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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 8 oct 2024

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मां का जीवन हम पाठ कर रहे थे देखा कि दक्षिणेश्वर में मां किस तरह की असुविधा में किस तरह की कष्ट में वो रह रही है और फिर भी मां बाद में जिस तरह से हमको कहेगी कि आनंद का एक पूर्ण घट हृदय में स्थापित करके रखा हो इस तरह से उनको हमेशा महसूस होता था तो यह आनंद का घट हृदय में है और बाहर में जिस तरह से है कि गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि एक दिन अंधकारे स्नानेर जन्य सीढ़ी बाहर बाहिया गंगाई नामी ते गया तिनी एक कुमरर गाय प्राय पा दिया छले एक दिन अंधकार के समय सीढ़ी से उतर कर के गंगा में वह स्नान करने के लिए ना कि किसी भी कार्य से गई होंगी तो एक दिन ऐसा हो गया कि वहां पर एक मगरमच्छ था तो ऑलमोस्ट उसके ऊपर में पैर पड़ गया था कुमर सीढ़ रूपर सुया छीलो उस सीढ़ी के ऊपर में ही यह मगर सोया हुआ था श्री माय पद शब्द सुनिया झोले लाफाई या पड़े मां के पैरों की आवाज सुनकर के उसने पानी में जाकर के जंप लगा दिया पानी में जाकर के कूद गया तद बोधी तीनी आलो नालिया नाने जैते ना इस घटना के बाद में मां प्रकाश लिए बिना कोई दिया या बत्ती लिए बिना कभी स्नान के लिए नहीं चाती थी तो बाहर में इस तरह से है और भीतर में किंतु आनंद का पूर्ण घट विराजित है यहां पर देखिए कि एक एक मगरमच्छ को लेकर के एक दूसरा भी एक सुंदर कहानी अपने शास्त्र में है कि किस तरह से शंकराचार्य की इच्छा थी कि वह सन्यास ग्रहण करें किंतु उनके पिताजी थे नहीं मां अकेली थी और मां के आशीर्वाद के बिना किस तरह से संन्यास ले सकते हैं तो वह सब चल रहा था मां कहेगी कि मैं अनुमति नहीं दूंगी शंकराचार्य चाहते थे सन्यास लेना एक बार स्नान करते हुए क्या हुआ एक मगरमच्छ ने आकर के शंकराचार्य का पैर पकड़ लिया और उनको पानी की ओर खींचने लगा तो शंक अभी उनकी मां तो किनारे पे थी वो बेचारी रो रही है चिल्ला रही है कि मेरे बच्चे को इस तरह से यह मगर मार डालेगा खा जाएगा मैं अकेली विधवा वो तो पति नहीं थे उनके तो मैं क्या करूंगी ऐसा करके और बच्चा तो अपना प्राण से भी प्रिय होता है तो उसी समय शंकराचार्य ने चिल्ला करके के कहा कि मां वैसे ही तो मेरा मृत्यु हो रहा है तुम मुझे सन्यास की अनुमति दे दो तो अभी क्या है कि देखिए सन्यास विधि के साथ में जो लोग परिचित है उनको पता है कि सन्यास के पहले तो अपना स्वयं श्राद्ध करना पड़ता है श्राद्ध का अर्थ हुआ कि आप श्राद्ध आप किसका करते हैं जिनका कि मृत्यु हो गया है उन्हीं का तो श्राद्ध करेंगे तो सन्यासी भी सर्वप्रथम अपना श्राद्ध कर लेते हैं क्यों क क कि वैदिक प्रथा के अनुसार वैदिक नियमावली वर्णाश्रम से वह पर चले जाते हैं ऊपर चले जाते हैं या तो उनके परे चले जाते हैं तो फिर यह वैदिक प्रथा के अनुसार उनका मृत्यु हो गया है उनके उनके देहांत के बाद में उनका श्राद्ध करने वाला कोई नहीं होगा क्योंकि सन्यासी के तो ना ही माता है ना ही पिता है ना ही भाई बहन पत्नी पुत्र उसका तो कोई भी नहीं है तो श्राद्ध कौन करेगा तो श्राद्ध सन्यासी स्वयं अपना कर लेता है बाद में वह सन्यास विधि विधिवत सन्यास ग्रहण करता है तो आपको वैसे ही बच्चे की मृत्यु होने वाली है और वैसे ही बच्चा चाहता है कि व आखिरी उसकी इच्छा है कि वह सन्यास ले ले तो मृत्यु के पहले यदि वह संन्यास ले तो फिर वह एक ही चीज होती है उसके मन की इच्छा पूर्ण होगी तो यह सोच कर के मां ने उस समय किनारे पर जो खड़ी थी अनुमति दे दी कि अच्छा बच्चा मैं तुमको अनुमति देती हूं तुम सन्यास ले लो उसी समय किंतु ऐसा हुआ कि मगरमच्छ ने शंकराचार्य को छोड़ दिया और वह पानी में चला गया अर्थात कि यह एक दिव्य घटना थी ईश्वर या देवता भी चाहते थे कि शंकराचार्य सन्यास ले और सन्यास लेकर के अपना हिंदू धर्म की जो लुप्त शास्त्र है खास करके यह प्रस्थान त्रय तो प्रस्थान त्रय का उद्धार करें उसके ऊपर में टीका लिखे और हिंदू धर्म का पुनः जागरण करें यह प्रस्थान त्रय अर्थात की उपनिषद ब्रह्मसूत्र और श्रीमद भगवत गीता श्रुति प्रस्थान न्याय प्रस्थान और स्मृति प्रस्थान तो इन तीनों के ऊपर में शंकराचार्य ने टिकाए लिखी थी और बाद में व्यास देवता का दर्शन भी हुआ था व्यास देव का दर्शन भी शंकराचार्य को हुआ था क्योंकि जब वह वैदिक युग की समाप्ति हुई तभी यह भगवान वेदव्यास ने ही सभी वेद को इकट्ठा करके उनको सिस्टेमेटाइज्ड भगवत गीता तो यह जो प्रस्थान त्रय के जो आदि प्रणेता थे वो तो थे भगवान वेदव्यास तो जब शंकराचार्य ने इन तीनों ग्रंथ के ऊपर में टिकाए लिखी उनको फिर से भारतीय जन समाज में प्रचलित किया तब कहीं जाकर के भगवान वेदव्यास का उनको दर्शन भी हुआ था तो बीच में जो बौद्ध युग आया था और बौद्ध युग की उनके आगमन की वजह से हम हिंदुओं में अपने ही धर्म के प्रति जो एक संशय जागृत हो गया था कि भगवान बुद्ध तो वेद विरोधी है या तो फिर वेद को स्वीकार नहीं करते या तो फिर और यदि श्री रामकृष्ण देव की भाषा में कहा जाए तो भगवान बुद्ध मौन थे ब्रह्म का स्वरूप क्या है तो बुद्ध मौन रहे क्यों क्योंकि ब्रह्म का स्वरूप आप अपने शब्दों से वर्णन नहीं कर सकते हैं वह शब्द के परे है तो इसीलिए बौद्ध धर्म का जब प्रचार हुआ किंतु तो भगवान बुद्ध ने अपने से तो ऐसा नहीं कहा था कि हम लोग हिंदू से अलग एक नया पंथ प्रारंभ करेंगे उन्होंने तो सिर्फ इस ईश्वर की ईश्वर का अंतिम स्वरूप क्या है उसके बारे में मौन धारण किया और कहा कि जो साधन पद्धति है उसको आप बहुत ही अच्छे से फॉलो कीजिए तो साधन पद्धति को आप फॉलो करते-करते ईश्वर का अंतिम स्वरूप है उसको आप स्वयं ही जान लेंगे उसके बाद में आपको मुझे पूछने की जरूरत नहीं होगी कि ब्रह्मण क्या है जब आपको ब्रह्म दर्शन स्वयं होगा तब आप समझ जाएंगे तो यह बुद्ध युग था उसमें भी बाद में बहुत सारा कुछ एक तरह से कहे तो विकार आ गया और यह विकार की वजह से ही फिर आखिर में हिंदू धर्म को पुनः जागृत करना पड़ा उनका अभी ऐसा तो नहीं है कि हिंदू धर्म समाप्त हो गया था भारत में से स्वामी जी का एक स्वामी विवेकानंद का एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट है स्वामी जी क्या कहते हैं कि भारत में एक ऐसा युग एक भी ऐसा युग नहीं गया जब की कोई ना कोई ब्रह्म ब्रह्मज्ञानी भारत की इस पवित्र भूमि पर विचरण ना कर हो अर्थात कि प्रत्येक युग में एक ना एक ब्रह्मज्ञानी हमेशा भारत की भूमि पर उन्होंने साधना की है उन्होंने अपनी साधना का फल अपने आशीर्वाद इस भूमि को भूमि के भीतर में उन्होंने बीज बोए हैं जैसे कि अपने आशीर्वाद से भूमि को सिंचित किया है तो इसी सिंचित की हुई भूमि का ही परिणाम है कि भारत में आज हजार हजार लाख लाख तीर्थस्थान है कोई भी गांव में जाएंगे कोई भी शहर में जाएंगे कोई भी जगह पर राज्य में जाएंगे इतने सारे तीर्थ स्थान इतने सारे संतों के बारे में संतों की कहानी आपको सुनने को मिलेगी तीर्थ स्थान देखने को मिलेंगे और इनवेरिएबली हमेशा ऐसा होगा वहां पर जाकर के थोड़ा सा भी आंख बंद करके आपने ईश्वर का स्मरण करने का प्रयास किया तो इमीडीएटली आपका मन ऊर्ध्वगामी होना शुरू हो जाएगा फिर चाहे संसार की हजार चिंताए क्यों नाना पड़ी हो तीर्थ स्थान में जाकर के आप देखेंगे कि आपको यह फल अवश्य देखने को मिलेगा तो यह था मैंने ये मगरमच्छ की बात से ये एक उसका एक दूसरा रेफरेंस अपने शास्त्र में अच्छा तो अभी मां के जीवन में वापस चले आते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं महाराज जी कहते हैं लिखते हैं श्री मायर किंतु ऐश क्लेश बा असुविधा प्रति खेप छलो मां का यह सब क्लेश या तो फिर असुविधा क्लेश यानी कि कष्ट और अ असुविधा के प्रति कोई भी दृष्टि नहीं थी बुखे अर्थात कि इन सब की ओर मां देखती तक नहीं थी उत्तर काले सब कटेर कथा उल्लेख कोरिया हो तिनी भक्तो दिग के बोली तेन बाद में जब ठाकुर की महासमाधि हुई फिर स्वामी जी अमेरिका से वापस आए रामकृष्ण मठ और बेलूर मठ की स्थापना की और फिर मां के लिए शरत महाराज मां के द्वारी हुए मां की सेवा का भार ग्रहण किया कोलकात्ता में उद्बोधन भवन का निर्माण किया जयराम बाटी में जितने भी आवश्यकताएं होती थी जितने सेवक को भेजना होता था वह सब यहां से शरद महाराज देख रहे थे तो उस समय में मां ने यह सब घटनाओं का बात-बात में सभी लोग तो मां को पूछेंगे ना मां उन पुराने दि दिनों की बात करो मां दक्षिणेश्वर में आप कैसी थी ठाकुर की बात करो तो यह सब घटनाओं का वर्णन करके फिर आखिर में मां कहती थी तबू आर कोनो कोटो जाननी फिर भी इतना सब होने के बाद में भी फिर भी और कोई कष्ट देखा नहीं है और कोई कष्ट अनुभव नहीं किया है तार से बार जनन कोनो कष्ट गाए लागतो ना तार अर्थात की श्री राम कृष्ण श्री राम कृष्ण की सेवा करते-करते कोई भी कष्ट गाय लागतो ना अर्थात कि शरीर को अंग को स्पर्श भी नहीं कर पाता था ठाकुर की सेवा करते-करते मां जैसे कि एक इस तरह के एक दिव्य राज्य में चली जाती थी कि यह संसार का कष्ट रहने खाने पीने का कष्ट बार-बार यह डाइजेंस हो जा रहा है वहां की ह्यूमिड एटमॉस्फियर है इत छोटे से नबत में रहना है वहीं पर जैसे कल हमने देखा कि रस्सी से एक हांडी झुलाई रहती है छत से उसमें फिर पानी रख कर के मछली रखी है ठाकुर के लिए मछली का सूप तैयार होगा तो यह सब उसी के नीचे में फिर मास होई है तो यह सब कष्ट उनको स्पर्श तक नहीं करता था कोथा दिए आनंदे दीन केटे जेतो कहां आनंद में दन पसार हो जाते समझ भी नहीं आता था के हो अच्छा अभी मां ने जब ऐसा कहा तब अभी गंभीरानंद जी हमारे सामने एक आर्गुमेंट खड़ी करते हैं गंभीरानंद जी कहते हैं कि कोई कोई कहेगा कि अच्छा आप तो ठाकुर के साथ में रहते हैं ठाकुर का आशीर्वाद आपको प्राप्त है ठाकुर ने ही तो आपको जैसे कि साधन भजन के बारे में सब कुछ उपदेश देते हैं आज हमारी अवस्था देखिए रामकृष्ण संघ के िक हो ना कि भक्त हो ना कि कोई भी एक आध्यात्मिक साधक हो इन जनरल हम सबके साथ में एक सबसे बड़ा प्रश्न क्या है कि हमको गुरु नहीं मिलता क्यों क्योंकि अपनी भारतीय परंपरा के अनुसार गुरु कौन है गुरु वह है जो कि आपके जन्म जन्मांतर के कर्म के प्रवाह है उसको पहचान करके उसको समझ करके आपको इतना परफेक्ट एक तरह की साधन पद्धति दर्शित करें और इतना सुंदर रूप से प्रत्येक पद शेप पे जीवन के प्रत्येक स्टेप पे आपको इस तरह से गाइड करें कि आप बड़े ही आसानी से बिना किसी कष्ट के ईश्वर दर्शन या आत्म दर्शन प्राप्त हो जाएंगे अभी आज मुझे कोई भी बीमारी हुई है तो पहले तो ऐसा था कि कोई भी हार्ड वैद के पास चले जाएंगे और जैसे कि और फिर वह पता नहीं किस तरह का उल्टा-पुल्टा ट्रीटमेंट करेगा यदि लगा ट्रीटमेंट तो हो गया नहीं लगा तो नहीं लगा जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि वह गांव जा रहे थे कमार पुकुर के रास्ते से एक बेलगाड़ी में बैठ कर के कुछ डकेट आ गए चारों ओर से तो ठाकुर ने फिर डर के मारे सभी का नाम लेना शुरू कर दिया काली काली दुर्गा दुर्गा शिव शिव कृष्णा कृष्णा राम राम जो भी काम करें जे खटे ठाकुर कहते हैं तो एक तरह के वैध्य एक तरह के डॉक्टर ऐसे होते हैं लगा कि बुखार है तो बुखार की दवाई दे दो बुखार नहीं कम हो रहा है तो इसकी दवाई दे दो यह नहीं लग रहा है तो यह तीसरी दवाई दे दो एक्सपेरिमेंट पे एक्सपेरिमेंट करते जाएंगे आपका गठन किस तरह का है आयुर्वेद में कहा जाता है कफ पित्त वायु तीन तरह के गुण अपने शरीर में होते हैं और ठाकुर जैसे कहते हैं कि वैद्य शास्त्र यदि सीखना है तो कौन सी नाड़ी किस काम की है क्या कार्य करती है वह कौन सी नाड़ी के क्या गुणधर्म है आपको वैद्य के साथ में रह कर के सीखने होंगे नाड़ी देखना सीखना होगा कफ पित्त वायु का क्या बैलेंस है इंबैलेंस है वह समझना होगा फिर वह समझ कर के परफेक्ट डायग्नोसिस होकर के आपको औषध देना है जैसे कि वह ठाकुर ने वो जो मां के बारे में कहा था हमने वह घटना देखी थी कुछ दिनों पहले कि कामर पुकुर में ठाकुर और हृदय खाने के लिए आहार करने के लिए बैठे हैं खाना बनाने वाले थे दो एक तो थी मां दूसरा कि रामलाल दादा की मां ये अर्थात की ठाकुर के जो बड़े भाई थे उनकी पत्नी तो यह रामलाल दादा की मां और अपनी मां शारदा दोनों ने आहार बनाया है प्रस्तुत करके ठाकुर और हृदय के सामने रखा है उसमें से एक तरह का आहार एक तरह की पकवान या वानगी या तरकारी जो भी होगा वह खा करर के ठाकुर कहते हैं कि अरे रिदु य जे बानी छ से होचे रामदास बदी अर्थात की राम दास नामक वैद्य जो वहां पर फेमस होगा वह है रामदास वैद्य या तो वदी ये ठाकुर की गांव की भाषा के अनुसार और ये जो दूसरे तरह की तरकारी जिसने बनाई है वो व आ छी नाथ सेन छी नाथ सेन अर्थात की श्रीनाथ सेन अगेन गांव की भाषा में ठाकुर की भाषा में अर्थात की मां कहती है कि देखिए यह रामलाल दादा की मां हुई यह रामदास वदी जो कि अच्छा वैद्य है जो कि प्रॉपर ट्रीटमेंट करता है और मैं हुई छी नाथ सेन अर्थात कि हाथ उड़े हाड़ वैद्य उसके हाथ में पड़ेंगे तो जीवन बचेगा कि नहीं बचेगा कुछ ठिकाना नहीं तो ये देखिए कि दो तरह के डॉक्टर आजकल भी देखिए कि यदि आपको प्रॉपर ट्रीटमेंट लेनी है तो ठीक-ठीक से आपका डायग्नोसिस हुआ तो अच्छे से दवाई मिलेगी अच्छे से ट्रीटमेंट होगी तो कहने का तात्पर्य यह है कि मां कितनी भाग्यवान थी या तो फिर मां जगदंबा स्वयं है तो फिर भाग्य वगैरह तो क्या भाग्य तो उनके हथेली में है तो आपके लिए तो दक्षिणेश्वर में इतना कष्ट करके रहना वह तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है भगवान श्री राम कृष्ण देव का संग स्वयं आपको प्राप्त था उनके जैसे गुरु आपके लिए थे वह तो आपके इष्ट और आपके पति थे तो उसमें आप बाहर का कष्ट भूल कर के भीतर के आनंद का अनुभव करें उसका उपभोग करें उस बात में कुछ आश्चर्य की बात क्या है ऐसा एक ऑब्जेक्शन कोई खड़ा कर सकता है ऐसा अभी गंभीरानंद जी महाराज इस ऑब्जेक्शन को भी खड़ा करते हैं और उसका उत्तर भी देते हैं क्या लिखते हैं महाराज के हो होई तो भाभी बहन कोई हो सकता है कि ऐसा सोचेगा य आनंदे थाक मध्य श्री मायर कोन कृतित्व नहीं इस आनंद के बीच में रहना इसमें मां का खुद का कोई उपलब्धि नहीं है कारण जे आनंदमय पुरुषेर आकर्षण दूर दूरा होई ते आग तो स्त्री और पुरुष भक्त बिंदो तहर कथामृत पाने संसारे ज्वाला जंत्रण एक काले भुलिया दिनर पर दिन दक्षिणेश्वर थाक जाई तो तहर निकट अस्थान तो सौभाग्य कथा मां को ठाकुर के पास में रह करर के आनंद की उपलब्धि करना इसमें मां का खुद का कोई यह नहीं है कोई सिद्धि नहीं है यह तो सहज है क्यों क्योंकि जिस आनंदमय पुरुष के आकर्षण से देश देशांतर देश देशांतर से दूर दूर से कितने ही स्त्री पुरुष भक्त वृंद उनके कथामृत पान करके कथामृत पान करके संसार की ज्वाला जंत्रण हमेशा के लिए भूल कर के दिन के बाद दिन दक्षिणेश्वर में रहने के लिए तैयार हो जाते हैं उन के सामने उनके साथ में रहना वो तो बड़े सौभाग्य की बात है ठाकुर जी जो मास्टर महाशय की ही बात देखिए मास्टर महाशय कहां सुसाइड करने को गए थे कहां उनके घर में कष्ट था और फिर कहां से ठाकुर की ठाकुर के बारे में उनको जानने को मिला ठाकुर के बारे में ठाकुर का दर्शन हुआ ठाकुर का कथामृत सुनने को मिला और फिर उनका मन जैसे कि हमेशा के लिए ठाकुर के श्री चरणों में आबद्ध हो गया हमेशा के लिए उन्होंने अपने को श्री राम कृष्ण देव को अर्पण कर दिया अर्पित कर दिया तो मास्टर महाशय की यह सुंदर कहानी और फिर मास्टर महाशय ही कहा जितने भी भक्त ये स्वामी जी को ही देखिए स्वामी जी वैसे तो ठाकुर की कितनी हंसी मजा कर किया करते थे कहते थे ठाकुर के जितने भी दर्शन है सब उनके मन का भ्रम है किंतु एक दिन बेचारे के पिताजी का मृत्यु हो गया स्वामी जी के नरेंद्र के पिताजी जी का मृत्यु हो गया और फिर अभी व क्या करेंगे स्वामी जी अर्थात स्वामी विवेकानंद नरेण उनका बचपन का नाम तो नरेद ठाकुर के पास आया कहता है कि महाशय आपको कुछ कर देना होगा ठाकुर ने कहा कि जाओ मां के पास जाक मांगो मां अर्थात मां काली के मंदिर में मां काली के पास जाकर के मांगो जो भी तुमको चाहिए रोटी कपड़ा मकान तो स्वामी जी गए बेचारे नरेण गया और मा क्या मांग करके आया ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो रोटी कपड़ा मकान पड़ा रहा ज्ञान भक्ति वैराग्य मांगने लगे तो देखिए कि यह नरेण है यह मास्टर महाशय है कितने कितने उदाहरण है जो लोग कि अपने संसार की ज्वाला अपने संसार का कष्ट भूलकर के ठाकुर के सामने उनके आशीर्वाद मय वाणी सुनने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे वहां पर उपस्थित रहते थे तो उसमें मां भी वहां पर रहती थी तो कौन सी बड़ी बात हो गई मां की तो कोई सिद्धि नहीं है माने कोई तपस्या करके या तो फिर साधन करके यह भीतर का आनंद उपलब्ध नहीं किया है वह तो ठाकुर के आशीर्वाद से जो भी जाता वह रसिक मैतर वहां पर था उसको भी तो वही आनंद प्राप्त हुआ था तो मां का इसमें कौन सा बड़ा एक सिद्धि है ऐसा एक प्रश्न हो सकता है तो गंभीरानंद जी महाराज इसका क्या उत्तर देते हैं ही प्रकार जुक्ति संबली तो चिंता धारा आपात तो ज तोई चमक चमत्कार मने होक ना केनो इस तरह की यह एक लॉजिक एक तर्क लगा कर के युक्ति लगा कर के कही हुई बातें अपने मन में लगे कि कितनी चमत्कारिक है कितना एक उसने बहुत बड़ी एक बात कह दी है वास्तव जीवने कोई जोन रूप आकर्षण बोध करे वास्तव जीवन में देखिए कि कितने लोग है जो कि ठाकुर के प्रति इस तरह का आकर्षण महसूस करते थे वही कालीवाड़ा जी वहीं के कितने पुजारी यह सब लोग ठाकुर की निंदा करने से क्या वो कहीं उन्होंने यह किया है कभी भी अपने को रोका है वो ठाकुर भोग का प्रसाद वो बिल्ली को खिला देते हैं ना कि क्या करते हैं तो खजांची वहां पे वह मथुर बाबू को पत्र लिखता है फिर अभी देखिए रामलाल दादा स्वयं बाकी सब लोगों की तो बात छोड़ दीजिए रामलाल दादा अर्थात कि ठाकुर के बड़े भाई के पुत्र ठाकुर की सेवा करते थे वही रामलाल दादा के बारे में ठाकुर को मां को पत्र लिखना पड़ा कि रामलाल अभी काली का पुजारी हुआ है और वह सोचता है ए बरामी काली पुजारी होए छी ए बार आर की अभी तो मैं मां काली का पुजारी हूं अभी मुझे थोड़ी ना जाकर के अपने चाचा की सेवा करनी है वोह सब चीजों से भी मैं मुक्त हो गया इसलिए ठाकुर मां को पत्र लिखते हैं कि तुम कैसे भी करके यहां पर आओ पालखी करके हो ना कि गाड़ी करके हो जैसे भी हो जितना रुपया लगेगा मैं दूंगा ऐसा करके ठाकुर को मां को बुलाना पड़ा था रिक्वेस्ट करके वही हृदय ठाकुर का भांजा ठाकुर की इतनी सेवा की आखिर में किंतु मन इस तरह का विकृत हो गया कि ठाकुर को तो गाली गलोज करता ही था ठाकुर को तो कष्ट देता ही था आखिर में मां को भी उसने जो भी मन में आए वह सब बोलना उटपटांग बोलना शुरू कर दिया था तो ठाकुर के ही वही भांजे ठाकुर के ही वही भतीजे यह लोग भी ठाकुर की महिमा को नहीं समझ पाए थे काली वा में दिन रात उनके साथ में रहने वाले जो बाकी के ये ब्राह्मण पुजारी वगैरह थे वे लोग भी ठाकुर को नहीं समझ पाए थे तो ठाकुर को समझ कर के ठाकुर के श्री चरणों में अपने को अर्पण कर देना वह तो बहुत बड़े भाग्य की बात थी भले ही दूर देशांतर से लोग आते हो वे लोग आ जाएंगे किंतु ठाकुर के पास में जो रहते थे वहां पर उनके समझने वालों की संख्या बड़ी कम थी इसीलिए ठाकुर ने बाद में काशीपुर में कहा था कि देखे जो कि यह रामला रा सब होलो पर और तुमरा होलो अमार निजे अर्थात की भक्तों को कहते हैं किय रामलाल वगैरा जो कि मेरे संबंधी है वह हुए पराए और तुम लोग हुए मेरे अपने तो यहां पर ठाकुर के महता महत्व को समझ कर के अपने को उनको अर्पण कर देना वह कोई छोटी मोटी बात नहीं है रस देर कोई जोन भावे दिन रात दक्षिणेश्वर पड़या था कि पारिया लेन मने जितने भी भ इवन जो भक्त आते भी थे उसमें भी कितने लोग दिन रात ठाकुर के साथ में बीता पाए हैं वह भी तो एक बड़ी बात है ना वो भवनाथ था एक स्वामी जी के साथ में ठाकुर के पास आता था ठाकुर कहते थे प्रकृति और पुरुष स्वामी जी हुए पुरुष और भवनाथ को कहते थे प्रकृति तो इन दोनों का अच्छा एक जोड़ी था तो वही भवनाथ किंतु बाद में शादी करके वोह वर राजा की तरह सच करके ठाकुर के पास में आकर के पूछता है कि ठाकुर कैसे हो तो ऐसे इवन ऐसे लोग भी जो कि ठाकुर के पास आते थे उनमें उनमें से कितने लोगों ने यहीं पर रह लिया था ठाकुर को ही अपना जीवन सर्वस्व समर्पित कर दिया था संगे संगे मने रखते होई बे जे पति गत प्राणा श्री मायर भाग्य अनेक समय पति सुदर्शन पर्यंत घटित होना साथ-साथ में ही इस बात को याद रखना है मन में रखना है कि पति गत प्राणा पति के ऊपर में जिनका सर्वस्व प्राण न्योछावर है पति ही जिनके प्राण है ऐसी पति गत प्राणा मां के भाग्य में पति संदर्श कितने दिनों तक होता था कब होता था कब उनके भाग्य में होता था ठाकुर अभी जैसे देखिए कि यहीं पे आप जो लोग दक्षिणेश्वर गए होंगे ठाकुर का कमरा भी देखा होगा नबत भी देखा होगा कितना डिस्टेंस होगा 15-20 फुट इससे ज्यादा तो नहीं होगा किंतु देखिए कि मां और ठाकुर का मिलन मां ठाकुर का दर्शन कब करेगी कितने मतलब वह ऐसे कितने दिन जाते थे कि ठाकुर का दर्शन तक नहीं होता था एक बार कभी दिन में ठाकुर का दर्शन होता था कब कि जब मां खाना बना कर के ठाकुर को खिलाने के लिए जाती थी उसमें भी जदी वह गुलाप मा आ गई एक दिन तो ठाकुर ने एक बार गुलाप मां को कहा होगा तुम जाओ खाना लेके आओ मेरे लिए कोई भी कारण सा उसके बाद में जितनी भी बार खाना बनाएगी मां इमीडिएट गोलाप मा आके कहेगी थाली लेकर के उनके हाथ से मुझे दीजिए मां मैं जाती हूं फिर ऐसा करके ठाकुर के पास वो खाने का थाली लेकर के जाती थी ठाकुर के सामने घंटों घंटों तक बैठी रहती थी और यहां पर मां ठाकुर का दिन में एक बार जो दर्शन होता था वह तो बंद हो ही गया ऊपर से गोलाप मां संध्या के बाद में ठाकुर के पास में इतना समय बैठी रहती थी कि यहां पर उनका तो खाना तो मां को तो रखना पड़ेगा ना गोलाप मां तो आकर के खाएगी तो उनका खाना गर्म रख कर के मां को वहां पर बैठे रहना पड़ता था गुलाब मां की राह देखने के लिए एक बार इतनी देरी हो गई तो मां को बोलना पड़ा कि खाना जद ठंडा हो जाए तो हो जाए जद बिल्ली आ करके खाना खा ले तो खा ले किंतु अभी मैं यहां पे उनका खाना सजा करके उनकी राह नहीं देख पाऊंगी जिस दिन इमीडिएट जैसा ही मां ने कहा ठाकुर ने सुन लिया और ठाकुर ने गुलाब मां को सावधान कर दिया देखो तुम्हारी वजह से मां को कष्ट हो रहा है तुम इस तरह से तुम मत करो मां को कष्ट मत दो और गोलाप मां भी उनका बुद्धि थोड़ा सा यह था ना तो गोलाब मां ठाकुर को कहती है अरे नहीं नहीं मां तो मुझे बहुत प्रेम करती है मुझे बहुत स्नेह करती है अपनी बच्ची की तरह मुझे रखती है तो देखिए कि ऐसे भी भक्त थे इतने स्वार्थी थे कि समझते नहीं थे कि ठाकुर और मां का मिलन से उ ठाकुर का दर्शन करने का मौका मां को दिन में एक बार मिलता है वो मौका भी वे लोग छीन लेते हैं इतना बुद्धि भी इन लोगों में नहीं था तो ऐसे लोगों के साथ में मां को रहना पड़ता था तो इसीलिए यहां पर गंभीरानंद जी लिखते हैं कि पति गत प्राणा मां के भाग्य में पति संदर्श अनेक समय होता ही नहीं था तीनी बोलिया लेन अर्थात की मां ने एक बार कहा था कोखोनो कोखोनो दुई मासियो होई तो एक दिन ठाकुरे देखा पे तुम ना कभी-कभी दो दो महीने तक एक बार भी ठाकुर को मैं देख नहीं पाती थी मन के बोझा तुम मैं अपने मन को समझाती मोन तू एमन की भाग्य करे छी जो रोज रोज और दर्शन पावी मन तुमने ऐसा कौन सा भाग्य लेकर के जन्म लिया है मन तुमने तुम्हारा ऐसा तो कौन सा भाग्य है कि तुम उनके अर्थात श्री राम कृष्ण के दर्शन रोज-रोज पाओगे रोज-रोज उनके दर्शन मिलेगा तुमको दाढ़ ए दाढ़ ए दोर मर बेडर फाक दिए कीर्तने आखर सुन तुम पाए बात धरे के न वहां पे वो एक का ये जो ये होता है ना एक वो पट्टी का एक ये होता है कर्टेन जैसा वो कर्टेन वो कर्टेन के भीतर में एक छिद्र था अभी नबत में एक कर्टेन था वो वरांडा था वरांडा में कर्टेन था कर्टेन में एक छिद्र था उस छिद्र में से मां जब ठाकुर के घर में कीर्तन वगैरह होता था वह देखती थी और सुनती थी तो मां कहती है कि दाणे दाणे कीर्तन आखर सुन तुम खड़े-खड़े में कीर्तन की आखर सुनती और इसी तरह से पाए बात धरे गेलो पैर में ये आर्थराइटिस हो गया बात अर्थात की बात वात का रोग आर्थराइटिस का रोग तो खड़े-खड़े इस कर्टेन के छिद्र में से ठाकुर के घर में कीर्तन हो रहा है वह देखते देखते मां के पैरों में आर्थराइटिस का रोग लग गया सुधीर घो काल एकही स्थाने दाढ इया एक खुद्रो द्र मध्य श्री रामकृष्ण लीला संदर पने संदर्श ने आनंद उपभोग करी ते गेले दर्श के अंतर के कौन पवित्र सात्विक स्तर तुल रा कीते होए ताहा पाठक एक टू भाभिया देखी बेन के लंबे समय तक एक ही जगह पर खड़े रहकर एक छोटे से छिद्र में से श्री राम कृष्ण के लीला संदर्श करके करके आनंद का उपभोग कर करना यदि होगा तो हमको अपने अंतर को किस पवित्र शिखर पर हमको उसको स्थापित करना होगा वह क्या वाचक या तो फिर श्रावक क्या इसका थोड़ा सा इसका चिंतन करके देखेगा यह मास्टर महाशय है ना कि नरेण है ना कि रामचंद्र दत्त है ऐसे लोग तो फट करके आकर के ठाकुर के कमरे में बैठ जाते थे ठाकुर के सामने बैठते थे उनको स्पर्श करके उनकी चरण धुली ग्रहण करते थे उनके साथ में संकीर्तन करते थे उनकी कथामृत अमृतम वाणी का श्रवण करते थे उनको प्रश्न करते थे सब समय उनके साथ में रहते थे यदि शहर में कलकत्ता में जाना हो तो एक ही गाड़ी में बैठ कर के उनके साथ में जाएंगे यदि वो थिएटर में जाना है गिरीश घोष के वहां पर नाटक देखना है कोई धार्मिक पौराणिक नाटक तो यह लोग उनके साथ में जाएंगे उनका कितना भाग्य था तो किंतु मां को देखिए कि मां ना ही ठाकुर के साथ में रह पाती थी ना ही ठाकुर के सामने बैठ कर के सब समय उनकी अमृतम वाणी का श्रवण कर पाती थी ना ही ठाकुर के साथ में कहीं प घूमने को जा सकती थी यह कलकाता वगैरह तो छोड़ ही दीजिए वो पाणी हाटी महोत्सव में जाना है जब सब लोग जा रहे हैं इवन स्त्री भक्त भी जा रही है सब तब मां को मन में एक बार हुआ कि मैं भी जदी ठाकुर के पास जा सकती मां ने किसी के द्वारा ठाकुर को पूछा या कि क्या मैं आपके साथ में आऊं तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया था और जद इच्छा था कि आशु उसकी जद इच्छा हो तो व आए तो इमीडिएट मां समझ गई कि ठाकुर यदि चाहते कि मैं आऊं तो ऐसा कहते कि हां हां वो क्यों नहीं आएगी अवश्य आएगी ऐसा ठाकुर कहते हैं किंतु ऐसा नहीं करके कहा कि उसकी जद इच्छा है तो आए अर्थात कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं उनके साथ में जाऊं और ठ मां ने मना कर दिया कि ना मैं नहीं जाऊंगी और इस मां की इस एक निर्णय से ठाकुर आनंदित हो गए और ठाकुर ने कहा कि देखो वो कतो बुद्धिमता उसमें कितनी बुद्धि है वो यदि साथ में आती तो लोकेरा कीबल तो हंसो हंसी ऐसे लोग क्या कहते हंस और हंसी आए हैं एक साथ में घूमने के लिए ठाकुर थे परमहंस तो मां हुई हंसी तो इस तरह से लोग कटाक्ष करके कहते और ठाकुर हमेशा जागृत रहते थे कि यदि समाज में रहना है तो समाज हमारे सामने हमारे बारे में क्या कहता है हालांकि ठाकुर को समाज की कुछ फिक्र नहीं थी उपन उन्होंने जो ये यज्ञो पवित्र था यज्ञो पवित्र उठा कर के फेंक दिया था हृदय झगड़ था ठाकुर के साथ में कि कितने जन्मों के बाद में बड़े भाग्य होने से ब्राह्मण शरीर मिलता है आपने ब्राह्मण शरीर मिलकर के यज्ञोपवित फेंक दिया यह कौन सा आप बड़ा ये किस तरह का आप ये कर रहे हैं अन्याय कर रहे हैं तो ठाकुर वो सब नहीं सुनते थे किंतु समाज को कब स्वीकार करना समाज का कब परिहार परित्याग करना वो सब ठाकुर की प्रैक्टिकल सेंस बड़ी ही स्ट्रांग थी जब भी ईश्वर साक्षात का की बात आती है तो समाज को हमेशा के लिए छोड़ देना होता है समाज में 10 लोग क्या कहते हैं उसके बारे में कभी सोचना नहीं है किंतु जब यह व्यवहार की बात आती है पति-पत्नी साथ में कहां जाएंगे कैसे करेंगे 10 लोग देखते हैं मां के बारे में मां के चरित्र के बारे में उनकी कार्यावटम में ठाकुर की बड़ी तीक्षण दृष्टि थी और इसीलिए ठाकुर यह सब चीजों से बड़े कोई कहता तो बड़े पीड़ित भी हो जाते कि एक बार किसी ने वह मां के बारे में कुछ कह दिया था मंदिर में कि अभी मां को लेकर के ठाकुर आए हैं तो दक्षिणा स्वीकार करने में प्रणामी स्वीकार करने में सुविधा होगी ऐसा कुछ व वहां के एक पुजारी ने कह दिया था तो ठाकुर रोते-रोते मां काली के पास में गए थे नरेंद ठाकुर को यदि कुछ कह देता कि आपके दर्शन तो आपके मन का भ्रम है तो ठाकुर बड़े ही चिंतित हो जाते मां को मां काली को पूछने को जाते अरे नरेण यह सब कह रहा है तो अर्थात कि ठाकुर का भी एक प्रैक्टिकल सेंस भी जितना स्ट्रांग था अधर वर्ल्ड तो वो थे ही थे मैंने दूसरी दुनिया के तो वो थे ही थे किंतु ये प्रैक्टिकल सेंस भी उनका बड़ा ही स्ट्रांग था तो ठाकुर के बाकी जो भक्त थे ठाकुर के पास में रह पाते ठाकुर के साथ में उनका नाच गान कीर्तन भाव समाधि सब देख पाते किंतु मां इतना पास में रह कर के भी ठाकुर से कितनी दूर थी और इतनी दूरी बनाए रख कर के भी ठाकुर के आशीर्वाद सतत प्राप्त करते रहना ठाकुर के प्रति सतत अपना मन प्राण लगाए रखना और फिर मन में आनंद का उपभोग करना वह कितनी बड़ी बात है वह महाराज कहते हैं पाठक तुम थोड़ा सा सोच करके देखो कि कितना बड़ा आत्म बलिदान देने के बाद में यह परिस्थिति यह उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त हुई होगी श्री मायर देहो खानी खन दूरे पड़िया था कीले ओ मन सर्वदा ठाकुरे पार्श्व गुरिया बेई तो मां का देह मां का अंग श्री अंग ठाकुर के ठाकुर से दूर रहने के बाद में भी मन हमेशा ठाकुर के इर्दगिर्द ठाकुर के चारों ओर घूमता रहता ठाकुर के श्री चरण में ही पड़ा रहता तो खन ठाकुरे निकट कतो भक्तो आशीते उस समय ठाकुर के पास में कितने भक्त आते नाच गान कीर्तन भाव समाधि दिन रात चली तो नाच गान कीर्तन भाव समाधि वगैरा दिन रात चलता मां ई सबब देखीते सुनी तेन आर भाविन मां यह सब देखती सुनती और फिर सोचती आ जद ए भक्तो देर मतो एक जन होतम ता होले बेश ठाकुरर काछ थकते पेत मां क्या सोचती कि मैं जद इन भक्तों में से एक होती तो मैं इतना आनंद से ठाकुर के पास में रह सकती थी को तो कथा सुनत कितनी बातें सुनती देखिए गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि यदि कोई ऐसा सोच ले कि मां का तो जीवन कितना मतलब भाग्य में लिखा हुआ है भाग्य कितना है सद् भाग्य मां का कि हमेशा ठाकुर के पास में रहने को मिलता है यहां पर देखिए मां उल्टा ही सोच रही है मां कहती है कि मैं जद इन भक्तों में से एक होती तो मैं ठाकुर के पास में अपनी इच्छा के अनुसार आप पाती यह गोलाप मा है यह योगिन मां है यह गौर दसी है वो गोपालेर मां अघोर मणि देवी जो कि गोपाल का दर्शन किया करती थी वो ऐसे कितने ही मा मने वो स्त्री भक्त है लेडी डिवोटा है हमेशा ठाकुर के पास में आकर के उनकी अमृतम वाणी सुनते थे मैं भी यदि उनमें से एक होती तो मैं भी जब भी अपनी इच्छा होती कोलकात्ता से गाड़ी में बैठ कर के नौका में बैठ कर के दक्षिणेश्वर आती ठाकुर के साथ में रह ठाकुर की सेवा कर पाती तो मां बिल्कुल किंतु उल्टा सोच रही है एक दिके स्वतंत्र युगा वतार श्री राम कृष्ण गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं आगे एक और है स्वतंत्र युगा वतार श्री राम कृष्ण अन्य दिके स्वेच्छा पिंजरा बद्ध जगन माता दूसरी ओर है अपनी इच्छा से ही स्वेच्छा से पिंजरा बद्ध जगन माता एक और है स्वतंत्र युगा अवतार श्री राम कृष्ण दूसरी ओर है स्व इच्छा से पिंजरा बद्ध जगन माता एक दिख लीला विलास एक र है लीला विलास अपर दिके तृष्ण निरीक्षण दूसरी ओर है प्यासी आंखों से शत्रु क्ण निरीक्षण प्यासे अंतर से भगवान श्री राम कृष्ण देव का हमेशा दर्शन करना यहा एक अपूर्व चित्र यह एक पूर्व चित्र है यहां पर ठाकुर के कमरे में दक्षिणेश्वर कालीबाड़ी में यह 15-20 फुट का ही अंतर है ठाकुर के कमरे में है स्वतंत्र युगा वतार और दूसरी ओर है यही नबत में स्वेच्छा में अपनी इच्छा से पिंजरा बद्ध जगन माता ठाकुर के कमरे में है लीला विलास तो फिर मां के नौबत में है शत्रु ण निरीक्षण इहा एक अपूर्व चित्र ए सुख दुख मिश्रित निकट थाकि आओ अति दूरे अति बाही तो जीवन समस्त सुविधा असुविधा कथा तुलिया भूलिया श्री माय हृदय सुधु ए स्म स्मृति टुकु सर्वदा जागिया था की तो यह सुख दुख मिश्रित पास में रह कर के भी अति निकट रह करर के भी अति दूर से अति वाहित जीवन का समस्त सुविधा और असुविधा की बातें भूल कर के मां के हृदय में सिर्फ यही एक स्मृति हमेशा जागृत रहती क्या की आनंदे छलो किस आनंद में थी कतो रकम लोकी तार काछ आज तो कितने तरह के लोग मां के ठाकुर के पास में आते दक्षिणेश्वर जेनो आनंदे हार्ट भाषा बाजार बसे ज तो दक्षिणेश्वर में जैसे कि आनंद की बाजार हाट बाजार बैठ जाती देखिए इसमें मां का क्या कार्य है आनंद का जो बाजार है वह तो है नरें के लिए वह तो है यह लाटू महाराज के लिए वह तो है शशि महाराज शरत महाराज के लिए मास्टर महाशय के लिए ना कि यह फिर ये बूढ़ो गोपाल यानी कि अद्वैतानंद जी के लिए ना कि सुबोध अर्थात कि ये खोका महाराज के लिए मां का इसमें क्या कार्य है तो जो भी वहां पर आता सबका खाना मां को बनाना है तो यह मां का कार्य है खाना बनाना सब सबके लिए सबके लिए कुछ भी जो भी जिस समय आएगा उसको जिस तरह के पथ्य की आवश्यकता होगी उस तरह से उसके लिए आहार प्रस्तुत करना यह मां का कार्य है नहीं कि उन लोगों के साथ में ठाकुर के साथ में नृत्य कीर्तन आनंद उपभोग कथा वार्ता उपदेश इस सब में पार्टिसिपेट करना वो नहीं बैठ कर के वो गर्म चूहे के सामने और आजकल तो हमको पता है कि यह गैस का स्टो नहीं होकर के वो जो खुले आगुण में खुले अग्नि में जब आप खाना पकाते हैं तो धुआं कितना अपने भीतर में चला जाता है उससे कितने सारे कॉम्प्लिकेशंस होते हैं यह जो ओपन फायर प्लेस होता है खुले अग्नि प खाना बनाना इसका डेंजर आज हम सबको पता है गांव-गांव में गैस के छूले पहुंचाने का कार्य अभी हम लोग कर रहे हैं वह चाहे सरकार हो ना कि ये गैर सरकारी यह नॉन गवर्नमेंट ऑर्गेनाइजेशन हो तो वहीं पे खुले चूल्हे प खाना पकाना यह था मां का कार्य नहीं कि इन सब लोगों के साथ में आनंद करना कीर्तन करना मन आनंद से विभोर हो जाना किंतु फिर भी इन सब चीजों के भीतर में भी सुख दुख मिश्रित इस जीवन के भीतर में भी इतने निकट रहकर के भी अति दूर से अतिवाद किए हुए जीवन में भी समस्त सुविधा असुविधा की बातें भूल कर के मां के हृदय में यही एक स्मृति हमेशा से जीवित थी कि आनंदे छील कितने आनंद में थी कतो रकम लोकी तार काछ आज तो कितने तरह के लोग ठाकुर के पास में आते दक्षिणेश्वर में जैसे कि आनंद का हाट बाजार बैठ जाता यही बात मां को याद है बाकी अपने खुद के किए हुए कष्ट कहां विस्मृत हो गए उसके बारे में हम लोग अनुमान भी नहीं कर सकते श्री रामकृष्ण अवश्य मायर प्रति उदासीन छिले ना अभी देखिए कि हमने यह पूरी घटना यह पूरा चित्र देखा मां की दृष्टि से अभी थोड़ा सा ठाकुर की दृष्टि से देख लेते हैं कि ठाकुर कैसे थे क्या ठाकुर मां को संपूर्ण रूप से भूल कर के बस अपने ही भक्तों के साथ में अपने ही यह शिष्यों के साथ में वह भूल कर के मां को भूल कर के आनंद मग्न रहते थे ना कि ठाकुर का भी मां के प्रति कोई दायित्व था तो इस दायित्व के बारे में अभी हम देखेंगे ठाक मां के प्रति उदासीन नहीं थे बिल्कुल नहीं थे बरम तहर सुख स्वच्छंद जन्नो विशेष आग्रह भी तो लेन सिर्फ उदासीन नहीं थे इतना ही नहीं मां के सु सुख और स्वच्छंद के प्रति हमेशा विशेष रूप से वह अलर्ट रहते थे आग्रह अंवित रहते थे चारी दिके दरमा घेरा अति खुद्रो कोख खानी के तिनी खाचा आख्या दिया चलन चारों ओर से एक तरह के कर्टेन से घिरे हुए उनका जो मां का छोटा सा घर था उस घर को ठाकुर कहते थे पिंजरा ये जो पंखी को जिस पिंजरे में रखते हैं तो इस तरह से उसको कहते थे पिंजरा एक खा चाई ताहर भातु पुत्री लखि हों माझे माझे थाकी तेन और इसी पिंजरे में इसी नबत में उनकी जो भाई की जो लड़की है लक्ष्मी वह भी बीच-बीच में रहती थी ठाकुर रहस कररिया तहा दिग के शूक ओ सारी बोली तेन ठाकुर आनंद करके बीच-बीच में उनको तोता और मेना कहा करते थे मां काली प्रसाद ठाकुरर घोरे ना मिले तीनी रामलाल दादा के बोली तेन जब मां काली का प्रसाद ठाकुर के घर में लाया जाता तब वह रामलाल दादा को कहते ओरे खाचा सुखारिया छे फल मूल छोला टोला किछु दिए आई अरे पिंजरे में वो तोता और मेना है यह फल है मूल है यह छोला वगैरह जो है वह कुछ जाकर के उनको वहां पर देके आओ अपरिचित लोकेरा भाभी तो सतही पाखिया छ मने कोई अपरिचित होगा तो वह सोचेगा ठाकुर की बात सुनकर के सही सही में कोई पंखी को पिंजरे में पुर करके बंद करके ठाकुर ने रखा है किंतु देखिए कि ठाकुर कभी किसी को पिंजरे में बंद करके नहीं रख सकते थे वो जो हृदय की कहानी है ना हृदय ने एक बछड़ा कहीं से जुगाड़ किया गायका और फिर ठाकुर ने पूछा अरे ये इसका तुम क्या करोगे तो हृदय कहता है इसको मैं सिहोड़े सिहोड़े का अपना पत्रक निवास गांव का और वहां पे ये जब बछड़ा बड़ा होगा तब वोह लंगर टानेनबाउम उसको फिर इससे हल जुत आओगे इतना लंबा तुम प्लानिंग करते हो बाप रे है ना अर्थात कि इतना लंबा प्लानिंग करना भविष्य के बारे में ये सब ये जो स्कीमिंग जो माइंड है कि ईश्वर पर आप निर्भर नहीं होक के अपने खुद के बारे में सोचना शुरू करते हैं तो ठाकुर इस तरह से भी नहीं किसी को ये बछड़े को देख पाते इसको इतना बंधन में रखा हुआ तो यहां पे वह अपने हाथों से पंखियो को पिंजरे में कैसे पुर करके रख सकते हैं तो फिर भी जो लोग ठाकुर को नहीं पहचानते थे वे लोग सही सही ऐसा सोचना शुरू कर देते थे कि ठाकुर ने सही में पिंजरे में किसी पंखी को पाला है यहां तक कि मास्टर महाशय पर्यंत प्रथम ही भ्रम में पड़िया छले मास्टर महाशय स्वयं कथामृत के लेखक स्वयं इस भ्रम में शुरू शुरू में पड़े थे लखी दीदीर अनुपस्थित काले श्री मायर पायर बात और संगिनी हीनो जीवन ठाकुर के खूब बाबा इया तुली तो लक्ष्मी दीदी जब वहां पर नहीं रहती थी तो ठाकुर ठाकुर को पता था कि मां के पैरों में आर्थराइटिस प्रवेश करना शुरू हो गया है तो मां के पैर का यह बात और फिर यह संगिनी हीन जीवन लक्ष्मी दीदी नहीं रहेगी तो ऐसा तो नहीं है कि कोलकात्ता से महिला भक्त सब समय दक्षिणेश्वर में उपस्थित रहेंगे तो बिना किसी संगिनी के मां का जीवन अकेला जीवन यह सोच कर के ठाकुर बड़े ही चिंतित हो जाते तिनी तहा के परामर्श दते ठाकुर मां को देते कहते बुनो पाखी खाचा रात दिन थाक ले बते जाए पंखी को पिंजरे में दिन रात रखने से वह असु हो जाएगा माझे माझे पाड़ा बेड़ा जावे बीच बीच में पाड़ा अर्थात की गांव में तुम घूमने के लिए जाना सुधु एखानी निब तो ना होया द प्रहर आहारे पर मंदिरो उद्यान जन शन होले तिनी ताहा के काली बाड़ी र खिड़की दर्जा दिया बाहर गिया किछु काल निकटवर्ती पांडे गिन्नी देर बाड़ी ते बेड़ाया आशीते बोली तेन और फिर यहां पर वह निवृत्त नहीं होकर के क्या कहते दोपहर के खाने के बाद यह मंदिर उद्यान जन शून्य हो जाता है वहां पर कोई रहता नहीं है तो उस समय कालीवाड़ा का दरवाजा है वहां से बाहर निकल कर के पास में ही पांडे बोलकर के किसी का घर होगा उनकी जो गृहिणी है पांडे गिन्नी उसके घर जाकर के वो आने को बोलते थे उसके घर जाएंगे थोड़ा सा बात करेगी तो मन को सुकून होगा शेखाने आला पादी करिया आरती र पोरे पंचवटी निर्जन ईले श्री मां आबार नौबत फिरी तेन वहां पर वो पांडे की गृहिणी के साथ में मां जाकर के कुछ बातें करती और फिर आखिर में आरती के बाद में पंचवटी जब शांत हो जाता वहां पर किसी के आवन जावन का वह बंद हो जाता लोग चले जाते वहां से तब कहीं जाकर के मां अपने नबत में वापस आती ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु