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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 13 Sept 2023

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ओम संस्थापक अध्यक्ष शक्ति का जो पृथ्वी पर अवतरण है आध्या शक्ति का जगत के भीतर में जो अवदान है जो मिशन है उसमें सहायता करने के लिए स्त्री एक स्त्री को अपना गुरु बनाया है मां शारदा देवी की शिक्षा और दीक्षा उन्होंने की है और साथ में ही जो कर पॉइंट है उसमें से एक पॉइंट गंभीर नानजी महाराज ने कहा था की मधुर भाव साधन स्त्री वेस्ट धरण करके किया था की लीला प्रश्न में से हम लोग इस बात का थोड़ा सा डिस्कशन करेंगे इस यह मैंने भी जब पहले बार इसको पढ़ा था मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ की यह किस तरह की साधना है क्या यह साधना क्या ठीक है की नहीं शक्तिशाड़ना के बड़े में हमको थोड़ा सा संदेह हो सकता है की उसके बड़े में हमने जो कुछ भी पढ़ा है उससे हमको ऐसा प्रतीत होता है की मनुष्य के मां को थोड़ा सा वो करप्ट करने वाली साधना है की नहीं मनुष्य के मां में यदि वह थोड़ा सा डिस्टरबेंस प्रगति कर शक्ति है की नहीं तो यह साधना के बड़े में भी मधुर साधना के बड़े में भी हमको इस तरह का थोड़ा सा संदेह हो सकता है उसके बाद में मैंने लीला प्रसंग में शरद महाराज जो लिखने हैं उसको बड़े ध्यान से पढ़ा और मुझे लगा की हालांकि ये साधना सभी के लिए नहीं है किंतु साधना के रूप में यह सर्वोच्च साधनाओं में जो कुछ साधनाएं शामिल है उसमें यह मधुर भाव यह ए सकता है तो शर्ट महाराज है इसके बड़े में क्या कहते हैं थोड़ा सा पढ़ने हैं मैं फिलासफी इसका बहुत सुंदर तरीके से महाराज ने डिस्क्राइब किया है किंतु इसको मैं थोड़ा सा स्किप कर देता हूं मैं सीधा वहां पे चलता हूं जहां पर ठाकुर ने सीधे ये भाव की साधना का प्रारंभ कर दिया था हालांकि पहले से ही पता है की इसके पहले शरद महाराज ने के ही दिया है की ठाकुर के ठाकुर में स्त्री और पुरुष दोनों भाव के अंश पहले से ही विद्या मां थे मैन यह नहीं है की वो मधुर भाव साधना के समय में यह सब भाव प्रगति हुए थे पहले भी जैसे की ठाकुर की अवलोकंद दृष्टि जो बड़ी ही शिक्षक थी उसका एक उदाहरण है की एक स्त्री है जिसका चरित्र यदि अच्छा नहीं है तो वह किस तरह से वह बिहेव करती है इसका एक लंबा सा वर्णन ठाकुर ने अपने शिष्यों के साथ में एक बार किया था अभी ये ऑब्जरवेशन ठाकुर ने कब किया था जब वो कमपुकुर में थे वो बच्चे थे तब तो तभी से उनकी नजर में यह भाव को पकाने की क्षमता और भाव को मिमिक करने की क्षमता बड़ी ही तीव्रता पहले से ही और जिसका शरीर और मां संपूर्ण रूप से शुद्ध होता है वही इस साधना को इस भाव को संपूर्ण रूप से समझ सकता है तो पहले से ही ठाकुर में ये सब था किंतु जब इस भाव की साधना उन्होंने आरंभ की तब यह भाव उनमें संपूर्ण रूप से निखार उठा संपूर्ण रूप से प्रकट हुआ तो शरत महाराज का थोड़ा सा वर्णन हम पढ़ लेते हैं सबसे पहले तो हमारी श्रीमती राधा रानी के जीवन में किस तरह की यह भाव प्रकट हुआ था इस भाव का क्या महत्व है उसका वर्णन करके एक ही पैराग्राफ का सीधा फिर ठाकुर के जीवन में किस तरह से ये घटनावली एक के बाद एक उपस्थित हुई उसकी और हम जाएंगे तो सबसे पहले श्रीमती के जीवन में श्रीमती राधा रानी के शरद महाराज लिखने हैं भक्ति ग शोकोले लिखी तो अच्छे भक्ति ग्रंथ जितने भी है उसमें लिखित है बृजेश्वरी श्रीमती राधा रानी केवल मंत्र यथार्थ हो अतींद्रिय प्रीमियर पराकाष्ठा जीवन में प्रत्यय को पूर्वक उहर पूर्ण दर्शन जो होते रखिए गया सेंटेंस अर्थात एक-एक शब्द को लेकर के आप 10-10 मिनट डिस्कस कर सकते हैं इतना कंसंट्रेटेड और इतने शब्द भी बड़े-बड़े सेंटेंस भी बड़े-बड़े और एक सेंटेंस इतना मतलब उसमें पावर होता है की यदि डिस्कस करें तो एक क्लास एक सेंटेंस में चला जाए अभी कहते हैं श्रीमती राधा रानी ही एकमात्र यथार्थ अतींद्रिय प्रेम की पराकाष्ठा इस जीवन में प्रत्यक्ष प्रदर्शित करके उसका पूर्ण आदर्श इस जगत में स्थापित करके गई है अतींद्रिय प्रेम इंद्रिय प्रेम तो है किंतु अतींद्रिय प्रेम की जो पराकाष्ठा है उसका आदर्श किसने स्थापित किया तो श्रीमती राधा रानी ने लज्जा घृणा भाई झाड़ियां अर्थात की लज्जा घृणा और भाई ये तीनों का त्याग करके लोग भाई समाज भाई प्रीती कोरिया लोक भाई और समाज बे इसको भी त्याग करके जाति कॉल सील पद्मरिया डा और नीचे देखो जाति कॉल सील पद्मरिया डा और अपने खुद के डे और मां के सुख और भोग की बात संपूर्ण रूप से विस्मृति हो करके और साथ में ही पद्मरिया डा और संपूर्ण रूप से इस्मत होकर के भगवान श्री कृष्णा कृष्णा सुखी केवल मंत्र के सुखी अनुभव को रेट अर्थात की भगवान श्री कृष्णा के सुख में अपना सुख ये अनुभव करके तहर न्याय द्वितीय दृष्टांत भक्ति शास्त्र पवैया उनके जैसा दूसरा दृष्टांत इस भक्ति शास्त्र में मिलने का संभावना नहीं है अपने खुद के बड़े में ज्यादातर लोग सोचते हैं और बोलते हैं की मैं साधना करता हूं तो मुझे मुक्ति प्राप्त होगी इसके रिलेटेड ठाकुर का एक सुंदर छोटा सा उदाहरण है की वह नारद मनी भगवान कृष्णा को कृष्णा कर रहे हैं वहां द्वारिका में की आपके सबसे बड़े शिष्य कौन है तो वह मैन इनडायरेक्ट शो इस तरह से प्रश्न करके वो सुन अपने खुद की प्रशंसा सुना चाहते होंगे बहुत सारे लोग अपना मां बढ़ाने के लिए या तो अपने खुद के बड़े में बोलने के लिए इस तरह के हाइपोथेटिकल क्वेश्चन खड़े करते हैं की अच्छा ये इतना सुंदर कम किसने किया फिर कोई बोलेगा की अरे किसने किया पता नहीं फिर हम लोग इनडायरेक्ट बोल देंगे भाई मैंने ही किया तो ऐसे यहां पे एक बार जब 2013 की बात है या बहुत बड़ा युद्ध कन्वेंशन हुआ था राजकोट में तकरीबन 2 3000 स्टूडेंट इकट्ठा हुए थे तो अभी दो-तीन हजार स्टूडेंट का रजिस्ट्रेशन एक दिन का सुबह को जब एक बार में सब स्टूडेंट आएंगे तो सब का रजिस्ट्रेशन एक साथ में करना मां सोच लीजिए की कितना बड़ा कम है दो-तीन हजार स्टूडेंट एक साथ में ए जाएंगे साथ में उनके अभिभावक रहेंगे पिक्चर्स रहेंगे प्रेस वाले रहेंगे और पर क्लिक किया गया था की आश्रम का गेट है वहीं पर उनका रजिस्ट्रेशन करके उनको वो बीच देकर के वो बाद में ही उनको भीतर में ले जाना है क्योंकि इतना बड़ा इवेंट है कोई एनोडतुरई इस परसों यदि भीतर में ए जाता है कुछ गड़बड़ करता है तो बिना मतलब ये कॉलेज के लड़के लड़कियां हैं की कुछ भी हो सकता है तो इसलिए वो काउंटर के वहां पे गेट के पास में लंबा काउंटर बना करके तीन-चार कंप्यूटर रख दिए थे और वहां पे इमीडीएटली वो कंप्यूटर में एंट्री करके वो रजिस्ट्रेशन होता था अभी हुआ ऐसा था की रजिस्ट्रेशन करने का सॉफ्टवेयर पूरा मैंने बनाया था तो वो सुबह को मैं जाकर के वहां पे खड़ा र गया देखने के लिए वो सब हम लोग 3-4 साधु लोग पूरा चारों और मैदान में चक्कर लगा रहे हैं देख रहे थे और इतने सारे लोग ए रहे हैं अरे वह कितना अच्छा कार्यक्रम हो रहा है तो फिर मैं इन साधुओं को बोला चलो जाकर के काउंटर पे दिखाई हैं क्या हो रहा है तो रजिस्ट्रेशन चल रहा था तो अभी मेरा यार ऐसा इरादा था की अभी इनडायरेक्ट इनको बताया जाएगी यह सॉफ्टवेयर मैंने बनाया है क्योंकि इतने सारे कंप्यूटर पर सिमुल्टेनियसली रजिस्ट्रेशन करना इतने सारे लोगों का मैं बड़ा मुझे उसे समय बड़ा घर था की हां मैंने ऐसा कुछ किया है तो वो मैं तीन-चार साधु थे तो हम लोग जा करके वहां खड़े हो गए अभी एक्चुअल रजिस्ट्रेशन तो वॉलिंटियर लोग कर रहे थे 5-6 वॉलिंटियर बैठे थे लाइन में तो मैं वहां पीछे जाकर के खड़ा र गया है और फिर मैं एक साधु को बता रहा हूं की यहां पे इस तरह से और रजिस्ट्रेशन होता है इस तरह से होता है ये फंक्शन है वो मतलब जैसे की बताया जाता है बिना कहे की मैंने ये सब किया है मैं सोच रहा था की वो कब पूछेंगे की ये किसने किया तब मैं बताऊंगा तो अभी मैं खड़ा था वहां पे और मैं ऐसा कंप्यूटर में कुछ दिखा रहा था अब एक वॉलिंटियर मुझे बोलना है महाराज जिसको हाथ मत लगाइएगा ये बड़ा कॉम्प्लिकेटेड सॉफ्टवेयर है आप हाथ लगाने से गड़बड़ हो जाएगा मुझे हंसी भी आया और मुझे बड़ा गुस्सा भी है अभी देखिए की मुझे ये मौका नहीं मिल रहा है बताने का की ये मैंने बनाया है और ऊपर से ये वो मुझे बता रहा है की मैं उसको हाथ लगाऊंगा तो गड़बड़ हो जाएगा बड़ा कॉम्प्लिकेटेड सॉफ्टवेयर है है तो कभी-कभी ऐसा भी होता है की मैंने आप अपनी प्रशंसा सुनने का पर्यटन करते हैं तो कुछ उल्टा ही हो जाता है वह साधु लोग भी हंसना शुरू कर दिए अरे चलो चलो ये बड़ा कॉम्प्लिकेटेड चीज यहां से चले और कहानी जा करके खड़े रहते हैं तो यहां पे नारद मनी ने भी शायद ऐसा सोचा होगा की मैं कहूं भगवान को की आपका सबसे बड़ा भक्ति कौन है तो भगवान बोल देंगे की आप यह नारद मनी तो अभी ऐसा नहीं करके भगवान ने कहा की देखो तुम एक टेस्ट करो जितने भी मेरे भक्ति हैं जाकर के उनको बोलो की मुझे मैं बड़ा ही बीमा हो गया हूं बड़ी कठिन भी आई हुई है वही धीरज ने कहा है की भक्ति के चरणों की राज यदि मुझे दी जाए और चरणों की राज में धरण करूं तो मुझे इस व्याधि से वो मुक्ति हो शक्ति है तो अभी जो तुम जाकर के भक्ति के चरणों की राज लेकर आओ मेरे लिए मुझे धरण करने के लिए तो अभी नारद मनी सोने लगे की ऐसा तो कौन भक्ति होगा की अपने चरणों की राज देगा खुद तो देंगे नहीं अपने चरणों सूरज भगवान को देना मानिए तो कितना बड़ा अपराध हो गया भगवान के चरणों की राज हम लेंगे हमारे चरणों की और कैसे लेंगे ये तो बहुत बड़ा अपराध तुम नारद मनी खुद ने तो दिया नहीं चारों और घूमते वो रुक्मिणी वगैरा जितनी भी रानियां है जितने भी ये उनके सेवक वगैरा है सब ने माना कर दिया बोले क्या अरे भगवान तो अपनी माया से कभी भी बीमा हो सकते कभी भी वो ठीक भी हो सकते हैं उनको हमारे चरणों के राज की क्या जरूर है वैसा देने से हम लोग के पाप में पढ़ेंगे तो ऐसा घूमते घूमते नंद मनी वृंदावन में ए गए और गोपियों को कहा की आपके चरणों की राज दीजिए तो भगवान श्री कृष्णा को उनकी बीमारी व्याधि में से उनको मुक्ति मिल सके तो सभी गोपियों ने अपने चरणों के रख देना शुरू कर दिया ये लो ये लो अब हमारा खुद का क्या होगा उसकी फिक्र नहीं है भगवान को चरणों की राज दी हमको श्राप मिलेगा हमारा अध्यापक पाटन होगा नरक में जाएंगे डीएजेंस मटर भगवान सुखी रहे भगवान स्वस्थ रहे यह सबसे बड़ी बात है मैं संपूर्ण रूप से ईश्वर के श्री चरणों में समर्पित हूं और मुझे भगवान की ही खुशी देखनी है भगवान के चेहरे पे ही हास्य देखना है मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए तो ऐसा जब उन्होंने किया तब नारद मनी को पता चला की भगवान के प्रति सबसे ज्यादा श्रेष्ठ भक्ति या प्रेम किसका है जो की अपने को विस्मृति हो जाता है वो और सिर्फ भगवान का ही सुख वो देखा है वो भक्ति की पराकाष्ठा है अब लोग अभी इसके कंपेयर में आजकल क्या करेंगे मंदिर में जाएंगे बोलेंगे भगवान हमको यह दे दो हमको वो दे दो अपने लिए ही मांगते रहेंगे और सोचते रहेंगे की भगवान तो इतने ऐश्वर्या साली है त्रिभुवन के वो महाराजा है उनके साथ में तो ये सब ऐश्वर्या धन वगैरा देना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है किंतु सच्ची जो भक्ति है वह भगवान को अपना खुद का बेटा है जैसे की मां यशोदा या तो फिर वह पति या प्रेमी जैसे गोपिया या राधिका श्रीमती राधिका वो अपना खुद का एक रिलेटिव एक अंगत एक मित्र एक बहुत ही नजदीक के अपने खुद के आदमी है इस तरह से जो सोचता है वो भक्ति की पराकाष्ठा है मुझे उनसे कुछ नहीं चाहिए मुझे उनकी सेवा करनी है ठाकुर जब कैंसर हुआ था तो अभी कैंसर के बड़े में तो इतना किसी को नॉलेज आज जितना है उतना नहीं था तो किसी किसी ने बोलना शुरू कर दिया अरे ये लड़के लोग सब ठाकुर की सेवा कर रहे हैं यदि उनको इंफेक्शन ग गया तो आप जैसे कोरोना में किस तरह से किसको कोरोना हुआ है तो लोग डॉ में दाल दो अपने घर में किसी को कोरोना हुआ है तो दरवाजा बैंड करके उसको रख देते थे और मतलब इनफेक्शियस डिजीज तो कितना डेंजरस है तो अभी यह कैंसर इनफेक्शियस है की नहीं वो किसको पता तो अभी इस तरह के बातें होना शुरू हुई तो जी ने क्या किया ठाकुर के गले में से जो पस वगैरा जो निकाला था मैंने वो तो कितना भयानक होता है उसमें तो रोग के कीटाणु तो हो गई होंगे प्लस ये शरीर का ये सब लिक्विड यानी की कितना दुर्गंध और कितना खराब चीज है वो स्वामी जी ने एक ग्लास में इकट्ठा किया और आराम से पी गए निर्विकार रूप से और बोला की देखो अभी ये इनफेक्शियस होगा तो मुझे होगा ये डिजीज ओ मुझे नहीं होगा तो फिर इनफेक्शियस नहीं है ये इनकी सेवा करना ठाकुर की सेवा करने से कोई हमको नुकसान नहीं है देखिए की अब स्वामी जी ने इतना साहस था की वो ये कर पे इसलिए नहीं की उनको ठाकुर से मुक्ति चाहिए थी इसलिए की ठाकुर के सुख ठाकुर का स्वास्थ्य वही उनकी सर्वश्रेष्ठ कामना थी घर बार छोड़कर के ठाकुर की सेवा के लिए ये लोग यहां पे आए थे और सामने उनको देने के लिए कुछ नहीं था ठाकुर ने खुद एक बार बोला था की मेरे पास में यह लड़के लोग क्यों आते हैं मेरे पास में है क्या देने के लिए मेरे पास में कोई आदमी ए जाता है तो उनको बिठाने के लिए चटाई भर नहीं है तो ऐसा मतलब ठाकुर तो निर्धन थे उन उनका तो जो भी कुछ सेवा का भर था ये तो काली मंदिर का था पहले माथुर बाबू थे उसके बाद में उनके लड़के द्वारिक बाबू थे तो ये लोग तो ठाकुर की जो कुछ भी सेवा या तो फिर उनके लिए जो कुछ भी करना है वो करते थे तो मेरे पास तो कुछ भी नहीं है फिर भी ये लोग मेरे पास क्यों आते हैं ठाकुर ऐसा रिटोरिकल क्वेश्चन करते हैं इस तरह के क्वेश्चन जिसका कोई उत्तर नहीं है उसको रिटोरिकल क्वेश्चन कहता है या तो फिर उत्तर स्वयं सिद्ध है ये लोग आते हैं इसके लिए क्योंकि ठाकुर के भीतर में उन्होंने परमात्मा का दर्शन किया है ये भवन आत्म भावनात और नरेंद्र दोनों साथ में आते थे तो ठाकुर ने कहा भी था की भौनाथ की बड़ी उच्च अवस्था है किंतु जब ठाकुर को कैंसर हुआ तो ऐसे लोग जो की ठाकुर के पास कुछ प्राप्त करने की आशा रखते थे की हां हमको मुक्ति मिल जाएगी या जो कुछ भी है जीवन में मिल जाएगा तो उसे समय ऐसे लोग चले गए ठाकुर ने कहा था कैंसर क्यों हुआ लोग बादशाह ये फिर जानो बंगाली शब्द है अर्थात लोगों को फिल्टर करने के लिए जो अंतरंग है वो र जाएंगे वही रंग है वो चले जाएंगे सोचेंगे की अरे भैया वो खुद का कुछ कर नहीं का रहे अपने खुद के कैंसर से इतने पीड़ित हैं तो हमारे लिए वो भला क्या करने वाले हैं तो छोड़ो उनको और किसी परमहंस को खोजें और ये परमहंस से तो भारत में कोई कमी नहीं है गली-गली में पर हम उसे खड़े हो जाते हैं तो ये नहीं तो और कोई परमहंस तो खोजने हैं तो ऐसा करके भी रंग लोग चले गए और अंतरंग लोग र गए अंतरण क्यों र गए ठाकुर की सेवा करने की इसके लिए नहीं की उनको कुछ प्राप्त होने वाला है जो देख सकते हैं की यदि ठाकुर के पास कोई सिद्धि होती तो पहले अपना खुद का इलाज करते बाद में तो फिर इनके लिए कुछ रख करके जाता है मैन इस तरह के पिताजी जिनके पास में ना ही धन है वो निर्धन है और लड़के लोग उनकी सेवा कर रहे हैं तो वह कोई क्योंकि पता है की वो प्रेम से ही उनकी सेवा कर रहे हैं वो पिताजी उनके लिए कोई धन रख कर के नहीं जान वाले वरना ये जितने भी हम लोग एक कहानियां में पढ़ने हैं या तो न्यूज़पेपर में पढ़ने हैं बड़ा धनी व्यक्ति है बीमा होता है 10 लोग आसपास में आकर के खड़े हो जाते पूछते हैं की अच्छा दादा जी काका जी आपको अभी क्या चाहिए आपके लिए जो कुछ भी सेवा करने हैं हम लोग तैयार हैं बात ये नहीं है की उनके स्वास्थ्य की बड़ी चिंता है बात ये है की अभी उनका जान का समय ए गया तो बिल में अपने लिए कुछ रख करके जाएंगे तो वो एक सा कम सेवा से कम श्रद्धा से कम भक्ति और दूसरी हो गई संपूर्ण रूप से निष्काम भक्ति या तो संपूर्ण रूप से स्नेहा को भालोबाशा अर्थात की प्रेम के वाष्प करके किया जान वाली भक्ति वहां पर उनके खुद के यहां पर देखिए की महाराज ने कितने सुंदर सुंदर शब्द उसे किया हैं लज्जा घृणा और भाई छोड़ कर के लोग भाई समाज भाई को छोड़कर के राधा रानी तो विवाहित थी उनके पति भी थे अभी विवाहित स्त्री अभी इस तरह से जाकर के भगवान कृष्णा को मिलती है तो हमको तो लगता है की भगवान कृष्णा है उनके पति की या तो फिर ये ससुरा में किस तरह से उनको किस दृष्टि से देखा जाएगा हम तो अनुमान करके का सकते हैं तो लोग भाई और समाज भाई को छोड़ करके जाति कॉल सील पद्मरिया डा वो सब छोड़ कर के वो अपने खुद के डे मां के भोग सुख की बात संपूर्ण करके जब भगवान कृष्णा वृंदावन में से मथुरा चले गए उसे समय महायुद्ध बड़ी ही शोक पुल थी और राधा रानी के पास गई वो वहां पर सम बैठी थी ध्यान में मैग्ना थी और समाधि में बैठी थी अभी जैसे ही मां यशोदा ठाकुर की कहानी है यह तो ठाकुर कहते हैं जैसे की मां यशोदा गई राधा रानी का दर्शन किया तो राधा रानी ने आंख खोल करके मां को कहा की मां आप वरदान चाहिए मेरे से मैं आपको एक वरदान देती हूं आपको क्या वार चाहिए तो मैन क्या कहा यशोदा ने की और कुछ नहीं चाहिए बस इस आंखों से हमेशा बालक गोपाल का दर्शन हो हमेशा इस हाथों से बाल गोपाल की सेवा हो और हमेशा इस मां से बाल गोपाल का चिंतन होता है तो आध्या शक्ति राधा रानी स्वयं आपको वरदान देने के लिए तैयार है किंतु मानते क्या है वरदान में सिर्फ वही गोपाल की सेवा और चिंता और उनका स्मरण बना है तो ये हो गया उसे तरह का प्रेम जो की इंद्रिय के राज्य को पर करके और केंद्रीय राज्य में जाकर के अपने खुद का संपूर्ण विस्मरण करके ईश्वर में संपूर्ण रूप से ओटपोट हो गया है इस तरह का ये प्रेम और इसकी सर्वोच्च पराकाष्ठा है वो है राधा रानी महाराज जी लिखने हैं तहर न्याय द्वितीय दृष्टांत स्थल भक्ति शास्त्र पावर चीन राधा के जैसा दूसरा दृष्टांत संपूर्ण रूप से अपने को न्योछावर कर देना संपूर्ण रूप से भगवान कृष्णा में समाहित हो जाना भगवान में समाहित हो जाना दूसरा दृष्टांत भक्ति शास्त्र में नहीं है शास्त्र सृजन एन बोले श्रीमती राधा रानी कृपा कटक को बिन्नू भगवान श्री कृष्णा ने दर्शन लाभ जगत कोनो संभव पर नहीं शास्त्र इसीलिए कहता है की राधा रानी के कृपा कटाक्ष के बिना भगवान कृष्णा का दर्शन जगत में कभी भी संभव पर नहीं है जैसे वो ठाकुर का जो उदाहरण है भगवान राम सीता और लक्ष्मण वन में से जा रहे हैं भगवान मां सीता बीच में चल रही है तो भगवान लक्ष्मण को भगवान राम के दर्शन नहीं हो रहे तो वो हाथ जोड़कर के मां सीता को प्रार्थना करते हैं कहते हैं की मां आप रास्ता छोड़ दीजिए कृपा करके तब मैं भगवान का दर्शन कर पाऊं तो अभी मां यदि कृपा करके आपका रास्ता छोड़ दे आपका रास्ते के भीतर में जो माया का आवर्धन है जो व्यवधान है उसको हटा ले तभी कहानी जाकर के ईश्वर का दर्शन संभव है करण सच्चिदानंद गान विग्रह भगवान श्री कृष्णा श्रीमतीर प्रेम चिरकाल शरबतों भावे आबूतूत हत्या हरेंगी ते भक्तों शोकोला मनोभिलाष पूर्ण करें कितनी बड़ी बात का दी क्यों क्योंकि सच्चिदानंद गान विग्रह भगवान कृष्णा श्रीमती के प्रेम में क्या कल संपूर्ण रूप से अपने को बैंड करके मां राधा के इंगित से ही इशारे से ही भक्ति सकल की मनोबिलास पूर्ण करते हैं भगवान श्री कृष्णा तीनों जगत के नियंत्रण वह सृष्टि स्थिति प्रलय जो की उनके कृपा कटाक्ष से जो होती है वह राधा रानी के प्रेम में बंदे हुए हैं और राधा रानी के प्रेम उनकी इशारे के बिना राधा रानी के आदेश के बिना भगवान कृष्णा किसी पर कृपा नहीं करते अग्नि है और अग्नि की दही का शक्ति है एक दी का शक्ति और अग्नि इन दोनों को आप कभी भी अलग नहीं कर सकते यदि ठाकुर और मां के बड़े में कहा जाए तो मैंने शायद इसे एक बार कहा था की गुजरात में मैंने सुना है किसी किसी से मुझे सही गलत पता नहीं ये बातें बहुत कुछ चलती रहती है भक्तों के मुंह से तो ऐसा मैंने सुना है की गुजरात ने एक खास करके ऐसा है की किसी विग्रह को भगवान को बिजनेस में पार्टनर बनाया जाए तो ऐसे जिसको स्लीपिंग पार्टनर कहते हैं ना की मैंने एक सूक्त एक जिनका की बिजनेस में ये है और फिर उनका जो प्रॉफिट है वो उनकी सेवा के लिए दे दिया जाएगा तो ऐसा करके एक प्रथम है ये हाथ के कुछ व्यापारियों में तो ऐसा प्रयोग करके देखा गया है की भगवान राम कृष्णा को यदि पार्टनर में बनाते हैं अपने बिजनेस में तो प्रॉफिट कभी नहीं होता किंतु शारदा को पार्टनर बनाते हैं उनमें उनका ऐसे उन पार्टनर के रूप में उनका नाम रखते हैं है तो प्रॉफिट ही प्रॉफिट होता है तो देखिए की शक्ति जो है वो तो मां के पास है मां जब कृपा करेगी तब वो भगवान रामकृष्ण की दया होगी और सिर्फ वो मुक्ति ही नहीं यहां तक की अर्थ कम धर्म एक तीनों ही उनके हाथ में धर्म अर्थ कम मोक्ष ये कर पुरुष अर्थ है तो मोक्ष के साथ में धर्म और अर्थ भी मां के कृपा कटाक्ष से ही मां की सहमति से ही मां के आशीर्वाद से ही प्राप्त होते हैं श्रीमतीर कम गांधी प्रीमियम अनुभव अनुरूप जाति है प्रेम लाभ ना हौले केहू को खोलो ईश्वर के परिपाटी एवं मधुर भाबी पूर्ण मधुर जो उपलब्धि कारी टेकरी बिना श्रीमती राधा रानी के जी तरह से कम गांधी जो प्रेम है या तो फिर इसके तरह का और कोई प्रेम यानी की मां यशोदा का बाल कृष्णा के प्रति है पूर्ण रूप से मातृ भाव इस तरह का कोई प्रेम ना हो अपने हृदय में ईश्वर के प्रति ईश्वर के साथ में कोई रिलेशन ना प्रकट हो तब तक कोई भी कभी भी ईश्वर को प्रतिभाओं से लाभ कारी ते मधुर भावे पूर्णमधुर्य उपलब्धि कारी ईश्वर को पति रूप से प्राप्त नहीं कर पाएंगे और मधुर भाव का पूर्ण माधुरी या अर्थात की मधुर भाव का जो पूर्ण आदर्श है वो प्राप्त नहीं कर पाएगा भक्ति शास्त्रीय कथा बुद्धि से पराजय मां राधा रानी के भाव की साधना करने से ही भगवान कृष्णा को पति रूप में प्राप्त कर सकते हैं और तभी कहानी जाकर के उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं अभी दूसरे पैराग्राफ में शरद महाराज लिखने हैं की किस तरह से यह श्रीमती राधा का जो मधुर भाव है यह मधुर भाव रूपी साधना है वो एक बार तो अपने पुराने में एक बार तो यह प्रगति हो चुका था यह जो हमारी वैदिक सनातन परंपरा है उसमें तो इसका प्रादुर्भाव को ही चुका था किंतु बीच का जो समय है उसमें ये भाव लुप्त हो गया था और इस लुप्त भाव को पुनः जागृत करने के लिए जैसे की वेदांत का लुप्त भाव पुनः आविष्कार करने के लिए भगवान शंकराचार्य का पृथ्वी पर आगमन हुआ तो वैसे ही मधुर भाव या तो फिर ये भाव साधना या तो फिर यह भक्ति शास्त्र का यह सार्थक हुआ इसका पुनः अविष्कार करने के लिए पुनः इसको पृथ्वी पर प्रतिपादित करने के लिए भगवान श्री कृष्णा चैतन्य का आगमन हुआ प्रोग्राम महाप्रभु का पृथ्वी पर अवतरण हुआ तो इसके बड़े में एक पैराग्राफ शरत महाराज का है ब्रजेश्वरी श्रीमती राधा रानी प्रीमियम देबो महिमा माया रहित विग्रह परमहंसगरानी श्री सुखदेव प्रमुख आत्मा राम मनीष कलर द्वारा बहू शक गीत हीले अर्थात की बृजेश्वरी श्रीमती राधा रानी के प्रेम की दिव्या महिमा माया रहित विग्रह परमहंस दिव्या महिमा माया रहित विग्रह परमहंस अग्रणीय श्री सुखदेव प्रमुख अभी शुक्र देव की परिचय भी किस तरह से देते हैं जो माया रहित थे और परमहंस अग्रणी है इस तरह के सुखदेव द्वारा आत्माराम मनी शकलिया द्वारा इस तरह के मनी जो की आत्माराम है इन सबके द्वारा बहुभ शाह गीत हीले हो अर्थात की बहल अनुच्छेद उनकी महिमा कहां पर हुआ है तो श्रीमद् भागवत में श्रीमद् भागवत में मां राधा रानी के प्रेम का भाव यह सुखदेव मनी सुखदेव जी द्वारा और भारत के बहुत सारे मुनियों द्वारा इसका बहुत अच्छे से ज्ञान महिमा प्रतिपादन हो चुका है किंतु फिर खोल ओ भारत और दोनों साधारण वहां की रुपए जीवन में उपलब्धि कारी ते हुए तहबाहुकाल पर जंतु बुझने पैर ने भारत का जो जनसाधारण है वह बहुत समय तक यह समझ नहीं पाया की श्रीमती राधा रानी का भाव अपने जीवन में किस तरह से प्रतिपादित करें इसीलिए कहते हैं अर्थात गौड़ देश के जो की बंगाल का एक हिस्सा है वहां बुझाईबार जानना श्री भगवान के श्रीमती सहित मिली तो हो या एक आधारित एक शरीर अवलंब ने पुणे यह समझने के लिए श्री भगवान को श्रीमती के साथ में मिलित होकर की एकर या एक शरीर में फिर से अबीर भूत होना पड़ा है कृष्णा अवतार में श्रीमती अलग थी भगवान कृष्णा का डे अलग था और श्रीमती के डे द्वारा भगवान श्री कृष्णा के डर में वो पूछा अर्चना हुई किंतु अभी आधुनिक समय में श्रीमती के जो अंश है श्रीमती का अंश और भगवान कृष्णा का अंश दोनों एक ही शरीर में भगवान कृष्णा चैतन्य के देखो में एक साथ में आमिर्भुत हुए अर्धनारीश्वर जो भगवान ने शंकर की जो कल्पना है तो यहां पर शरीर तो न का था देहात और श्री माटी के भी थे और भगवान कृष्णा के भी थे दोनों के थे अतः कृष्णा बहिर गौर रुपए प्रकाशित श्री गौरांग देवी मधुर भावे प्रेम आदर्श प्रतिष्ठा कुरते अमीर भूतों श्री भगवान कोई पूर्वक विग्रह अतः कृष्णा बहिर गौर गौर अर्थात की गौरवर्ण और कृष्णा अर्थात की कल रंग तो अतः कृष्णा बहिर गौर अर्थ आपकी भीतर में कृष्णा का भाव है मैन एक बहुत ही काव्या आत्मक रूप से कहा गया है भीतर में कल है बाहर में गोरे है अर्थात की बाहर में भले ही चाहे वो गौरांग रूप धरण करके आए हैं भीतर में तो कृष्णा के ही भाव है कृष्णा का भी और राधिका का भी वो बहिर गौर रुपए प्रकाशित श्री गौरांग देव ही मधुर भाव के प्रेम आदर्श की प्रतिष्ठा करने के लिए श्री भगवान का यह अपूर्विग्रह रूप के विग्रह के रूप में शरीर धरण किया हैं श्री कृष्णा प्रेमी राधा रानी शरीर मैन जेसन को लोखंड प्रकाशित हुई तो श्री कृष्णा प्रेम के मध्य श्री कृष्णा प्रेम की वजह से राधा नई आ राधा रानी के श्री अंग में जो लक्षण प्रकाशित होते थे शेष तो लोखंड ईश्वर प्रीमियम प्रॉबलिए श्री गौरंगज़ेब श्री समस्त लखन ईश्वर प्रीमियम प्रोबेबलीय अबीर भुट्टो हुई ते देखिए गोस्वामी गाना के श्रीमती बोलियां निर्देश कोरिया छान कृष्णा प्रेम से मतवारी हो करके कृष्णा प्रेम से अपने अपने मां को पूरा उनके श्री चरणों में समर्पित करके राधा रानी के श्री अंग में जो लक्षण प्रकाशित होते थे वही लक्षण भगवान कृष्णा चैतन्य के प्रकाशित होकर के देख करके निर्देश दिए हैं उनको श्रीमती का के उनको पुकार है और तो श्री गौरांग देव जी अतींद्रिय प्रीमदर्शत द्वितीय दृष्टांत स्थल एक था भुज जाए अर्थात इसकी वजह से श्री गौरंगदेव अतींद्रिय प्रेम का जो आदर्श है उसके ये दूसरे दृष्टांत है यह बात हम समझ सकते हैं सर्वप्रथम सर्वश्रेष्ठ दृष्टांत्रिया प्रेम का हुई राधा रानी और दूसरे हो गए भगवान कृष्णा चेतन अभी यह हमने प्रिलिमनरी देखकर के भगवान रामकृष्ण देव के जीवन में किस तरह से मधुर भाव का प्रवृत्ति हुआ है ये दो-तीन पैराग्राफ जो शरद महाराज ने यहां पे वर्णित किया है वह हम कल देखते हैं