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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र इसका हम कर रहे थे पाठ स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसमें अभी नया चैप्टर चालू होता है चैप्टर का नाम नाम है आलो छायाय और इस चैप्टर में अभी तक हम जहां पर पहुंचे हैं मां का विवाह हो गया है मां दक्षिणेश्वर आती है कभी जयराम बाटी जाती है और मां के साथ में जो जीवन के कष्ट हम लोगों को कभी-कभी लगता है कि हम लोगों का जीवन कितना कष्ट से भरपूर है जो भी छोटी मोटी चीजें छोटी मोटी भी और बड़ी भी जो कुछ भी हमारे साथ में होता है वह हमारे सामने एक दुख का पहाड़ बन कर के हमको दिखता है किंतु जब हम ठाकुर और मां खास करके इन दोनों के जीवन का अध्ययन करेंगे अभ्यास करेंगे तो पता चलेगा कि जीवन तो कोई इनका भी सरल नहीं था और इस कष्टम जीवन में रह करर के भी इस कष्टम परिस्थिति में रह कर के भी इन्होंने जिस तरह से ईश्वर को पकड़ के रखा वह सब हमारे लिए एक बहुत बड़ी सीखने की बात है स्वामी जी की जब जब तक हम हम स्वामी जी को पढ़ते हैं तब तक लगता है कि यह जो एक नेशनल एक ग्लोबल एक आउटलुक होगा जिनका उन्हीं के लिए यह स्वामी जी या ठाकुर या मां का मैसेज है किंतु मां के जीवन को पढ़ कर के लगता है कि इवन हमारे परिवार में जो हम रह रहे हैं या तो फिर यहां पर जिस तरह से हम आश्रम में सब साधु लोग मिलकर के रह रहे हैं तो ये जो कम्युनिटी लाइफ जो होती है कम्युनिटी लाइफ में भी फैमिली लाइफ ना कि आश्रम लाइफ इसमें जिस तरह से एडजस्टमेंट करके हमको रहना पड़ता है इसमें भी जिस तरह से पागल लोगों के साथ में हमको काम करना पड़ता है जिस तरह से हमको दिन प्रतिदिन अपने ईगो के ऊपर में आघात लगता है तो उसको सहन करके रहना पड़ता है तो यह सब मां ने भी अपने जीवन में किया था मां के साथ में भी यह सब कितना ही हुआ था यह सबका विवरण हमको इस चैप्टर में पढ़ने को मिलेगा गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं मथुरा नाथर देहो त्याग किछु काल परे जगदंब विधान श्री जुक्तो शंभुनाथ मल्लिक श्री श्री ठाकुर द्वितीय रसदार निजुक्ति होया छले तीनी श्री श्री ठाकुर और श्री मायर सर्व प्रकार सेवा जनन सततो प्रस्तुत था कीतन र परिचय हमरा पूर्वे पाइया मथुर बाबू का निधन हुआ और मथुर बाबू के बारे में तो हमको पता है है लीला प्रसंग जिन लोगों ने पढ़ा है या तो फिर ठाकुर के जीवन के साथ में जिन लोगों का अल्प परिचय भी है उन सबको पता है कि मथुर बाबू ने ठाकुर के लिए जो एक सिक्योरिटी खड़ी की थी उसकी मदद से ही तो इसके बेस के ऊपर में ही तो ठाकुर ने अपनी युग परिवर्तनकारी युग प्रयोजन कारी साधना में ठाकुर निमग्न हुए थे अभी प्रश्न यह होता है कि यदि मथुर बाबू नहीं होते तो क्या होता क्या म बाबू का अपना इतना क्रिटिकल इंपॉर्टेंस है तो हम लोग यह हमेशा कह सकते हैं कि मथुर बाबू नहीं होते तो और कोई होता और कोई उनके जैसा होता कि जो लोग ठाकुर को सहाय करते किंतु जो भी है यहां पर तो हमको मथुर बाबू मिले हैं और देखिए कि मां ने एक बार कहा था कुछ साधु बेलूरमठ बेलूरमठ की यह बात है उस समय बेलूरमठ स्थापित हो गया था और महापुरुष महाराज वहां पर बेलूरमठ में प्रेसिडेंट थे और उस समय कुछ साधु वहां से बेलूरमठ छोड़ कर के कुछ टहलने के लिए ग्रांड ट्रंक रोड यह जो वहां पर बाहर में है मठ के सामने तो उसके ऊपर टहलने के लिए निकले तो उसमें किसी ने कहा कि चलो अभी हम जा ही रहे हैं तो एक काम करते हैं कि हम चलते चलते सीधे काशी चले जाते हैं ये गुरु भाइयों को देखिए गुरु भाई यानी कि यही स्वामी जी यही राजा महाराज यही महापुरुष महाराज जो लोग आज स्वामी जी का तो समय निधन हो गया था राजा महाराज का भी किंतु उन लोगों ने देखा कि यह लोगों ने अपना जीवन कहीं कोई मठ में नहीं बिताया उन्होंने तो अपना प्रारंभिक जीवन साधना का जीवन पूरे भारत में भ्रमण करके निसंग ईश्वर के ऊपर में भरोसा करके ईश्वर के ऊपर में शरणागत होकर के निसंग भ्रमण करके बिताया है पता ही नहीं आज का रोटी अभी मिला तो अभी कल का रोटी कब मिलेगा आज यहां पर चल रहे है कल कहां पर सोएंगे कुछ पता नहीं नहीं सोने का ठिकाना नहीं खाने का ठिकाना नहीं पहनने का नहीं रहने का ठिकाना तो इस तरह से संपूर्ण रूप से अनिश्चितता के भीतर में हम यदि अपने को नहीं डालेंगे तो हम गुरु भाइयों की तरह साधना कैसे कर पाएंगे ठाकुर के जो डायरेक्ट डिसाइल है उनकी तरह साधना हम कैसे कर पाएंगे ऐसा सोच कर के यह चार पांच साधु वे लोग बेलूरमठ छोड़ के निकले निकले और चलते गए च चते गए सोचे कि पहले तो जयराम बाटी जाते हैं मां वहां पर है मां का आशीर्वाद लेकर के फिर काशी में चले जाएंगे तो ऐसा सोच कर के जयराम बाटी गए जयराम बाटी में जाकर मां को प्रणाम किया कहा मां आप आशीर्वाद दीजिए तो अभी हम लोग कहीं जाकर काशी में तपस्या करेंगे जिस तरह से ठाकुर के सन्यासी संतानों ने किया था वैसा ही हम करेंगे हम ऐसा तो नहीं है कि हम लोग कुछ नया कुछ कर रहे हैं उन्हीं के पद चिह्नों पर हम लोग चल रहे हैं तो उस समय माने ने क्या कहा था कि देखो ठाकुर जन्नो माछ मु माछ माथा और पाय सेर बाटी मथुर जुगो तो तो मादर जन् य सबब के करवे अर्थात कि ठाकुर के लिए मछली का माथा और पायस अर्थात खीर की कटोरी यह तो मथुर बाबू इसका जुगाड़ करते थे तो बैठ कर के ठाकुर ने एक जगह पर बैठ कर के इतनी तपस्या की और इतनी साधना की निश्चिंत होकर के कि अभी खाना कहां मिलेगा पहनने का क्या है कहां पर रहना है यह सब चिंता छोड़ कर के ठाकुर ने साधना की तुम लोगों के लिए यह सब जुगाड़ कौन करेगा यह धूप के भीतर में भिक्षा करते-करते ही तुम लोग अवसन हो जाओगे तुम लोग परेशान हो जाओगे साधना कब करोगे तो बेटर है कि तुम चले जाओ वहां पर वापिस अपने बेलूर मठ में मैं तारक को लिख देती हूं तारक अर्थात कि अपने महापुरुष महाराज कि तुमको वो तुमको डांट नहीं तो अभी क्या था कि तीन लोग लोग निकले थे एक साथ में तो उन्होंने सोचा कि नहीं मां को कह दिया कि मां हम तो निश्चय करके निकले हैं काशी जाना ही जाना है अभी इसमें ऐसा हुआ जो तीन साधु थे उसमें एक साधु था वो थोड़ा सा यंग था और माने ही उसको कहा था कि तुम जाओ बेलूरमठ जाकर के तारक के पास साथ में रहो अर्थात कि महापुरुष महाराज के साथ में रहना वो तुमको गाइड करेगा करेंगे ऐसा करके मां ने ही ये यंग साधु को बेलूरमठ भेजा था तो मां ने देखा कि यह जो दो सीनियर साधु है वे लोग तो बड़े ही अड़क है कि ना हम लोग काशी जाकर के तपस्या करेंगे ही करेंगे किंतु ये जो तीसरा साधु है यंग है उसका मन थोड़ा सा विचलित हो रहा है तो माने ये वीकनेस पकड़ ली उसकी फिर इस साधु को अलग से बुलाया यंग साधु को अपने पास में कहा कि अरे तुम इन लोगों के चक्कर में पड़कर के बेलर मट छोड़ कर के जा रहे हो इस तरह से तपस्या करने के लिए तो यह तो ठीक नहीं है तो मेरी तो इसमें सहमति नहीं है तो अभी ये यंग साधु कहने लगा कि मैं क्या करूं मैं तो इन सीनियर साधुओं के साथ में निकला हूं और अभी ये लोग जिस तरह से मुझे बताते हैं मैं करता हूं तो अभी इनका संग छोड़ना मेरे लिए ठीक नहीं रहेगा तो मां अभी इससे ज्यादा तो और क्या बोलेगी तो ठीक है ये तीनों साधु वहां से रवाना हुए काशी गए यहां से महापुरुष महाराज ने बेलूरमठ से काशी के जो अध्यक्ष महाराज थे उनको एक पत्र लिख दिया पत्र में लिखा कि यह तीन साधु बेलूरमठ से निकले हैं मेरी परमिशन ली नहीं है और ऊपर से जयराम बाटी जाकर के मां को परेशान करके गए हैं उस समय ऐसा था कि जो कोई चाहे जब चाहे वे लोग बेलूरमठ जयराम बाटी नहीं जा पाएंगे अच्छा महापुरुष महाराज उस समय अध्यक्ष नहीं थे राजा महाराज ही अध्यक्ष थे महापुरुष महाराज वहां का सब मैनेज कर रहे थे तो इसलिए महापुरुष महाराज ने यह लेटर इस तरह से वहां पर लिख दिया काशी में कि ये तीन साधु जो आते हैं उनको मठ में मत रखना उन लोगों की यदि भिक्षा करके खाने की इच्छा है तो भिक्षा करके ही खाए तो यह तीन साधु जब मठ में पहुंचे बोल दिया गया कि यहां पर नहीं रह सकते तो बाकी दो जो सीनियर थे रिंग लीडर जैसे तो उन्होंने ठीक कर लिया ठीक है हम लोग अपने से तपस्या करके भिक्षा करके रहेंगे किंतु जो तीसरा यंग साधु था वह बेचारा बड़ा ही परेशान हो गया उसने इस तरह से सोचा नहीं था कि भिक्षा का जीवन इतना कठिन होगा तो उसने मां को जयराम बाटी में पत्र लिखा कहा कि मां आप ने जो मुझे कहा था ठीक ही कहा था बिना मतलब इन लोगों के चक्कर में पड़ कर के मैं यहां पर आ गया हूं अभी मेरा क्या होगा आप मुझे बताइए तो मां ने इमीडिएट सामने पत्र लिख कर के कहा कि बेटा तुम एक काम करो तुम चले जाओ बेलूरमठ मैं तारक को पत्र लिख देत हूं वह तुमको डांटे नहीं महापुरुष महाराज को लिख देंगी मां कि इसको डांटना मत इसको पश्चाताप हो गया है नहीं मां ने क्या कहा मां ने कहा कि अच्छा तुम एक काम करो अभी तुम यदि वहां पर चले ही गए हो तो तुम वहीं रहकर के चंद्र की सेवा करना चंद्र अर्थात कि स्वामी जी के वह जो शिष्य और जो वहां के मठ के जो अध्यक्ष थे वो तो मां ने कहा कि तुम वहीं पर रहो अभी तुम वहां पर गए हो तो कोई दिक्कत नहीं वहीं पर रहो और वहीं पर तुम वो मठ के अध्यक्ष की सेवा करना आश्रम का सारा कार्य करना तो यह जब माने इस तरह से लिख दिया तो वहां के मठा ने भी एक्सेप्ट कर लिया स्वीकार कर लिया यहां बेलूर मठ में महापुरुष महाराज ने भी यह स्वीकार कर लिया तो तीसरा साधु ये जो थे उ उन्होंने पूरा जीवन वहीं पर काशी में ही अद्वैत आश्रम में ही उन्होंने पूरा समय पूरा जीवन बिताया किंतु जो बाकी जो साधु थे उन्होंने बाहर जाकर के काफी तपस्या की तो यहां पर कहने का तात्पर्य था कि मां खुद इस तरह से सबके सामने कहती है मां खुद यह स्वीकार करती है कि मथुर बाबू ही थे कि जिन्होंने ठाकुर को इतनी सहाय की ठाकुर को इतना सपोर्ट किया जबकि ठाकुर सबसे ज्यादा वल्नरेबल थे जब कोई साधना करता है है उसका मन पूरा अंतर्मुखी छोटी-छोटी चीजें भी उसको बड़ी होकर के दिखाई देती है उस समय दो लोगों ने ठाकुर की प्रचंड सेवा की एक तो था हृदय और दूसरे थे मथुर बाबू तो इन दोनों का ऋण रामकृष्ण संघ में हम लोग कभी नहीं भूल पाएंगे वही था कि मथुर बाबू ने तो बड़े ही नरे बली ठाकुर की सेवा भी की और बड़े ही उन्होंने देह त्याग भी किया किंतु हृदय का था कि पता नहीं उसके मन में आखिर आखिर में क्या-क्या सब हो गया था जो हृदय की जो पतन हृदय का जो पतन आरंभ हुआ वह यही मां के अपमान के साथ में उसका पतन प्रारंभ हुआ इस चैप्टर में यह सब घटनाएं आने वाली है किस तरह से मां के साथ में वह यह करता है आर्गुमेंट करता है मां के साथ में वह कटु शब्दों का भी प्रयोग किए बिना नहीं रहता मां को बड़ा ही अपमानित भी करता है तो यह सब घटना इस चैप्टर में आए गी तो मुझे लगता है कि यहीं से हृदय का पतन प्रारंभ हुआ था यह हृदय के बारे में आखिर आखिर की जो कहानियां है मैंने एक दो बार शायद कही थी वराह नगर मठ की बात है उस समय ठाकुर का निधन हो चुका था महासमाधि हो चुकी थी और यह गुरु भाई वराह नगर मठ में रह रहे थे उस समय एक बार हृदय वहां पर गया था मठ में तो उसको देख कर के राजा महाराज और शशि महाराज यह सब तो उनको अच्छे से पहचानते थे उसको देखा होगा कि नहीं पता नहीं राजा महाराज ने शायद देखा होगा एक बार वह वहां पर आया था दक्षिणेश्वर में तो मास्टर महाशय साथ में थे तो ठाकुर ने मास्टर महाशय को लेकर के हृदय को मिलने के लिए दक्षिणेश्वर के गेट के पास गए थे क्यों गेट के भीतर में हृदय को आने का मना था क्योंकि उसने वहां के जो त्रैलोक्य बाबू थे मथुर बाबू के पुत्र और जो उस समय दक्षिणेश्वर के कर्ता थे या तो फिर दक्षिणेश्वर के मालिक थे उनकी लड़की की उसने कुमारी के रूप में पूजा की थी तो यह लोग डर गए एक ब्राह्मण ने अब ब्राह्मण कन्या की पूजा की तो पता नहीं क्या श्राप लगेगा क्या होगा तो मथुर त्रैलोक्य बाबू ने हृदय को भगा दिया था तो हृदय आया है दक्षिणेश्वर में ठाकुर मास्टर महाशय को लेकर के गए हैं तो ठाकुर ने हृदय को पूछा क्या रे गांव में इस बार खेती वगैरह कैसी हुई है बारिश वगैरह कैसा है तो हदय उत्तर देता है कि हां एक तरह से देखा जाए तो कोई बहुत बुरा नहीं है ठीक-ठीक ही है ऐसा करके फिर वह हृदय कहता है कि मैं बड़े कष्ट में हूं तो ठाकुर ने कहा किस चीज का कष्ट तो हृदय कहता है कि मैं आपके साथ में नहीं रह पाता हूं आपका संग मुझे छोड़ना पड़ा है इसी बात का कष्ट तो मास्टर महाशय देखते हैं कि ठाकुर की आंखों में उस समय आंसू आ गए थे तो मतलब ठाकुर भी एकदम यह हो गए कि इस हृदय ने मेरी ऐसी इतनी सेवा की अभी उसके साथ में यह है किंतु यह तो हृदय ने ठाकुर का अपमान भी तो कितना किया था मां का अपमान भी तो कितना किया था ठाकुर आत्महत्या करने के लिए गंगा में ड जल समाधि लेने के लिए गए थे इतना हृदय ने ठाकुर को परेशान किया था फिर भी देखा मास्टर महाशय ने कि ठाकुर के हृदय में हृदय के प्रति इतना ममत्व अभी भी है तो यही हृदय व वराह नगर मठ में आया था और राजा महाराज वगैरह थे तो राजा महाराज ने शायद हृदय को देखा होगा तो वह देख कर के ही वह बोल उठे अरे आगे तो तुम यह तो शडा गुंडा छिले एक खून एटा की होलो अर्थात कि आगे में तुम बिल्कुल मने एक बड़े ही सशक्त और एक उसकी तरह तुम्हारा शरीर था देह में बहुत शक्ति थी बॉडी तुम्हारा बड़ा ही हेल्दी था ये दुपे पतले इतने कैसे हो गए तो हृदय ने कहा कि अरे तो मैं क्या करूं जद मैं एक रात को तीन चार भैरवी चक्र में जाता हूं तो सेहत की तो यही हालत होगी तो यह सुनकर के ही राजा महाराज बोल उठे अरे तुम्हारा लड़का तुम्हारे साथ में है हृदय अपने लड़के को साथ में लेकर के गया था और उस समय वह कपड़े बेचता था कपड़ों का सेल्समैन था घर-घर जाकर के कपड़े बेचना यह सब करने की परिस्थिति उसकी आ गई थी तो यह कपड़ों का पोटली लेकर के अपने लड़के को लेकर के आया था तो जैसे ही उसने भैरवी चक्र के बारे में कहा तो राजा महाराज बोल उठे अरे तुमको शर्म नहीं आती यह सब बातें करते हो अपने ही लड़के के सामने तो अभी य रवि चक्र अर्थात की यह तंत्र साधना जो होती है ना जो स्त्री पुरुषों का वह जो उस भाव को लेकर के जो साधनाएं वगैरह होती है उसको भैरवी चक्र कहते हैं और कलकाता में यह सब बहुत नाटक चल रहा था ये जो धर्म का एक ये आता है ना पूर आता है एक जब जवार आता है तब ये बहुत सारे संस्थाएं बहुत सारे ट्रेडीशंस बहुत सारे गुरु अपना अपना कुछ ना कुछ चलाना शुरू कर देते हैं तो जैसे ब्रह्म समाज बड़ा फेमस था एक आर्य समाज बड़ा चला था एक थियोसोफिकल सोसाइटी बड़ा चला था कितने ही यंग लड़के लोग लड़कियां इस तरह से किसी ना किसी समाज में सभा में संघ में जाकर के योगदान करते थे यह करता बजा एक चल रहा था तो इसी तरह से यह एक भैरवी चक्र का भी एक चल रहा था कि जहां पे आपकी इंद्रियों के संयम की वजह इंद्रियों को पूरा आप जितना चाहे उसका आनंद ले लीजिए यह जो उल्टा एक सिद्धांत है कि आप आपको भोग त्याग करना है तो संयम करके नहीं होगा भोग को भोग लेने से होगा तो जितना भोग आप करना चाहे कर लीजिए इससे क्या होगा कि आखिर में यह शमन हो जाएगा इसका किंतु ठाकुर ने क्या कहा है कि छोटे-मोटे भोग को भोग करके संतुष्ट कर देना है किंतु बड़े-बड़े भोगों का तो संपूर्ण रूप से त्याग करना है गीता में भी है न जातु कामह कामा उपभोग न श्यतीज काम के उपभोग करके कभी भी नहीं होगा यह तो इस तरह से हो गया कि आपको अग्नि को ठंडा करना है तो उसमें आप घी डाल रहे हैं तो घी डालने से तो अग्नि और ही ज्यादा प्रज्वलित होगा व शमन नहीं होगा अग्नि का तो इस तरह से हृदय के मन में भी यह सब उलट पुलट क्या घुस गया था इस तरह से वह सब तांत्रिक क्रियाओं में वह भाग ले रहा था बोल कर के उसका सेहत संपूर्ण रूप से खत्म हो गया था यह तो एक बार हमने देखा हृदय को और एक हृदय का आखिरी एक बार हम देखते हैं कि राम राम चंद्र दत्त ने वहां पर कांकड़ काछी में ठाकुर का श्राइन बनाया था ठाकुर की महासमाधि के बाद ठाकुर के जो अस्थि थे वहां पर उन्होंने स्थापित करके ठाकुर का मंदिर बना कर के वहां पर नित्य पूजा करते थे करवाते थे तो रामचंद्र दत्त को उस समय राम बाबू को किसी एक पुजारी की जरूरत थी ब्राह्मण पुजारी की जो ठाकुर की सेवा कर पाए तो उन्होंने उनको पता चला हृदय इस तरह से काम खोज रहा है तो उन्होंने हृदय को ही लाकर के बिठा दिया सोचा कि इससे अच्छा पुजारी कौन मिलेगा ठाकुर का ही वंशज है और ठाकुर की सदेव उसने सेवा की है तो अभी तो ठाकुर की सेवा करने के लिए इससे उपयुक्त कौन मिलेगा बोलकर के हृदय को बिठाया पुजारी के पद पे और हृदय ने फिर उसके मन में क्या सब पागलपन प्रकट हुआ कि ठाकुर जिस तरह से पूजा करते थे उस तरह से पूजा करनी शुरू की ठाकुर के लिए जो भोग आएगा वो अपने से खा लेगा ठाकुर के लिए जो पूजा के पुष्प हो गए अपने ही सर पे बैठा देगा और यह सब नाटक करना शुरू किया तो राम बाबू बड़े ही नाराज हो गए कहा कि तुम ठाकुर थोड़ी ना हो ठाकुर जिस तरह से विधि विधान को परे जाकर के रागा क्म का भक्ति रागा क्म का जो पूजा करते थे उस तरह की पूजा करने का तुमको अधिकार नहीं है तुम तो यह सिर्फ नाटक ही कर रहे हो जिसका जो भाव जेन्युइन है उसको वह भाव शोभा देता है गिरीश घोष को देख कर के और एक भक्त के मन में लगा था कि मैं भी ठाकुर को जाकर के गाली दूं ठाकुर को अपशब्द कहूं मेरा भी कल्याण हो जाएगा तो उसने जैसा ही ऐसा करना शुरू किया ठाकुर ने ऐसा डांट कर के उसको शांत कर दिया कहा सब लोग गिरीश घोष थोड़ी ना होते हैं गिरीश घोष की तो बात ही अलग थी गिरीश घोष अलग है ठाकुर व और ये जो दूसरा जो एक भक्त था उसका भान कर रहा था डोंग कर रहा था उसकी बात अलग है जिसका जो जेनन भाव है उसका वो जेनन भाव ही शोभा देता है तो ठाकुर जिस तरह से विधि विधान से परे जाकर के पूजा कर रहे थे ऐसी पूजा करने का हृदय को अधिकार नहीं है वैसा ही तो काम उसमें डूबा हुआ है काम कांचन में एक बार बात हो रही थी मथुर बाबू और हृदय की ठाकुर उस समय मंदिर में थे काली मंदिर में तो बाहर आकर के देखा कि मथुर बाबू हृदय को कह रहे हैं कि मैं जाऊंगा तो फिर ठाकुर की सेवा कौन करेगा मैं एक काम करता हूं ठाकुर के नाम पर एक जमींदारी लिख देता हूं और यह जमींदारी की सब रखवाली तुम करना मथुर बाबू हृदय को कह रहे हैं तुम रखवाली करना जमीन की जमींदार बन कर के रहना और ठाकुर की सेवा करना तो ठाकुर जैसे ही वह बाहर आए सुना इन दोनों को ये सब बातें करते हुए तो दोनों को मारने को दौड़े थे कि सालो तुम लोगों को शर्म नहीं आती मुझे क्या इस तरह से संसारी बना देना चाहते हो क्योंकि अल्टीमेटली ठाकुर की सेवा के लिए जिस चीज को चिह्नित किया गया है वो तो ठाकुर की ही हुई वो जो मां को किसी ने एक बार किसी ने कुछ रप ना कि ऐसा देने को चाहा तो ठाकुर ने सोचा कि अच्छा एक काम करो जद दूध के लिए जद चाहिए था इतना रुपया तो उसमें चल जाएगा तो फिर ठाकुर ने कहा कि अच्छा ठीक है वो एक काम करो मां को दे दो यह रुपया जाकर के तो बाद में एकदम ठाकुर को लगा कि अरे रात को ऐसा लगा जैसे हृदय में कोई उनको नाखून उनके हृदय में डाल दे रहा हो ऐसा उनका त्याग था कि इस तरह से पाच रुपया भी जो लिया था वो भी वो नहीं रख पाए उन्होंने जाकर के रामलाल दादा को कहा रात को ही वो रुपया जो हमने लिया है उसी को जाकर के वापस करके आओ उसी दिन रात को एक एक सेकंड वो एक क्षण भी वह रुपया अपने पास में नहीं रहना चाहिए तो ठाकुर का यह त्याग था तो ठाकुर वोह सब पूजा करेंगे मां का भोग बिल्ली को खिला देंगे वो ठाकुर को शोभा देता है हृदय को नहीं तो फिर ऐसा करके हृदय को जो भगा दिया वहां से तो वो हृदय की आखिरी स्टोरी अपने साहित्य में मैंने पढ़ी है तो यह था हृदय और यह थे मथुर बाबू मथुर बाबू के बारे में ठाकुर कहते थे कि मथुर की मेरे ऊपर में इतनी श्रद्धा भक्ति थी कि मैंने उसको जो कहा है वह मथुर ने किया है मैंने जितना जिसको दान देने को कहा है कपड़ा दे दो वस्त्र दे दो बर्तन दे दो गाड़ी दे दो सब मथुर ने बिना किसी झक के बिना किसी आर्गुमेंट किए उस इतना दान दिया है तो यह सब और ब्राह्मणी जो थी भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर की तंत्र गुरु तो भैरवी ब्राह्मणी मथुर बाबू को प्रताप रुद्र कह के पुकारा करती थी प्रताप रुद्र थे उड़ीसा के राजा और वोह चैतन्य महाप्रभु के बड़े ही भक्त थे तो यह प्रताप रुद्र यानी कि ठाकुर के प्रताप रुद्र कौन है तो यह मथुर बाबू जैसे कि भगवान बुद्ध के लिए भ ये सम्राट अशोक थे हालांकि दोनों साथ में नहीं जिए थे किंतु सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के प्रति जो श्रद्धा भक्ति की उसका वो दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है तो यहां पर भी मथुर बाबू है वो ठाकुर के अशोक या तो फिर ठाकुर के प्रताप रुद्र तो यह थे मथुर बाबू और हृदय जिन्होंने ठाकुर की इतनी सेवा की थी यहां पर गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं कि मथुर बाबू का जिस दिन निधन हुआ अच्छा मथुर बाबू के निधन के बारे में भी वह बात है कि मथुर बाबू मृत्यु शैया पे थे उस समय उनकी उनका तो मकान था कमरा था घर उनका कलकाता में और ठाकुर रहते थे दक्षिणेश्वर में और ठाकुर के साथ में तो इतना घनिष्ठ उनका संबंध था अभी वह मृत्यु शैया प है तो वह बार-बार कह रहे हैं ठाकुर को बुलाओ कि मेरा मुझे एक बार आकर के दर्शन दे दे तो ठाकुर जा नहीं रहे हैं कह रहे हैं मैं अभी इस समय जाकर क्या करूंगा मैं क्या उसको हेल्प करने वाला हूं तो यहां पर मथुर बाबू बार-बार बुला रहे हैं तो फिर आखिर में ठाकुर गए तो मथुर बाबू ने उनको उनके चरणों की धुल लेकर के कहा कि आप क्या समझते हैं कि मैं आपसे क्या कोई भव बंधन पार करने के लिए ना कि आपको मेरी बीमारी ठीक कर देने लेके क्या मैं आपको बुला रहा हूं यह सब तो आपने मेरे लिए ऑलरेडी कर दिया है और बीमारी ठीक करने की कोई अपेक्षा भी नहीं रखता हूं सिर्फ आपका दर्शन करना था इसलिए मैं बुला रहा था और तो यही मथुर बाबू का निधन हुआ उसके बाद में शंभू मल्लिक एक था ठाकुर का दूसरा रसत दार रसदार अर्थात कि जो लोग ठाकुर की जितनी भी आवश्यकताएं हैं उसको वे लोग निभाते हैं ठाकुर को ये चंदे का रुपया इकट्ठा करना अच्छा नहीं लगता था इसके बारे में हमने पहले भी काफी डिस्कस किया था काशीपुर में ठाकुर थे तो उस समय बात हुई थी कि खर्चा बहुत ज्यादा हो रहा है तो एक काम कर दे हम चंदा इकट्ठा करते हैं उसी समय ठाकुर ने कहा कि देखो इस तरह के चंदे के रूपे में नहीं रह पाऊंगा यह इस तरह से नहीं होगा फिर ठाकुर ने इनको कहा था पहले तो व नरेन को कहा नरेन यानी भविष्य के स्वामी विवेकानंद पहले तो नरेण को कहा तुम अपने कंधे पर बिठा कर के मुझे जहां पर ले जाओगे वहां पर मैं जाऊंगा इन लोगों का रुपया भी नहीं लेना और इन लोगों के गार्डन हाउस में काशीपुर में रहना भी नहीं है तुम ले जाओ मुझे तुम भिक्षा करके मुझे खिलाना उसी से मैं संतुष्ट रहूंगा यह तो नरेंद्र को कहा था और गिरीश घोष उनका भैरव भक्त गिरीश को कहा था कि देखो तुम यहां की जितनी भी आवश्यकता है उसको पूरी करना अभी गिरीश वैसे था थिएटर का मालिक था वैसे बड़ा ही उसका मनब भीतर में बड़ा ही श्रद्धा थी उसके भीतर में किंतु वह इतना धनपति नहीं था किंतु ष ने एकदम बिना झिझक के कह दिया कि घर बार थिएटर सब बेच दूंगा किंतु आपको मैं आपकी मैं सेवा करूंगा आखिर में वह सुरेश मित्र था उसने कह दिया कि नहीं ठीक है मैं मैं सब व्यवस्था करूंगा सब खर्चा मैं दूंगा तो ये दूसरे रसदार अभी प्रश्न होता हो सकता है कि इस तरह से चंदे के रूपे में और रसदार जो एक होता है एक व्यक्ति वही सारा खर्च दे इन दोनों में फर्क क्या है आप तो वैसे ही दूसरों के रुपए प रह रहे हैं कोई आपको चंदा करके दे 10 भक्त दे या एक भक्त दे फर्क क्या पड़ता है तो मुझे मेरा पर्सनली यह जो एक है कि चंदा करने में बहुत बार लोगों को शर्म में डाल कर के पैसा इकट्ठा किया जाता है यह कह के कि इसने इतना दिया उसने इतना दिया आप इतना कम क्यों देते हैं तो ये थोड़ा सा कोशन या तो फिर लोगों के ऊपर में दबाव डाल के पैसा इकट्ठा करने का एक रहता है यह शायद होगा इसके पीछे का भाव यह मुझे ऐसा लग रहा है तो जो भी है शंभू बाबू थे ठाकुर के दूसरे रसदार और फिर उन्होंने ठाकुर और मां की संपूर्ण रूप से बहुत सेवा की थी इसके बारे में हम लोग अभी बात करेंगे अभी गंभीरानंद जी महाराज लीला प्रसंग में से कोट करके कह रहे हैं शंभु बाबु पत्नियो ठाकुर के साक्षात देवता ज्ञाने भक्ति करी तेन एवं श्री श्री माता ठाकुरानी दक्षिणेश्वर थाकि ले तहा के प्रति जोय मंगल बारे निजा लए लैया जाया छोड़ो शोप चारे छोड़ो शो पचारे तहा श्री चरण पूजा करी तेन यह लीला प्रसंग में से गंभीरानंद जी कोट कर रहे हैं अर्थात कि शंभू बाबू की पत्नी भी मां शारदा देवी की बड़ी ही भक्त थी और जितने दिन जब मां शारदा दक्षिणेश्वर में रहती थी तो प्रत्येक मंगलवार को उनको अपने घर ले जाकर के उनके श्री चरणों की शौड़ शोप चार से पूजा करती थी तो ये एक बहुत बड़ी बात है कि जनरली हम लोग माको मान मां के बारे में मानते हैं कि मां की महिमा का गान सर्वप्रथम अपने नरेंद्र ने ही किया अर्थात कि स्वामी विवेकानंद ने ही किया किंतु इससे पहले की ये जो सब घटनाएं हैं ये शंभू बाबू की पत्नी देखिए मुझे भी यह पढ़ते हैं किंतु सब कुछ याद नहीं रहता है तो मैं भी यह सोच रहा था कि यह जो दाना काली की जो पत्नी है उसी को ठाकुर ने पहली बार मां के पास में भेजा था और वहीं पर मां की महिमा सर्वप्रथम इस तरह से प्रकाशित हुई थी दाना काली की पत्नी के बारे में पता है कि ठाकुर के पास आई कहा कि मेरा जो पति है बहुत ही बड़ा शराबी है बहुत ही मुझे मारपीट करता है मुझे बड़ा ही परेशान करता है उसके बारे में कुछ करो तो ठाकुर ने कहा एक काम करो दक्षिणेश्वर में मां है नबत में मां है तो नबत में जाकर के उनके साथ में बात करो अभी नबत और ठाकुर का कमरा यदि आपने दक्षिणेश्वर के दर्शन किए होंगे तो आपको पता होगा वैसे पासपास में ही है 20-30 फुट का ही अंतर है ज्यादा अंतर नहीं है तो किंतु मां इतने सावधान से इतनी गोपन होता से सीक्रेट वहां पर रहती थी कि बड़े कम लोगों को पता था कि मां वहां पे है तो यह दाना काली की पत्नी को ठाकुर ने मां के पास में भेजा तो मां तो पहले आश्चर्य चकित ही हो गई ठाकुर किसी को मेरे पास में क्यों भेजते हैं मैं क्या करने वाली हूं इसमें तो मां ने कहा कि एक काम करो बेटी तुम जाओ और ठाकुर को ही कहो कि आप जो करना है आप कीजिए मैं क्या करने वाली हूं तो दा ना काली की पत्नी बेचारी आई ठाकुर के पास में वापस कहा कि मां ने तो ऐसा कहा है कि वह कुछ नहीं कर पाएगी आप ही को कुछ करना होगा तो ठाकुर ने कहा अरे नहीं नहीं तुम जाओ कहो उसको वही जो कुछ करना है तुमको हेल्प करेगी वो तो फिर दाना काली की पत्नी मां के पास में वापस गई मां ने फिर से ठाकुर के पास भेजा ठाकुर ने फिर से मां के पास में भेजा तीन बार ऐसा हुआ तब मां समझ गई कि अभी ठाकुर छोड़ने वाले नहीं है और ये इसकी अवस्था है इसकी पत्नी की ये तो बड़ी ही अभी बुरी हो गई है रोने रोना जैसा उसका हालत हो गया है अभी क्यों मैं इसको फिर वापस भेजूं तो मां ने फिर एक बिल्व पत्र के ऊपर में कुछ नाम लिख कर के उनको दे दिया था तो अभी यह देखिए कि दाना काली की पत्नी को मां का आशीर्वाद जो प्राप्त हुआ तो अभी दाना काली के मन में जो परिवर्तन होना शुरू हुआ धीरे-धीरे धीरे करके जब वह ठाकुर के पास में आखिर में आया उस समय ठाकुर ने कहा कि देखो कि यह अपनी पत्नी को 12 साल से परेशान कर रहा था आज कहीं जाकर के उसके भीतर में थोड़ी सी अकल आई है तब तो दाना काली को पता चला कि 12 साल पहले उसकी पत्नी ठाकुर के पास आई थी और यहां से उसको आशीर्वाद मिला था तो मैं सोच रहा था कि यह यही थी यह सर्वप्रथम अपने संग में कि जिसकी जिसको पता चला था मां की महिमा के बारे में कि ठाकुर ने बताया था किंतु यहां पर देखिए कि शंभू बाबू की पत्नी भी इस तरह से मां की सेवा करती थी छोड़ो श उपचार से मां के चरण की पूजा करती थी ये बहुत बड़ी बात है ये सब समय याद नहीं रहते तो सब इंसीडेंट तो मेरे मन में था कि वही दाना काली की पत्नी ही सर्वप्रथम थी तो यहां पर पता चलता है कि शंभू बाबू की पत्नी भी वही जो सर्वप्रथम डिवोटा मां के पास में आना शुरू हुए थे उनमें से एक थी ये गोलाप मां है फिर ये योगेन मां है जो कलकाता के स्त्री भक्त है यह लोग तो बड़े बाद में आए थे मां के पास में यह तो सबका आना कब से हुआ था प्रारंभ अ 18753 में ठाकुर अ इसको मिले थे अपने इसको ब्रह्म समाज का वह जो लीडर था केशव सेन उसको मिले थे यह सब बातें इसके आसपास की है ठाकुर के बाकी जितने भी अंतरंग भक्त थे रामचंद्र दत्त है वगैरा वे लोग तो 89 यानी कि 188 के बाद में आना शुरू हुए थे यह सब घटना है इनके पहले की तो यहां पर इस तरह से महाराज जी लिखते हैं फिर आगे कहते हैं शंभू बाबू न्याय भक्ति परायण और सदाशिब होलो ना जे पलीर स्वाधीनता और स्वा छंद देर मध्य लालि माता ठाकुरी ठाकुरानीर पखे ओई पिंजर प्राय नबत गृहे बास कष्टदायक ओ स्वास्थ हानि कर शंभू बाबू बड़े ही भक्ति परायण थे और बड़ा ही तीव्र उनका ऑब्जर्वेशन था उनको यह बात समझने में देरी नहीं लगी कि जो गांव के मुख उत वातावरण में जिनका जन्म और लालन पालन हुआ है इस तरह की मां शारदा का दक्षिणेश्वर में एक पिंजरे में रहना नबत रूपी पिंजरे में रहना वोह उनके मन के लिए भी हानिकारक है उनके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है इसके बारे में एक घटना हमने पहले देखी थी कि अभी यह घटना है बहुत बाद की ठाकुर की महासमाधि के बात की स्वामी जी के भी महासमाधि के बात की मां उस समय ग्वालपाड़ा आना आया आना जाना करती थी और उस समय मां को जब भी दक्ष कोलकाता आना था जयराम बाटी से तो बीच में कोआलपाड़ा रुकती थी और वह आने जाने के लिए किसी को एस्कोर्ट के रूप में शरत महाराज कोलकात्ता से भेज देते थे तो उस समय एक स्वामी जी थे कुछ स्वामी जी को बेलूरमठ से या कलकाता से शरद महाराज ने भेजा था कि जाओ मां को जयराम बाटी से उनको एस्कोर्ट करके यहां पर लेके आओ तो ये लोग गए थे जयराम बाटी से या की है क्वाल पाड़ा आए हैं क्वाल पाड़ा कुछ समय विश्राम करेंगे कोलकात्ता जाएंगे बाद में उस समय क्या हुआ कि वहां पर जिस आश्रम में मां रुकी थी वहां पर जो क्वाल पाड़ा के जो मुख्य व्यक्ति मुख्य भक्त केदार बाबू तो केदार बाबू की मां ने कहा मां शारदा देवी को कि चलिए आप कुछ क्षण के लिए हमारे घर आइए तो मां भी सहमत हो गई और दोनों ये पैदल चलकर जा रहे हैं और उनके घर गए यहां पर ये जो महाराज थे जो कलकाता से गए थे मां को लेने के लिए उनको पता चला कि मां पैदल चलके इस तरह से केदार बाबू के घर गई है तो महाराज जी बड़े ही नाराज हो गए चिल्लाना शुरू कर दिए डांटना शुरू कर दिए कोआलपाड़ा के भक्तों को कि तुम लोगों में अकल नहीं है तुम लोगों को शर्म नहीं आती कि मां को इस तरह से पैदल लेकर के गए मां को तो हमेशा पालकी में बिठा कर के ले जाना है जिससे कि उनको कष्ट ना हो बोलकर के पालखी लेकर के केदार बाबू के घर जाने के लिए निकले यहां पे क्या हुआ कि मां ने केदार बाबू के घर से प्रस्थान कर लिया था वापस आने के लिए आश्रम में देखा कि आधे रास्ते में यह महाराज जी मिले उनको तो महाराज ने मां को प्रणाम करके कहा महाराज ये लोग किस तरह का अन्याय कर रहे हैं आपके साथ में आपको पैदल चला कर के इनके घर लेकर गए देखिए मैं पालकी लेकर आया हूं आप पालकी में बैठ जाइए मैं पालखी में बिठा कर के आपको आश्रम में ले जाता हूं तो मां थोड़ी सी नाराज तो हो गई किंतु उस समय कुछ बोली नहीं और पालखी में बैठ गई पालखी में बैठ कर के आश्रम में वापस आए फिर मां ने जो महाराज को डांटना शुरू किया मां ने कहा कि देखो यह हमारा ग्राम है मैं यह मेरा गांव है गांव में मैं गांव की महिलाओं की तरह ही मुक्त रूप से रहना चाहती हूं यहां पर भी यदि मुझे कलकाता की तरह एक जेल में पर बंद करके तुम लोग रखना चाहते हो तो मेरा कलकाता जाने का कोई इच्छा नहीं है तुम जाओ जाकर के शरत को बोल दो ऐसा करके मां ऐसी नाराज हो गई कि बिल्कुल इमीडिएट महाराज जी ने मां के चरणों में साष्टांग प्रणाम करके कहा मां आप मेरे पर नाराज मत होइए मैंने तो यह सोचा था कि शरत महाराज ने मुझे कहा था कि मां को बड़े ही संभाल पूर्वक बड़े ही यत्न पूर्वक तुम लेकर आना तो मुझे ऐसा लगा कि आप पैदल गई है तो मेरी ही कुछ गलती हो गई है इसलिए मैं पालखी लेकर के आपको मिलने के लिए आया था तो यदि आपकी इच्छा है पैदल चलने की तो आप पैदल चलिए इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा तो यह देखिए कि मां जब कोलकात्ता आती थी तो जितने भी आपको कता की प्रथा के अनुसार स्त्रियों को अंदर महल में रहना है घुमता टान करके रखना है पुरुषों के साथ में बात नहीं करना है बाहर में घूमना फिरना नहीं है दक्षिणेश्वर में तो पता है ना वो दक्षिणेश्वर का खजांची अर्थात कि वहां का मेन एडमिनिस्ट्रेटर वो कहता है कि हमने सुना है कि मां यहां पे है किंतु उनको कभी देखा नहीं है तो शौच जाना है तो शौच बिल्कुल अर्ली मॉर्निंग को जाना पड़ेगा फिर जैसे ही प्रभात हो गया है पुरुष लोग इधर-उधर जाना शुरू कर दिए हैं मां अपने नबत से बाहर ही नहीं निकलती थी एक बार ऐसा हुआ कि अंधेरे अंधेरे में शौच जाते-जाते गंगा किनारे एक मगरमच्छ के ऊपर में उनका पैर पड़ गया तो ठाकुर को जब से यह बात पता चली तो ठाकुर ने वह लाइट वगैरह की कुछ व्यवस्था की थी और फिर बाद में मां ने भी कहा था कि इस अभी देखिए अति प्रभात में सूर्योदय के पहले आप सोच जाएंगे उसके बाद में दिन भर आपको सोच जाने की आवश्यकता आन भी पड़ी तो आप नहीं जा पाएंगे तो मां ने कहा था इस तरह से वेग धारण करके करके ही मुझे पेट की बीमारी हो गई थी तो ये इनडाइजेशन वगैरह तो यह कष्ट करर जीवन मां को यहां पे सहना पड़ रहा था तो शंभू बाबू की नजर में किंतु आ गया देखा कि यह तो गांव के उन्मुक्त वातावरण में गांव में तो इस तरह से स्त्रियों को काम करना ही पड़ता है खेत में जाना पड़ता है घर का सब काम करना पड़ता है जलाशय में से पानी लाना पड़ता है वह सब काम तो महिलाओं को करना पड़ता है तो वे लोग बड़े ही फ्रीडम से वे लोग घर के बाहर में घूम सकती है कलकाता में मां इस तरह से नबत में रह रही है तो मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से मां के स्वास्थ्य को हानि होगी बोलकर के शंभू बाबू ने मां के लिए दक्षिणेश्वर गांव में एक मकान बनाने के लिए सब प्रयास प्रारंभ किए अत एव श्री श्री मायर तृतीय बार अर्थात मार्च 187 6 दक्षिणेश्वर फिरी बार पुर्बे तीनी काली मंदिरे नि कटे एकन जेखाने रामलाल दादा देर बाड़ी ताहर पार्श्व एक खानी चाला घर करिया दिवार जनन किछु जमी अ स टाका मूले मौरूसी कोरिया ले लेन यह सोच करके कि मां इस तरह से पिंजरे में बद्ध रहेगी तो मां को तकलीफ होगी शंभू बाबू ने क्या किया काली मंदिर के पास में ही जहां पर उस समय रामलाल दादा उस समय अर्थात की जब यह किताब लिखी गई य अभी पता नहीं उनका घर कहां पर है किंतु यह किताब जब लिख रहे थे गंभीरानंद जी अराउंड 1950 उस समय रामलाल दादा का घर वहां पर था तो वहीं पर कुछ उसी के पास में ही एक घर बनाने के लिए शंभू बाबू ने 50 देकर के जमीन को खरीद किया नेपाल सरकारर कर्मचारी श्री जुक्तो विश्वनाथ उपाध्याय तखन ठाकुरर प्रति विशेष श्रद्धा संपन्न नेपाल सरकार के प्रतिनिधि शंभूनाथ उपाध्याय विश्वनाथ उपाध्याय जिनको कि ठाकुर कैप्टन करके पुकारा करते थे वह ठाकुर के प्रति उस समय स विशेष श्रद्धा संपन्न थे तिनी गृह निर्माण शुभ संकल्प श्या प्रायोजन काष्ठ प्रदा नेर प्रति शूति दिले उन्होंने जब यह सुना कि शंभू बाबू वहां पर घर बना रहे हैं और शंभू बाबू ने जमीन भी खरीद ली है तो यह नेपाल के प्रतिनिधि कैप्टन ने कहा कि हां मैं घर बना ने के लिए जो लकड़ी लगेगी वह मैं दूंगा यथा समय गंगार अपर तीरथ बेलूर ग्रामर काठे गोला होते तीन खाली सालर गुंडी पठानो होलो किंतु रात्रे प्रबल जोर बेगे एक खानी भाष गेलो जब जरूरत पड़ी लकड़ी की तो दक्षिणेश्वर के सामने ही बेलूर ग्राम है और बेलूर ग्राम के बारे में आज हम सबको पता है वहां पर अपना बेलूर मठ है तो वही बेलूर ग्राम में से कुछ लकड़ियां जहां पर मिलती है वहां से लकड़ियां बांध करके गंगा के किनारे उनको बांध दिया गया किस तरह से बांधते हैं कि लकड़ियां तो पानी में डूबेगी नहीं तो लकड़ियों को पानी के भीतर में ही रख के वहां प बांध देते हैं पानी के ऊपर में तैरती रहेगी किंतु एक दिन रात को इस तरह से पानी का वेग और पानी का ज्वार इतना था कि जो लकड़ियां बांध कर के जो रखी थी उसमें से एक पूरा वो जो एक बंडल था लकड़ियों का वो पानी के साथ में में बह गया हृदय इ हाते विरक्त होया मातु लानी के बोली लेन तुम्हार भाग्य मंदो संगे संगे आरो किछु कटकती करी तेव भूली लेना जब हृदय को पता चला कि मां के घर के लिए लकड़ियां जो आई थी उसमें से एक बंडल पानी में बह गया है तो मां को जाकर के जो चाहे इस तरह से कटकती मां को करने लगा साथ में और कहा कि तुम्हारा भाग्य मंद है देखिए किस तरह का भागा यह हृदय है जिसका भाग्य पूरे भाग्य पूरे विश्व के भाग्य नियंता है जो जिनके भाग्य से पूरा विश्व चलता है ऐसी मां को जाकर के इस मूर्ख ने कह दिया कि तुम्हारा भाग्य मंद है मां का भाग्य मंद होता तो पृथ्वी कब की प्रलय में डूब जाती फिर से हमारा ये जो सृष्टि स्थिति चक्र ये जो चल रहा है चक्र कब का टूट जाता यदि मां का भाग्य मंद होता भाग्य मती स्वयं भाग्य जो जिनके जो भाग्य मती स्वयं है वैसी मां को कह दिया जाकर के कि तुम्हारा भाग्य मंद है ये पागल हृदय ने क्या पता नहीं उसके मन में उस समय चल रहा था ये सेवा का भी एक घमंड होता है ठाकुर की सेवा करते-करते उसके मन में ऐसा लगा कि अभी मैं ठाकुर से भी महान हो गया हूं तो यह सब नाटक वो कर रहा था उस समय तो मां को जाकर के इस तरह से कहा कि तुम्हारा भाग्य मंद है कैप्टन किंतु भाषा जबार संवाद पाइया आरे खाना गुंडी काट पाठया दिलन कि कैप्टन को जब पता चला विश्वनाथ उपाध्याय को जब पता चला कि उन्होंने जो लकड़ियां भेजी थी उसमें से एक बंडल इस तरह से पानी में बह गया है तो उन्होंने साथ में ही दूसरा एक बंडल मां के घर बनाने के लिए इमीडिएट भेज दिया आज देखिए कि मां का यदि घर बनाना है तो पैसों की लकड़ियों की सोनों की सोने की कोई किसी भी चीज की कोई भी अछत नहीं होगी मां के भक्त पूरे विश्व में है सभी लोग एक हाथ से दान करेंगे किंतु उस समय था किंतु यह देखिए कि विश्वनाथ का भी यह श्रद्धा कितनी थी और कोई होता तो कहता अच्छा ठीक है मेरे से जितना हुआ मैंने कर लिया अभी जो बह गया तो आप अपना देखिए ऐसा नहीं उन्होंने सामने से दूसरा लकड़ी इमीडिएट भेज दिया गृह निर्माण समाप्त होले श्री मां शेखाने चोलिया गले जब इस तरह से घर बन गया तो मां वहां पर चली गई ताहा के गृह करर में शहज जो करीब व सर्वदा संगे था की ब बोलिया एक स्त्री भक्त व छीलो मां के साथ में हमेशा जो रहेगी और मां को घर कार्य में सहाय करेगी बोलकर के और एक स्त्री को भी वहां पर रखने की व्यवस्था हुई शीघ्र ही हृदयर पत्नियो ओई गृहे आशिया श्री मायर संगिनी होलेन कुछ ही समय के बाद में हृदय की पत्नी भी आकर के मां के साथ में वहां पर रहने लगी श्री मां ईग है श्री श्री ठाकुरे रुचि और प्रयोजना अनुरूप विविध विविध खाद्य प्रस्तुत करिया मंदिरो द्याने लया जाई तेन एवं तहर भोजन समा पना स्वगृह फिरिया शते मां वहां पर ठाकुर के लिए विभिन्न खाना विभिन्न वानगी या पकवान बनाया करती थी और ठाकुर को खिलाने के लिए मंदिर में जाती थी ठाकुर को भोजन करवा करके फिर वह वापस आती थी श्री मायर भैरवी ब्राह्मणी का भी था भैरवी ब्राह्मणी जब पहली बार दक्षिणेश्वर आई तो पहले तो मंदिर में ही रहने लगी मंदिर में ही ठाकुर के लिए विभिन्न तरह का आहार वगैरह वह प्रस्तुत किया करती थी किंतु फिर उनको भी लगा ठाकुर को भी लगा कि देखिए इस तरह से भैरवी तो उम्र में कोई बहुत ज्यादा तो नहीं थी वह तो यंग ही थी फिर भी उस समय मिडिल एज थी उसकी उम्र वो ठाकुर के साथ में उस तरह से रहेगी तो लोग क्या कहेंगे बोलकर के ठाकुर ने भैरवी के लिए दक्षिणेश्वर गांव में ही रहने की सब व्यवस्था वस्था कर दी थी तो वहां पर भैरवी ब्राह्मणी गांव में ही रहती थी और वह गांव की जितनी महिलाएं थी उनकी वह बड़ी प्रिय हो गई थी उस समय और फिर गांव में ही विभिन्न तरह का आहार बना कर के ठाकुर को खिलाने के लिए मंदिर में आया करती थी तो यहां पर मां को भी देखिए कि वहां पर गांव में रहती है ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करती है और ठाकुर को भोजन करवाने के लिए काली मंदिर में आती है श्री मायर संतोष और तत्ता नेर जनन ठाकुरो दिवा भागे कखन कखन ओई गृहे पदार्पण करतन एवं किछु काल शदा लाभ करिया निजो स्थाने फिरी तेन मां को संतोष मां के संतोष के लिए मां को एक कंपनी मिले इसके लिए और मां के जो वहां पर घर है उसमें सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है कि नहीं वह देखने के लिए ठाकुर भी कभी-कभी मां के घर जाते थे और मां के साथ में कुछ समय तक वार्तालाप कर के मंदिर में वापस आते थे ये ये दृश्य भी कल्पना करके बड़ा एक एक एक आनंद आता है जब तक मां दक्षिणेश्वर मंदिर में ही रहती थी काली मंदिर में ही रहती थी नबत में तो अभी ठाकुर का नबत में जाने का तो ऐसा कोई वहां से सामने से जाएंगे और सुबह को जब ठाकुर शौच के लिए जाएंगे बहुत ही अर्ली मॉर्निंग उस समय जोर से चिल्लाए लक्ष्मी और मां साथ में रहती थी तो नब्त में तो ठाकुर चिल्लाए अरे लक्ष्मी कितना देरी तक सोगी सुबह हो गया है उठो ठाकुर का नाम लो अपनी खड़ी को भी अपनी अपनी जो काकी है उसको भी उठाओ अपनी चाची को भी उठाओ ये क्या सोती रहोगी बोल कर के ठाकुर चिल्लाते थे बाहर से नबत में और फिर मां उस समय जैसे ही लक्ष्मी दीदी की नींद उठ जाती थी खुल जाती थी तो मां उनको एकदम शांति से कहती कि एक काम करो वापस सो जाओ तुम चिंता मत करो ठाकुर तो रात को सोते नहीं है ठाकुर की आंखों में नींद ही नहीं है वो तो चिल्लाते रहेंगे किंतु तुमको नींद नहीं पूरी होगी तो तुमको तकलीफ होगी सो जाओ तुम वापस ऐसा करके मां फिर उनको सुला देती थी अभी ठाकुर शौच के लिए गए हैं जब वापस आक के देखा कि मां के कमरे में वो प्रदीप वगैरह नहीं जल रहा है दैट मींस कि ये लोग अभी भी सोए हुए हैं तो ठाकुर क्या करते थे वो एक बकेट पानी भर कर के वो जो दरवाजा होता है उसके नीचे थोड़ी सी जगह होती है उसमें से पानी डाल देते थे तो अभी यह दोनों तो जमीन पर सोती थी ना जो बिस्तर वगैरह थे जमीन प ही बिठाते थी वहां प खाट वगैरह की तो कोई व्यव थी नहीं तो अभी पानी भीतर में आएगा तो वह तो बिस्तर वगैरह गिले हो जाएंगे तो फटाफट करके मां और लक्ष्मी दीदी को खड़े हो जाना पड़ता था तो इस तरह से ठाकुर वहां पर जाते थे किंतु बाहर से ही जो कुछ भी वार्तालाप किया करते थे यहां पर किंतु वह मां के घर में जाकर के वहां पर बैठते हैं और मां के साथ में बातें करते हैं वह कितना सुंदर दृश्य होता होगा एक दिन मात्र ई नियम व्यतिक्रम होया छलो एक दिन इस नियम में भंग हुआ था कौन सा नियम कि ठाकुर जाएंगे कुछ समय बैठेंगे किंतु रात होने से पहले दक्षिणेश्वर में मंदिर में आ जाएंगे क्यों क्योंकि रात वो वहां पर नहीं बिताएंगे रात को तो अपने कमरे में ही मंदिर में ही बिताते थे तो एक दिन किंतु इस नियम का भंग हुआ था एक बर सार दिने ठाकुर ओई चालाई उपस्थित होई बार पोर एमन मुशल धारे बृष्टि चली ते लागलो जे तीनी मंदिरे प्रत्यावर्तन खोम होईया आहार आंते शेखाने सुया पड़ी लेन आर ठट कोरिया श्री मा के बोली लेन काली र बामरा रात्रे बाड़ी जाए ना ए जेनो आमी ताई ऐसे छी एक दिन रात को एक दिन बारिश का समय था मौसम थी बारिश की मानसून का सीजन था ठाकुर आए थे मां के घर और जैसे ही मां के घर में प्रवेश किया कुछ ही समय के बाद में इतनी भयानक रूप से बारिश प्रारंभ हो गई कि अभी इस बारिश में तो मंदिर में वापस जाना संभव नहीं है तो ठाकुर ने आहार करके वहीं पर रात को शयन किया और हंसी मजाक में मां को कहा कि यह जो कालीबाड़ी के जो दूसरे ब्राह्मण जो पुजारी है ब्राह्मण जो है वो कैसा काम समाप्त करके अपने घर जाकर के अपने परिवार जनों के साथ में रहते हैं तो मैं भी ऐसे ही तुम्हारे घर आया हूं जैसे बाकी सब पुजारी लोग अपने घर चले जाते हैं रात को मैं भी इस तरह से यहां पर आया हूं तो चलाते श्री मां दीर्घ काल बास कोरीते पारे नाई इस घर में मां लंबा समय रह नहीं पाई थी क्यों इसके बारे में अभी हम कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु बाद में किंतु दाना काली ने सेवा भी कितनी की पता है ना कि जब वो बंबई में उसका पोस्टिंग हुआ था और बंबई में जितने भी गुरु भाई प्रव्रज्या के लिए समय बंबई जाते थे सब दाना काली के घर रुकते थे स्वामी जी खुद उसके घर रुके थे जब प्रव्रज्या कर रहे थे तब तो सेवा भी उसने बहुत की थी और यह बात तो सही है देखिए कि बिना श्रद्धा के यह सब तो होने वाला नहीं है ना जब मास्टर महाशय ने मास्टर महाशय नहीं ये अक्षय कुमार सेन ने जब पुंथी लिखी थी रामकृष्ण पुंथी उस समय स्वामी जी ने कहा था कि ठाकुर का ठाकुर खुद ओरिजिनल थे और ठाकुर के पास जो लोग आ रहे हैं वह सब ओरिजिनल है अर्थात कि ठाकुर का खुद का अपना एक इंडिपेंडेंट ओरिजिनल थिंकिंग था और उनके पास में जो लोग आए हैं सबका अपना-अपना एक प्रचंड चरित्र है अपना-अपना मास्टर महाशय ने देखिए कथामृत लिख लिया ठाकुर के सन्यासी संतानों की तो बात ही नहीं है महापुरुष महाराज लाटू महाराज खोखा महाराज अद्वैतानंद जी मने एक के बढ़कर एक सब है तो अभी यह बड़े-बड़े लोगों के बारे में तो हमको पता है कि राजा महाराज ने इतनी तपस्या कर ली लाटू महाराज ने इतनी तपस्या कर ली किंतु यह जो अत्यंत सामान्य लोग इसका नाम भी नहीं पता दाना काली की पत्नी इतना ही पता है हमको किंतु इसके जीवन में भी जो एक प्रचंड तपस्या का प्रवाह बह रहा था च वास नॉट लेस देन एनी ऑफ ग्रेट डिसाइल्स ऑफ ठाकुर यह मेरा पर्सनल मानना है नित्य सत्संग जैसे कि अभी हमको यह पता है कि दाना काली की पत्नी एक बार आई थी मां के पास में प्रथम बार जब आई थी किंतु ऐसा तो कहीं पर नहीं अभी आधर और यह भी नहीं लिखा है कि बाद में कभी नहीं आई और यह भी नहीं लिखा है कि फिर वो नियमित रूप से आती थी तो इन एब्सेंट ऑफ एविडेंस हम मान लेते हैं कि नियमित रूप से मां के पास में आती ही होगी तभी तो कहीं जाकर के सब समय ये जो सदिया चाहिए मन को पापी तापी मन को तो वो तो सत्संग से ही तो मिलता रहेगा तो अभी यह जो सब वर्णन जो है ना अपनी कथामृत में वगैरह कि स्त्री भक्त वहां पर रह रही है उसमें कलकत्ता से जितने भी स्त्री भक्त आते थे वो दक्षिण नबत में मां के साथ में रहते थे मां उनके लिए खाना बनाती थी तो हम मान लेते हैं कि दाना काली की पत्नी भी बीच-बीच में आती ही होगी ठाकुर और मां का दर्शन करके प्रणाम करके आशीर्वाद तो लेती ही होंगी ये नित्य सत्संग जो है कि नियमित रूप से यह सब करते रहना दैट इज अवर बिगेस्ट क्या कहेंगे किय अपनी स्ट्रेंथ है ऐसा जो एक है एक्चुअली मां ने एक बार किसी को कहा था कि तुम लोग जब क्यों करते हो जब तो स्त्री लोग करेगी तुम लोगों के लिए तो ध्यान है तो इस तरह से मां ने कहा है हालांकि मां अभी यह सब तो साधक स्पेसिफिक है मां ने तो मंत्र जब बहुत मंत्र बहुत लोगों को दिया था और लोगों को विभिन्न तरह से इंस्ट्रक्शन भी देती थी तो किंतु जब के बारे में माने इस तरह से एक बार एक पुरुष भक्त को कहा था कि जब तुम्हारे लिए नहीं है जब स्त्रियों के लिए तुम लोगों के लिए ध्यान है प्रार्थना बार-बार करना नहीं करना उसके बारे में मुझे नहीं पता मुझे याद नहीं आ रहा है ये सब चीजों में क्या है ना कि पर्सन स्पेसिफिक होता है अभी जब के बारे में ही मां कितनी विभिन्न तरह की बातें किया करती थी एक बार किसी ने कहा कि मां मेरे से जब नहीं हो रहा है तो मां ने कहा मैं तो तुम्हारे लिए करती हूं और किसी ने आकर के कहा मां मेरे से जप नहीं हो रहा है तो मां ने कहा तुम ही डूबो ग मुझसे मुझे क्या है मैंने स्पष्ट ऐसा कह दिया था तो ये सब पर्सन स्पेसिफिक होता है कि आपको मां किस कैटेगरी में डालती है मां आपके लिए जप करती है कि मां कहेगी आपको खुद जप करो वो सब है i