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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 6 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय [गाना गाने की आवाज़] राम कृष्णायते नमः श्री श्री मां शारदा देवी का जीवन इस सप्ताह स्टडी करेंगे स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी किताब

पुनरावृत्ति

उसमें में चिर सिमंतिनी इस चैप्टर के अभी आखिरी पार्ट में हम पहुंच गए हैं। इस चैप्टर को गंभीरानंद जी महाराज ने तीन भागों में डिवाइड किया है। प्रथम पार्ट तो है कि वह जो घटनावली जो कि ठाकुर की महासमाधि तक हमको ले आती है। जैसे कि मां तारककेश्वर जाकर के महादेव के सामने हत्या देती है। इस आशा में कि ठाकुर का मृत्यु किसी भी तरह से रोका जा सके। ठाकुर का लीला अवसान किसी भी तरह से डिले किया जा सके। किंतु फिर हमको पता है कि मां को एक ऐसा आवाज सुनाई दिया जैसे कि बहुत सारी हांडियां एक के ऊपर एक मिट्टी की हां एक के ऊपर एक सजा के रखी है और उसको लाठी से कोई एक जोर से मारे तो हांडियों के टूटने का जो आवाज होगा धड़ाम करके इस तरह का आवाज मां को सुनाई दिया और साथ-साथ में ही हृदय के भीतर में से वह भी सुनाई दिया कि इस संसार सार में कौन किसका स्वामी है? कौन किसका क्या है? तो वह जो ठाकुर और मां का सदेह लीला प्रकट लीला का जो उनका संबंध था दिव्य मधुर संबंध इस घटना से तो विच्छेद हो गया। किंतु एक जो आंतर संबंध था हृदय में जाकर के ठाकुर जो विराज करने वाले थे वह प्रोसेस अभी स्टार्ट हो रही है। मां के जीवन में एक बड़ा ही पेनफुल ट्रांजिशन एक बड़ा ही कष्ट कारक एक तरह का जीवन का मोड़ अभी प्रारंभ हो रहा है। जिन ठाकुर की मां ने दक्षिणेश्वर में रह के रह के सदै सेवा की। वही ठाकुर इनका देह अभी त्याग करके मां के हृदय में आकर के बसने वाले हैं। और अभी मां के जीवन का लक्ष्य होने वाला है। ठाकुर की ये जो संतान संतति है रामकृष्ण संघ जिसकी स्थापना ठाकुर करके गए हैं। वही भक्त संतान और ये कन्याएं जिनको कि ठाकुर ने वहां पे दक्षिणेश्वर में कुठीवाड़ी की छत से पुकारा था ओरा तू कोथाई आशीष आए रे अरे तुम लोग कहां पे हो आओ तो जो ठाकुर ने पुकारा था वही वही त्यागी संतान गृहस्थ संतान अभी वहां पे आके इकट्ठा हो रहे हैं तो यह जो विद्या का परिवार है यह जो ठाकुर का संतान संतति गण है इनकी रक्षा करना इनको आशीर्वाद देना इनको शिक्षा देना इनका आध्यात्मिक मंगल करना यह अभी मां के जीवन का व्रत होने वाला है। किंतु यह पेनफुल ट्रांजिशन है। जिनको कि आपने जीवन सर्वस्व प्रदान किया वो यदि जीवन में से अदृश्य हो जाएंगे और जब एक नतुन एक रिस्पांसिबिलिटी अपने सामने आन खड़ी होगी तो नेचुरली है कि मन सहज रूप से इसको स्वीकार नहीं करता है। तो यह जो पेनफुल प्रोसेस जो है अपने जीवन को एक नया मोड़ देने की यह इस चैप्टर के थर्ड पार्ट में गंभीरानंद जी हमको दिखा रहे हैं। प्रथम पार्ट में है कि यह महासमाधि तक ले आने वाली घटनाएं द्वितीय पार्ट में है कि महासमाधि का विवरण गंभीरानंद जी ने वह विवरण संक्षिप्त में कर दिया है। क्योंकि मां की दृष्टि से यह किताब लिखी गई है। अभी जितना इसमें विवरण बढ़ाते जाएंगे उतनी ही किताब की साइज बड़ी होती जाएगी। तो गंभीरानंद जी ने तो संक्षिप्त में विवरण किया है। किंतु बाद में हम लोगों ने रामलाल दादा है, स्वामी जी है, शशि महाराज है, लाटू महाराज है। इन लोगों ने ठाकुर की महासमाधि के बारे में जो विवरण दिया है, इसका डिस्कशन इसका पाठ हम लोगों ने अलग से किया था। तो वह सेकंड पार्ट हो जाता है यह चिर सीमंतिनी चैप्टर का और थर्ड पार्ट होता है यह जो जीवन को एक नया मोड़ देने की यह जो प्रोसेस है यह प्रोसेस अभी से प्रारंभ होती है। मां सर्वप्रथम तो तीर्थ यात्रा के लिए जाती है। तीर्थ यात्रा से वापस आने के बाद में कामार पुकुर में रहने को जाएगी। यह जो दो पीरियड कहेंगे मां के जीवन के पहले तो तीर्थ यात्रा पर जाना और फिर यह कामार पुकुर ठाकुर के घर में रहने को जाना यह है मां के जीवन के सही में तपस्या के दिन और इतनी जो शारीरिक कठोरता मां को करनी पड़ी थी मानसिक एक तरह के झंझवात से मां को जो गुजरना पड़ा था और और यह देखिए कि यह हम पढ़ते तो है। हमको लगता तो है, हमको समझ में तो आता है कि मां को इतना कष्ट हो रहा है। किंतु साथ में ही हमको यह भी समझने की आवश्यकता है कि मां तो है जगत जननी अध्याशक्ति जगदंबा स्वयं सरफेस के ऊपर में हमको कितना ही यह सब झंझवात दिखते हो। वेव्स आफ्टर वेव्स सुनामी के आते-होते दिखते हो। किंतु थोड़ा सा गहराई में जाइए। 510 मीटर जैसे समुंदर की गहराई में जाएंगे। सरफेस के ऊपर में चाहे जितना भी तूफान हो भीतर में प्रशांति विराजमान होती है। तो मां के जीवन में भी आप देखेंगे कि ऊपर से यह जो घटनावली है देखकर के ही समझ में आता है एक स्त्री के जीवन में पति के मृत्यु से कितना कष्ट आता है और वह भी उस समय की बात है। जबकि ये पेंशन है, ये इंश्योरेंस है, ये सेफ्टी है, सोशल सिक्योरिटी है, वह सब नहीं था। विधवा का जीवन बड़ा ही कष्टकर होता था। तो यह दोनों तरह से हृदय का नाता जो है ठाकुर के साथ में प्रकट लीला अवसान के साथ में वो नाता विच्छेद हुआ और फिर साथ में ही यह जो शारीरिक कष्ट मानसिक कष्ट सामाजिक कष्ट मां को सहने पड़े थे आर्थिक कष्ट उसकी एक लंबी दुख भरी कहानी है। तो यह दो जो पीरियड यह दो जो चैप्टर वह अभी मां के जीवन में प्रारंभ होने वाले हैं। तीर्थ यात्रा का वर्णन गंभीरानंद जी महाराज ने यही चीर सीमंतिनी चैप्टर में ही समाप्त किया है। इसके बाद में स्वामीर भेटा भेटा अर्थात कि घर स्वामी अर्थात कि पति पति के घर में जाकर के मां जो रहती है कामारपुर ठाकुर के घर जाकर के रहती है वो विवरण जो है इसके