Transcript
ओम संस्थापक धर्म स्वरूप ने अवतार नमः श्री राम कृष्णा लीला प्रसंग किताब में से हम लोग मधुर भाव का सर तत्व या तो फिर मधुर भाव की साधना के बड़े में देख रहे थे किस तरह से श्री रामकृष्ण ने उसने साधना की तो अभी तक हमने इसकी पूर्व भूमिका या तो फिर फिलोसॉफिकल बैकग्राउंड अभी हम एक्चुअली ठाकुर ने क्या किया था उसका थोड़ा सा वर्णन पढ़ लेते हैं शारदानंद जी महाराज अर्थात शरद महाराज ठाकुर के सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी बोलते हैं श्री राम कृष्णा लीला प्रश्न पुस्तिका में पुस्तक श्रीमती राधा रानी कृपा भिन्न श्री राम श्री कृष्णा दर्शन असंभव जानिए अर्थात की श्रीमती राधा रानी की कृपा के बिना भगवान कृष्णा का दर्शन असंभव है ये जानकर के ठाकुर चीताहर उपासनाए प्रभुत्व हुई है ठाकुर अभी तद्गत चित्र देखिए कितना सुंदर संस्कृत शब्द है तद्गत चिंतन ततगढ़ अर्थात की जिनका चित्र तट अर्थात की ईश्वर के ऊपर में गत अर्थात के संपूर्ण रूप से निविष्ट हुआ है नियोजित हुआ है इस तरह से इस तरह के चित्र से ठाकुर राधा रानी की या तो फिर राधा रानी का भाव आप करके भगवान कृष्णा की उपासना में और प्रति हुए एवं त्योहार तथा उनकी प्रेम घणमूर्ति प्रेम गान प्रेम जिसमें जो घाना अर्थात की जो सॉलिड है और किस चीज का बना हुआ है किस चीज का पदार्थ बना हुआ है या किस चीज का शरीर बना हुआ है प्रेम का किस चीज की मूर्ति बनी हुई है प्रेम की प्रेम से बनी हुई गठित हुई इस मूर्ति का स्मरण मनन और ध्यान में निरंतर मगन होकर के तहत श्री पाड़वे हृदय अकाल अवेडा उनके श्रीपाद पड़ा में हृदय का आल आवेग अविराम निवेदन कोरिया छीलें अभिराम बिना विराम के सात कंटीन्यूअस निवेदन अर्थात की सुप्रीत किया है शरणागत किया है राधा रानी की कृपा के बिना भगवान कृष्णा का दर्शन संभव नहीं है यह जानकर के ठाकुर ने उसे प्रेम घणमूर्ति के प्रति अपने हृदय की श्रद्धा भक्ति उनके श्री चरणों में अविराम रूप से उन्होंने प्रवाहित की है भोले ओ चिरई तीन श्रीमती राधा रानी दर्शन लगे गुरुतार्थों को ही अच्छे लेने वाले इस एन रिजल्ट अच्छी रही कुछ ही अच्छी रही कुछ ही कुछ ही समय में अल्प समय में वो ठाकुर श्रीमती राधा रानी के दर्शन लाभ दर्शन करके कृतार्थ हुई या छालें देखिए कृतार्थ कितना सुंदर शब्द है यदि हमको भगवान दर्शन देते हैं तो ऐसा नहीं है की हमने भगवान की इतना लोग ठाकुर कहते हैं ना की कोई कोई लोग क्या सोचता है की बाजार में जाकर के मुझे सब्जी खरीदनी है तो ₹20 किलो आलू है ना की ₹20 किलो ये प्याज है तुमने ₹20 ले लिया और 1 किलो आलू ले लिया भगवान की भगवान का दर्शन भगवान की कृपा इस तरह से नहीं होती की हमने सोच लिया की मैं प्रतिदिन एक घंटा जब करूंगा या तो फिर यह पूरा चरण होता है या तो फिर यह लोग एकादशी का उपवास करते हैं या तो फिर यह श्रवण मास का उपवास होता है या तो फिर जिन लोगों में ये जो पर्यूषण का उपवास होता है तो इस तरह से मैं कोई विधि साधना कर लूंगा तो मुझे कुछ लाभ हो जाएगा तो भगवान मैं कोई साधना करूंगा तो भगवान को कोई पड़ी नहीं है हमारी साधना की की साधना करने से वो हमारे पे कृपा करेंगे या तो हमारा हमको दर्शन देंगे भगवान देखते हैं हमारा हृदय कितना सरल है और हम अपने को विस्मृति होकर के उनकी ही चिंता कितनी करते हैं जो कल हमने देखा था ना की अपने को खुद को विस्मृति कर देना है और उनके ही आनंद में हमको आनंदित होना है तो वो ठाकुर ईश्वर देखते हैं नहीं की हमारा खुद का क्या आ हमने इतना दिया मैंने इतने साधना की तो मुझे इतना प्राप्त हुआ सामने और इसीलिए भगवान का जब दर्शन होता है तब हमको किरदार तो महसूस करना है हमको धनिया में महसूस करना है हिंदी में एक शब्द है वह धन्य धन्य हो गया अर्थात की जब वो किसी की कृपा प्राप्त करता है तो वह बड़ा ही अपने को भाग्यवान समझना है वो अपने को बड़ा ही धन्य समझना है तो एक कृतार्थ हमको महसूस करना है नहीं की मुझे लगे दिस इस इएनटाइटलमेंट की हां मैंने तो इतना किया है तो ईश्वर को तो ठाकुर को तो दर्शन देना ही था कौन सी बड़ी बात है वो कौन सी बड़ी बात नहीं हो वो हम आ साधना करेंगे और साधना नहीं भी करेंगे वो ईश्वर का दर्शन वो ईश्वर की इच्छा के ऊपर ही निर्भर है उसमें हमारा कुछ इसमें कोई ज्यादा कंट्रीब्यूशन नहीं है ठाकुर एक बहुत ही सुंदर श्लोक बोलते थे बीच-बीच में उसका अर्थ यदि मैं तपस्या भी अमृत का है की हरि का जो दर्शन है वह तपस्या करने से भी मिलता है और नहीं करने से भी मिलता है तो फिर तपस्या का क्या लाभ है इस तरह का उसका कुछ अर्थ है तो इसको जल्दी हमको ईश्वर का दर्शन प्राप्त करना है तो हमको सामने में कुर्ता और महसूस करना है हमको अपने को धनिया महसूस करना है अन्य देव देवी शुक्ला अर्थात अन्य देवों के दर्शन के समय अपूर्व ने जी तरह से प्रत्यक्ष किया था जैसे की मां सीता का दर्शन ठाकुर को हुआ था पंचवटी में बैठे थे और देखा की एक बहुत ही एक भाव जिनका स्वरूप है जो की इनकी इतना मतलब उनके भीतर में से एक प्रकाश एक पूजा एक ओजस का प्रकाश प्रगतित हो रहा है एक इस तरह की स्त्री वो गंगा की और से उनकी और आई तो ठाकुर बैठे थे तो सोने लगे की अरे यह कौन हो सकते हैं यह देवी कौन हो शक्ति है तभी वो पंचवटी की दाल पर बैठा हुआ एक हनुमान एक जंप लगा करके वो देवी के चरणों में गिरा और दो हाथ से उनको नतमस्तक हो करके नता जानू हो करके प्रणाम ठाकुर के मां में हुआ की हां जन्म दुखी नहीं सीता मैन वो सीता जिसने जन्म अंतर तक दुख भोग है किंतु फिर भी भगवान राम के प्रति उनकी निष्ठा कभी भी कम नहीं हुई भगवान राम ने कहा की अपनी पवित्रता का प्रूफ दो वहां पे अशोक वाटिका में इतने दिन रही थी लोग का रहे हैं की पवित्रता किया सीता के साथ में क्या हुआ होगा तो जब वो अग्नि परीक्षा स्वयं करने के लिए मां सीता तैयार हो गई वरना तो वो का शक्ति थी की मुझे ये सब कोई प्रूफ देने की जरूर नहीं है आपको मुझे स्वीकार करना है तो कीजिए वरना तो मैं यहां से चलती हूं मां सीता के लिए रहने के लिए उनकी सेवा करने के लिए लोगों की तो सेवकों की कमी नहीं थी मैंने यदि ऐसा होता है की मां सीता यदि भगवान राम को छोड़कर चली जाति है तो फिर ये लक्ष्मण है या फिर महावीर महावीर हनुमान है भगवान राम की सी है सब लोग सीता के साथ में चले जाते हैं भगवान राम के लिए पद जाते हैं तो मैन सीता के उन्हें सीता की उपस्थित से भगवान राम का ऐश्वर्या था मां सीता को कोई अपनी पवित्रता की परीक्षा देने की कोई जरूर नहीं थी किंतु जब भगवान राम ने कहा फौरन मां सीता तैयार हो गई और अग्नि परीक्षा में भी वो सफल हुई किंतु बात ये है की फिर पृथ्वी ने जाकर के उनको फिर से ग्रहण कर लिया तो यह बाकी सब दर्शन के समय जी तरह जी तरह ठाकुर को प्रत्यक्ष होता था अपनी दो आंखों से देखते थे ऐसा नहीं की इमेजिन करते थे या तो फिर अपने मां में उसका दर्शन करते थे प्रत्यक्ष दर्शन बाकी सब देव देवियों की दर्शन के समय अपने दो आंखों से जैसे वो देखते थे अन्य देव देवियों के दर्शन के समय ठाकुर जी तरह से प्रत्यक्ष किया थे इस ईद-दर्शन कईयों से रुपए ऑयमूर्ति निजांगे सम्मिलित होयाज लो इस दर्शन के समय भी मां राधिका की वो मूर्ति मां राधिका की वो उपस्थित उनके खुद के नीचे अंग निजांग उनके खुद के शरीर में प्रवेशित हो गए सम्मिलित हो गई अनुभव कोरिया जिले बाकी जितने देव देवियों के दर्शन के समय जैसे की मोहम्मद का दर्शन भगवान जीसस का दर्शन जितने भी दर्शन के समय ठाकुर हमको बार-बार कहते हैं की हां वो प्रगतित हुए फिर मैंने उनका दर्शन किया फिर धीरे से आकर के वह मेरे ही श्री अंग के मेरे ही शरीर में समाहित हो गए मेरे ही शरीर में अदृश्य हो गए तो उसे बाकी जितने दर्शन के समय यह हुआ था वैसे ही मां राधिका के दर्शन के समय हुआ मां उनके शरीर में समाहित हो गई टिनी बोली टेन श्री कृष्णा प्रेमी सर्वस्वहाराशि निरुपम पवित्र जल मूर्ति महिमा और मधुर जो बोलना असंभव ठाकुर ने कहा था की श्री कृष्णा प्रेम में सर्वस्व हर अपना सर्व कुछ भी उन्होंने जिन्होंने की लूट दिया है वो जैसे वो पिछली बार हमने देखा था ना की शरद महाराज कहते हैं की किस तरह से जब कृष्णा प्रेम में जो सफल हो जाते हैं तो क्या होता है लज्जा घृणा भाई झाड़ियां लच्छा घृणा भाई छोड़ कर के लोग भाई समाज भाई परित्यक्ता प्रिया लोक भाई समाज भाई का प्रीती करके जाति कॉल सील पद्मरिया डा और नीचे और नीचे देखो सील पद्मरिया डा और अपने खुद के शरीर और मां का सुख उसको संपूर्ण रूप से विस्मृति होकर के कुछ भगवान श्री कृष्णा सुख केवल मंत्र अपना के सुखी अनुभव कारी ते भगवान श्री कृष्णा के सुख में ही अपने को सुखी अनुभव करती है तो इसीलिए यहां पे लिखने हैं की श्री कृष्णा प्रेमी सर्वस्वहाराजी कृष्णा प्रेम में जिन्होंने अपना सब कुछ को दिया है सब कुछ त्याग कर दिया है श्री निरुपम जिसकी उपमा नहीं है वो निरुपम पवित्र जल पवित्रता से जो उज्ज्वलित हो रही है मूर्ति और महिमा और मधुर का इस तरह की इस देवी का महिमा की वर्णन करना असंभव है और हम इमेजिन भी कर सकते हैं की जो लोग भोपाल बालिका जो मां राधिका और भगवान कृष्णा के वृंदावन लीला के अपनी नजरों से जो दर्शन किया होंगे वह कितने भाग्यवान होंगे और इतने ही भगवान कृष्णा चैतन्य और भगवान राम कृष्णा श्रीमती अंगों कांति नाग केसर पुष्पेयर केश्वर सुखद न्याय गौरव देखिए चिलम श्रीमती की अंग कांति अर्थात की शरीर का रूप शरीर का रंग नाग केसर पुष्पेयर के शोर कलर न्याय नाग केसर का जो पुष्प होता है उसमें जो केसर होता है वो गोल्डन येलो कलर का जो होता है उसकी तरह गौरा वर्ण देखे उसकी तरफ से गौरव वर्ण देखा था अभी शरद महाराज आगे लिखने हैं ठाकुर किछु कलर जुनून अपना के श्रीमती बोलियां निरंतर उपलब्धि कोरिया जिले इस दर्शन के कुछ समय तक ठाकुर कुछ समय तक अपने को श्रीमती के भाव में सब समय वो श्रीमती थे ऐसा निरंतर उपलब्धि किया है इस तरह से निरंतर उन्होंने अनुभव किया है की मैं ही श्रीमती राधा रानी इस तरह से उन्होंने अनुभव किया था श्रीमती राधा रानी श्रीमूर्ति और चरित्र गंभीर अनुज्ञाने अपन पृथक गति तो बहुत एक कल हरिया तहर ए यूरोप अवस्था उपस्थित हौलो श्रीमती राधा रानी की श्रीमूर्ति और चरित्र का गंभीर अनुज्ञा में डब करके अपने को पृथक गतित्व बोडो देखिए अर्थात की अलग में उनसे अलग हूं ये दिशा होना पृथक व्यक्तित्व दिशा में उनसे पृथक यानी की अलग में उनसे अलग हूं यह भाव यह विचार यह सोचना उनका संपूर्ण रूप से चला गया था एक कल हरिया संपूर्ण रूप से विस्मृति होकर के हर करके तहर उपस्थित हुई अच्छी लो उनकी इस तरह की अवस्था उपस्थित हुई थी देखिए तो हमको भी हम लोग बहुत बार सोचते हैं इस क्रिश्चियनिटी में भी है जिसको की इग्माता कहते हैं की वो जीसस का अनुज्ञा करते करते इस तरह से वो जीसस के भाव में लुप्त हो जाते हैं की उनको जब कृषि फी किया गया था तो उनको जी तरह से हाथ में किले मार करके अनल्स मार्कर के उनको क्रॉस पे उनको पुरुष तक किया गया था तो जो लोग यह इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट यह किताब स्वामी जी भी अपने साथ में थॉमस कैंपस का लिखा हुआ स्वामी जी अपने साथ में लेकर के पूरे भारत में घूमे थे दो किताब अपने साथ में रखा था उन्होंने एक तो गीता थी और एक था ये इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट यानी की इमिटेशन अर्थात की तू बी क्राइस्ट नहीं करना उनका अनुकरण नहीं करना जैसे की बहुत सारे लोग मिमिक्री करते हैं कोई बड़े कोई विख्यात व्यक्ति है कोई राजनेता है ना की कोई एक्टर है ना की ऐसा कोई है तो लोग उसकी मिमिक्री करते हैं तो ईएमआई मिशन दस नोट मीन मिमिक्री उसका अनुकरण नहीं उनके साथ में रूप हो जाना है उनके साथ में अभी उनके साथ में उनकी जो व्यक्तित्व है उनका चरित्र है उसमें अपने को डूबो देना है जिससे की अपना पृथक अस्तित्व दिशा वो लुप्त हो जाए मैं उनसे अलग हूं वो चला जाए तो एक्चुअली ये इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट का जो ट्रांसलेशन होगा वो ततगीत जीसस के साथ में तद्गत चित हो जाना नहीं की जीसस का अनुकरण करना बहुत बार हम लोग ये खास करके मैं पब्लिकेशन में कम करता हूं तो हम लोग ट्रांसलेशन करते हैं तो ट्रांसलेशन हम लोग शाब्दिक ट्रांसलेशन बहुत समय हमको जब फिलासफी नहीं समझ में आई है हम लोग शाब्दिक ट्रांसलेशन करते हैं की यह शब्द है उसका क्या अर्थ है हम लोग डिक्शनरी में देख लेते हैं फिर डिक्शनरी में से उठा करके यह शब्द हम यहां पर दाल देते हैं जैसे की गुजराती में स्वामी जी का कंप्लीट वर्ष 1963 में स्वामी जी की आ जन्म शताब्दी जब थी तब यहां पे ऐसा ठीक हुआ की स्वामी जी का गुजर राजपूत आश्रम में की स्वामी जी का कंप्लीट वर्क पूरा गुजराती में ट्रांसलेट किया जाए तो अभी उसे समय तो इतने ट्रेन साधु नहीं थे की जो बंगाली या इंग्लिश या हिंदी में से पूरा गुजराती में एकदम सुंदर साहित्य भाषा में कर सके ट्रांसलेशन तो हमने क्या किया था जो कुछ प्रोफेसर थे वैसे ड्यूटी जैसे थे वैसे देवोटी नहीं थे हमको पहचान वाले थे यानी की रामकृष्ण भाऊ धारा का उनको इतना ये नहीं था शायद तो उनको हमने कुछ वॉलिंटियर के रूप में रखा और उनको कहा की आप ट्रांसलेट कीजिए क्योंकि आपकी गुजराती भाषा तो बहुत सुंदर है तो गुजराती भाषा में ट्रांसलेट करना शुरू किया अभी प्रॉब्लम क्या होता है की अपने साहित्य का अपनी फिलासफी का तो उनको इतना अंदाज नहीं है तो जो शब्द या तो जो फिलोसॉफिकल वर्ल्ड उनको समझ में नहीं आता तो वह लोग डिक्शनरी में देखकर के उसको ट्रांसलेट करेंगे तो अभी स्वामी जी का एक सेंटेंस है की 1000 साल के बाद में भारत माता ये जो 1000 साल की निद्रा में भारत माता जो सोई थी तो अभी फिर से वो जागृत हो रही है तो इंग्लिश में है जॉइंट इस अवकेनिंग आफ्टर एन लॉन्ग स्लीप जयंत यानी की विराट महापुरुष 1000 साल की नींद के बाद ये फिर से जागृत हो रहा है अभी इन लोगों को तो क्या है की इतना समझ में नहीं आता की स्वामी जी एक्जेक्टली क्या कहना छह रहा है वो तो शब्दों का ट्रांसलेट कर रहे हैं तो जॉइंट शब्द का डिक्शनरी में अर्थ हो जाए तो जय हिंद शब्द का लिखा है रक्षा गुजराती कंप्लीट वर्समैन लिखा की यह रक्षा 1000 साल की लंबी नींद के बाद से फिर से जागृत हो रहा है भारत मां को रक्षा बना दिया तो ये शाब्दिक ट्रांसलेशन फिलासफी नहीं समझ करके शाब्दिक ट्रांसलेशन जब करते हैं तब इस तरह का वाइब्राहट सृष्टि होता है अर्थ का अनर्थ बन जाता है तो इसीलिए ये जो सब बड़े-बड़े हमको संस्कृत शब्द दिखते हैं तद्धित या तो फिर आ पृथक अस्तित्व दिशा वो विस्मृति हो जाना तो ये शब्द हमको थोड़े बहुत ख्याल क्यों रखना है क्योंकि यह एग्जैक्ट फिलोसॉफिकल पोजीशन हमको बताते हैं और अभी तो खैर सभी को ट्रांसलेशन करने की जरूर नहीं पड़ती या तो फिर ये विभिन्न लैंग्वेज में से पढ़कर के अंडरस्टैंडिंग लेने की जरूर नहीं पड़ती खास करके को मैं यहां पर ब्रह्मचारियों का क्लास लेट हूं तो एक ब्रह्मचारी कोई गुजराती है तो कोई मराठी है तो कोई बंगाली है तो मैं हमेशा बंगाली ब्रह्मचारियों को कहता राहत हूं की देखो तुम लोग बहुत ही अनफॉर्च्युनाते हो की ठाकुरमार स्वामी जी का साहित्य आप लोग ओरिजिनल में बिना कोई कष्ट करके पढ़ सकते हो बाकी जो लोग नॉन बंगाली है उसमें से कोई कोई तो बंगाली सीखने का पर्यटन ही नहीं करता ट्रांसलेशन पर आधार रखना है और मेरे जैसे जब कुछ कोई सीखने को जाएंगे हमको एक लंबे डिसिप्लिन में से प्रसार होना पड़ता है अभी बचपन में तो पढ़ाई लिखी किया था यहां पे आकर के फिर से मतलब स्कूल में जब गुजराती लैंग्वेज सखी थी स्कूल में इंग्लिश लैंग्वेज सखी थी अभी यहां पर आकर के फिर से लैंग्वेज सीखनी पद रही है तो मैंने जो बंगाली फॉर्च्यूनर की यह सब ओरिजिनल में पढ़ सकते हैं किंतु जो लोग बंगाली नहीं है उन लोगों के लिए यदि यह संतुष्ट शब्दों का अर्थ थोड़ा सा समझ में आए तो ये हमारा है हमारी जो फिलोसॉफिकल प्योरिटी है वो आगे आईटी इसे ग्रहण कर सकते हैं रदर दें विदाउट अन्य ट्रांसलेट यहां पे जब ट्रांसलेशन होता है तो मैं हमेशा कहता हूं की संस्कृत शब्दों को आज आईटी इस रख दो इनको गुजराती में कन्वर्ट करने का पर्यटन ना करो इसीलिए हमारा ट्रांसलेशन कभी-कभी लोगों को पढ़ने में दिक्कत होती है लोग कहते हैं की अपनी इतनी कठिन गुजराती क्यों व्यवहार करते हैं तो किंतु मेरा कहना है की जी संस्कृत शब्दों को जी ओरिजिनल में जी अर्थ से प्रायोजित किया गया है इस अर्थ में इस एक से उसका पूरे मीनिंग जो है वो ट्रांसलेशन में आए इसलिए मैं वह सब कुछ शब्द रहने देता हूं जबकि आपको पता नहीं चलेगा अभी पहले बार पढ़ने में दिक्कत भी होगी शायद किंतु आप लगे रहिए यदि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में दीप में जाना है एडरवाइज मोती कथाएं तो है अपनी और बहुत ही सरल भाषा में लिखी गई है किंतु जो कोई फिलोसॉफिकल ग्रंथ है जैसे की कंप्लीट क से या तो फिर लीला प्रसंग है ये दो किताबें ऐसी है और गंभीर नानजी का मां का ये जो फॉरवर्ड जो है तो एक्चुअली किताब बड़ी सरल है किंतु कुछ-कुछ पोर्शन जो है गंभीरानंद जी ने बड़े ही फिलोसॉफिकल डेवलप्ड किया हैं उनमें अपनी भारतीय परंपरा की जी जो पुरी उपलब्धि है भारतीय धर्म शास्त्र का जो सर है वो समझा करके उन्होंने मां का जीवन और युग्णायक विवेकानंद में स्वामी जी का जीवन समझने में उन्होंने पर्यटन किया है तो मैं अभी पुराना पुराना ट्रांसलेशन कुछ रिवाइज कर रहा हूं तो उसमें मैं देख रहा हूं मैं बंगाली से कंपेयर करके की योजनाएं थे या तो फिर यह मां का मेरा नंद जी का जीवन है ना की लीला प्रसंग है या तो फिर ग्रंथ माला है ये कर अपने फिलोसॉफिकल क है जिसमें अपने और डायरेक्ट भी सैंपल को हो ना की अपने सर्वश्रेष्ठ विद्वान साधुओं का हो शरद महाराज डायरेक्ट डिसएबल थे स्वामी जी डायरेक्ट भी साइकिल थे और गंभीर आनंद जी अपने ऑर्डर के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों में से एक थे तो उन्होंने भारतीय धर्म शास्त्र को समझ करके ठाकुर मां स्वामी जी का जीवन किस तरह से जीवन और संदेश को हमको किस तरह से समझाया है वो फिलासफी के बेस पे हमको समझना है तो ये कर किताब है फिर और भक्ति मलिक है किंतु भक्ति मलिक में फिलोसॉफिकल परेशन इतना नहीं है जितना की उन्होंने मां के जीवन में और स्वामी जी के जीवनी में उन्होंने डाला है तो यह कर किताब हम इस कर किताबें में यदि जितने मैक्सिमम संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया जाए उट ना ही बटर रहेगा पहले पहले पढ़ने में दिक्कत होगा किंतु आप जितना जितना पढ़ने जाएंगे वैसे-वैसे देखेंगे की ये संस्कृत शब्द ये जो अपने पुराने में वेदों में उपनिषदों में मेट्रो के रूप में वो व्यवहार हुए थे मंत्र के रूप में उनका हुआ है यानी की वह मंत्र शक्ति भी इन सब शब्दों के पीछे कार्य करती है श्रीमती राधा रानी की श्रीमूर्ति और चरित्र का गंभीर अनुज्ञा अनुज्ञा करते-करते अपने को अपना पृथक गतित्वबोध अपने अलग हूं वह भाव एक कल हरिया तहर ओ रूप अवस्था उपस्थित ही अच्छी लोग संपूर्ण रूप से मैं उनसे भिन्न हूं यह बात संपूर्ण रूप से विस्मृति होकर के उनकी श्रीमती राधा रानी के साथ गतात्मक अवस्था उपस्थित हुई थी सूत्रण एक कथा निश्चय बोली ते पराजय तहर मधुर भाव में से उत्पन्न इसका अर्थ है की यह बात हम निश्चित रूप से का सकते हैं की ठाकुर अर्थात हम यह बात निश्चित रूप से का सकते हैं की मधुर भाव से उत्पन्न ईश्वर का जो उनका अनुभव है श्रीमती राधा रानी के प्रेम से अनुरूप हो करके सुगाबीर हो करके वो उपस्थित हुआ था सेंटेंस थोड़ा सा डिफिकल्ट है किंतु समझना एक बार समझ ले तो बड़ा आसन है की मधुर भाव से श्रीमती राधा रानी के साथ में उन्होंने एकात्मबोध जो किया था उससे जो उनको भगवान कृष्णा की उपलब्धि या तो फिर जो अनुभूति हुई थी वो बहुत ही गंभीर रूप से उन्होंने अनुभूति की थी फालैो यू रूप देखा की यह छह लो उसका बाद में परिणाम भी इसी तरह से देखा गया था करण पूर्वक तो दोष ने पर हुए थे श्रीमती राधा रानी और श्री गौरांग देव न्याय था टीव मधुर भवर पराकाष्ठा प्रसूत मा भावे शब्द प्रकाशीतो ही अच्छे लोग क्योंकि पूर्वक्ता दर्शन ये दर्शन जिसका हमने वर्णन किया उसके बाद से श्रीमती राधा रानी और श्री गौरांग देव की तरह उनके श्री अंग में भी उनके मां में भी मधुर भाव की पराकाष्ठा से उत्पन्न होते प्रकाशित शारीरिक लक्षण सब उनके भीतर में प्रकाशित हुए थे मधुर भाव की पराकाष्ठा रूप जो लक्षण राधा रानी के भीतर में और गौरांग देव के भीतर में जो प्रकाशित हुए थे वह ठाकुर के भीतर में भी प्रकाशित हुए थे कब इस दर्शन के बाद में गोस्वामी पादुकोण जो भगवान कृष्णा चैतन्य के अनुयाई थे उनके ग में महाभारत के जो लक्षण है उसका विषाद वर्णन उपलब्ध है मधुर भाव की पराकाष्ठा शारीरिक लक्षण उसकी कथा लिपिबद्ध अच्छे और लिपिबद्ध है वैष्णव तंत्र निपुण भैरवी ब्राह्मणी एवं पर्यावरण भैरवी भैरवी कौन थी वैष्णव तंत्र में निपुण थी अभी उसको ऐसा लिख सकते थे की वैष्णो तंत्र में निपुण भैरवी हिट उसकी जगह उसका समास करके संस्कृतज करके लिखा है वैष्णव तंत्र निपुण भैरवी ब्राह्मणी और बाद में विष्णु चरण आदि शास्त्र सड़क ठाकुर के श्री अंग में मा भाव की प्रेरणा से यह सब उपस्थित लक्षणों का आविर्भाव देख कर के स्तंभित हो गए थे और समित हो करके उनको अपने हृदय की श्रद्धा और पूजा अर्पण की थी तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति