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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्राणों की पुकार || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 28 Nov 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध उसका जो एक चैप्टर हम पढ़ रहे थे बिंदु वासिनी वह समाप्त हुआ और आखिर में जो माने एक बात कही थी कि तुम तो सिर्फ मेरे ठाकुर नहीं हो तुम ही तो शो कोलेर ठाकुर तुम तो सभी के ठाकुर हो तो यह एक महामंत्र के साथ में यह चैप्टर समाप्त हुआ था तो देखिए कि रामकृष्ण संघ का जो फाउंडेशन है उसमें ठाकुर की जो करुणा मां की तो भी मां की भी तो सही ठाकुर की भी हम सभी के ऊपर में है और जैसे महापुरुष महाराज को किसी ने पूछा कि जद जब ध्यान करना है तो हम लोग जब बैठते हैं महापुरुष महाराज अर्थात कि स्वामी शिवानंद जी महाराज रामकृष्ण संघ के द्वितीय प्रेसिडेंट प्रथम प्रेसिडेंट महाराज थे स्वामी ब्रह्मानंद तो जब महापुरुष महाराज जब प्रेसिडेंट थे तो सब साधु सन्यासी ब्रह्मचारी सुबह-सुबह उनको प्रणाम करने को जाते थे तो उस समय किसी साधु ने प्रश्न किया कि महाराज जी जब ध्यान तो इतना होता नहीं है इतनी चेष्टा भी करते हैं मन को इतना हम एकाग्र करने का प्रयास भी करते हैं किंतु जब भी हम देखते हैं कि मन थोड़ा सा एकाग्र होता है उसी समय एक इस तरह का एक विक्षेप आ जाता है कि मन फिर से चारों दिशाओं में बिखर जाता है तो इसका क्या उत्तर है इसका क्या उपाय है तब महाराज जी ने क्या कहा था कि ठाकुर के ऊपर में मन को केंद्रित करो बहुत बार हम लोग वेदांत पढ़ कर के या तो फिर योग पढ़ कर के जो कठिन साधन प्रणालियां है उसको अपनाने का प्रयास करते हैं जैसे कि अपने हृदय में जो चक्र है उसके ऊपर में ध्यान एकाग्र करना या तो फिर दिया है दिए की जो ज्योत है उसके ऊपर में ध्यान एकाग्र करना यह यह सब हम प्रयास करते हैं किंतु इस सब चीजों में क्या है कि आपको जन्म जन्म मतलब सालों सालों का आपको अनुभव चाहिए ध्यान करने का और प्रैक्टिस चाहिए और अपनी जो संकल्प शक्ति या विल पावर है बहुत ही हाईली डेवलप होना चाहिए तब यह सब बातें संभव है हम लोगों के लिए जो कि आज बड़ी उम्र में ध्यान करने की सबसे श्रेष्ठ उम्र है बचपन की जब हम यह फर्स्ट स्टैंडर्ड में होते हैं सेकंड स्टैंडर्ड में होते हैं वो सब किंतु तो वो समय तो हमने गंवा दिया अभी यह 20 22 साल की उम्र में हम ध्यान करने का प्रारंभ करते हैं कभी-कभी 30 40 साल भी हो जाता है 50 60 साल भी हो जाता है जबकि हम सर्वप्रथम यह सब प्रारंभ करते हैं तब क्या है कि मन ऑलरेडी जो कमजोर हो चुका है अपना यह जो यूथ यह जो युवानी का समय है वही सर्वश्रेष्ठ समय है अपने मन को और अपने शरीर को ट्रेन करने का तो वह समय तो चला गया जिस समय हम लोग मैथमेटिक्स सीखते थे जिस समय लैंग्वेजेस सीखते थे सोशल साइंस या तो फिर यह फिजिक्स मैथ केमिस्ट्री बायोलॉजी यह सब सीखते थे उस समय यदि साथ-साथ में ध्यान करना आसन करना प्राणायाम करना सीख लिया होता तो हमको आज बड़े होकर के वह बहुत ही काम में आता किंतु वह गोल्डन पीरियड अपने जीवन का छूट गया अभी बड़ी उम्र में हम यह सब कर रहे हैं तो हमारे लिए क्या पॉसिबल है क्या बेटर है कि जो कि सबसे आसान ऑब्जेक्ट है उसके ऊपर में मन को एकाग्र करना जैसे कि ठाकुर है या मधर है मां शारदा देवी है उनका हमारे प्रति प्रेम उनका हमारे प्रति करुणा उनका हमारे प्रति आशीर्वाद इस भाव को लेकर के यदि हम मन को एकाग्र करेंगे तो देखेंगे कि मन बड़ा सहजता से एकाग्र हो जाएगा अभी जैसे देखिए कि यदि हमारे जीवन में कोई आघात पहुंचता है तो वह जो उसमें से जो रिग्रेट या तो फिर उसमें से जो रेज रेज अर्थात कि क्रोध गुस्सा या तो फिर उसमें से और कोई नेगेटिव फीलिंग प्रकट होती है तो यह नेगेटिव इमोशन कैसे अपने मन में सतत एक घर करके बैठ जाती है सब समय वह अपने मन में मंडराती रहती है जैसे कि ऐसा लगेगा कि हमारे मन को इस नेगेटिव फीलिंग ने वशीभूत कर दिया हो जैसे कि हमको पूरा अपने कंट्रोल में कर दिया हो हम चाह कर के भी उस नेगेटिव फीलिंग में से अपने को छुड़वा नहीं पाते तो ऐसे ही देखिए कि यह नेगेटिव इमोशन है वह इतनी सहजता से अपने मन को आधार करके अपने मन में आकर के घर बसा करके बैठ जाती है तो उसका काउंटर यही है कि कुछ पॉजिटिव इमोशंस खड़ी की जाए और यह पॉजिटिव भाव ठाकुर की भाषा में कहेंगे तो भाव यह भाव को केंद्रित करके भाव को आधार करके अपने मन में उसको स्थापित किया जाए तो अभी जैसे यह सब कितनी सुंदर बात माने कल कही कि ठाकुर तुम तो सिर्फ मेरे ठाकुर नहीं हो तुम तो सभी के ठाकुर हो तो यह जो सीन है यह सीन हम अपने मन में उसको रिपीट करें कि जैसे हम भी मां के साथ में वह खाने का थाली लेकर के ठाकुर के कमरे की ओर जा जा रहे हैं एक स्त्री ने आकर के मां के हाथ में से थाली ले ली कहा कि मां मुझे दीजिए मैं ठाकुर को खाना खिलाती हूं खाना देती हूं और फिर वह ठाकुर के सामने थाली ले रख कर के चली गई फिर हम भी मां के साथ में ही ठाकुर के कमरे में प्रवेश करते हैं वहां पर बैठते हैं मां और ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं वह हम सुनते हैं और हम भी यह जो मां ने जो कहा कि कोई भी मां आकर के मेरे साथ ने खड़ा होगा मां बोल कर के मेरे सामने आकर के खड़ा होगा मेरे पास में से कुछ भी मांगूंगा तो मैं उसको विदाई नहीं कर पाऊंगी मैं उसको बिना कुछ दिए बिना उसकी आशा पूर्ण किए उसको वहां से रवाना नहीं कर पाऊंगी मैं उसको जो चाहिए वह दे दूंगी तो यह जो मां का जो आशीर्वचन है मां ने ठाकुर को कहा तुम तो सभी के ठाकुर हो तो यह सब महामंत्र अपने को मन में मन में इसको इसको पोषण करना है जैसे कि पौधा हम नया अपने गार्डन में वो डालते हैं वो पब्लिकेशन में मैं जब था राजकोट में तो वहां पर एक टेरेस गार्डन बनाया था तो टेरेस गार्डन क्यों बनाया था दिन भर मुझे बैठे बैठ कर के काम करना पड़ता था तो थोड़ा सा मन फ्रेश हो इसके लिए मैं ही गार्डन में जाता था मैंने जो गार्डन के सब विविध उपकरण वो परचेस करके रखे थे तो माटी को खोदना फिर उसमें पौधा डाल ना फिर माटी को ठीक करके फिर उसमें पानी देना सब कुछ मैं अपने हाथों से करता था तो मुझे पता है कि कोई भी एक पौधा आप डालेंगे तो फिर उसका जतन कितना करना पड़ता है वहां जैसे कि यह फुदीना का पौधा मैंने डाला था अभी फुदीना क्या है कि वह आप चाय में डालेंगे तो बड़ा सुंदर टेस्ट आएगा उसका फिर मेडिसिनल क्वालिटी भी है फिर जैसे कि यह लेमन ग्रास है फिर यह तुलसी है फिर यह बहुत सुंदर फूलों के बहुत सारे पौधे थे तो सब समय में नए-नए पौधे लाकर के उसको रखता था वहां पर उसको वहां पर मिट्टी में वो रखता था बीज को या तो फिर पौधा का रोपा होगा तो रोपा को वहां पर बोता था और फिर उसका जतन करता था तो ऐसे ही ये किस तरह से हम छोटे पौधों का जतन करते हैं मां कैसे बच्चे का जतन करती है कितना प्रेम से उसको नहला जाएगी उसके वस्त्र पहनाए गी उसको उसको खाना खिलाएगी उसके बाद जो है वह ब्रश कर यह कर देगी कोम कर देगी उसको ब्रश करवा देगी छोटा बच्चा होता है तो वह तो असहाय होता है अपने से तो कुछ नहीं कर पाएगा डेढ़ साल का एक साल का जब होता है तब तो इसे बच्चे को मां कितना प्रेम से जतन करती है तो यह जो स्मृति कथाएं हैं उसको भी हमको अपने मन में जतन पूर्वक रखना है और उसको बार-बार दोहराना है इससे देखेंगे कि एक ऐसे जैसे फूल खिलता है तो उसकी सौर चारों ओर फैलती है उसकी सुवास तो कैसा वो वहां प जो बदबू होती है या और कुछ होता है सबको काट देती है अपने कमरे में भी देखेंगे कभी-कभी हम यह जो अगरबत्ती है धूप है यह घी का दिया है यह सब जलाएंगे तो घर में ऐसी सुवास फैल जाएगी घर का जैसे कि वातावरण ही बदल जाएगा यदि आपको घर को पवित्र करना है तो यह घी का दिया जलाना है बीच-बीच में कभी-कभी यह अगरबत्ती जलानी है धूप जलाना है तो यह प्रतिदिन करने से घर का भी देखेंगे कि वातावरण कितना सुंदर स्वच्छ रहता है तो यह अपने मन में भी यह सब कहानियों को रिपीट करके बार-बार रिपीट करके इसके ऊपर में चिंतन करके उसका मतलब उसको एक्सटेंड करके जो उसका परिप्रेक्ष्य है यदि इमेजिन करके कि वो आप यदि दक्षिणेश्वर गए होंगे तो देखा होगा कि मां के कमरे से अर्थात कि नबत से ठाकुर के कमरे की ओर जा ते हैं तो एक र आता है गंगा एक र होती है मां गंगा और फिर दूसरी ओर है यह सब सामने की ओर देखेंगे तो वह सब मंदिर काली मंदिर है अभी काली मंदिर दिखाई तो नहीं देगा बीच में ठाकुर का कमरा है किंतु काली मंदिर का जो शिखर है वह दिखाई देगा तो ऐसा इमेजिन करना है कि यह जो चांद है चांद की ज्योति इस काली मंदिर के शिखर के ऊपर में प्रसरण रही है और उससे जो एक शुभ्र प्रकाश फैलता है चारों ओर अभी आजकल क्या है कि हम लोगों को रात का जो आनंद है वह हमने गवा दिया है पहले के जमाने में ऐसा होता था कि चांद और तारे उसी का प्रकाश से पूरी रात झगमग थी ज्यादा से ज्यादा यह मशाल है या टॉर्च है यह सब जलाया जाता था कमरे के भीतर में यह दिया है या तो फिर आगुण ये यह सब कैंडल है यह सब रखा जाता था तो जैसे ही रात ही अंधेरा होता है जगत जैसे कि रुक जाता है जितना भी काम है किसान लोग खेत में काम करते थे वह जो ब्लैकस्मिथ है जो लोहे के साथ में काम करता है फिर वो कुंभार है जो कि मिट्टी का घड़ा वगैरह बनाता है यह जितने भी कार्य थे गांव में सब रुक जाते थे अंधेरे में कैसे काम करेंगे सब अपने अपने घर में आकर के वह शांति से बैठते थे अभी मैं कुछ दिनों पहले यहां पे एक ट्राइबल विलेज में गया था तो पहाड़ के ऊपर में बहुत ही इंटीरियर में है कितना लंबा रास्ता पार करके हमको वहां पे जाना था नहीं वह वहां पे कोई टावर मिल रहा है कि वह googleapis.com उनको पूछा हम लोग 10 बजे के आसपास पहुंचे सुबह को 6:00 बजे हम रवाना हो गए थे 10 बजे के आसपास में पहुंचे तो मैंने कहा था कि वह ब्लैंकेट डिस्ट्रीब्यूशन करना है तो वहां पर सबके लिए खाना बनाना तो गांव वाले सब आ जाते हैं तो गांव वाले बैठ कर के साथ में खाना खाएंगे तो गांव में उत्सव जैसा रहेगा कुछ तो मैं हम लोग गए आई थिंक 10:30 हो गए थे तो 10:30 को पहुंचे तो फिर मैंने पूछा कि अच्छा खाना वगैरह तो बनाया है तो वहां का जो अपना वॉलंटस बोला हां महाराज हम लोग तो खाना खा भी लिए मैंने कहा क्या बात करते हो सुबह का नाश्ता क्यों किया यह तो खाना बनाना मैंने बोला था दोपहर का तो वह बताता है नहीं नहीं हम लोग 10 बजे ही खाना खा लेते हैं हम लोग उनका दिन क्या है कि अपनी तरह घड़ी के अनुसार नहीं चलता उनका दिन चलता है यह सूरज के अनुसार तो जैसे ही प्रभात होता है ये लोग अर्ली मॉर्निंग 5:00 बजे उठ जाते हैं फिर अपना काम चालू कर देते हैं फिर 10 बजे तक उनका खाना बन करके रेडी हो जाता है 10 बजे खाना बनाएंगे फिर खेत में चले जाएंगे उससे पहले घर का गांव का जितना भी काम है समाप्त कर लेना है 10 बजे खाना खाके खेत में चले जाना है खेत में पूरा दिन काम करना है और जैसे ही सूरज पहाड़ के पीछे में डूबना शुरू हो जाता है 4:00 बजे के आसपास में सब लोग घर आकर के खाना खा कर के फिर 5:00 बजे 6:00 बजे तो अंधेरा हो जाता है तो 7:00 बजे ये लोग सो भी जाते हैं तो मैंने कहा देखिए कि कितना हेल्दी लाइफस्टाइल है इन लोगों का ये तो 7:00 बजे सो जाएंगे सुबह को 5:00 बजे उठ जाएंगे माने एक बच्चा एक बूढ़ा ऐसा नहीं होगा जो कि इस तरह अर्ली मॉर्निंग उठता नहीं होगा या अर्ली पहले जल्दी से सोता नहीं होगा अपनी शहरों की लाइफस्टाइल कैसी हो गई है बड़ी रात तक जगना 11 12 1 बजे तक फिर दिन में आराम से उठना 7:00 बजे 8 बजे इवन 9:00 बजे तक उसके बाद में हेवी ब्रेकफास्ट करना उसके बाद में 121 बजे भोजन करना फिर 56 बजे फिर से हेवी कुछ नाश्ता करना तला हुआ सब कुछ फिर रात को 10 बजे 900 बजे न कि ऐसा कुछ फिर से खाना खाना यह जो पूरा एक डिस्ट्रक्टिव लाइफस्टाइल है यह पॉसिबल क्यों है अभी अपने पास में सब कुछ आर्टिफिशियल आ गया है यह आर्टिफिशियल लाइट आ गई है यह आर्टिफिशियल लाइफस्टाइल है 24 घंटे का अपना दिन है यदि अ यहां पे रात है तो अमेरिका में दिन है तो आप यदि जॉब करते हैं खास करके आईटी में तो आपके जितने भी क्लाइंट होंगे रात को 121 बजे फोन करेंगे आपको उत्तर देना है तो यह अपनी लाइफ स्टाइल हो गई है तो पहले ऐसा था कि सूरज के साथ में सोना था सूरज के साथ में उठना था व एक नेचुरल लाइफ था जब अंधेरा होता था तो इतना निर्मल सुंदर प्रशांत अंधेरा हो जाता था सब काम बंद हो गया है जगत के ऊपर में जैसे कि सत्व छा गया है यहां पर तो रात को 9:00 बजे आप भले चाहे सोने का प्रयास करें जगत पूरा जग रहा है ट्रैफिक पूरा चल रहा है लोगों की जो तन मात्राएं हैं वाइब्रेशन से रजस के पूरे जगत में फैले हुए हैं आप कैसे बचेंगे कैसे अपने को बचाएंगे इस तरह की लाइफस्टाइल से तो देखिए कि अभी ऐसा तो नहीं है यह ऑप्शन अपने पास में नहीं है किसी के पास नहीं है कि शहर छोड़ कर के गांव में चले जाए वहां पे जाकर के बस है हां रिट्रीट के लिए कभी-कभी जा सकते हैं किंतु परमानेंटली नहीं जा सकते तो फिर अभी ये जो बाहर में जो संभव नहीं है वो अभी भीतर में करना है अभी वो वही इमेजिन करना है कि इस तरह से एक सुहानी रात दक्षिणेश्वर काली मंदिर के ऊपर में छा गई है वहां पर ठाकुर बैठे हैं अपने कमरे में यहां पर नबत में मां बैठी है या तो फिर मां भी ठाकुर के ही कमरे में बैठ कर के वो दोनों ध्यान मग्न है यहां पर नरेण है फिर राजा महाराज है फिर यह लाटू महाराज है बाबूराम महाराज वह सब बैठे हुए हैं और हम भी उनके साथ में बैठे हुए हैं यह जितना कल्पना का रंग इस चित्र के भीतर में हम भरते जाएंगे देखेंगे कि उतना ही यह जो कल्पना है जैसे कि जीवित हो जाएगी शुरू शुरू में लगेगा यह तो सब इमेजिनेशन ही तो है इमेजिनेशन में कहां इतना दम है किंतु देखिए कि यह इमेजिनेशन आप कोई मिथ्या इमेजिनेशन नहीं कर रहे सही सही में ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे सही सही में मां वहां पर थी सही सही में यह सब लीलाएं हुई है तो हमको तो सिर्फ अपने मन के द्वारा यह समय और अवकाश की सीमाओं को लांघ करके टू क्रॉस दिस बैरियर्स ऑफ स्पेस एंड टाइम हमको फिर वही दक्षिणेश्वर में पहुंच जाना है तो यह अपनी कल्पना के माध्यम से सर्वप्रथम करना है और जैसे-जैसे दिन जा ते जाएंगे वैसे-वैसे देखेंगे कि आपका भाव हमारा भाव इतना घनीभूत होता जाएगा कि यह सब हमको सत्य सत्य नजर के सामने दिखाई देगा यह जो गोपाल की मां यह जो ठाकुर की भक्त एक थी जो कि बाल गोपाल की पूजा किया करती थी फिर कुछ दिनों के बाद इतना मतलब प्राण ढल कर के इतना मन को एकाग्र करके बाल गोपाल की पूजा करती है कि कुछ दिनों के बाद में कुछ समय के बाद में उनको सही सही यह बाल गोपाल जीवंत दिखने लगा वह उसको बाल गोपाल को अपनी गोद में बिठा कर के जा रही है उसको खाना खिला रही है उसके साथ में वार्तालाप कर रही है वह जब कोई नटखट हरकत करता तूफान कुछ करता तो उसको डांट रही है यह सब उनको दिखता था फिर ठाकुर का वो जो राम लल्ला के साथ में व उनकी लीला की कहानी तो जगत प्रसिद्ध है राम लल्ला कुछ ऐसा कुछ करेगा तूफान करे कि ऐसा कुछ हरकत करेगा नटखट तो ठाकुर उसको डांट तो बेचारा रोना शुरू कर देगा तो यह देखिए कि ठाकुर और गोपाल की मां जो इमेजिनेशन अभी कहेंगे कि इमेजिनेशन शब्द यहां पर यूज करना ठीक नहीं है बेटर शब्द होगा उपासना तो यह उपासना जब करते थे तो उपासना का फल उनको जीवंत घनीभूत भाव के रूप में प्रत्यक्ष होता था तो यही सब प्रस ंग यही सब बैकग्राउंड यही सब इमेज सीनरी यही सब लोकेशन अपने मन में ऐसा बिठा दे कि जिससे कि हम भी इसके ऊपर में जब ध्यान करें इसका चिंतन करें तो अपने मन में से जितना भी कचरा है जितना भी टेंशन है जितना भी रिग्रेट है जितना भी शोक ताप है जितना भी यह ग्रीफ है जितना भी रेज है यह सब मन में से जैसे कि फ्लश आउट कर दे और मन को घनीभूत भाव से भर दे तो यह अभी बिंदु वासिनी चैप्टर समाप्त हुआ अभी सेकंड चैप्टर इसके बाद का प्रारंभ करते हैं इसका नाम है प्राण टान द अट्रैक्शन फ्रॉम द बॉटम ऑफ अवर हार्ट देखते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज इसमें क्या लिखते हैं महाराज जी कहते हैं नबत कार्ज बाप होता और श्री श्री ठाकुरर खण सानिध्य अथवा दूर होई ते दर्श ने परितृप्ति श्री मां के आमरा देखिया जीी हमने मां शारदा को देखा है मां शारदा क्या करती थी या तो फिर नहब में कार्य से व्यापत होती थी कार्य में मग्न होती थी या तो फिर ठाकुर का क्षण मात्र सानिध्य प्राप्त करके या तो फिर दूर से दूर से ही दर्शन करके परितृप्ति होती थी ऐसी मां शारदा को हमने अभी तक देखा है देखिए कि ठाकुर के बारे में जो कहा वह कितना सटीक है कितना सही है क्षण भर के लिए ठाकुर का दर्शन होता था जैसे ही वह योगिन मा ने अभी पिछले चैप्टर में कहा कि इन दोनों के बीच में है सिर्फ 50 हाथ का अंतर यानी कि ये 3040 फुट से ज्यादा का अंतर नहीं होगा किंतु फिर भी यह दोनों हो सकता है कि कभी छछ महीने में एक बार मुलाकात हो कभी-कभी ठाकुर के घर में कीर्तन चलता था तो ठाकुर रामलाल को क्या कहते थे यह नबत की ओर का जो दरवाजा है उसको खोल दो तो क्या है कि यहां का कीर्तन यहां का यह जो गान भजन वगैरह मां जद सुनेगी तभी तो उनको यह भक्ति लाभ होगा हालांकि मां को भक्ति लाभ ठाकुर के पास से प्राप्त हो ऐसा कुछ नहीं मां तो महामाया स्वयं है किंतु फिर भी यह जागतिक लीला है तो संसार में संसार में हमको शिक्षा देने के लिए जो लीला इन्होंने रचाई है एक जो स्वांग रचा है जैसे कि एक अभिनय कर रहे महामाया अभिनय कर रही है कि वह गांव की एक अनपढ स्त्री है और ठाकुर यह जो युग पुरुष नारायण स्वयं एक ऐसा अनु अभिनय कर रहे हैं कि वह एक गांव में छोटे से गांव में उन्होंने जन्म लिया है पढ़ाई लिखाई कुछ की नहीं सिर्फ काली के एक सामान्य पुजारी थे ऑफकोर्स उन्होंने इस मने जन्म के बाद में बहुत सारी उन्नति की किंतु यह स्वांग रचा है उन्होंने यदि हम लोग यह मानना शुरू शुरू कर दे कि हां महामाया और नारायण तो जो चाहे कर सकते हैं उससे हमको क्या है तो फिर हम उनसे सीखेंगे नहीं हम भी अपने जीवन को इस तरह से तपस्या में ढालेंगे नहीं तो यहां पे देखिए कि ठाकुर और मां रहते थे पासपास में दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में किंतु मने ऐसा होगा कि कितने लंबे समय तक उनका मुलाकात नहीं उनकी मुलाकात नहीं होगी मां को ठाकुर के दर्शन करने का सद्भाव प्राप्त नहीं होगा किंतु फिर भी यहां पर देखिए महाराज जी क्या लिख रहे हैं दूर ईते खण सानिध्य अथवा दूर ईते दोषों ने परि तृप्ता क्षणिक सानिध्य मिला है खाना लेकर के खाने का ट्रे लेकर के थाली लेकर के मां जाती है ठाकुर को खाना खिला के वापस आ जाती है कभी-कभी यह भी नसीब नहीं होता दूर से ही दर्शन कर लेती है किंतु इससे भी परितृप्ति है ऐसी मां के बारे में हमने पढ़ा है और देखा है किंतु वह तहर जीवन र एकटा अबा तर दिख मात्र किंतु यह उनके जीवन का एक एस्पेक्ट मात्र है उनका संपूर्ण जीवन यदि देखें तो ब्रह्मा और शक्ति एक अभेद जैसे वोह विज्ञानानंद जी की कहानी है ना वो महापुरुष महाराज के पास में एक डिवटी यह पांव रोटी और माखन लेकर के गया माखन का टन लेकर के मक्खन का तो फिर महापुरुष महाराज ने कहा यह मक्खन जो है वह विज्ञान महाराज को दे दो उनको खिलाने से ठाकुर को खिलाने जैसा ही व आपको आशीर्वाद प्राप्त होगा पुण्य प्राप्त होगा तो यह डिवोटा जाकर के विज्ञान महाराज को मक्खन का ये टीन देता है तो विज्ञान महाराज बिल्कुल बच्चे की तरह पूछते हैं सामने कि अरे पांव रोटी कहां है बिना उसके मैं कैसे मक्खन खाऊंगा तो इमीडिएट यह भक्त दौड़ा दौड़ा महापुरुष महाराज के पास में जाता है कहता है कि महाराज विज्ञान महाराज ने पांव रूटी मांगी है तो महापुरुष महाराज वो दे देते हैं फिर वह भक्त आता है पांव रोटी लेकर फिर यह विज्ञान महाराज क्या करते हैं एक हाथ में वो टीन मक्खन का दूसरे हाथ में पांव रोटी और फिर लेकर के हंसते हंसते कहते हैं यह है ब्रह्मा यह है शक्ति यह दोनों अभेद है एक साथ में ही रहने चाहिए अर्थात कि मखान और पांव रोटी एक साथ में ही रहेंगे अच्छा देखिए किंतु ये कहानी पढ़ के हमको यह ना हो जाए कि महा विज्ञान महाराज को खाने की ऐसी कोई वासना थी या इच्छा थी जब यह स्वामी जी के मंदिर का निर्माण कार्य जब चल रहा था समाधि मंदिर का या तो फिर यह राजा महाराज की समाधि मंदिर का तो उस समय वह बीच-बीच में अलाहाबाद से बेलूरमठ आकर के रहते थे तो महापुरुष महाराज उनकी सेवा के लिए अपने खुद के सेवक को भेज देते थे तो यह महापुरुष महाराज के सेवक क्या करेंगे दोपहर को या शाम को खाना लेकर जब विज्ञान महाराज के पास में जाएंगे तो विज्ञान महाराज को अर्थात स्वामी विज्ञानानंद ठाकुर के सन्यासी संतान और राम कृष्ण संघ के चतुर्थ प्रेसिडेंट तो जब विज्ञान महाराज आहार कर रहे हैं तोय सेवक महाराज लिखते हैं कि आहार कैसे कर रहे हैं जैसे कि लगता है वो आहुति दी श्यामा मां के अर्थात कि वो आहार कर रहे हैं मां श्यामा को श्यामा अर्थात कि काली को वो जैसे कि भोग धरा रहे हैं जैसे कि और किसी को खिला रहा है बिल्कुल जैसे कि उनका मन ही नहीं है खाने के भीतर में और जब सेवक महाराज पूछते थे खाना समाप्त होने के बाद में आहार कैसा रहा आपको यह तरकारी अच्छी लगी कि नहीं यह अच्छा लगा कि नहीं तो विज्ञान महाराज क्या उत्तर देते थे अरे दादा तुम लेकर आए और मैंने खा लिया अभी इसमें क्या अच्छा लगा क्या नहीं लगा यह सब प्रश्न पूछने से क्या लाभ है अ फिर ये सेवक महाराज वहां से चले जाएंगे और फिर वह कभी भी काम के लिए उनके कमरे में वापस आएंगे देखेंगे कि विज्ञान महाराज जब कंस्ट्रक्शन साइट पर नहीं होंगे खड़े उस समय अपने कमरे में खिड़की दरवाजा बंद करके अपनी चेयर में बैठे-बैठे ध्यान स्थ होंगे पूरा समय जैसे कि ध्यान में बिताते थे तो देखिए कि इन लोगों का जीवन बन गया उन्होंने ठाकुर और मां का दर्शन किया ठाकुर और मां के भाव से अपने हृदय को भर दिया तो अभी किंतु सब समय ध्यान स्थ होकर के बैठेंगे हमको शिक्षा नहीं मिलेगी इस तरह का वर्णन पढ़ते जाएंगे कि अच्छा सुबह को सेवक महाराज गए देखा महापुरुष महापुरुष महाराज है विज्ञान महाराज ध्यान में बैठे हैं दोपहर को गए फिर भी ध्यान में बैठे हैं शाम को गए तो फिर भी ऐसे ही भाव में भाव है तो फिर हम इससे क्या सीखेंगे मतलब हमारा तो एक चंचल मन है तो हमको एक रस चाहिए यह सब कहानियों से इसलिए फिर यह लोग ऐसी लीला करेंगे शिवानंद जी महाराज महापुरुष महाराज बोलेंगे ये मक्खन और पा देके आओ फिर यह विज्ञान महाराज कहेंगे कि अरे शिव और शक्ति अभेद है यह सब कहानियां होंगी तो वह हमारे मन को रस पहुंचाएगी सब समय यह लोग ध्यान में बैठे रहेंगे ठाकुर मां डायरेक्ट डिसाइल तो हमको सीखने को क्या मिलेगा या तो फिर कहेंगे कि हमारा जो चंचल मन है उसको आहार कैसे प्राप्त होगा तो हमारे चंचल मन को आहार देने के लिए खाना देने के लिए पौष्टिक आहार देने के लिए यह लोग यह सब लीला किया करते थे अच्छा दक्षिणेश्वर तिनी लेन पति सेवा जननो दक्षिणेश्वर में मां शारदा थी अपने पति की सेवा के लिए अर्थात कि ठाकुर की सेवा के लिए से सेवा के उपल कोरिया जे आत्म तृप्ति होई तो यहा मुख्य उद्देश्य छलो ना किंतु माथी वैसे ठाकुर की सेवा के लिए किंतु सेवा करके जो मां को आत्म तृप्ति मिलती थी वह इसका मुख्य उद्देश्य नहीं था जदी ताहा हैतो तबे नबत अशेष काय क्लेश ताहर मन एक दिन ना एक दिन विद्रोही होईया उठी तो जद अपने पति की ठाकुर की सेवा करके उनको जो आत्म तृप्ति आत्म प्रसाद आत्म शांति प्राप्त होती थी वही यदि उनके जीवन का उद्देश्य होता मां शारदा देवी का तो वह जो नबत के छोटे अल्प परिसर में छोटे से कमरे में रहना उनके लिए एक ना एक दिन बड़ा ही कष्टदायक बन जाता और वह उसके सामने विद्रोह पुकारती और उसके सामने विद्रोह करती कह बैठती ठाकुर को जाकर के कि अभी इतने छोटे से कमरे में मेरे से नहीं रहा जाएगा और कोई व्यवस्था कीजिए और ऐसी व्यवस्था की कमी भी नहीं थी महाराज जी क्या लिखते हैं उहा प्रति विधा निर उपाय अन्वेषण करीतो और यह छोटी सी अल्प परिसर जगह में नहीं रहना चाहती हूं बोलक के इसका कुछ उपाय प्रति विधान उसका वह खोज करती प्रतिकार एमन दुर्लभ छीलो ना और इस तरह का विरोध इस तरह का एक विद्रोह करके व नबत में से चले जाना दूसरी जगह खोजना रहने के लिए जहां पर रहना थोड़ा सा आरामदायक हो सुकून दायक हो वह खोजना कोई मुश्किल नहीं था कारण दक्षिणेश्वरी अदूरे शंभू बाबू निर्मित पृथक गृह छीलो क्योंकि दक्षिणेश्वर के पास में ही शंभू बाबू ने मां के लिए एक अलग निवास बना कर के दिया था वह कहानी हमने पूरी पढ़ी थी इसके पहले वाले चैप्टर में कि किस तरह से मां को वहां पर रहने में असुविधा हो रही है यह समझ कर के ठाकुर के यह रसदार शंभू मलिक उसने कहा कि मैं आपके लिए वहां पर घर बना दूंगा दक्षिणेश्वर गांव में फिर यह जो कैप्टन था विश्वनाथ उपाध्याय उसने कुछ लकड़ियां भेजी लकड़ियां गंगा के किनारे प वह बांध कर के रखी थी गंगा में ही तो वह कैसे ही एक जवार आया लकड़ियां सब बह गई फिर हृदय ने जाकर के मां को कहा कि तुम्हारा भाग्य मंद है माने हृदय की अवनति शुरू हो गई थी दक्षिणेश्वर से जाने का समय हो गया था विनाश काले विपरीत बुद्धि कहते हैं ना तो हृदय का अंतिम समय आ गया था दक्षिणेश्वर में तो यह सब मां को जाकर के इस तरह से कटु वचन किए कहे उसके बाद में वह किंतु कैप्टन ने फिर से लकड़ियां भेज दी फिर मां का घर निर्माण हुआ फिर मां और यह हृदय की पत्नी दोनों वहां पर रहते थे किंतु उसी समय कुछ दिनों के बाद में ठाकुर इतने बीमार हुए कि फिर उनकी सेवा करने के लिए मां को दक्षिणेश्वर काली मंदिर में वापस आना पड़ा वह एक महिला थी वह कहीं काशी से ना कि कहीं से एकाएक आ पहुंची शुरू में तो उसने ठाकुर की सेवा की फिर किंतु उसने देखा कि सब सेवा वह ठाकुर अपने से व खुद नहीं कर पाएगी मां की भी जरूरत होगी तब उसने कहीं जाकर के मां को कहा कि मां आप इस समय ठाकुर की बीमारी के समय यदि दक्षिणेश्वर में नहीं रहेंगे तो कैसा रहेगा तो फिर काली मंदिर में यदि नहीं रहेंगे तो कैसा लगेगा तो फिर मां खुद अपने से ही काली मंदिर में वापस आ गई थी तो यहां पर देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं कि यदि मां की सेवा करने के लिए यदि मां को वहां पर काली मंदिर में असुविधा होती और उनका मन विद्रोहियों इटली ठाकुर को कह कर के ठाकुर परमिशन देके ना दे वह सीधा वह शंभू बाबू निर्मित जो घर था वहां पर चली जा सकती थी आबार आपना के नबत एकांतो पिंजरा बद्धो ना राखी लेओ ते मन आपत्ति कोरार के हो मंदिरो ध्यान छीलो ना और जदी मां जदी अपने को ये पिंजरा बद्ध नहीं रखती यह जो नबत रूपी पिंजरे में आबद्ध नहीं रखती नबत रूप पिंजरे में अपने को पूर करके नहीं रखती तो कोई आपत्ति करने वाला नहीं था मां जद शंभू बाबू निर्मित घर में चली जाती तो ठाकुर भी आपत्ति नहीं करते एक्चुअली ठाकुर की सहमति होती तभी तो यह शंभू बाबू ने मां के लिए घर निर्माण किया होता ठाकुर की जद असहमति होती ठाकुर यदि ना कह देते बिल्कुल पहले से ही कि नहीं मां सिर्फ यहीं पर रहेगी पास में ही रहेगी तभी मेरी ठीक-ठीक सेवा होगी यदि ठाकुर पहले से ही ऐसा कहते तो शंभू बाबू वह दूसरा घर बनाते ही नहीं तो ठाकुर की सहमति तो थी और फिर दक्षिणेश्वर में ऐसा कोई नहीं था यदि कहता कि ना मां को कंपलसरी नबत में रहना ही पड़ेगा ऐसा तो कोई था नहीं तो फिर मां जदी वहां से चली भी जाती तो विरोध करने वाला वहां पर कोई नहीं था जहां हो किंतु जो भी हो यहां अमाद प्रधान आलोच्य विषय नहीं यह हमारा आलोचना करने का प्रधान विषय नहीं है मरा वर्तमान अध्याय श्री मायर पति शवार एवं तहरी अनुगामी भक्तो शवार अनुसरण करी हम इस वर्तमान अध्याय में इस चैप्टर में मां की पति सेवा अर्थात की ठाकुर सेवा और पति सेवा के रिलेटेड ही ठाकुर सेवा के रिलेटेड ही भक्त सेवा का ही अनुवनऊवू पाइबो सेवा निरत श्री मां का दर्शन हमको पहले भी मिला है बाद में भी मिलता रहेगा एखाने प्रधान तो भक्त समागम ओ श्री श्री ठाकुर कंठ रोगर समय मध्य अमाद दृष्टि निबध राखीबो यहां पर हम उसी पीरियड के बारे में चर्चा करेंगे उसी कालखंड के बारे में चर्चा करेंगे जबकि वह ठाकुर के प्रधान भक्तों का आना शुरू हो हो गया है और ठाकुर का कंठ रोग अर्थात कि ठाकुर का कैंसर अभी प्रारंभ नहीं हुआ है यह कौन सा समय हुआ 18792 में देखें तो मास्टर महाशय है नरेण है राजा महाराज है उन सबका आगमन शुरू हो गया था और 1885 अर्थात कि 1885 के अंत में फिर ठाकुर के गले के रोग का सूत्रपात हुआ था तो यह ऑलमोस्ट 5 साल का यह जो पीरियड है 6 साल का यह जो पीरियड है उसी के बारे में हम यहां पर चर्चा करेंगे रामकृष्ण संघ का सुवर्ण युग जब भी ठाकुर भी दक्षिणेश्वर में थे मां भी दक्षिणेश्वर में थी और एक के बाद एक उनके जितने भी अंतरंग भक्त थे यह बलराम बाबू हो न कि ये मास्टर महाशय हो योगेन मां हो गोलाप मां हो या तो फिर यह स्वामी जी राजा महाराज निरंजन महाराज यह सब एक के बाद एक आकर के दक्षिणेश्वर में एकत्रित हो रहे थे मिलित हो रहे थे वो सुवर्ण युग की यह कहानियां इस चैप्टर में उसका लिपिबद्ध होगी श्रीमा जतोग ना दक्षिणेश्वर आशिया ठाकुरे सेवा भार स्व हस्ते ग्रहण करिया लेन ततो दिन हृदयादी उपर निर्भर करिया ठाकुरे दिन एक एकरूप चोलिया जाते छलो जब तक मां ने दक्षिणेश्वर में आकर के ठाकुर का सेवा भार ग्रहण नहीं किया था तब तक हृदय है फिर यह रामलाल है इनके ऊपर में निर्भर करके ठाकुर के दिन कैसे भी करके चले जाते थे बीत जाते थे किंतु साधना शेषे तहर परिपाक शक्ति ह्रास पावर संगे संगे दैव निर्देश श्रीमा दक्षिणेश्वर आशिया पड़ा एवं हृदय के मंदिरो ध्यान ईते बिता ड नेर पर श्री मायर प्राण ढाला सेवाय ठाकुरे शारीरिक उन्नति ई ठाकुर अतः पर अनेकांत ताहर ऊपर निर्भर करी तेन किंतु साधना के अंत में ठाकुर की पाचन शक्ति थी ठाकुर की जो शारीरिक शक्ति थी उसका धीरे-धीरे रास हुआ व कम होती गई और फिर साथ में ही जैसे कि ईश्वर की इच्छा कह ने कि क्या कहो हृदय को दक्षिणेश्वर के मंदिर उ ध्यान में से भगा दिया गया श्री मां पर मोरर लेस परमानेंटली दक्षिणेश्वर में आकर के रहने लगी और उन्होंने प्राण ढाल कर के ठाकुर की सेवा की और फिर मां की सेवा की वजह से ठाकुर की शारीरिक उन्नति होना शुरू हुई स्वास्थ उन्नति होना शुरू हुई और इसकी वजह से ठाकुर संपूर्ण रूप से अनेक हद तक बहुत अद तक मां के ऊपर में निर्भर शल होकर के रहते थे देखिए ठाकुर जब साधना कर रहे थे उस समय का विवरण तो हमको पता है कि कभी खाना भी नहीं खाते थे खाना पना सब भूल जाते थे हृदय को ही उनकी पूरी संभाल रखनी पड़ती थी ठाकुर ने कहा है मां अपने बच्चे का जिस तरह से जतन लेती है 1 साल का अबोध बच्चा उस तरह से हृदय उनकी संभाल रखता था उनकी केयर करता था क्योंकि साधन जगत में पूरे ही परिवर्तन के बाद में ठाकुर को किसी चीज का होश नहीं था अपने देह का होश था ना कौन से वस्त्र पहने हैं उसका होश था अपने शरीर की रक्षा भी वह नहीं कर पाते थे इसलिए हृदय की जो सेवा थी साधन समय वह बड़ी ही अमूल्य थी किंतु फिर देखिए कि हमने देखा कि विनाश काले विपरीत बुद्धि हृदय का जो भी नसीब है सत्कर्म था जो भी कहो वह सब धीरे-धीरे समाप्त होने लगा ठाकुर से उसने ज्यादा कुछ सीखा नहीं मां का जब प्रथम प्रथम आगमन हुआ तो मां को वह कटु वचन सुनाने लगा मां का अपमान करने लगा और इसी वजह से आखिर में उसको दक्षिणेश्वर मंदिर में से जाना पड़ा उसको भगा दिया गया फिर मां जब वहां पर नियमित रूप से रहने लगी और ठाकुर के लिए अपने हाथों से ठाकुर की ठाकुर का स्वास्थ्य देख कर के ठाकुर की रुचि देख कर के ठाकुर का मन समझ कर के ठाकुर के लिए जब आहार प्रस्तुत करने लगी और खुद ठाकुर के पास में बैठ कर के उनको खिलाती ऐसा ना हो कि वह यदि खाना रख के चली जाएगी ठाकुर तो दूसरी ही क्षण भाव में चले जाएंगे समाधि में चले जाएंगे खाना वैसे ही पड़ा रहेगा तो ऐसा नहीं ठाकुर के पास में बैठती सब दुनिया भर की बातें करके ठाकुर के मन को इस जागतिक जगत में रखती देखती वह खाना खा रहे हैं कि नहीं फिर वो वहां से जाती तो ये जितना केर केयरफुल मां उनकी संभाल लेती थी उसकी वजह से ठाकुर की स्वास्थ्य उन्नति होने लगी उनका हेल्थ इंप्रूव होने लगा और इसीलिए धीरे-धीरे करके ठाकुर मां के ऊपर में निर्भर शल होना शुरू हो गए यह जो ठाकुर और मां का यह खाने के समय किस तरह का वार्तालाप होता था एक बार ठाकुर मां को कहते हैं कि मैं तो बूढ़ा होने वाला नहीं हूं मैं मैं यह नहीं चाहता मेरे बाल सफेद हो जाए मैं पहले ही यहां से चल बसू तो मां थोड़ी टेंशन में आ गई फिर वो ठाकुर को जैसे बच्चे को समझाते हैं ना व वसे वो मां ठाकुर को कहती है कि अरे तो जब उम्र आपकी ज्यादा होगी तो ये लोग ऐसा थोड़ी ना कहेंगे कि वहां पर एक वृद्ध साधु रहते हैं या वहां पर एक बूढ़ा रहता है लोग तो कहेंगे कि काली मंदिर में एक प्रवीण साधु रहते हैं अभी देखिए मां की वो गांव की भाषा प्रवीण अर्थात कि वयो जेष्ठ अर्थात कि जो उम्र में बड़ा है वडील है उनको प्रवीण कहते हैं जो उम्र में और बुद्धि में दोनों में परिपक्व है उसको प्रवीण कहते हैं तो प्रवीण नहीं बोल कर के मां बोलती है पिर बिन लोकेरा बोल ज कालीबाड़ी ते एक दिन पिर बन साधु आछ लोग कहेंगे काली मंदिर में एक पीर बन साधु है तो फिर ठाकुर बोलते हैं बच्चा जैसे मां के साथ में कभी-कभी नाराज हो जाता है तो कैसा वो नाराजगी के सुर में कहता है तो वैसे ही यहां पर ठाकुर भी मां को कहते हैं आमी तोमार पिर बिन टरबीन होते जावो ना मैं तुम्हारा पिर बिन टरबीन होने वाला नहीं हूं होने जाने वाला नहीं हूं तो देखिए कि इस तरह से ठाकुर को भुला भुला करके मां खाना खिलाते थी तो ठाकुर भी धीरे-धीरे करके छोटा बच्चा अपनी मां के ऊपर में कैसा निर्भर शल हो जाता है मां खिलाएगी तो वह खाएगा मां जद केयर करेगी तो वह ठीक रहेगा वो ऐसा करके मां के ऊपर में ठाकुर धीरे-धीरे करके निर्भर शल होना शुरू हो गए थे कोन कारणे श्री मां अन्नत गेले बालक स्वभाव ठाकुर आपना के विपन्न मने कोरी तेन यदि किसी भी कारण से मां को वहां से जाना पड़ा काली मंदिर से बाहर में तो ठाकुर जैसे बिल्कुल बालक की तरह अपने को एकदम जैसे कि विपन्न अर्थात कि दिशे हारा अर्थात कि असहाय महसूस करते थे बच्चा जद मां चली जाएगी तो बच्चा चारों ओर अभी जैसे कि वो विवाह प्रसंग है ना कि ऐसा कोई भी प्रसंग है उसमें बच्चा अपनी मां की उंगली पकड़ कर के जाता है फिर अभी मां जद इधर-उधर कुछ हुई किसी के साथ में बात कर रही तो छोटा बच्चा कैसे टेंशन में आ जाएगा अरे मां कहां गई मां कहां गई तो वैसे ही ठाकुर का भी मां जदी मां शारदा इधर-उधर कहीं पर जाती तो बिल्कुल छोटे बच्चे की तरह अपने को असहाय महसूस करते थे एवं तहा के दक्षिणेश्वर आनाई ते अति मात्र व्यस्त हुया पड़ी तेन और मां को फिर दक्षिणेश्वर में ले आने के लिए बिल्कुल बच्चे की तरह अधीर हो जाते व्यस्त हो जाते कहते कि वह कहां है कैसे भी करके उसको बुला जैसे कि वह एक बार मां दक्षिणेश्वर आई फिर हृदय ने मां का अपमान किया कहा कि यहां पर क्यों आई हो क्या करने के लिए आई हो तो ठाकुर तो बेचारे उस समय कुछ बोल नहीं पाए और इसको लेकर के हमने काफी डिस्कस भी किया है कि ठाकुर ने क्यों अपनी नजर के सामने यह सब होने दिया जो भी है अभी ठाकुर कुछ बोले नहीं और श्यामा सुंदरी देवी अर्थात की मां शारदा की गर्भधारिणी मां तो उन्होंने कहा कि मैं यहां पर किसके पास में अपनी बच्ची को छोड़ के जाऊंगी बोलकर के वह मां शारदा को लेकर के चली गई अभी उसकी घटना के कुछ दिनों के बाद में हृदय को काली मंदिर से जाना पड़ा वह त्रैलोक्य बाबू की बच्ची का वह कुमारी पूजा के कुमारी के रूप में पूजा की थी तो यह लोग डर गए कि ब्राह्मण है अब ब्राह्मण की कन्या की पूजा करेगा तो पाप लग सकता है उनको बोलकर के उन्होंने क्रोध में हृदय को भगा दिया इसके बाद में ठाकुर वह वहां पे पत्र लिखते हैं जयराम बाटी में जितने भी लोग पत्र तो नहीं किंतु दक्षिणेश्वर से जितने भी लोग कामर पुकुर जयराम बाटी में जाएंगे उनके माध्यम से यह मैसेज पहुंचाएंगे तुम कैसे भी करके यहां पर आओ यदि बेलगाड़ी में बैठ के आना चाहती हो बेलगाड़ी में यदि पालखी में आना चाहती हो पालकी में यदि ₹ लगेगा यदि ₹ भी लगेगा तो मैं दूंगा किंतु कैसे भी करके तुम यहां पर आओ तो देखिए कि ठाकुर इस तरह से कहते हैं कि जद ₹ लगेगा यदि आपको वहां से यात्रा करने में पैदल नहीं आना है बेलगाड़ी में आना है पालकी में आना है जितना रुपया लगेगा मैं दूंगा सब तरह का प्रलोभन दिखा रहे हैं ठाकुर कि कैसे भी करके तुम दक्षिणेश्वर में आओ तो यहां पे महाराज जी लिखते हैं मां जैसे ही जद जयराम बाटी कामर पुकुर जाती या यदि किसी कारण के वजह से कोलकाता में जाना होता और कहीं पे जाना होता ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह अधीर हो जाते और कैसे भी करके मां को दक्षिणेश्वर वापस ने के लाने के लिए व्यस्त हो पड़ते देह बुद्धिहीन जुगा वतार ई प्रकार लीला तात्पर्य मानव बुद्धिर अगम होले हो अर्थात की देह बुद्धि विरहित अवतार की इस तरह की लीला का तात्पर्य हमारी मनुष्य बुद्धि के अगोचर मनुष्य बुद्धि के अगम अगम्य होने पर भी श्री माय चरित्र ध्यान अग्रसर होया आमा देर सहज होई जे ताहर पति सेवा सफल हैया छीलो हमको पता नहीं है कि जिसकी देह बुद्धि नहीं है जिसका अपने शरीर के ऊपर में तनिक भर भी ध्यान नहीं है ऐसे युग अवतार ठाकुर की इस तरह की लीला का बालक बुद्धि का बालक लीला का क्या तात्पर्य है किंतु यह चाहे हम समझ ना भी पाए अपनी मोटी बुद्धि से तो भी हमको इतना तो समझ में आता है कि मां जिस तरह से ठाकुर की सेवा करती थी वह सेवा अवश्य सफल हुई है सदा समाधि मग्न महामानव महामानव ओ श्री अनुपम सेवा मर्यादा मुक्त कंठे स्वीकार करते बाध्य होया चले सदा समाधि मग्न महामानव सदा समाधि मग्न शिव स्वयं य अनुपम सेवा की जो महत्ता है वह मुक्त कंठ से बिना किसी हिजक के हिजक जिजकॉम मजबूर हुए थे बाध्य हुए थे श्री मा नारायणर पद प्रांत उपविष्ठा लक्ष्मीर न्याय श्री श्री ठाकुरर पाद संवाहन करी तेन श्री मां जैसे कि नारायण के सामने श्री लक्ष्मी स्वयं बैठ कर के उनके पैर दबाती थी वैसे ही मां अपने पति के पैरों की सेवा करती थी स्नानेर पूर्वे तहर अंगे तैल मर्दन करी तेन स्नान के पहले ठाकुर को तेल मालिश कर दिया करती थी एवं देहर अवस्था बुजिया रुचिकर और पुष्टिकर आहार ज प्रस्तुत करिया कावा तेन और ठाकुर के शरीर की अवस्था को समझ करके ठाकुर को जो अच्छा लगता है रुचिकर है और जो पुष्टिकर है और जो स्वास्थ्य नति के लिए अच्छा है पोषक आहार है ऐसा आहार प्रस्तुत करके ठाकुर को खिलाती थी फलत आपना समस्त सुख छंद भुलिया तिनी तखन शरबतो भावे श्री राम कृष्ण मय होया लेन और अपना खुद का जितना भी कंफर्ट है सुख है स्वच्छंद है सबको भूल कर के श्री मां शारदा देवी संपूर्ण रूप से श्री राम कृष्ण मय हो गई थी ई नितांत तद एक शरण देवी के भूलिया थाका संसार संपर्क सुन्न श्री राम कृष्णर पखे बोध होय संभव लोना यह संपूर्ण रूप से शरणागत देवी को भूल कर के संसार को संसार से जिसका संपर्क संपूर्ण शून्य हो गया है वैसे श्री रामकृष्ण के लिए भी इस तरह से मां को भूलना सहज नहीं था संभव नहीं था मायर शेबा और ठाकुरर य दृष्टांत य निर्भरता दृष्टांत तो बरल न है मां की यह सेवा और ठाकुर की उनके ऊपर में निर्भरता इसके दृष्टांत विरल नहीं है इसके बहुत सारे दृष्टांत है और वह दृष्टांत क्या है किस तरह से मां ठाकुर की सेवा करती थी उसमें आदर्श का कभी-कभी क्लेश भी कैसे होता था एक आदर्श को ठाकुर किस दृष्टि से देखते थे मां किस दृष्टि से देखती थी वह भी एक बड़ा ही मनोरम एक सुंदर विवरण है जो कि गंभीरानंद जी महाराज इसके बाद में करने वाले हैं वह एक लंबा विवरण है कल से हम उसको प्रारंभ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु