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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 10 jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित जिस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं उसका नाम है भार समर्पण इसमें जैसे कल हमने थोड़ा सा इस टॉपिक को डिस्कस करना प्रारंभ किया था। वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल पैसेजेस इन आवर लिटरेचर। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में जो सबसे खूबसूरत कुछ पैराग्राफ्स कुछ रचनाएं हैं उनमें से एक यह है एक पैसेज जो कि हम कल से डिस्कस कर रहे हैं। महाराज जी हमको कहते हैं कि किस तरह से देखिए कि देवी का आगमन पृथ्वी पर होता है तो मनुष्य देवी के साथ में किस तरह से अपना नाता अपना रिश्ता जोड़ता है। कभी-कभी देवी असुर संहार के लिए आती है तो भयंकरा रूप धारण करती है। मां काली का अवतरण जैसे हुआ था असुर के संहार करने के लिए तो वह रण रणक्षेत्र है। वहां पर वह अटहास्य करती हुई दानवों का संहार कर रही है। वो एक भयानक भयंकरा मूर्ति काली और देखिए कि यही मां काली भयंकरा मां काली अ आध्यात्मिक जगत में जो एक सबसे आश्चर्यजनित सबसे आश्चर्यजनक ट्रांसफॉर्मेशन है वो मां काली का है कि किस तरह से रणक्षेत्र में असुरों के साथ में युद्ध करती हुई काली एक मातृति में परिवर्तित हुई। ये अ राम प्रसाद सेन जिसका जिसके कि गान ठाकुर बार-बार गाया करते थे वो राम प्रसाद का यह सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन है आध्यात्मिक जगत में। बंगाल में देखिए कि किस तरह से जो ईश्वर या तो स्वर्ग में रहते हैं या तो जिनके प्रति हमारा एक भय का एक रहता है भय और एक तरह से दूर का नाता कि हां ईश्वर को हमको प्रार्थना करनी चाहिए। ईश्वर यदि खुश होंगे तो हमको आशीर्वाद देंगे। ईश्वर यदि नाराज होंगे तो हमको श्राप देंगे। तो यह ईश्वर ईश्वर के साथ में जैसे कि यह लेनदेन का रिश्ता है। हमको ईश्वर को कुछ देना है। ईश्वर को हमको कुछ देना है। किंतु यह लेनदेन का रिश्ता तो होता है पराए के साथ में। जो अपना होता है उनको उनके पास में से हम सतत डिमांड करते कर सकते हैं। उनके पास में से हम सदा अभिमान कर सकते हैं। उनके ऊपर में उनके साथ में झगड़ा कर सकते हैं। उनको हम प्रेम कर सकते हैं। तो यह जो सतत आत्मीयता का रिश्ता है वह आत्मीयता का रिश्ता आप देखेंगे कि चैतन्य मूवमेंट जो बंगाल में जो चली थी उसमें यह एक बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन है। यह रूप गोस्वामी ने भक्ति रसामृत सिंधु बोलकर के ग्रंथ लिखा। उसमें उन्होंने महाप्रभु के जो यह रस थे एक के बाद एक जो भाव थे उनका एक फिलॉसोफिकल डिस्क्रिप्शन उन्होंने उसमें दिया है। महाप्रभु का गौरांग महाप्रभु का भगवान कृष्ण के साथ में एक मधुर भाव का जो संबंध उन्होंने बनाया था। मधुर भाव से उन्होंने भगवान कृष्ण की उपासना की थी। यह आध्यात्मिक जगत में एक सर्व एक वन ऑफ द ग्रेटेस्ट डेवलपमेंट वन ऑफ द ग्रेटेस्ट कंट्रीब्यूशन इन स्पिरिचुअल वर्ल्ड तो यह वैष्णव भावधारा में आप देखेंगे कि यह रस साधन रस या तो फिर यह भाव साधना यह गौरांग महाप्रभु के समय से ही चली आ रही थी। यहां पर दूसरी जो स्ट्रीम है एक स्ट्रीम है वैष्णव भाव या तो फिर वैष्णविज्म तो दूसरी है यह शक्ति साधना वैष्णव अब साधना में हम भगवान कृष्ण की उपासना करते हैं तो शक्ति साधना में मां काली है दुर्गा है इन सब देवियों की उपासना करते हैं। तो जिस तरह से यह भाव साधना का डेवलपमेंट वैष्णव साधना में हुआ, वैष्णव परंपरा में हुआ, वैसे ही यह भाव साधना का डेवलपमेंट शक्ति परंपरा में भी हुआ। यह शक्ति स्कूल में भी हुआ और इसके लिए एक बहुत बड़ा श्रेय जाता है यह राम प्रसाद को। राम प्रसाद का मां काली के साथ में जो एक मधुर संबंध था वह काली का संतान है। मां काली का संतान है और मां के साथ में झगड़ा करता है। मां को कंप्लेन करता है। मां के सामने अभिमान दिखाता है कि तुम तुम्ही तुम ही माता थाकले अमार जागा घोरे चोरी। तुम मां हो उसके बावजूद तुम मेरी मां होने के बावजूद मेरे घर में चोरी कैसे हो सकती है तो यह जो एक के बाद एक जो राम प्रसाद की यह जो गीत है श्यामा संगीत है उसमें देखेंगे कि मां काली का भयंकर रूप जो है मां काली की जो स्तवस्तुति होती है पहले के समय में जो होती थी वो नहीं हो वो तो है ही है किंतु साथ में ही एक एडेड डायमेंशन यहां पर एक ऐड हुआ है। वह है मां का मातृ रूप में अभिवादन। मां के साथ में आदार। यह जो बेंगली शब्द है आबदार अर्थात कि मां के ऊपर में अभिमान कि मां तुम क्यों मुझे दर्शन नहीं देती हो? मैं तुम्हारे दर्शन के लिए इतना तड़पता हूं। इसके बावजूद तुम मुझे दर्शन क्यों नहीं देती हो? यह मां के साथ में सतत एक तरह का वाद विवाद, मां के साथ में झगड़ा, मां को कंप्लेन करना, यह मां के ऊपर में अभिमान करना और मां के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होना। यह सब कब हो सकता है? यदि ईश्वर अवकाश में स्वर्ग में बैठे होते, हेवन में बैठे होते तो उनके साथ में एक लेनदेन का रिश्ता रहता है। यदि हम सुकर्म करेंगे तो हमको वह पुण्य प्रदान करेंगे। दुष्कर्म करेंगे तो पाप प्रदान करेंगे। तो हमको हमारी ओर से यह हमारी ओर का जो यह बारगेन है वह हमको ठीक रखना है। हमारी ओर का जो कॉन्ट्रैक्ट है वह ठीक रखेंगे तो वह उनके साइड का कॉन्ट्रैक्ट ठीक रखेंगे। किंतु यहां पर मां के साथ में संतान का जो भाव है, संतान सब समय मां को परेशान करता रहता है। इधर-उधर दौड़ता रहता है। मां की बात सुनता नहीं है। मां डांटेगी तब भी वह कुछ वह सामने झगड़ा करने को जाएगा। पहले तो वह मां को परेशान करता है और फिर जब मां डांटती है तो मां को मां के सामने जाकर फिर से झगड़ा करेगा। जैसे कि सब दोष मां का है। तो मुझे इस तरह से मुझे अपना बिहेवियर करेक्ट करने की जरूरत नहीं है। मुझे संपूर्ण रूप से मां के ऊपर में भरोसा रख के संपूर्ण शरणागति रखनी है। संतान देखिए कि एक शिशु है, एक बालक है। वो मां के साथ में झगड़ा जितना भी चाहे करेगा। किंतु मां के ऊपर में उसका जो भरोसा है कितना गहन है, कितना गंभीर है। यह जो संपूर्ण शरणागति या तो संपूर्ण रूप से मां के ऊपर में भरोसा रखकर के बैठना यह है मां और संतान का जो संबंध है। इसकी यह विशिष्टता। साथ-साथ में ही आप देखिए कि किस तरह से जैसे कि यह वैष्णव भाव है। यह वैष्णव पदावली है। वैष्णव पदावली में आपको यही भाव गौरांग महाप्रभु के जीवन में देखने को मिलेगा। किस तरह से गौरांग महाप्रभु का भगवान कृष्ण के साथ में। वह गोपी है, वह राधा है और मान और यह फिर यह अभिमान यह सब चलता रहता है भगवान कृष्ण के साथ में। तो यही भाव या तो फिर यह यही रस माधुर्य राम प्रसाद ने शाक्त पदावलियों में शक्ति साधना में इंट्रोड्यूस किया है। तो उसके कुछ-कुछ उदाहरण हम देखेंगे। इसके पहले किंतु कल का जो पैसेज था गंभीरानंद जी महाराज के जीवन में उसको फिर से एक बार पाठ कर लेते हैं। यहां पे पहले तो गंभीरानंद जी कहते हैं कि किस तरह से बंगालियों ने भगवान के साथ में देवी के साथ में खास करके विभिन्न रूप से उन्होंने आत्मीयता बनाई है। विभिन्न रूप से उन्होंने देवी की पूजा की है। किंतु देवी तबु देवी थाकिया गले देवी सिर्फ देवी ही रह गई मानुष मतो मानुषे शरीररे तखनो विग्रह परिग्रह कोरि लेना मनुष्य के रूप में मनुष्य के शरीर में कभी भी विग्रह को परिग्रह नहीं किया मानुष देवी के ए भाहिले केनो आर भगवती बा से अभिलाष पूर्ण कर ले केनो मनुष्य देवी को एक मनुष्य या तो अपनी जननी के रूप में चाहता ही क्यों है और भगवती वह अभिलाषा पूर्ण करती ही क्यों है आमरा बोलिया छ ए मातृति ते आविर्भाव ना होले अध्यात्म जगत एकटा अपूर्णणीय अभाव थाकिया जाए तो यदि मातृति में देवी ने अवतरण न किया होता तो आध्यात्मिक जगत में एक अपूर्णय अभाव रह जाता मां संतान के गर्भ धारण करें एवं प्रशभानते क्रोड़े तुल्या स्तनोपान कोान मां संतान को गर्भ में धारण करती है और प्रसव करके उसको अपनी गोद में उठाकर के स्तनपान कराती है। शिशु चखु मेलियाई मां के पाय स्नेहो पुष्टि तुष्टि सौंदर्य लालन प्रवृत्ति गुण राशि एकमात्र आकर रूपे शिशु जब आंख खोलता है तो वह मां को देखता है स्नेह पुष्टि तुष्टि सौंदर्य और पालन जैसे जितने भी गुण है उन सबकी मूर्तिमंत स्वरूप के रूप में साधन क्षेत्र साधक ताई जगदंबा के देखीते चाय इहार पराकाष्ठा रूपे इसीलिए साधन क्षेत्र में साधक चाहता है अपनी मां को इसी की पराकाष्ठा के रूप में देखने को ठाकुर श्री रामकृष्ण बोलिया छे मातृभाव साधने शेष कथा ठाकुर ने कहा है मातृभाव है साधना की आखिरी बात स्वामी विवेकानंद ताहार कर्म जोगे बोलिया छे जगत माय स्थान शकले ऊपरे इस जगत में मां का स्थान है सबसे ऊपर में तो शिशु का मां के ऊपर में जो भाव है निर्भरता है मां जिस तरह से शिशु का लालनपालन करती है उसको सिखाती है समय आने पर उसको डांटती है और चाहे शिशु जितना ही वो परेशान करें मां को चाहे जितना ही तूफान करे चाहे जितना भी वो इधर-उधर जाकर के चीजों को तोड़े फोड़े फेंके इधर-उधर किंतु मां हमेशा शिशु को प्रेम ही करेगी। गी यह अनकंडीशनल लव मां का प्रेम है। किसी भी तरह की कंडीशन के ऊपर में डिपेंडेंट नहीं है। इसके पहले जो था कि मैं पुण्य करूंगा मैं अच्छे कर्म करूंगा तो मुझे पुण्य मिलेगा। यह जो कर्म का सिद्धांत है यह कर्म का सिद्धांत मां के पास में नहीं चलता। पिता के साथ में चलेगा शायद। पिताजी देखेंगे कि अच्छा का वह होमवर्क अच्छे से करता है। यदि परीक्षा में अच्छे से मार्क लाता है तो चलो उसको कहीं जाकर के उसको गिफ्ट दे दे। उसको नई साइकिल खरीद ले उसके लिए उसके लिए कोई हो सकता है कि कोई अच्छा कपड़े वगैरह खरीद ले। तो पिताजी देखेंगे कि लड़का वो स्कूल में अच्छा कर रहा है कि नहीं। उसका परफॉर्मेंस कैसा है? किंतु मां बच्चा यदि उसका परफॉर्मेंस अच्छा नहीं भी रहेगा तो भी बड़े स्नेह से उसको जो चीजें अच्छी लगती है खाने की वो बना करके उसको खिलाएगी। तो यह मां का जो प्रेम है वह अनकंडीशंड लव है। उसकी कोई भी किसी भी तरह की उसमें लेनदेन का भाव नहीं है। तो यही भाव देखिए कि ये जिस तरह से वैष्णव पदावलियों में भगवान कृष्ण के प्रति राधा का जो भाव था मान का भाव वही भाव हमको राम प्रसाद के गीतों में देखने को मिल जाता है। तो वह किस तरह से उसका थोड़ा सा अभी हम एक बार देखते हैं। पहले तो रामप्रसाद

कवि रामप्रसाद का अद्भुत जीवन

के बारे में राम प्रसाद 18th सेंचुरी के एक कवि थे और उनके जीवन में बहुत सारी अद्भुत घटनाएं हुई थी। ठाकुर की ही तरह रामप्रसाद की यदि बायोग्राफी पढ़ेंगे तो जिसने ठाकुर का लीला प्रसंग पढ़ा है, उनको बहुत सारा कुछ सिमिलरिटीज देखने को मिल जाएगा। ठाकुर किस तरह से मां के लिए रोते थे, मां के लिए क्रंदन करते थे। वैसे ही राम प्रसाद ने भी एक पंचमुंडी आसन बनाया था। यह जो शक्ति साधना के लिए इसकी आवश्यकता होती है और फिर उस आसन पर बैठकर कितनी तपस्या करते थे और मां के लिए मां काली के दर्शन के लिए कितना रोते थे। उनके जीवन की एक अद्भुत घटना है कि एक बार उनके

कहानी: जगदम्बा रामप्रसाद की बाड़ को ठीक करने में मदद करने के लिए बेटी के रूप में प्रकट होती हैं

घर के आसपास में जो फेंस थी वह फेंस टूट गई। फेंस अर्थात कि वो जो एक बैरियर जैसा होता है लकड़ी का वो जो आपका यह जो यह होता है आपके घर के आसपास में वो लगाते हैं फेंस फेंसिंग करते हैं जिससे कि यह गाय बकरी वगैरह हमारे घर के भीतर में ना आ जाए। तो यह फेंस लगाया था आसपास में लकड़ी का वो टूट गया। तो फिर अभी राम प्रसाद सोचते हैं कि पैसा वैसा तो है नहीं अपने पास में। वह भी तो फकीर जैसे ही थे। नौकरी करते थे, अकाउंटेंट थे। किंतु अकाउंट का वो जो ये नोटबुक होता है उसमें बस मां के भजन लिखते रहते थे। तो वह जिनका अकाउंट करते थे। उन्होंने देखा नाराज होना चाहिए। नाराज नहीं होकर के आश्चर्यचकित हो गए। कहा कि मां काली के ऊपर में आपकी इतनी भक्ति है तो एक काम कीजिए। आपको यह सब काम करने की जरूरत नहीं है। मैं आपको थोड़ा सा पेंशन दूंगा। आप अपने गांव जाकर के अच्छे से मां की साधना कीजिए। तो वह कोलकाता में अकाउंटिंग करते थे। वहां से मां की कृपा से छूटे। गांव गए वापस और वहां पर जाकर के उन्होंने यह मां के एक के बाद एक संगीत की गानों की भजन की रचना करते गए। तो यह अभी क्या है कि वह जो पेंशन मिलता था वह तो थोड़ा सा ही होगा। ऐसा तो नहीं है कि घर में बहुत सारा कुछ खाने को वगैरह का है तो फिर यह फेंस टूट गई है तो उसको रिपेयर करना है तो कैसे करेंगे अपने से ही करने को बैठे हैं अभी फेंस जिस तरह से लगाते हैं कि लकड़ी जमीन में गाड़नी पड़ती है फिर वो जो रस्सी होती है रस्सी से उसको बांधना पड़ता है लकड़ी की ये जितने भी वो जो प्लेक है वो लगाएंगे तो उन्होंने अपनी लड़की को कहा कि तुम यहां पर खड़ी रहो और यह जो रस्सी है अपने हाथ में रखो रस्सी का जो दड़ा होता है तो उसको अपने हाथ में रखो और धीरे-धीरे करके जैसे मुझे रस्सी की जरूरत पड़ती है तुम वैसे दड़े में से उसको छोड़ते जाना। यह जिन लोगों ने पतंग चगाई होगी यह उत्तरायण में तो उनको पता होगा कि यदि आप पतंग चगाते हैं काई फ्लाइंग करते हैं तो उसकी जो डोरी होती है डोरी को उसको धीरे-धीरे करके छोड़ना पड़ता है तो किसी के हाथ में वह दोरी का यह रहता है चरखा और यह दूसरा लड़का जो है वह पतंग चगाता है तो वैसे ही कुछ कि इसके हाथ में यह रस्सी का दड़ा है उसकी लड़की के हाथ में और वो उसमें से रस्सी खींच खींच करके वो फेंसिंग कर रहे हैं वो लकड़ियों को बांध रहे हैं। एकाएक देखा कि कुछ समय के बाद में वह लड़की ने कहा कि अच्छा पिताजी मैं तो यहां पर नहीं थी बड़े लंबे समय तक तो आपने इस तरह से फेंसिंग किया रस्सी से आप बांध रहे हैं तो किसने ये रस्सी को आपको दिया? तो उस समय राम प्रसाद ने पीछे देखा तो उसकी लड़की खड़ी थी थोड़ी सी दूर और रस्सी का दड़ा था जमीन पर पड़ा था। तो उसने कहा कि बिटिया मुझे तो कुछ पता नहीं। मैं तो यही सोचता हूं कि तुम ही यह रस को धीरे-धीरे करके मुझे दे रही हो। तो लड़की कहती है नहीं पिताजी मैं तो किसी काम से लंबे समय के पहले ही चली गई थी। यहां पर तो मैं थी ही नहीं। तो फिर आपको यह रस्सी दी किसने? तब कहीं जाकर के राम प्रसाद को पता चला कि यह मां जगदंबा ही उनकी कन्या के वेश में आकर के वहां पर खड़े थे उनके पीछे। और जब उनको रस्सी चाहिए थी तो धीरे-धीरे करके वह रस्सी के दड़े में से उनको रस्सी दे रही थी। तो यह जो पूरी घटना उसके बाद में राम प्रसाद अपना एक भजन की रचना करते हैं। क्या कहते हैं? मन केनो माय चरण छाड़ा। मन क्यों मां के चरण को छोड़कर के रहता है। ओ मन भाव शक्ति पाबे मुक्ति बांध दिया भक्ति दड़ा। तू मन तुम शक्ति की आराधना करोगे तो तुम मुक्त हो जाओगे। यह भक्ति के दड़े से तुम्हारी साधना जो है उसको तुम बांध पाओगे। नयन थाकते देख लेना मोन केमन तोमार कपालपोड़ा। आंख रहते भी तुम देख नहीं पाए कि मां काली स्वयं तुम्हारे पीछे खड़ी थी। केमन तोमार कपालपोड़ा। यह तुम्हारा कैसा दुर्भाग्य है? मां भक्त तनया रूपते बेंधे गलेन घरे बेड़ा मां भक्त की कन्या के रूप में आकर के बांध के गई घर का बेड़ा बेड़ा अर्थात कि फेंस तो देखिए कि मां जो है भक्त की कन्या के रूप में भक्त की जननी के रूप में अवतरित होती है और उनका जो प्रेम है उनका जो आबदार है उनकी जो सेवा है श्रद्धा है उसको ग्रहण करती है ठाकुर के

श्रीरामकृष्ण की माँ काली के दर्शन पाने की अपूर्व व्याकुलता

जीवन में देखेंगे कि यह मातृभाव कितना सुंदर रूप से परिस्फुट हुआ है। जब ठाकुर पहली बार साधना का दिव्य दिव्यद में जब ठाकुर ने मां की आराधना करनी प्रारंभ की थी। देखिए कि ठाकुर की साधना को हम दो स्टेज में डिवाइड कर सकते हैं या तो फिर दो फेज में समझ सकते हैं। सर्वप्रथम फेज तो है कि ठाकुर अकेले ही अपने हृदय की उच्छ्वासता से अपने हृदय के आवेग से मां काली की पूजा कर रहे थे। उनको पुकार रहे थे दर्शन देने के लिए। उस समय ठाकुर को सिखाने के लिए ना ही कोई गुरु थे, ना ही कोई आचार्य थे, ना ही उन्होंने बस वह केनाराम भट्टाचार्य से मां काली का मंत्र लिया था। शक्ति मंत्र लिया था। क्योंकि मां काली की यदि पूजा करनी है तो शक्ति मंत्र में दीक्षित होना आवश्यक था। तो बस उतना ही उन्होंने किया था। इससे ज्यादा उन्होंने कोई किसी गुरु से यह सीखा नहीं था कि किस तरह से शक्ति की उपासना की जाए। बस अपने हृदय के आवेग भरे प्रेम से वह मां को पुकारते गए और फिर क्या कहते थे मां तू राम प्रसाद के देखा दिए छीश आमाई केनो तबे देखा दीना मां तुमने राम प्रसाद को देखा दर्शन दिया था तुम मुझे दर्शन क्यों नहीं दोगी आमी धन जन भोग सुख किछु ही चाहिए ना आमाई दिखा दे मुझे धन जन भोग सुख कुछ नहीं चाहिए मुझे दिखा दे मुझे मुझे तुम आकर के दर्शन दो। मैं तुमको देखना चाहता हूं। तो इस तरह से हृदय के आवेग से श्री रामकृष्ण ने मां की आराधना की थी। तो वो फर्स्ट फेस। इसके बाद में जब कोलकाता में समाचार गया कि ठाकुर पागल हो गए हैं तो चंद्रामणि देवी ने उनको बुला करके उनका विवाह करवाया। ठाकुर मां शारदा के साथ में विवाह होने के बाद में जब वापस आए कल कोलकाता दक्षिणेश्वर में तो फिर विधिवत उन्होंने सब साधनाओं का अनुष्ठान किया। तो जैसे कि तंत्र साधना का विधिवत अनुष्ठान किया। भैरवी ब्राह्मणी के साथ में भैरवी ब्राह्मणी उनकी गुरु थी। वेदांत साधना में उनके गुरु थे। तोतापुरी वात्सल्य भाव की साधना में थे। जटाधारी वगैरह-वगैरह किंतु वह तो बाद की बात है। फर्स्ट फेज जो था उसमें ठाकुर के पास में सिर्फ एक ही अस्त्र था ठाकुर के पास में जैसे कि एक ही अवलंबन था और वह अवलंबन था उनका उनका उनकी व्याकुलता। तो यह जो व्याकुलता के माध्यम से ही उन्होंने मां काली की जो साधना की और उसके लिए जो सबसे ज्यादा उन्होंने सहाय ली है तो वो राम प्रसाद के गानों की राम प्रसाद के भजनों की। देखिए कि एक के बाद एक ठाकुर के जीवन में किस तरह से यह राम प्रसाद का जो भाव है मां काली के प्रति जननी का भाव वह मां काली के संतान है वह भाव देवी मैं थोड़ा सा पाठ करता हूं लीला प्रसंग में से लीला प्रसंग में किस तरह से शरद महाराज कहते हैं प्रार्थना करीते करीते नयन धाराए तहार बखो भाष्या जाए तो एवं उहाते हृदय भार किंचित लघु होले विश्वास मुक्त प्रेरणा कथनचितो आश्वस्त होइया पुनरााय गीत गाहिया तनी देवी के प्रसन्ना कोते उद्यत होते प्रार्थना करतेकरते ठाकुर की आंखों में से नयन धारा आंसुओं के प्रवाह से उनका सीना भीग जाता और इससे रोते-रोते जब उनके हृदय का भार थोड़ा सा हल्का होता तो फिर विश्वास की मुग्ध प्रेरणा से थोड़े से आश्वस्त होकर के फिर से गीत गा करके वह देवी को प्रसन्न करने के लिए उद्यत होते तैयार होते। ऐसा करते-करते पूजा और ध्यान और भजन में दिन जाने लगा और ठाकुर के मन का अनुराग और व्याकुलता दिन बढ़ने लगा और फिर देवी की पूजा और सेवा संपन्न करने का जो समय था वह भी उनका बढ़ता जाता है। वैसा तो आपको ऐसा होता है कि इतने समय में देवी की पूजा समाप्त कर लेनी है। भोग लगा देना है। उसके बाद में यह जो प्रसाद होगा वो जाएगा वो वहां पर ऑफिस में वहां पर कांगाली है अन्य साधु है वो सब उसका आहार करेंगे तो यह भोग टाइम पर लगना चाहिए क्योंकि सभी को तो खाने को भी तो समय पर बैठना है किंतु वो नहीं ठाकुर जब ध्यान करने को बैठेंगे मां की मूर्ति के सामने तो सतत ध्यान ही करते रहेंगे यदि भजन गाने को बैठेंगे गीत गाने को बैठेंगे यह श्यामा संगीत राम प्रसाद का वह यदि गाते रहेंगे तो वह चलता ही रहेगा। चलता ही रहेगा जैसे कि इसका कोई अंत ही नहीं आएगा। और फिर यदि लोग आकर के कहेंगे कि अरे भोग का समय समाप्त हो गया है। सभी लोग खाने को बैठे हैं। उनके पास में मां काली का प्रसाद नहीं आया है तो ठाकुर यह बात को सुनेंगे ही नहीं। जैसे कि इस जगत में दो ही है। ठाकुर है और मां है। इसके अलावा और कोई नहीं है। उस समय मां का दर्शन प्राप्त करने के लिए ठाकुर के हृदय की जो यंत्रणा है, ठाकुर के हृदय की जो व्याकुलता है वह इतनी बढ़ गई थी कि ऐसा लगता था जैसे कि एक भी गमछा हो। एक भी एक टॉवेल हो। गीला टॉवेल उसमें से जल निकालने के लिए आप टोवेल को किस तरह से आप उसको स्क्वीज़ करेंगे। किस किस तरह से आप उसको ट्विस्ट करेंगे। यह जो कपड़े धोते हैं जो लोग कपड़े धोते हैं उनको पता होगा कपड़ों को सुखाने से पहले उसमें से पानी निकालना पड़ता है। तो उसको स्क्वीज़ करके उसको ट्विस्ट करके उसमें से सब पानी निकल जाए। अपनी जितनी शक्ति है हाथों में तब कहीं जाकर के उसको रस्सी पर डाला जाता है सूखने के लिए। अभी तो आजकल वाशिंग मशीन आ गए हैं। किंतु फिर भी बहुत सारे लोग इसी तरह से कपड़े धोते हैं। अपने हाथों से अपने हाथों से ही उसको सुखाते हैं। तो यह जो कपड़ों को सुखाने के लिए उसमें से पानी निकालने के लिए जिस तरह से आप उसको ट्विस्ट और स्क्वीज करेंगे वैसे ही ठाकुर कहते थे कि मेरे हृदय की जो यंत्रणा है मां काली का दर्शन प्राप्त करने की इतनी बढ़ जाती थी कि जैसे मेरे हृदय को कोई ट्विस्ट कर रहा है और कोई स्क्वीस कर रहा है। इतनी मेरे हृदय में यंत्रणा होती थी और फिर यदि मां का दर्शन नहीं मिला तो फिर मैं जमीन पर गिर जाऊंगा और बाह्य संज्ञा शून्य हो जाऊंगा अर्थात कि जगत का कोई ज्ञान ही नहीं रहेगा बेहोश हो जाऊंगा और फिर किंतु ऐसा करतेकरते रोते-रोते साधना करतेकरते इतना भीतर में से जैसे कि देखिए यहां पर जो वर्णन है कि सहशामार अद्भुत दर्शन पायला एकाएक मां काली का अद्भुत दर्शन प्राप्त हुआ और शंगा शून्य होइया पिया गलाम और बेहोश होकर के पड़ गया ताहार पर बाहरे की जे होइया छे ता कौन दिख दिया दिन और तत्पर दिन जे गया छे ताहार किछु ही जानी ते पारी नाई बाहर में क्या चल रहा है वो दिन कैसे गया था बाद का दिन कैसे गया था इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है अंतररे किंतु एकटा अननू भूत जमाट बांधा आनंद श्रोतो प्रवाहित छिलो एवं मार साक्षात प्रकाश उपलब्धि करिया छिला हृदय में किंतु एक जमाट बांधा घोर आनंद का घनघोर आनंद का स्त्रोत प्रवाहित हो रहा था और मां का साक्षात प्रकाश में उपलब्धि कर रहा था। यह दर्शन होने के बाद में मां की

श्रीरामकृष्ण का माँ काली के साथ मधुर बालक भाव

यह जो चिन्मय मूर्ति है उसका सब समय ठाकुर को दर्शन होता था और फिर यह ठाकुर का जो मां के साथ में जो रिश्ता था वह इतना सुंदर रूप से बनने लगा। ठाकुर कहते हैं कि मां मेरे साथ में क्या हो रहा है? मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुमको पुकारने का मंत्र तंत्र मुझे कुछ भी पता नहीं है। क्या करने से मैं तुम्हारा दर्शन कर पाऊं? तुम ही मुझे यह बात सिखा दो। तुम यदि मुझे ना सिखाओगी तो मुझे और कौन सिखाएगा? तुम्हारा तुम तुम्हारे अलावा ना ही मेरे पास में कोई सहाय है ना ही मेरे पास में और कोई अवलंबन है। इस तरह से सतत ठाकुर कहते हैं कि मैं प्रार्थना कहता करता रहता था। और फिर यह प्रार्थना करते-करते जब ठाकुर को मां का दर्शन हुआ तो मां के साथ में जो बालक का जो मान, अभिमान, अनुराग, झगड़ा करना वो जो सब भाव है वो लीलाएं चलने लगी। किस तरह से चलती है? जैसे कि हृदय का वर्णन है कि कभी-कभी जब ठाकुर मां की आराधना करते थे, मां का मां की पूजा करते थे तो क्या-क्या सब वो हृदय कभी-कभी चला जाता था और क्या देखता था कि मां ठाकुर मां को खाना खिला रहे हैं, भोग खिला रहे हैं। तो अभी भोग जब ठाकुर मां को ऑफर करेंगे तो आपको मंत्र का पाठ करना होगा। तो ऐसा नहीं ठाकुर देखते थे कि मंत्र पाठ करने से पहले ही मां साक्षात स्वयं देह धारण करके भोग के थाले के सामने आकर के बैठी है और यहां पर ठाकुर मंत्र बोल रहे हैं। वह समाप्त होने के पहले ही खाना शुरू कर देती है। देखिए यह मां का भी एक तरह का बालिका भाव है। किस तरह का मधुर भाव है। वो यहां पर मंत्र चल रहा है। उससे पहले ही वह जैसे कि खाना शुरू कर दिया तो ठाकुर नाराज हो जाते हैं। जैसे कि छोटा बच्चा कभी-कभी मां के ऊपर में नाराज हो जाता है। और फिर ठाकुर कहते हैं ठहरो ठहरो बोश बोश रोश रोश आगे मंत्र बोली तार पर खास ठहर जाओ ठहर जाओ पहले मैं मंत्र तो बोल लूं बाद में तुम खाना ऐसा करके वो नाराज होकर के जैसे कि मां को कहते हैं कि वो नियम का भंग कर रही है तो ऐसा क्यों कर रही है पहले मंत्र बोलूं बाद में खाना ऐसा बोलकर के चित्कार करेंगे और चित्कार करते करते ही जैसे कि मां को नैवेद्य ऑफर कर रहे हैं जीवंत मां को ऐसा करेंगे कभी-कभी इसी में समाधि में चले जाएंगे। हृदय कहता है कि जब ठाकुर की पूजा देखने को मैं जाता तो देखता कि यह जो जवा और बिल्व का जो अर्घ्य है जासवंत और बिल्व पत्र का वो अर्घ्य जो बनाते हैं मां को ऑफर करने के लिए तो मां को ऑफर करने से पहले खुद के मस्तक के ऊपर में खुद के सीने पे यहां तक कि खुद के पैरों में उसको स्पर्श करवा करके मां को ऑफर करते थे। देखिए कि यह तो वैसे तो देखा जाए तो कितना बड़ा पाप है। आप यदि भगवान के सामने पुष्प अर्पण करते हैं उस पुष्प को अपने पैरों में स्पर्श करवा के करेंगे तो कितना बड़ा पाप लगेगा। यह हो गई वैधि भक्ति। किंतु ठाकुर अभी वैध भक्ति की सीमाओं को छोड़कर के रागात्मिका भक्ति के भीतर में प्रवेश कर चुके हैं। यहां पर ईश्वर के साथ में कर्म का संपर्क कर्म का नियम यहां पर लगता नहीं है। लेनदेन का संपर्क नहीं है। बच्चा और मां यह जो दोनों का मधुर संबंध है, मधुर रिश्ता है, वही यहां पे चलता रहता है। किस तरह से कि ठाकुर मां को खाना खिलाते हैं। मां को नैवेद्य ऑफर करते हैं और कहते क्या है खा मां बेश कोरे खा मां अच्छे से खाओ तुम बड़े सुंदर रूप से खाओ फिर कहते हैं अभी पता नहीं मां उनको क्या कहती है हृदय देख रहा है और ठाकुर का जो डायलॉग है वो सुन रहा है ठाकुर क्या कहते हैं आमी खाबो अच्छा खा मैं खाऊं क्या अच्छा मैं खाता हूं यानी कि मां ने ठाकुर को कहा होगा पहले तुम खा लो फिर मैं खाती हूं अभी ये अगेन विधिवादी यह भक्ति के अनुस अनुसार आप देखें कि आप यदि ठाकुर को ग्रहण ठाकुर को ऑफर ईश्वर को ऑफर करने के लिए जो कुछ भी चीज देते हैं पहले ईश्वर खाएंगे बाद में आप खाएंगे आप पहले खुद खाएंगे और फिर ईश्वर को ऑफर करेंगे यह तो कितना महापाप हो गया किंतु यह रागात्मिका भक्ति मां ठाकुर को कहती है कि अच्छा पहले तुम खाओ फिर मैं खाती हूं तो ठाकुर कहते हैं अच्छा तो ठीक है बोल कर के हृदय कहता है कि मैं अपनी नजरों से देखता हूं की मां को ऑफर करने वाले थाले में से ठाकुर पहले खा लेते हैं। और फिर क्या कहते हैं? आमी तो खेची ए बार तू ही खा। मैंने तो खा लिया अभी तुम खाओ। फिर हृदय कहता है कि एक दिन जब ठाकुर मां काली को इसी तरह से भोग ऑफर कर रहे थे। उस समय एक बिल्ली वहां पर आ गई। अभी देखिए ठाकुर के दर्शन कितने विचित्र विचित्र दर्शन है। ठाकुर ने देखा कि बिल्ली के भीतर में भी मां है और जैसे कि बिल्ली के भीतर में से मां ठाकुर को आदेश कर रही है कि पहले मुझे खाना खिलाओ। तो ठाकुर उसको देखकर के कहते क्या है? खाबी मां खाबी मां। बोल कर के खाओगी मां खाओगी मां। ऐसा बोलकर के वो जो मां के लिए जो भोग का जो प्रसाद जो कुछ भी होगा वह लेकर के बिल्ली को खिलाने लगे। एक दिन का एक दिन की बात है। अगेन यह सब हृदय हमको कहता है ठाकुर का भांजा कहता है कि ठाकुर मां काली को शयन करवाने के लिए उनके जो शयन कक्ष है उसमें गए। अभी देखिए कि जो भारतीय परंपरा है हमारे मंदिरों में ईश्वर की जिस तरह से पूजा होती है। हम लोग मानते हैं कि ईश्वर साक्षात हमारी नजरों के सामने विराजमान है। उनको हम आहार कराते हैं। उनको हम स्नान करवाते हैं। उनको हम वस्त्र पहनाते हैं। उनको हम शयन करवाते हैं। तो साक्षात ईश्वर हमारे सामने है। इस तरह से हमको यह सब कुछ करना है। और विधिवादी जो पूजा होती है वैधि पूजा उसमें ईश्वर को अर्पण करने का थाला जिसमें ईश्वर खाना खाएंगे या तो फिर जो शयन कक्ष जिसमें यह बेड जिसके ऊपर में ये खाट जिसके ऊपर में ईश्वर शयन करेंगे उसको और कोई स्पर्श उसके उसका और कोई व्यवहार नहीं कर सकता। जिस थाले में आप भगवान को भोग लगा रहे हैं उस थाले में ना ही आप खा सकते हैं। जिस खाट के ऊपर में यदि भगवान को शयन करवाना है उसमें आप खुद शयन नहीं कर सकते वरना तो बहुत बड़ा पाप होगा। किंतु देखिए पहले तो ठाकुर मां के थाले में से खुद खा रहे हैं। म एक के बाद एक यह जो विधि वैधि भक्ति जो है उसकी ये जितनी भी बैरियर है यह सब बैरियर तोड़कर के ठाकुर यह रागात्मिका भक्ति में कैसे उठ रहे हैं। पहले तो हृदय ने यह देखा कि ठाकुर एक के बाद एक मां के खुद के थाले में से खुद खा रहे हैं। उसके बाद में अपने पैर को स्पर्श करवा करके पुष्प मां को ऑफर कर रहे हैं। बिल्ली को खिला रहे हैं। मां के ही भोग के थाले में से उसके बाद में मां काली को शयन करवाने के लिए जब वो शयन कक्ष में जाते हैं तो फिर मां काली उनको कहती है कि आओ तुम भी मेरे साथ में शयन करो। जैसे कि एक छोटा बच्चा अपनी मां के साथ में सोता है। तो जैसे ही मां ने ठाकुर को आह्वान किया तो ठाकुर भी कहते हैं कि अच्छा तुम कहती हो कि मेरे मां मां आमा के काछे सुते बोल छिश अच्छा शुच्छी। ठाकुर कहते हैं मां मां तुम मुझे तुम्हारे साथ में सोने को बोलती हो। अच्छा सो रहा हूं। ऐसा बोलकर के जो जगन माता का जो खाट था उसके ऊपर में खुद सो गए। देखिए कि यह जो कि आत्मीयता है कितनी गहन आत्मीयता है। हम लोगों को यह सब बातों को पढ़कर के इतना कुछ लगता नहीं है कि अरे चलो भगवान के लिए खाने का थाला है। उसमें से हमने खा लिया शयन कक्ष शयन करने के लिए जो खाट है उसमें हम शयन कर लिए। कौन सी बड़ी बात है? क्योंकि क्या है कि हम लोगों का वह ब्राह्मण संस्कार नहीं है। ठाकुर का ब्राह्मण संस्कार था और ब्राह्मण लोगों के मन में जैसे कि डीएनए में यह सब विधि जो है उनके भीतर में प्रवेशी हुई है। तो ठाकुर कहते हैं ना कि लज्जा, घृणा, भय, जाति, कूल, शील, मान, अभिमान ये सबका त्याग करना है। जैसे कि तो यह सब बैरियर्स जो है ईश्वर आराध ईश्वर प्राप्ति में आत्म साक्षात्कार में ये जितनी भी बैरियर्स थी सब बैरियर्स जैसे कि मां उनके सामने से हटा रही है तोड़ दे रही है। हृदय कहता है कि रात को मामा कभी सोते नहीं थे। ठाकुर उनके मामा हुए तो यह रात को मामा कभी सोते नहीं थे। जब भी मैं ठाकुर के पास में जाता हूं देखता हूं वह भाव में आकर के सतत मां जगदंबा के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। कभी-कभी मैं देखता हूं मां काली के गर्भ गुरु में जाकर के कि मां का हाथ पकड़ कर के ठाकुर गीत गा रहे हैं। भजन गा रहे हैं और कभी-कभी तो वो नृत्य करना शुरू कर देते हैं। जैसे कि सही-सही में एक छोटा बालक है और ये छोटा बालक अपनी मां के साथ में अभिमान करता है। कभी-कभी मां के साथ में झगड़ा करता है। वह जो फेमस कहानी है। ठाकुर ने कहा कि मां का दर्शन जब नहीं मिल रहा था तो मैंने मां को कहा कि तुम यदि अपना दर्शन नहीं दोगी तो यह जो खड़ग है तुम्हारा उससे लेकर के मैं अपना खुद का गला काट दूंगा। तो यह अभिमान बच्चा कब करेगा मां के ऊपर में जबकि उसको यह पक्का पता है कि यह मां वो अभिमान करेगा तो मां उसको जो चाहिए वह दे देगी। जैसे कि वो ठाकुर एक कहानी कहते हैं कि छोटा बच्चा है मां के पास में एक रुपया मांगता है तो भी मां उसके किसी पड़ोसन के साथ में बात कर रही है तो बच्चा रो रहा है जोर-जोर से कि तुम मुझे रुपया दो ही दो मुझे काम है तो फिर मां नाराज होकर के वो जो जहां पर वो सिक्का रखा होता है रुपया रखा होता है वो बॉक्स खोल करके उसमें से एक सिक्का निकाल करके बच्चे को दे देती है। अच्छा ठीक है जाओ यहां से परेशान करते हो। देखिए कि मां को आप परेशान भी करेंगे तो भी आपको मां का आशीर्वाद प्राप्त होगा। मां का कैसे भी करके आपको अटेंशन प्राप्त करना है। स्तवस्त स्तुति करना, अच्छे कार्य करना, अच्छे कर्म करना वो एक तरीका था। किंतु ये दूसरा तरीका है। जैसे कि मां मेरी खुद की मां है। यदि मैं मां को परेशान भी करूंगा, मां के साथ में झगड़ा भी करूंगा, अभिमान भी करूंगा तो भी मां जैसे कि मेरी बात सुनेगी। और देखिए यह तो ठाकुर की जो पूजा

श्रीरामकृष्ण और माँ काली

थी वहां पर उसकी बात हुई। जैसे-जैसे हम कथामृत का पाठ करते जाएंगे वैसे ही हम देखेंगे कि यह मान और अभिमान का जो संबंध जो रिश्ता है ठाकुर ने मां के साथ में मां काली के साथ में किया था जोड़ा था। उसका यह जो राम प्रसाद की यह जो पदावलियां जो है श्यामा संगीत है वह गान गातेगाते ठाकुर के जीवन में कितना सुंदर रूप से यह बनता आता है। यह केशव के सेन के साथ में वह वार्तालाप कर रहे हैं। केशव ठाकुर को कहते हैं कि अच्छा यह काली कितने भावों से लीला करती है वो थोड़ी सी बताइए। तो ठाकुर फिर हंसते-हंसते कहते हैं कि महाकाली, नित्य काली, श्मशान काली, रक्षा काली और श्यामा काली उसमें से श्यामा काली का कोमल भाव है। वरा भयदा दायिनी है। बाकी जो है महाकाली है जैसे कि जो श्मशान काली है उसका वो भयानक भाव रहता है। किंतु श्यामा काली का है वह कोमल भाव है। और फिर यह जो ठाकुर जो राम प्रसाद के जो भजन गाते हैं वह क्या है? श्यामा मां उड़ा छे घड़ी माने यह जो श्यामा मां है वह पतंग चगा रही है आशा वायु भरे उड़े बांधा है माया दड़ी कि आशा रूपी वायु है वो पतंग को उड़ाती है और जो दोरी है वो माया रूपी दोरी से यह पतंग बंधी है काक मंडी गाथा पंजरादी नाना नाड़ी घड़ी शगुड़े निर्माण कोरा कारीगरी बाड़ा बाड़ी विषय मेजे छु मांजा कुरकोशा होए छे दौड़ी घड़ी लखेर दुटा एकटा काटे हशे दाव मा हाथ चापड़ी यह एक के बाद एक पहले तो यह जो आत्म तत्व है उसका वर्णन करते हैं किंतु फिर आखिर में क्या कहते हैं जो एक लाख पतंगे जो मां उड़ा रही है उसमें से एक दो पतंगों को काट देगी और फिर हाथ ताली देती हंसती रहेगी घड़ी लखेर दुटा एकटा काटे हशेदा दाव मा हाथ चापड़ी लाखों पतंगों में से एक दो पतंगों को मुक्त मुक्त करके हंसती हंसती हाथ ताली देती रहेगी। तो यह देखिए कि यह जो मां के साथ में वह आत्मीयता का भाव राम प्रसाद के गीतों में जो है वह ठाकुर किस तरह से अपने ऊपर में आरोप करते हैं। देखिए एक बड़ा ही सुंदर

संतान का जननी पे आक्षेप: गीत: में इस दुःख से दुःख कर रहा हु

गीत है। केशवसेन के साथ में जो वार्तालाप हो रहा था उसी में ठाकुर गाते हैं। मास्टर महाशय क्या लिखते हैं? ठाकुर संसारी का भाव जैसे कि अपने ऊपर में आरोप करके अभिमान करते करते गा रहे हैं। आमी ओई खेदे खेद कोरी तुम माता थक ले आर जागा घरे चोरी मैं इस बात से दुख इस दुख से दुख करता हूं कि तुम माता हो फिर भी मेरे घर में तुम जागृत माता हो जागृत जननी हो इसके बाद में भी मेरे घर में चोरी हुई है मने करी तुम्हार नाम करी किंतु समोय पाशरी मैं सोच रहा हूं कि मैं तुम्हारा नाम कर रहा हूं किंतु बीच-बीच में मैं नाम करना भूल भूल जाता हूं आमी बुझे छ जेने छी आशोय पेए छ ए शोक तोार चातुरी मुझे समझ में आया है मुझे अंदाज हो गया है कि मैं तुम्हारा नाम तो करने का प्रयास करता हूं किंतु वे बीच-बीच में मैं विस्मृत हो जाता हूं। यह सब तुम्हारी चतुराई है। यानी कि देखिए कि अपना जो तमस है या तो फिर अपने मन का यह जो कहेंगे कि एकाग्र नहीं होने की जो यह है प्रॉब्लम सीधा मां के ऊपर में डाल दे रहे हैं यहां पे कि मैं तुम्हारा नाम करने का प्रयास तो कर रहा हूं। किंतु यह जो बाकी हजार विषय में मेरा मन दौड़ा चला जाता है, यह मेरे विल पावर का प्रॉब्लम नहीं है। यह तुम्हारी ही चतुराई है। देखिए कि यह जो आप जनरल साधना जिसको कहते हैं और यह रागात्मिका साधना है। कितना डिफरेंस है। जनरल जो भी साधना है उन सब में ये जैसे कि हमारा विल पावर वेदांत जैसे कि माने कहेंगे कि क्विंट एसेंशियल द वर्ड इज क्विंटसेंशियल क्विंट एसेंशियल कर्म के बेस पर साधना कौन सी है? तो वह वेदांत की साधना है। वेदांत क्या कहता है कि यह षडरिपु है, पंचक्लेश है, यह अष्टपाश है। इन सबको हटाओ और फिर ईश्वर के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करो और एकाग्र करने के लिए आपको विल पावर चाहिए। तो यह विल पावर के माध्यम से मन को एकाग्र जब करेंगे तब आपको ईश्वर प्राप्ति होगी। यह आत्म साक्षात्कार होगा। ये क्विंट एसेंशियल आपका कि कर्म के ऊपर में कर्म का जो सिद्धांत है उसके ऊपर में यह साधना बनी है। किंतु यह जो शक्ति साधना या तो यह भाव साधनाएं हैं वह बनी हुई है एक स्नेह और प्रेम के रिश्ते पे। यहां पे आपको खुद को कर्म यानी कि साधना माने कि विचार करके मेरे मन में से यह सब काम कांचन के प्रति आसक्ति है। उसको दूर करना। यह सब छोटी-मोटी चीजें हैं। यहां पर सबसे बड़ा है ईश्वर के प्रति अनुराग, ईश्वर के प्रति प्रेम। और फिर यह प्रेम और अनुराग और शरणागति और संपूर्ण भरोसा जब आ गया उसके बाद में यदि मैं अपने मन को एकाग्र करने का प्रयास करता हूं और मन एकाग्र नहीं हो रहा है तो मां की गलती है। फिर मेरी गलती नहीं है। मने कोरी तुम्हार नाम करी किंतु समय पाशरी। मैं सोचता हूं कि मैं तुम्हारा नाम कर रहा हूं किंतु बीच-बीच में विस्मृत हो जाता हूं। आमी बुझे छ जेने छ आशय पे छी मैं समझ पा रहा हूं जान पा रहा हूं। अंदेशा हो गया है। ए शो तो चातुरी यह सब तुम्हारी चतुराई है। किछु दिलेले ना पेलेना नीलेना खेलेना शेष की आारी मैं तुम्हारी पूजा कर रहा हूं। किंतु तुमने मेरी पूजा ग्रहण नहीं की। मेरे पास में से कुछ लिया नहीं। या तो फिर मुझे आशीर्वाद नहीं दिया। मैंने जो तुमको खाना खिलाया भोग अर्पण किया तुमने खाया नहीं यह क्या मेरा दोष है मेरी अपवित्रता नहीं है मेरी जो विधि है तुम्हारी पूजा करने की इसका दोष नहीं है जदी दीते पेते नीते खेते दीताम खवाताम तुम्हारी तुम यदि मैं जो ग्रहण करता हूं वो ग्रहण करती तो मैं अच्छे से तुमको खिलाता यह सब तुम्हारी गलती है मेरी गलती नहीं है जोश अपश सुरश कुरश शकल रश तुम्हारी यह यश है अपयश है सुरस है कुरस है जितने भी रस है वह सब रस तुम्हारे हैं रसे के रसो भंगो केनो करो रसेश्वरी तुम रस में रहकर के रस भंग क्यों करती हो रसेश्वरी प्रसाद बोले मन दिए छो मनेरी आंखी ठारी प्रसाद कहता है राम प्रसाद कहता है तुमने जैसे कि आंख मार करके आंखों से इशारा करके यह मन जो मुझे दिए हो तुम्हार सृष्टि दृष्टि पोड़ा मिष्टि बोले घरी यह जो तुम्हारी सृष्टि है जलेगी तुम्हारी सृष्टि जल गई तुम्हारी सृष्टि क्या इससे मुझे लेना देना है यह मैं इसके पीछे में इस सृष्टि के पीछे में जो दौड़ता हूं इसके पीछे में मेरी गलती नहीं है गलती है सब तुम्हारी इसके बाद में

संतान का जननी पे आक्षेप: गीत: तुम आँख लाल करोगी तो भी में डरने वाला नहीं हु

देखिए यह सब एक बार भजन में गाए थे फिर एक है कि जब यह यदुमल्लिक के घर ठाकुर जाते हैं सिंह वाहिनी देवी का दर्शन करते हैं तो दर्शन दर्शन करतेकरते संपूर्ण रूप से समाधि में चले जाते हैं। पहले तो बहुत देरी तक खड़े-खड़े दर्शन करते हैं दोनों हाथ जोड़ के किंतु फिर धीरे-धीरे करके समाधि में चले जाते हैं। और फिर समाधि भंग नहीं हो रही है। भक्त लोग खड़े हैं। भक्तों के साथ में गप लगाने हैं। ठाकुर कहते हैं ना चीनी होते चाहिए ना मां। चीनी खेते चाहिए। मैं शुगर होना नहीं चाहता। मैं शुगर खाना चाहता हूं। ईश्वरी के साथ में एकाकार नहीं होना चाहता। ईश्वरी के साथ में संतान का संबंध रखना चाहता हूं। तो फिर समाधि भंग करने के लिए क्या करना पड़ेगा? तो फिर यह रामलाल जो है वह एक के बाद एक मां काली के भजन गाते हैं और फिर ठाकुर जब होश में आते हैं तो वह भी गाना शुरू करते हैं। देखिए वही अभिमान भरा भाव, वही मां के सामने आबदार, वही मां के साथ में झगड़ा ये सब राम प्रसाद के गीत क्या कहते हैं? मां आमी की आटा छेले। मां क्या में ये आटा से छेले आटा से छेले अर्थात कि जो 9 महीने के बाद में बच्चे का जन्म होता है किंतु ये जो प्रीमेच्योर बच्चे का जन्म होता है 8 महीने में तो वो बच्चा कमजोर होता है वो उसका फिजिकल डेवलपमेंट है मेंटल डेवलपमेंट है वो सब स्टंट हो जाता है तो यहां पर ठाकुर कहते हैं मां आमी की आटा छेले मां क्या मैं आठ महीने में बच्चा हुआ जन्म आठ महीने में जन्मा हुआ बच्चा हूं प्रीमेच्योर बच्चा हूं क्या आमी भोय कोरी ने चोख रांगा ले तुम यदि आंख काो आंख लाल करोगी मेरे सामने तो मैं भय नहीं करूंगा देखिए भय कौन करेगा जो प्रीमेच्योर बच्चा है मेंटली एंड फिजिकली स्टंटेड है वीक है वो भय करेगा तुम मेरे सामने आंख का आंख निकालोगी तुम मेरे सामने आंख लाल करोगी तो मुझे कोई डर फर नहीं लगने वाला है संपद आमार ओई रांगा पद शिव धरेन जा रिद कमले मेरी मेरी संपद क्या है? मेरा धन क्या है? मेरा सर्वस्व क्या है? तो वह रांगा पद वह लाल चरण जिसको कि भगवान शिव ने अपने हृदय पर धारण करके रखा है। आमार विषोई चाहते गले विडंबना कतई छोले मैं कुछ भी चाहता हूं तो फिर कितनी विडंबना होती है। शिबेर दोलील शोई रेखे छ हृदयते तुले मैं तुम्हारे पास में से कुछ भी चाहूंगा बड़ी तुम यह सब यह करोगी तो खड़ी ये सब झंझट वगैरह देखना कि मैंने क्या किया है दस्तावेज बना के भगवान शिव की सही कर दी है और यह सिग्नेचर लेकर के मैंने अपने हृदय में छुपा करके रखी है ए बार करबो नालिश नाथेर आगे डिग्री लो एक शवाले इस बार मैं नाथ के सामने जाकर के कंप्लेन करूंगा नाथ कौन? तो भगवान शिव भगवान शिव के सामने जाकर के कंप्लेन करूंगा। एक सवाल में मैं डिग्री ले लूंगा। आप यदि परीक्षा देंगे यदि आपको डिग्री लेनी है तो कितना सब कुछ लंबा लंबा वो आपका पेपर चलेगा। दो घंटे का पेपर चलेगा। उसमें इतने सारे प्रश्न होंगे फिर वाइवा होगा फिर प्रैक्टिकल होगा। फिर अप्रेंटाइजशिप होगी वगैरह वगैरह कितना सब कुछ किंतु ऐसा नहीं ए बार करबो नालिश नाथेर आगे डिग्री लो एक सवाल है नाथ के सामने जाकर के कंप्लेन करूंगा और एक प्रश्न का उत्तर देकर के मैं डिग्री ले लूंगा जाना वो केमन छले मुकदमा दाढ़ाई ले कैसा लड़का हूं तुमको समझ में आ जाएगा जब तुम्हारे सामने मैं मुकदमा चालू करूंगा जखन गुरु दत्त दस्ताबीज गुजराइबो मिरर चाले यह गुरु दत्त के द्वारा जो दस्ता दस्तावेज मिला है। मुकदमा करना है तो आपको कुछ सबूत भी तो प्रस्तुत करना होगा। तो गुरुदत्त के पास में से यह दस्तावेज मिला है। शिव ने उसके ऊपर सही कही है। यह जब जाकर के कोर्ट में प्रस्तुत करूंगा तब देखना माए पोए मुकदमा धूम होवे राम प्रसाद बोले मां और संतान में मुकदमा होगा धूम मच जाएगी। राम प्रसाद कहता है आमी खंतो होवो जोखो आमा शांतो कोरे लबे कोले मैं शांत खंतो होऊंगा अर्थात कि मैं मेरे मुझे तब मुझे भरोसा होगा तब मैं शांत होऊंगा कब आमा शांत कोरे लबे कोले तुम जब मुझे शांत करके अपनी गोद में उठाओगी तब कहीं जाकर के मैं शांति से बैठूंगा वरना तो तुम्हारे सामने मुकदमा करूंगा और जब हम दोनों के बीच में यह जो देखिए कितना सुंदर लाइन माए पोए मुकदमा धूम होवे राम प्रसाद बोले मां और संतान के बीच में मुकदमा होगा धूम मच जाएगी राम प्रसाद कहता है तो देखिए कि यहां पे कोई भी विधि विधान नहीं है कोई कर्म का सिद्धांत नहीं है मुझे अच्छे कर्म करने हैं मुझे तपस्या करनी है यह जो यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धरणा ध्यान समाधि इसका अनुष्ठान करना है वो सब उड़ गया बस मां के साथ में जैसे कि अतूट प्रेम का रिश्ता जैसे जैसे देखिए एक बड़ा सुंदर

संतान का जननी पे आक्षेप: गीत: नाथ की छाती पे मारती है लात

गीत है यही राम प्रसाद का ठाकुर गाते हैं जार कोलेर काल कोरे प्रणति जारे कालेर काल करे प्रणति मां मां की शुद्ध हुई शिबेर शति मां तुम क्या सिर्फ शिव की सती हो ज कालेर काल करे प्रणति जिसको कि काल का काल है वह उनके सामने जाकर के प्रणति करता है जाकर के उनके सामने नतमस्तक होता है नटावेश शत्रु नाश महाकाश हृदय स्थिति नटावेश शत्रु नाश महाकाल हृदय स्थिति नटाबेश अर्थात के दिगंबरी होकर के महाकाल जिसके हृदय में स्थित है ऐसी यह शत्रुओं का नाश करती है बोलो देखी मौन शेबा के मोन नाथेरबू के मारे लाथी मन देखो कि यह कैसी मां है अपने नाथ के छाती पे यह लाती मारती है अर्थात कि लात मारती है देखिए जनरली कोई भी पत्नी होगी कोई भी स्त्री होगी होगी अपना पति है कितनी जतन पूर्वक सेवा करेगी किंतु यह मां ऐसी नहीं है कैसी मां है अपने खुद के पति की छाती पर लात मारती है यह जो मां काली का जो स्वरूप है देखा होगा कि शिव शब होकर के लेटे हैं और उनके पैर में काली ने पैर रखा है। तो यह अभिमान करके झगड़ा करके रामप्रसाद कहता है कि यह कैसी यह है स्त्री यह कैसी मां है मेरी? अपने खुद के पति की छाती पर लात मारती है। बोलो देखी मोन शेबा के मोन नाथेर बुके मारो लाथी तो एक के बाद एक ऐसे कितने ही

जिस देश में रजनी नहीं वहाँ का एक व्यक्ति मैंने पाया

भजन है और एक है ए बार आमी भो भबे छ भो भाभीर काछे भाव सीखे छ इस बार में ठीक ठीक मैंने सोच लिया है अच्छे से एक भाविक के पास में मैंने भाव सीखा है जे देशे रजनी नाई से देशे एक लोक पे देखिए कितना सुंदर यह है जिस देश में रजनी नहीं है। जिस देश में रात नहीं है। इस देश का एक लोग मुझे मिला है जो कि मां का संसार है। मां के संसार में यह निराशा रूपी हताशा रूपी ऐसी कोई रात नहीं है। यहां पे इसी इस इस तरह का जो देश है इस तरह का जो संसार है वहां का एक आदमी मुझे मिला है। जे देश रजनी नाई से देश एक लोक पेए छ आमी किबा दीबा किबा शंधा शंधारे बंध्या करे छ ये क्या है दिन यह क्या है संध्या यह सब क्या है संध्या को भी मैंने वध्या कर दिया है और फिर और एक गान है देखिए अभय पदे प्राण शपे छ ये अभय पद मां काली के उसके में उसके ऊपर में मैंने अपने प्राणों को दे दिया है आमी की जोमेर भय रखे छ मुझे क्या यम का भय है? काली नाम महामंत्र आत्मर शिखाय बंधे छ यह काली नाम महामंत्र है उसको मैंने मेरी शीर शिखा पर बांध के रखा है देहो बेचे भबेर हाटे दुर्गा नाम किने एनेची देह बेच के भव की हाट में मैंने दुर्गा नाम खरीद लिया है कितना सुंदर यह देह जो है यह भव की हाट है हाट अर्थात कि बाजार और यह भव संसार रूपी यह जो हट बाजार उसमें मैंने अपने देह को बेच लिया है और उसके सामने मैंने दुर्गा नाम ले लिया है और यहां पर मास्टर महाशय लिखते हैं दुर्गा नाम किने एने छी एकथा शून्या पंडित अश्रुवारी विसर्जन करित छ ये शशधर पंडित इतना बड़ा यह पंडित ये वेद वेदांत ये वो सब और जब किंतु ठाकुर ने यह गान ये जो गीत की ये जो लाइन है वो जब गाय गा के सुनाई दुर्गा नाम किने एनची ये पंडित की आंखों में से आंसू निकलना शुरू हो गए। और फिर यह आखिरी गान बड़ी ही सुंदर कली है इसकी गान की। यह एक लाइन है। गान क्या है? काली नाम कल्पतरु हृदय रोपण करे छ। ये काली नाम रूपी कल्पतरु है। इसको कि मैंने हृदय में रोपण किया है। ए बार शमय ए बार शमन एले हृदय खुले देखा ताई बोशयाची। इस बार शमण जब आएगा शमन अर्थात कि यमराज और यमराज जब आएगा मुझे लेने के लिए तब हृदय खुला के दिखाऊंगा कि काली राम कल्पतरु मेरे हृदय में रोपण किया है देह मध्य छजन कुजन तादेर घरे दूर करे छ देह के भीतर में यह जो छ कुजन है बुरे आदमी है छह ये बुरे छह आदमी अर्थात कि षडरीपु उनको घर में से भगा दिया है राम प्रसाद बोले दुर्गा बोले यात्रा कोरे बोशयाची राम प्रसाद कहते हैं कि मैं दुर्गा नाम लेकर के यात्रा करने के लिए प्रस्तुत होकर के बैठा हूं। अर्थात कि मृत्यु भी जब अभी आ जाता है मेरे सामने शमन जब स्वयं आ जाता है। उसको मैं हृदय खोल के दिखा दूंगा कि हृदय के भीतर में मां काली का नाम है और दुर्गा नाम लेकर के मैं यात्रा करने के लिए बैठ के तैयार होकर के बैठा हूं। तो यह है कि एक तो हो गया कि विधि विधान के माध्यम से आप साधना करते हैं और यह है यहां पर कि आप शुद्ध प्रेम, शुद्ध भक्ति, शुद्ध निर्भरता और उसके माध्यम से मान और अभिमान रूपी साधना करते हैं। यह जो वैष्णव भाव का यह जो सर्वोच्च भाव है, यह यहां पे राम प्रसाद और श्री रामकृष्ण ने शक्ति साधना में यहां पे आरोपित किया है। और देखिए यह भाव का डेवलपमेंट मां के जीवन में कैसे होता है। इसको अभी हम कल नेक्स्ट क्लास में देखते हैं। आज की ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: रागात्मिका भक्ति क्या है?

एक है विधिवादी भक्ति वैधि भक्ति तो वैध भक्ति से डिफर करने के लिए एक दूसरा नाम चाहिए तो यह हो गई रागात्मिका भक्ति जैसे कि मैंने कहा ना कि यह भक्ति रसामृत सिंधु है जो कि रूप गोस्वामी ने इसकी रचना की है। तो चैतन्य देव का जो भाव है उसका यह जो एक दार्शनिक एक फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग और एनालिसिस इस किताब में है। तो अभी हम नेक्स्ट जब क्लास होंगे कुछ इसमें हम भाव की ही सब डिस्कशन करेंगे। तो यह जो भक्ति रसामृत सिंधु है। और दूसरा एक है उज्जवल नीलमणि। यह उसकी रचना भी खास करके यह मधुर भाव क्या है? उसके बारे में फर्दर डिस्कशन करने के लिए रूप गोस्वामी ने उसकी उस ग्रंथ की रचना की है। उज्जवल नीलमणि तो उसमें से कुछ-कुछ कोटेशन लेकर के यह भाव साधना क्या है? उसका डेवलपमेंट कैसे हुआ है? और यह वैष्णव परंपरा में से शक्ति परंपरा में इसका यह जो ट्रांसफर कैसे हुआ? खास करके यह राम प्रसाद के जीवन में और फिर ठाकुर ने कैसे उसको डेवलप किया और फिर मां के जीवन में इसका क्या रिफ्लेक्शन है वो वी विल सी फर्दर अहेड इन फर्दर क्लासेस

स्वामी विवेकानंद का आम का पेड़

यह जो आप यदि बेलूर मठ में गए होंगे हमारी स्मृति कथियां कथाएं पढ़ी होगी तो पता होगा कि ये जो चौक है मठ ऑफिस जहां पे है स्वामी जी का कमरा जहां पे है उसके सामने एक आम का पेड़ है तो यह आम के पेड़ के नीचे में एक बेंच के ऊपर में स्वामी स्वामी जी बैठा करते थे। तो फिर अभी वह आम का पेड़ तो बड़ा पुराना हो गया है। बड़ा जतन करके उसको अभी भी मेंटेन किया है। बिलमठ में जाएंगे तो देखेंगे बड़े-बड़े पिलर बना के उसकी डालियों को ये देने के लिए सहारा देने के लिए पिलर बनाए हैं। किंतु फिर हुआ क्या कि ये पेड़ में से कलम करके डालियों को कलम करके बहुत सारे सेंटरों में बांटा गया। तो और सेंटरों में कहा गया कि यह जो पेड़ है वह स्वामी जी का जो आम का पेड़ है उसकी डाली है। तो राजकोट में भी यह डाली आई थी और वहां पर यह आम का पेड़ लगाया गया है। आम का पेड़ बड़ा भी हुआ है और उसके सामने साइन है कि बेलूर मठ में जिस आम के पेड़ के नीचे में बैठकर स्वामी जी बैठते थे वही आम के पेड़ की एक कलम यहां पे यह डाली ये है। उसमें से यह पेड़ हुआ है। तो यह कथामृत में भी यह वर्णन है कि मास्टर महाशय ठाकुर को कहते हैं कि यह पंचवटी का जो वटवृक्ष है उसकी डाली मैं तोड़ कर के अपने घर ले गया हूं तो ठाकुर ने कहा क्यों तो मास्टर महाशय कहते हैं कि एक ऐसा समय आएगा जब यह जगह महातीर्थ हो जाएगी तो ठाकुर हंसते-हंसते पूछते हैं क्या यह पानी हाटी की तरफ महातीर्थ होगा देखिए कि पानीहाटी तू कहां पर छोड़ दे इतना बड़ा महातीर्थ आज दक्षिणेश्वर है तो यह सब वृक्ष पुरुषों की बड़ी महिमा है जिसके नीचे में बैठकर महापुरुष ध्यान किया करते हैं। यह स्वामी जी एक बार आखिरी आखिर में जब योगेंद्र बाबूराम महाराज के साथ में वो टहल रहे थे तब बाबूराम महाराज को वो जगह दिखा के कहा था मैं मर जाऊं तो मेरी चिता यहां पे

भयंकरा काली मातृ काली में कैसे परिणत हुई

जलाना। एक्चुअली मैंने कल बैठकर के काफी रिसर्च किया खास करके कि किस तरह से यह जो कांसेप्ट है ना कि भयंकरा काली किस तरह से मातृभावापन्न काली हुई। तो यह तो समझ में आता है कि वैष्णव भाव में से यह सब आया है। किंतु राम प्रसाद की कुछ-कुछ बड़ी-बड़ी किताबें मैंने डाउनलोड की है। कल मैंने पढ़ी एक वामदेवानंद जी के द्वारा लिखित जो कि उद्बोधन से प्रकाशित हुई है। अपने ही साधु नेम तो बड़ी अच्छी है। शॉर्ट है। किंतु फिर यह जो भाव काट जो डेवलपमेंट है उसके अब जैसे लीला प्रसंग पढ़ेंगे तो ठाकुर के साधनाओं के पीछे क्या फिलॉसोफिकल अंडरस्टैंडिंग है वो मुझे इस तरह से राम प्रसाद के जीवन में जाननी है। तो तीन चार किताबें मैंने अच्छी-अच्छी डाउनलोड की है ओवर ए पीरियड ऑफ टाइम मैं थोड़ा सा स्टडी और फिर यह जो भक्ति रसामृत सिंधु है उज्जवल नीलमणि है चैतन्य महाप्रभु के जीवन में किस तरह से भाव का डेवलपमेंट हुआ यह जो वेदांत का जो डेवलपमेंट है जो कि हम सभी लोग बड़े अच्छे से पढ़ना चाहते हैं। शंकराचार्य के जीवन में फिर उन्होंने जो भाष्य लिखा उसके ऊपर में भाष्य उसके ऊपर में टीका ये जो सब पूरी परंपरा है तो वैसे ही भाव साधना में भी वह परंपरा है तो हमको यदि ठाकुर को समझना है तो यह वेदांतिक परंपरा भी समझनी है और यह भाव परंपरा भी समझनी है तब ठाकुर को हम ठीक- ठीक समझ पाएंगे तभी यह मां के जीवन का क्या तात्पर्य है वह हमको समझ में आएगा क्योंकि जैसे देखिए मैंने कहा ना कि ये जो पूरा क्रोनोलॉजी पढ़ेंगे ना ठाकुर का जीवन अप टू 1886 6 समाप्त हो गया स्वामी जी का 1886 टू 1902 किंतु 1902 से 1920 नियरली 20 ईयर मां का मिनिस्ट्री चला है। सो मां का मिनिस्ट्री आखिर में क्यों स्टार्ट हुआ और फिर उसका सर्व सबसे ज्यादाेंस क्यों है? तो वो शक्ति परंपरा को समझ करके हमको आएगा समझ में

प्रश्न: कभी-कभी हमें लगता है कि भक्ति मार्ग सर्वोत्तम है, कभी-कभी हमें लगता है कि वेदांत मार्ग सर्वोत्तम है। हम इस बात को लेकर भ्रमित हो जाते हैं कि कौन सा मार्ग चुनें।

ना इसका उत्तर वो जो योगेंद्र महाराज ने शरद महाराज को दे दिया तो योगेंद्र महाराज हां योगेंद्र महाराज ने कि नरेंद्र शरद महाराज कंप्लेन करते हैं। नरेंद्र जब जिसके बारे में बोलता है वही सब सबसे बड़ा करके बोलता है। अभी मैं क्या करूं समझ में नहीं आता। वेदांत ज्ञान योग ना कर्म योग ना क्या करूं मैं? तो क्या उत्तर मिलता है? मां के शरण में जाओ सब ठीक हो जाएगा। नहीं ठाकुर कहते हैं ना भक्ति का तमः माने भक्ति का सत्व भी है, भक्ति का रजस भी है और भक्ति का तमस भी है। तो ठाकुर जिस तरह से डिस्क्राइब करते हैं ना हमको लगता है कि भक्ति का तमस ही सबसे ज्यादा श्रेष्ठ मार्ग है। वो लुटारा लुटारे जो होते हैं वो सत्व क्या है? तो एकदम चुपचाप शांत रहता है। उसके घर की मरम्मत नहीं है। वो जो मॉस्किटो नेट के भीतर में बैठकर के वह चुपचाप जप ध्यान करता रहता है। भक्ति का रजस क्या है? तो दिखावा चलता है। वह जो पीतांबरी पहनी है। फिर यह माला दिखा के लोगों को जप कर रहा है। फिर सर के ऊपर में तिलक टाना हुआ है। किंतु भक्ति का तमस क्या है? तो जैसे कि ये जो डाकू लोग जो होते हैं वो जब डकैती करने के लिए जाते हैं तो कैसे चिल्लाते हैं? मारो काटो। तो वैसे ही ये डकैत वाला भाव लेकर मां के पास में जाना है। तुमको दर्शन देना ही होगा। वरना तो मैं अपना ही गला काट दूंगा।

प्रश्न: कभी-कभी हमें ठाकुर पर श्रद्धा नहीं होती, क्योंकि हमें विश्वास नहीं होता कि वह हमें आध्यात्मिक आशीर्वाद दे सकते हैं।

देखिए यह बात हम सबको अच्छे से पता है कि ठाकुर ने नरेंद्र को अद्वैत साधना करने के लिए तैयार किया और ठाकुर का वो जो विज़न भी है कि एक भक्त जाकर के देखता है कि यहां पे एक सब एक ओर सब साकारवादी भक्त बैठे हैं। दूसरी ओर है यह निराकारवादी नरेंद्र जैसे कि एक चारों ओर लाल लाइट जल रही है। उसके बीच में नरेंद्र ध्यानस्थ होकर के बैठा है। और जो साकारवादी भक्त हैं जैसे ही जाकर के नरेंद्र को देखते हैं वहां से भाग खड़े होते हैं। तो यह अद्वैत भाव साधन के लिए नरेंद्र का जो एलिजिबिलिटी है वो इट इज द बेस्ट ऑफ द बेस्ट। यह बात बहुत अच्छे से पता है हम सबको। किंतु साथ में ही देखिए कि यह मधुर भाव साधन जो है उसके लिए भी ठाकुर ने जैसे कि नरेंद्र को एलिजिबल समझा है। आखिर आखिर के समय में एक दिन की बात है कि नरेंद्र ठाकुर के सामने सा निराकार भाव का भजन गा रहे थे। ठाकुर ने इमीडिएटली कह दिया कि अरे यह तो नीचे का भाव है। यह सब क्यों? तो फिर जाकर के नरे ने यह सखी भाव का मधुर भाव का भजन गाना शुरू किया और ठाकुर बड़े खुश हो गए। तो यहां पर दिखाता क्या है? जो अद्वैत भाव का एलिजिबल है वही मधुर भाव के लिए एलिजिबल है। क्यों? क्योंकि यह प्रचंड जो तपस्या है वह तो चाहिए ही चाहिए। किंतु साथ में कंप्लीट कन्विक्शन भी चाहिए। यह कन्विक्शन नहीं होगी तो फिर वह सब भावों में जाएंगे तो पैर फिसलेगा। आप कर सकते हैं वह साधना किंतु फिर वो देह भाव आ जाएगा, काम भाव आ जाएगा। तो यहां पे यह बात यह पहले तो यह इंसिडेंट कि साकार भाव का भजन गा रहे हैं। ठाकुर ने इमीडिएटली कहा अरे वो तो नीचे का भाव है। तो स्वामी जी ने मधुर भाव का भजन गाना शुरू किया। स्वामी जी को बखूबी पता है कि शायद यह जो निराकारवादी साधना है, अद्वैत साधना जो है उसके उससे भी ज्यादा यह बड़ा भाव है। किंतु जब स्वामी जी अमेरिका से लौटे भारत में तो बार-बार कहते हैं कि यह जो पिछले कितने सदियों से भारत में यह जो रोना-धोना चलता रहा है, यह मधुर भाव चलता रहा है। बोलकर के पूरी प्रजा कमजोर हो गई है। क्या नगारे नहीं बनते हैं इस देश में? शिव के भाव से त्याग के भाव से अपने को भर दो। तो यहां पर स्वामी जी हमको यह त्याग का भाव, शिव का भाव, अद्वैत भाव का आराधना करने को कहते हैं। वहां पर ठाकुर के पास में ऐसा खुद मधुर भाव सीखे हैं। राइट? तो नेचुरली है कि उसके लिए जो मैच्योरिटी है मधुर भाव के लिए या तो फिर यह जो भाव साधना के लिए विधिवादी भक्ति और यह रागात्मिका भक्ति यह कर्म के सिद्धांत पे बनी भक्ति और यह कर्म को पार करके बेआईनी यह जो कहता है ना कि गिरीश घोष ठाकुर को कहता है अपनार सब किशु बेआईनी आइन अर्थात कि कानून और जो बेआईनी अर्थात कि गैर कानानूनी आपका सब कुछ गैरकानूनी है तो यह जो कानूनी भक्ति और यह गैरकानूनी भक्ति। सो गैरकानूनी भक्ति के लिए आपको वह सॉलिड कन्विक्शन चाहिए, सॉलिड त्याग चाहिए। तभी यह होगा। अब जैसे कि यहां पर गंभीरानंद जी कहते हैं कि जब मां संतान का प्रसव होता है तो शिशु जैसे अपनी मां को मां के भीतर में ही पूरा विश्व देखता है। वही मां ही उसका लालनपालन कर रही है, स्नेह कर रही है, खिला रही है सब कुछ। किंतु फिर साथ में कहते हैं कि यह जो भाव है ना यह भाव हमको ईश्वर पर ट्रांसप्लांट करना होगा। यह हम सक्सेसफुली कर पाएंगे कि फिर वह बातों की बातें रह जाएगी। वो देखना है हमारा मां के साथ में तो इंस्टिंक्टिवली भाव है। किंतु क्या ईश्वरीय के साथ में ईश्वरी के साथ में देवी के साथ में शक्ति के साथ में क्या वो हृदय से वो भाव बनेगा कि हम सिर्फ बातें कर रहे हैं। सो वो एक देखने वाली बात है। अब अब जैसे एक उदाहरण है इसका कि गिरीश घोष गिरीश घोष का ठाकुर के प्रति जो था एक कि इतना सरेंडर था इतना शरणागति था कि ठाकुर को वो गाली भी देते थे ठाकुर हंस के सब कुछ स्वीकार भी कर लेते थे अभी ऐसा ही कुछ दूसरे भक्त ने आ करके करना चाहा ऐसा कुछ कह सोचा कि गिरीश घोष का मैं भी अनुकरण करता हूं मैं भी जाकर के ठाकुर के साथ में झगड़ा करता हूं ठाकुर ने इमीडिएटली उसको मना कर दिया कि गिरीश घोष का वो भाव है वो तुम्हारा नहीं है। उसकी जो शरणागति है, उसकी मेरे पे जो श्रद्धा है, तुम्हारी नहीं है। तुम इस तरह से झगड़ा-वगड़ा मत करो। तो मेरे ख्याल से यह दाना काली ने करने चाहा होगा। मुझे नाम याद नहीं है या तो नाम लिखा नहीं है। व्हाटएवर

प्रश्न: क्या रागात्मिका भक्ति केवल ठाकुर तक सीमित थी या अन्य सभी साधकों में भी यह अवस्था थी?

देखिए जिसको कि आध्यात्मिक वेदांत में जिसको मुमुक्षुत्व कहते हैं। वो मुमुक्षुत्व है जय इज़ अ इंटेंस डिजायर टू एटेन एनलाइटनमेंट। या तो फिर एटेन ए हायर गोल इन आवर लाइफ। सो मुमुक्षुत्व कैसे भी प्रकाश हो। अभी भगवान बुद्ध के जीवन में आप देखेंगे कि जो प्रचंड तपस्या की वो मुमुक्षत्व नहीं होती तो कैसे होती? नहीं खाना खाए बिना कितने दिन वो हाथ में जितना आएगा उतना ही खाएंगे फल मूल या इतना ही कुछ खाएंगे तो इस तरह की तपस्या करना वो तो स्ट्रांग डिजायर फॉर एनलाइटनमेंट नहीं होने से नहीं होगा। सो उनके जीवन में यह इस तरह से मैनिफेस्ट हुआ है। ठाकुर के जीवन में मुमुक्षुत्व इस तरह से मैनिफेस्ट हुआ है। मुमुक्षत्व आपको चाहिए। स्ट्रांग मुमुक्षत्व चाहिए। हाउ इट मैनिफेस्ट इन डिफरेंट साधका इट्स डिफरेंट अभी जैसे कि यह है रामप्रसाद रामप्रसाद का जो लाइफ में कल पढ़ रहा था एक बार घर जाता है वो वहां पे उसने क्या किया है उन्होंने कि एक पंचमुंडी आसन बनाया है किसी एक एकांत जगह पर वहां पर बैठकर के ही दिन रात तपस्या करते रहते हैं बीच-बीच में घर जाते हैं अभी पत्नी भी है बच्चे भी हैं तो एक बार घर गए चे बच्चों का चेहरा देख करके पता चला कि इतने मायूस होके बैठे हैं भूखे बैठे हैं घर में खाने को कुछ नहीं अभी वो पिताजी है तो वह तो दया तो होगी ना तरस तो आएगा इनके ऊपर में तो बड़े मायूस हो गए खुद रामप्रसाद सोचे अरे मैं वहां पर तपस्या कर रहा हूं यहां पे मेरे बच्चे भूखे मर रहे हैं कुछ तो मुझे करना चाहिए उनके लिए तो कुछ करने का प्रयास तो करते हैं किंतु जो पंचमुंडी आसन बिठाया है वहां पर मां जैसे कि उनका इंतजार कर रही है वो आकर्षण इतना स्ट्रांग है कि उनके खुद के बच्चे भूखे मायूस बैठे हैं रो रहे हैं उनको छोड़कर के फिर से वहां पर चले जाते हैं तपस्या करने के लिए। सो यह जो देखिए यह जो संसार का बंधन है यह आत्मीय का प्रेम है। इतना बड़ा यह मायाजाल है जिससे छूटना मैंने कोई-कोई लड़कों के साथ में बात होती है। मेरी किसी किसी भक्त के साथ बात होती है। कहते हैं महाराज हम भी साधु हो जाते हैं। हमको कोई काम कांचन से त्याग हो या उसके प्रति आकर्षण हो ऐसा नहीं है। किंतु मां-बाप को छोड़कर कैसे जाए? तो यह देखिए कि आध्यात्मिक जीवन में आपका मान लीजिए काम कांचन त्याग कर दे। किंतु यह जो आपका कर्तव्य है या तो फिर आपका प्रेम है वह कभी-कभी नहीं छोड़ता है आपको। सो उसको छोड़कर के आप ईश्वर की आराधना करते रहे करते दैट रिक्वायर वेरी स्ट्रांग डिजायर फॉर अटेनिंग गॉड और एनलाइटनमेंट। इसको कहते हैं मुमुक्षुत्व। फिर वह कित जितने भी साधकों को आप देखेंगे कि वह जैसे कि सामने से चलकर के उन्होंने यह सब कष्ट वरण किया है तो इस सबके पीछे में यह है। आप 7

प्रश्न: स्वामीजी अपने लिए एक बेहतरीन करियर बना सकते थे और अपने परिवार की देखभाल भी अच्छे से कर सकते थे। लेकिन उन्होंने अध्यात्म का मार्ग चुना। 9 सितम्बर को सफल होने से पहले उन्हें कितने मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा होगा, क्योंकि उन्होंने अपने परिवार की देखभाल नहीं की।

साल की तो बात छोड़ दीजिए। आपने जैसे कहा नाइंथ सप्टेंबर उसी दिन का आप देखिए कि वहां पर स्टेज पर बैठे हुए हैं। उनको बार-बार बुलाते हैं कि स्वामी योर टाइम हैज़ कम। आपका टाइम आ गया। आप बोलिए अभी। किंतु मन के भीतर में क्या चल रहा है। पांच से छह बार उन्होंने मना कर दिया खड़े होकर बोलने के लिए। आखिर में पता नहीं कैसे क्या कुछ क्लिक हो गया। खड़े होकर के बोलना शुरू किया एंड द हिस्ट्री वाज मेड। तो माने अप टू द नाइंथ सप्टेंबर इटसेल्फ पांच से छह बार इनविटेशन देने पर भी कि आइए बोलिए टाइम हुआ है आपका। वो नहीं स्वीकार कर रहा है। तो क्या चलता होगा? जस्ट इमेजिन। स्वामी जी ने एक बार कहा था कि वह आसाम के किसी चाय के बगीचे में मैनेजर की नौकरी मिली है। वहां पर चला जाऊंगा। यह सब छोड़ दूंगा। तो छूटा कुछ नहीं। उनको हावर्ड यूनिवर्सिटी में वो ईस्टर्न फिलॉसोफी का चेयर देने वाले थे। आजकल किसी को देंगे तो अपने देश को बेच के वो बैठ जाएगा वहां पे। कंपेयर टू देखिए कंपेयर टू ठाकुर ने लीला लीला प्रसंग तो कथामृत जब पढ़ेंगे ना अपनी खुद की साधनाओं के बारे में कितना सब कुछ विवरण है पूर्व कथा तीर्थ यात्रा पर गए थे साधना का वर्णन ये हलधारी के साथ में कृष्ण किशोर के साथ में यह जो सब उनका वार्तालाप कितनी बातें उन्होंने की है। सो इट नॉट नेसेसरी कि आप अपने बारे में बोलेंगे तो इट विल बी कंसीडर नार्सिसिज्म ऑल द टाइम नॉट नेसेसरी। मैं मिट्टी पे गिर करके अपना जो चेहरा है मिट्टी में रगड़ता था। चेहरे पर खून बहता आता था। मां का दर्शन नहीं मिलता था। तो जो व्याकुलता मेरे मन में होती थी। स्वामी जी ने इस तरह से कभी नहीं कहा। स्वामी जी ने कुछ कुछ वर्णन किए हैं। लीला प्रसंग पढ़ेंगे तो स्वामी जी के कुछ-कुछ वर्णन मिलते हैं कि जब वो ठाकुर ने टच कर दिया, स्पर्श कर दिया। वो जो मजाक कर रहे हैं ना कि घटी भी ब्रह्म है, बाटी भी ब्रह्म है। तो ठाकुर ने उनको स्पर्श कर दिया तो सब कुछ जैसे कि ब्रह्ममय दिखने लगा। तो वो कहते हैं कि वो जो ये जो सलाखें होती है ना उसके ऊपर मैं अपना सर भी पटकता था तो कोई दर्द नहीं होता था। रास्ते से जा रहा था। घोड़ा गाड़ी आ रही है। अपने को बचाने के लिए मैं जंप भी नहीं लगाता था। सो कुछ-कुछ कहा है। बट कम म ऑब्वियसली कि 39 इयर्स की जो उनकी लाइफ है उसमें भी ये ठाकुर का साथ में उनका जो साक्षात्कार हुआ 81 से लेकर के यह 1902 उसमें उनका इतने वेरिड इतने कॉम्प्लेक्स इतने भव्य उनको जो सब अनुभूतियां हुई है उसका वन परसेंटेज भी उन्होंने हमको नहीं बताया। दैट इज ट्रू। वह जो लेक मिशिगन के किनारे मोस्ट प्रोबेबबली यह जो थाउजेंड आइलैंड पार्क में वहां पर बैठकर एक दो पेड़ के नीचे बैठे हैं। कहते हैं एक बार कि एकाएक मेरा मन ब्रह्म की ओर जाने लगा। किंतु फिर यह ठाकुर ने ही जैसे वो कहा था ना कि तुमका ताला लगा दिया है। चाबी मेरे पास में है। कर्म संपूर्ण नहीं होंगे तब तक निर्विकल्प समाधि नहीं होगी। तो फिर से मेरा मन नीचे आ गया। तो वह जो जब उठ रहा होगा ऊपर में तो वह क्या अनुभूति होगी यह तो बताया ही नहीं है वो उसमें से सीधा माने यह हो गया ना कि यह मेवा मिठाई को स्केप करके सीधा आपको वो रोटी दाल दे दिया भोजन में जा जाते हैं वो जो भोजन समारोह में तो आपको पता है कि वो बर्फी भी होगी यह मोहन थाल भी होगा ये बहुत कुछ होगा किंतु आपके पास में लेके आते हैं सिर्फ दाल और रोटी तो कैसा लगेगा हमको

प्रश्न: वेदांत कहता है कि समय एक भ्रम है। अन्यथा वाल्मीकि ऋषि रामायण को उसके घटित होने से पहले कैसे लिख सकते थे? इसलिए किसी तरह ठाकुर की लीला अभी भी चल रही है!

ना माने आप यह सिर्फ फिलॉसोफी िकल स्पेककुलेशन की बात नहीं है। दिस इज़ अ सॉलिड साइंस। दो तरह से पहले तो जो क्वांटम डायनेमिक्स कहता है टाइम इटसेल्फ इज़ ए डायमेंशन माने रिलेटिविटी और क्वांटम डायनेमिक्स। अकॉर्डिंगली ये जो सब एटॉमिक पार्टिकल है दे फ्रीली ट्रैवल बैक एंड फोर्थ इन टाइम। ये तो एकदम माने सॉलिड मैथमेटिकल और एंपेरिकल फाउंडेशन पे प्रूव हो चुका है। सो दैट इज़ दैट दूसरा कि आप कहेंगे ना ठाकुर की लीला आप नजरों से देख सकते हैं। इट इज़ एंटायरली पॉसिबल। क्यों? क्योंकि लाइट ट्रैवल करती है 3 लाख कि.मी. पर सेकंड की स्पीड से। तो अभी बेस्ड ऑन दैट आप गिन लीजिए कि आज से ठाकुर की लीला को 150 साल के इतना हुआ है। तो आप आकाश में चले जाइए। 150 साल में लाइट कितना ट्रैवल करेगी? 3 लाख कि.मी. पर सेकंड के हिसाब से कैलकुलेशन करके वहां पे चले जाइए। दूरबीन से देखेंगे। ठाकुर की सभी लीलाएं आपको दिखाई देगी। दिस इज़ एंटायरली पॉसिबल। तो देखिए हम सूरज को आज सूरज को देखते हैं वो 8 मिनट देरी से देखते हैं क्योंकि सूरज का जो लाइट है पृथ्वी पे आते 8 मिनट लगता है। ये जो तारों को देखते हैं तीन लाइट ईयर दूर है। उसका अर्थ क्या है कि ये प्रकाश को आते-आते तीन साल लगते हैं। आज जो तारा देखते हैं वो 3 साल पहले का है। ये हम एक कहते हैं कि ये बड़ा दूर का तारा है। 1 मिलियन ईयर लाइट ईयर उसका डिस्टेंस है। उसका अर्थ क्या है? आज से 10 लाख पहले जो तारा था वो देख रहे हैं। आज उस तारे के साथ में क्या है? कुछ पता नहीं। 8 मिनट पुराना सूरज दिखता है। आज यदि सूरज इस समय ब्लास्ट हो गया हमको 8 मिनट के बाद पता चलेगा कि सूरज में ब्लास्ट हुआ है। मल्टीप्लाई बाय ना 150 साल बाय मल्टीप्लाई बाय आप कितना सेकंड होती है 150 साल में वो गिन लीजिए और प्रत्येक सेकंड के 3 लाख कि.मी. गिन लीजिए। उतना दूर चले जाइए। फिर वो टेलीिस्कोप से देखिए ना। किंतु ये साइंस की दृष्टि से मतलब साइंस की दृष्टि से भी दिस इज पॉसिबल। वेदांत की दृष्टि से तो सब कुछ पॉसिबल है ही है। इवन फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ साइंस। देखिए सूरज का डिस्टेंस कितना है? उसको हम कहेंगे 8 लाइट मिनट्स। आठ लाइट मिनट दूर है। यानी कि प्रकाश को आते-आते 8 लाइट मिनट लगता है। यदि आप ठाकुर की लीला देखना चाहते हैं तो पृथ्वी से आप 150 लाइट ईयर दूर चले जाइए। फिर वहां से टेलिस्कोप से देखेंगे क्लियर दिखाई देगा क्या हो रहा है पृथ्वी पे।

प्रश्न: ठाकुर के दर्शन भी टाइम मशीन थे। उन्होंने देखा कि यीशु की नाक मुड़ी हुई है।

थ्री डिस्क्रिप्शन है, तीन डिस्क्रिप्शन है ना। मतलब जीसस के बारे में तीन डिस्क्रिप्शन है कि जीसस ऐसे दिखते थे। उसमें से एक डिस्क्रिप्शन ऐसा है कि उनकी नाक चपटी थी। ना ये आप वृंदावन किस तरह से आविष्कार हुआ। यह जो जितने भी चैतन्य महाप्रभु के जो थे रूप सनातन गोस्वामी वो वृंदावन गए। उस समय तो वो जंगल ही था। किसी को पता ही नहीं कहां पे क्या लीला हो रही है। भाव की दृष्टि से खोज रहे हैं। यहां पे यह लीला हुई है। यह निधुवन है। यह यहां पे यह लीला, यह वर्षा, यहां पे श्रीमती का जन्म हुआ। यह तो सब भाव की दृष्टि से खोज खोज करके वृंदावन लीला के सब स्थान ठीक किए गए। वरना वो कितने हजारों साल पहले हुआ। सब विस्मृत हो चुका है। यह अपने नरसी मेहता की कहानी कि वह अपनी भाव की दृष्टि से वृंदावन लीला देखते हैं और फिर उसके ऊपर में भजन बनाते हैं। यह देखिए यह जो ब्रेक हो गया था ना यह भारत हिंदू धर्म के इतिहास में कि एक तो था सत्ययुग या तो या तो फिर कहेंगे वैदिक युग जो कि यह सत्ययुग, त्रेता युग और द्वापर युग तक चला था। किंतु फिर एक लंबा कलिकाल चला। यह बुद्ध के आने के बाद में यह सब हम सब विस्मृत हो गए थे। फिर यह जो क्लासिकल हिंदूइज़्म फिर से जागृत हुआ। यहां पे यह भक्ति मूवमेंट स्टार्ट हुआ। चैतन्य महाप्रभु का वगैरह का यहां पे यह वेदांत मूवमेंट फिर से स्टार्ट हुआ। शंकराचार्य ने उसका प्रारंभ किया। तो यह हमारे पुराने तीर्थ स्थान, हमारी पुरानी कहानियां, हमारे पुराने जो संत महापुरुष, अवतार सबको जैसे कि पुनरुद्धार करना पड़ा था। थे सब कुछ थे। किंतु बीच में हम लोग सब भूल गए थे। तो ये पुनरुद्धार जो भी हुआ अभी शंकराचार्य ने भाष्य और टीका लिखी तो ये फिलॉसोफिकल जो विजन उनका था तो वेदव्यास ने आकर के उनको दर्शन दिया क्योंकि वेदव्यास से जो परंपरा त्रुटी थी उन्होंने फिर से उसको प्रारंभ किया। तो दिव्य दर्शन दिव्य चक्षु से देखकर के उन्होंने ये दर्शन को उद्धार किया। फिलॉसोफी को यहां पर उन्होंने तीर्थ क्षेत्र को उद्धार किया। सो दिस इज एंटायरली मतलब यह मॉडर्न हिंदूइज़्म पूरा चला आ रहा है ऐसा। देखिए यह एक बड़ा सुंदर डायलॉग है कथामृत में वो स्वामी जी का जो जैसे रैशनलिस्टिक माइंड है कि वृंदावन लीला हुई ही नहीं है। किसने कहा हुई क्या प्रूफ है? तो ठाकुर कहते हैं देखो तुम शायद यह ना मानो कि वृंदावन लीला हुई वास्तव में नहीं हुई है। ऐसा तुम यदि मानते हो तो भी ठीक है। किंतु तुम जिसके मन के भीतर में ये लीला हुई है। जिस कवि ने इसकी कल्पना की है तो उसके मन में तो यह हुई है ना। वहां पर तो एटलीस्ट ये लीला का अस्तित्व है। यानी कि इस डायलॉग को थोड़ा सा यदि हम एक्सटेंड करें कि रूप और सनातन गोस्वामी जो कि वृंदावन में जाकर के वो जो सब तीर्थ स्थान उद्धार कर रहे थे। हो सकता है नरेंद्र का जो रैशनलिस्टिक एक्सप्लेनेशन यहां पे ले कि वृंदावन लीला वही वर्षा में श्रीमती का जन्म हुआ था। क्या प्रूफ है? शायद नहीं हो सकता है। किंतु फिर रूप और सनातन गोस्वामी या तो यह इनके मन में तो यह सब लीलाएं हुई है। उसका भी तो एक अस्तित्व है। राइट? नरसी मेहता ने हां नरसी मेहता ने वो जो रास लीला रास लीला हुई कि नहीं प्रूफ नहीं है। नरसी मेहता ने जो दर्शन किया नरसिंह मेहता के मन में जो रास लीला हुई वो तो मतलब उसका तो अस्तित्व है। दैट मच एटलीस्ट वी कैन एक्सेप्ट

प्रश्न: हम कैसे कह सकते हैं कि जो हम अपनी भौतिक आँखों से कहते हैं वह सत्य है और जो हम दर्शन की दृष्टि से देखते हैं वह गलत है.

रेदर कि यह जो चर्म चक्षु से जो दिखता है, दैहिक चक्षु से जो दिखता है, वही सही है। और मानस चक्षु से जो दिखता है, वह गलत है। ऐसा हम कैसे कह सकते हैं? वो जो किसान की फेमस कहानी ठाकुर कहते हैं रात को सो गया था दिन में उठा तो उसकी बीवी रो रही है तो कहा क्यों रो रही हो तुम्हारा बच्चे का मृत्यु हुआ तो ये किसान रो नहीं रहा है तो बीवी पूछती है तुम इतने कठोर हृदय हो बच्चा मर गया है रो नहीं रहे हो तो वो क्या कहता है मैं अपने सपने में राजा हुआ था तीन सुंदर राजकुमार थे अब ये सपना टूट गया अभी मैं क्या वो तीन राजकुमार के लिए रोऊं ना कि एक लड़के के लिए रोऊं किसान के बच्चे के लिए रोऊं क्या सही है यह सही है ना कि वो सही है किंतु देखिए कि ज्ञान और भक्ति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दिस इज द ब्यूटी ऑफ़ रामकृष्ण लिटरेचर। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य। यहां पे कोई हार्ड एंड फास्ट नहीं है कि यहां पे आपका हमारा ऑर्गेनाइजेशन का यह फिलॉसोफी आपको इसी को स्टिक हो के रहना है। दिस एंटायर स्पेक्ट्रम इज देयर। आपकी नेसेसिटी के अनुसार, आपकी एलिजिबिलिटी के अनुसार, आपकी पोजीशन के अनुसार। अभी मैं थक गया हूं। अभी मेरा वो वेदांत साधना करने का कैपेसिटी नहीं। तो थोड़ा सा मैं अभी ये देवलोक है। यहां पे एक महाराज कल किताब पढ़ रहे थे देवलोक बोल के वो इंग्लिश में पढ़ रहे थे। उसका ओरिजिनल बेंगली है देवलोक। अपूर्वानंद जी ने लिखा है शिवनंद महाराज जब प्रेसिडेंट थे उस समय के सब घटनाओं का वर्णन है बेलूर मठ का। एक के बाद एक सुंदर घटनाएं चलती जाती है। तो महाराज मुझे कल कह रहे थे मुझे पढ़कर के इतना शांति मिलता है। मैंने कहा इसको मैंने टीसी में पढ़ा था देवलोके को और इतना सुंदर किताब है। वेरी गुड। अभी देखिए अब रात को जब मन थक जाता है उस समय आप यदि यह विवेक चूड़ामणि खोल के बैठेंगे या तो स्वामी जी का यह राजयोग खोल के बैठेंगे तो सर पर कोई हथौड़ा मार रहा है ऐसा लगेगा उस समय ये देवलोक के जो अपूवानंद जी ने लिखा है इतना सुंदर है। सो अर्ली मॉर्निंग आप मंगल आरती के बाद में आते हैं योर माइंड एंड बॉडी बोथ आर फ्रेश। उस समय आप वो वेदांत पढ़िए। सो

शिवानन्द महाराज की एक कहानी

यही शिवनंद जी की एक घटना है। एक जगह पर गए तीर्थ यात्रा में तो वहां पर एक लोकल साधु बड़ा पंडित था तो महापुरुष महाराज के साथ में वाद विवाद करने के लिए सोचा कि मैं महापुरुष महाराज को हरा दूंगा रामकृष्ण मिशन के प्रेसिडेंट है तो मेरा नाम हो जाएगा। तो ऐसा कुछ वेदांत का कोई विचार करने के लिए चर्चा करने के लिए आया डिबेट करने के लिए। तो महाराज महापुरुष महाराज के साथ में एक दूसरे साधु थे हमारे तो उन्होंने कहा कि देखो तुमको सिद्धांत वाक्य सुनना है ना तो महापुरुष महाराज के साथ बात करो और वाद विवाद करना है तो मेरे साथ में करो [हंसी]