मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हम पाठ कर रहे हैं। चीर सिमंतिनी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित मां की जीवनी का यह अध्याय चीर सधवा श्री
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का विवरण
रामकृष्ण देव की महासमाधि हो चुकी है और गंभीरानंद जी ने तो वैसे एक ही पैराग्राफ में घटना का विवरण किया है किंतु हम अन्य जितने भी सोर्स है वहां से लेकर के इस घटना के इस ठाकुर की महासमाधि का जो जो विवरण हमारे पास में अवेलेबल है उसका हम पाठ कर रहे थे कल ऑलरेडी देखा कि राम रामलाल दादा के बारे में किस तरह से स्वामी जी ने उनको भेजा गोपाल दादा माने स्वामी अद्वैतानंद जी बूढ़ो गोपाल कि जाओ ठाकुर की महासमाधि हुई है ना कि समाधि है समझ में नहीं आ रहा रामलाल दादा को बुला के लाओ तो बूढ़ो गोपाल आधी रात को गए वहां पे रात को 2:00 बजे के आसपास में दक्षिणेश्वर में रामलाल दादा आए तो कहा कि अभी पता नहीं चल रहा है कि यह समाधि है कि महासमाधि तो कैप्टन को बुलाया जाए। वह जो नेपाल सरकार के जो राज प्रतिनिधि थे कथामृत में उनका काफी उल्लेख है। तो उनको बुलाया जाए तो उनको बुलाया गया। मीनवाइल जो डॉक्टर सरकार ठाकुर की ट्रीटमेंट करते थे रेगुलरली उन्होंने भी आकर के निदान किया कि ठाकुर ने अपना स्थूल देह त्याग कर दिया है। इसके बाद में कैप्टन आए। कैप्टन ने कहा ठाकुर के देह पर गाय के घी का मालिश किया जाए। तो शशि महाराज ठाकुर के देह पर मालिश कर रहे हैं। करते-करते जब तक मेरुदंड गर्म था तब तक मालिश करते गए किंतु एक समय आया पता चला कि उनका मेरुदंड स्पाइनल कॉर्ड ठंडा हो गया है। इसका अर्थ है कि अभी देह के भीतर में प्राण नहीं बचा है। इसके बाद में ठाकुर को वही शैया में बिठाकर लेटा करके सभी जो डिसाइपल्स थे और उसी रात को जो हुटको गोपाल वगैरह थे उन्होंने कोलकाता में घर-घर जाकर के बता दिया कि ठाकुर की महासमाधि हुई है। तो सुबह होते ही सभी भक्तों का आगमन प्रारंभ हो गया। ठाकुर को उन्हीं एक शैया पर लिटाया गया और सभी भक्तगण साथ में सामने खड़े रहे। वो फेमस फोटो उस फोटो में फोटो बहुत जगह पर पब्लिश हुआ है किंतु ठाकुर को उसमें ब्लैक आउट कर दिया है और ऐसा करना उचित भी है। मैंने वह ओरिजिनल फोटो देखा है। सही में ठाकुर एकदम क्रश क्रश काय लग रहे हैं। जैसे कि सही में देह के भीतर में हड्डी पसली के अलावा और कुछ नहीं। तो इस तरह से सभी डिसाइपल्स सभी भक्त त्यागी संतान गण खड़े हैं। प्रोमिनेंटली हमको दिख रहा है कि नरेंद्र है और नरेंद्र के बगल में रामबाबू खड़े हैं। तो मास्टर महाशय भी है पीछे में लंबी दाढ़ी वाले। तो इस तरह से फोटो लिया गया। दो फोटो लिए गए हैं। इसके बाद में वो ठाकुर को काशीपुर महास्मशान ले जाया गया। वहां पर चिताग्नि में स्थूल देह को आहूत किया गया। और उस समय जब हम लाटू महाराज की स्मृति कथा पढ़ रहे थे तो लाटू महाराज ने कहा कि मुझे रामबाबू ने कहा था कि यदि सभी लोग चले जाते हैं तुम यहां पर रहना। क्यों? क्योंकि मां वहां पे है काशीपुर गार्डन में। और मां के बारे में भी लाटू महाराज ने जो कहा था हमने सुना कि जैसे ही ठाकुर की महासमाधि का मां को अंदाजा आ गया होगा तो साथ में ही मां आई और रोना शुरू कर दिया कि मां काली मेरे किस अपराध की वजह से तुम मुझे छोड़ के चली गई हो। वि इज देखिए मां का यह जो शब्द प्रयोग है ठाकुर के बारे में ठाकुर को मां काली कह के जो मां पुकारती है मां शारदा वि इज देखिए कि दोनों के भीतर का जो संपर्क है वो तो आध्यात्मिक संपर्क है मां काली ही जैसे कि ठाकुर और मां दोनों के हृदय में रहकर के इन दोनों का जो स्पिरिचुअल यूनियन है उसके लिए माने मां काली के भीतर में ही जैसे कि ठाकुर कुर और मां नर नारायण और नारायणी यह दोनों धाराएं जैसे कि मिलित होती है। तो वो एक हमने देखा किंतु साथ में ही लाटू महाराज कहते हैं कि मां को फिर उनके कमरे में ले जाया गया और फिर जो वह एक बार चित्कार करके मां रोई थी। उसके बाद में मां का गले का स्वर लाटू महाराज को कभी सुनाई नहीं दिया गया। और जैसे होता है बाकी स्त्रियों के साथ में कि मृत्यु होने से जोरजोर से रोना चित्कार करके स्वाभाविक ही है अपने पति का निधन होने से कि स्त्री को दुख नहीं होगा। किंतु यहां पर लाटू महाराज लिखते हैं कि इतना धैर्य मां के भीतर में था। इतना धैर्य मैंने और किसी स्त्री में देखा नहीं है। वही जो एक बार मां रोई थी उसके बाद में मां ने अश्रुवारी भी बहाई होगी तो नीरव में एकांत में सबके सामने नहीं चित्कार करके नहीं। तो यह एक हमने देखा। इसके बाद में ठाकुर के देह को वहां पर काशीपुर ले जाया गया है। लाटू महाराज वहां पे ही है। काशीपुर उद्यान वाटी में ही है। और जब शाम को आखिर में लाटू महाराज महास्मशान पहुंचे। देखा कि शशि महाराज का जो शोक है जैसे कि संवरित ही नहीं हो रहा। शरद महाराज और नरेंद्र स्वामी जी स्वामी विवेकानंद दोनों जैसे कि शशि महाराज को स्वामी रामकृष्णानंद जी को सांत्वना देने का प्रयास कर रहे हैं। शशि महाराज एक पंखा लेकर के ठाकुर की चिता के सामने जैसे बैठे ही है और वहां से हिलना ही नहीं चाहते। तो यह सब हमने देखा। इसके बाद में हमने यह भी देखा कि किस तरह से ठाकुर के पूत अस्थि एक कलशी में भर के शशि महाराज अपने सर पर उसको वहन करके काशीपुर गार्डन हाउस में ले आए और फिर जिस शैया पे ठाकुर शयन करते थे उसी के ऊपर में उस कलशी को रखा गया और यहां तक हमने पढ़ा था लाटू महाराज का स्मृति कथा। अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं। क्या कहते हैं लाटू महाराज?
श्रीरामकृष्ण का अस्थि कलश
लास्ट एक लाइन पढ़ लेते हैं अस्थि वाली जानो पता है तार अस्थियार भस्मो एक कोलशीते पूरे शशि भाई माथाई कोरे बागाने एने छिलो उनका अस्थि उनका अर्थात ठाकुर का अस्थि और भस्म एक कलसी में रख के शशि भाई अपने सर पर रख के बागान में ले आए थे वही गार्डन हाउस जहां पर ठाकुर आखिरी दिनों में रहे थे ट्रीटमेंट के लिए जे बिछाना तनी शतेन शखाने कोलशिश रेखे देवा हो जिस बिस्तर पर ठाकुर शयन करते थे उसी के ऊपर में यह कलसी रखी गई देखिए इंटरेस्टिंगली ठाकुर ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था वही काशीपुर गार्डन हाउस में पैसों को लेकर के जब थोड़ा सा विवाद हुआ था थोड़ा सा आर्गुममेंट हो रहा था उस समय ठाकुर ने नरेंद्र को कहा था तू तोर कांधे बोशमा के जेखाने नहीं जा शेखाने आमी जाओ तुम अपने कंधे पर बिठा करके मुझे जहां पर ले जाओगे वहां पर मैं जाऊंगा तो आखिर में स्वामी जी यही बात शरद चंद्र चक्रवर्ती को करते हैं। स्वामी शिष्य संवाद में है। कब करते हैं? जबकि बेलूर मठ का स्वामी जी पूरा जगत भ्रमण करके भारत आए हैं। विश्व विजय स्वामी विवेकानंद होकर के जब बेलूर मठ की जमीन खरीदी गई और वही बेलूर मठ की जमीन पर ठाकुर को स्थापित करना था। उस समय स्वामी जी स्वयं अपने कंधे पर वही ठाकुर की कलशी लेकर के गए थे और इसी समय स्वामी जी ने शरद चंद्र को यह बात कही थी कि देखिए ठाकुर ने देखो ठाकुर ने मुझे यह प्रॉमिस किया था कि तुम अपने साथ जहां पर ले जाओगे वहां पर मैं जाऊंगा। तुम मुझे भिक्षा करके भी खिलाओगे तो भी मैं खाऊंगा। यह धनी लोग हैं। ये जो विषय में डूबे हुए लोग हैं उनका ना ही हमको धन चाहिए ना ही उनकी कोई सहाय चाहिए। तो देखिए कि यहां पर शशि महाराज कलसी को अपने सर पर रख के आते हैं। स्वामी जी अपने कंधे पर ले जाकर के उसको वहीं पे बेलूर मठ में उनको स्थापित करते हैं। तो दिस आर सच कोइंसिडेंससेस। तो अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं।
नित्य श्रीरामकृष्ण - चिर सधवा माँ सारदा: महासमाधि के बाद ठाकुर ने प्रकट हो कर माँ को चूड़ियाँ उतारने से रोका
परे दिन गोलाप मां ऐसे खबर दिलो दूसरे दिन गोलाप मां ने आकर के समाचार दिया मां के ऊनी दिखा दिए हाथर बाला खुलते निषेध कोरे छे मां को ठाकुर ने दर्शन देकर के हाथ की चूड़ियां खोलने से निषेध किया है बोले छे कहा है आमी की कोथाई ग छ गो मैं क्या कहां पे गया हूं यही तो रहे छ यहां पे ही तो हूं श यही घर थे कि वही घर ऐसे छी बस इस घर से उस घर में आया हूं। देखिए एग्जजेक्टली यही बात मां जब वृंदावन जाती है अभी इसके बाद में ही मां वृंदावन जाएगी और हमको पता है कि योगिन मां ऑलरेडी वृंदावन में ही थी और जैसे ही योगिन मां मां को दर्शन हुआ मां को भेंट पड़ी और फिर वहां पर दोनों रो ही रही है रो ही रही है क्योंकि मां की आंखों में से भी अश्रुवारी जल रही है योगिन मां की आंखों से भी तो जब कुछ दिन तक ऐसा चला तो ठाकुर ने आकर के मां को दर्शन देकर के कहा कि अरे तुम लोग इतना रोते क्यों हो? मैं कहां गया हूं? बस यही तो एक घर में से दूसरे ही घर में तो गया हूं। तो यह बात ठाकुर मां को दो-तीन बार कहते हैं। तो ये दो उदाहरण तो है अपने सामने में। गोलाप मार कथा सुने जारा सब दुख कर छिलो तादेर संदेहो मिटे गोो गोलाप मां की बात सुनकर के जो लोग दुख कर रहे थे उनका संदेह मिट गया तारा तो खून शोकोले मिले बोलले जो सब ने मिलकर के कहा शेबा चोल छिलो तेमनी चोलबे सेवा जिस तरह से चल रही थी वैसे ही चलेगी जैसे देखिए देखिए यह महामंत्र की तरह यह वाक्य है। सेवा जैसे ही चल जैसी चल रही थी वैसे ही चलेगी। रामकृष्ण संघ आप देखिए साधना के जो जितने भी प्रकार हैं कर्म योग है, ज्ञान योग है, भक्ति योग है, राजयोग है। यह सब तो है ही है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ी यह साधनाएं। यह तो हमारा अमर वारसा है। हमारा सौभाग्य है कि यह सब साधनाएं हमको मिली है जिससे कि हम आध्यात्मिक जीवन में उन्नत हो पाए। किंतु देखिए हम हम लोगों का परिस्थिति तो वही गिरीश घोष वाला ही तो है। ठाकुर ने कहा दिन में सुबह को एक बार मां का नाम करना, ईश्वर का नाम करना। तो गिरीश कहता है कब सोऊंगा, कब उठूंगा उसका तो कोई ठिकाना नहीं। तो ठाकुर कहते हैं अच्छा खाने से पहले एक बार ईश्वर का नाम स्मरण कर लेना। तो गिरीश कहता है किस मूड में खाऊंगा? एब्सेंट माइंडेड होकर के खाऊंगा। मामला मुकदमा चल रहा है। कोर्ट केस चल रहा है। वही सर में चल रहा है। वो म एब्सेंट माइंडेड होकर के मैं खाना खाऊंगा। तो खाने के पहले भी ईश्वर को नहीं पुकार पाऊंगा। तो फिर ठाकुर आखिर में कहते हैं ठीक है। तो मुझे पावर ऑफ एटर्नी दे दो। तुम्हारी वजह तुम्हारी तुम्हारा होकर के मैं ईश्वर को पुकारूंगा। ऑन योर बिहाफ आई विल कॉल ईश्वर। ऐसा ही तो हो गया पावर ऑफ एटर्नी का अर्थ। तो गिरीश घोष बड़ा ही खुश हो गया। हालांकि उसको बाद में पता चला कि कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग वगैरह कर लेते तो बेटर रहता। यह साधना शरणागति की कोई सहज साधना नहीं। किंतु देखिए जो ट्रेडिशनल साधनाएं हैं उसमें एंट्री बैरियर बहुत बड़ा है। आपको यह क्वालिफिकेशन वो क्वालिफिकेशन सब चाहिए। शरणागति चाहिए, त्याग चाहिए, विश्वास चाहिए। ये सब कुछ नहीं होने सेलेसनेस चाहिए। आप उसमें ज्यादा एकाग्रता चाहिए, विल पावर चाहिए। तभी थोड़ा बहुत आप आगे बढ़ पाएंगे। किंतु यह जो गुरु भक्ति है, गुरु सेवा है, गुरु को संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाना है। उसमें आपका एंट्री बैरियर इतना बड़ा नहीं है। गिरीश घोष जैसा गिरीश घोष यदि यह एंटर हो सकता है। देखिए वह जो एक आईआईटी जी वाला एग्जाम होता है। हमको पता है। मैंने कभी सोचा ही नहीं उस एग्जाम में अपीयर होने का। मुझे पहले से ही पता था अपना लेवल कहां है। झूठ-मूठ का वो एग्जाम में प्रिपरेशन करेंगे। फेल हो जाएंगे। पक्का पता है पता नहीं कितने अटेम्प्ट करेंगे अननेसेसरी वह टेंशन बढ़ेगा फिर एक डिप्रेशन जैसा आ जाएगा हीन बुद्धि आ जाएगी कि अरे भाई मैं परीक्षा में पास नहीं हो रहा हूं तो देखिए कि मैंने कभी अटेमप्ट ही नहीं किया इसी तरह से यह जो सब ट्रेडिशनल साधनाएं हैं कभी-कभी ये आईआईटी जी जैसा वो एंट्रेंस उसका बैरियर जो है बहुत हाई लगता है जबकि यह एक ऐसा ऐसा साधन पथ है कि गिरीश घोष जैसा गिरीश घोष उसमें सहजता से प्रवेश कर लेता है तो फिर हमारे लिए तो ऐसा कोई टेंशन नहीं तो देखिए कि सेवा जैसे चल रही थी वैसी ही चलेगी तो हमारे लिए यह जो गुरु सेवा है श्री रामकृष्ण के प्रति शरणागति है श्री रामकृष्ण का मंत्र लेकर के नाम स्मरण करना है यह सब सहज साधनाएं है आज हमको इतना नहीं लगता राम रामकृष्ण संघ के जितने भी हमारे संघ गुरु हैं वो ठाकुर का ही मंत्र देते हैं। ठाकुर का कथामृत हम पाठ करते हैं। ठाकुर की कहानियां सुनते हैं। ठाकुर के आश्रम में आकर के ठाकुर की सेवा पूजा देखते हैं। दर्शन प्राप्त करते हैं। ठाकुर उत्सव में पार्टिसिपेट करते हैं। रामकृष्ण संघ की कार्यप्रणाली में हम लोग पार्टिसिपेट करते हैं। हम लोगों के लिए आज यह सब कुछ ज़्यादा आश्चर्यजनक या अद्भुत नहीं लगता। किंतु जब रामकृष्ण संघ की स्थापना नहीं हुई थी, उस समय आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना एंट्री बैरियर बहुत बड़ा था। आज संघ एक ऐसा मैकेनिज्म है कि बिल्कुल विद मिनिमम क्वालिफिकेशन लेकर के भी आप साधक जीवन में प्रवेश कर सकते हैं। साधक जीवन तो छोड़ ही दीजिए। मैं कोई अपने को बहुत क्वालीफाई नहीं समझता आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने को किंतु फिर भी मैं सन्यास जीवन में प्रवेश करने का मुझे सद्भाग्य मिला है। यह यदि रामकृष्ण संघ नहीं होता तो मेरे से कभी होता ही नहीं। ट्रेडिशनल सन्यास जिस तरह से उसमें एंट्री बैरियर्स होती है उसमें जिस तरह से आपसे अपेक्षा रखी जाती है तपस्या करने की वो उसमें से मेरे से कुछ नहीं होने वाला था। तो देखिए कि रामकृष्ण संघ ने आध्यात्मिक साधना का पथ एक सहज सरल करके हम सभी मुमुक्षुओं के सामने रख दिया है। तो उसका यह जो ऑपरेटिंग सेंटेंस ऑपरेटिव सेंटेंस जो है वो यह है। सेवा जिस तरह से चल रही थी वैसे ही चलेगी। और यह ठाकुर की सेवा को लेकर के ही यह संघ बना है। यह स्वामी जी जब अमेरिका से आए थे तो यह जो टैगोर फैमिली उस समय का बहुत बड़ा नाम किया हुआ बंगाल में। आज भी रविंद्रनाथ टैगोर तो कवि गुरु है अपने राष्ट्र के। किंतु उस समय उनके पास में धन बल प्रेस्टीज सब कुछ था। तो वहां से किसी निवेदिता थी कि उसका एक था कि भारत के जितने भी प्रोमिनेंट फैमिली है प्रोमिनेंट पेट्रियोट है उनका संपर्क करके रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा से उनको कनेक्ट किया जाए। तो इसी सिलसिले में निविदिता का उनके साथ में मुलाकात हुआ और उनको भी लगा यह विदेशिनी एक है वि इज समथिंग नोवेल है ना वो एनी बेसेंट व्हिच वाज़ वन ऑफ द यूनिक पर्सनालिटी उस समय की कि जिसने भारतीय संस्कृति को अपनाया है। सो निवेदिता इज अनदर वन ऑफ देम। तो एक नोबेलिटी की वजह से वे लोग उसको थोड़ा सा आदर देते थे। तो निवेदिता के थ्रू स्वामी जी के पास समाचार आया कि आपकी राष्ट्र सेवा की प्रवृत्तियों के बारे में जो आप कह रहे हैं वी आर रेडी टू पार्टिसिपेट किंतु बस वही बात है कि यह जो आप गुरु पूजा जो कर रहे हैं ठाकुर की पूजा उसको आप छोड़ दीजिए। ठाकुर को बीच में क्यों लाते हैं? देश सेवा ही तो करनी है। हम लोग चलो सब मिलकर करते हैं। टैगोर फैमिली रामकृष्ण मिशन हम दोनों मिलकर के पेट्रियोटिज्म राष्ट्र नव निर्माण राष्ट्र का नवनिर्माण ये कल्चरल रहनेसा मूवमेंट फॉर इंडिपेंडेंस फ्रीडम मूवमेंट ये सब में हम पार्टिसिपेट करते हैं। बस आप यह ठाकुर को साइड पर कर दीजिए। अननेसेसरी एक गरीब अनपढ़ ब्राह्मण की पूजा करना यह अंधश्रद्धा से ज्यादा और कुछ नहीं है। ऊपर से उनको हेलुसिनेशन होते थे मां काली के ऐसे एक अनपढ़ ब्राह्मण की पूजा करके हम यदि आजाद भारत में प्रवेश करेंगे तो वही जो हजार साल की सुपरस्टिशन हमारे सर पर बैठी हुई थी इंडिपेंडेंट इंडिया में वही सब सुपरस्टिशन फिर से प्रवेशेगी। ये ब्राह्मण की अनपढ़ ब्राह्मण की पूजा करके यहां पे कास्टिज्म और सुपरस्टिशियन ये बाइगोट्री सब तरह के एंगल देखिए आप ठाकुर के साथ में एसोसिएट कर सकते हैं। तो स्वामी जी ने वह जो भारती की पत्रिका है क्या नाम उसका सरला देवी समथिंग उसको जो लेटर लिखा है बेंगली में वन ऑफ द बेस्ट लेटर ऑफ स्वामी विवेकानंद स्वामी जी कहते हैं जिसका कलेजा इतना धकधक कर रहा है भारत के लिए वे लोग सिर्फ एक ठाकुर की पूजा से पीछे हट क्यों कर रहे हैं भाई भारत को इंडिपेंडेंस दिलवाने के लिए आपका यदि भारत के लिए इतना ही हृदय रोता है मन रोता है तो बस एक ठाकुर बीच में क्यों आ रहे हैं आपको देश की सेवा करने के लिए ठाकुर बीच में खड़े हैं बोलकर के आप देश सेवा नहीं करेंगे क्या यह किस तरह का आपका पेट्रियोटिज्म है बोलकर के स्वामी जी ने बड़ा एक स्ट्रांग लेटर लिखा था तो देखिए उसी समय था कि यह ठाकुर की पूजा आप क्यों कर रहे हैं यदि स्वामी जी का ये ग्लोबल एजेंडा है यह लार्जर विज़ है वी ऑल एग्री के यस यह सब होना चाहिए किंतु एक अनपढ़ गरीब ब्राह्मण उसकी यह पूजा पूजा करना यह गुरु की आराधना करना यह कर्ता भजा वगैरह से देखिए कि किस तरह से इंडिया को उसने तोड़ दिया था भीतर में आप वही सब चीजें फिर से ले आ रहे हैं क्या यहां पे सो ये आर्गुममेंट ऐसे लोगों की जिनको कुछ नहीं पता है ठाकुर के बारे में यह तरह की आर्गुमेंट काफी चलती रहती है तो किंतु जो लोग रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा से संलग्न है हमको पता है कि यदि ये आज ठाकुर सेवा नहीं रहेगी तो यह संघ जैसे कि दो दिन में टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। उसी समय देखिए ठाकुर को कैंसर हुआ तो एक ग्रुप सेपरेट हो गया। अरे इस तरह के महामानव को कैंसर हुआ। अर्थात कि उनके पास में कोई जादुई शक्तियां तो थी नहीं। हमको जितना सिखाना था उन्होंने सिखा दिया। हमको जितना सीखना था हमने सीख लिया उनसे। अभी चलो हम अपने से आराधना उपासना साधना करते हैं। बोल के एक ग्रुप निकल गया। उसके बाद में जब यह संघ स्थापन की बात आई सन्यासी संघ तो एक दूसरा ग्रुप सेपरेट हो गया। अंतरंग भक्तों में से ही यह गुरुही भक्त सेपरेट हो गए। कुछ-कुछ भले ही चाहे ठाकुर को अवतार करके पुकारते हो किंतु ठाकुर ने यह गुरु परंपरा प्रारंभ की है। ये ये लोग स्वीकारने को तैयार नहीं थे। ठाकुर के बाद में यदि गुरु है तो हम ही है। यह मां है, स्वामी जी है और फिर राजा महाराज से लेकर के जो गुरु परंपरा प्रारंभ होगी ये लोग गुरु परंपरा को स्वीकारने को तैयार नहीं थे। तो यह एक ग्रुप सेपरेट हो गया। तो देखिए कि ऑलरेडी वो ठाकुर को लेकर के ठाकुर की ये जो गुरु परंपरा को लेकर के ठाकुर के जो ओरिजिनल डिवोटीज थे उसी में इस तरह से डिवीजन होना स्टार्ट हो गया था। आज यदि ठाकुर सेवा को यदि हम छोड़ दें तो साथ-साथ में ही 15 20 टुकड़े तो विदिन वन वीक हो जाएंगे। तो देखिए ठाकुर सेवा है इस संघ का प्राण। यह संघ टिका ही है ठाकुर सेवा पे। यह कर्म, ज्ञान, भक्ति, ध्यान यह सब साधनाएं हम करते हैं। किंतु इन सबके पीछे में ठाकुर के प्रति अपनी शरणागति है। वही सर्वश्रेष्ठ है। वही जैसे कि बाकी ट्रेडिशनल साधनाओं का फाउंडेशन है। और इसीलिए मैं हमेशा कहता हूं कि देखिए जो रामकृष्ण संघ के डिवोटीज हैं उनके लिए जप ध्यान करना बहुत आसान है। एक हाथ में कथामृत लीजिए। दूसरे हाथ में जप माला लीजिए। जब तक जप में मन लगता है तब तक जप कीजिए। मन जब भटकने लगता है तो कथामृत खोल करके ठाकुर की वाणी का पाठ कीजिए। यदि बोलकर के कर पाए तो और भी अच्छा है। तो यह ठाकुर की ही वाणी, ठाकुर का ही नाम यह दोनों आप साथ-साथ में चलाते जाइए। देखिए कि यह जगत कहां पड़ा रहेगा और फिर जब समय मिलता है तो यह मां की स्मृति कथाएं हैं। राजा महाराज की स्मृति कथाएं हैं। स्वामी जी की सब कहानियां है। रेमिनेशन स्वामी जी को हम बड़े राजसिक समझते हैं। एक किसी के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। यहां पे रात को क्या है? डिनर के बाद में डिनर होता है रामकृष्ण संघ में ऑलमोस्ट अराउंड 9:30 के आसपास। तो उसके बाद में 15 मिनट थोड़ा सा पाठ होता है। सब साधु लोग मिलकर के पाठ करेंगे। तो जिन जिनका रिस्पांसिबिलिटी था एक किताब कंप्लीट हो गई तो दूसरी किताब दूसरी किताब कंप्लीट हो गई तो तीसरी किताब वो लोग सिलेलेक्ट करेंगे। किसी एक साधु को रिस्पांसिबिलिटी दिया है। तो मैंने उनको कहा कि अरे स्वामी जी का कुछ सिलेलेक्ट करो ना। बाकी तो तुमने बहुत कुछ सिलेलेक्ट कर लिया। तो बोलते हैं स्वामी जी बड़े राजसिक है। स्वामी जी को रात को सोने से पहले पढ़ के फिर रात को नींद नहीं आती है। मन बड़ा ही यह चंचल हो जाता है। चलो अभी गांवगांव जाए घर घर जाए लोगों की सेवा करें। तो मुझे बड़ा हंसी आया था उस समय इन अ वे स्वामी जी इस वेरी राजसी। किंतु देखिए स्वामी जी की कहानियां जो है जिस तरह से ठाकुर और मां राजा महाराज की कहानियां जो कि हमारे मन को सांत्वना देती है स्वामी जी की भी इनफ कहानियां है। सो ये छोटी-छोटी कहानियों का पाठ करना कथामृत का नियमित पाठ करना और ठाकुर का नाम स्मरण जप करते रहना इससे सहज साधना और कोई हो नहीं सकती है। रामकृष्ण संग में साधना करना जप ध्यान करना एक बार ठाकुर पर अपना विश्वास आ जाए तो फिर इससे सहज और कुछ नहीं है। और यह सबके पीछे देखिए यही महावाक्य कि सेवा जिस तरह से चल रही थी वैसे ही चलेगी। ये शशि महाराज शशि महाराज को उसके लिए सबसे बड़ा श्रेय देना चाहिए क्योंकि बाद बात बाद बात बाद में हम पढ़ेंगे काफी कहानियां पढ़ेंगे अभी वराह नगर मठ का पीरियड जो कि हम पाठ कर रहे हैं स्वामी जी के जीवन में शशि महाराज थे कि जो कि इतनी समस्याओं के बीच में भी जिन्होंने ठाकुर की सेवा छोड़ी नहीं बाकी सब गुरु भाई प्रवृज्या के लिए इधरउधर चले गए अखंड खंडानंद जी कहां वो तिबेट है सेंट्रल एशिया तक जाने का प्लान कर रहे थे स्वामी जी का तो हमको पता ही है पूरे वर्ल्ड में घूम कर के आ गए तो और सभी गुरु भाई ये पूरा भारत भ्रमण कर ही रहे थे किंतु शशि महाराज एक थे कि जैसे कि ठाकुर की सेवा का अखंड दीप जो है जो कि उन्होंने प्रज्वलित करके रखा था। तो यह देखिए कि ठाकुर की सेवा जब तक रामकृष्ण संघ में व्यवस्थित रूप से चलती रहेगी तब तक हमारी साधना है वह भी सहज रूप से आगे बढ़ती रहेगी।
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि के बाद के दिनों का वर्णन : स्वामी अद्भुतानन्द कथित
इसके आगे क्या कहते हैं लाटू महाराज अद्भुतानंद जी से दिन तो निरंजन भाई शशि भाई बूढ़ो गोपाल दादा आर तारक दादा शखाने रहलो उस दिन तो अर्थात कि ठाकुर की पूत ठाकुर के पूत देह को चिताग्नि में भस्मीभूत किया गया था उसी दिन अर्थात कि मेरे ख्याल से 16th अगस्त की ही बात चल रही है से दिन उस दिन तो निरंजन भाई शशि भाई बूढ़ो गोपाल दादा और तारक दादा वहीं पर रहे हमने आर जोगिन भाई मायर कथा में तो ठाकुर भोगेर व्यवस्था कोते कोलकाताई गै मैं और योगिन भाई योगानंद जी मां की मां की बात के अनुसार मां की बात को अनुसरण करते हुए ठाकुर के भोग की व्यवस्था करने के लिए कोलकाता गए दुपरे दिन ठाकुर भोग देवा होए छिलो उस दिन दोपहर को ठाकुर को भोग दिया गया था अर्थात ये दोपहर की बात है तो अर्थात ये 17th अगस्त की बात होगी क्योंकि 16th अगस्त को रात को 1:00 बजे माने सुबह को 1:00 बजे सुबह होने के पहले के 1 am 1 am के आसपास में ठाकुर का देह त्याग हुआ इसके बाद में 16th अगस्त को ही शायद क्रिमेट कर दिया गया था। रात को सब आए होंगे। तो यह 17th अगस्त की बात है कि दोपहर को ठाकुर को भोग दिया गया था। शबाई मिले तार घरे कीर्तन कोरे छिलो सब ने मिलकर के उनके कमरे में कीर्तन किया था। रातें सुजीर पायस कोरे ताके निवेदन करा होलो। रात को सूजी अर्थात कि उपमा का पायस बना के रवा रवा का पायस बना करके उनको निवेदित किया गया था फिरन राम नाम सुनानो होलो और उसके बाद में राम नाम सुनाया गया तार पर शोभ जे बाड़ी चोले गो उसके बाद में सभी अपनेप घर चले गए हमने गोपाल दादा और तारक दादा शखाने रोए गू मैं गोपाल दादा बोल अद्वैतानंद जी और तारक दादा महापुरुष महाराज शिवंद जी तीन लोग वहीं पर रह गए। देखिए ठाकुर की सेवा आज जिस तरह से चलती है उसका ऑलमोस्ट सब कुछ उसी पहले ही दिन से ठीक-ठीक हो गया था कि रात को अभी भी देखिए कि रवा का पायस ठाकुर को दिया जाता है अपने सभी आश्रमों में। तीन चार दिन पर तीन चार दिनों के बाद में मां हम के गोपाल मां के आर लखी दीदी के शंगे एक बार दक्षिणेश्वर गले तीन-चार दिन के बाद में मां मुझे गोलाप मां को और लक्ष्मी दीदी को साथ में लेकर के एक बार दक्षिणेश्वर गई शधारा आगे तीन काशीपुर बागाने फिरे एलेन संध्या के आगे ही वह काशीपुर गार्डन में फिर लौट उठ करके आई सुने छ से दिन बलेर दिखे रामबाबू बागाने ऐसे छिले सुना है कि उस दिन शाम के समय रामबाबू बागान में आए थे दुपरे शशि भाई निरंजन भाई लोरेन भाई राखाल भाई और बाबूराम भाई ऐसे शीलो दोपहर को शशि भाई निरंजन भाई लोरेन भाई स्वामी जी राखाल भाई और बाबूराम भाई आए थे रामबाबू नाकी आश्रम तुले चाहिए छ आर शोकोल के निजे निजे बाड़ी फिरे बोले छ रामबाबू ने सुना कि आश्रम को उठा देने को कहा और कहा सबको कहा कि आप सब अपने अपने घर वापस चले जाइए देखिए ऑलरेडी लाटू महाराज काशीपुर गार्डन हाउस को आश्रम बोलकर के वो पहचान रहे हैं। आश्रम के नाम से पुकार रहे हैं। और यह जितने भी त्यागी संतान आए थे रामबाबू ने सबको कहा कि भाई यह आश्रम अभी उसको भाड़े पर लिया गया था तो तो अभी भाड़ा तो इतना तो कौन नियमित रूप से देता रहेगा तो यह अगस्त मास के अंत तक यह जो भाड़ा का रकम दिया गया है तब तक यह रहेगा गार्डन हाउस अपने पास में इसके बाद में बेटर है कि सब अपनेप घर चले जाइए यह इसको लेकर के हमारा काफी काफी डिस्कशन वह स्वामी जी के जीवन के दरमियान हो चुका है। इसलिए इसमें हम बहुत ज्यादा नहीं जाते हैं। ए कथा सुने निरंजन भाई आर शशि भाई भारी दुख होए छिलो यह बात सुनकर के निरंजन भाई और शशि भाई को बहुत दुख हुआ था तादेर इच्छे जेमोन चोलछे ठाकुर सेवा तेमनी रोज रोज चोलू उनकी इच्छा थी कि जिस तरह से ठाकुर की सेवा चल रही थी वैसे ही रोज रोज चलती ही रहे जैसे कि ठाकुर अभी भी सदैव वर्तमान है काशीपुर में और जिस तरह से त्यागी संतान उनकी सेवा करते थे तो प्रतिदिन इस तरह की सेवा चलती ही रहे निरंजन भाई तो से रात बलराम बाबू बाड़ी गलो निरंजन भाई तो उसी रात को बलराम बाबू के घर गया था परेर दिन बलराम बाबू मां के नी आश बारजनो काशीपुर निजे गए छिले दूसरे ही दिन बलराम बाबू मां को ले आने के लिए अपने से काशीपुर आए थे। देखिए एक बार यह ठीक हो गया कि काशीपुर गार्डन हाउस का जो रेंट है भाड़ा है वह अगस्त मास के बाद में फिर अभी नहीं दिया जाएगा तो फिर मां का कहां पर जाना होगा? तो यह निरंजन भाई निरंजनंद जी जो बलराम बाबू के घर गए थे तो लगता है कि यही बात करने के लिए गए होंगे कि हम लड़के तो इधर-उधर कहां पर भी चले जाएंगे किंतु मां का क्या होगा? तो फिर दूसरे ही दिन बलराम बाबू स्वयं काशीपुर आकर के मां को लेने को आए और अपने घर ले जाएंगे। माय शंगे ठाकुर कापड़ चोपड़ शो बलराम बाबू बाड़ी ते पाठी देवा होो मां के साथ में ठाकुर के जितने भी वस्त्र वगैरह थे व्यवहृत व्यवहृत वस्त्र जितने भी थे सब बलराम बाबू के घर भेज दिया गया मां बलराम मंदिर चोले गलेन मां बलराम मंदिर चली आई हामी गोपाल दादा और तारक दादा बागाने रोए गू मैं गोपाल दादा और तारक दादा बागान में ही रह गए दुपरे सबाई आज तो आ रात होले चले जे तो दोपहर को सब आते और रात होने से सब चले जाते रामबाबू बो इच्छा छिलो जैसे ठाकुर कलश टीके काकुरगाछर बागा ने समाधि दिए मठ बाना बेन रामबाबू की बहुत इच्छा थी कि ठाकुर के अस्थि से पूर्ण वह कलसी को काकुड़गाछी में योगो ध्यान उनका जो गार्डन था वहां पर समाधि बना करके उसके ऊपर में मठ बनाए रामबाबू शेक थाई शशि भाई निरंजन भाई राजी होलो ना रामबाबू की इस बात से शशि भाई और निरंजन भाई दोनों राजी हुए नहीं तारा बोलले उन्होंने कहा आमरा कोलसी देबो ना हम लोग कलसी देंगे नहीं लोरेन भाई तखन तादेर कतो बुझा ले उस समय लोरेन भाई ने उनको कितना समझाया आया कहा देखो कोलशीनी आमादे झगड़ा झटी करा उचित हबे ना कलसी लेकर के हम लोगों को झगड़ा करना उचित होगा नहीं आमरा के कोथाई था कि तार कोनो ठीक ठिकाना नहीं हम लोग कहां पर रहेंगे उसका कोई ठिकाना नहीं है रामलाल दादा तो तार बागान खानी ठाकुर नाम में लिखे दीते चालो रामलाल दादा तो उनका जो बागान है वो राम दादा रामलाल दादा नहीं राम दादा राम दादा तो उनका जो बागान है वह ठाकुर के नाम पर लिख देना चाहते हैं। तो यह तो अच्छी ही बात है। तो शेखाने ना हो तार पूजो कर लूं ना हो हम लोग वहां पर जाकर के ठाकुर की पूजा करें। आमी तो बुझ तार आदर्श जीवन गड़े नीले ही आदर उद्देश्य सफल होवे। मैं तो यही समझता हूं कि तार अर्थात कि ठाकुर के आदर्श अनुसार जीवन गठन करना है करने से ही हमारा उद्देश्य सफल होगा जन्माष्टमी आगे दिन हमने रामबाड़ी गूं जन्माष्टमी के आगे दिन मैं रामबाबू के घर गया शेखान होते काकुड़ गाछ बागाने गू वहां से काकुड़ गाछ के बागान में गया परे दिन शोकाल बेला रामबाबू बाड़ी थे के कीर्तन करते शकोले मिले काकुड़ गाछते गू दूसरे दिन सुबह को रामबाबू के घर से कीर्तन करतेकरते सब लोग मिलकर के काकुड़ गाछ गए शशि भाई नीजे माथा कोरे कोलसीए गैो शशि भाई अपने खुद के सर पे रख के कलसी ले गए शेखा ने कलसीर ऊपर माटी फैलते देखे शशि भाई कैदे उठ लो वहां पे कलसी को जैसे वो समाधस्त किया जाने के लिए एक गड्ढे में रखकर के उस पर जो मिट्टी रख रहे थे वो माटी फेंकता हुआ देखकर के शशि भाई रो उठा बोलले ओगो ठाकुर गाय बोला छे बोल उठा अरे ठाकुर के देह पे लग रहा है देखिए ये किस कितना ठाकुर के साथ में शशि महाराज का तादात्मय हो गया था शशि भाई कथा सुने शकलेर चोखे झोले ऐसे छिलो लो शशि भाई की बात सुनकर के सभी की आंखों में पानी आ गया था। श्मशान होते फेरा समय उपेन बाबू के शापे केटे छिलो। श्मशान से फिरने के समय वापस आने के समय उपेन बाबू को यह बसुमती का जो उपेंद्रनाथ है उसको सांप ने काटा था। ये श्मशान अर्थात कि ये काशीपुर की काशीपुर श्मशान ठाकुर की देह को चिताग्नि में रखने के लिए जो गए थे सब वहां से वापस आने के समय की बात है उसी दिन 16th अगस्त की ही बात है नित्य गोपाल बाबू से जाएगा गए लोहा पुिए छांका दिए छिलो नित्य गोपाल यानी कि वही जिसको ठाकुर ने कहा था साधु सावधान तो उसने लोहे को गर्म करके जहां पर सांप ने काटा था वहां पर डाम दिया था। श घा तखनो सुकोनी तो वह घा त अभी तक सूखा हुआ नहीं था। देखिए यह बात तो कर रहे हैं वही काशी काकुड़ गाछी की कि जहां पर ठाकुर के अस्थियों को वहां पर रखा गया था जिसके ऊपर में यह मंदिर बनाना चाहते थे। तो उस दिन उपेन भाई उपेन बाबू भी गए थे। तो किंतु जब उपेन बाबू ठाकुर को चिताग्नि में आहुत करके वापस आ रहे थे शशान से उस समय उनको वो जो लगा था सांप ने काटा था और यह जो डाम दिया गया था लोहे का वो अभी भी पूरा पूरा वो ठीक नहीं हुआ था तब उपेन बाबू काकुड़ गाछ ते कीर्तन करते करते गए छलेन इसके बावजूद उपेन बाबू काकुड़ गाछ कीर्तन करते करते गए थे तीन साधु संगो कोते बोलो बा वह साधु संग करना बहुत पसंद करते थे। बहुत अच्छा लगता था। काकुड़ गाछ उत्सव पोर रामलाल दक्षिणेश्वर एकटा भंडारा दिलन काकुड़ गाछ के उत्सव के बाद रामलाल दादा ने दक्षिणेश्वर में एक भंडारा दिया था शेखाने कीर्तन होए छिलो वहां पे भी कीर्तन हुआ था मां के निय जाबार्जन ने रामलाल दादा बलराम बाबू गाड़ी बलराम बाबू बाड़ी ऐसे छिले और जब रामलाल दादा ने दक्षिणेश्वर में भंडारा दिया था तो वो मां को ले जाने के लिए बलराम बाबू के घर आए थे। बाकी मां शेख शेखाने जेते चाहलेना किंतु मां ने वहां पे जाना नहीं चाहा था। दक्षिणेश्वर रामलाल दादा देवा भंडारा हमने गिल दक्षिणेश्वर में रामलाल दादा ने जो भंडारा दिया था वहां पे मैं गया था ठाकुर महासमाधि पर काशीपुर बागान हमार मन टिकतो ना ठाकुर की महासमाधि के बाद में काशीपुर बागान में मेरा मन टिकता नहीं हमने माझे माझे रामबाबू बाड़ी चोले जे तुम मैं बीच-बीच में रामबाबू के घर चला आता। तो देखिए यह लाटू महाराज का काफी विस्तृत वर्णन है यहां पे। इसके बाद में
श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: स्वामी रामकृष्णानन्द कथित
शशि महाराज का वर्णन है। यह भी बड़ा इंपॉर्टेंट है। शशि महाराज तो स्वयं ठाकुर की सेवा करते थे। इसके लिए इस वर्णन का काफीेंस भी है। क्या कहते हैं शशि महाराज? स्वामी रामकृष्णानंद जी काशीपुर ठाकुर अंतिम दिन आमरा शोभाई भाबलाम तनी अपेक्षा कृत भालो आन काशीपुर में ठाकुर के अंतिम दिन हम सब ने यानी कि 15th अगस्त 1886 उस दिन को हम सबको लगा कि ठाकुर आज कंपेरेटिवली अच्छे हैं। कारण तिनी रात्रे अन्य दिन चे बेश खेले क्यों क्योंकि रात को उन्होंने दूसरे दिनों की अपेक्षा ज्यादा खाया था एवं निजे प्रयाण संबंध किछु ही बोले नहीं और उनके खुद के महाप्रयाण के बारे में ठाकुर ने कुछ कहा नहीं था बिक बेला प्राय एक सप्ताह हो आगे तीन जोगिन के बोलले पाजी देखते दिन शुभ दिन की ना ऑलमोस्ट एक सप्ताह आगे ठाकुर ने योगिन को स्वामी योगानंद जी को पूछा था कि यह जो दिन है वह शुभ है कि नहीं तो ठाकुर ने पहले ठीक करके रखा था कि यह दिन शुभ है कि नहीं किंतु ठाकुर ने किसी को बताया नहीं था ए छाड़ा गतो को एक दिन धोरे आमादे बोल छिलेन और इसके अलावा भी वो कुछ दिनों से हमको बता रहे थे समुद्रे जे जहाज भालो तार तीन भाग दुई भाग चोले भरे गए छ समुंदर में जो जहाज वह तैर रहा था उसका तीन में से दो भाग पानी में डूब गया है एवं शीघ्र बाकी अंश टुकु जले भरे जाबे वो जहाष्ट समुद्र तलिए जाबे और जल्द ही शीघ्र ही माने जल्द ही बाकी का जो अंश अभी पानी के ऊपर था वह भी पानी से भर जाएगा और जहाज आज समुंदर के तले में जाकर के डूब जाएगा। देखिए यह कितना सुंदर एक इमेजरी ठाकुर हमारी नजर के सामने रखते हैं। ठाकुर को जो विज़न हुआ था दर्शन जो हुआ था ठाकुर ने मां को तो कहा ही कि यह अनंत समुद्र है उसके ऊपर में मैं कहां पे जा चलता जा रहा हूं। उसके ऊपर से होकर के मैं पता नहीं कहां दूर-दूर जाता जा रहा हूं। तो वह वैसे ही एक अनंत समुद्र की उपमा ठाकुर ने दी ही थी मां को और फिर यहां पर फिर से एक दूसरी उपमा समुद्र के साथ में ही जुड़ी हुई। कुछ दिनों से ठाकुर यह सबको अपने शिष्यों को बता रहे हैं कि जो जहाज जो कि ऑलरेडी जो दो तिहाई पानी के भीतर में डूबा हुआ है। वो अभी पूरा पूरा पानी में डूब जाएगा। हमको यदि आइसबर्ग के बारे में पता है हिमखंड जिसको कहते हैं। आइसबर्ग का क्या होता है कि 23 थर्ड पानी के नीचे रहता है और वन थर्ड होता है पानी के ऊपर। तो ऑलरेडी ठाकुर का जहाज डूब ही रहा था। दो तिहाई 2 थर्ड पानी में डूब ही गया था। बहुत जल्द जो वन थर्ड पानी के ऊपर है वह भी वो भी डूब जाएगा। किंतु हमरा विश्वास को नहीं जेनी शक्ति चले जा किंतु हम लोगों ने विश्वास नहीं किया कि वह सत्य सत्य सही सही चले जा रहे हैं कोखो ही मने हो तो ना तनी जंत्रणाएं कातर होए छ कभी भी हमको ऐसा नहीं लगता था कि यह ठाकुर को जो कैंसर हुआ है कैंसर की यंत्रणा से वह कातर हो गए हैं। यानी कि इतने कष्ट उनको भोग करना पड़ रहा है कि अभी उनसे सहा नहीं जाता। ऐसा तो हमने कभी नहीं देखा था कि ठाकुर असह्य कष्ट कर रहे हैं। हालांकि असह्य कष्ट ठाकुर को होता था किंतु चेहरे पे वाणी वर्तन में वह नहीं दिखता था। तन सर्वदा प्रफुल्लो थकते वह हमेशा प्रफुल्ल रहते खुश रहते खुश मिजाज रहते। बोलते भो आ और सुखे आ छे कहते कि वो अच्छे हैं और सुख में है केवल एक खाने की एक आ बस यहां पे क्या कुछ हुआ है म कैंसर हुआ है हड्डी पसली दिख रही है खाना खाने में तकलीफ है मृत्यु अभी सामने ही है फिर भी कहते हैं बड़े मजे से हूं बड़े आनंद से हूं बस यहीं पे थोड़ा कुछ हुआ है गले में तो तीन ही बोलते हैं वो कहते ए मध्य दुई छ इसके भीतर में दो लोग हैं। एक जन जगन माता और एक जन तार भक्त एक है जगन माता और एक है उनका भक्त भक्त ही अशुख कोरे छ भक्त को ही अशुख हुआ है। भक्त को ही रोग हुआ है। देह के भीतर में दो है। जगन माता है। एक उनका भक्त है। भक्त को ही रोग हुआ है। जगन माता को कुछ नहीं हुआ है। देखिए इसको लेकर के हम कितना सब कुछ डिस्कशन कर सकते हैं। अद्वैत वेदांत के अनुसार हमको तो पता है कि आत्मन ही है हमारा सही नेचर। जैसे वो ठाकुर खुद कथामृत हम पढ़ रहे थे जो उपमा देते थे ना कि एक सूरज है और उसका प्रतिबिंब एक घट में पानी रखा है तो घट के भीतर में जो पानी है उसमें सूरज का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है। जिस दिन घट टूट जाएगा वैसे ही यह जो सूरज का प्रतिबिंब है वह अदृश्य हो जाएगा। हम ऐसा भी नहीं कहेंगे कि वह सूरज के साथ विलीन हो जाए। विलीन हो जाएगा। हमने देखा है थोड़ी ना ऐसा कभी होता है कि यहां पे यह प्रतिबिंब यहां पे घट टूटा आप एक्सपेरिमेंट करके देख लीजिए अपने वरांडा में ये अपने ये जो छत के ऊपर में घट ले जाकर के रखिए पानी भर के देखिए सूरज का प्रतिबिंब है फिर घट को तोड़ दीजिए क्या होगा प्रतिबिंब के साथ उड़ के क्या सूरज को मिलने को जाएगा नहीं प्रतिबिंब ही मिथ्या है माने प्रतिबिंब सिर्फ प्रतिबिंब ही है उसके अलावा और कुछ नहीं जैसे ही घट टूटा प्रतिबिंब हवा में विलीन हो गया। उसका एक रिलेटिव एग्जिस्टेंस मात्र था। तो यहां पे भी ठाकुर वही अद्वैत वेदांत वाली बात को द्वैत में करके कहते हैं कि जगन माता है और उनका भक्त है। यह देखिए प्रतिबिंब आप जिस घट में रखा है पानी उस पानी में आप चाहे हजार पत्थर डालिए। देखेंगे कि प्रतिबिंब सतत रूप से देखेंगे उसको डिस्टोर्ट होता रहता है। अभी प्रतिबिंब डिस्टोर्ट हो रहा है। उसमें पानी में पत्थर डालकर के क्या वह सही सूरज है वह भी डिस्टोर्ट हो रहा है क्या? उसमें भी यह जो रिपल्स दिख रहा है क्या? उसके ऊपर में भी यह तरंगे दिखाई दे रही है क्या? नहीं। वो जो तरंगे होगी जो रिपल्स होगा जो डिस्टॉर्शन होगा शेप और साइज में वो घट के भीतर में जो पानी रखा है उसमें जो प्रतिबिंब है सूरज का उसी में यह सब विकृतियां दिखाई देगी। इससे सही सूरज का कोई लेना देना नहीं है। तो वैसे ही ठाकुर कहते हैं एक है जगन माता दूसरा है भक्त। भक्त को कैंसर हुआ है। किंतु इससे जगन माता को कोई फर्क नहीं पड़ता। यानी कि ठाकुर ने जगन माता के साथ में अपना तादात्म्य कर लिया है। उनको पता चल गया है कि उनके भीतर में जो जीवात्मा है वह रिफ्लेक्शन के अलावा और कुछ नहीं है। जोखन श्री रामकृष्ण देह रक्षा कर लेन अमार मने होई सेटे ही छिलो तार जीवन शो चे आनंदमय मुहूर्त जिस समय ठाकुर ने देह रक्षा की अपना देह त्याग किया तब मुझे लगा था कि वही था उनके जीवन का सबसे आनंदमय मुहूर्त देखिए कितना आश्चर्यजनक बात जब देह त्याग होता है तो कितना कष्ट होता है कितना पेन सफरिंग होगा तो वह नहीं होकर के शशि महाराज कहते हैं देह त्याग का मुहूर्त ठाकुर के जीवन का सबसे आनंदमय क्षण था तार मु दिए एकटा आनंद शिहरण बोए गो उनके भीतर में से आनंद का एक शिहरण बह गया आनंद की एक रिपल आनंद की एक तरंग बह गई आमी निजेता देखे छ मैंने स्वयं इसका दर्शन किया है। देखिए शशि महाराज पास में ही खड़े थे। उन्होंने स्पष्ट देखा जिस क्षण देह त्याग हुआ आनंद की तरंग जैसे कि वो वही उपमा माने एक इमेजरी यदि हम याद करें तो ठाकुर को जब पहली बार मां का दर्शन हुआ था। मां काली का वही गर्भगह की फेमस कहानी ठाकुर ने मां का खड़ग उठाकर के कहा या तो दर्शन दो या तो मैं अपना गला काट दूंगा। उस समय का जो विवरण शरद महाराज ने लीला प्रसंग में किया है। शरद महाराज क्या लिखते हैं? जैसे कि प्रकाश की लाखों तरंगे आकर के ठाकुर के ऊपर में गिरी और ठाकुर को जैसे कि इस प्रकाशमय किरणों में वो वो समाधस्त हो गए। तो देखिए यह जो प्रकाश की किरणें प्रकाश की तरंगे जो कि आकर के ठाकुर को घेर ली थी। ठाकुर के ऊपर टूट पड़ी थी। तो वही जैसे कि प्रकाशमय आनंद की तरंग लहर ठाकुर की महासमाधि के समय उनके पूरे देह में जैसे कि वह रम गई थी। पूरे देह में जैसे कि बह गई थी। से शेष दिन प्रति घटना अमार मने आ उस आखिरी दिन की प्रत्येक घटना मुझे याद है। अच्छा अभी ये जितनी भी घटनाओं का शशि महाराज विवरण करते हैं अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: ठाकुर कहते हैं—इस शरीर में दो हैं: एक माँ, और दूसरा उसका बालक। बालक ही बीमार है, माँ नहीं -- यह बात मुण्डक उपनिषद की उस कथा से बिल्कुल मेल खाती है—एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं: एक रोगी और जर्जर, दूसरा युवा और सुंदर। और यह बात कहते है जब की वो मृत्यु के द्वार खड़े है!
बिल्कुल सही बात है। वो जो नीचे वाला पंखी है वह बीमार है। म रोगी है और ऊपर वाला जो सुस्त पर परफेक्ट है एकदम। वाह वेरी गुड। यस यस ये ठाकुर कब बोलते हैं पता है जो नीचे वाला पक्षी एक के बाद एक डाल जंप करके टॉप ब्रांच पे चला जाता है देखता है कि ए से मैं यही मैं हूं तो उसके बाद में किंतु वो नीचे आता है वही पक्षी बीमार होकर के क्यों क्योंकि वह सभी पक्षी को यह बताना चाहता है कि यह जो वही वाला पक्षी है वह हमारा रियल नेचर है किंतु जब यह पक्षी नीचे नीचे आता है तब उसको किंतु पता है कि दैट इज माय ट्रू नेचर। दिस इज नॉट माय ट्रू नेचर। तब ठाकुर यह बात करते हैं। यानी पहले पक्षी जो नीचे है वह तो अज्ञानी है। किंतु ठाकुर ज्ञान प्राप्त करके नीचे आए हैं लोक शिक्षा के लिए।
प्रश्न: आश्चर्य की बात है—शशी महाराज कहते हैं कि ठाकुर का अंतिम क्षण ही उनका सबसे महान आनंद का क्षण था।
और ये बोलते कौन है? नो नॉनसेंस। शशि महाराज इस नो नॉनसेंस पर्सन। कोई सेंटीमेंटालिटी नहीं, रोना धोना नहीं। कि बाबूराम महाराज का जैसे था एक वैष्णव भाव वाले थे भाव थोड़ा सा हो जाता था उनको शशि महाराज इस अ कंप्लीट नो नॉनसेंस पर्सन वो यदि ऐसा बोलते हैं कि यह ठाकुर के जीवन का सबसे आनंदमय मुहूर्त था देन वी हैव टू टेक इट विद सीरियसली और यह तो ठाकुर ने जानबूझकर के अपने देह में डिसीज आने दिया ना मां ने क्या कहा देखिए गिरीश घोष का पाप लेकर के ठाकुर को यह हुआ है वरना उनके पवित्र देह में इस तरह का कहां से आने वाला था। तो यह तो मां ने खुद ने कहा है। सो ठाकुर तो वहां पे पहुंच गए थे टॉप ब्रांच पे। वह जो पक्षी के साथ में तादात्म हो गया था। किंतु लोक कल्याण के लिए और फिर क्या है ना उस लेवल पे उनकी इच्छा और मां की इच्छा एक हो गई है। मां ने आदेश दिया। अभी खुद ने खुद को आदेश दिया। अब कैसे आप डिफरेंशिएट करेंगे कि तू ही भाव मुखे था। सो फिर वो भाव मुख में रह के पृथ्वी पर लौटे वापस। सो एट वन पॉइंट निर्विकल्प समाधि में वह तो खुद जगन माता थे। उन्होंने अपने को आदेश किया है कि जगत का कल्याण करने के लिए वापस आना है।
प्रश्न: हमारी अपनी कोई योग्यता नहीं। इसी लिए गिरीश को देखकर भरोसा होता है. अगर गिरीश कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं !
और यही है ना देखिए सबके लिए तो आना है ना। जो योगी है माने जो साधक है वह तो कैसे भी करके अपना मार्ग निकाल लेगा। जो कि साधना में बिल्कुल जीरो है। उसी के लिए तो अवतार का आगमन है। अवतार का और कोई डेफिनेशन ही नहीं है। अब जैसे यह वो जो राज चंद्र वगैरह है गुजरात में तो आप थोड़ा सा मैंने ऐसे सब थे मेरे मित्र मैं जब राजकोट में था और वो राजचंद्र फिर वो वो क्या दो-तीन है ना वो वही जैन के नाम भूल गया तो वो उनकी बातें किया करते थे। तपस्या करनी है, यह करना है। मैंने कहा बहुत अच्छा है। अब देखिए वे लोग ऑलरेडी एक लेवल पर पहुंच चुके थे तो उनको पढ़ते हैं। उनको अट्रैक्ट होता है। किंतु जो लोग बिल्कुल जमीन पे हैं। जमीन के गड्ढे में गिरे हैं। उनका हाथ पकड़ के निकालने वाले तो ठाकुर ही है। ना उसका अर्थ ही हुआ ना कि वहां पे एंट्री बैरियर है। माने सभी लोग प्रवेश नहीं कर पाएंगे। माने इस अर्थ में कि स्वीकार करना फॉलो करना। अब स्वीकार तो आप कर ही लेंगे। फॉलो करना मुश्किल है।
प्रश्न: अपने कहा की रामकृष्ण भावधारा में एंट्री बेरियर entry barrier नहीं है. किन्तु आपने ऐसा नहीं कहा की यहाँ ईश्वर प्राप्ति सहज है.
ना एक्चुअली मैं बोलने वाला था उस समय किंतु बिकॉज़ कि उसने व्याख्या करने की इच्छा नहीं हो रही थी आज ज्यादा। इसमें ऐसा है देखिए स्लोपिंग स्लोप है ना ठाकुर खुद उदाहरण देते हैं। वो किले में गए थे फोर्ट में देखा वो स्लोपिंग वे है। तो आप जब अभी जैसे वो रैंप होता है चढ़ना बड़ा आसान है और आप धीरे-धीरे करके चढ़ भी जाएंगे। किंतु शायद एक लेवल ऐसा आएगा कि फिर आपको थोड़ा सा स्ट्रेन लगाना पड़े जैसे-जैसे ऊपर चलते जाएंगे किंतु एंट्री बैरियर वहां पे नहीं जबकि स्टेप्स होते हैं वहां पे एंट्री बैरियर उस अर्थ में होता है कि व्हीलचेयर लेकर के जाना मुश्किल है। सो अल्टीमेटली देखिए कि जो फोर्स लगाना है ऊपर जाने के लिए वो आपका इक्वल ही होगा। किंतु यहां पर स्लोपिंग स्लोप है और ऊपर जाकर के आपको फोर्स लगाना है। इनिशियल स्टेजेस में फोर्स इतना नहीं लगाना है। सो दैट इज व्हाई कि एंट्री बैरियर इज लो। दैट इज वन थिंग। ऐसा तो बिल्कुल नहीं है कि आपको ईश्वर प्राप्ति करनी है तो फ्री में हो जाए। ऐसा तो कभी नहीं होने वाला।
प्रश्न: गिरीश ने भी कहा था की पावर ऑफ़ अटोर्नी देने के बाद में उसे सही में तपस्या करनी पड़ी थी.
एक्चुअली देखिए यह जो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट होता है ना हमारे भीतर में सब कुछ हम हमारे से जो सर्वाइवल इंस्टिंक्ट ही करवाता है। जैसे ही हमको थोड़ा सा भी डर लगा वी विल हम लोग डर जाएंगे और वी विल ट्राई टू स्ट्राइक बैक। यह फाइट और फ्लाइट इंस्टिंक्ट है। इट इज सो हार्ड वायर्ड विद इन ह्यूमन डीएनए कि जैसे ही सामने थ्रेट आती है, हम या तो फाइट करेंगे या तो भाग जाएंगे अपने को बचाने के लिए। सर्वाइवल इंस्टिंक्ट इज द स्ट्रांगेस्ट इंस्टिंक्ट इन अ ह्यूमन माइंड। आप कामकांचन भी देखेंगे ना तो इतना डीप नहीं जाता है जितना सर्वाइवल इंस्टिंक्ट जाता है। आप देखिए ये सर्वाइवल इंस्टिंक्ट कहां तक जाता है? काम कांचन कहां तक जाएगा? ये हायर लेवल ऑर्गेनिज्म है वहां तक किंतु एक अमीबा को भी आप लेंगे सिंगल सेल एक ऑर्गेनिज्म को भी लेंगे आप सिरिंज वो नैनो सिरज जाता है उसके पास में ले जाएंगे इट विल ट्राई टू सेव इटसेल्फ सर्वाइवल इंस्टिंक्ट इज द मोस्ट फंडामेंटल इंस्टिंक्ट इन एनी लिविंग बीइंग काम कांचन तो फिर एकदम हायर ऑर्गेनिज्म में आता है बबून है ये म तब आता है राइट सो दिस यहां पे आपको सर्वाइवल इंस्टिंक्ट इटसेल्फ को त्याग करना है व्हिच इज मच डीपर देन काम कांचन त्याग क्योंकि ठाकुर यदि ठाकुर को शरणागति कर दी तो फाइट और फ्लाइट क्या फिर तो कोई प्रश्न ही नहीं आता जो कुछ भी है सब ठाकुर ही करेंगे तो दैट इज फार फार मोर डिफिकल्ट देखिए आप पत्थर में से जैसे ही प्राण संचार हुए सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिज्म वहां से ही सर्वाइवल इंस्टिंग स्टार्ट होता है। फिर यह जो बाकी जो लस्ट एंड ग्रिड है वो तो कब म मिलियंस ऑफ बिलियंस ऑफ इयर्स फर्दर अहेड इन द इवोल्यूशनरी लाइन।
प्रश्न: कंकुरगाछी का मंदिर जैसे ठाकुर की अस्थियो पे बना, वैसे ही क्या अपने अन्य मंदिरो में ठाकुर के अस्थि रहते है?
हां वो तो है वो तो है हां मतलब नागपुर के मंदिर में मैं तो जब था ना मेरा पोस्टिंग नया मंदिर बना तो ठाकुर की वेदी में से वेदी के पीछे में वो रखा था वो पूरा बॉक्स तो उसको निकाला गया वो उस समय कौन आए थे एक वाइस प्रेसिडेंट महाराज आए थे उन्होंने ही अपने हाथों से बॉक्स निकाला फिर वो अपने नए मंदिर में ले गए कुछ ना कुछ अस्थियां जब मठ सेंटर होता है बड़ा सेंटर मां के बाल होंगे नाखून होंगे स्वामी जी का कुछ होगा। कपड़े के जो उनका जो फाइबर है कुछ टुकड़ा होगा। ऐसा कुछ ना कुछ तो बड़े-बड़े मंदिर में होता ही है। ठाकुर के अस्थि सब जगह पे आई डू नॉट नो। देखिए अभी जैसे गौतम आनंद जी आए थे तो मैं कल ही मैं किसी साधु के साथ बात कर रहा था। मैंने कहा देखिए हम लोग कितने फॉर्चूनेट है। ज्यादातर भक्तों को ठाकुर के अस्थियों का स्पर्श कब होता है? जबकि वो दीक्षा लेते हैं। गुरु महाराज जो है सर के ऊपर में ठाकुर के अस्थि वाला जो एक एक बॉक्स होता है उनके सर पर स्पर्श करवाएंगे। जबकि साधुओं को प्रत्येक साल यह मौका आता है। क्योंकि हमारे आश्रम में तो प्रत्येक साल दीक्षा होती है तो दीक्षा के बाद में जैसे गुरु प्रणाम हो गया जितने भक्तों को ये अस्थिस्पर्श हो गया। फिर हम सभी साधु लोग लाइन में खड़े रह जाएंगे और हमको भी वो स्पर्श होगा। सो द डे आई जॉइ मैं 20 साल तो होने को आए। एवरी ईयर ठाकुर के अस्थियों का स्पर्श होने का सद्भाग्य मिला है। सो सभी साधुओं को दैट इज माने दीक्षा होने के समय में गुरु महाराज जब आएंगे दीक्षा गुरु जब आएंगे उनके पास में होगा। अच्छा उनके पास होता है। हां उनके पास में होता है। सेंटर में से मंदिर में से नहीं निकालेंगे। वो तो एकदम बंद कर दिया वेदी के भीतर में। अभी तो मंदिर टूटेगा तब निकलेगा। उससे पहले नहीं क्योंकि देखिए अपने यहां पे तो कांसेप्ट स्पष्ट है। ठाकुर ही गुरु है। संघ गुरु है। ठाकुर को ही रिप्रेजेंट करते हैं। उनका अपने अलग से गुरुवाद नहीं है। ये जो कर्ता भजा और हम में फर्क क्या है? देखिए इक्वलेंस हम गुरु महाराज अपने संघ गुरु को देते हैं। किंतु बिकॉज़ के वो संघ ठाकुर के रिप्रेजेंटेटिव है बोल के। उनका इंडिपेंडेंट एक्जिस्टेंस नहीं है। रंगनाथानंद जी को किसी ने पूछा था कि आप संघ छोड़ के चले जाएंगे। आपका तो इतना बड़ा नाम है। आप ये संघ की ये जो चार दीवारी के भीतर में क्यों रहते हैं? तो रंगनाथ आनंद जी कहते हैं यदि मैं अपना स्टार्ट करूंगा अलग से तो इंदिरा गांधी वुड बी माय फर्स्ट डिसाइपल। किंतु देखिए विद वी आर जीरो एंड श्री रामकृष्ण इज वन। ये जीरो का वैल्यू वन के बाद में ही है। वन हटा लो। जीरो का कोई वैल्यू नहीं। अभी कल ही ना जब ये उनको रखने के लिए मैं एयरपोर्ट गया था गौतम आनंद जी को तो उनके सेवक महाराज के साथ में गाड़ी में बात हो रही थी तो वैसे ही दो-तीन मेरे बैचमेट है जो कि संघ छोड़ के चले गए हैं तो जो महाराज का सेवक है वो भी मेरा बैचमेट है संतोष तो उनके बारे में बात हुआ टीसी में तो सब साथ में थे तो एक के बाद एक सभी टीसी बैचमेट का नाम लेके हम बात कर रहे थे कौन कहां है क्या कर रहा है तो ऐसे दो-तीन लोग निकल गए तो सोमनाथ महाराज गौतम आनंद जी के दूसरे से वो कहते हैं देखो बाहर बाहर से लगता है कि लोग बाहर जाकर बहुत अच्छा कर रहा है किंतु मैंने सबके साथ में बात करके देखा है वो कुछ अच्छा नहीं लगता कुछ समय शुरू शुरू में आपका बड़ा यूफोरिया रहेगा कोई सोचता है मैं बहुत कुछ कर दूंगा यह कर दूंगा वो कर दूंगा ऐसा करके संघ छोड़ता हूं किंतु संघ छोड़ने के कुछ दिन के बाद में सब उत्साह सब यूफोरिया खत्म हो जाता है तो ओम