बाद वाले चैप्टर में उसमें आएगा। तो यह दो जो इस चिरसीमंतिनी का थर्ड पार्ट जिसमें कि यह तीर्थ यात्रा का विवरण है और स्वामीर भीटा पति का घर स्वामी का घर यह जो चैप्टर है उसमें कामार पुकुर के दिनों का वर्णन यानी कि मां के जीवन के जो सबसे कष्टकर जो कुछ दिन है वह अभी यहां से प्रारंभ होते हैं। और देखिए कि ऐसा नहीं था कि यह जो त्यागी संतान थे वराह नगर मठ में जो रहते थे ऐसा नहीं है कि वे लोग बेचारे मां को ज्यादा सहाय कर पाएंगे। बाद में किसी ने लिखा भी है माय नट को जुट तो ना ताऊ आमरा जानता ना जे मां को भात के साथ में खाने के लिए नमक भी नहीं मिलता था यह बात तो हमको पता ही नहीं थी क्योंकि क्या है गृहस्थ भक्त जो थे वह तो सब अपनेप कार्य में लग गए व्यस्त हो गए उनको तो संसार है संसार देखना है नौकरी है नौकरी करनी है जो भी है वे लोग करते थे और जो त्यागी संतान है वे लोग महा तपस्या में विलीन हो गए क्योंकि यह जो प्रारंभ के ही दिन थे जिस समय की उन्होंने सबसे ज्यादा प्रचंड तपस्या कर ली थी तो यहां पर त्यागी संतान गण है तपस्या में व्यस्त है और गृहस्थ संतान गण है वो अपने गृह में व्यस्त है गृह कार्य में व्यस्त है तो मां जैसे कि सब तरह से अकेली पड़ गई थी और जो एक व्यक्ति जो कि जिसको कि मां की सहाय करनी चाहिए। यह रामलाल दादा ठाकुर के भतीजे वहां पे पुरुष के रूप में तो अभी घर के वल के रूप में तो अभी वही है। तो उन्होंने भी जैसे कि मां को तर छोड़ दिया था। मां की अवज्ञा करते थे। मां को इग्नोर करना शुरू कर दिया था। तो यह पूरी जो कहानी है कष्ट की कहानी, दुख की कहानी यह सब प्रारंभ हो रही है। किंतु इवन इस तीर्थ यात्रा के समय से ही हमको पता है कि भले ही चाहे बाहर में जितना भी कष्ट झंझवात सुनामी के लिए जो सब तरंग आफ्टर तरंग हमको दिखता हो हृदय जो था शांत निर्मल प्रशांत था। एक चीज और दूसरा कि ठाकुर के दर्शन की परंपरा मां के जीवन में प्रारंभ हो चुकी थी। तो वही पहले दिन जिस समय मां अपनी चूड़ियां खोल रही थी तभी से ठाकुर ने आकर के हाथ पकड़ कर के कहा था कि मैं मरा थोड़ी ना हूं कि तुम यह विधवाओं के सधवा के चिन्ह अपने हाथों से निकाल रही हो। तो वहां से प्रारंभ करके ऑलरेडी हमने तीन दर्शनों के बारे में तो देख ही लिया है कि मां वह गाड़ी में जा रही थी जो हाथ में तावीज धारण किया था तो वह खिड़की के पास में ट्रेन की खिड़की के पास में उनका हाथ था तो ठाकुर ने उस समय आकर के दर्शन देकर कहा कि देखो वो हाथ में तावीज पहना है कहीं निकल ना जाए तो मां ने इमीडिएटली तावीज को अपने बॉक्स में रख दिया था वो एक दर्शन वृंदावन में वह परिक्रमा कर रही थी। तो एकाएक दूसरे भक्तों ने देखा कि मां एकदम अपने घर जा रही है। निवास स्थान की ओर जा रही है। जैसे कि कोई मां को दौड़ करके ले जा रहा है। गाइड करके ले जा रहा है। ध्रुत पद विक्षेप बड़े ही झड़प से मां जा रही है निवास स्थान की ओर। तो फिर बाद में उन्होंने मां को जिज्ञास प्रश्न किया तो मां ने उत्तर दिया कि ठाकुर ही जैसे कि ठाकुर ही मेरा हाथ पकड़ करके निवास स्थान की ओर ले आए थे। तो यह तीन दर्शन तो ऑलरेडी देख लिए हैं और फिर ठाकुर का स्वयं मां के ऊपर में भर हुआ था। आवेश हुआ था। जैसे वो गंभीरानंद जी कहते हैं कि वृंदावन में जब रास लीला में से भगवान कृष्ण अदृश्य हो गए तो गोपियां जैसे कि उनके भीतर में भगवान कृष्ण का भाव प्रकट हुआ और वे सभी मैं ही कृष्ण हूं बोलकर के लीला करने लगी। तो यह देखिए कि ये वैष्णव भाव यह तो वृंदावन का भाव जो है यह तो वैष्णव भाव है। वैष्णव भाव के अनुसार यह जो अद्वैत स्थिति है कि मैं ही श्री कृष्ण हूं। यह अद्वैत स्थिति इट इज लेस प्रेफरेबल। यह सेकंड स्टेज पर उसका प्रेफरेंस आता है। फर्स्ट प्रेफरेंस होता है कि रास लीला स्थली में यदि भगवान कृष्ण स्वयं उपस्थित हो तो फिर उनके साथ में रास लीला करना उनके साथ में मधुर भाव से प्रणय करना वो फर्स्ट प्रेफरेंस है। अद्वैत भाव में यानी कि मैं ही कृष्ण हूं। इस भाव में गोपियां तभी प्रवेश करती है जबकि भगवान कृष्ण सदेह रूप से वहां से अप्रकट हो जाते हैं। अंतर्धान हो जाते हैं। एक बार भगवान कृष्ण गोपियों को अद्वैत भाव ब्रह्म तत्व का उपदेश देने लगे। तो गोपियों ने कहा कि क्या कृष्ण तुम क्या हमको छोड़कर के चले जाने वाले हो? इसलिए क्या हमको ब्रह्म तत्व की शिक्षा देते हो? तो यह एकदम क्लियर कांसेप्ट है वैष्णव भावधारा का कि फर्स्ट प्रेफरेंस होता है भगवान कृष्ण के साथ में लीला करने का और यदि भगवान कृष्ण अंतर्ध्य हो जाते हैं तो फिर यह जो विरह अग्नि जो है यह विरह अग्नि बाद में धीरे-धीरे करके अद्वैत वेदांत में परिणत होती है। भगवान कृष्ण का उन पे आवेश होता है। तो यहां पे भी मां के जीवन में देखिए वृंदावन का जो विरह मधुर भाव है वह मां के हृदय में भी प्रकट हुआ और यह जो विरह अग्नि है इस अग्नि ने ठाकुर के साथ में ये जो सदेह लीला जो चल रही थी प्रकट लीला जो चल रही थी ठाकुर के साथ में उसके विच्छेद से जो विरह अग्नि प्रकट हुआ इस विरह अग्नि ने मां के मन को जैसे कि ब्रह्म तत्व में स्थित कर दिया। मां के ऊपर में ठाकुर का आवेश होता है। योगानंद जी कहते हैं कि मां जब धीरे से जब उस अद्वैत भूमि से थोड़ा सा अर्धबाह्य दशा में आई तो फिर जब उनको पान ऑफर किया गया। पहले तो मां ने कहा खाबो। यह जो ठाकुर जब ठाकुर का मन तो सब समय उर्ध्वगति करता था। तो उसको पृथ्वी लोक पर बांध के रखने के लिए ठाकुर छोटी-मोटी वासना प्रकट किया करते थे। तो ठाकुर कहते थे कुछ खाऊंगा खाऊंगा ऐसा कुछ बोलेंगे या तो फिर कहेंगे कि शौच जाऊंगा ऐसा कुछ ना कुछ अल्प छोटी सी एक वासना प्रकट करेंगे। तो इस वासना के सूत्र को पकड़ पकड़ करके वह पृथ्वी पर अपने मन को खींच करके वापस ला सकते हैं। ब्रह्मलोक से पृथ्वी लोक पर वापस आ सकते हैं। तो ठाकुर ने जिस तरह से जिस एग्जजेक्टली जिस तरह से ठाकुर कहते थे उसी ही तरह इस अद्वैत भूमि से अर्धबाह्य दशा में आकर के मां शारदा ने कहा मैं खाऊंगी। अभी यह एग्जैक्ट ठाकुर ने जिस तरह से कहा था मां ने एग्जजेक्टली उसी तरह से कहा था खाबो। ठाकुर ने भी कहा था खाबो। मां ने भी कहा था खाबो। किंतु इसका ट्रांसलेशन जब हम हिंदी में करते हैं तो वो जेंडर लग जाता है। इसलिए ठाकुर जब कहते हैं खाबो तो उसका ट्रांसलेशन करेंगे खाऊंगा। और मां जब कहेंगी खावो तो उसका ट्रांसलेशन होगा खाऊंगी। किंतु यह जेंडर जो है वह हिंदी में है। ओरिजिनल बंगाली में यह जेंडरलेस वर्ड है। और एग्जैक्टली जो शब्द ठाकुर उच्चारित किए थे उसी शब्द को मां भी उच्चारित करती है। जिस भाव में ठाकुर उच्चारित करते थे उसी भाव में ही मां उच्चारित करती है। तो योगानंद जी को लगा कि नहीं कुछ ना कुछ तो अभी इसके भीतर में रहस्य है। मां मां ने जब कहा खावो खाऊंगी तो फिर उनको एक थाली में पान दिया गया तो मां ने एग्जजेक्टली उसी स्टाइल में पान खाया जिस स्टाइल से ठाकुर खाते थे तो फिर उनको लगा कि नहीं ठाकुर का आवेश हुआ है मां के ऊपर में फिर ठाकुर मां को कुछ प्रश्न किए आध्यात्मिक कुछ गुढ़ प्रश्न मां को किए और मां ने एग्जजेक्टली उसी तरह उत्तर दिया जिस तरह ठाकुर उत्तर देते थे तो यह एक मां के जीवन में यह कहेंगे कि यह मां के ऊपर में ठाकुर का आवेश होना दिस इज अल्टीमेटली कि वह जो मां के हृदय की विरह अग्नि जो प्रचंड रूप से प्रज्वलित हो रही थी। मुझे लग रहा है कि यहां से धीरे-धीरे करके प्रशित होना शुरू हुई है और यह संतानों के प्रति दया और करुणा के चैनल में दया और करुणा की धारा में बहना शुरू हुई है और इसका उदाहरण हमको इसके बाद में ही मिलेगा कि फिर ठाकुर ने आकर के मां को दर्शन देकर कहा था कि योगेन की दीक्षा नहीं हुई तुम उसको दीक्षा दो। तो फिर मां ने सोचा कि अरे लोग बोलेंगे कि ठाकुर का अभी तो देहावसान हुआ है और अभी से मैं क्या मां ने दीक्षा देना शुरू कर दिया। लोग ऐसा बोलेंगे तो बोल के शर्म के मारे मां भी कुछ नहीं बोल रही। यहां पर योगेंद्र महाराज को भी सेम दर्शन हुआ था। वह भी शर्म के मारे नहीं बोल रहे। तो वह सब घटनावली अभी आएगी। तो देखिए कि ये ट्रांजिशन जो है कितना सुंदर रूप से यह फिलॉसोफिकली यहां पर हमको देखने को मिलता है। तो फिर देखिए आखिर में एक जो दर्शन मां को हुआ था लास्ट हमारा जो डिस्कशन हुआ था कि ठाकुर मां वहां पर गई है फिर और यहां पर मां को एक दर्शन हुआ है कि वो दर्शन में क्या देखा मां ने तो यह जो नवगोपाल का जो परिवार है निस्तारिणी देवी तो मां ने देखा कि नवगोपाल का परिवार राधा रमण के मंदिर में निस्तारिणी देवी कि यह भगवान को पास में खड़े रहकर के चामर व्यजन कर रही है। तो यह घटना हमने आखिर में देखी थी और फिर हमने यह भी देखा कि कौन है यह निस्तारिणी देवी उनका भी एक बड़ा ही उच्च आध्यात्मिक स्थान है रामकृष्ण संघ में उनके जो पुत्र थे अंबिकानंद जी महाराज जिन्होंने बाद में रामकृष्ण संघ ज्वाइन किया था और राजा महाराज की बहुत सेवा की थी। बड़े ही सु गायक थे। बड़े ही अच्छे गायक थे। तो यह सब कुछ हमने देख लिया और साथ में यह एक विजन भी हमने देखा था कि उद्बोधन में पुजारी महाराज यह जो बाणेश्वर की जो पूजा करते हैं बाणेश्वर शिव का जो प्रतीक है छोटा सा शिवलिंग तो यह शिवलिंग की पूजा करते-करते एकाएक उनके हाथ से वो शिवलिंग फिसल करके जमीन पर गिर गया। तो महाराज तो बड़े ही आतंकित हो गए। किंतु एक बात का उनको माने आशा थी माने भरोसा था कि किसी ने देखा नहीं है बोल के कोई उनको डांटेगा नहीं तो बोल के फिर वह जमीन पर गिरे हुए बाणेश्वर शिव को शिवलिंग को विधि समेत जो परिष्कार करना है उसे फिर पूजा करके रख दिया गौरी पट्ट के ऊपर में स्थापित कर दिया किंतु देखिए कि यही निस्तारिणी देवी उनको दर्शन रात को भगवान शिव ने आकर के दर्शन देकर के कहा था कि आमाई फैले दिए छ मुझे फेंक दिया उसने तो दूसरे दिन यह निस्तारिणी देवी आकर के पुजारी महाराज को कहते हैं कि अरे तुमने इसको तुम्हारे हाथ से जो उनका तुम स्नान करवा रहे थे फिसल करके गिर गया था क्या शिवलिंग तो यह सुनकर के वो महाराज एकदम डर गए बोला कि आपको कैसे पता चला उस समय तो आज की तरह सीसीटीवी कैमरा चारों ओर नहीं थे कि वो देखकर के आपको पता चले तो फिर निस्तारिणी देवी ने कहा कि यह छोटे से महादेव शिशु के रूप में बड़ी-बड़ी जटाएं वह आकर के बिल्कुल शिशु अपनी मां को कंप्लेन करता है। इसी तरह से आकर के कंप्लेन करके कहा कि उन्होंने मुझे फेंक दिया ऐसा करके। तो फिर खैर अभी तो इसमें और कुछ करना नहीं है। किंतु उस समय मां भी वहां पर बैठी हुई थी। और यह जो पुजारी महाराज थे उनका हृदय धक-धक कर रहा था कि मां डांटेगी तो नहीं। तो मां पहले तो कुछ किसी के साथ में बात कर रही थी। पूरी घटना सुन रही थी। किंतु फिर उन्होंने पुजारी महाराज की ओर देख के कहा कि नीरद महाराज की मां को कहा कि अरे ये तो छोटे बच्चे जो होते हैं ना वो तो खेलते धुलते ऐसा तो कितनी ही बार कितनी ही बार गिरते हैं। उसमें क्या अभी इतना टेंशन लेने की जरूरत है? ऐसा करके मां ने कहा। फिर वह महादेव की ओर हाथ जोड़कर के कहा कि बेटा तुम तो अष्टमूर्ति से तुमने पूरे जगत को आवृत करके रखा है। तो यह बेचारा छोटा सा संतान है तुम्हारा तो यह आपको धारण कैसे कर सकता है? तो ऐसे जब मां ने कहा तो पुजारी महाराज के हृदय को आश्वस्त प्राप्त हुई, शांति प्राप्त हुई, सांत्वना प्राप्त हुई। तो इतना हमने ऑलरेडी देख लिया था। इसके बाद में हम देखते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] कि गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं।

माँ वृन्दावन परिक्रमा करती है

इहारी कोनो एक समय मां शोदल बोले वृंदावन परिक्रमा कोरिया छिलेन वृंदावन में रहते रहते ही मां ने अपने संगियों के साथ में सदल बल अर्थात कि दल और बल को साथ में रखकर के वृंदावन परिक्रमा मां ने की थी। इहा तहां देर पखाध को समय ला छिलो परिक्रमा करतेकरते उनको सप्ताह से भी ज्यादा का समय लगा था पक्ष अर्थात कि दो सप्ताह आई थिंक 15 दिन के आसपास का समय लगा होगा परिक्रमा काले मने हो तो जेनो तनी मनोजगो शोकारे ब्रजेर पोथ घाट निरीक्षण करते छे परिक्रमा के समय ऐसा लगता था की जो कि मां मनोयोग सहकार्य मनोयोग अर्थात कि बड़े ही ध्यान पूर्वक पथ और घाट का निरीक्षण कर रही है। यात्रा आप करेंगे परिक्रमा करेंगे तो रास्ते में तो जो कोई भी यमुना का घाट आएगा या तो फिर यह जो रास्ता है जहां से आप परिक्रमा कर रहे हैं आसपास में मंदिर वगैरह भी होंगे। मैंने तो परिक्रमा की नहीं। मैं वृंदावन गया नहीं। मुझे पता नहीं। कि जो लोग वृंदावन गए होंगे परिक्रमा की होगी उनको पता ही होगा कि यह जो करतेकरते परिक्रमा करतेकरते मंदिर वगैरह तो आएंगे ही आएंगे। तो उनके संगियों ने देखा कि मां बड़े ही मनोयोग पूर्वक यह सब निरीक्षण कर रही है। जैसे कि उन्होंने भी इसी यहां पे ही रहकर के लीला की हो और फिर अब ऐसा होता है ना कि आप एक गांव में बड़े हुए हैं। फिर बहुत सालों के बाद आप फिर आप नौकरी करने के लिए कहीं शहर या विदेश चले गए। बहुत सालों के बाद में आप लौटे तो लौटने के बाद में ना आपको उस गांव का सब जो जो जगह है वो आपको याद आएगी कि हां यहां पे मैं जब अपने मित्रों के साथ में खेलता रहता था। यह जो आइसक्रीम वाले की दुकान है। मैं यहां पे आकर आइसक्रीम खाता था। यह स्कूल है मेरी। मैं यहां पे स्कूल में जाता था। मैं यहां पर आने से पहले राजकोट से विशाखापट्टनम मेरा ट्रांसफर हुआ तो मैं अपने घर गया था तो एक दिन मैंने क्या किया कि वैसे तो मैं रहता था आश्रम में वहां पर अपना आश्रम है तो रात को तो वहां पर रहना है दिन को मैं घर जाता था एक बार तो एक दिन मैं आश्रम से घर जा रहा हूं रिक्शा में बैठकर के तो मैंने रिक्शा वाले को कहा कि एक काम करो पूरे शहर में एक बार रिक्शा को घुमाओ। तो और मैंने बता दिया कहां-कहां से रिक्शा को लेकर जाना है। वह बोला पैसा ज्यादा होगा। मैंने कहा उसकी चिंता मत करो पैसा मैं दे दूंगा। उसको यह लगा कि मुझे पता नहीं कि रास्ता ठीक रास्ता कौन सा है। इसलिए मैं उसको झूठ-मुठ का लंबा रास्ता दिखाता हूं। और कोई रिक्शा वाला होता तो बड़ा खुश हो जाता। चलो लंबे रास्ते से जाएंगे तो भाड़ा ज्यादा मिलेगा। किंतु इस ये रिक्शा वाला जो था वो थोड़ा सज्जन था और मैंने गिरवा पहने है तो थोड़ा सा उसको लगा होगा कि साधु के पास से कहां एक्स्ट्रा रुपया ले तो उसने बेचारे ने सामने से कहा जो आप रास्ता बता रहे हैं वो तो बहुत लंबा है भाड़ा ज्यादा लगेगा मैंने कहा डरो के हां मुझे पता है मैं बहुत सालों के बाद यहां पे आया हूं मैं थोड़ा सा देखना चाहता हूं तो ठीक है वो मुझे ले गया मैं सब देख रहा हूं कि मैं स्कूल जाता था तो इस रास्ते से जाता था ट्यूशन जाता था तो यहां से जाता था। घूमने के लिए जाते थे तो वहां से जाते थे। फिर मैंने कहा उसको कि मेरी स्कूल पर ले जाओ। तो स्कूल के दरवाजे तक वो ले गया। मैं रिक्शा में बैठे-बैठे देख रहा हूं स्कूल को। मुझे लगता है कि स्कूल छोड़ने के बाद में पहली बार आई थिंक एटलीस्ट 30 40 इयर्स कितना मतलब 40 तो नहीं एटलीस्ट 25 एटलीस्ट साल के बाद में मैं वहां पे वापस गया होऊंगा। तो मैं रिक्शा में बैठे-बैठे स्कूल की ओर देख रहा हूं। तो वहां पर वो गेटम खड़ा था। वो गेटमैन देख रहा है कि यह बाबा जी एक है। रिक्शा में बैठे-बैठे स्कूल की ओर देख रहे हैं। क्या कुछ उनको काम है क्या? किसी से मिलने का है? तो वो मेरी ओर आ रहा है। तो पूछने के लिए शायद कि क्या काम है आपको? मैंने कहा रिक्शा वाले को चलो चलो मुझे बात नहीं करना अभी किसी के साथ। तो वो फिर हम लोग निकल गए वहां से। तो देखिए कि आप अपनी परिचित जगह पर बहुत सालों के बाद में जाते हैं तो आप बड़ा ही ध्यानपूक निरीक्षण करते हैं कि हां यहां पर मैंने यह किया था हां वहां पर मैंने वो किया था। मां का वो फेमस उदाहरण है कि वो रामेश्वरम गई वो बाणेश वो जो राम लिंग को देखा वो जो जिसकी स्थापना मां सीता ने की थी तो उसी लिंग को देखकर के मां शारदा ने क्या कहा जेमंटी रेखेश छिलम तेमंटी आज और इसके पीछे की भी कहानी है रामेश्वरम से यात्रा करके मां वापस आई है उद्बोधन में बैठी है यह प्रबोध बाबू है वो मां के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं और प्रबोध बाबू पूछ रहे हैं कि मां वहां पर गई थी तो कैसा सब अनुभव हुआ तो मां ने पहले तो सब वर्णन किया कि हां शशि महाराज तो मुझे बहुत प्रेम से सब जगह पर बड़े ही भक्ति भाव पूर्वक सब जगह पर मुझे घुमाया दर्शन करवाया और फिर मां ने रामेश्वरम से दो फोटोग्राफ ले आई थी भगवान के तो रामेश्वरम के ही तो केदार बाबू को दिया केदार बाबू कौन तो कोवालपाड़ा आश्रम के अध्यक्ष तो मां ने उनको और क्वालपाड़ा क्या तो जय राम भाटी जाने के समय रास्ते में आता है। मां वहां पर विश्राम करती थी। कोलकाता से जयराम भाटी आने और जाने के समय मां का विश्राम स्थल वहां पर जगदंबा आश्रम की रचना हुई। जगदंबा आश्रम में मां रहती थी। बाद में बीमार राधु को लेकर के मां काफी समय वहां पर रही है। तो वही कोलपाड़ा आश्रम के अध्यक्ष केदार बाबू तो मां ने केदार बाबू को दो फोटोग्राफ दिए। कहा कि यह वहां पे जो गर्भ ग्रुप मंदिर है आपका उसमें दोनों फोटो को फ्रेम करके रख देना इसकी पूजा करना। तो केदार बाबू थोड़े प्रैक्टिकल थे। उन्होंने कहा मां ऑलरेडी तो आपने ठाकुर और आपका फोटो तो स्थापित किया है। आपकी पूजा तो हम कर ही रहे हैं और कितनी पूजा हम करेंगे वहां पे। तो मां ने कहा ठीक है एक काम करो फ्रेम करके दीवाल पर टांग देना। तो फिर बहुत लंबे समय तक यह मां के दिए हुए दो फोटो कुआलपाड़ा आश्रम में मंदिर में टंगे हुए थे। आज है कि नहीं ही होंगे। बहुत पुराने हो गए हैं। किंतु फिर रक्षित वो कहीं पर रखा है कि नहीं मुझे पता नहीं। तो जो भी है तो वो केदार बाबू फिर मां को पूछ रहे हैं मां वहां का थोड़ा वर्णन तो कीजिए। तो फिर बात बातबात में मां ने जब वो रामेश्वर जो लिंग का जो वर्णन कर रही थी शिवलिंग का तो मां ने कहा कि जैमटी रेखे ऐसे छिल तेमटी अच्छे जिस तरह से मैं रख के गई थी वैसे का वैसा ही है अभी केदार बाबू क्या है पुरुष होते हैं ना उनका दिमाग 10 जगह पर रहता है तो मां ने जो कहा उसका सिग्निफिकेंस वो तो नहीं समझ पाए किंतु गोलाप मां जो है मां की सेविका जो ठाकुर की भक्त वो वहां से जा रही थी तो उन्होंने सुन लिया तो उन्होंने पकड़ लिया क्या कहा मां जैसा तुम रख के आई थी वैसा ही है क्या वह तो सीता अवतार में तुम रख के आई थी तो वही सीता फिर से मां शारदा का रूप धारण करके अवतरित हुई है क्या तो मां ने इमीडिएटली कहा मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा मैंने तो ऐसा कहां कहा है तो फिर गोलाप मां कहती है नहीं नहीं देखो इस बार तो आपको पकड़ लिया हमने अपने मुंह से स्वीकार कर दिया है कि वही सीता के रूप में आप आई थी अभी फिर से मां शारदा के रूप है तो यहां पे देखिए कि जैसे गंभीरानंद जी कहते हैं परिक्रमा समय में यह पथ और घाट मनो योग पूर्वक मां निरीक्षण कर रही है। तो इसका अर्थ क्या हुआ? जैसे कि श्री राधिका अवतार में मां ने जो लीलाएं की है। जैसे कि वही लीला मां की नजर के सामने फिर से प्रगटित हो रही है। मां रिमेंबर्स ऑल दैट। मां मां को सब याद आ रहा है कि यहां पर यह लीला हुई है। वहां पर वह लीला हुई है। तो परिक्रमा के समय

तीर्थ माहात्म्य

ऐसा लगता था जैसे कि मां मनो योग सहकार्य एकदम ध्यान पूर्वक ब्रज के पथ और घाट निरीक्षण कर रही है। कोथाओं बातनी हठात डाइयां पड़ी तेन किसी किसी जगह पे मां एकाएक खड़ी रह जाती। जिज्ञासा कोरिले बोली ते ना चलो। यदि कोई उनको पूछता कि मां इकाई खड़ी क्यों रह गई तो मां कहती नहीं चलो। अर्थ क्या है कि मां को स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि यहां पे ऐसा हुआ है और वो याद एकाएक आ गया होगा। जन्म जन्मांतर की मेमोरी है तो सब समय तो सरफेस पर नहीं रहता। किंतु उस जगह पर उपस्थित होने के साथ में ही उसका उद्दीपन हो जाता है। ठाकुर फेमस घटना कि वहां पर गए हैं नवद्वीप तो वहां पे नवद्वीप चैतन्य महाप्रभु की लीला भूमि तो गांव में जाकर के ठाकुर घूमे इधर-उधर। ठाकुर कहते हैं मुझे कोई उद्दीपन नहीं हुआ। यानी कि यह सही में चैतन्य देव की लीला भूमि है कि भी नहीं किसको पता? यानी कि देखिए चैतन्य रूप में भी वही शक्ति अवतरित हुई थी जो कि आज रामकृष्ण रूप में जिस शक्ति का आगमन हुआ है अर्थात ठाकुर यदि वहां पर जाएंगे तो वो जो सब लीला हुई थी स्पष्ट रूप से उनको देखने को मिलेगी तो ठाकुर वहां से थोड़ा सा डिसपॉइंट होकर के नौका में आकर के बैठ रहे थे नौका थोड़ा सा चला लोकेशन थोड़ा सा चेंज हुआ एकाएक उनको को उद्दीपन हुआ। ठाकुर कहते हैं आकाश मार्ग से दो युवक हाथ ऊपर करके जैसे यह जो वैष्णव लोग नृत्य करते हैं ऐसा हाथ ऊपर करके आकाश मार्ग से दो सुंदर बालक एकदम ठाकुर की ओर उड़कर के आ रहे हैं। और ठाकुर एलो रे एलो रे आए रे आए रे ऐसा चिल्ला करके ठाकुर भाव में चले गए। वही भगवान चैतन्य और नित्यानंद। तो देखिए कि यह जो उद्दीपन कैसे होता है? जिस जगह पर लीला हुई है जिन्होंने लीला की है उस जगह पे उनका फिर से आगमन होगा तो यह सब घटनाएं उनकी नजर के सामने फिर से चली आएगी। तो यहां पर भी मां को जैसे ही किसी ने पूछा कि मां एकाएक खड़ी क्यों रह गई? तो फिर प्रश्न के उत्तर में मां कहेगी नहीं नहीं कुछ नहीं चलो आगे शंगिनी जोगिन मा प्रभुति स्पष्ट ही बोध है तो ये जो मां के साथ में ये योगिन मां वगैरह जो संगिनियां है उनको स्पष्ट समझ में आता था स्पष्ट बोध होता था तीन जनों भाव मुखे चलिया छे मां जैसे कि भाव मुख में चल रही है कि भाव मुख ठाकुर को वो जो आदेश हुआ था निर्विकल्प समाधि के समय तू ही भाव मुखे था। तुम भाव मुख में रहो। यह जो अह कॉन्शियस और सुपर कॉन्शियस के बीच का जो स्टेट है उसमें तुम रहो। एक पैर है देवलोक में एक पैर है पृथ्वी लोक में। जगत का भी कल्याण करना है और आत्मज्ञान का आनंद भी उपभोग करना है। यह पृथ्वी लोक से ब्रह्मलोक के बीच में एक सेतु का काम अवतार करते हैं। तो यह जो मां चल रही है भाव मुख में चल रही है। यह जो देखिए इसका एक सिग्निफिकेंस क्या है पता है? यह जितने भी लीला स्थली है ना अवतार की लीला स्थली यह जैसे कि सिर्फ पृथ्वी के ऊपर में यह लोक नहीं है। जैसे आप हायर डायमेंशन में थोड़ा सा देखेंगे तो यह ब्रह्मलोक और पृथ्वी लोक के बीच के यह सब सेतु है और मां का वहां पर उपस्थित होना इसका अर्थ [हंसी] है कि यह जो सेतु है यह सेतु फिर से परिपुष्ट होता है। यह सेतु जो है फिर से स्ट्रेंथन होता है। उसको नवजीवन प्राप्त होता है। इसीलिए वृंदावन, वाराणसी, रामेश्वरम ये जितने भी तीर्थ स्थान हैं अमरनाथ, कैलाश मानस सरोवर, मीनाक्षी मंदिर, कन्याकुमारी का मंदिर, विंध्याचल का मंदिर जहां पर राजा महाराज गए थे। भारत के यह जो तीर्थ क्षेत्र है सभी का यह महात्म है कि यह पृथ्वी लोक और यह ब्रह्मलोक के बीच में सेतु का काम करते हैं। आप अपने घर में बैठकर के 1000 जप कीजिए। उसका जो फल आपको मिलेगा और तीर्थक्षेत्र में जाकर के वही 1000 जप कीजिए। उससे 10 गुना फल आपको प्राप्त होगा। मैं इसका साक्षी हूं। आपको पता होगा शायद कि मैं कभी यात्रा नहीं करता। आश्रम छोड़कर के मैं कभी नहीं जाता। तभी जाता हूं जबकि मेरा एक सेंटर से दूसरे सेंटर में ट्रांसफर हो रहा है। तो उस समय मैं बेलूर मठ से मेरा ट्रांसफर हुआ था राजकोट। तो उसी समय मैंने ठीक किया कि चलो थोड़ा सा यात्रा कर लेते हैं। ट्रांसफर हुआ ही है तो। तो मेरे अपने जीवन में पहली बार मैं काशी गया तो अभी क्या है काशी में एक गुजराती साधु थे उस समय अभी उनका देहांत हो गया देवेंद्र महाराज देवेंद्र महाराज डॉक्टर थे और मेरे साथ में बहुत अच्छी मित्रता थी तो बहुत सालों से काशी में है तो जैसे ही मैं गया तो बड़े ही प्रेम पूर्वक अवकार दिया वगैरह सब और फिर मुझे कहा तुमको जहांजहां जाना है मैं सब ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था कर दूंगा मैंने कहा महाराज जी मैं 15 दिन लेके आया हूं। कहीं नहीं जाऊंगा। बस यहीं पे काशी में ही रहना है। तो फिर मैं काशी के जितने भी मंदिर है सब मंदिर में जाकर के दिन के समय बैठता था। कहीं पे आधा घंटा कहीं पे एक घंटा जैसा मन स्थिर हो। तो मैंने स्पष्ट अनुभव किया कि वैसे तो आश्रम जो है अपना वो तो तीर्थ क्षेत्र ही है। राजकोट बेलूर मठ जहां पे मैं रहता हूं। यह विशाखापट्टनम जितने भी आश्रम है वह तो तीर्थ क्षेत्र ही है। ठाकुर की विधिवत स्थापना हुई है। किंतु यह जो अपने ट्रेडिशनल तीर्थ है उसकी बात ही अलग है। वहां पे मैं जैसे ही किसी एक मंदिर में जाकर बैठा फट करके मन ऐसा एकाग्र हो जाता है। जैसे कि माने ऐसा लगता था मैं मुझे पता है कि अभी आश्रम में भोजन का समय हो गया। मुझे अभी यहां से निकलना चाहिए। गेस्ट होकर के आए हैं। खाने में यदि इधर-उधर जाएंगे आगे पीछे तो उन लोगों को कष्ट होगा। जो गेस्ट है उनको तो समय पर जाकर खाना खा लेना चाहिए। तो यह सब टाइम का कंस्ट्रेंट रहता है। आप तीर्थ यात्रा में जाएंगे या तो फिर पहले से ही बता के जाइए कि मैं खाना नहीं खाऊंगा दोपहर का। तो वे लोग आपके लिए परेशान ना हो। किंतु मैं तो ऐसा बोल के आया नहीं था बोल के मुझे टाइम पे 12 12:30 का जो भी टाइम है आश्रम में वापस जाना है तो मैं खड़ा भी हो रहा हूं ना तो ऐसा लग रहा है कि मैं जैसे कि निद्रा में हूं और मैं जैसे मेरा नींद में कैसे सपना आते हैं तो कैसा हम फुल्ली कॉन्शियस नहीं होते। ऐसा लग रहा है शरीर काम कर रहा है किंतु मेरा मन कहीं और पड़ा है। ऐसा आवेश में आकर के मैं वापस आता था। यह मैंने अनुभव किया है। सो यह देखिए कि तीर्थ यात्रा यह जो क्षेत्र है तीर्थ क्षेत्र अपने यह पृथ्वी लोक ब्रह्मलोक के बीच में सेतु है। और यह महापुरुषों का जब आगमन होता है खास करके आध्या शक्ति और नारायण का उस तीर्थ क्षेत्र में तो यह तीर्थ क्षेत्र जैसे कि रिवाइटलाइज होते हैं पुनः शक्ति प्राप्त करते हैं। और मां ने एक्चुअली यह बात कही है। प्रयागराज जब गई ठाकुर की अस्थियों को वहां पर मां गंगा में पधराने के लिए जैसे ही मां ने हाथ बढ़ाया साथ में ही गंगा की एक तरंग आकर के मां के हाथ में से अस्थियां छीन करके चली गई। तो मां ने कहा देखो कि यह तीर्थ क्षेत्र भी जैसे कि महापुरुष की अस्थियों को पुनः धारण करके पुनः ये रिवाइटलाइज होना चाहते हैं। पुनः शक्तिशाली होना चाहते हैं। पवित्रता को जैसे कि रिफ्रेश करना चाहते हैं। तो यह देखिए कि यहां पे योगिन मां वगैरह संगिनियों को स्पष्ट बोध हो रहा था कि मां जैसे कि भाव मुख में चल रही है। एवं दर्शनादि होते छे और साथ में दर्शन वगैरह भी हो रहे हैं। सुतरान सभी विशेष जानी बार बासना जागी तो इसीलिए विशेष रूप से जानने की इच्छा प्रकट होती नेचुरली हम भी यदि मां के साथ में चलते और मां का इस तरह का आचरण यदि लक्ष्य करते हम पूछते मां को कि मां बताओ तो सही कि तुम क्या देख रही हो किंतु मां ए कौतु हले उत्तरे शुधु एकई कथा बोली तेन किंतु इस प्रश्न के उत्तर में मां सिर्फ एक ही बात कहती ना चलो नहीं चलो आगे इसके बाद में योगानंद जी की दीक्षा का प्रसंग प्रारंभ हो रहा है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में कल से देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

एक भक्त: जब हम राम या कृष्ण के मंदिर जाते हैं, तो क्या हमें उनमें ठाकुर को देखना चाहिए?

देखिए यहां पे गाइड है राजा महाराज राजा महाराज जैसे विंध्याचल के मंदिर में गए थे राजा महाराज जैसे मीनाक्षी मधुराई मंदिर में गए थे कन्याकुमारी मंदिर में गए थे तो उन्होंने ने उन्हीं देवी का ही दर्शन किया था। मुझे ऐसा याद नहीं आ रहा है कि मैंने कहां पर भी पढ़ा हो। मैं राजा महाराज का उदाहरण इसलिए दे रहा हूं क्योंकि जैसे आपने अपने दृष्टिकोण से पूछा तो ठाकुर मास्वामी जी जो देखते हैं, सुनते हैं, एक्सपीरियंस करते हैं। दैट्स ऑन अ कॉस्मिक लेवल ऑल टुगेदर। राजा महाराज और जो बाकी के डायरेक्ट डिसाइपल है फिर भी हम उनको अपने तरह से देख सकते हैं टू 1%। [हंसी] तो राजा महाराज ने जितने भी तीर्थ यात्रा की है उसका मैंने जितना भी वर्णन पढ़ा है सब समय वो वही देखते थे जो कि वहां पे की इष्ट देवता थे। उन्होंने ऐसा नहीं देखा कि अल्टीमेटली यह इष्ट देवता आकर के फिर मां या ठाकुर के भीतर में विलीन हो गए। जैसे ठाकुर को खुद को दर्शन होते थे। जितने भी दर्शन होते थे सब अब जैसे मां सीता का दर्शन हुआ। वहां पर पंचवटी के नीचे में बैठे हैं। देखा कि वह मां सीता वहां से आ रही है। पहले तो प्रश्न हुआ कौन है यह? जो चेहरे पर जो भाव है दया करुणा वो देवी के चेहरे पर भी इतनी दया करुणा नहीं होती और हे मानवी ही त्रिनेत्र नहीं है देवी की तरह उसी समय एक हनुमान आकर के उनके पैरों में गिरा और ठाकुर कहते हैं जन्म दुखिनी सीता और फिर किंतु मां सीता आकर के ठाकुर के भीतर में विलीन हो गए। जितने भी ठाकुर को दर्शन हुए, जीसस के दर्शन हुए, मोहम्मद के दर्शन हुए, जितने भी हुए, सभी लोग अल्टीमेटली ठाकुर के भीतर में विलीन हो गए। है। सो दैट इज हिज अंडरस्टैंडिंग और आवर अंडरस्टैंडिंग कि अवतार वरिष्ठाय श्री राम कृष्ण सर्व देव देवी स्वरूपाय श्री राम कृष्ण वो उनका एक्सपीरियंस है। किंतु राजा महाराज ने जितनी भी बार मंदिर में गए हैं उन्होंने उस इष्ट देवी या देवता का ही दर्शन किया है। मुझे ऐसा याद नहीं आ रहा कि कहीं पर ऐसा वर्णन हो कि अल्टीमेटली जैसे कन्याकुमारी के मंदिर में कन्याकुमारी मां का दर्शन हुआ तो फिर अल्टीमेटली माया ठाकुर में विलीन हो गई। ऐसा नहीं मैंने पढ़ा है। हो सकता है कि ऐसा हुआ होगा विवरण नहीं है। तो व्हाटएवर तो हमको भी ये जो अपना लिबरलिटी जो है हिंदू धर्म के भीतर का कि जितने भी देवी देवताएं हैं स्वामी जी क्या कहते हैं कि हिंदू धर्म प्रिंसिपल के ऊपर में खड़ा है नहीं कि पर्सन के ऊपर में। भगवान कृष्ण की ग्रेटनेस यह है कि वह ब्रह्म तत्व की व्याख्या करते हैं नहीं कि वह अपना खुद का अवतारत्व चलाते हैं। सो वी आर वेरी क्लियर ऑन दिस कॉनसेप्चुअल लेवल कि ब्राह्मण अल्टीमेटली सत्य है। ब विनीत ब्राह्मण इवन यदि देवी देवता अवतार भी है। सो दे आर लिमिटेड विद इन स्पेस टाइम कोशन। सो दैट वे हिंदू को कहीं पे यह दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि मैं भगवान नारायण का दर्शन कर रहा हूं। भगवान शिव का कर रहा हूं, महावीर का कर रहा हूं, कन्याकुमारी का कर रहा हूं, कि मीनाक्षी देवी का कर रहा हूं। वी डोंट हैव एनी सच कॉन्फ्लिक्ट कि जैसे दूसरे धर्म में ये कन्फ्लिक्ट होता है कि मेरे भगवान ही है अल्टीमेटली ओनली गॉड। माय गॉड इज द ओनली गॉड। कि माय जो प्रॉफेट इज द ओनली प्रॉफेट। दैट कॉन्फ्लिक्ट वी हिंदूस डू नॉट हैव।

एक भक्त: मेरा प्रश्न आध्यात्मिक दृष्टि से था, नहीं की दार्शनिक दृष्टि से

ना सब कुछ ठाकुर की दृष्टि से देखना मोर बेनिफिशियल है क्योंकि क्या है कि इवन भगवान राम की जो लीला है ठाकुर की लीला समझने से हमको और ज्यादा डिटेल में समझ में आती है। सो टू सी एव्री गॉड एंड गॉडेस विद द लेंस ऑफ श्री रामकृष्ण इट इज मोर बेनिफिशियल टू अस। इस बात में कोई प्रश्न ही नहीं है। देखिए मैं यदि डायरेक्ट काशी गया होता ना तो मुझे वहां पर मंदिर में देव देवी में इतनी श्रद्धा कभी नहीं आती। मैं बचपन से ही नास्तिक जैसा ही हूं। मोर और लेस कभी मंदिर में नहीं जाता था। [हंसी] ठाकुर के पास नहीं आता तो मुझे यह सब श्रद्धा भक्ति होता ही नहीं। तो मैं तो मेरा तो पर्सनल बिल्कुल स्पष्ट है। ठाकुर के लेंस से ही सभी देवी देवता को देखना है। स्क्रिप्चर को भी उसी लेंस से देखना है।

एक भक्त: माँ जैसे अंबिकानंदजी के बारे में कहती है, जो तीनो लोको के स्वामी है उसे एक बालक कैसे धारण कर सकता है, तो हम भी तो इस से साधियारा ले सकते है की ईश्वर की सेवा आसान नहीं.

उनका नाम अंबिकानंद जी नहीं वह दूसरे वो निस्तारिणी देवी के पुत्र यह जो महाराज थे जिनके हाथ से गिर गया उनका नाम था विलास महाराज मैंने नाम दिया नहीं था क्लास के समय किंतु वो विलास महाराज की बात ना वो अंबिकानंद जी निस्तारिणी देवी के पुत्र जो कि बहुत अच्छे गायक थे और राजा महाराज की बहुत सेवा की थी राजा महाराज के साथ में बहुत घूमे थे और राजा महाराज जैसे कोई भी मंदिर में जाएंगे तो उनको कहेंगे अच्छा तुम गाओ तो यह गीत गाओ तो वह गान गाओ तो वह गाते राजा महाराज भाव में चले जाते हैं। अनफॉर्चूनेटली राजा महाराज की महासमाधि के बाद में उन्होंने ऑर्डर छोड़ दिया और एक जगह पर जाकर के रहते थे। देखिए हमारे लिए इस बात का रिलेवेंस कहां पे है? हम तो पूजा करने वाले नहीं। मतलब वो पूजा करने का प्रिविलेज सबको नहीं मिलता। किंतु यह जैसे दीक्षा के समय जब दीक्षा गुरु ने जो कहा है उसका पालन तो कहां सब कुछ होता है तो उस समय यह एक्सक्यूज है कि भाई वह पालन करने वाले वो ठाकुर मां स्वामी जी एक है हम लोग हैं दूसरे बेचारे राम प्रसाद का है ना माए पोए मुकदमा धूम होवे राम प्रसाद बोले मां और बच्चे का मुकदमा होगा धूम मच जाएगी राम प्रसाद कहता है [हंसी] ठाकुर ने कहा ना माने जे हेतु जिस लिए उन्होंने हमको को जन्म दिया है। आमा देर दाबी अच्छा आदर हिस्स अच्छा माने दावी यानी कि उनकी जो संपत्ति है उसके ऊपर में हमारा दावा है। उनकी संपत्ति में हमारा हिस्सा है। मां ने तो जन्म दिया है। मां की संपत्ति पे अपना हिस्सा हम लोग हक करके नहीं मांगेंगे तो किसके पास मांगेंगे? और देखिए दोनों तरीके से ना बहुत बार हम सोचते हैं कि जैसे स्वामी जी को पढ़ के लगेगा कि अद्वैत वेदांत गिव्स यू आत्मश्रद्धा। किंतु ठाकुर का जो भक्ति मार्ग है उल्लसित भक्ति उतफुल्ल भक्ति उन्मना भक्ति भावे हासे कांधे नाचे गाए यह भक्ति भी हमको वही उत्साह और आत्मश्रद्धा देती है शंभू शंभू मलिक वो कंजूस था थोड़ा तो वो आधा रास्ता गाड़ी में आता था घोड़ा गाड़ी में आधा चल के आता था तो बोला इतना धूप में चल के आते हो तो एकदम जोर करके बोलेगा मां दुर्गा का नाम लेके निकला हूं मुझे क्या होने वाला है [हंसी] वैसे वो कंजूसाई छुपाने के लिए कहता होगा किंतु सी ये लोगों का तो बहुत सारा स्ट्रेटजी रहता है ना

एक भक्त: ठाकुर ने माँ काली को दो भागों में काटकर निर्विकल्प समाधि में प्रवेश किया। तो उनकी वास्तविक निष्ठा द्वैत में थी या अद्वैत में?

किंतु देखिए फिर वही मां ने कहा कि तुम भाव मुखे थाको म है ना बिगिनिंग एंड एंड बोथ वि मदर मां और मायर संतान देखिए ये जो महावीर कहते हैं ना लवकुश को धरा ना दिल तू पारिश की ध्वते माने वो जो उनकी पूंछ पकड़ के खींच के ले गए तो महावीर कहते हैं दोनों बच्चे थे ना लव और कुश कि मैंने यदि पकड़ने नहीं दिया होता तो पकड़ पाते क्या तो यहां पे भी तो हम कह सकते हैं ना मां ने नहीं काटने दिया होता तो ठाकुर कैसे काटते और और देखिए और भी इसी सिलसिले में जब तोतापुरी पहली बार आए और कहा कि तुम अद्वैत साधक के बहुत अच्छे मतलब कैंडिडेट दिखते हो क्या तुमको मैं सिखाऊं वो कहते मैं मां की परमिशन ले आता हूं तो उन्होंने सोचा अपनी मां को पूछने को जा रहा है तो नहीं वह तो मां काली मंदिर में जाकर परमिशन ले आए। फिर ठाकुर कहते हैं कि मां ने परमिशन दी है। कहा है कि मुझे अद्वैत साधना सिखाने के लिए ही आपको मां खुद यहां पे ले आई है। मतलब तोतापुरी आते ही नहीं। सबसे चक्के में पकड़ लिया था। गला पकड़ लिया था। वो तोतापुरी तोतापुरी ठाकुर कहते हैं तोतापुरी समझ गए कि इसके भीतर में कौन है। दो हाथ जोड़ के बोलते हैं मुझे जाने दो यहां से। तो ठाकुर कहते हैं इसके ऊपर में मां का आवेश हुआ। कहा जब तक तुमको पूर्ण ज्ञान नहीं होगा यहां से जाने का उपाय नहीं है तुम्हारा तोता सोचते है यार ये मैं इसको सिखाने मेरा गला पकड़ ली ब्रह्म शक्ति अभेद की ओर जाना है अभी [हंसी] ये भगवान कृष्ण 12 साल के थे 11 ना 12 साल के थे वो कुवलैया पीड़ का वध किया था मुष्टिकोर चारुण का चाणूर का वध किया था हमको लगता है ये 11 12 साल का लड़का इतना कैसे कर सकता है अभी वो जब वो वहां पे वो रिंग में एंटर हुए होंगे वे लोग भी सोचते सोचते होंगे बच्चा है इसकी पिटाई करेंगे। तो भगवान कृष्ण बोलते हैं अच्छा बेटा आजा अभी बताता हूं किसकी कौन पिटाई करता है। बचपना म चेहरे पे तो बालकवत ये था ना मतलबुर्य था। बालकवत माधुुर्य था चेहरे पे 36 उनका बर्थ है। तोतापुरी आए 65 64 65 ना 63 के आसपास में। सो अभी गिन लीजिए 36 टू 46 56 और बस वही 23 45 के आसपास होंगे। हां यस यस दुबले पतले जैसे थे वैसे ठाकुर का जो क्स्टिट्यूशन बड़ा स्ट्रांग था किंतु मतलब यू कैन नॉट से दैट ही इज़ फिजिकली स्ट्रांग ऑफ कोर्स वही वही ना क्योंकि कठोरता इतनी की है इम्यून सिस्टम बड़ा स्ट्रांग था ये होता है ना इम्यून सिस्टम ऑर्गन ऑर्ग्स भीतर के वगैरह बड़ा स्ट्रांग था किंतु फिजिकल स्ट्रेंथ चली गई थी बाय दैट टाइम

एक भक्त: माँ अभी दीक्षा देना प्रारम्भ करेगी

वो जो उनकी मां कहती है कि मेरी बेटी शारदा को मां पुकार सुनने का सद्भाग्य प्राप्त नहीं हुआ। ठाकुर बोलते हैं इतने बच्चे आएंगे ऐसा मां मां करेंगे मां पुकार सुन के बेचारी परेशान हो जाएगी। देखिए एव्री स्टेप ऐसा ही है ना। अब जब ठाकुर ने पहली बार मथुर बाबू को कहा कि मेरे बहुत सारे भक्त आने वाले हैं। मां ने कहा है। तो फिर कुछ दिन हुए तो ठाकुर ने देखा कोई नहीं आ रहा है। तो थोड़े निराश हो गए। तो फिर मथुर बाबू कहते हैं अरे बाबा कोई आए ना आए मैं ही अकेला 100 भक्तों के बराबर हूं। तो ठाकुर ने सोचा अच्छा ठीक है माने ऐसा ही मेरा तो गणित पक्का नहीं है कच्चा है। तो माने ऐसा मुझे मूर्ख बना दिया होगा। बेचारे ठाकुर भी ऐसे कन्विंस हो गए। એ સ્ટેપ ना अब जब इतने सारे दर्शन होने के बावजूद जब नरेंद्र ये कहता है कि आपके मन का भ्रम है तो मां के पास में रोते-रोते गए थे कि मैं गवार और मूर्ख समझ करके क्या तुमने मेरे साथ में इस तरह का मजाक किया क्या तो मां ने कहा नहीं नहीं उसको पता नहीं उसकी भी अकल ठिकाने ला देंगे डोंट वरी माने यह तो फिर भी स्वामी जी है हाजरा अभी ठाकुर ने कहा अब हाजरा भी सब गड़बड़ गड़बड़ करता था ना वो सब राखाल वगैरह के माइंड में कोई डाउट खड़ा कर देता था तो मां ने ठाकुर ने मां को कहा होगा। मां ने कहा यह जाएगा यहां से। तो ठाकुर ने हजरा को बोल दिया कि मां ने कहा है तुम चले जाओगे यहां से। तो कुछ दिनों के बाद हजरा आके ठाकुर को कहता है देखा मैं अभी भी यहां पे हूं। तो ठाकुर भी थोड़ा डाउट में आ गए। किंतु उसके बाद में फिर हजरा सही में चला गया था वहां से। वो थोड़ा टाइम लगता है ना वो प्रेडिक्शन और उसको उसके फ्रक्टिफिकेशन में। तुमने कहा था ना कि मां ने कहा है मैं चला जाऊंगा। देखो अभी भी मैं यहीं पे हूं। [हंसी] ओम