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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 23 Aug 2023

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ओम स्थापा का यथार्मास सरवत धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठय रामकृष्ण यतीम श्री मां शारदा देवी तो हम किस तरह गंभीर आनंद जी महाराज का रहे हैं की पहले जो देवसर संग्राम होता था देव और असुर का संग्राम वो बाहर के जगत में फूल जगत में होता था और आज का जो देव असुर संग्राम है वह हमारे अंदर जगत में होता है असुर है असुर है हमारी दूरवृत्तियां या तो फिर दुर्गुण और और या तो फिर सदगुण सूर्य या तो फिर देव है हमारी एसएडवृतियां यहां पे उन्होंने गंभीरानंद जी महाराज ने सद्गृति कौन सी है और दूरवृत्ति कौन सी है उसका लिस्ट दिया है लिस्ट छोटा सा है किंतु फिर भी बहुत ही चिंतन करने योग्य है महाराज जी कहते हैं आस्तिक के बुद्धि पर लोग चिंता ध्यान निष्ठा ये है सदगुण राशि और इनका जो एक्सेप्ट अपोजिट है वो है दुर्गुण राशि स श्रद्धा जड़वा डी प्रियता और भोग ब्रांड था यह तीन और ये तीन सूर्य और असुर देव और दाना इनका घर संग्राम हमारे अंतर जगत में हो रहा है और जो जितना है मां लीजिए की ये आस्तिक के बुद्धि जीत गई यह परलोक वध परलोक चिंतन यदि जीत गया तो हम बाहर के जगत में हम लोगों का प्रेजेंस हम लोगों की उपस्थित हमारे समाज के लिए एक बेनिफिशियल हो जाएगी हमारे समाज को इससे लाभ होगा हम मैं छोटा था तो हम लोग गांव जय करते थे मेरी मां के घर तो वहां पे हमारे दादा जी थे दादा जी यानी की मां के पिताजी के पिताजी वो बहुत ही मतलब उम्र में बड़े थे और उसे समय अभी तो मुझे याद भी नहीं है उनके बड़े में ज्यादा कुछ मैं बहुत छोटा था तब मैं उनको देखा था तो उमेश शायद 5-6 साल का होगा और जब मुझे याद है की उनके साथ में मैं खेलते था उनके साथ में बात करता था तो उनकी जो प्रेजेंस है हमें छोटे बच्चे हैं अभी वो इतने उम्र में हमारे से बड़े हैं और फिर भी हम लोगों को उनके पास में जाकर के बात करने में खेलने में इतना अपना आनंद आता था तो हमारी एक छोटे से एक दुकान थी वो दवाई की तो दवाई दुकान में वो बैठे रहते थे वहां पे तो वहां पर वैसे कस्टमर भी आते थे हम लोग छोटे बच्चे भी खेलने रहते थे तो जाकर के उनके साथ में बात करेंगे वो मुझे कस्टमर भी जो भी आएंगे वो उनके साथ में दादा जी बैठे हैं तो चलो उनके साथ में तो थोड़ी सी बात कर ले तो है छोटा सा गांव है छोटे से गांव में एक छोटी सी दुकान है और कुछ चार-पांच लोग आते हैं दवाई लेने के लिए उसमें हम बच्चे भी हैं तो वह उनकी जो प्रेजेंस है दादा जी की उससे वो पुरी दुकान में ऐसा लगता था जैसे शांति को जैसे की एक तरह का एक क्या कहेंगे पीसफुल एटमॉस्फेयर क्रिएट होता हो उसे समय हमको यह सब पता नहीं चला था हम लोग तो दुकान में जाते थे क्या है की वह कैंडी स्वीट वगैरा वहां पे मिलता राहत है तो हम लोग बोलेंगे की हमको यह कैंडी चाहिए वो कैंडी चाहिए दुकान में जैसे राहत है तो वह लोग हमको देते थे तो बच्चे होने से हमको यही है की चलो दुकान में क्यों जाते हैं तो कैंडी मिलेगी इसलिए किंतु देखिए की यह वाक्य प्रलोभन की एक थी मैंने चलो की है बाकी आप लोग बैंड किंतु भीतर में से हमको कौन टांग है भीतर में से हमको क्या खींचना है ये जो वहां पे एक शांति जो उनकी प्रेजेंस से बंटी थी वो हमको वहां पे खींचना है फिर हमारे घर यह जो दुकान थी हमारी उसके पीछे में एक बांग्ला बांग्ला मैन बहुत बड़ा मकान है जहां पर एक सेठ जी रहा करते थे सेठ अधिक यानी गुजराती में सेठ का शब्द है एक धनी व्यक्ति तो उन्होंने है उनका जो एक बहुत बड़ा गार्डन था गार्डन के एक कोनी में उन्होंने कुटिया बनाई थी कुटिया में एक बहन जी रहा करती थी एक बड़ी उम्र की उनको हम जय भगवान माता जी कहते थे अभी हम लोग तो बिल्कुल छोटे बच्चे हैं हमको तो कुछ पता भी नहीं है किंतु फिर भी वो एक गार्डन में से थोड़ा सा बड़ा था और जी कॉर्नर में वो माताजी रहती थी वहां पे क्या है थोड़ा सा वीरान जैसा था तो जान में भी थोड़ा डर लगेगा किंतु फिर भी हम लोग वहां पर जाते थे और माता जी को जय भगवान कहते थे और फिर उनको वो हमको कुछ ना कुछ प्रसाद ये बताशा वगैरा कुछ देती थी तो वो लेकर के हम लोग वहां पर खेलने भी थे अभी देखिए की ऐसी जगह पर हम लोग जाते हैं तो एक प्रसाद का मो राहत है या तो जैसे मैं दुकान में जाता था तो दुकान में कैंडी कम हो राहत था किंतु हमारे अंदर के भीतर में आज इतने सालों के बाद में जब मैं वो फिर से गांव के बड़े में सोचता हूं तो मुझे लगता है की हम लोग वहां पर सिर्फ वह कैंडी है वह प्रसाद के लिए नहीं जाते थे वह हमको ऐसा कुछ आकर्षित करता था जिसकी व्याख्या हम उसे उम्र में नहीं कर पाते थे एक इस तरह की आकर्षण शक्ति जो की सबको अपने पास में खींचती है जो की सबके हृदय में एक आशा भरोसा का संचार करती है और जैसे बाहर जाएंगे तो हम लोग थोड़ा सा दुविधा में पद जाते हैं क्या करें कैसे करें क्या होगा हमारे साथ में अपना फ्यूचर क्या है हमको क्या करना चाहिए वगैरा यह जो सब चिंतन वगेरा चला है तो ऐसे लोगों के सामने जाकर के वह चिंतन थोड़ा सा प्रेशर मीत हो जाता है एक नई आशा की किरण एक नई आशा की लहर हमारे मां में वह प्रकट होती है वह माताजी के बड़े में फिर मुझे बहुत सालों के बाद पता चला मैं तो बिल्कुल छोटा था और उनके पास में जाता था तो अब गांव में रहती है ऐसे तो वह रहते हैं माताजी क्या है वो उनके अब छोटी उम्र में उनके साथ क्या बात करना उनकी कुटिया में जाकर के बैठेंगे तो देखा था की फोटोग्राफ्स वगैरा सब लगाएं हुए हैं अभी किसके फोटो है वह भी कुछ पता नहीं छोटी सी उम्र में यह सब क्यूरोसिटी भी नहीं होता अच्छा ठीक है चलो किसी भगवान की भी कमी नहीं है तो ऐसे किसी का होगा मैं बहुत सालों के बाद रामकृष्ण मिशन में जॉइन करने के बाद में एक्सक्यूज मी बहुत सालों के बाद रामकृष्ण मिशन में जॉइन करने के बाद में मैं एक बार किसी एक अपने देवोते के साथ बात कर रहा था तो उन्होंने कहा की एक गांव है छोटा सा वहां पे एक माता जी इस तरह से रहती है तो उन्होंने अपने राजकोट आश्रम में महापुरुष महाराज की जो तिथि पूजा है उसको उसे दिन होम वगैरा करने के लिए कुछ दीक्षा कुछ प्रणामी दिया है कुछ डोनेशन दिया है इसके लिए बाकी वैसे डायरेक्ट डिसाइड करती थी पूजा वैसे ही पूजा करके चलती है किंतु महापुरुष महाराज की तिथि पूजा को होम होता है तो मैंने कहा की ऐसा क्यों महापुरुष और अभी उन्होंने जी गांव का नाम कहा वह गांव तो मेरा ही गांव है किंतु मैंने उनको बताया नहीं की मैं तो इस गांव में वह तो मेरा मां का घर वहां पर है और छोटा था तो हर साल वेकेशन में मैं 2 महीना 3 महीना वहां पे जाता था तो बहुत ही मेरा नजदीक का रिश्ता है उसे गांव के साथ में और जी माताजी का नाम बोला वह तो उनको तुम्हें बिल्कुल बचपन से जानता हूं तो किंतु मैंने उनको बताया नहीं मैंने कहा की क्यों इस तरह का क्या है इस माताजी का ऐसा तो क्या राजपूत आश्रम के साथ में रिलेशन है और महापुरुष महाराज जी के साथ खास करके ऐसा क्या है की उन्होंने महाराज की पूजा के दिन होम करने के लिए स्पेशली प्रणामी दी है तो उन्होंने कहा की वह जो माताजी थी वह एक्चुअली राजकोट का जो रॉयल फैमिली था राजकोट का जो राजा रॉयल फैमिली उसमें से सही बाज मेंबर ऑफ डी रॉयल फैमिली उसमें से वो एक थी और वो टीचर थी और उन्होंने फिर शादी नहीं की उन्होंने सोचा की अपना जीवन धर्म को जीवन ईश्वर को समर्पित करेगी फिर कहानी से जाकर के उनको ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में पता चला आश्रम में भी आई थी और फिर उनको पता चला की उन्होंने कथामृत पद्धति थी तो कथामृत में मास्टर महाशय का नाम लिखा है अभी आपको पता होगा तो अपने रामकृष्ण मिशन से कथमरूद का प्रिंटिंग तो 1963 में हुआ जबकि यह मास्टर महाशय का कॉपीराइट चला गया था मास्टर महाशय का कॉपीराइट जब तक था तो मास्टर महाशय ही प्रिंट करते थे तो उन्होंने मास्टर महाशय का नाम पड़ा उसकी किताब में की हां इस किताब के वो एड्रेस वगैरा है तो उनको खोजने खोजने ये मास्टर महाशय जीवित थे 1930 के आसपास की बात है तो 1930 में वो कोलकाता चली गई मास्टर महाशय का दर्शन करने के लिए और उनको कहा की मैं राजकोट से आई हूं मेरी इच्छा है की इस तरह से ठाकुर जी को मैं अपना जीवन समर्पित करूं और आपका आशीर्वाद चाहिए तो मास्टर महाशय ने कहा की यह तो बहुत अच्छी बात है उनके साथ में ठाकुर के बड़े में बहुत साड़ी बात हुई फिर उन्होंने कहा की यह बेलूर मठ है अब बेलूर मठ में जाइए वहां पे ठाकुर के साक्षात शिष्य महापुरुष महाराज उसे समय प्रेसिडेंट है तो आप उनका दर्शन कीजिए तो वो बहन जी वो माताजी सीधा ब्लू मथाई महापुरुष महाराज का दर्शन किया दीक्षा ली और फिर गुजरात वापसी और गुजरात वापस आकर के उन्होंने ठीक किया की अब यह जो टीचर थी उसे समय तो ये जब नहीं करनी है वो जब वगैरा छोड़ देती है सिर्फ साधन भजन तपस्या करके वो जीवन बिताएगी तो ऐसा करके वह कहानी एक तीर्थ स्थान में र रही थी तो उसे समय जो मैंने कहा की हमारे वो दुकान के पीछे में वो जो बड़ा बांग्ला था उसके जो शेख जी थे वो सेठ जी वहां पर गए हुए थे उन्होंने इस माताजी को देखा देखा की बड़ी ही कष्ट कारक अवस्था में वो तपस्या कर रही है तो सेठ जी ने कहा की आप एक कम कीजिए आप हमारे वहां पर ए जाइए हमारा एक बांग्ला है बेंगल के सामने बहुत बड़ा गार्डन है गार्डन के कोनी में मैं आपको एक कुटिया बना दूंगा और कुटिया में आप रहिए और साधन भजन कीजिए कोई भी कष्ट होगा कोई भी जरूर होगी तो हम आपको वो फूल फिल्म आपको जो भी चाहिए हम दे देंगे तो वह माताजी वहां पर उसे समय क्या हुआ था मेरी मां के पिताजी की हमारी एक रिलेटिव थी एक बहन वो बड़ी उम्र की थी हम उनको कई कहते हैं वो बंगाली में भी काफी कहते हैं गुजराती में भी काफी शब्द है कई अर्थ का और कई काका अर्थात पिताजी के भाई को काका कहते हैं और पिताजी के भाई की जो पत्नी होती है उनको कई कहते हैं तो यह मेरी मां के पिताजी के भाई की बीबी इनको हम काफी कहते थे हम भी कटे तो वो क्या डेली खाना पाक करके उनके पास जाति थी और उनके साथ में बात प्रतिदिन और हम लोग बच्चे लोग क्या करते हो माता जी के पास जाएगी बैठेगी बात करेगी सब कुछ उनके साथ में और ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में जान की और इतना ही नहीं वो खुद ये कई जो है और काका जो है वो खुद बेलूर मठ जाकर के आए थे अभी मैं छोटा था मैं इस घर में र रहा हूं हर साल 2 महीने 3 महीने में अपना वेकेशन के वहां पे बिताता हूं बड़ा हो गया मुझे कुछ पता नहीं अब क्या है की क्यूरोसिटी भी नहीं रहती ना इतना सब कुछ जन के लिए ऐसे तो है कितने भगवान है कितने अवतार है होंगे इसमें से कोई मैं बड़ा हुआ फिर मैंने स्वामी जी को पढ़ने की शुरुआत की फिर स्वामी जी को पढ़ने के बाद में मैंने रामकृष्ण मिशन जॉइन किया रामकृष्ण मिशन में जॉइन करने के बाद में गुजरात में फिर से मेरा पोस्टिंग हुआ और यह ड्यूटी के साथ मेरी बात हो रही है ऑडी मुझे सब कुछ पूरा बैकग्राउंड हो माता जी का बता रहा है अभी मैंने उनको बताया नहीं मैं उनको कितने बिल्कुल बचपन से जानता हूं बिल्कुल छोटे थे हम लोग उनके पास में जाकर के खेलने थे उनके पास में मार्क करके प्रसाद खाता थे और जो कुटिया उसमें जो फोटोग्राफ थे उनको प्रणाम भी वो करवाते थे अभी मुझे पता भी नहीं था की वो ठाकुरमार स्वामी जी है बच्चे को ये सब क्या वो होने वाला है वो समझ में आने वाला है तो मैं बताया नहीं उनको किंतु देवोते ने मुझे पुरी बात बताई माता जी की पूरा बैकग्राउंड स्टोरी बताइए तब कहानी जाकर के मैंने वो जो मेरी जो कई है उनको मैंने फोन किया तो मैंने कहा की वो आपको याद है ना वो माताजी जय भगवान माता जी हम उनको कहा करते थे क्योंकि हम उनके पास में चाहते थे और जय भगवान करके उनको प्रणाम करते थे तो मैंने उनको पूछा की वह जो जय भगवान माता जी है थी उनका तो उसे समय देहांत हो गया था तो क्या वो रामकृष्ण मिशन के साथ में संलग्न थी वो क्या वो ठाकुर मास स्वामी जी के फोटोग्राफ थे रामकृष्ण विवेक आनंद के क्या वो बेलूर मठ गई थी तो अमेरिका को सब कुछ पता था उन्होंने कहा की हां वो तो ठाकुरमार स्वामी जी के ही फोटोग्राफ्स थे और वह प्रतिदिन कथामृत पढ़ा करती थी और मैं खुद वो हमारी कई खुद बेलूर मठ जाकर के आई है उनके पास में से सिख कर के और हम लोग जो है जो प्रतिदिन जाकर के जी फोटो को प्रणाम करते हैं बिल्कुल मैं छोटा सा बच्चा था वह वही ठाकुर उमस स्वामी जी तो मैं इतना आश्चर्य चकित हो गया देखिए की मैं मैं तो सोचता था की मैं बड़ा हुआ हूं अकल आई है अपनी बुद्धि से मैंने स्वामी जी को फिलासफी समझ करके मैं यहां पे आया हूं ऐसा नहीं है एक्चुअली में बिल्कुल छोटा था जी गांव में मेरा जन्म हुआ था जी जगह पे जन्म हुआ था उससे 20-25 फुट दूर ही ठाकुर महिष्मति ऑलरेडी प्रतिष्ठित होकर के बैठे थे ऑलरेडी मेरे ऊपर उनकी नजर थी और पहले से ही जैसे की मुझे चिन्हित कर दिया था की मुझे बड़े होकर के यही पे ही आना है तो देखिए मैं छोटा था मुझे कुछ पता नहीं किंतु फिर भी बार-बार वो छोटी कुटिया में जाकर के वहीं पे खेलने रहना वहीं पर उनको जाकर के प्रणाम करना किसी ने तो ऐसा मुझे सिखाया नहीं था वो जो कई भी मुझे ऐसा नहीं कहते थे की जो तुम उनसे साथ में जाकर के बात करो वो तो प्रतिदिन भजन बनाकर के पाक करके उनको खिलौने को जाति थी वह हमको पता है किंतु हमको बच्चों को जाना है वहां पर ऐसा तो हमको कोई बोलना नहीं था हमको तो पूरा फ्रीडम था जो चाहे जितना खेलने दौड़ना हंसी मजाक करना चाहे वो ऐसा कर सकते थे और गांव में हम लोग जाते भी क्यों है वेकेशन में वो आनंद प्राप्त करने के लिए तो जाते हैं स्कूल में से छुट्टी हो गई है अभी होमवर्क नहीं है प्रतिदिन सुबह को उठकर के स्कूल में नहीं जाना है टेंशन नहीं है चलो अभी गांव में जाते हैं और खेलने हैं दौड़ते हैं बड़ा मजा करते हैं और हमारे छोटे-छोटे कोसिंस मेरे जितने भी थे मेरी ही उम्र के हम लोगों का एक पूरा दाल था पूरा एक ग्रुप था तो हर वेकेशन में हम लोग वहां पर इकट्ठा होते थे बहुत खेलने डुलना वह सब चला था मेरे अंकल मेरे आंट आंटी मामा मानी वगैरा मुझे इतना प्रेम करते थे की वह हर समय मुझे ऐसा लगता था चलो गांव में जाते हैं चलो गांव में जाता है तो देखिए की है उसे समय जो मुझे नहीं समझ में आता था जो आज समझ में ए रहा है मेरे दादाजी जो थे वह जय भगवान माता जी थी उनका प्रेजेंस ठीक है मेरे मेरी उम्र के कोसिंस वगैरा के साथ में मैं खेलते था उसका तो आनंद ही है जो की बच्चों के समझ में आता है किंतु जो बच्चों को समझ में नहीं आता है वो है ऐसे बड़े लोगों की उपस्थित जिनकी प्रेजेंस मंत्र वहां पर आशीर्वाद शांति आशा भरोसा यह फलता है तो आज इतने सालों के बाद में मुझे क्या याद है मुझे वो याद नहीं है की मैं मेरे मित्रों के साथ में मेरे कजिन के साथ में क्या खेलते था वो अभी वो याद नहीं ए रहा है किंतु वह मैं वह कुटिया में जाता था जय भगवान माता जी वहां पर हम खेलने थे वह मुझे याद है मेरे दादा जी के साथ में मैं बैठता था उनके साथ में मैं बातें करता था बात क्या करता था वह याद नहीं किंतु उनके साथ में जो बैठता था उनका प्रेजेंस अनुभूति अनुभव करता था अनुभूत करता था वह आज मुझे याद है वो छोटी सी दुकान थी किंतु छोटी सी दुकान में छोटे से गांव में भी इस तरह की शांति थी जो की मां को सब समय लुभा करके वहां पे खींच के ले जाते थे थोड़ा सा मैं बड़ा हुआ अनफॉर्चूनेटली मैंने गांव में जाना बैंड कर दिया फिर सोचा की अरे ये सब क्या वो छोटे से गांव में जाना वहां पे तो कुछ है ही नहीं हमको तो एक इंटेलेक्चुअल डेवलपमेंट करना है और मैं किताबें पढ़ने की शुरुआत कर दी थी तो फिर जब स्कूल में वेकेशन होता था वह 10 11 की बात की बात कर रहा हूं बस वो वहां पे बहुत साड़ी किताबें पढ़ेंगे बहुत सर कुछ चिंतन करेंगे कोई इंटेलेक्चुअल इंगेजमेंट चाहिए ऐसा एक मेरे मां में फिट हो गया था फिर मैंने गांव में जाना बैंड कर दिया फिर ऐसा भी हुआ की हमारा जो घर था वह दुकान थी वह भी वह हमारे जितने यह रिलेटिव से धीरे-धीरे करके सभी लोग गांव छोड़कर के चले गए वो हमारा घर भी बीच दिया गया दुकान पे बीच दी वो अभी कुछ नहीं रहा एक छोटा सा एक घर है शायद एक घर है किंतु हमारा बहुत बड़ा घर था बहुत बड़ा जॉइंट फैमिली था सब कुछ अभी वो चला गया सभी लोग अभी बाहर जाकर के वो चले गए हैं की छोटे से गांव में कौन रहेगा वहां पे तो करियर नहीं है फ्यूचर नहीं है बच्चों के लिए तो किंतु देखिए की अभी आज इतने सालों के बाद में किंतु मुझे मैं जब अपने बचपन के बड़े में सोचता हूं तुम्हें ये नहीं सोचता की मैं किस लाइब्रेरी में जाकर के क्या किताब पढ़ना था या तो फिर मैं किस स्कूल में जाकर के क्या स्टडी करता था वह सब तो है किंतु जो सबसे ज्यादा याद आता है वो छोटा सा गांव छोटी सी दुकान एक छोटी सी कुटिया जहां पर हम प्रसाद मांगने के लिए या तो कैंडी करने के लिए चले जाते थे तो वह आज मुझे याद है और उसका जो आनंद और उसका जो आशा और शांति है थिस इस व्हाट वे क्रेन टुडे बड़े होने के बाद में छोटे होने छोटे हम जो थे बच्चे उसे समय की जो हमको एक निर्मल आनंद आज का हमारा आनंद क्या है की सब समय देवर इस सम सॉर्ट ऑफ टेंशन लड़की बिहाइंड एवरीडे एवरी एंजॉयमेंट डेट वे हैव कुछ भी आज बाहर घूमने को जो कहानी कुछ परवाह है कुछ उत्सव है हम कहानी से भी कुछ भी प्राप्त करने को ट्राई करते हैं आनंद प्राप्त करने को ट्राई करते हैं पीछे में एक थोड़ा सा टेंशन एक थोड़ा सा रिस्पांसिबिलिटी अभी हम लोगों को टेंशन नहीं होता है मेरा है जैसे मेरा एक सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी है की यह कम चल रहा है यह प्रोजेक्ट चल रहा है यह मुझे लखनी है मैं एक साथ में 34 किताब ट्रांसलेट करता हूं पब्लिकेशन में और कर से पांच नई किताबें में अपने से लिख रहा हूं तो यही चला राहत है अच्छा इस किताब में अभी नेक्स्ट ट्रांसलेट करना है किसी दिफिक पैसेज के ऊपर में किसी डिफिकल्ट सेंटेंस या तो फिर शब्द के ऊपर में मैं अट गया हूं तो उसके बड़े में उसका सॉल्यूशन लाना है डिक्शनरी खोल कर देखो रेफरेंस बुक खोल के देखो किसी सीनरी साधु को उसका अर्थ पूछो यही सब चला राहत है उत्सव भी होता है तो हम लोग 100% जो एंजॉय जब बचपन में करते थे वो हम आज नहीं कर पाते तो देखिए की ये सदगुण राशि जिनके भीतर में विजय प्राप्त करती है ऐसे लोगों की प्रेजेंस अभी आज बड़े होकर के हमको रामकृष्ण मिशन में सिमिलर एक्सपीरियंस क्या है जबकि गौतम आनंद जी है या तो सुनीता नंद जी है या तो विमलात अमन जी महाराज है हमारे वाइस प्रेसिडेंट रिसेंटली जो अभी विजिट कर रहा है हमारे सेंटर में अभी इस 30 तारीख को ही 30 सितंबर को ही गौतम आनंद जी आने वाले हैं राजकोट में तो अभी उनके उपस्थित है जो की हमको सिमिलर पीस और वीडियो होप हमको प्रधान करती है किंतु फिर भी आज बड़े होने के बाद में हम वाइस प्रेसिडेंट महाराज को प्रणाम भी करते हैं नाइट क्लास हमारा साधुओं का होता है वो महाराज जी पुराने दोनों की बातें याद करते हैं सुनकर के बहुत आनंद आता है किंतु आज बड़े होने के बाद में जो निर्मल आनंद जो बचपन का था वो नहीं आने वाला है क्योंकि ऑलवेज आईटी बैक ऑफ ओवर मन डर बिल हायड रेमन हैडिंग सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी और सेंस ऑफ से वो एक डेडलाइन है ये है वो है उसको हमको कंप्लीट करना है वो सब समय पीछे में राहत है तो हमको लगता है जब हम जब ध्यान करते हैं तब लगता है की चलो फिर से ये वो बचपन ये जो ठाकुर बालक भाव के थे ना बालक भाव यानी की सिर्फ यह नहीं की आप ईश्वर मां है और मां के साथ में जैसे बच्चा खेलते है वैसे ही ईश्वर के साथ में हम वार्तालाप करें या तो आकर ईश्वर के साथ में हम बच्चे हैं ऐसा सोचकर के खेलें सिर्फ इतना ही नहीं बालक भाव का अर्थ है जब हम खुद बच्चे थे तो किस तरह से मुक्त मां होता था किसी भी तरह का रिस्पांसिबिलिटी सेंस ऑफ रिस्पांसिबिलिटी नहीं था किसी भी तरह का टेंशन नहीं था हां स्कूल में जाते थे किंतु स्कूल खत्म हो गया बात खत्म हो गया अभी वो आज जितना वो हम ऐसा नहीं है की ऑफिस में से घर चले जाते हैं तो जैसे हम लोग यहां पे ऑफिस में से अपने रूम में चला गया तो ऑफिस का कम ऑफिस में र जाएगा ऐसा नहीं होता है ऑफिस का कम रूम में आता ही आता है अपने मां के ऊपर में स्वर होकर के बच्चे थे तो अपना मां का स्ट्रैंथ भी इतना था की स्कूल में से घर ए गए तो स्कूल स्कूल में ही र गया घर में और कुछ चालू हो गया आप का सकते हैं की ये तो ठीक नहीं हुआ आपका पढ़ाई लिखी का मामला है होमवर्क करने आए वगैरा वगैरा किंतु क्या है की चलो बड़े होकर के पढ़ाई लिखी अच्छे से नहीं होगी तो करियर ठीक से नहीं बनेगी वो भी एक है और दूसरा है की आजकल अपना जीवन इतना एक मैटेरियलिस्टिक हो गया है करियर ओरिएंटेड हो गया है की हम लोग सोच ही नहीं सकते की उसे पहले के जमाने में लोग कैसे रहते थे मुझे याद है मेरे दादाजी हमको किसी बगीचे में या किसी जगह पे घूमने के लिए ले जाते थे तो ऐसे ही बात-बात में बात हुआ की चलो चलते हैं वहां पे तो खड़े हो गए और चलना शुरू कर दिया है वो चलो उसे गार्डन में घूम के आते हैं चलो किसी रिलेटिव के वहां बैठ करके आते हैं चलो किसी के घर जाकर के मिलकर के आते हैं नेचुरल अभी मंदिर में जाना है इच्छा होने से खड़े होकर के चले जाते थे ऐसा कुछ पकाने वाला ऐसा कुछ नहीं था आज हम इतने सारे चीजों में बंदे हुए हैं की मैं चने से पर चने से भी इच्छा हो करके चलो आज दो दिन छुट्टी लेकर वहां पर चला जाता हूं ऐसा होने वाला नहीं है मुझे प्लेन करना पड़ेगा सब यहां के रिस्पांसिबिलिटी किसी को देनी पड़ेगी तब कहानी जाकर के मैं अपने को छोड़ पाऊंगा यहां से मुक्त कर पाऊंगा हम सबके साथ में यह इतना हम यह जो आज का जीवन है इतना फास्ट पास जीवन हो गया है की सब समय हमारा कुछ ना कुछ इंगेजमेंट राहत है एक मुंह एक बिना कम के हम बैठे हैं एक फ्री टाइम हमारे पास में है लगता ही नहीं है की हमारे पास में फ्री टाइम है जी समय में हम हम जो चाहे वो कर सकते हैं ऐसा कभी होता ही नहीं सब चीज करने के लिए हमको प्लेन करना है सब कुछ करने के लिए हमको पहले से सोच करके रखना है पहले से ही स्टेप्स लेने हैं तब कहानी जाकर के वो हो पाएगा एक जो स्पॉन्टेनििटी जिसको अंग्रेजी शब्द है उसका मुझे पता नहीं की हिंदी क्या होगा किंतु स्पॉन्टेनििटी अर्थात की मैंने अभी सोचा और अभी उसको कर लिया अभी अभी ही उसको प्लेन करके ऐसा करके वो पहले से ही डिसाइड करके इसे नहीं कंटिन्यूट अभी अभी सोचा अभी कर लिया वो अपने जीवन में से धीरे-धीरे करके वो देख रहे हैं की चला जा रहा है तो एक सरल जीवन की और हम वापस से ये परलो परलोक वाद यह आज भौतिक जगत में हम इतने लिपट हो गए हैं की इसके पैर भी एक जगह है जिसके लिए हमको समय देना है जिसके लिए हमको एक स्पॉन्टेनियस एक एक होप एक्सपेंदी फिर एक क्या कहेंगे एक आधार वर्ल्डली ने ये सब हमको डेवलप करना है ऐसा हमको कभी कभी हम लोग भूल जाते हैं और इस तरह के हम जिसमें देखते हैं मैं इसी में पहले बार गया था ट्रेनिंग सेंटर बैलून मठ में होता है तो ट्रेनिंग सेंटर में क्या है की 2 साल हमको रहना है वहां पे शास्त्र है ठाकुर मां स्वामी जी की बातें हैं सब कुछ सीखना है तो वो बड़ा ही इंटेंस एक्सपीरियंस राहत है सुबह को 4:00 बजे से मंगल आरती से शुरुआत करके एक पूरा एक शेड्यूल बनाया हुआ होता है हमारे लिए तो एवरी मोमेंट एवरी मिनट एवरी अवर शेड्यूल को फॉलो करना है तो मैं जी दिन पहले ही दिन गया था तो वहां पर एक सीनरी महाराज मुझे बोलना है की भाव में रहने से यहां पे नहीं चलेगा यहां पे बिल्कुल प्रैक्टिकल होके रहना पड़ेगा तो मैंने कहा मुझे एकदम दुख हो गया मैंने कहा की देखो ठाकुर खुद सब समय भाव में रहते थे ठाकुर खुद किसी समय किसी चीज का प्लानिंग नहीं करते थे किसी तरह का रूटीन में ठाकुर को बंद करके नहीं रख सकते थे लट्टू महाराज का वो है स्वामी जी ने बता दिया था की घंटा पढ़ने से सबको मंगल अब मंदिर में जाना है तो लेटो महाराज बड़े ही नाराज हो गए बोले स्वामी जी को बोलने को ले गए की जो तुम आज मॉडर्न मॉडर्न जो सब पश्चिम ये जो सब विचार ले ए रहा है और वेस्टर्न आइडिया उसकी तरह घंटा पड़ा और मैं जब करने को बैठी ऐसा मेरे से नहीं होने वाला है मैं चला हूं यहां से मैं जा रहा हूं मठ में नहीं रुकूंगा तो स्वामी जी एकदम खड़े होकर उनका हाथ पकड़ लिया अच्छा ठीक है ठीक है यह सब नियम कानून तुम्हारे लिए नहीं है तुमको जी तरह से रहना चाहे जब इच्छा चाहे जब करो जब इच्छा चाहे खाओ जब इच्छा चाहे सो जो अभी ऑफ कोर्स इतना तो बेलूर मठ में होने नहीं है लात मारा जब भी बेलूर मठ में ज्यादा रहे भी नहीं किंतु एटलिस्ट उनको पता है की सबके साथ में चलना चाहिए तो देखिए की इस तरह का एक अपना था हिस्ट्री और आज हमें की इतने सारे नियम कानून में शेड्यूल में टाइम लाइन में फैंस गए हैं की ऐसा लगता है की कहानी हम अपना जो मुख्य उद्देश्य है ईश्वर प्रताप ठाकुर का साक्षात्कार या तो आत्मा साक्षात्कार उसको कहानी भूल तो नहीं गए हैं इस तरह के जीवन में किंतु अब स्वामी जी ही तो ये सब चीजों की शुरुआत करके गए हैं यहां पे कल ही एक देवोटी के साथ में मेरी बात हो रही थी तो व्हाट्सएप पर उसने मैसेज किया की एक और तो ठाकुर कहते हैं की किसी मंदिर में जाते हो तो काली मंदिर में जैसे जाते हो तो काली मंदिर में जान के समय क्या तो मां का पहले दर्शन करोगी कैसे भी करके मां का दर्शन प्राप्त करोगे ना की फिर बाहर में खड़े र करके भिखारी को भिक्षा देने में समय गाव डॉग ऐसा ठाकुर सकते हैं दूसरी और स्वामीजी का एक इंसिडेंट है स्वामीजी बड़े ही विमर्श हो करके बैठे थे कोई एक मारवाड़ी एक उनके पास में आया धनी व्यक्ति और शास्त्र चर्चा करने के लिए और स्वामी जी बड़े ही नाराज होकर के बोल दिए की ये सब शास्त्र चर्चा को छोड़ो पहले ये देखो की तुम्हारे आस-पास में कितने गरीब लोग बैठे हैं कितने भूखे लोग बैठे हैं उनको कुछ खाने को दो जब तक उनको खाने नहीं डॉग तुम्हारा शास्त्र चर्चा किसी कम का नहीं है तो ये वॉलेंट देवोटी है अपना उसने प्रश्न किया की ये दो इंसिडेंट है क्या इसमें क्या विरोधाभास नहीं है अब ए जगत और परलोक जगत यह जो भौतिक जगत है स्वामी जी का हमको भौतिक जगत में बंद देना चाहते हैं क्या ठाकुर क्या परलोक या तो फिर आधार वर्ल्ड के बड़े में एक दूसरे जगत के बड़े में बात कर रहे हैं स्वामी जी हमको इस जगत में बांधना चाहते हैं की इन दोनों में विरोधाभास नहीं है तो विरोधाभास वैसे नहीं है लगता है फिलोसॉफिकल नहीं है क्योंकि हम लोग पूरा समय जब ध्यान करके नहीं र सकते हैं कर्म और चिंतन प्रार्थना कर्म तो हमको करना ही है आप कर्म प्रार्थना वगैरा भीमबेर कितना करेंगे देवर इस वन लिमिट के आपका बॉडी आपका मन कितना ले पाएगा तो कर्म तो आपको करना ही है भजन तो आपको जुगाड़ करना ही है तो क्यों नहीं सत्कर्म करके हम अपना भजन का जुगाड़ करें क्यों हम दुष्कर्म करके अपने भजन का जुगाड़ करेंगे तो वैसे साइकोलॉजिकल भी कुछ गलत नहीं है फिलोसॉफिकल भी कुछ गलत नहीं है बोल करके मैंने उनको लंबा लंबा आर्गुमेंट दिया और हमको सबको पता है की ठाकुर और स्वामी जी के बीच में विरोधाभास आप कितना ही दिखे आप परफेक्टली उनको ऐसा कभी खाने वाले नहीं है की हां सही-सही विरोधाभास है हम सबको पता है की 8 1.30 रिकॉन्सिलिएशन 8 मनी किंतु फिर भी इसे प्रश्न बार-बार होते हैं सबके मां में होते हैं भक्तों के मां में भी हमारे मां में भी की यह जो आधार वर्ल्ड है यह जो परलोक है और उसके भीतर में हमको इस जगत की रिस्पांसिबिलिटी बिल्कुल छोड़कर के एक्सपेंशन बिहेव करना है तो वो हमसे होगा की भी नहीं तो ये जो सब चिंतन देखिए की जिसके भीतर में यह सदगुण राशि विजय प्राप्त करती है ऐसे लोगों के पास बैठकर के हमारी ये सब दुविधा हमारी शंका हमारे मां के यह जो टेंशन वगैरा धीरे-धीरे करके दूर होते हैं और हमको हमारे मां को शांति होती है और जिनके मां में दुर्गुण राशि विजय प्राप्त करती है उनके पास में जान से ही पता चला है की हर या हमारे मां में भी द्वेष ईर्षा क्रोध वगैरा का जन्म होता है और ऐसे लोग खुद तो बड़े परेशानी में रहते ही है पूरे जगत में परेशानी फ्लेट हैं तो यह अंतर का जो युद्ध है सिर्फ अंत में नहीं राहत वो उसका एक रिप्पल इफेक्ट इसका साइड इफेक्ट इस बाहर के जगत में भी आता है और इसीलिए पहले के युद्ध थे सिर्फ बाहर के जगत में होते थे आज के युद्ध सिर्फ बाहर के जगत में नहीं वो सिर्फ अंदर के जगत में नहीं बाहर के जगत में भी दोनों जगत में वो होते हैं डेट इस वही दिस आज का मॉडर्न देवसर संग्राम और भी बड़ा खतरनाक है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति