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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्राणों की पुकार || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 6 Jan 2025

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन इस सप्ताह फिर से हम प्रारंभ करेंगे हमने देखा हमने जिस तरह से रामकृष्ण संघ का इतिहास और अपनी यह जो 10 की हिस्ट्री है श्री राम कृष्ण देव के जन्म से लेकर के श्री राम कृष्ण देव का मंदिर जो कि बेलूरमठ में कंसेक्रेट हुआ 1836 से लेकर के ठाकुर की जन्म शताब्दी 1936 तक की यह जो 100 साल की हमारी यात्रा है उस यात्रा में हमने देखा था कि एक गोल्डन एज है वैसे तो श्री रामकृष्ण देव श्री रामकृष्ण संघ और यह श्री राम कृष्ण भाव प्रवाह इसमें जितने भी दिन हम बिताएंगे जहां से भी प्रसंग लेंगे वह चाहे ठाकुर के कामर पुकुर के दिन हो कि ठाकुर की साधना के दिन ना कि ये वराह नगर के दिन ना कि वह जयराम बाटी कोवाल पाड़ा के दिन श्री मां शारदा देवी के साथ में ना कि फिर यह राजा महाराज या तो महापुरुष महाराज प्रेसिडेंट है व कि बेलूरमठ में हम रह रहे हैं कोई भी हिस्ट्री का कोई भी एक पार्ट आप लेके देखिए इंस्पिरेशनल घटनाओं से आध्यात्मिक प्रवाह से प्रत्येक क्षण यह भरा हुआ है यदि वह अरूपानंद जी महाराज है अपूर्वानंद जी महाराज स्वामी महापुरुष महाराज के शिष्य शिष्य उनके थे एट पता नहीं मुझे किंतु उनके सेवक थे तो उन्होंने बड़ी ही सुंदर किताब लिखी है देवलोक तो यह देवलोक पुस्तक या तो फिर यह महापुरुष महाराज की प्रेसिडेंसी कब से स्टार्ट हुई तो 19 22 ना 23 उस समय जब राजा महाराज का राजा महाराज ने महासमाधि ग्रहण की थी उसके बाद में महापुरुष महाराज रामकृष्ण संघ के परम पूजनीय परमाद रूप से वर्ण हुए थे हमारे प्रेसिडेंट हुए थे तो वहां से लेकर के वह उनकी उनकी खुद की महासमाधि तक यह 1933 34 की बात होगी कि महापुरुष महाराज ने खुद ने समाधि ली तो यह देखिए कि इवन उन नों की जब आप बात करें तो देवलोक के पुस्तक में इतना सुंदर वर्णन है इतनी सुंदर घटनाएं हैं महापुरुष महाराज जी के साथ में इतने सुंदर वार्तालाप है कि आप कह नहीं पाएंगे कि यह राजा महाराज थे जब बेलूरमठ में न की मां थी जयराम बाटी में वह आज नहीं है तो हमको अभी एक एक ऐसा लग रहा है कि ऐसा स्पिरिचुअल अभी कोई नहीं है ऐसा हमको नहीं लगेगा तो यह 100 साल की हानी प्रत्येक क्षण प्रत्येक दिन कोई भी महीना कोई भी साल ये 100 साल में से उठा केर देख लीजिए वो आध्यात्मिकता से भरपूर रहेगा ही रहेगा ठाकुर मां और उनके पार्षद सन्यासी पार्षद स्वामी विवेकानंद से प्रारंभ करके यह लाटू महाराज हो फोका महाराज हो इन सबने हमारे संग की भावधारानी और यह 100 साल की कहानी है 1836 से लेकर के 1936 तक की यह पूरी इन लोगों की आध्यात्मिकता से भरी हुई है ठाकुर है मां है स्वामी जी है अन्य सन्यासी पार्षद है इन सब की घटनाएं इन सबके प्रसंग इन सबके उपदेश यह 100 साल में बिखरे पड़े हुए हैं जहां से भी हम जो दिन लेना चाहे जो घड़ी लेना चाहे जो मिनट जो सेकंड लेना चाहे ये पूरे 100 साल में से देखेंगे कि वह आध्यात्मिकता से भरपूर होकर के ही हमारे हाथ में आएगी उसके बारे में चिंतन करना है उसके बारे में मनन करना है उसके बारे में हमको अनु दन करना है हम सिर्फ यह नहीं सोचेंगे कि हां मैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में रह रहा हूं हम यह भी तो एक कल्पना कर सकते हैं कि राजा महाराज बेलूर मठ में है और वहां पे मैं भी बेलूर मठ में उनके साथ में रहने के लिए गया हूं यानी ये 100 साल का जो पीरियड है पूरा आध्यात्मिकता से भरपूर है तो इवन ये जो प्रचंड आध्यात्मिकता का प्रवाह ये शताब्दी के दौरान जो बहा है उसमें भी यदि हमको गोल्डन एज यानी कि सुवर्ण युग सिलेक्ट करने को कहा जाए तो वो कौन सा होगा वो सुवर्ण युग होगा जहां पे कि ठाकुर मां और सभी सन्यासी पार्षद एक के बाद एक आकर के एक साथ में जहां पर रह रहे हैं वो वो होगा सुवर्ण युग क्योंकि देखिए कि एक समय था कि कामर पुकुर की जब कहानी हम देखते हैं तो ठाकुर अकेले थे जयराम बाटी की जो शुरू की कहानियां देखेंगे तो मां अकेली थी उसके बाद में भी ठाकुर की महासमाधि के बाद में देखेंगे कि स्वामी जी थे राजा महाराज थे मां थी किंतु फिर ठाकुर नहीं थे स्वामी जी की महासमाधि के बाद में देखेंगे कि स्वामी जी अब नहीं रहे हैं किंतु एक ऐसा कौन सा पीरियड है जबकि ठाकुर मां स्वामी जी अन्य सभी पार्षद गुरु भाई एक साथ में रह रहे हो एक साथ में साधन भजन तपस्या आध्यात्मिकता जैसे कि फुंवारे की तरह वहां पर चारों ओर बारिश की तरह चारों ओर गिर रही हो तो वो गोल्डन एज या वो तो फिर सुवर्ण युग कहा जाएगा दक्षिणेश्वर के वो दिन इसके बाद में शोड़ी पूजा के माध्यम से ठाकुर ने धर्मचक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया उन्होंने सबको आह्वान दिया कि तुम सब भक्त कहां हो आओ और फिर भक्तों का आगमन अंतरंग भक्तों का आगमन प्रारंभ हुआ देखिए ऐसा नहीं है कि यह मां के आने से पहले ठाकुर के भक्त नहीं थे या तो फिर ठाकुर के पार्षद कोई नहीं पार्षद नहीं उनके शिष्य कोई नहीं थे ऐसा तो नहीं है बहुत सारे शिष्य ट्रेडिशनल पंडित या तो साधक गण ठाकुर के पास में आते थे किंतु फिर साधना कर ठाकुर के पास में से साधना सीखने के बाद में वह दक्षिणेश्वर से चले जाते थे क्योंकि उनके जीवन का एम था हेतु था उनके खुद की मुक्ति उनके खुद के जीवन में ईश्वर प्राप्ति की वा वांछना तो फिर वासना यही उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था किंतु जब ये मां के आगमन के बाद में जिन पार्षदों का जिन शिष्यों का आगमन हुआ उनका कैटेगरी बिल्कुल डिफरेंट था वे लोग सिर्फ यह नहीं चाहते थे कि उनकी खुद की मुक्ति हो उनके जीवन का सबसे बड़ा एक यूनिकनेक्ट के रूप में देखा था अभी ऐसा नहीं है कि शश दर पंडित या तो गौरी पंडित ये जो ट्रेडिशनल साधक ठाकुर के पास में आते थे या या तो इवन भैरवी ब्राह्मणी या तो फिर इवन तोतापुरी जिन ठाकुर के गुरु होने के बावजूद जिन्होंने ठाकुर के पास में से बहुत कुछ सीखा उनकी अपूर्ण आध्यात्मिक साधना जिन्होंने ठाकुर के माध्यम से पूर्ण की ये लोग ठाकुर को रिस्पेक्ट नहीं करते थे ऐसा नहीं है किंतु उन सब में और मां के आगमन के बाद में आए हुए भक्तों के बीच में एक बड़ा तफावत है एक बड़ा डिफरेंस है वो वो क्या है जो पहले आने वाले ट्रेडिशनल साधक थे ईश्वर प्राप्ति ट इज सम वेर एल्स ईश्वर कोई अलग है ठाकुर से ठाकुर को अवतार भी चाहे घोषित कर दिया भैरवी ब्राह्मणी ने किंतु ठाकुर के प्रति जो संपूर्ण शरणागति अपने अहंकार को संपूर्ण निर्मूल करके श्री राम कृष्ण देव के पाद पद्म में शरण लेना संपूर्ण रूप से जैसे कि उन्हीं श्री राम कृष्ण मय हो जाना ऐसा वो नहीं कर पाए थे जो कि बाद के पार्षद ने किया ये नरेण फिर लाटू फिर यह बाबूराम योगेन शशि शरद सुबोध काली यह सबका देखिए कि उन्होंने सिर्फ यह नहीं सोचा कि हमको आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करनी है या तो फिर हमको ईश्वर प्राप्ति करनी है इन सबसे परे जाकर के उन्होंने श्री राम कृष्ण देव के पाद पद्म में शरणागति ग्रहण की श्री राम कृष्ण देव जब और ये जो शरणागति है ये शरणागति उनको एक संघ बद्ध करने में सक्षम हुई ठाकुर का जदी ये पहले के डिसाइल और बाद के डिसाइल में यही अंतरंग और बहिरंग जैसे कि ठाकुर कहते थे और इवन अंतरंग भक्तों का भी आगमन जो प्रारंभ हुआ उसमें भी फिर दो कैटेगरी हो जाती है एक तो भक्त थे जिन्होंने सोचा कि हां श्री राम कृष्ण देव ने हमको स्पर्श कर दिया है हमको आशीर्वाद दे दि दिया है तो इसी से अपना काम हो गया हम उनके श्री चरणों में संपूर्ण शरणागत हो गए तो इसी से अपना काम हो गया और फिर दूसरा कैटेगरी त्यागी भक्तों का था जिन्होंने सोचा कि नहीं श्री राम कृष्ण देव को संपूर्ण रूप से आत्म समर्पण किया है किंतु श्री राम कृष्ण देव ने ही कहा है कि आपको साधना करनी है आपको तपस्या करनी है तो देखिए कि एक तो बहिरंग भक्त जो कि पहले ठाकुर के पास में आ आते थे बाद में भी आते रहे हैं एक और दूसरे थे अंतरंग भक्त यह दो मेजर कैटेगरी और अंतरंग भक्तों में भी त्यागी भक्त और गृहस्थ भक्त तो इस तरह से हमारे पास में भक्तों की तीन कैटेगरी होती है बहिरंग भक्त जो कि अपनी खुद की आध्यात्मिक साधना पूर्ण करने के लिए ठाकुर के पास में आए ठाकुर के उपदेश को ग्रहण किया और अपनी साधना पूर्ण करने के लिए उन्होंने बाद में व से जाकर के अपनी साधना में पूर्णता हासिल की तो वो हो गए बहिरंग अंतरंग की बात सिर्फ यह नहीं है कि साधना को पूर्ण करना है साधना के चरम शिखर पर आरूढ़ होना है बात यह है कि अपने को संपूर्ण रूप से श्री राम कृष्ण देव को समर्पित कर देना है और अंतरंग भक्तों में भी गृही भक्त और बाद में तपस्वी सन्यासी भक्त तो यह डिवीजन जो हुआ तो अभी देखिए कि ये सब कुछ अंतरंग भक्तों का आगमन श्री राम कृष्ण देव उनके साथ में नृत्य कर रहे हैं भजन गा रहे हैं कीर्तन गा रहे हैं उनके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं हंसी मजाक कर रहे हैं वह कितने सुंदर दिन थे मां के आगमन से सड़सी पूजा से यह जो दिन प्रारंभ होते हैं तो ठाकुर के गले के कैंसर तक यह अपना सुवर्ण युग चलता है 100 साल की हिस्ट्री में यह हमारा वर्ण युग है 18725 उसके ग्रीष्म ऋतु में ठाकुर को गले का रोग प्रारंभ हुआ अभी देखिए कि हमने पिछली बार डिस्कस किया था कि ठाकुर के गले का जो रोग प्रारंभ हुआ उसमें एक की इवेंट कौन सी है यह जो सुवर्ण युग है सुवर्ण युग के प्रारंभ की सबसे इंपोर्टेंट घटना कौन सी थी तो वो थी शशी पूजा जैसे कि शोशी पूजा से सुवर्ण युग प्रारंभ हुआ है तो फिर ये सुवर्ण युग का अंत कौन सी घटना से आया ऐसी कौन सी की इवेंट थी जिससे कि हमको पता चले कि हां अभी यह सुवर्ण युग का सूर्य अस्ताचल की ओर बह रहा है बढ़ चला है श्री राम कृष्ण देव ने लीला संवरण करने की ओर कदम आगे बढ़ाना शुरू कर दिए हैं तो वो कौन सी घटना थी हमने देखा कि वो घटना थी पाणी हाटी का महोत्सव ठाकुर और बहुत सारे भक्त उनके नौका में बैठ कर के पाणी हाटी गए और वैसे तो सबको थोड़ा अभी ठाकुर के गले का दर्द तो प्रारंभ हो ही गया है वैद्य कविराज ने पहले ही कह दिया है कि बार-बार भाव समाधि में जद आप जाएंगे तो गले का दर्द बढ़ जाएगा तो ठाकुर जाने से पहले ही चौक अन्ने थे सावधान थे भक्त लोग बड़े सावधान थे कि ठाकुर के ऊपर में ठाकुर को ऐसी परिस्थिति में ना ले जाए कि ठाकुर के मने वो तो ट्रिगर होता है ना भाव तो कुछ भी देख कर के ट्रिगर हो जाता है तो एक अन्य तरह के चरित्र वाली स्त्री को देख कर के ठाकुर को एकदम यह हो गया कि अच्छा मां तुम तुम भी इस वेश में खड़ी हो यहां पर तुम इस वेश में यहां पर खड़ी हो ऐसा बोलकर के उनको भाव हो गया था तो ठाकुर को कब यह भाव ट्रिगर होता है यह सब कहना मुश्किल होता है किंतु कर क्या सकते हैं यह भाव को ट्रिगर करने वाली जितनी भी यह सब इवेंट्स है जैसे कि नृत्य कीर्तन य ईश्वर का नाम उन सबसे ठाकुर को दूर रखा जाए बोलकर के पाणी हाटी ले गए किंतु हमने देखा कि कैसे एक ढोंगी बाबा जी आकर के बड़े नाटकीय अंदाज से उन्होंने नृत्य कीर्तन चालू किया और इसको देख कर के ठाकुर का जो भाव ट्रिगर हुआ तो फिर उसी भाव से फिर उन्होंने भी इस तरह से सिंह विक्रम के साथ में नृत्य करते कर करते कीर्तन करना प्रारंभ किया तो वो दिन की पूरी घटना हमने देखी फिर जब ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस आए तो पता चला कि दूसरे ही दिन से उनके गले का दर्द बहुत ही ज्यादा बढ़ना शुरू हो गया है उसके बाद में सभी भक्तों ने ठीक किया कि यदि ठाकुर को दक्षिणेश्वर में रखते हैं तो यह वैद्य कविराज को यहां पर लेके आने की एक समस्या रहती है ये लोग को कता समय बड़ा मूल्यवान रहता है और ये यात्रा बड़ी लंबी है कलकाता से आजकल की तरह व एक मींस ऑफ ट्रांसपोर्ट इतने इजली अवेलेबल नहीं थे कि फटाक करके वह कोलकात्ता से दक्षिणेश्वर आ जाए हालांकि गंगा में आप आ सकते हैं किंतु यदि ठाकुर को यदि कोलकात्ता लाकर के रखा जाए तो उनकी सेवा में सुविधा होगी सभी गृहस्थ भक्त बारी-बारी से वहां पर आकर के सुपरविजन करेंगे और फिर यह त्यागी संतान है वो वहीं पर रह जाएंगे उनकी सेवा करने के लिए लिए अभी ये जो प्लान बाद में डेवलप हुआ था किसी ने पूछा ये किसने मास्टर महाशय ने कि किसी ने हां मास्टर महाशय ने ही जब डॉक्टर सरकार को मास्टर महाशय लेने को जाते थे रेगुलर कंसल्ट करने को जाते थे उस समय डॉक्टर सरकार ने मास्टर महाशय को पूछा था कि आप लोग उनकी सेवा किस तरह से करते हैं तो मास्टर महाशय ने कहा था कि यह जो उमर में जो बड़ा है वडील है ऐसा एक गृहस्थ भक्त एक एक दिन की सेवा का सुविजन करेगा और जो सेवा इट सेल्फ जो करनी है वो यह त्यागी संतान है वे लोग करेंगे और मां शारदा देवी ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करेगी पथ्य या तो फिर डाट प्रस्तुत करेगी तो इस तरह की एक अरेंजमेंट हो गई थी किंतु वो अरेंजमेंट को क्रिस्टलाइज होने में फलीभूत होने में थोड़ा सा समय लगा था शुरू शुरू में जब यह कैंसर प्रारंभ हुआ डॉक्टर ने किसी ने कहा होगा कि यहां पे आइए या तो फिर भक्तों ने सोचा होगा कैसे भी करके यह निर्णय लिया गया सर्वप्रथम ठाकुर को कलकाता में एक घर में राखला पहले तो एक घर भाड़े लिया गया और ठाकुर को वहां पर लाया गया किंतु ठाकुर तो यह मुक्त आबोहवा में बड़े हुए हैं कामर पुकुर में भी और दक्षिणेश्वर में भी आस ऊपर में खुला आसमान है और चारों ओर यह हरियाली है वगैरह है और यह छोटा सा घर घर छोटा नहीं होगा किंतु बंधिया ज जैसा था तो उसकी वजह से इमीडिएट ठाकुर ने कह दिया कि मैं इस घर में नहीं रह पाऊंगा और वह इमीडिएट पैदल चल कर के बलराम बसु का घर पास में ही था तो उसके घर में चले गए कुछ दिन वहां पर रहने के बाद में कुछ दिन ना कि इस तरह से एगजैक्टली टाइम देखना पड़ेगा फिर वहां से ठाकुर के लिए श्याम पुकुर जो अभी आज जो श्याम कुकुर बाड़ी करके जिसको हम पहचानते हैं उसको भड़े पे लिया गया और उसके कुछ समय के बाद में काशीपुर गार्डन हाउस को भाड़े पर लिया गया था तो यह कैंसर का प्रारंभ और ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ होती है सुवर्ण युग का अंत आता है तो अभी जो हम पाठ करेंगे श्री मा शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित चैप्टर का नाम है प्राण टान अर्थात की अंतरात्मा का आकर्षण तो फिर अंतर का आकर्षण तो इस चैप्टर में हम देखते हैं कि ठाकुर के कैंसर के प्रारंभ होने से क्या-क्या घटनाएं होती है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं सुखे दुखे दक्षिणेश्वर दीन गुली बेश काटते छीलो सुख में दुख में दक्षिणेश्वर के दिन बड़े ही सुंदर रूप से बीत रहे थे किंतु विधि बाम होई ले किंतु विधि या तो फिर ये अपना फेट उसने और एक तरह से मुश्किल खड़ी की बाम होलेन यानी कि उसने और एक तकलीफ खड़ी की 1885 क्रिस्टा ब्द जून मास श्री श्री ठाकुरे कंठ रोगे सूत्रपात होए 1885 1885 के जून महीने में ठाकुर के गले के रोग का सूत्रपात हुआ प्रारंभ हुआ अतः पर रोग दुश चिकित्सा दु चिकित्स एवं कोलकाता नाथा किले सदा सर्वदा उपयुक्त डॉक्टर कबीराज पावा असंभव जानिया भक्त बृंद स्थिर रीले ज ठाकुर के कोलकता आया राखा होई जैसे ही कैंसर प्रारंभ हुआ वैसे ही जैसे एक के बाद एक कविराज ने आकर के ठाकुर के परीक्षण करके निरीक्षण करके जो एक निदान देना शुरू किया ग्रहणी रोग ऐसा एक किसी ने कहा और जब किसी को पूछा गया एक डॉक्टर को कि क्या यह रोग इसका कोई समाधान है कि नहीं क्या इसका आरोग्य लाभ हो सकता है कि नहीं तो उस डॉक्टर ने कोई भी उत्तर नहीं दिया था ठाकुर खुद समझ गए थे डॉक्टरों के समझने से पहले ठाकुर को ही एक तरह का अंदाज आ चुका था कि अभी ये उनका उनकी लीला पृथ्वी पे उनकी लीला मनुष्य देह में उनकी लीला अभी अदृश्य होने वाली है और श रामकृष्ण देव सूक्ष्म रूप से भक्तों के हृदय में प्रकट होने वाले हैं तो वह ठाकुर को पता चल गया था और भक्तों को भी धीरे-धीरे पता चलना शुरू हो गया था सभी लोग बड़े ही चिंतित हो गए थे और इसके लिए ठीक किया गया कि ठाकुर को कोलकाता में लाकर के रखा जाए और जिससे कि यह कविराज है वैद्य है डॉक्टर है उनको आने जाने में सुविधा हो चिकित्सा में सुविधा हो ठाकुरो ई विषय समत होले ठाकुर भी उसी बात में सहमत हो गए तदनुसार बाग बाजारे दुर्गा चरण मुखर्जी स्ट्रीट एक खानी खुद्रो बाटी भाड़ा लया ठाकुर के कोलकाता आना होलो इसके अनुसार बाग बाजार में दुर्गा चरण मुखर्जी स्ट्रीट यानी कि शेरी में एक छोटी सी एक छोटा सा घर को भाड़े लेकर के ठाकुर को कलकाता लाया गया घर छोटा था और हमको पता है ठाकुर किस तरह से रिएक्ट करेंगे किंतु दक्षिणेश्वर भागीरथी तीरे काली बाटी प्रशस्त उद्याने मुक्त बायु ते थाकी ते अस्तो ठाकुर ई स्पायन गृहे प्रवेश करयाई बास कोरीते पारी ब ना बोलिया तत कणा पद ब्रजे रामकांत बशु स्ट्रीट बलराम बाबू भवन चलिया गले किंतु छोटा सा घर था दक्षिणेश्वर में कालीवाड़ा में प्रशस्त उद्यान में रहने को व्यस्त ठाकुर को जैसे ही छोटे घर में लाया गया इमीडिएट उन्होंने कह दिया कि मैं यहां पर नहीं रह पाऊंगा और ऐसा बोल कर के ही वहां से चल कर के पैदल चल कर के पास में ही रामकांत बसु स्ट्रीट में बलराम बाबू के घर जिसको कि हम भक्त लोग बलराम मंदिर कहते हैं उनके घर चले आए ई हार पर एक सप्ताह मध्य श्यामपुकुर स्ट्रीट अवस्थित गोकुल चंद भट्टाचार जर बैठक खाना भवन ताहर बासर जनन भाड़ा लेवा होलो इसके एक सप्ताह के बाद में ठाकुर वहां पर बलराम बाबू के घर पर एक सप्ताह रुके थे इसके बाद में ही श्याम पुकुर स्ट्रीट में अवस्थित गोकुल चंद्र भट्टाचार्य का बैठक खाना उस उस समय ठाकुर के रहने के लिए भाड़े पर लेना हुआ एवं अश्विन शेषे अक्टूबर प्रारंभ है और अश्विन मास के आखिर में अक्टूबर के प्रारंभ में ठाकुर को वहां पर लाकर के सुप्रसिद्ध डॉक्टर महेंद्र लाल सरकार चिकित्सा किछु दिन राखा होलो ठाकुर वहां पर आए और सुप्रसिद्ध चिकित्सक महेंद्र लाल सरकार की चिकित्सा के आधीन कुछ समय रखा गया अभी जिन लोगों ने श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ किया है उनके लिए यह महेंद्र लाल सरकार एक बड़े ही मने एक नॉन फिगर जिसको इंग्लिश में कहते हैं उनको हम इजली पहचान जाएंगे जिन्होंने कथामृत को पढ़ा है क्यों क्योंकि महेंद्र लाल सरकार का ऐसा था कि वो आते ते आते तो थे ठाकुर की चिकित्सा करने के लिए किंतु फिर ठाकुर की जो ठाकुर का जो आध्यात्मिक प्रवाह है उससे आकर्षित होकर के वहीं पर बैठे रहते थे घंटों के घंटों ठाकुर के साथ में वार्तालाप करते थे महेंद्र लाल सरकार के साथ में ठाकुर के जो वार्तालाप है उसका अपना एक सौंदर्य है उसका अपना एक इंपॉर्टेंस है महता है रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में यहां पे थे महेंद्र लाल सरकार एक पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित एक तरह से कहा जाए तो नास्तिक एक व्यक्ति अभी नास्तिक कैसा जैसे हमने पहले भी डिस्कस किया था हिडन नास्तिक बहुत सारे लोग होते हैं वे लोग ऐसा नहीं कहेंगे कि ईश्वर नहीं है या तो फिर ईश्वर गलत है या तो फिर ईश्वर के बारे में जो बातें चल रही है व गलत है उनको हृदय से कोई विश्वास नहीं होता है ईश्वर के ऊपर में और ईश्वर के लिए कुछ भी करेंगे नहीं ये ऐसी बात हो गई जैसे हमने पहले भी डिस्कस किया था कि एक चोर है एक कमरे के सामने एक बड़े महल के सामने रह रहा है अभी यदि उसको पता चले कि महल के भीतर में सोना महर है वो कैसे भी करके कितनी ही मेहनत करके दरवाजा तोड़ कर के वो सोना मोहर चोरी करके लाएगा किंतु जब तक ये चोर को यह विश्वास ना हो हो कि इसके भीतर में सही सही सोना मोहर है वो दरवाजा तोड़ने की चोरी करने की मेहनत क्यों करेगा तो हम सभी लोगों में हम मान तो लेते हैं ऊपर ऊपर से कि हां भगवान है किंतु एक कन्विंसिंग हम ईश्वर प्राप्ति के लिए साधना नहीं करेंगे इसीलिए हमेशा ये एक्सक्यूज हम देते रहते हैं अभी विद्यार्थी हूं तो सबसे पहले मुझे अपना विद्याभ्यासम दो इसके बाद में अभी मैं नया-नया गृहस्थ हुआ हूं तो मेरे बीवी बच्चों के भविष्य के लिए माता-पिता के भविष्य के लिए कुछ मुड़ी एकत्र कर लेने दो ये भविष्य का कुछ बैंक बैलेंस फिक्स डिपॉजिट इन्वेस्टमेंट यह सब मुझे पहले कर लेने दो फिर वृद्धावस्था हुई तो पहले ऐसा होगा कि ये बच्चे हैं मेरे बच्चे नाती नातन इन सबके भविष्य के लिए लड़के और पोतों के भविष्य के लिए मुझे कुछ करना पड़ेगा फिर जब एकदम शरीर अचल होना शुरू हो जाता है फिर लगता है कि अरे इतनी वृद्धावस्था में क्या होने वाला है नेक्स्ट टाइम जब जद यदि धर्मा सही है हिंदू धर्म तो कहते हैं कि दूसरा जन्म होगा तो दूसरे जन्म में देख लिया जाएगा ऐसा हम हमेशा आध्यात्मिक साधना को टालते रहते हैं क्यों क्योंकि मुंह से तो बोलते हैं ईश्वर है किंतु भीतर में कोई कंविद लाल सरकार किंतु उनको मुंह से भी ईश्वर के अस्तित्व के बारे में या तो फिर जिस तरह से ठाकुर को अवतार बोल कर के गिरीश घोष घोषित करते थे उसके सामने वो मुंह पर आर्गुमेंट करते थे वो और आर्गुमेंट भी बड़ी इंटेलेक्चुअल बड़ी सुमधुर आर्गुमेंट थी तो कथामृत पढ़ने से वह सब हमको पढ़ने में आता है एक बार वो वहां पर बैठे हैं आर्गुमेंट कर रहे हैं महेंद्र लाल सर का तो ठाकुर पूछते हैं उनको कि यदि इतना अविश्वास है तो क्यों आते हो यहां पर तो महेंद्र लाल सरकार क्या पूछते कहते हैं पता है कि महाशय समझ में नहीं आ रहा कि मैं आपकी चिकित्सा के लिए आता हूं जो कि 1015 मिनट में समाप्त हो जाएगी और मैं चला जा सकता हूं किंतु फिर भी छ सात घंटे तक मैं यहां पर बैठा रहता हूं मेरा दूसरा जो यह दूसरे पेशेंट को देखना है यह सब मैं नहीं देख पाता हूं मेरे बिजनेस में नुकसान नुकसान हो रहा है मेरी ये प्रैक्टिस में ये मैं मुंह से आर्गुमेंट करता हूं किंतु मेरे आचरण से पता नहीं चल रहा है आपको कि मेरे मन का क्या भाव है तो देखिए कि इवन ऐसे महेंद्र लाल सरकार का भी धीरे-धीरे करके ठाकुर ने हृदय परिवर्तन करना शुरू किया था महेंद्र लाल सरकार कहते थे डॉक्टर सरकार ठाकुर को कि आपको गले का रोग है और किसी के साथ बात नहीं करनी है किंतु मैं जब आता हूं तो मेरे साथ में सिर्फ आपको अकेले बात करनी है सिर्फ मेरे अकेले के साथ बात कीजिए और किसी के साथ बात मत कीजिए तो यह थे डॉक्टर सरकार उनकी चिकित्सा वहां से प्रारंभ हुई थी किंतु यहां पर और एक इंपोर्टेंट टॉपिक है जिसका डिस्कशन गंभीरानंद ंद जी महाराज करते हैं हमको लगेगा कि अच्छा जैसे कि गिरीश घोष है गिरीश घोष का यहां पर एक ऐसा मानना था कि ठाकुर एक तरह की एक लीला कर रहे हैं उनके रोग के माध्यम से इस इस रोग की लीला के माध्यम से वो कलकत्ता आए हैं उनको एक बहाना चाहिए था कलकाता आकर के रहने का और भक्तों को इकट्ठा करने का भक्त लोग जब संघ बद्ध हो जाएंगे आपस में एक अटूट प्रेम का बंधन उनके बीच में आज आके बसे तब ठाकुर जैसे कि ये लीला के द्वारा स्वीकृत रोग को भी वो फेंक देंगे और आराम से फिर दक्षिणेश्वर चले जाएंगे जैसे वह पहले थे वैसे ही वह रह जाएंगे यह गिरीश घोष और उनके जैसे भक्तों का मानना था और दूसरी ओर स्वामी जी का मानना था स्वामी जी ने अपने गुरु भाइयों को यह कहना शुरू कर दिया था कि हम मुझे लग रहा है नरेण कहता है मुझे लग रहा है कि परमहंस महाशय अभी उन्होंने देह त्याग करने के बारे में ठान लिया है अभी मुझे लगता है कि वह महासमाधि की ओर जा रहे हैं उन्होंने खुद ने ऐसा निश्चय किया है महासमाधि की ओर जाने का तो आओ हम सब इस मौके का लाभ उठा कर के ठाकुर के यह जो कुछ अंतिम दिन है पृथ्वी के ऊपर में हम लोग भी प्रचंड साधना कर ले जीवन में जो प्रात व्य है ईश्वर का दर्शन ईश्वर का आशीर्वाद या तो फिर आत्मज्ञान में संस्थिता कर ले जब तक ठाकुर का देह रहता है और नरेंद्र ने अपने गुरु भाइयों को लेकर के महा तपस्या में डूब कर के दिन निकालना शुरू किया तो ठाकुर इस तरह से ठाकुर के रोग को लोग किस तरह से देखते थे उनके भक्त उसमें ये दो डिवीजन है अभी देखिए कि ये भक्तों की दृष्टि से ठाकुर की दृष्टि से क्या ठाकुर खुद इसके बारे में क्या सोचते थे ठाकुर ने एक बार कहा था जब उनकी बीमारी बढ़ गई थी काशीपुर में नहीं कि कहीं पे मुझे लग रहा है कि अभी यह देहन नहीं रहेगा उस दिन सभी लोग चिंतित हो गए थे किंतु वो तो कैंसर होने के समय की बात है कैंसर होने के पहले ठाकुर ने अपने महाप्रयाण के लिए क्या-क्या इंगित दिए थे क्या-क्या उन्होंने निशानियां दी थी कौन सेकन से ये दिए थे अ कि इस तरह की घटना होगी इस तरह की घटना होगी तो मान लेना कि मेरे अंतिम दिन नजदीक आ गए हैं तो यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ठाकुर अपने खुद के महाप्रयाण के बारे में क्या कहते हैं वह बता रहे एकद के श्री मां दक्षिणेश्वरी शी चरम दुखेर दन गोली काटा ते लागले देखिए कल तक तो ऐसा था कि ठाकुर वहां पर दक्षिणेश्वर में है ठाकुर अपने कमरे में है मां नौबत में है भले ही चाहे प्रतिदिन मां ठाकुर कु के दर्शन ना कर पाती हो कभी खाने का समय है आहार लेकर के थाली लेकर जाना है वही मां ठाकुर के दर्शन का एक मौका पाती थी वो मौका भी कभी-कभी कोई भक्त मां के हाथ में से थाली लेकर के या तो फिर जैसे हमने डिस्कस किया मां खुद थाली उनके हाथ में दे देती थी और यह गोलाप मां वगैरह भक्त लोग ठाकुर के पास में आहार लेकर के जाते थे वो दर्शन भी मां को दुर्लभ होता था किंतु एटलीस्ट उनो साथ-साथ में तो रह रहे हैं जद आप दक्षिणेश्वर दर्शन करने के लिए गए होंगे तो आपको पता होगा कि ठाकुर का कमरा और मां का कमरा बस दोनों सामने सामने ही है ज्यादा कोई अंतर नहीं है तो भले ठाकुर का दर्शन प्रतिदिन ना हो किंतु ठाकुर के साथ में तो रह रही है ठाकुर की सेवा तो कर रही है भले ही चाहे दूर से करें भले ही चाहे अदृश्य रूप से करें ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करना वस्त्र ठाकुर के वस्त्र कौन धोता था कपड़े कौन धोता था ये अभी इसका तो मैंने कहीं पर विवरण नहीं पाया किंतु मैं अनुमान करके कर ले समझ लेता हूं अनुमान करता हूं कि ठाकुर की जो भी व्यक्तिगत सेवा होगी सभी ज्यादातर तो मां ही करती होगी तो देखिए कि ठाकुर का दर्शन नहीं हो रहा है किंतु ठाकुर की सेवा का मौका तो मां को मिल रहा है किंतु जैसे ही ठाकुर को चिकित्सा के लिए वहां पर कलकत्ता ले जाया गया मां के हाथ में से यह जो आखिरी मौका था ठाकुर की सेवा करने का वो भी जैसे कि छीन लिया गया कुछ समय के लिए मां को वहीं दक्षिणेश्वर में ही रुकना पड़ा था बाद बाद में फिर उन्होंने सोचा समझ लिए भक्त गण ठाकुर को वहां पर ले जाक के कि नहीं उनकी सेवा यानी कि उनके लिए आहार प्रस्तुत करना वगैरह यह त्यागी संतान भी नहीं कर पाएंगे बाकी सब अभी गृहस्थ जो शिष्य है वो ओवरऑल सुपरविजन करेंगे ठाकुर की व्यक्तिगत सेवा ये त्यागी संतान गण करेंगे किंतु पथ्य प्रस्तुत करना डायट या तो आहार प्रस्तुत करना वो सब कुछ कुछ बातें हैं वो तो मा कर पाएगी बोलक के उन्होंने फिर जाकर के मां को आमंत्रण दिया मां को विनती की कि आप आइए ठाकुर की सेवा के लिए और फिर मां वहां पर गई कलकाता तो वो किंतु बाद में शुरू में तो कुछ दिनों मां को दक्षिणेश्वर में ही रहना पड़ा था और बड़े ही दुख कष्ट के यह दिन मां के कि ठाकुर की सेवा से उनको वंचित रहना पड़ा था श्री रामकृष्ण निकट नाई तहर सेब सुजो रुद्ध आ प्रति खण मने उदी तो होई र अशुभ भविष्यत वाणी देखिए किसी परिस्थिति में माथी श्री राम कृष्ण पास में नहीं है उनकी सेवा का सुयोग जो है वह रुद्ध हो गया है बंद हो गया है और प्रति क्ण मन में ठाकुर की वही अशुभ वाणी वही अशुभ भविष्यवाणी चक्कर काट रही है मां के देखिए ऐसी यह जो परिस्थिति होती है ना कि आपके पास में काम कुछ नहीं है और ऐसी अशु शुभ घटना होने वाली है ऐसी आशंका है इन दोनों का मिलन हो जाना बड़ा ही भयावह है मानसिक स्वास्थ्य के लिए मान लीजिए आपको कुछ अशुभ होने वाला है ऐसी आशंका है किंतु आप अपने को कार्य में जब तक व्यापत करके रखेंगे तब तक यह अशुभ भविष्य घटना आपके मन को ज्यादा असर नहीं पहुंचा पाएगी क्योंकि आप अपने कार्य में व्यस्त है किंतु कार्य नहीं है कर्म नहीं है सेवा का भार जो ठाकुर का मां के ऊपर में था वो लिया गया है विधि ने य अपने ये जो ईश्वर ने जैसे कि मां के पास में वही एक जो मुख्य कार्य था मां का वही छीन लिया है और यह अशुभ भविष्यवाणी जो कि ठाकुर ने अपने अंतिम समय के बारे में की थी अपने महाप्रयाण के बारे में की थी वह भविष्यवाणी अभी सतत मां के मन में चक्रवाद की तरह एक अशांति का सृजन कर रही है ठाकुर ने क्या कहा था कंठ रोग होई बार चारी पांच वसर पूर्वे ठाकुर श्री श्री माता ठाकुरानी के बोलिया छले कंठ रोग होने के चार पा साल पहले ठाकुर ने श्री श्री माता ठाकुरानी को कहा था जखन जार तार हाथे खाव जब मैं हर किसी के हाथ से खाऊंगा कोलकाता रात काटा कलकाता में मैं रात्रि वास करूंगा और खबार अग्र भाग काके दिए बाकी टा निजे खा और खाने का अग्रभाग में और किसी को देकर के बाकी का मैं आहार करूंगा तो खन जान में देहो रखा कोरी बार बेसी देरी नाई तब समझना कि शरीर जाने में महाप्रयाण में अभी ज्यादा देरी नहीं है ठाकुर ने तीन लक्षण प्रदर्शित किए हैं सूचित किए हैं वो लक्षण जैसे ही प्रारंभ होंगे प्रगट होना शुरू होंगे वैसे ही समझ लेना कि मेरे महा समाधि के दिन नजदीक आ गए हैं वो तीन लक्षण कौन से हैं जब जो कोई भी ले आक के जो कोई भी खाना खिलाएगा वह ठाकुर खा लेंगे कलकत्ता में रात्रि वास करेंगे और अपने खुद के आहार का अग्र भाग और किसी को खिला करके बाकी का आहार वो करेंगे तब ये तीन लक्षण जब प्रदर्शित होते हैं प्रकट होते हैं तब समझ लेना कि महाप्रयाण के दिन बस अभी सामने आकर के खड़े हो ही गए हैं तो अभी गंभीरानंद जी महाराज बताते हैं कि किस तरह से पिछले कुछ समय से यह तीनों लक्षण धीरे-धीरे करके प्रकट होना शुरू हो गए थे मां देखती थी मां को याद था ठाकुर की यह भविष्यवाणी मां को याद थी और मां यह जो सब भविष्यवाणी जैसे कि फलित हो रही है मां अपनी नजर के सामने देखती थी और मन में ही मन में समझ ली थी माने कि हां अभी ठाकुर के अंतिम दिन आ गए हैं ठाकुर ने अभी यह स्थूल देह त्याग करने के बारे में निश्चय कर लिया है तो मां देख भी रही है भीतर भीतर में बड़ी ही दुखी भी हो रही है किंतु ठाकुर जब खुद यह ठीक कर ले कि हां अभी यह पृथ्वी पर मेरा कार्य समाप्त हो गया या तो फिर मां जगदंबा यह ठीक कर ले कि अपने संतान को अपने पास में वापस बुलाने का समय फिर से आ गया तो फिर यह मां शारदा इसमें क्या कर सकती है तो देखिए कि यह किस तरह से यह तीन भविष्यवाणी फलित होती है कंठ रोग होई बार किछु काल पूर्व होई ते घटनाओ वास्तविक रूप होया आशीते कंठ रोग ठाकुर का हुआ उसके कुछ समय पहले से ही घटना चक्र भी इसी तरह से चलता आ रहा था कोलकाता नाना स्थाने नाना लोकर बाटी दे निमंत्रित होया ठाकुर अन्न भिन्न अपर सकल भोज्य पदार्थों जहार ताहर बस्ते भोजन करते लेन कलकत्ता में विभिन्न लोगों के घर पे विभिन्न लोगों के हाथ से अन्न के अलावा और सभी तरह का खाद्य पदार्थ ठाकुर ग्रहण कर रहे थे अभी अन्न के अलावा देखिए ये एक बड़ा इंपोर्टेंट डिस्टिंक्शन है ठाकुर ने कहा था कि बलराम का अन्न शुद्ध अन्न है अन्न अर्थात कि ये चावल तो ये चावल ठाकुर सिर्फ बलराम के घर का ही खाते थे किंतु यह मिठाई है कचोरी है यह सब चीजें जो है ठाकुर को बड़ी पसंद थी जलेबी कचोरी वो जो कोई भी ले ले कर के देता था तो ठाकुर खा लेते थे और यह सब क्या आजकल का नहीं है ऐसा नहीं है कि आखिर आखिर में वो ठाकुर ने यह सब किया है इवन केशव सेन जब जीवित था और ठाकुर अपने मुंह से कहते हैं एक जगह पे कथामृत में ही कहते हैं कि देखो यह खाने पीने में तो इतना ना सब में शौच म इतना सब में नियम बद्ध हूं किंतु ये नियमों का सब समय पालन नहीं होता है ठाकुर खुद कहते हैं कि केशव के घर गया था तो एक नापत ना धोपी मने धोपा ना की नापत अभी ये धोपा अर्थात की जो कपड़े धोता है वो और जो नापत अर्थात की सर में वो बाल काटता है वो हमको जिसको नाई कहते हैं हेयर ड्रेसर वो तो इस ऐसा धोपा ना नापी य रकम किछु आन लो और आमी के आन लो जानी ना धोपा ना की नापता लो और टा खे फेलो अर्थात ही केशव के घर गए थे केशव ने कचोरी है यह जलेबी है पता है कि ये ठाकुर को यह सब बड़ा ही पसंद है फागू फगू की एक दुकान थी वहां से यह कचोरी जलेबी आती थी तो अभी वहां पर कौन बनाता है पता नहीं कौन लेके आता है वो भी पता नहीं इस तरह के किसी भी व्यक्ति वहां पर केशव सैन के घर पर लेकर आया और ठाकुर को वैसे पता था लाने वाला कौन है उसकी कौन सी जाति है किस जाति का है फिर भी ठाकुर कहते हैं मैंने खा लिया देखिए उस समय का था ये जात नात वगैरह प्रथा तो आजकल तो हमको इसको स्वीकार नहीं करना है किंतु ठाकुर उस परिपेक्ष में रह रहे थे उस परिप्रेक्ष्य में रह कर के ठाकुर यह बात करते हैं तो ठाकुर खुद अपने मुंह से कहते हैं कि यह सब मैं सब समय पालन नहीं कर पाता हूं कभी-कभी कोई भी आकर के कुछ भी लाता है मैं खा लेता हूं एक दिन की बात है कि ठाकुर उस समय कलकाता थे कुछ स्त्री भक्त दक्षिणेश्वर आई और जो सर बोलकर के एक मिठाई होती है बड़ा गाढ़ा मलाई का बना होता है एक घट जो है उसका वो वहां पे एक पट वो वहां पर रख कर के गई दक्षिणेश्वर में सोचा था ठाकुर आएंगे तो ठाकुर को खिलाएंगे ठाकुर तो थे नहीं तो मिठाई वगैरह वहां पर रख कर के गई वे लोग खुद कलकाता चली गई उसके बाद में उनको पता चला कि ठाकुर जब कोलकात्ता से दक्षिणेश्वर वापस आए थे आधि को एकाएक वो खड़े हो गए बोला कि मुझे भूख लगी है देखो कि क्या है खाने के लिए ठाकुर का भी तो ये सब भाव होता था ना वो हमने विपरीत शुधा के बारे में देखा था कभी ठाकुर खाने में बड़े ही पर्टिकुलर वो मां की दूध पिलाने की कहानी कि कितना वो कितना वो मेहनत करके मां दूध को जला जला करके गाढ़ा करके ठाकुर को पिलाती थी जैसे कि ठाकुर के शरीर में कुछ बल आए ठाकुर इतने सावधान रहते थे ज्यादा भात भी जद ठाकुर को चावल दे दिया तो मां ठाकुर डर जाएंगे अरे इतना सारा चावल मैं कैसे खा पाऊंगा तो मां फिर चावल को ऐसा दबा दबा करके प्रेस करके उसका साइज कम करके ठाकुर को देती थी यहां पे मां के पास में ये सब नाटक कर रहा है किंतु जब भाव में आ जाते थे तो जो भी सामने आएगा सब खा लेंगे तो उस दिन रात को आधी रात को भूख लगी बोला कि क्या है खाने के लिए तो रामलाल दादा ना कि कोई थे उन्होंने कहा कि वो कोलकाता से लेडी डिवोटा सब आई थी उन्होंने ये सर का एक बड़ा घट है वो यहां पे रख कर के गई है तो क्या तो ठाकुर ने कहा लेके आओ तो लेके आया ठाकुर ने सबका सब वो खा लिया गाड़ी वो मलाई की मिठाई तो अभी जब दूसरे दिन महिला भक्तों को पता चला सबका सब ठाकुर ने खा लिया तो बड़ी ही चिंतित हो गई कि अरे ठाकुर को तो वैसे ही गले का पेट का रोग है थोड़ा सा ही कुछ ज्यादा खाते हैं तो उसमें तकलीफ हो जाती है इतना सारा यह खा लिया फिर क्या होगा पता नहीं किंतु देखा कि ठाकुर को उस दिन कुछ नहीं हुआ था तो ये ठाकुर भाव में जब आते थे कभी भी कुछ भी खा लेते थे एक बार जयराम बाटी गए थे जयराम बाटी की ही एक घटना है मोस्ट प्रोबेबली आधी रात को उठ कर के कहते हैं कि अभी मुझे भूख लगी है क्या करें तो अभी घर में जो महिलाएं थी तो वो तो बड़ी टेंशन में आ गई उस दिन कुछ उत्सव जैसा था तो उत्सव जैसा था बोल कर के वहां पर घर में जितना भी अन्न द्रव्य था वह सब खत्म हो गया था तो ठाकुर ने कहा कि अरे तुम लोग जो मोरला माछ वो एक तरह की माछ होती है वो उसको बनाया था देखो वो बचा है कि नहीं तो वो घर वो उसमें वो देखा गया जिसमें यह मछली रखी थी कि हां एक छोटी सी मछली पड़ी हुई है थोड़ा सा ये ग्रेवी जैसा पड़ा हुआ है तो वो लाया गया और फिर ये जो पां आता भात रखा था वहां पे तो एक बड़ा सा एक लेकर के बर्तन में पूरा पां आता भात और एक छोटा सा मछली और उसका ग्रेवी ये दोन मिलाकर के ठाकुर ने खा लिया तो ठाकुर भाव में आते थे तो कुछ भी खा लेते थे फिर उनको खाने का शौक भी था ये कचोरी खाते थे जलेबी खाते थे तो जिसके तिस के घर जाकर के जिस का लाया हुआ खाना अन्न के अलावा चावल के अलावा ठाकुर ने खाना तो बड़े पहले से ही प्रारंभ कर लिया था जो भी नाटक उनका होता था मां के सामने ही सब चलता था बाकी बाहर में जाने से सब वो कुछ भी खा लेते थे तो वो तो एक ऑलरेडी प्रति फलित हो चुका था इसके बाद में कल कथाए आगमन पूर्वक श्री जुक्तो बोलोराम मेर बाटी ते इत पूर्वे रात्रि बासो मध्य मध्य कोरिया गिया छले ये जो पहली कंडीशन जिस तिस के हाथ से मैं खाऊंगा हर किसी के हाथ से खाऊंगा तो वो तो एक हो गया केशव के घर में ही वो पता नहीं कौन धोपा ना नापित कौन सी जाति का होगा उसके हाथ से लाया हुआ जो बाजार का खाना वो खा लिया फिर बलराम बाबू के घर दूसरी कंडीशन थी मैं कलकाता में रात्रि वास करूंगा तो ये ठाकुर भी यहां पर बलराम बाबू के घर बलराम मंदिर में जाते थे ठाकुर कहते थे यह मेरा किल्ला है यानी कि ये मेरा फोर्ट है कलकाता में ठाकुर का एक फोर्ट था वो बलराम मंदिर तो वहां पे जाकर के रात्रि वास भी ठाकुर कर लेते थे तो वो दूसरी कंडीशन भी यहां पे फुलफिल हो जाती है एवं अभी तीसरी बात है कि ठाकुर अग्रभाग किसी को दे कर के बाद में खाएंगे देखिए यह बार-बार नहीं हुआ है इनफैक्ट जहां तक अपना रिकॉर्ड जाता है सिर्फ एक ही बार ऐसा हुआ है हर किसी के हाथ से खाना वो भी एक हो गया है काफी लोगों के हाथ से कोलकाता में रात्रि वास करना वो भी काफी बार हो चुका है किंतु अग्रभाग किसी को देकर के खाना यह घटना अभी तक का हमारा जो रिकॉर्ड है एक ही बार हुई है और इसका क्या है तात्पर्य या मतलब क्या है यह गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं अजीर्ण रोगे आक्रांत होया नरेंद्रनाथ एक समय दक्षिणेश्वर पत्थर बंदोबस्त होई बे ना बोलिया बहु दिवस ठाकुरे निकट ना आशी ले तिनी एक दिन रद्र के प्रातः काले आनाया अपनार जन्म प्रस्तुत झोल भते अग्रभाग सकाल सकाल तहा के भोजन कराया अशिष्टा स्वयं ग्रहण परिल एक बार ऐसा हुआ था कि नरेंद्रनाथ को अजीर्ण का रोग हो गया था पेट का रोग हो गया था अभी यह जिस डॉक्टर को वो कंसल्ट करते होंगे उन्होंने उनको कहा होगा कि इसी तरह का आहार आपको करना है सब तरह का खाना आप नहीं खा पाएंगे तो नरेंद्र सोच रहा था कि दक्षिणेश्वर जाऊंगा फिर वह मां काली का प्रसाद उसमें तो तेल मसाला वगैरह सब रहता है या तो फिर विष्णु घर का भी प्रसाद अभी जो भी मंदिर में खाना बनता है तेल मसाला तो रहता ही है तो यह सब मैं खाऊंगा तो फिर फिर से मेरे पेट का दर्द बढ़ जाएगा इससे बेटर है जब तक मैं ठीक ना हो जाऊ जब तक मेरे डाट का ठीक-ठीक वो मुझे पालन करना है तब तक मैं अपने घर में ही रहता हूं यहां पर बहुत दिनों से नरेण आ नहीं रहा है तो ठाकुर ने व्याकुल होकर के वो मैसेज भेजा कि आओ तुमको ठाकुर बुला रहे हैं मैं बुला रहा हूं तो अभी ठाकुर का मैसेज मिला तो नरेण आया दक्षिणेश्वर में और ठाकुर ने क्या किया ठाकुर खुद पेट के रोगी है तो उनको जो मां खाना बना कर के देती थी वही वो पेट रोगी वाला ही खाना था तो ठाकुर ने क्या किया अपने लिए जो मां शारदा देवी ने आहार प्रस्तुत किया था उसका अग्र भाग नरेद को खिला दिया अभी देखिए श्री श्री माता ठाकुरानी वि विषय आपत्ति कोरिया तहर निमित्त पुनरा रंधन करिया दीवार अभिप्राय प्रकाश रीले तीनी बोलिया छले ज नरेंद्र के अग्रभाग प्रदान तहर मन संकुचित होई दे छ ना मां शारदा देवी ने जब यह देखा कि ठाकुर अपने खाने का अग्रभाग नरेंद्र को देने के लिए तैयार हो गए हैं इमीडिएट मां के मन में ठाकुर की वह भविष्यवाणी वो उदीत हुई ठाकुर ने कहा था जब मैं अग्रभाग किसी को देकर के बाकी का खाना मैं खाऊंगा उस दिन सोच लेना यह तीसरी निशानी है महाप्रयाण की ओर तो यह बात इमीडिएट मां के मन में उदित हुई मां ने आपत्ति जताई मां ने कहा कि अरे आप अपने खाने में से अग्रभाग उसको क्यों देंगे अब मैं दूसरा खाना नरेंद्र के लिए फिर से बना देती हूं तो किंतु ठाकुर ने कहा कि नहीं नरेंद्र को अग्रभाग देकर के बाकी का खाना खाने में मैं किसी तरह की संकुचित महसूस नहीं करता हूं देखिए कि नरेण और ठाकुर इन दोनों का जो आइडेंटिफिकेशन है भगवान और भक्त का नर और नारायण का वो इस तरह से अभी इतना क्लोज हो रहा है कि ठाकुर नरेंद्र को जैसे अपना ही एक अंग ही गिनते हैं को जैसे अपना ही एक अपने मन का ही एक हिस्सा गिनते हैं अपने से अभिन्न गिनते हैं नरेंद्र पर नहीं है वो उनसे अभिन्न है जो अद्वैत में जो संपूर्ण सर्वश्रेष्ठ शिखर पर विराजमान जो व्यक्ति होता है जो सिद्ध उनके लिए यह संभव है तो ठाकुर ने कहा कि नरेण को अग्र बाग देकर के बाकी का आहार ग्रहण करने में मुझे किसी भी तरह की संकुचित महसूस नहीं हो रही है और मुझे इसी से किसी भी तरह का दोष भी नहीं होगा इसलिए मां को फिर से राध में की आवश्यकता नहीं है नरेंद्र के लिए अलग से खाना बनाने की जरूरत मां को नहीं है देखिए यह घटना जब हुई तो उस समय मां के मन पर क्या बीता होगा हम अनुमान कर सकते हैं एक के बाद एक जितनी भी निशानियां थी जितने भी संकेत थे वो सब फलीभूत हो रहे हैं कलकता में रात्रि वास करना हर किसी के जिस किसी के भी हाथ से खाना और फिर किसी को अग्र भाग देकर के अवशिष्ट अपने से ग्रहण करना श्री मा शब देखिया जाते छिले किंतु विधाता पुरुष स्वयं जेखाने भाग्य चक्र ते थाके सेखाने अपरे निवारण उपाय जानिया हो निज असहाय अवस्थाई अश्रु विमोचन व्यतीत आर की पारे मां सब कुछ देख रही है किंतु भाग्य विधाता स्वयं जहां पर भाग्य चक्र घुमा रहे हैं वहां पर हम इसके लिए प्रार्थना करने के अलावा अपनी यह जो असहाय अवस्था है इसके बारे में अश्रु विसर्जन करने के अलावा कर भी क्या सकते हैं ई रूप परिस्थिति ते श्री मायर गभीर मनो वेदना हमरा सहज अनुमान करी ते पारी इस तरह की परिस्थिति में मां के मन की गंभीर वेदना हम सहज रूप से अनुमान कर सकते हैं अच्छा ऐसा नहीं है कि यह भाग्य विधता मां के अलग मां से मां के अलावा और कोई है यही मां जगदंबा ही मां शारदा देवी का स्वरूप लेकर के पृथ्वी पर आई है और यदि मां शारदा देवी चाहे तो यह भाग्य चक्र को भी घुमा सकती है किंतु देखिए कि ऊपर ऊपर से तो यह सब लीला हो रही है भीतर में से इनको पता है कि हां महाप्रयाण तो होने ही वाला है एक पंच महाभूत के ये नश्वर जगत में ये नश्वर देह कितने दिन टिकेगा एक देह को तो कभी ना कभी तो जाना ही है तो जब जाएगा तब भी ये कोई ईश्वरीय हेतु संधान करके जाएगा कोई ना कोई एक ईश्वरीय परपस के लिए इस देह का पृथ्वी पर आगमन हुआ है उस हेतु को सिद्ध करके ये देह जाए तो वो अच्छा है बिना मतलब लंबा लंबा जीना और इस लंबे जीवन से किसी भी तरह की फल श्रुति ना इससे कुछ भी फलित ना हो इस तरह का लंबा जीवन किस काम का ठाकुर ने जैसे पहले ही इन तीन के अलावा भी ठाकुर ने और भी कुछ-कुछ साइन दी है उसमें से एक हमको पता है कि ठाकुर मां को कहते हैं कि मुझे बूढ़ा नहीं होना है मैं यंग होते होते ही मैं चला जाऊंगा अब मां खाना खिला रही है एकाएक ठाकुर ऐसी बात करना शुरू कर दिए तो मां तो घबरा ही जाएंगी किंतु फिर जैसे छोटे बच्चे को समझाती है इस तरह से मां समझाती है कि ठाकुर कहते हैं कि मैं ऐसा नहीं चाहता कि कोई कहे कि कालीवाड़ा साधु रहता है तो मां ने कहा क्यों लोग ऐसा क्यों कहेंगे लोग तो कहेंगे कि कालीवाड़ा ु थाके अभी पिर बीन यानी कि प्रवीण माकी ये जो गामठी भाषा है ग्राम्य भाषा तो उस ग्राम्य भाषा में प्रवीण को कहती है पिरवी प्रवीण का अर्थ हुआ जो उम्र में बड़ा है और बुद्धि विजडम जिसको कहते हैं उसमें भी बड़ा है यानी मां इस तरह से ठाकुर को मना रही है पटा रही है बच्चे की तरह कि आपको कोई बूढ़ा साधु नहीं कहेगा आपको तो कोई प्रवीण साधु कहेगा तो ठाकुर क्या उत्तर देते हैं वैसे छोटा बच्चा जैसे मां के साथ में जब झगड़ा कर रहा है तो कैसा नाराज हो कर के बोलता है वैसे ही ठाकुर भी बोलते हैं आमी तोहार पिर बन टरबीन होते जाबो ना मैं तुम्हारा परवीन पिरन टरबीन होने वाला नहीं हूं होने को जाने वाला नहीं हूं तो इस तरह से देखिए कि साइंस तो ठाकुर देते ही रहते थे कि वृद्धावस्था नहीं देखने वाले हैं 50 साल के आसपास की उनकी आयु होगी जब उनकी महासमाधि हुई थी और नर का भी ऐसा था ये जैसे कि ठाकुर ने अपने बारे में और नरेंद्र के बारे में दोनों के बारे में एक साथ में ही जैसे कह दिया हो स्वामी जी की भी आयु 39 के आसपास की थी उनकी महासमाधि के समय तो देखिए कि ये बुढ़ा वस्था नहीं देखने वाले थे वृद्धावस्था ये भी एक साइन उन्होंने पहले से ही दे दी थी अभी ऐसा नहीं है कि मां इसके बारे में में कुछ ना कर पाए मां तो जगदंबा स्वयं है चाहती तो भाग्य का चक्र घुमा सकती थी किंतु भीतर में अंदर खाने सबको पता है कि हां ये मृत्य लीला का कहीं ना कहीं तो अंत आने ही वाला है और जो अंत आए बेटर है अच्छा है कि इस अंत के माध्यम से भी ये संघ का गठित होना सिद्ध हो जाए तो ये अंत्य लीला का सबसे महत्त्वपूर्ण जो एक थ्रेड है एक महत्त्वपूर्ण थीम है वो क्या है यह सभी अंतरंग शिष्यों को दलबदल के अटूट डोरी में बांधना तो यह कार्य ठाकुर अभी प्रारंभ कर रहे हैं और यह अंत्य लीला में भी मां का बड़ा महत्व का एक भूमिका रहेगी मां की यह भी मां को पता थी सब पता है किंतु फिर भी क्या है कि भलो भाष प्रेम एक ऐसी चीज है कि प्रेम का जो आप जिसको की जिसके जिसके प्रति आपने सब कुछ समर्पित कर दिया उनके जाने की बारी आए तो इवन ईश्वर भी जैसे कि अपने अश्रु संवरण नहीं कर पाएंगे ईश्वर भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाएंगे तो यहां पे भी मां के मन में क्या चलता होगा यह सब घटना चक्र देख कर के एक के बाद एक लक्षण प्रतिफल हो रहे हैं यह देख कर के मां के हृदय में जो जो चलता होगा उसका अनुमान हम कर ही सकते हैं बुझीते पारी ज खड़े खने तहर अंतरे एक कठोर प्रश्ने उदय होते लो समझ सकते हैं कि प्रति क्षण क्षण क्षण उनके हृदय में इस प्रश्न का उदय होता होगा तबे की तीनी देहो रखा कोरीते कत संकल्प तबे तब क्या ठाकुर देह रक्षा करने के लिए कृत संकल्प हो गए हैं उन्होंने अपना देह त्याग करने का ठान लिया क्या उन्होंने ठीक कर लिया है क्या यह बात मां के हृदय में बार-बार प्रतिक्षण उदय हो रही थी किंतु अप्रिय सत्य के विश्वास परते चाय किंतु यह जो अप्रिय सत्य है उसके ऊपर में कौन विश्वास करना चाहेगा कौन यह स्वीकार कर लेगा कि हां ठाकुर के अंतिम दिन आ चुके हैं अंत्य लीला का प्रारंभ हो रहा है कौन इस बात को स्वीकार करेगा कौन प्रार्थना नहीं करेगा कि हां यह दि जितने दूर रहे उतना ही अच्छा है सुवर्ण युग जितना लंबा चले उतना ही अच्छा है प्रार्थना कौन नहीं करेगा प्रार्थना सब करेंगे किंतु साथ-साथ में यह समझ भी है कि सुवर्ण युग का अंत तो आना ही है आर उहा सत ना होले श्री मायर वर्तमान अवस्था नी की बा कोरीते पारले और अभी ये जद सत्य ना है ठाकुर ने नहीं सोचा कि मैं देह त्याग करूंगा एक टेंपररी बीमारी है तो इसके बारे में भी बेचारी असहाय मा क्या कर पाएंगी क्योंकि वह तो दक्षिणेश्वर में है और ठाकुर को ले गया गया है कलकाता में ठाकुरे प्रियो भक्तगण तहर अनुमोदित जखन अनुमति ते जखन तहर सेवा जुन पर्वत व्यवस्था करले तो खन श्री मां के निरब से विरह यथा शच करते होई बे ठाकुर की ही अनुमति से ठाकुर के ही भक्तों ने यह ठीक किया कि ठाकुर को चिकित्सा के लिए कलकाता ले आया जाए और मां वहीं पर दक्षिणेश्वर में ही रही तो अभी मां इसके बारे में विरह वेदना नीरव रूप से शांति से बिना किसी वाक्य वय के सहन करने के अलावा और क्या कर सकती है तबे मायर से ब्यथा दीर्घ काल स्थाई रोलना किंतु मां के मन की यह व्यथा थ कि आखिर आखिर में ठाकुर की सेवा का जो भर है वो उनसे छीन लिया गया यह वेदना बहुत दिन तक नहीं रही को भी कलकाता लाया तो किस तरह से लाया गया वो कौन सी घटनाए थी वो अभी हम अपने नेक्स्ट क्लास में देखेंगे क अंतरंग में तो सभी आ जाते हैं रामचंद्र दत्त बलराम बसु मास्टर महाशय गिरीश घोष सभी को अंतरंग में ले लेते हैं बहिरंग यानी कि ये भवनाथ अंतरंग बहिरंग का डिफरेंस क्या है ठाकुर को जब कैंसर हुआ ठाकुर ने खुद ने कहा ना कि कैंसर कन होलो मैंने बहुत सारे रीजन है एक रीजन ठाकुर ने बताया लोक बाछा जन टू फिल्टर पीपल कि एक दल जिन्होंने यह सोच लिया कि अरे खुद को नहीं संभाल पाते हमारा क्या करेंगे तो वहीं से चल पड़े जैसे भवना थे वो और दूसरे दल ने सोच लिया कि नहीं ठाकुर की सेवा करना ने जीवन का परम कर्तव्य है तो त्यागी संतान भी है और रामचंद्र दत मास्टर महाशय सभी है इसमें जो ठाकुर की अंतिम समय सेवा करने के लिए जो इकट्ठा हुए थे वह है अंतरंग फिर अंतरंग में जैसे मैंने कहा कि दो डिवीजन होते हैं कि एक था डिवीजन कि जिन्होंने सोच लिया कि ठाकुर ने स्पर्श कर दिया तो अभी तपस्या करने की जरूरत नहीं और नरेंद्र था कि जिसने कहा कि नहीं तपस्या ठाकुर ने ही करने को बोला है सो दैट इज डीपर सेकंड लेवल डिवीजन विदन अंतर किंतु अंतरंग तो वैसे सभी होंगे वहां पर सन्यासी गस्त का डिफरेंस नहीं है मां यहां तक कि जयराम बाटी में एक सेवक को मां का कुछ काम था आधी रात को तो बड़े डरते डरते मां को पुकारा मां सो रही होगी बिना मतलब उनको अभी निंद्र में व्याघात करना किंतु मां जगी हुई है इमीडिएट उन्होंने उत्तर दिया तो सेवक ने पूछा मा आप सोई नहीं है इतनी देर हो गई तो मां ने कहा कि अरे मेरे इतने सारे संतान है जब ध्यान तो कोई करने वाला नहीं है अभी सबका जिम्मा उठाया है तो मुझे ही करना [हंसी] पड़ेगा इसमें अधिकारी अधिकारी वाद जो है कि सबका अपना अपना अधिकार है गंभीरानंद जी ने यह सब अच्छे से डिस्कस किया है अभी यहां पर मां ऐसा कहती है कि हां कि मुझे यह लोग जद अपने जब ध्यान नहीं करेंगे तो फिर मुझे उनके बारे में उनके करना पड़ेगा यह तो एक मां कहती है फिर दूसरी ही जगह प एक किसी ने आकर के मां को कहा कि मां मैं जब ध्यान नहीं कर पा रहा हूं तो क्या करूं तो उसने यह सोच लिया होगा कि मां कहेगी अच्छा बच्चा मैं तुम्हारे लिए कर देत ऐसा नहीं मां ने कहा कि तुम जब नहीं करोगे तुम ही गड्ढे में गिरोगे उसे मुझे क्या है मां ऐसा सीधा सीधी बोल देती है तो क्या है कि ये अधिकारी भेद के ऊपर में सब कुछ है एक कोई कोई आता था 10 बार सोचती थी इसको दीक्षा दे कि ना दे एक लड़का आया मां ने देखा बड़ा शुद्ध पवित्र है मां ने बोला कि अच्छा तुम आए हो जय राम बाटी दीक्षा लेकर के ही जाना तो ये लड़का कहता है मां मुझे पता नहीं है दीक्षा के बारे में थोड़ा सोच के बताऊंगा बाद में ले लूंगा कलकाता जाकर ले लूंगा मां ने कहा अरे नहीं नहीं तुम दीक्षा लेके ही जाओ क्या है अभी मैं दे देती हूं अभी जगदंबा स्वयं कहती है कि तुम दीक्षा लेकर जाओ वो लड़का सोच रहा है कि दीक्षा के बारे में क्या करना है क्या नहीं ये अधिकारी भेद के अनुसार है सब कुछ किसी किसी के लिए देखिए आईडियली स्पीकिंग मां जब आधि रात को जप करती है जगक कर के तो तो पूरे संसार के लिए करती है वहां पे फिर यह डिवीजन नहीं है कि यह मेरे दीक्षित भक्त है यह अमेरिकन अमेरिकन है यह ब्रिटिशर्स है ये अफ्रीकन है यूरोपियन है उस समय वो भेद नहीं रहता तो जगत कल्याण के लिए मां साधना करती है वो तो चल ही रही है मां की साधना किंतु फिर जैसे मां कहती है कि जद कुछ नहीं करोगे तो अंतिम यदि दीक्षा ली है तो अंतिम समय में ठाकुर तो आकर के दर्शन देने ही वाले उसमें कोई दो राई नहीं है किंतु यदि इसी जन्म में सदेव मुक्ति चाहते हो तो जब ध्यान करना पड़ेगा और फिर आखिरी समय ठाकुर आके ले जाएंगे उसके लिए भी तो विश्वास चाहिए ना गिरीश घोष जैसा विश्वास चाहिए गिरीश को ठाकुर ने कहा कि ज्यादा कुछ करना नहीं है सुबह शाम एक बार उनका स्मरण मनन करना तो गिरीश का लाइफ स्टाइल ही ऐसा है कब उठेगा कब सोएगा कुछ ठिकाना नहीं है बोला कि ये नहीं कर पाऊंगा तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है तो तुम खाने से पहले एक बार मेरा नाम लेना खाना तो खाओगे तो वो भी गिरीश कहता है कि एब्सेंट माइंडेडली खाता हूं क्या खाता हूं वो भी पता नहीं मुकदमा चल रहा है मैसेज आया तो आधा खाना छोड़ के मुझे चला जाना पड़ेगा तो मैं खाने के पहले नाम लूं आपका ये भी प्रॉमिस नहीं कर पाऊंगा तो ठाकुर कहते हैं अच्छा ठीक है आमा के बकल मा दिए दो पावर ऑफ एटर्नी दे दो तो गिरीश बड़ा खुश हो गया पावर ऑफ एटर्नी दे दिया ठाकुर को अभी कुछ करने की जरूरत नहीं है बाद में गिरीश बोलता है कि अरे तो बड़ा फंस गई ये तो डेंजरस इससे तो बेटर था सुबह शाम नाम ले ले तो बच जाता है वहीं पर खत्म हो जाता है अभी क्षण क्षण ठाकुर का नाम उन के हृदय में चलता है जब भी यह सोचते हैं कि मुझे यह करना है यह करना है इमीडिएट भीतर से बात आती है तुम कौन हो करने वाले पपेट मास्टर तो ठाकुर है जब तक ठाकुर की आज्ञा नहीं होगी तब तक कुछ नहीं होने वाला है सो इवन मोर डेंजरस य शरणागत हो जाने इवन मोर डेंजरस इस सब बेटर है जबन करके बच लो ये मैंने वो जो एक इंग्लिश शेयर किया है ना लेक्चर कल्पतरु दिन का यहां प मुझे मंदिर में कल्पतरु दिन के बारे में बोलना था तो इस मैं इसी थीम ली थी एक्चुअली कल्पतरु दीन ट्रिगर ठाकुर तो ट्रिगर होते है ना ट्रिगर चाहिए तो ट्रिगर फैक्टर कौन सा था ठाकुर आक के गिरीश को पूछते हैं कि अरे तुम ये प्रचार कर रहे हो कि मैं अवतार हूं क्या है इसके पीछे तुम क्या सोचते हो तो इमीडिएट गिरीश उनके पैरों में गिर के कहता है व्यास वालनी की जिसकी जो महत्ता का गान नहीं कर सकते मैं कौन होता हूं तो इसके पीछे व्हाट इज द बैक स्टोरी गिरीश ऐसा क्यों कहता है सो ये पूरी कहानी कि गिरीश का ट्रांसफॉर्मेशन और ठाकुर का कल्प तर्व होना ये दोनों सब इंटी मतलब बड़ी ही डीपी कनेक्टेड है यानी गिरीश कल्पतरू जो ठाकुर हुए समग्र संसार पे उन्होंने जो कृपा बरसाई इसके पीछे तो गिरीश का हाथ है यदि गिरीश यह कहता कि हां मैं सुबह शाम जब ध्यान कर लूंगा तो फिर तो ठाकुर कल्प तरम नहीं हो सकते थे किसको पता क्यों गिरीश को पूछा क्यों रामचंद्र को नहीं पूछा ये रामचंद्र भी तो बड़ा अवतार अवतार करके घूमता है इवन ये कथामृत में ही है कि ठाकुर पूछते हैं राम को कि क्यों तुम मुझे अवतार बोल कर के प्रचार कर रहे हो तो राम बाबू भी कम नहीं थे किंतु उस दिन उन्होंने गिरीश को ही पूछा राम बाबू को नहीं पूछा जो कि वहीं पर खड़े थे सो गिरीश का ठाकुर को बकल मा देना इस डायरेक्टली रिस्पांसिबल फॉर ठाकुर का कल्पतरु होना देख नॉलेज से पता है ईश्वर है और भले ही मुझे कन्विंसिंग हूं कि मुझे इस रास्ते पर आगे बढ़ना है सो फ्रॉम नॉलेज टू सिंसेरिटी इज वन स्टेप की हमको लेना होगा इस पूरे जगत को आप दो डिवीजन में बांट लीजिए नॉलेज ऑलमोस्ट आज का जगत में ऐसा कोई नहीं कहेगा कि ईश्वर नहीं है एथे लोगों की संख्या 10 15 पर से ज्यादा नहीं होगी मेजोरिटी ऑफ पीपल बिलीव इन वन ऑफ द फोर मेगा रिलीजन इस्लाम क्रिश्चियनिटी हिंदुइज्म एंड बुद्धिज्म इन वन वे और अनदर दे एक्सेप्ट सम हायर अथॉरिटी वो बुद्धिज्म चाहे वो निर्माण में विश्वास करे अद्वैतवाद हो आत्मन में करे सो नॉलेज ऑलमोस्ट 85 पर लोगों के पास में होगा 700 करोड़ में से सो दैट इज किंतु नॉलेज के बाद में सिंसियर का जो स्टेप है मुझे लगता है कि 10 15 पर से ज्यादा इस वर्ल्ड पॉपुलेशन में नहीं लिया होगा एक सिंसेरिटी का स्टेप अपने से लेना पड़ेगा जब तक सिंसेरिटी का स्टेप नहीं लेते हैं तब तक हम आगे कुछ भी नहीं कर पाएंगे नॉलेज हो गया बैठ गए दिन में नौकरी कर ली रात को शाम को घर आकर न्यूज़पेपर पढ़ लिए थोड़ा सा टीवी देख लिया थोड़ा बहुत घूम लिया सोशल रिस्पांसिबिलिटी ले ली मंदिर में जाकर के कुछ कर लिया दैट इज द एंड ऑफ द मैटर मैं सिंसियर नहीं हूं तो मैं इससे आगे शायद नहीं बढ़ पाऊंगा सिंसटीवी सिंसियर अबाउट दिस ईश्वर है ऐसा मुझे मैंने सुना है बट हाउ टू गो टुवर्ड्स कन्विंसिंग ने पूरे जगत में घूम करके देख लिया कि यह हिडन नास्तिकता का समय है कोई लोग तो बोलते हैं ज्यादातर किंतु वे लोग लिप सर्विस से ज्यादा कुछ नहीं देते और जो सिंसियर है उनको बेचारे को जन नहीं पता है कि क्या करना है कल जैसे हमने रिफॉर्म सोसाइटी के बारे में बात की थी अभी बात यह नहीं है कि राजा राम मोहन रॉय या तो फिर यह केशव सेन उन लोगों में हिंदू धर्म के प्रति कोई विदोष थी ऐसा कुछ नहीं है किंतु हिंदू धर्म कोई एग्जांपल तो दिखाओ अ ये चैतन्य महाप्रभु की बात करते हैं भगवान कृष्ण की बात करते हैं वो इतिहास में आए गए चले गए अभी क्या व्हाट इज द प्रूफ बिफोर मी सो प्रूफ ऑफ पुडिंग इज इन ईटिंग जैसे इंग्लिश में कहते हैं कि ये पुडिंग यानी कि केक अच्छी है उसका प्रूफ क्या खाएंगे तो पता चलेगा बिना खाए क्या अब हम किताबों में ही पढ़ते रहेंगे गीता बाइबल वगैरह स लाइफ में कुछ होने वाला नहीं है तो ये सिंसेरिटी तो है केशव सेन सबसे बड़ा उदाहरण है कि सिंसेरिटी तो उसमें आ गई उसने सर्चिंग चालू कर दिया मुमुक्षु था उसको समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें तो बोलकर के उसने विदेशी कुछ एलिमेंट्स को अपना लिया और फिर ये ब्राह्मण समाज बोलकर के एक किंब किमा का एक विचित्र कुछ उसने मिश्रण करके चला रहा था जिस क्षण वो ठाकुर के पास में आया उसी क्षण उसको पता चल गया कि नहीं सिंसेरिटी को कन्विसिटी है तो स्वामी जी ने यह देखा कि सिंसियर लोग बहुत है जगत में उनको जनली नहीं पता है कि क्या किया जाए तो उसके लिए कर्म योग उन्होंने स्वामी जी ने चालू किया वही फेमस घटना कि एक लड़का अपने कमरे में बैठ कर के ध्यान कर रहा है पूछ रहा है स्वामी जी को कि ध्यान नहीं हो रहा है स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया पहले तो अपने कमरे के खिड़की दरवाजे खोलो कमरे के बाहर आओ आसपास में देखो गरीब गुरब हैं उनकी सेवा करो सेवा करके तुम्हारा चित्त निर्मल होगा तब कहीं जाकर के तुम ईश्वर आराधना की ओर जाओगे दैट इज कन्वेंशनल वे ऑफ इंटरप्रिटिंग स्वामी जीस कर्म योगा और जो रेडिकल वे ऑफ इंटरप्रिटिंग स्वामी जीस कर्म योग है कि यदि गरीब गुरुओ की ही सेवा करते जाओ उसी से तुमको सब कुछ प्राप्त हो जाएगा उन्हीं के भीतर में तुमको ईश्वर देखना मिल शुरू हो जाएगा इन बोथ द इंटरप्रिटेशन यू आर गोइंग टू ट्रांसफॉर्म योर लाइफ सो यह सिंसटीवी क्शन की जो यात्रा आज के आधुनिक युग के लिए जो वैलिड है इजी है डूबल है दैट इज स्वामी जी सेवाय और इसका उदाहरण ये मैं खुद हूं कि मैं पहले तो पूरा नास्तिक था थोड़ा सा सिंसटीवी मा हार्ट इज ट्रांसफॉर्म अभी ऐसा नहीं है कि कुछ पा लिया है किंतु एटलीस्ट आई एम कन्विंस्ड उसके बाद की लंबी यात्रा है बट कन्वे तक तो मैं पहुंच गया हूं सो ऐसे इतने अपने विनायक लोहानी ऐसे कितने ही उदाहरण होंगे कि जिन्होंने आखिर में सेवा कार्य में अपने को समर्पित कर दिया है कन्वे आ गया है नाउ दैट लॉन्ग जन्म जन्मांतर की यात्रा है धीरे-धीरे करके अपने वो कर्म के फल को काटते जाइए और जब क कर्मफल कट जाएंगे तब वो आपको मुक्ति मिल जाएगी किंतु वो यात्रा स्टार्ट हो गई है अभी जब तक कोई मेजर डिजास्टर नहीं होगा इस यात्रा में अभी कोई विघ्न नहीं होने वाला सो इजस्ट वे जो कि सिंसियर पर्सन है उसके लिए है ये सेवा योग बाकी क्योंकि देखिए ऐसा कहे भक्ति योग करो नवधा भक्ति है या तो राज योग करो मन को एकाग्र करके एक जगह पर बैठो या तो ज्ञान योग करो कि ये त्याग वैराग्य अपने मन में प्रतिफल करो प्र फलित करो तो ये सब चीजें बड़ी कठिन है किंतु गांव में जाकर के गरीब लोगों को मैथमेटिक्स सिखाना ये तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है यह तो इजली डूबल है आप करते जाइए सिंसियर निस्वार्थ भाव से करते जाइए देखिए कि सिंसटीवी