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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 11 nov 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी की जीवनी और उनका उपदेश हम पाठ कर रहे थे स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित मां की जो प्रमाणित जीवनी है उसमें से तो चैप्टर का नाम था बिंदु वासिनी और बंगाली में गंभीरानंद जी महाराज ने लिखी है उस समय ऐसा था कि मां की इस महासमाधि के बाद में बहुत सारे लोगों ने बहुत कुछ लिखना शुरू कर दिया था तो उस समय एक ऐसा लगा था कि जो चीजें रामकृष्ण संघ में इनकरेज नहीं होती जो कोई भी एक आदमी खड़ा हो जाएगा कहेगा मैं मुझे मां का दर्शन प्राप्त हुआ है मां ने मुझे इस तरह से आशीर्वाद दिया है कोई कहेगा मां ने मेरे लिए यह कर दिया है वगैरह वगैरह कुछ-कुछ चलने लगा था उस समय तो फिर अपने संघ में यह महसूस हुआ कि मां की एक प्रमाणिक एक ऑथेंटिक बायोग्राफी लिखी जाए जिससे कि भविष्य में आने वाली जनरेशन को दो बेनिफिट हो सर्वप्रथम तो मां का जीवन किस तरह से शास्त्र की जो शास्त्र में जिस तरह से लिखा गया है शक्ति के बारे में तो शास्त्र सम्मत मां का जीवन किस तरह से पढ़ना चाहिए उसको वोह तो एक हमको यह किताब पढ़ कर के पता चलता है दूसरा है कि हम लोग क्या डिस्कस करते हैं ऐसा नहीं है कि मां ने किसी भक्त को दर्शन नहीं दिया या तो फिर माने किसी भक्त को आशीर्वाद नहीं दिया यह दर्शन आशीर्वाद अपने सांसारिक जीवन में मां की आशीर्वाद से कुछ प्राप्त होने यह सब बहुत सारी घटनाएं है अच्छे अपनी गंभीरानंद जी के महाराज की जीवनी में भी लिखित है किंतु यह सब चीजों को एकदम मिनिमम रखना चाहिए और मां का जो प्रेम था वह प्रेम मातृ प्रेम व उसी को सबसे ज्यादा भक्तों के समक्ष उसको लाना चाहिए क्यों क्योंकि मान लीजिए कि आपको यदि जीवन में कुछ प्राप्त करना है आपके जीवन में कोई बहुत बड़ी समस्या है या कष्ट है तो उसका समाधान आप कैसे करेंगे क्या आप इसका समाधान मां के आशीर्वाद लेकर के करेंगे ना कि फिर इससे भी एक उच एक और एक हायर स्टेज है और वह है अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करना जब तक हम अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म नहीं करेंगे अपने खुद के जीवन का जो दिशा है अपने जीवन की दिशा ईश्वर की ओर जब तक नहीं ले जाएंगे तब तक होगा क्या कि हम लोग एक के बाद एक जितने ही आशीर्वाद मिलते रहे वहीं के वहीं आकर के हम लोग खड़े रह जाएंगे कल यह कष्ट था तो आज यह कष्ट है परसों दिन यह प्रॉब्लम है तो हमेशा के लिए मां का भी देखिए मां इस तरह से अपने पर लोगों का डिपेंडेंस बढ़े यह बहुत ज्यादा नहीं चाहती थी एक भक्त ने मां को कहा कि पत्र लिखा ना कि एसई पत्र में लिखा था मुझे मां का प्रेम मिला नहीं अर्थात कि आपका सत्संग मुझे ज्यादा नहीं मिला तो फिर मां थोड़ा नाराज होकर के कह दिया मां ने कि यह क्या कि मां का प्रेम नहीं मिला मां का प्रेम नहीं मिला ऐसा बार-बार क्यों कहते हो देखो आप 10000 दिन में जप कीजिए देखिए कि आपका मन किस तरह से शांत हो जाता है जीवन के संसार के जितने भी कष्ट है सामाजिक रीति नीति तो हम सबको फॉलो करनी पड़ती है जो गृहस्थ आश्रम में है उनको गृहस्थ आश्रम के नियमों का पालन करना है जो संन्यास आश्रम में है उनको सन्यास आश्रम के नियम का पालन करना है तो यह नियम का पालन करना 10 लोगों के साथ में रहना फिर यह पंच महाभूत का शरीर है कब इसका कौन सा मशीन बिगड़ेगा कुछ ठीक नहीं है कब उसको क्या मेंटेनेंस की जरूरत पड़ जाएगी कुछ ठीक नहीं है तो यह सब तो चलता ही रहेगा तो इन सब में मन को किस तरह से शांत रखें वह शांति मन की शांति सिर्फ एक ही बात से हमको मिलेगी कि जब हम अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म करें जीवन में एक आंतरिक का अंतर्मुखी का जप ध्यान ईश्वर के प्रति शरणागति अपने विषय वासनाओं के ऊपर में थोड़ा सा संयम थोड़ा सा नियमन और सत्संग और सत्कर्म यह सब करके हम अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म कर सकते हैं और यह ट्रांसफॉर्म करने के लिए हमको जो प्रेरणा चाहिए वह ठाकुर म स्वामी जी का जीवन पढ़ कर के हमको मिलती है यदि हम यह समझना शुरू कर दे कि मुझे ठाकुर महा स्वामी जी से कोई आशीर्वाद ऐसा मिल जाए कोई वरदान ऐसा मिल जाए कि मेरे बाकी सब संताप है जीवन के वह सब चले जाए तो यह ठाकुर के पास में वरदान मांगना और ठाकुर के पास में आशीर्वाद मांगना यह दोनों में फर्क है वरदान हम इस तरह से मांगेंगे कि मुझे ऐसा अभी मैं पढ़ाई कर रहा हूं मैं स्टूडेंट हूं तो ठाकुर से मां से मैं वरदान मांगूंगा कि अभी मेरी परीक्षा में मुझे अच्छे नंबर से पास करवा दो अब मैं मैंने यह बात पहले भी कही थी कि एक सेंटर में मैं था अपने एक आश्रम में वहां पर स्टूडेंट्स होम था तो सभी लड़के लोगों को सुबह शाम मंगल आरती में संध्या आरती में आना पड़ता था अभी क्या करें बहुत सारे लोगों की इच्छा नहीं होती अर्ली मॉर्निंग उठ कर के सुबह 5:00 बजे उठकर के मंदिर में आए वो धोती सफेद धोती सफेद कुर्ता पहन कर के स्नान वगैरह करके सुबह-सुबह तो बड़ा कष्ट होता है सभी के घर में इस तरह का हैबिट नहीं होता जल्दी से उठने का तो मैं हमेशा देखता था अभी नियम है आश्रम में यदि रहना है तो मंदिर में तो आना ही पड़ेगा नियम का पालन करना ही पड़ेगा किंतु बहुत सारे लड़कों को मैं देखता था इस सब नियम से खुश नहीं है फिर एक दिन मैंने एकाएक देखा सरस्वती पूजा का समय था सब लड़के सुबह मंगल आरती से पहले थोड़ा सा आकर के मां की जो मूर्ति जो रखी थी उसके सामने वह नोटबुक पेन वगैरह सब रख रहे हैं तो मैंने एक महाराज को कहा देखा जग मां सरस्वती का कैसा प्रभाव है सभी लोग इतना जल्दी बड़ा खुशी खुशी उठकर के मां को प्रणाम करने के लिए आ गए तो महाराज मुझे बोलते हैं अरे वो आशीर्वाद लेने के लिए नहीं वरदान लेने के लिए कि परीक्षा में अच्छे से पास हो जाए उनका कैरियर अच्छा बन जाए वह सब चीजों के लिए तो देखिए आशीर्वाद मांगना और वरदान मांगना ये दोनों दोनों में काफी फर्क है आशीर्वाद मांगेंगे हम ज्ञान भक्ति वैराग्य शरणागति एक संयम नियमन जीवन में एक डिसिप्लिन एक अंतर्मुखी लोगों के प्रति करुणा मैत्री जीवन में एक साहस शौर्य उत्साह यह सब हम आशीर्वाद के रूप में मांगेंगे किंतु वरदान मांगना अर्थात कि संसार में किसी चीज में में सफल हो जाऊ उसके लिए वरदान मांगना तो देखिए कि मां का जीवन पढ़ कर के हमको यह दोनों के बीच में जो फर्क है बड़ा ही स्पष्ट रूप से नजर आता है जितना ही मां के पहले भी मैंने कहा था कि ध्यान करना है जप करना है तो उसकी सबसे सहज सरल रीत क्या है तो सबसे सहज रीत है कि आप जैसे जैसे आप मां के नाम का या ठाकुर के नाम का जो भी मंत्र हमको मिला हो वह जप करते हैं साथ-साथ में ही ठाकुर मां स्वामी जी के जो छोटी-छोटी घटना वली है छोटे-छोटे प्रसंग है उसका स्मरण मनन करते रहे तो यह स्मरण करते करते देखेंगे कि अपना मन कैसा ऑटोमेटिक शांत हो जाता है कोई बहुत ज्यादा कष्ट नहीं करना पड़ता मेरा हमेशा से यह नियम है कि यदि मैं जब ध्यान करने को बैठूं उससे पह पले मां की या ठाकुर की या डायरेक्ट डिसाइल अपने जो पार्षद है सन्यासी संतान ठाकुर माहा स्वामी जी के उनकी कुछ ना कोई ना कोई किताबें पढ़ कर के स्मृति कथा में थोड़ा सा पढ़ूंगा बहुत पहले मैं ऐसा करता था जब मैं नया-नया आया था तो यह सब पढ़ते हैं तो हम लोग लोगों से बहुत सारे सलाह हमको मिलती है तो किसी ने मुझे ऐसा बताया था उस समय में बेलूरमठ में था बेलूरमठ में जवाइन करने के लिए गया था तो हमको सप्ताह के सात दिन प्रतिदिन गीता का एक श्लोक मुख स्त करना होता था और फिर हमारे जो आचार्य महाराज थे जो हमको गीता पढ़ाया करते थे उनका क्लास होता था एवरी फ्राइडे को फ्राइडे को ना कि ऐसा ही कुछ सप्ताह में एक दिन जिस दिन उनका क्लास होगा हम सबको वह पूछेंगे चलो सात दिन के सात श्लोक तुम लोग मुख स्त बोलो और महाराज के पास में वो मार्किंग रहता था कौन कहां तक पहुंचा है सभी तो एक साथ में जैसे कि 11थ चैप्टर का प्रथम श्लोक सभी तो एक साथ में नहीं वो करेंगे कोई आगे आया है कोई थोड़ा सा पीछे आया है किसी का मिस हो गया है कोई थोड़ा सा ज्यादा करके श्लोक मुख कर लेता है कैपेसिटी ज्यादा है तो सबका अपना अपना एक मार्किंग महाराज की नोटबुक में रहता था कि अच्छा अभी ये जो है यह ब्रह्मचारी इसने इसका इसने लास्ट वीक यहां तक मुख स्त किया है तो अभी आज से उसको यहां से स्टार्ट करना है फिर वो दूसरा ब्रह्मचारी है उसने पिछले सप्ताह यहां तक किया है तो उस को इस सप्ताह यहां से आगे सात श्लोक करने हैं तो इस तरह से हमारे महाराज हम सबसे सप्ताह के सात दिन के सात श्लोक मुख स्त किए हैं कि नहीं वो हमसे सुनते थे तो अभी देखिए कि उस समय हमारे मन में था महाराज ने भी कहा था कि जप करने से पहले या ध्यान करने के समय यदि आप कोई भी एक श्लोक है जो कि आप मुख स्थ कर रहे हैं उसको आप मन में उसका चिंतन कीजिए अभी ये तो भगवान की वाणी है तो यह भगवान की वाणी जितनी अपने मन के ह अपने हृदय में गहराई से प्रवेश करेगी उतना ही उसका जो गुढा जो है उसका जो तात्पर्य है वह प्रस्फुटित होगा और धीरे-धीरे करके इसकी यह जो सुवास है यह गीता के श्लोक रूपी एक कमल कमल के पुष्प की वह हमारे मन को शांत कर देगी मन को एकाग्र कर देगी अपने विल पावर को बढ़ा देगी क्योंकि अल्टीमेटली भगवान कृष्ण ने युद्ध के क्षेत्र पर तो यह श्लोक गीता अर्जुन को सुनाई है जबकि अर्जुन के मन में दुविधा थी दु शंका थी आशंका थी उसके मन में ये जो कशमकश चल रही थी उस समय कि मुझे क्या करना चाहिए मेरा क्या कर्तव्य है उस समय तो भगवान कृष्ण ने यह गीता अर्जुन को सुनाई थी तो गीता के प्रत्येक श्लोक में वोह पावर है अभी आप गीता का कोई भी श्लोक लेंगे और उसका जो सिर्फ शब्दार्थ उसका पढ़ेंगे तो हो सकता है कि बहुत ज्यादा डिटेल में आप ना समझ पाए किंतु इस श्लोक के ऊपर में चिंतन मनन स्मरण करके उसका जो गुढ़ा थ है धीरे-धीरे करके आपको समझना शुरू हो जाएगा तो उस समय मैं ऐसा कुछ किया करता था कि चलो आज गीता का यह श्लोक लिया और इसको अच्छे से उस अपने मन में चिंतन करते-करते में ध्यान करने के लिए बैठूं जिससे कि मन का यह जो जितना भी यह डिस्टरबेंस है जितना भी रजस है जित ना भी रेस्टस नेस है सब शांत हो जाए मेरा मन रेडी हो जाए जप करने के लिए फिर मैं मंत्र जप है या ध्यान है प्रारंभ करूंगा तो यह सब मैं उस समय किया करता था किंतु जैसे-जैसे मैंने अपने संघ की अपने किताबों की इस किताबों में लिखित यह जो स्मृति कथाएं पढ़ना शुरू की तब से मुझे पता चला कि ये स्मृति कथाओं में भी एक ऐसा पावर है और खास करके हम लोगों ने तो भगवान राम कृष्ण के मंत्र ग्रहण किए है तो अपने जीवन में भगवान राम कृष्ण को अवतार के रूप में इष्ट के रूप में हमने ग्रहण किया है तो फिर उनका नाम और उनका स्मरण उसमें जो पावर है वो इमीडिएट है उसका तत्कालिक उसका फल हमको मिलने वाला है तो मैंने जैसे-जैसे यह एक नया मेथड खोजा उससे मैं देखता हूं कि मेरा मन एकदम बहुत ही अच्छे से वो एक रेस्टस निस जो होती है देखिए जब ध्यान करने में हम कितना डीप गए वो सब चीजों का कोई तात्पर्य नहीं है जैसे ठाकुर ने कहा कि कली में अनगतला 1015 मिनट 202 मिनट आधा घंटा बैठेंगे उसी में हमारा शरीर और मन दोनों रेस्टस हो जाएगा अदर वाइज तो यदि आध्यात्मिक जीवन में सही सही आगे बढ़ना है तो पूरी रात जब ध्यान करना पड़ेगा यह होल लाइट मेडिटेशन यह कांसेप्ट जब तक हम उसमें प्रवेश नहीं करेंगे तब तक तो सब कुछ ऊपर ऊपर से है तो अभी ऊपर ऊपर से भले ही चाहे हम कर रहे हो किंतु जो प्रवेश करने के समय ये जो सब से बड़ी बाधा होती है कि मन को पहले इतना तो शांत करें कि मैं जप करने को बैठूं तो वह बाधा यदि यह स्मृति कथाओं को आप पढ़ेंगे छोटी-छोटी यह सब घटनाओं को पढ़ेंगे तो बाधा सर्वप्रथम आपकी समाप्त हो जाएगी उसके बाद में बैठ कर के एक बार मन एकाग्र हुआ फिर अपना विल पावर कितना है कि हम कितना खींच सकते हैं आधा घंटा पौना घंटा एक घंटा डेढ़ दो घंटा वो कितना खींच सकते हैं फिर वह अपने विल पावर के ऊपर में है किंतु जो इनिशियली बैठ ही नहीं सकते बैठने से ही मन में इतनी अशांति इतना पागलपन खड़ा आ जाता है कि हमको खड़े होकर के दौड़ के जाना पड़ेगा मैंने देखा है मैंने लोगों से सुना है कि जैसे ही हम जप करने के लिए बैठते हैं वैसे ही भीतर में से एक ऐसा एक झंझावात खड़ा होता है कि जद हम खड़े होकर के दौड़ना नहीं शुरू कर देंगे तो हम पागल हो जाएंगे तो लोगों का यह संसार है ये ये जगत में ऐसा तो होने ही वाला है माया के जगत में तो इनिशियल जो सबसे बड़ी बाधा जो है इनिशियल जो सबसे बड़ी विपद जो है हमारे आध्यात्मिक जीवन की उसको तो यह स्मृति कथाएं बड़े आराम से दूर कर देगी उसके बाद में अपना विल पावर कितना है हम कितना खींच सकते हैं वो तो बाद की बात है तो यह जो मां की कहानियां है मां की जो जीवनी है इसका यह सबसे बड़ा तात्पर्य यही है सबसे बड़ी उपलब्धि यही है अपने मन को इतना शुरू के लेवल प इतना शांत और एकाग्र कर देना कि जैसे ही आप बैठते हैं ईश्वर का नाम स्मरण करने के लिए वैसे ही आपका मन तैयार हो जाता है उनका नाम स्मरण करने के लिए वरना तो फिर सबसे बड़ी जो विपत्ति बहुत बार आती है एक एक ऐसा होता है ना आध्यात्मिक जीवन में एक बड़ा ही वल्नरेबल पीरियड शुरू में जाता है बहुत बार हमको कहा जाता है कि आपका अहंकार है आपका ईगो है उसको समाप्त कर दीजिए क्योंकि बिना ईगो जद आपका जितना बड़ा होगा उतना ही आप शरणागति से दूर जाते जाएंगे यदि आप द्वैत वेदांत में विश्वास करते हैं तो वह हो गया शरणागति और यदि अद्वैत वेदांत में विश्वास करते हैं तो उसका सबसे फंडामेंटल कांसेप्ट है त्याग तो यह त्याग अद्वैत वेदांत का सबसे फंडामेंटल कांसेप्ट और शरणागति ध्व वेदांत का सबसे फंडामेंटल कांसेप्ट तो यह त्याग और शरणागत जो भी आपको चाहिए उसके लिए अपने ईगो को सर्वप्रथम आपको भगवान अपने जो इष्ट देवता है या तो अपने गुरु है उनके सामने बलि स्वरूप दे देना होगा जब तक अपने भीतर में घमंड है जब तक यह भोग वासना है इंद्रिय सुख से हम चारों ओर से घिरे हुए हैं तब तक हम अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएंगे तो ठीक है चलिए ऐसा हमने पढ़ लिया ऐसा हमने अपने गुरुजनों से सुन भी लिया अभी मैं यदि आध्यात्मिक साधना का प्रारंभ करता हूं तो मैं सबसे पहले अपने ईगो को कंट्रोल करने का शुरू करूंगा अभी ऐसा हो गया कुछ दिनों के बाद में किसी के साथ झगड़ा हो गया या किसी ने मुझे कुछ कटु वचन कह दिए तो फिर अभी मैं यदि अपने पूर्व जीवन में होता तो मैं इमीडिएट उसके साथ में झगड़ा कर लेता कोई मुझे कुछ बोल दे और मैं चुपचाप सुन लू ऐसा कैसे हो सकता है नहीं होगा किंतु अभी तो मैं आध्यात्मिक साधना का पथिक आध्यात्मिक पथ का पथिक हूं अभी तो मैं आध्यात्मिक साधना कर रहा हूं इसका अर्थ है कि मुझे प्रतिकार नहीं करना है अच्छा ठीक है किसी ने मुझे कटु वचन कहे मैंने प्रतिकार नहीं किया किंतु यह जब मैं प्रतिकार मुंह से नहीं करता हूं किंतु उसका जो प्रतिक्रिया जो मन में प्रारंभ होगा ये वो बड़ी ही भयानक होगी देखिए मैंने किसी ने मुझे कुछ कहा कटु वचन मैंने इमीडिएट उसका प्रतिकार कर दिया तो वह क्या है कि अकाउंट वहीं पर बैलेंस हो गया बात खत्म हो गई मेरा माइंड थोड़ा सा उद्वेग रहेगा किंतु उसको तो उसके साथ में तो मैं डीएल कर सकता हूं बाद में किंतु जब मैं प्रतिकार नहीं करूंगा चुपचाप सुन लूंगा उसके बाद में मेरे मन में जो प्रतिक्रिया प्रारंभ होगी वह बड़ी ही डेंजरस होगी क्यों क्योंकि अपने भीतर में से हमको एक वल्नरेबल फील होगी हमको एक कमजोरी का एहसास होगा हमको एक इनफीरियर और ये सर्वाइवल इंस्टिंक्ट जो है मनुष्य के डीएनए के भीतर में लिखी हुई है यह जो 100 करोड़ साल से जो हमारा इवोल्यूशन जो चलता आ रहा है यह इवोल्यूशन एक कोषी जीव बहु कोषी जीव उसके बाद में यह पानी में तैरने वाले जीव उसके बाद में यह जमीन पर चलने वाले उसके बाद में यह बंदर और यदि उसमें से मनुष्य यदि हम ये मॉडर्न इवोल्यूशन को स्वीकार करते हैं तो उनके अनुसार इस तरह से इवोल्यूशन हुआ है तो यह जो पूरा 100 करोड़ साल का इवोल्यूशन है उसमें एक चीज जो हमको बार-बार हमारे भीतर में जो डाली गई है सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट यदि आप में अपनी रक्षा करने की क्षमता नहीं है तो यह जो आपकी स्पीशीज जो है उसका संपूर्ण रूप से सफाया हो जाएगा उसका एक्सटिंक्शन हो जाएगा और यह एक्सटिंक्शन कितनी सारी स्पीशीज का हुआ है यह 100 करोड़ साल के इवोल्यूशन में ये जैसे कि डायनोसोर उनका भी एक्सटिंक्शन हो गया एक्सटिंक्शन अर्थात कि विशाल पैमाने पर संहार य पूरी पूरी स्पीशीज अभी जैसे कि मनुष्य एक प्रजाति है स्पीशीज है तो मनुष्य स्पीशीज का संहार हो जाना अर्थात कि पृथ्वी पर जितने मनुष्य हैं सबका मृत्यु हो जाना तो यह डायनोसोर का भी इस तरह से संहार हुआ उनका एक्सटिंक्शन हुआ कितनी ही स्पेसस एक के बाद में एक लाखों लाखों स्पीशीज है प्रजातियां है जिन्होंने जन्म गहण किया इवोल्यूशन हुआ यह जो नेचर के साथ में उन्होंने सर्वाइवल के लिए फाइट किया उसमें हार गए और उनका एक्सटिंक्शन हो गया मनुष्य अभी तक टिका क्यों है क्योंकि हमारे पास में युद्ध करने की प्रतिकार करने की सामना करने की जबरदस्त शक्ति है आज इस पृथ्वी पर एक एक भी ऐसा पशु नहीं है जो कि मनुष्य के साथ में युद्ध करने से जीत जाए क्यों क्योंकि अपने पास में एक समय था कि फिजिकल स्ट्रेंथ बहुत चाहिए थी डायनासोर को देखिए आज ये जद वो मूवीज वगैरह में देखेंगे वोह आपको टीरेक्स बोल कर के एक डायनोसोर दिखाएंगे टायरेनस अस रेक्स तो ये टीरेक्स जो है वो इतना बड़ा था 10 मंजिला बिल्डिंग की उसकी साइज थी और उसके दांत ही थे जैसे कि एक-एक मंजिल के उसके साइज के तो दांत थे मने ऐसे भयानक भयानक राक्षस पृथ्वी पर जन्म ले चुके हैं किंतु मनुष्य इन सबसे ज्यादा सर्वश्रेष्ठ क्यों है क्योंकि हमने एक इवोल्यूशन ने एक स्टेज ऊपर आक के समझ लिया कि फिजिकल स्ट्रेंथ बढ़ाने से अभी सर्वाइवल मुश्किल है अभी आपको इंटेलेक्चुअल स्ट्रेंथ बढ़ाना है तो अपने ब्रेन की साइज उनकी बॉडी की साइज बढ़ रही थी अपनी प्रजाति में अपनी स्पेसस में ब्रेन की साइज बढ़ना शुरू हो गया जितना पावरफुल ब्रेन है उतना ही हमारे पास में य क्रिएटिव इंटेलेक्ट है इस क्रिएटिव इंटेलेक्ट से हमने फायर को ने अग्नि को अपने वश में लिया पहले तो ऐसा होता था जंगल में जो पशु रहते हैं ल में आग लगी तो सब आंख बंद करके दौड़ना शुरू करेंगे क्योंकि वह चाहे डायनासोर हो ना कि चाहे ये टीरेक्स हो कोई भी हो जंगल में लगी हुई आग के सामने कोई भी टिक नहीं सकता आज मनुष्य है जिसने कि आग अग्नि के ऊपर में विजय प्राप्त की है हम दूसरों का हम दूसरों का दूसरों की कत्ल करने के लिए अग्नि का उपयोग कर सकते हैं और अग्नि जब अपने ऊपर में आ जाए जंगल में चलते चलते तो उसका भी प्रतिकार हम कर सकते हैं इतना इंटेलेक्ट अपने पास में है तो देखिए कि यह जो पूरी सर्वाइवल की एक यात्रा है अपनी इवोल्यूशन की उसमें सबसे ज्यादा हमारे ब्रेन के भीतर में डाला गया है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट और यह आध्यात्मिक जीवन है वो ये पूरे इवोल्यूशन रूपी जो प्रवाह है उसके अगेंस्ट में आपको जाना है यह प्रजनन क्षमता और यह सर्वाइवल की कैपेसिटी यह दो चीजें हैं जिसने कि मनुष्य प्रजाति के बाकी सब प्रजातियों के ऊपर में विजय प्राप्त करवाई है अभी आध्यात्मिक जीवन में जैसे ही प्रवेश करेंगे तो वैसे ही आपके गुरुजन आपको कहेंगे कि यह जो दो क्षमताएं हैं मनुष्य के प्रस पास में एक प्रजनन की क्षमता और दूसरा है कि यह सर्वाइवल अर्थात कि प्रतिकार करने की क्षमता इन दोनों क्षमताओं के सामने आपको युद्ध करना है तो प्रश्न होगा कि अरे क्या हम लिए जो इवोल्यूशन का जो नियम है प्रकृति का ये जो उत्क्रांति का उसके विरुद्ध में हम क्या नहीं जा रहे हैं हम क्या इतने व बल हो जाएंगे कि फिर जो लोग आध्यात्मिक है वे लोग ऑटोमेटिक जब भी कोई भी क्राइसिस आएगा यही लोग सबसे पहले व क्या कहेंगे कि वो कैनन फोडर के रूप में सबसे पहले इनको गिना जाएगा सबसे पहले यही लोग मारे जाएंगे अभी ऐसा होगा ना कि एक सोसाइटी है वहां पर अभी रायोट में जब स्टूडेंट था स्कूल में पड़ता था तो हमारे शहर में बीच-बीच में राट होते थे ये दंगल होता था किसी ने इसके ऊपर में हमला किया किसी ने इसके ऊपर में हमला किया एक बार ऐसी ऐसा हो गया था कि पुलिस वालों ने आकर के हमको कह दिया कि वो लोग आ रहे हैं आपके ऊपर में हमला करने के लिए और यहां पे पुलिस वाले हैं नहीं सफिशिएंट कि हम आपकी रक्षा कर पाए आपको अपना डिफेंस अपने से करना होगा तो हम लोगों ने क्या किया था सोसाइटी में जितने भी लड़के थे हम लोग यंग लड़के हमने सब इकट्ठा होकर के कहीं से पाइप कहीं से बेट यह सब निकाला और हम लोग हम खुद लोग वहां पे ये राउंड दे रहे हैं यदि कोई आए तो हम सब मिलकर के उनका सामना करेंगे और जितने भी फैमिली थे महिलाएं थी बच्चे थे बूढ़े थे उन सबको एक ग्राउंड है सेंटर में सोसाइटी में वहां पे लेके आ गए कि सबको एक साथ में यहां पे रखते हैं जैसे कि उनको डिफेंड करना आसान हो जाए ये मैंने देखा है मैंने अनुभव किया है ऐसा हुआ था तो देखिए कि कोई आध्यात्मिक व्यक्ति होगा उसके सामने यदि ऐसा रायोट हो जाए अपने परिवार की रक्षा करने की बारी आ जाए तो वोह तो बेचारा कुछ नहीं कर पाएगा तो क्या एंटाई इवोल्यूशन नहीं है एंटाई इंस्टिंक्टिव नहीं है कि जो सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट की जो यह यात्रा है यह जो प्रवाह है उसका विरोध हम क्या नहीं कर रहे आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करके तो एक्चुअली नहीं देखिए जो सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का नियम जिस तरह से डायनोसोर को अप्लाई होता था मनुष्य को आज के सामान्य मनुष्य को जिस तरह से अप्लाई होता है उतना ही वह आध्यात्मिक जगत के पथिक को भी अप्लाई होता है किंतु देखिए कि इवोल्यूशन ने यह चीज बहुत अच्छे से समझ ली है कि आप स्ट्रेंथ किसको कहते हैं जब डायनोसोर थे तब स्ट्रेंथ कहा जाता था फिजिकल स्ट्रेंथ ये टीरेक्स इतना भयानक प्रिडेटर है कि उसके सामने जगत का और कोई भी प्राणी है कोई भी व्यक्ति है व खैर उस समय तो मनुष्य नहीं थे किंतु उस समय जितने भी प्राणी थे व कोई भी टीरेक्स के सामने टिक नहीं सकता था उतना प्रचंड फिजिकल स्ट्रेंथ टीरेक्स के पास में था किंतु उसके बाद में धीरे-धीरे करके इवोल्यूशन ने अपनी डायरेक्शन चेंज की और यह जो बौद्धिक विकास है बाकी सब तरह का विकास उस तरह के जैसे कि कोऑपरेशन ये जो जो पशु एक ग्रुप में ये करते हैं शिकार करते हैं उनके पास में बड़ी प्रचंड शक्ति होती है वो मूवीज में भी आप देखेंगे टीरेक्स के ऊपर में पूरा ग्रुप जो है वो अटैक करता है और इससे वो टीरेक्स को हरा देता है छोटे-छोटे डायनासोर होते हैं किंतु वो ग्रुप में हंट करते हैं शिकार करते हैं तो पहले तो यह ग्रुप बनाना ये एक इवोल्यूशन कहता है कि फिजिकल स्ट्रेंथ बढ़ाने से ग्रुप बनाना एक हंटिंग पैक बनाना वो इजी है उससे ज्यादा स्ट्रेंथ मिलता है दूसरा कि ये ग्रुप बनाने के बाद में एक ऊपर में और एक क्षमता आती है जैसे कि मनुष्य के पास में आई होमोसेपियंस प्रजाति जो हमारी है यह जो स्पीशीज हमारे पास में यह ब्रेन पावर है तो देखिए कि स्ट्रेंथ की डे डेफिनेशन भी इवोल्यूशन चेंज करता जाता है पहले फिजिकल स्ट्रेंथ थी बाद में ग्रुप स्ट्रेंथ है ग्रुप में हंटिंग करना शिकार करना इसके बाद में फिर अपने पास में है क्रिएटिव इंटेलेक्चुअल पावर आज अप मनुष्य ने एटम बम बना दिया है एक ही व्यक्ति के पास में यदि एटम बम होगा और उसके ऊपर में 1 लाख लोगों का सैन्य आक्रमण करेगा तो एक एटम बम फेंक करके वो 1 लाख लोगों को मार सकता है उनका कत्ल कर सकता है इतना पावर इंटेलेक्ट का है तो अभी इवोल्यूशन ने और एक स्टेप ऊपर में जाकर के कहा कि जो स्पिरिचुअल पावर है ये आध्यात्मिक शक्ति है उसमें इससे भी ज्यादा क्षमता है इंटेलेक्ट से भी ज्यादा देखिए कि स्वामी जी हमको कहते हैं कि तीन लेवल है अपने कॉन्शियस निस के एक तो है सबकॉन्शियस फिर है कॉन्शियस और है सुपरकॉन्शियस तो सुपरकॉन्शियस क्या है देखिए आप जब ध्यान साधन भजन करते करते जब आप सुपर लेवल में आप स्थित हो जाएंगे तो जैसे राजयुग में स्वामी जी कहते हैं जितने भी हायर थॉट्स है फिलोसॉफिकल हायर थॉट्स आर्ट लिटरेचर लैंग्वेज कल्चर साइंस टेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग फिजिक्स केमिस्ट्री बायोलॉजी एस्ट्रोनॉमी जितने भी हायर थॉट्स है इस जगत में वह सब मंडरा करके आपके कॉन्शियस लेवल में आ जाएंगे क्यों क्योंकि सुपरकॉन्शियस इज अ डिपॉजिटरी वो रिजर्व बैंक की तरह है बाकी जितनी भी बैंक है वहां पर करेंसी कहां से आती है तो रिजर्व बैंक के पास में आती है कोई भी देश हो उसमें रिजर्व बैंक का एक इक्विवेलेंट रहता है जिनके पास में नोट छापने का अधिकार होता है कोई भी गवर्नमेंट हो एक ही बैंक को नोट छापने का अधिकार देगी और कोई बैंक अपनी पर्सनल नोट नहीं छाप सकता फिर रिजर्व भारत में जैसे रिजर्व बैंक है रिजर्व बैंक की करेंसी नोट प्रिंट करेगी और बाकी सब बैंक में यह डि डि ब्यूट करेगी तो यह रिजर्व बैंक और बाकी बैंक में यह फर्क है बाकी सब जितनी बैंक है वह क्या करेगी उनके पास में जो डिपॉजिट है उसी को व ट्रांजैक्शन के लिए इस्तेमाल कर सकती है किंतु रिजर्व बैंक उसकी डिपॉजिट यदि खत्म हो जाए तो नई नोट छाप करके नई नोट प्रिंट करके वो उसको यूज कर सकती है तो यह कॉन्शियस और सुपरकॉन्शियस में यह डिफरेंस है कॉन्शियस लेवल पर हमने जो स्टडी किया हमने जो मंथन किया चिंतन किया उसी का परिणाम हम देख देखने को पाते हैं उसी का उसी को हम ट्रांजैक्शन में ले सकते हैं किंतु सुपरकॉन्शियस इज लाइक ए रिजर्व बैंक आप अपनी नई करेंसी प्रिंट कर सकते हैं जिसके बारे में हमने कभी ना सोचा ना भूतो ना भविष्यति ना कभी सोचा ना कभी पढ़ा ना कभी चिंतन किया ऐसे कंपलीटली नए क्रिएटिव विचार हमारे माइंड में यह सुपरकॉन्शसनेस के द्वारा आते हैं तो मान लीजिए कि एक आदमी है जिसने कॉन्शियस निस लेवल पर रह कर के वह सब रट लिया है फ फिजिक्स उसने रट लिया है वेपन सिस्टम कैसे बनानी उसने पढ़-पढ़ करके मुख स्त कर लिया है यह एक आदमी है और दूसरा है जो कि सुपरकॉन्शियस में जाकर के बिल्कुल नई तरह की वेपन सिस्टम बिल्कुल नया तरह का थिंकिंग बिल्कुल न्यू स्टाइल ऑफ वरफेन वो सोच सकता है तो हु विल बी ग्रेटर किसका पावर ज्यादा होगा जो सिर्फ कॉन्शियस लेवल पे रहकर फाइट कर सकता है वो ना कि जो सुपरकॉन्शियस पे रह कर के जाकर के फाइट करने के नए-नए आइडियाज खोज के ला सकता है वो तो आंसर इज ऑब् वियस कि सुपरकॉन्शियस लेवल पर जाकर के हम इतना पावर प्राप्त करते हैं कि जैसे कि प्रकृति पर हमने विजय प्राप्त कर ली आज लोग क्या सोचना शुरू कर दिए हैं कि यदि पृथ्वी पर न्यूक्लियर वॉर होगा पृथ्वी पर ये रेडियो एक्टिविटी फेल जाएगी टॉक्सिन जाएगी तो चलो दूसरे ग्रह पर जाकर के वसाहत बनाए स्पेस में कॉलोनी एस्टेब्लिश करें मार्स के ऊपर में जाए ना कि पूरा विश्व ब्रह्मांड हमारे लिए ख ला है एक्सपेंशन करने के लिए एक समय था कि यूरोप में ऐसा था कि वहां पर जमीन की कमी थी नौकरी बिजनेस का कोई स्कोप नहीं था एंप्लॉयमेंट का स्कोप नहीं था तो बहुत सारे जो वहां के यंग मेंस थे वो लोगों ने क्या किया जहाज में बैठ कर के नई दुनिया खोजने के लिए निकले उसमें उन्होंने भारत को खोजा भारत को गुलाम बनाया अफ्रीका में गए अमेरिका नॉर्थ अमेरिका साउथ अमेरिका ऑस्ट्रेलिया ऐसे तीन बड़े-बड़े कॉन्टिनेंट खोज निकाल और उनको कॉलोनाइज किया तो अभी अपने पास में पृथ्वी पर तो एक्सपेंशन के लिए जगह नहीं है किंतु यह पूरा कॉस्मस ने पूरा यूनिवर्स तो खुला हुआ है यहां पे इतनी जगह है जगह ही जगह है पूरा मार्स अपने सामने खुला है और यदि मैं तो कहता हूं कि किसी भी नए ग्रह पर जाकर के कॉलोनी बनाने की क्या जरूरत है स्पेस स्टेशन ही बड़े-बड़े बना दे जिससे कि हम पूरा कस्टमाइज एक प्लेनेट अपने जिस अपने को जिस तरह का चाहिए उस तरह का प्लेनेट हम डिजाइन करके हम उसको कंस्ट्रक्ट करके उसी पर रहना शुरू करेंगे दूसरे प्लेनेट को खोजने की जरूरत ही क्या है इस तरह की इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजिकल कैपेसिटी ऑलरेडी अपने पास में आ गई है बस वही है कि आपको मैन पावर कलेक्ट करना है कैपिटल खोजना है इन्वेस्टमेंट करने के लिए बाकी और कोई बहुत दिक्कत नहीं है यह सब चीजों में तो देखिए कि इवोल्यूशन ने भी किस तरह से अपनी डायरेक्शन चेंज की है फिजिकल स्ट्रेंथ उसके बाद में ग्रुप हंटिंग उसके बाद में ये इंटेलेक्चुअल स्ट्रेंथ और अभी आ जाता है यह स्पिरिचुअल स्ट्रेंथ किंतु जैसे कि स्पिरिचुअलिटी में प्रवेश करने के समय सबसे बड़ा एक जो खतरा यह है कि हमको कहा जाता है अपने घमंड को यह जो प्रतिकार करने की जो क्षमता है जो कि इवोल्यूशन ने हमको आज तक सिखाया है उसको छोड़ देना है यदि आध्यात्मिक स्ट्रेंथ आध्यात्मिक स्पिरिचुअल पावर आपको अर्जन करना है प्राप्त करना है तो यह जो इंटेलेक्ट के द्वारा जो कुछ भी इंस्टिंक्ट इंस्टिंक्टिव जो कुछ भी सीखा है इंस्टिंक्ट के द्वारा जो कुछ भी सीखा है उसको हमको छोड़ देना है जब तक उसको नहीं छोड़ेंगे तब तक अध्यात्मिकता में आगे नहीं बढ़ेंगे तो यह अपने घमंड को छोड़ना या तो फिर प्रतिकार करने की यह जो अपनी इंस्टिंक्ट है डीप सीटेड इंस्टिंक्ट उसका त्याग करना और फिर यह जो सबसे ज्यादा वल्नरेबल पीरियड है क्योंकि ऐसा तो नहीं है कि आज मैंने प्रतिकार करना बंद कर दिया चलिए आज कोई भी मुझे कोई भी कटो वचन कह देगा या मेरे पर किसी भी तरह का आक्रमण करेगा मैं प्रतिकार जहां तक हो सके नहीं करूंगा क्यों क्योंकि प्रतिकार करने से घमंड बढ़ जाएगा हो सकता है कि मेरा ईगो बढ़ जाए इससे तो उसको उससे मुझे बचना है ऐसा करके मैं प्रतिकार नहीं करूंगा किंतु उसका अर्थ यह तो नहीं है कि पहले ही दिन में जिस दिन से मैंने प्रतिकार करना बंद किया उसी दिन में जब ध्यान साधन भजन समाधि के सर्वोच्च शिखर पर आरूढ़ हो गया ऐसा तो नहीं है आध्यात्मिक जीवन आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने के लिए एक जीवन तो क्या जन्म जन्मांतर की यात्रा हमको करनी पड़ती है तो यह जो पीरियड है हमने जिस दिन आध्यात्मिक साधना प्रारंभ की तब से लेकर के आध्यात्मिक साधना में सफलता प्राप्त की यह जो पीरियड है यह बड़ा ही वल्नरेबल पीरियड है हमारे लिए और इस वल्नरेबल में हमको टकना है क्योंकि सब समय यह जो प्रलोभन हमको देते हैं ना भगवान बुद्ध की जो कहानी है कि निर्वाण के पहले वह मारा बोलकर के जो राक्षस है उसने आकर के भगवान बुद्ध को एक के बाद एक प्रलोभन देना शुरू किया कोई कभी कोई अप्सराओं को लेकर आता है तो खाने पीने की चीजों लेकर के आता है ना सोना मोहर लेकर के आता है अभी भगवान बुद्ध प्रलोभन से विचलित नहीं हुए तो उनको डर दिखाना शुरू किया विभिन्न तरह के भयावह भूत पिशाच राक्षस यह सब आकर के उनके सामने भयावह नृत्य करने लगे जैसे कि अभी उनको पकड़ के खा जाएंगे तो इससे भी भगवान बुद्ध विचलित नहीं हुए और रात के आखिरी प्रहर में उन्होंने निर्वाण में प्रवेश किया तो यह जो टेंप्टेशन अपने सामने सब समय आता है अपनी आध्यात्मिक साधना से हमको विचलित कर देने के लिए भगवान रामकृष्ण देव की कहानी तो बड़ी प्रसिद्ध है कि पंचवटी के नीचे में बैठे थे एक गोरा खलासी आकर के ब्रिटिश सेलर आकर के उनको सब प्रलोभन दिखा रहा है दो स्त्रियां है फिर एक बड़ा थाल है थाल के भीतर में संदेह संदेश है सोना महर है शाल है यह सब कितनी अच्छे-अच्छे वस्त्र है सब दिखा रहा है तो ठाकुर को ठाकुर एकदम मां को पुकारना शुरू कर दिया ठाकुर ने तो देखिए कि ना ठाकुर विचलित हुए इस प्रलोभन से और भय से ना ही भगवान बुद्ध इससे विचलित हुए तो यह सब तो किंतु फिर भी क्या है ना कि प्रलोभन या भय यह दोनों चीजें तो आप मान लीजिए कि उससे आप शायद लड़ भी ले जुज भी ले किंतु यह प्रतिकार नहीं करना यह कितना डेंजरस है ये सब समय हमारा टेस्टिंग होता रहेगा एक जो हालदार बोलकर के एक आदमी था वहां पे कालीवाड़ा कि ठाकुर ये जो सब नाटक कर रहे हैं दर्शन उनको हो रहा है जैसे कि बीच-बीच में समाधि में जा रहे हैं यह नाटक के अलावा कुछ नहीं है और यह जो बाबू लोग है अर्थात किय मथुर बाबू रानी रास मणि वगैरह उनका यह जो उनका उने उनसे पैसा पढ़ाना चाहते हैं इसलिए ये सब ढोंग कर रहा है तो ऐसा ये आदमी सोचता था और उसके मन में ठाकुर के प्रति ईर्ष्या भी बहुत थी तो एक दिन ठाकुर इस तरह से भाव में पड़े हुए थे पंचवटी के नीचे कहीं पे तो उसने आकर के ठाकुर को अपने जूतों से जूते पहने हुए पैरों से जोर-जोर से मारा और फिर वह वहां से चला गया अभी ठाकुर उस समय तो भाव में थे बाद में जब भाव में से जब उनको होश आया तब देखा कि पूरा उनका शरीर क्षत विक्षत हो गया है तो ठाकुर के जो हितेश थे उन्होंने सबने कहा चलो हम जाकर के मथुर बाबू को कंप करते हैं मथुर बाबू अभी तलवार लेकर के आएंगे और उसका सर काट देंगे उस समय ठाकुर ने कहा नहीं नहीं उसकी जो मन की जो बात थी व उसके अनुसार उसने यह सब किया उसका अर्थ नहीं है कि हम इसका बदला ले तो देखिए यह प्रतिकार नहीं करना यह कितना मतलब आपको विल पावर ले लेता है आपके पास से और यह प्रलोभन भी सब समय आएगा कि आपके सामने एक ऐसी परिस्थिति खड़ी कर देगा यह इवोल्यूशन या तो यह प्रकृति या तो फिर यह माया या तो फिर यह मारा जिसको जो भी आप कहे आपके सामने ऐसी परिस्थिति खड़ा करेगा कि आपको प्रतिकार करने को भीतर से इतना ये होगा कि नहीं इसका तो मुझे प्रतिकार करना ही पड़ेगा और वो प्रतिकार नहीं करना वो आपका विल पावर का सही सही वो आपका वो टेस्ट करेगा तो देखिए कि प्रलोभन आता है तब मन को रोकना है या तो फिर भय आता है तो भय से मन को भयभीत नहीं होने देना है या तो फिर ऐसा कोई परिस्थिति खड़ा हो जाए कि हमको प्रतिकार करने की आवश्यकता बहुत ही महसूस होने लगे उस समय प्रतिकार नहीं करना है यह सब करने के लिए आपको जो विल पावर चाहिए वो विल पावर तो हमको डेवलप करना पड़ेगा तभी तो हम आध्यात्मिक जीवन में सही सही सक्सेसफुल हो पाएंगे किंतु यदि ये विल पावर डेवलप करने के लिए मन की जो रेस्टस बस है उसको शांत करने के लिए साधना करनी है तो दो चीज चाहिए ही चाहिए सबसे पहले तो साधना में प्रवेश करने के लिए मन शांत होना चाहिए मन की जो रेस्टस निस है मन का यह जो रजस है उससे आपको थोड़ा बहुत तो मुक्ति पाना होगा उससे आप साधना में प्रवेश कर पाएंगे किंतु प्रवेश करने के बाद में आपको चाहिए विल पावर कि जिससे कि आप साधना में टिके रहे तो दो चीजें एक तो मन का पहले थोड़ा बहुत शांत होना आवश्यक है दूसरा कि आपको विल पावर चाहिए ही चाहिए आगे बढ़ने के लिए प्रवेश करने के लिए और आगे बढ़ने के लिए दो आवश्यकताएं और दो नेसेसिटीज है आप के पास तो यह जब हम मां के जीवन का तात्पर्य क्या है यह दोनों चीजें हमको प्रदान करता है जो कि सर्वस्व सर्वोच्च वरदान है यदि हम लोग कहे कि वरदान नहीं मांगना है आशीर्वाद मांगना है आप बोलेंगे मैं ऐसा मूर्ख क्यों हूं भाई कि जो सब कल्पतरु ठाकुर तो है कल्पतरु जिसको जो मागा वो दे दिया तो कल्पतरु ठाकुर स्वयं मेरे सामने विराजमान है और मैं अपने बेनिफिट के लिए कुछ ना मांगू ऐसा ऐसा मूर्ख मैं क्यों हूं अरे भैया सबसे ज्यादा बेनिफिट आपको किस चीज से हो रहा है आपका वो अच्छे से नौकरी मिल जाएगी आपका बैंक बैलेंस बढ़ जाएगा आपका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा हो जाएगा आप पढ़ाई लिखाई करते हैं अच्छे नंबर से पास हो जाएंगे अच्छे मार्क से यह आपके लिए सबसे बड़ा प्राप्त व्य विषय है ना कि जन्म जन्मांतर के बंधन को तोड़ देने वाला यह जो साधन समग्र है साधन प्रवाह है उसको प्रारंभ करने के लिए उसमें टिके रहने के लिए जो गुणावती चाहिए जो विल पावर चाहिए जो पीस ऑफ माइंड चाहिए वह आपके लिए ज्यादा इंपोर्टेंट है सोच कर के देखिए तो मां एक तरह से हमको वरदान देती ही है किंतु यह वरदान किस तरह का है हाईएस्ट लेवल का है स्पिरिचुअल वरदान है यह सब तो जब मां के जीवन का जो अभ्यास करते हैं मां के जीवन को जो हम समझने का प्रारंभ करते हैं तो हमको यह चीज ख्याल में रखनी है कि क्यों गंभीरानंद जी महाराज को जिस तरह से उन्होंने यह जीवन की रचना की है लिपि बद्ध किया है ये क्यों किया है इस तरह से क्यों किया है तो इसका यह उत्तर है अभी आपको ज्यादा कुछ नहीं लगेगा मां का जीवन पढ़ कर के कि अच्छा ठीक है जो जिस तरह से होना चाहिए वैसे ही हुआ है किंतु आप दूसरी सब किताबों के साथ में कंपेयर कीजिए दूसरे धर्म गुरुओं की किताब के साथ में मैं नाम नहीं लूंगा दो-तीन किताबें मैंने इस तरह से पढ़ी है किसी योगी के बारे में ना कि किसी कोई महात्मा के बारे में उसमें चमत्कार के अलावा और कुछ नहीं है तो एक के बाद एक चमत्कार होते ही रहते हैं और मैं जब पहले पहले जब पढ़ता था ना मुझे बड़ा अच्छा लगता था हां ऐसा मिरेकल होना चाहिए तभी तो लगेगा कि अपने पास में कुछ पावर है किंतु देखिए वो ठाकुर की वो कहानी है ना दो भाई थे एक भाई जंगल में जाकर के साधु हो गया दूसरा भाई संसार कर रहा है गृहस्थ आश्रम में है अभी दूसरा जो साधु था बहुत दिनों के बाद में अपने गृहस्थ भाई को मिलने के लिए आया तो वो गृहस्थ भाई ने पूछा कि भाई तुमने इतने साल जंगल में बैठकर तपस्या की तो तुमको क्या सिद्धि प्राप्त हुई तो यह साधु कहता है कि देखो यह जो नदी है ना उसके ऊपर में मैं चलकर जा सकता हूं तो वो गृहस्थ था उसने कहा कि अरे भाई मैं 10 पैसा की नौका करके नदी पार कर सकता हूं उसमें तुमने कौन सी बड़ी सिद्धि प्राप्त की तो ऐसा ना हो जाए कि हम लोग यह सब पढ़ाई लिखाई करके ऐसी कुछ चीज प्राप्त करें जिसका कि सही सही में कोई मूल्य ही नहीं है तो फिर तो बेटर है ना ठाकुर की वह कहानी है दो मित्र थे दो मित्र एक दिन शाम को बाजार में निकले एक ने देखा कि कहां पर नृत्य कीर्तन नृत्य गीत हो रहा है कोई कुछ स्त्रियां वहां पर नृत्य गीत कर रही है तो वहां पर मैं जाकर के आनंद थोड़ा करता हूं और दूसरा आदमी दूसरा जो मित्र था वो देखा कि पंडित जी बैठ कर के भागवत का पाठ कर रहे वो वहां पर चले गए अभी जो मित्र नृत्य गीत सुन रहा था वह सोच रहा है कि देखो मेरा जो मित्र है कितना सद्भवाना है वो पंडित के पास में बैठ कर के वो भागवत सुन रहा है मैं कहां पापी यह सब सुन रहा हूं किस तरह से मैं अपना टाइम वेस्ट कर रहा हूं वहां पर जो पंडित के सामने जो मित्र बैठा था वोह सोच रहा है कि मेरा मित्र कितना चालाक है कितना वो इं क्लेवर है और मैं किस तरह का मूर्ख हूं कि बिना मतलब का यह भगवत सुन रहा हूं अभी देखिए ठाकुर कहते हैं दोनों का जब मृत्यु हुआ भगवत सुनने वाले मित्र को यह लोग यमदूत नर्क में ले गए और वह जो नृत्य गीत सुन रहा था उस मित्र को यह लोग स्वर्ग में ले गए क्योंकि आप क्या कर रहे हैं उसका कोई मीनिंग नहीं है किस इंटेंशन से कर रहे हैं उस बात का मीनिंग है जदी मंदिर में जाते हैं जदी सत्संग करते हैं जदी जब ध्यान करने का प्रयास करते हैं किंतु इंटेंशन है कि जीवन में मुझे कुछ सफलता इससे मिल जाए तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला यह सब तपस्या वगैरह करने से इससे तो बेटर है कि अहंकार यह सब क्रोध यह सबको बढ़ा करके बाहर जाकर के फाइट करो और अपने बलबूते प थोड़ा पैसा कमाओ यह बेटर है इससे कि ठाकुर के पास में बैठ कर के ठाकुर के पास में पैसा मांगो ना कि सांसारिक जीवन में सफलता मांगो यह तो मैंने कर कुछ रहे हैं इंटेंशन और कुछ है तो ऑलवेज बेटर कि ठाकुर महा स्वामी जी की जीवनी और प्रसंग इस इंटेंशन से हम उसका श्रवण करें मनन करें जिससे कि अपने जीवन में हमेशा के लिए शांति और यह शरणागति का प्रादुर्भाव हो शरणागति प्रस्फुटित तो आज यही तक कल से फिर हम मां का जीवन इस सप्ताह पूरा पाठ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्ण पस्तु कल के तो जगत दात्री पूजा लो खाने तो बते परा जाना ज पूजा बोले काल के तो के एक जन पोस्ट करे ग्रुप त खोज करलाम तो ब गलो ना हा एकन महाराज के कोल कर एक्चुअली क्या हुआ लिड़ीं है तो मंदिर 2014 में उसकी स्थापना हुई थी जगत धात्री पूजा के दिन तो कल 10 साल खत्म हुए उसके तो किसी महाराज ने मुझे फोन करके बताया कि लीमड़ी मंदिर का 10 साल हुआ मैंने कहा क्या बात करते हो आज जगत धात्री पूछा है बोला हां आज जगत धात्री पूछा है ओ अच्छा हम लोग बेलूर मठ में शारदा पीठ में जगत धात्री पूजा के लिए जाते थे जगत धात्री पूजा तो बेलून मठ में होती नहीं है तो शारदा पीठ में होती है तो अभी क्या हम लोग तो ट्रेनिंग सेंटर में थे ट्रेनिंग सेंटर में तो खाना पना एकदम तपस्या से भरपूर वने सुबह को 6:30 को नाश्ता उसके बाद में 12:00 बजे खाना फिर खाने के बाद 12:00 बजे खाया तो सीधा रात को 9:00 बजे और बीच में वोह पानी डाला हुआ चाय देंगे थोड़ा सा तो जगत धात्री पूजा में क्या होता था शारदा पीठ में जगत धात्री पूजा होती थी तो इतना सारा वहां पे प्रलोभन क्या था कि पूजा के बाद में वो डाइनिंग हॉल में ले जाएंगे और इतनी अच्छी अच्छी चीजें खिलाएंगे व्याकुलता और रेस्टस यह दो अलग-अलग चीजें हैं रेस्टस कहां से प्रारंभ होती है कि हमको कोई वासना की पूर्ति नहीं होती तब रेस्टस निस आती है और व्याकुलता कब आती है कि अभ जैसे कि मैं जगत का ही एक उदाहरण दूं आपको अब जैसे कि आइंस्टाइन है आइंस्टाइन सोच रहा है कि क्या होगा यदि हम प्रकाश की किरण के साथ में उड़ना शुरू करें क्या हमको प्रकाश की किरण स्थिर होती हुई दिखाई देगी नहीं एक्चुअली नहीं आंसर इज वेरी काउंटर इंटूटिव कि प्रकाश की जो किरण की गति है 3 लाख किमी पर सेकंड वो वैसी की वैसी ही रहेगी तो दैट इज अ ब्रेक थ्रू जिसके बाद में उसने यह स्पेशल थिरी ऑफ रिलेटिविटी खोज निकाली तो क्या है जिसको हम कहेंगे क्यूरियोसिटी जिज्ञासा वृत्ति या तो मुमुक्षु तोव दैट इज वन थिंग और ये जो रेस्टस है कि मुझे शारी अपनी इंद्रियों से कुछ चीजों का भोग करना है और उस भोग करने में मुझे कोई बाधा आ रही है या तो फिर मैं अपनी कोई भी यह जो एंबिशन है उसको मैं फुलफिल नहीं कर पा रहा हूं वहां से यह रेस्टस आती है तो मुमुक्षु और यह रेस्टस इन दोनों में काफी अंतर है बाहर से शायद एक जैसा दिखाई देगा किंतु साइकोलॉजिकली कॉन्शसनेस लेवल पे उसमें बहुत बड़ा डिफरेंस है मेरा जो पर्सनल एक्सपीरियंस है कि वह दोनों एक के बाद एक आते रहेंगे कभी में हम बहुत व्याकुल है फिर बैठते हैं तो फड़ मन शांत हो जाता है किंतु यह मन का शांत होना परमानेंट नहीं है क्योंकि जैसे योग शास्त्र में कहा गया है दग्ध बीज यह जो वासनाओं का जो बीज है व दग्ध कब होगा वो वो आग उसमें कब लग जाएगी जब हमको निर्वाण प्राप्ति होगी तो जब तक निर्वाण प्राप्ति या मुक्ति नहीं मिलती है वो व्याकुलता बनी रहनी चाहिए अदर वाइज जैसे ठाकुर के है ना वो इसको कि तुम थोड़ा और आगे जाओ आगे में चंदन के पेड़ है और थोड़ा आगे जाओ वहां पर जाकर बैठने से तो होने वाला नहीं और थोड़ा आगे जाओ वो सोना मोहर मिलेंगे इसकी खान मिलेगी मने उसकी गोल्ड माइन मिलेगी सिल्वर माइन मिलेगी डायमंड माइन मिलेगी तो वो हमेशा आध्यात्मिक जीवन के एक के बाद एक स्टेजेस जो है वो पार करने के लिए एक स्टेज पे आ करर के रुक जाने से तो होगा नहीं व्याकुलता बने रहने से हमको एक के बाद एक स्टेज हम पार करते जाएंगे थोड़ा बहुत समय हमको चलो शांति मिला किंतु फिर से व्याकुलता आ गई नहीं दिस इज नॉट इनफ अभी मुझे डायमंड माइंड चाहिए तो फिर व्याकुलता हमको वहां तक ले गए अभी ये भी इनफ नहीं है मुझे प्लूटोनियम माइंड चाहिए लाइक दैट और यहां पे ठाकुर की दूसरी भी कहानी है य ठाकुर कहते हैं ना देखिए ये एक एक देर इज वन पॉइंट ऑफ व्यू देखने का दूसरा भी एक पॉइंट ऑफ व्यू है ठाकुर का ही उदाहरण देकर के कि जो नौका चलाने वाला है मांझी वो मलहार तो वो क्या करता है कि वह पहले तो तूफान आता है तो कैसे भी करके तूफान को मेहनत करके वह सर्ड जो है उसका वो खोल करके मेहनत करके नौका को तूफान में से निकाल देता है इसके बाद में बैठ कर के शांति से तमाकू फूंकतायन के जो जो ये पेड़ है वो मिलकर के आपको शांति हो जाती है तो वो हो गई किंतु आपकी प्यास और भी ज्यादा गहरी है नहीं मुझे वो सिल्वर माइन चाहिए तो और ज्यादा व्याकुलता लाओ फिर सिल्वर माइन मिलकर के जद आपकी हो जाती है शांति मन की तो ठीक है वरना ल गोल्ड माइन है डायमंड माइन है वो अंत तो है नहीं सही बात है कि आई एग्री विथ यू कि ठाकुर का ही उदाहरण देकर के और कुछ नहीं यदि ठाकुर के साधना का जो समय है साधन काल का उसी को पैरेलल देकर के यदि इसको समझा जाए और सि ठाकुर क्यों स्वामी जी भी तो है और ठाकुर ने क्या एक बड़ा ही स्टेटमेंट दे दिया था पता है ना शारदानंद जी इस बात को हाईलाइट करते हैं शारदानंद जी ने जब पहली बार ठाकुर को यह कहते हुए सुना तो उन्होंने कहा हमारे पर ऐसी असर हुई थी ठाकुर के यह स्टेटमेंट की ठाकुर ने क्या कहा उस समय स्वामी काशीपुर की बात है स्वामी जी की व्याकुलता जैसे कि आसमान को स्पर्श कर रही है और जितने भी ये गुरु भाई थे शारदा शरद महाराज है राजा महाराज है सब लोग बड़े ही मुग्ध हो गए थे मंत्र मुग्ध हो गए थे कि स्वामी जी बस निर्वाण प्राप्त करना ही है मुक्ति पानी ही है बोलकर के साधन भजन का जो प्रवाह ब रहा था काशीपुर में उस समय ठाकुर ने क्या कहा कि देखो पहले तो नरेण की प्रशंसा की फिर क्या कहा एखा ने अपनी ओर इशारा करके खाने साधन जा तोड़ ऐसे छलो नरेन भतर तार शिकर सियो नहीं अर्थात कि इसके भीतर में व्याकुलता और साधन प्रवाह का जो भयानक वो जो आंधी तूफान चला था उसके सामने नरेंद्र का एक मने मने एक पैसा भी नहीं है उसके सामने 1 पर भी नहीं है तो शरद महाराज कहते हैं इस स्टेटमेंट का हमारे पर जो असर हुआ आप वर्णना नहीं कर सकते ये ठाकुर कहते हैं ना मरा ठेले दे वो [हंसी] जो ओ और ठाकुर जब भी किसी वीआईपी को मिलने के लिए ले जाएंगे ठाकुर को ठाकुर बड़े डरते डरते जाएंगे वो विद्यासागर को मिलने के लिए जा रहे हैं तो मास्टर महाशय को बोलते एक कुर्ते का बटन खुला है बंद कर दूं क्या तो वरना वोह बड़ा आदमी है क्या सोचेगा मेरे बारे में मैं गवार हूं काली का पुजारी हूं तो मास्टर महाशय कहते हैं नहीं नहीं आपको ये सब कोई चीजों की चिंता करने की जरूरत नहीं जैसे कि बच्चे को समझा रहे ऐसा फिर वहां डरते डरते जाते हैं और फिर वहां पर जो मां का आविर्भाव होता है जैसे कि विद्वानों के विद्वान महादेव स्वयं बैठ कर के जैसे कि वह शास्त्र की रचना कर रहे हैं और सामने सब लोग चुपचाप उनकी बात सुन रहे हैं आप जितने भी वीआईपी के साथ में ठाकुर की मुलाकात का वर्णन है चाहे ये हो अपना केशव सेन ना कि विद्यासागर हो ना कि य बंकी ना कि जितने भी हो सब चुपचाप ठाकुर की बात सुन रहे हैं ऐसा प्रभावित कर देते थे ठाकुर उन लोगों को ठाकुर कहते हैं ना अमी जद दा मती तोरा रे घरि मुत मैं खड़े-खड़े पेशाब करूंगा तुम लोग घूम घूम करके करोगे कहने का तात्पर्य क्या है ठाकुर ने जो किया उसका सवा भाग हम करेंगे तो ठाकुर कहते हैं तुम लोग जो करोगे उससे हजार वा भाग मने हजार गुना करके मुझे करना पड़ेगा तब तो कहीं जाकर के उसका एक ह जवा भाग हम करेंगे