प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित हमारे साहित्य का वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल पैसेज जो कि किसी भी किताब में लिखा गया है तो उसमें से यह एक पैसेज गंभीरानंद जी ने मां की महिमा का वर्णन करते हुए किया और यह पैसेज अभी समाप्त होता है। हमारे आखिरी क्लास में यह पैसेज पूरा समाप्त हो गया। किस तरह से उसका यदि एक आउटलाइन देख लें तो किस तरह से साधक चाहता है कि वह जननी
क्या जीवन का संघर्ष हमें "दीन-हीन-अधम" बना देगा, या हमें चरित्र की शक्ति प्रदान करेगा?
के साथ में जगत जननी के साथ में जैसे कि वह अपनी खुद की मां है इस तरह से वह एक संबंध बनाए। अभी जैसे कि हमारा एक बार डिस्कशन हुआ था लास्ट क्लास में भी बहुत बार ऐसा समझा जाता है कि भक्ति का अर्थ है कि दीन हीन होकर के रहना। एक तरह से हमारे खुद के प्रति हीन भावना का डेवलपमेंट होना। हमारे खुद के प्रति हमारे भीतर में एक तरह का इनफीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स प्रकट होना कि मेरे में किसी भी तरह की पवित्रता नहीं है। मेरे में किसी भी तरह का आत्मसंयम नहीं है। मेरे साथ में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। मैं कभी-कभी कोई वृद्ध व्यक्ति के साथ में बात करता हूं तो वह मुझे जैसे ही बात करने की शुरुआत करते हैं साथ-साथ में ही वे लोग उनके साथ में जो जो कुछ हुआ सब पूरा बता देंगे कि मैं वहां पर था उस समय तो मेरे साथ में इस तरह का अन्याय हुआ। इसके बाद में मेरे साथ में इस तरह का अन्याय हुआ। जैसे कि उनकी जीवन कहानी उनके साथ में हुए अन्याय से ही भरपूर है। किंतु देखिए कि यदि हम अपने जीवन को इस तरह से देखेंगे कि मेरे साथ में सिर्फ अन्याय ही होता आ रहा है तो आप यह देखिए देखिए मैं एक इंटरेस्टिंग घटना बताता हूं। मैं उस समय लिमड़ी में था। तो लिमड़ी अर्थात कि गुजरात का एक आश्रम है और वहां पर उस समय एक फेस्टिवल था, उत्सव था। तो जैसे हमारे आश्रम में सब समय होता है कि उत्सव में बहुत सारे भक्त आते हैं। उनको खिचड़ी प्रसाद ना कि ऐसा कुछ दिया जाता है। कोई तिथि पूजा थी ऐसा कुछ था। तो अभी लिमड़ी आश्रम में ऐसा है कि वहां पर जब यह तिथि पूजा वगैरह होती है, भक्तों के लिए प्रसाद बनता है तो हम लोग वो बर्तन वगैरह मांझने के लिए धोने के लिए कुछ गांव की स्त्रियों को बुलाते थे। तो एक्चुअली क्या है कि हम लोग तो उनके साथ डायरेक्ट कांटेक्ट नहीं रखते थे। वह हमारा कॉन्ट्रैक्टर होता था। अर्थात कि अभी जैसे कि हमने कॉन्ट्रैक्टर को कहा कि जो इस तरह से उत्सव वगैरह में खाना बनाता है कि अभी आप इस दिन 500 लोगों का भोजन की व्यवस्था कर दीजिएगा। तो यह कॉन्ट्रक्टर फिर बाकी सब काम अपने से ले लेगा। वह जो रसोइयां है उत्सव के दिन उसको भी भेज देगा। जो बड़े-बड़े जो हांडियां है, बर्तन है वह भी वह भेज देगा। जितना भी सामान खरीदना है, वह भी अपने से ही खरीद लेगा। हमको तो सिर्फ उसको मेन्यू बता देना है कि पर हेड यदि हमको ₹100 खर्च करना है तो ₹100 के भीतर में कौन सा क्या-क्या आएगा अच्छे से तो मोहन थाल है पूरी है खिचड़ी है पापड़ है आचार है दो दो सब्जियां है इस तरह से जितना भी हो सके इतना हमारा बजट है पर हेड और इस बजट में यह मेन्यूस चाहिए इतना यदि उसको बता दिया और टोटल नंबर ऑफ जो एक्सपेक्टेड डिवोटीज बता दिए तो वही सब खरीद करके सब व्यवस्था वही करेगा। अपने जो बड़े-बड़े बर्तन होते हैं, हांडी वगैरह जिसमें खाना बनाना है, चूल्हा जो होता है सब कुछ वह उस दिन सुबह को एक ट्रक लेकर के आएगा। ट्रक में से सब उतारेगा और फिर रसोइया भी आ जाएगा। रसोइया खाना बनाएगा और इसके बाद में जब उत्सव समाप्त होता है तो फिर वह जो गांव से स्त्रियों को भी ले आएगा जो कि जो हां है बर्तन है उसको धोएगी और फिर सब कुछ वो ट्रक में रख के रात में वो सब कुछ ले जाएगा। हमको और कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। तो एक दिन हुआ ऐसा कि मैं वहां पर किचन में बैठा हुआ था। उस दिन उत्सव था और दोपहर के 4:00 बजे का समय अर्थात कि उत्सव तो समाप्त हो गया है और फिर भक्तों का खाना भी समाप्त हो गया है। अभी यह जो गांव की स्त्रियां है वह बर्तन धो रही है। अभी हुआ ऐसा कि जो बर्तन धोने का था वह बाहर में ही था। जहां पे मैं बैठकर के दोपहर का चाय पी रहा था। और अभी यह स्त्रियां है बाहर में बैठकर के बर्तन धोकर शायद उनके पास में थोड़ा सा टाइम होगा तो वहां पर बैठकर बातें कर रही थी। अभी उनको पता नहीं है कि भीतर में मैं बैठा हूं और मैं वहां पर चाय पी रहा हूं। तो यह लोग सब आपस में बात करते हैं। तो अभी क्या है कि यह लोग तो कौन सी बात करेगी? उनके खुद के जीवन के बारे में ही तो बात करेगी कि अच्छा मेरे लड़के को बुखार हो गया। फिर उसको तो अभी दवाई का तो पैसा है नहीं। कैसे भी करके इधर-उधर करके वह किसी गांव में यह जो सब होते हैं ना जब प्रॉपर तो डॉक्टर होते नहीं है और किंतु भी पैसा नहीं है तो कहां पे जाएंगे तो ऐसे लोगों के पास जाना पड़ता है वे लोग कुछ इधर-उधर का कुछ करेंगे ट्रीटमेंट तो ऐसा हुआ तो फिर मेरे लड़के को पैरालिसिस ना कि ऐसा हो गया ऐसा एक औरत बोल रही है दूसरी कह रही है कि उसका हस्बैंड भाग गया घर से बहुत शराब पीता था उसको मारता भी था शराब पी करके और फिर कुछ समय के बाद में भाग गया। तो ऐसी सब यह गांव की औरतों की कहानियां जो कि मैं अभी क्या है कि ऑलरेडी लिमड़ी तो एक छोटा सा टाउनशिप है और उसमें भी यह जो औरतें आती थी स्त्रियां वो तो गांव से आती थी। जहां पे कि अभी देखिए गुजरात कंपैरेटिवली मैंने बाकी सब स्टेट्स के देखा कि गुजरात काफी वेल्थी स्टेट है। किंतु इवन देन कि पैसा है वैसे गांव में किंतु पॉवर्टी भी तो इतनी ही है। तो इन लोगों की जो बातें मैं सुन रहा था मैं सोच रहा था कि देखिए कि इतना कष्ट जो है इनके जीवन में जो कि हम शहर वाले इमेजिन भी नहीं कर पाते हैं। हम लोगों के पास में यह मेडिकल फैसिलिटी भी मान लीजिए प्राइवेट आप डॉक्टर ना अफोर्ड कर पाए तो एटलीस्ट यह जो गवर्नमेंट हॉस्पिटल है वहां पे तो आप जा ही सकते हैं। यह जो बेसिक सर्विसेज है यह इलेक्ट्रिसिटी है, यह पानी है, यह जो रोड है, यह जो जनरल लॉ एंड ऑर्डर है, वे लोग हम लोग इतना टेकन फॉर ग्रांटेड कर लेते हैं। हम लोगों का लाइफ इन जनरल इतना कंफर्टेबल होता है कंपेयर टू यह गांव वाले जो कि सुबह से लेकर के रात तक या तो फिर खेत में काम करेंगे मजदूर की तरह ना कि फिर वह इस तरह से और किसी के घर में जाकर के यह फिजिकल वर्क करेंगे। अभी यह स्त्रियां थी। किसी की भी सबकी उम्र मैंने देखा था कि वह 50 से कम किसी की उम्र नहीं है। सबकी 50 50 प्लस एज है। अभी हम लोग देखिए कि हम लोग जो है फिजिकल वर्क करना तो जैसे कि हमारा बंद ही हो गया है। सब कुछ जो कुछ है सब माइंड से काम करते रहते हैं हम लोग। और उसमें भी जो थोड़ा बहुत फिजिकल करना पड़े वर्क तो हमको कितना कष्टदायक महसूस होता है। तो यह एक शहर का एक जीवन जिसके साथ में हम हैबचुएटेड हो गए हैं और यह गांव की स्त्रियां देखिए एज इट इज स्त्रियों के प्रति एक गांव में एक तरह की उपेक्षा की जाती है। वो बेचारी बीमार भी होती है तो कोई उसकी ठीक से ट्रीटमेंट नहीं करेगा। पुरुष बीमार होगा तो वे लोग फिर भी कुछ ना कुछ उसके लिए करेंगे। अभी बहू गई है अपने ससुराल वो शादी करके वह बीमार भी होती है तो उसका कोई ठिकाना नहीं कि इलाज होगा कि नहीं। उसको खाने-पीने का भी ऐसा कुछ यह नहीं है। ठाकुर ठाकुर खुद एक कहानी कहते हैं कि एक घर था। घर में दो-तीन बहुएं थी और एक थी सास। तो अभी हुआ ऐसा कि सास क्या करेगी? सबको वो एक कटोरी भर के वो राइस देगी खाने के लिए। भात देगी। किंतु यह सास भी बड़ी चालाक थी। वह कटोरी थी इतनी छोटी कि वह अभी यह बहुएं तो काम करती है। फिजिकल वर्क तो सब उनको ही करना है घर में। तो अभी ये छोटी कटोरी का भात उनको हो नहीं रहा था। उससे पेट नहीं भर रहा था। अभी हुआ ऐसा अभी किंतु कुछ बोल भी नहीं पाएगी। कि यह तो अपनी पेट्रिय्कल सिस्टम जो है एक तरह की रिजिड सिस्टम कि स्त्रियों को जैसे कि कभी-कभी सेकंड हैंड सिटीजन की तरह ट्रीट करते हैं। तो अभी सास को कुछ बोल भी नहीं पाएगी ये बहुएं। अभी एक दिन हुआ ऐसा कि वो कटोरी है वो टूट गई। तो अभी स्त्रियां ये जो बहुएं हैं दो-तीन जो थी बड़ी खुश हो गई कि अभी सास क्या करेगी वो छोटी कटोरी टूट गई है तो बड़ी कटोरी शायद लेगी तो थोड़ा सा ज्यादा भात खाने को मिलेगा। तो यह खुश हो रही थी यह बहुएं आपस में शायद बात कर रही होगी। तो सास ने सुन लिया तो वह कहती है कि बहुत ज्यादा खुशी होने की जरूरत नहीं है। मुझे मेरे हाथ का अंदाज है कि आप लोगों को कितना राइस देना है, कितना भात देना है। वो उससे ज्यादा मैं कभी आपको नहीं देने वाली हूं। तो क्या था कि अभी यह शहर में भी इस तरह से गांव में तो देखेंगे कि स्त्रियों की हालत बहुत ही बुरी है। तो मैं इन लोगों की बातें सुन रहा था वहां पर बैठे-बैठे किंतु साथ में ही व्हाट स्ट्रक मी देखिए कि मैं शहर वालों की वृद्ध लोगों की बात मैं काफी सुनी थी। उस समय भी अभी भी पहले भी मैं जब घर में था एक लॉन्ग लिस्ट ऑफ फेलियर्स ट्रबल्स इनजस्टिस रिग्रेट कि मेरे साथ में ऐसा हुआ मेरे साथ में ऐसा हुआ। हालांकि देखें तो ऐसा नहीं है कि उनके साथ में इनजस्टिस नहीं हुआ है शहर के वृद्ध लोगों के साथ में। किंतु एक क्या है कि एक नेगेटिव माइंडसेट बहुत सारे लोगों का बन जाता है। और यहां पर मैं देखता हूं यह गांव की स्त्रियां जिनका भी एज इट इज सेकंड क्लास सिटीजन एज इट इज कोई उनका यह एंपावरमेंट नहीं एज इट इज इतना फिजिकल मेंटल उनको लेना है कष्ट करना है। किंतु यह जो सब बातें कर रही थी उसके भीतर में भी चीयरफुलनेस थी। आपस में हंसी मजाक कर रही है, हंस रही है, चीयरफुलनेस है, भीतर से। इवन आई कैन फील दैट। तो देखिए कि यह जो होता है आपका माइंडसेट का प्रश्न है कि इतना कष्ट करने के बावजूद भी हो सकता है। देखिए हम स्पिरिचुअलिटी किसको कहते हैं? हम लोग जो यह ऑब्वियस यह सब सिग्नल होते हैं ना उसको हम स्पिरिचुअलिटी कहते हैं कि यह पीतांबरी पहनता है आजकल तो खैर कोई पीतांबरी नहीं पहनता किंतु तिलक लगाता है माला पहनता है ऐसे भी शायद आज ज्यादा लोग नहीं करेंगे किंतु फिर भी इस तरह का जो रिलीजियस पर्सन है उसके साथ में थोड़ी सी बात करके ही आपको पता चल जाएगा वह मैं इस आश्रम में गया उस मंदिर में गया उस तीर्थ स्थान पर गया मैं उस साधु को पहचानता हूं मैं उस साधु को पहचानता हूं। इनके साथ में मेरा वार्तालाप हुआ था। विदिन 10 मिनट्स आप ऐसे लोगों के साथ बात करेंगे। आपको पता चल जाएगा कि वो कितना धार्मिक है। किंतु हो सकता है कि यही तथाकथित धार्मिक व्यक्ति उसके आप पर्सनल लाइफ के बारे में पूछेंगे तो 10 तरह की कंप्लेंट बता देगा। तो उस धर्म का क्या अर्थ है? यदि वह धर्म आपको आपकी जो यह लाइफ जो व्यू पॉइंट है आपके जीवन के प्रति यह जो आपका एटीट्यूड है उसको बदलने में हेल्प नहीं करता है। जबकि यह स्त्रियां हो सकती है कि मैंने यह जो बात सुन रहा था उस समय हालांकि गांव में काफी धर्म होता है ग्रास रूट लेवल पे किंतु जब मैं इन लोगों की बात सुन रहा था तो मुझे ऐसा लगा नहीं कि दे आर पार्टिकुलरली रिलीजियस या तो धार्मिक है। समय ही कहां मिलता है? या तो खेत में मजदूरी करनी है या तो इस तरह से किसी के घर जाकर के बर्तन मांझने हैं। कहां समय मिलता है? तो किंतु यह जो चीयरफुल एटीट्यूड था इंस्पाइट ऑफ ऑल द ट्रबल्स यह मुझे इतना मुझे अच्छा लगा कि मैंने कहा देखिए जो स्वामी जी कहते हैं ना कि विदेश में आप गरीब व्यक्ति को देखेंगे पुअर पर्सन को ही विल बिहेव लाइक ए मॉन्सर। क्यों? क्योंकि उसके इंद्रियों के भोग सुख इंद्रियों की यह जो लालसा है उसको उसको चरितार्थ करने के लिए उसको प्राप्त करने के लिए उसका पूरा जीवन लगता है और फिर वह क्या करता है कि अपनी खुद की पॉवर्टी है और दूसरों के पास में जो वेल्थ है उसको कंपेयर करके उसके मन में सब समय एक तरह का क्रोध प्रज्वलित होता रहता है। जबकि भारत में आप गरीब लोगों को देखेंगे तो इस तरह की हैवानियत या शैतानियत इन लोगों में नहीं देखने को मिलेगी। स्वामी जी ने खुद ऑब्जर्व किया है गांवगांव गरीब से गरीब घर की कुटिया में भी आप वो व्यक्ति की कुटिया में भी जाएंगे। तो वहां पे भी ना ही वह आप भूखे रहेंगे ना ही आपको अधर्म दिखेगा। तो यह भारत में पॉवर्टी जो है ये गरीबाई जो है वो धर्म के साथ में एसोसिएटेड है कि इतना बड़ा देश इतने बड़े देश में इतनी सारी पॉवर्टी इतना सारा सफरिंग गांव में जाकर के हम देखेंगे मैं तो ट्राइबल एरियाज में जाता था रांची में मुझे तो पता है कि हम लोगों के शहर का जो लाइफ है और इन लोगों का जो गांव वालों का लाइफ है कहीं पर कुछ कंपैरिजन ही नहीं है। बहुत बार हम लोग क्या सोचते हैं? गांव में यह बड़े-बड़े किसान रहते हैं जिनके पास में एसयूवी है। जिनका लड़का लंदन में स्टडी करता है। ऐसा ही कभी-कभी हमारा एक रहता है एक इमेजिनेशन गांव के प्रति। किंतु गांव में ऐसे भी लोग रहते हैं कि जो कि सच में बेहाल है। सच में उन लोगों का आज यदि काम किया तो आज खाना मिलेगा। कल काम नहीं किया तो कल खाना नहीं मिलेगा। इस तरह की परिस्थिति कितने ही घरों में है। तो देखिए कि यहां पर एक माइंड सेट या एटीट्यूड इसका प्रश्न है। तो जब हम यह
क्या भक्ति या शरणागति हमें "दीन-हीन-अधम" बना देगी, या हमें चरित्र की शक्ति प्रदान करेगी? वैष्णव और रामप्रसाद की शाक्त भक्ति में अंतर।
भक्ति की बात कर रहे हैं तो भक्ति करते-करते बहुत बार हमारे भीतर में एक हीन भावना आ जाती है। हमारे भीतर में एक तरह का इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाता है। हम लोग यह सोचते हैं कि अच्छा मैं तो पापी हूं। मेरे भीतर में किसी भी तरह का यह नहीं है, सत्व नहीं है। भगवान की मेरे पर कब कृपा होगी? किंतु यह जो कभी-कभी हालांकि वैष्णव लोग ओरिजिनल वैष्णविज्म या तो फिर कोर कासेप्ट ऑफ वैष्णविज्म यदि देखेंगे उसमें यह नहीं है। किंतु वैष्णव धर्म के साथ में या तो वैष्णव भावधारा के साथ में एसोसिएटेड यह दीनहीन भाव काफी एसोसिएट हो गया है समहाऊ कंपेयर टू दैट यहां पे यह राम प्रसाद है या शाक्त ट्रेडिशन है। शाक्त ट्रेडिशन में जिस तरह से भक्ति का प्रवेश हुआ है वि इज कंप्लीटली यूनिक यहां पे जो कि हम जगत जननी को या तो ईश्वर को अपनी मां के रूप में देखते हैं और हम मां के साथ में झगड़ा कर सकते हैं। मां के साथ में अभिमान कर सकते हैं। मां को जाकर के हम धमक भी दे सकते हैं कि यदि मुझे दर्शन नहीं दोगी तो मैं अपना गला काट दूंगा। इस तरह से मां जैसे कि मेरी खुद की मां है। इस तरह का एटीट्यूड हम ईश्वर के साथ में रह रख सकते हैं। व्हिच इज अ रेवोल्यूशनरी एटीट्यूड।
बुद्ध का शांत परमानंद प्रसन्न-वदन ध्यान और श्री रामकृष्ण का उद्दाम नृत्य-क्रंदन और प्रचंड भाव प्रवाह
मैं खुद जब शुरू-शुर में यह सब स्टडी मैंने चालू किया था। आई यूज्ड टू एसोसिएट डिवोशन विद वीकनेस। भक्ति कौन करेगा? जो कि यह मानसिक रूप से यह स्टंटेड है। जो कि मानसिक रूप से कमजोर है। ऐसे ही लोग भक्ति में जाएंगे। अदरवाइज आपके पास में नॉलेज है, इंटेलेक्ट है, विल पावर है, फिलॉसोफी है। उसके माध्यम से अब जैसे कि मेरे उस समय के आइडियल थे भगवान बुद्ध और भगवान महावीर। देखिए इन दोनों का जीवन मेडिटेशन करके उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने किसी भगवान को किसी ईश्वर को, किसी अवतार का प्रचार नहीं किया। ऐसा नहीं कहा कि वहां पर स्वर्ग में एक देवता बैठे हैं। लंबी दाढ़ी वाले तीन सर वाले चार हाथ वाले उनकी आप आराधना कीजिए तो कहीं जाकर के वो आपको मोक्ष दिलवाएंगे। ऐसा नहीं कहा आत्मदीपो भवः ऐसा कहा है। हमारे भीतर में ही यह निर्वाण रूपी या तो फिर यह मुक्ति रूपी चाबी है। हमको सिर्फ उसको खोज के निकालना है ध्यान के माध्यम से। तो एक रैशनलिस्टिक एटीट्यूड था भगवान बुद्ध और महावीर का वह मुझे बहुत अच्छा लगता था। बट सम हाउ जैसे ही मैंने ठाकुर को पढ़ना शुरू किया आई वास सो सरप्राइज्ड ठाकुर के जीवन में यह जो इंटेंस सेंटीमेंटालिटी है यह इंटेंस इमोशन भाव का प्रवाह है यह मुझे कभी-कभी अनकंफर्टेबल महसूस करवा देता था। यहां पर भगवान बुद्ध बैठे हैं शांति से रैशनलिस्टिक एटीट्यूड उनका मन जो है किसी भी तरह का कामना वासना विकार नहीं ये जो योग चित्तवृत्ति निरोध यह जो योग शास्त्र का जो दूसरा ही यह जो सूत्र है प्रथम है अथः योगानुशासनम अर्थात कि नाउ लेट अस बिगिन द डिसिप्लिन ऑफ योगा देखिए अनुशासन डिसिप्लिन दिस इज द की ऑफ द स्पिरिचुअल लाइफ। और दूसरा ही सूत्र है योग चित्त वृत्ति निरोधः अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। तो मुझे ऐसा लगता था कि दिस इज यह जो मेंटल डिसिप्लिन है, फिजिकल डिसिप्लिन है और फिर यह मेडिटेशन है। दिस इज द प्रॉपर वे ऑफ अटेनिंग अल्टीमेट एम ऑफ ह्यूमन लाइफ। किंतु फिर यह नृत्य करना, रोना, धोना, अपने भावों को, अपनी इमोशन को इस तरह से एक्सपोज करना जैसे कि सब लोग उसको देख पाए। हम लोग खास करके यह जो आज का जो एक यूरोपियन इनफ्लुएंस से प्रभावित होकर के यूरोपियन में भी खास करके यह ब्रिटिश इन्फ्लुएंस से प्रभावित होकर के हम लोग यह सोचते हैं कि ये जो इमोशन का ये जो प्रदर्शन है वो वीकनेस की वजह से होता है। हमेशा अपनी इमोशन को कंट्रोल में रखना है। ये ब्रिटिश वे लोग इसको कहते हैं स्टिफ अप्रलीप अर्थात कि ये जो उपलाहट है उसको एकदम स्टिफ रखना है। कभी हंसना नहीं है। रोना नहीं है। अपने मन की इमोशन को भीतर में रखना है। बाहर से शांत लॉजिकली सभी चीजों के साथ में डील करना है। और ब्रिटिश लोग इसको एक स्टोरी के रूप में एग्जिंपलीफाई करते हैं। एक स्टोरी माने सभी ब्रिटिश लोग अपने एक दूसरे को कहेंगे कि इस तरह का हमारा एटीट्यूड होना चाहिए। अभी उस समय तो क्या था कि यह एक्सप्लोरेशन का युग था तो यह तो ब्रिटिश लोग पूरे जगत में फैले हुए थे। तो अभी होता ऐसा था कि कभी कोई ब्रिटिश एक्सप्लोरर अफ्रीका में बैठा हुआ है। अभी अफ्रीका कहां हजार माइल दूर अपने ब्रिटिश होमलैंड से अपने घर से और उस समय तो सोशल मीडिया नहीं था कि वो मोबाइल निकाल करके वो अपनी बीवी बच्चों को दिखा रहा है कि देखो मैं कैसे गोरिल्ला के बीच में रह रहा हूं। तो उस समय और यात्रा भी बड़ी कठिन होती थी। जहाज में आना जाना होता था। दो-तीन महीने तो इजीली लग जाएंगे। ज्यादा लगेंगे और यदि यह जो पायरेट्स का अटैक हो गया तो पता नहीं आप मर भी जाएंगे घर भी पहुंचेंगे कि नहीं तो इतना ग्रेट एडवेंचर उन लोगों में था कि घर छोड़कर के इतना चैलेंजेस का फेस करके इतने डेंजर्स फेस करके हम जगत को एक्सप्लोर करेंगे। तो उस समय अभी यह कहानी माने यह कहानी तो फेमस है किंतु यह घटना सही में हुई है कि नहीं वो सभी लोग डाउट करते हैं जो भी है। सहारा का डेजर्ट है और एक ब्रिटिश एक्सप्लोरर ऊंट के ऊपर में बैठकर के डेजर्ट क्रॉस कर रहा है। अभी देखिए कि आप अपने घर से हजारों हजारों किलोमीटर दूर है और वह भी डेजर्ट में है। जहां पर किसी भी व्यक्ति के साथ में किसी भी तरह का संपर्क नहीं है। एकाएक यदि उसने देखा कि सामने से एक दूसरा ऊंट आ रहा है। कैमल आ रहा है और उसके ऊपर में एक दूसरा आदमी बैठा हुआ है। तो पहले तो क्या है कि आप डेजर्ट में ट्रैवल करेंगे तो चेहरा वगैरह ढका होगा। आपने देखा है अरब लोग किस तरह से वो हेड गियर वो चेहरा पूरा ढक करके रखते हैं। किंतु जैसे ये ऊंट पास में आया और दोनों लोगों ने एक दूसरे को देखा तो पता चल गया बॉडी लैंग्वेज और जिस तरह से पोश्चर होता है ब्रिटिश लोगों का कि यह लोकल आदमी नहीं है। तो चेहरा ऐसा करके खोला पता चला दोनों ब्रिटिश हैं। तो अभी देखिए कि आप अपने घर से पता नहीं कितने सालों पहले निकले थे। कि दूसरे ब्रिटिश आदमी को आपने देखा होगा कि नहीं देखा होगा और वह भी आप डेजर्ट के बीच में है तो अपने को अपना देशवासी मिल जाए तो हम लोग तो कैसा खुशी-खुशी मनाएंगे अमेरिका में मैंने काफी सुना है कि यदि रेस्टोरेंट में जाते हैं कहीं जॉब करने के लिए जाते हैं एक इंडियन दूसरे इंडियन के साथ में मुलाकात हो जाती है तो कितना हंसीखुशी से बात करते हैं मृत मित्रता हो जाती है ऐसा होता है तो इवन इंडियन और पाकिस्तानी के बीच में भी यहां पे इतना दुश्मनी है। अमेरिका में एक इंडियन और पाकिस्तानी मिलेंगे तो फ्रेंडशिप हो जाएगा। क्यों? कि चारों ओर से गोरे लोगों से घिरे हुए हैं। वहां पे एटलीस्ट अपना कल्चर में सिमिलरिटी तो है। तो ये सिमिलर कल्चर ये घर का एक अपनापन खोजने के लिए हम सभी में एक ये रहता है। स्वामी जी जैसे स्वामी जी स्वयं प्रवृज्या करते-करते पूरा भारत घूमते-घूमते गए थे। वहां पर किसी एक लोकल व्यक्ति के घर में रह रहे थे। एकाएक वहां उसके साथ में मुलाकात हो गई। तो तो बंगाली था। तो उसने स्वामी जी को कहा स्वामी जी आप तो अपने घर से इतने दूर है। कल्चर लैंग्वेज फूड यह सब ने आपने कब आखिरी बेंगली कल्चर देखा होगा। बेंगली में बात की होगी। बेंगली खाना खाया होगा। आप मेरे घर आ जाइए। तो स्वामी जी वो जो लोकल जो जेंटलमैन थे वो वहां के वो उसके घर छोड़कर के घर आ गए। अभी ये लोकल आदमी था। उसने जाकर के स्वामी जी को कंप्लेंट किया कि स्वामी जी आप तो साधु हैं। आपने तो घर वगैरह सब छोड़ दिया है। किंतु एक आपका जो देशवासी है अभी उस समय तो माने ऐसा इंटीग्रेट ये नहीं था ना भारत इतना तो आपके देशवासी जो है अर्थात कि बंगाली तो उस एक दूसरे बेंगली ने आकर के आपको इनवाइट किया तो आप मेरा घर छोड़कर के चले गए। ऐसा आपने क्यों किया? ऐसा स्वामी जी को कंप्लेन करता है और स्वामी जी सामने उत्तर देते हैं। देखो कि वी बंगाली स्टिक टुगेदर अर्थात कि यह जो बंगाली आदमी है वह हमेशा साथ में रहेंगे। यदि अभी बंगाल में जब तक रहते हैं तो सभी बंगाली है। किंतु बंगाल के बाहर यदि मुलाकात हो गई तो ये लोग हमेशा साथ में आकर के रहना पसंद करेंगे। अपनी खुद की लैंग्वेज में बात करना पसंद करेंगे। ये जो सेंटीमेंटालिटी थी एक्चुअली एशियन कल्चर यदि देखें तो एस सच हम लोग काफी सेंटीमेंटल होते हैं। किंतु अभी ये जो यूरोपियन इन्फ्लुएंस आया था भारत में तो देखिए कि ये दो ब्रिटिश लोग हैं एक्सप्लोरर कहां डेजर्ट में कैमल के ऊपर में जा रहे हैं। एक इस डायरेक्शन में जा रहा है तो दूसरा ऑपोजिट डायरेक्शन में जा रहा है। तो एक दूसरे के साथ में मुलाकात होने से स्वामी जी की अपने गुरु भाई के साथ में मुलाकात होती ना कि ऐसा होता कितना हंसी-खुशी हंसीज़ाक साथ में रहना गप लगाना कितना चलता आउटपोरिंग ऑफ इमोशन आउटपोरिंग ऑफ भालोशा लव बट ये दो ब्रिटिश ऑफिसर है वो एक दूसरे के सामने ऐसा करके हाय ऐसा करके वो जो हेलो जो कि उनका है ट्रेडिशनल ग्रीटिंग ऐसा बोल करके अपने-अपने रास्ते पर चलना शुरू किए वो थोड़ी देर के लिए भी रुके नहीं कि भाई तुम कौन हो कहां से आए हो थोड़ा सा इंग्लिश सुन ले। इतने सालों के बाद में इंग्लिश भी नहीं सुना था। इंग्लिश सुन ले। अपनी लैंग्वेज सुन ले। अपनी लैंग्वेज में बात कर ले। कुछ नहीं। एक दूसरे को ग्रीट किया और अपने-अपने रास्ते पे निकल गए। हंसना भी नहीं, रोना भी नहीं। किसी भी तरह का इमोशनल आपको आउटपुट नहीं होना है। वि इज द साइन ऑफ स्ट्रेंथ। तो मेरा भी माने यह क्या है कि ब्रिटिश इन्फ्लुएंस खास करके आज के कुछ पढ़े लिखे लोगों में होता है। तो मेरा भी ऐसा था कि आप क्यों किसी भी तरह का इमोशन दिखाएंगे। आप क्यों किसी भी तरह का सेंटीमेंटालिटी दिखाएंगे? इस हिसाब से यदि आप बुद्ध या महावीर का लाइफ स्टडी करते हैं तो एक जो शांति उनके भीतर में रहती है प्रशांति जो रहती है किसी भी तरह का वो सेंटीमेंटालिटी हां उनके भीतर में कंपैजन है किंतु सेंटीमेंटालिटी नहीं है। ये रोना धोना कंप्लेन करना क्रोधित हो जाना निराश हो जाना डिप्रेस हो जाना या तो फिर यूफोरिक हो जाना एक्टेटिक हो जाना इस तरह से कुछ भी नहीं दिखेगा। कंपैशन है और सेरिनिटी है, शांति है और करुणा है। तो यह मुझे लगता था कि यह होना चाहिए आध्यात्मिक व्यक्ति का आदर्श। और यहां पर मैं ठाकुर को देख रहा हूं। क्या देखता हूं? कभी रोते हैं, कभी हंसते हैं, कभी नाचते हैं, कभी गाते हैं तो कभी जाकर मां को कंप्लेन करते हैं जगत जननी को। कभी बड़े खुश हो जाते हैं, कभीस्टेटिक हो जाते हैं। कभी डिप्रेशन में चले जाते हैं कि यह नरेंद्र ने ऐसा कहा यह चातक पक्षी नहीं। ये तो चमगादड़ है तो भयभीत होकर के या तो नर्वस होकर के एशियस होकर के वो मां काली के पास में दौड़े चले जाते हैं। ये जो एक्सट्रीम सेंटीमेंटालिटी है ठाकुर की इट यूज्ड टू मेक इट मेक मी सो अनकंफर्टेबल और फिर ये जो अगेन ये जो यूरोपियन ब्रिटिश इन्फ्लुएंस हमारे सर पे आके बैठा था। हम लोग कहते हैं कि किसी भी तरह का सेंटीमेंटालिटी या तो किसी भी तरह का इमोशन इस तरह से एक्सेसिव होना अर्थात कि यह आपकी वीकनेस की निशानी है। उसमें भी यह वैष्णविज्म के साथ में यह जो दीन हीन भाव जुड़ा हुआ है। तो मेरे मन में यह बैठ गया था कि हम एशियन लोग खास करके हम इंडियन लोग बहुत ज्यादा सेंटीमेंटल है। बहुत ही ज्यादा हमारा जो पर्सनालिटी है वह वलाटाइल है। अर्थात कि कभी खुशी कभी गम कभी एक्सटेसी कभी डिप्रेशन इस तरह से एक्सट्रीम जो हम चले जाते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए एक तरह का सिरिनिटी होना चाहिए एक तरह का कंपैजन होना चाहिए किंतु मैंने जैसे-जैसे ठाकुर को पढ़ना शुरू किया जितना ही डीप में अपने लिटरेचर में जाता गया उतना ही मुझे समझ में आया कि यह जो जिसको कि हम दीन हीन भाव कहते हैं या तो जिसको हम इनफरियो कॉम्प्लेक्स कहते हैं कि हम लोग इंडियन लोग सिर्फ गुलाम बनने के लिए ही बने हैं। वो जितने भी बाहर से यह जो सशक्त प्रजातियां यह जो स्ट्रांग सिविलाइजेशन आएगी हमारे पे राज ही करेगी क्योंकि हमारे सब नेता करप्ट है। हमारे जो इंडस्ट्री है वो कमजोर है। कोई किसी तरह का इनोवेशन नहीं है। एक तरह का यह जो इनफिरिटी कॉम्प्लेक्स है दैट इज़ सम हाउ एसोसिएटेड यह जो वैष्णविज़्म जो है उसका एक अंश के साथ में यह एसोसिएटेड है। ओरिजिनल वैष्णविज़्म के साथ में तो नहीं ही नहीं किंतु उसके एक अंश के साथ में एसोसिएटेड है। कंपेयर टू दैट यह जो शाक जो डिवोशन है या तो शाक्त धर्म में यह जो भाव साधना है व्हिच इज कंप्लीटली डिफरेंट। यहां पर ठाकुर जैसे कहते हैं कि भक्ति का सत्व है, भक्ति का रजस है और भक्ति का तमस है। तो भक्ति का सत्व क्या है? तो यह है कि आप अपने चुपचाप अपने घर में बैठकर के साधना करेंगे। आप सोए हुए हैं। सुबह रात को फिर यह जो मच्छर मॉस्किटो नेट के भीतर में आप सोए हुए थे। अभी सुबह को उठकर के वहीं पर आप मॉस्किटो नेट के भीतर में ही जप करना शुरू कर दिए हैं और घर में दूसरे लोग यह समझेंगे कि रात को नींद नहीं हुई इसलिए दूसरे दिन देरी तक सोए हुए हैं। किसी को पता नहीं चलेगा। जो कुछ भी करना है मने वने और कोणे अपने मन के भीतर में करना है। लोगों को पता ना चले इस तरह से शांति से साधना करनी है। हां आप यह जो सख्य भाव है, दास्य भाव है या तो वात्सल्य भाव है या तो फिर यह मधुर भाव है सब कुछ कीजिए। किंतु जितना हो सके थोड़ा सा आप उसको लोगों से दूर रख के कीजिए। दूसरा कि यह सेंटीमेंटालिटी जो है मैं दीन हूं, हीन हूं। भगवान की कृपा के बिना मेरे साथ कुछ नहीं होने वाला है। यह सब किंतु यहां पे देखिए कि यह जो शाक साधना है शक्ति साधना उसमें यह जो है कि तमस भक्ति का तमस वो हो गया भक्ति का सत्व यह हो गया भक्ति का तमस। जैसे कि एक डकैत का भाव मारो काटो। ऐसा जो डकैत लोग जब डकैती करने को जाते हैं तो तलवार ले जाते हैं और जोर-जोर से चिल्लाते हैं। इसको मार लो, इसको काट दो ऐसा करके तो वो हो गया भक्ति का तमस। तो ठाकुर की बात पे पहली पहली बार सुनी तो मुझे लगा कि ठाकुर ये कंट्राडिक्टरी बात क्यों कर रहे हैं? भक्ति का सत्व जो है उन्होंने प्रॉपर्ली डिफाइन तो किया है। हां, अच्छी बात है कि भक्ति का सत्व होना चाहिए। एक तरह से आपके भीतर में विनम्रता है, शरणागति है, होना चाहिए। किंतु यही ठाकुर का यह पैसेज आप पढ़ेंगे ना तो आपको यह फील हुए बिना रहेगा नहीं कि ठाकुर प्रस कर रहे हैं, प्रशंसा कर रहे हैं भक्ति के तमस की। तो ऐसा क्यों कर रहे हैं? किंतु फिर अभी मुझे ऐसा लगता है कि भक्ति का जो सत्व जिसके बारे में ठाकुर शुरू में पहले बताते हैं वह जैसे वैष्णव साधना के साथ में जुड़ा हुआ है। अपने को दीन हीन शरणागत मानना है। और यह जो भक्ति का तमस है वो जैसे कि शाक्त साधना के साथ में जुड़ा हुआ है। शक्ति साधना के साथ में जिसमें कि मैं मां का वीर संतान हूं और मां को मुझे मुक्ति देनी ही होगी। कहां पर जाएगी मां? अपने संतान को छोड़कर के वो जो वीर का भाव है, वो जो एक भक्ति का तमस है, उसको दिखा देना है। और ठाकुर को पढ़कर के लिटरली ऐसा लगता है कि ठाकुर इस ये भक्ति के तमस की प्रशंसा कर रहा है। तो यह देखिए कि भक्ति करनी है किंतु यह दीन हीन भाव नहीं लाना है। वि इज अ वेरी की अंडरस्टैंडिंग वेरी की कांसेप्ट ऑफ यह शक्ति साधना। तो यह जो
गंभीरानंदजी किस तरह माँ के जीवन का आलेखन करते है
है यह पूरा पैसेज हमने पढ़ा यह गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित उसमें जो हमको समझ में आता है कि भक्ति का तमस मां के साथ में हम इस तरह से आबदार भी कर सकते हैं। मां के साथ में हम झगड़ा भी कर सकते हैं। मां के साथ में हम जैसे ये छोटा बच्चा ये नटखट सब हरकतें करता है। मिसिफ जो करता है वह भाव के नेत्रों से यह सब कुछ भी कर सकते हैं। मां को हमको मुक्ति देनी ही होगी। मां जाएगी कहां? अपने संतान को छोड़कर के। तो यह पूरा फिलॉसोफिकल डिस्कशन गंभीरानंद जी महाराज ने इस पैसेज में किया। इसके बाद में अभी स्टोरी फिर से प्रारंभ होती है। और स्टोरी कहां तक पहुंची है? हमको पता है कि मां दक्षिणेश्वर में रह रही थी। वह सुख के दिनों की वो जैसे कि आनंद के दिनों का धीरे-धीरे करके ह्रास हुआ है। ठाकुर को कैंसर हो चुका है। ठाकुर श्यामपुकुर आ गए हैं। श्यामपुकुर से काशीपुर किंतु यहां तक स्टोरी को ले जाने के बाद में गंभीरानंद जी महाराज जैसे कि बैक ट्रैक करते हैं। फिर से वह शाह काशीपुर आने स्टोरी को काशीपुर तक ले आते हैं। किंतु फिर से वहां से यह दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर चले जाते हैं और वहां पे जाकर के एक दूसरा नया टॉपिक प्रारंभ करते हैं और वो है मां शारदा देवी का गुरु भाव। अभी प्रश्न होगा मुझे भी शुरू में हुआ था कि गंभीरानंद जी महाराज ये क्रोनोलॉजिकल सिस्टम को क्यों नहीं वो फॉलो करते हैं? यूजुअली जो बायोग्राफी लिखी जाती है वो क्रोनोलॉजिकल उस सिस्टम को ही फॉलो करती है। एक पीरियड ले लिया जाता है जैसे कि ठाकुर के दक्षिणेश्वर के दिन और इस पीरियड के भीतर में जो जो कोई थीम आपको डेवलप करनी है वो डिफरेंट-डिफरेंट चैप्टर में आप करते रहते हैं। जितनी भी थीम वो दक्षिणेश्वर के साथ में एसोसिएटेड थी वो सभी थीम्स आपने एक्सप्लोर कर दी। इसके बाद में आप फिर से का कैंसर वाला जो पीरियड है आत्म प्रकाश आत्म प्रकाश है अभयदान ठाकुर का ये जो पीरियड है वो चालू कीजिए और डिफरेंट-डिफरेंट चैप्टर में डिफरेंट-डिफरेंट थीम लेते जाइए। ऐसा नहीं करके गंभीरानंद जी ने पहले तो यह दक्षिणेश्वर की थीम ले ली। उसके बाद में काशीपुर यह श्यामपुकुर का वह वर्णन करना स्टार्ट कर दिया और फिर ठाकुर की महासमाधि से पहले फिर से वही दक्षिणेश्वर जाकर के बैक ट्रैक करके फिर से एक दो थीम ऐसी लेते हैं जो कि भविष्य के लिए बड़ी इंपॉर्टेंट है वो है मां शारदा देवी का गुरु भाव। तो इस तरह का इनका जो अरेंजमेंट है, वह देखकर के प्रश्न खड़े हो सकते हैं हमारे मन में कि महाराज जी ने ऐसा क्यों किया? अभी देखिए कि क्यों किया इसका उत्तर तो उन्होंने कभी कहीं दिया है। ऐसा तो मेरे ख्याल में नहीं है। किंतु हम जो अपनी एक छोटी सी बुद्धि चला करके जो एक अनुमान करके कह सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है जैसे कि हमने वह जो एक एनालिसिस किया था कि रामकृष्ण संघ में यदि आप गुरु भाव देखेंगे तो सर्वप्रथम ठाकुर का प्रदर्शित हुआ प्रकाशित हुआ सर्वसाधारण के सामने शोडशी पूजा से लेकर के 1886 उनकी महासमाधि तक इसके बाद में स्वामी विवेकानंद का गुरु भाव प्रकाशित होता है ठाकुर की महासमाधि से 1886 से उनकी खुद की महासमाधि 1902 तक। अभी ऐसा नहीं है कि ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे और स्वामी जी जब प्रवरज्या कर रहे थे, विदेश में प्रवचन दे रहे थे, भारत में रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर रहे थे। उस समय मां में गुरु भाव नहीं था। ऐसा नहीं है। शोडशी पूजा के साथ में ही मां के भीतर में गुरु भाव जागृत हो गया था। सिर्फ गुरु भाव नहीं देवी भाव भी जागृत हो गया था। किंतु मां का जो सर्वजन के सामने सर्वसाधारण के सामने जो उनका गुरु भाव प्रकाशित होना शुरू हुआ वो स्वामी विवेकानंद की महासमाधि 1902 के बाद में 1902 से 1920 तो यह जो हमने देखा है इस ये ये एनालॉजी या तो फिर यह स्केमा या यह सिस्टम को यहां पे गंभीरानंद जी का यह जो ऑर्गेनाइजेशन सिस्टम है कि किस तरह से वह पहले कैंसर को ले आते हैं। स्टोरी को फिर से बैक ट्रैक करके यह भार समर्पण वाला चैप्टर लेते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि उनके माइंड में भी शायद ऐसा होगा कि ठाकुर का यह जो जीवन काल है या ठाकुर का गुरु भाव है उसको कैसे भी करके उस थीम को समाप्त कर देते हैं कि मां शारदा देवी ठाकुर के पास में क्या-क्या सब सीख रही थी। साथ-साथ में ही नो डाउट कि मां ठाकुर की केयर करती थी। वो फेमस दूध वाली घटना कि ठाकुर ने कहा कम दूध देना फिर भी मां झूठ बोलकर के भी असत्य वचन करके भी ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती थी तो और फिर वो जो वही दूसरी फेमस घटना कि इस तरह की स्त्री जिसका चरित्र अच्छा नहीं है उसके हाथों से मां ठाकुर के खाने का थाला ठाकुर के पास में पहुंचाती है तो मां का जो मातृभाव था जननी भाव उसी समय से प्रकाशित होना शुरू तो हो गया था किंतु उस समय ठाकुर के जीवन का जो एक थीम डेवलप कर रहे थे गंभीरानंद जी ठाकुर गुरु है और मां ठाकुर से सीख रही है। यहां पे यह जो थीम है कि मां खुद गुरु का जो गुरु रूपी जो जो कार्य है वह स्वीकार करने के लिए आगे बढ़ रही है। उससे पहले ठाकुर को ठाकुर के जीवन का गुरु भाव है उसको समहाऊ वो स्टोरी समाप्त कर देनी होगी। तो ऐसा सोच करके शायद मुझे लग रहा है कि गंभीरानंद जी ने इस तरह का यह स्केमा या स्कीम उन्होंने ठीक किया है। तो जो भी है यह अपना स्पेकुलेशन है। अभी आगे पढ़ते हैं। ये फिलॉसोफिकल डिस्कशन समाप्त होता है। फिर से स्टोरी स्टार्ट होती है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? श्री मायर जीवन ई मर्मार्थो श्री श्री ठाकुर अबोग तो छिलेन मां के जीवन का यह जो मर्म है मर्मार्थ है। इससे श्री रामकृष्ण अवगत थे। कौन सा मर्मार्थ? कि जगत जननी स्वयं मां शारदा देवी का स्वरूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुई है। जिससे कि हम साधक गण मां शारदा के साथ में जननी और संतान का भाव रूप संबंध अपनी साधना में अपने मन के राज्य में स्थापित कर पाए। तो इसलिए जो मां का यह जो उद्देश्य था जन्म ग्रहण करने का इसके साथ में ठाकुर अवगत थे एवं श्री मां के वो तीन उहा बोलिया गया छिलेन और सिर्फ उनको पता था इतना ही नहीं मां को वो बोलकर के गए थे उत्तरकाले जने उत्सुक
माँ सारदा का प्रयोजन: जगत में ईश्वर के प्रति मातृ भाव का प्रचार
भक्तों एक दिन श्री मां के जिज्ञासा कोरिले बाद के समय में एक भक्त ने मां को पूछा था उत्सुक भक्त ने मां को प्रश्न किया मां अननो अवतार गण निजो निजो शक्ति पर देहो रखा करे छ किंतु ए बार आपना के रेखे ठाकुर पूर्वे चले गन केनो उसने भक्त ने मां को पूछा कि मां पहले पहले के जो अवतार गण थे उन्होंने अपनी शक्ति की महासमाधि के बाद में उन्होंने अपना देह त्याग किया है। अर्थात कि पहले के जो अवतार थे उनकी शक्ति का देह त्याग पहले ही हो चुका था। अब जैसे भगवान राम मां सीता ने वो जो भूमि के भीतर में वो समाहित हो गई। उसके बाद में जाकर के भगवान राम सरयू नदी में जल समाधि लेते हैं। तो पहले मां सीता का महासमाधि हुआ, देहत्याग हुआ। उसके बाद में भगवान राम देह त्याग करते हैं। तो इस तरह से दूसरे दूसरे अवतारों ने पहले तो उनकी शक्ति का देह त्याग हुआ। उसके बाद में उन्होंने देह त्याग किया है। किंतु ठाकुर ठाकुर पहले ही चले गए और आपको बाद में पीछे रखकर के गए। ऐसा क्यों? तदुत्तरे श्री मां बोलेन इसके उत्तर में मां ने कहा बाबा जानो तो ठाकुर जगत प्रत्येके ऊपर मातृभाव छिलो। बेटा तुमको पता है तो ठाकुर का जगत में सभी के ऊपर में मातृभाव था। अभी दिस इज अ वेरी इंटरेस्टिंग स्टेटमेंट एक्चुअली कि मां ने ऐसा नहीं कहा कि ठाकुर का जगत की सभी स्त्रियों के ऊपर में मातृभाव था। मां कहती है कि ठाकुर का जगत में सभी के ऊपर में मातृभाव था। तो यह क्या लिखने में भूल हो गई है? ना कि यह कोई बड़ा प्रोफाउंड फिलॉसोफिकल स्टेटमेंट गंभीरानंद जी दे रहे हैं। आई डू नॉट नो। सही में इस तरह के स्टेटमेंट जो आते हैं तो पहले तो यही सोचना पड़ता है कि मैंने बेध्यान होकर के ये लिखा गया है। इसका इंप्लिकेशन क्या है यह ना समझ कर के सीधा-सीधी लिख दिया है कि हां वो मैंने तो डिफ माने इट गोज विदाउट सेइंग बहुत बार हम कहते हैं ना कि अच्छा तुम वहां पर चले आना। अभी यह हम लोग स्पष्ट नहीं करते हैं क्योंकि वह कन्वर्सेशन के भीतर में पता ही है कि वहां पर चले आने का क्या अर्थ है। यदि मैं किसी डिवोटी के साथ में वार्तालाप कर रहा हूं प्लान कर रहा हूं कि सुबह को हम यहां पे सी शोर है वॉकिंग के लिए जाएंगे तो मैं बाद में आखिर में कह दूंगा अच्छा तुम 5:00 बजे वहां पर चले आना। मुझे यह स्पष्ट करके कहने की जरूरत नहीं है कि 5:00 बजे समुंदर के किनारे चले आना। इट इज इंप्लाइड विद इन द कन्वर्सेशन। तो यहां पर भी यह क्या इंप्लाइड है कन्वर्सेशन के भीतर में कि जगत में सभी के प्रति मातृभाव था। अर्थात कि नो डाउट कि स्त्रियों के ऊपर में ही मातृभाव होगा। यह है ना कि देयर इज अ रियल प्रोफाउंड फिलॉसोफिकल कांसेप्ट हिडन हियर। आई डू नॉट नो। तो जो भी है किंतु ये स्टडी जैसे-जैसे हम करते हैं तो वैसे-वैसे यह सब हमारे सामने आता है। यह पहली नजर में नहीं आएगा। पहले रीडिंग में भी नहीं आएगा। ये इस तरह से कैच करना कि अच्छा यहां पे बड़ा कुछ लिखा हुआ है। इसका अर्थ समझना होगा। अर्थ समझे ना समझे किंतु यह पकड़ लिया। यह भी आपको पहले रीडिंग में नहीं आएगा। तीसरे, चौथे, पांचव, 10वें रीडिंग में आएगा। तो यहां पे मुझे ऐसा लग रहा है कि समथिंग इज देयर। किंतु आई डू नॉट नो क्या कहना चाहते हैं। कुछ-कुछ कांसेप्ट ऐसे होते हैं जिसके बारे में अर्थ विस्तार करने को भी हमको डर लगता है। इतने प्रोफाउंड होते हैं। सो इसको हम यहां पर छोड़ देते हैं यहीं पे। किंतु दिस क्वेश्चन रिमेंस कि ये बेध्यान होकर के लिखा गया है ना कि इसके भीतर में कुछ सही में कुछ है। तो जो भी है आगे मां क्या कहती है? से मातृभाव जगते विकाश जनो आमा के ए बार रेखे गए छ तो ठाकुर का जगत में सभी के प्रति मातृभाव था उसी मातृभाव को इस जगत में विकास हो इसलिए ठाकुर इस बार मुझे रख करके गए हैं। इस अर्थ में कि ठाकुर चाहते थे कि उनका उनके भीतर में जो जगत की स्त्रियों के प्रति या तो फिर इस तरह से भी हम कह सकते हैं कि ईश्वर के प्रति ईश्वर को मां के रूप में देखते थे और मां के साथ में जो संतान का संबंध था वो ईश्वर और संतान ईश्वरी और संतान यह संबंध यूनिक रिलेशनशिप है। जगत में इसका प्रचार करने के लिए ठाकुर मुझे रख करके गए
ईश्वर की अवधारणा का विकास
