Invocation
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते
Challenges in meditation
नमः आज एक डिफिकल्ट टॉपिक पर बात करते हैं। कल एक वॉलंटियर के साथ में मेरा वार्तालाप हो रहा था। तो उन्होंने मुझे पूछा कि मैं कितनी देर तक ध्यान कर सकता हूं कंटीन्यूस? तो ऐसा सब वार्तालाप हो रहा था। तो मैंने कहा मेरे लिए प्रॉब्लम यह नहीं है कि मैं यदि ध्यान करने को बैठूं तो मन एकाग्र ना हो। प्रॉब्लम या तो फिर चैलेंज मेरे लिए यह है कि जिस समय हम ध्यान नहीं करते हैं उस तरह का कोई कार्य करते हैं कि जिस समय माइंड फ्री रहता है। शरीर कार्य करता है किंतु माइंड फ्री रहता है। जैसे कि खाना खाने का कहीं पे जा रहे हैं, वॉकिंग कर रहे हैं, घर की साफ सफाई कर रहे हैं। इस तरह के कार्य या तो फिर इवन ऑफिस में भी कभी बैठे हैं तो उस समय मन जो है उसके भीतर में सतत ईश्वर चिंतन ही चलता रहे यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है। जब हम ईश्वर चिंतन करने के लिए विधिवत बैठते हैं तो तो ईश्वर चिंतन कर लेंगे। वो दैट्स नॉट अ बिग डील। किंतु फिर जीवन के जो बाकी जितने भी एस्पेक्ट हैं उन सब में ईश्वर चिंतन को कैसे लाया जाए उस समय अपना मन इधर-उधर ना भटके यह एक चैलेंज है। तो खैर फिर और भी थोड़ा सा वार्तालाप हुआ कि किस तरह से ध्यान और जप वगैरह किया जाता है। यह सब मेथड्स क्या है जिसके माध्यम से हम ध्यान को और भी बेटर बना सके। तो मैंने सोचा कि जो कल वार्तालाप हुआ था उसके बारे में यहां पर थोड़ा सा मैं बात करूं।
Before meditation: forgive our opponents, our enemies, our detractors
हमने ऑलरेडी मैंने ऑलरेडी कुछ शेयर किया था ध्यान के बारे में कि जब हम ध्यान करने को बैठते हैं सबसे पहले तो हमको देखिए कि डिस्ट्रैक्शंस आते हैं। ध्यान करने के समय यह बात तो जग जाहिर है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु जैसे कि मैंने उसके कुछ वर्क अराउंड जैसे मैंने कुछ प्रिपेयर किए हैं। कुछ सॉलशंस प्रिपेयर किए हैं। उसमें से एक सॉल्यूशन यह है कि जब हम जप करने को या ध्यान करने को या तो फिर स्मरण मनन करने को बैठते हैं तो सबसे पहले तो जगत में जितने भी लोग हैं जिनके साथ में हमारा डीएलिंग हो रहा है जिसके साथ में हमको ऐसा लग रहा है कि वे लोग हमको हानि पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं या तो फिर हमारा बुरा चाहते हैं। सबसे पहले तो अपने हृदय के अंतः स्थल से उनको क्षमा कर देनी चाहिए। ईश्वर को प्रार्थना करनी चाहिए कि ईश्वर मेरे जितने पुण्य कर्म है इस जीवन में मैंने जो कुछ भी अर्जित किया हो वह सब मेरे विरोधियों को दे दीजिए जिससे कि क्या है कि वह अकाउंट यहीं पर समाप्त हो जाए। देखिए इसके बारे में एक मैं बात बताता हूं। मैं एक आश्रम में उस समय रह रहा था। तो उस समय अभी वहां से मेरे जाने का समय हुआ तो मैं सबको प्रणाम कर रहा था। अभी वहां पे और एक स्वामी जी खड़े थे। वह देख रहे थे कि मैं सबको प्रणाम कर रहा हूं करके। तो उन्होंने नोट किया कि मैंने एक साधु को प्रणाम नहीं किया। तो अभी उनका तो बड़ा शार्प ऑब्जरवेशन था और वह एक्सपेक्ट भी करते थे कि शायद मैं उनको प्रणाम ना करूं। तो इमीडिएटली उन्होंने मुझे पूछा क्यों रे उनको प्रणाम क्यों नहीं किया? मैंने कहा महाराज उनके साथ में मेरा पट्टा नहीं है। जाने के समय कहां अभी उनके साथ में मैं बात करने को जाऊंगा? जो भी है वह सब कुछ मैं यहीं पर रख के जाना चाहता हूं। जब नई जगह पर जाएंगे तो एक ब्लैंक अकाउंट ओपन करेंगे। पिछला सब भूल जाएंगे। तो वो महाराज ने मुझे कहा कि देखो तुम यदि उनको प्रणाम नहीं करोगे तो तुम्हारा वो अकाउंट हमेशा के लिए ओपन रहेगा। उनको प्रणाम करके उनके साथ में वार्तालाप करके तुम जाओ। उसके बाद में वह जो साधु है उनको तुम्हारा प्रणाम स्वीकार करना है नहीं करना है वह बाद की बात है। वह उनका मामला है। वह जाने और ठाकुर जाने। तुम अपना अकाउंट उनके साथ में क्लोज करना चाहते हो तो उनको प्रणाम करके जाना। तो मुझे लगा कि बात तो बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। हम लोग तो बच्चे था। मैं तो उस समय ब्रह्मचारी ही था। इतना अकल नहीं था मेरे में। किंतु यह महाराज ने कहा तो मैंने कहा ठीक है फिर मैं वह महाराज को प्रणाम करके वहां से निकला और सही में मैंने देखा कि उनके उस महाराज के साथ में जो भी मेरा डिफरेंस ऑफ ओपिनियन रहा हो वह उसी सेंटर में सब छूट गया बाद में उनके साथ में मेरा अच्छा मित्रता भी हो गया और पूरा मामला मैं भूल गया तो देखिए कि आपको यह आप अभी वह तो खैर मुझे एक सेंटर से दूसरे सेंटर जाना था किंतु यह जो है जप करने को बैठना ध्यान करने को बैठना वह भी ऐसा ही है। जैसे कि हम एक घर में से दूसरे घर में आते हैं या तो एक आश्रम में से दूसरे आश्रम में आते हैं। यह संसार आश्रम में से ईश्वर के आश्रम में आते हैं। जभी हम यहां पर ईश्वर चिंतन करने को बैठते हैं तो संसार के साथ में जितने भी अकाउंट है वह सब हमको क्लोज करने पड़ेंगे। सबकी क्षमा मांग दो। सबको अपना पुण्य अर्पित कर दो और जितने भी प्रोजेक्ट का भार अपने सर पर बैठा है वर्क प्लेस पर जो कोई भी काम चल रहा है उन सब से अपने मन को डिटच इस तरह से कर लो कि जैसे कि यह जगत मिथ्या है और जो ईश्वर चिंतन जो करने को मैं बैठता हूं वही सत्य है। तो वह एक प्राइमरी कंडीशन है कि यदि
Before Meditation: Close our account with the world
हम जप करने को ईश्वर चिंतन करने को बैठते हैं तो बाहर के जगत के साथ में हमको अपना अकाउंट क्लोज करना होगा। बहुत बार मैं किसी किसी के साथ में वार्तालाप करता हूं तो लोगों को यह बात समझ में नहीं आती है कि आप जगत के साथ में अपना अकाउंट कैसे क्लोज करेंगे? आप तो जगत के साथ में इतने जड़ित हैं। मेरा एक लेडी के साथ में बात हो रहा था। उनके घर में डोमेस्टिक प्रॉब्लम बहुत सारे हैं। वो अपने मदर इन लॉ, फादर इन लॉ वो जो जैसे डोमेस्टिक सिचुएशन में होता है तो उनके साथ में प्रॉब्लम था तो मैंने उनको कहा कि देखिए जब मेडिटेशन करते हैं, जप करते हैं उस समय यह सब भूल जाना है। वरना तो फिर क्या होगा ना जप कभी ठीक से नहीं होगा। तो उन्होंने कहा कि यह कैसे भूल जाए? वो उन्होंने मेरे साथ में यह किया, मेरे साथ में वह किया। यह सब क्या भूल सकते हैं क्या? मैंने कहा इस अर्थ में नहीं देखिए कितना यह टिपिकल मामला है समझ लीजिए यदि किसी ने हमारे साथ में अन्याय किया हो तो हम फिर सामने उसका उत्तर ना दें तो यह तो कायरता का मामला हो गया हम साधुओं की बात अलग है ठाकुर की वह जो कहानी है कि एक सांप था वह सबको दसता था तो फिर अब ब्रह्मचारी ने उसको मंत्र दिया तो सांप ने सबको दसना बंद कर दिया अभी जब गांव गांव वालों ने देखा कि यह सर्प तो बड़ा विषैला था। कल तक तो सबको दंसता था। किंतु आज वह एकदम अहिंसक हो गया है। तो उन्होंने बदला लेने के लिए सांप को उठाकर के पटका। तो उसको इतना इंजरी हुआ कि बेचारा अधमरा हो गया। जब वो साधु जिन्होंने मंत्र दिया था वापस आए। देखा इस तरह से आधा मरा हुआ पड़ा है। तब वह सब पूरी बात समझ गए और सांप को क्या कहा कि अरे तुमको दंसना नहीं है किंतु तुमको फस तो करना है अपने आत्मरक्षा के लिए। किंतु साथ में ही फिर ठाकुर क्या कहते हैं कि जो साधु होता है उसको अपनी आत्मरक्षा के लिए फस भी नहीं करना है। तो वह तो हम लोगों का मामला है। यदि आप संसार में रहते हैं तो आत्मरक्षा करनी ही है। किंतु जब आप ईश्वर चिंतन करने को बैठते हैं तो वह जो आपके माइंड में चल रहा है कि अच्छा इसने मेरे साथ में ऐसा किया तो मैं इस तरह से रिप्लाई दूंगा। इस तरह की सिचुएशन में इस तरह से बिहेव करूंगा। दैट फ्रॉम दैट यू हैव टू डिसोसिएट योरसेल्फ फॉर सम टाइम। कुछ समय के लिए ईश्वर चिंतन करने के समय तक आपको अपने को इससे डिसोसिएट कर देना है। यह साउंड्स वेरी डिफिकल्ट टू जनरल पीपल। किंतु मैं सही देखा है। थोड़ा सा प्रैक्टिस करेंगे इस तरह से अपने को डिसोसिएट करने का तो बड़ा आराम से हो जाएगा। मैंने पहले भी एक उदाहरण दिया था एक लड़के का। वह लड़का मेरे पास में आता था। अभी इसके ऊपर में इसके मित्रों ने कुछ आक्षेप लगाए कि इसने चोरी की है। अभी यह लड़का कॉलेज में पढ़ता था तो अभी कॉलेज के लड़कों का जैसा होता है कि एक एंथूजियाज्म होता है। फिर एक एक विनिंग एटीट्यूड होता है। वो कैन डू एटीट्यूड होता है कि हां कैसे भी करके जगत में जय करेंगे। तो यह लड़का तो अच्छा सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। वो यंग था। कॉलेज में पढ़ता था। किंतु यह आक्षेप उसके ऊपर में ऐसा लग गया कि वह बेचारा बिल्कुल डिप्रेस सा हो गया था। तो मैंने कहा कि ठीक है वह मुझे पूछता है मेडिटेशन वगैरह कैसे करें? मैंने कहा तुम इस तरह तरह से करना। किंतु वो वो मुझे कहता है कि मैं जितनी भी बार आंख बंद करके ठाकुर के बारे में सोचता हूं तो वैसे ही पूरा जगत का मेरे ऊपर में जो आक्षेप लगा है वही विचार आ जाते हैं। मैं किस तरह से उससे मुक्त हूं। जब तक मैं उससे मुक्त नहीं होऊंगा तब से मेरे से तब तक मेरे से जप ध्यान नहीं होगा। मैंने कहा यह जो तुम कह रहे हो यह कैसा कहने का बराबर है पता है? पहले मैं तैरना सीख लूंगा बाद में मैं पानी में गिरूंगा। ऐसा कभी नहीं होने वाला है। पानी में गिरो तैरते हाथ पैर लगाते लगाते तुम तैरना सीख जाओगे। जब ध्यान आज से ही प्रारंभ कर दो। आज से ही अपने मन को अपनी जो आसपास की परिस्थितियां है उससे डिसोसिएट करने का प्रयास कर लो। हृदय के भीतर में से सभी चीजों को क्षमा कर दो। सभी व्यक्तियों को क्षमा कर दो। अपने को कहो कि हां मैं तो ठाकुर का संतान हूं। अमृतस्य पुत्रा वयं अमृत के हम संतान हैं। भारतीय धरोहर 10,000 साल की 20,000 साल की जो आध्यात्मिक परंपरा चली आ रही है। उसमें जिन्होंने एक के बाद एक लाखों ऋषियों को इस धरोहर ने जन्म दिया है। इसी धरोहर में से मैंने भी जन्म ग्रहण किया है। तो फिर मैं भी तो इन्हीं ऋषियों का संतान हूं। मैं भी तो ऋषियों के समान ही हूं। मैं यदि आंख बंद करके ईश्वर दर्शन ईश्वर चिंतन करने को बैठूं तो मुझे रोकने वाला कौन है? ऐसा करके अपने मन में जो विल पावर है उसको दृढ़ करना है और जगत को क्षमा करनी है। यह दोनों हमको करना ही करना है। वरना उस लड़के की तरह यदि हम ऐसा सोचने को बैठेंगे पहले मेरी कॉलेज में जितने भी प्रॉब्लम है जो जितने भी मेरे मित्र मेरे पे चोरी का आक्षेप लगाते हैं वह सबको पहले तो ठंडा कर देना है। पहले तो सबसे बदला ले लेना है। उसके बाद में मैं जब करने को बैठूंगा, ध्यान करने को बैठूंगा। वह कभी नहीं होने वाला। मान लीजिए कि बाय सम मिरेकल वो यह करने में सफल भी हुआ तो फिर एक दूसरा चैलेंज आ जाएगा। तीसरा चैलेंज आ जाएगा। वो भी उसको तो ग्रेजुएट होना है। जॉब करनी है, मैरिज करने है, बच्चों का संभाल रखना है। यह तो संसार चला ना। यह क्या कोई चैलेंज से कम है क्या? दिन प्रतिदिन नई-नई चैलेंज आती ही जाएगी। उस समय यदि ऐसा सोचे कि पहले मैं सभी चैलेंज से निपटा लूं और फिर मैं ध्यान करने को बैठूं। दिस इज़ नेवर गोइंग टू हैपन। यह जगत जो अपने आसपास में चल रहा है, जैसा मैंने उन लेडी को कहा था कि डोमेस्टिक सिचुएशन से अपने को सेपरेट करना सीखो। और यह इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने को कमजोर कर दे रहे हैं। जो मेरे साथ में अन्याय करेगा मैं अन्याय का उत्तर दूंगा। किंतु वह तो सब जागतिक जगत में है। ईश्वर के साथ में जब हम वार्तालाप कर रहे हैं तब मैं हूं और ईश्वर है। वहां पर जगत जैसे कि भस्म हो जाता है। यह हमको समझ में रखना है कि जगत के साथ में अपने को इतने समय तक डिसोसिएट करना ही करना है। यह लड़का मेरे पास में आकर के हर हर दिन कहता था अच्छा आप मेरा कोई सॉल्यूशन ला दीजिए। आप कोई सॉल्यूशन ला दीजिए। मैंने कहा देखो इट इज नेवर गोइंग टू बी पॉसिबल कि मैं तुम्हारी कॉलेज में जाकर के तुम्हारे मित्रों को समझाऊं। मैं यदि जाऊंगा भी सही बाय सम स्ट्रेच ऑफ इमेजिनेशन तो वो मेरी बात कभी सुनने वाले नहीं है। किंतु जो तुम कर सकते हो जब तक तुम आश्रम में आते हो जब तक तुम मेरे से मेरे साथ वार्तालाप करते हो उतना समय तुम जगत को भूल जाओ। सी लोग अपने मन में जो चल रहा है एक बार-बार एक बात रिपीट होती है। उससे मुक्ति पाने के लिए लोग एडिक्शन में जाते हैं। वो ड्रिंकिंग, स्मोकिंग, ड्रग्स फिर ये और भी कितने सारे एडिक्टिव डिस्ट्रैक्शन है इस जगत में। हम सबको पता है न्यूज़ेपर पढ़ने से ही सब समझ में आ जाता है। तो तुम तो तुम्हारे में इतना तो संस्कार है कि तुम्हारे मन के भीतर में जो तूफान मचा है उससे छुटकारा पाने के लिए तुम एक साधु के पास आते हो। आश्रम में आते हो। ठाकुर के पास में आए हो। ठाकुर का शरण ग्रहण किया है। दीक्षा ली है तुमने। तो इतना तो तुम्हारे में सुकृति है। तो फिर ये सुकृति को तुम वेस्ट क्यों जाने देते हो? टेक द नेक्स्ट स्टेप। इसके बाद का जो स्टेप है कि ठाकुर के साथ में डायरेक्ट वार्तालाप करना शुरू कर दो कि मुझे तुम्हारा एडिक्शन मत बना दो कि अभी मैं आश्रम में जाऊंगा महाराज जी के साथ में बात करूंगा तभी मेरा मन शांत होगा। अभी ऐसा करोगे तो मैं भी एक एडिक्शन होकर रह जाऊंगा तुम्हारे लिए। एडिक्शन इज व्हाट कि आप उसके ऊपर में डिपेंडेंट हो जाते हैं। किसी भी सिचुएशन के ऊपर में, किसी भी व्यक्ति के ऊपर में, किसी प्रोसेस के ऊपर में, किसी सब्सटेंस के ऊपर में आप डिपेंड हो जाते हैं। दैट मींस कि आपका एडिक्शन स्टार्ट हो गया है। डिपेंड ओनली अपॉन गॉड डिपेंड ओनली अपॉन ठाकुर। ठाकुर मां स्वामी जी यही एकमात्र सहाय है। उनके ऊपर में डिपेंड हो। यदि एडिक्शन बनाना है तो रामकृष्ण कथामृत है। यह मां की बातें हैं। इनको पढ़ के इनके एडिक्टेड हो। नहीं कि किसी व्यक्ति के ना ही किसी सब्सटेंस के। तो यह एक जब हम ध्यान करने को बैठते हैं, मेडिटेशन करने को बैठते हैं तो सबसे बड़ा प्री कंडीशन जो एक है कि हमको जगत के साथ में डिसोसिएट होना सीखना होगा। और यह बात हमेशा याद रखनी है कि यदि आप यह कहे कि अच्छा मैं जगत के साथ में डिसोसिएट हो जाऊंगा तो मैं कमजोर हो जाऊंगा। बिल्कुल नहीं। आप ध्यान करके खड़े होइए और फिर से जो आपके साथ में अन्याय कर रहा है उसका आप मुंहत जवाब दीजिए। कोई फर्क नहीं पड़ता। भारत के साथ में यही तो हुआ ना। 1000 साल से सबको क्षमा करते गए, क्षमा करते गए और एक के बाद एक जितने भी लुटेरे हैं, हम तो लूटते गए। तो वह आध्यात्मिक जगत एक है। यह जागतिक जगत एक है। यह दोनों में से हमको एक डिसोस उनको सेपरेशन करना सीखना होगा। जागतिक जगत में व्यवहारिक जगत में हमारे साथ में जो अन्याय करता है तो अन्याय का मुंहतोड़ उत्तर देना है। किंतु साथ में ही जब हम ईश्वर के साथ में वार्तालाप कर रहे हो उस समय जगत को भूल जाना है। यह टेक्निक हमको सीखनी होगी। यह सेपरेशन यह सूक्ष्म जो है यह सूक्ष्म सेपरेशन हमको सीखना होगा। यह आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करने का सबसे पहला कंडीशन है। यदि इसको हम नहीं समझेंगे तो दो चीज होगी। यदि हम जगत के
Danger of attachment with world: Meditation will become hell
साथ में अपने को नहीं छुड़ा पाते हैं तो फिर क्या होगा? जितनी भी बार मैं आंख बंद करके ईश्वर का नाम गुणगान करने का प्रयास करूंगा। साथ में ही बाहर के जगत के जो स्ट्रेस है, जो टेंशन है, जो चैलेंजेस है, वह इतने भयानक रूप से आकर के हमारे मन के भीतर में एक इतना बड़ा तूफान मचाएंगे कि हम पागल से हो जाएंगे। विदिन अ फ्यू मोमेंट्स, कुछ ही क्षणों में हम खड़े हो जाएंगे और मंदिर में से यदि घर में जप कर रहे हो, मंदिर में कर रहे हो, वहां से दौड़ के भाग जाएंगे। उस जगह पर वापस जाने की इच्छा नहीं होगी, बैठने की इच्छा नहीं होगी। ईश्वर का नाम लेने की इच्छा कभी नहीं होगी। इतना बड़ा खतरा वो हमारे लिए ले आता है यदि हम अपने को डिसोसिएट ना करें। तो यह तो एक पहला खतरा है। दूसरा
Dangers of attachment with world: cowardice, running away from challenge
खतरा क्या है? पता है बहुत सारे लोग जैसे कि गीता पूरा गीता दूसरे खतरे पर लिखा गया है कि अर्जुन सोचता है कि युद्ध करने से बेटर है जो प्रॉब्लम्स खड़े होंगे मेरे माइंड में। बेटर है कि मैं यहां से सन्यास लेकर के वन में चला जाऊं। ईश्वर का चिंतन करूं। तो फिर यह भगवान कृष्ण क्या कहते हैं? देखो तुम यदि इस तरह से चले जाओगे तो जहां पर भी जाओगे वहां पर यही स्ट्रेस और टेंशन तुम्हारा पीछा करेगा। तुम इससे मुक्ति पाने के लिए निष्काम होकर के कर्म करो और निष्काम होकर के यह सोच के उनका वध करो कि वध करने वाला तो मैं हूं। तुम तो सिर्फ निमित्त मात्र हो। निमित्त मात्रम भवसव्य साचन तो यह निमित्त होकर के ईश्वर के निमित्त होकर के जगत में कर्म करो यानी कि दो खतरे एक तो है कि यदि हम जगत को भूलने को यदि जगत को भूल नहीं पाएंगे जप करने को बैठेंगे भयानक आंधी खड़ी होगी दूसरा कि यदि हम कायर होकर के भाग जाएंगे बहुत वो पता है आजकल वो एक पॉपुलर जनरेशन स्टार्ट हुआ है किताब का वो जो एक एक लेडी है अमेरिका न लेडी उसने एक किताब लिखी है इट प्रे लव अर्थात कि वह उसका डोमेस्टिक प्रॉब्लम चल रहा था तो वह घर छोड़कर के निकल गई अमेरिका में से वो इटली है इंडिया है इंडोनेशिया है यहां पे सब वो घूम रही है और वो फॉर द फॉर द सेक ऑफ पीस ऑफ माइंड। अभी होता क्या है? देखिए यह सब चीजों में कि आईडिया लगता है बड़ा अच्छा कि बीच-बीच में रिट्रीट पे चले जाना चाहिए। बट रिट्रीट इज़ वन थिंग एंड रनिंग अवे इज़ क्वाइट अनदर। यदि आप अपनी सिचुएशन से भाग खड़े होंगे तो आप जहां पर भी जाएंगे सब जगह पर आपके मन में एक तरह का तूफान तो मचा ही रहेगा और आखिर में आपकी ये जो पूरी स्पिरिचुअल क्वेस्ट है ना वो पूरी फेलियर हो जाएगी। तो यह हमको ख्याल रखना है कि जगत को साथ में लेकर के कभी भी ईश्वर चिंतन करने के लिए नहीं बैठना है। भगेडू होने से रनिंग अवे भाग जाने से कोई सॉल्यूशन मिलने वाला नहीं है। यह डिसोसिएशन हमको सबसे पहले सीखना ही होगा। तो, यह एक बात हो गया। अभी एक्चुअल
Construct as a method of meditation
मेडिटेशन की मेथड के बारे में बात करते हैं। तो हमने उसके बारे में थोड़ा सा डिस्कशन किया था। हम लोग अपने मन में एक कंस्ट्रक्ट बना सकते हैं। अब यह कंस्ट्रक्ट ऐसा होगा कि जैसे कि वह अपने मन को, अपने बॉडी को, अपनी जो इमोशंस से, अपने सेंटीमेंट से, अपना यह जो कर्म प्रवाह है, भीतर में जो चल रहा है, उसको वो एक्यूरेटली रिफ्लेक्ट करेगा, और इट विल वर्क एस एन अर्ली वार्निंग सिस्टम। यदि मान लीजिए, अह जैसे कि अह पहले तो एक बात
What is the meaning of construct
है कि यह कंस्ट्रक्ट का अर्थ क्या है? देखिए जैसे हम आंख बंद करते हैं ना आंख बंद जहां तक मैं अभी जैसे मैं ये क्लास ले रहा हूं तो मेरे सामने यह लैपटॉप पड़ा है मेरे सामने यह माइक है अभी मैं यदि ऑफिस में जाऊंगा तो 10 लोगों के साथ में मेरी बात होगी 10 लोगों के साथ में मुझे काम करना है तो क्या है कि मैं फिजिकल ऑब्जेक्ट के साथ में कार्य कर रहा हूं जिसका कि एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी है किंतु जैसे ही मैं अपने कमरे में वापस आया आंख बंद करके मैंने मैं अपने ऑफिस में मैंने क्या-क्या किया उसके बारे में यदि मैंने सोचना प्रारंभ किया तो वह मैंने अपने माइंड में एक कंस्ट्रक्ट बनाया है। अभी मैं ऑफिस के साथ में काम नहीं कर रहा हूं। ऑफिस में काम नहीं कर रहा ना ही ऑफिस वालों के साथ में काम कर रहा हूं। अभी मैं अपने माइंड में खड़े हुए कंस्ट्रक्ट के साथ में काम कर रहा हूं। यह कंस्ट्रक्ट हमको हेल्प करता है टू सिमुलेट द रियल वर्ल्ड। अभी जैसे कि ऑफिस में आज मुझे एक रिपोर्ट बनाना है। किंतु मुझे ऐसा लगा कि चलो अभी ऑफिस में अभी मैं थक गया हूं। काम करते-करते मैं अपने कमरे में जाता हूं। कमरे में बैठकर के रिपोर्ट बनाऊंगा। अभी मैंने ऑफिस में चार लोगों के साथ बात कर रहा हूं मीटिंग करके कि इस रिपोर्ट में क्या-क्या होना चाहिए। अभी ये सब पॉइंट्स मैंने लिख लिए हैं। अभी मैं कमरे में आकर के इस पॉइंट्स को देख रहा हूं और मेरे माइंड में यह सब पूरा विजुअलाइज कर रहा हूं कि मैंने कौन से किसके साथ में क्या बात किया था। किसके किसका क्या ओपिनियन था और सभी के ओपिनियन को सिंथेसाइज करके मुझे यह रिपोर्ट बनाना है। तो मैं जब कमरे में बैठकर के ऑफिस की मीटिंग के बारे में जो सोच रहा हूं व्हिच इज नॉट एक्चुअली ए मीटिंग बट इट इज अ सिमुलेशन और ए कंस्ट्रक्ट इन माय माइंड। यह कंस्ट्रक्ट हमको हेल्प करता है कंटिन्यूटी मेंटेन करने के लिए। यदि एक पशु है तो पशु को एक उसके साथ में कोई घटना होती है तो अभी वह दूसरी जगह पर चला जाता है और फिर क्या होगा ना जो घटना हुई है ना उसकी मेमोरी में इतना लंबा समय रहेगी नहीं उसकी मेमोरी शॉर्ट टर्म होती है और घटना को भूल जाएगा उसी वही घटना शायद फिर से रिपीट भी होगी तो पहली वाली घटना से वह शायद सीख नहीं पाएगा किंतु यदि आप पहली वाली घटना को मेमोराइज करके रिम रिमेंबर करके यदि आप उससे सीखते हैं तो देन यू आर अ थिंकिंग ह्यूमन बीइंग। यह आजकल का जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जो है उसका जो पहले के आर्ट एआई और आज के एआई में डिफरेंस क्या है कि आज का एआई इट लर्न्स फ्रॉम दी द इनपुट उसको जो इनपुट दिया जाता है उसमें से वह सीखता है अपनी मेमोरी में स्टोर करता है। फिर जो उत्तर पूछते हैं उसको अपनी मेमोरी में से निकाल करके एक्सपीरियंस के अनुसार वह उत्तर देता है। सो दिस एबिलिटी टु रिमेंबर एंड टु सिंथेसाइज़ आवर मेमोरी एंड टु वर्क अकॉर्डिंगली दिस इज़ व्हाट मेक्स अस ह्यूमन। तो यह कंस्ट्रक्ट है। रियल वर्ल्ड को सिमुलेट करने में मदद करता है। मीटिंग चली है मुश्किल से 5 मिनट किंतु मुझे रिपोर्ट लिखना होगा। मैं यदि सही सही में मेहनत करता हूं तो 5 घंटे मुझे लगेंगे उसको रिपोर्ट को कंप्लीट करने में। वो पांचों घंटा में सोचता रहूंगा कि वह 5 मिनट की मीटिंग में क्या हुआ। अभी यह कंस्ट्रक्ट हमको लगता है बड़ा हेल्पफुल है। किंतु यही कंस्ट्रक्ट बड़ा डेंजरस कब हो जाएगा? इस मीटिंग में मेरा किसी के साथ में झगड़ा हुआ। किसी ने मुझे कोई कटु वचन कह दिए। मैं भी सामने झगड़ पड़ा। अभी इससे जो स्ट्रेस प्रकट होगा 5 मिनट की मीटिंग में 5 मिनट का जो स्ट्रेस था अभी मैं अपने कमरे में आकर के 5 घंटा उसके बारे में सोचूंगा। यही 5 मिनट का स्ट्रेस 5 घंटे तक मैग्नीिफाई होकर के मेरे माइंड में घूमता रहेगा और फाइव टाइम्स ग्रेटर वो स्ट्रेस मेरे बॉडी में प्रकट करेगा और यह जो लाइफस्टाइल डिसीज जितने भी है फटाफट आकर के मुझे पकड़ लेंगे। तो यह कंस्ट्रक्ट जितना हेल्पफुल है उतना ही डेंजरस भी है कि कोई भी नेगेटिव इवेंट को कोई भी नेगेटिव इमोशन को कोई भी नेगेटिव सिचुएशन को अपना माइंड एंडलेसली अपॉन ए लूप वो रिकंस्ट्रक्ट किए ही जाता है। किए ही जाता है। फिर उसमें से जो स्ट्रेस निकलता है अपने बॉडी को एंडलेसली मतलब डिस्ट्रॉय करता रहता है। सो दिस कांसेप्ट ऑफ कंस्ट्रक्ट ऑन वन हैंड इट इज़ हेल्पफुल देन ऑन दी अदर हैंड इट इज़ डिस्ट्रक्टिव आल्सो बट वी हैव टू टेक द सेम इंस्ट्रूमेंट सेम आइडिया ऑफ कंस्ट्रक्ट टू लर्न मेडिटेशन। आंख बंद करके हम ईश्वर के रूप का चिंतन करते हैं। यह क्या है? अपने जगत में देखिए। अपने मन में देखिए कि एक्चुअली इट इज अ ब्लैंक कैनवस। अपना मन क्या है? टैबुला राजा इसको कहते हैं। अर्थात कि एक ब्लैंक कैनवस जिसके ऊपर में हम जो चाहे वह लिख सकते हैं। होता ऐसा है कि हम इस जगत के साथ में इतने घनिष्ठ रूप से जड़े हुए हैं कि जगत का ही रिफ्लेक्शन मेरे माइंड में हमेशा से बना रहता है। और जब जो कंस्ट्रक्ट मेरा माइंड खड़ा करता है, वह जगत ही होता है। जगत के अलावा यानी कि जगत का अर्थ है कि मेरी सिचुएशन यदि मैं हाउसवाइफ हूं, मैं अपने घर में रह रही हूं तो मेरे जो इन लॉस है फादर इन लॉ, मदर इन लॉ, हस्बैंड डॉटर एंड सन यही मेरा जगत है। आंख बंद करके ईश्वर चिंतन करने के समय में वही सब चीज दिखता है। सास, ससुर, बच्चे यह वो एंडलेसली वो वही चलता रहेगा। यदि मैं कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव हूं, बोर्ड रूम में मीटिंग हो रही है, यह मेरा जगत है। घर आकर के आंख जैसे बंद करने का अपने साथ में कुछ समय बिताने का प्रयास करता हूं। वही बोर्ड मीटिंग, वही सेल्स टारगेट, वही प्रमोशन का चक्कर, वही पैसा कितना मिल रहा है? प्रॉफिट प्रॉफिटेबिलिटी क्या है? कॉम्पिटिटर्स के साथ में कैसे डील करना है? वही बातें चलती रहेगी। हम लोग अपने आसपास के जगत के साथ में इतने घनिष्ठ रूप से बद्ध हो गए हैं। तो सबसे पहला कांसेप्ट
How to meditate: create a blissful construct
है मेडिटेशन में प्रवेश करने का कि इस बाह्य जगत एक ही मात्र कंस्ट्रक्ट नहीं है। वि इज आवर माइंड कैपेबल ऑफ क्रिएटिंग। अपना माइंड इनफाइनाइट नंबर ऑफ कंस्ट्रक्ट्स क्रिएट कर सकता है। जैसे कि हम आंख बंद करके बैठे और एक कंस्ट्रक्ट ऐसा खड़ा कीजिए कि मैं हिमालय में कैलाश पर बैठा हुआ हूं। वहां पर ठंडी हवा चल रही है। धवल शिखर पर्वत शिखर चारों ओर बिखरे पड़े हैं। और गंगा स्वयं मां गंगा स्वयं मेरे सामने स्वर्ग से अवतरण कर रही है। और वहां पे महादेव के सामने मैं ध्यानस्थ होकर के बैठा हूं। यह कंस्ट्रक्ट हम क्रिएट कर सकते हैं। अपने माइंड में वह कैपेसिटी है। इस कैपेसिटी को जनरली हम क्रिएटिविटी या तो फिर इमेजिनेशन के नाम से पहचानते हैं। यह हॉलीवुड के मूवीज देखिए। कहां-कहां से यह लोग सब लेके आते हैं। वो इंटरस्टेलर बोल के एक मूवी आया था। वो मतलब उसका जो फोटोग्राफी था उसके जो कांसेप्ट है वो ब्लैक होल के पास में एक प्लेनेट है वहां पे वो स्पेसशिपिप लेकर के जाते हैं। अभी पता है कि फिजिक्स किस तरह से काम करता है। ब्लैक होल के पास में टाइम स्लो हो जाता है। तो अभी ये लोग जब प्लेनेट पे जाते हैं तो टाइम स्लो हो जाता है। फिर वो प्लेनेट में से बाहर आते हैं तो देखा कि पूरे 20 30 साल बीत गए हैं। प्लेनेट पे उन्होंने दो-तीन घंटे ही बिताए हैं। किंतु बाहर में 2030 साल बीत गए हैं। अब ये फिजिक्स पता है किंतु फिजिक्स के ऊपर में ऐसा एक इमेजिनेशन खड़ा करना ये मूवीज है, टीवी है। ये सब क्या है? ये सब हमारे सामने एक दूसरा जगत खड़ा करते हैं। मुझे अभी भी याद है कि पहला इंग्लिश मूवी मैंने देखा था। मैं उस समय बहुत छोटा था। ऑलमोस्ट मैं फर्स्ट स्टैंडर्ड में भी शायद नहीं होऊंगा। मेरे पिताजी की जो कंपनी थी वे लोग क्या करते थे कि एव्री वीक एक मूवीज बताते थे। अभी क्या है कि वह कंपनी थी किसी एक गांव में तो वहां पे और तो कोई एंटरटेनमेंट का साधन नहीं था। तो सभी एंप्लाइजज़ के लिए वंस इन अ वीक ऐसा कोई मूवी स्क्रीनिंग होता था। तो अभी मैं देखिए कि मेरा आउटर सिचुएशन क्या है? एक छोटे से गांव में रह रहा हूं। वहां पर ऐसा एजुकेशन का या तो फिर ऐसा कोई लर्निंग का कोई कैपेसिटी मतलब यह जो पॉसिबिलिटी है वह बड़ा कम है। स्कूल में भी जाता हूं तो एक छोटा सा गांव का स्कूल है। किंतु वो इंडस्ट्री है वहां पे बोल के हमको वहां पर रहना है। अभी इस तरह की एक छोटे से जगत में मैं रह रहा हूं। अभी मैं वो मूवी देख रहा हूं। मुझे अभी भी याद है कि एक नॉर्थ ये जो नॉर्थ पोल के आसपास में ये नॉर्थ सी है। नॉर्थ सी को एक्सप्लोर करने के लिए कुछ लोग जहाज लेकर के निकले हैं। और वहां पे प्रचंड तूफान आता है। यह जो बर्फ है ये बर्फ जहाज के साथ में टकराता है और मतलब दैट वाज़ सच अ स्टनिंग विजुअल। मैं तो आश्चर्यचकित हो गया कि जगत में ऐसी चीजें भी है व्हिच इ हैज़ नथिंग टू डू विथ अ स्मॉल डस्टी विलेज आउट ऑफ द वे होम और यह जो छोटा सा मतलब इट इज़ सच अ पावरफुल एक्सपीरियंस फॉर मी। तो उस समय मुझे पता चला कि इमेजिनेशन जो है क्रिएटिविटी जो है अपने साथ में कितना बड़ा वह कार्य करता है। आई कैन इजीली सिंस दैट डे आई हैव लर्न कि ईजीली मैं अपने को आसपास की जो सिचुएशन है उससे डिसोसिएट करके एक कल्पना के जगत में चला जाऊं। उस कल्पना के जगत में भव्य चीजें होती है। अद्भुत नजारे हैं। जो इमोशंस और सेंटीमेंट्स हम एक्सप्रेस करते हैं। विच आर ऑफ द प्यरेस्ट नोबलेस्ट ऑफ द काइंड प्यरेस्ट सेंटीमेंट। इस जगत में किसी व्यक्ति के पास में प्रकट करना बड़ा मुश्किल है। अपने मन की जो बात है वह आप ठाकुर को ही कह पाएंगे या तो फिर इस तरह से कोई इमेजिनेशन क्रिएट करके आप कह पाएंगे। अदर वाइज क्या होगा कि जगत में हम यह अपेक्षा रखेंगे कि द डिपेस्ट सीक्रेट ऑफ माय हार्ट मेरे हृदय के जो गहन सीक्रेट है या तो मेरे हृदय के जो सेंटीमेंट है किसी को कहने को जाऊंगा तो वह ठुकरा देगा फिर मुझे आघात लगेगा यह डर के मारे हम कहते नहीं है तो दैट इज ओके यह जगत है ही ऐसा कि इसमें आप प्यरेस्ट ऑफ द प्योर कभी भी एक्सप्रेस नहीं करने वाले हैं। होलीएस्ट ऑफ द होली इफ यू वांट टू एक्सप्रेस इट हैज़ टू बी डन ओनली इन द रिलेशन विथ गॉड और विद इन योर माइंड। अपने मन में ही हम अपनी सर्वश्रेष्ठ सेंटीमेंट सर्वश्रेष्ठ बातें कर सकते हैं। जगत के साथ में यह नहीं कर सकते। सो दिस इज द पावर ऑफ कंस्ट्रक्ट। ऑन वन हैंड। यह जगत का स्वरूप लेकर के यह कंस्ट्रक्ट हमको परेशान कर रहा है। ऑन दी अदर हैंड यही कंस्ट्रक्ट हमको एक इस तरह का जगत खड़ा करने में हेल्प करता है व्हिच इज प्यरेस्ट ऑफ द प्योर होलीएस्ट ऑफ द होली परफेक्ट ऑफ द परफेक्ट। तो लेट अस टेक द हेल्प ऑफ दिस कंस्ट्रक्ट एंड क्रिएट अ वर्ल्ड। अभी जैसे कि मैं ध्यान करने को बैठता हूं। तो जो भी हम ध्यान करते हैं आंख बंद करके सब कुछ कंस्ट्रक्ट है। पहले तो यह बात ख्याल रखनी है। यदि मैं ठाकुर की मूर्ति का चिंतन भी करता हूं तो किस तरह से होगा? मैं मंदिर में बैठा हूं। आंख खोलकर के ठाकुर की मूर्ति को देख रहा हूं। मैं कमरे में आकर के आंख बंद करके ठाकुर की वही मूर्ति को मैं याद कर रहा हूं। जब तक मैं मंदिर में बैठकर के ठाकुर की मूर्ति के सामने खुली आंखों से देख रहा हूं। वह तो एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी हो गई। किंतु जब मैं कमरे में आकर के आंख बंद करके वही मूर्ति का ध्यान करने का प्रयास कर रहा हूं। दैट मींस आई एम क्रिएटिंग ए कंस्ट्रक्ट इन माय माइंड। अभी यह कंस्ट्रक्ट का कांसेप्ट को और थोड़ा सा आगे बढ़ाएं। यदि मुझे इमेजिनेशन ही करना है, मुझे क्रिएट ही करना है कि मैं मंदिर में बैठा था मंगल आरती के समय में या संध्या आरती के समय में उस समय पुजारी महाराज ने मूर्ति को जिस तरह से सजाया था ठाकुर की इमेज को उसी को यदि मैं विजुअलाइज करना है तो व्हाई डू आई स्टॉप मैं वहीं पर क्यों रुक जाऊं? फिर तो मैं अपने मन को उठा के दक्षिणेश्वर में भी ले जा सकता हूं। जबकि ठाकुर स्वयं साक्षात सदैव पृथ्वी पर वर्तमान थे। उनका घर तो मैंने देखा है तो घर को भी मैं विजुअलाइज कर सकता हूं। मेरे सामने एक खाट के ऊपर में ठाकुर बैठे हैं अपनी खाट के ऊपर में और फिर बगल में ही दूसरी जो खाट है वहां पर मां शारदा देवी बैठी है और फिर बाकी जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल है वही लाटू वही यह अपने निरंजन फिर यही ये शशि यही शरद वही नरेंद्र वही राखाल वही तारक वही सब लोग वहां पर जमीन पर बैठे हैं और ठाकुर का ध्यान कर रहे हैं। कमरा संध्या का समय है। कथामृत में से हमको इनफ डिस्क्रिप्शन मिल जाता है कि संध्या का समय है। आरती के शंख और घंटा बज रहा है और फिर वह जो धूप वहां पे ठाकुर के कमरे में किसी ने धूप धुना दिया हुआ है। उसकी खुशबू है। यहां पर संध्या का समय भागीरथी का किनारा कलकल करके नदी बहती जा रही है। पंखियों की कलरव है और इस समय में ठाकुर के कमरे में बैठकर के मैं ठाकुर के सामने देख रहा हूं। उस समय मैं फिर अपने को क्यों रिस्ट्रिक्ट करूं कि मेरा जो रियलिटी है वह यह है कि मैं विशाखापट्टनम के मंदिर में बैठकर के ठाकुर की मार्बल इमेज है वो मैं देख रहा हूं आंख खोल करके किंतु आंख बंद करता हूं तो फिर यह विशाखापट्टनम विशाखापट्टनम का यह मंदिर वो मार्बल की इमेज यह मेरे लिए लिमिटेशन नहीं है। फिर तो मैं जीवंत ठाकुर दक्षिणेश्वर वो सब में आज से 100 साल पहले 200 साल पहले मैं वापस चला जा सकता हूं इतिहास में। मेरे मन के सामने समय और अवकाश स्पेस
Summary
और टाइम यह दोनों का कोई भी बैरियर नहीं है। दिस पावर द कंस्ट्रक्ट गिव्स अस। सो दिस इज़ द वन थिंग दैट वी हैव टू दिस इज़ द सेकंड लेसन दैट वी लर्न। फर्स्ट लेसन इज़ टू लर्न टू डिसोसिएट आवरसेल्फ फ्रॉम द वर्ल्ड फॉर द ड्यूरेशन ऑफ मेडिटेशन। जितना समय हम ध्यान करने को बैठते हैं उतना समय जगत से अपने को मुक्त करना सीखना होगा। वो लोगों को क्षमा करके हो कि लोगों से दूर जाकर के वैराग्य प्रकट करके जो भी है यह लेसन हमको सीखना ही होगा। सेकंड है कि लर्निंग कि हमको एक कंस्ट्रक्ट खड़ा करना सीखना होगा। हम अपने मन में ध्यान करने को बैठते हैं तो कंस्ट्रक्ट ही खड़ा करते हैं। वही बात है कि फिर अपने आसपास में जो हो रहा है उससे लिमिटेड मत रहिए। देन थिंक वाइल्ड आप दक्षिणेश्वर में जाइए। कैलाश मानसरोवर चले जाइए। आपको कोई रोकने वाला नहीं है। वाराणसी है, इतने सारे तीर्थ क्षेत्र हैं। अपना खुद का एक जगत खड़ा कर सकते हैं। मेरा एक फेवरेट कंस्ट्रक्ट है। मैं अपने गांव में जब जाया करता था छुट्टियों के दिनों में बड़ा ही सुंदर जगह है। वो चारों ओर खुला मैदान वगैरह है। तो वहां पर मैं बैकयार्ड में बैठे-बैठे वहां पर वो खुले खेत है, खुला आसमान है, खुला जमीन है। यह सब कभी-कभी देखा करता था। तो मैं कभी-कभी उस कंस्ट्रक्ट का इस्तेमाल करता हूं। बच्चा हो गया हूं। अपने गांव के घर में बैठा हुआ हूं। बरामदे में एक कुर्सी पे वहां पर वो हिंचका भी था। हिचका यानी कि स्विंग झूला। झूला जिसको कहते हैं। तो उसके ऊपर मैं बैठकर के मैं देख रहा हूं सुंदर नजारा। और जब हम बच्चे होते हैं तो जगत का तो कोई टेंशन होता नहीं है। फिर क्या है नाना नानी के घर गए हैं तो दुनिया भर का प्रेम हमको मिलता है। तो इतना सुंदर वातावरण में मैं बैठा हूं। जस्ट बैठा हूं और कुछ नहीं कर रहा हूं। एंड देन आई एम इबाइबिंग द पीस दैट इज प्रोड्यूसिंग बाय दिस कंस्ट्रक्ट। यह इमेजिनेशन में से जो पीस खड़ा होता है, आनंद खड़ा होता है, वह मेरे हृदय में मेरे पूरे शरीर में व्याप्त हो जा रहा है। एंड फ्रॉम दिस वी कम टू
Construct should produce “Bhava”
थर्ड पॉइंट। ये तीसरा जो पॉइंट है उसको कहते हैं भाव। अभी देखिए यह भाव क्या है? कंस्ट्रक्ट हम जब खड़ा करते हैं तो कंस्ट्रक्ट खड़ा करने का एक्चुअली दो मीनिंग होना चाहिए। दो पर्पस होने चाहिए। एक तो है कि जब हम कंस्ट्रक्ट खड़ा करते-करते उसमें डिटेल्स जब डालते हैं तो हमारा माइंड इतना बिजी रहता है कि जो बाहर के जो डिस्ट्रक्टिव थॉट है डिस्ट्रक्टिव और डिस्ट्रक्टिव ये दोनों थॉट्स को आने के लिए बैंडविड्थ नहीं मिलती है। स्पेस नहीं मिलता है। माइंड को इतना बिजी रख लेना है कि यह कंस्ट्रक्ट ही खड़ा करता रहे। जैसे कि हम अब रिपोर्ट लिखते हैं या तो कंप्यूटर पे कोई काम करते हैं। हम इतने बिजी हो जाते हैं और किसी चीज के लिए वो स्पेस ही नहीं रहता। तो यह कंस्ट्रक्ट खड़ा करने के समय माइंड एक व्यक्ति का फिर डिटेल वो करता रहेगा। तो डिटेल डालते डालते अपने माइंड को इतना बिजी रखना है कंस्ट्रक्ट बनाने में कि वह और किसी चीज में जाए ही नहीं। तो वह तो एक चीज है। दूसरा है कि भाव प्रकट करना है। जैसा कंस्ट्रक्ट हम क्रिएट करते हैं, उसमें से भाव प्रकट होना चाहिए। अभी यह भाव क्या है? इट इज अ मिस्टिकल एंटिटी। मैं जब पहली-पहली बार योग वगैरह सीख रहा था, मेरे शहर में एक योग निकेतन था। बड़ी पुरानी संस्था है। बड़े अच्छे टीचर वहां पर हुआ करते थे। वहीं पर सबसे पहली बार स्वामी विवेकानंद का राजयोग मैंने पढ़ा था। वहां पर एक डॉक्टर सिखाते थे। वह भी अच्छे अपने डिवोटी ही है। तो बड़ा सुंदर तरीके से राजयोग सिखा रहे थे। तो राजयोग का वह जो सूत्र है योग चित्तवृत्ति निरोध योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध यानी कि योग का अर्थ क्या है? मेडिटेशन ध्यान का अर्थ क्या है? अपने चित्त में अपने मन में जो कोई भी विचार इमोशन खड़े हो रहे हैं इन सबको संपूर्ण रूप से जीरो कर देना, डिलीट कर देना आज की लैंग्वेज में वह है योग। तो उस समय में वह प्रैक्टिस करता था अपने घर में आकर के अपने माइंड को कंप्लीटली ब्लैंक कर दो। कंप्लीटली जीरो कर दो सभी विचारों को। तो अभी यह 5 मिनट गई। फिर एकाएक में एकदम अलर्ट हो जाता था। अरे यह 5 मिनट जो कि मैंने अपने माइंड को ब्लैंक करने में लगाया है उसमें और अन्य समय की बजाय 10 गुना ज्यादा विचार आ गए हैं। तो दैट वाज़ म एक बड़ा ही डिप्रेसिंग एक्सपीरियंस था मेरे लिए। जब भी मैं अपने माइंड को ब्लेम करने का प्रयास करता हूं। चित्त की वृत्तियों का निरोध करने का प्रयास करता हूं। यही चित्त की वृत्तियां 10 गुना होकर के मेरे माइंड को जैसे कि हरण कर लेती है, किडनैप कर लेती है। तो इससे कैसे मुक्ति पाई जाए? उस समय मैं सोचता था कि ध्यान करना असंभव है मेरे लिए। किंतु जैसे-जैसे मैंने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य खास करके मां की बातें और कथामृत इन दोनों को पढ़ने का प्रारंभ किया। वैसे-वैसे ही देखा कि ठाकुर और मां के जीवन में जो भाव है वह भाव मुझे समझ में आ रहा है। ठाकुर का बालक भाव, संतान भाव फिर मां का मातृ भाव। खास करके यह जो दो भाव है बड़े ही शुद्ध भाव है। तो यह भाव मैं जितना इनको पढ़ता हूं, उतना मुझे समझ में आ रहा है। दिस इज अ सॉर्ट ऑफ अ मिस्टिकल प्रोसेस। ये आप सीख नहीं सकते। ऐसा कोई देयर इज नो अदर मेथड ऑफ लर्निंग। ठाकुर और मां की जो छोटे-छोटे प्रसंग है मैं पहले भी कहता आ रहा हूं हमेशा से यह जो छोटे-छोटे प्रसंग होते हैं इतने वो अपने मन को वो गरमगरम जो हलवा होता है वो खाते हैं कैसा भीतर में चला जाता है हमको रुष्ट पुष्ट बनाता है वैसे ये छोटे-छोटे प्रसंग ये इतने पावरफुल है इसको पढ़ते जाइए पढ़ते जाइए पढ़ते जाइए इट विल चेंज इट विल ट्रांसफॉर्म अस फ्रॉम इनसाइड भीतर में से संपूर्ण रूप से हमको बदल देंगे और यह जो बदलाव की प्रोसेस है वह पहले तो अदृश्य रहेगा गी किंतु बाद में जब आप इस तरह का कोई कंस्ट्रक्ट क्रिएट करेंगे तो देखेंगे कि उस समय उसमें से भाव रूपी रस निकलता है और हमारे अंतर्मन में फैल करके हमको हृष्ट पुष्ट करता है। यह मैंने हमेशा से देखा है कि ठीक-ठीक मैं यदि ध्यान करने का प्रयास करता हूं। ऐसा कोई कंस्ट्रक्ट खड़ा करता हूं। जैसे कि मैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर के सामने बैठा हुआ हूं। चारों ओर का एक एक पूरा एक विजुअलाइजेशन करता हूं। उस समय यह कंस्ट्रक्ट में से जैसे कि भाव प्रकट होता है। यह जैसे कि उजाला की तरह जैसे कि अमृत की तरह पूरे धीरे-धीरे प्रकट होकर के भीतर में से मुझे स्ट्रेंथन करता जाता है। और फिर देखिए वो जो मैं सालों पहले जो प्रैक्टिस किया करता था वो एक नेगेटिव टाइप की प्रैक्टिस थी कि सभी चीजों से जगत की जितनी भी इंटरेस्टिंग चीजें हैं वो सभी इंटरेस्टिंग चीजों से मैं अपने माइंड को निकाल करके एक बोरिंग चीज पे लगाता था। मन को ब्लैंक करना वो क्या है? इट इज वेरी बोरिंग। नो वन माइंड अबोर्स वैक्यूम। यह जो एक बड़ी चीज मैंने अपने जीवन में सीखी है, अपना मन जो है ना, वह ब्लैंकनेस से वह बड़ा डरता है। इसीलिए आप देखिए कि इवन यदि हम सोते भी हैं, तो वैसे तो ब्लैंक स्टेट है सोना। उसमें भी सपना आते हैं। माइंड विल क्रिएट अ वर्ल्ड इवन विद इन आवर स्लीप। नींद में भी वह सपने खड़ा करेगा। नींद में भी अपना माइंड ठीक-ठीक वो शांति से नहीं बैठेगा। वह जो स्वामी जी का उदाहरण है एक बंदर है उसने शराब पिया फिर उसको बिछी ने काटा फिर उसके सर पर भूत सवार हो गया वैसे ही तो बंदर है फिर वह शराब पिएगा क्या पागलामी करेगा फिर वो बिछी काटेगा तो फिर और भी उसका पागलपन बढ़ेगा और फिर उसके सर पर भूत खड़ा सवार होगा तो फिर वो क्या पागलपन नहीं करेगा अपना मन भी ऐसा है इट विल ऑलवेज क्रिएट वन कंस्ट्रक्ट और अनदर इस माइंड को बिना कंस्ट्रक्ट के चलेगा नहीं आप इससे बचने के दो ही उपाय हैं। या तो फिर बाह्य प्रवृत्तियों में अपने को ऐसा फेंक दें हमेशा ऑफिस में बैठे रहे। हमेशा वह मार्केट में घूमते रहे। हमेशा किसी ना किसी के साथ में गप लगाते रहे। या तो फिर एडिक्शन में घुस जाए। यही एक अपने मन से बचने का ये है सॉल्यूशन। या तो फिर अपने को शराब पी के कंप्लीटली वो ये कर दे। अपने अपने माइंड को बिल्कुल ब्लैंक कर दे। बेहोश हो जाए। तो बेहोश होने के अलावा और सतत अपने मन को किसी ना किसी प्रवृत्ति में रत रखने के अलावा मन का यह जो कंस्ट्रक्ट खड़ा करने का जो को ये है टेंडेंसी उससे बचने का कोई सॉल्यूशन नहीं। ओनली सॉल्यूशन इज टू टीच द माइंड टू क्रिएट अ पॉजिटिव कंस्ट्रक्ट। माइंड दो तरह के कंस्ट्रक्ट बनाता है। एक तरह का कंस्ट्रक्ट जो कि स्ट्रेस प्रोड्यूस करता है। लेट अस टीच द माइंड टू क्रिएट ए कंस्ट्रक्ट। इस तरह का कंस्ट्रक्ट खड़ा करें जिसमें से कि ओजस प्रकट होता है। यह जो पूरा एक पॉजिटिव भाव जो प्रकट होता है उसमें से वो मैं इसको ओजस कहता हूं। तो अभी दिस इज़ अभी ओजस इज अ रियल वर्ड बट हियर आई एम यूजिंग इन दिस कॉन्टेक्स्ट। तो एक एक तरह का ओजस खड़ा होता है। यह ओजस अपने अपने मन को शांति और आनंद से भर देगा। सो किस तरह से यह भाव या ओजस प्रकट हो यह आई डू नॉट नो कि मैं उस समय जो सोच रहा था कि अपने माइंड को ब्लैंक कर दूं योग चित्तवृत्ति निरोध चित्त की वृत्तियों का संपूर्ण रूप से विनाश कर दूं वो प्रोसेस मेरे लिए कभी सक्सेसफुल नहीं हुई है क्योंकि माइंड की टेंडेंसी ही है कंस्ट्रक्ट खड़ा करने की कुछ ना कुछ वो खड़ा करता ही रहेगा बेटर बेटर सॉल्यूशन इज टू क्रिएट अ पॉजिटिव कंस्ट्रक्ट रेदर देन टू किल फिल द कंस्ट्रक्ट सभी तरह के कंस्ट्रक्ट को डिलीट कर दें। बेटर है कि पॉजिटिव कंस्ट्रक्ट खड़े करें जिसमें से कि भाव प्रकट हो नहीं कि अभाव प्रकट हो नहीं कि स्ट्रेस प्रकट हो। ये शशि महाराज का है भाव और अभाव। उनका डेफिनेशन थोड़ा अलग है वैसे जस्ट हिंट। तो यह हो गया कि मैं जिस तरह से ध्यान करता हूं या तो फिर जप करने का ईश्वर चिंतन करने का प्रयास करता हूं। उसमें से कुछ बातें अभी इसके साथ में ही एक दो चीजें याद रखनी है कि
Spiritual power of Ramakrishna - Ma Sarada literature
मेरे जीवन में मैंने जो सबसे ज्यादा हेल्पफुल पाया है वो है रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। मैं जितना इस लिटरेचर को पढ़ता हूं अभी देखिए कि अपने साहित्य को आप बौद्धिक दृष्टि से पढ़ सकते हैं। जैसे कि आप सोच सकते हैं कि अपने साहित्य में शंकराचार्य के साथ में कहां पे मैच हो रहा है? कहां पर कंट्रास्ट हो रहा है? यह द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत हम कौन सी फिलॉसोफी को फॉलो कर रहे हैं? हम कर्म क्यों कर रहे हैं? ये सब फिलॉसोफिकल सब डायलेमास, चैलेंजेस, इशूज़ है और जिसके बारे में सोचना ही चाहिए, सोचना इज अ वेरी गुड इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज। किंतु यह एक तरीका है अपने लिटरेचर को पढ़ने का कि एक इंटेलेक्चुअल हम कोई थ्यरी खड़ा करें। इसमें से इंटेलेक्चुअल कोई क्वेश्चन का सॉल्यूशन निकालने का प्रयास करें। देयर इज़ अनदर वे ऑफ़ रीडिंग आवर लिटरेचर। अपने साहित्य को पढ़ने का और एक तरीका है और वह तरीका है इसमें से भाव ग्रहण करें। नहीं कि बौद्धिक रूप से पढ़े किंतु भाव की दृष्टि से पढ़े। भाव के नेत्रों से पढ़ें टू रीड आवर लिटरेचर विद द आईज ऑफ रेवरेंस एंड श्रद्धा। यह जितना हम भाव के नेत्र से अपने साहित्य को पढ़ते जाएंगे देखेंगे कि यह ठाकुर का जो संतान भाव है या तो फिर मां का जो मातृ भाव है वो धीरे-धीरे करके हमारे भीतर में प्रवेश करना शुरू करेगा और हमारे भीतर में जो बाकी जो जितने भी नेगेटिव भाव है जो राग द्वेष लज्जा घृणा भय ये जितने भी जो नेगेटिव भाव है उनको वह धीरे-धीरे करके प्यूरिफाई करना शुरू करेगा। इसको धीरे-धीरे करके वो होली म पवित्र बनाना शुरू करेगा। सो दैट इज वन वेरी पावरफुल हेल्प आई हैव गॉट। तो ये हो गया मैं जो मैं जो कल डिस्कस कर रहा था अपने वालंटियर के साथ में मैंने सोचा कि थोड़ा सा आपके साथ में भी शेयर करूं। तो आज यहीं तक अभी कल फिर मां का लाइव प्रारंभ करते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: क्या construct बनाने पर कोई सीमा होती है? Q: is there any limitation upon making a construct?
कृष्णपणमस्तु कंस्ट्रक्ट कैसे भी आप क्रिएट कर सकते हैं क्योंकि अपॉन इमेजिनेशन देयर इज़ नो बाउंड्री। कंडीशन अभी जैसे कि आप अपने को स्पेसशिपिप में रख सकते हैं। इट डज़ नॉट मैटर यू कैन ट्रैवल इंटरस्टेलर स्पेस इन योर माइंड। बात यही है कि उसका आउटकम आपके मन में भाव प्रकट करना चाहिए। वो स्ट्रेस नहीं प्रकट करना चाहिए। अब जैसे कि लोग मूवी देखते हैं। फिर अपने को इमेजिन करते हैं कि वह मूवी के एक्टर की तरह वह दुश्मनों से लड़ रहे हैं। इट्स अ गुड कंस्ट्रक्ट। किंतु इससे आपके मन में स्ट्रेस के अलावा और कुछ प्रकट नहीं होगा। सो दैट आउटकम क्या है? उसको ख्याल में रख के आपको कंस्ट्रक्ट खड़े करने हैं। किसी आप ऑथर की इमेजिनेशन में प्रवेश करें या तो फिर आप अपने YouTube वीडियो मैं कभी-कभी इस तरह के वीडियो देखता हूं नेचुरल सीन के जो उसको फिर मैं यूटिलाइज़ कर सकता हूं इन क्रिएटिंग आवर कंस्ट्रक्ट कि हां सनराइज़ का वीडियो देखना है। मुझे सनराइज़ में बैठना है सुबह को। सो इट्स गुड कंस्ट्रक्ट। आप आप यूज़ कर रहे हैं आउटसाइड इमेज इमेजरी का। सो यू कैन डू व्हाटएवर यू वांट बट रिजल्ट शुड बी इन भाव। भाव होना चाहिए। अभाव मतलब स्ट्रेस नहीं होना
प्रश्न: क्या हम एक ही कंस्ट्रक्ट पर टिके रहते हैं या हम कई नई कंस्ट्रक्ट बना सकते हैं? ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारी सारी ऊर्जा ध्यान करने के बजाय कंस्ट्रक्ट बनाने में खर्च हो जाए। Q: do we stick to one construct or we can create many new constructs? it shouldnt happen that all our energies are spent in making the construct rather than on meditating.
चाहिए। मैं जब भी कोई भी कंस्ट्रक्ट क्रिएट करता हूं तो मेरे लिए वो सहज होते हैं। इस अर्थ में कि मैं प्लान करके इसको नहीं करता हूं। अभी जैसे मेरा एक रीडिंग का बड़ा हैबिट है तो हमेशा कुछ ना कुछ पढ़ता रहता हूं। तो पढ़ते-पढ़ते जो मैं पढ़ता हूं उसमें से फिर वो कंस्ट्रक्ट कभी-कभी ऑटोमेटिक खड़े हो जाते हैं। आई एंटर इन द बुक इटसेल्फ। ये किताब में मैं प्रवेश करके किताब का जो जगत है उसमें मैं अपने को बिठा लेता हूं। वह सहज रूप से हो गया। तो जितनी भी बार मैं नई-नई किताब पढूंगा या पुरानी किताबों को रिवाइज करूंगा या तो फिर इस तरह से कोई स्पिरिचुअल आइडियाज है उसको मैं दे सोचने का प्रयास करूंगा। तो सहज रूप से ऑटोमेटिकली कंस्ट्रक्ट खड़े हुए हैं। यह मेरा खुद का अनुभव है। कुछ-कुछ कंस्ट्रक्ट मैंने डेलीबरेटली क्रिएट किए हैं। जैसे कि दक्षिणेश्वर वाला है। कुछ-कुछ कंस्ट्रक्ट है मेरे खुद के एक्सपीरियंस से जाते हैं। जैसे कि मेरा चाइल्डहुड होम है या तो फिर बेलूर मठ। बेलूर मठ की मेरी बहुत सुंदर मेमोरीज है। तो वह ऑटोमेटिक मेरे माइंड में आ जाती है। तो मैंने इस तरह से कभी प्लान नहीं किया कि मैं कंस्ट्रक्ट खड़ा करूंगा। एक चीज दूसरा कि आज मैं उसी कंस्ट्रक्ट को रिपीट करूंगा या तो फिर नया नहीं खड़ा करूंगा या नया खड़ा करूंगा। डेलीबरेटली मैंने ऐसा कभी नहीं किया। कर सकते हैं। नथिंग रोंग विथ दैट। आप डेलीिबेरेटली कर सकते हैं। नए कंस्ट्रक्ट खड़े कर सकते हैं। पुराने को रयूज कर सकते हैं। सब समय ख्याल में रखना है कि अभी जैसे कि अब बेलूर मठ ही फॉर एग्जांपल मैं जब बेलूर मठ में से मेरा राजकोट पोस्टिंग हुआ था। उस समय मैंने काफी समय तक बेलूर मठ के बारे में नहीं सोचा था। क्योंकि क्या होता है आप कभी किसी जगह पर रहते हैं तो कुछ-कुछ घटनाएं ऐसी हो ही जाती है कि जिसके बारे में सोच कर के आपके माइंड में स्ट्रेस खड़ा हो। तो अभी जस्ट लिटरली मैंने कुछ ही दिनों पहले बेलूर मठ छोड़ा है। दूसरी जगह पर आया हूं। तो अभी मैं जब बेलूर मठ के बारे में सोचूंगा तो वही बातें फिर सब रिपीट होगी। इट विल प्रोड्यूस स्ट्रेस इन माय माइंड। तो फिर मैंने सोचा कि छोड़ो अभी बेलूर मठ को। कंस्ट्रक्ट की कमी नहीं है। बहुत सारे हैं। किंतु अभी आज इतने दिन हो गए बेलूर मठ छोड़े हुए। वहां के जो लोग थे जिनके साथ में मेरा डिफरेंस ऑफ ओपिनियन यदि रहा भी होगा तो अभी मैं भूल गया हूं। बस बात वही याद रह गई है कि वहां गंगा के किनारे सूर्योदय होता है और ठाकुर के मंदिर में मैं बैठा हूं। दिस इज़ द ओनली थिंग टुडे आई रिमेंबर। सो व्हाट कंस्ट्रक्ट यू यूज़ और क्रिएट बॉटम लाइन शुड बी इट शुड नॉट प्रोड्यूस स्ट्रेस।
प्रश्न: मैंने मानस पूजा के बारे में सुना है - अपने मन में ठाकुर की पूजा करना। Q: i have heard about manas puja -- to worship thakur in our minds.
मानस पूजा के बारे में देखिए कि अपने संघ में तो पूजा जब होती है नित्य पूजा ठाकुर की उसी का मानस पूजा उसी का एक अंग है कि जिसमें कि पुजारी महाराज ठाकुर की मानस पूजा करते हैं उनको धूप दीप चंदन नैवेद्य वगैरह ऑफर करते हैं। तो अपनी तो नित्य पूजा का ही मानस पूजा एक पार्ट है और मानस पूजा एक बहुत ही सुंदर कंस्ट्रक्ट है कि आप अपने ईश्वर की आप आराधना करते हैं और उसमें जो फिजिकल लिमिटेशंस होती है कि अभी इस आश्रम में तो नियम ऐसा है कि पांच ही लड्डू ऑफर करने हैं। अभी मेरे मन में है कि 5000 करूं लड्डू ऑफर। तो वह तो इन रियल वर्ल्ड पॉसिबल नहीं है। तो मानस पूजा करने के समय मैं सुंदर से सुंदर वस्त्र, आभूषण, नैवेद्य, भोग सब कुछ ऑफर कर सकता हूं। सो दैट इज अ पार्ट ऑफ आवर मानस पूजा इज अ पार्ट ऑफ आवर डेली रिचुअल। तो वह तो एक बात है। दूसरा कि आपने जैसे कहा कि कथामृत है या कोई भी धार्मिक साहित्य है। पढ़ते-पढ़ते आप अपने को यदि विजुअलाइज करते हैं कि मैं भी वहां पर चला गया हूं। मैं भी उस पूरी चीज को देख सकता हूं। अनुभव कर सकता हूं। आई कैन बी इन द मिडिल ऑफ दैट। इनफैक्ट हम यह भी अनुमान कर सकते हैं कि मैं मास्टर महाशय स्वयं होकर के और वही वार्तालाप मैं ठाकुर के साथ में कर रहा हूं। आप अद्वैत वेदांत में यदि आगे बढ़ जाएंगे तो आप अपने को ठाकुर के रूप में भी कल्पना कर सकते हैं कि वही भवतारिणी के मंदिर में मां काली के सामने बैठकर के ठाकुर जब मां को प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं भी ठाकुर के साथ में ठाकुर के ही देह के भीतर में बैठा हूं और मैं भी वही सब अनुभव कर रहा हूं जो कि ठाकुर को अनुभव हो रहा है जो कि वो जो तीव्र भाव के जो माने एक के बाद एक जो वेव्स आफ्टर वेव्स आकर के ठाकुर के हृदय मन को झंझोल दे रहे हैं। मैं भी उसको अनुभव कर रहा हूं। कंस्ट्रक्ट जब खड़ा करते हैं तब हम पूरे अद्वैत तक जा सकते हैं। देयर इज नो लिमिटेशन। ये ये डिफरेंस जो है यह डिफरेंस
प्रश्न: क्या हमें ठाकुर को अपने हृदय में बिठाना है या हमें ठाकुर के हृदय में बैठना है? Q: do we have to sit thakur in our heart, or we are to sit in thakur's heart?
है द्वैत और अद्वैत का। देखिए कि अद्वैत की दृष्टि से मैं ठाकुर के कमरे में यदि बैठा हूं तो मैं नरेंद्र या तो फिर राजा महाराज या तो फिर अन्य कोई गुरु भाई कि या तो फिर मैं अपना खुद का स्वरूप धारण करके वहां पर ठाकुर के सामने बैठा हूं। ठाकुर की स्तवस्तुति कर रहा हूं। यह हो गया द्वैत भाव से। अद्वैत भाव से कि मैं ही ठाकुर हूं। और ठाकुर के हृदय में जो कोई भी प्रचंड भाव का तरंग चल रहा है ईश्वर के प्रति जो संपूर्ण रूप से 100% तादात्म हो गया है वो मैं अनुभव कर रहा हूं। बोथ आई कैन डू। सो देखिए हिंदूइज़्म में यह बात अभी क्रिश्चियनिटी में यह बात कहेंगे तो दे विल से दिस इज़ अ ब्लास्टफेमी कि यह क्या बोल रहा है अपने को। राइट? हिंदूइज़्म गिव्स यू अ ह्यूज पावरफुल लैटीट्यूड। आप एंटायर स्पेक्ट्रम आपके सामने खोल दिया है। आप यदि कहेंगे मैं नारायण स्वयं हूं। अरे यदि जिस शास्त्र कहते हैं अहम ब्रह्मास्मि तो मैं यह कहने को क्यों कतराऊंगा कि मैं श्री रामकृष्ण के देह में नहीं विराज कर सकता। या तो फिर मैं श्री रामकृष्ण का स्वरूप धारण करके उनके जो अनुभूतियां है वो मैं नहीं ले सकता। सो दिस इज आवर ग्रेटनेस के जब आप जप करने को ध्यान करने को बैठते हैं आपके स्पिरिचुअल जगत में देयर इज नो सच ए थिंग एस कि यह नोगो एरिया के रिस्ट्रिक्टेड एरिया कि यहां पे प्रवेश निषेध है ऐसा कुछ नहीं
प्रश्न: स्वामीजी की एक कविता पढ़ी है, "मैं हूं चेतना का वो महासागर जिसमे जीसस या बुद्ध है लहरे मात्र"
है। देखिए यह जो कंस्ट्रक्ट के परे क्या है पता है? यह कंस्ट्रक्ट के परे हैं कि आप सहज अवस्था में है और आपका माइंड पूरा मतलब यह जो चित्तवृत्ति निरोध जो कि मेरा ओरिजिनल एंट्री पॉइंट था कि वो एक्चुअली मैं बड़े नेगेटिव रूप से ले रहा था कि अपने माइंड को ब्लैंक कर देना सभी चीजों को हटा देना किंतु अपना माइंड इट एोर्स वैक्यूम कभी भी ब्लैंक नहीं होने देगा कुछ ना कुछ तो खड़ा करेगा तो हम कंस्ट्रक्ट खड़ा करते हैं किंतु एक मैच्योरिटी का एक लेवल ऐसा आएगा कि कंस्ट्रक्ट की जरूरत नहीं रहेगी भाव सिर्फ रह जाएगा क्योंकि क्योंकि कंस्ट्रक्ट क्रिएट करने का हेतु क्या है? भाव को प्रकट करना। तो कंस्ट्रक्ट चला जाएगा भाव रह जाएगा। सो दैट इज दी अल्टीमेट एम अपने जीवन का। और जैसे मैंने कहा कि चैलेंज मेरे लिए क्या है कि यह भाव का प्रवाह ऐसा बहता रहे दिन भर कि मैं कुछ भी कार्य कर रहा हूं तो मेरे मन में यह शांति ही बनी रहे। फिर वो 10 चीजें आकर के मुझे परेशान ना करें। वो चीज मैं अभी तक नहीं कर पाया। सो दैट दैट विल बी समथिंग के रियली अपने जीवन का वह एटनमेंट होगा कि कंस्ट्रक्ट चला गया है। आपको बैठकर के मेहनत करके एक सिचुएशन खड़ा करना अपने माइंड में वो जरूरत ही नहीं है। भाव ऑटोमेटिक बह रहा है। तो दैट इज अहम ब्रह्मास्म। ये दैट विल बी रियल अद्वैतिक अटेनमेंट। ये जो डिफिकल्टी हम खड़ा करते
प्रश्न: शुरुआत में कंस्ट्रक्ट बनाने में बहुत प्रयास करना पड़ेगा। शायद बाद में यह आसान हो जाएगा। Q: in the beginning making a construct will take a lot of effort. perhaps later on it will become easy.
हैं इट इज इंटेंशनल जिससे कि अपने माइंड में और किसी चीज के लिए बैंडविड्थ ना रहे। वरना तो फिर मैं बैठा हूं। मेरे माइंड में थोड़ा सा भी स्पेस है एक्स्ट्रा तो कचरा आकर के खड़ा हो जाएगा। वही स्ट्रेस आकर के खड़ा हो जाएगा। सो आई एम डेलीबेटली मेकिंग इट सो डिफिकल्ट। इतना डिफिकल्ट बनाओ कि फिर वो और किसी चीज के लिए जगह ना रहे। सो इट्स इंटेंशनल
प्रश्न: मैंने अनुभव किया है कि मैं 5% मन से जप कर रहा हूँ और 95% मन से संसार की चिंता कर रहा हूँ। इसलिए, उस 95% का उपयोग कंस्ट्रक्ट बनाने में करना एक अच्छा विचार है। Q: i have experienced that i am doing japa with 5% of mind and worrying about the world with the 95% of mind. so it is a good idea to use that 95% in making a construct.
एक्चुअली। मैं जब बेलूर मठ में जॉइ करने को गया था ना तो वहां का मैं जो पहले तो मेरे हाथ में वो शेड्यूल थमा दिया। सुबह को 3:30 को उठना है। 4:00 बजे मंगल आरती अटेंड करना है। वहां से जो शेड्यूल स्टार्ट होता है, रात को सोने का समय मिलेगा आपको सीधे 10:00 बजे। 10:00 बजे 10:30 बजे। तो फिर मैंने पूछा कि इतना टाइट शेड्यूल रखने का आवश्यकता क्या है? तो फिर मुझे बताया गया और फिर वो उस समय सुहितानंद जी हमारे इंचार्ज थे तो क्लास में भी डिस्कस करते थे। देखिए कि यहां पे जब नए लड़के आते हैं जॉइ करने के लिए तो संसार और सन्यास ये तो इतना बड़ा डिफरेंस है ना तो मन में बहुत सारे टेंशन होते हैं मां-बाप का क्या होगा वगैरह-वगैरह जो होता रहता है तो उनको इतना बिजी रखो कि और कुछ आलतू-फालतू सोचने के लिए समय ही ना हो उनके लिए। तो वी हैव टू यूज़ द सेम टेक्निक विद आवर माइंड कि कंस्ट्रक्ट करने खड़े करने में इतना बिजी रखो इसको कि वो फिर और किसी कचरा लाने खड़ा करने के लिए उसके पास में वो बैंडविड्थ ही ना बचे। यह चित्त प्रसाद वाला आईडिया बड़ा
प्रश्न: क्या हमें ध्यान करने से पहले अपने क्रोध, ईर्ष्या से छुटकारा नहीं पा लेना चाहिए? Q: shouldnt we get rid of our anger, jealousy before we meditate?
सुंदर है। मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा। यह जितना हम अपने माइंड में डेवलप करेंगे उतना ही जप करने में यह जो प्रीिलिमिनरी कंडीशन हमने डिस्कस किया उसमें बहुत हेल्प करेगा। सो दैट इज वन थिंग। सेकंड इज के जैसे मैं आपका जो मेन क्वेश्चन है उसको लास्ट में रख रहा हूं। रख रहा हूं। आई एम टेकिंग द अनदर इशू फर्स्ट दैट सी इफ यू थिंक दैट फर्स्ट ऑफ़ ऑल आई विल गेट रीड ऑफ़ ऑल माय एंगर, डिजायर, हेट्रेड, एटसेट्रा, एंड देन आई विल स्टार्ट मेडिटेशन, देन इट्स नेवर गोइंग टु हैपन। व्हेन आई वाज़ लर्निंग योगा आवर आचार्य वाज़ अ वेरी ओल्ड एंड वनरेबल पर्सन एंड ही इज़ अ ट्रेडिशनल पंडित एंड ही ही हैड बीन लर्निंग योगा। योगा हैज़ बीन हिज फैमिली ट्रेडिशन। ही हैज़ बीन लर्निंग सी ही वाज़ अ बेबी बेबी इटसेल्फ ही स्टार्टेड लर्निंग योगा। हिज़ फादर टोट हिम। सो, ही यूज्ड टू टेल अस दैट देयर वाज़ अ डिबेट अमोंग द योगा टीचर्स। एंड वन ऑफ़ द योगा टीचर से दैट सी यू आर टीचिंग योगासना व्हिच इज़ कंप्लीटली रॉन्ग अकॉर्डिंग टू पतंजलि योगसूत्र बिकॉज़ पतंजलि सेज़ फर्स्ट लर्न यम नियम हाउ द एइट स्टेप्स गोज़ द यम नियम आसन प्राणायाम राइट सो अंटिल एंड अनलेस यू लर्न यम नियम यू कैन नॉट लर्न आसन सो यू गाइस आर टीचिंग आसना प्राणायामा ए मेडिटेशन विदाउट अ पर्सन बीइंग परफेक्ट इन यम नियम दैट इज़ यू आर नॉट एक्चुअली फॉलोविंग पतंजलि ऋषि मेथड यू आर कमिटिंग अ सैक्रिलेज। सो आवर आचार्य ही रिप्लाईड इन अ वेरी ब्यूटीफुल वे। ही सेज़ दैट सी दीज़ आर द योगा। योग अंग नाउ व्हाट इज़ द अंग? अंग इज़ एन ऑर्गन। नाउ व्हेन अ बेबी इज़ बोर्न इज़ इट हैपन दैट फर्स्ट हिज़ हैंड विल ग्रो देन सेकंड हैंड विल ग्रो देन लेग विल ग्रो देन हेड विल ग्रो। एव्री ऑर्गन ऑफ़ ए बेबी इट विल ग्रो साइमलटेनियसली। हैंड्स, लेग्स, हेड, टॉर्सो एवरीथिंग। सो इट इज़ लाइक दिस। द यम, नियम, आसन, प्राणायाम यू स्टार्ट प्रैक्टिसिंग टुगेदर दे विल ग्रो इन अ सिंक्रोनाइजेशन ग्रो टुगेदर। सो नेवर इमेजिन दैट फर्स्ट आई विल मास्टर यम नियम दैट इज़ सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोध, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर, प्रणिधान। फर्स्ट आई विल मास्टर दैट। फर्स्ट आई विल मास्टर ब्रह्मचर्य। देन आई विल स्टार्ट लर्निंग आसना, प्राणायामा। सो दैट इज नॉट अ करेक्ट वे ऑफ़ थिंकिंग। सो दैट इज वन थिंग एंड सेकंड
प्रश्न: क्या हम वास्तव में अपना पुण्य किसी और को दान कर सकते हैं? Q: Can we actually transfer our punya to someone else?
वेरीेंट एज यू सेड दैट कैन आई एक्चुअली ट्रांसफर माय व्हाटएवर द पुण्य आई हैव अर्न टू समवन एल्स। सी आई डू नॉट नो वेदर दिस इज़ पॉसिबल ऑर नॉट। बट व्हाट काउंट्स इज़ द सेंटीमेंट दैट आई आई एम प्रयंग गॉड टू ट्रांसफर माय अह पुण्य टू समवन एल्स। दैट एक्ट ऑफ़ प्रेयर इटसेल्फ इज़ व्हाट क्राउंड्स। वेदर दैट पुण्य इज ट्रांसफरर्ड और नॉट आई डू नॉट नो बट फ्रॉम द बॉटम ऑफ माय हार्ट व्हेन आई प्रे टू गॉड दैट गॉड प्लीज फॉरगिव माय एनिमीज़ गिव व्हाटएवर माय स्पिरिचुअल अटेंडमेंट टू देम देन आई हैव क्लोज माय अकाउंट विथ देम द स्टोरी आई टोल्ड दैट ऑफ दैट मॉक दैट बिफोर लिविंग आश्रमा माय इनिशियल प्लान वाज़ नॉट टू मेक प्रणाम टू हिम इन रामकृष्ण मिशन द ट्रेडिशन इज़ दैट इवन अ पर्सन हु जॉइ्स वन डे बिफोर यू ही इज़ योर यू सीनियर यू शुड मेक प्रणाम टू हिम। तो दिस साधु वाज़ एटलीस्ट 10 इयर्स ओल्ड सीनियर टू मी। सो नॉट टू मेक प्रणाम हैड आई लेफ्ट दैट आश्रमा दैट अकाउंट आई मसेल्फ नेवर वुड हैव बीन एबल टू क्लोज। बट द सीनियर स्वामी टोल्ड मी टू मेक प्रणाम डजंट मैटर इफ ही इंसल्ट्स यू टेक द इंसल्ट डज़ नॉट मैटर। सो आई मेक प्रणाम टू हिम। एंड सिंस दैट डे आई एम नेवर बोदर बाय द थॉट ऑफ दैट मॉक। सो दिस आवर बॉटम लाइन इज टू क्लोज द अकाउंट विद द वर्ल्ड बिफोर वी एंटर मेडिटेशन दैट इज व्हाट काउंट्स रेदर देन व्हाट एक्चुअल फिर एक्चुअल गॉड लिसंस टू अस ट्रांसफरर्स आवर पुण्य टू देम ऑ नॉट दैट आई डू नॉट नो
प्रश्न: अपनी साधना से अर्जित पुण्य को दान करना परम त्याग है। उस पुण्य को दूसरों को दे देने से हमें और अधिक पुण्य प्राप्त होता है, है न? Q: transfering the punya earned from our sadhana is ultimate sacrifice . giving away that punya also give us more punya, right?
देखिए यह बात आपका आईडिया अच्छा है कि यदि मैं अपना पुण्य दूसरों को देने के लिए प्रार्थना करता हूं तो दैट इटसेल्फ इज अ वो पुण्य अर्जन करता है तो वो बहुत अच्छा कांसेप्ट है किंतु देखिए यह सब चीजों का एक्चुअल क्या होता है हमको पता नहीं। मान लीजिए ठाकुर ने सही-सही हमारी बात सुन ली। वो पूरा पुण्य ट्रांसफर कर दिया और हम खाली हाथ बैठ गए। सो यू शुड बी प्रिपयर्ड फॉर दैट। फिर ये चालाकी करके यह सोचना ठाकुर ये टेस्ट कर सकता है हमारा कि चालाकी तो नहीं कर रहा ज्यादा पुण्य अर्जन करने का। तो पहले तो उसके पुण्य ले लो। देखिए वो हरिश्चंद्र के साथ में वो सत्यवादी है कि नहीं। उसकी जो परीक्षा की वो कहां कलमिनेट हुई कि उसकी पत्नी उसके मरे हुए पुत्र का शब्द देह लेकर के श्मशान में आई है। कहां इसको चिता इसकी जलाइए? हरिश्चंद्र मना कर देता है कि जब तक पैसा नहीं मिलेगा मेरे खुद के पुत्र की चिता मैं नहीं जलाऊंगा। भले ही चाहे मेरी खुद की बीवी रोती हो मेरी नजर के सामने। वो टेस्ट में पास होने के बाद में फिर से उनको राज्य वगैरह वापस मिला। तो बी केयरफुल कि ठाकुर यदि सोच ले कि यह नाटक कर रहा है कि नहीं? टेस्ट करो इसका तो
प्रश्न: कंस्ट्रक्ट तो हमारे मन की एक कल्पना मात्र है। यह कल्पना और वास्तविकता का मिलन कहां होता है? ठाकुर साक्षात रामलला के दर्शन करते थे। हो सकता है कि रामलला शुरू में कल्पना रहे हों, लेकिन बाद में वे वास्तविकता बन गए। Q: construct is just an imagination in our mind. where does this imagination and reality meet? thakur used to actually see ramlalla. ramlalla could have been an imagination in the beginning but later he became reality.
देखिए ये क्वेश्चन इज वेरी गुड के क इमेजिनेशन और रियलिटी के बीच में मतलब वो ये कहां है? भेदरेखा कहां पे है? कहां पे रियलिटी एंड होता है? कहां पे इमेजिनेशन स्टार्ट होता है? और इसीलिए यह प्रश्न ना खड़ा हो इसके लिए मैं इमेजिनेशन शब्द नहीं यूज़ करके कंस्ट्रक्ट वर्ड यूज़ किया है। देखिए कि कंस्ट्रक्ट इज अ वेरी रियल थिंग। हम पल-पल इस कंस्ट्रक्ट को अनुभव करते हैं। मेरे माइंड में देखिए कि आज मेरे माइंड में जो कोई मेमोरी है मैंने बचपन से जो सीखा है लैंग्वेज ये इतना सारा जो मेरा वोकैबलरी है शब्द भंडो कोई भी एक नॉर्मल ह्यूमन बीइंग होता है उसका मतलब 1000 2000 वोकैबलरी तो ईजीली उसका बन जाता है। अभी ये वोकैबलरी रहता कहां पे है? क्योंकि जो सीखा था मैंने स्कूल में सीखा था। पढ़ा था। तो अभी ये व्हाट इज़ प्रेजेंट? एक्चुअली प्रेजेंट इज़ नथिंग बट अ कंस्ट्रक्ट ऑफ द पास्ट। क्योंकि एक पल पल पल जो मैं जीता हूं उस पल में यदि वहीं पे मैं यदि जिऊंगा तो फिर मैं तो कंप्लीटली ब्लैंक ही हो जाऊंगा। एव्री पल प्रत्येक क्षण जो मेरा प्रेजेंट है उसमें मेरा पास्ट एज ए कंस्ट्रक्ट मुझे हेल्प करना चाहिए। दैट दैट इज़ व्हाट मेक माय आइडेंटिटी। मेरी अस्मिता है। मेरी जो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार यह चारों कंस्ट्रक्ट है। मेरे मन के भीतर में किस तरह से मैं डिसीजन मेकिंग करता हूं। दैट मींस कि यह सिर्फ यह जन्म नहीं पिछले कोटि-कोटि जन्मों का यह सब भरा हुआ है। मेरी जो बुद्धि है किस तरह से मैं बुद्धि मेरी मेमोरी है सब कुछ सेंटीमेंट है इमोशन है। यदि मैं उसको प्रेजेंट तक ही रखूंगा तो प्रेजेंट तो फ्लिटिंग है। जो बुद्धिज्म जो कहता है शून्यवाद आप एक यदि प्रेजेंट में जी रहे हैं सोचिए कि आपके पास में अभी क्या है? व्हाट आई हैव टुडे? नथिंग एब्सोलुटली नथिंग। जो कुछ भी है सब तो पास्ट में से आया है। जो कुछ भी है बहुत सारा कुछ मेरा फ्यूचर एस्पिरेशंस है। सो पास्ट एंड फ्यूचर आर ऑलवेज कनेक्टेड विद मी बट दे आर नॉट रियल। सी दिस सच अ पावरफुल आईडिया। बुद्धिज्म का आईडिया कितना पावरफुल है। यदि प्रेजेंट ही रियल है तो पास्ट भी रियल नहीं है, फ्यूचर भी रियल नहीं है। यू हैव टू रनाउंस एंड यू हैव टू अटेन निर्वाण। सो दिस एंटायर वर्ल्ड इज अ कंस्ट्रक्ट इन माय माइंड। तो वही है कि हम फिर अपनी इच्छा से एक दूसरे टाइप का कंस्ट्रक्ट खड़ा करते हैं। यह मेरा जो कंस्ट्रक्ट है इनवोलंटियरी है। मेरी मैं जो सीखा बचपन में तो मां-पिताजी ने जहां पे भेजा था जिस स्कूल में जो टीचर ने सिखाया वो सीखा है। इवन टुडे आज मैं यदि चाहूं कि मेरा पास्ट मैं कंप्लीटली चेंज कर दूं। मुझे कैलिफोर्निया में जन्म लेना है सिलिकॉन वैली में जहां पे कि मैं बचपन से ही वो फिर मैं सीईओ बन जाऊं। कोई फाउंडर बन जाऊं। अपनी गैरेज में कंपनी चालू कर दूं। या तो फिर मुझे एस्ट्रोनॉट होना है। मेरा पूरा पास्ट चेंज करके मैं एस्ट्रोनॉट का पास्ट लगा देता हूं। मुझे साइंटिस्ट होना है आइंस्टाइन की तरह। बेस्ट ऑफ द बेस्ट यूनिवर्सिटी में मुझे स्टडी करना है। मेरा पास्ट में पूरा चेंज कर दूं। बेस्ट स्कूल में मुझे जाना था। बेस्ट इट्स नॉट गोइंग टू हैपन। मेरा पास्ट और इवन हाफ ऑफ माय फ्यूचर इज कंप्लीटली इनवॉलंटियरी। हियर वी आर क्रिएटिंग अ वॉलंटियरी कंस्ट्रक्ट। व्हिच इज कंप्लीटली अंडर माय कंट्रोल। दैट इज़ व्हाई अवॉयड टू यूज़ द वर्ड
प्रश्न: हमारी सामाजिक वास्तविकता भी एक कंस्ट्रक्ट है। इससे कैसे मुक्त हुआ जाए और अपनी स्वतंत्रता कैसे प्राप्त की जाए? अपनी वास्तविकता को रीकंस्ट्रक्ट कैसे किया जाए? Q: our social reality is also a construct. how to break free of it and assert my freedom? how to reconstruct our reality?
इमेजिनेशन। कंप्लीटली राइट के कंस्ट्रक्ट गिव्स अस एबिलिटी टू चेंज आवर प्रेजेंट एज वेल एज़ फ्यूचर। देखिए आज मुझे ऑलमोस्ट 50 इयर्स हुए। मैं हु एम आई? मैं कौन हूं? तो मेरा जो 10 12 साल का जो स्कूलिंग था उसके बाद में जो मेरा हायर एजुकेशन था। उसके बाद में रामकृष्ण मिशन में आकर के जो मैंने सीखा। टुडे आई एम ए प्रोडक्ट ऑफ माय पास्ट। अभी मैं जो हूं वह मेरा एक लिमिटेशन बन गया। मैं एक पिंजरे में बंद हो गया। मेरा जितना एजुकेशन मुझे जहां तक बना सकता था मेरा एक पास्ट एक्सपीरियंस वहां तक मैं पहुंच गया हूं। बट आई वांट टू बिकम मच ग्रेटर। आई जस्ट वांट टू रिमेन मी सपोज आई वांट टू बिकम एज इंटेलेक्चुअल एज आइंस्टाइन। आई वांट टू बिकम एज ग्रेट एस सेंट एस से मीराबाई और यह अपने नरसिंह मेहता। सो इफ आई वांट टू ब्रेक आउट यह जो पिंजरा है जो कि मेरे पास्ट ने मुझे बंद करके रखा है तो ओनली ऑप्शन आई हैव गॉट इज रिकंस्ट्रक्ट माय पास्ट क्योंकि देखिए कि कंस्ट्रक्ट आप कहते हैं कि प्रेजेंट को चेंज करना। सो हाउ द प्रेजेंट इज़ चेंज बाय क्रिएटिंग समथिंग। मेरा मैं अपने पास्ट को एकदम रियलिटी के रूप में ले ले रहा हूं कि जो पास्ट में जो हुआ उसी का रिजल्ट मैं हूं। यू क्रिएट ए कंस्ट्रक्ट इन सच अ वे दैट देयर यू आर री एजुकेटिंग योरसेल्फ दैट योर प्रेजेंट विल चेंज बिकॉज़ कि कंस्ट्रक्ट का अल्टीमेट एम है कि आपका जो बॉटम लाइन एक क्रिएट करना मेरे लिए रियलिटी एज ऑफ टुडे क्या है इस पल में मेरे जितने भी संस्कारों का प्रवाह मेरे सामने एक यूनिटी बन के जो खड़ा होता है दैट इज द ओनली रियलिटी जैसे कि यह ऐसा हो गया ना कि गन्ने का बहुत बड़ा खेत है। अभी गन्ने के खेत में देखेंगे कि वह गन्ना पड़ा हुआ है। अभी जैसे मैं दिस इज़ अ रियल लाइफ एग्ज़ांपल एक्चुअली कि हम लोग वहां पे जाते थे जयराम बाटी में तो जयराम बाटी में अपना ही गन्ने का खेत है। तो वहां पे एक स्वामी जी वो इनके इंचार्ज थे। फिर हम वहां पे जाएंगे खेत में कहेंगे महाराज जी वो गन्ना खिलाइए। तो वो काट करके वो गन्ना हमको खाने को देते थे। तो बड़ा मजा आता था। मतलब इट्स नॉट लाइक ए वो शेरडी का रस वो खाना इटसेल्फ इज नॉट बट इट्स अ मैटर ऑफ़ जॉय कि मां का बागान है। मां के बागान के मां के स्वामी जी हमको वो गन्ना काट के खिला रहे हैं। दैट इज समथिंग वेरी फन। जॉयफुल। देखिए कि ये गन्ना काट के उसका जूस निकाल करके जब मैं जूस पी रहा हूं। दैट इज माय प्रेजेंट। कि व्हाट इज दिस जूस? कि पिछला अभी यह गन्ना लगाया होगा खेती एक साल से लगाया होगा। एटलीस्ट जो भी है। उसका जो बॉटम लाइन क्या है? वो मैं जो एक गिलास भर जूस पी रहा हूं वो तो मेरा जो 47 ईयर 50 साल जो गया मेरा भूतकाल में यह प्रत्येक क्षण जो मेरा पास्ट चेंज हो रहा है एडिशन हो रही है उसका बॉटम लाइन है आज के मेरे संस्कार तो कंस्ट्रक्ट का तो यही काम है ना कि मुझे एक तरह के संस्कार देना विच वर्तमान में कार्य करते हैं तो यदि मैं अपने माइंड में एक ऐसा कंस्ट्रक्ट खड़ा करूं जो कि मेरे संस्कारों को चेंज कर सकता है तो यू नो दिस इज एक्चुअली इन प्रैक्टिस चेंजिंग माय पास्ट जो कि हम फ्यूचर चेंज कर सकते हैं। ऐसा सुना है। बट दिस इज आल्सो पॉसिबल टू चेंज द पास्ट। इन माय माइंड आई कैन अभी देखिए कि इंटरनेट हमको इतनी सुविधा देते हैं कि बेस्ट ऑफ द बेस्ट यूनिवर्सिटी के बेस्ट ऑफ द बेस्ट प्रोफेसर है। यह सब सिलेबस ऑनलाइन हमारे पास में है। आई कैन रीएजुकेट मसेल्फ। मैं अपना मैं वो सोचने की जरूरत नहीं है कि मेरे शहर में तो हावर्ड या प्रिंस्टन या तो फिर यह ऑक्सफोर्ड नहीं था तो मैं वहां पे नहीं जा पाया। डज़ नॉट मैटर आई एम नॉट बाउंड बाय दैट। टुडे इटसेल्फ आई कैन स्टार्ट रीलर्निंग मायसेल्फ एंड आई कैन चेंज दिस बॉटम लाइन। आई कैन चेंज माय संस्कार। कंस्ट्रक्ट गिव्स दैट पावर टू कंप्लीटली रीमेक आवर लाइफ। एक्चुअली देखिए कि व्हाट इज़
प्रश्न: जैसा कि स्वामीजी कहते हैं कि पूरी मानवता प्रकृति के खिलाफ लड़ रही है। हम कहते हैं कि मुझे प्रकृति ने जो दिया है, उससे भी अधिक कुछ चाहिए। Q: as swamiji says the whole humanity is fighting against the nature. we say that i want something higher than what nature has given me.
सिविलाइजेशन? सिविलाइजेशन इज़ नथिंग बट अ कंस्ट्रक्ट। अब जैसे इंस्टीट्यूशन ऑफ मैरिज देखिए कुछ-कुछ का ऑब्जेक्टिव रियलिटी आप कह सकते हैं। माइक का एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी है। आपका एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी आपकी कार का एक ऑब्जेक्टिव रियलिटी है। बट जैसे कि फॉर एग्जांपल ये गवर्नमेंट। व्हाट इज़ गवर्नमेंट? देयर इज़ नो सच अ थिंग इज़ गवर्नमेंट। एक्चुअली इट्स अ सेट ऑफ़ रूल्स एंड कन्वेंशंस। दिस रूल्स एंड कन्वेंशंस आर नथिंग बट कंस्ट्रक्ट इन माय माइंड। यह पूरा सिविलाइजेशन ह्यूमन सिविलाइजेशन। मैं मैं पुत्र हूं तो मेरे पिता के प्रति मेरा ड्यूटी है। राजा हूं तो मैं प्रजा के प्रति जो ड्यूटी है। ये तो धर्म है। धर्म इज नथिंग बट अ कंस्ट्रक्ट। ह्यूमन सिविलाइजेशन रिलीजन जो कि हाईएस्ट एक्सप्रेशन ऑफ ह्यूमन सोसाइटी जो है दीज़ आर नथिंग बट कंस्ट्रक्ट्स। सो ओनली थिंग इज व्हाट पर्सनली आई बिलीव कि वेदांत हमको क्या सिखाता है कि वी आर नॉट बाउंड बाय कंस्ट्रक्ट्स। आज मैं जो हूं, यदि मैं कहता हूं कि मेरे फैमिली, मेरे सोसाइटी, मेरी एजुकेशन सिस्टम, मेरी गवर्नेंस, उसकी वजह से यदि आज मैं हूं, तो आई कैन गो बियड दिस इफ आई वांट टू बाय रिकंस्ट्रक्टिंग माय माइंड। दिस इज़ एंटायरली पॉसिबल। दिस इज़ द टीचिंग ऑफ़ वेदांत। तो