Invocation
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हम लोगों ने ऑलरेडी देखा के किस तरह से ठाकुर और मां पहले तो एक ओवरऑल आउटलाइन देख लेते हैं ठाकुर के साथ में मां का विवाह हुआ था उसके बाद में मां काफी समय जयराम बाटी में रही थी बीच-बीच में कामर पुकुर जाती थी और मन में ही मन में सोचती थी कि ठाकुर के बारे में जो सब खबर मिल रही है दक्षिणेश्वर से जो लोग वहां पर गांव में यात्रा करते हैं वहां दक्षिणेश्वर में ठाकुर को देख कर के आए हैं तो वह खबर क्या सब सही है कि गलत है तो मां के मन में भी बड़ा दुख होता था उसके बाद में मां ने खुद ने दक्षिणेश्वर यात्रा की अपने पिताजी के साथ में वह दक्षिणेश्वर आई रास्ते में बड़ी बीमार हो गई थी तो देखा कि एक काले वर्ण की स्त्री उनके सामने आकर के खड़ी रही और कहा कि
ma sarada and kali
तुम्हारे लिए ही मैंने उनको वहां पर अटका करके रखा है अर्थात कि भवता जिणी मां काली स्वयं दक्षिणेश्वर मंदिर से मां शारदा
Bhavatarini Kali, Daksnineshwar temple
देवी को सांत्वना देने के लिए आधे रास्ते तक गई गई थी और कहा था कि श्री रामकृष्ण देव को तुम्हारे लिए ही मैंने वहां पर रखा है तो फिर यह घटना के बाद में मां मां का बुखार भी ठीक हो गया मां दक्षिणेश्वर आई
dakshineshwar Kali temple
ठाकुर के साथ में रह रही है बड़े ही आनंद में दिन कट रहे हैं अभी यह जो कहानियां है जिसको हम पढ़ रहे हैं इसके आगे वाला जो चैप्टर था बिंदु वासिनी वह भी इसी सब कहानियों पर आधारित था और यह जो चैप्टर है
Nahabat
प्राण टान यह भी इसी सब कहानियों पर आधारित है बीच-बीच में मां कभी जयराम बाटी जाती थी तो फिर कभी दक्षिणेश्वर लौट आती
Jayrambati
थी किंतु हमको पता है कि एक बार जब वहां से हृदय ठाकुर की सेवा करता था और हृदय को
Hraday
यह पसंद नहीं था कि मां ठाकुर की सेवा करें तो वोह एक घमंड उसके मन में बैठ गया था किंतु जिस दिन से हृदय का वहां से जाना हुआ दक्षिणेश्वर से तब से मां मोर और लेस परमानेंटली ही दक्षिणेश्वर में रह रही थी तो यह सब बड़ी ही सुंदर और जैसे हमने
Golden age of Ramakrishna sangha
डिस्कस किया था कि रामकृष्ण संघ का यदि एक सुवर्ण युग कहा जाए तो वह कौन सा होगा कौन सा वह समय है कि जबकि आनंद का प्रमाण जो है आनंद सबसे ज्यादा आधिक्य होगा आनंद का सबसे ज्यादा आनंद होगा जिस समय हम यदि चले जाए अपने हाथ में यदि टाइम मशीन आ जाए और यदि कोई कहे कि अच्छा ठीक है तुमको कहां पर यात्रा करनी है टाइम मशीन पता है ना क्या कांसेप्ट है आप भूतकाल में भविष्य में यात्रा कर सकते हैं उठ में बैठ कर के तो यदि मुझे कहा जाए कि तुम्हारे पास में यह टाइम मशीन है तुम जाओ जयदिश में जाना चाहते हो भूतकाल में जाना चाहते हो कहां जाना चाहते हो तो हम कौन सा समय सिलेक्ट करेंगे वो समय की जब कि ठाकुर बालक थे और कामर पुकुर में वो बाल्य लीला कर रहे थे वह भी एक बड़ा सुंदर समय है
Kamarpukur, Thakur's balya lila
ठाकुर जब दक्षिणेश्वर कलकाता आए फिर दक्षिणेश्वर में रहने लगे और उस समय जो साधन भजन कर रहे थे वह भी एक बड़ा ही इंस्पायरिंग पीरियड है कि अवतार युग पुरुष
Panchvati
जो है नारायण स्वयं वह जद साधन करेंगे भजन करेंगे मतलब साधना करेंगे तो किस तरह की इंटेंसिटी वहां पर प्रवाहित होगी उसमें बहकर के हम भी अपने मन प्राण अंतरात्मा को परिशुद्ध कर देंगे वह भी एक पीरियड है इसके बाद में फिर यह कह सकते हैं कि जब गुरु भाई सब इकट्ठा होकर वराह नगर में रहते थे तो कैसी सब तपस्या करते थे कैसी
Varahanagar Math
हंसी मजाक होती थी बहुत सारे उदाहरण हमने देखे हैं गुरु भाइयों में आपस में स्नेह भी इतना था झगड़ा भी इतना होता था फिलोसॉफिकल डिस्कशन भी इतना होता था और उपासना साधन भजन भी उतना ही होता था वह भी
Varahanagar Math Monks
एक पीरियड है यदि टाइम मशीन में बैठ कर के जाने के लिए फिर स्वामी स्वामी जी अमेरिका गए अमेरिका में शहर शहर घूम रहे हैं लोगों को वेदांत का उपदेश देते देते जो लोग
Swamiji in Chicago Parliament of Religion
स्वामी जी के संपर्क में आते हैं वह लोग धन्य हो जाते हैं उनके जन्म जन्मांतर के कर्म वहीं पर कट जाते हैं तो वह भी एक समय है फिर स्वामी जी भारत लौटे बेलूरमठ की स्थापना की बेलूरमठ में प्रथम राजा महाराज
Belur Math
द्वितीय अपने महापुरुष महाराज प्रेसिडेंट थे उस समय बेलूरमठ जो था पुराना बेलूरमठ उसके बारे में हम ने बहुत सारी बातें सुनी है बहुत सारी कहानियां भी सुनी है वहां पर खोका महाराज रहते थे तुरिया नंद जी बीच-बीच में आते थे लाटू महाराज बाबूराम
Belur math group pics
महाराज मैनेजर थे फिर शरत महाराज उद्बोधन में थे किंतु बीच-बीच में वहीं प आते थे सो इतने सारे पीरियड है जयराम बाटी में मां रहती है बहुत सारे भक्त मां के पास
Ma in Jayrambati
जाते हैं हम कौन सा पीरियड सिलेक्ट करेंगे टाइम मशीन में बैठ कर के जाने के लिए यदि मुझे कहा जाए कि यह है टाइम मशीन जाओ तुम एक पीरियड सिलेक्ट कर लो वहां पर जाकर रहना तो आई विल सिलेक्ट दिस पीरियड यह जो दक्षिणेश्वर में ठाकुर और मां दोनों साथ में रहते थे और उसी समय यह त्यागी भक्तों
Dakshineshwar
का त्यागी लड़कों का आने की शुरुआत हुई थी राजा महाराज है स्वामी जी है लाटू है निरंजन है योगेन है ये जो सब नाम हम कथामृत में पढ़ते हैं फिर ये बलराम बाबू
Kathamrita book
है बलराम बसु है मास्टर महाशय है गिरीश घोष यह जब सब एक साथ में अपना पूरा संघ
group pic
