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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

दैवाधीन : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 21 May 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः स्वामी जी जब सेकंड टाइम अमेरिका गए थे तो वहां पर गए थे लगेट हाउस और उनके जो डिवटी थे ये डिवोटा कहो ना कि फ्रेंड्स कहो ना कि एडमाइट्स की बहन जोसेफाइन मैक्लाउड जोसेफाइन मैक्लाउड का नाम तो अपने ऑर्डर में बड़ा ही फेमस है तो उन लोगों का वहां पर एक रूरल एरिया था यह जो रिजली बोलक के छोटा सा गांव जैसा ही था और वहां पर इनका जो फ्रांसिस लगेट है वो तो बड़े धनपति थे तो उनकी बहुत बड़ी एस्टेट थे तो उन्होंने वहां पर एक बड़ा सा एक मेनोर हाउस बनाया था और उसका नाम दिया था उन्होंने लेगे रिजली मैनर वो मेनर तो रिजली मैनर तो स्वामी जी सेकंड टाइम जब अमेरिका आए तो उनको लेकर गए तो स्वामी जी के साथ में निवेदिता भी थी और हरि महाराज भी थे तो अभी वहां पर जो प्रॉपर्टी है वह तो बहुत बड़ी है और वहां पर विभिन्न विभिन्न वो बिल्डिंग्स बने हुए हैं एक तो मेन बिल्डिंग है जहां पर ये फ्रांसिस लगेट और उनकी वाइफ वगैरह रहते थे और फिर अलग-अलग बिल्डिंग थे कोई गेस्ट हाउस था कोई कैसीनो था कैसीनो अर्थात की वो मतलब वो जुआ खेलने वाला कैसीनो नहीं वहां पर वो विभिन्न तरह की आप गेम्स वगैरह खेल सकते हैं तो वो कैसीनो था वो एक स्टेबल था तबेला जहां पर घोड़ों को रखते हैं वगैरह वगैरह तो स्वामी जी को रहने के लिए एक मकान वो स्वामी जी के लिए रखा पूरा एक बिल्डिंग ही स्वामी जी को दे दिया उस बिल्डिंग में रह रहे हैं स्वामी विवेकानंद और के गुरु भाई स्वामी तुर्या अभी जिस दिन स्वामी जी को रहने के लिए दिया उस दिन शाम को वो बेटी लगेट बेटी लगेट तो फ्रांसिस लगेट की वाइफ और पूरी स्टेट की वो मालकिन तो वो वहां पर गई स्वामी जी के कमरे में देखने के लिए कि इन लोगों की सोनी की व्यवस्था सब कुछ ठीक-ठाक है तो उनको कोई तकलीफ नहीं है तो रहने की चीज में तो वो बेटी लगेट जाकर के पहले तो स्वामी जी के कमरे में गई पूछा कि सब व्यवस्था ठीक है कि नहीं वगैरह वगैरह वो बात करके फिर वो आई रयान जी के कमरे में देखा कि अभी अमेरिकन जो प्रथा है उसके अनुसार बहुत बड़ा जो एक बेड होता है खाट जैसा उसके ऊपर में बिस्तर डाल के यह लोग सोते हैं तो अभी रयान जी के रूम में जाकर के देखा कि वहां पर जो एक बहुत ही सुंदर खाट दिया गया था उनको पलंग उसके ऊपर में से उन्होंने अपना बिस्तर जो है वह जमीन पर लगा दिया है और जमीन पर सो रहे हैं तो बेटी लगेट ने पूछा अरे स्वामी जी इज देयर एनीथिंग रंग विथ योर बेड मने आप आपका यह जो खाट है जो आपको सोने को दिया है क्या उसके साथ में कुछ गड़बड़ है क्या दूसरा खाट ले आए आप जमीन पर क्यों सो रहे हैं बिस्तर लगा कर के तो रयान जी ने पता है क्या उत्तर दिया कि स्वामी जी जिस लेवल पर सो रहे हैं उस लेवल प मैं सोना नहीं चाहता इसलिए मैं जमीन पर सो रहा हूं क्योंकि दूसरे कमरे में स्वामी जी भी खाट पे सोते थे और इस कमरे में भी तुर आनंद जी खाट पे सोते थे तो एक ही लेवल पर सोना हो गया तो स्वामी जी से नीचे सोना चाहते हैं क्यों क्योंकि वो हालांकि है सभी लोग गुरु भाई किंतु स्वामी जी का जो स्टेटस है वो उनको गुरु भाई को पता था इसलिए उस लेवल पर नहीं सो करके मैं थोड़ा सा नीचे सोना चाहता हूं तो ये बेटी लगेट ने यह रेमसंस नोट किया है और उसने कहा है कि देखिए कि स्वामी जी के गुरु भाई का स्वामी जी के प्रति जो श्रद्धा भक्ति था कैसा गजब था किस तरह से वे लोग हालांकि सभी को पता है कि तुर्या जी उनके गुरु भाई है किंतु गुरु वत गुरु वत गुरु पुत्रे शु जब स्वामी जी अमेरिका आए राजा महाराज से प्रथम मुलाकात हुई तब स्वामी जी ने सर्वप्रथम राजा महाराज को प्रणाम किया क्या कह के कि गुरु वत गुरु पुत्रे शु गुरु का पुत्र राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र थे तो राजा महाराज का जो स्टेटस था स्वामी जी ने ही कहा था जिस दिन ठाकुर ने कहा कि राखल एकटा राज्य चलाते पारे अर्थात कि राखल एक राज्य चला सकता है तभी स्वामी जी ने सभी गुरु भाई भाइयों को कहा था आज से हम राखल को राजा करके पुकारेंगे और जब जब स्वामी जी ने ऐसा कह के प्रणाम किया राजा महाराज को गुरु वत गुरु पुत्रे शु राजा महाराज ने सामने स्वामी जी को प्रणाम किया क्या कह के जेष्ठ भ्राता समम पिता ये लोग तो कम नहीं है आपस में अर्थात कि जेष्ठ भ्राता यानी कि बड़ा भाई है वह समम पिता पिता के समान ही है तो देखिए कि इन लोगों का आपस में कैसा स्नेह का बंधन था तो और इसी रिलेटेड एक दूसरी एक घटना है जीसस को जब क्रूसिफिकेशन उनको क्रूसिफिकेशन जीसस के जितने भी डिसाइल थे ऑलमोस्ट सभी की हत्या कर दी गई थी तो जब सेंट पीटर उनको क्रूसिफिकेशन नीचे ऐसा रिवर्स पोजीशन में मैं क्रूसिफिकेशन एक निशानी है कि लोग उनको कितना रिस्पेक्ट करते हैं यह दो तरह की रिस्पेक्ट होती है एक तो पावर और पोजीशन की रिस्पेक्ट है जैसे ये हिटलर था जैसे ये स्टालिन था ये जो सब बड़े-बड़े डिक्टेटर होते हैं उनको हम रिस्पेक्ट करते हैं क्यों क्योंकि इन लोगों को हम रिस्पेक्ट नहीं करेंगे तो वह हमारा और हमारे परिवार जनों का अहित करेंगे और यह जो जमीन से निकले हुए यह जो महापुरुष है उनको हम इसलिए रिस्पेक्ट करते हैं क्योंकि हमारा हृदय चाहता है उनको रिस्पेक्ट करना हमारा हृदय चाहता है उनके चरणों में शरणागत होना तो मां का जीवन गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित अभी जिस चैप्टर का हम पाठ करेंगे देवाधि देव के आधीन श्री मां का यह पर्व जीवन का उसमें भी हम देखेंगे कि मां के जीवन में कितना कष्ट था कितना परिश्रम था कितना उसमें अ क्या कहेंगे गरीबी थी फिर भी इसके बावजूद इन लोगों के प्रति देखिए कि इन लोगों ने इस परिस्थिति में भी एक डिग्निफाइड लाइफ लीड किया है हमारे साथ में थोड़ा सा भी यदि क्राइसिस आ जाए तो हम लोग क्या करेंगे पता है उसमें से कुछ ना कुछ अन एथिकल शॉर्टकट निकालने का प्रयास करेंगे इससे क्या होगा कि हमको कष्ट कम करना पड़े अ अभी जैसे मेरी नजरों से मैंने यह देखा है कि एक एक व्यक्ति का कहीं पे कोई बड़े ऑफिसर के पास में कुछ काम था तो अभी वह ऑफिसर शायद उनको इतना हेल्पफुल नहीं होगा ऐसा इस व्यक्ति को लगा तो उन्होंने क्या किया मैं भी मुझे भी साथ में ले गए थे चलो तुम भी साथ में चलो बहुत दिनों के पहले की बात है व उस ऑफिसर जो था जो इनका काम करवाने वाला था उसका एक चमचा था जो कि ये सब मिडल मैन की तरह सब कुछ डीएल करता था तो इस चमचे के पास में मिडल मैन के पास में गए और जाकर के कहा देखिए अभी इ में इतने कष्ट में हूं ये वगैरह अभी आपको क्या चाहिए बता दीजिए यह काम करवा दीजिए तो ये काम सही में हो भी गया तो अभी क्या है कि संसार में रहते हैं तो यह सब कुछ तो आपको करना ही पड़ता है किंतु मैंने हमेशा से यह बात देखी है कि धर्म और आध्यात्मिकता यानी कि सिर्फ मुंह से बातें करना नहीं मुंह से भक्ति दिखाना नहीं ये अपने जीवन में एथिक्स एंड मोरालिटी का पालन करना है जो कि सही क्या है और गलत क्या है यह विवेक हमारे मन में जागृत जब होता है तभी हम सही सही एक आध्यात्मिकता के रास्ते पर चल सकते हैं कल जो प्रश्न किया था ना बहुत सुंदर प्रश्न था कि मैं ऐसा क्यों होता है कि मां का जो प्रेम है मां का जो मातृ हृदय है वो इतनी विपरीत परिस्थिति में भी मां का मातृ हृदय सब समय वह प्रकाशित होकर के दिखता है कोई चाहे मां को इतना कष्ट भी दे मां को गाला गाली भी दे वो जो पागली मामी वो काशी में गए थे तो पूरी रात मां को गाली दी कि मां मर जाए मां मर जाए ठाकुर जी मरूक ठाकुर जी मरूक ऐसा करके वो पूरी रात भर गाली दी मां को आखिर में जब मां ने सुबह को क्या कहा पता है पागली जाने ना आमी मृत्युंजय उसको पता नहीं है मैं मृत्युंजय स्वयं हू जिस मृत्युंजय शिव के दरबार में मां बैठी है उनको प्रणाम करने के लिए गई वो खुद तो मृत्युंजय है तो देखिए कि इतनी विपरीत परिथि स्थिति में भी मां का जो प्रेम है मातृ प्रेम सब समय वैसे का वैसा रहता है उसमें भरती ओट नहीं आती तो प्रश्न होगा कि हमारे जीवन में ऐसा कैसे हो वो तभी हो सकता है कि जबकि हम सत्य के रास्ते पर चले यह ठाकुर ने कहा ना कि बहुत बड़ा स्टेटमेंट काम कांचन त्याग करना वो तो खैर इस जगत का सबसे बड़ा मतलब एक यह है ही है तपस्या किंतु साथ में ही ठाकुर ने कहा था सत्य और ब्रह्मचर्य यह सत्य और ब्रह्मचर्य कलयुग की सही सही तपस्या है जब तक आप एथिक्स एंड मोरालिटी को पकड़ के रहेंगे सत्य का पालन आप जब तक करेंगे तब तक आप देखेंगे कि आप सही रास्ते पर हैं और जब यह सत्य का पालन करते-करते एथिक्स एंड मोरालिटी यह त्याग का पालन करते-करते जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे वैसे-वैसे ही संसार के ऊपर में अपना जो आकर्षण है संसार के ऊपर में अपना यह जो एक मन भीतर से अट्रैक्ट होता है वो आकर्षण वो अट्रैक्शन धीरे-धीरे करके स्लो हो जाएगा धीरे-धीरे करके कम हो जाएगा और फिर जैसे ही आकर्षण कम होगा तो आकर्षण की जगह पर प्रेम प्रकट होगा जैसे मान लीजिए कि एक गिलास है गिलास पूरा पानी से भरा हुआ है तो जब तक पूरा ग्लास पानी से भरा हुआ है उसमें सिर्फ पानी ही रहेगा और कुछ नहीं रहेगा किंतु जैसे-जैसे गस में से पानी कम होता जाएगा उतना ही गिलास कम पानी कम होगा और बाकी की जगह में हवा भरती जाएगी हवा तो सब जगह प है तो गिलास आधा पानी से भरा हुआ है तो हम कह सकते हैं बा बाकी आधा उसके भीतर में हवा भरी है तो अभी जैसे-जैसे पानी कम होगा पानी 75 पर हुआ तो 25 पर हवा हुई पानी 50 पर हुआ तो 50 पर हवा हुई और पानी 25 पर हुआ तो 75 पर हवा और पानी 0 पर हो गया तो 100% हवा से ग्लास परर गया तो वैसे ही यहां पे है जैसे-जैसे संसार का आकर्षण 75 पर होगा तो 25 पर ईश्वरीय दिव्य प्रेम हमारे हृदय में आएगा संसार का आकर्षण % होगा तो बाकी का 50 पर दिव्य प्रेम संसार का आकर्षण 75 25 तो 75 पर प्रेम और संसार के प्रति आकर्षण शून्य हो गया तो 100% हृदय दिव्य प्र प्र से भर जाएगा तो एक्चुअली प्रेम को लाने के लिए त्याग की आवश्यकता है संसारी आकर्षण से दूर होने की आवश्यकता है तो इन लोगों के जीवन में जो हम कष्ट परिश्रम गरीबी यह सब देखते हैं उससे दो-तीन चीजें पता चलती है सर्वप्रथम तो उन्होंने सामने से यह चूज किया है ऑप्शन चूज किया है मल्टीपल चॉइस ऑप्शन ईश्वर के पास में भी होते हैं कि जब पृथ्वी पर जाना है तो गर्भ श्रीमंत के घर पर जन्म धारण करना है ना कि फिर कोई राजकुमार के रूप में जन्म धारण करना है ना कि किसी गरीब की किसान की कुटिया में जाना है कौन सा ऑप्शन सिलेक्ट करना है तो ये लोग हमेशा देखिए कि या तो फिर गरीब किसान की कुटिया न कि ऐसे कुछ और जिन लोगों ने राज परिवार में जन्म ग्रहण किया भी सही भगवान कृष्ण उन्होंने वृंदावन में आकर के लीला की भगवान राम उन्होंने वनवास सिलेक्ट किया भगवान बुद्ध उन्होंने अपने से राज्य त्याग करके वह वन में चले गए तपस्या के लिए तो हमेशा एक कॉमन पर्सन के लेवल पर तो यह लोग अवती हुए ही है उन्होंने संसार की माया हालांकि इनके भीतर में होती नहीं किंतु एक एक बाह्य दृष्टि से भी देखना पड़ेगा कि संसार की माया से यह लोग अलि पत है वह दिखाएंगे तभी तो हम लोगों की शिक्षा होगी अभी यह देवा धीना चैप्टर हम आगे पढ़ते हैं चैप्टर का पहला पैराग्राफ हमने ऑलरेडी पढ़ दिया है इसमें शोड़ी पूजा के बाद में मां जयराम बाटी गमन करती है कमार पुकुर के रास्ते से और उस समय दो दुखद घटनाएं मां के जीवन में होती है सर्वप्रथम तो ठाकुर के बड़े भाई रामेश्वर का मृत्यु होता है देहांत होता है और उसके बाद में मां के पिताजी रामचंद्र का भी देहांत होता है तो यह दुखद दो घटनाएं मां के शरीर में उपस्थित हुई थी इसके बाद में कुछ समय के बाद में मां फिर दक्षिणेश्वर तो आ गई किंतु मां जो दक्षिणेश्वर वापस आई इसके पीछे की और एक बैकग्राउंड कहानी है हम कह सकते हैं कि यह मृत्यु का शोक शायद मां से नहीं देखा गया इसलिए मां दक्षिणेश्वर वापस आ गई किंतु इसके अलावा भी कुछ-कुछ बातें हैं जो कि गंभीरानंद जी महाराज हमको कहते हैं महाराज क्या कहते हैं ए गमने शहित होतो बा पितृ कुलर निदर दारिद्र्य रो एकटा शपर को छीलो मां जो जयराम बाटी गई थी फिर वहां से दक्षिणेश्वर वापस आ गई इस घटना के पीछे इस वापस आने के पीछे हो सकता है कि उनके पितृ गृह में जो एक भयावह दारिद्र्य था वह भी शायद रिस्पांसिबल था वह भी इतना ही जवाबदार था पति र देहो त्यागे पर श्रीमती श्यामा सुंदरी देवी आपना के नैराश्य परिवेट तो देखी ते लेन रामचंद्र के देहांत के बाद में महासमाधि के बाद में मां श्यामा सुंदरी देवी अपने को नैराश्य निराशा से चारों ओर घिरी हुई उन्होंने अपने को पाया गृहे थोना पुत्र पुत्र गण श कोले अप्राप्य योस को रामचंद्र देहो त्यागे जाजन क्रिया लब्द आए पोथ वृद्धो चाश आबाद देखी बार उपयुक्त लोकर अभाब उ हाओ वि श्रंखला ग स्टोर अर्थात कि घर में पैसा नहीं है सर्वप्रथम उसके बाद में लड़के सब छोटे हैं कि वह रोजगार नहीं कर सकते इसके बाद में रामचंद्र खुद जो याज क्रिया करते थे यान अर्थात कि किसी के घर जाकर के कोई विधि है या कोई फिर उत्सव है उसमें पूजा करनी है या तो उपनयन संस्कार करना है वह सब संस्कार विधि पूजा वगैरह जो करवाते थे वो उनकी एक आय थी एक रोजगार था उनका इनकम का जो सोर्स था वह बंद हो गया उसके बाद में उनकी छोटी सी जमीन थी खेती थी व खेती पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है इसलिए खेती में भी अब सब गड़बड़ होने लगी वि श्रंखला ग्रस्त उसमें भी गड़बड़ होने लगी देबर ईश्वरचंद्र कोलकाता पौरोहित्य द्वारा किंचित अर्थ संचय करीले शयो यो संकुलन प राम बाटी ते प्रेरण जनन किछुई उधत थाके ना उनके देवर ईश्वर चंद्र अर्थात की रामचंद्र के भाई कलकत्ता में रहकर के पौरोहित्य गिरी तो करते थे किंतु उस उनको इतना नहीं मिलता था कि पहले अपना पर अपना खुद का पालन लालन पालन करें और फिर जयराम बाटी में पैसा भेजे इतना ज्यादा उनको कुछ पैसा नहीं मिलता था यानी कि देखिए यह जो एक सनातन काहिनी है अपने अपनी कहानियों में ऐसा कहते हैं ना कि जब ब्राह्मण की बात आती है अपनी पुराण की कहानी है कि कोई भी कहानी है तो ब्राह्मण की बात आएगी तो सबसे पहले क्या कहेंगे एक गरीब ब्राह्मण था कोई भी कहानी है अपनी यह जो इस तरह की बध कथा क्मक अपने हिंदू धर्म की या पुराण की तो इसी एक सेट ब्राह्मण के बारे में जद बात है तो यही एक सेंटेंस से स्टार्ट होगी कि एक गरीब ब्राह्मण था तो ये ब्राह्मण के साथ में यह गरीबा ये हमेशा से जुड़ी हुई है यह जो ब्राह्मण है वह संस्कृति का धरोहर है वह जद धन के पीछे दौड़ेगा तो यह हमारी हिंदू संस्कृति कहीं की कहीं विलुप्त हो जाती देखिए कि यह जो चार ग्रेट रिवल वैली सिविलाइजेशन थी चार बहुत बड़ी सिविलाइजेशन आज से 10000 साल पहले कहो ना कि 15000 साल पहले कहो वो जो डेवलप हुई थी इसमें यह सिंधु रिवर वैली सिविलाइजेशन जो कि अपनी ओरिजिनल भारतीय सिविलाइजेशन थी यहां पे ंग हो वैली सिविलाइजेशन जो कि चाइना की ओरिजिनल थी यह मेसोपोटामिया या तो फिर यूफ्रेट्स सिविलाइजेशन जो कि मिडिल ईस्ट की थी और यह नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन इजिप्त की तो यह जो अपने आर्कियोलॉजिस्ट है यह जो लिंग्विस्ट है हिस्ट्री का जो स्टडी करते हैं ह्यूमन सोसाइटी का जो स्टडी करते हैं उन्होंने पाया है कि वैसे तो इतिहास मनुष्य जीवन का बहुत पुराना है आज से 3 लाख साल पहले न कि कुछ वह होमो इरेक्टस वह बंदर में से व होमो इरेक्टस हुआ और आज से 40 5 हज साल पहले आज का मॉडर्न ह्यूमन होमो सेपियंस प्रकट हुआ तो मॉडर्न ह्यूमन का आगमन तो वैसे 40 5 हजार साल पहले हो चुका है किंतु जिसको हम आधुनिक सभ्यता कहते हैं वह तकरीबन 10 12 हज साल पुरानी है और यह जो चार सबसे परा पौराणिक सभ्यताएं हैं तो अभी देखिए कि यह बाकी की जो तीन सिविलाइजेशन है ंग हो रिवर वैली सिविलाइजेशन यह मेसोपोटामिया और यह इजिप्शियन सिविलाइजेशन अपने ओरिजिनल स्वरूप में नहीं है उनके भीतर में कितना प्रचंड ये रेवोल्यूशन आया है जैसे कि यह मेसोपोटामिया अर्थात कि आज का मॉडर्न इराक और यह आज का मॉडर्न इजिप्ट यहां पर इस्लाम के आगमन के बाद में वह पौराणिक सभ्यता बिल्कुल नष्ट हो चुकी है यह जो ंग हो रिवर वैली सिविलाइजेशन चाइनीज सिविलाइजेशन उसमें पहले तो बुद्धिज्म आया वो म ने उसका पूरा परिवर्तन कर दिया उसके भीतर में और बाद में यह कम्युनिज्म आया कम्युनिज्म ने भी उसको संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया एक सिर्फ ये सिंधु रिवर वैली सिविलाइजेशन अर्थात कि भारतीय सिविलाइजेशन ऐसी है जो कि सालों के बाद साल जनरेशन आफ्टर जनरेशन मिलेनिया आफ्टर मिलेनिया वन नेशन आफ्टर अनदर नेशन कितने ही परिवर्तन आते गए कितने ही राजा महाराजाओं ने इस भूमि पर राज्य किया कितने ही आक्रमण हो गए कितने ही लोगों ने हमारा दमन और शोषण किया इसके बाद में भी हमारा यह जो एक डीएनए जो है हमारा जींस आध्यात्मिकता का हिंदू संस्कृति का वैदिक सभ्यता का वो वैसे का वैसा ही रहा है और इसके पीछे कौन रिस्पांसिबल है किसने हमारी सभ्यता को उस पौराणिक युग से आज के आधुनिक युग तक बचा के रखा है वो है यह गरीब ब्राह्मण जिन्होंने ना ही कभी धन संपत्ति के पीछे में दौड़े जिन्होंने ना ही कभी राज्य सत्ता की कामना की जिन्होंने ना ही कभी दूसरों के दमन और शोषण के बारे में सोचा हमेशा से सोचा तो यजन याज और अध्यापन जैसे कि शरत महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं कि यज्ञ याग करवाना विधि विधान करवाना और अध्ययन अध्यापन करवाना शिक्षा प्राप्त करना शिक्षा ट्रांसमिट करना यही संस्कृति को लेकर के ब्राह्मण जो प्रजा है वह रही है और इसीलिए भारतीय धर्म की धरोहर अभी तक टिकी हुई है अभी आप हजारों उदाहरण दे देंगे कि ये ब्राह्मण करप्ट हो गया इसने यह किया उसने यो वो किया वो काला पहाड़ बोल कर के एक था जिसने कितने हिंदुओं की हत्या कर दी वगैरह वगैरह वो जगाई थे जगाई मगाई था ब्राह्मण थे वो कन्वर्ट हो गए इस्लाम में फिर वो हिंदुओं प अत्याचार करने लगे कितने ही उदाहरण मिलेंगे वैसे इतिहास में किंतु इन जनरल देखा जाए तो ब्राह्मण लोगों ने इस सभ्यता को बचा करके रखा है और यह ब्राह्मण लोगों की जो सनातन काहिनी है वो इन दोनों परिवार में जयराम बाटी में मां के पित पिताजी के घर में परिवार में या रामचंद्र के परिवार में और कामर पुकुर में य खुद ही राम के परिवार में वही सनातन ब्राह्मण काहिनी सनातन ब्राह्मण वार्ता कहानी वह हमको फिर से जीवंत होकर के होती हुई दिखती है तो यहां पर जब गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि रामचंद्र के मृत्यु के बाद में श्यामा सुंदरी देवी की कैसी अवस्था हुई वैसे तो रामचंद्र यजन याज वगैरह करते थे किंतु उनके देहांत के बाद में तो उस उस रास्ते से आती हुई आय बंद हो गई उनका छोटा सा एक जमीन का टुकड़ा था उसमें खेती बंद हो गई लड़के सब छोटे-छोटे हैं तो वह कोई रोजगार वगैरह नहीं कर सकते ब्राह्मण का जो कार्य वगैरह है वह नहीं कर पाएंगे और फिर रामचंद्र के भाई वैसे कलकाता में पौरोहित्य कार्य करते तो थे किंतु उतना नहीं कमाते थे कि जिससे कि वह जयराम बाटी में गांव में अपने भाई की विधवा को पैसा बेच सके तो एक महा भयानक गरीबी इनके सामने श्यामा सुंदरी देवी के सामने आकर के खड़ी हुई और इसका उन्होंने क्या उपाय किया ऐसी गरीबी में श्यामा सुंदरी देवी ने परिवार कैसे चलाया रूप संकटे पड़िया श्यामा सुंदरी का यो क्ले से परिवार पालने प्रवृत्त ईले इस तरह के महा निदन दारिद्र्य में फस करके श्यामा सुंदरी देवी शारीरिक परिश्रम करके अपने परिवार का निर्वाह करने के लिए प्रस्तुत हुई ग्राम पांडु परिवार तखन संगति शली छिले गांव में बांडोज परिवार या तो कहेंगे बैनर्जी परिवार उस समय थोड़ा बहुत धन संपत्ति धारण किए हुए था रामचंद्र गृहिणी बांड बाटी ईते धान आनिया ढें कीते कुटी ते रामचंद्र गृहिणी अर्थात की श्यामा सुंदरी मां शारदा की मां श्यामा सुंदरी इस बांडोज फैमिली में से परिवार में से धान ले आ करके उसको कटती थी अर्थात कि वह जो धान में से वह जो चावल जो सेपरेट करते हैं वो ऐसा करती थी जे परिमाण भा धान तेन तहर चतुर्थांश तीनी पारिश्रमिक स्वरूपे पाइथन जितना धान में से चावल करती थी उसका एक चतुर्थांश वह पारिश्रमिक के रूप में वो उसके सैलरी कहो ना कि उसका रोजगार आय कहो उसके रूप में उनको मिलता था श्यामा सुंदरी के संसार जन्नो की रूप परिश्रम करी ते होई तो ताहर उदाहरण स्वरूप तिनी पुत्र वधि इंदुमती देवी के एक समय बोलिया लेन तो किस तरह से कायिक परिश्रम करके किस तरह से शारीरिक परिश्रम करके श्यामा सुंदरी देवी को परिवार चलाना पड़ता था वह उन्होंने अपनी पुत्र वधु इंदुमती देवी को एक बार बताया था क्या बताया था आमरा घोरे भात बोसिएट निए ऐसे छी अर्थात कि घर में भात बनाने को लिए बिठा दिया चूल्हे के ऊपर में इसके बाद में सियोर जाकर के शि होड़ अर्थात की यह हृदय का गांव श्यामा सुंदरी देवी का पिा है अपने पिताजी का घर तो वह वहां पर जाकर के तरकारी यानी कि सब्जी वगैरह लेकर के आई है आर बोलिया लेन और कहां था सोलो पाका उन जोल से अर्थात की एक लाइन में 16 ये चूले जल रहे हैं 161 चूले जल रहे हैं ताते राना कोरेची उसके भीतर में खाना पकाया है एक ी भात और एक धु चुनी लेर जन्नो एक हांडी भात के लिए और एक टोकरी चाल के लिए इसका क्या अर्थ है कि जब वह धान में से चावल करेगी या चावल में से भात करेगी तो उसके पारिश्रमिक रूप में कुछ खाना इनको मिलेगा तो अभी जितना खाना बनाएंगी तो उसका कुछ भात मिलेगा तो 16 चूल्हे एक साथ में जलाए है 16 चूलो के ऊपर में भात बन रहा है और इससे क्या उनको मिलेगा सिर्फ एक हांडी भात और एक टोकरी चावल ऐसा कुछ इनको मिलेगा आप सोच के देखिए कि 161 चूहों के ऊपर में वह खाना पका रही है भात पका रही है माने यह कितना परिश्रम का कार्य है वह मां की बात हमने देखी ना कि जब वह मां छोटी थी तब यह वहां पे अकाल पड़ा अभी अकाल पड़ा तो रामचंद्र ने कहा कि चलो अपने पास में इतना धान सुरक्षित है कि जो कोई भी भूखा व्यक्ति आएगा उसको हम खिचड़ी बना कर के खिलाएंगे बस मेरी शारदा को अच्छे से चावल का भात खाने को मिलेगा बाकी हम सभी लोग यह खिचड़ी खाएंगे तो वो एक दिन था कि जो भी भूखा वहां पर मां के घर में आता था रामचंद्र उनको यह खिचड़ी खिलाते थे और यह आज का एक दिन है कि वहां पर अपने को खुद को खाने के लिए नहीं मिल रहा और एक साथ में 16 चूलो के ऊपर में धान वो चावल पकाना पड़ रहा है यह कैसा एक विधि का चक्र है कैसा एक विधि का विधान है कि वही कितने ही चूहों पे खिचड़ी बनती थी लोगों को खिलाने के लिए आज कितने ही 161 चलों के ऊपर में भात पकता है उसमें से मिलेगी सिर्फ एक ी चावल अपने को इसके लिए इतना कुछ करना पड़ता है किंतु देखिए कि ये जो विधि का जो चक्र है कि कभी उसको हमारी अवस्था अच्छी होती है तो कभी हमारी अवस्था बुरी होती है मैंने अपने खुद के फैमिली में यह अनुभव किया है अच्छा समय भी हमारे परिवार में गया है बुरा समय भी हमारे परिवार में गया है सब कुछ मैंने खुद ने ये सब चीजों का फर्स्ट हैंड मेरा एक्सपीरियंस है तो देखिए कि मनुष्य जब यह परख जद चरित्र की सही सही होती है ना तो वो उस समय होती है यदि हमारा अच्छा सम सब समय चलता रहे तो मनुष्य चरित्र के बारे में हम ठीक-ठीक आकलन नहीं कर पाएंगे अच्छा आप बड़े दानवीर है अच्छा आप अपने बाकी सब लेस फॉर्चूनेटली हो गई है तब आपका हृदय कितना विशाल रहता है यह यदि पता लगाना है यह चरित्र की सही सही परख करनी है तो ऐसी परिस्थिति में होती है नॉट नेसेसरी कि सभी को इस परिस्थिति में से पसार होना पड़े किंतु ये एक परक है चरित्र की एकय कि अभी जैसे सुदामा का कृष्ण प्रेम वो पता है हमको बड़ी फेमस स्टोरी है कि उनकी पत्नी ने बार-बार सुदामा को कहा कि जाइए आपके भगवान कृष्ण तो आपके बाल्य बंधु थे आपके बैचमेट आपके क्लास स्कूल मेट थे तो जाइए जाकर के पाठशाला में उनके साथ में पड़े हैं इतना ह हसी उनके साथ में इतनी मित्रता की है हंसी मजा किया है खेला खेलना वगैरह किया है तो जाइए उनके पास से कुछ मदद मांग के आइए तो अभी बेचारे सुदामा क्या कहेंगे पत्नी बार-बार ऐसी कर रही है तो बोला ठीक है चलो जाता हूं किंतु जा जाऊंगा तो कुछ तो गिफ्ट उनके लिए लेकर के जाना पड़ेगा कुछ तो ऑफि लेकर जाना पड़ेगा उनके लिए तो क्या लेकर जाऊं तो कुछ मिला नहीं तो वह बस वो थोड़ा सा चीड़ा मिल गया तो वो जिसको कहते हैं पोहा तो कुछ पोहा मिला तो एक छोटी सी एक पुट में पोहा बांध कर के भगवान कृष्ण के वहां पर गए देखा कि इनका इतना वैभव इतना ऐश्वर्य इतनी रानियां इतने सेवक दास दासी यह सेनापति सब खड़े रह करर के उनकी सेवा में खड़े और वो गए हैं वो गरीब के कपड़े पहन के एक पोटली में थोड़ा सा पहा लेकर अब किस मुंह से किस हाथ से व पहा दे वो भगवान कृष्ण ने देख लिया कि पुट वो पटली जो है वह छुपा करके घूम रहे हैं तो उन्होंने जोर करके पटली ले ली और फिर देखा कि जो सुदामा की आंखों से जो आंसू आ रहे थे कि भगवान कृष्णा के लिए मैं सिर्फ यही लेकर आया उस आंखों से वह पोहे जो है चीड़ जो है भीग गए और वह भीगे चिड़े वो भगवान कृष्ण ने खाए तो देखिए कि यह जो भीतर में भगवान कृष् के प्रति प्रेम था इतना उनके साथ में रहे राजमहल में किंतु एक बार भी ऐसा मुंह से नहीं बोले कि मेरी ऐसी अवस्था है आप थोड़ा सा कृपा करके मुझे थोड़ा सा धन दौलत दे दीजिए कुछ नहीं मांगा तो यह जो ईश्वर के प्रति प्रेम इसलिए है क्योंकि मेरा प्रेम के खातिर प्रेम प्रेम के वास्ते प्रेम किसी चीज मांगने के लिए दुकानदारी के लिए प्रेम नहीं कि मैं वो जो हजरा वो ठाकुर के कमरे के बार में बैठा रहता था इतना जप करूं तो इतना वह जो ऋण था वह ठीक हो जाएगा वह चुपते हो जाएगा ऐसे नहीं प्रेम के खातिर प्रेम यह जो विशुद्ध प्रेम का जद परख करना है कसौटी होनी है तब ऐसी परिस्थिति आनी है श्यामा सुंदरी देवी कायक परिश्रम करके शारीरिक परिश्रम करके अपने परिवार का पालन लालन पालन कर रही है और किस तरह से वो जो मां शारदा यह सब देखती है व सीख है देखिए कि हालांकि मां शारदा जगदंबा स्वयं है जगत जननी जगदंबा आध्या शक्ति स्वयं है किंतु संस्कार जो पिताजी और माता जी से सु संस्कार मिलना है वह संस्कार प्राप्त होने की सनातन हिंदू परंपरा तो मां के जीवन में भी ऐसी ही है और यह जैसे ठाकुर का सुंदर उदाहरण है ना कि अब जैसे कि चंद्रा मणि देवी दक्षिणेश्वर गई चंद्रा मणि देवी अर्थात भगवान रामकृष्ण देव की मां अभी वो वहां पर दक्षिणेश्वर में रह रही है काली मंदिर में ठाकुर के साथ में और वहां पर मथुर बाबू भी है मथुर बाबू यानी कि ठाकुर के एकदम संपूर्ण समर्पित उनके सेवक रसदार सब कुछ उनके भक्त तो मथुर बाबू आकर के चंद्रा मणि देवी को कहते हैं कि मां आप कुछ मांग लीजिए मेरे से मैं आपको कुछ देना चाहता हूं मेरे पास में तो अड़ अधक धन पड़ा हुआ है इतना सब कुछ पड़ा हुआ है मैं इतना दान करता रहता हूं तो आप भी कुछ ले लीजिए तो चंद्रा मणि देवी तो बेचारी एकदम सोच में पड़ गई कि अरे कुछ कोई जद इतना कुछ देगा तो मैं क्या मांगूंगी क्या है किस चीज की मुझे आवश्यकता है क्या है जो कि मेरे पास नहीं है जो कि मुझे चाहिए तो मां सोचती है चंद्रा मणि देवी कि नहीं बेटा मुझे तो कुछ नहीं चाहिए मेरे पास में तो जो कुछ भी है तुम्हारी दया से दो वक्त का खाना तो मिल ही जाता है एक छोटा सा कमरा भी तुमने दे दिया है रहने के लिए तो इससे रोटी कपड़ा और मकान इससे ज्यादा तो क्या चाहिए जीवन में तो मथुर बाबू बाहर बार विनती कर रहे हैं नहीं मां आपको कुछ तो मांगना ही पड़ेगा तो आखिर में चंद्रा मणि देवी ने क्या कहा परेशान होकर के अरे भाई इतना बोल रहा है बार-बार अच्छा एक काम करो मेरा यह तंबाकू का तबाकू के जो पत्ते हैं वो मा वो चिबा थी उस समय तो जैसी हैबिट थी सबकी तो वह तंबाकू के पत्ते खत्म हो गए हैं समाप्त हो गए हैं वो थोड़ा सा एक बंडल मेरे लिए 1015 पत्तों का मुझे दे दो जब चंद्रमणि देवी ने ऐसा कहा मथुर बाबू की आंखों से आंसू आ गए कहा कि ऐसी मां नहीं रहने से ठाकुर जैसे संतान का जन्म क्या हो सकता है यानी देखिए कि दोनों तरह से कि भगवान राम कृष्ण तो भगवान विष्णु के ही एक अंश लक्ष्मी स्वयं जिनकी दासी जिनको धन ऐश्वर्य का कोई कमी नहीं किंतु फिर भी पृथ्वी पर अवती हुए हैं चंद्रा मणि देवी और खुदीराम जैसे मां और पिताजी के घर में है कुछ नहीं संसार है शिव का किंतु हृदय है लक्ष्मी का हृदय लक्ष्मी का भंडार है हृदय अन्नपूर्णा का भंडार है और संसार है शिव का वो भूत और वो साप वगैरह वहां पर घूम र है तो यह जो है कि ये कादवंथरा शमान चरित्र हमको प्रतीत होता है हमको दिखाई देता है और यही है हम सब लोगों के लिए प्रेरणा कि जदिया हूं ना कि गृहस्थ हूं यदि मैं अपने को ठाकुर का संतान गिनता हूं ठाकुर की प्रदर्शित साधन पद्धति को फॉलो करने का प्रयास करता हूं तो यही चरित्र विपरीत परिस्थिति में भी और अच्छी परिस्थिति में भी मेरा चरित्र समान बना रहे यही ठाकुर और मां के सामने हमारी प्रार्थना रहेगी तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओ शांति हरि ओम तसत श्री राम

Questions & Answers

कृष्णा यह तो बड़ी सिद्ध बात है अपने साहित्य में कि आप जितना जप करेंगे उसके अगेंस्ट में इतना फल मिलेगा ऐसा तो कुछ नहीं नहीं है लोग लाखों लाखों जन्मत जप करते हैं ठाकुर कहते हैं ना कि कोली काता लोकेरा लखो लखो जप करेने नकी पजन तो जप करेने तो कलकाता में लोग लाखों लाखों जप करते हैं जिनका चरित्र अच्छा नहीं ऐसे लोग भी जप कर लेते हैं मिलता कुछ नहीं है तो इतना जप किया इतना ध्यान किया इतना पूजा पाठ किया सामने इतना मिला ऐसा तो है नहीं किंतु बिना जप किए बिना ध्यान किए बिना पूजा किए सिर्फ हाथ पर हाथ रख के बैठे रहेंगे तब भी तो कुछ नहीं मिल वाला राट करेंगे तो मिलेगा ऐसा कोई गारंटी नहीं है नहीं करके बैठे रहेंगे तो मिलेगा ऐसा भी तो नहीं है इसलिए कर्तव्य कर्म करते जाना है और फल की आशा नहीं रखनी फल कब मिलेगा कैसे मिलेगा वह ईश्वर के ऊपर में छोड़ देना है जैसे कहा गया है कि उंगली दी है तो जप करना है यदि ठाकुर की इच्छा नहीं होती हमको जप करने की तो उंगली नहीं दी होती जीव दी है तो ईश्वर का प्रशंसा करने ईश्वर का स्मरण मनन करने के लिए यह जो स्मृति शक्ति दी है तो ठाकुर महा स्वामी जी की कहानियों का संस्मरण के लिए उनका मनन चिंतन अनु्या करने के लिए तो यह सब दिया क्यों है हमको तो ईश्वरीय कार्य में लगाने के लिए ही तो यदि यह नहीं करना था जब नहीं करना था तो उंगली क्यों दी थी ठाकुर की पूजा प्रार्थना नहीं करनी थी तो जिवा क्यों दी थी ठाकुर का दर्शन नहीं करना था तो आंखें क्यों दी है ठाकुर की कहानी श्रवण नहीं करनी सत्संग नहीं करनी तो कान क्यों दिए हैं आंख कान नाक उंगली जिवा यह जो सब दिए हैं वो तो ईश्वर के प्रति समर्पित होने के लिए ही दिए है इसका और कोई प्रयोजन नहीं है तो हम इसका प्रयोजन सिद्ध करें फिर ठाकुर को कृपा करनी है नहीं करनी वो ठाकुर जाना है हमने अपना काम कर दिया ठाकुर का काम ठाकुर कर है देखिए जब तक यह सेंस नहीं आएगी कि ईश्वर को समर्पित ये ज्ञानेंद्रिय कहो ना कि कर्मेंद्रियां कहो ना कि ये मन बुद्धि चित्त अहंकार कहो हमारे ईश्वर को समर्पित करने के लिए है जब तक यह सेंस नहीं आएगी जब तक संसार में यह सब कर्मेंद्रियां ज्ञानेंद्रियां बंधी रहेगी तब तक बार-बार इस संसार चक्र में फंसना पड़ेगा जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में पीसना पड़ेगा और रोते-रोते जाएंगे रोते-रोते आएंगे एक समय किंतु एक जन्म ऐसा आएगा कि रोते-रोते आए हैं किंतु हंसते हंसते जाएंगे वह जन्म कब आएगा जब जिस जन्म में हमने इस इंद्रियों को ईश्वर को समर्पित किया है जिस जब तक वह आखिरी जन्म नहीं आता तब तक रोते-रोते आना है और रोते-रोते जाना है वन वर्ड उत्तर है अपना यह जो डेली सत्संग है य सिंपल वन वर्ड सलूशन देख देखिए मैं खुद इसको शुरू किया था क्यों क्योंकि मैं भी ऐसी एक परिस्थिति से गुजर रहा था कि दिन प्रतिदिन ऑफिस में आता हूं वही सब नेगेटिव बातें चलती रहती है मैंने सोचा इसका कोई सोल्यूशन लाना पड़ेगा फ ठाकुर महा स्वामी जी की बातें करना शुरू करते हैं और किसी को कुछ मिले ना मिले मेरे मन को सदिया मिलेगा तो यह जो सत्संग है तो यह सत्संग इज वेरी इंपोर्टेंट और दूसरा है कि मैंने यह ठाकुर म स्वामी जी की ये जो वाणी है यही तो सबसे बड़ा एक सहारा है ना हमारे लिए बहुत सारे लोगों को मैं कहता हूं कि कथामृत का पाठ पढ़ कर के करो जो पढ़ते हैं जो मन में मन में जो पढ़ते हैं ऐसा नहीं बोल कर के पाठ करो देखो कि कितना अच्छा मैंने मुझे खुद को इतना लाभ हुआ है उससे जब भी मैं अपने कमरे में बैठक बोल कर के जो पाठ करता हूं तो यह जो मंत्र है ना मंत्रों से तो क्या पूरा एक वातावरण एक शुद्ध हो जाता है सात्विक हो जाता है तो वैसे वैदिक मंत्र भी है जो कि हम उसका चैटिंग करते हैं प्रतिदिन सुबह को यह कथामृत में ठाकुर की वाणी भी ऐसी है तो इसका बोल कर के पाठ करने से वह एक मानसिक शांति मिलती है क्योंकि इसके अलावा ठाकुर की वाणी के अलावा सबसे सरल रास्ता और कोई नहीं है सबसे सरल से सरण रस्ता यही है इसके बाद में धीरे-धीरे करके साधना की कॉम्प्लेक्टेड आया था बहुत दिनों पहले आई थिंक साल हो गया उसका मित्र उसको खींच के ले आया बोला कि चलो वहां पर चलते हैं स्वामी जी के पास में तुम्हारा जरूरत है तुमको उनसे बात करने की लेकर आया फिर वह खुद तो कुछ बोल नहीं रहा है उसका मित्र बता रहा है कि महाराज जी इसको बोलिए बहुत डिप्रेसो गया सुसाइडल थ थॉट इसको आ रहा है सुसाइड करने के बारे में सोच रहा है तो मैंने बोला भाई तुम बताओ थोड़ा सा जद अपने मुंह से इतना तो क्या मायूस होकर बैठे हो हो सकता है मैं थोड़ा सा सोल्यूशन तुमको सजेस्ट कर दूं तो फिर उसने बताना शुरू किया वो पढ़ा लिखा था एसी किया था किसी कॉलेज में लेक्चरर था और स्टूडेंट्स भी उसको बड़ा रिस्पेक्ट देते थे किंतु धीरे-धीरे परिस्थिति ऐसी आई कि गांव में घर है व पिताजी का मृत्यु हो गया मां को देखने वाला कोई नहीं तो नौकरी छोड़ के गांव में चला गया अभी गांव में एक ऐसा उसका मन के साथ में जो हुआ एक शहर का लड़का है ना रजस एक एक्टिविटी देखा है गांव में तो ऐसा एक्टिविटी नहीं प्लस वो कहीं सेपरेटली किसी फार्म हाउस में रहता था लोगों का संपर्क नहीं तो एक तो सॉलिट्यूड और इन एक्टिविटी इन दोनों की बजह से पूरा डिप्रेशन में चला गया और फिर आर्थिक अवस्था बिगड़ी आर्थिक अवस्था भी बिगड़ी और फिर जब शहर में वापस आया नौकरी करने के लिए तो नई नौकरी नहीं मिल रही तो अभी सब मिलकर के उसके साथ में ऐसा हुआ कि पूरा सुसाइड करने की परिस्थिति में आ गया मैंने उसको क्या कहा पता है कि व्हाट यू नीड इज अ वर्क थेरेपी किसी ऐसी जगह प चले जाओ वहां पे बहुत सारे लोगों के साथ में बहुत सारा काम करना पड़ता है जैसे कि यह जो यह जो दुकान वगैरह है ना वहां पर रिसेप्शनिस्ट होते होते हैं या तो फिर यह जो जो न्यूज़पेपर का जो जहां पर काम होता है बहुत सारे लोग आते हैं बहुत सारी एक्टिविटी होती है तुम ऐसा उसमें डूब जाओ कि छह सात महीनों के लिए कि यदि तुमको सैलरी भी ना दे फिर भी मुफत में जाकर के काम करो जैसे कि तुम्हारा माइंड पूरा बाहर की ओर चला जाए क्योंकि तुम पूरा भीतर में चले गए हो ना डिप्रेसो गए हो खत्म हो जाएगा तुम्हारा माइंड इतना भीतर में चले गए हो इंद्रियों को पूरा एक्सट्रोवर्ट कर दो पूरा वर्क थेरेपी ले लो छ सात महीना के लिए इतना काम करो इतना काम करो कि जब तुम अपने कमरे में जाओ सोने के लिए सीधा सो जाओ एक एक एक एक भी विचार तुम्हारे मन में ना आया उल्टा-पुल्टा वरना वो मोबाइल प क्या-क्या सब उल्टा-पुल्टा देखता रहता था दिन भर बिना काम के बैठा रहता था तो वर्क थेरेपी इज वट यू नीड मुफत में जाकर काम करो मन को पूरा एक्सट्रोवर्ट कर दो भीतर में से पूरा खाली कर दो फिर धीरे-धीरे करके उसको इंट्रोवर्ट करना वो आके मुझे बोल रहा है महाराज जी आप मेडिटेशन करने का कोई उपाय बता दीजिए मैंने कहा पागल तुम इस अवस्था में मेडिटेशन करोगे ना तो मर जाओगे खत्म हो जाओगे जो आधा खत्म हुआ है तुम्हारा ब्रेन 100% खत्म हो जाएगा यह कोई मेडिटेशन करने की परिस्थिति में तुम नहीं हो तो जैसे वह स्वामी जी ने कहा था कि एक लड़का आया कहता है कि मैं अपने कमरे दरवाजा खिड़की सब बंद करके ध्यान करने का प्रयास कर रहा हूं हो नहीं रहा है स्वामी जी ने क्या कहा पहले तो खिड़की और दरवाजा खोलो बाहर निकलो गरीबों की सेवा करो अपना मन दूसरों के दुख कष्ट में लगाओ उनका दुख कष्ट दोगे अपने हृदय में करुणा जागृत होगी ये जब करुणा जागृत होगी ना मैं अपना कष्ट भूल जाऊंगा तब तो कहीं जाकर के दिस सेल्फलेसनेस इज द फर्स्ट स्टेप टुवर्ड्स द स्पिरिचुअलिटी ये स्वामी जी का कितना बड़ा स्टेटमेंट है कि ये निस्वार्थ आध्यात्मिकता के प्रति प्रथम कदम है जब तक मैं अपना ही सोचता रहूंगा मैं डिप्रेसो गया हूं मैं मर गया हूं मेरे साथ में आर्थिक अवस्थिति ऐसी है मेरी परिस्थिति ऐसी है मैं क्या करूं क्या करूं और फिर ऐसी परिस्थिति में मैं जब ध्यान करने को जाऊ पूरा ब्रेन वश हो जाएगा पूरा पहले तो सेल्फलेस हो अपना जो मन है उसको करुणा मैत्री उससे भर दो तब कहीं जाकर के मन जो है वह अपनी एकदम व परिस्थिति में से ऊपर आएगा देन द टाइम विल कम फॉर स्पिरिचुअल लाइफ बायरे ये तो लोकर की परिस्थितियां छ देखो यहां पर मंदिर से मेरा हमेशा से ऐसा है मैं जहां पर भी रास्ते में जाता हूं ज गरीब लोगों के प्रति मेरी पहली एक नजर आकर्षित होती है तो यहां पे मैं अपने कमरे में से ऑफिस में आता हूं यह आश्रम के गेट पे ही कुछ भिखारी बैठे रहते हैं छोटी-छोटी बच्चियां अभी क्या उनके पास में फोर्सफुली भीख मंगवाते होंगे इन लोगों का क्या पूरा रैकेट रहता है तो जो भी है छोटी-छोटी बच्चियां फटे कपड़े पहन कर के वो भिक्षा मांगती है रास्ते पे इतनी धूप में बैठी रहती है तो उनको देख कर के ऐसा मैं ये हो जाता हूं अरे बाप रे इनकी जद ऐसी परिस्थिति है तो उसके सामने मेरा कष्ट क्या है भाई यहां पे क्या है कि पहले तो बैकग्राउंड परिस्थिति क्या है आप अपनी यात्रा में कहां पे है मान लीजिए कि अभी मैं संसार से जड़ित हूं या तो मैं कहूंगा कि सांसारिक जवाबदार हों से मैं मेरे सर पर है अभी भी अभी भी परिवार का लालन पालन करना पड़ेगा नहीं करूंगा तो फिर उनको कौन देखेगा ऐसी एक परिस्थिति है तब तक मैं भले ही स्वार्थ के लिए कार्य करता रहूं साथ-साथ में मैं ईश्वर का नाम जप करता रहूंगा क्योंकि ठाकुर ने मुझे और कोई ऑप्शन नहीं दिया है मास्टर महाशय वो जो मास्टर महाशय पहली बार आए तो ठाकुर ने कहा कि वो प्रताप का भाई यहां पर आया था तो मैंने उसको कहा कि तुम्हारे बीवी बच्चों को क्या पड़ोसी देखेंगे क्या जाओ पहले जाकर उनकी संभाल लो तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मास्टर महाशय के मन में ऐसा कुछ होगा ठाकुर तो अंतर्यामी है ना तो मास्टर महाशय के मन में होगा कि घर छोड़ के मैं यहां पे आ कर के रहूं ऐसा आकर्षित हो गए होंगे तो ठाकुर ने भी इनडायरेक्टली उसको उनको बोल दिया बीवी बच्चे तो कर दिए हैं अभी उनकी संभाल कौन लेगा पड़ोसी लेंगे क्या जाओ जाकर के पहले उनकी संभाल लो साथ बीच-बीच में मने वने और कोण जाकर के ईश्वर का नाम चिंतन करना क्योंकि जवाबदारी तो है और जवाबदारी छोड़ देना तो उचित नहीं तो वह तो एक बात हो गई कि संसार की जवाबदारी है तो आपको सेल्फिश होना ही पड़ेगा क्या करेंगे वह तो एक परिस्थिति में आप है साथ-साथ में ईश्वर का नाम लेते रहिए फिर परिस्थिति आएगी आप साधना में सीरियसली आगे बढ़ रहे हैं अभी यहां पर जब आप साधना में आगे बढ़ेंगे सबसे बड़ा एक डेंजर क्या खड़ा हो होता है कि मेरा एक ईगो था मेरा एक अहंकार था जो कि मुझे संसार के जो सब प्र आघात से प्रोटेक्ट करके रखता था कोई आके मेरे साथ में झगड़ा करेगा तो मैं सामने उसको दो झापड़ मार दूंगा साले पता नहीं मैं कौन हूं मेरे साथ में झगड़ा करते हो ऐसा एक घमंड अहंकार वो साइकोलॉजिकली मुझे प्रोटेक्ट करके रहा था अभी यह घमंड अहंकार मद इसको मैं छोड़ रहा हूं जैसे ही मैं उसका त्याग करूंगा एक भयानक वल्नरेबल मेरे मन में आकर खड़ी होगी वल्नरेबल अर्थात कि एक तरह की कमजोरी कि कोई आकर के मुझे दो शब्द भी बोल देगा ना मैं बड़ा ही उससे आघात होगा क्यों क्योंकि वह ईगो रूपी वो शील्ड था वो अभी मेरा नहीं रहा और मैं बहुत ही वल्नरेबल हो गया हूं छोटी-छोटी चीजों के प्रति कोई भी छोटी चीज आकर के मुझे ऐसा आघात करेगी कि मैं क्या करूं कैसे अपने को बचाओ यह साधक के जीवन का सबसे डेंजरस फेस है आप जब तक संस में थे एक ईगो का एक आवरण था एक शील्ड था जो कि आपको बचा के रखता था आप सिद्ध हो जाएंगे तो आपकी सात्विक सिद्धियां ही आपको बचा के रखेगी किंतु यह जो बीच का रास्ता है जबकि आपके पास ना ही आध्यात्मिक सिद्धि है जो कि सिद्ध लोगों की है ना ही यह सांसारिक शील्ड है ईगो का उस समय यू आर एक्सट्रीमली वल्नरेबल उस समय प्रत्येक छोटी-छोटी चीजें आकर के आपके मन के ऊपर में ऐसा आघात करेगी कि आप साइकोलॉजिकली कोलप्पन के लिए आपको सेल्फलेस होना है उस कॉलेप्स से बचने के लिए आपको एक नया शील्ड खड़ा करना है वो शील्ड है सेल्फलेसनेस तो देखिए कि इस मनुष्य को बचाने के लिए तीन शील्ड है डिफरेंट डिफरेंट अवस्था में संसार में है तो आपका अहम आपको रक्षा करता है साइकोलॉजिकली यदि साधक सिद्ध हो गए हैं तो यह ईश्वरीय कृपा आपकी रक्षा करती है और जब तक साधक है साधना के क्षेत्र में आप यात्रा कर रहे हैं तब यह सेल्फलेसनेस या तो फिर निस्वार्थ आपको शील्ड बना कर के मन को बचाएगी