प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी की जीवनी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे और कल एक बड़ा ही रस माधुर्य पूर्ण घटना का हमने चर्चा किया। अभी कल की घटना के ही संदर्भ में गंभीरानंद जी महाराज एक नया टॉपिक प्रारंभ कर रहे हैं।
मातृत्व हर स्त्री की आकांक्षा होती है
हमको पता है कि प्रत्येक स्त्री के भीतर में मातृत्व का भाव रहता है। उनके भीतर में यह मातृत्व शक्ति हमेशा से रहती है। जैसे ही संतान का प्रसव होता है, उनकी यह सूक्त मातृत्व शक्ति जो कि बचपन में या तो युवावस्था में इतना उसका मैनिफेस्टेशन नहीं होता था। जैसे ही संतान का प्रसव होता है, उनकी यह मातृशक्ति जागृत हो जाती है। अपने संतान के प्रति स्नेह वो इस माध्यम से उनके भीतर में यह जननी स्वरूप है। वह प्रकटित होता है। अभी यह संतान प्रसव किसी भी स्त्री के जीवन में एक बड़ी ही महत्वपूर्ण घटना है। आप कह सकते हैं कि स्त्री के जीवन में एक टर्निंग पॉइंट है। पहले तो वह बालिका थी। फिर वह युवा होकर के उसका विवाह हुआ। और उसके बाद में तो बालिका एक भाव रहता है। युवावस्था एक रहती है। सेकंड टर्निंग पॉइंट सेकंड फेज है उसके जीवन का और तृतीय फेज होता है यह जननी का। और यह जननी का जो समय है, यह जननी स्वरूप है स्त्री के भीतर में, वह उसका सबसे महत्वपूर्ण उसका लक्षण है। स्वामी जी कहते हैं कि विदेश में खास करके अमेरिका में अमेरिका में स्त्रियों को जैसे कि एक उनकी जो युवावस्था है, उसी को जैसे कि सबसे ज्यादा सराहा जाता है, उसी को जैसे सबसे ज्यादा प्राधान्य मिलता है। जबकि भारत में जननी स्वरूप को सबसे ज्यादा प्राधान्य मिलता है। उसी को स्त्री का सही-सही सर्वोच्च गुण माना जाता है। तो अभी मां के जीवन में भी देखिए कि बालिका जब थी मां जयराम बाटी के दिन कामार पुकुर में भी विवाह के बाद ठाकुर के पास में आती थी। किंतु वह तो बालिका वधू थी। वह ठाकुर उस मां को सब सिखाते थे। किस तरह से संसार में रहना है वगैरह किंतु जैसे ही मां युवा होकर के दक्षिणेश्वर में मां ने पदार्पण किया तब से ही मां के मन के भीतर में यह जो मातृभाव है उसके प्रति आकर्षण दिन प्रतिदिन बढ़ता गया और जैसे कि भारतीय
विधवाओं और निःसंतान महिलाओं को अपने खान-पान और जीवनशैली में कठोरता क्यों करनी पड़ती है? वैराग्य उत्पन्न करने के लिए।
समाज तो है मातृ प्रधान समाज है। जननी प्रधान समाज है। यहां पर मातृत्व को लेकर के सिर्फ सामाजिक नहीं किंतु धार्मिक भी बहुत सारे विधि विधान है और जो स्त्री उसको जननी होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होता उस स्त्री को जैसे कि विधवा की तरह ही कई जगहों पर ट्रीट किया जाता है। भारतीय समाज में यदि एक थोड़ा सा ये था दूषण कहो कि कुछ भी कहो जिसके बारे में यह विद्यासागर वगैरह कुछ लोगों ने यह विधवा पुनर्विवाह प्रथा का वो जो प्रारंभ किया था क्योंकि विधवा का जो जीवन है भारतीय समाज में बड़ा ही कठिन था। अभी विधवा को अलंकार नहीं पहनने हैं। विधवा को किसी उत्सव वगैरह में कोई शुभ कार्य करने में उसको जो मौका जो मिलना चाहिए शुभ कार्य का वह नहीं मिलता है। रिलीजियस धार्मिक जो भी उत्सव वगैरह होते हैं। सबसे पीछे विधवा को रहना है वगैरह-वगैरह खाने-पीने में तो कठोरता है ही है। रहने वगैरह में सब तरह से कठोरता करनी है। तो विधवा के जीवन की यह कठोरता दूर हो इसके लिए विधवा के पुनः विवाह की प्रथा यह सब प्रारंभ की गई थी। उस समय के बंगाल की ये जो रिफॉर्म सोसाइटीज थी उसके माध्यम से। किंतु साथ-साथ में यदि हम कोई भी सामाजिक प्रथा की निंदा करें तो साथ में यह भी हमको देखना होगा कि प्रथा उद्भव कैसे हुई। तो प्रथा का खास करके यह जो विधवाओं के लिए कठोर नियम वगैरह इसका प्रारंभ इसीलिए हुआ था कि भारत में हम हिंदू सनातन धर्म जो है वो उसका मान्यता यह है कि आध्यात्मिकता है जीवन का सर्वोच्च प्राप्ति जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य। तो आप यदि और इसी हमको पता है कि इसीलिए भारत में गृहस्थ के चार गृहस्थ का जीवन चार आश्रमों में बांटा गया है। गृहस्थ का ही नहीं इन इन जनरल सामान्य सभी तरह का कि ब्रह्मचर्य आश्रम है जहां पर वह गुरु के ग्रुप में रहकर के विद्याभ्यास करेगा। अह कोई भी एक लड़का है बड़ा होता है। 25 साल की आयु से प्रारंभ करके 50 साल तक गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेगा। सांसारिक सब जवाबदारी है। उसका निर्वाह करेगा। विवाह करेगा। सब कुछ करेगा। इसके बाद में 50 साल के बाद में वानप्रस्थ आश्रम और उसके बाद में सन्यास आश्रम। तो यह सन्यास आश्रम तक जाने की और सन्यास आश्रम के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति ईश्वर दर्शन या तो आत्म साक्षात्कार तक पहुंचने की यह पूरी यात्रा है हिंदू सनातन धर्म में तो विधवा को अर्थ यही है कि जैसे ही पति का मृत्यु हुआ तो उसका जो गृहस्थ आश्रम है उसका वहीं पर समापन हो गया और वहां से ही उसका वानप्रस्थ आश्रम और अल्टीमेटली सन्यास आश्रम प्रारंभ हो गया। तो यह एक ओरिजिनल इंटेंशन था कि वानप्रस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम में तो सभी को जाना है। बस वही है कि जब तक आपका मैरिड लाइफ टिका रहता है तो आपको 50 साल की उम्र तक वो आपका जो गृहस्थ आश्रम चलेगा या तो यह सांसारिक जीवन चलेगा। 50 साल के बाद में आपका जो स्पाउस अर्थात कि पति या पत्नी जीवित भी है तो भी आपको वानप्रस्थ आश्रम की तरह ही आपको जीवन निर्वाह करना है। महाभारत में आप देखेंगे कि महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया। यह कुंती है, गांधारी है। यह ध्रुतराष्ट्र है। यह सब लोग वन में चले गए हैं। वानप्रस्थ आश्रम के लिए और फिर कुछ कोई लोग उनके दर्शन के लिए जाते हैं तो दूर से यह लोग जैसे ही देखते हैं कि यह सांसारी लोग हमको मिलने के लिए आ रहे हैं तो यह कुंती है या गांधारी है या यह ध्रुतराष्ट्र है। वहां से भाग जाते हैं। क्योंकि वह सांसारिक लोगों को मिलना नहीं चाहते। इतनी कठिन प्रथा अपने वेद में थी कि हां एक बार जैसे आपने वान वन में प्रस्थान किया। वानप्रस्थाश्रम का अर्थ है शहर या गांव छोड़कर के वन में प्रस्थान करना। यह जड़ जो जड़ी बूटियां है यह फल फूल है उसको खा के जीवन निर्वाह करना और जीवन संपूर्ण रूप से ईश्वर को शरणागत कर देना। तो यह हाईएस्ट आइडियल एक समय था विधवा का क्या है कि वानप्रस्थ आश्रम प्रीमेच्योरली प्रारंभ हो जाता है। तो खैर जो भी है अभी यह सब एक उच्च सर्वोच्च आदर्श थे हमारी प्रथाओं के पीछे में। किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया हम सबको पता है कि रेयरली कोई लाख में कोई एक होगा जो कि 50 साल की 60 साल की उम्र में वन में प्रस्थान करेगा या तो त्यागी का जीवन जीने का प्रयास करेगा। ज्यादातर तो क्या है कि पुत्र है, पोतेपोती है। उन्हीं को लेकर के वे लोग बिजी रहते हैं। तो ठीक है। अभी आज का युग परिवर्तन हो गया है। तो आज के युग में सभी को अभी यह लग्जरी है कि वानप्रस्थ वन में न जाकर के संसार में ही रहे। तो सिर्फ विधवा को बेचारी के ऊपर में यह सब क्यों कायदे कानून आप ये लगा देते हैं? उनके ऊपर में जोर जबरदस्ती करके कि हम सभी लोग संसार करेंगे। बढ़िया मजे से करेंगे। बस विधवा को ही वही वह वैदिक प्रथाओं का अनुसरण करना है। तो ऐसा तो नहीं चलेगा। बोल के वह विधवा पुनर्विवाह का यह सब प्रचलन हुआ था। अभी आज के युग में तो संपूर्ण रूप से यह सब प्रथाएं समाप्त हो गई है। तो जो भी है अभी विधवा के लिए जो कुछ-कुछ नियम थे इस तरह के कि शुभ कार्य में वह यजमान नहीं हो सकती। या तो फिर शुभ कार्य में वह कोई अग्रसर होकर के कोई रोल नहीं निभा सकती वगैरह वगैरह। तो जिस स्त्री का बच्चा नहीं हुआ है, भले ही चाहे वह विधवा ना हो, भले ही चाहे उसके पति जीवित भी हो, किंतु एक उम्र के बाद में जो संतान का प्रसव होना चाहिए, वह जब नहीं होता है, तो फिर इस तरह की स्त्रियों को भी लोग विधवा की तरह ही ट्रीट करना शुरू करते हैं। तो अभी देखिए कि मां के
माँ सारदा की मातृत्व की आकांक्षा
जीवन में यह सब धीरे-धीरे करके दक्षिणेश्वर में जैसे ही मां आई ठाकुर के कार्यकलाप जैसे ही देखे मां तो समझ गई कि यह तो त्यागेश्वर है। मुझे तो संतान होने वाला नहीं है। तो मां मुंह से तो कुछ बोल नहीं पा रही है। किंतु मन में ही मन में दोनों तरह से क्योंकि एक तो संतान प्राप्ति की इच्छा कोई भी स्त्री के हृदय में होती ही है। दूसरा कि लोग क्या कहेंगे? देखिए ठाकुर और मां ये नारायण और नारायणी स्वयं होने के बावजूद यह लोग क्या कहते हैं? इसके प्रति उनकी बड़ी तीक्ष्ण नजर थी। यह सनातन काल से ही हम लोग देख रहे हैं त्रेता युग की घटना कि जब भगवान राम ने किसी धोबी को सुना मां सीता की निंदा करते हुए तो भगवान ने मां सीता को पवित्रता स्वरूपिणी स्वयं जननी सीता को वन में भेज दिया। तो क्या है कि लोग क्या कहते हैं? इसके ऊपर में अवतार की भी नजर होती है। तो यहां पर मां को भी सेम चीज कि अभी इस तरह से जो लोग कहते रहते हैं कि जिसका पुत्र नहीं हुआ इस तरह की स्त्री किसी भी शुभ कार्य में अग्रसर नहीं हो सकती। वगैरह-वगैरह जो यह सब लोग कमेंट करते ही रहते हैं। मां के जीवन में बेचारी के तो पहले से ही यह सब लोक निंदा लिखी हुई थी। जयराम भाटी में भी थी। तो सभी लोग सभी तो नहीं कई कई लोग कहते थे कि वो श्यामा मेयर खेपा जमा और संग बे होए से वो श्यामा की लड़की का पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है तो यह सब तो मां पहले से ही बेचारी सुनती आ रही थी तो अभी क्या करें तो मां बोलती कुछ नहीं है किंतु कोई कभी भी ठाकुर के पास जाकर के कंप्लेन किया हो अभियोग किया हो ऐसा मां कभी नहीं करती किंतु ठाकुर भी तो अंतर्यामी ठाकुर भी तो मां के मन की बात समझ लेते हैं। देह दो है किंतु प्राण तो एक ही है। दोनों के भीतर में शोडशी पूजा के समय में महाराज जी जितना सुंदर वो वर्णन करते हैं पूजक और पुजारी दोनों जैसे कि अध्यात्म भूमि में एकाकार हो गए। तो देखिए कि ठाकुर को भी पता था कि मां के मन में यह बात बीच-बीच में उठती है, उदय होती है और फिर ठाकुर ही फिर मां को किस तरह से सांत्वना देते हैं। तो यह पूरा जो टॉपिक है मां के मातृत्व की झंखना मां के मातृत्व की आशा आकांक्षा और किस तरह से धीरे-धीरे करके यह एक पुत्र संतान के प्रति एक जनरली जो होता है एक स्त्री का अपने संतान के प्रति ही जननी भाव होता है। मां के मां में जिस तरह से हुआ कि एक जननी भाव पुत्र और मां का संबंध और यह गुरु भाव अर्थात कि यह गुरु और शिष्य का संबंध और इष्ट भाव यह इष्ट और उसके पुजारी या फिर उसके भक्त का संबंध ये तीनों भाव जैसे कि मां के जीवन में एक हो गए। जननी भाव, गुरु भाव और इष्ट भाव। तो यह जो मां के जीवन का यह इवोल्यूशन था वि इज वेरी यूनिक। कोई भी आध्यात्मिक बायोग्राफीस आप पढ़ लीजिए। मैं पौराणिक बातों की नहीं बात करता हूं। पौराणिक कहानियों की नहीं किंतु एटलीस्ट आधुनिक युग में जो आध्यात्मिक स्पिरिचुअल बायोग्राफीस अवेलेबल है हमारे पास में देखेंगे कि यह तीन एक भाव किसी एक साधक या सिद्ध के भीतर में एकत्रित हो वे एक यूनिक घटना है मां के जीवन की तो देखिए कि गंभीर देखिए दो बात है पहले तो यह टॉपिक भी बड़ा सुमधुर है जो हम लोग जो कि मां के संत संतान या मां के भक्त हैं। हमारे लिए यह मां का इवोल्यूशन कि किस तरह से मां का जननी भाव धीरे-धीरे करके गुरु भाव के साथ में मर्ज हुआ। किस तरह से मां अपने शिष्यों को यह जो त्यागी संतान आते थे। अपने ही पुत्र संतान के रूप में या तो कन्या संतान के रूप में देखना शुरू किया और किस तरह से यही गुरु और जननी भाव इष्ट भाव में परिणत हुआ। जो हम लोग आज के युग में हम लोग कभी मां का स्थूल देह में पंचमहाभूत के देह में दर्शन नहीं किए हैं। किंतु हम लोग तो मां के जो भक्त हैं हम लोगों के प्रति यह जो इष्ट भाव है मां का वो इष्ट भाव भी किस तरह से ये गुरु और जननी भाव में मर्ज हुआ और तीनों भाव एकाकार हो गए। आज हम मां को सिर्फ इष्ट के रूप में नहीं देखते हैं। सिर्फ गुरु के रूप में भी नहीं देखते हैं। और सिर्फ एक जननी के रूप में भी नहीं देखते हैं। हम सभी का मां के प्रति यह तीनों भावों का मिश्रण होता है। मां को हम गुरु, जननी, गुरु और इष्ट तीनों के मिश्रण के रूप में तीनों की हार्मोनी के रूप में देखते हैं। तो हमारे लिए भी यह टॉपिक का बड़ा ही महत्व है। वो तो एक बात है। दूसरा कि देखिए गंभीरानंद जी का जो फिलॉसोफिकल इंसाइट है उनकी ये जो सिद्धि है आध्यात्मिक जीवन की उसकी वजह से कितना सुंदर रूप से यह पूरा जो पैसेज है पांच छह पैराग्राफ तक यह चलेगा यह टॉपिक कितना सुंदर रूप से उन्होंने यह साहित्य की दृष्टि से इतना सुंदर आलेखन किया है। तो यह पूरा पैसेज अभी हम अभी से लेकर के पांच छह पैराग्राफ इसी तरह से चलेंगे और इससे पहले जो हमने जिस तरह से डिस्कस किया था कि गंभीरानंद जी का वो फिलॉसोफिकल कांसेप्ट वो फिलॉसोफिकल पैसेज जिसमें कि हमने राम प्रसाद वगैरह सभी का एक डिस्कशन किया था। वह कितना एक सुंदर फिलॉसोफिकल पैसेज था। तो यह पैसेज भी इतना ही सुंदर है। यह देखिए कि अभी तक जितने भी चैप्टर हमने पढ़े इसमें यह भार समर्पण चैप्टर है। यह सबसे ज्यादा फिलॉसोफिकल चैप्टर है। यदि हम अवतरणिका को छोड़ दें। ये प्रीफेज जो था प्रीफेज भी इतना ही फिलॉसोफिकल था और यह चैप्टर अभी इतना ही फिलॉसोफिकल है। तो यह बड़ा ही सुंदर टॉपिक प्रारंभ होता है। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी?
श्री रामकृष्ण रंग-रस के माध्यम से माँ की महिमा प्रकाशित करते है
अच्छा पहले तो गंभीरानंद जी कल की जो कहानी हमने डिस्कस की थी उसी के अनुसंधान में कहते हैं। कल कौन सी दो दो कहानियां सबसे पहले तो गंभीरानंद जी हमको कहते हैं कि किस तरह से रंग रस के माध्यम से ठाकुर कभी-कभी अपने भक्तों को मां की महिमा का ज्ञान करवाते थे। मां की महिमा से अवगत करवाते थे। तो दो रंग रस पूर्ण घटनाएं कौन सी थी? सर्वप्रथम तो ठाकुर ने गौरदासी को पूछा। गौर दासी मां के साथ में नहबत में बैठी थी। उस समय बातें कर रही थी। वार्तालाप कर रही थी। उस समय ठाकुर नौबत के सामने आकर के उपस्थित हुए और इमेजिन कीजिए कितना सुंदर दृश्य होगा। दक्षिणेश्वर में तो आज की तरफ भीड़भाड़ नहीं थी। दिन के दौरान तो पूरा खाली ही रहता था। दिन के दौरान क्या वो वीक डेज में तो पूरा सन्नाटा ही रहता था। वीकेंड में यह ज्यादातर यह डिवोटी ठाकुर के आते थे। तो उसी इसी तरह का कोई समय होगा। शांत वातावरण है। गंगा बह रही है। पंखियों का कलरव हो रहा है। पेड़ पौधे हैं। फूलों की खुशबू है और आज की तरह पोल्यूशन वगैरह कुछ नहीं। तो ऐसे एक वातावरण में ठाकुर ने जाकर के गौर दासी को पूछा कि बताओ तो तुम मां और मैं हम दोनों में से किसको ज्यादा प्रेम करती हो? किसके प्रति तुम्हारी ज्यादा निष्ठा है, भक्ति है? तो गौर दासी ने बड़े ही सुंदर रूप से एक पद पदावली के माध्यम से ठाकुर को गा के कहा कि जब पूरे जगत को कष्ट होता है तो मधुसूदन को पुकारता है। पूरा जगत मधुसूदन को पुकारता है। किंतु हे कृष्ण तुमको जब कोई कष्ट होता है तो अपनी बांसी में तुम राई किशोरी के राग की धुन छेड़ते हो। अर्थात कि तुम जब उस समय राधा को पुकारते हो तो इतना सुंदर रूप से वो गौर दासी ने गौरी मां ने ठाकुर को बता दिया तो ठाकुर भी महाराज लिखते हैं बड़ा सुंदर रूप से ठाकुर हार में हंसते-हंसते चले गए ठाकुर ने हार स्वीकार करके हंसते-हंसते चले गए वहां से और फिर वही वह फेमस कहानी कि यह दाना काली की पत्नी ठाकुर के पास आती है ठाकुर के विनती करती है कि मेरा जो पति है वह बड़ा ही शराब शराबी है और वह मे कुसंग में पड़ा हुआ है। घर में आकर के बड़ा ही उत्पात मचाता है और घर का वातावरण कलुषित कर दिया है। तो आप मुझे ऐसा कोई औषध, ऐसी कोई जड़ी बूटी, ऐसा कोई मंत्र दे दीजिए जिससे कि मेरे पति ठीक हो जाए। तो ठाकुर ने रंग रस करने के लिए रहस्य करने के लिए वह कहा कि तुम जाओ नहबत में वहां पर एक स्त्री रहती है उसके पास उसको यह सब तरह की मंत्र औषधि जड़ी बूटी पता है जाओ जाकर के उसके पास में मांगो और इस इलाके में इस मामले में उसकी शक्ति मेरे से भी ज्यादा है और शक्ति ज्यादा होनी ही वाली है। शक्ति के इलाके में तो शक्ति की ही शक्ति सबसे ज्यादा होगी। प्रश्न ही नहीं है। तो फिर यह घोष पत्नी वहां पर गई। यह स्त्री बेचारी तो मां ने सोचा ठाकुर बेचारी का बिना मतलब इस तरह से यह कर रहे हैं। उसके साथ में रंग रस कर रहे हैं। उसको वापस भेज दिया। कहो ठाकुर को ही कहो कि तुमको औषध दे जड़ी बूटी दे। तो ऐसा करके ठाकुर मां के पास भेजते हैं। मां ठाकुर के पास भेजते हैं। तीन बार ऐसा हुआ। फिर मां को दया आ गई और फिर एक बिल पत्र पूजा में से लेकर के उसको दिया। कहा कि बेटा यह लो तुम्हारी मनोवांछा पूर्ण होगी। और आखिर में हुआ भी वही कि यह जो दाना काली था वो अच्छे से उसका जो हृदय परिवर्तन हुआ और ठाकुर का यह जो भक्त परिवार है उसमें उसने स्थान ग्रहण किया। तो यह दोनों कहानी गंभीरानंद जी महाराज हमको कहते हैं और इसके बाद में क्या प्रारंभ करते हैं?
श्री रामकृष्ण के युगधर्म संस्थापन में सहाय माँ सारदा की मातृत्वशक्ति
किंतु इहा अपेक्षाओं लाखों कर बार विषय यही जे मैं उसके पहले की एक लाइन से स्टार्ट करता हूं वो जो दाना काली की घटना की आखिरी लाइन से घोष गृहिणी से आशीर्वाद माथाई तुल्या ले लेन जो मां ने जब बिल्व पत्र दिया तो घोष गृहिणी ने उसको अपने सर पर उठा के रख लिया जथाकाले माय अमोग वाणी सफल होइया छिलो समय समय इवेंचुअली यथाक काले अर्थात इवेंचुअली मां की यह अमोग वाणी सफल हुई थी। दाना काली श्री रामकृष्ण अनुचर वृंदे अंतर्भक्त होइया छिलन दाना काली श्री रामकृष्ण के भक्त वृंद में उसने स्थान ग्रहण किया था। किंतु इहा अपेक्षाओं लाखों कर बार विषय ए जे ए घटनांब ने ठाकुर श्री माय कृपा हस्तो उन्मोचितो कराई ले किंतु इससे भी ज्यादा लक्ष्य करने की बात यह है किससे ज्यादा लक्ष्य किस इस घटना से भी ज्यादाेंस किसका है इस घटना अर्थात कि यह दाना काली का हृदय परिवर्तन हुआ ठाकुर का भक्त बना इससे भी ज्यादा इंपॉर्टेंट यह है कि इस घटना के माध्यम से ठाकुर ने श्री मां का जो कृपा हस्त है उसको प्रसारित करवाया था। मां का हाथ जो बंद था कृपा हस्त उसको ठाकुर ने खुलवाया था। अभी ऐसा नहीं है कि मां का कृपा हस्त बंद था। किंतु वही है कि मां जो लज्जाशिला इतनी थी कि यह जो जनसाधारण के सामने अपनी महत्ता प्रकट हो। कोई आकर के मां को प्रार्थना करें। ठाकुर के रहते-रहते और फिर मां ठाकुर के रहते-रहते मां आशीर्वाद दे। यह सब मां सहन नहीं कर पाती थी। एक तो साधारण लज्जाशीला भी थी। दूसरा कि ठाकुर के प्रति मां की इतनी भक्ति थी। या तो फिर कहेंगे कि इतना अनु शरणागति थी कि मां यह नहीं चाहती थी कि ठाकुर के रहते रहते वो गुरु का स्थान गुरु की पदवी वो स्वीकृत करें और इसीलिए ठाकुर ने मेहनत करके मां का यह जो कृपा हस्त है उसको उन्मोचित करवाया था उसको खुलवाया था शेषोक्त घटनाटी आलोचना कोरिया आमादे स्वतः ई मने ने होय जे श्री रामकृष्ण जुगत धर्म स्थापन प्रचार सहित श्री मां ज्ञातोशारे हो बा अज्ञातोषारे क्रम अधिकतर संश्लिष्ट होते छिले आर ई शक्ति विकाश द्वारा स्वभावत ता मात्र स्नेह सहित अभिच्छेद भा मिलित होया परिपुष्टि लाभ करिया छ इस घटना की आलोचना करके हमारे मन में स्वतः ही यह बात प्रकट होती है। सहज रूप से स्वाभाविक रूप से यह बात प्रकट होती है कि श्री रामकृष्ण की युग धर्म स्थापन की प्रचेष्टा के साथ में युग धर्म स्थापन की प्रचेष्टा के साथ में श्री मां उनके ज्ञात ज्ञात सारे या तो अज्ञात सारे सोच समझ करके या तो फिर भीतर के किसी दैवी आकर्षण से आकर्षित होकर के धीरे-धीरे धीरे क्रम ही क्रमशः ज्यादा से ज्यादा संश्लिष्ट हो रही थी जुड़ रही थी और इस शक्ति विकास की द्वारा शक्ति विकास की धारा स्वभावत ही सहज रूप से उनके मातृ स्नेह के साथ में अविछेद्य भावे जो कभी भी जिसके भीतर में सेपरेशन नहीं होने वाला है इनसेपरेबली अविछेद्य भावे इनसेपरेबली बलि मिलित होकर के परिपुष्टि लाभ की थी। थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस बड़ा ही यह लिटरेचर की दृष्टि से बड़ा ही उपभोग्य और इसका परफेक्ट ट्रांसलेशन हिंदी में करना थोड़ा मुश्किल है। तो एनीवे इसका अर्थ हम समझ सकते हैं बड़ा ही सहज है कि जैसे ही मां की मातृत्व शक्ति जो कि अंतर्निहित उनके भीतर में थी ही थी जो कि कोई भी स्त्री के भीतर में होती है। किंतु जैसे ही ठाकुर का यह युग धर्म की स्थापना का जो ठाकुर का प्रयास था ठाकुर जो यह युग धर्म स्थापन करना चाहते थे या तो फिर यह धर्म चक्र प्रवर्तन जो करना चाहते थे उसके साथ में ज्ञात या तो फिर ज्ञात रूपे या तो अज्ञात रूपे मां का यह जो मातृ स्नेह है वह इनसेपरेबली मिलित होता गया और दोनों परिपुष्टि लाभ करते गए। एक और तो ठाकुर है। कोलकाता में युग धर्म स्थापन की प्रयास चेष्टा कर रहे हैं। कोलकाता के जितने भी यह धर्म पिपासु है, आध्यात्म जिज्ञासु है, मुमुक्षु है, एक निष्ठ साधक है, सभी लोग ठाकुर की ओर आकर्षित हो रहे हैं। तो ठाकुर के पास में ऑलरेडी यह भक्त संतानों का आगमन प्रारंभ हो गया है। अभी मां को चाहे पता हो ना कि पता ना हो। मां जानबूझ करके सोच समझ करके ठाकुर के इस धर्म चक्र प्रवर्तन में सहाय करने के लिए आगे बढ़ रही हो या तो फिर भीतर में से कोई एक दैवी आकर्षण उनके अज्ञात सारे ही उनको इस रास्ते की ओर ले जाता हो। जो भी हो ठाकुर के युग धर्म संस्थापन के इस प्रयास में मां का भी योगदान प्रारंभ हुआ। और इस योगदान के साथ में मां का सहज जननी भाव है। धीरे-धीरे करके इस तरह से मिश्रित होना प्रारंभ हुआ कि आप इस दोनों को कभी भी सेपरेट नहीं कर सकते हैं। एक दूसरे को कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते हैं। इतना सुंदर रूप से मां का जननी भाव और यह मां का ठाकुर के युग धर्म संस्थापन की सहाय में मां का यह जो रोल था यह दोनों धीरे-धीरे करके मिक्स होना शुरू हुए मातृ स्नेह आकार आकार तो कोरियाई श्री मां आपन अनंत शक्ति के श्री रामकृष्ण कारजे उत्सर्गी कृतो कोरिया छिले मातु स्नेह के आकार से आकारित करके देखिए कितना सुंदर स्टेटमेंट है। मातृ स्नेह के आकार से आकारित करके ही श्री मां ने अपनी अनंत शक्ति को श्री रामकृष्ण के कार्य में उत्सर्गित की थी। अर्थात कि श्री रामकृष्ण के कार्य में सहायभूत की थी। मातृ स्नेह के आकार में आकारित करके। यह आकार में आकारित करने का अर्थ क्या है पता है? वो जो एक मोल्ड होता है ना वो मोल्ड के भीतर में फिर आप यह लिक्विड मेटल डालेंगे और फिर मोल्ड को तोड़ देंगे तो यह जो लिक्विड मेटल है वह सॉलिड हो के उसी का शेप धारण कर लेगा या तो यह लिक्विड प्लास्टिक इस मोल्ड के भीतर में डालेंगे और फिर मोल्ड को तोड़ेंगे तो फिर क्या है वह खिलौने का आकार का यह लिक्विड प्लास्टिक हो जाएगा जब वह सॉलिड होगा तब यह हम प्रतिदिन इस मोल्ड को देखते ही है अपने डीप डीप फ्रिज में जब हम बर्फ की ट्रे रखते हैं तो बर्फ की ट्रे का जो शेप है अब पानी डालते हैं तो पानी तो लिक्विड होता है तो डीप फ्रीजर में रहकर के पानी जब सॉलिड हो जाता है और यह ट्रे जो है बर्फ की बाहर निकाल कर के आप बर्फ को निकालते हैं तो उसके कैसे वो स्क्वायर शेप है वगैरह में हो जाता है। मैं जब छोटा था तो हमारे घर में एक ये जो राउंड शेप का इस तरह का एक था और किस तरह से राउंड शेप बनता था? मार्बल का शेप कैसे बनता था कि उसके ये जो पूरा मोल्ड था यानी जो पूरा ट्रे था उसमें एक हो एक जगह पे छेद था। होल था। तो इस होल के भीतर में से हमको पानी डालना है। तो पानी जैसे डाल दिया तो उसके भीतर में वह राउंड शेप में पानी बैठ जाता था। फिर यह जब ठंडा हो गया, पूरा बर्फ हो गया तो फिर इस ट्रे को खोलना होता था। तो जैसे ही खोलेंगे यह बर्फ गोल-गोल शेप में यह मार्बल के शेप में दिखाई देंगे। फिर उसको मैं वो पानी के ग्लास में डाल के राउंड शेप का बर्फ इसको मैं ठंडा पानी पीता था। यह मुझे बड़ा अच्छा लगता था यह राउंड शेप का बर्फ। तो देखिए कि उसको यह राउंड शेप के आकार में पानी को आकारित करना। तो यहां पर भी देखिए कि मां की यह जो अनंत शक्ति जो थी वह मातृ स्नेह के आकार में आकारित होकर के ठाकुर के कार्य में वह परिणत हुई है। यानी कि ठाकुर का कार्य वह तो एक गुरु का कार्य है। एक इष्ट का कार्य है। किंतु इस गुरु या इष्ट के कार्य में मां की मातृत्व शक्ति ही जैसे कि बह रही थी। मां की मातृत्व शक्ति ही जैसे कि इसके पीछे शक्ति बनकर के विद्यमान थी।
मातृत्व के प्राथमिक सोपान
नारी हृदय मातृत्व आकांक्षा अति स्वाभाविक नारी के हृदय में मातृत्व की आकांक्षा स्वाभाविक है। बड़ी स्वाभाविक है। किंतु से मातृत्व सर्वदा एक ही रूपे प्रगटित तो हो ना। किंतु यह मातृत्व है। हमेशा एक ही रूप में प्रगटित नहीं होता है। स्थल विशेष उहा शुदु शय संतान के आबद्ध था स्वार्थ परता रूपांतर होइया दाणाए ज्यादातर जगह पे स्थल विशेष में या तो किसी स्पेसिफिक केस में कहेंगे कि अपने खुद के संतान तक ही वह सीमित रह के स्वार्थ पर्ता के रूप में ही रूपांतरित होता है। यह एक जगत जननी और एक जननी एक साधारण या सामान्य जननी हम देखेंगे कि कोई भी मां है तो उसका प्रेम है अपने बच्चे तक ही सीमित होता है। अभी ऐसा नहीं कि सभी मां का ऐसा होता है। किंतु यहां पर जैसे शब्द यूज किया है महाराज जी ने स्थल विशेष है। स्पेसिफिक केसेस में ऐसा होता है कि संतान के प्रति स्नेह एक स्वार्थ परता के रूप में सेल्फिशनेस के रूप में वह प्रगटित होता है। जननी का प्रेम अपने ही संतान के ऊपर में है और यह संतान प्रेम से वश होकर के देखिए यह बहुत सारे उदाहरण है इतिहास में कि पुत्र प्रेम से अंध होकर के ध्रुतराष्ट्र ने पांडवों के साथ में युद्ध भी यदि हो गया तो ध्रुतराष्ट्र उस समय कुछ नहीं बोले। कौरवों उनके संतान थे उनके प्रेम में अंध हो गए थे। तो पुत्र प्रेम में अंध होकर के सर्वनाश को न्योता देना सत्यानाश या तो विनाश आ जाए तो भी कोई परवाह नहीं। इस तरह के ऐतिहासिक कैरेक्टर हमने देख लिए हैं। तो आधुनिक युग में तो ठीक है अपने संतान के लिए कोई युद्ध करने को तो नहीं जाता है। किंतु जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में यह सब कुछ हमको देखने को मिलता ही है कि कोई भी कोई कोई जननी ऐसी है अपने संतान के प्रति ही प्रेम है। दूसरों के संतान को वह या तो इग्नोर करती है या तो फिर उनके साथ में कोई बुरा व्यवहार भी करेगी। ये जो कहानियां होती है ना बहुत सारी इस तरह की कहानी है। ये साऊ की मां है। तो यह साऊ की मां क्या करती है के सौतेली मां की क्या करती है? उसका खुद का संतान है। उसको तो बड़ा प्रेम करती है। किंतु यह सौतेला पुत्र है। उसको द्वेष करती है। यदि प्रहलाद की कहानी ऐसी ही कहानी है। तो क्या है कि यह सौतेली मां एक म स्टैंडर्ड एक फीचर है। स्टैंडर्ड कैरेक्टर है। बहुत सारी कहानियों में। तो यहां पे भी देखिए कि महाराज जी कहते हैं कि कई-कई बार ऐसा होता है कि जननी का प्रेम अपने संतान तक ही सीमित रहता है और उसमें स्वार्थ भाव भी प्रवेश कर जाता है। अन्न क्षेत्र उहा शय संतानेर सहित अपर अनेक के ओ टान्यालया जनहित रूपे आत्म प्रकाश करें दूसरे दूसरे क्षेत्रों में किंतु अन्य स्त्रियों में किंतु यह मातृ प्रेम अपने संतान के अलावा दूसरों को भी अपने प्रेम में आकर्षित करके जन हित के रूप में आत्म प्रकाश करता है। कोई कोई जननी होगी सिर्फ अपने संतान को प्रेम करती है। पुत्र मोह में अंध होकर के अन्याय भी कर बैठती है। और कोई-कोई जननी ऐसी होती है कि उसका जो जननी भाव है इस तरह से विस्तृत होता है कि सिर्फ अपना ही संतान नहीं किंतु दूसरों के संतान के प्रति भी यह भाव प्रसारित होकर के एक जनरल साधारण जनहित का भाव प्रकाश करता है। अल्पस्थले उहा देहो संबंध शून्य असीम स्नेह रूपे जीव मात्रे परिव्याप्त होया माता के अनुपम अध्यात्म भूमि ते उन्नत करते पारे एवं तदपेक्षा बिरल स्थले उहा सर्वम श सुपवित्र स्वार्थ लेेश शून संसार संपर्क विरहितो जन जगत जननी कल्प देवी विशेषते जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति रूपे रूपा प्रवाहित होया संतान के विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादने परितृप्त करे क्या कहना चाहते हैं महाराज जी पहले तो इनकी सहज समझ क्या है कि दो तरह के उदाहरण तो दे दिए कि एक तो है कि मातृ प्रेम जननी प्रेम एक ही संतान तक सीमित होकर के दूसरों के प्रति दुर्व्यवहार करने में भी अचकता ये ये नहीं होता संकोच नहीं होता। स्वार्थ परता आ जाती है, सेल्फिशनेस आ जाती है। कोईकोई क्षेत्र में ऐसा होता है कि संतान के प्रति जो प्रेम है वो सर्व के प्रति सर्व के प्रति नहीं तो जन सामान्य के प्रति प्रवाहित होकर के एक जन हित कर एक स्वरूप धारण करता है। एक समाज सेवा का रूप धारण करता है। किंतु कोई कोईकोई क्षेत्र में विरल कोई एक उदाहरण है कि विश्व में समग्र के प्रति यह जननी प्रेम प्रसारित होकर के देह संबंध शून्य अर्थात कि किसी भी तरह का दैहिक संबंध बिना अभी मेरा संतान है तो मैं दूसरों के संतान को प्रेम करती हूं। किंतु मेरा कोई एक दैहिक मेरे देह से कोई एक संतान उत्पन्न नहीं हुआ। इसके बावजूद मैं सभी को सर्व समान रूप से प्रेम करता हूं। इस तरह से देह संपर्क शून्य स्वार्थ गंध शून्य प्रेम सर्व जीवों के प्रति वो कभी-कभी विरल ही कोई क्षेत्र में प्रकट होता है। अल्पस्थले अर्थात कि बहुत कम जगहों पर बहुत कम केसेस में इसको देह संबंध शून्य असीम स्नेह रूप से जीव मात्रे परिव्याप्त होकर के समग्र जीवो के प्रति परिव्याप्त होकर के फैल करके मां को अनुपम आध्यात्मिक भूमि पर उन्नत कर सकता है। अनुपम अर्थात कि सर्वोच्च या तो फिर जिसकी उपमा नहीं है यूनिक इस तरह की आध्यात्मिक भूमि पे उसको उन्नत कर सकता है एलिवेट कर सकता है और इससे भी विरल स्थल है माने इससे भी रेयर कोई केस है कि उसको सर्वम सर्म सहा अर्थात कि किसी भी तरह का कष्ट वो सहन कर सकता है। सर्वम सहा सुपवित्र स्वार्थ लेेश शून्य किसी भी तरह का स्वार्थ नहीं है। इस तरह का संसार संपर्क विरहित किसी भी तरह का संसार संपर्क नहीं है। इस तरह की जगत जननी कल्प देवी विशेष जगत जननी रूपी देवी विशेष अर्थात कि एक पार्टिकुलर देवी होकर के होते जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति रूपे प्रवाहित होकर के इस तरह की देवी जो कि जगत जननी है उसके भीतर में से उद्भूत होकर के अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति रूपे प्रवाहित होकर के संतान को विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादन से परितृप्त करती है। यह सेंटेंस बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड किंतु साथ-साथ में ही बड़ा ही साहित्यिक इसको दो-तीन बार हम स्टडी करते हैं क्योंकि तभी इसका सही अर्थ हमको समझ में आएगा। कहना जो चाहते हैं महाराज जी वो बड़ा सहज है। वैसे दो और उपमाएं उन्होंने दी है। कहते हैं कि पहले तो है कि जो देह संबंध शून्य असीम स्नेह रूप जो है वो जीव मात्र समग्र जीवों में वो प्रवाहित होकर के मां को अनुपम आध्यात्मिक भूमि पर उन्नत कर सकता है। अर्थात कि देखिए कि पहला तो उदाहरण था कि एक ही संतान के प्रति प्रेम है। दूसरा उदाहरण है कि अपने संतान के अलावा दूसरों के संतान के ऊपर में भी प्रेम है। तीसरा उदाहरण दिया कि स्नेह संबंध शून्य असीम स्नेह अर्थात कि भले ही चाहे अपना संतान हो कि ना हो उनका यह जो असीम प्रेम है वह जीव मात्र में परिव्याप्त हो सकता है। यानी कि समग्र संसार में परिव्याप्त हो सकता है और समग्र संसार को अपने जननी प्रेम से अपने मातृ स्नेह से प्लावित करके मां को उच्च आध्यात्मिक भूमि पर उन्नत कर सकता है। तो यह तीसरा किंतु इससे भी बड़ा एक चौथी कैटेगरी फोर्थ कैटेगरी महाराज जी हमारे सामने रखते हैं। क्या कहते हैं? इससे भी
मातृत्व का उच्च सोपान: कहानियों के माध्यम से माँ की दिव्य महिमा
विरल है। माने कि इससे भी रेयर केसेस में क्या होता है? एक पूरा एक लिस्ट ऑफ क्वालिफिकेशंस दिया है। एक इस तरह की जगत जननी रूपी देवी जिसका कि सर्व जो कि क्या है? सर्वम सहा है। जितने भी आप मां के ऊपर में इस तरह की देवी के ऊपर में अत्याचार कर लीजिए। वो सब कुछ सहन कर सकती है। केस इन पॉइंट कि ये मां के जितने भी परिवारजन है देखिए कि मां के ऊपर में किस तरह का अत्याचार करते थे। मां का यह किस तरह से एक के बाद एक मां को कष्ट देते थे और सिर्फ मां के परिवारजन ही नहीं बादबाद में आने वाले भक्तों में से कोई-कोई भक्त इस तरह के पागल थे जो कि आकर आकर के मां को इस तरह से परेशान करते थे। एक दिन की घटना है कि जयराम भाटी की ही घटना है। मां के एक त्यागी संतान ने ही यह बात लिखी है। वह कहीं पे काम के लिए कहीं बाहर गया होगा घर से। तो मां के घर में वापस आकर देखा तो मां बार-बार पानी से अपने पैरों को धो रही है। तो यह त्यागी संतान ने मां को पूछा कि मां इतना बार-बार आप पानी से पैर क्यों धोती है? ठंडी का समय है। आपको सर्दी लग जाएगी। तो मां ने कहा कि बेटा देखो वह एक वृद्धा आदमी आया था। उसने मेरा पैर स्पर्श करके मुझे प्रणाम किया। मैं उसको कितना ही मना करती रही कि पैरों को स्पर्श मत करो। वहीं पर चौखाट पर खड़े रहकर के ही दरवाजे पर खड़े रहकर के ही प्रणाम करो। किंतु मेरी बात सुना ही नहीं। कमरे में प्रवेश करके पैरों को स्पर्श करके प्रणाम किया और तब से लेकर के पैरों में इस तरह की ज्वलन हो रही है। ऐसा एक बर्निंग सेंसेशन हो रहा है कि बार-बार पानी से पैर धोने पर भी यह जाता नहीं है। और फिर ऐसा कहने के बाद में मां कहती है उसी त्यागी संतान को कि देखो यह उद्बोधन में इतना यह लोग स्ट्रिक्ट है। वह गुलाब मां वगैरह सब प्रणाम के समय खड़े रहते हैं। वह कोई गलत नहीं है। जिस तरह के लोगों को मैं स्पर्श करने दूंगी अपने को तो देखो यही हालत होगा और फिर मां कहती है कि देखो तुम जय राम भाटी की ही बात करके कि यहां पर तो तुम लोग हो वैसे मेरी रक्षा करने के लिए किंतु तुमको तो काम के लिए बाहर जाना होगा। उद्बोधन जैसा नहीं है कि वो इतने सारे साधु ब्रह्मचारी उपस्थित है। इतनी सारी स्त्री भक्त उपस्थित है। तो मां के पास में हमेशा कोई ना कोई खड़ा रहेगा। यहां पर तो वही गिने चुने यह वर्दा महाराज है। यह रास बिहारी महाराज है। ऐसे वो गौरीश्वरानंद जी महाराज है। ऐसे चार पांच तो लोग थे। उसमें से कोई काम के लिए बाहर चला गया तो मां अकेली हो जाएगी। इस समय ऐसा कोई पागल भक्त आएगा पागलामी करेगा तो मां क्या करेगी बेचारी? तो देखिए कि इस तरह से किंतु फिर भी मां ने उसको आशीर्वाद ही दिया। उसको श्राप नहीं दिया या तो फिर इसके ऊपर में नाराज नहीं हो गई। सर्वम सहा इसलिए मां को कहते हैं सर्वम सहा सुपवित्र जिसके चरित्र के भीतर में एक भी दाग नहीं है। इस तरह से सुपवित्र स्वार्थ लेश शून्य एक माने एक तिनका भी सेल्फिशनेस इनके भीतर में नहीं है। मां के जीवन के आखिरी दिन की घटना वो वर्ल्ड फेमस घटना कि एक लड़का आया मां के साथ में दर् मां का दर्शन प्राप्त करने के लिए वो बड़ा ही आकुल व्याकुल हो उठा है किंतु यह त्यागी संतान है मां के उद्बोधन में मां के पास में नहीं जाने दे रहे क्योंकि मां का आखिरी समय चल रहा था मां बड़ी ही बीमार थी यह काला ज्वर यह ब्लैक फीवर अभी ब्लैक फीवर क्या है आज की लैंग्वेज में वह तो पता नहीं किंतु बंगाली में उसको काला ज्वर यानी ब्लैक फीवर बोल के उस समय की भाषा में लिखा है। मां की स्वास्थ्य संपूर्ण रूप से टूट गया था। किंतु और मां ऐसे ही वहां पर पड़ी थी। किंतु ऐसी अवस्था में भी मां ने जब यह सुना कि बाहर में हल्लागुल्ला हो रहा है। मां ने बड़े ही क्षीण स्वर से पूछा किसी को कि अरे यह क्या हो रहा है? तो उत्तर मिला कि मां एक लड़का है आपको मिलने के लिए आया है आपके दर्शन के लिए। किंतु यह जो साधु लोग हैं उसको आपके पास में नहीं आने दे रहे हैं। आपकी जो अवस्था है इसकी वजह से तो मां लेटी हुई थी तो कष्ट करके मेहनत करके बैठी वो बेड के ऊपर में उठकर के बैठी और कहा कि उसको मेरे पास में आने दो और फिर मां ने क्या कहा ठाकुर क्या रसगुल्ला कहते हैं ऐसे चले ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने के लिए आए थे ये संतानों को आशीर्वाद देने के लिए ही तो हमारा जन्म हुआ है आखिरी समय में देह जा रहा है। उस समय भी इतना शारीरिक संताप के बीच में भी मां उस लड़के को आशीर्वाद देती है। उसके साथ में वार्तालाप करती है। उसको दर्शन देती है। तो इसको कहते हैं स्वार्थ लेश शून्य। संसार संपर्क विरहितो संसार संपर्क विरहितो। किसी भी तरह का सांसारिक संबंध इन लोगों के साथ में नहीं होने के बावजूद इनके ऊपर में इतना प्रेम है। एक वृद्ध महिला मां का दर्शन करने के लिए आई। अभी उसने मां के बारे में ऐसा ज्यादा कुछ सुना नहीं था। ठाकुर के बारे में भी ऐसा ज्यादा कुछ पता नहीं था। किंतु क्या है यह सब एक ट्रेंड चलता है ना आज की लैंग्वेज में कि लोग वहां पर जाते हैं। मेरे पड़ोसी भी जाकर आए तो मैं भी जाकर आता हूं। तो ऐसा बोल के वो लोगों से लोगों की देखादेखी में यह बूढ़ी महिला भी आ गई। अभी ना ही मां के बारे में कुछ पता है ना ही ठाकुर के बारे में। पहले तो उद्बोधन में प्रवेश किया देखा इतने सारे यंग लड़के इधर-उधर जा रहे हैं। काम कर रहे हैं। सब कार्यकलाप चल रहा है। अभी इसको यह भी नहीं पता कि यह सन्यासी है गेरुआ पहने वाले। तो जो भी है यंग लड़कों को देखा। फिर ऊपर गई तो यह सब लड़कियां वगैरह जो स्त्रियां वगैरह तो थी मां की संगिनियां तो उनको देखा तो देखकर के फिर जब मां के साथ में वार्तालाप करती है तो ये वृद्धा मां को पूछती है कि मां ये जो सब लड़के लड़कियां है क्या आप ही के पुत्र पुत्रियां हैं क्या इस तरह से जब मां पूछती है तो मां तो कुछ बोले इससे पहले ये जो बाकी जो स्त्रियां थी वो एक दूसरी डिवोटी वो बड़ी नाराज होकर के कहती है कि आपको पता नहीं है क्या ठाकुर के बारे में ये क्या सब उटपटांग बातें करती हो तो ऐसा बोलकर के उसको डांट दिया। किंतु जब वह वृद्धा चली गई तो मां उसी स्त्री भक्त को कहती है कि हां तुम तो कह ही सकती थी कि ये मेरे ही पुत्र पुत्रियां है। उसमें क्या है? गलत क्या है इसमें? तो देखिए कि मां के गर्भ में से किसी ने जन्म धारण नहीं किया। किसी का भी मां के साथ में सांसारिक संबंध नहीं है। किंतु अपने खुद के पुत्र पुत्रियों को एक मां जिस तरह से स्नेह प्रेम करती है, रक्षण करती है, उतना ही स्नेह, प्रेम और रक्षण मां इन सभी का किया करती थी। तो इसीलिए यहां पर लिखा है संसार संपर्क विरहित किसी भी सांसारिक संपर्क नहीं है। इस तरह का जगत जननी कल्प देवी यह साधारण देवी नहीं है। जगत जननी स्वयं है। इस तरह की देवी से ये जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण शक्त गुरु शक्ति ये प्रवाहित होकर के संतान को विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादन से परितृप्त करती है। प्रत्येक शब्द में इतना पावर है। देखिए संत जगत जननी कल्प देवी ये देवी हम देखते हैं बहुत सारी देवी देवताएं होते हैं। किंतु उनके भीतर में एक-एक शक्ति होती है। यहां पे किंतु यह जगत जननी रूपी शक्ति यह कोई सामान्य या तो फिर एक सहज शक्ति नहीं है। रेयरली ही यह जगत जननी स्वरूप आपको देखने को मिलेगा। यह जननी सीता में जननी राधा में हमको यह दिखा था। अभी यह जननी मां शारदा में हमको यह दिखता है। उसमें से यह जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति यह कैसी गुरु शक्ति है? सामान्य गुरु शक्ति नहीं है। जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण है। इस अर्थ में कि मां के साथ में रहकर के ही हमारे मन के जितने भी क्लेश है, जितने भी यह शुद्ध कुसंस्कार है, वह सब धुल जाएंगे। क्योंकि क्या है मां उनके पास में जितने भी संतान आते थे उनको ऐसा कोई कठोर तपस्या करने का या तो फिर इस तरह से साधना करने का उपदेश तो नहीं देती थी। मां तो कहती थी कि सहज सहज रूप से रहो। सहज सरल रूप से रहो। मां यह जो संसार का जो मां के संसार का जो कार्य है वही कार्य सब करते जाओ और शांति से आराम से आपको ईश्वर प्राप्ति होगी। देखिए यह क्वालपाला क्वालपाड़ा के जो लड़के थे जो कि मां के पास में आते थे या तो फिर यह जो बाकी त्यागी संतान जो कि मां के पास में आते थे ऐसा नहीं है कि उनके जीवन में आध्यात्मिक उपलब्धि यह ठाकुर के जो त्यागी संतान है उससे कम हुई होगी। यह नरेंद्र है, राखाल है, लाटू है, शशि है, तारक है, निरंजन है, योगेन है। यह जो सब जगत प्रसिद्ध नाम है यह सब। उनकी यह जो आध्यात्मिक उपलब्धि थी इससे मां के संतानों की या यह वर्दा महाराज है, गौशरानंद जी है, रास बिहारी महाराज है। मुझे ऐसा नहीं लगता कि मां के संतानों की आध्यात्मिक उपलब्धि ठाकुर के संतानों की आध्यात्मिक उपलब्धि से कम हो। किंतु साथ में ही आप इन दोनों के जीवन को आप कंपेयर करके देखेंगे खास करके तपस्या को तो यह डायरेक्ट डिसाइपल जो थे ठाकुर के उन्होंने जो प्रचंड तपस्या की यह कहां वो प्रवृज्या करते-करते पूरे भारत में घूमे थे। कहां वो वराह नगर मठ की तपस्या के सब कहानियां कंपेयर टू दैट यह क्वालपाड़ा के लड़कों की तपस्या वैसे उनकी तपस्या थी किंतु इतनी प्रचंड रूप से नहीं हमको दिखती थी। तो देखिए कि उपलब्धि तो सेम है किंतु इतनी प्रचंड तपस्या भी नहीं करनी पड़ी है। क्यों? क्योंकि मां यहां पर जीवंत आध्यात्मिक शक्ति स्वयं थी। अब जीवंत आध्यात्मिक शक्ति के सानिध्य में आप जब दिन निकालते हैं तो आपको फिर अपने से ऐसी कोई तपस्या करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मां का यह जो नाम स्मरण है, उनके जीवन की घटनाओं का यह जो स्मरण है, चिंतन है, पाठ है, स्वाध्याय है, श्रवण है, उसी से हमारा ज्यादातर काम हो जाएगा। और इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि रामकृष्ण संघ में आध्यात्मिक जीवन कोई बहुत कठिन नहीं है। मां के जीवन की घटनाओं को आप पढ़ते जाइए, पढ़ते जाइए, पढ़ते जाइए। इसी से हमारा जो अंतर मन है स्वच्छ और निर्मल हो जाएगा। ठाकुर ने जिस तरह से तपस्या करने को कहा उसमें से यदि कुछ होता है तो ठीक है। नहीं होता है तो भी कोई दिक्कत नहीं। स्वामी जी ने जिस तरह से शिव ज्ञान ने जीवन सेवा करने का कहा वह भी यदि हुआ तो ठीक है। ना हुआ तो भी कोई दिक्कत नहीं। जब तक हम मां को पकड़ कर के रखते हैं, मां के चरणाश्रित होकर के रहते हैं। मां की कथाओं का, मां की कहानियों का, मां के जीवन प्रसंग का सतत पाठ करते रहते हैं। तब तक हमको कोई बहुत बड़ा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। इसीलिए महाराज कहते हैं कि जीवंत अनुप्रेरणा पूर्ण गुरु शक्ति रूप में प्रवाहित होकर के संतान को विशुद्ध ऐश्वरिक रसास्वादन से परितृप्त करता है। यह जो मां का प्रेम है वह इसके बारे में और भी डिस्कशन हम करेंगे। अभी हमारे नेक्स्ट क्लास में आ जाएंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम