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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्रकाश और छाया के बीच : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 3 oct 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा के जीवन का पाठ कर रहे हैं उसमें वह जगत विख्यात घटना तेलो भेलो के मैदान में जो डकेट बाबा के साथ में मां की मुलाकात हुई थी उनके साथ में जो वार्तालाप हुआ था उसका पूरा वर्णन अभी हम लोग पाठ करेंगे हालांकि प्रश्न होगा कि यह कहानी तो हम सबने सुनी है यह कहानी के बारे में हम सबको जनरली पता भी है तो इस किताब में से पाठ करके हमको नया क्या मिलेगा एक्चुअली फैक्ट्स की वजह से भी ज्यादा इसमें जैसे हमने गंभीरानंद जी महाराज का पाठ करते करते पहले भी हमने अनुभव किया है कि इसका जो साहित्यिक लालित्य है साहित्यिक मधुरता है महाराज की वर्णन करने की और साथ में ही कुछ ना कुछ फिलोसॉफिकल पॉइंट्स हमको समझाने की वह अद्भुत है तो कहानी के फैक्ट्स हम सबको पता है किंतु यह जो साहित्य है महाराज के कलम से जो प्रकट हुआ इस साहित्य का भी आस्वाद लेंगे और महाराज साथ-साथ में में जो कोई भी फिलोसॉफिकल ऑब्जर्वेशन हमको कहेंगे उसको भी हम थोड़ा सा विषद रूप से चर्चा करेंगे तो वह कहानी का आरंभ हो रहा है गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं कामर पुकुर बा जयराम बाटी होते श्रीमा साधारण तो पदो ब्रजी दक्षिणेश्वर जाई तेन कामर पुकुर या जयराम बाटी से मां पैदल ही दक्षिणेश्वर जाति एक बार कोनो पर्व उपलक्ष कोई एक जन पल्ली रमणी गंगा स्नाना अथ कोलकाता जाते उधत होले श्री माओ कमार पुकुर होते लोखी दीदी शिवुदा प्रवृति के लोया तहादेर संगे चली लेन एक बार ऐसा हुआ कि किसी उत्सव के उपलक्ष में कुछ गांव की महिलाएं गंगा स्नान के लिए कलकाता आ रही थी तो इसी बहाने मां ने भी सोचा कि मैं भी इनके साथ में कलकाता जाती हूं दक्षिणेश्वर में आऊंगी तो मां के साथ में लक्ष्मी दीदी और शिवुदा अर्थात कि ठाकुर के भाई के लड़के और लड़की यह दोनों भी साथ में जाने के लिए तैयार हो गए तहर मनेर भाव एई ज ग्रामवासी नीरा फिरिया आश बे किंतु तिनी दक्षिणेश्वर थाकि जाई बेन मां ने सोचा मां के मन का भाव था कि बाकी सब गांव वासी जो महिलाएं हैं वह वापस आ जाएंगी किंतु वोह वहां पर दक्षिणेश्वर में रुक जाएंगी कामर पुकुर ईते चार क्रोस दूरे आराम बागे पहुंच अवशिष्ट दन शेखाने काटा बार कथा छलो ज कामर पुकुर से चार क्रोश दूर अब यह क्रोश अर्थात कि कितना होता है डिस्टेंस हो पता नहीं किंतु मान लीजिए कि चार क्रोश दूर आरामबाग एक गांव है शहर छोटा सा टाउन जैसा वहां पर पहुंच कर के देखा कि पहले तो सोचा था कि वहीं पर रात रुक जाएंगे और वहां पर सामने में तेलो भेलो माठ जो है वह सुबह में ही वहां पर निकलेंगे रात में जर्नी बड़ा डेंजरस है किंतु इन्होंने देखा कि रात अभी भी हुई नहीं है अभी भी दिन है तो क्यों नहीं हम चलना शुरू कर देते हैं कारण समुख नरो हंता देर बसती बोलिया कुखा तो पंच क्रोष व्यापी तेलो भेलोर माट वहां पर आरामबाग में ही रात रुकने की बात थी क्योंकि सामने ही नर हत्या करने वाले कुख्यात तेलो भेलो माठ पंच क्रोष व्यापी पांच क्रोष बड़ा तेलो भेलो का माठ ता मैदान था उहा मध्य भागे एनो एक भीषण काली मूर्ति आचे इस मैदान के मध्य में मध्य भाग में अभी भी एक भीषण काली मूर्ति है दस्यु गण लठन आदते प्रवृत होई बार पूर्वे ई डाका ते काली पूजा करीतो ये दशु गण लूटमार करने के पहले इस डाका काली की पूजा करते डाका अर्थात की डकेट डकेट की काली अर्थात की डाका दे काली उनकी पूजा करते डाका तेर भोए दोल बद्धो ना होया कोई के हो ओई भीषण माठ अतिक्रम्य ना डकेट के डर के मारे कोई भी बिना दल बद्ध हुए इस मैदान को सेकंड वर्ल्ड वॉर में अटलांटिक ओशन में जर्मन सबमरीन उन्होंने यह जो ब्रिटिश और अमेरिकन जहाज जितने भी अटलांटिक ओशन से जाते थे अमेरिका और ब्रिटेन के बीच में तो सबमरीन आकर के सब समय उन परे हमला करती थी तो जब भी अमेरिका से कोई भी जहाज ब्रिटेन आएगा ब्रिटेन से अमेरिका जाएगा तो जितने भी जहाज होंगे सब जहाज दल बना कर के एक साथ में जाएंगे क्योंकि क्या है कि पानी के ऊपर में तैरने वाले जो जहाज होते हैं वह आक्रमण करते हैं तो उसको गोला बारूद वगैरह मार करके आप उसका कैसे भी करके अपना बचाव कर सकते हैं किंतु पानी के नीचे तैरने वाली जो सबमरीन या तो पनडुब्बी होती है उसके सामने बचाव करना इतनी टेक्नोलॉजी उस समय नहीं आविष्कार हुई थी तो य व यदि पनडुब्बी से बचना है सबमरीन अटैक से तो सबको दल बना कर के जाना होगा जिससे कि ये सबमरीन वाले कंफ्यूज हो जाए कि किसके ऊपर में पहला हमला करना है तो यहां पर भी डकेट के सामने सब लोग दल बना कर के ग्रुप बना कर के एक मैदान को पार करते थे यदि डके हमला भी करें तो वे लोग भी देखेंगे कि अरे इतने सारे लोग हैं एक साथ में वह यदि सामने अपना बचाव करेंगे तो हम कैसे उनको लूट पाएंगे हालांकि इस ग्रुप में सब महिला ही ज्यादा थी किंतु फिर भी ये वो ज्यादातर लोगों को देख कर के डर जैसा तो लगता है हालांकि डकेट को डर जैसा कुछ नहीं है और वे लोग आक्रमण करते हैं तो वे लोग भी ग्रुप में ही आक्रमण करते हैं किंतु फिर भी एक मानसिक सध्या रहता है 10 15 लोगों के साथ में चल रहे हैं तो तो यहां पर भी लोग सब ग्रुप बना कर के इस मैदान को क्रॉस करते थे आलोच्य दिने श्री मायर संगरा आराम बागे उपस्थित होया देखि लो ज संधार थेट बिलबो आचे एकट ध्रु तो चलीले सेद नहीं ए बप संकुल प्रांतर पूर्वक तारकेश्वर उपस्थित हुआ संभव जिस दिन की बात कर रहे हैं उस दिन मां और मां की संगियोवेसे झुकती झुक तो विचित होलो इसीलिए आरामबाग में विश्राम नहीं करके उसी दिन संध्या के समय ही इस मैदान को पार करने का निर्णय लिया गया श्री मां बालो काल होते पोरे असुविधा सृष्टि नाकोरा जन्नो सुपरिचित लेन मां बचपन से ही और किसी को अपनी वजह से कष्ट ना मिले इस तरह की कार्य करने में इस तरह के निर्णय लेने में सुपरिचित थी हमने देखा है बहुत बार कि देखिए कि पहली बार भी जब मां अपने पिताजी के साथ में दक्षिणेश्वर आ रही थी तो पहला दिन तो उनका बड़ा ही सुंदर रूप से कट गया किंतु दूसरे ही दिन मां को बुखार होने लगा अभी जैसे हल्का सा बुखार हुआ मां ने किसी को बताया नहीं यह सोच कर के कि मेरी वजह से सबको रुक जाना पड़ेगा पिताजी को भी कष्ट होगा किंतु अभी क्या करेंगे बुखार धीरे धीरे बढ़ता गया और इतना बढ़ता गया कि मां का चलना ही असंभव हो गया तब कहीं जाकर के मां ने अपने पिताजी को बताया कि पिताजी मुझे बुखार है तो पिताजी फिर मां को लेकर के एक जगह पर रुक गए थे और दूसरे दिन भी वो फिर हमको पता है कि उस दिन क्या हुआ था उस दिन रात को मां काली ने आकर के हमारी मां शारदा को दर्शन दिया था कहा था कि तुम्हारे लिए ही तो ठाकुर को वहां पे अटका करके रखा है दूसरे दिन सुबह को बुखार कम हो गया था बिल्कुल शांत नहीं हुआ था मां बिल्कुल सुस्त नहीं हुई थी किंतु फिर भी दूसरी बार पिताजी को कष्ट ना हो कहां इस जंगल में अकेली जगह पर अनजानी जगह पर पड़े रहेंगे तो मां ने कहा कि चलो फिर से हम चलना शुरू करते हैं तो मां के साथ में बार-बार ऐसा हुआ है देखिए कि जब हृदय मां का अपमान कर रहा था ठाकुर कुछ नहीं बोल रहे थे उस समय भी मां चाहती तो ठाकुर के साथ में झगड़ा कर सकती थी ठाकुर के साथ में सामने अभियोग कंप्लेन कर सकती थी कि यह मेरा अपमान कर रहा है तो आप मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहे किंतु फिर भी मां ने सोचा कि जो विधाता की इच्छा होगी जो मां काली की इच्छा होगी वैसा ही होगा अपने ही नसीब को दोष देकर के मां वहां से चली आई दूसरी बार जब दक्षिणेश्वर आई ठाकुर ने कहा कि तुम बुध बृहस्पतिवार बार बेलाए वहां से निकली हो बोलकर के मेरे हाथ में फैक्चर हुआ है तो दूसरी बार भी मां ने ऐसा कुछ नहीं कहा कि वह मेरे निकलने से बार बेला से आपको क्या मतलब आजकल तो देखते हैं हम लोग कि आर्गुमेंट करने में कोई भी पीछे नहीं रहता तो यहां पर भी और बिना किसी आर्गुमेंट के मां ने ठाकुर की बात मान ली और उसी दिन रात को वह निकल जाने वाली थी ठाकुर ने फिर कहा कि नहीं कल सुबह को जाना तो मां के जीवन में हम बार-बार देखते हैं कि उनकी वजह से दूसरों को कष्ट ना हो अपने को बुखार हुआ है तो दूसरों को कुछ भी नहीं बताएंगे वह जो एक फेमस कहा नी मैंने पहले भी बहुत बार कही है कि कुछ भक्त कलकाता से कामा जयराम बाटी गए यह बहुत बाद की बात है ठाकुर की महासमाधि के बात की कि जयराम बाटी गए मां वहां पर रहती थी और देखा कि एक दिन सुबह को इस भक्त ने सोचा कि मैं सुबह को अर्ली मॉर्निंग बहुत ही सुबह को उठकर के पास में जो तालाब है वहां से पद्म फूल लेकर के कमल के फूल लेकर के चुन कर के आऊंगा मां के चरणों की पूजा करूंगा अभी जीन मा की पूजा करने को वह कमल के पद्म फूल लेने के लिए निकले हैं देखा कि रास्ते में दो महिलाएं आ रही है वही अर्ली मॉर्निंग सूरज भी नहीं निकला है अंधेरा है उस समय उसमें से एक महिला थी यह दोनों भक्तों को देख कर के दूसरी महिला के पीछे में छुप गई और वैसे ही उसके पीछे-पीछे ही वहां से निकल गई तो दूसरे भक्त ने पहले वाले भक्त को पूछा कि देखा यह कौन है तुमको पता चला व दूसरी महिला कौन थी तो उस पहले वाले ने कहा नहीं तो दूसरे वाले ने कहा कि यही हमारी मां हमको खाने पीने में असुविधा ना हो तो बड़ी ही अर्ली मॉर्निंग बगल वाले गांव से बाजार करके वो वहां से तरकारी वगैरह लेकर के मां हमारे लिए ले आ रही है तो यह पहले वाला भक्त एकदम आश्चर्य चकित हो गया कि जिनकी पूजा करने के लिए सुबह को फूल तोड़ने के लिए लोग पद्म फूल तोड़ने के लिए ये लोग निकले हैं उनसे भी पहले मां ने पास वाले गांव जाकर के यह सब चीजें खरीदने के लिए घर से निकली थी तो यह थी हमारी मां तो अपने खुद की सुविधा कभी नहीं देखती थी हमेशा देखती थी कि उनके संतान उनके संगी और श्री श्री ठाकुर इनकी सुविधा पहले कैसे हो वही हमेशा देखती थी तो यहां पर जब सबने ठीक किया कि उसी दिन रात को मैदान पार कर देंगे तो माने यह नहीं कहा कि उस दिन रात को पूरा दिन चल कर के उनके पैर थक गए हैं मां तो मां को तो इतना लंबा चलने का ऐसा हैबिट नहीं था मां को तो इस तरह से हालांकि देखिए कि मां के जीवन में शारीरिक कर्म बहुत है दक्षिणेश्वर में भी रहती थी तो मां खाना वगैरा सब पकाती थी सब कुछ ठाकुर का काम करती थी और जब दक्ष वो छोटी थी तब वह बच्ची थी बालिका थी जयराम बाटी में तब अपने भाइयों की संभाल रखती थी खेत में जाकर के अपने पिताजी सहाय करती थी खेती काम में और घर में वह खाना भी पकाती थी किंतु फिर भी यह जो लंबा चलने का एक स्टेमिना और कैपेसिटी होता है वह बाकी स्त्रियों में जितना था मां में नहीं था मां तो थी हमारी लक्ष्मी सरस्वती स्वयं इस तरह का शारीरिक कष्ट करके जीवन मां ने कभी नहीं बिताया था तो इसीलिए दिन भर चलकर के मां को तो थकान लग गई थी किंतु मां ने कुछ बताया नहीं प्रयोजन थले अपरे स्वाधीनता खु राख्या तिनी स्वयं कष्ट बरण करतन प्रयोजन स्थले जब भी आवश्यकता होती थी मां दूसरों की स्वाधीनता को बनाए रख कर के अपने ही सर पर पूरा कष्ट ले लेती थी यह सा बहुत सारे उदाहरण हमने देखे वर्तमान क्षेत्रे तहर क्लांत देहो कोमल पद दव अबार ई दीर्घ पोथ चलते सक्षम नोहे जानि आओ तिनी सकलर संगे जात्रा करी लेन आज भी उनका देह और कोमल पैर इस इतना लंबा चलने के लिए सक्षम नहीं है यह जान कर के भी माने बिना कोई विरोध के इनके साथ में यात्रा प्रारंभ कर दी किंतु अल्प किश दूर टार पर अक्षमता बस तो तहर गति मंदी भूतो था कीलो किंतु थोड़ा सा चलने के बाद में ही थक जाने की वजह से मां के चलने की गति धीरे-धीरे स्लो होती गई संगरा दई चारी बार ताहर जन्नो पथे अपेक्षा करलो किंतु परे जखन बुझलो ए रूप मंथर गति ते चलीले संधार पूर्वे गंतव्य स्थले पहुंचते पारा जाय बे ना एवं तहर फले प्राण हानि संभावना विशेष तो श्री मा जखन साहस भरे सकल के ताहर जनन कोनो प्रकार दुश्चिंता ना करिया द्रुत तारकेश्वर चली दिया जाते बोली लेन तखन त हारा आर अपे करीलो ना एक पूरा एक पैराग्राफ जितना सेंटेंस है जैसे जैसे मां थकने लगी उनको विश्राम के लिए थोड़ा सा रुकना पड़ा और उनकी अपेक्षा करके उनकी राह देख कर के उनके जो संगी थे वह भी उनके साथ में दो चार बार के किंतु फिर अभी यह उनको समझ में आया कि जद इतना धीरे-धीरे चलेंगे और इतना रुक-रुक करके चलेंगे तो उस रात को यह मैदान यह लोग पार नहीं कर पाएंगे और इससे डर है कि डाकू लोग आकर के उनका उनकी हत्या करके उनके पास में जो धन वगैरह जो कुछ भी होगा वह छीन करके ले जाए तो इस भय की वजह से उन लोगों ने सोचना पहले तो शुरू कि कि अभी क्या करें और फिर मां ने भी सामने से कहा कि एक काम कीजिए मेरी वजह से आप सबको प्राण हानि की संभावना है वह ना हो इसके लिए आप लोग आगे निकल जाइए मैं धीरे-धीरे करके पीछे आती हूं तो जब मां ने ऐसा कहा तो बाकी जो जितने भी लोग थे वह एकदम झड़प से आगे निकल गए अच्छा यहां पर एक बात याद रखनी है बहुत बाद में जब मां उद्बोधन में थी थी तो सब लोग भक्त लोग तो सब मां को आक के पूछेंगे कि सड़सी पूजा की कहानी कहो वो डाकत बाबा की कहानी कहो यह सब कहानियां ये सब भक्त लोग आकर के मां को पूछेंगे उस समय मां ने पहले तो उत्तर नहीं दिया फिर बाद में थोड़ा सा नाराज होकर के क्या कहा था पता है कि देखो यह लक्ष्मी दीदी और यह शिवुदा ये दोनों अभी जीवित है और यह मैं बार-बार यह कहानी कहूंगी भक्त लोग जदी आपस में चर्चा करेंगे तो यह प्रश्न होगा कि बाकी जो मां की संगिया थी सहेलियां थी वह तो चलो अपने खुद के प्राण की रक्षा के लिए मां को वहां पर मैदान में छोड़ कर के चली जाए किंतु शिवुदा और लक्ष्मी दीदी यह तो मां के रिलेटिव्स थे ठाकुर के ठाकुर के भतीजे भतीज थी तो फिर वोह मां को इस तरह से मैदान में छोड़ कर के चले गए ऐसा क्यों उनको तो मां के साथ में रुक जाना चाहिए था मां की रक्षा कर करने के लिए और मां को सदिरा देने के लिए मां के साथ में रहना चाहिए था तो ऐसा नहीं करके वे लोग भी चले गए तो अभी क्या है कि मां ने इसलिए मां ने नाराज होकर के कहा देखो यह डाकत बाबा की कहानी जो है डाकेत बाबा की उसको अभी रहने दो उसके बारे में बहुत ज्यादा चर्चा मत करो तो यह एक बात माने उस समय कही थी और भी एक बात माने कही थी कि मैं बिल्कुल अकेली थी ऐसा नहीं था मेरे साथ में और भी एक अति वृद्ध महिला थी माने ऐसा कहा था अति वृद्ध महिला तो वह अति वृद्ध होने की वजह से उनको भी चलने में तकलीफ हो रही थी यहां पर मां को भी चलने में तकलीफ हो रही थी तो यह दोनों रुक गए थे किंतु यहां पर गंभीरानंद जी की कहानी में हम देखते हैं कि वह वृद्ध महिला का कोई उल्लेख नहीं है अस्ताचलगामी शर जेर विदाय संगे संगे जखन उच्च ताल वृक्ष मस्तक होते संध नाय मान छाया नामिया आशिया प्रांतर सर्वत्र छुड़ाया पड़ लो तखन से जन बसती हीन चिंत बते विपद आबास स्थल प्रांतर अजाना पथे एकाकी चलते चलते श्री मा विषम उत्कंठा भाबत छन की करीबन एमन समय देखि लेन प्रांतर एक स्थले एक दीर्घा बय मूर्ति ताहर दिख अग्रसर होते छ महाराज जी इतना सुंदर वर्णन करते हैं थोड़ा सा देखते हैं अस्ताचल गामी सूरजे बिदायर संगे संगे अस्ताचल गामी सूर्य अर्थात कि अस्ताचल की ओर बढ़ता हुआ सूर्य की विदाई के साथ-साथ में ही उच्च ताल वृक्ष लंबे ताल के पेड़ों के मस्तक से संध्या का घन संध्या की घनी छाया जब आकर के मैदान में चारों ओर बिखर गई जैसे-जैसे सूर्य अस्ताचल की ओर जाता है वैसे ही ताल के लंबे पेड़ों की मस्तक से संध्या की घनी छाया पूरे जमीन पर आकर के पूरे मैदान में बिखर गई तब उस जन वसति हीन अचिंत विपद आबास स्थल प्रांतर जन वसति हीन अचिंत्य विपद का जो आवास स्थल है ऐसा प्रांतर अर्थात कि मैदान जहां पर कोई भी तरह की वस्ती नहीं है वह वहां पर भयानक विपद की संभावना है ऐसे इस मैदान में चलते-चलते मां के मन में भयानक एक दुश्चिंता का उदय हुआ विषम उत्कंठेश्वर के मां सोच रही है कि क्या करेगी वह इस तरह के मैदान में अकेली चलती चलती उनका क्या होगा क्या करेगी उस समय देखा कि मैदान के एक कोने से एक दीर्घ वयो एक लंबा चौड़ा एक व्यक्ति जिसका कि वर्ण घनघोर काला है जिसके कि हाथ में व एक लंबी सी लट्टी है और उसके जो हाथ है हाथ के जो मसल होते हैं वो जो वो एकदम एक रस्सी की तरह उसके हाथ के जो मसल है उसके हाथ के स्नायु है और उसका जो कि उसके जो बाल है एकदम काले काले बाल इस तरह का एक पुरुष भयानक देह वाला एक पुरुष इस मैदान के एक कोने में से आता उनको दिखाई दिया श्री माय श्री मायर बुझीते बाकी रही लो ना ज से दशु सुतं तीनी भए थम किया दाई लेन मां को समझने में देरी नहीं लगी कि यह व्यक्ति डकेट है दस्यु है और इसीलिए वह डर की मारी वहां पर रुक गई लोटी संभव तो तहर मनोभाव बुझीते पारिया आरो भयोत्पादने जन्नो रुख स्वर बोली लो यह व्यक्ति मां समझ गया कि मां के मन में डर प्रकट हुआ है इस तरह के वीरान मैदान में रात के अंधेरे में और एक अकेली लड़की जब वहां से जा रही है अकेली औरत वहां से जाएगी और इस तरह के एक दस को एक डकेट को देखेगी तो उसके मन में भय प्रकट होगा ही होगा इसको यह बात समझ में आ गई तो मां को और भी डराने के लिए वह बड़े ही रुक्ष स्वर में बोला केगा य समय खाने दाढ़िया छो कोथा जावे कौन हो तुम इस समय यहां पर खड़ी हो कहां जाओगी श्री मां बोली लेबे श्री मां ने कहा पूब यहां पर मुझे लगता है कि मां ने कहा पूर्व में पूर्व दिशा में किंतु अभी वह गांव की भाषा में माने कहा पूब आगो तो व्यक्ति तमनी को कोश कोठे बोली लो से ए पथ नय ओई पथ जेते होवे यह जो दस्यु था उसने और भी कर्कश स्वर से कहा कि यह रास्ता नहीं है तुमको दूसरे रास्ते से जाना पड़ेगा श्रीमा तखन थानु बत अचल आर लोयो खूब काछ आशिया पड़िया छे जब यह दस्यु ने कहा डकेट ने कहा कि आप जिस रास्ते से जा रही है वह रास्ता नहीं दूसरे रास्ते से जाइए माने किंतु कुछ भी कहे बिना कुछ भी किए बिना एकदम जैसे अचल होकर के वहां पर खड़ी रह गई और बाय दैट टाइम यह व्यक्ति था यह डके और भी पास में आ गया किंतु मायर श्रीमुख देखि अकस्मात श्री नर घात केर मने जेनो की एक परिवर्तन आशी लो किंतु जैसे ही उसने मां का श्री मुख देखा चेहरा देखा वैसे ही यह नर घातक जो डके था जिसके लिए मानव हत्या बड़ी ही सहज बात थी उसके मन में जैसे कि एक अद्भुत परिवर्तन आकर के खड़ा हो गया शे मायर द के ताका इया नरम सूरे बोली लो वह मां की ओर देख कर के बड़े ही नरम स्वर से कहा भय नहीं आर संगे मे लोक आचे भय नहीं डरो मत मेरे साथ में मेरी स्त्री भी है से पीछे पड़े छ वह थोड़ी सी पीछे पड़ गई है वह अभी भी आती ही होंगी य तो खण श्री मायर दृष्टि सम्मुख तो विपद के छड़िया आरो दूरे दाबी तो होले तीनी देखी लेन एक त्रिलोक स सेद के आशीते से इतनी देर तक मा की दृष्टि सिर्फ नजर के सामने यह भयानक विपद आ पड़ी थी उसी ओर थी किंतु जैसे ही इसने कहा कि मेरे साथ मेरी स्त्री भी है तब मां ने पीछे देखा इस पुरुष के इस डकेट के देखा कि सही में एक स्त्री पीछे पीछे चली आ रही है तखन तीनी भरोसा पाइया बोली लेन स्त्री की उपस्थिति देखी तो मां के भी मन में थोड़ा भरोसा हुआ और मां ने कहा बाबा अर संगी अमा के फैले ग छे बाबा अर्थात कि पिताजी मेरे संगी है वह मुझे छोड़ कर के चले गए हैं देखिए कि मा पहले तो यह डकेट जो था मां का चेहरा देख कर के ही मां का श्री मुख देख कर के ही पहले ही नरम हो गया था और फिर जैसे कि मां ने कहा बाबा अर्थात कि अपने पिताजी के नाम से पुकारा वैसे ही यह डकेट और भी कोमल हो गया मां के प्रति मा ने कहा बाबा मेरे संगी मुझे छोड़ कर के चले गए हैं आमी बोध होए पथ भुले छी मुझे लग रहा है कि मैं रास्ता भूल गई हूं तुम्ही आमा के संगे खरे जदी तादिर काछ पहुंचे दाओ तुम मुझे आपके मुझे साथ में लेकर के मेरे संगियोवेसे तुम्हारे जमाई दक्षिणेश्वर में रानी मण के काली मंदिर में है ठाकुर सीधे ही इस डकेट के जमाई हो गए मां जदी डकेट की बेटी होंगी बिटिया होंगी तो ठाकुर निश्चय डकेट के जमाई होंगे तो आपके जमाई वहां पर दक्षिणेश्वर में रास मणि के काली मंदिर में रहते हैं अमी तार काछ जा मैं उनके पास में जा रही हूं तुम जदी शे खान पर जंतो आमा के निए जाओ ता हले तिनी तोमय खूब आदर जोतनो कोर बेन तुम यदि मेरे मुझे आपके अपने साथ में लेकर के काली मंदिर में ले जाओगे तो आपके जमाई आपका बड़ा ही आदर सत्कार करेंगे ई कोथा शेष ईते ना ईते स्त्री लोटी आशिया पड़ी लो एवं श्री मां विश्वास और स्नेहो भरे ताहर अस्त धारण पूर्वक बोली लेन बात जितनी देर तक माने यह बात कही अपने डकेट बाबा को उतनी देर में वो स्त्री भी वहां पर आ गई और मां ने भी जैसे कि बच्ची अपनी मां को मिलती है तो कितना भरोसे से अपनी मां का हाथ पकड़ कर के स्नेह भरे बात करती है तो वैसे ही मां ने स्त्री का हाथ पकड़ कर के बड़े ही स्नेह पूर्ण स्वर से कहा मां आमी तोमार में शारदा मां मैं तुम्हारी बिटिया शारदा हूं संगी रा फैले जावाई विषम विपद पड़े छिल मेरे संगी मुझे चल यहां पर रख कर के चले गए तो मैं बड़ी ही मुसीबत में आन पड़ी हूं भाग्य बाबा और तुम ऐसे पोड ले नो इले की को और तुम बोलते पारी ने बड़ा ही अच्छा भाग्य है कि तुम और पिताजी आ गए यहां पे वरना मैं क्या करती मैं बता नहीं पाऊंगी देखिए कि यहां पर कितना सुंदर एक दृश्य है यह डके जो कि नर हत्या करने में वो उसका कोई उसको आपत्ति नहीं है नर हत्या करके ही हो सकता है कि वह अपना गुजरान चलाता हो डकेट हो और डकेट की स्त्री का भी हृदय तो ऐसा ही होगा नर हत्यारों के साथ में रह रही है तो उसका नेचर भी रुक्ष और क्रूर ही होगा किंतु मां शारदा यहां पर जैसे कि उनकी बिटिया की तरह इतना सहज विश्वास भरे इनके साथ में बात कर रही है कि इन दोनों का हृदय संपूर्ण रूप से विगलियो गया ठाकुर ने भी एक बार कहा है कि जो लोग आपसे बड़े हैं उनके ऊपर में भरोसा करके उनके पास में न्याय पाने की आशा से बड़े ही विनम्रता पूर्वक हम उनसे बात करेंगे तो वह कभी भी हमारा अकल्याणेंकीलम बहुत बाद में मां ने डकेट बाबा को पूछा था उनके साथ में जब बात हुई थी हो रही थी उस समय क्योंकि ये डक्त बाबा भी बार-बार फिर दक्षिणेश्वर आए थे तो मां ने पूछा था कि उस दिन रात को मेरे में आपको ऐसा तो क्या दिखा था कि आप इतने कोमलता से मेरे साथ में बात कर रहे थे तो डकेट बाबा ने कहा था कि मां के भीतर में मां काली का दर्शन किया था अब देखिए कि जिस मां काली को यह लोग नर हत्या प्रदान करते हैं वही मां काली का दर्शन मां शारदा में हुआ था तो फिर मां शारदा का अकल्याणेंकीलम की बिटिया की तरह ही इतना भरोसा रख कर के उनके साथ में बात कर रही है इतने रुक्ष लोगों का हृदय भी इससे जैसे कि पिघल गया शारदा मण र रू नि संकोच सरल व्यवहार एकांत विश्वास और मिष्ट कथाए बागदी जातीय ई दशु संपत्ति ए दशु दंपति प्राण एके बारे गलिया गेलो मां शारदा के ये सहज सरल निसंकोच व्यवहार और एकांत विश्वास और मीठी बातों से यह दस्य दंपति का हृदय एक बार में विगलिंक हो गया त हारा सामाजिक आचार व्यवहार और जातिर पार्थ को भूलिया सतो सत तहा के निजो कन्या न्याय देखिया शांतोना दते लागलो एवम तिनी क्लां तो बोलिया आर तहा के चलते ना दिया निकटवर्ती ग्रामर एक दुकाने लैया गया राखी लो वे लोग भी यह सामाजिक प्रथा वगैरे को विस्मृत होकर के शारदा मणि को अपनी बिटिया की तरफ ही उसके साथ में व्यवहार करने लगे यह नात प्रथा और यह जो सामाजिक आचार व्यवहार जो है उसके अनुसार यह जो दस्यु दंपति था उनको उस समय में कहा जाएगा नीची जात का और यह मां थी वह थी उच्च कुल की ब्राह्मण कन्या तो कहा यह दस्यु कहा यह ब्राह्मण कन्या उनका कोई सामाजिक कभी भी संबंध हो ही नहीं सकता किंतु यहां पर मां के निसं को सरल व्यवहार से विश्वास से और मीठी बातों से यह लोग इतने द्रवी भूत हो गए कि मां शारदा को अपनी बिटिया की तरह ही उसके साथ में व्यवहार करने लगे और देखा कि मां चलते चलते थक गई है तो और ज्यादा मां को न चला करके पास के ही एक गांव में ले गए और वहां पर एक दुकान थी दुकान में गए रमणी निजर वस्त्राद बिछाया तहर जन्नो बिछाना करिया लो व पुरुष की दुकान ईते मुड़ी मुन की कीनिया तहा के खाते दलो उस स्त्री ने अपने ही वस्त्र बिछा करके मां के लिए सोने की व्यवस्था कर दी और वह पुरुष यह डके उस दुकान में जाकर के थोड़ा सा मुड़ मुड़ा वगैरा कुछ नाश्ता खरीद के ले आया मां को खिलाने के लिए परे पिता माता और मतो आदर और स्नेह ताहा के घूम पड़ाई लो एवं बागदी पाई सारा रात्रि जोट हस्ते धरो रखाई निजु तो रही लो फिर मां को खिलाया सोने की व्यवस्था की और फिर जैसे मां अपनी छोटी बच्ची को समझा करके कहानियां कह के कितना स्नेह भर उस स्नेह से वो अपनी छोटी बिटिया को सुलाती है वहां पर भी यह स्त्री ने बिल्कुल वही स्नेह भरी बातें करके मां को जैसे कि किसी तरह का डर ना लगे संकोच ना हो विधा ना हो इस तरह से मां को धीरे से प्रेम से सुलाया और यह बागदी पाइक यह नाथ है दस्यु की तो यह बागदी पाइक हाथ में लाठी लेकर के वहां पर दुकान के कोने में खड़ा रहा चौकीदारी करने के लिए कि जिससे कि कोई आकर के उनकी बिटिया की नींद में किसी भी तरह का वह विघ्न न डाले अशेष भोरे तहा के संगे लैया तारकेश्वर पथे चली चली बागदी मा खेत होते कड़ाई सुटी तुलिया सस्नेह श्री मायर हाथे दते लागी लो एवं ती नियो खुद्रो बालिका न्याय शेष नेहर दान स्वीकार पूर्वक खाते खाते चलते लागलो आखिर में सुबह हुई और यह दोनों लोग मां को लेकर के तारकेश्वर के रास्ते से खेत के माध्यम से खेत के रास्ते से जा रहे हैं खेत में ही वो महिला ने व जो कोई कुछ कुछ जो खेत में जो उपज होती होगी वो कड़ाई शूटी अर्थात कि जिसको कुकुंबर कहते हैं वो कुकुंबर वगैरह तोड़ कर के मां के हाथ में दिया और मां भी छोटी बच्ची की तरह खाते-खाते बड़े ही आनंद पूर्वक अपने यह डकेट मां और पिताजी के साथ में चलने लगी यह बात पढ़ कर के शूटी कढई शूटी क्या कढई सूटी कुकुंबर नहीं ग पस है ओ अच्छा अच्छा अच्छा ग्रीन पीस अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा तो यह जो ग्रीन पीस ऐसा तोड़ करके मां के हाथ में देने लगे और यह दृश्य उसको इमेजिन करके ही ठाकुर का वह दृश्य मन में आ जाता है कि ठाकुर अपने वह कुर्ते के एक कोने में वह मुरमुरा वगैरह बांध कर के जा रहे थे खेत में आकाश में देखा कि घने बादल छा गए हैं उसमें से यह सफेद बतक हवा में उड़ते उड़ते जा रहे हैं उसको देख कर के ही ठाकुर को समाधि हो गई समाधि में गिर भी गए और मुरमुरा वगैरह जो था वह भी खेत में गिर गया तो वैसा ही दृश्य हालांकि यहां पर मां को समाधि नहीं हुई थी किंतु मां की जो सरलता थी वो सरलता की वजह से इन दोनों डकेट का हृदय संपूर्ण रूप से परिवर्तन हो गया था कौन कहेगा कि ठाकुर की वह जो खेत में जाते-जाते समाधि हुई थी वह मां का हृदय परिवर्तन करने की क्षमता से ज्यादा है यह जो जितना ही हम ठाकुर और मां को पढ़ते हैं उतना ही यह कंट्रास्ट हमको दिखता है कि ठाकुर के जीवन में बार-बार यह समाधि मग्न होना बार-बार दर्शन प्राप्त होना बार-बार मां काली और अन्य देवी देवताओं का उनको दर्शन होना जबकि मां के जीवन में है कि ऐसा कुछ भी नहीं दिखेगा बड़ा ही रेयरली दिखेगा कि मां भाव में मां को भाव समाधि हुई है मां को भाव हुआ है ऐसा कोई वर्णन बड़ा ही रेयरली पढ़ने को मिलेगा मां का दर्शन मां के वो देवी देवताओं का दर्शन वगैरह यह सब भी बड़ा ही रेर पढ़ने को मिलेगा किंतु मां की यह जो अद्भुत क्षमता थी कि पाषाण हृदय पत्थर स्वरूप जिसका हृदय है उस पत्थर हृदय को भी पिघला दे ये मां की अद्भुत दैवी क्षमता थी यह दोनों का ये कंट्रास्ट कितना अ मधुर लग रहा है जब साथ-साथ में सोचेंगे तब तो यहां पर भी देखिए दोनों खेत में से जा रहे हैं यह स्त्री भी यह जो ग्रीन पीस जो है वो तोड़ कर के मां को दे रही है मां भी जैसे खुद्रो बालि का न्याय छोटी बच्ची की तरह छोटी बच्ची जैसे ठाकुर की तरह ये छोटे बच्चे कुछ खाते-खाते खेत में कैसे आनंद करते करते चलेंगे ऐसी मां वहां से चल रही है मैंने अपनी नजरों से यह दृश्य देखा है मैं जब 2015 में मेरा सन्यास था तो सन्यास के पहले मैं ओमकारेश्वर में रहने के लिए कुछ समय गया था तो ओमकारेश्वर अर्थात की नर्मदा के किनारे और फिर वहां से कुछ दिनों तक मैंने भ्रमण किया था तो भ्रमण अर्थात नर्मदा परिक्रमा ही किंतु कुछ दिनों तक किया जाता है नर्मदा परिक्रमा में पूरी परिक्रमा करनी होती है भ्रमण अर्थात 15-20 दिन तक आप नर्मदा के किनारे चलेंगे तो मैं ऐसे ही एक दिन चलता जा रहा था खेत में से और संध्या का समय था मां नर्मदा के ऊपर में सूरज की किरणें गिर रही थी और वह प्रकाशित चारों ओर हो रही थी और इस और खेत था बड़ा ही बड़ा चौड़ा जिसमें कि हरियाली फैल रही थी देखा एकाएक कि एक कुटिया थी वहां पे छोटी सी कुटिया छोटी सी कुटिया में से तीन-चार बच्चे एकदम हंसते-हंसते चिल्लाते चिल्लाते वहां से बाहर निकले कुछ अपने हाथ में ऐसा ही कुछ खाना खा खाना था उनके हाथ में वो लेकर के और एकाएक वो खेत में दौड़ना शुरू कर दिए तो अभी थे बिल्कुल ये उनका जो बड़ी ही दुर अवस्था में थी यह बच्चे वस्त्र भी उनके फटे हुए थे बाल भी जैसे बिखरे हुए थे लगता था कितने दिनों से स्नान भी नहीं किया है वो खेत उनका होगा नहीं हो सकता है ये लोग खेत मजदूर के बच्चे होंगे ऐसा देख कर के उनको लग रहा था किंतु उनके चेहरे पे जो प्रसन्नता थी जो हासी थी हास्य था और ये प्रकृति का सुंदर वातावरण था मैं एकदम 10 मिनट तक वहां पर खड़े रह कर के इन बच्चों को देख रहा हूं कि मैंने देखा कि देखिए मैं शहर के मैं शहर में भी इतना रहा हूं मैं खुद शहर में रहता हूं और किंतु एक गांववासियों के मन में यह जो आनंद है जो कि एकदम किसी भी उसमें किसी भी तरह का फेकनेस नहीं है किसी भी तरह का आर्टिफिशलिटी नहीं है संपूर्ण निर्मल आनंद ये कितना जबरदस्त है उसको देख कर के मेरे मन में कितना खुशी हो रहा है तो ऐसा दृश्य मैंने भी देखा है तो यहां पर भी माहा छोटी बच्ची की तरह खाते खाते आनंद करते करते खेत में से जा रही है तरा तारकेश्वर जोखन पहुंची लेन तखन बेला चारी दंडोति क्रांत होया छ वे लोग जब तक तारकेश्वर पहुंचे तब तक हो सकता है कि दोपहर हो गई होंगी अतब एकटी चोटी ते आश्रय लो आई बाग दीनी तहर स्वामी के बोली लो अमार में काल किछुई खेते पाई नहीं बाबा तारक नाथर पूजा सिगिर शेरे बाजार थे के माच तरकारी निए ो आज ताके भालो करे खा वाते होवे जैसे ही वहां पर एक चोटी अर्थात की एक धर्मशाला जैसी एक छोटी सी जगह होती है वहां पर आश्रय लेकर के ही यह बाग दिनी अर्थात की स्त्री ने अपने स्वामी को कहा कि मेरी बिटिया ने कल कुछ खाया नहीं है तो बाबा तारकेश्वर की पूजा समाप्त करके बाजार में से मछली तरकारी वगैरह कुछ लेकर के आओ मेरी बेटी को आज मैं अच्छे से रांत करके खिलाऊंगी पुरुष ए सबब काजे चोलिया गले श्री मायर संगी और संगी नी गण तहा के खुजी खुजी शेखाने आश उपस्थित होए लो यह डकेट जब वहां से चला गया तब कुछ ही देर देर के बाद में मां की जो संगिया थी जो कि रात को मां को छोड़ कर के चल गई थी वे लोग मां को खोजते खोजते वहां पर आकर के उपस्थित हुई एवं तिनी निरापद पहुंच छ देखिया आनंदो प्रकाश करीलो और मां बिना किसी स आपद के वहां पर पहुंच गई है यह देख कर के वे लोग आनंद प्रकाश करने लगी तार पर तीनी तहर रात्रे आश्रय दात्री बागी बागदी माता शही तहादेर परिचय कराया दिया बोली लेन रा ऐसे आमा के रक्खा ना करले काल रात्रे जे की कोतुम बोलते पारी ना मां ने फिर अपनी संगी नियों की अपने डकेट मां और पिताजी के साथ में मां के साथ में पिताजी तो गए हैं बाजार में तो मां का परिचय करवा कर के कहा कि इन्होंने आकर के कल रात को मेरी रक्षा ना की होती मुझे पथ दर्शित ना किया होता तो मेरे साथ में क्या होता मैं क्या क्या करती में सोच भी नहीं सकती कामर कुकर ईते आगो तो ओमार जी तो बुद्धि जाति बिचारे कुंचिका समाज छन्नो सोरोल पल्ली बाश श्री मायर से काहिनी की भावे ग्रहण करिया लो जानी ना अभी कामर पुकुर से आए हुए यह जो कुंचित कुंठित हृदय वाले यह जाति विचार करने में हीय डूबे रहने वाले अमर्जी बुद्धि यानी कि यह अशुद्ध बुद्धि वाले लोगों ने मां शारदा ने इस बागदी को मां और पिता बनाया है देख कर के उन्होंने क्या सोचा होगा उसके बारे में तो हमको पता नहीं है और हालांकि यह लोग विरोध करना भूलते नहीं थे देखिए कि वह कहानी पहले भी हमने डिस्कस की थी कि एक बागदी लड़का जयराम बाटी में आया मां के पास में दीक्षा लेने के लिए तो मां ने कहा कि देखो यहां पर तो गांव वालों का इतना सब यह रहता है वे जाति विचार यह सब रूढ़ चुस्त यहां का परिवेश है तुम एक काम करो तुम कलकत्ता आना मैं कलकत्ता में तुमको दीक्षा दूंगी तो यह बागदी लड़का भी बड़ा चालाक था फट करके मां को बोल उठा कि आपको जब जरूरत पड़ी थी तो एक बागदी को पिता बना दिया और अभी आपको आवश्यकता नहीं है तो एक बागदी को अपना बेटा बनाने में संकोच महसूस कर रही हो जैसे ही उसने कहा तो बाकी जो आसपास के लोग थे बड़े ही स्तंभित हो गए सोचा कि मां के मुंह प फटाक करके ऐसा बोल दिया मां पता नहीं किस तरह से रिएक्ट करेगी किंतु मां ने हंस कर के कहा अच्छा ठीक है यह बेटा बड़ा चालाक है उसको तो दीक्षा देनी ही पड़ेगी और मां जब यह दीक्षा देने के लिए जब स्वीकृत हुई थी तब वहां पर दूसरे ब्राह्मण भक्त उपस्थित थे तो उन्होंने कहा कि देखिए कि हम लोग ब्राह्मण होकर के मां को तो राज राजेश्वरी दुर्गा स्वरूपिणी मान कर के कितनी स्तुति करते हैं कितनी उनकी यह करते हैं प्रार्थना कर करते हैं तब कहीं जाकर के सालों साल के बाद में हमको मां की कृपा प्राप्त होती है और यह बागदी का लड़का जैसे डके की करता हो वैसे मां के पास में से आकर के मंत्र छीन कर के जा रहा है तो ये यहां पे देखिए कि मां के खुद के मन में कुछ नहीं था किंतु यह जो सामाजिक आचार विचार जो है उसके भीतर में मां को रहना पड़ता था तो मां ने अपनी अपने जान की रक्षा जिन्होंने की उनके प्रति भी इन लोगों का इस तरह के पता नहीं यह बागदी दंपति है उनको अपना पिता बनाया है यह ब्राह्मण कन्या है क्या यह सब है तो ठीक है महाराज कहते हैं कि किस तरह से इन्होंने यह सब किया होगा पता नहीं बगतो दिबा और रात्रे मिलन समय जे दैव स्नेहो शलाला संघट जे दैव स्नेहो लीला संघटित होलो एवं निशा गमे अति निम्न जातीय दशु दंपति सहित प्रांतर मिलिता अपरिचिता ब्राह्मण कन्या शारदा मण जे आत्मीय वत व्यवहार और अभेद्य प्रीति संपर्को संस्थापन होलो ग्राम वासरा ताहर तात्पर्य जो कतो टक धारणा करी ते पारी लो ताहा ओ आमरा अबतो नहे विगत दिवा और रात्रे मिलन समय संध्या और रात्रि के मिलन समय में जो विगत दिन और रात्रि के मिलन समय में जो घटना वहा हां पर उस प्रांतर में उस मैदान में घटित हुई थी वहां पर निम्न जाति के यह जो दस्यु दंपत्ति है जिनकी जाति निम्न मानी जाती थी ऐसे ये डकेट मां और पिताजी के साथ में अपरिचित ब्राह्मण कन्या उनकी संपूर्ण रूप से अपरिचित ब्राह्मण कन्या शारदा मणिका जो आत्मीय वत व्यवहार और अविच्छिन्न दोनों का जो आत्मीय पत व्यवहार था और अविच्छिन्न लिखा है कि यह जो घटना है इसका तात्पर्य क्या है देखि कि इसका ता पर्य सिर्फ मां और यह दस्यु दंपति के साथ में नहीं है हमने 20th सेंचुरी के प्रारंभ में 20वीं सदी के प्रारंभ में सभी देशों में देखा कि निम्न जातीय निम्न वर्ग के जितने भी लोग हैं सबने कहा कि हमको हमारा हक चाहिए और यह उच्च जातीय उच्च कुल के उच्च वर्ग के लोग यदि हमको हमारा हक नहीं देंगे तो हम छीन करके ले लेंगे उनकी हत्या करके ले लेंगे इस तरह से यह जो कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन या फासिस्ट रेवोल्यूशन जो पूरे विश्व में छा गया था यहां पर चाइना में वहां पर रशिया में वहां पर जर्मनी में इवन अमेरिका ब्रिटेन में भी यह सोशलिज्म जिस तरह से चल रहा था इस तरह का भारत में क्यों नहीं हुआ भारत में निम्न जातीय निम्न कक्षा के लोग उच्च जातीय उच्च कक्षा के सामने विरोध प्रकट करके उनकी हत्या करके उनकी संपत्ति क्यों नहीं छीन लिए इसके पीछे का यह कारण है कि यहां पर ब्राह्मण कन्या ने स्वयं ही इस दस्यु संप दंपत्ति को अपने डकेट माता-पिता को अपने सामने से जाकर के कहा कि मैं आपकी बेटिया हूं मैं आपकी बच्ची हूं और यह जो अविच्छिन्न दोनों के बीच में जो स्थापित हुआ यही एक रीजन है कि निम्न जातीय लोगों ने कभी भी युद्ध करके रक्तपात करके भारत में अपने हक की ये मांग नहीं की है उच्च कक्षा के उच्च वर्ण के जो लोग हैं उन्होंने सामने से निम्न कक्षा के निम्न वर्ण के निम्न जातीय लोगों को सामने से उनका हक दिया है यह स्वामी जी को देखिए कि पूरा भारत घूम कर के स्वामी जी ने देखा जहां पर गरीबी है जहां पर इस तरह से ये भयानक एक अवस्था है निम्न स्तरीय लोगों की तो उच्च स्तरीय विद्वान पढ़े लिखे जितने भी यंग लड़के लड़कियां हैं उनको इनकी सेवा करने के लिए अपना जीवन व्यतीत करना होगा अपने जीवन का बलिदान देना होगा यह जो स्वामी जी का संदेश बाद में यही घटना की परिपूर्ति है कि यहां पर ब्राह्मण कन्या मां शारदा डकेट दंपति को बागदी अर्थात की नीची जात के दंपति को अपनी वो उनकी बेटी है इस तरह से उनके अपने मां और पिताजी के रूप में जो स्वीकार करती है यही घटना की प्रतिध्वनि स्वामी जी का यह है शिव ज्ञाने जीव सेवा आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च और यह तात्पर्य यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि ये जो गांव वाले जो थे अमर्जी बुद्धि संकुचित बुद्धि वाले इन लोगों को इस घटना का तात्पर्य कितना समझ में आया होगा वह तो हम बता नहीं पाएंगे अच्छा यह कहानी वैसे और भी चलती है और भी थोड़ा सा महाराज जी का विश्लेषण वगैरह है तो वह सब अभी हम कल देखेंगे आज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु अमरा गछ अमरा हा हमको टीसी में से सब जगह पर जैसे ले जाते हैं ना वो दर्शन वगैरह करवाने के लिए तो हम लोग लोग जब गए थे यह उस समय तेलो भेलो था वो वहां पर ये मां काली का मूर्ति भी था डाका दे काली वह मंदिर भी था किंतु माका मूर्ति उस समय नहीं था वह बाद में बना था हा तो वो वो माका मूर्ति जो था डाका ते काली मां वह हमने देखा है हालांकि यह बोलना मुश्किल है कि वह वही मां काली है जो कि ओरिजिनल मां के समय थी कि बाद में मूर्ति बना गई क्योंकि क्या है जो मिट्टी की प्रतिमा होती है तो तो भगना हो जाती है कुछ सालों के बाद में तो शायद हो सकता है कि यह बाद में बनाई गई हो टक हम लोग गए थे किंतु हम लोग गाड़ी में गए थे तो अभी वह गाड़ी में तो क्या है डिस्टेंस इतना पता नहीं चलता है और मैं तो बिल्कुल नया था उस समय बंगोल में तो कौन सा जगह कौन सा है नाम भी नहीं पता था वह जैसे-जैसे ले जाते थे गाड़ी में वैसे गाड़ी में जाते थे गाड़ी में से उतर कर के दर्शन करते थे फिर से गाड़ी में बैठ जाते थे