मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र इसका हम पाठ कर रहे हैं। स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चीर सीमंतिनी चीर सद्भा यह चैप्टर हमारा चल रहा है। हमने ऑलरेडी देख लिया कि ठाकुर के अंतर्ध्य का समय आ चुका है। लीला संवरण की ओर उनका जीवन आगे बढ़ रहा है। ऑलरेडी जो साइंस जो लक्षण ठाकुर ने कहे थे कि यह जब लक्षण देखोगे तो समझना कि अभी इस मर्त्य लोक में मैं ज्यादा दिन नहीं हूं। तो वह लक्षण हमने ऑलरेडी देख लिए हैं कि जबकि जिस तिस के हाथ से ठाकुर खाएंगे कोलकाता में रात्रिवास करेंगे और और किसी को खाने का अग्र भाग देकर के बाद में वह भोजन करेंगे। यह तीन लक्षण ठाकुर ने जो मां को कहे थे ऑलरेडी दक्षिणेश्वर में रह के रह के ही यह तीनों लक्षण मिल चुके थे और हमने कल देखा विस्तृत रूप से कि किस तरह से ईश्वर को सिर्फ मूर्ति के भीतर में नहीं ईश्वर को सिर्फ अपने हृदय के भीतर में नहीं सर्वभूत में ईश्वर दर्शन जब प्रारंभ होता है तब यह तीन लक्षण आकर करके उपस्थित होते हैं ठाकुर के जीवन में। तो यह भी एक है कि साधना की चरम समाप्ति। ठाकुर ने जैसे कहा शरद महाराज लीला प्रसंग में कहते हैं कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो फिर सर्व सभी के भीतर में आत्म साक्षात्कार आत्मदर्शन यह जब परिस्थिति आन खड़ी होती है तब साधक अपनी साधना के सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुंच गया है और फिर इसके बाद में फिर लीला अवसान ही नेक्स्ट स्टेप स्टेप है महासमाधि ही नेक्स्ट स्टेप है तो उस महासमाधि की ओर तीनों लक्षण मिल रहे हैं। ठाकुर महासमाधि की ओर आगे बढ़ रहे हैं। और
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "घर घर मेरी पूजा होगी"
फिर एक चतुर्थ लक्षण भी ठाकुर ने मां को कहा था कि जब बहुत सारे लोग इसको अर्थात अपनी ओर इशारा करके कि इसको देवता के रूप में पहचानते हैं, पूजा करते हैं, स्वीकृत करते हैं। तब समझना कि अभी लीला अवसान बहुत ज्यादा देरी नहीं है। तो वह लक्षण भी मिल गया। हमने देखा कि किस तरह से दक्षिणेश्वर में कुछ भक्त गए। ठाकुर वहां पर नहीं थे क्योंकि ठाकुर ट्रीटमेंट के लिए ऑलरेडी काशीपुर आ चुके थे। तो फिर उन्होंने ठाकुर के फोटो के सामने ही यह भोग निवेदित करके उसको फिर यह प्रसाद करके उसको खाया था। तो यहां पर ठाकुर ने भी कहा जब यह समाचार काशीपुर में आया कि अरे इन लोगों ने ऐसा क्यों किया? मां काली को भी तो भोग अर्पण कर सकते थे। ऐसा नहीं करके छवि को क्यों भोग दिया? ऐसा करके ठाकुर भी बोल रहे हैं। और फिर अकल्याण होगा। यह समझ के सोच के मां भीत हो गई है। भयभीत हो गई है। तो मां को भयभीत देखकर के ठाकुर ने कहा था अरे तुम लोग थोड़ा सा भी चिंता मत करना। देखना कि बाद में घरघर इसकी पूजा मेरी पूजा होगी। देखिए यहां पे ठाकुर अमार पूजा होवे। यह जैसे कि मेरी यह जो ठाकुर ने अभी तक जो एक आइडेंटिफाई करने से अपने को वो बच रहे थे कि नहीं मैं इसकी ऐसा करके जब कहते थे अपने को थर्ड पर्सन में आइडेंटिफाई करते थे। यहां पे जैसे कि ठाकुर ने सब जितना भी छल है जितना भी ये लीला का लीला रूपी हमारी आंखों में ये धूल झोंक करके रखी है कि हां एक साधक है परमहंस है। मां काली के संतान है। आनंद से वहां पर दक्षिणेश्वर में रहते हैं। आनंद की आट बिठाई हुई है। सब लोग आकर के नृत्य कीर्तन करते हैं। अपने जीवन को परिपुष्ट करने वाले उपदेश प्राप्त करते हैं। यह जो एक आवरण ठाकुर ने बना के रखा था, जैसे कि अपने जीवन की आखिरी घड़ियों में यह आवरण भी टूट गया। यह आवरण भी हट गया भक्तों के सामने से। जब ठाकुर ने फर्स्ट पर्सन में अपने को संबोधित करके कहा, "देना घर घर मेरी पूजा होगी।" यह आमार पूजा हो गए, मेरी पूजा होगी। यह जो ठाकुर अपने को आइडेंटिफाई करके करते हैं। देखिए कि यह कितना बड़ा रिवोलेशन है हमारे लिए। पहले तो ठाकुर कहते हैं चतुर्थ लक्षण और यह इसको मैं कहूंगा पंचम लक्षण। यह चतुर्थ लक्षण और पंचम लक्षण इन दोनों में देखिए कि कितना एक पूरा सी चेंज आ चुका है। कितना बड़ा ट्रांजिशन हो चुका है। चतुर्थ लक्षण था कि 1885 ख्रिस्ताब् की 1885 की साल की बलराम भवन में रथ यात्रा का उत्सव मनाने के बाद में जब ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस आए थे काली मंदिर में। तब कहा था कि जब बहुत सारे लोग इसको थर्ड पर्सन में अपने को संबोधित करके कहते हैं एक इसको देवता के रूप में मानेंगे स्वीकार करेंगे श्रद्धा भक्ति करेंगे तब समझना कि अंतर्ध्य का समय आ चुका है तो वह एक था कि एक समय और काल था कि जैसे कि अभी भी लीला संवरण में थोड़ा सा समय तो है एटलीस्ट एक साल तो है अभी भी लीला संवरण में किंतु यह जो पंचम लक्षण जैसे कि ठाकुर कहते हैं यह पंचम लक्षण वैसे तो यह जो चार लक्षण है लीला अंतर्ध्य के लक्षण है। किंतु जो पंचम लक्षण है वो है कि अंतर्ध्य होने के बाद में क्या ऐसा तो नहीं है कि ठाकुर का जैसे ये पंचमहाभूत का देह चला गया। उसके बाद में ठाकुर की लीला का अवसान हो गया। ऐसा तो नहीं है। तो यानी कि यह जो चार जो लक्षण ठाकुर ने बताए हैं, उसी की कड़ी में ठाकुर ने यह पंचम लक्षण को निर्देशित किया है और साथ में ही हमको पंचम लक्षण में दो इंपॉर्टेंट चीजें बताई है। सबसे पहले तो ठाकुर जैसे कि अपने को फर्स्ट पर्सन में संबोधित करते हैं। देखना इसके बाद में घरघर में मेरी पूजा होगी। यह जैसे कि ठाकुर अपनी यह जो दिव्यत्व अपना यह जो अवतारत्व अभी जो कि इशारोंइशारों में बताते थे अभी जैसे कि सबके सामने बताना शुरू कर दिए हैं। सबके सामने स्वीकार करना शुरू कर दिए हैं। तो यह स्वीकृति जो है वो दो बातों की यह सूचक है। एक तो है कि जो पंचमहाभूत का देह है जिसकी आराधना जिसकी पूजा जिसको कि अपने को गुरु के रूप में स्वीकार करना वगैरह उसमें एक जैसे सीमा है किंतु वह सीमा जो है पंचमहाभूत का देह त्याग करके या तो फिर यह हांडी को तोड़ करके जैसे कि इसके भीतर का आत्म तत्व है पूरे जगत में बिखर जाए भक्तों के हृदय में जब निवास करना शुरू शुरू कर दे तब ठाकुर को गुरु के रूप में या तो फिर अवतार के रूप में स्वीकार करना हमारे लिए इतना मुश्किल नहीं होगा। इतना इनकन्वीनिएंट नहीं होगा। तो फिर यह जैसे कि अपने भीतर का अवतारत्व ठाकुर ने जैसे कि एक संतान मां काली का एक सदानंद हास्यमय बालक जैसे कि वो मां काली के इस तरह से एक हास्यमय सदानंद सदाशिव एक बालक के रूप में यह जो आवरण हमारी नजरों के सामने बना के रखा था वो आवरण जैसे कि ठाकुर यह पंचम लक्षण में हटा देते हैं। कहते हैं घरघर मेरी पूजा होगी। इससे क्या पता क्या चलता है? एक तो है कि यह मर्त्य देह जो है उनका वह भी वह त्याग करने वाले हैं। किंतु साथ-साथ में ही लीला की कंटिन्यूटी ऐसा नहीं है कि पंचमहाभूत का देह था। जब तक उनका शरीर था तब तक वह भक्तों के साथ आनंद करते थे। भक्तों के साथ में लीला करते थे। भक्तों को आशीर्वाद देते थे। अभी वह जैसे कि देह चला गया तो फिर उनकी लीला का भी अवसान हो गया। नहीं लीला की कंटिन्यूटी बनी रहेगी। बस वही बात है कि ठाकुर को अभी तक हम भक्त लोग अपनी जो यह जो बाह्य चक्षु है उससे दर्शन करते थे। अभी जो है ठाकुर को दर्शन करना है आंतरिक चक्षु से। यह आवृत चक्षु यानी कि चक्षु जो है अपने नेत्र जो है बाहर की वजह अभी अंतर घुमा देने हैं। प्रत्याहार प्रति आहार इंद्रियों को अभी रिवर्स आहार करवाना है। मेरी आंखों का आहार भक्त की आंखों का आहार क्या है? भगवान के दर्शन। तो ठाकुर के दर्शन अभी तक बाहर से करते थे। बाहर के जगत में करते थे। अभी ठाकुर के दर्शन को अपने हृदय में करना है। अपनी आंखों को अभी भीतर में घुमा देना है। तो यह हो गया लीला की कंटिन्यूटी। तो देखिए कि यह पांचों
श्रीरामकृष्ण गुरु परम्परा : ठाकुर, माँ, स्वामीजी—एक तीन, तीन एक
लक्षण जो है एक के बाद एक हमको ठाकुर की यह जो अंत्य लीला है और फिर लीला की कंटिन्यूटी है उसका अच्छे से हमको एक आभास देते हैं। बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि ठाकुर के जीवन की अंत्य लीला वही ठाकुर के जीवन की परिसमाप्ति है। इसके बाद में जैसे इवन हमारा फ्रेमवर्क है कि स्वामी विवेकानंद उनका गुरु भाव प्रारंभ होता है। उनका मिनिस्ट्री प्रारंभ होता है। और फिर इसके बाद में स्वामी जी की महासमाधि के बाद में 192 मां का मिनिस्ट्री या तो फिर मां का गुरु भाव प्रकाश गुरु भाव भक्तों के भीतर में तो मां सभी लोग मां को गुरु के रूप में इष्ट के रूप में जननी के रूप में स्वीकार करना शुरू कर ही दिया था। किंतु बाह्य जो एक बहिरंग भक्त है उनके सामने मां का जननी देवी और गुरु के रूप में जो आविर्भाव होना था वह स्वामी जी की महासमाधि के बाद हुआ। तो यह अपना फ्रेमवर्क हमने बनाया है। पहले ठाकुर का मिनिस्ट्री प्रारंभ होता है। शोडशी पूजा से प्रारंभ होकर के काशीपुर में महासमाधि तक काशीपुर में महासमाधि से लेकर के स्वामी जी की खुद की महासमाधि तक स्वामी जी का गुरु भाव और फिर स्वामी जी की महासमाधि से प्रारंभ कर उन मां की खुद की महासमाधि 1920 1920 वहां तक मां का गुरु भाव यह अपना फ्रेमवर्क तो है किंतु यह जो ठाकुर ने यह जो पांच लक्षण जो प्रदर्शित किए वो तो उनके जीवन की ये जो अंत्य लीला है काशीपुर पर्व काशीपुर अध्याय उस लीला को जैसे कि स्वामी जी का गुरु भाव और बाद में जो मां का गुरु भाव है उसके साथ में डायरेक्टली कनेक्ट करते हैं। इंटरेस्टिंगली अ
माँ का कहना है: जहाँ स्वामी विवेकानंद की पूजा नहीं होती वहाँ श्री रामकृष्ण पूजा ग्रहण नहीं करेंगे
आज का जो बांग्लादेश है उस समय का पूर्व बंग तो पूर्व बंग से कुछ भक्त मां के पास आए थे। अभी क्या है कि देखिए कि ठाकुर तो ब्राह्मण थे मां भी ब्राह्मण है और ठाकुर अवतार है तो मां शक्ति है ठाकुर शिव तो मां शक्ति यहां तक तो इन्होंने स्वीकार कर लिया था माने इतना तो उनका एडवांसमेंट हो चुका था किंतु फिर यह स्वामी विवेकानंद कौन है एक तो है कायस्थ के संतान कायस्थ के या तो क्षत्रिय कहेंगे तो उनके संतान और फिर है कि उन्होंने ने यह कर्म योग का प्रचलन किया है। यानी कि कहां ठाकुर और मां और कहां स्वामी विवेकानंद। तो फिर इन लोगों ने क्या किया कि वहां पर मंदिर बनाया और मंदिर बना के मां और ठाकुर का फोटो रखा। स्वामी जी का फोटो रखा नहीं। तो अभी यह लोग मां के पास में आए हैं। बड़े ही खुश होकर के गर्वित अनुभव करते हैं। अपनी बुद्धि पे अपनी बुद्धिमत्ता पे। देखिए हमने ठीक-ठीक सब कुछ पहचान लिया है। ठाकुर शिव है, मां शक्ति है और स्वामी जी वो कायस्त के संतान है। ऊपर से यह सब गड़बड़ गड़बड़ प्रैक्टिकल वेदांत की बातें करके विदेश में जाकर के पता नहीं क्या-क्या सब खा पी के आए हैं। जातिचत [गला साफ़ करने की आवाज़] हो गए हैं। उनको मंदिर में रख के पूजा करने की कोई जरूरत नहीं। ऐसा घमंड से वह मां के पास में आए। किंतु जैसे ही मां को कहा कि मां हमारे मंदिर में ठाकुर और आपका फोटो रखा है। आपकी हम नित्य पूजा करते हैं। तो उन्होंने सोचा था मां बड़ी खुश हो जाएगी। चलो मेरे रहते मेरी पूजा हो रही है। ठाकुर तो बेचारे डर गए थे कि वो जीवित है। उनके फोटो की पूजा करके ना भोग निवेदन कर दिया। पता नहीं क्या अकल्याण होगा। किंतु मां तो जगत जननी है। उनको यह सब टेंशन नहीं है कि जिंदा है ना कि नहीं है और उनके फोटो की पूजा हो रही है। हमको पता ही है कि क्वालपाड़ा में जब वहां के मंदिर की स्थापना हुई तो मां ने ही अपने स्वयं के हाथों से ठाकुर का फोटो और अपना खुद का फोटो दोनों स्थापित किया था। तो यह भक्तगण में यह भी फिट बैठ गया है कि चलो ठाकुर के रहते-रहते ठाकुर की फोटो की पूजा करते थे। वो तो ठीक नहीं हुआ था किंतु मां के रहते-रहते मां के फोटो की पूजा करें। उसमें मां की तो सहमति ही है। क्वालपाड़ा में मां ने इस तरह से अपने ही फोटो को स्थापित किया ही है अपने हाथों से। तो यह लोग बड़े गर्वित महसूस करतेकरते आकर के मां को कहते हैं कि मां हमारे वहां मंदिर है। वहां पे ठाकुर का फोटो रखा है और आपका रखा है और स्वामी जी का नहीं रखा। तो जैसे ही मां ने ऐसा सुना मां एकदम गंभीर हो गई। तो इतनी गंभीर हो गई कि अभी एक भक्तगण डर गए कि हमने ऐसा क्या गलती कर दिया भाई यह तो कि मां इतनी गंभीर और नाराज हो गई है। तो उन्होंने पूछा डरते डरते मां क्या हुआ? तो मां ने कहा देखो जहां पर नरेंद्र को नरेंद्र की पूजा नहीं होती है वहां पर ठाकुर स्वयं पूजा ग्रहण नहीं करेंगे। ठाकुर भी पूजा ग्रहण नहीं करेंगे। तो ऐसा जैसे ही मां ने कहा तो यह भक्त लोग तो बड़े ही डर गए। मां को वचन दिया कि हां मां जैसे ही वापस जाएंगे साथ-साथ में ही स्वामी जी के फोटो को भी वहां पर रख देंगे। तो देखिए यह जो लीला अवसान के बाद में यह जो ठाकुर एक स्वामी जी एक यह जो इवन कुछ कुछ गुरु भाइयों के मन में यह संदेह रहना शुरू हो गया था कि ठाकुर ने तो यह अंतर्मुखीता यह रिट्रीट मने वने कोण वहां पर जाकर के एक बार ईश्वर को पुकार करके बाद में फिर संसार में आओ और जो करना है करो दूध में से एक बार दही जो है वह आप निकाल लो मक्खन निकाल लो कैसे भी करके फिर उस मक्खन को फिर से आप वहां पर दूध या पानी में रखेंगे तो वह सेपरेट ही रहेगा उसके साथ में मिक्स नहीं हो जाएगा तो कैसे भी करके जोर लगा करके कैसे भी करके ईश्वर प्राप्ति कर लो फिर संसार में आकर रहो फिर संसार का जिम्मा भी लेना है संसार की जवाबदारी भी लेनी है तो कोई दिक्कत नहीं यहां पे स्वामी जी उल्टा ही कहते हैं कहते हैं संसार में कूद पड़ो संसार की जो कष्ट दुख है सब जवाबदारी अपने सर पर ले लो। हां यह काव्याट है माने कंडीशन है कि माया के जितने संबंध हैं उसको काट देने हैं और यह जो गरीब गुरबे दरिद्र नारायण चंडाल नारायण इनको हमको अपना लेना है जैसे कि अपने ही भाई-बहन हैं उनकी सेवा अपने जी जान से करनी है। भक्ति चली जाए, मुक्ति चली जाए, कोई चिंता नहीं है। पहले मैं इनके इनके लिए मैं अपना जीवन समर्पण करने को तैयार हूं। तो यह कहां स्वामी जी और कहां ठाकुर तो यह जो क्रैक यदि ना हो जाए रामकृष्ण संघ में इसके लिए जो लीला कंटिन्यूइटी है यह लीला कंटिन्यूटी जैसे कि ठाकुर अपने पंचमहाभूत के देह में नहीं है किंतु स्वामी जी के हृदय में रह के रह के तो ठाकुर अवश्य कार्य करते रहेंगे। यह जो लीला कंटिन्यूटी उसको सूचित करने के लिए यह पंचम लक्षण है। कि घरघर मेरी पूजा होगी और यह घरघर ठाकुर की पूजा का प्रवर्तन कौन स्वामी जी ही तो करने वाले हैं। एक समय की बात है कुछ गुरु भाइयों के ऊपर में उनकी ये जो नैरो माइंडेड उनका जो पॉइंट ऑफ व्यू पॉइंट था एक एक कहेंगे कि ऑर्थोडॉक्स उनकी जो दृष्टिभंगी थी उससे स्वामी जी नाराज हो गए थे और नाराजगी में नाराजगी में ही उन्होंने बोल दिया कि तुम्हारे ठाकुर को कौन पहचानता है यह कोलकाता छोड़कर के थोड़ा 1215 किलोमीटर दूर जाओ देखो कोई तुम्हारे ठाकुर को नहीं पहचानता मैंने ही तो ठाकुर का प्रवर्त पूरे विश्व में किया है। बोल के तो आज अमेरिका है, यूरोप है, यह जापान है, यह साउथ इंडिया है या यहां पे राजपूताना है। वहां से कितने हजारों हजारों भक्त ठाकुर का संदेश और ठाकुर की अमृतमय वाणी को स्वीकार किया है। उन्होंने अपने जीवन में। तुम लोग ये अपनी एक छोटी सी दृष्टिभंगी है। उसमें ठाकुर को बंद रखना चाहते हो और सोचते हो कि यह जो ऑर्थोडॉक्स पॉइंट ऑफ व्यू है इंटरप्रिटेशन है आपका नैरो माइंडेड शॉर्ट साइटेड क्या वही इंटरप्रिटेशन है क्या ठाकुर के जीवन का तो ये जो कभी-कभी स्वामी जी भी उनसे नाराज हो जाते थे। अनदर स्टोरी मैंने यह
माँ का कहना है: श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानन्द को अपनी गोद में बैठाते
जो पूर्व भंग की ही यह बात है और सेम स्टोरी है जो अभी हमने कही थी कि कुछ भक्त आए मां के पास में तो अभी उन्होंने उल्टा किया है। जैसे वहां पर स्वामी जी को नहीं रखा था। इन लोगों ने क्या किया? सब कुछ ठीक किया। ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को एक ही वेदी पर रख करके तीनों की पूजा करते हैं और किंतु मन में एक डर तो बैठ गया है क्योंकि यह लोग जो थे ब्राह्मण एक दल था उनका जैसे ऑलरेडी कहना था कि स्वामी जी तो कायस्थ है फिर यह क्या सब उटपटांग बातें करते हैं तो फिर उनके फोटो को मंदिर में रख के पूजा करने की कोई जरूरत नहीं है। आप ऐसे उनको फॉलो कीजिए। उनको रिस्पेक्ट दीजिए। पूजा क्यों करेंगे उनकी? तो वैसे ही तो यह सब बातें चल रही है। अभी इन भक्तों में इतना तो अकल है कि भाई बेलूर मठ के जो सन्यासी है जो कहते हैं वह तो कुछ सोच समझ के ही कहते होंगे। तो क्यों नहीं तीनों को एक ही वेदी पर रख के पूजा की जाए। तो ऐसा वे लोगों ने करना शुरू कर दिया था। किंतु मन में संदेह तो अभी भी बना हुआ है कि हां यदि ऐसा करते हैं तो सही है कि गलत है। तो वे लोग भी आए मां के पास में मां के पास में आकर के मां को कहते हैं डरते डरते कहते हैं कि मां हमने तो ठाकुर मां ठाकुर को आपको और स्वामी जी को एक ही वेदी पर रख के तीनों की पूजा हम लोग कर रहे हैं। तो क्या हम सही कर रहे हैं कि गलत कर रहे हैं? तो यह सुनकर के मां फिर से थोड़ी सी गंभीर हो गई। तो यह भक्त लोग भी डर गए कि अरे वैसा जैसा उनके साथ में [हंसी] हुआ था। ऐसा कहीं अभी हमारे साथ में ना हो जाए। क्या हमने क्या गड़बड़ कर दी है अभी? तो मां गंभीर होकर कहती है कि यदि ठाकुर होते तो नरेंद्र को क्या अपने पास में बिठाते? तो ये लोग तो बेचारे और डर गए तो क्या स्वामी जी को ठाकुर के नीचे में बिठाना चाहिए? क्या एक ही वेदी पर बिठाया है? और यह बात भी तो सही है। जब स्वामी जी दक्षिणेश्वर आते हैं कथामृत के जितने भी विवरण देखिए कहां पर भी ऐसा नहीं देखने को मिलता कि ठाकुर ने नरेंद्र को अपने पास में एक काट पे बिठाया हो। हां ऐसे विवरण अवश्य है कि नरेंद्र जमीन पर चटाई पर बैठा है। ठाकुर भी भाव के आवेश में आकर के नरेंद्र के साथ में चटाई पे आकर बैठ गए हैं। किंतु ऊपर में खाट पे जहां पे ठाकुर खुद जनरली विराजित होते थे। वहां पे तो नरेंद्र को आकर के बिठाना ऐसा तो ज्यादा कुछ सुनने में नहीं आता। तो हमने क्या गलती कर दी? नरेंद्र को स्वामी जी के ठाकुर को नीचे में बिठाना चाहिए था। तो ये लोग सोचते-सचते डर गए। तो यहां मां ने कहा कि ठाकुर होते तो क्या नरेंद्र को पास में बिठाते? तो फिर यह भक्त कहते हैं कि मां तो क्या करते ठाकुर? तो मां कहती है ठाकुर होते तो नरेंद्र को अपनी गोद में बिठाते। तो [हंसी] अभी जब मां ने ऐसा कह दिया तो फिर अभी तो कोई प्रश्न ही नहीं रहा। अब फोटो को तो एक दूसरे फोटो की गोद में नहीं बिठा सकते। तो फिर एक वेदी पे एक समान लेवल पर रखा है। उसमें अभी कोई गलती नहीं है। तो देखिए कि यह लीला कंटिन्यूटी यह जो अपनी गुरु परंपरा है। ये गुरु परंपरा ठाकुर ने यहां से प्रारंभ की है। यदि ये गुरु परंपरा नहीं होती। देखिए बहुत सारे संत महापुरुष आते हैं। उसके बाद में क्या होता है? उनके जो कुछ कुछ मुख्य शिष्य होते हैं, वह अपने को ही एक दूसरा संत महापुरुष घोषणा करके अपने नाम से सब कुछ करना स्टार्ट कर देते हैं। वो फिर गुरु को रिस्पेक्ट दो देंगे किंतु ऐसा नहीं कि हां गुरु के लिए ही सब कुछ है। गुरु ही यहां पर सर्वस्व है। उनका खुद का अस्तित्व एक बहुत बड़ा हो जाता है। मैंने ऐसा एक संघ देखा है। नाम नहीं कहूंगा। अह वहां पे मैं गया था। देखा कि जो वर्तमान गुरु थे उन्हीं की सब जगह पर बोलबाला है। वहां के जो स्थापक थे उनका तो जैसे कि एक कोने में उनको बिठा दिया गया है। अभी वहां के लोगों के मन में जो भी हो मैं तो बाहर वाला था तो बाहर से तो जो दिखता है ऐसा ही दिखता है कि जो संघ गुरु है वहां के उन्हीं की सब जगह पर मूर्ति उन्हीं की सब जगह पर बातें और संघ के स्थापक जिनको ये लोग अवतार कहते हैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं। एक कॉर्नर में बिठाया है उनको। तो यह देखकर के मुझे आश्चर्य हुआ था। किंतु देखिए ये शिष्यों के मन में गुरुवाद प्रबल हो जाना यह आम बात है। स्वामी जी इतने टैलेंटेड थे। चाहते तो अपने सभी अमेरिकन डिसाइपल्स को इकट्ठा करके अमेरिका में ही एक विवेकानंद मिशन की स्थापना कर सकते थे। भारत में भी आते तो भारत में भी घर-घर उनका सम्मान होता। कहां श्री रामकृष्ण यह कोलकाता के यह जो मुट्ठी भर भक्तों के अलावा और तो कोई पहचानता नहीं है उनको तो उनके नाम से यह मिशन का प्रारंभ करना उनके नाम से सभी एक्टिविटीज करना और आखिर में सुप्रीम सैक्रिफाइस कि गुरु भाइयों के साथ में मतभेद है। किंतु फिर भी स्वामी जी अपने अमेरिकन डिसाइपल्स को कहते हैं देखिए मैं जब भी किसी मनुष्य को परख करता हूं मनुष्य की परीक्षा करता हूं तो मैं कभी-कभी मैं उसमें फेल हो जाता हूं। इस अर्थ में कि किसी पर मैंने भरोसा किया बाद में उसने मुझे दगा दे दिया। किंतु ठाकुर जब किसी की परीक्षा करते हैं और उसके बारे में जो जजमेंट देते हैं, वह जजमेंट कभी भी फेल नहीं हुआ। यह स्वामी जी अपने डिसाइपल्स को कहते हैं और इसीलिए जब यह ट्रस्टी बॉडी बनाने की बात आई तो उसमें सिर्फ ठाकुर के ही त्यागी संतान ही स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को ही रखा। अपने खुद के शिष्यों को नहीं रखा। और आखिर आखिर में तो जब वह अमेरिका आए थे तब उन्होंने ट्रस्ट डीड पर साइन करके सब कुछ जो था वो राजा महाराज के हवाले और जो ट्रस्टी बॉडी थी उनके हवाले सब कुछ सुपुत कर दिया था। तो देखिए कि यह गुरु भाव माने अपने को एक सेपरेट गुरु बनाकर के खड़ा करना स्वामी जी आसानी से कर सकते थे। उन्होंने यह किया नहीं। क्यों? क्योंकि यह गुरु परंपरा जो है वह ठाकुर खुद एस्टैब्लिश करके गए थे। तो अभी हमको तो पता है कि संघ की गुरु परंपरा कहे फॉर्मली कहे तो ठाकुर के बाद में आते हैं संघाध्यक्ष यानी कि स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी शिवनंद, स्वामी अखंडानंद, स्वामी विज्ञानानंद। यह चार तो ठाकुर के ही साक्षात सन्यासी संतान थे। और उसके बाद में स्वामी शुद्धानंद जी से प्रारंभ होकर के सेकंड जनरेशन ऑफ डिसाइपल्स संघाध्यक्ष हुए। किंतु भक्तों को तो स्पष्ट पता है कि इस गुरु परंपरा में मां और स्वामी जी का भी सर्वोच्च स्थान है। ठाकुर के बाद में ही इनका स्थान है। तो यह जो ठाकुर ने जो पूरे संघ का जिम्मा सर्वप्रथम स्वामी जी को सुपृत किया और स्वामी जी के जाने के बाद में मां के कंधों पर यह जो पूरा जिम्मा आन पड़ा यही तो है अपनी सही सही गुरु परंपरा। तो देखिए कि ठाकुर ने इस गुरु परंपरा का भी प्रवर्तन करके गए हैं। सिर्फ संघ को प्रारंभ नहीं किया कि वहां पर काशीपुर में यह जो अपने 11 डायरेक्ट डिसाइपल थे उनको गेरवा वस्त्र दिया। यह तो संघ का प्रारंभ हुआ। किंतु संघ की गुरु परंपरा जो है उसका भी वह प्रारंभ करके गए थे। तो यह जो पंचम लक्षण जो है प्रथम चार लक्षण है यहां पे वह लीला अवसान से रिलेटेड है कि हां मर्त्य देह में मर्त्य लोक में जो लीला है वो यहीं तक किंतु इसके बाद में पंचम लक्षण है लीला की कंटिन्यूटी भक्तों के हृदय में विराजित होकर के गुरु परंपरा के माध्यम से ठाकुर हमको गाइडेंस देंगे हमको आशीर्वाद वाद देंगे हमको सध्यारा देंगे तो यह जो आखिरी लक्षण कि
श्रीरामकृष्ण कहते हैं, "घर घर मेरी पूजा होगी"
अरे तुम लोग थोड़ी सी भी चिंता मत करो इसके बाद में घरघर मेरी पूजा होगी यह जो आत्म स्वरूप जो है प्रकट करना आत्म प्रकाश से अभयदान यह जो शरद महाराज का वह जो टाइटल है कल्पतरुद्दीन की घटना का तो वही यह जो आत्म प्रकाश से अभयदान या तो फिर कल्प तरु होना वो सिर्फ एक तो वह एक फेमस घटना है जो कि सबके सामने वह अभिनय हुआ है उस लीला का कि वह तो एक है किंतु साथ-साथ में ही यह जो सटल छोटी-छोटी बातें हैं उसमें भी ठाकुर जैसे कि आत्म प्रकाश से अभयदान दे रहे हैं। अभी तक कहते थे एक खोल्टा ये आवरण इसको एटा एयर इसका तो ये जो अपने को थर्ड पर्सन में जो संबोधित करते थे अभी तक चतुर्थ लक्षण तक ठाकुर ने जैसे कि अपने को थर्ड पर्सन में संबोधित किया है। पंचम लक्षण से प्रथम पुरुष आ गया है। एक प्रथम पुरुष एकवचन ठाकुर उसी ये जैसे कि आत्म प्रकाश से अभय दान देते हैं घर घर मेरी पूजा होगी और फिर इतना ही नहीं मायरी बोलची बापान तो दिव्य कसम से कहता हूं बाप की कसम खा के कहता हूं कि ऐसा होगा यानी कि वो जो बंगाली में कांसेप्ट
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है त्रिसत्य का यदि आपको किसी के पास में कोई बात स्वीकार करवानी है बहुत सारे भक्त मां के पास में जाकर के ऐसा कहते थे मां तुम्हारी कृपा मिलेगी तो मां कहती है हां फिर से पूछेंगे कृपा मिलेगी तो मां कहती है फिर से पूछेंगे तीन बार मां के पास में बुलाएंगे ती सत्य करवा देंगे यानी कि अभी मां भी अपने वचन से वो मुंह घुमा नहीं सकती है मां को अभी तीन सत्य करवा दिया है जैसे जगत धात्री जगत धात्री देवी आकर के मां के पास में कहती है मैं जाऊं तो यहां से मैं जाऊं तो अभी देखो जगत धात्री की पूजा अभी ये दोद साल ना कि ऐसा करके करके जो सबके नाम से संकल्प ले लिया गया था तो फिर अभी नेक्स्ट ईयर अभी संकल्प लेना वगैरह क्या फिर मां भी कहती थी श्यामा सुंदरी को कि यह बहुत झमेला है ये सब झमेले में मैं ज्यादा नहीं जाना चाहती तो फिर उस समय रात को जगत धात्री देवी मां के स्वप्न में आकर के मां को तीन बार पूछती है मैं जाऊं क्या मैं जाऊं मैं जाऊं तीन सत्य करवा लेना चाहती है मां के पास में से तो मां तीन बार यदि कहेगी हां तुम जाओ तो फिर तो वापस आने का कुछ नहीं रहा तो मां अभी समझ गई कि ये देवी की चालाकी तो मां ने इमीडिएटली कह दिया ना मां तुम यहीं पर रहना मैं साल साल तुमको आमंत्रण दूंगी तुम्हारी पूजा करूंगी ये देखिए जैसे देवी को सामने से जैसे कि देवी के मुंह पे जैसे दरवाजा बंद कर देना ऐसे भी घटना है कि देवी के जो यह आना चाहती है वह आमंत्रण नहीं दिया और यह कर दिया प्रत्याख्यात कर दिया कि नहीं अभी मत आना ऐसा भी है चंद्रामणि देवी यह बात मां ने खुद ने कही है कि चंद्रामणि देवी एक दिन रात को अपने घर में थी चंद्रामणि देवी यानी कि ठाकुर की मां तो ठाकुर की मां अपने घर में थी ठाकुर शायद नहीं होंगे उस समय बालक गदाधर उस समय का तो चंद्रामणि देवी घर में है एक देखा अंधेरा वहां तो ये गैस लाइट वगैरह तो था नहीं इलेक्ट्रिसिटी वगैरह गांव में तो पूरा अंधेरा ही होता है चारों ओर मतलब जब आप गली में बाहर निकलते हैं रास्ते पे तो रास्ते पे तो अंधेरा ही है तो एकाएक चंद्रामणि देवी ने देखा कि ये जो लाहा बाबू का घर ना कि ऐसा कुछ है। वहां से एक युवती सुंदरी स्त्री उनके घर की ओर आ रही है। बड़े ही माने सुंदर गहने आभूषण पहने हुए हैं और उनका यह जो प्रभाव है देखकर के ही समझ में आता है कि यह कोई सामान्य स्त्री नहीं है। तो चंद्रामणि देवी जो लटन जो होती है उसके प्रकाश में देख रही है। तो यह सुंदरी स्त्री युवती सुंदर गहने पहने हुए वह आकर के चंद्रामणि को कहती है कि मां मैं तुम्हारे घर में आऊं क्या? तो चंद्रामणि देवी थोड़ी सी डर गई कि इस रात को और क्या है खुदीराम ठाकुर के पिताजी गए थे बाहर में यजमान वो तो यजमान जब पुकारता है किसी ब्राह्मण को पूजा करने के लिए तो ब्राह्मण को जाना है यही तो उनके घर की आई थी और तो कुछ था नहीं तो खुदीराम गए थे बाहर घर में चंद्रामणि देवी अकेली और इस तरह की स्त्री जो कि उसकी जो रूप हैुर्य छटा जो है वह तो मतलब उन्होंने कभी कभी देखा नहीं होगा। तो इस तरह की स्त्री वो भी रात को गांव में क्या कर रही है? मेरे घर में आने को बोलती है। तो चंद्रामणि देवी ने कहा बिटिया देखो अभी तो घर में कोई है नहीं। तुम अभी मत आओ बाद में आना। तो ये स्त्री ने ऐसा ऐसे ही आई थिंक तीन बार ही पूछा। तो तीनों बार वो चंद्रामणि देवी ने मना कर दिया। तो फिर वो स्त्री जो है हंसते यह कहा कि अच्छा ठीक है। वैसे ही आप रहिए और ऐसा बोल के चली गई। अभी खुदीराम जब आए वापस तो चंद्रामणि देवी ने खुदराम को कहा कि देखिए इस तरह से एक सुंदरी स्त्री आई थी। सुंदर आभूषण वस्त्र पहने थे और अपने घर में आने को वो बोल रही है। बार-बार बोल रही है। मैंने सब बार उसको मना कर दिया। तो फिर अभी खुदराम तो यह ज्योतिष शास्त्र वगैरह जानते थे। उनको तो पता है कि कौन से दिन कौन सा यह मुहूर्त है। तो उन्होंने इमीडिएटली ये पंजीिका खोल के देखा और ठीक मतलब कंफर्म किया कि आज है कोजागरी पूर्णिमा। तो कोजागरी पूर्णिमा की रात को इतनी सुंदर स्त्री इतने सुंदर भव्य आभूषण पहन के आती है। इसका एक ही अर्थ है कि मां लक्ष्मी स्वयं आई थी और ठाकुर के घर में प्रवेश करना चाहती थी। चंद्रामणि देवी ने बार-बार उनको मना कर दिया बोलकर के वह वापस चली गई। तो अभी यह देखिए मां शारदा स्वयं यह कहानी कहती है और कहने के बाद में क्या कहती है पता है कि देखिए कि यह जो देवी ने बार-बार मां लक्ष्मी ने आने को कहा और चंद्रामणि देवी ने मना कर दिया। इसके फलस्वूप देखिए कि ठाकुर के पिताजी के घर में कभी भी पैसों की इतनी सुविधा नहीं हुई। वे लोग आखिर तक ये शिव का ही संसार जैसे कि संसार श्मशान में ही रहते हैं। सप्त समय जो है खाने की मुश्किल है, पहनने की मुश्किल है, रहने की मुश्किल यह कष्ट कर ही उनके दिन बीते हैं। तो मां शारदा स्वयं यह बात कहती है। तो क्या है कि यह मायरी बोलची बापान तो दिब्बी यह इट इज़ अ सॉर्ट ऑफ त्रिसत्य ठाकुर ने कर दिया है। एमफेसाइज उन्होंने किया है। भार देकर के कहा है। हवाहवा वैसे तो देखिए रघुकुल नीति सदा चली आई प्राण जाए पर वचन ना जाए। यह जो ठाकुर का सत्य वचन पालन है हमको तो पता ही है। ठाकुर कहते हैं कभी मेरे मुंह से निकल जाता है कि मैं शौच के लिए जाऊंगा। फिर किंतु शौच का प्रेशर नहीं भी आया है। किंतु मुंह से बोल दिया है तो सत्य रक्षा करने के लिए मुझे जाना पड़ेगा। तो ऐसा करके ठाकुर का सत्य रक्षा कितना था वो तो हमको सबको पता है। तो ठाकुर यदि एक बार भी कहते बिना किसी एम्फेसिस के भी कहते तो वह भी तो हमको एकदम पक्का ठीक ही मान ही लेना है। किंतु इसके बावजूद सत्य रक्षा ठाकुर की है। हम सबको पता है एक बार ठाकुर ने कह दिया तो जैसे कि पत्थर पर लकीर जैसे कि समय उल्टा हो जाए ठाकुर की बात टलेगी नहीं। किंतु इसके बावजूद ठाकुर भार देकर के कहते हैं। एक तो सत्य वचन पालन है उसका उनका और उसके ऊपर में भार देकर के एम्फेसाइज करके करते हैं कि कसम से कहता हूं बाप की कसम लेकर कहता हूं। दैट मींस देखिए कि इस कथा में कि घर मेरी पूजा होगी। फर्स्ट पर्सन एक वचन तो यह जो ठाकुर ने अपने जो आत्म स्वरूप को प्रकाश करके हमको अभयदान जो दिया है उस बात में हमको ठाकुर के शिष्यों को थोड़ा सा भी संदेह नहीं होना चाहिए। यह जो गुरु परंपरा ठाकुर प्रारंभ करके गए हैं उस परंपरा में अपना संपूर्ण रूप से विश्वास होना चाहिए।
श्रीरामकृष्ण की अन्त्यलीला
इसके बाद में अभी देखिए कि महा समाधि की यह घटनाएं सब प्रारंभ हो गई है। गंभीरानंद जी कहते हैं सुतान श्री माय बुझते बाकी छिलोना जे सुधु देवताई बाम नहेन श्री श्री ठाकुर लीला शरण उन्मुख हो इसलिए श्री मां को अभी समझने में बाकी नहीं रहा था कि सिर्फ देवता ने ही मुंह नहीं घुमा लिया है। ठाकुर भी अभी इस लीला संवरण के लिए प्रस्तुत हो रहे हैं। लीला संवरण के लिए उन्मुख हो रहे हैं। तारकेश्वर जाकर के तो देखा कि भगवान शिव ने कि यह वरदान ना देकर के कि हां ठाकुर का देह है। अभी और कुछ दिन टिकेगा। ऐसा ना कह के मां को जैसे कि वैराग्य का ही उपहार दे दिया। इस संसार में कौन किसका है? कौन किसका स्वामी? कौन किसका है? यह जो बात मां के मन में प्रकट हुई, यह जो सदा शिव महादेव का ही तो एक उपहार ही तो समझा जाए। त्याग और वैराग्य के देवता के पास में मां मांगने को गई। बेचारी वो सिंह वाहिनी के पास में मांगा था प्रथम वर तो उसमें तो जैसे कि पता चल गया कि वह मां की कृपा है कि मां ने उनको मां शारदा को सुस्थ कर दिया। किंतु यह ठाकुर के जीवन रक्षा के लिए महादेव के पास में मां क्यों गई? यह भी तो एक पहेली है। तो महादेव तो वैराग्य के देवता है। त्याग और प्रलय के देवता है। यदि ठाकुर के देह रक्षा के लिए यदि आराधना करनी ही है तो भगवान विष्णु या तो भगवान राम या कृष्ण उनकी तो आराधना करने से उनके सामने तो हत्या देने से होता। कोई देवी है उनके सामने हत्या देने से होता। प्रलय के देवता के सामने हत्या क्यों दी? यह भी तो एक आश्चर्य की बात है। लगता है कि मां को पता ही था कि झूठ-मूठ का देवता को परेशान करने से भी कोई लाभ नहीं। जो कि अभी वास्तव सत्य है। ठाकुर ने ठीक कर ही लिया है कि अभी मुझे इस मर्त्य जगत में नहीं रहना। इस पृथ्वी पर मुझे नहीं रहना। ठाकुर ने जब ठीक कर ही लिया है तो फिर बिना मतलब देवताओं को इस तरह से हमको कष्ट क्यों देना यह भी शायद मां के मन में होगा। हमको ऑलरेडी पता है कि मां ने जब सिंह वाहिनी के सामने हत्या दी इसके बाद में मां के एक चाचा ने भी वहां पर हत्या दी थी। किंतु मां सिंह वाहिनी नाराज हो गई। और फिर श्यामा सुंदरी देवी को आकर के कहती है कि अरे वह तो ब्राह्मण का लड़का है। वह जो मां के जो चाचा थे वह तो ब्राह्मण का लड़का है। झूठमठ का मुझे परेशान कर रहा है। मेरे जो मैं विश्राम कर रही हूं उसमें खलेल पहुंचा रहा है। बोलो उसको कि जाए वहां से बिना मतलब मेरे सामने हत्या देकर पड़ा ना रहे। तो क्या है कि ईश्वर भी कौन हत्या देता है? कब उनकी बात स्वीकार करनी है। ईश्वर का भी एक लॉजिक होता है। तो मां को शायद लगा ही होगा। पता चल ही गया होगा हृदय के भीतर में से कि ठाकुर अभी लीला संवरण के लिए उन्मुख हो रहे हैं। अभी झूठमठ का जाकर के सिंह वाहिनी को या और किसी देवी देवता को उनके सामने हत्या देकर के उनको परेशान नहीं करना है। चलते हैं सीधा प्रलय के देवता के सामने और प्रलय के देवता क्या आशीर्वाद या क्या वरदान देंगे? प्रलय रूपी वैराग्य का वरदान जो देंगे वह शायद मां को पहले से ही अंदाज हो ही गया था। बोलकर के ही जब यह स्वप्न या विजन हुआ कि बहुत सारी मिट्टी की हांडी एक के ऊपर एक सजा करके रखी है और जैसे लाठी से जोर से तोड़ दी तो फिर जो यह आवाज होती है और फिर इस आवाज से वो जो रुद्र का प्रलय विषाण अर्थात कि भगवान महादेव का प्रलय विषाण विषाण यानी कि यह जो सिंहनाद जो होता है रुद्र का प्रलय विषाण की असफुट निनाद उससे जैसे कि मां के मन में से माया अपश्रुत हो गई और वहां पे प्रकट हो गई असीम वैराग्य की भास्व दीप्ति। तो यह मां को पहले से ही पता होगा कि सिर्फ देवता मुझसे रूठे नहीं है। ठाकुर स्वयं देह त्याग करना चाहते हैं। तो बोलकर के सिंह वाहिनी के सामने नहीं जाकर के प्रलय के देवता के सामने ही हत्या की जाए। हत्या दी जाए। शदिक होते बसे बुक बांधी बार मतो किुई छिलोना शदिक होते उस ओर से अर्थात कि ठाकुर की ओर अपेक्षा रख के बैठना देवता को तो पटाने का प्रयास किया देवता ने तो फिर वैराग्य का उपहार आशीर्वाद वरदान दे दिया तो अभी किंतु एटलीस्ट ठाकुर की ओर तो आशा रख के बैठा जाए ठाकुर तो खुद कोई सामान्य साधक है नहीं देवता के ही समान है। किंतु ठाकुर की ओर से भी हृदय में विश्वास बांधने के लिए कुछ नहीं था। विश्वासे बूक बांधी बार मतो की छुई छिलोना। विश्वास से हृदय को सीने को मजबूत करने के लिए कुछ नहीं था। तब विश्वास भांगी ले वो आशा जाना। किंतु विश्वास भांगने से भी विश्वास टूटने से भी आशा नहीं जाती। देखिए यह कितना बड़ा स्टेटमेंट है हम सबके जीवन में कि विश्वास टूट भी जाता है। बहुत बार छोटे होते हैं ना मुझे याद है मैं स्कूल में पढ़ता था सेवंथ एट्थ स्टैंडर्ड में तो ऐसा लगता था कि 10थ की एग्जाम है बोर्ड की एग्जाम जैसे कि वही जीवन का सबसे बड़ा चैलेंज है और जैसे ही यह एग्जाम खत्म हो जाए क्योंकि उस समय सेवंथ एट हाई हाई स्कूल में जब आप आते हैं तो फिर आपको बोर्ड की एग्जाम ही नजर के सामने दिखती है फिर जैसे कि वही हमारा सब खा जाती है प्राणशक्ति तो वही लगता था आपकी बोर्ड की एग्जाम 10थ की बोर्ड की एग्जाम जैसे ही चली गई बस शांति से रहेंगे आनंद से खाए पिएंगे तो किंतु प्रॉब्लम यही है कि जैसे ही बोर्ड की एग्जाम खत्म हुई तब पता चला कि असली चैलेंज तो अभी प्रारंभ हो रही है। तो क्या है कि विश्वास तो टूट गया। यह जो बोर्ड की एग्जाम पर विश्वास था कि वो एग्जाम इतनी पावरफुल है। उसके जो फल है वो इतने लॉन्ग टर्म के है कि पूरा जीवन शांति से बैठ के खाएंगे। वह विश्वास तो टूट गया किंतु यह जो आशा है कि एक शांति से जीवन बिताएंगे या तो फिर ऐसा कुछ करके बिताएंगे जीवन जो कि मुझे अच्छा लगता है। यह जो जॉब सेटिस्फेक्शन जिसको कहते हैं हार्ड वर्क करेंगे किंतु इस तरह का कार्य करेंगे जिससे कि हमको सेटिस्फेक्शन मिलता है। वरना बहुत बार इस तरह का कार्य करना पड़ता है। उसमें ना ही जॉब सेटिस्फैक्शन मिलता है ना ही उसमें अपनी प्रोडक्टिविटी या अपनी क्रिएटिविटी को हम मैनिफेस्ट कर पाते हैं। तो विश्वास टूट जाता है किंतु आशा नहीं टूटती। यह 10थ की एग्जाम के बाद में सब ठीक हो जाएगा। यह विश्वास तो ईजीली टूट गया। किंतु यह जो आशा है कि आज नहीं ना कल, कल नहीं ना परसों, परसों नहीं ना नरसों। ऐसा कुछ हम तोप मार देंगे इस जगत में कि फिर जैसे कि उसके बाद में अपना जीवन शांति, सुख और आनंद से बीतेगा। किंतु ऐसा ही है कि विश्वास तो टूट जाता है बार-बार टूट जाता है किंतु आशा टूटती नहीं है। आर अकुलर कांडारी के ना डाकियाओं के हो चुप करिया थकीते पारे ना अकुल के कांडारी महासागर में डूबने के समय आपने जो नौका चलाने वाला जो होता है नौका चालक हमको जैसे कि नौका में बिठा के महासागर पार करवा देता है तो यह अकुल के कांडारी महासागर को पार करने करवाने वाले यह जो नाविक है उनको ना पुकार करके भी कोई सिर्फ चुपचाप बैठ नहीं सकता है। पता ही है कि ठाकुर का देह त्याग होने ही वाला है। किंतु इसका अर्थ यह थोड़ी ना है कि चुपचाप बैठे रहेंगे। भगवान को तो पुकारेंगे ही पुकारेंगे। ठाकुर तिरोधान काले तिरोधान काल अप्रतिहत बेगे अग्रसर होते छे ठाकुर का तिरोधान समय ठाकुर की महासमाधि का समय झड़प से अप्रतिहत बेगे अग्रसर होते छे आगे बढ़ रहा है उहार अन्यथा करो मानव श्राद्धायत नहीं इसको मिटा देना इसको पलट देना मनुष्य के साध्य के बाहर में है मनुष्य की क्षमता के बाहर है। इहार आभा श्री मां अन्य भाई छिले इस बात का जो आभास है मां को अन्य रूप से ही अन्य रूप से भी मिला था। अब यह पूरा एक दूसरा प्रसंग स्टार्ट होता है अभी यहां से। तो उसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु