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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 10 Oct 2023

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः गंभीरानंद जी महाराज लिख सतो कथा बोली ते गले उन शताब्दी मध भाग होई ते जद सच बात बताए तो 19वी सदी के मध्य भाग से लेकर के ए शताब्दी प्रथम भाग पर्यंत ए शताब्दी यानी कि यह 20 सेंचुरी में गंभीरानंद जी महाराज लिख रहे थे तो 1950 ना कि 1960 के आसपास के समय में तो यह 1850 से लेकर के 1950 का 100 साल का यह जो पीरियड है इस पीरियड के दरमियान थर्मे अधोगति जे मन सर्वा पेक्षा अधिक होया छ धर्म की अधोगति धर्म की अवनति जिस तरह से सबसे ज्यादा हुई है सर्वा पेखा होया छ सबसे ज्यादा हुई है शक्ति अवतरण तमनी सर्वोत्तम होया छ शक्ति का अवतरण भी उसी तरह सर्वोत्तम हुआ है जितनी गहन अधोगति है उतना ही सर्वोच्च शक्ति का अवतरण है मां का वो इंसिडेंट है हमको सबने मैंने पहले भी एक दो बार कहा था मां जयराम बाटी में थी और कहीं से एक समाचार आया न्यूज़ आया कि एक लोकल क्रांतिकारी था वहीं पर आसपास के गांव का तो पुलिस वाले उसको अरेस्ट करने के लिए उसके घर गए देखा कि वह क्रांतिकारी वहां पर नहीं है वोह लड़का तो नहीं है किंतु उसकी बीवी थी वहां पर उसकी धर्म पत्नी और वह सगर भा थी उसको बच्चा होने वाला था तो अभी पुलिस वालों ने क्या किया अभी यह क्रांतिकारी पकड़ में नहीं आया तो उसकी पत्नी को अरेस्ट करके ले गए अभी उस समय की मर्यादा के अनुसार स्त्रियों को जिस तरह से मर्यादा देनी चाहिए वह किसी पालखी वगैरह इस तरह से उसको ले जाया जाए जिससे कि वह उसको लोग उसको सामने में ना देख सके माने वोह क्या है पर्दा प्रथा का समय था अभी पर्दा प्रथा हमको पता है कि कितनी बुरी है इस तरह से स्त्रियों को सब समय मुंह छुपा के घूमना यह तो ठीक नहीं किंतु फिर भी उस समय की जो बात थी उसके अनुसार माने खुद ने वह सभी ट्रेडिशनल किया है और जिसको जो सम्मान प्राप्य है व तो देना ही चाहिए तो जिसको बंगाली में कहते हैं जान बाहन अर्थात कि स्त्रियों को ले जाने के लिए जो व्यवस्था होती है तो उसमें नहीं करके उसका हाथ पकड़ करके खुले बाजार में से घुमा कर के उसको पुलिस स्टेशन ले गए अभी यह बात जब मां के कानों में आई तो मां इतनी प्रचंड गुस्सा हो गई रुद्र स्वरूप धारण करके बोला कि अरे कोई लड़का वहां पर मर्द का बच्चा नहीं था जो कि पुलिस वालों को दो झापड़ मार के उस औरत को बेचारी को रिहा कराता उसको मुक्त करवाता क्या ऐसा कोई नहीं था वहां पे ऐसा करके माने ऐसा गुस्सा किया सब लोग बेचारे डर गए अरे ये तो मां जगदंबा स्वयं है वो तो गुस्सा करेगी तो क्या से क्या नहीं हो जाएगा किंतु फिर उस दिन तो इसी तरह से टेंशन में गया मां भी बार-बार बोल रही है कि अरे उस बेचारी का क्या होगा इस तरह से फिर शाम को फिर समाचार आया कि उस औरत को जिनको पुलिस वालों ने अरेस्ट किया था उसको रिहा कर दिया है उसको मुक्त कर दिया है तब कहीं जाकर के शाम को मां ने चैन की सांस ली शाम को मां ने सुकून की सांस ली और फिर क्या कहा कि देखो क्वीन विक्टोरिया मां क्वीन विक्टोरिया का नाम लेती है कहती है जब तक क्वीन विक्टोरिया के पुण्य थे तब तक यह ब्रिटिश राज चला किंतु अभी विक्टोरिया के पुण्य क्षय हो रहे हैं अभी यह ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है तो देखिए मां ने खुद ऐसा कहा था कि भारत में जो आक्रमण हुआ भारत जो गुलाम हुआ उसके पीछे हमारा खुद का जो सिविलाइजेशनल एक क्या कहेंगे अ एक गलती तो होगा ही होगा नेहरू जवाहरलाल नेहरू ने एक बहुत बड़ा किताब लिखा है डिस्कवरी ऑफ इंडिया तो उसमें उसका कंक्लूजन है कि सिविलाइजेशन जो उसका डिटेन होता है या कोई भी सभ्यता का जब विनाश होता है तो बाह्य आक्रमण उसके लिए जितना रिस्पांसिबल है जितना जवाबदार है उससे कहीं ज्यादा उसके भीतर की कमियां उसके भीतर की इंटरनल वीकनेस उसके खुद के विनाश के लिए ज्यादा रिस्पांसिबल है तो अभी भारत में क्या दुर्गुण थे धर्म में सब प्रवेश कर गए थे इसके बारे में विस्तार से गंभीरानंद जी महाराज ने भी चर्चा की है स्वामी जी ने भी कहा है 10 साल की बच्ची को शादी करवा के उसका गर्भाधान करवा देते हो यह हम इस चीजों में हमारी बहादुरी है ऐसा करके स्वामी जी ने अपने पत्रों में लिखा है इतना नाराज होकर के लिखा है तो फिर किंतु स्वामी जी खुद कहते हैं कि देखो यह जो सब दुर्गुण या कुप्रथा एं भारतीय समाज में प्रवेश कर गई उसका यह भी एक कारण था कि 1000 सालों का यह जो विदेशी आक्रमण हमारी भूमि पर था तो उसके लिए हमको इस तरह से अपने को अपने स्त्रियों की मर्यादा की रक्षा करने के लिए यह पर्दा प्रथा का हमको यह इस्तेमाल करना पड़ा तो जो भी रीजन हो अभी हिस्टोरिकल किंतु 1850 आते-आते भारतीय समाज की इतनी दयनीय परिस्थिति हो गई थी स्त्रियों की खास करके पहली बात तो है कि बाह्य समाज बाहर में जब जाएंगी बाहर तो उनका कोई राइट है ही नहीं है किंतु यह जो संयुक्त कुटुंब प्रथा थी उसमें कहीं जाकर के स्त्रियों को थोड़ा सा एक एक नरिच मेंट मिलना चाहिए एक इनकरेजमेंट मिलना चाहिए एक फ्रीडम मिलना चाहिए एक उनको एक एनवायरमेंट मिलना चाहिए कि जहां पर वह अपनी टैलेंट को डेवलप कर पाए किंतु यह संयुक्त कुटुंब प्रथा भी धीरे-धीरे करके इतनी जड़ हो गई थी रूढ़िवादी हो गई थी एक तरह से थोड़ी सी क्रूर हो गई थी कि स्त्रियों का वो डेवलपमेंट उनके मन की जो मुक्त गति जो है वह वहां पर भी कुंठित हो गया था तो यह जो 100 साल का पीरियड है 1850 से लेकर के 1950 का गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि 19वीं शताब्दी के मध्य भाग से लेकर के 20वीं शताब्दी के मध्य भाग तक का यह 100 साल का पीरियड भारतीय समाज हिंदू समाज के लिए प्रचंड अधोगति का का वो एक पीरियड था समय था तो साथ-साथ में ही महाराज क्या कहते हैं कि यह हिंदू समाज यह भारतीय सभ्यता यह अपना भारतवर्ष इसके ऊपर तो ईश्वर का स्वयं आशीर्वाद है वह थोड़ी ना भारतीय समाज को इतना आसानी से नष्ट हो जाने देंगे विनाश हो जाने देंगे और वह बैठे-बैठे देखे देखते रहेंगे ऐसा कभी नहीं होने वाला है तो ईश्वर स्वयं भगवान नारायण स्वयं और मां आध्याय शक्ति स्वयं इन दोनों ने जन्म ग्रहण किया भारत की भूमि के ऊपर में और साथ में ही महाराज क्या कहते हैं जितना गहन अधोगति हुआ था जितना गभीर क्षय हुआ था उतना ही उन्नत उतना ही स सर्वोच्च सर्वश्रेष्ठ शक्ति का अवतरण था यह अवतार वरिष्ठा जो स्वामी जी ने कहा है वो वैसे ही नहीं कहा उस समय यह कृत युग अर्थात कि सत्य युग देखिए ना कि द्वापर युग देखिए ना कि त्रेता युग देखिए उस समय फिर भी भारतीय समाज हमारा हिंदू धर्म हमारी वैदिक संस्कृति हमारे उपनिषदों के आदर्श फिर भी समाज में वर्तमान थे लोग उसको ग्रहण कर करते थे भारत एक मुक्त राष्ट्र था इसके लिए जब भगवान राम भगवान कृष्ण इन लोगों का जब एक के बाद एक अवतरण हुआ इनको ऑलरेडी जिस समाज में धर्म है उस धर्म को थोड़ा सा बुट अप करना था किंतु जब भगवान रामकृष्ण का अवतरण हुआ इस समय परिस्थिति संपूर्ण रूप से विपरीत थी भारतीय समाज में धर्म सिर्फ एक कथ और कथा एक बातों बातों में धर्म रह गया था एक छिछराना धर्म के नाम पर विधियां आचार व्यवहार वह सब होते थे किंतु धर्म हृदय के भीतर में जाकर के मन को परिवर्तित करता और फिर जो धार्मिक जिनको जिनके भीतर में जिनके हृदय में ईश्वर का अवतरण हुआ है ऐसे संत महात्मा समाज को जाकर के परिवर्तित करते यह होना हो गया था लोगों का हृदय कुंठित हो गया था और कुंठित लोगों की अ संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से हमारा समाज भी संकुचित हो गया था तो ना ही समाज का डेवलपमेंट हो रहा था ना ही मनुष्य का खुद का आध्यात्मिक डेवलपमेंट हो रहा था और इन दोनों की वजह से इन दोनों के आधार पर जो खड़ा रहता है वह है राष्ट्र राष्ट्र भी हमारा एक के बाद एक पराजय के सामने ने वो विवश होता जा रहा था इसीलिए भगवान रामकृष्ण देव जब आए उनके सामने इतना विराट कार्य था नहीं मात्र देश को उन्नत करना है देश को आजादी देना है समाज को उस उसकी यह जो उसके ऊपर में अंधश्रद्धा की जो पकड़ है उसके गले में यह जो राक्षस अ अंधश्रद्धा रूपी इसके सर पर सवार हो गया है उसको हटाना है किंतु मनुष्य का हृदय जो कुंठित हो गया है उसको भी कुंठित हृदय के भीतर में सच्ची सच्ची भक्ति का पद्म प्रस्फुटित करवाना है तो यह प्रचंड कार्य करने के लिए रामकृष्ण देव और मां शारदा देवी का अवतरण हुआ और कार्य इतना विराट था उनके सामने तो सामने जो शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ वह प्रादुर्भाव भी इतना ही प्रचंड था महाराज जी आगे कहते हैं देवी गुरु मातृ ज्ञाने ए शक्ति पुजार भीतर दयाई देवी गुरु और मातृ और मां यह तीन गुण जिनके भीतर में अवस्थित है ऐसी मां शारदा देवी की पूजा के माध्यम से ही नवीन सभ्यता भित्ति पत्तन होई बे नवी सभ्यता जो है नवीन ता उसका आधार स्तंभ रखा जाएगा उसकी नीव खोदी जाएगी उसका फाउंडेशन डाला जाएगा यह मां के भीतर में तीनों गुणों का एक साथ में अवस्था इसके बारे में हमने पहले भी डिस्कस किया है ऐसे कितने ही उदाहरण है जो कि हमको देखने को मिलेंगे एक एक और देखेंगे तो यह जितने भी लड़के हैं ये कोआलपाड़ा के लड़कों की खास करके रेमसंस पढ़ने से हमको बड़ा ही मजा आता है क्यों है कि एक तो थोड़े बहुत तो थोड़े बहुत क्या ऐसे तो पढ़े लिखे हैं तो क्या है कि वे अच्छे से मां का जो मां की जो घटना वली है उसका वर्णन कर पाते हैं यह तो एक है किंतु कलकत्ता में जैसे पढ़े लिखे लड़के होते हैं किंतु उनका जो माइंड सेट होता है ना वो बड़ा ही वो थोड़ा सा एक क्या कहेंगे एक संशय संदेहाम हो जाता है एक स्केप्टिसिजम उनके भीतर में आ जाता है कलकाता के मतलब जो कि बड़े शहर के लड़के होते हैं जबकि ये तो ल लड़के थे गांव के तो गांव का एक सरल व्यवहार होता है सरलता जो होती है मां के ऊपर में एक सहज विश्वास आ जाना मां जो कहती है व वो बात को इमीडिएट ग्रहण कर लेना यह सरलता इन लोगों में थी तो एक बार एक घटना का वर्णन वरदा महाराज ना कि कौन कर रहा है मैं भूल गया तो जो भी है यह महाराज जी मां के सेवक थे वो वर्णन कर रहे हैं कि क्वाल पाड़ा में बैठे थे अभी ऐसा था कि राधु का संतान होने वाला था वोह सगर्भंगा एक उसने कहा उसको कोलकात्ता ले गए थे अच्छी ट्रीटमेंट मिल पाए कोई भी कॉम्प्लिकेशन हो तो डॉक्टर अच्छे वो वहां पर उपस्थित और ट्रीटमेंट कर पाए किंतु उसने जीद ले ली कि मैं कलकाता नहीं रहूंगी मैं जाना चाहती हूं गांव में तो उसको गांव में लेकर आए जब कोआलपाड़ा आए तो कोआलपाड़ा में हमको पता है कि मां के रहने के लिए वहां पर एक अलग से जगदंबा आश्रम की स्थापना की थी केदार बाबू ने तो वहां पर इतना सुंदर शांत और एक एकांत एरिया था किसी भी तरह का हल्लागुल्ला नहीं और मां के जो भक्त हैं और मां के जो संगी निया है वही वहां पर रहेंगे जो मां के साथ में रहती थी वही लोग वहां पर रहेंगे तो अब वहां पर जाने के बाद राधू को लगा कि अरे देखो यह तो बहुत शांत जगह है मैं यहीं पर रहना चाहती हूं अब मां ने कहा अरे देखो तुम तो कलकाता से यहां पर आए हैं अभी और भी तुम यहां जंगल में रहना चाहती हो तुम्हारे लिए डॉक्टर वगैरह का जब व्यवस्था करनी पड़ेगी कौन यहां पे आएगा किंतु अभी राधू तो पता है उसका माइंड किस तरह से काम करता था वो जीद ले ली कि बस मुझे कोल जगदंबा आश्रम में ही रहना है तो मां ने कहा अच्छा ठीक है यहीं पर रहते हैं तो फिर हां ये वरदा महाराज ही थे तो वरदा महाराज उस समय जयराम बाटी में रहते थे क्योंकि जयराम बाटी में तो किसी को काम करना पड़ेगा वहां पर तो मां का संसार है तो मां ने वरदा महाराज को कहा देखो वरदा तुम भले दिन भर जयराम बाटी में रहो किंतु रात होने से तुमको यहां पर क्वाल पाड़ा चले आना है और रात मेरे साथ में ही यहां पर रहना है देखो तो यह तो एक जंगल है और फिर सभी औरतें मां के साथ में तो औरत ही रहेगी कोई पुरुष तो मां के साथ साथ में एक वो आश्रम में थोड़ी ना रह पाएंगे यह तो उचित नहीं है और वरदा महाराज तो बच्चे जैसे थे मां तो अपने बच्चे की तरह ही उनको देखती थी तो वो वहां पर रहने से उनको पुरुष दृष्टि से नहीं देखेंगे बच्चे की तरह ही देखेंगे तो बोले तुम यहां पर रात को तो तुम यहां पर आकर के ही रहना होगा मुझे भी तो किसी का सहारा चाहिए अकेली जंगल में तो वरदा महाराज कहते हैं ठीक है फिर वरदा महाराज उस सब दिनों का वर्णन जो करते हैं वो इतना सुंदर वो वर्णन है सब वो क्वाल ा चले आएंगे जयराम बाटी से रात को फिर मां वहां पे वो थोड़ी खुली जगह है वहां पर सुंदर खुली जगह है तो वहां पे वो एक खाट डाल कर के एक वहां पे वो बैठेगी और महाराज जी सामने वो जमीन के ऊपर में मां के सामने बैठेंगे फिर मां के साथ में सब तरह की बातें चलती रहेगी और उतना सुंदर अभी गांव का एटमॉस्फियर तो आपको पता है कि किसी भी तरह का पोल्यूशन नहीं किसी भी तरह का घूघाट नहीं किसी भी तरह का कोई भी डिस्टरबेंस नहीं सुंदर रमणीय वातावरण और शुद्ध हवा शुद्ध वायु वहां का पानी शुद्ध सब कुछ सुंदर वातावरण और वहां पर खुले आसमान में तारे और चांद है चांद और सितारों से भरा हुआ खुला आसमान उसके नीचे में वो मां के साथ में बैठे हैं गप लगा रहे हैं जो भी दुनिया भर के वो जो भी बातें करते हैं तो कितना सुंदर वातावरण बनता होगा तो वहां पर अभी एक दिन मां ने कहा कि अच्छा वो एक पगला है ना वो इसी पास के गांव में रहता है तो मैंने मुझे ऐसा लगा कि सपना देखा ना कि क्या हुआ मैं एग्जैक्ट भूल गया मां ने कहा कि मुझे ऐसा लगा कि वह पगला यहां पर आ रहा है तो अभी वरदा महाराज सोचते हैं कि अरे मां उस पगले की बात अभी इस समय कहां करती हो ये जहां पे सब औरतें ही रहती है वहां प इस तरह का कोई एक पागल आदमी यदि उसका चरित्र चाहे बुरा न भी हो वो भी जब आकर के हल्ला मचाए तो किस तरह का एक परेशानी खड़ी हो सकती है हम समझ सकते हैं तो ऐसी कुछ बातें ही करते थे वो पागल आदमी वहां पर आकर उपस्थित हो गया और अब क्या सब उटपटांग बातें करने लगा तो अभी क्या है वैसे ही तो राधू बीमार है और यहां पर यह जद हल्ला मचाएगा तो फिर क्या क्या ना हो जाएगा और फिर सब औरतें भी मां के साथ में रहती थी थोड़ी सी भयभीत हो गई तो मां ने उसको शांति से कहा बेटा तुम अभी यहां से जाओ और अभी तुम्हारी यहां पर जरूरत नहीं है बाद में आ तो ऐसा जब मां ने शांति से दृढ़ता पूर्वक कहा वो पागल वहां से चला गया तो अभी इस घटना के कुछ दिनों के बाद में देखा कि मां ने सोचा कि अरे यह जंगल है यहां प ये भालू वगैरह आते हैं कि नहीं आते तो अभी वर्धा महाराज थोड़े से डर गए वो वरदा महाराज ने बोला मां तुम जो भी बोलती हो वह सच हो जाता है उस दिन वोह पगले की बात की थी तो पगला आ गया अभी भालू की बात कहां कर रही हो इस जगह प कभी भालू आता नहीं है किंतु अभी भी तुम बोलोी तो पता नहीं क्या हो जाएगा भालू आ भी जाएगा दिन में यहां पर औरत ही है भालू आ गया तो कितना बड़ा मतलब वो मतलब क्या से क्या ना हो जाएगा तो अभी सही सही दूसरे दिन पता चला कि पास के गांव का एक चौकीदार है अंबिका उसका नाम उसकी सास को उसकी मदरिन लो को व भालू आ कर के पकड़ के ले गया और उसका उसको खा गया तो दूसरे दिन महाराज बोलते हैं देखो मां तुम ने बोला तो इस तरह से हो गया यहां पर कभी भालू आते हुए नहीं देखा तुमने बोला तो आ गया तो मां बोलती है अरे पता नहीं देखो क्या हो गया है मेरे साथ में जो बोलती हूं वो हो जाता है तो ये देखिए कि ये कितना सुंदर मानवीय स्वरूप है मां का व जब वरदा महाराज इस तरह से वर्णन करते हैं एक दिन पता चला कि एक ज्योतिषी वहां पर आया है तो ज्योतिषी ने अभी वो उसके में उसमें अभी ज्योतिष शास्त्र एक ऐसा शास्त्र है कि उसका नाम लेकर के लोगों को ठगने वाले लोगों की कमी नहीं है मतलब ज्यादातर जो लोग ज्योतिष का नाम लेते हैं ज्योतिष का बिजनेस करते हैं वे लोग ठग ही होंगे ऐसा मेरा खुद का पर्सनल धारणा है किंतु जो भी है यह लड़का जो वहां पर उस दिन आया था उसके पास में सही सही ज्योतिष का ज्ञान था और यह जब वह आया तो यह माखू दी है नलिनी दी है इन लोगों ने बोलना शुरू कर दिया कि अरे हमारे हाथ देख कर के बोलो तो क्या होने वाला है तो अभी उसने हाथ देख कर के बोला तो कहा वो माकू उस समय उसको बच्चा होने वाला था उसको भी बच्चा होने वाला था तो उसने कह दिया कि इसका बच्चा ज्यादा दिन रहेगा नहीं तो अरे ना उसको बच्चा ऑलरेडी हो चुका था तो अभी य उसने जब ऐसा कहा कि यह बच्चा ज्यादा दिन जिएगा नहीं सब लोग इतने परेशान हो गए मां भी बेचारी टेंशन में आ गई जब जाकर के उस लड़के ज्योतिषी को बुलाया और बोला कि अरे भाई तुमको यदि इस तरह से तुम्हारे ज्योतिष शास्त्र में कोई दिखता था तो तुमको तो आकर के मुझे बताना था जाकर के लड़कियों को क्यों बेचार हों को इस तरह से बता दिया देखो वो बेचारी परेशान है चिंता में पड़ गई है कितनी भयभीत हो गई है अभी तुम्हारे ज्योतिष शास्त्र में इसका जो भी विधान है इसको काटने के लिए यह दुर्य जो है उसको काटने के लिए जो भी करना पड़े वो तुम करो ऐसा करके मां ने कहा कि देखिए कि अभी वो ज्योतिष वाला लड़का उसने सब कुछ विधि स्वस्थ यान यह सब किया तो सही किंतु माक दी का लड़का सही में कुछ दिनों के बाद में वो उसका मृत्यु हो गया तो अभी उस समय की जो पूरी घटना वली है उस समय का जो पूरा चित्रण है वह जो महाराज जी हमारे लिए अंकित करते हैं इतने सुंदर शब्दों से इतने सरल शब्दों से वो देख कर के पता चलता है कि वो लड़की के लिए मां के मन में कितना प्रेम कितना सहानुभूति कितना दर्द है और उसके लिए वह कितनी वो जब उस समय वो समाचार मां के पास में आया कि माकू दी का लड़का का मृत्यु हुआ है जयराम बाटी में मां उस समय लपाड़ा में थी तो मां जैसे बिल्कुल गांव की एक औरत उस जिसने अपने बच्चे को खोया है वो जैसे डाक मने बंगाली शब्द है डाक वो चिल्ला कर के रोएगी वैसे ही मां ने चिल्ला चिल्ला करके रोना शुरू कर दिया जैसे कि उसका हृदय पूर्ण भग्न हो गया हो चूर्ण विचूर हो गया हो इस तरह से मां ने रोना शुरू कर दिया बाकी सब लोग देख रहे हैं अरे यह श्री जगदंबा स्वयं एक लड़के के लिए इस तरह से रो रही है फिर कहीं जाकर के मां का रोना धोना समाप्त हुआ दोपहर ढल चुकी थी शाम हो गई थी मां ने पूछा कि अरे किसी ने भोजन किया है तो जो मां की सेविका थी उसने कहा मां आप खुद यदि भोजन नहीं करेगी तो हम लोग कैसे करेगी तो मां ने कहा ठीक है चलो मैं मैं भी भोजन करती हूं और सब भी भोजन करते हैं तो देखिए ये जो वर्णन जब हम पढ़ते हैं दोनों चीजें हम एक के साथ एक के बाद में एक करके देखते हैं एक लड़का क्रांतिकारी लड़का वहां पर आया अभी उस समय सरकार की बड़ी तीक्षण नजर थी कि कोई भी क्रांतिकारी वहां पर आने से क्वाल पाड़ा जयराम बाटी में पुलिस वाले आएंगे और गुप्तचर विभाग के लोग और उस लड़के का नाम और एड्रेस लिख कर के जाएंगे तो यह सब होने की वजह से मां के साथ में जो सब साधु स्वा महाराज जी जो रहते थे जो सेवक जो थे उन्होंने ठीक किया था कि कोई भी क्रांतिकारी लड़का आने से वहां पर कोआलपाड़ा जयराम बाटी में उसको रहने की व्यवस्था नहीं करें यदि उसको रहना है तो आसपास के किसी गांव में रहे आकर के मां को थोड़ी क्षणों के लिए मिलकर के चला जाए ऐसा ठीक हुआ था था तो एक क्रांतिकारी लड़का मां के पास आया और उसने मां को बड़ी ही हृदय की विनती मां के सामने प्रकट की कि मां मुझे दीक्षा दो अभी मां तो थोड़ी परेशान हो गई देखो यहां पे तो इस तरह से पुलिस आती है हमको भी परेशान करेगी तुमको भी करेगी तो अभी क्या करे फिर वरदा महाराज को कहा वरदा इसको कहीं पर रहने की व्यवस्था कर दो और कल सुबह को अर्ली मॉर्निंग इसको मेरे पास ले आना तो वरदा महाराज ने जहां पे आज क्वाल पाड़ा आश्रम है वो स्कूल स्कूल था उस समय वहां पर जहां पर क्वाल पाड़ आश्रम की शुरुआत की थी मुझे पता नहीं कि अभी वही स्कूल अभी आज का आश्रम है वह मुझे पता नहीं अनुमान करके कह रहा हूं शायद वही होगा तो जो भी है तो व जहां पर उस समय का क्वाल पाड़ा आश्रम था उसी स्कूल भवन में उसके रात को रहने की व्यवस्था कर दी भोजन की व्यवस्था भी अपने घर से भोजन लाकर के उसको करवा दिया और सो अर्ली मॉर्निंग उसको बताया कि मां जब जाएगी इस रास्ते से मैं लेकर जाऊंगा तुम वहां पर आकर के उपस्थित रहना अभी वो सुबह को मां वरदा महाराज के साथ में जा रही थी तो रास्ते में वह आया सामने आकर के खड़ा रहा मां को पूरा साष्टांग प्रणाम किया तो मां ने कहा कि अच्छा उसको तो दीक्षा देनी है वो भी रास्ते में ही तो अभी अर्ली मॉर्निंग है वैसे कोई है नहीं तो अभी क्या करें तो मां ने कहा वरदा को अच्छा एक काम करोगे आश्रम से जाकर के आसन ले आओगे बैठने के लिए तो वर्धा महाराज कहते हैं हां थोड़ी अपेक्षा कीजिए मैं आसन लेकर आ हूं तो मां ने फिर कहा अरे नहीं नहीं रहने दो आसन वैसे ही जमीन पर थोड़ा सा स्वच्छ करके मां और लड़का बैठ गया और वहीं पर मां ने उसको दीक्षा दे दी और फिर लड़का बड़ा ही खुश होकर के अपने घर चला गया तो ये गुरु का भाव और यह मानविका भाव मातृ भाव ये दोनों मां के भीतर में साथ-साथ में अवस्था करते हैं एक ही दिन में ऐसा होगा कि कितने ही लड़कों को मां ब्रह्मचर्य दीक्षा देती है सन्यास दीक्षा भी देगी कितने भक्तों को मां मंत्र दीक्षा भी देगी और साथ में ऐसे घर के जितने भी घटना वली है जो परिवार में होती रहती है जो संयुक्त कुटुंब में सब चलता रहता है सब कुछ मां को देखना है सहन करना है और उसका कोई निराकरण भी कर देना है कोई भी समस्या होने से मां को उसका निराकरण करना है राधु के बारे में राधु बहुत बीमार रहती थी वही क्वाल पाड़ आश्रम की ही बात है तो अभी क्या करें तो अभी मां तो बच्चे जैसा स्वभाव एकदम हो गया था तो बच्चे जैसी तरह से मां किसी किसी ने मां को बोला कि राधू के सर पर यदि बर्फ रखा जाए तो अच्छा रहेगा तो मां बड़ी ही खुश खुश होकर के मां ने कहा अरे ठंडे पानी का जुगाड़ करो बर्फ का जुगाड़ करो और फिर वो राधू सुई है मां बिल्कुल बच्ची की तरह आकर के उसके सर पे वो ठंडा पानी से वो वो जो गमछा होता है ठंडे पानी में डाल कर के राधू के सर पे लगा रही है ना कि बर्फ खिस रही है बिल्कुल छोटी बच्ची जैसा व्यवहार मां का कि खुश खुश होकर के हां अभी मेरी बच्ची बच जाएगी उस समय काली मामा आए कल जयराम बाटी से तो काली मामा ने देख कर के कहा अरे मां ये क्या कर रही दीदी वो काली मामा तो मां के छोटे भाई थे तो मां को बोल र अरे दीदी ये क्या कर रही हो इससे तो राधू को ठंडी लग जाएगी ये तुम सोच के थोड़ा सा तो सोच समझ के किया करो कोई भी कुछ भी बोलता है तुम उसको ये करना शुरू कर दे हो उसको मां का ऐसा था कोई भी कुछ भी बोलेगा वोह ब्रह्म वाक्य बोल कर के हां हां ऐसा ही करना है एक समय था जयराम बाटी में भोजन व्यवस्था करने का समय आया तो उस समय क्या था कि ब्राह्मण भोजन करवाना है तो ब्राह्मण लोगों का तो मतलब उस समय गुमान कहो ना कि घमंड कहो वह भी बड़ा रहता था तो ब्राह्मण भोजन चल रहा है तो एकाएक देखने में आया कि ये वरदा महाराज ना का कोई वहां पर वो ये सर्विंग कर रहे हैं पर्यवेक्षण कर रहे हैं अभी ब्राह्मण लोगों ने देखा कि अरे यह लड़का तो ब्राह्मण नहीं है वो हम ब्राह्मण लोगों को सर्विंग कर रहा है यह कैसे चलेगा यह तो बड़ा ही अत्याचार हो गया बड़ा ही अनाचार हो गया ऐसा करके सब ब्राह्मण लोग खड़े हो गए बोला हम लोग यहां पर भोजन नहीं करेंगे बीच भोजन हम भोजन त्याग करके चले जाएंगे अभी ब्राह्मण लोगों को इकट्ठा करके भोजन करवाना और फिर यदि बीच भोजन वे लोग चले जाए तो कितना बड़ा पाप यजमान को होगा बेचारी इतनी परेशान हाथ जोड़ कर के सबको विनती कर रही है अरे बैठ जाइए बैठ जाइए हमारी गलती हो गई हम लोग फिर से ऐसा नहीं करेंगे इतनी दयनीय भाषा में तो यह वर्णन जो है मैं जब पढ़ रहा था यह घमंडी ब्राह्मण जिन लोगों का कोई तपस्या नहीं है कितने अनाचार दु दु ये करते होंगे दुष्टा चार पता नहीं किस तरह का इनका चरित्र होगा ये मां स्वयं बेचारी दो हाथ जोड़ कर के बिनती करती उनके सामने घूमती है कि हां आप बीच भोजन चले मत जाइए खड़े मत हो जाइए भोजन समाप्त कीजिए हम ब्राह्मण लोगों से सर्विंग करवाएंगे तो यह वर्णन पढ़ कर के हमको इतना गुस्सा भी आता है कभी-कभी क्या अरे मां के पास में इस तरह से इन लोगों ने क्षमा मंगवाई यह तो बड़ा ही अत्याचार हो गया भाई इन ब्राह्मण लोगों का बहिष्कार करना चाहिए यह वह अपने मन में इतने कितने ही विचार आ जाएंगे किंतु देखिए मां का जन्म आध्या शक्ति जगदंबा का जो पृथ्वी पे अवतरण है वह किसी हमारी हिंदू धर्म को तोड़ने के लिए नहीं बना हिंदू धर्म में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है तो यह सर्वोच्च स्थान से ब्राह्मण को पदच्युत नहीं कर देना है ब्राह्मण का अपमान नहीं करना है किंतु जगत के सामने सही सही ब्राह्मण क्या है उसका आदर्श दिखा के जाना है मां और ठाकुर दोनों ही ब्राह्मण थे और मां के पिताजी माताजी ठाकुर के माताजी और पिताजी ठाकुर और मां की बात तो छोड़ ही दीजिए किंतु यह चंद्रा मणि देवी है या तो फिर इनके पिता जी ये जो भी है ये इनका वर्णन हम पढ़ेंगे तब हमको लगेगा कि देखिए कि सही सही ब्राह्मण कैसा होता है और इस तरह से सत चरित्रवान लोग ही ब्राह्मण कहलाने के लायक है तो ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण का अपमान करना है अ अवगणना करनी है सही ब्राह्मण क्या है उसका आदर्श स्थापित करके जाना है तो ऐसे कितने ही प्रसंग हमको मां और मां के जीवन में मिल जाएंगे एक तरह प मां है मानवी है और दूसरी ही और देवी है और गुरु है तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु