प्रार्थना
ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः
बालकवत् परमहंस अवस्था कैसे प्राप्त हो: प्रचंड तपस्या से — या माँ के सहज, सरल शिशु बनकर
मां के एक त्यागी संतान एक कहानी लिखते हैं। अह एक दिन जय राम भाटी की बात है। एक दिन मां के साथ में गए खेत में। अब जय राम भाटी तो पता है गांव है छोटा सा चारों ओर बड़े-बड़े खेत है मैदान है खेत है वगैरह तो अभी क्या है कि अभी जो हम लोग सिटी में रहते हैं हमको सब्जी वगैरह चाहिए परचेस करना है वेजिटेबल ना कि कुछ तो हम लोग क्या करेंगे कि वह जो घर के सामने वह आता है वेजिटेबल सेल करने वाला या तो उसके पास में से लेंगे ना कि फिर क्या करेंगे वह बाजार बाजार में से लेंगे तो यह परचेस करने का जो है हम लोगों के माइंड में फिट बैठा हुआ है। माने एक सिटी का मेंटालिटी है। अ एक दिन यहां पे क्या हुआ? मैं जब शुरूशुर में आया था मैं यहां पे अपने कमरे में वो ग्रीन टी बनाता हूं। तो ग्रीन टी के लिए चाहिए लेमन। तो अभी नींबू चाहिए तो मैं किचन में से फ्रिज में रखे होते हैं कुछ नींबू मैं ले आ जाता हूं। अभी एक दिन ऐसा हुआ कि फ्रिज खोल के देखा तो नींबू है ही नहीं उसके भीतर में। तो मैंने वह उसको बोला यह जो रसोइया है जो कि यह सब परचेस करता है। मैंने कहा यह लेमन खत्म हो गया है। तुम ले आना। तुम लोगों को तो रसोई में सब समय चाहिए। वह फ्रिज में नहीं है। तुमने देखा नहीं क्या? तो मुझे बोलता है महाराज अच्छा आप ठहर जाइए 2 मिनट। आपके कमरे के सामने ही यह नींबू का पेड़ है। पौधा है। वहां से मैं तोड़ के लाता हूं। मैंने कहा अरे बाप रे ये देखिए कि हम लोगों के साथ में यह जो सिटी वालों के साथ में यह प्रॉब्लम है। अभी मैं अपने कमरे से प्रतिदिन किचन की ओर जा रहा हूं। मेरे कमरे के एग्जैक्ट सामने में यह नींबू का पेड़ है जिसमें इतने सारे वह नींबू उगते हैं। मैं प्रतिदिन देखता हूं। इसके बावजूद क्योंकि सिटी में रहे हैं तो तो सिटी में रहने से यह पूरा मेंटालिटी अपना बन गया है कि यदि कोई भी वेजिटेबल है या कोई भी चीज है तो हमको यदि चाहिए तो या तो बाजार से परचेस करनी होगी या तो फिर वह परचेस करके जो ऑलरेडी किचन में रखा है उसको लेना है। नजर के सामने पेड़ है वो देख के भी मैं नहीं देखता हूं। सो यह क्या है कि हम लोगों का कंडीशनिंग हो गया है। तो दिस इज वेरी फनी। अभी मां के एक त्यागी संतान गिरिजंद जी। तो मां जय राम भाटी गए हैं। मां के साथ में मां के वो घर में ही रह रहे हैं। जहां तक हो सके मां की सेवा करते। यंग लड़के थे तो जहां पे भी कुछ भी काम है मां साथ में ले जाती थी। उनसे वह काम करवाती थी। तो एक दिन की बात है वह जो लोकी होता है सब्जी बनाने के लिए। तो मां ने कहा कि लोकी नहीं है। चलो लेके आते हैं। तो अभी यह जो सिटी का मेंटालिटी तो वही है ना कि परचेस करेंगे ना कि दुकान से लाएंगे ना कि ऐसा कुछ किंतु देखिए गांव में तो यह तर माने बाकी सब परचेस करना पड़ेगा। किंतु यह जो सब्जी वगैरह है वह तो खेत में ही उगता है और ऐसा वहां पर नहीं है कि यह इसका मालिक ये उसका मालिक यदि खुले मैदान में उगता है यह सब्जी तो कोई भी उसको काट के ले जा सकता है तो गिरिजानंद जी महाराज मां के साथ में गए और फिर खेत में गए मां के हाथ में वह चाकू जैसा था तो चाकू से वह जो पौधा था उसका ना कि पेड़ जो भी है उसमें से उसको काटा लौकी को और फिर गिरी गिरजानंद जी अपने सर के ऊपर में जो बास्केट वगैरह जो भी होगा उसमें उसको डाल के लेकर के आते हैं वापस। अभी महाराज जी लिखते हैं कि देखिए वह क्षण जो था मेरे लिए इतना आनंद का था। अब गांव में गए होंगे तो देखा होगा ना ही पोल्यूशन है, ना ही यह हल्लागुल्ला है, ना ही यह सब जो बाकी सब न्यूसंस होते हैं सिटी के। खुला मैदान है, खुला खेत है। सर के ऊपर में नील आसमान है। कहीं पर पास में यह तालाब वगैरह होगा। बंगाल के गांव यहां पर साउथ इंडिया के भी यह खास करके आंध्र प्रदेश है और यह केरल है। यह दो तो मैंने देखे हैं। जैसे हर जगह पर आपको छोटे-छोटे तालाब है। आपको देखने को मिल जाएंगे। और उसका ब्यूटी भी बहुत सुंदर होता है। तो वेस्ट बंगाल भी ऐसा है कि इंद्रदेव की कृपा है, बारिश है, पानी है, जथ है वहां पे। तो छोटे-छोटे तालाब, तालाब में से यह पद्म का फूल वह सब वहां पे हर जगह पर आपको मिल जाएगा। सो जस्ट इमेजिन दैट सीन। यह महाराज जी स्वयं कहते हैं कि इतना गांव का सौंदर्य यह ग्रीनरी है और फिर मां का संग है। देखिए मां तो है वैसे नारायणी जगत जननी आध्या शक्ति किंतु जब मां का यह सहज भाव भी जो है वो इतना मधुर है। इतना सरल है। इतना हमारे मन को शीतलता देने वाला है। मां के साथ में जा रहे हैं। वह गांव के वो खेत के रास्ते में और चलते-चलते वह मां कुछ बता रही है। वो महाराज जी हंस रहे हैं। वह ऐसा आनंद से जा रहे हैं। फिर वहां पर मां अपने हाथों से यह लोकी को काटती है। फिर महाराज जी उसको अपनी बास्केट में डाल देते हैं। और फिर बास्केट में डाल के वही खेत के रास्ते पर वापस आ रहा है। तो यह पूरा सीन महाराज जी वर्णना करते हैं और फिर कहते क्या है पता है कि मैं चाहता हूं कि मैं हमेशा वही एक आनंद आनंदित बालक की तरह रहूं जो कि मां के साथ में खेत में जाता था लौकी तोड़ने के लिए सर सब्जी काटने के लिए और फिर वही मां के साथ में हंसी मजाक आनंद निर्मल शीतल पवित्र संग मां का जननी का मां का जो सहज भाव है इतना सुमधुर है तो वही भाव मां का और मैं एक सहज सरल छोटा सा शिशु तो यही मैं चाहता हूं पूरा जीवन भर रहने को तो देखिए कि मैंने जब पढ़ा मैं मैं भी रांची में था वो ट्राइबल एरियाज में मैं काम करता था तो मैं भी गांव में जाता था खेतों में जाता था और बिकॉज़ के मैं सिटी में ही पूरा जीवन बिताया है। वैसे मैं छोटा सा तो गांव में जाता था मेरी मां का जो पिताजी का घर था किंतु फिर भी वहां पर क्या है कि वह फैमिली लाइफ ही हमारा इतना यह था एंगेजिंग था कि वह कहीं बाहर जाकर के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाना वो बचपन में यह सब अकल ही नहीं थी हमको तो क्या है कि यह मैं जब रांची गया रांची के गांव में जाता हूं खेतों में जाता हूं वह जो एक निर्मल हवा है निर्मल पानी है। स्वच्छ सली ये स्वच्छ नील आकाश है। वो सब जब दर्शन करता हूं तो मन में से इतना एक आनंद उत्पन्न होता है। तो देखिए कि मैं जब ऐसे ही मैं काम करने के लिए वहां पर गया था इसी से इतना आनंद आता था तो यदि मां साथ में होती तो और भी कितना आनंद आता। तो देखिए कि मां का जीवन जितना भी स्टडी करेंगे ना उसमें फिलॉसोफी तो देखने को मिलेगा। यह सब कुछ देखने को मिलेगा। किंतु एट द एंड ऑफ द डे व्हाट इज द टेक अवे जैसा हम लोग आजकल कहते हैं हमारा जो यूटिलिटेरियन लाइफ है। तो यूटिलिटेरियन लाइफ सब कुछ आपको एक यूटिलिटी होना चाहिए। आपने बहुत कुछ पढ़ तो लिया, सुन तो लिया किंतु फिर अल्टीमेटली कहेंगे पूछेंगे कि व्हाट इज दैट अल्टीमेट एसेंस? इसका डिस्टिल्ड एसेंस क्या है? वह बताइए। तो मां की इतनी सारी जो कहानियां हम सुनते हैं, पढ़ते हैं। सो दिस इज द डिस्टिल्ड एसेंस। ये महाराज जी की यह जो बात है गिरिजानंद जी की कि बस वही मां के साथ में खेत में जाते हैं सब्जी तोड़ने के लिए और फिर वहां पर मां के साथ में आनंद से कथा वार्तालाप होता है। सरल शिशु की तरह मैं अपनी मां की बातें सुन रहा हूं। मां की बातें सुनकर के मैं आनंदित हो रहा हूं। यही जीवन भर मुझे रहना है। महाराज जी जब यह लिखते हैं यही सरल बालक की तरह ही मैं पूरा जीवन बिताना चाहता हूं। सो दैट इज द मां के जीवन का जो अल्टीमेट प्राप्त्य है वो यह है। और देखिए कि साथ में ही आध्यात्मिक जीवन की जो सर्वोच्च अनुभूति है यह परमहंस अवस्था आपने यह ठाकुर ने इतनी सारी साधनाएं की। कि ये शक्ति साधना है, वैष्णव साधना है, इवन क्रिश्चियनिटी इस्लाम की साधना है, वगैरह-वगैरह एट द एंड ऑफ द डे वो नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करते हैं। और फिर इति इति करके वापस आते हैं। इसी जगत संसार में देखते हैं कि जिस जगत जननी को उन्होंने जिस जगत जननी के साथ में उन्होंने एकात्मता अनुभव की थी। अद्वय अद्वैत ब्रह्म भूमि में उसी जगत जननी वही ब्रह्ममई ब्रह्म और ब्रह्ममई ब्रह्म और शक्ति वही शक्ति पूरे विश्व में व्याप्त है। वही शक्ति ही इस जगत के रूप में मैनिफेस्ट होती है। फिर आमी याची आर मां आचर मैं हूं और मेरी मां है। वो परमहंस अवस्था तो ठाकुर क्या कहते हैं? परम अंश अवस्था में आचरण कैसा होता है? बालकवत होता है, जड़वत होता है, पिशाचवत होता है। तो यह जड़वत और पिशाचवत को थोड़ा सा अभी हम भूल जाए तो यह शिशुवत आचरण जो है महापुरुष का वही तो है कि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च प्राप्ति। तो अभी वह आप पूरा इतना सारी तपस्या करें। कितना ठाकुर की तपस्या का तो विवरण हमने पढ़ा है। जिस पेड़ के नीचे बैठकर के ध्यान करते थे उस पेड़ की शाखाएं पत्ते झुलस जाते थे। इतना गर्मी प्रकट होता था। भैरवी ब्राह्मणी उनको गंगा में शीतल करवाने के लिए लेकर जाती थी। उनके पवित्र देह को स्पर्श नहीं कर पाती थी। कंबल से उनको पूरा आवृत कर देना पड़ता था। फिर उनको बड़े ही जतन पूर्वक बड़े ही केयरफुली गंगा में उनको ले जाया जाता था जिससे कि उनका देह शीतल हो। तो देखिए कि इतनी प्रचंड तपस्या करना वह तो अपने हाथ की बात नहीं है। हम प्रयास करेंगे। ऐसा नहीं है कि हम हार मान लेते हैं। प्रयास अवश्य करेंगे। किंतु देखिए कि एट द एंड ऑफ द डे हमको पता है कि अपनी कैपेसिटी कहां तक जाती है। तो फिर देखिए कि वही बालकवत शिशुवत अवस्था प्राप्त करने का वो एक रास्ता है जिस रास्ते से ठाकुर चले थे। और यहां पर यह अपना रास्ता है मां के त्यागी संतानों का सहज सरल एक बालक होकर के मां के सामने बैठे रहना मां का कार्य करते रहना मां की सेवा करना मां की यह जो सहज अवस्था है वो उससे अपने हृदय को शीतल होते देना यही तो है वो अल्टीमेट परमहंस अवस्था बालकवत और यहां पर वो जो मां के पास में आकर के इमीडिएटली हम बालकवत अवस्था प्राप्त करते हैं। सो और
कहानी: केवल तपस्या करने से ही ईश्वर-प्राप्ति नहीं होती; इसके लिए ईश्वर की कृपा आवश्यक है।
देखिए यह तपस्या करके कोई ईश्वर मिलेंगे ऐसा कोई ठीक नहीं है। एक ब्रह्मवादीन महाशय थे। अह थे एक काफी अच्छी पोस्ट पर थे। किंतु फिर रिटायर होकर के काशी अपने काशी आश्रम में ना कहीं पर रहकर के तपस्या करते थे। तो पूरी रात भर जप करेंगे। ऐसा फिर खाने-पीने में कठोरता जैसे वो एक म स्टैंडर्ड साधु को रहना चाहिए। काफी कठोरता करते थे। तो फिर एक बार शांतानंद जी थे। मां के सेवक तो काशी से आ रहे हैं जय राम भाटी ना कोलकाता मां का दर्शन करने के लिए तो यह ब्रह्मवादीन महाशय यह निकनेम है ब्रह्मवादी निक नेम है तो उन्होंने महाराज को कहा कि आप ना मां को पूछिएगा कि मैं इतनी तपस्या करता हूं तो मुझे ईश्वर प्राप्ति कब होगी तो महाराज जी कहते हैं ठीक है मैं मां को पूछूंगा तो आए कोलकाता ना जय राम भाटी जहां पे भी मां का दर्शन हुआ कोलकाता ही कोलकाता नहीं तो महाराज ने फिर जब मौका मिला तो मां को पूछा कि मां वह ब्रह्मवादीन महाशय है वहां पर रहते हैं। काफी कठोरता करते हैं। रात भर जप करते हैं। तो अभी उन्होंने आपको पूछवाया है कि अभी मुझे ईश्वर प्राप्ति कब होगी और कितने दिन कठोरता और कितने दिन तपस्या करनी पड़ेगी? तो मां सुनकर के ही बड़ी ही गंभीर हो गई और गंभीर होकर के कहती है कि देखो यह वैदिक युग में ऋषि मुनियों ने सर नीचे करके पैर ऊपर करके वो पूरा जीवन भर कितने कितने जीवन भर उन्होंने तपस्या की है। फिर भी कोई उनको ईश्वर मिल गया है ऐसा नहीं है। कितनी कितनी तपस्या के बाद में यह सब फल प्राप्ति होती है। तो मां कहती है कि उनको बता दो उनको लिख दो कि तुम इतनी तपस्या कर रहे हो बोलकर के भगवान के पास में और कोई कामधाम है नहीं कि जैसे आकर के तुमको दर्शन दे दे तपस्या करके कभी भी ईश्वर का दर्शन नहीं होता ईश्वर की कृपा कर प्राप्त होने से ही ईश्वर की जब दया होगी हम पर ईश्वर जब अपने से दर्शन देना चाहेंगे तभी तुमको दर्शन मिलेंगे ऐसा मत सोचो कि अभी ये मैं थोड़ा अपना ऐड कर दे रहा हूं मां ने यह बात नहीं कही किंतु थोड़ा मैं ऐड कर देता हूं कि ईश्वर कोई जैसे साग सब्जी है वह दुकान में गए यह लो ₹50 1 किलो आलू दे दो जो भी अभी आलू का रेट है तो यह ₹50 लो 1 केजी आलू दे दो तो ऐसा करके मैंने पूरी रात भर अभी तपस्या की है जप किया है बोल के अभी इतने दिनों के बाद में मुझे ईश्वर को दर्शन देना ही है ऐसा कुछ मत समझो कभी भी यह किस तरह की दुकान है पता है आपको ₹50 ले जाना दुकानदार को देने हैं और दुकानदार की यदि इच्छा होगी तो सामने वह 1 केजी आलू देगा वरना कुछ नहीं देगा। बोलेगा भागो यहां से तो वह भी सहन कर लेना है। ये ये दुकानदार जो है बड़ा ही वह पागल किस्म का है। आप वहां पर दुकान पर जाकर खड़े रहेंगे। कुछ नहीं कर रहे हैं। वह सीधा आपके हाथ में आलू है। टमाटर है वो पकड़ा दिया। यह लो रखो। चलो तुम आनंद करो इसको। तो हम पूछेंगे अरे भाई मैंने तो पैसा भी नहीं दिया। कुछ नहीं दिया। तो बोला मैं अपने आनंद से दे रहा हूं। तुमको लेने में क्या दिक्कत है? और फिर कोई कोई होता है दुनिया भर की संपत्ति लेकर जाकर के दुकानदार के चरणों में अर्पित करता है। फिर भी दुकानदार कहेगा कि नहीं दूंगा। जाओ क्या कर लोगे? तो क्या है कि यहां पे तो कोई वो सांसारिक सौदा नहीं है कि इतना दिया तो इतना मिलने वाला है। आप देते जाइए। देना अपना धर्म है। बात यह नहीं है कि मां तपस्या को डिसरेज कर रही है। वह एक दूसरा एक मिसअंडरस्टैंडिंग कहीं ना हो जाए कि बस ईश्वर की इच्छा पर सब कुछ है। तो तो मुझे तो कुछ करना नहीं है। मैं अकर्ता हूं तो मैं बैठकर के तमस में डूब जाता हूं। अब तमस में डूबेंगे तो कहीं ना जाकर 100 जन्म के बाद में ईश्वर प्राप्ति होने वाली थी। कहीं हजार जन्म के बाद में भी नहीं होगी। तो वह मां के कहने का आशय नहीं है। मां के कहने का आशय यह है कि हमको दुकानदार को अपने पास में जो कुछ भी है अपना धन वैभव संपत्ति यह धन वैभव संपत्ति जो कि दुकानदार को देना है वह क्या है? हमारा घमंड है। अपना अहंकार है। यह नेम एंड फेम की आशा वासनाएं हैं। यह जितना भी काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, मत्सर यह जो षडरी जो अपने भीतर में पड़े हुए हैं। यह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश यह पंच कक्लेश से जो मेरा मन भरा पड़ा है, कामिनी कांचन के प्रति जो मेरा आकर्षण है, यह अष्टपाश है। जाति, कुल, शील, मान, अभिमान, लज्जा, घृणा, भय यह सब कुछ ईश्वर को अर्पण करना है। आप अभी अगेन यह सब कुछ ईश्वर को अर्पण किया बोलकर के ईश्वर ने हमको दर्शन दे दिया बोलकर के ऐसा भी मत समझो। यह अर्पण करना अपना धर्म है। ईश्वर को कब दर्शन देना है? वह ईश्वर ही जाने। वो इच्छामय इच्छामई जब इच्छा होगी तब वह दर्शन देगी। घड़ी लखेर एकटा दुटो केटे हशे दाव मा हाथ चापड़ी माने 1 लाख पतंगे उड़ रही है उसमें से एक दो पतंग माने काट दी यानी कि वो पतंग बाकी सब पतंगों का जो दौरा होता है धागा वो मां के हाथ में है पपेट की तरह वो पतंगों को नचाती है वो पपेट शो आपने देखा है ना वह पपेट मास्टर होता है उसके हाथों में यह सब डोरी बंधी हुई है स्ट्रिंग सब बंधी हुई है फिर उसे ऐसा ऐसा करेगा तो पपेट जो है सब वह नाचेगी वो तो ये ठाकुर ने उल्टी उपमा दी है। वहां पे वो पपेट मास्टर ऊपर रहता है। पपेट नीचे रहते हैं। यहां पे मां जमीन पर खड़ी है। वो पतंग हवा में उड़ रही है। और ये जो पतंग की जो स्ट्रिंग्स जो है सब मां के हाथ में है। जैसे मां चाहे वैसे मां उड़ाए। किंतु ये 1 लाख पतंगों की ये जो स्ट्रिंग्स मां के हाथ में है। मां की इच्छा होने से एक दो को काट देगी। जो कि पतंग फिर मुक्त होकर के वे हवा में अपनी इच्छा से विचरण करेगी। या तो फिर अपनी इच्छा क्या उस समय जब वह जब समय आता है मुक्ति का पता चलेगा कि मेरी कोई इच्छा ही नहीं थी। यह जो मेरी इंडिविजुअलिटी है वह तो एक भ्रम मात्र था। बस जैसे ही मुक्त हुए या तो फिर जैसे ही यह समझ आई जैसे ही यह अकल ठिकाने आ गई अपनी कि यह जो मेरा इंडिविजुअलिटी है भ्रम मात्र है। तुम्ही ही तुम्ही। ठाकुर कहते हैं ना कि आमी आर कभी कभी सोचता हूं तुम और मैं मैं और तुम और कभी-कभी हो जाता है तुम ही तुम हो जाता है तो मैं जब चला जाएगा सिर्फ तुम ही जब तक मैं और तुम इसके इलाके में है तब तक हमारी पतंग मां के हाथ में बंधी हुई है जिस क्षण मैं विलीन हो जाएगा सिर्फ तुम ही तुम हो जाएगा तो फिर देखिए कि पतंग कट गई ठाकुर की वह फेमस कहानी कि वह जो कसाई जो है बेल को ले जाता है। वह हम्मा हम्मा करता है पूरा किंतु आखिर में जब तू हूं तू हूं करता है तब उसकी मुक्ति होती है। तो यह हम्मा हम्मा से तू हूं तू हूं मैं मैं से तुम यह जो यात्रा है यह शरणागति की यात्रा दैट इज दी हार्ट ऑफ रिलीजन। तो यहां पर जो हमारा जो एसेंशियल पॉइंट था कि मां के श्री चरण में
साधना-पथ में पतन के कारण
एक बालक शिशु संतान की तरह आनंद से दिन बिताने शिशु और एक बड़ा आदमी एक एडल्ट और एक चाइल्ड दोनों में फर्क क्या है? एक उम्र का तो फर्क है ही है। एक एटीट्यूड का फर्क होता है। जब हम बड़े हो जाते हैं तो सब रिस्पांसिबिलिटी अपने सर पर आ जाती है। घर का जिम्मा है। यह फिर यह नौकरी करनी है, बैंक बैलेंस बनाना है, करियर बनानी है, फ्यूचर में क्या होगा देखना है। बच्चे हैं छोटे तो उनका फ्यूचर क्या है? वह सब चिंता करनी है। यानी कि जैसे ही हम बड़े होते हैं, बचपन से बड़े होने की यात्रा है, वह देखेंगे कि रिस्पांसिबिलिटी लेने की यह यात्रा है। जितना ही हम रिस्पांसिबिलिटी लेते जाएंगे अपने सर के ऊपर में, उतना ही यह कर्तापन कि मैं करता हूं। मैं मेरे हाथ में यह सब यह है रिस्पांसिबिलिटी है। अर्थात कि मैं जिम्मेदार हूं। यह कर्तापन का जो भाव है वह एक चाइल्ड में और एक बड़े के भीतर में डिफरेंस रहता है। शिशु का ठाकुर कहते हैं कि बालक है तो पिताजी का हाथ पकड़ के जब तक चलता है तब तक वो हाथ उसकी ग्रिप जो होती है वह तो वीक होती है तो छोटे बच्चे की तो हाथ की ग्रिप निकल जाएगी और वह गिर जाएगा यह भय रहता है। किंतु पिताजी जब बच्चे का हाथ पकड़े तब बच्चे को कोई चिंता नहीं। तो यह जब तक मैं सोचता हूं कि मेरा जिम्मा है पिताजी का हाथ पकड़ कर के चलने का तब तक मेरा यह ग्रिप जो है वह वीक रहेगा। किंतु जब मैं यह सोचता हूं कि पिताजी की ही जिम्मेदारी है मेरी रक्षा करने की। फिर पिताजी अपना हाथ पकड़ ले और फिर हम चले तो अपने गिरने का कोई भय नहीं। तो यहां पर देखिए कि संपूर्ण शरणागति यह एक जो टीचिंग है और सामने यह भी है कि यह बालकवत अवस्था रखने के लिए भीतर में से जो कुछ भी अंकट बंकट है जो भी कोई कूड़ा कचरा है यह जो भी गार्बेज अपने भीतर में है उसको खाली करना होगा। वरना तो फिर मुंह पर बातें कर रहे हैं कि हां मैं ईश्वर का संतान हूं। हां मैं मां का सरल शिशु हूं। किंतु भीतर में तो पूरा काम कांचन के प्रति आकर्षण भरा हुआ है। यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि वह गिद्ध जो है वह हवा में बहुत ऊपर तो उड़ता है किंतु उसकी नजर रहती है हमेशा जमीन के ऊपर में कहां पे यह कूड़ा कचरा यह गार्बेज कहां पर पड़ा हुआ है। वह हवा में उड़ता है किंतु नजर है गार्बेज के ऊपर में। जमीन के ऊपर में तो वैसा कहीं हम लोगों के साथ में ना हो जाए। यानी यह देखिए कि यह पिटफॉल जो होते हैं स्पिरिचुअल लाइफ में कितने सारे हैं। यदि स्पिरिचुअल लाइफ में प्रवेश ही नहीं किया एक कर्तापन का अभिमान लेकर के काम क्रोध से भर के अपना जीवन जीते हैं तो वह तो एक स्ट्रेट फॉरवर्ड लाइफ चाहता है। किंतु जिस क्षण हम यह सोचते हैं कि हां चलो अभी मुझे आध्यात्मिक होना है तो आध्यात्मिक होने के लिए जैसे ही मैं अध्यात्म के जीवन पर पैर रखता हूं वैसे ही यह खतरा जो है ना वह 10 गुना हो जाता है। बाहर के जगत में तो पक्का पता है कि यह अष्टपाश है, डरिपु है, पंचक्लेश है या तो फिर यह दो कामिनी कांचन है। यह खतरा है। स्पष्ट हमारी नजर के सामने दिखाई देता है। अभी मैं उसको स्वीकार करूं ना करूं वो अलग बात है। किंतु वहां पर जो है स्ट्रेट फॉरवर्ड है कि क्या सही है, क्या गलत है, क्या धर्म है, क्या अधर्म है। किंतु आध्यात्मिक जीवन में धर्म और अधर्म सही और गलत यह जो इतने सूक्ष्म हो जाते हैं कि फिर जो बड़े-बड़े सीनियर साधक भी होते हैं, वह कहीं इसमें वो फंस जाते हैं। इसकी झपट में आ जाते हैं। अधर्म की झपट में यह सोच के कि मैं धर्म कर रहा हूं। कर्तापन का अभिमान आ जाता है। यह पूरा जिम्मा मेरा है। मैं यह सब कुछ चला रहा हूं। मेरे नहीं होने से सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा। मुझे येन केन प्रकारारेण साम दाम दंड भेद मुझे यह कार्य तो करना ही है। अभी जैसे ही यह विचार आया यह जिम्मा मेरा है और जैसे ही साथ का एसोसिएट विचार आया कि साम दाम दंड भेद का इस्तेमाल करके मुझे इसको समाप्त करना है। साथ में ही हम धर्म से अधर्म के रास्ते पर आ गए। क्योंकि क्या है मींस और एंड यदि अच्छा कार्य करना है तो अच्छे कार्य की जो मेथड है वह भी अच्छी होनी चाहिए। पवित्र कार्य यदि करना है तो उसका जो साधन है वह भी पवित्र होना चाहिए। अपवित्र कार्य अपवित्र साधना के माध्यम से अपवित्र आचरण से आप पवित्र कार्य लक्ष्य को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे। ऐसा संभव ही नहीं है। मैं सोचूंगा कि चलो एक बहुत अच्छा एक बड़ा प्रोजेक्ट है। मेरे हाथ में आया है। किंतु यह प्रोजेक्ट को कंप्लीट करने के लिए थोड़ा बहुत मुझे चीटिंग करना पड़ेगा। थोड़ा बहुत झूठ बोलना पड़ेगा। थोड़ा बहुत अकाउंट में इस पॉकेट में से उस पॉकेट में डालना पड़ेगा। किंतु आखिर में तो देखो यह प्रोजेक्ट जब कंप्लीट होगा बहुत सारे लोगों का कल्याण होगा। नहीं होगा। क्यों? क्योंकि अधर्म के माध्यम से जो प्रोजेक्ट आपने कंप्लीट किया है उस प्रोजेक्ट में आखिर में देखेंगे शुरू शुरू में शायद ऐसा लगेगा कि चलो लोगों को फायदा हो रहा है किंतु वो प्रोजेक्ट जो है ना अल्टीमेटली और बहुत बड़ा अधर्म का कारण बन जाएगा। यह कैथोलिक चर्च की हिस्ट्री तो हमको पता ही है कि इतना बड़ा ऑर्गेनाइजेशन बना दिया। यह सोच के कि पूरी पृथ्वी पर क्रिश्चियनिटी का फैलावा करेंगे। किंतु आखिर में देखिए क्या हुआ। यही कैथोलिक चर्च उसमें यह इंक्विजिशन नामक एक महा भयानक राक्षस प्रवेश किया। और जितने भी लोग यह पॉप है ना कि यह लोकल बिशप है उनकी बात नहीं सुनते हैं। सबको पकड़ पकड़ कर के टॉर्चर करना, जिंदा जलाना यह सब प्रारंभ किया। यह इंक्विजिशन जो है कैथोलिक चर्च के ऊपर में एक बहुत बड़ा धब्बा है। तो अभी वे लोग बोलते हैं कि हम लोग इससे मुक्त हो गए। किंतु क्या है कि यह जो राक्षस एक बार भीतर में प्रवेश कर गया फिर उसको निकालना बड़ा ही मुश्किल है। आए दिन हमको समाचार आते रहते हैं कि यह चर्च में यह गड़बड़ हुई, वो चर्च में यह गड़बड़ हुई। विदेश में यह समाचार अच्छे से चलते हैं। इंडिया में वह माइनॉरिटी माइनॉरिटी बोल के उसको दबा देते हैं। किंतु देखिए कि अधर्म का सहाय लेकर के अधर्म के रास्ते पर चलकर के जो प्रोजेक्ट जो इंस्टीट्यूशन जो कार्य आपने प्रारंभ किया है वो कभी सफल नहीं होगा। इसलिए मैं कभी-कभी जो हम लोग कंपेयर करते हैं ना कुछ दिन पहले ही मैंने कहा था कि भारत का जो विकास है रामकृष्ण मिशन का जो विकास है देखकर के थोड़ा सा डिसअपॉइंटमेंट होता है। किंतु जैसे ही देखिए हम मां का जीवन स्टडी करते हैं तो हमको पता चलता है कि भले चलो हमारा विकास थोड़ा सा स्लो हो एटलीस्ट हम हमारी जो पद्धति है मेथोडोलॉजी है कार्य करने की यह जो हमारी यह जो पद्धति उसको हम प्योर रखने का प्रयास करते हैं। वह चाहे अपना अकाउंट हो, चाहे अपना इंस्टिट्यूशनल सेटअप हो, चाहे अपने साधुओं का बिहेवियर हो ना कि चाहे हम जो कार्य करते हैं, वह कार्य इटसेल्फ हो। जहां तक हो सके हम इसको प्योर रखने का प्रयास करते हैं। तो अभी क्या है कि प्योरिटी के ऊपर में आप जितना इंसिस्टेंस रखेंगे, उतना ही आपका क्वांटिटी जो है क्वालिटी और क्वांटिटी। यह कंफ्लिक्ट हमेशा रहता है। क्वालिटी कम कर दो तो क्वांटिटी बहुत बढ़ जाएगी। क्वालिटी को बढ़ाओ तो फिर अपनी एनर्जी क्वालिटी को मेंटेन करने में इतनी जाएगी कि क्वांटिटी कम पड़ जाएगी। अभी जो कमर्शियल लोग हैं उन लोगों के लिए क्वांटिटी ज्यादा इंपॉर्टेंट है। जितना प्रोडक्ट सेल होता है उतना प्रॉफिट होता है। अपने यहां पे क्वालिटी इज फार मोरेंट। क्यों? क्योंकि यदि क्वालिटी गड़बड़ हो गई तो हम हजार क्वांटिटी भी बढ़ाएंगे ना वो क्वांटिटी आखिर में और बहुत बड़ा अधर्म लाकर के नजर के सामने खड़ा करेगी। तो यह मां का जीवन पढ़ के हर छोटी-छोटी बातों में देखेंगे कि किस तरह से हमको सिविलाइजेशनल लेवल पर, कम्युनिटी लेवल पे और स्पिरिचुअलिटी के लेवल पर तीनों लेवल पर हमको शिक्षा मिलती है। हालांकि हमारे वो फ्रेमवर्क है उसमें मां मदर रिप्रेजेंट्स कम्युनिटी लाइफ किंतु तीनों का है। चाहे ठाकुर हो, चाहे स्वामी जी हो, चाहे मां हो। उन तीनों का टीचिंग वैसे तीनों फील्ड में अप्लाई होता है। वही है कि बाह्य उपलब्ध दृष्टि से देखेंगे तो वह उनको जो जो फ्रेमवर्क हमने अलॉट किया है उसमें उन लोगों का ज्यादा कंट्रीब्यूशन दिखता है। अदरवाइज एनालाइज करने को जाएंगे उनका कंट्रीब्यूशन आपको सब फील्ड में दिखेगा। तो यह छोटी-छोटी बातों में से इतना डीप मैसेज है। अभी गंभीरानंद जी का
माँ सारदा अपने बच्चों का उत्तरदायित्व संभालती हैं
मां का जीवन वो प्रारंभ करते हैं। इस सप्ताह हम इसको देखने वाले हैं। तो भार समर्पण यह चैप्टर जो है इस चैप्टर का अभी एक आखिरी पॉइंट आकर के खड़ा हुआ है। हमने हमको पता है कि गंभीरानंद जी का यह जो चैप्टर है इट इज अ सॉर्ट ऑफ ए आप कहेंगे ना ओवासिस ओवासिस अर्थात कि या तो फिर कहेंगे कि सॉर्ट ऑफ ए वाटर शेड कि आप जा रहे हैं रास्ते में एक बड़ा ही एक सुंदर एक जगह आया आपने आनंद किया फिर आपने यात्रा करना शुरू कर दिया यानी कठिन यात्रा पर थोड़ा सा बैठकर के विश्राम करने की जगह तो यह जो भार समर्पण चैप्टर है सॉर्ट ऑफ लाइक दिस कि आप एक जगह पर बैठकर के आनंद से विश्राम करते हैं। फिर अपना जर्नी प्रारंभ करते हैं। देखिए कि मां का जर्नी खास करके ठाकुर के साथ में ये शोडशी पूजा के बाद का ये जो हम देखते हैं एक के बाद एक जहां दक्षिणेश्वर में मां का जो मां की जो तपस्या थी मां ठाकुर ने मां को जिस तरह से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किस तरह से आचरण करना चाहिए वह सब सिखाया है कि दिए की जो वाट होती है वह जो वीक होती है लैंप की उसको इस तरह से बनाना नौका में यदि बैठना है तो सबसे पहले बैठना है और सबसे आखिर में उतरना है। अभी इसके पीछे का क्या लॉजिक है मुझे पता नहीं किंतु मां ने कहा है ठाकुर ने इस तरह से बताया है नौका में बैठने के समय सबसे पहले बैठो और सबसे आखिर में उतरो तो जो भी है मैं तो कभी नौका में रेयरली ही बैठा हूं वो बेलूर मठ से दक्षिणेश्वर जाने के समय अदरवाइज तो बैठा नहीं इसलिए क्या है वो जो कल्चरल मेमोरी जो होती है वो मेरी है नहीं नौका के बारे में तो अदरवाइज यह ठाकुर का टीचिंग है तो इतनी छोटी-छोटी बातों से लेकर के मने किस किस तरह से जप ध्यान किया जाए। किसको अभी शिष्य जब आते हैं मां के पास में तो कौन से शिष्य का क्या एक ये है संस्कार प्रवाह है। उसको समझ करके उसके अनुसार उसकी दीक्षा देना। किसी शिष्य के मन में क्या चल रहा है। मन की बात या तो फिर यह मन के भीतर में जो छुपे हुए संस्कार हैं जो कि उस शिष्य को भी नहीं पता। तो उसको समझ करके किस तरह से दीक्षा देना किस तरह से जो त्यागी संतान है गृहस्थ संतान है उनका आध्यात्मिक जीवन गठन करने में उनको सहाय करना वो सब छोटी-छोटी बात जो ठाकुर थे वो मां को समझाते थे बताते थे और साथ में ही मां की तपस्या थी और जब ध्यान वो तो एकदम बहुत ही करती थी और फिर ठाकुर को कैंसर हुआ तो फिर ठाकुर को श्याम पुकुर ले आया गया तो यह जो एक नॉर्मल ल प्रोग्रेशन चल रहा था हमारी स्टोरी का। ठाकुर को कैंसर हो चुका है। ठाकुर श्याम पुकुर में आ चुके हैं। काशीपुर तक यहां तक वो पूरा एक मामला चल चला था। किंतु बीच में फिर गंभीरानंद जी ने ब्रेक लेकर के यह भार समर्पण चैप्टर लिखा है। उसमें जैसे कि वह एक दूसरा ही पहलू मां के जीवन का वह बता रहा है। एक यहां तक जो चला मां जैसे कि ठाकुर के पास में से सीख रही है। ठाकुर की जैसे कि वह शिष्या है। किंतु इस चैप्टर में मां का जो असली स्वरूप है जगत जननी जगत धात्री स्वरूप उनका आगमन हुआ है। भक्तों का आध्यात्मिक कल्याण करने के लिए, भक्तों का जिम्मा लेने के लिए यह बात जो है वह इस चैप्टर में गंभीरानंद जी समझाते थे। अभी मैं आज सुबह ही देख रहा था कि यह चैप्टर हमने कब से स्टार्ट किया है। मैंने देखा कि इसका पहला क्लास मार्च में हुआ था। तो ये मार्च से दिसंबर तक ये एक ही चैप्टर इतना लंबा चला। मेरे ख्याल से एक लंबा एक चला था हमारा अवतरणी का। वो भी काफी लंबा चला था। उसका भी इतनाेंस था है और इसी चैप्टर का भी इतनाेंस है। तो अभी इस चैप्टर का अंत एक पॉइंट बचा है। एक स्टोरी बची है योगिन मां की इसके साथ में आएगा और फिर ठाकुर की अंत्य लीला इसके बाद में से प्रारंभ होगी। जो कहानी का प्रवाह हमारा चलता आ रहा था कि पहले मां आई शो दक्षिणेश्वर आई फिर शोडशी पूजा हुई उसके बाद में मां वहां पर रह रही है ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं त्यागी संतान आ रहे हैं वगैरह-वगैरह जो फिर ठाकुर को कैंसर वो पानीहाटी की घटना माने यह पूरा देखेंगे कि एक पीरियड है पूरा पीरियड शोडशी पूजा से जो स्टार्ट होता है पीरियड पानीहाटी जो यात्रा थी उसके साथ में इस पीरियड का अंत आता है। आनंद का प्रवाह जैसे कि इस पीरियड में बहा है। किंतु जैसे ही पानीहाटी गए ठाकुर फिर वहां से वापस आए तब से लेकर के उनके गले का जो दर्द है वह बढ़ता ही जा रहा है। बढ़ता ही जा रहा है। और आखिर में निदान हुआ। ग्रहणी रोग लगा है। कैंसर हुआ है। और फिर ठाकुर का जो बोलना है, उनका जो वार्तालाप, उनकी जो चलन शक्ति है, सब कुछ धीरे-धीरे करके कम होता गया। तो यह जो प्रवाह था हमारा उस प्रवाह को ब्रेक करके यह भार समर्पण चैप्टर लिया गंभीरानंद जी ने किंतु अब जैसे ही यह चैप्टर समाप्त होता है फिर से वही प्रवाह जो है मां के जीवन का ठाकुर के जीवन का श्री रामकृष्ण भावधारा का वह फिर से प्रारंभ हो जाएगा। तो यह आखिरी पॉइंट देख लेते हैं। इसके साथ में ही यह मार्च में हमने जो चैप्टर स्टार्ट किया था वह चैप्टर आज दिसंबर में जाकर के कहीं पर समाप्त होगा। कल हमने देखा गंभीरानंद जी हमको आखिर में इस चैप्टर के आखिर में मां की जया और विजया इन दोनों की बात बता रहे थे कि किस तरह से योगेन मां और गोलाप मां इन दोनों ने मां की सेवा की। गोलाप मां के क्षेत्र में
कहानी: गोलाप माँ की विचित्रताएँ और माँ सारदा में उनका अटूट विश्वास
हमने देखा कि वह मां की सेवा भी जितनी करती है उतना ही उनका एक नेचर भी थोड़ा सा विचित्र है। देखिए कि मां की रक्षा भी इतनी करती है। कोई भी भक्त आकर के कुछ भी गड़बड़ करेगा तो वो चिल्ला करके उसको डांट देगी ना कि कुछ करेगी। कभी-कभी इस तरह से मां को प्रोटेक्ट करने का प्रयास करती है जो कि मां पसंद नहीं करती। किंतु फिर भी क्या है? देखिए मां को तो पता ही है कि जब यह पंचमहाभूत का देह लेकर के आए हैं तो थोड़ा सा तो उनको भी प्रोटेक्शन की जरूरत है। एक बार मां जयराम भाटी जा रही थी कोलकाता से तो हुआ ऐसा कि कोलकाता में मां का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। काफी बीमार रही थी। तो अभी तो स्वास्थ्य अच्छा हुआ था। जय राम भाटी इसलिए तो जा रही थी। वरना तो शरद महाराज जाने नहीं देते। किंतु क्या है? मां बहुत ही दुर्बल हो चुकी थी। तो अभी रेलवे स्टेशन पर मां है। वह पता होगा कि यह कोलकाता से वर्धमान तक ना कहीं तक यह रेलगाड़ी जाती है। इसके बाद में यह क्वालपाड़ा जाया जाता है। बेलगाड़ी में फिर क्वालपाड़ा से वह पालकी में फिर जय राम भाटी वगैरह जो मां का तो रूट फिक्स ही है। तो सब रेलवे स्टेशन पे इकट्ठा हुए हैं। मास्टर महाशय है, गोलाप मां है, योगेन मां है, साधु ब्रह्मचारी है। सब और भी बहुत सारे भक्त हैं। तो अभी अह गुलाब मां का तो है ना प्रोटेक्टिव नेचर मां के प्रति तो उन्होंने अह अपने से ही मां ने तो कुछ कहा नहीं है बिना प्रटिंग के बिना प्रकल एआई का प्र बिना प्रटिंग के गोलापमा ने जाकर के मास्टर महाशय को कह दिया कि आप थोड़ा सा जोर से अनाउंस कीजिए ऊंचे स्वर में अनाउंस कीजिए थोड़ा सा कि मां का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। भक्त लोग जय राम भाटी जाकर के मां को परेशान ना करें। ऐसा अनाउंस कर दीजिए। वरना यह सब पगले लोग जिस तरह से उद्बोधन में आकर के हल्ला करते हैं वैसे ही जय राम भाटी जाएंगे। अभी यहां पे तो हेल्प करने के लिए हम है इतने सारे जय राम बाटी तो मां अकेली है। तो बोल बोल दीजिए ऐसा। तो ऐसा गोलाप मां ने वो मास्टर महाशय को कहा और मास्टर महाशय भी सोचते हैं कि अब गोलाप मां कह रही है तो मां का ही आदेश होगा। तो उन्होंने ऊंचे स्वर में कह दिया सबको अनाउंस करके कि मां का आदेश है कि किसी को जय राम बाटी नहीं जाना है। मां का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है तो फिर जाकर के मां को परेशान ना करें। अभी रेलवे स्टेशन पर मास्टर महाशय मास्टर महाशय का तो रिस्पेक्ट उस समय तो बहुत था ना। म सबको पता है ठाकुर के अंतरंग शिष्य है। कथामृत लिखा है। मां के प्रिय है। तो अब जब मास्टर महाशय इस तरह से माने ऊंचे स्वर में बात करेंगे तो सब भक्त लोग तो थोड़े बेचारे शांत हो ही जाएंगे। तो किंतु मां यह सब सुन रही है और मां इमीडिएटली समझ गई कि वो मास्टर महाशय ये जो बता रहे हैं अनाउंसमेंट कर रहे हैं उसके पीछे हाथ किसका है तो मां ने इमीडिएटली गोलाप मां को बोला किंतु मां का बोलने का स्वर तो बड़ा मृदु होता है तो बड़े ही मृदु स्वर से गुलाब मां को कहा अरे गुलाब ये तुम क्या कर रही हो ये क्या कर रही हो तुम मेरे भक्तों को मेरे संतानों को जय राम बाटी आने से रोक रही हो यह सब क्या मामला है तो देखिए कि मां के जीवन में इवन आख आखरी तक इस तरह से मां स्वास्थ्य खराब होने से भी भक्तों की यह जो जतन करना भक्तों को उपदेश देना वो छोड़ती नहीं थी। किंतु गोलाप मां का ऐसा नेचर था कि कैसे भी करके मां को प्रोटेक्ट करके रखें। अभी गोलाप मां किस तरह से मां को प्रोटेक्ट करती है नहीं करती है वह कल भी एक उदाहरण देखा और जिस तरह से हमने कल लाटू महाराज का उदाहरण देखा था वैसे ही उसी समय का एक दूसरा उदाहरण है और सेम एग्जैक्ट वही बात है कि मां वहीं पे बीमार होकर के पड़ी है उद्बोधन में और बहुत ही शरीर खराब चल रहा है। बार-बार बुखार हो रहा है। पूरा देह जैसे कि हड्डी पसली हो गया है। उस समय मां लेटी है वहां पे और मां के एक भाई का मृत्यु हो गया। मोस्ट प्रोबेबबली प्रसन्न मामा का जो भी है नाम याद नहीं मोस्ट प्रोबेब्ली प्रसन्न मामा। उनका मृत्यु हो गया। अभी मां को यह तो पता है कि वह बीमार है और बीमार है और उनकी ट्रीटमेंट चल रही है। तो मां बार-बार पूछती है अच्छा मेरे भाई का क्या हुआ? क्या उसकी ट्रीटमेंट चल रही है? क्या उसका है? फिर मां क्या करेगी? अपने पास में उसकी उनकी खुद की सेवा के लिए जो फल मिठाई वगैरह आएगा। मां किसी त्यागी संतान को कहेगी कि जाओ ये जाकर के मेरे भाई को दे दो। उसके घर देकर आओ। वह तो गरीब है। उसकी बेचारी की सेवा करने वाला कोई नहीं है। तो अब मां खुद इतना बीमार है। अपने भाई की खबर ले रही है और बार-बार पूछ रही है। और अगेन कल जैसे लाटू महाराज के केस में देखा था शरद महाराज ने सबको स्ट्रिक्ट इंस्ट्रक्शन दे दिया था कि मां के भाई का देहांत हुआ है। मां को बताना नहीं है। वरना तो फिर उनकी तबीयत और भी बिगड़ जाएगी। तो अब मां पूछ रही है और मां के जितने भी सेवक सेविकाएं हैं बेचारे मां के सामने झूठ बोल रहे हैं कि मां उनका सेहत अच्छा है और अभी तो ठीक ही हो रहा है। डॉक्टर की ट्रीटमेंट चल रही है वगैरह-वगैरह। किंतु फिर मां अब देखिए जिस तरह से लाटू महाराज के केस में हुआ। भाई के साथ में तो एक अत्यंत ही एक अपनेपन का भाव है ना। छोटे थे ये सब बच्चे थे। तो मां ने ही तो उनकी संभाल रखी थी। मां ने ही तो उनकी केयर करती थी। जैसे जननी होकर के अपने छोटे भाइयों की जतन करती थी तो उनका मृत्यु हो और मां को पता ना चले ऐसा कैसे हो सकता है? भीतर में एकदम आशंका प्रकट हो गई कि क्या हो रहा है? क्या हो रहा है? क्यों मुझे कोई कुछ नहीं बता रहा। मां जब बार-बार पूछ रही है तब गुलाब मां चिल्ला करके बोल उठी। अरे वह तो चला गया। अभी उसकी चिंता करने से क्या है? तो जैसे ही मां ने सुना मां के हृदय में इतना आघात लगा। फिर वह बेचारी का सेहत बिगड़ गया। और यह दोनों घटनाएं ना एक ही समय में पासपास में ही हुई थी। मां के भाई का देहांत और यह लाटू महाराज का और यह दोनों बातें गोलाप मां ने ही मां को बता दी थी। शरद महाराज ने स्पष्ट मना किया था सभी को कि कोई मां को मत बताओ। तो गोलाप मां ने बोल दिया था। अभी देखिए कि इसके बारे में क्या कहेंगे? गोलाप मां का गलती कहेंगे कि फिर अल्टीमेटली देखिए कि सबको पता है कि मां तो जगत जननी है। मां से कुछ छुपा नहीं सकते। कितना आप झूठ बोलेंगे? वो भी तो एक प्रश्न है। तो ये थी गुलापमा तो उनकी ये मतलब गंभीरानंद जी कहते हैं जया विजया की बात कर लेते हैं क्योंकि उनकी बातें आगे के अपना जो स्टोरी आगे जब चलेगी बहुत सारी आएगी तो ये गुलाब मां का परिचय हो गया। अभी ये योगिन मां का परिचय तो गंभीरानंद
कहानी: माँ के मातृत्व के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए ठाकुर को भी शिशु-संतान बनना होगा
जी लिखते हैं ठाकुर जोखन काशीपुर आन तखन जोगिन मार वृंदावन जाइया तपस्या कोार बासना जागिलो ठाकुर जब काशीपुर में थे कैंसर से पीड़ित थे मृत्यु शैया पेशा थे लीला अवसान होने का बस मुहूर्त आ ही चुका था उस समय योगिन मां की वृंदावन में जाकर के तपस्या करने की वासना प्रकट हुई एवं एक सुजोगे तीन उहा ठाकुर के जाना ले और जब मौका मिला तो उन्होंने यह बात ठाकुर को बताई शून्या ठाकुर मुखे ठाकुर मुख उज्जवल होया उठिलो और जैसे ही योगिन मां ने कहा सुनकर के ठाकुर का चेहरा उज्जवल हो उठा तिन्ही उत्साह दिया बोली ले उन्होंने उत्साह देकर के कहा तुम ही वृंदावन जावे तुम क्या वृंदावन जाओगी बेश होबे जाओ बहुत अच्छा होगा जाओ सब शेखाने पावे वहां पर सब पाओगी अभी देखिए यह जो मामला है कि ठाकुर की अंतिम समय के दौरान ठाकुर की सेवा नहीं करके वृंदावन चले जाना यह भी एक माने ये दोनों गोलाप मां और योगेन मां जितनी सेवा की है उन्होंने इतना ही एक थोड़ा सा क्या कहेंगे कि एक थोड़ा उनके नेचर में एक स्टेप पीछे चले जाना माने क्रिटिकल मोमेंट में ऐसा था अभी ठाकुर ठाकुर तो मुंह पर बोलते हैं कि वृंदावन जाओ बहुत अच्छा है। वहां पर सब कुछ मिलेगा। किंतु फिर हमको यह विजय कृष्ण गोस्वामी की भी तो बात याद है। वो आकर के ठाकुर के पास में खड़ा होकर कहता है कि महाशय हम लोग सोच रहे थे कि कोलकाता के पास में ही जब इतना उच्च आध्यात्मिक आधार माने ठाकुर के रूप में हमको उपलब्ध है तो फिर हम जब हिमालय में जाएंगे, पहाड़ में जाएंगे, समुंदर के किनारे जाएंगे, गुफाओं में खोजने को जाएंगे और भी कितना बड़ा आध्यात्मिक आधार मिलेगा। कोलकाता के पास में ही यदि इतना अच्छा मिल रहा है हमको तो यदि वहां पर जाएंगे तो और पता नहीं कितना उच्च आध्यात्मिक आधार मिलेगा किंतु गिरी विजय कृष्ण कहता है ठाकुर को सब घूम कर के देख लिया यहां पे जो है ऐसा कहां पर भी नहीं है तो देखिए कि जो शिष्य थे ठाकुर को ठीक-ठीक समझे थे सब पता था कि काशी कहो ना वृंदावन कहो राम कहो ना कृष्ण कहो गोदावरी कहो ना कि नर्मदा दा सरस्वती गंगा कहो सब ठाकुर के भीतर में ही है और ठाकुर के क्रिटिकल समय में जब लीला अवसान होने वाला है अंतिम मुहूर्त आन खड़ा हुआ है उस समय ठाकुर को छोड़कर चले जाना यह बड़ा ही आश्चर्य की बात है स्वामी जी भी गए थे बोधगया तपस्या करने के लिए वो तो दो-तीन दिन में आ गए थे वापस पता चल गया कि म ठाकुर के पास में जो पावर है और कहीं पर नहीं है किंतु योगेन माथी पता नहीं आखिरी घड़ी में कहां वहां से यह बात आ गई तो जाकर ठाकुर को कहा। ठाकुर ने भी उत्साह देकर के कहा अच्छा ठीक है जाओ वृंदावन में जाती हो सब वहां पर मिल मिलेगा। तो अभी ठाकुर भी शायद उनके मन की बात समझ गए होंगे जो भी है। तो वो गई वहां श्रीमात अखंड ठाकुर घरे ठाकुर पत्थया घरे उपस्थित छिलेन। अब जब यह बात हो रही थी उस समय ठाकुर के लिए जो डाइट फूड बनाना है पथ्य वो लेकर के मां भी उसी कमरे में उपस्थित थी। काशीपुर गए होंगे गार्डन हाउस में तो देखा होगा कि फर्स्ट फ्लोर जो है ठाकुर का कमरा वो कल्पतरु दिन वह पूरा भर जाता है अदरवाइज तो पूरा खाली रहता है तो वही ठाकुर के कमरे में वो ठाकुर भी थे तो मां भी उस समय उपस्थित थी ताहार दिखे चोखू के ठाकुर जोगिन मां के बोली लेन ओके बोले छो व ओ की बोले माने मां की ओर ठाकुर ने इशारा करके योगिन मां को कहा कि उनको बोला है वो क्या कहती है यानी कि तुमने ने मुझे जो बताया कि मैं वृंदावन जाना चाहती हूं। तो यह बात तुमने क्या मां को बताई है? मां क्या कह रही है? मां ताड़ाताड़ी बोली ले। अब जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा कि मां क्या कह रही है? पूछो थोड़ा सा तो मां ने इमीडिएटली कहा। ताड़ाताड़ी इमीडिएटली कहा। जा बोल बार तुम ही तो बोल ले। जो बोलना है तुम ही ने तो बोल दिया है। आभार की बोलो। मैं और क्या बोलूंगी? देखिए बाकी भी ठाकुर के साथ में इतना सुंदर म संबंध है। तुम मैंने आप नहीं वैसा सर पे नहीं चढ़ाना है ठाकुर को बिना मतलब का तुमने जो बोलना था बोल दिया अभी मुझे क्या बोलना है आप तो बोल दिया तो कि बहुत अच्छा होगा जाओ वृंदावन बोलने से पहले यदि पूछा होता कि मुझे पूछा है कि नहीं तो मैं तो अपना ओपिनियन देती अब मैं तो बता ही दिया है तो अभी मैं क्या बोलूंगी ठाकुर जेनो से कथा सुन्याओ सुनी लेना फिर ठाकुर भी ऐसा है किंतु वो जिद्दी बच्चे की तरह वो बात सुनकर के भी मां ने ऐसा कहा ये सुनकर के भी जैसे ठाकुर ने सुना नहीं त जोगिन मां के आभार परामर्श दिल उन्होंने जोगिन मां को फिर से कहा ओगो बादशाह ओके राजी कोिए जो तुम्हार सब होवे बेटा तुम उसको राजी करके जाना उसको खुश करके जाना तो तुम्हारा सब होगा उसको अर्थात कि मां को देखिए ये दोनों का जो रिलेशन इतना सुंदर है पहले तो ठाकुर ने बोल दिया अच्छा ठीक है तुम जाओ वहां पे सब मिलेगा फिर पूछा मां को बुला है मां ने कहा तुमने तो बता दिया अभी जो बोलना है मुझे क्यों पूछ रहे हो अभी ठाकुर ने फिर योगिन मां को कहा कि देखो उनको राजी करके जाना उनको खुश करके जाना उनके आशीर्वाद ले जाना तभी तुमको सब कुछ मिलेगा मां शहीदी के कान ना दिया उच्छिष्टो बाटी लैया नीचे जा बार जनो उठी लेन अभी मां के मन में भी आ गया कि ठाकुर बिना मुझे पूछे सब कुछ ओपिनियन दे देते हैं और फिर आखिर में कहते हैं कि मेरे आशीर्वाद लो तो मां ने इस बात को पूरा ही नजरअंदाज करके कान ना दिया अर्थात कि बिना सुने जो उच्छिष्ट कटोरी थी जिसमें ठाकुर ने आहार किया था उसको लेकर के नीचे जाने के लिए मां उठी जोगिन मां ताहार अनुसरण कर ले योगिन मां ने भी मां का अनुसरण किया से दिन और कोनो कथा हो ना उस दिन और कोई बात हुई नहीं पोर दिन शोका किंतु दूसरे दिन सुबह को योगिन मां वृंदावन यात्रा पूर्वे काशीपुर विदाई लेते आशी वृंदावन यात्रा करने से पहले योगिन मां काशीपुर में विदाई लेने के लिए आई ठाकुर के प्रणाम करिया त श्री मां क्यों प्रणाम करते गलेन ठाकुर को प्रणाम करके वो मां को भी प्रणाम करने के लिए गई तो श्री मां तहार माथा कोर जोप कोरिया दिलन तब जब वो योगिन मां आई प्रणाम करके विदाई लेने के लिए मां ने योगिन मां के सर पे मस्तक पे कर जप करके उनको आशीर्वाद दिया इहार दुई दिन पर जोगिन मां वृंदावन बने के लिए इसके दो दिन के बाद में ही योगिन मां वृंदावन कई एवं शेखाने जमुना तीरे बलराम बाबू देर प्रतिष्ठित देवालय और वहां पे यमुना के किनारे बलराम बाबू के द्वारा प्रतिष्ठित देवालय काला बाबू कुंजे आश्रय ले लेन काला बाबू का कुंज आज भी आप जाएंगे देखेंगे वहां पे है वहां पे उन्होंने आश्रय लिया देखिए ये कैसा ये बैक एंड फोर्थ ठाकुर के बीच में मां का संपूर्ण रूप से ठाकुर को शरणागत है। ठाकुर मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से आश्रित है। किंतु यह जब व्यवहार की बात आती है, दिन प्रतिदिन की बात तो कैसा एक सुमधुर संघर्ष माने छोटी-छोटी म ये लीला है ना बाकी सब कुछ ठीक-ठीक चलता होता तो उसमें हमको हो सकता है पढ़ने का आनंद ना आए। स्मरण मनन निधि्यासन करने के लिए मसाला ना मिले। किंतु यह एक बिल्कुल छोटी सी घटना कि जैसे ही योगिन मां ने पूछा ठाकुर ने पहले ही बोल दिया अच्छा जाओ किंतु फिर बाद में कहा कि मां का आशीर्वाद ले जाना और फिर मां को कहते हैं कि तो फिर मां तो थोड़ा सा नाराज हो ही जाएगी ना कि मुझे बिना बताए पहले तो बोल दिया कि जाओ करके और फिर ऐसा क्यों कहते हो कि मेरा आशीर्वाद लेकर जाओ तभी तुम्हारा सब होगा। यदि मेरी इतनी ही चिंता है तो पहले ही कहते कि क्या मां का आशीर्वाद लिया है तो ऐसा तो कहा नहीं तो फिर मां फिर वहां से कुछ बोल के नहीं बोल के कटोरी ले चली गई तो किंतु दूसरे कि देखिए यह सब तो सरफेस पे रहता है ना इन लोगों के भीतर में तो कुछ सब तो म वो ब्रह्म ही है वहां पे भीतर में वो ब्रह्म साक्षात्कार जैसे कि ब्रह्म रूपी सूरज जो है प्रचंड प्रकाश के साथ में वह प्रकाशित हो रहा है वहां पे अंधेरा प्रवेश करने का कोई प्रश्न ही नहीं है। बाहर में यह सब लीला लीला चिंतन करने के लिए जो हमको मसाला मिले इसके लिए यह बाहर में लीला चल रही है। तो बाहर में तो उस दिन जो हुआ सो हुआ। दूसरे दिन किंतु जब योगिन मां मां के पास में आशीर्वाद लेने के लिए आई तो मां ने उनके सर पर कर जप करके आशीर्वाद देकर खुशी-खुशी विदाई किया। सो यह था आखिरी घटना और इस आखिरी घटना में भी देखिए कि सब तरह से यह जो पूरा चैप्टर है अह भार समर्पण इसका एसेंस जैसे कि यहां पे मिल जाता है कि एक और तो है कि मां का सर्वस्व ठाकुर के श्री चरणों में किंतु मां ने अपना जो मातृत्व का इलाका जो है मातृत्व का राज्य है उसमें जैसे कि ना ठाकुर को भी प्रवेश नहीं करने दिया। वहां पर भी ठाकुर को यदि प्रवेश करना है ना तो शिशु बनकर के ही प्रवेश करना है। जैसे अन्नपूर्णा है तो वही मां पार्वती कैलाश में रहती है तो भगवान शिव की आराधना करती है। किंतु वही मां पार्वती जब काशी में अन्नपूर्णा होकर के विराज करती है तो भगवान शिव को भी भिक्षुक होकर के हाथ में कटोरा रहकर के उनके दरवाजे पर खड़ा रहना पड़ेगा। तो वह मां का इलाका है। जब मां के इलाके में प्रवेश करेंगे आपने मुझे बिना बताए कैसे परमिशन दे दिया वह तो है तो मेरी संतान है। मेरा जिम्मा है उनके ऊपर में तो जब आप मां के इलाके में प्रवेश करेंगे। मां के राज्य में प्रवेश करेंगे तो आपको इवन हम तो हम जैसे लोगों का तो प्रश्न ही नहीं है कि संतान होकर के प्रवेश करेंगे। ठाकुर जैसे ठाकुर को भी संतान होकर के प्रवेश करना है। तो यह जो पूरा चैप्टर एंड विद दिस लास्ट पॉइंट गंभीरानंद जी भार समर्पण का अंत लाते हैं कि हां मां ने सही-सही में अपने संतानों का जिम्मा ले लिया है। अभी ठाकुर का राइट नहीं रहा यह कहने का कि हां तुम जाओ तुम्हारा सब अच्छा होगा। वो जो स्वामी कल ही हमारी जो बात हो रही थी स्वामी जी ने इतना मेहनत करके बेलूर मठ खड़ा करने के लिए पैसा अमेरिका से ले आए खून का पानी करके पैसा ले आए अपना हेल्थ तोड़ के पैसा ले आए वही बेलूर मठ जब स्वामी जी बेचने को जा रहे हैं मां ने सीधा मुंह पे बोल दिया बेलूर मठ तुम्हारा है तुम बेचोगे तो जिस तरह से स्वामी जी की अकल को ठिकाने लगा दिया स्वामी जी का ये जो सेवा करने का भाव है उसको यहां पे भी कि अभी गुलाब मां आपकी थोड़ी ना है। योगिन मां आपकी थोड़ी ना संतान है। अभी तो यह सब मेरे संतान हो चुके हैं। आपने बार जो है मुझे समर्पित कर दिया है। अभी मैं चिंता करूंगी उनकी कि इनको क्या करना है, क्या नहीं करना, कैसे इनका कल्याण होगा, कैसे नहीं होगा। अभी आपका काम है शांति से ब्रह्म भाव में लीन होने का। तो देखिए कि विद दिस फाइनल पॉइंट इतना सूक्ष्म और इतना पॉइंटेड यह एक है विद दिस पॉइंट यह भार समर्पण का अंत आता है। इसके बाद का जो चैप्टर है चीर सिमंतिनी चीर सत्वा यह जो मां का जो भाव है यह और ठाकुर की महा समाधि यह इसके बाद में प्रारंभ होगा जिसको कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
तीर्थयात्राओं की कहानियाँ
एक इंटरेस्टिंग स्टोरी मां काशी गई है एक मंदिर में गई तो अभी मां तो मुक्त हस्त प्रणामी देती है ना तो सबको प्रणामी दे रही है तो पंडा वगैरह जो होते तो सब लोग बड़े खुश हो गए। पूछ रही माई आप कहां से आई है? कहां से आई है? तो मां के साथ में जो सेवक थे ना उन्होंने थोड़ा नाराज होकर बोल दिया यहां से ही आई है और कहां से आने वाली है? तो फिर मां ने एकदम मृदु स्वर से कहा अरे नहीं ऐसा कहो मैं जय राम भाटी से आई हूं। एंगल पता नहीं किंतु ये मां का जो एकदम मधुर भाव जो है ना मां का एकदम स्वभाव का कि कहो कि मैं जय राम भाटी से आई हूं। ना सही बात है। सही बात है। वो ठाकुर तो गए थे उस समय तो ये थे अपने वो मथुर बाबू थे तो वो पूरा अलग ही मामला था उस समय का। यह बात सही है कि अंतरंग शिष्यों के आने के बाद में तो ठाकुर ने तीर्थ यात्रा की नहीं है। अब जैसे कि कामर पुकुर का है तो वैसे सब जा चुके हैं। स्वामी जी नहीं गए हैं। नहीं गए। एक बार जा रहे थे। आठपुर तक पहुंच गए। आई थिंक तारकेश्वर तक नहीं आठपुर तक पहुंच गए। किंतु फिर उनका स्वास्थ्य खराब हो गया तो फिर उनको लौटाना पड़ा। नहीं इसीलिए तो ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ना ना। देखिए मतलब इतनी छोटी-छोटी चीज में भी कि अब ठाकुर का महाप्रयाण का टाइम आ गया है। मां को जिम्मा दे दिया है। फिर किस हिसाब से डायरेक्ट सीधा योगिन मां को बोल दिया अच्छा जाओ तुमको सब मिल जाएगा। माने सच अ स्मॉल थिंग और वहां से लेकर के बड़ा-बड़ा पूरा कि आत्मनो मोक्षार्थम जगत हितायच द एंटायर स्पेक्ट्रम इज हियर ओपन बिफोर अस मैं बहुत बार सोचता हूं ठाकुर मां स्वामी जी के जो डिवोटी है उन लोगों को जप ध्यान करने में कुछ नहीं है बहुत ही सहज है ये तीनों की किताबों को रोटेशन में पढ़ते जाइए बस हो गया इसी से आपका हो जाएगा और यह सीक्रेट है फिर और भी कुछ-कुछ लोग आकर कहेंगे कथामृत पढ़ते फिर भी शांति नहीं मिलती। सिर्फ कथामृत से नहीं चलेगा। आपको तीनों लेना पड़ेगा। तभी ठीक-ठीक आपको प्राप्ति होगी।
ठाकुर, माँ और स्वामीजी—तीन अलग व्यक्तित्व नहीं, एक ही धारा हैं; उनका अध्ययन संयुक्त रूप से होना चाहिए
किंतु किंतु सही-सही अप्रिशिएट करना है ना। स्वामी जी को ठीक-ठीक एप्रिशिएट करना है। मां और ठाकुर को पढ़ना है। ठाकुर को ठीक-ठीक एप्रिशिएट करना है। मां और स्वामी जी को पढ़ना है। मां को ठीक-ठीक बहुत सारे लोग हैं। मां को ही पढ़ेंगे तो फिर वह भी एक नहीं होगा। आपको स्वामी जी और ठाकुर भी चाहिए। एक तीन तीन एक यह मंत्र याद रखना है। फिर देखिए कि आप रोटेशन में पढ़ते जाइए तीनों को। एकदम हां अभी कल ही मैंने फॉर्मेट में थोड़ा सा मॉडिफिकेशन किया। पता है मैंने देखा कि स्वामी जी का क्लास दो हो जाता है। ठाकुर का क्लास दो हो जाता है। एक कथामृत एक लीला प्रसंग है। स्वामी जी का लाइफ है और यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा में से एक अभी ले रहे हैं। तो दो-दो क्लास इनके हैं। मां का एक क्लास है। यानी कि मां का क्लास एव्री फिफ्थ वीक पे आता है। और मैंने इनिशियली क्या सोचा? अपना फार्मूला क्या है? लाइफ एंड टीचिंग। लाइफ एंड टीचिंग। तो ठाकुर का लाइफ लीला प्रसंग तो टीचिंग कथामृत। स्वामी जी का लाइफ तो स्वामी जी का टीचिंग। तो मां का ऐसा मैं सोच रहा था कि मां का लाइफ है तो साथ में मां के लेटर है या तो फिर ये मां की बातें जो सब में अभी जो बात हुई वो उसको ले लेते हैं। फिर मैंने सोचा मां का तो लाइफ ही तो टीचिंग है। अलग से तो कुछ है ही नहीं। तो मां के लाइफ को मैंने डबल कर दिया है। अभी एव्री थ्री वीक पे मां का लाइफ आएगा। माने हां हां हां हां हां माने छह क्लासेस अभी होंगे सीरीज में। दो ठाकुर के दो स्वामी जी के दो मां के किंतु मां का एक ही टॉपिक है मां का लाइफ ही है किंतु फिर उसमें बाकी सब ले लेंगे अभी जैसे हमने कहानी का स्टार्ट ही किया जैसे क्लास का वो वही मां की बातों से सो वो बस सब ले लेंगे यहां पे वो मां के लेटर भी आ जाएंगे सब कुछ आ जाएगा ओम