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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 9 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

अद्भुत कहानी: आध्यात्मिक सुर-तरंगों का चमत्कार: चरित्र कैसे होता है पवित्र

एक बार गिरीश घोष स्वामी जी को बिल्व मंगल नाटक दिखाने के लिए ले गए। ठाकुर की महासमाधि के बाद की बात है। जब वराह नगर मठ था उस समय की बात तो स्वामी जी गए बिल्व मंगल नाटक देखा अच्छा लगा उनको उसके बाद में नाटक जब समाप्त हो गया ऑडियंस सब चले गए तो गिरीश ले गया स्वामी जी को बैक स्टेज पे रंगमंच के ऊपर में तो रंगमंच के ऊपर में क्या है नाटक तो अभी समाप्त हुआ है तो जितने अभिनेता या अभिनेता नेत्रियां है तो अभी भी वह साजधाज करके वो नाटक के जो वेश में उसी वेश में सब इधर-उधर खड़े हैं। आपस में बात कर रहे हैं और गिरीश भी किसी के साथ बात कर रहा है। तो नरेंद्र ने देखा वहां पर एक तानपुरा पड़ा था। तो वहां पर वह बैठ गया स्टेज के सेंटर में और तानपुरा लेकर के एक गीत गुनगुनाने लगा और धीरे-धीरे करके गुनगुनाते पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। सोचा कि स्वामी जी बस इस तरह से कुछ टेस्ट कर रहे हैं। टाइम फ्री है उनके पास में गिरीश्वर किसी के साथ बात कर रहा है। तो वह अपने मन से कुछ गुनगुना रहा है। पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। किंतु यह गुनगुनाना स्वामी जी का गान धीरे-धीरे करके गहराई पकड़ने लगा। एक डेप्थ एक स्पिरिचुअल वाइब्रेशन पकड़ने लगा। स्वामी जी का आवाज जो है धीर गंभीर होता गया और तानपुरा इतना सुमिष्ट राग से सुर से स्वामी जी बचा रहे हैं और साथ में ही उनके गले की आवाज इतनी सुमिष्ट मधुर माधुर्यमय आवाज और फिर गान का जो भाव है वह मिलकर के धीरे-धीरे करके ऐसा एक आध्यात्मिक आबोहवा का सृष्टि किया कि उसको सुनकर के जैसे लोगों के कान में गया सभी लोग वहां पर स्तंभित हो गए। जो बात कर रहे थे जो एक दूसरे के साथ में जो कुछ डिस्कस कर रहे थे सब जैसे कि स्टॉप हो गया। जैसे समय अपने से स्टॉप हो जाता है और एक आध्यात्मिक तरंग बहने लगती है। तो ऐसी एक ऐसी तरंग रंगमंच के ऊपर में बहना शुरू हुई। गिरीश जैसा गिरीश जो कि उसने ठाकुर के गीत सुने थे म स्वामी जी तो खैर ठाकुर के साथ में गाते ही थे किंतु यह जो भाव था कहां वो रंगमंच और यह अभिनेता या अभिनेत्रियां जिनका कि चरित्र अच्छा नहीं होता मतलब उस समय भी नहीं था आज भी नहीं होता किंतु उस समय मैटर करता था आज मैटर नहीं करता तो यह सब अभिनेता अभिनेत्रियां जहां पर खड़े है जो कि एक अति राजसिक जगह है। नाटक थिएटर का रंगमंच कहो थिएटर का स्टेज कहो भयानक राजसिक जगह है। यह तो कोई दक्षिणेश्वर काली मंदिर है नहीं कि ठाकुर की साधना से वह गम गम करता हो। नहीं मतलब कोई यह वराह नगर मठ कि जहां पे साधन भजन की लहरें बह रही हो। यह तो है एक पब्लिक थिएटर और उसका एक पब्लिक स्टेज जहां पे यह सब अभिनेता अभिनेत्रियां खड़े हैं। ऐसे एक एटमॉस्फियर में स्वामी जी ने इस तरह से गाना शुरू किया। सब कुछ स्टॉप हो गया। सब कुछ जैसे कि फ्रीज हो गया। गिरीश स्तब्ध होकर के सुन रहा है और यह भाव का गांभीर्य आध्यात्मिकता का गांभीर्य गहन से गहनतर होता ही जाता है। आखिर में एकाएक गिरीश को होश हुई कि यह जो गांभीर्य बढ़ता जाएगा ना आध्यात्मिक जिस ऊंचाई पर नरेंद्र चला गया है ये गीत गातेगाते यदि वो और ज्यादा ऊपर में चला जाएगा ना तो उसको वो समाधि हो जाएगी। समाधि में से फिर वापस लाना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा ना हो जाए कि समाधि में ही फिर देह त्याग हो जाए। तो फिर गिरीश घोष को जैसे ही यह होश आई वैसे ही दौड़ा हुआ गया। नरेंद्र के हाथ में से तान पूरा खींच लिया। जोर से खींच लिया और नरेंद्र का हाथ पकड़ करके उसको उठाया। कहा चलो अभी हम निकलते हैं यहां से। और ऐसा हाथ पकड़ कर के नरेंद्र को ले जाकर के मठ में जाकर के रख दिया। और स्वामी जी जो है देखिए स्वामी जी के हाथ में से तान पूरा खींच लिया उसको हाथ पकड़ करके गिरीश उठा रहा है हाथ खींच करके ले जा रहा है वहां से स्वामी जी ऐसे उस समय भी ऐसे भाव में मत थे कि कुछ बोल नहीं रहे हैं जैसे एक ओबेडिएंट बालक जो होता है वो जैसे वो गिरीश कहता है चलो चलो निकले निकलते हैं यहां से तो वह भी निकल रहे कोई प्रोटेस्ट नहीं किया गुस्सा नहीं दिखाया क्यों मेरे हाथ से तान पूरा छीन लिया कुछ नहीं तो देखिए कि यह जो आध्यात्मिक भाव आध्यात्मिक तरंग एक बार बहना शुरू होती है तो वह देश काल पात्र कौन सा परिस्थिति है कौन वहां पर खड़ा है किस सिचुएशन में आप है वो कुछ मैटर नहीं करता आपका मन क्या साधना में रत था स्वामी जी तो गए थे वहां पे नाटक देखने के लिए हालांकि बिल्व मंगल है एक धार्मिक नाटक किंतु मतलब सॉर्ट ऑफ धार्मिक एक नाटक किंतु फिर भी क्या है देखिए कि है तो वह एक पब्लिक थिएटर है तो वो रंगमंच ही वहां पे एकाएक इस तरह के भाव का आवेश होना सही में स्वामी जी का डेप्थ कितना है ऐसी ही एक घटना उद्बोधन में हुए उस समय मां वहां पर थी उद्बोधन में ही थी एक अभिनेत्री आई तो पहले तो वो आती थी मां के पास में वो अपनी कार में और कार तो उस समय नहीं थी। घोड़ा गाड़ी जो थी उसके साथ में उसमें यह फल मिठाई वगैरह सब बहुत कुछ लेकर के मां को वह देने के लिए आती थी प्रणाम करने के लिए। तो मां अपने से तो ग्रहण नहीं करेगी। ठाकुर को भी नहीं देगी किंतु आपस में किसी लोगों को बांट देगी। यह सब चीजें जैसे लक्ष्मीारायण मारवाड़ी के साथ ठाकुर करते थे। तो ये अभिनेत्री की चीजें ठाकुर को मां ऑफर नहीं करती थी। किंतु उसके ऊपर में मां का यथेष्ठ स्नेह था। प्रेम था कि हां तुम आओ फिर मां उसके साथ में सहृदयता से बात करेगी और ये अभिनेत्री को भी पता है कि मां जिस कमरे में बैठती है उस कमरे में नहीं जाकर के वहां पर चौखट है वहीं पर बैठकर के वो मां का कुशल प्रश्न जिज्ञास पूछती थी मां का आशीर्वाद मांगती थी मां को प्रणाम करती थी अभी देखिए एक दिन मां ने इसको कहा अभिनेत्री को अच्छा तुम तो वहां पे थिएटर में गान करती हो मैं कोई ईश्वर का भजन यदि तुमको आता है तो ईश्वर का कोई गान तो सुनाओ तुम तो अभिनेत्री ने गाना शुरू किया और जैसे ही उसने गाना शुरू किया ना पता नहीं उसकी आवाज में कैसा एक चमत्कार कहो कैसा एक आध्यात्मिकुर्य कहो प्रकट हुआ कि जैसे ही यह गान की तरंगे फैलने लगी जिसने सुना वह वहीं का वहीं स्टॉप हो गया वहीं का वहीं फ्रीज हो गया। ग्राउंड फ्लोर पे वहां पर तो उद्बोधन कार्यालय था। स्वामी शारदानंद जी महाराज गणेश की तरह वहां पर विराजमान थे। पूरे मठ मिशन का कार्य वहां से चलता था। कॉरेस्पोंडेंस सब होता था। रिलीफ वर्क मैनेज करना है। पैसा आता है, जाता है, डिवोटी आते हैं, जाते हैं। सब व्यवहार जो है रामकृष्ण संघ का वह ग्राउंड फ्लोर से होता है। क्योंकि शारदानंद जी है संघ के जनरल सेक्रेटरी और शारदानंद जी का खुद का यह जो गान है, भजन है, राग रागिणी है, उसको समझने की उनकी जो अंडरस्टैंडिंग थी, वह बहुत ही गहरी थी। और नेचुरली शारदानंद जी ने तो ठाकुर को भी गाते हुए सुना है। स्वामी जी को भी गाते हुए सुना है। यानी कि उनका जो स्टैंडर्ड है रसास्वाद करने का इस तरह से भगवान के संगीत का रसास्वादन करने का उनका जो स्टैंडर्ड है इस नेचुरली वेरी हाई स्टैंडर्ड। तो वो अपने डेस्क के ऊपर में बैठे-बैठे लिख रहे थे। जो शारदानंद जी का वो फोटो यदि आपने देखा होगा कि वह एक जमीन पर बैठे हैं सुखासन में और सामने एक राइटिंग डेस्क है तो उसके ऊपर में बैठकर के कुछ लिख रहे थे। जैसे ही यह गान की तरंगे उनके कानों में प्रवेश की वह भी फ्रीज हो गए। जिस हाथ में कलम पकड़ी है लिख रहे हैं तो ऐसे के वैसे ही बैठे हैं। हाथ में कलम लेकर के एक ध्यान से गान सुन रहे हैं। ज्ञान का जो गांभीर्य है, उसकी जो मधुरता है, ईश्वर के प्रति जो शरणागति है, एक भक्त की एक पतित भक्त की जो आरती है, ठाकुर के प्रति, ईश्वर के प्रति वो जो इस तरह की आध्यात्मिक शक्ति है उसके भीतर में पूरा जो उद्बोधन कार्यालय था। जैसे-जैसे गान की तरंग फैलना शुरू हुआ, जहांजहां पे भी गान की तरंग गई, सब लोग जैसे कि स्टॉप हो गए। जो काम करते थे वो काम वहीं पर रुक गया। एक ध्यान से सभी लोग श्रवण कर रहे हैं। श्रवण कर ही रहे हैं। मां भी जैसे कि स्थिर होकर के एकाग्र चित्त से गान सुन रही है। जब गान समाप्त हुआ तो फिर जैसे कि वो किसी ने वो टाइम को स्टॉप कर दिया हो ना आप वीडियो देखते हैं आप पोस्ट कर देते हैं तो कैसा सब फिक्स हो जाता है। फिर आप फिर से प्ले करते हैं तो फिर से चलने लगता है। तो जैसे ही गान समाप्त हुआ वैसे ही सब अपना-अपना कार्य करने को चालू कर दिए। शरद महाराज किंतु देखिए ये जो कौन इस तरह का गाना गा सकता है? कौन है जिसके पास में यह आध्यात्मिक शक्ति है कि शरद महाराज जैसे शरद महाराज मां जैसी मां यह उद्बोधन भर के जो साधु लोग है सबको अपनेप कार्य में फ्रीज करवा सकता है कौन है यह तो सभी लोग आपस आपस में बात कर रहे हैं कि जब यह स्त्री जब नीचे आएगी लेडी डिवोटी हम देखेंगे कि कौन है तो यह जब नीचे आई वो तो वही अभिनेत्री तो सभी लोग इतने आश्चर्य में पड़ गए कि यह तो थिएटर में तो प्रतिदिन गाती किंतु वह तो क्या है कि पुरुषों का मन लुभाने के लिए ईश्वर का मन लुभाने के गायन वो भजन गाती भी होगी पदावली गाती भी होगी तो उसमें तो वो पावर कहां से आएगा जो कि एक शुद्ध पवित्र साधक गाता है ऐसा पावर वहां पर कैसे आएगा तो फिर किसी ने शारदानंद जी को पूछा कि अच्छा महाराज इतना इतना सुंदर रूप से इसने गाया सभी साधु लोग एकाग्र चित्त होकर के मां स्वयं सुन रही है इसके पीछे का रहस्य क्या है? ऐसा तो नहीं है कि थिएटर में इस तरह से गाएगी तो थिएटर ही स्टॉप हो जाएगा। कितने लोग सुनने को आ जाएंगे। ऐसा तो नहीं है। शी इज वेरी टैलेंटेड बट नॉट दिस टैलेंटेड। व्हाट इज द सीक्रेट कि यहां पे हुआ क्या? तो फिर शरद महाराज कहते हैं देखो मां के सामने गा रही थी तो मां की शक्ति उसमें प्रवेश की है। मां के आशीर्वाद उसके गान के भीतर में उसकी वाणी में ओतप्रोत हो गए हैं। बोलकर के ये जो गान है यह गीत था इतना सुमधुर इतना हृदय को चित्त को आकर्षक करने वाला हुआ था। तो ये जब आध्यात्मिकता ये गान भजन एक बार चालू होते हैं हृदय के भीतर में से वह प्रकट होना शुरू होते हैं। फिर वह देश काल पात्र देखा नहीं जाता। आध्यात्मिकता की तरंगे ऐसे बहती ही है। अच्छा अभी हम मां के जीवन की ओर आते हैं।

माँ सारदा की हरिद्वार तीर्थयात्रा

स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चीर सीमंतीनी इस अध्याय का अंतिम भाग जो है मां हरिद्वार आंत पहुंची है। यात्रा के लिए निकली थी वहां से मां ठाकुर की महासमाधि के बाद में तो वृंदावन तो समाप्त हो गया। अभी कोलकाता वापस जाने की बारी आई है। तो वापस जाने के समय मां हरिद्वार, जयपुर और प्रयाग तीन जगह पर जाती है। तो पहला स्टॉप है रिटर्न जर्नी में हरिद्वार। तो हरिद्वार में ऑलरेडी रास्ते के हरिद्वार में जाने के समय रास्ते में योगिन महाराज को जो बुखार हुआ था। फिर उनको एक दर्शन हुआ कि एक भीषण दानव मूर्ति उनके सामने आकर के कहती है कि मैं तुमको देख लेता वो बंबैया लैंग्वेज में मैं तुमको देख लेता किंतु परमहंस महाशय का आदेश है मुझे अभी चले जाना होगा और फिर एक देवी मूर्ति को दिखा के कहा रक्त वस्त्र परिहिता लाल रंग के वस्त्र पहनी हुई देवी को कहा दिखा के कहा कि उनको कुछ रसगुल्ला खिला देना तो इस दर्शन के बाद में उनका बुखार ठीक हो गया। इसके बाद में गंभीरानंद जी क्या लिखते हैं? हरिद्वारे उपस्थित होइया श्री मां यथा रीति ब्रह्म कुंडे स्नान एवं मंदिर आदि दर्शन कोले ब्रह्म हरिद्वार में उपस्थित होकर के श्री मां ने यथा रीति जिस तरह की तीर्थ क्षेत्र की रीति है उस अनुसार ब्रह्मकुंड में स्नान किया और मंदिर में दर्शन किया कोलकाता हो त तीर्थ जोले बसने जन श्री ठाकुर केश और नक आिया छले कोलकाता से उन्होंने तीर्थ जल में विसर्जन करने के लिए श्री श्री ठाकुर के केश और नक नाखून जो होते हैं कुछ वो लाई थी तो उन्होंने ब्रह्मकुंडे उहार कीदंश निक्षेप कोले ब्रह्मकुंड में उसका कुछ अंश निक्षेप किया विसर्जित किया एतद व्यतीत तिनी भागीरथी अतिक्रम पूर्वक चंडीर पहाड़े आरोहण कोरिया देवी दर्शन को ले इसके अलावा एतद व्यतीत इसके अलावा माने भागीरथी गंगा नदी को क्रॉस करके अतिक्रम पूर्वक क्रॉस करके चंडी पहाड़ के ऊपर में आरोहण करके उठ के देवी का दर्शन किया

माँ सारदा की जयपुर तीर्थयात्रा

अभी जयपुर अनंतर मां शोदोल बोले जयपुर घुमोन कोरेन इसके बाद में मां अपने संगीत संगिनियों को लेकर के जयपुर गमन करती है। शेखा ने शकले गोविंद जी के दर्शन करिया अन्नान्य विग्रह देखीते देखीते एक देवी विग्रह सम्मुखे आशी ते जोगेन महाराज बोलिया उठले उठेन जे इनहीं तहार ज्वरा बसाई दृष्टा देवी वहां पे गोविंद जी के दर्शन करके बाकी सब विग्रह दर्शन करतेकरते यह लोग भ्रमण कर रहे थे उस समय एक देवी विग्रह के सामने आने से ही योगिन महाराज बोल उठे कि यही उनकी ज्वर अवस्था में जो दृष्ट दर्शन हुआ था वह देवी है। इनहीं शीतला यह शीतला देवी देवी के आठ आना रसगुल्ला भोग देवा होए। देवी को आठ आने का रसगुल्ले का भोग देना हुआ। इसके बारे में हमने कल भी काफी डिस्कस किया था कि रैशनलिटी और फेथ यह और यह सुपरस्टिशियन तो अंधश्रद्धा तो हम लोग कहां पे आते हैं? यह हम लोग एक रैशनलिस्ट है। हमारे में श्रद्धा है ना कि हमारे में अंधश्रद्धा। तो एक्चुअली देखें तो बहुत कोई हार्ड एंड फास्ट इसमें आप वाटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं बना पाएंगे। ठाकुर तो खैर मां ने तो कहा है ठाकुर टिक टिकी परजन तो मैनेज है माने यह टिक टिकी अर्थात को जो दीवार के ऊपर में वो जो चढ़ती है ना वो क्या नाम भूल गया तो जो भी है वो टिक टिकी को भी ठाकुर ने माना है अर्थात कि उसका दर्शन होने से या तो फिर वो रास्ते में गिरने से क्या होगा कि अपशुकन होगा तो जो भी है ठाकुर और मां की तो बात अलग है उन्होंने सब कुछ स्वीकार किया है मां ने तो तांत्रिक को बुला के वो और राधु का ट्रीटमेंट करने का भी ट्राई किया था। लिजारार्ड यस लिजाार्ड यस तो ठाकुर ने तो वो भी मां ने तो वो भी ट्राई किया था। किंतु देखिए कि स्वामी जी हिमसेल्फ इज क्वाइट माने वेस्टर्न नॉलेज, वेस्टर्न साइंस, वेस्टर्न फिलॉसोफी सब पढ़े हैं। और इसके बाद में स्वामी जी को भी किंतु चरणामृत वगैरह में उतना ही विश्वास था। सो यहां पर भी देखिए कि देवी को आठ आने का रसगुल्ले का भोग दिया गया। जयपुर पर तहारा पुष्कर

माँ सारदा की पुष्कर तीर्थ यात्रा

तीर्थ उपनित होन जयपुर के बाद में वे लोग पुष्कर तीर्थ में उपनित हुए। श्री मां शेखा ने सावित्री पहाड़े आरोहण करिया छिले। श्री मां ने वहां पे सावित्री पर्वत के ऊपर में आरोहण किया था। पाए बातेर सूत्रपात पुरबे होया थाकिले ओ तन तखनो बेश चोलीते पारते पैर में यह अर्थराइटिस का प्रारंभ पहले से ही हो चुका था किंतु उस समय मां अच्छे से चल पाती थी पता है ना कि अर्थराइटिस कैसे हुआ माने और भी तो रीजन होंगे उस समय कि हेल्थ हाइजीन न्यूट्रिशियस फूड वगैरह तो एक प्रॉब्लम था ही था प्लस वो वो ह्यूमिड एटमॉस्फियर में मां रहती थी गंगा के किनारे तो वह भी एक था डैंप सब कुछ हो जाता था किंतु एक रीजन मां ने खुद ने बताया है कि वहां पे वो बारंदा में वो जो पर्दा लगा था ना वहां पे एक उसमें एक छेद था एक होल था वहां से वो मां ठाकुर के कमरे में जो कीर्तन था होता था नाम गुण कीर्तन नृत्य गीत वगैरह जो होता था वहां पर खड़े-खड़े उस छेद में से मां दर्शन किया करती थी और ठाकुर कहते भी थे विनोद करके अपने रामलाल दादा को कि अरे रामलाल तो तुम्हारी चाची का वहां पर जो पर्दा है उसका छेद है वो बड़े से धीरे-धीरे करके बड़ा होता जा रहा है अर्थात कि छोटा वो वो रहने से होल रहने से देखने में दिक्कत होगा तो मां ने उसको और ज्यादा होल को बड़ा कर दिया होगा तो वहां पे खड़े-खड़े कीर्तन देखतेदेखते म एक स्टिफ हो जाता है ना बॉडी आप लंबे टाइम तक इस तरह से खड़े रहेंगे। तो मां ने कहा था वहां से ही फिर यह अर्थराइटिस का प्रारंभ हुआ है। तो वह तो ठाकुर के रहते-रहते ही वहां पे बारंदे में नहबत के कीर्तन सुनते-सुनते ही तो अर्थराइटिस प्रारंभ हो चुका था। तो किंतु उस समय मां अच्छे से चल पाती थी। बोलकर के मां ने पर्वत जो है उसके ऊपर में उठी थी। और पाए हां मंदिर आदि दर्शन संभव होया छिलो पैर से चलकर के मंदिर वगैरह में दर्शन उस समय संभव हुए थे

माँ सारदा की प्रयागराज तीर्थयात्रा

उसके बाद में प्रयाग बछते तहारा प्रयाग होया कोलकाता चोली लेन साल के आखिर में प्रयाग होकर के वे लोग कोलकाता फिरत आए प्रयागे गंगा जमुनार संगम स्थले श्री मां ठाकुर अवशिष्ट केश विसर्जन दिले प्रयाग में गंगा यमुना के संगम स्थल पे श्री मां ने ठाकुर के जो केश बचे हुए थे वह विसर्जित किए ए दिन घटना संबंध तनी पर ए रूप बोलिया छिले इस दिन की घटना के बारे में बाद में मां ने इस तरह से कहा था ठाकुर चूल की कोम जिनिश ठाकुर के जो बाल है वह क्या कोई सामान्य है तार शरीर त्याग पर जो प्रयाग जाई तो तार चूल तीर्थ देवार जो शंगे छिलो ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब मैं प्रयाग गई थी तब उनके बाल तीर्थ में देने के लिए मैं साथ में लेके गई थी गंगा जमुना संगमेर स्थिर जोलेर काछे ओईचूल हाथ लिए झोले देवो मोने कोर छछ गंगा यमुना का संगम स्थल है वहां पर स्थिर जल के पास में यह बाल मैं हाथ में लेकर के पानी में पधराऊं ऐसा मैं सोच रही थी ऐन समय हठात एकटी ढे उठे उठी हम हाथ के आ जले मिो जैसा मां ने हाथ में यह लिया था वो ऑफर करे करेगी ऐसा सोच ही रही थी एकाएक एक पानी की तरंग उठी और वह बाल मेरे हाथ में से लेकर के फिर से पानी में मिल गई तीर्थ पवित्र हो बार जनने तार चूल हमार हाथ के लिए गैो तीर्थ पवित्र होने के लिए मेरे हाथ में से ठाकुर के बाल ले गया देखिए यह कितना बड़ा यह स्टेटमेंट है स्वामी जी कहते हैं भारत को पुण्य भूमि यह पुण्य भूमि क्यों है क्योंकि यहां पे यह साधु संत अवतार महात्मा साधक यह जो जनरेशन आफ्टर जनरेशन ेशन युग के बाद युग युग युगांतर से यह जो साधना कर रहे हैं और उनके यह जो देहावशेष है इस देहावशेष इस मिट्टी में मिले हैं बोलकर के इस मिट्टी की यह पवित्रता है। देखिए जब वो राक्षस का वध करना था वज्र बनाना है तो वज्र कैसे बनेगा? तो एक ऋषि की हड्डी चाहिए। उसमें से यह वज्र बनेगा। यह तभी एक भयानक शस्त्र बनेगा। तब दधीच मुनि को रिक्वेस्ट की गई और उन्होंने रिक्वेस्ट स्वीकार की इच्छा मृत्यु वरण किया और फिर उनकी हड्डियों में से यह अस्त्र बनाया गया। तो देखिए कि ऋषि मुनियों की ये जो हड्डियां है उनके ये जो देहावशेष है उसमें से आप क्या से क्या नहीं कर सकते। अमोघ अस्त्र बना सकते हैं। यहां पे ठाकुर के देहावशेष से अमोग आध्यात्मिक अस्त्र यह भारत की भूमि तैयार हुई है। इस भूमि पर यदि आप जब ध्यान करेंगे, साधन भजन करेंगे। खास करके जो हमारे तीर्थ क्षेत्र है वहां पर जाकर के तो आप देखेंगे कि आध्यात्मिक उन्नति कितनी स्पीडीली होती है। कितनी फटाफट करके होती है। महापुरुष महाराज ने एक बार कहा था कि सती के देह का एक-एक अंग जहां पर गिरा तो इतने सारे 51 51 शक्तिपीठ हो गए। आप सोच के देखिए श्री मां शारदा देवी का समग्र देह बेलूर मठ में अग्निदाह किया गया है। तो कितना बड़ा शक्तिपीठ बेलूर मठ है। तो महापुरुषों की देहावशेष उनकी अस्थियां उनकी यह भस्म चिता की भस्म यह जहांजहां पर भी जाती है वहांवहां पे जगह पवित्र हो जाती है। तो मां कहती है तीर्थ ने अपने को पवित्र करने के लिए ठाकुर के बाल मेरे हाथ में से छीन लिए। तो लक्ष्मी दीदी एक ने मस्तक मुंडन करिया छिले लक्ष्मी दीदी ने यहां पे मस्तक मुंडन करवाया था। श्री मां कोरेन मां ने यह करवाया नहीं। श्री माय हृदय तखन श्री श्री ठाकुर शहीद नित्य मिलनोत्सव चलिते श्री मां के हृदय में उस समय श्री श्री ठाकुर के साथ में नित्य मिलनोत्सव चल रहा है देखिए कितना सुंदर शब्द है नित्य मिलनोत्सव अर्थात मिलन उत्सव भगवान कृष्ण और श्रीमती राधा रानी उनका जब मिलन होता है तब उत्सव होता है और कैसा उत्सव नित्य जो कि कभी ऐसा नहीं कि जो कभी था नहीं ऐसा नहीं कि कभी रहेगा नहीं हमेशा था हमेशा है हमेशा रहेगा इस तरह का नित्य मिलनोत्सव शिव और शक्ति का मां के हृदय में चल रहा है एवं चर्म चक्ष्य मध्य मध्य ताहार शुभ दर्शन घोटते छ और चर्म चक्षु अर्थात कि यह जो बाह्य चक्षु है उसके द्वारा भी बीचबीच में ठाकुर के शुभ दर्शन प्राप्त हो रहे हैं। काफी घटनाएं हमने तो देखी। पहले ही दिन यह ठाकुर ने हाथ पकड़ करके कहा मां चिड़िया निकाल रही थी कि मैं मरा थोड़ी ना हूं कि मैं तो कि तुम जो है सधवा के यह चिन्ह अपने देह से निकाल रही हो। तो माने हृदय में तो नित्य मिलन उत्सव चल ही रहा है। यह जो बाह्य चक्षु जो है चर्म चक्षु चमड़ी के बने यह चक्षु उसके माध्यम से भी मां ठाकुर का दर्शन कर रही थी। शुभ दर्शन कर रही थी। ताई अलंकार त्याग जैमन संभव होए नाई केश त्यागो तेमनी संभव होयलो ना इसीलिए जिस तरह से मां का मां अलंकार त्याग संभव नहीं हुआ इसी तरह से केश त्याग भी संभव नहीं हुआ यही रूप देखिए अनफॉर्चूनेटली मां की जीवनी में हमने ऑलरेडी पढ़ा है इसको मां को तो पता है ना वह सब कितने सारे गहने पहनती थी वह जो नाक में नथ वगैरह काफी कुछ पहनती थी ठाकुर ने कहा है ना शारदा सरस्वती सेजन साजते बालोबा से शारदा सरस्वती वो है इसलिए उसको श्रृंगार करना अच्छा लगता है सजना धजना अच्छा लगता है तो मां तो यह सब अलंकार वगैरह पहन करके वहां पर रहती थी किंतु उस समय यह योगी गोलाप मां है उसने गोला माना कि ऐसे ही किसी ने ऐसा कमेंट किया और कमेंट ऐसा था कि ठाकुर है त्यागी तो मां क्यों इतने सारे गहने पहन करके रखती है तो फिर मां ने कुछ गहने तो ज्यादातर गहने तो उसी समय निकाल के बॉक्स में रख दिए किंतु फिर जब योगिन मां आई उन्होंने देखा कि मां ने गहने नहीं पहने हैं तो फिर उन्होंने कहा मां अरे लोग तो यह सब बोलते रहेंगे इस सब को आपको सीरियसली क्यों लेने की जरूरत है तो फिर मां ने कुछ गहने फिर से तो पहने किंतु उसी उसी के गंभीरानंद जी लिखते हैं कि मां को फिर किंतु सब गहने वापस पहनने का हुआ नहीं क्योंकि इमीडिएटली बाद में ठाकुर को कैंसर हो गया और उनको श्याम पुकुर ट्रीटमेंट के लिए ले जाया गया और फिर वहां से काशीपुर वगैरह तो फिर वो जो एक ऐसा दौर प्रारंभ हुआ कि फिर मां को मन ही नहीं हो होगा कि ठाकुर को कैंसर है इतना कष्ट है वह गहने पहनेगी बोलकर के वो जो ज्यादातर गहने मां ने निकाल के बॉक्स में रख दिए थे तो फिर वो वो बॉक्स में ही रहे। तो देखिए कि जिस पगले ने इस तरह का कमेंट किया है कि यह जगत जननी आध्या शक्ति शारदा सरस्वती लक्ष्मी स्वयं यह गहने धारण करके रहती है। लक्ष्मी के पास में से आप गहने ले लेंगे या कहेंगे कि आप गहने मत पहनिए। यदि लक्ष्मी गहने हीन हो जाएगी तो क्या है? जगत में से ही यह प्रोस्पेरिटी है। यह आनंद है। यह वेल्थ है। यह सुख, शांति, ऐश्वर्य है। जगत में से ही अदृश्य हो जाएगा। तो अच्छा है कि मां ने सब अलंकार त्याग नहीं किए थे। बोलकर के तो चूड़ियां तो मां ने पहन करके रखी थी। इसलिए यहां पे गंभीरानंद जी कहते हैं कि इसीलिए अलंकार त्याग माने मां के हृदय में ठाकुर के साथ में नित्य मिलनोत्सव चल रहा है और बाह्य चक्षु से भी उनके बीच-बीच में शुभ दर्शन हो रहे हैं। इसीलिए अलंकार त्याग जिस तरह से मां के लिए संभव हुआ नहीं। केश त्याग भी इसी तरह संभव हुआ नहीं।

ठाकुर की महासमाधि के बाद तीर्थयात्रा कर माँ कोलकाता वापस लौटती है

ए रूप तीर्थ दर्शन और ठाकुर साक्षात्कार आनंद लयाई त कोलकाता भक्त बोर बलराम बाबू गुरुहे पदार्पण करें इसी तरह से तीर्थ दर्शन और ठाकुर के साक्षात्कार का आनंद लेकर के ही उन्होंने कोलकाता में भक्तवर बलराम बाबू के घर में पदार्पण किया। देखिए यह जो तीर्थ दर्शन करना और फिर बात तो ऐसी थी गंभीरानंद जी जो आगे ही एक लॉजिक देते हैं कि मां कोलकाता से ले जाकर के तीर्थ क्षेत्र में ले जाना उसके पीछे का एक कारण यह भी था कि ठाकुर ने जहांजहां पर लीला की है मां कहां जहां पे भी जाए तो सब जगह तो ठाकुर की लीला हुई है बलराम बाबू के घर रहे वहां पर भी ठाकुर की लीला है दक्षिणेश्वर जाए तो वहां पर भी ठाकुर की लीला हुई है। जिस किसी भक्त के घर जाए बाद में मां कभी-कभी मास्टर महाशय के घर रही थी। तो जहां पर भी मां जाएगी तो ठाकुर की लीला का दर्शन या तो फिर उनको वो जो विचार तो आएंगे ही कि ठाकुर ने यहां पर यह किया था। इस तरह से वार्तालाप किया था। इस तरह से भजन गान किया था। हालांकि ठाकुर जब कोलकाता आते थे तब मां साथ में नहीं रहती थी। किंतु फिर भी मां को पता तो है ही है कि ठाकुर यहां पर आए थे। जय राम बाटी कामार पुकुर भी जदी जाएगी। तो भी तो ठाकुर वहां पर गए हैं। तो ठाकुर का यह जो अदर्शन से मन का विरह जो है थोड़ा सा शांत हो बोलकर के तीर्थ दर्शन के लिए ले गए। किंतु तीर्थ दर्शन में खास करके वृंदावन में यह विरह अग्नि और भी प्रचंड रूप से प्रगटित हुआ। किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर ने यह जो दर्शन परंपरा प्रारंभ कर दी थी तो दोनों तरह से बाह्य दृष्टि से भी ठाकुर के दर्शन होते थे। हृदय में भी ठाकुर के दर्शन हो रहे हैं। बोलकर के मां को अभी लग नहीं रहा है कि ठाकुर उनके जीवन से चले गए हैं। ठाकुर ने स्वरूप बदला है। कमरा बदला है। इस कमरे से दूसरे कमरे में गए हैं। प्रकट लीला में से अभी अप्रकट लीला कर रहे हैं। स्थूल देह में से सूक्ष्म देह में लीला कर रहे हैं। किंतु लीला जो है वो अभी नित्य है। मां को यह पक्का माने भीतर में कन्विक्शन हो गया था। देखिए बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि ये जो लोग है अवतार या सिद्ध महापुरुष कोई भी कार्य करते हैं लोगों को सिखाने के लिए कि यह लोग करेंगे तो लोग सीखेंगे। वो जो एक थे वहां पर वैष्णव संत तो ठाकुर उनको मिलने को गए। देखा कि वो माला घुमा रहे हैं। बड़ी उम्र है। आई थिंक 80 ईयर की प्लस उनकी एज थी। तो ठाकुर ने कहा कि आप इतनी उम्र हो गई है फिर भी आप नित्य नियमित माला क्यों घुमा रहे हैं? उन्होंने प्रश्न जो होता है एक आध्यात्मिक जिज्ञासु जो एक सीनियर साधक को प्रश्न करता है तो उन्होंने कहा वो क्या उत्तर दिया कि मुझे तो अपने लिए जरूरत नहीं है किंतु मैं माला घुमाता हूं इससे देखकर के दूसरे लोग सीखेंगे। तो यह जो बार-बार वो मैं कर रहे थे तो ठाकुर और फिर एक ठाकुर जाकर के जब बैठे थे उस समय एक साधु की बात चल रही थी वैष्णव समाज की ही जिसने कि कोई बुरा कार्य किया होगा तो यह कह रहे थे कि उसको वैष्णव समाज से निकाल दो तो यह जो बातें चल रही थी इसको निकाल दो इसको यह जजमेंट दे दो फिर मैं माला घुमा रहा हूं जिससे दूसरे लोग सीखे तो यह सब मैं मैं जो चल रहा था ठाकुर फटाक करके करके अपना सही स्वरूप प्रकट किए। ठाकुर कहते हैं ना जब यह भाव जब मेरे मन में आता है ना तब भीतर में से ही ही करके एक हास्य उत्पन्न होता है। म दैट वुड हैव बीन अ सीन वर्थ सीइंग ठाकुर ही ही करके हंस रहे हैं। कटाक्ष पूर्ण व्यंग और विनोद पूर्ण ये जो हास्य जो लोग अपने को तथाकथित धार्मिक कहलाते हैं। इस तरह के तथाकथित सिद्ध महात्मा इनकी ये जो भीतर का जो घमंड है वह जब पकड़ में आ जाता है तो ठाकुर के भीतर में से ऐसा एक हास्य प्रकट होता है और ठाकुर कहते हैं पंडित गुलो खड़कुटो बोध हो तो म पंडित वगैरह जो है अपने को बड़े-बड़े कहनाने वाले वो तुच्छ प्रतीत होते हैं तो ठाकुर में वो ठाकुर कहते हैं फिर वही भाव का आवेश हुआ फिर उसको सुनाया ये तुमको शर्म नहीं आती है इस उम्र में ये मैं करते घूमते हो वगैरह वगैरह जो ठाकुर का था किंतु देखिए कहने वाली बात थी कि ये जो मन मुख एक करना राइट जो मन में जो है वही मुंह पे बोलना ऐसा नहीं है कि मैं लोगों को दिखावा करने के लिए मैं यह सब कर रहा हूं कि ठाकुर शिव है मैं शक्ति हूं बोलकर के ठाकुर का तो निधन कभी होगा नहीं मृत्यु कभी होने वाला नहीं ठाकुर तो सत्य है नित्य है तो मेरा और ठाकुर का मिलन भी नित्य है बोलकर के मैं गहने पहन के रख रखो। यह कोई लॉजिकल कंक्लूजन नहीं था। मां को कन्विक्शन हो गया था कि ठाकुर नित्य है। नित्य उनकी लीला चलती रहेगी। नित्य मिलनोत्सव चलता रहेगा। यह कन्विक्शन होने के बाद में मां ने गहने पहन करके रखे हैं। नहीं कि बस एक तरह का दिखावा करने के लिए कि लोग समझे जिससे कि कि ठाकुर नित्य है और वगैरह-वगैरह दिखाने के लिए नहीं कन्विक्शन है बोलकर के मां ने यह गहने पहन करके रखे हैं। तो यह तीर्थ दर्शन और ठाकुर के साक्षात्कार का आनंद लेकर के ही मां कोलकाता वापस आई और फिर इसके बाद में अति

कामारपुकुर में माँ सारदा के तपस्या के दिनों का प्रारम्भ

कठिनाई के अति तपस्या के दिन प्रारंभ होते हैं जो कि हमको पता है जैसे ही मां कामारपुर जाएगी वैसे ही दो-तीन चीजें होती है। एक और ऑल ऑफ़ देम अनफ़ॉर्चूनेट अह कैसे हुआ ऐसा? वैसे मुझे भी समझ में नहीं आता कभी-कभी क्योंकि दो-तीन चीज़ में देखिए एक तो एक्सपेक्टेड था कि रामलाल दादा ने मां को इग्नोर करना शुरू किया। वो तो एक एक्सपेक्टेड था। किंतु फिर बाकी की जो चीजें हैं ना वह थोड़ी सी अनएक्सेक्टेड है। पहले सबसे पहला तो लक्ष्मी दीदी का देखिए कि लक्ष्मी दीदी मां के साथ में लंबा समय नहबत में रही है। मां का स्नेह प्रेम उनको प्राप्त हुआ है। ठाकुर का भी स्नेह प्रेम उनको प्राप्त हुआ है। किंतु यही लक्ष्मी दीदी ने मां को इग्नोर करना तो शुरू किया ही किया और साथ-साथ में ही परमेश्वरानंद जी आई थिंक वही श्री मां जय राम भाटी पुस्तक है उसमें वो लिखते हैं कि जब भी वो कभी-कभी वो कामरार पुकुर आती थी लक्ष्मी दीदी तो वहां पे मां ने वो जो सब्जी उगाती थी ना वहां पे बागान में तो सब्जी को क्या करेगी? यह पैर से उसको यह कर देगी, डिस्टर्ब कर देगी। जैसे कि सब्जियां उगे नहीं जो उगी हुई सब्जी है पैरों से नष्ट कर देगी। ऐसा सब करती थी। इसके पीछे का क्या कारण है? मुझे तो समझ में नहीं आता। इतना मां के प्रति द्वेष क्यों सही में बड़ा आश्चर्य की बात है। यह तो अनएक्सेक्टेड एक है। रामलाल दादा वाला तो एक्सपेक्टेड था ही था। अह अनएक्सेक्टेड एक लक्ष्मी दीदी वाला। दूसरा एक था कि भक्तों ने ठीक किया था कि मां को प्रत्येक महीने ₹1 करके देंगे। तो कार्यतः किंतु जब मां कामार पुकुर गई तो पैसा देना ऐसा संभव नहीं हो पाया। क्यों ऐसा हुआ वह पता नहीं है। किसने यह निर्णय लिया था कि मां को पैसा देंगे और फिर पैसा क्यों नहीं दिया गया? यह नाम वगैरह यह लोग लेते नहीं है। तो ठीक है। अभी क्या करें? किंतु ये ये तो एक था दूसरा एक अनएक्सेक्टेड। तीसरा एक था कि भक्त लोग जितने भी थे सभी जब ठाकुर की सेवा करना है तो सभी लोग वहां पर उपस्थित थे। किंतु जैसे ही ठाकुर चल बसे मां को अकेली छोड़कर के सब अपने कार्य में लग गए। किसी ने मां की खबर कामार पुकुर जाकर के ली नहीं। तो यह क्यों? वि इज अनदर एक आश्चर्य की बात है। ऐसा हो सकता है कि शायद उन्होंने मां को ऑफर किया होगा कि मां आप यहां पे कोलकाता में ही रह जाइए। हो सकता है बलराम बाबू के घर ना कि ऐसा कहीं पे किंतु ठाकुर ने स्वयं मां को कहा था बरम परो भाता होवा भालो पर घरो होवा भालो नहीं पर भाता दूसरों का भात खाना वो फिर भी ठीक है पर घरो अर्थात कि दूसरे के घर में रहना यह बिल्कुल ठीक नहीं है इसलिए सब समय क्या है कि आप एक तरह के ऑब्लिगेशन में रहेंगे एक तरह से नतमस्तक होकर के रहना पड़ेगा तो ठाकुर ने मां को कहा था जो कुछ भी करो कामार पुकुर में जो अपना घर है उसको कभी भी नष्ट मत करना। तो ठाकुर की ही यह बात सुनकर के मां कामार पुकुर गई थी। तो दैट इज वन थिंग। भक्त लोगों ने कामार पुकुर जाकर के मां की खबर पहले क्यों नहीं ली? वह आश्चर्य की बात है। तो और एक फिर जब आखिर में जब मां की दुरावस्था की बात फैलना शुरू हुई। एक दो भक्त गए थे एकआध साल के बाद में और फिर उन्होंने कोलकाता आकर के जो कहा तो यह सुनकर के सभी लोग एकदम डर गए थे कि अरे मां की यह परिस्थिति है ये गुरु भाइयों में से ही किसी ने कहा माय नटुक जुट तो ना ताऊ हमरा जानता ना जे माय नटुक जुटतो तो ना अह हमको यह पता नहीं था कि मां को भात के साथ में खाने के लिए नमक भी नहीं था मां के पास में ऐसी दरिद्र अवस्था में मां रहती थी तो गुरु भाइयों का तो स्पष्ट है कि साधन भजन रूपी वह एक अंतर जगत है उसमें उन्होंने डुबकी लगा दी थी अखंडानंद जी जैसे तो उन्होंने प्रवृजिया प्रारंभ भी कर दी थी तो उनकी तो एक बात है गृहस्थ भक्तों ने क्यों मां का पहले खबर नहीं लिया वि इज सरप्राइजिंग अल्टीमेटली ये कामरार फिर वैसे तो गृहस्थ भक्त त्यागी भक्त मिलकर के मां कोलकाता ले आए थे किंतु तो मां को पक्का पता था कि यहां पर परमानेंट नहीं रह सकते। बोलकर के मां कामार पुकुर वापस चली गई यह कामार पुकुर की तपस्या तभी समाप्त हुई जबकि यह श्यामा सुंदरी देवी मां की मां उसने कामार पुकुर जाकर के देखा कि उनकी बिटिया को पहनने के लिए ठीक से साड़ी भी वस्त्र भी नहीं है। वस्त्र में भी छेद है। उस छेद को साध करके सिलाई करके मां चला रही है। फटे वस्त्र पहन करके लक्ष्मी स्वयं वहां पे विराजमान है। तो फिर उनको उनसे देखा नहीं गया, सहा नहीं गया और फिर मां को लेकर के वह फिर से जय राम भाटी चली आई। तो यह जो कामार पुकुर के वो दिन उस दिनों का प्रारंभ अभी होने वाला है। और फिर हमने इस दूसरी बात को भी एक हमने डिस्कस किया था कि कामार पुकुर के एक तो ठाकुर का स्पष्ट आदेश था कि पर घरो होवा भलो ना। दूसरों के घर में रहना उचित नहीं है। तो कोलकाता में तो और किसी के घर नहीं रहती थी मां मतलब परमानेंटली शॉर्ट टाइम के लिए आएगी जाएगी। किंतु जय राम भाटी का तो खुद का घर है। तो वो तो एक अपने घर में वापस गई मां वो तो एक समझ सकते हैं। तो ठाकुर का यह तो आदेश था जिसको कि मां ने पालन किया है। किंतु एक दूसरी भी बात हमने पहले भी डिस्कस की थी। ठाकुर का एक इच्छा थी मन के भीतर में। ठाकुर ने कहा था लंबे बालों वाली बाल विधवा मैं एक साधिका बनना चाहता हूं। माने ठाकुर म सभी का एक रहता है ना कि मैं क्या होना चाहता हूं। मैं जब छोटा था मुझे एस्ट्रोनॉट होना था। अनफॉर्चूनेटली इंडिया का स्पेस प्रोग्राम था नहीं वो होने से भी मैं क्वालीिफाइड नहीं होता। सो दैट इज अनदर मैटर। किंतु हम सबका एक विज़न होता है कि हम क्या होना चाहते हैं? हमारा एंबिशन क्या है? तो ठाकुर ने कहा था कि मैं एक लंबे बालों वाली एक एक बाल विधवा एक छोटे से गांव में रहती है। मैं रहना चाहूंगी और फिर वहां पर एक छोटी सी कुटिया हो और मेरी संभाल रखने के लिए एक वृद्धा एक कोई एक स्त्री वहां पर रहती हो। तो जो बाहर के जो भी कार्य है खरीदना है यह करना है वो करना है मेंटेनेंस वगैरह ये वृद्धा स्त्री कर लेगी। ठाकुर कहते हैं मैं बस अपने कमरे में अपने किचन में भगवान कृष्ण के लिए अच्छे-अच्छे यह भोग वगैरह पायस वगैरह बनाऊंगी। फिर मंदिर का गर्भगृह का दरवाजा बंद करके कृष्ण को सब ऑफर करके ईश्वर को सब ऑफर करके मैं आकुल हृदय से व्याकुल हृदय से उनको पुकारूंगी और रोऊंगी। वहां पे एक गाय रहेगी। गाय का दूध वो पायस बनाने में रहेगा। छोटा सा सब्जी बागान होगा जो कि यह भगवान की यह भोग लगाने भोग बनाने के लिए सब्जियां वगैरह रहेगी। तो यह था ठाकुर का विज़ तो हो सकता है माने ठाकुर की एंबिशन तो हो सकता है कि ठाकुर की इस वासना को पूर्ण करने के लिए मां शारदा वहां पर कामार पुकुर रही हो। ये हमने एक बार डिस्कस किया था। तो जो भी है अभी यह अध्याय जो है चिर सिमतीिनी यहां पर समाप्त हुआ। इसके बाद वाला जो अध्याय है अभी हम कल से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु