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श्री मां शारदा देवी अभी तक हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर और मां के विवाह के बारे में और जो शुरुआत के दिन है कि जब मां जयराम बाटी में रहती थी ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे तो ठाकुर आया आना जाना करते थे एक बार आए थे दो बार आए थे पहली बार तो विवाह हुआ था मां के साथ में और फिर जब आए थे तो मां को जयराम बाटी से कमार पुकुर बुलाया था कमार पुकुर अर्थात की ठाकुर का गांव और जयराम बाटी अर्थात की मां का गांव और ठाकुर अपने से रहा करते थे दक्षिणेश्वर में कोलकाता में तो कोलकाता से कामर पुकुर आते थे जाते थे और मां को जब भी कामर पुकुर आते थे जयराम बाटी से मां को कामर पुकुर बुलाते थे यह सब एक के बाद एक घटना हुई उसके बाद में हमने देखा कि मां जयराम बाटी में है अपने पति अपने ठाकुर दक्षिणेश्वर में उनके बारे में ऐसी सब चित्र विचित्र घटनाएं उनको सब सुनाई दे रही है तो मां बेचारी मन में ही मन में सोचती है कि अरे ठाकुर के बारे में लोग जो इस तरह की बातें करते हैं वो बातें सही होगी कि भी नहीं किसको पता तो मां बेचारी यह सब सोच रही है तो फिर मां ने एक बार ठीक किया चलो कलकाता जाक के अपने से ही देख लेते हैं तो अपनी कुछ संगी नियों के साथ में और अपने पिताजी जी रामचंद्र के साथ में मां कोलकाता आने के लिए रवाना हुई रास्ते में मां को बुखार हो गया और वहीं पर मां बेबस ससी हुई पड़ी हुई है कि इतना बुखार है चल भी नहीं पा रही पिताजी बेचारे असहाय होकर के बैठे हैं सोच रहे हैं क्या से क्या अभी नहीं हो जाएगा और अनजाना प्रदेश है उस समय एक और एक स्त्री आकर के मां के पास में बैठी काले कलर का उसका शरीर का व रंग और आकर के बड़े ही मृदु सर से मां के साथ अपने हाथ बड़े ही जत्न पूर्वक मां के सर के ऊपर में शरीर के ऊपर में फैलाने लगी मां एकदम आश्चर्य चकित होक के पूछ उठी कि आप कौन है कहां से आई है तो उन्होंने कहा कि अमी तुमार बोन मैं तुम्हारी बहन हूं और दक्षिणेश्वर से आई हो मां ने पूछा अरे मैंने भी सोचा था मैं दक्षिणेश्वर जाऊंगी उनकी सेवा करूंगी उनकी उनको देखूंगी उनके साथ रहूंगी किंतु ऐसा तो हुआ नहीं तो उस स्त्री ने क्या कहा अरे तुमको दक्षिणेश्वर जाना ही है तुम्हारे लिए ही तो मैंने उनको वहां पर बिठा के रखा है देखिए कितना गहन तात्पर्य इस छोटे सी वाक्य में और इस छोटी सी घटना में है जो स्त्री जिसने आकर के मां को शांतना दी मां का जो बुखार है उसको शांत कर दिया वह थी मां काली स्वयं और वही मां काली ने ही ठाकुर को दक्षिणेश्वर में बिठा के रखा था जिससे कि मां शारदा वहां पर जाए शिव और शक्ति का मिलन हो और सनातन भारतीय हिंदू संस्कृति अपना वेदांत धर्म फिर से इस जगत में अपने पेर पसारे अपने पंख पसारे हालांकि धर्म सनातन धर्म स्वामी जी ने एक बार बहुत ही सुंदर बात कही थी कि ऐसा एक भी समय नहीं है जबकि एक कोई ना कोई एक ब्रह्मज्ञानी भारत की पृथ्वी पर विचरण ना करता हो डबल नेगेटिव उन्होंने यूज किया है यदि इस सेंटेंस को थोड़ा सा सरल करें तो स्वामी जी कहते हैं हमेशा कोई ना कोई एक ब्रह्मज्ञानी तो भारत की इस भूमि पर विचरण करता ही रहा है भले ही चाहे हम बाहर से इतने सारे आक्रमण हो गए भले ही चाहे हमारी हिंदू सभ्यता लुप्त प्राय होने को बैठी है भले ही चाहे हम हजार साल तक गुलाम रहे किंतु ऐसा एक भी साल नहीं होगा एक भी समय नहीं होगा जबकि कोई ना कोई एक ब्रह्मचारी ब्रह्मज्ञानी का भारत की इस धरती पर उदय ना हुआ हो क्योंकि यह ब्रह्मज्ञान की यह जो स्प्रिया है ब्रह्म ज्ञान की यह मुमुक्षु तोव है ब्रह्म ज्ञान का यह हमारी हिंदू प्रजा में सनातन काल से चला आ रहा है जैसे स्वामी जी कहते हैं कि पश्चिम की प्रजा को देखो और हम हमारी प्रजा को देखो पश्चिम में क्या है उन लोगों की एक क्यूरियोसिटी है कि इस प्रकृति के ऊपर में कैसे विजय प्राप्त किया जाए पहले तो है कि प्रकृति को कैसे समझा जाए उसके बाद में है कि प्रकृति के ऊपर में कैसे विजय प्राप्त किया जाए और हमारा है भारतीय परंपरा का कि यह जो इनर प्रकृति है आंतरिक प्रकृति उसको कैसे समझा जाए और उसके ऊपर में कैसे विजय प्राप्त किया जाए अर्थात कि हम दोनों की एक तरह से है तो बेसिक एंबिशन एक ही है समझना और उसके ऊपर में विजय प्राप्त करना किंतु वही है कि पश्चिमी प्रजा बाह्य प्रकृति को उसके ऊपर में विजय प्राप्त करना चाहती है हम हिंदू अपनी आंतर प्रकृति के ऊपर में विजय प्राप्त करना चाहते हैं अभी यह जो स्वामी जी विदेश में जाते थे तो कभी कभी कोई लोग कहते हैं कि आपके हिंदू फकीरों को हमने देखा अपने शरीर को इतना कष्ट देते हैं ये तो एक एक पशु वत एक आचरण हो गया क्यों अपने शरीर को इतना कष्ट देते हैं व जो लोहे के यह जो ये होते हैं नेल खिले उसकी पथरी पर यह लोग सो जाते हैं अपने शरीर पर चाबुक मारते हैं वो कभी-कभी एक हाथ ऊपर रख कर के तपस्या करेंगे कभी-कभी अनाहा रहेंगे उपवास करेंगे फास्टिंग करेंगे इतना शरीर को कष्ट देना ये तो पशु वत आचरण हो ग ये तो धर्म थोड़ी ना हुआ तो स्वामी जी क्या कहते हैं बहुत सुंदर उत्तर देते भाई हम लोग जो कष्ट देते हैं तो हमारे ही शरीर को देते हैं ना तुम लोग तो दूसरों को कष्ट देते हो यह जो इनक्विजिशन रूपी एक महा भयानक एक दानो राक्षस समूह मने एक राक्षस जैसा एक विचार ये कैथोलिक चर्च में प्रकट हुआ था कि हां जो ऐसे कुछ लोग हैं जिनका धर्म प्योर है और ऐसे कुछ लोग हैं जिनका धर्म इंपोर है या तो फिर वोह लोग शैतान से वे लोग प्रभावित हो गए हैं तो जो लोगों को शैतान ने प्र भावित किया है वो लोग विच या तो फिर डायन ना कि यह सब मने इस तरह के कोई है तो उनके शरीर पर अत्याचार किया जाए उनको टॉर्चर किया जाए उनको फांसी उनको जला दिया जाए जिंदा जला दिया जाए यह जो इनक्विजिशन बोल करर के पूरा चालू हुआ था खास करके स्पेन वगैरह में वहां पे कितने ही लोगों को जिंदा जला दिया गया था इनक्विजिशन कोर्ट होती थी वहां पर हाई इनक्विजिटर बोलकर के एक जज बैठा करता था वो ठीक करेगा कि आपका धर्म सही धर्म है कि गलत धर्म है यदि आप गलत धर्म का पालन करते हैं तो आपको जेल में डाल देंगे पिटाई करेंगे क्या से क्या नहीं करेंगे आखिर में जिंदा स्टेक के ऊपर में जला देंगे तो यह सब जो आप लोग कर रहे हैं दूसरों को कष्ट देना तो ऐसा तो हम नहीं करते हम अपने ही शरीर को कष्ट देते हैं इस आशा में कि हमारे भीतर की जो इंप्योरिटीज है वह चली जाए जैसे कि अग्नि में लोहे को जलाते हैं तो लोहे के भीतर की इंप्योरिटी कैसी चली जाती है वैसे ही वी आर टेंपरिंग अवर सोल वी आर टेंपरिंग अवर माइंड इन ऑर्डर टू फ्री इट प्यूरीफाइड फ्रॉम ऑल द इंप्योरिटीज तो यह है हमारा भारतीय सनातन संस्कृति इसी संस्कृति की पुनः स्थापना करने के लिए आवश्यक था कि शिव और शक्ति का फिर से मिलन हो जो हजारों करोड़ों सालों पहले जो अपने पुराणों में जो कुछ हुआ था वही घटना वली का फिर से इस रंग मंच के ऊपर में अभिनय हो तो इसीलिए मां को वहां पर जाना है ठाकुर के साथ में रहना है और उसके बाद में जो सबसे महत्त्वपूर्ण घटना अपने संघ की अपने भारतीय धरोहर की सड़सी पूजा वो आकर के खड़ी होने वाली है तो मां काली ने मां शारदा को कहा मैं बीमार होकर के बुखार से त्रस्त वहां पर सोई हुई है रास्ते में कि तुम जाओगी और तुम्हारे लिए यही उनको वहां पर अटका के रखा है मां मां सुस्त हो गई दक्षिणेश्वर आई ठाकुर के साथ में मिलन हुआ ठाकुर वैसे तो बड़े ही चिंतित हो गए कि अरे मां बीमार है तो मां के लिए जो ट्रीटमेंट करने की जो कोई भी व्यवस्था थी वो तो ठाकुर ने करना शुरू कर दिया किंतु फिर भी जो एक पॉइंट हमने पिछली बार देखा था और यह पॉइंट बार-बार रिपीट होगा मां की जब बात पढ़ेंगे तो ठाकुर का कुछ कुछ भी बिहेवियर क्वेश्चनेबल हमको दिखेगा इस तरह से कि मां को जो उचित सम्मान देना चाहिए वह नहीं देते और ऐसा क्यों इस बात का कोई उत्तर हमारे पास में नहीं है जैसे ही मां सर्वप्रथम दक्षिणेश्वर आई अपनी नौका में से गंगा से गंगा के रास्ते से दक्षिणेश्वर आए थे तो नौका में से जैसे ही चांदनी घाट पर वह उतर रही है उसी समय उनको क्या सुनाई दिया कि ठाकुर हृदय को कहते हैं कि अरे हृदय बार बेला नहीं है तो पहली बार आ रही है अभी बार बेला अर्थात की एक अशुभ मुहूर्त तो अशुभ मुहूर्त में तो नहीं आई तो अभी हमको प्रश्न होगा कि जगत जननी स्वयं जिस मुहूर्त में आकर के पधारी है उपस्थित होती है वो मुहूर्त यदि अशुभ भी होगा तो शुभ हो जाएगा मुहूर्त जिसके कंट्रोल में है जो मुहूर्त को वो घुमा देने वाली जो जगत जननी जगदंबा स्वयं उनको फिर महूर से क्या लेना देना किंतु फिर भी ये ये लीला है हम सभी के क्या हम सभी के कल्याण के लिए हम सभी की शिक्षा के लिए तो ठाकुर ये सब चीजों में मानते थे क्यों मानते थे समझ में नहीं आ रहा मैंने खुद ने और सिर्फ मां की बातों में ही नहीं ठाकुर की खुद की बातों में बहुत बार यह सब मैंने देखा है कि ठाकुर एक दिन सुबह कथामृत में कहते हैं कि एक दिन सुबह को उठ कर के मैंने सोचा कि राखल आ रहा है बोलकर के किसी का चेहरा देख लिया अभी उसका चेहरा ऐसा अप शुकन है वाला है कि पूरा दिन अभी गड़बड़ गड़बड़ हो रहा है अभी ठाकुर ने ऐसा इतना डिटेल में तो नहीं कहा ऐसा कहा किसी का चेहरा देख लिया तो अभी बाकी सब लोग हंसने लगे यह बात सुनक के तो हमको प्रश्न होता है कि अरे भाई वेदांत तो कहता है कि पूरा जगत ही मिथ्या है आत्मन ही सत्य है और यह आधार अपने जीवन में बैंक बैलेंस क्या है बहुत बार हम सोचते हैं ना कि मेरी एसेट क्या है मेरी वेल्थ क्या है तो व वे लोग कहेंगे कि मेरा एजुकेशन मेरा मेरा एसेट है मेरा फैमिली कनेक्शन मेरा रियल एसेट है कोई कहेगा कि मेरा जो फ्रेंड सर्कल है वह मेरा रियल एसेट है सभी का कोई ना कोई एसेट होता है तो हम लोगों की आध्यात्मिक पथ के साधकों की रियल एसेट क्या है वो है त्याग और एकाग्रता तो ठाकुर में तो त्याग और एकाग्रता भर भर के पड़े थे तो फिर उनको यह सब देखने की क्या जरूरत थी कि भाई सुबह को उठकर के इसका मुह दिख लिया फिर कौन से मुहूर्त में कौन यात्रा करता है फिर एक बार ऐसा हुआ था मनो मोहन ने के कोई वह दक्षिणेश्वर आए तो ठाकुर ने कहा कि अरे तुमने इस दिन यात्रा क्यों कर रहे हो क्योंकि यह जो डिवोटा थे अपने परिवार के साथ में वह कहीं से आकर के दक्षिण कोलकाता की यात्रा कर रहे थे रास्ते में जाकर के ठाकुर को मिले थे तो ठाकुर ने पूछ दिया कौन सा एक दिन था गुरुवार ना कि ऐसा कोई एक दिन था तो ठाकुर ने पूछा कि अरे तुम आज के दिन क्यों यात्रा कर रहे हो किंतु ऐसा बोलक के ही ठाकुर ने बात घुमा दी तो हमको प्रश्न होता है इस दिन को यात्रा करना इस मुहूर्त को देखना ये क्यों ठाकुर ये सब करते हैं क्यों वही अंधश्रद्धा है हमारी भारतीय संस्कृति को एक बार जाकर के तो डुबा दिया है किंतु फिर भी ठाकुर क्यों उसी बात को बार-बार करते हैं जबकि ही हैज अ बेटर मैसेज टू गिव म ठाकुर का जो मैसेज है इस जगत के लिए वो इतना सर्वोच्च कक्षा का है उस मैसेज को जद देंगे तो कितने लोगों का कल्याण होगा उस मैसेज में यह सब इस तरह की बातें क्यों डालते हैं प्रश्न हो सकता है इसका कोई इजी उत्तर नहीं है बाकी तो अपने लिटरेचर में लिखा गया है कि हां ठाकुर तोड़ने के लिए नहीं आए थे कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए थे भा भांग जन्नो आशय नहीं गुड़ जन्नो आश अर्थात कि भांग के लिए नहीं आए थे ड़ने के लिए सृजन करने के लिए आए थे पुरानी परंपरा गलत है उसको छोड़ दो नई परंपराएं अपनाओ ऐसा कहने के लिए नहीं पुरानी परंपरा उस जगह पर अपनी जगह पर उस काल उस परिस्थिति में सही थी आज इस काल और इस परिस्थिति में नई परंपराओं का आवश्यकता है ऐसा कहने के लिए आए थे मां का जीवन जैसे-जैसे पढ़ते जाएंगे हम सबको यह प्रश्न होता ही जाएगा कि आज की आधुनिक महिलाओं के लिए मां का संदेश मां का जीवन कहां तक रिलेवेंट है यह प्रश्न हो सकता है और अगेन यह सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि एसेंस ग्रहण कर लेना है सार ग्रहण कर लेना है उन्होंने जो कुछ भी किया वो ब्लाइंड उसको फॉलो नहीं करना है तो यह हो गई बात कि मां आई है दक्षिणेश्वर में ठाकुर के घर में जा रही है ठाकुर के साथ में बैठेगी और अभी ठाकुर के साथ में रहेगी और अभी आगे हम पढ़ते हैं ठाकुर ने यह तो कह लिया कि वो बार बेला आई है कि नहीं फिर उनकी ट्रीटमेंट के लिए सब व्यवस्था कर दी और साथ-साथ में ही क्या कहा तुम एतो दिने ले तुम इतने दिनों के बाद में आई हो एक खन की आर अर सेजो बाबू आछे ज तुम्हार जत्न होवे अभी क्या मेरे सेजो बाबू अर्थात की बिचले जमाई सेजो बाबू का अर्थ है जो बीच वाले जो होते हैं उनको से जो कहते हैं तो एक्चुअली ये थे मथुरानाथ तो मथुर बाबू है कि अब तुम्हारी इतनी सहाय करेंगे तुम्हारी इतनी केयर करेंगे अभी आगे क्या लिखते हैं कि अर डान हाथ भें गए छे मेरा एक राइट एंड टूट गया है कट गया है तो खन को एक मास होय 16 जुलाई 187 दक्षिणेश्वर काली बाटर प्रतिष्ठा तरी राणी रास मण जमाता और श्री रामकृष्ण प्रथम रसदार मथुरा नाथ देव त्याग पररिया चन कुछ महीने हुए हैं अर्थात की 16 जुलाई 187 को दक्षिणेश्वर की प्रतिष्ठा तरी रानी रनाथ विश्वास उन्होंने देह त्याग किया है और यह मथुरानाथ और ठाकुर की जो कहानी है इसके बारे में हमको बड़ा ही विषद से वर्णन लीला प्रसंग पुस्तक में मिल जाता है ठाकुर की जीवनी है स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित उसमें हम देखते हैं कि मथुर नाथ इस तरह से सोचना शुरू कर देते हैं पहले तो हमको पता है ना कि वह म ये मथुरानाथ की भी दो तीन इंटरेस्टिंग स्टोरीज है वो किसी ने कंप्लेन कर दिया यह जो कालीवाड़ा थे जिनको खजांची वगैरह कहते थे इन लोगों ने मथुरानाथ को कंप्लेन कर दिया कि अरे यह छोटो भट्टाचार जो महाशय अर्थात कि ठाकुर के बड़े भाई थे भट्टाचार्य तो ये थे छोटू भट्टाचार्य अर्थात कि छोटे भट्टाचार्य तो ये छोटो भट्टाचार्य जो महाशय क्या उलट पुलट सेवा करते हैं क्या पूजा करते हैं कुछ ठीक नहीं है मां को देने वाला भोग या तो बिल्ली को खिला देते हैं वगैरह वगैरह तो ये ज जैसे ही कंप्लेन गई मथुर बाबू के पास में मथुर बाबू एक दिन अपने कलकत्ता के निवास से दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में उपस्थित हुए बिना किसी को बताए और सीधे जाकर के मंदिर में चले गए जहां पर ठाकुर पूजा कर रहे थे तो ठाकुर की पूजा देख कर के मथुर बाबू इतने प्रभावित हो गए कि जैसे कि स्वयं मां काली को जीवंत मान कर के मां का बालक मां का संतान मां को पुकारता है इस तरह से ठाकुर पूजा करते थे तो यह देख कर के मथुर बाबू बिना किसी को बताए फिर से कोलकात्ता चले गए और फिर वहां पर काली वाड़ी में काली मंदिर में पत्र लिखा वो खजान च को कि ठाकुर जिस तरह से पूजा करते हैं उनको करने दो उसमें किसी भी तरह की बाधा विपत्ति देने की आवश्यकता नहीं है मत देना ऐसा और फिर रानी रास मण को क्या कहते हैं पता है कि इतने दिनों के बाद में मां कालिका एक सच्चा पुजारी मिला है हमको मां काली ठीक ठीक पूजा पूजक हमने पावा गछ मतलब पूजक प्राप्त हुआ है ऐसा करके काली मने रास मणि को कहते हैं और इसके बाद में अभी देखिए यह भी एक बड़ा आश्चर्य की बात है ना ये जनरली ये जो राजा लोग रहते हैं जमींदार लोग रहते हैं इनको लोग ये जो छोटे-मोटे लोगों की उनको कोई ज्यादा परवाह नहीं होती कोई जाकर के उनको कंप्लेन करेगा तो सीधा वह अपने कुछ एनफोर्सर्स होते हैं ना गुंडे उनको भेज देंगे बोला कि उसको ठीक कर दो उसका जो भी प्रॉब्लम है अपने से तो ये सब छोटी-मोटी चीजों में हाथ ही नहीं लगाएंगे तो ऐसा कोई एक एक जनरल कैटेगरी वाला एक यदि एक रहता जमीनदार जो कि कालीवाड़ा होता और उसके पास में यदि इस तरह की कंप्लेंट जाती कि काली मंदिर का पुजारी इस तरह से सब हरकत कर रहा है तो वह सीधे-सीधे खजान जी को कहते कि उसको भगा दो और नए किसी को ले लो उनको क्या पड़ी है कि एक इस तरह के एक पूजक के लिए खुद बिना किसी को बताए मंदिर में आए अपनी नजरों से सब ठीक-ठाक चेक करें और फिर बिना किसी को बताए चले जाए यह जो मॉडर्न मैनेजमेंट थिरी है यह वाला यह तो हो गया कि अपने जो रिपोर्ट मिलते हैं सबोर्डिनेट के पास से उसके ऊपर में डिपेंड मत रहो अपनी नजरों से सब कुछ वेरीफाई करो और तब डिसीजन लो यह जो मॉडर्न मेथड ऑफ मैनेजमेंट है मॉडर्न मेथड में क्या है फ्लैट मैनेजमेंट वो स्ट्रक्चरल नहीं कि पहले तो जनरल मैनेजर है उसके अंडर में मैनेजर है फिर उसके अंडर में सबोर्डिनेट मैनेजर है फिर डिपार्टमेंट इंचार्ज इस तरह से नहीं वर्टिकल स्ट्रक्चर नहीं हॉरिजॉन्टल स्ट्रक्चर एकदम जो जनरल मैनेजर या तो फिर सीईओ के लेवल प जो बैठा है वही डिपार्टमेंट में जाकर के सब कुछ अपने से वेरीफाई करेगा चेक करेगा ही विल बी इन टच ऑफ डे टू डे एक्टिविटीज तो वैसे ही यह फ्लैट स्ट्रक्चर मैनेजमेंट वाला वो आईडिया मथुर बाबू उस समय अप्लाई करते थे तो अभी एक बार जब ठाकुर के ऊपर में भरोसा हो गया फिर मथुर बाबू यह लीला प्रसंग में सुंदर वर्ण है मथुर बाबू ने ऐसा सोचना शुरू कर दिया था कि उनकी यह जो प्रगति हो रही है सांसारिक जगत में क्योंकि ताली रास मणि ने वैसे तो मंदिर बनाना शुरू कर दिया किंतु रास मणि की तो तीन लड़कियां थी अभी खुद का तो कोई लड़का नहीं था और इस समय की जो परिस्थिति थी स्त्रियों के लिए समाज में जमींदारी है इतना बड़ा मंदिर है इसका एडमिनिस्ट्रेशन है वह सब संभालना तो बड़ा ही मुश्किल होता था उनको इस तरह की ट्रेनिंग भी नहीं दी जाती थी तो किसी ना किसी पुरुष पर तो भरोसा करना पड़ेगा तो रास मणि ने धीरे-धीरे करके समझा कि मथुर बाबू वैसे तो गरीब घर से आते हैं किंतु उनकी एक जो कॉमन सेंस है एक नेचुरल इंटेलेक्ट है वो बड़ी ही शार्प है और कोई भी सांसारिक कार्य कोई भी एडमिनिस्ट्रेटिव वर्क बड़ा ही एफिशिएंटली वो मने वो करके दिखा सकते हैं तो धीरे-धीरे करके रासमुस मथुर बाबू पर बढ़ता गया और रास मणि कि जितनी भी जमीन जायदाद जमींदारी काली मंदिर का यह जो एडमिनिस्ट्रेशन है सब कुछ धीरे-धीरे करके मथुर बाबू के हाथ में आने लगा और मथुर बाबू ऐसा सोचना शुरू कर दिए कि यह जो मेरी सांसारिक उर्ध्व गति हो रही है यह जो मेरी प्रतिष्ठा बढ़ रही है इसके पीछे ठाकुर के आशीर्वाद ही कारण भूत है तो मथुर बाबू ठाकुर के इतने अनुग हो गए कि ठाकुर जैसे भी कहेंगे वैसे पैसा खर्च करेंगे और ये भी एक था कि मथुर बाबू का खुद का एक गुण था वो चाहते थे कि काली मंदिर में साधु संतों की सेवा हो तो लीला प्रसंग में वर्णन है कि ठाकुर यदि कहेंगे कि चलो इतने साधु संत आते हैं तो उनके लिए कमंडलु है गेरुआ वस्त्र है ये सब एक भंडार बना कर के यहां पर रखो जो जो भी साधु आएंगे संत आएंगे मैं उनको उसमें से भंडार में से दक्षिणा दूंगा तो ठाकुर जितना पैसा व्यय करने को कहते थे उससे भी ज्यादा पैसा मथुर बाबू व्यय करते क्योंकि दोनों तरह से एक तो ठाकुर पर श्रद्धा थी ठाकुर जो कहेंगे आंख बंद करके उसको तो फॉलो करना ही है किंतु उनके खुद के हृदय की एक इच्छा थी कि साधु संतों की सेवा करें तो देखिए कि कितना सद् भाग्य कितना आपका वह जो स्टार एलाइन होते हैं यदि ऐसा यदि कहा जाए कि आपके स्टार्स इतना परफेक्टली एलाइन होंगे तो इतने सारे सद्गुण एक व्यक्ति में आएंगे कि एक तो एडमिनिस्ट्रेटिव ंसी है ऑन द अदर हैंड साधु संतों की सेवा करने की एक इच्छा भी है और तृतीय है कि अवतार वरिष्ठा भगवान शिव स्वयं उनके गुरु बनकर के उनके साथ-साथ में चलते थे तो यह थे मथुर बाबू अनफॉर्चूनेटली मथुर बाबू का देहांत हो चुका था और ठाकुर ने बिल्कुल ठीक कहा कि मेरा राइट हैंड जैसे कि टूट गया है इस तरह से मुझे महसूस होता है मथुर बाबू की लास्ट स्टोरी है कि मथुर बाबू जब खीरी बीमारी थी उनकी वो मृत्यु शैया पर पड़े हुए थे अपने घर में कलकाता में वो बार-बार विनती करते हैं कि ठाकुर एक बार दक्षिणेश्वर से आकर के उनको अपना दर्शन दे आशीर्वाद दे करर के जाए तो कितनी ही बिनती की कितने ही लोगों को कोलकात्ता से दक्षिणेश्वर भेजा कि ठाकुर को कहने के लिए कि आप आइए मथुर बाबू आपको बुला रहे हैं किंतु फिर भी आखिरी तक ठाकुर उनके आखिरी समय में उनको देखने के लिए नहीं गए क्यों नहीं गए किसी ने पूछा तो ठाकुर ने कहा कि देखो कि उसकी यह परिस्थिति देख कर के मने मृत्यु शैया पे है इतना सफरिंग हो रहा है मैं कैसे उसको जाकर के देखूं मुझे मुझे खुद को उसका कष्ट देख कर के कष्ट होगा किंतु जो भी है ठाकुर यदि स्थूल देह से नहीं गए थे तो सूक्ष्म देह से तो गए ही थे जाकर के आशीर्वाद दिया था उनके आखिरी समय तक और यह जो सूक्ष्म देह में जाकर के आशीर्वाद देने की एक एक दूसरी भी घटना है कि यह घटना एगजैक्टली कहां पर हुई मैं भूल गया कलकाता में कि कोठार में कि साउथ इंडिया में कहीं पर एक जगह पर हुई मैं एग्जैक्ट लोकेशन भूल गया ऐसा था कि अपना एक साधु एकाएक बीमार हो गया बीमार होकर के हॉस्पिटल में उसको एडमिट करना पड़ा तो अभी उस समय राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र और अपने संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई तो वही राजा महाराज प्रेसिडेंट थे अभी प्रेसिडेंट थे और बार-बार उनको कहा जाता है कि महाराज जी हॉस्पिटल में वह अपना साधु एडमिट है वह आपको आखिरी बार दर्शन करना चाहता है आप जाकर के एक बार उसको मिल के आइए उसकी बड़ी ही इच्छा है तो राजा महाराज का एक ऐसा नेचर था वैसे तो वह ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठित थे किंतु ठाकुर की तरह ही एक तरह का बालक भाव था उनमें तो यह जो हॉस्पिटल में जाएंगे तो बीमार हो जाएंगे इफेक्ट हो जाएंगे किसी चीज से कोई बीमारी उनको पकड़ लेगी सब बाल सुलभ उनको एक डर था वो कहेंगे अरे नहीं नहीं नहीं हॉस्पिटल में जाना वहां पे तो इतना सब यह होता है इनफेक्शियस डिजीज होते हैं यह होता है वो होता है ऐसा ऐसा बिल्कुल बच्चे की तरह बहाने दिखाएंगे तो यह देख कर के मेरे ख्याल से शशि महाराज ही थे कि जो उनको इस तरह से रिक्वेस्ट करते थे बार-बार तो शशि महाराज मोस्ट प्रोबेबली शशि महाराज ही थे शशि महाराज बड़े ही नाराज हो गए एक दिन राजा महाराज को आकर के कहा राजा देखो वो लड़का हमारा मर गया आखिरी घड़ी तक वो तुम तुमको मिलना चाहता था तुम जाकर के मिले नहीं इतना तो तुमको क्या मृत्यु भय है इतना तो क्या बीमारी का डर है ऐसा जैसे ही शशि महाराज ने ऐसा कहा राजा महाराज एकदम गंभीर हो गए जो एकदम बालक वत डर डर के बोलते थे अरे मैं हॉस्पिटल में जाऊंगा तो बीमार हो जाऊंगा यह हो जाएगा वो हो जाएगा वो बचपना सब चला गया और एकदम ऋषि मुनियों की तरह गंभीर हो कर के बोले शशि भाई शरीर दिखाई ना की देखा माने शशि भाई यह शरीर से मैंने जो दर्शन दूंगा वही क्या आखिरी दर्शन है अर्थात कि उस साधु के आखिरी समय में राजा महाराज ने वही आध्यात्मिक जगत में सूक्ष्म रूप से जाकर के उस साधु को आशीर्वाद दिए थे और जैसे ही राजा महाराज ने ऐसा कहा शशि महाराज एकदम विनीत होकर के राजा महाराज को साष्टांग प्रणाम कर दिए कि राजा मुझे क्षमा कर दो कि मैंने तुम्हारे पर इस तरह से संशय किया तो ये बचपना ये ऑन वन हैंड कहां यह लोग आध्यात्मिक शिखर पर आध्यात्मिक एवरेस्ट पर विराजमान है कहां वह ब्रह्मज्ञान अपनी मुट्ठी में अपनी जेब में डाल कर के घूम रहे हैं और कहां वह जगत में इस तरह से बच्चे की तरह बिहेव करते हैं कि हमको लगेगा कि अरे इन दोनों के बीच में कंट्रक्शन क्यों है जिनको ब्रह्मज्ञान है उनको यह अंधश्रद्धा या तो यह बीमारी का भय या तो फिर ये इनफेक्शियस डिसीज का भय यह सब क्यों है राजा महाराज की बड़ी ही सुंदर स्टोरी है वो उड़ीसा में थे शायद यह उड़ीसा की कहानी है मोस्ट प्रोबेबली अगेन यह सब मैंने बहुत पहले पढ़ा है तो कभी-कभी ये लोकेशन वगैरह गड़बड़ हो जाता है किंतु जो भी है राजा महाराज एक बार कहीं से जा रहे थे रास्ते में आते-आते अंधेरा हो गया और एक जंगल जैसा था अभी जंगल जैसा है अंधेरा हो गया है पास में ही कहीं से शायद शेर की आवाज शेर की दहाड़ सुनाई दी अभी उनके साथ में एक दूसरे भी साधु थे वो कहने थे कि नहीं यह तो शेर की दहाड़ नहीं है राजा महाराज एकदम डर गए अरे शेर दहाड़ रहा है शेर आएगा शेर हमको कहा जाएगा अभी उनके साथ वाले साधु थे वो कहते हैं महाराज ये शेर तो हमको नहीं लग रहा है हो सकता है ये मैंने ये वो शियाल की दहाड़ हो शेर तो हमको नहीं लग रहा किंतु फिर भी राजा महाराज के ऊपर में पता नहीं एकाएक एक बचपना सवार हो गया और छोटा बच्चा जैसे शेर से डरता है वो कैसे बिहेव करता है एकदम वो डरते डरते वो दौड़ कर के एक पेड़ के पीछे में छुप गए और पेड़ के पीछे में से वह मुंह निकाल कर के चारों ओर देख रहे हैं कि कहां से शेर आ रहा है कहां नहीं आ रहा है कैसे वह पेड़ के पीछे छुपे रहे फिर थोड़ी देर हुई फिर उस पेड़ के पीछे में से निकल कर के दौड़ कर के पिछले दूसरे पेड़ के पीछे में छुक गए फिर वहां से वह मुंह करके देख रहे हैं कि कहां वो आ रहा है कि नहीं आ रहा है शेर नहीं आ रहा तो ऐसा पूरा रास्ता उनके मन के ऊपर में यह बचपना जैसे कि छाया हुआ है कि इस पेड़ के पीछे में से दूसरे पेड़ के पीछे में दौड़ते हैं छुक जाते हैं डरते डरते चारों ओर देखते हैं कि शेर आकर के खा तो नहीं जाएगा और मने जब तक अपने घर जहां आश्रम था वहां पर पहुंच ना गए पूरा बचपना उनके सर पर इस तरह से सवार रहा मने ये डिस्क्रिप्शन में पढ़ रहा हूं तो हंस भी रहा हूं और एक विस्मय भी प्रकट हो रहा है कि अरे ये ब्रह्मज्ञानी लोग इस तरह से क्यों बिहेव करते हैं ठाकुर की वो जो बड़ी ही सुंदर कहानी है मैं काफी बार इसका उदाहरण देता रहता हूं ठाकुर अपने कमरे में बैठे हैं दक्षिणेश्वर में और एक बास्केट में किसी ने उनको जलेबी लाकर के दे दी है और ठाकुर को जलेबी कितनी प्रिय है हमको तो पता है ठाकुर क्या कहते थे कि वाइस रोय की गाड़ी का पहिया है अर्थात कि कितना ही आपने खाना खा लिया हो पेट आपका कितना भी भर्ती हो किंतु जैसे कि वाइस रोई की गाड़ी आती है और बहुत सारी भीड़ होने के बावजूद वाइस रोई की गाड़ी के लिए जगह हो जाती है यह ब्रिटिश राज का समय था जबकि वाइस रॉय सर्वोच्च और मैंने एडमिनिस्ट्रेटिव अथॉरिटी हुआ करता था भारत में जैसे कि आज प्रधानमंत्री होते हैं तो वैसे ही कितनी ही चाहे भीड़ क्यों ना हो वाइस रोय की गाड़ी आएगी तो वाइस रोय के लिए जगह हो जाएगी भीड़ में वैसे ही कितना ही पेट भर के खाया क्यों ना हो जलेबी जाएगी तो जलेबी के लिए जगह हो जाएगी तो ठाकुर इस तरह से एक बास्केट में जलेबी किसी भक्त ने लाकर के दी थी और ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह जलेबी खा रहे थे और सामने से उसी कमरे में 5 साल का एक बच्चा प्रवेश किया ठाकुर के ऊपर में इमीडिएट बचपना ऐसे सवार हो गया कि जैसे एक बच्चा दूसरे बच्चे से अपनी प्रिय चीज को छुपा के रखता है जिससे कि शेयर ना करना पड़े वैसे ही ठाकुर ने वह बास्केट लेकर के जलेबी की अपने पीछे में छुपा दी और छुपाते छुपाते समाधि मग्ना हो गए यह बचपना और समाधि यह दोनों इन लोगों के जीवन में साथ-साथ में बुने हुए हैं किस तरह का यह मधुर संगम है वो जितना ही हम चिंतन करेंगे जितना ही पाठ करेंगे उतना ही हम समृद्ध होंगे उतना ही भीतर में से हमारे जितना हीय कचरा है अंकट बंकट है वह क्लियर होता जाएगा तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि अभी मेरे मथुर बाबू है क्या कि जो तुम्हारी जितना सेवा सारवान बाबू चले गए हैं मेरा राइट हैंड कट गया है तखन हां ये तो पढ़ लिया प्रथम दर्शन व आना पादी शेष करिया श्रीमा नबत जायते चाहिले ठाकुर बाधा दिया बोली लेन अभी जैसे ही मां नौका से अवतरण किया और ठाकुर के कमरे में जाकर के जो पहला वार्तालाप किया वह समाप्त होकर के मां ने ठीक किया कि नबत में जाएगी जहां पर चंद्रा मणि देवी ठाकुर की मां और उनकी सास वो वहां पर रह रही है उनके पास जाएगी तब ठाकुर ने कहा कि अरे नहीं ना ना खाने डॉक्टर देखते असुविधा होवे एक घोरे थाको अरे नहीं नहीं वहां पर डॉक्टर दिखाने में असुविधा होगी इसी घर में रहो श्री मायर जन्नो पृथक सज्जा रचितो होलो मां के लिए अलग से एक शैया रचना एक शैया अलग से एक बेड की स्थापना हुई मायर संगिनी एकटी मेरो तहर संगे सुई बार व्यवस्था होलो मां के साथ में आई हुई एक संगिनी या तो एक सहेली की भी वहां पर सोने की व्यवस्था हुई यह भी एक थोड़ा आश्चर्यजनक है कि ठाकुर और मां का तो विवाह हो गया है तो अभी दोनों एक ज एक कमरे में रह रहे हैं तो मां को साथ देने के लिए सहेली को सोने की क्या जरूरत है किंतु फिर भी यही इसी मधुर लीला में यह सब है तखन कालीबाड़ी श कोलेर आहार शेष होया गया छ उस समय कालीबाड़ी में सभी लोगों का आहार समाप्त हो चुका था ताई श्री जुक्तो हृदय दुई तीन थामा मुड़ी लैया आशी लेन इसीलिए हृदय दो तीन धामा अर्थात की मैं अनुमान कर लेता हूं बास्केट ना कि ऐसा कुछ मुड़ी अर्थात की मुड़ मुड़ा या तो फिर मम जिसको गुजराती में कहते हैं उसको लेकर के आया पर दिन ठाकुरे निर्देश डॉक्टर देखानो हो लो दूसरे दिन ठाकुर के निर्देश अनुसार डॉक्टर को दिखाना हुआ स चिकित्सा तीन चारी दिनर मध जोर सारिया जावाई श्रीमा नहते चोलिया गले सु चिकित्सा के परिणाम से तीन चार दिन में ही ज्वर अर्थात की बुखार सही हो गया ठीक हो गया और फिर मां नबत में चली गई श्री श्री ठाकुरर जननी चंद्रमणि तो खन शेखाने आके ठाकुर की मां चंद्रमणि देवी भी उस समय नबत में रह रही थी तहर दक्षिणेश्वर प्रथम आगमन काले बाबूदर कुठी एक खानी गोर तहर जन्नो छड़िया देवा होया छलो जब चंद्रा मणि देवी प्रथम बार दक्षिणेश्वर में आई थी तो यह बाबू लोगों की वो बाबू लोग जहां पर रहते थे अर्थात किय कलकत्ता से मथुर बाबू और उनके पुत्र वगैरा जब दक्षिणेश्वर में आते थे तो उनको रहने के लिए जो मकान था उस मकान को कहते थे कुठी कुठी घर यही कुठी घर जिसकी छत पर जाकर के ठाकुर ने कहा था कि अरे भक्त लोग तुम लोग कहां पर हो आए रे मैंने आओ यह संसारी लोगों की बात सुनक के मेरे कान जल गए वही कुठी घर उसी कुठी घर में पहले तो मां रहती थी किंतु मथुरा नाथर देहो त्याग को एक मास पूर्वे ठक तुष पुत्र अई ई घरे परलोक गमन करले चंद्रमणि देवी आर सेखाने था कीते चाहिले ना किंतु वही मथुरा बाबू के परलोक गमन के कुछ समय पहले ठाकुर के भाई के पुत्र अक्षय का मृत्यु उसी कुठी करके उसी कमरे में हुआ था जहां पर चंद्रा मणि देवी रह रही थी तो उस कमरे में मृत्यु हुआ है अपने लाडले पोते का तो कैसे अभी वह उसी घर में रहेगी उस घर में जहां पर भी देखेगी जिस चीज को देखेगी अपने लाडले पोते की यादें उनको वापस आकर के सताने लगेगी तो फिर चंद्रा मणि देवी ने ठीक किया कि नहीं अभी इस कमरे में मुझे नहीं रहना तीनी नातिर शोक भुली बार जन्नो नबत चोलिया आशी लेन पोते का शोक विस्मृत करने के लिए भूल जाने के लिए नबत में चली आई एवम बोली लेन और कहा आर आमी ओखाने थाक बो ना अभी मैं वहां पर नहीं रहूंगी अमी नते घोरे थाक मैं इस नबत के घर में ही रहूंगी गंगा पाने मुख करे रब कुठी आर हमार दरकार नाई गंगा के सामने मु करके रहूंगी कुठी में रहने की अभी मुझे आवश्यकता नहीं जरूरत तो आज यही तक कल फिर से मिलते है हरि ओसत श्री राम कृष्णर
Questions & Answers
परम स्वामी जी जो कहते थे ना कि वेस्टर्न जो रोल मॉडल है शिवरी अर्थात की स्त्री को प्रेमिका के रूप में देखा और डेम सेलिंग डिस्ट्रेस मने स्त्री जब किसी मुसीबत में आ जाती है तो उनको सहाय करना यह शिवरी मॉडल है वहां पर और अपने यहां पर है कि मातृ भाव हम पुरुषों का एक होता है कि स्त्री को सबसे पहले जननी के रूप में देखना और उनको जननी की तरह आदर सन्मान देना तो दिस आर टू डिफरेंट मॉडल्स स्वामी जी कहा करते थे अभी क्या है कि यह तो एक सोसाइटल रोल एक हो गया दूसरा है कि एक लार्जर सिविलाइजेशनल रोल क्या है स्त्री का माने अपार्ट फ्रॉम एक फैमिली रोल तो सोसाइटी या तो सिविलाइजेशन में स्त्रियों का कंट्रीब्यूशन देखिए स्वामी जी खुद जो महाकाली पाठशाला में गए थे कलकाता में तो वहां पर देखा कि एक सुंदर पाठशाला स्त्रियों के लिए चल रही है और वहां पर उनको सब कुछ सिखाया जाता है स्वामी जी ने खुद ने निवेदिता को कहा कि भारत में आकर के लड़कियों को हिस्ट्री जियोग्राफी साइंस वो सब कुछ सिखाना है तो दो रोल है माने एक तो फैमिली लेवल पे है दूसरा कि लार्जर सिविलाइजेशनल लेवल पे तो फैमिली लेवल पे दो तरह के मॉडल है रोल मॉडल एक वेस्टर्न रोल मॉडल और एक ईस्टर्न रोल मॉडल ये तो हो गया किंतु जब हां जहां तक सिविलाइजेशनल कंट्रीब्यूशन की बात है ईस्ट एंड वेस्ट स्टैंड टुगेदर इस अर्थ में कि स्त्रियों का लार्जर रोल डिसीजन मेकिंग पॉलिसी मेकिंग गवर्नेंस ये इकोनॉमिक्स इंडस्ट्री यह सब में होना चाहिए बिकॉज दे ब्रिंग कूल हेड टू द टेबल यह जो चारों ओर युद्ध की बात चल रही है सब पुरुष लोग बैठ कर के ठीक करते हैं इसके ऊपर में बम फेंको इसके ऊपर में ड्रोन फेंको इसके ऊपर में तोप चलाओ अभी उनकी कैबिनेट में जो यदि स्त्रियां होती तो दे विल बी मोर मैचोर म उनलोगों का एक मोर एक पर्सपेक्टिव रहता कि भाई युद्ध करने से जो जो जो बूढ़े हैं स्त्रियां है बच्चे हैं इन लोगों प क्या डिवा पेटिंग असर होगा यह तो थोड़ा सा सोचिए यह जो कूल हेड है वो स्त्रियों का होता है तो डिसीजन मेकिंग जितने भी कैबिनेट है ना कि जितने भी ये हेड ऑफ द स्टेट है सब ज्यादातर पुरुष है वहां पर स्त्रियों को के बिठाए तो वर्ल्ड विल बी अ मच बेटर प्लेस इस बात में वेस्ट और ईस्ट दोनों एक साथ में एक आवाज में खड़े हैं बट दिस इज अ सड रियलिटी ऑफ अवर टाइम कि इतने दिनों के बाद में भी स्त्रियों का पार्टिसिपेशन वो इतना नहीं है भारत में देखिए एक तरह से अपनी फाइनेंस मिनिस्टर स्त्री मने निर्मला सीतारामनगर उदाहरण मिल जाएंगे बड़े-बड़े देश में चाइना में देखेंगे कि वहां की कैबिनेट में एक भी स्त्री नहीं व जो सीसीपी है ना चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी उन लोगों का वो जो मीटिंग होता है वो सूट बूट पहन के सभी लोग खड़े रहते हैं पूरे सब के सब पुरुष एक भी स्त्री नहीं उन लोगों की स्टैंडिंग कमिटी में पोलिस ब्यूरो में तो रशिया में जाकर के देखिए ज्यादातर जगह पर ने एक पुरुष प्रधान देश और इन लोगों का ही सबसे ज्यादा दिमाग गर्म रहता है यही लोग सब इसके ऊपर में ड्रोन फेंक द इसके ऊपर में कर सो ऑफकोर्स दो तरह के लेवल प है जहां तक फैमिली की बात है और वेस्ट डिफरेंट डिफरेंट तरीके से सोचते हैं तो जहां तक लार्जर सिविलाइजेशनल रोल है स्त्रियों का बोथ स्टेंट ना फिलोसॉफिकली एक जगह प खड़े हैं प्रैक्टिस में कितना है वो तो अभी देख ही रहे हैं एक्चुअली देखिए ठाकुर बहुत चालक थे मैंने इस तरह की भोली भोली बातें भी करते हैं आपने जो बोला एगजैक्टली वैसा उन्होंने किया भी था देखिए कि उनको कहां से ऐसे तो वो हवाहवा में ये सब वाइब्रेशन जो उड़ते हैं वो पता चल गया कि ब्राह्मण समाज है वहां पर सबसे ज्यादा ये यंग लड़के इकट्ठा होते हैं तो ब्रह्म समाज को कैप्चर करो तो ये लड़के सब अपने पास आ जाएंगे पहले सबसे पहले क्या किया पहले तो वो जो देवेंद्रनाथ टैगोर है अभी देखिए ठाकुर की टेक्निक भी कैसी वो मने बड़ी सूक्ष्म टेक्निक है ऐसा नहीं है कि मैं वहां पर जाकर के लेक्चर दूंगा पहले तो मथुर बाबू को कहा कि ये देवें के बारे में सुना है देवेंद्रनाथ टैगोर जो कि बड़े ही ईश्वर का नाम लेते हैं मैं उनके पास में जाना चाहता हूं ईश्वर की बातें सुनना चाहता हूं तो अभी मथुर बाबू थोड़ा सा इधर-उधर करने लगे देवेंद्रनाथ उनके साथ में स्कूल में पढ किंतु ईगो होता है ना सामने से कैसे जाए किंतु फिर भी ठाकुर ने जब बड़ा जोर किया तो गए देवेंद्रनाथ के वहां पर और इस बहाने गए कि मैं ईश्वर की बातें सुनना चाहता हूं किंतु फिर उन्हीं को ईश्वर की बातें सुना दी वो उल्टा हो गया किंतु पता चला कि देवेंद्रनाथ का इतना प्रभाव शायद नहीं है तो फिर ठाकुर ने सोचा अभी केशव सेन को पकड़ा जाए तो फिर वही बात है व व हृदय को बोला कि चलो केशव सैन को जाकर के मिलते हैं ईश्वर की बातें सुनते हैं तो वो जो पहली मुलाकात है उसका बही डिटेल सुंदर वर्णन वो ब्राह्मण समाज की पत्र पत्रिकाओं में है कि वो ब्रह्म समाज वाले बैठे हैं वो स्नान करने के वो सब तैयार हो रहे हैं तो वहां से एक वो हृदय वो एक लंबा चौड़ा एक आदमी आया हृदय वो आकर के बोलने लगा कि मेरे मामा है जो कि ईश्वर की बड़ी बात करते हैं ईश्वर के बड़े भक्त हैं आपके साथ में ईश्वर की बातें करना चाहते हैं तो वो सब लोग सोचने लगे काली का पुजारी है क्या मूर्ख जैसा आदमी होगा ठीक है चलो बुलाओ तो तो फिर आकर के ठाकुर को बुला के ले आया तो ठाकुर को देख कर के उनको लगा अरे ब एकदम सिंपल तरह का आदमी है ब्राह्मी है कालिका पुजारी है ठीक है ठीक है बैठो बैठो क्या बात है तो पहले तो ठाकुर ने वो कैशव को देख कर के ही देखा कि एर लेज खोश से अर्थात कि इसकी ही पूंछ चली गई है तो सब लोग हंसने लगे थोड़े लोग नाराज भी हो गए क्या ऐसा केशव इतना बड़ा आदमी उसको बोलते हैं तुम्हारी पूछ चली गई है तो केशव देखिए केशव की भी क्या महानता है वो ठाकुर को गाली देने की बजाय सबको ठंडा करके बोलता है अरे पहले तो इनको पूछो कि क्या कहना चाहते है फिर ठाकुर ने व्याख्या दी कि जैसे वो मेंढक होता उसकी पूछ चली जाती है तो पानी में भी रह सकता है जमीन में भी रह सकता है वैसा ही केशव का है वो संसार में भी रह सकता है और संसार के बाहर आध्यात्मिक साधना भी कर सकता है तो केशव वो सो इंप्रेस और फिर तो जो ठाकुर ने एक के बाद एक बात करना शुरू किया पहले दिन से ही केशव चुपचाप सुन रहा है फिर केशव ने अपने पत्र पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया कि हम लोगों ने दक्षिणेश्वर के परमहंस की मुलाकात की और हमको लगता है कि आज भारतीय समाज में हिंदू समाज इससे बड़ा संत नहीं मिलेगा और वही सब धीरे और जब भी टाउन हॉल में वक्त होता देते हैं तो ठाकुर की बात करते हैं ऐसा करके करके ब्रह्म समाज के प्रचार के थ्रू यह अभी नरेंद्र ब्रह्म समाजी था राजा महाराज ब्रह्म समाजी थे और मास्टर महाशय ब्रह्म समाजी थे तो इन्हीं लोगों ने फिर बच्चों को कैप्चर करके लाना शुरू किया मने ठाकुर दोनों है ऐसे तो मां मा भी करते हैं और व प्रैक्टिकल सेंस भी इतनी वो जो मास्टर महाशय को कहते हैं ना कि छाता वहां पर छोड़ के चले आए पंचवटी में मेरे शरीर पर वस्त्र नहीं रहते फिर भी मैं छाता नहीं भूलता