दक्षिणेश्वर काली मंदिर में इकट्ठा हुआ था मैं उस समय जाना पसंद करूंगा क्योंकि वहां पर कभी वह नबत है तो वहां पर मां के पास में बैठ कर के मां रोटी बना रही है गरम-गरम हमको परोस रही है वह खा रहे हैं तो कभी ठाकुर के कमरे में जाकर के नृत्य गान कीर्तन चलता है उसमें हम लोग सहयोगी उसमें हम पार्टिसिपेट कर रहे हैं तो कभी नरेंद बैठा है वहां पे वो बेलतला के नीचे बिल्व वृक्ष का जो यह था बिल्व का वृक्ष
Bel tala
उसके नीचे में तपस्या कर रहा है कभी लाटू महाराज पंचवटी में बैठे हैं तो यह पीरियड है कि जब मैं जाना पसंद करूंगा और मैं वहां पर रुकूंगा यदि अपना जीवन बिताने का यदि हमको मौका मिले तो इस पीरियड में तो यह बड़ा ही सुंदर समय इस सुंदर समय की आलोचना कर रहे थे हम लोग और जो घटना चल रही है जो प्रसंग के बारे में हम चर्चा च कर रहे थे करेंगे आज और इस चर्चा को आगे बढ़ाएंगे वह भी बड़ा ही सुमधुर प्रसंग है बड़ा ही रसमय प्रसंग है
Story of milk
ठाकुर बीमार हुए हैं और वह खाना उनका कम हो गया है वो भात वगैरह नहीं खा पाएंगे दूध पीना है तो मां फिर क्या करती थी ठाकुर को ज्यादा ज्यादा दूध पिलाए अभी क्या है ठाकुर को बड़ा डर लगता है ज्यादा खाना देख कर के तो बड़े थोड़ा-थोड़ा खाना खाएंगे तो ठीक है अब ठाकुर दूध भी पिएंगे तो थोड़ा सा दूध पिएंगे ज्यादा नहीं पिएंगे अभी यहां पर मां चिंतित है कि बिल्कुल नहीं खाएंगे तो शरीर की हालत क्या होगी तो फिर मां ने क्या किया दूध को उबाल करके घना दूध कर दिया गाढ़ा दूध कर दिया जिससे कि क्या होगा दूध का परिमाण कम हो
Ma
जाएगा एक कटोरी बड़ी कटोरी दूध है उसको आप उबाले गे तो क्या होगा आधी कटोरी हो जाएगी किंतु परिमाण कम हुआ उसके जो पोषक तत्व है प्रोटीन है वगैरह वैसे के और और ज्यादा वैसे के वैसे ही रहेंगे उसकी क्वांटिटी कम हो जाएगी किंतु उसकी न्यूट्रिशनल वैल्यू इतनी ही इतनी रहेगी तो इस तरह से मां गाढ़ा दूध बना कर के ठाकुर को खिलाती थी पिलाती थी तो अभी ठाकुर भी अभी ठाकुर वैसे
Thakur's room
तो बालक स्वभाव थे किंतु बिल्कुल भी तो मने बच्चे जैसे नहीं थे उनमें भी तो थोड़ा सा एक ऑब्जर्वेशन था उन ऑब्जर्वेशन पावर था जब मां ऐसा घना दूध लेकर के आती है तो ठाकुर को संदेह हुआ पूछते हैं मां को कि अच्छा ये कितना दूध है तो मां कहती है कि ये एक शेर होगा आधी कटोरी क्या है इसमें तो ठाकुर कहते हैं कि तो यदि इतना कम दूध है तो इसके ऊपर में इतना घना मलाई का स्तर क्यों है आपको पता ही होगा यदि दूध घना होता है तो उसके ऊपर में मलाई का एक लेयर पूरा जम जाता है तो ज्यादा घना दूध होने से वो मलाई जो है एकदम मोटी होगी उसका वो जो लेयर होगा वो बड़ा ही थिक होगा तो ठाकुर कहते हैं इतना यह जो मलाई का यह जो स्तर है इसके ऊपर में इसका अर्थ है कि तो बड़ा ही गाढ़ा दूध है तो अर्थात कि ये जो ओरिजिनल जो परिमाण होगा दूध का क्वांटिटी उससे वो उबाल करके कम करके दिया है ठाकुर को भी तो मैंने इतने तो बच्चे नहीं थे कि यह ना समझ में आए तो साथ में ही मां कहती थी कि अरे नहीं नहीं यह तो उतना ही दूध है आप चिंता क्यों करते हैं किंतु ठाकुर के मन में संदेह अभी प्रवेश कर गया है वह समझ ग है कि मां कुछ ना कुछ गड़बड़ कर रही है कुछ ना कुछ ट्रिक कर रही है तो फिर एक दिन गुलाप मां आई तो ठाकुर ने पूछा कि अच्छा
Golap Ma
बताओ तो कितना दूध मुझे देते हैं तो गुलाप मां ने कह दिया जो ओरिजिनल परिमाण था वो एक कटोरी पूरा करके जो मां उबाल थी तो वह एक कटोरी वाला पूरा उन्होंने बता दिया कि मां तो इतना दूध आपको खिलाती है फिर उसको उबाल करके गाढ़ा कर देती है तो ठाकुर तो बड़े ही नाराज हो गए बोला कि बुलाओ मां को इतना दूध तो मैं खा नहीं सकता हूं क्यों मुझे इतना जोर जबरदस्ती दू खिलाती है तो मां आई फिर ठाकुर ने पूछा कि कितना यह माप है कितना शेर होगा कितना कटोरी तो मां ने कहा दूध पीना है उसमें इतना सब कुछ चिंता क्यों करते हैं आप फिर दूसरी बात है कि गुलाब को क्या पता कि यहां का माप क्या है यहां का एक कटोरी यानी कि छोटी कटोरी है बड़ी कटोरी थोड़ी ना है इसमें आप गुलाब को मेजरमेंट नहीं पता है त उसको उसने पता नहीं बिना समझे कुछ बता दिया है तो ठाकुर उस दिन तो मान लिए किंतु फिर भी मन में संदेह है फिर से गुलाप मां आती है दूध
dakshineshwar kali mandir
लेकर के फिर से ठाकुर पूछते हैं कि अच्छा बताओ तो कितना दूध पी रहा है मां मुझे पिलाती है मां शारदा तो फिर गोलाप मा ने फिर से कह दिया ओरिजिनल जो परिमाण था अब ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए बोले कि बुलाओ उसको तो फिर से मां को बुलाया गया फिर से ठाकुर पूछते हैं कि कितना दूध था तो मां ने कहा दूध पीना है उसमें इतनी चिंता क्यों करनी है एक कटोरी आधी कटोरी एक शेर दो शेर दूध पिए उसमें क्या है वो ठाकुर ही तो कहते हैं ना कि यदि बागान में गए हैं तो कितने पेड़ है उस पेड़ के ऊपर में कितनी ये डालियां है डालियों के ऊपर में कितने पत्ते हैं यह सब क्या गिनना है पेड़ के ऊपर में आम लगे हैं आम खाइए तो अभी ठाकुर माने यह उदाहरण तो नहीं दिया किंतु ठाकुर को खुद को पता है कि उन्होंने यह सब उदाहरण दिए हैं और मां तो सुनती थी वो जो ठाकुर के कमरे में नृत्य कीर्तन वगैरह होता था ठाकुर जब उपदेश देते थे तो ठाकुर कहते थे तो कि यह दरवाजा जो है नबत की ओर का उसको खोल दो अपने रामलाल को कहते थे
Ramlal
इससे कि क्या होगा कि जो नबत में रहते हैं मां शारदा और लक्ष्मी दीदी यह दोनों यह सब
Lakshmi didi
यहां पर जो कीर्तन हो रहा है आनंद आध्यात्मिकता का यह जो प्रवाह बह रहा है वह भीतू इसको सुने तो ठाकुर ने जब ऐसा ठाकुर को खुद को पता है कि उन्होंने ही तो मां को यह सब सिखाया है वो जो शुरू में ही हमने देखा था कि ठाकुर मां को क्या सिखाना चाहते थे मां तो छोटी उम्र में ही शादी हुई थी फिर वहां पर स्कूल वगैरह तो था नहीं पाठशाला दक्षिणेश्वर में भी कौन सिखाएगा मां को यह सब तो ठाकुर ने ही कहा गंभीरानंद जी ने ही आगे में ही कहा है कि ठाकुर ने मां को दो चीजें सिखाई थी क्या एक तो व्यवहारिकता दूसरा की आध्यात्मिकता व्यवहारिकता में जब कोई बीमार होता है तो पहले उसकी खबर करनी है ठाकुर क्या कहते हैं कि पड़ोसी यदि बीमार है अपने गांव में यदि कोई के उसकी खबर लेनी है या किसी के माध्यम से उसकी खबर लेनी है पूछना है कि तुम कैसे हो कोई बीमार है तो सेवा करनी है ऐसा सब कुछ अभी जैसे कि चंद्रा मणि देवी ठाकुर की मां और मां शारदा की सास तो उनकी सेवा करना यह सब कुछ तो मां करती थी ठाकुर ने ही सिखाया था तो फिर व्यवहारिकता तो ठाकुर ने ही मां को सिखाई थी और व्यवहारिकता में यह भी आ जाता है कि देखिए यदि कोई रोगी है तो उसकी सेवा करना परम कर्तव्य है उसमें यदि झूठ भी बोलना पड़े तो वो भी कोई इससे हानि नहीं है तो इसीलिए जब यहां पर ठाकुर कहते हैं कि कितना दूध है तो माने तीन बार यहां पर तीन घटना का उल्लेख गंभीरानंद जी ने किया है तीन प्रसंग है जबकि तीन बार ठाकुर ने मां को पूछा है कि कितना दूध होगा और मां ने तीनों बार झूठ बोला है यह कहकर कि दूध का परिमाण कम है और आप इसको पी लीजिए अभी क्या है कि मां भी तो ऐसा आउटरा इट झूठ तो बोलेगी नहीं कैसी बातों को घुमा देती है बच्चा यदि कोई जिद करता है यदि हट करता है कि मुझे यह चीज चाहिए ही चाहिए तो मां इसको बुलाएगी फुसला जाएगी मनाएगी ऐसा करके मां यहां पे एक बार कहती है कि कितना दूध है कितना उसका मेजरमेंट है एक कटोरी आधी कटोरी यह सब आपको चिंता करने की क्या जरूरत है दूध पीना है पीजिए तो एक बार तो फुस लाती है कभी कभी आउट राइट झूठ बोल देती है जब गुलाब मां ने कहा कि एक पूरी कटोरी है तब ठाकुर ने कहा मां को कि कितना दूध होगा तो मां ने क्या कहा कि वह जो काली मंदिर की जो कटोरी और यह जो ठाकुर के
kali temple
कमरे में जो मां के पास में नबत में जो कटोरी थी इन दोनों का मेजरमेंट अलग है गुलाब को पता नहीं है कि यहां का मेजरमेंट कितना है तो कभी-कभी ऐसा करती थी कभी-कभी झूठ बोलती थी कभी-कभी फुस लाती थी तो ये ऐसा जब तीन बार हुआ किंतु तब ठाकुर का संदेह जो है एकदम घनीभूत हो गया दृढ़ हो गया कहते हैं कि मुझे तुम्हारी ऐसी सेवा नहीं चाहिए क्योंकि ठाकुर ने एक बार जब मान लिया कि मां ज्यादा दूध पिलाती है तो फिर ठाकुर को एक पतला दस्त होना शुरू हो गया बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता है मां ने जब पूछा कैसा होता है दस्त ठाकुर ने कहा सफेद सफेद पतला पतला और फिर ठाकुर नाराज होकर के कहते हैं कि 15 बार मुझे सोच के लिए जाना पड़ा इस तरह से मुझे तुम लोगों की ऐसी सेवा नहीं चाहिए बोलकर के ठाकुर नाराज भी हो गए यहां पे गोलाप मा है वह बड़ी ही शोकान वित हो गई बड़ी ही दुखित हो गई और मां को कहा कि मां देखिए मैंने ठाकुर को बता दिया सच इसकी वजह से ठाकुर का यह दूध पीना भी नष्ट हो गया ठाकुर के लिए जो दूध बनाया था उस दिन और फिर ठाकुर बीमार भी हो गए यदि आप इस तरह से ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती है और ठाकुर के सामने झूठ बोलती है तो मुझे तो बता देना चाहिए
Truth is the austerity for the Kali yuga
ठाकुर सबको कहते हैं कि सत्य वचन कली की तपस्या है तो मैं तो सच ही बोलूंगी तो ठाकुर के पास जाकर के तो अभी हा गुलाप मा ने ऐसा कहा नहीं सत्य वचन वाली बात ये मैं ऐड कर दे रहा हूं थोड़ा सा इंटरेस्टिंग बनाने के लिए तो मां कहती है बड़ा ही
Lying in order to feed someone is not harmful
इंपॉर्टेंट बात मां क्या कहती है कि खावा जन्नो मिथ्या बोले दोष नहीं खाने के लिए खिलाने के लिए यदि आप मिथ्या बात करें झूठ बोलेंगे उसमें दोष नहीं है अमी ई रकम कोरे भूलिए टु खवाई में इसी तरह से ठाकुर को बुला करके फुसला करके पटा करके ठाकुर को खिलाती हूं तो देखिए कि यह कितना एक
Dilemna: Truthfulness vs. Selflessness
अभी प्रश्न होता है कि क्या इस तरह से झूठ बोलने से क्या पाप लगेगा क्या आपको आध्यात्मिक जीवन में उन्नति के लिए सत्य वचन के बारे में ठाकुर ने जो बार-बार कहा है कि ठाकुर ने कहा कि मैंने मां को मां जगदंबा को मां भवता को सब कुछ दे दिया किंतु एक सत्य नहीं दे पाया मैं यह नहीं कह पाया कि मां यह लो तुम्हारा सत्य यह लो तुम्हारा असत्य एक सत्य वचन की रक्षा मैं हमेशा करूंगा सत्य वचन में मां को मैंने ऑफर नहीं कर पाए बाकी सब बंधनों से जितने भी धर्म है जितने भी ऑब्लिगेशन से जितनी भी साधनाएं हैं सबसे ठाकुर मुक्त हो गए क्यों क्योंकि वह संपूर्ण शरण गत हो गए थे और जो ईश्वर के शरणागत होता है उनके लिए फिर साधना किस चीज की क्योंकि साधना का लक्ष्य ही है यह जो द्वैत है एक मैं हूं और एक ईश्वर है यह ध्व को मिटा देना यदि आपने संपूर्ण रूप से शरणागत हो ही गए हैं तो फिर यह ध्व में से अद्वैत हो गए आप आपका अपना खुद का अस्तित्व तो मिट गया अभी ईश्वर ही ईश्वर है आपके भीतर में तो फिर साधना किस चीज की तो साधना की परि समाप्ति के समय आपने ने सब कुछ जबी अर्पण कर दिया है किंतु ठाकुर कहते मैं सत्य नहीं दे पाया सत्य रक्षा इस कली की सबसे बड़ी तपस्या है तो ठाकुर जब यह कहेंगे तो हमको क्या यह संदेह नहीं होगा कि मां झूठ बोल कर के पाप में पड़ेगी कि क्या हुआ किंतु
Story of Gopis giving dust of their feet for Krishna
देखिए कि फिर ठाकुर का ही उपदेश कैसा है यदि प्रिय पात्र के लिए पाप भी अपने सर पर लेना पड़े तो भी कोई गम नहीं क्योंकि हमने ऑलरेडी देखिए शरणागति है वो स सर्वोच्च आदर्श है इसके लिए ठाकुर किस तरह का उदाहरण देते हैं कि एक जो भगवान कृष्ण के महल में जो सब रानियां थी यह रुक्मिणी वगैरा उनके मन में एक बार अहंकार आ गया कि हम ही लोग भगवान कृष्ण के सबसे बड़े भक्त है और यह नारद मुनि भी यही सोच रहे हैं कि यही लोग है सबसे बड़े भक्त तो फिर भगवान कृष्ण ने हंसते हस्ते उन कहा कि एक टेस्ट करते हैं कि देखते हैं कि कौन है सबसे बड़ा भक्त तो भगवान ने क्या किया कि बीमारी का ढंग ढोंग किया कहा कि मैं बीमार हो गया हूं और भक्त के चरण की रज जो है वह यदि मैं ग्रहण करूंगा तो फिर मैं बीमारी से मुक्त होंगा तो नारद मुनि को कहा कि जाओ भक्तों के चरणों की रज लेकर आओ वही है एक मेरी बीमारी की एक मात्र दवाई एक मात्र औषध तो यहां पर नारद मुनि उन्होंने सोचा कि सबसे बड़ा जो भक्त है वह तो ये रानी रुक्मिणी वगैरह है उनके चरणों की रज लेकर आते हैं उनके पद धूली लेकर के आते हैं तो उनके पास में गए तो फिर यह रानियां तो सब एकदम टेंशन में आ गई अपने पैरों की धूल भगवान कृष्ण को कैसे देंगे भक्त जो है वो ईश्वर के पैरों की धूल को अपने सर के ऊपर में मस्तक के ऊपर में ग्रहण करेगा ना व हम अपने पैरों की धूल क्या भगवान को देंगे यह तो कितना भयानक पाप हो गया तो ये रानियों ने कहा कि अरे नहीं भगवान कृष्णा तो नों तीनों लोक के स्वामी है त्रिभुवन के स्वामी उनको भी बीमारी वगैरह क्या वो तो इस माया के माध्यम से उन्होंने एक ढोंग रचा होगा स्वांग रचा होगा कोई जरूरत नहीं है हमारे पैरों की धुल देने की चरणों की रज देने की तो फिर नारद मुनि गए वृंदावन वृंदावन में जाकर के गोपियों को कहा कि भगवान कृष्ण बीमार है और उनकी एकमात्र दवाई है बीमारी की एकमात्र इलाज है भक्तों के चरणों की रज किंतु याद रखिएगा यदि आप अपने चरणों की रज देती है भगवान कृष्ण को तो बड़े ही पाप के भागीदार होंगे तो बिना झिझक के सभी गोपियों ने अपने पैरों की धूल जो है नारद मुनि को देना शुरू कर दिया एक सेकंड बिना सोचे कि यदि हम भगवान को अपने पैरों की धूल अर्पण करेंगे तो हमको कितना बड़ा पाप होगा तो देखिए कि नारद मुनि की वहीं पर शिक्षा हो गई कि भगवान की यदि प्रति आपकी भक्ति है तो संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होकर के संपूर्ण रूप से शरणागत होकर के आपको भक्ति करनी है उसमें फिर यदि स्वार्थ का एक लेश मात्र रहा कि मैं भक्ति कर रहा हूं उपासना कर रहा हूं उसका एक फल मुझे प्राप्त होगा मुक्ति फल ये आखिरी जो कामना होती है अपनी मुक्ति कामना वह भी आपको पूरे तिलांजलि दे देनी है उससे भी आपको मुक्त हो जाना है तभी तो कहीं जाकर के यह जो भक्ति मार्ग है उसकी चरम सीमा पर आप स्थापित हो पाएंगे और फिर जो भक्ति मार्ग की चरम सिवा है कि मुझे भक्ति भी नहीं चाहिए मुझे मुक्ति भी नहीं चाहिए मुझे संपूर्ण पूर्ण रूप से ईश्वर को शरणागत होना है तो फिर यह मेरा अहम जो है अहंकार वह पूर्ण पूर्ण रूप से विलीन हो जाएगा विघटित हो जाएगा और ईश्वर के साथ में मैं एकाकार हो जाऊंगा वही तो फिर अवेद का भी तो यही डेफिनेशन है आत्मज्ञान के साथ में आपका एकाकार होना यह जीव और आत्मन का यह जो डिवीजन है संपूर्ण रूप से मिट जाना जद यह घड़े के भीतर में बड़ा ही सुंदर उपमा है वेदांत की जो
Example from Vedanta
डिफरेंट डिफरेंट स्कूल्स जो होती है वह डि अलग-अलग तरीके से यह समझाने का प्रयास करती है कि ईश्वर में और जीव में फर्क क्या है कोई एक स्कूल कहती है कि जैसे कुम्हार है तो मिट्टी को अलग-अलग तरीके से शेप करता है कोई घड़ा बनाता है कोई एक ग्लास बनाता है कभी यह खाने के लिए वह कटोरी बनाता है यह सब है सब अलग-अलग शेप किंतु भीतर में एक ही मिट्टी है तो यह एक उदाहरण हो गया ब्रह्मण और यह जगत का कि ब्रह्मण ही जगत हुए हैं जैसे कि एक ही मिट्टी में से सब कुछ हुआ है तो वैसे ही ब्रह्मण में से ही पूरा जगत बना है दूसरा एक उदाहरण है कि मान लीजिए बहुत सारी टियो में पानी भरा हुआ है अभी घट में पानी है आकाश में सूरज है अब यह सूरज का प्रतिबिंब सभी घट के भीतर में पानी के भीतर में पड़ेगा तो ऐसा लगेगा कि इतने सारे प्रतिबिंबित सूर्य है किंतु नहीं प्रतिबिंबित सूर्य नहीं है सूर्य एक ही है उसके प्रतिबिंब बहुत सारे हैं यह तो दूसरा उदाहरण हो गया तीसरा एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग उदाहरण है घटा आकाश और पटाका अर्थात कि देखिए कि आकाश तो अपने चारों ओर विस्तृत है किंतु अभी मैं घट बनाता हूं तो आकाश तो घट के भीतर में भी है ऐसा नहीं है कि आकाश को बाहर से कहीं से इसमें डाला गया है आकाश जैसे ही घट बना आकाश घट के भीतर में है आकाश बाहर में भी है जैसे घट टूट गया तो घट के भीतर का आकाश बाहर के आकाश के साथ में एकीकृत हो गया किंतु देखिए कि आकाश की दृष्टि से कोई भी डिवीजन नहीं है घट की दृष्टि से ही डिवीजन है जैसे कि ठाकुर एक बड़ा ही सुंदर उदाहरण देकर के कहते हैं कि जब आप अग्नि प्रज्वलित करते हैं तो उसका धुआ जो है व दीवाल को ही लगेगा आकाश को नहीं लगेगा कितना सुंदर उदाहरण है कभी-कभी हम कथामृत पढ़ते हैं तो बहुत सारी बातें वसे पढ़ लेते हैं किंतु भूल जाते हैं किंतु फिर सेकंड टाइम थर्ड टाइम फो टाइम पढ़ते हैं तो यह सब छोटे-छोटे पावरफुल उपदेश है एकदम हमको स्ट्राइक करते हैं अच्छा ठाकुर इतनी सुंदर बात करते हैं कि जब अग्नि प्रज्वलित करने से उसका धुआं सिर्फ दीवाल को ही मलीन करेगा आकाश को मलीन नहीं करेगा आकाश तो वैसे का वैसा ही संपूर्ण रूप से स्वच्छ और परिशुद्ध रहेगा तो यहां पर भी देखिए कि
Complete Surrender to god frees us from truthfulness
ठाकुर वैसे एक और तो कह तो रहे हैं कि ना सत्य ही सर्वश्रेष्ठ तपस्या है किंतु यही ठाक र ने हमको एक वे आउट भी दिया है कि यदि आप संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाते हैं तो यह सत्य रूपी जो आखिरी एक चीज जो ठाकुर ने स्वयं उसको पकड़ के रखा था मां उसको भी पार कर गई अभी कोई पूछेगा जैसे कि स्वामी जी बार-बार कहते हैं को रामह राम कौन है सीता ही है महाभारत रामायण का सर्वोच्च पात्र रामायण में सर्वोच्च शक्ति मां सीता ही है ऐसा स्वामी जी बार-बार कह हैं और कहते हैं कि जब लड़कों के लिए मठ बाद में बनेगा पहले तो मां के लिए मठ बनेगा जब अमेरिका में थे पैसा इकट्ठा किया था तब स्वामी जी की इच्छा थी कि मां के लिए ही सर्वप्रथम मठ बनाया जाए और मां की महिमा का सर्वप्रथम प्रचार भी स्वामी जी ने किया था तो यह सब पढ़ कर के निश्चय हमको संदेह होगा कि ठाकुर तो इतनी समाधि में चले जाते थे इतने दर्शन होते थे मां के बारे में तो हमने कुछ भी सुना नहीं ऐसा एक दो दर्शन हुए हैं एक दो कहानियां है किंतु वो भी उसको भी इतना कोई प्राधान्य नहीं है मां के जीवन में मां के जीवन में एक ही बात का प्राधान्य है वह है भालो भाषा प्रेम मातृ स्नेह इसी बात का प्राधान्य है मां के जीवन में मां को समाधि होती है नहीं होती है हमको उससे कोई लेना देना नहीं मुझे तो पढ़ना भी नहीं यह सब कि मां को समाधि हुई है या मां को दर्शन हुआ है नहीं भी होते मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता मां के प्रति मेरी जो भक्ति है उसमें थोड़ा सा भी कोई भी परिवर्तन नहीं होने वाला है समाधि या दर्शन होने नहीं होने से क्यों क्योंकि मां के भीतर में स्नेह ही सर्वोच्च गुण है जिसको जिसके प्रति मैंने शरणागति उनके प्रति है मेरी जिसकी वजह से उनके प्रति मेरी भक्ति है तो देखिए कि शरणागति की अंतिम सीमा है पाप को भी जद ग्रहण करना पड़े यदि स्नेह पात्र के लिए अपने संतान की रक्षा करने के लिए मां यदि अपने सर पर पाप को भी आमंत्रण देती है पाप में पड़ती है तो उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो स्नेह है प्रेम है वही सर्वोच्च है तो यहां पर भी देखिए कि मां कितनी बड़ी बात कहती है खिलाने के लिए दोष ने झूठ बोलना मिथ्या बोलना इससे कोई भी दोष नहीं होता है अच्छा अभी जो है
Why to calculate: Ma uses Thakur's ideas to feed him more milk
गंभीरानंद जी भी इस घटना का थोड़ा सा एनालिसिस करते हैं और गंभीरानंद जी हमको सम जाते हैं कि किस तरह से मां सोच रही थी मां का खुद का माइंड सेट मां का खुद का एनालिसिस कैसा था जिसके चलते मां ने यह सब किया तो गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं उपेर बबेर दुई एकटी विषय एकट चिंता प्रयोजन यह जो ऊपर में जो पूरा विवरण दिया झूठ बोल कर के ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाने का इसके बारे में थोड़ा चिंतन करना आवश्यक है श्री मां ठाकुर के दूधेर परिमाण संबंध हिसाब कोरीते निषेध कोरिया लेन मां ने ठाकुर को मना किया था कि आप कितना दूध पीते हैं इसका मेजरमेंट आप मत कीजिए कितना परिमाण है एक बाटी आधी बाटी एक शेर दो शेर वह सब चिंता आप छोड़ दीजिए ऐसा माने ठाकुर को कहा था संभवत ही जुक्ति ठाकुर चिंता धारा अनुसरण क्रम श्री मायर मने उदीत होया छलो ऐसा पूरा संभव है कि मां के मन में यह बात ठाकुर की जो तन है ठाकुर ने जो उपदेश दिए हैं वही सुनकर के मां के मन में यह बात शायद प्रकट हुई होगी एक बार कालीबाड़ी खजांची ठाकुरे मासिक बरात देर हिसाबे की कोल करिया कम दिया छलो एक बार की घटना है कि ठाकुर को तो ठाकुर तो वहां पर पुजारी थे मंथली उनको सैलरी भी मिलती थी तो वहां पर काली मंदिर में से जिस ऑफिस में से यह सैलरी कैलकुलेट करके जब डिस्ट्रीब्यूटर ऐसा हुआ कि ठाकुर को जो मिलने वाला था सैलरी जो मिलने वाली थी वह थोड़ी सी कम मिली वो पता नहीं वो कैलकुलेशन में कुछ गड़बड़ हो गई होगी कि इन लोगों ने जानबूझ कर के ऐसा किया होगा जो भी है श्री मां उहा शनिया खाजान जी के बोलिया भूल सुधराई बार परामर्श दिले ठाकुर बोलिया छि लेन जब मां को पता चला कि पैसा इतना कम मिला है इस बार तो मां ने ठाकुर को कहा कि कालीवा कचेरी में जाकर के ऑफिस में जाकर के उनको कहिए कि कैलकुलेशन में गलती हुई है या किसी भी वजह से पैसा कम मिला है तो ठाकुर ने क्या कहा छी छी हिसाब कर वो अरे छी छी मैं क्या हिसाब करूंगा तो देखिए ठाकुर ने फट करके बोल दिया पहले तो मैं हिसाब क्यों करूंगा तो देखिए मा भी ये सब बातों को पकड़ लिए वर्तमान खेत्रे श्री मां संभवत सरल विश्वासी परेर परर निर्भर शल और बे हिसाबी ठाकुर के निजर जुक्ति तेही परास्त करिया दुग्ध पाने प्रोच तो करते चाहिया छिले तो ठाकुर ने एक बार जब कह दिया कि मैं हिसाब क्यों करूंगा तो इसी बात को मां ने पकड़ लिया है और ठाकुर तो थे ब बेचारे बड़े ही सरल स्वभाव दूसरों पे दूसरों के ऊपर में अर्थात कि मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से निर्भर शल और बे हिसाबी ये जो शब्द है गंभीरानंद जी महाराज यूज करते हैं बे हिसाबी अर्थात कि हिसाब किताब का थोड़ा सा भी ज्ञान जिसको नहीं है वो बे हिसाबी ठाकुर तो ठाकुर एक बार जो बोल दिया माने उसी घटना को उसी प्रसंग को पकड़ लिया और उसी प्रसंग से ठाकुर की ही युक्ति से ठाकुर को पराजित करने का मां ने सोच लिया कि इसी कि यदि हिसाब क्यों करना है पैसों में तो यदि पैसों में हिसाब नहीं करना है तो दूध पीने में क्या हिसाब करना है ऐसा मां के मन में फिट इक्वेशन बैठ गया और फिर उन्होंने ठाकुर को कहा कि इसमें इतना हिसाब करने की क्या जरूरत है तो ऐसा इसी युक्ति का सहारा ले लेकर के ठाकुर को माने ज्यादा दूध पिलाना चाहा अभी देखिए यह तो हमारी ओर से कैलकुलेशन है राइट माने ये हमारी ओर से एनालिसिस से मां के मन में क्या चल रहा होगा वह तो पता नहीं किंतु गंभीरानंद जी महाराज इस तरह से एनालिसिस
Mother tricks her loved ones to care for them
करते हैं आगे क्या लिखते हैं द्वितीय तो ठाकुर के ई भावे बुझाया सुनाया खाबाई बार चेस्टार सहीद आमा देर सम्मुख भास उठे प्रियजन के विशेष तो अबोध बालक बालिका दिग के प्रीति भरे आहार कराई बार चित्र यह तो एक एक्सक्यूज जो कि मां ने अपने को दिया होगा ठाकुर तो है बे हिसाबी ठाकुर तो है मेरे पर निर्भर शल ठाकुर तो है बच्चे की तरह सरल और वो चाहते हैं कि मैं सैलरी का हिसाब नहीं करूंगा तो फिर यह सबको इसका डायरेक्ट जो इक्वेशन का जो इफेक्ट होता है कि मां जब कहती है कि इतना दूध है तो ठाकुर को उस समय विश्वास के सहित वो दूध पी लेना चाहिए फिर दूसरा क्या है मां जब ठाकुर को इस तरह से भुला करके फोसला करके दूध पिलाती है तो हमारे मन के सामने एक चित्रक खड़ा होता है जो कि हम सभी ने अपने घर में देखा होगा छोटा बच्चा है वह जीद कर रहा है हट कर रहा है यह खाऊंगा वह नहीं खाऊंगा और मां किस तरह से उसको भला उसको भुला करके पटा करके खाना खिलाती है ऐसा एक सुंदर सुमधुर चित्र हमारी नजर के सामने खड़ा होता है यहां पर भी ठाकुर इतने सरल थे मां के ऊपर में मां शारदा के ऊपर में इतने निर्भर शल थे कि मां का भी देखिए कि ठाकुर के प्रति मातृ भाव था और मां भी ठाकुर को छोटे बच्चे की तरह भुला करके फुसला करके दूध पिलाती थी भगिनी माता भगिनी पत्नी प्रवृत्ति आत्मीय वर्ग कतो भावे भुलाया हितकर खाद शकोल प्रिय पात्र के भोजन करान एवं ओई रूपे तहादेर देहर पु संपादन करें मां है बहन है पत्नी है वह अपने प्रिय पात्र जो है अपने संतान या तो अपना छोटा भाई या तो अपने पति उनको किस तरह से भुला करके उनको फुसला करके उनके लिए जो अच्छा है इस तरह का आहार उनको खिलाती है इसे और इसी तरह से उनके देह को पुष्टिकर खाद्य देकर के देह को सशक्त करती है यह चित्र हमारी नजर के सामने खड़ा हो है शेष थले माता प्रवृति के के हो मिथ्या बादी नहीं बोला साहस राखे ना वो चिंता मने उठे ना यह इस तरह की घटना में कोई भी यह साहस नहीं करेगा यह नहीं कहेगा कि मां या तो फिर बहन या तो फिर पत्नी वह झूठ बोलती है यह कहने का साहस तक कोई नहीं करेगा
Sattva defeats rajas and tamas
भालो मंदो मिश्रित संसारे अमरा भालो ताहा की बोली जहा ते धिक बशत तमो रज अभिभूत होया जाए यह भालो और मंदो अच्छा और बुरा यह दोनों का बना हुआ यह संसार है इस संसार में हम अच्छा वही करेंगे कहेंगे जिसमें कि सत्व का आधिपत्य है क्योंकि देखिए कि जो भी कार्य आप माया के जगत में करेंगे उसमें सत्व रजस और तमस तीनों ही मिश्रित होंगे यदि सत्व के साथ में आप रजस और तमस नहीं मिलाएंगे शुद्ध त्व के साथ में तो फिर सृष्टि की रचना ही नहीं होंगी जैसे कि यह जो गोल्ड है यह जो सोना सोने के साथ में थोड़ी सी अशुद्धि मिलाई जाती है तभी वह गहने का घडतर होगा शुद्ध सोने का गहना बनाने को जाएंगे तो बनेगा नहीं या तो वह फिर बड़ा ही नरम होगा तो यहां पर भी यदि संसार की सृष्टि करनी है संसार की रचना करनी है तो शुद्ध सत्व के साथ में थोड़ा सा तो रजस और तमस मिलाना ही पड़ता है किंतु देखिए कि ज्यादातर लोगों में ज्यादातर तो नहीं किंतु कई लोगों में ऐसा होता है कि रजस या तो फिर तमस का ही प्रमाण अधिक होता है तो अभी जैसे कि इस संसार में सत्व रजस तमस तीनों है अच्छा भी है बुरा भी है तो हम सबसे अच्छा किसको कहेंगे कि जिसमें सबसे ज्यादा सत्व है ऐसा हम यदि एक एक इंपॉसिबल आइडियल खोजना शुरू करेंगे कि हमको 100% सात्विक जो है वही चाहिए तो 100% सात्त्विक कहां से हमको को प्राप्त होगा ठाकुर को जद छोड़ देते हैं ठाकुर तो वो नेती नेती करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके जब वापस आए तो किंतु वापस भी आते हैं तो उनको ये जो ठाकुर ने जैसे कि शंकराचार्य के बारे में या तो सुखदेव के बारे में कहा था कि उन्होंने विद्या का अहम या तो फिर यह भक्ति का अहम रख दिया था थोड़ा तो अहम अहंकार आपको रखना ही पड़ेगा तभी तो आप जगत में वापस आ पाएंगे यदि शुद्ध सत्व होगा तो सीधा निर्विकल्प समाधि में रह जाएंगी यह जो ठाकुर है निर्विकल्प समाधि में जाते थे तो कोई एक इच्छा प्रकट करते थे कोई एक वासना प्रकट करते थे वासना प्रकट करने से तमस और रजस थोड़ा सा प्रवेश होगा उनके मन में और उनके मन को भाव राज्य में से समाधि में से पृथ्वी पर इस जागतिक संसार में वापस लेकर आएगा तो ठाकुर क्या कहते थे कि मैं तमाकू तमाकू अ तामा खाबो अमी भाजे जावो अमी लची खाव अर्थात कि स्मोकिंग करूंगा मैं शोच के लिए जाऊंगा मैं मिठाई खाऊंगा ऐसा एक इच्छा एक वासना प्रकट करते थे वो वासना प्रकट जैसी ही हुई वैसे ही थोड़ा सा अल्प मात्र रजस और तमस प्रवेश हुआ और वह फिर पृथ्वी पर वापस आए तो पृथ्वी पर यदि रहना है इस लौकिक संसार में लौकिक जगत में यदि रहना है तो रजस और तमस थोड़ा सा तो होना ही चाहिए तो जब यह रजस तमस और सत्व भालो मंदो अच्छा बुरा इन दोनों का बना हुआ जब यह संसार है तो हम अच्छा उसी को कहेंगे बेस्ट उसी को कहेंगे जिसमें कि सबसे ज्यादा सत्व हो तो यहां पर भी एक इंपॉसिबल आइडियल को खोजने की वजह ऐसा आइडियल खोजिए जो कि सर्वश्रेष्ठ हो जो कि अवेलेबल जो कुछ है उसमें सर्वश्रेष्ठ हो गोलापर सब टुक भालो न है तथापि प्रभाते शिशिर शिक तो कुशु शपथ तो नयन के अनन समस्त विषय होते टानिया आनिया सुधु आपना सौंदर्य राशिर मध्य आबद्ध कोरिया राखे एक गुलाब है फिर से महाराज जी उदाहरण देते हैं दूसरा उदाहरण देते हैं इसी मामले में कि एक गुलाब है उसका सब कुछ अच्छा नहीं है उसमें कांटे भी है और फूल बड़ा ही सुंदर है किंतु साथ में कांटे भी है किंतु फिर हमको जद गुलाब का आकलन करना है गुलाब का वह जो यह करना है उसको मेजर मेंट करना है अच्छा क्या है उसमें कितना अच्छा है तो देखिए कि प्रभात की प्रभात जब होता है जब यह सूरज की किरणें प्रथम बार आकाश को लाली मा से आच्छादित करती है उस समय प्रभात का य जो ओस है जो यह जो छकड़ा में कहते हैं मॉर्निंग फोग यह जो फोग है या तो मिस्ट मॉर्निंग मिस्ट व जब गुलाब की पत्तियों पर गिरती है तो गुलाब की जो ऐसे तो रेड कलर का गुलाब है उसके ऊपर में यह जो जो पानी की छोटी-छोटी बूंदे जो जब उसके ऊपर में लगती है फिर उसके ऊपर में जब सूरज का प्रकाश गिरता है तो कितना सुंदर वह जो गुलाब दिखता है तो वही गुलाब जो है उसी को हमको लेना है नहीं कि उसके कांटों को उसके सौंदर्य का आकलन हमको इसकी गुलाब की पत्तियों से ही करना है नहीं कि उसके कांटों से जननी प्रभृति अनुपम स्नेहो सतो कोमल कथा गुलियो ते मनी अपर समस्त विषय भुलाया दिया प्रिय जनेर मन के सुधु अनुराग रंजीत कोरिया थाके वैसे ही जैसे कि गुलाब की पत्तियों को ही लेना है गुलाब का सौंदर्य पत्तियों में ही आबद्ध है उस समय कांटों को भूल जाना है वैसे ही जननी है अर्थात की मां है बहन है पत्नी है उनका यह जो अनुपम स्नेह सिक्त कोमल कथा अर्थात कि अनंत स्नेह मय मृदु बातें जो है उनकी स्नेह उनकी जो बातें हैं वह आपको बाकी सब भुला करके उनके जो हम जो है हम लोग बाकी उनके जो प्रियजन है उनको बाकी सब भुला कर के एक अनुराग से रंजित करके रखती है एवं उत्तर काले चिंता अवतारना होले केवल शी प्रीति टुक के स्मृति पथे तुल धरे यह जो सुंदर बातें है उनकी स्नेह से भरी वह बातों से बाकी सब भूल दिया जाता है आज हम इतने सालों के बा बाद में यदि याद करेंगे कि हां मेरी मां कैसी थी मां के साथ में क्या बातें होती थी तो वही सब प्रसंग ही हमारे मन में रहेंगे वो प्रसंग हम भूल जाएंगे कि मां ने पिटाई भी की थी जद कुछ हम लोग गड़बड़ कर रहे थे मां के साथ में झगड़ा भी हुआ था वो सब बातें भूल कर के मां का जो अनंत स्नेह है प्रेम है वो बड़ी उम्र में वही हमारे मन में जागृत रहेगा तो यहां पे भी महाराज कहते हैं कि सत्व रजस तमस तीनों का संसार है तमस और रजस को छोड़ कर के सत्व ही हमारे पर सबसे ज्यादा असर करता है हमारे जीवन को वह परिवर्तन करता है हमको स्नेह शक्ति से सशक्त करता है और जैसे-जैसे समय जाएगा वैसे-वैसे यही बातें हमारे मन में रहेगी बाकी सब बातों को हम भूल जाएंगे श्री मां रूप मन भुला कथा
Story of Ma giving rice to thakur
प्रयोगी करयाई खांतो ईते ना किंतु देखिए मां सिर्फ इस तरह से मन को भुलाकर के ठाकुर को भुला करके अच्छी बातें करके ही सिर्फ शांत नहीं होती थी ठाकुर अधिक भात देखिले भोई पाई तन अभी खाने को बैठे हैं ज्यादा भात है तो फिर ठाकुर को डर लगता था कि अरे इतना ज्यादा भात है मैं कैसे खा पाऊंगा तो फिर मां क्या करेगी ताई तीनी भात बाड़ी बार समय हात दिया चापि चापि देते अर्थात कि मां जब ठाकुर को भात देगी तो अपने हाथों से उसको प्रेस कर देगी स्रेस कर देगी जिससे क्या होगा वैसे ही भात देंगी थाली में परोसें तो बहुत सारा भात थाली में बिखर बिखरा हुआ ज्यादा दिखेगा किंतु सबको इकट्ठा करके हाथों से दबा देगी तो हाथ भात का परिणाम इतना सा ही दिखेगा अच्छा इतना सा ही भात है तो खा लेते हैं ऐसा करके मां ठाकुर के मन को भुला कर के ठाकुर को खिला द थी ठाकुर जननी जतोग छिले ततो दिन ठाकुर प्राय नबत आशिया दप्र हरे आहार ग्रहण करी तेन ठाकुर की मां चंद्रा मणि देवी जब तक जीवित थी तब तक वो में रहती थी और उनके रहते रहते खाने का भोजन का समय होने से ठाकुर स्वयं ही नबत में आकर के मां के सामने बैठ कर के मां का दिया हुआ खाना आहार करते थे शासुर देहो त्याग पर श्री मां आहार जो हस्ते श्री रामकृष्ण कोखे उपस्थित होई तेन एवं तहा के आसने बसाया पाखा दिया माछी ताते ताते प्रीति पूर्ण कथा बोलिया तहर उधमी मन के आहार दख धरिया राखी न और किंतु जब उनकी सास का अर्थात कि चंद्रा मणि देवी का देहांत हुआ तब मां अपने हाथों से यह भोजन का थाला लेकर के ठाकुर के कमरे में जाती ठाकुर के साथ में यही मन भुलाने की बातें करती ठाकुर के मन को भुलाने की बातें करती हाथों से पंखों से पंखा डालते डालते व हाथ वाला जो पंखा आता है ना उस समय तो इलेक्ट्रिसिटी नहीं थी कि स्विच ऑन कर दो पंखा चलने लगे वह हाथों से पंखा डालना होता था तो हाथों से ऐसा पंखे से हवा कर करते करते यह जो म मच्छी वगैरह है जो कि भोजन के ऊपर में ना बैठे इस तरह से हवा करते-करते ठाकुर के मन को भुलाते भुलाते ठाकुर को आहार करवाती थी और ठाकुर के साथ में यह सब बातें करनी पड़ती थी वरना तो ठाकुर का उर्ध्व गामी मन किसी भी सेकंड वह समाधि में मग्न हो जाएगा तो फिर खाना वैसे ही पड़ा रहा और ठाकुर समाधि में चले गए हैं तो फिर उनको वापस लाने के लिए ईश्वर का नाम सुनाना पड़ेगा तो मां इस तरह से कोई ना कोई बात लेकर के बातें करते रहती ठाकुर के मन को पकड़ के रखती एंगेज करके रखती व्यस्त करके रखती जैसे कि ठाकुर का मन खाने में रहे और पूरा खाना ठाकुर ग्रहण कर पाए तो अभी इसके बाद में एक नया टॉपिक चालू होता है जिसको कि अभी हम कल देखेंगे हां ज ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु यहां पे एक छोटा सा गांव है नाम है पलास व उड़ीसा की बॉर्डर पर है तो बड़े महाराज कहते हैं चलो वहां पर यूथ कन्वेंशन है थोड़ा सा बोल देना लड़कों के सामने अभी मुझे व तेलुगु तो आता नहीं है तो अभी स्कूल के लड़के हैं तो मैंने सोचा अभी चलो थोड़ा बहुत इंग्लिश में बोल देते हैं मैंने सोचा 100 200 होंगे जाकर के देखा तो इतना बड़ा पेंडल बनाया है मैंने वो जो वहां पर ऑर्गेनाइजर था मैंने उसको बोला अरे इतना ज्यादा पैसा क्यों खर्च किया कितने लोग आएंगे बोलता है 2000 लड़के आएंगे मैंने कहा क्या बात कर रहे [हंसी] हो यूथ कन्वेंशन में 2000 स्टूडेंट और दूसरे दिन डिवटी कन्वेंशन था उसमें 2000 से भी ज्यादा डिवटी मैं तो एकदम आश्चर्य चकित रह गया गुजरात में ऐसा कभी देखा नहीं है यहां पर जो भाव प्रचार परिषद है ना मैंने 80 से ज्यादा भाव प्रचार परिषद और मैंने इतनी एक्टिव जब अभी यहां पर सतानंद जी आने वाले हैं 250 लोग तो दीक्षा लेंगे
स्वामीजी भी ठाकुर की तरह ही बे-हिसाबी थे। लेकिन दूसरी ओर, हमारा रामकृष्ण मिशन हिसाब-किताब में इतना निपुण है।
देखिए ये आपने स्वामी जी की बात करी स्वामी जी बेहिसाब थे साथ-साथ में ही जब यह पब्लिक इंस्टिट्यूशन चलाना है तो पैसों का कितना केयर रखना पड़ता है यह जो राजा महाराज है शरत महाराज है डांट डांट करके स्वामी जी इनको सिखाया है कि एक पैसा भी इधर से उधर नहीं होना चाहिए यह स्वामी जी ने एक रूल बुक बनाया है जो कि हम सिर्फ साधु लोग पढ़ते हैं हमारे पास में है जो कि कंप्लीट वर्ष में इंक्लूडेड नहीं है उसमें स्वामी जी स्पष्ट लिखते हैं जब मछली का पैसा मछली खरीदने के लिए ही लगेगा सब्जी खरीदने के लिए नहीं सब्जी खरीदने का पैसा से मछली नहीं खरीदी जाएगी मैंने इतना मतलब वो जो डिपार्टमेंट आइज करके रखा है तो वो बात स्वामी जी ने वो कितनी सारी कहानियां है कि स्वामी जी राजा महाराज को डांट रहे हैं राजा महाराज कमरे में जाकर के रो रहे हैं बाद में फिर स्वामी जी जाकर के उनके सामने रोना शुरू कर देते हैं यानी एक तरह से पर्सनल फाइनेंस में बे हिसाबी है किंतु पब्लिक फाइनेंस इंस्टिट्यूशन की बात है 100% पक्का हिसाब रखना है वरना क्या है पब्लिक का ट्रस्ट उठ जाएगा तो स्वामी जी को यह बात किंतु बड़ी पक्की पता थी ये ये ठाकुर भी ठाकुर भी देखिए ठाकुर के कमरे में प्रतिदिन मां काली का प्रसाद आता है तो एक दिन प्रसाद नहीं आया तो ठाकुर गए खजान जी को बात करने के लिए अरे वहां पर प्रसाद भेजते हो आया क्यों नहीं तो योगन महाराज वहां पे थे सावर्ण चौधरी के लड़ तो मने उनके लड़के तो बोलते हैं ठाकुर आखिर में तो वो जो मने पुजारी ही है कि वो प्रसाद नहीं आया तो चिंता करते हैं ठाकुर उनके मन की बात समझ गए तो क्या कहा कि देखो कि रानी रामनी ने गरीब लोगों के लिए यह मंदिर बनाया है जिससे कि उनको अच्छे से वो प्रसाद वगैरह मिले अब ये जो जो ये लोग है ऑफिस वाले ये सब किसी को किसी को दे देंगे तो मैं मेरे पास में जद आता है तो मैं तो ऐसे लोगों को बाटूंगी जो कि डिजर्व करते हैं तो ये पब्लिक इंस्टिट्यूशन का पैसा पब्लिक इंस्टिट्यूशन के लिए ही लगे जिस पर्पस के लिए इंस्टिट्यूशन बनाया गया है ठाकुर भी क्लियर थे इस मामले में यानी ठाकुर और स्वामी जी पर्सनल मामले में बिल्कुल बे हिसाबी थे किंतु जब पब्लिक इंस्टिट्यूशन तब एकदम पक्के
हम झूठ बोल सकते हैं यदि झूठ अच्छे उद्देश्य के लिए हो, जैसे युधिष्ठिर ने द्रोणाचार्य के पुत्र की मृत्यु के बारे में झूठ बोला था। स्वामीजी की अनूठी शिक्षा है कि निस्वार्थता ही ईश्वर है
दोनों युधिष्ठिर का उदाहरण मां के उदाहरण में एक क्रिटिकल डिफरेंस क्या है कि अल्टीमेटली युधिष्ठिर को खुद को राजा होना था यानी युद्ध जद जीते तो खुद राजा हुए यहां पर और इसीलिए जो उनको फल लग गया कि रद जो हवा में चल रहा था जमीन पर आ गया गया ये मां का ऐसा था कि मां को इससे कुछ नहीं मिलने वाला था 100% सेल्फलेस तो आपने जैसे ठीक ही कहा कि सेल्फलेसनेस इज गड क्योंकि आप यदि झूठ बोलते हैं तो आपको यह क्लियर होना चाहिए कि मुझे उससे कोई लाभ नहीं हो रहा है मुझे राजा नहीं बनना है व जो भी होना है ठाकुर का ही अच्छा भला होगा मेरा कुछ नहीं किंतु ये भक्ति शास्त्र में यह है क्लियर जैसे ठाकुर ने ही कहा ना वो कहानी कही कि गोपियों ने सभी ने अपने चरणों की रज दे दी भले हमको पाप लगे भगवान कृष्ण का भला हो तो निस्वार्थ शुद्ध भक्ति जो वृंदावन में थी वह तो भागवत में है ही है वही है कि देखिए हम लोगों का आज का क्या प्रॉब्लम है कि शास्त्र वास्त्र तो पढ़े नहीं है ऐसा कुछ भागवत वगैरह ऊपर ऊपर से देखा है वो टीवी सीरियल देख कर के कृष्ण को समझने का प्रयास करते हैं तो इस सबका जो सटल है डेप्थ है वो हमारे हमको नहीं समझ में आता वो जब ठाकुर मा स्वामी जी को पढ़ेंगे तब वो डेप्थ तभी हमको समझ में आएगा वो पढ़ी है तो मैंने वो टीवी देख कर के ना कि वो जो छोटी मोटी किताबें पढ़ के अभी यह लक्ष्मण रेखा है लक्ष्मण रेखा देखिए ओरिजिनल रामायण में नहीं है वह बाद में बाद में वह सब कहानियों में आ गई है तो अभी ओरिजिनल संस्कृत रामायण पढ़ना वाल्मीकि कृत और उसको समझना तभी तो ठीक ठीक समझ में आएगा तो वह अभी कौन करने को जाएगा छोटा सा तो लाइफ है अभी कितना करेंगे किंतु लाभ ठाकुर महा स्वामी जी को पढ़ के यह है कि फिर हम पैरेलल ड्र कर सकते हैं देन इट विल बी इी फिर जब वो कहानियां पढ़ेंगे तो इमीडिएट यहां से हमको पता चलेगा कि इसका जो डेप्थ में जो असली मीनिंग क्या है तो वो यह है
मुझे नहीं पता था कि स्वामीजी को माँ सीता पर इतनी श्रद्धा है
वो जो सजीस ऑफ इंडिया बोलक स्वामी जी का लेक्चर है ना उसमें शुरू में बड़ा ही सुंदर विवरण है वो सभी सभी पहले भगवान राम फिर मां सीता फिर भगवान कृष्ण सभी का विवरण देते हैं उसमें जो मां सीता का जो विवरण है ना अद्भुत है वो वो यदि मतलब आपने जैसे कहा यदि इस तरह से सेशन करना है तो वो एक लेक्चर है उसका फर्स्ट पार्ट ले सकते हैं कभी