सबने आरंभ किया श्री मायर सहज अकृति व अनुब भाषाए जे मनोरम चित्र खानी फुटिया उठिया छ ताहा ते देखी ते पाई महाराज जी लिखते हैं मां की सहज अकृति और अनवत सुंदर भाषा में जो मनोरम चित्र हमारी नजरों के सामने खड़ा हुआ है उस उसमें उस चित्र में हम देख सकते हैं भविष्य ते जिनी मातृत्व महिम मंड तो दाबी लोया प्रति हृदय राजिता होई बेन बाल्य तिनी सुकुमार हस्ते बीजोन ग्रहण पूर्वक बुख अन्नो भोजन उपयोगी कोरीते कतो व्यस्त य महाराज जी वो बीच-बीच में एकदम साहित्यिक भाषा यूज करते हैं उसका एक नया एक उदाहरण कि भविष्य में जो मातृत्व की महिमा में मंडित होकर के जो हाथ जो हाथ सबको आशीर्वाद देंगे जो ममतामई मां की मूर्ति हजारों हजारों भक्तों के हृदय में विराजित होगी बाल्य तीनी सुकुमार हस्ते वही बचपन में वह अपने छोटे-छोटे हाथों से बीजन ग्रहण पूर्वक हाथों से हवा डालते हुए बभु खूर अन्न भोजन उपयोगी कोरीते कतो व्यस्त जो भूखे हैं उनका अन्न खाने के लिए तैयार करने में कितनी व्यस्त जो भविष्य में जगदंबा स्वयं उनका दिव्यत्वाची हाथों से जो भूखे लोग हैं उनका अन्न खाने के लिए तैयार करने में व्यस्त है आर से कोमल प्राणा दुहिता लाल ने दरिद्र ब्राह्मण सस्नेह हृदय कतो खानी अकलता और वह कोमल प्राणा बच्ची के लालन पालन में दरिद्र ब्राह्मण के हृदय की कितनी आकुल होता है कि सभी लोग खिचड़ी खाएंगे किंतु मेरी शारदा यह अच्छे धान का अच्छे चावल का बना हुआ भात खाएगी यानी देखिए कि सेल्फलेसनेस संपूर्ण रूप से है किंतु एक जगह पर सेल्फिश थोड़ा सा र गया है ईश्वर के लिए सेल्फिश निस ठाकुर कहते हैं ना कि ध्रुव ने ईश्वर के लिए मास्टर महाशय ठाकुर के पास जाकर के कहते हैं कि उनकी स्त्री कहती है कि यदि आप मेरी मेरा लालन पालन व जो भरण पोषण जो होता है वह आप नहीं करेंगे आप तो दिन भर जाकर के वह कहां वो कालीवाड़ा ह्मण है उसकी चक्कर में प करके वहीं पर बैठे रहते हैं मेरी केयर नहीं करते मेरी संभाल नहीं करते मेरा मेरे खाने के लिए तो शायद कोई अभाव नहीं होगा मास्टर महाशय तो एमए किया था और अच्छे वो विद्यासागर की स्कूल में नौकरी कर रहे थे खाने का तो शायद अभाव नहीं होगा किंतु आप घर पे आकर के मेरी केयर नहीं करते तो मैं जाकर के आत्महत्या करूंगी तो मास्टर महाशय परेशान होकर के ठाकुर के पास गए और ठाकुर को बोल रहे है कि देखि कि मेरी पत्नी ऐसा कहती है तो ठाकुर क्या कहते हैं कि ईश्वर के के रास्ते में जो बाधा विपत्ति दे इस तरह की स्त्री का त्याग करो ऐसा गंभीर होकर के ठाकुर ने कह दिया कि मास्टर महाशय एकदम चिंतित हो गए अभी बाकी लोग भी सब थे वो कहां वो नरेण और वो नरेण का तो स्वभाव है वो जोर-जोर से गप लगाना हट्टो गोल करना वो जहां पर भी जाएगा तो वो सब लड़के लोग हल्ला मचा रहे थे वे लोग भी ये सुनकर के एकदम शांत हो गए कि अरे बाप रे ठाकुर इतने सीरियस हो गए हैं इतनी गंभीर बात कर दी है तो लोग भी थोड़े से सहम गए कि अरे मतलब मामला सीरियस है अभी थोड़ा हल्लागुल्ला मचाना बंद करो तो मास्टर महाशय बड़े चिंता में खड़े हैं तब कहीं जाकर के एकदम ठाकुर फिर उनको यह बात करके और किसी के साथ बात करें फिर भी फिर थोड़ी देर के बाद आकर के मास्टर महाशय को शांत भाषा में कुछ शब्द कुछ बातें ऐसी कह दी कि ठाकुर का स्वा मास्टर महाशय का हृदय शांत हुआ ठाकुर ने क्या कहा कि जो सही सही ईश्वर के प्रति जिनकी भक्ति है सभी लोग उनके वश में आ जाते हैं तो माने लोगों को कष्ट कौन देता है तो दुष्ट लोग राजा और स्त्री अभी पुरुष है तो इसलिए ठाकुर ने स्त्री कहा है वरना ऐसा नहीं स्त्री के जद कोई स्त्री को बोलते तो पुरुष कहता है तो मैंने लोगों के जीवन में बाधा कौन खड़ी करता है जनरली कौन परेशान करता है तो कोई दुष्ट लोग होगा वो आकर के कुछ परेशानी खड़ी करेंगे राजा अर्थात कि जिसके पास में सत्ता है वो आकर के परेशान करेंगे या तो फिर आपका स्पाउस पति हो कि पत्नी हो वो शायद घर में परेशानी खड़ी करेंगे तो जिसका ठाकुर के ऊपर में ईश्वर के ऊपर में सही श्रद्धा भक्ति है सभी लोग उसके वश में आ जाते हैं जैसा ठाकुर ने जब कहा तब कहीं जाकर के मा म शाय के हृदय में थोड़ी सी शांति हुई तो ईश्वर के रास्ते में आप जब कोई भी हो आपका जो ऋण हो या तो फिर आपकी जो भी कोई लोग आपके पास में जो अपेक्षा रखते हैं वह अपेक्षा को आप इग्नोर कर सकते हैं यदि ईश्वर के ऊपर में सही सही श्र श भक्ति है तो यहां पर भी रामचंद्र कहते हैं मां के पिताजी कहते हैं कि बाकी सभी लोग खिचड़ी खाएंगे तो किंतु यह जो निस्वार्थ होता है वो मेरी बच्ची तक नहीं आएगी बच्ची जगदंबा स्वयं है बच्ची की आराधना उनके पिताजी इस तरह से उनके लालन पालन करके कर रहे हैं तो यहां पर जो बाकी जो नियम लगता है आध्यात्मिक जीवन के या तो फिर यह हमारी ड्यूटीज धर्म कहा जाता है हमारे शास्त्र में ईश्वर के ऊपर में सच्चे आपकी शरणागति हो तो फिर कोई नियम काम नहीं करता ईश्वर ही आपको सभी चीजों से बचाएंगे वो गोवर्धन वो वृंदावन में लोगों ने इंद्र को भोग देना पूजा करना बंद कर दिया तो इंद्र नाराज हो गया और कहीं जाकर के जोर से बारिश तूफान फेंक रहा है तो यहां तो भगवान कृष्ण स्वयं विराजमान है थोड़ी ना तूफान बारिश को कोई उनको परेशान करने वाले हैं भगवान ने गोवर्धन पर्वत अपनी अंगुली पर उठाया और पूरे ग्राम्य वासी की रक्षा की तो भगवान स्वयं जिनकी रक्षा करेगा तो वेद के विधान हो ना कि कोई भी हो उनको कुछ भी परेशानी कोई भी उनकी क्षति करने वाले नहीं है तो इसीलिए तो एक और है मां जो कि छोटी बच्ची है भविष्य में जाकर के लाखों भक्तों के हृदय में विराजित होने वाली है वह अपने छोटे-छोटे हाथों से जो भूखे लोग हैं उनका खाना खाने के लिए योग्य बना रही है और यह दरिद्र ब्राह्मण इतना विशाल हृदय सबके लिए अपना छोटा सा धान्य भंडार खोल केर खिचड़ी खिला रहे हैं किंतु अपनी छोटी बच्ची के लिए उन्होंने अच्छे चाल का भात बना के रखा है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री श्र राम कृष्णर्पण मस्तु