हैं। देखिए ये जो स्टेटमेंट है इसका अर्थ विस्तार एक बार हम कर लेते हैं। इसको समझना वैसे कंपेरेटिवली इजी है। देखिए कि हमारा ईश्वर के साथ में जो संबंध है उसको स्वामी जी वो एक स्वामी जी का जो कांसेप्ट है कि इवोल्यूशन ऑफ द कांसेप्ट ऑफ गॉड अर्थात कि ईश्वर के प्रति हमारी जो धारणा है ईश्वर के ईश्वर कौन है क्या है कैसे है उसके बारे में हमारा जो एक अंडरस्टैंडिंग है उसका क्या इतिहास में इवोल्यूशन हुआ है ऐतिहासिक डेवलपमेंट क्या हुआ है वो स्वामी जी ट्रेस करते हैं तो देखिए कि एक समय था जब हम ट्राइबल सोसाइटी में रहते थे। हम लोग ट्राइब में रहते थे। ट्राइबल सोसाइटी कहां? दैट विल बी अ कंट्राडिक्शन इन टर्म्स। हम जब ट्राइब्स में रहते थे। जब हम हमारे एनसेेस्टर वो जंगल में इस तरह से या तो शिकार करते थे या तो फल, मूल सब्जियां इधर-उधर से तोड़ करके जुगाड़ करते थे। उस समय ईश्वर को एक भयानक क्रोधित एक देवता के रूप में लोग देखते थे कि जिसको आपको सतत कुछ ना कुछ सैक्रिफाइस करते रहना होगा। कुछ ना कुछ बल पशु है इसका बलि देना होगा। यह जो सब्जियां वगैरह है, फल मूल जिसको कलेक्ट किया है, उसका बलि देना होगा। यहां तक कि जिस तरह से बाइबल की कुछ कहानियां है। एक कहानी एटलीस्ट कि वह एक पिता अपने संतान को काट करके उसको बलि के रूप में दे देता है। सैक्रिफाइस के रूप में देवता को प्रसन्न करने के लिए। यानी कि उस समय जो देवता की धारणा थी हमारी वह एक राक्षस जैसे देवता थे। कभी भी वह हमारे पर नाराज हो जाएंगे। कभी भी यह फ्लड भेजेंगे, कभी भी अर्थक्वेक भेजेंगे, कभी भी वाइल्ड फायर भेजेंगे। मैं भी मरूंगा, मेरे परिवारजन भी मर जाएंगे। मेरा ट्राइब पूरा नेस्तनाबूद हो जाएगा। कुछ कह नहीं सकते। ऐसे देवता को कैसे भी करके खुश रखना है। कुछ ना कुछ सैक्रिफाइस करते रहना है। वह जो एक राक्षस रूपी देवता थे। उसके बाद में एक प्रेम रूपी देवता जैसे-जैसे साधना का विकास हुआ, एक प्रेममय देवता का हमने कल्पना करना शुरू किया। इस तरह के देवता को आप शरणागति से उनकी आराधना करते हैं। और कभी-कभी यह जैसे श्रीमद् भागवत में हमको दिखता है कि पुराने देवता क्रोधमय क्रोधित देवता और यह प्रेममय देवता इनके बीच में कभी-कभी युद्ध भी लग जाता है। टकराव भी हो जाता है। वह जो फेमस वृंदावन की घटना कि इंद्र को सैक्रिफाइस दिया नहीं बोल के उसने बारिश बरसाना शुरू किया और लगा कि ब्रज मंडल जो है डूब ही जाएगा। उस समय भगवान कृष्ण ने गोवर्धन को अपनी जो आखिरी छोटी उंगली है उसके ऊपर में धारण किया और फिर ब्रजवासियों को इंद्र के जो क्रोध है उससे उनकी रक्षा की। तो वह पुराने क्रोधित देवता और यह प्रेममय देवता। तो यह एक इवोल्यूशन हुआ। उसके बाद में भी जैसे कि यह जो अद्वैत जो कांसेप्ट है कि ईश्वर को आप बाहर क्यों खोजते हैं? ईश्वर को तो भीतर में ही खोजना है। हमारे ही भीतर में देवत्व निहित है तो इस तरह के देवत्व को यदि आपको प्रकाशित करना है तो आप कैसे करेंगे? तो शरणागति तो खैर एक वह रास्ता था पुराना प्रेममय देवता के सामने आप शरणागत होंगे। किंतु यहां पर एक बेटर उपाय है मोर पावरफुल उपाय है इंद्रिय संयम। तो यह इंद्रिय संयम और ईश्वर या तो देवत्व अपने ही हृदय में है। यह कांसेप्ट प्रारंभ हुआ और यह जब कांसेप्ट पहुंच गया जब ऋषि मुनियों के पास में तो उन्होंने सोचा कि हमको अभी यह जो है कि इंद्रिय संयम करके सत्य और ब्रह्मचर्य का पालन करके तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान यह सब पालन करके कितने लोग ईश्वर को प्राप्त या तो देवत्व को प्राप्त करने वाले हैं। उनको और एक इजी रास्ता चाहिए। तो फिर उन्होंने फिर से यह प्रेममय ईश्वर और इसके साथ में आपको सिर्फ शरणागति नहीं यह विभिन्न भाव के माध्यम से संबंध बनाना है। तो दास्य भाव, सख्य भाव, शांत भाव, फिर यह संतान भाव, मातृ भाव और फिर सर्वश्रेष्ठ भाव था मधुर भाव। तो यह सब भावों का उन्होंने डेवलपमेंट किया। या तो फिर यह ऑलरेडी थे। उसका उन्होंने लोगों को उपदेश दिया। किंतु इसके बाद में भी यह जो ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त हुए जो ऋषि थे उन्होंने सोचा कि यह कलयुग में तो अन्नगत प्राण है। लोगों का मन यह कर्म और रजस से और तमस में ही डूबा हुआ है। तो ऐसे लोगों को सहज आध्यात्मिकता कैसे सिखाए? तो यह और एक नया डेवलपमेंट हो। ईश्वर को आप जननी के रूप में देखिए और आप संतान भाव प्रकट कीजिए अपने हृदय में। तो जननी के साथ में संतान का जो संबंध है हम सभी को उसका अनुभव है। तो इसी संबंध को आप दिव्यता के आप प्लेटफार्म पर रख देंगे तो आप बड़ा इजीली आध्यात्मिक जगत में विकास करेंगे। तो यह जो लेटेस्ट कांसेप्ट यह जो लेटेस्ट वर्जन जो है उसका डेवलपमेंट और उसका प्रचार करने के लिए ठाकुर ने मां को रख के गए हैं कि हम वैसे तो ठाकुर ने मां काली को जिस तरह से दर्शन किया हमारे से तो वह संभव नहीं। हमारे पे हमारी मां काली के ऊपर में इतनी श्रद्धा भी नहीं होगी। हमको एक बड़ा एक एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट लगता है। किंतु मां शारदा देवी का जीवन तो हमारे सामने पड़ा है। हम लोग इसके मां के जीवन के प्रत्येक छोटी-छोटी घटना, प्रत्येक छोटे-छोटे प्रसंग, प्रत्येक उपदेश को पढ़कर के मां का जो चरित्र था, मां का मातृभाव था, उससे सहज रूप से हम अवगत हो सकते हैं। सहज रूप से हम मां को पहचान सकते हैं। मां का चरित्र कैसा है? मां का पर्सनालिटी कैसा था? मां का हमारे प्रति प्रेम कैसा था? एकदम सहज रूप से हम जान सकते हैं। तो इस तरह से मां को जानकर के मां के प्रति संतान भाव डेवलप करना वो ज्यादा डिफिकल्ट नहीं होगा। इसलिए ठाकुर ने यह संतान भाव जगत जननी के प्रति डेवलप हो और यह सहज साध्य साधना और आध्यात्मिकता का रास्ता बने। इसके लिए ठाकुर मुझे रख करके गए हैं। यह मां का कहना है। अन्य एक समय श्री मां
माँ सारदा की हमारे प्रति अपार करुणा
बोल्या छिलेन और एक समय मां ने कहा था जखन ठाकुर चले गलेन आारो इच्छा हलो आमी हो जाए जब ठाकुर चल गए थे चल बसे थे तब मेरी इच्छा हुई कि मैं भी चली जाऊं त देखा दिए बोलले ना तुम ही थाको अनेक काज बाकी आ छे किंतु फिर ठाकुर ने दर्शन देकर के कहा कि ना तुम रहो अभी भी बहुत सारे काम बाकी है शेषे देख लूं ताई तो अनेक काज बाकी आ छे आखिर में देखा हां तो सही में तो बहुत सारा काम बाकी है। देखिए ये बहुत सारा काम अर्थात कि क्या ये हमारे जैसे वो जो लड़के थे कोवालपाड़ा के यहां पे कोलकाता में आसपास के गांव के जैसे ये अपने राममई महाराज थे वगैरह वो लड़के जब मां के पास में जाते थे और मां के साथ में सहज जो प्रेम का संबंध बन जाता था उसको देखकर के मां को समझ में आया कि नहीं इन लोगों को भी आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। देखिए
एक अमेरिकी भक्त की कहानी: स्वामी विवेकानंद की करुणा
करुणा जो होती है इन लोगों के भीतर में कितनी स्ट्रांग होती है। स्वामी जी अमेरिका गए थे भारत के लिए सहाय लाने के लिए और वहां पर वह जो टिकट भी बांटते थे स्वामी जी के प्रवचन की और एक घटना भी है वो मिसेज एलन वो स्वामी जी का दर्शन दर्शन करने के लिए आई किंतु जैसे ही वो स्वामी जी को प्रश्न करती है कि अच्छा स्वामी जी मैं आपको आपके साथ बात करना चाहती हूं या ऐसा कुछ तो स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया था पता है आप मेरे घर पे आइएगा जहां टर्क स्ट्रीट रोड है वहां वहां पे स्वामी जी ने और वो जो मिज हेंसब्रो थी एलिस हेंसब्रो घर भाड़ा करके रह रहे थे तो स्वामी जी ने कहा कि आप वहां पे आइएगा वहां पे ये टिकट का झमेला नहीं है टिकट का चक्कर नहीं है अर्थात कि देखिए कि स्वामी जी ऑन वन हैंड कि भारत के लिए पैसा भी इकट्ठा करते थे किंतु यह जब अमेरिकन लोगों का यह जो भीतर से देखा कि नहीं इन लोगों को भी आध्यात्मिकता की आवश्यकता है तो फिर वो जैसे कि फ्रीली अपनी आध्यात्मिकता बांटते थे यही मिसेज एलन का उदाहरण आई थी स्वामी जी का लेक्चर अटेंड करने के लिए टिकट का पैसा देकर के बैठी थी और स्वामी जी को सुना किंतु जो मन के भीतर में वह जो संताप भरा हुआ है जो ग्रीफ भरी हुई है जो डिप्रेशन भरा हुआ है किस तरह से वह पब्लिक के सामने बात करेगी तो फिर स्वामी जी ने समझ लिया और कहा आप मेरे कम घर पर आइएगा वो उस दिन मिसेज एलन स्वामी जी का दर्शन करने के लिए उनका विजिट करने के लिए गई तो वो ऊपर में जा रही थी सीढ़ी में तो किसी ने पूछा वो थी वो कोई वो थी मिज एलिस हेंसब्रो अभी वो मिज एलिस हेंसब्रो पे कुछ-कुछ लोगों की बड़ी नाराजगी थी क्योंकि क्या है स्वामी जी वैसे तो उनका एक म एक ये रहता है ना रूटीन रहता है तो क्योंकि वो वैसे ही बहुत काम करते थे तो रूटीन में जब उनका रेस्ट करने का समय है खाने का समय है उस समय कोई विजिटर आ जाएगा तो तो थोड़ा बोलना पड़ेगा कि भाई आप थोड़ा अपॉइंटमेंट ले आइए वगैरह-वगैरह तो मिज एलिस हेंसब्रो का था कि स्वामी जी को थोड़ा प्रोटेक्ट करके रखना चाहिए। जाती थी। किंतु कोई कोई डिवोटी है ना उस इसकी वजह से उन पे काफी नाराज हो जाते थे और कहते थे वह जो एक लेडी है ना स्वामी जी के साथ में घूम रही है अपने हाथ में एक हैंडबैग लेकर के वही सब गड़बड़ करती है तो ऐसा लोगों का कहना था तो किंतु अभी मिसेज एलिस हेंस अभी क्या करेगी तो ये मिज एलन उनको मिलने के लिए आई स्वामी जी का दर्शन करने के लिए तो मिसेज हेंसबरो ने रास्ते में ही कह दिया वो फर्स्ट ने सेकंड फ्लोर पे स्वामी जी का कमरा भाड़े किया हुआ था घर तो वो फ्लैट तो जैसे ही वो सीढ़ी चढ़ रही है। उसको ऊपर से ही कह दिया कि स्वामी जी बाहर जा रहे हैं। अभी किसी के साथ में वह मुलाकात नहीं करेंगे। बाद में आइएगा। अभी मिसेज एलन तो बड़ी उससे यह हो गई। दुखी हो गई क्योंकि मन में इतनी आशा ले आई है स्वामी जी का दर्शन करने के लिए। अभी रास्ते में ही बोल दिया सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते ही कि आप मत आओ। स्वामी जी बाहर जा रहे हैं। तो उन्होंने बड़ी विनती करके कहा कि देखिए स्वामी जी ने मुझे अपॉइंटमेंट दिया है। कैसे भी करके आप मुझे एक बार मेरी मुलाकात करवा दीजिए। तो फिर वह मिज हेंसब्रो का हृदय थोड़ा सा द्रवीभूत हो गया होगा। मिसेज एलन को कहा ठीक है आप आइए बैठिए देखिए क्या स्वामी जी को मैं बताती हूं उनके पास में टाइम होगा तो आपसे बात करेंगे तो ठीक है ये एडिथ एलन सो वहां पे वो बैठी है वो कुर्सी के ऊपर में थोड़ी देर के बाद में स्वामी जी आए और स्वामी जी आकर के उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठे और पूछा कि हां मैडम बताइए आपको क्या कहना है तो जैसे ही स्वामी जी ने यह प्रश्न पूछा यह बात कही कि बताइए आपको क्या कहना है साथ में ही मिसेज एलन ने रोना शुरू कर और रो रही है, रो रही है, रो रही है। जैसे कि कितने जन्म का दुख, कष्ट, ताप, संताप भीतर में भरा है। और सामने एक ईश्वरीय महापुरुष को देखती है तो भीतर में से जितने भी संस्कार, कुसंस्कार, दुष्कर्म, जय सब जैसे कि आंसुओं के माध्यम से हृदय जैसे धुल जाता है। वो रोती ही जाती है, रोती ही जाती है। कितना देर तक वो रोई। फिर स्वामी जी चुपचाप बैठे हैं। कुछ बोल नहीं रहे और उनके भीतर का जो प्रेम होगा जो करुणा सहानुभूति होगी वो जैसे कि वो कहते हैं ना गुरुस्तु मौन व्याख्यानम शिष्यस्तु छिन्न संशया स्वामी जी शांति से बैठे हैं और उनका जो मौन व्याख्यान है या तो जो मौन रहकर के उनके हृदय का प्रेम था। वह जो मिस सेलन ने जो अनुभव किया होगा धीरे-धीरे करके शांत हुई और फिर आखिर में स्वामी जी ने कहा आप एक काम कीजिए अभी एक दूसरे दिन मुझे मिलने के लिए आइए आज मुझे बाहर जाना है तो उस समय मिसेज एलन कहती है हां ठीक है दूसरे दिन मिलने को आऊंगी और ऐसा करके स्वामी जी के घर में से नीचे उतरती है वो फ्लैट था सेकंड थर्ड फ्लोर पे फिर जब ग्राउंड फ्लोर पे आती है रास्ते पर चलना शुरू करती है वो कहती है कि जैसे कि जगत में मुझे सोने का दिखाई देता है ये जो जितना भी भीतर में पड़ा हुआ था। सब इस तरह से क्लीन हो गया। मैं रास्ते पर जा रही हूं। रास्ते में ये जो पत्थर कंकर पड़े हुए हैं। मुझे ये सोना जवाहरात हीरे मोती की तरह दिख रहा है। इस तरह से मेरा भीतर में जो परिवर्तन हुआ दिव्यता का उदय हुआ। मैं पूरे जगत को दिव्य रूप में देखती हूं। तो ये देखिए कि इन लोगों के भीतर में तो करुणा होती है ना। जब भी दुख कष्ट देते हैं सब कुछ जैसे कि अपने हृदय में से ये लोग खाली करके इनको दे देते हैं। कहां स्वामी जी गए थे भारत के लिए सहाय लाने के लिए और कहां अमेरिका में उन्होंने अपने हृदय खोलकर के सब कुछ जो बांट दिया तो अमेरिका से डायबिटीज लेकर के भारत में लौटे और फिर वहां पे कुछ ही दिनों के बाद में उन्होंने देह त्याग कर दिया। एक बार
स्वामी विवेकानन्द और निर्विकल्प समाधि
स्वामी जी के पीछे लग गए और स्वामी जी को कहते हैं कि आपको निर्विकल्प समाधि हमको दिखानी होगी एक बार। यह बेलूर मठ की स्थापना के बाद की बात है। स्वामी जी की सेकंड विजिट के बाद की बात है। तो स्वामी जी कहते हैं अरे बूढ़ो बाबा यह जो अमेरिका में सब खर्च हो गया है मेरा अभी निर्विकल्प समाधि कहां से आएगी? अभी निर्विकल्प समाधि मुझे फिर से चाहिए तो फिर से मुझे यह कोपिन पहन करके तपस्या करनी पड़ेगी। अदरवाइज नहीं आएगी। तो खैर, हमको तो पता है कि स्वामी जी की आध्यात्मिकता उतनी उच्च थी कि वह चाहते तो निर्विकल्प समाधि ले भी आ पाते थे। किंतु अपने मुंह से एटलीस्ट उन्होंने ऐसा कहा कि अमेरिका में जैसे कि सब खर्च हो गया है। तो अमेरिका गए थे कहां? भारत के लिए सहाय लाने के लिए और अमेरिका में ही जैसे कि उन्होंने अपना पूरा देह के भीतर में जितनी भी प्राणशक्ति थी जैसे कि वहीं पर व्यय करके आ गए। तो इन लोगों के भीतर में करुणा रहती है। जब भी इस तरह से कष्ट देखते हैं साथ-साथ में ही हृदय में से जितना भी प्रेम होता है सब इन लोगों के भीतर में बांट देते हैं। इसलिए मां का यह जो लास्ट स्टेटमेंट है शेषे देख लूं। आखिर में देखा ताई तो हां तो सही तो अनेक काज बाकी आज छे बहुत सारा काम बाकी है। तो मां ने जैसे ही लड़कों को देखा होगा। उनका मातृभाव जागृत हो गया और फिर मां ने जगत में रहकर के हमारे कल्याण के लिए और 20 साल जीवन धारण किया। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु