प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी द्वारा लिखित मां का जीवन और संदेश इसका हम पाठ कर रहे हैं। जिस चैप्टर का नाम जो चैप्टर हम पाठ कर रहे हैं, उसका नाम है भार समर्पण। अर्थात कि ठाकुर ने यह जो आधुनिक युग में अपने सनातन धर्म का पुनः प्रचार प्रारंभ किया। सनातन धर्म को आज की भाषा में जिन्होंने नवजीवन प्रदान किया। यह ठाकुर का जो मिशन था, इस मिशन में जिम्मा ग्रहण करने के लिए इस मिशन का दायित्व स्वीकार करने के लिए ठाकुर श्री मां शारदा देवी को धीरे-धीरे करके तैयार कर रहे थे। तो वह जो दायित्व मां ने स्वीकार किया जो भार उन्होंने स्वीकार किया उसी का विवरण इस चैप्टर में हम पढ़ रहे हैं। अभी तक हमने देखा कि इस चैप्टर के प्रारंभ में ही अह गंभीरानंद जी महाराज हमको कहते हैं कि ठाकुर ने मां की शोडशी पूजा करके मां के भीतर में जो सूक्त जगत धात्री या तो फिर मातृशक्ति थी, उसको आवाहन तो दे दिया है, किंतु वह आवाहन दिया गया था मध्य रात्रि को और लोगों की नजर से बाहर। किसी को पता नहीं था कि यह पूजा हुई है। जिस समय हो रही थी उस समय और बाद में इसकी कुछ कुछ कहानियां भक्तों में अवश्य प्रसारित तो हुई थी किंतु इसका क्या महात्म है वह स्वामी विवेकानंद छोड़कर के और किसी को वह समझ नहीं आया था। तो इसीलिए यहां पर गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि ठाकुर की इच्छा थी कि अभी सर्व के सामने सर्व भक्तजनों के सामने मां की महिमा का प्रकाश किया जाए। तो उसी को लेकर के जो कुछ प्रसंग हुए हैं दक्षिणेश्वर में उसका वर्णन यहां पर है। किंतु यह आलोचना प्रारंभ करने से पहले एक पॉइंट गंभीरानंद जी महाराज हमारे सामने रखते हैं। वो कहते
ठाकुर के युगधर्म-प्रवर्तन प्रयास को सफल बनाने के लिए माँ भी तत्पर थी
हैं कि जब ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं या तो फिर जिस तरह से महाराज जी ने बड़ा सुंदर जो एक फ्रेज यूज किया था शिक्षा दीक्षा उद्दीपना यह तीन देकर के जब ठाकुर मां को प्रिपेयर कर रहे हैं कि भविष्य का रामकृष्ण संघ है। रामकृष्ण भक्त मंडली है। रामकृष्ण शारदा परिवार है। उसका दायित्व, उसका गुरुत्व पद पर आसीन तो मां को ही होना होगा। तो यह जब विवरण हम पढ़ते हैं तो हम कहीं यह ना मान लें कि यह जो मां के जीवन में जो गुरु शक्ति इष्ट शक्ति या तो देवी शक्ति का प्रकाश बाद में हमको जो देखने को मिलता है वह ठाकुर की शिक्षा दीक्षा और उद्दीपना के वजह से ही थी। हालांकि ठाकुर की जो भूमिका है वह ऑफकोर्स कि बड़ी ही महत्वपूर्ण है। किंतु यह पॉइंट यहां पर गंभीरानंद जी हमको कहते हैं कि यदि मां की खुद की इच्छा ना होती, मां की खुद की अंतर्निहित यह देवत्व वहां पर उपस्थित ना होता तो ठाकुर चाहे जितना भी समय उनके पीछे में दे, मां को कितना ही शिक्षा दे, मां यह महत कार्य जो भविष्य में उनको करना था, वह नहीं कर पाती। यानी कि यहां पर मां के आध्यात्मिक गुरु के पद पर आसीन होने की जो यात्रा है उसमें श्री रामकृष्ण देव का जितना अवदान है उतना ही यहां पे मां की खुद की प्रिपरेशन मां का खुद का जो पोटेंशियल डिविनिटी है वो और वह मां का खुद का यह एक तरह से मातृत्व भाव कि जैसे ही मां के पास में इन लड़कों को ठाकुर ने भेजने की शुरुआत की त्यागी त्यागी संतानों को भेजने की शुरुआत की या तो फिर महिला भक्तों को स्त्री भक्तों को भेजने की शुरुआत की। तो जैसे ही यह लोग मां के पास में आए इमीडिएटली मां के मातृत्व हृदय ने इनको अपने पास में खींच लिया। माने लिटरली माने मेटाफोरिकली भी और लिटरली भी जो हमने योगिन मां की कहानी हमने पढ़ी थी पिछले चैप्टर में कि जब रात योगिन मां जब मां के पास में शयन करती थी वहां पे नहबत में तो मां उनको खींच के अपने पास में बुला देती थी जिससे कि देखिए कि यह जो मां और पुत्री का जो संबंध होता है एक दिव्य संबंध होता है जिसको कि हम संसार सार की दृष्टि से कभी समझ ही नहीं पाएंगे। वह संबंध स्थापना की शुरुआत वहीं पर नहबत में हो गई थी। एक जगह पे इस तरह का भी विवरण है कि जब कोलकाता से बाकी सब स्त्री भक्त आती थी तो ठाकुर थोड़े चिंतित हो जाते थे कि इनको यदि रात रहना है तो रात कहां पर रहेंगे। क्योंकि ठाकुर को तो पता था कि नहबत इतना छोटा है कि वहां पर और फिर मां के शयन की व्यवस्था है। लक्ष्मी दीदी वहां पर निवास करती है। वहीं पर फिर ठाकुर के आहार भोजन बनाने की पकाने की सब व्यवस्थाएं हैं। इतना सा तो छोटे से कमरे में सब कुछ है। तो कोलकाता से जो स्त्री भक्त आएगी उनको ठाकुर कैसे नहबत में सोने को भेजें। रात को शयन करने को भेजें। इसलिए ठाकुर इनको क्या कहते थे? यह जो वरांडा है ठाकुर के कमरे का बाहर का वहीं पर यह आप लोग शयन कर लीजिए। ऐसा कुछ ठाकुर उनको कहते थे। किंतु यहां पर मां भी अलर्ट रहती थी कि कब कौन स्त्री भक्त ठाकुर के पास में आती है। तो जैसे ही वह ठाकुर को ऐसा कुछ कहते सुनती या तो फिर स्त्री भक्त जब मां को कहती कि ठाकुर ने हमको उन्हीं के वरांडे में सोने को कहा है, तो मां कहती कि तुम लोग सब यहीं पर नहत में ही आ जाओ। कैसे भी होगा मैं व्यवस्था कर लूंगी। तो यह जो है कि रात को शयन के लिए स्त्री भक्त आती थी। वह सभी मां के साथ में वही छोटे से नौबत के भीतर में ही यह लोग भी शयन करती थी। तो लिटरली एंड मेटाफोरिकली जैसे ही भक्तों का आगमन यह शुद्ध सात्विक बालक भक्तों का स्त्री भक्तों का आगमन आना शुरू हुआ। मां ने जैसे कि अपने दोनों हाथ अपने दोनों हाथों से अपने पूरे विशाल हृदय से इनको अपना लिया था। तो यह एक क्रिटिकल पॉइंट यहां पे गंभीरानंद जी महाराज हमारे सामने लिखते हैं। क्या कहते हैं? ए आलोचनार पूर्वे एक्ट विषय आमादग के विशेष सावधान होइते होइबे। यह जो ठाकुर मां को शिक्षा दीक्षा और उद्दीपना देकर के किस तरह से गुरुत्व पद पर आसीन होने के लिए तैयार कर रहे थे। इस विषय की आलोचना प्रारंभ करने से पहले एक बड़ा ही महत्वपूर्ण विषय के बारे में हमको विशेष सावधान होते होबे विशेष रूप से सावधान होना होगा। आमरा जेनो ए महाभ्रम पति तो ना होई जे सुधु श्री रामकृष्ण शिक्षा गुण श्री मां आज जगत वर्णणीय होइया छे हम लोग कहीं इस महाभ्रह में ना पड़ जाए कि सिर्फ श्री रामकृष्ण देव की शिक्षा के माध्यम से ही श्री मां आज जगत वरेणीय हो हुई है। जगत वरेणीय अर्थात कि समग्र जगत की पूजिता हुई है। यह भ्रम महाभ्रम देखिए महाराज जी शब्द यूज करते हैं इस महाभ्रह में हम ना पड़ जाए पतित ना हो यह पतित ना हो अर्थात कि गिर ना जाए देखिए कि इस सेंटेंस का जितना भी शब्द है वो सभी शब्दों को इस तरह से चयन किया गया है जैसे कि हमको बड़ी ही सावधानी वर्तने की जरूरत हो वरना पतित ना हो यानी कि गिर ना पड़े इस महाभ्रह में ऐसा नहीं बोलकर करके महाराज तो ऐसा भी लिख सकते हैं कि महाभ्रम जनोमरा आद सन्मुख है आशितो ना हो या तो फिर इसी तरह से कि हमारे सामने यह भ्रम ना आन पड़े कि हां मां मां जो भी बाद में हुई थी वह सब ठाकुर की शिक्षा के परिणाम से ही था क्योंकि जैसे हमको पता है कि जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में एक स्वामी विवेकानंद ही थे और फिर जो गुरु भ्राता थे जो कि उनकी सेवा करते थे जैसे कि योगेन महाराज या तो त्रिगुणातीतानंद जी और बाद में शारदानंद जी जिनको कि मां की महिमा के बारे में सबसे ज्यादा ज्ञात था किंतु फिर यह बाकी जो भक्त मंडली थी उनमें सभी में मां की महिमा के बारे में ऐसा कुछ प्रचार नहीं था और फिर कोईकोई तो ऐसा भी सोचते थे कि अरे गुरु पत्नी है तो बोलकर के यह जो त्यागी संतान है यह सन्यासी शिष्य है वे लोग उनको सर पर चढ़ा रहे हैं। तो इसीलिए और फिर वहां पर उस समय का जो कंजर्वेटिव सोसाइटी था कि स्त्रियों की जगह समाज में वैसे भी निम्न कक्षा की है और फिर यहां पर मां तो फिर विधवा थी तो पता है ना कि विधवा के लिए कितने कठिन कठिन नियम हुआ करते थे। उस समय वह समाज के कोई भी शुभ मंगल कार्य है उन उसमें उनको जैसे कि अनुमति नहीं थी हिस्सा लेने की वैसा बहुत ही कठिन एक विधवा का जीवन हुआ करता था तो मां एक तो स्त्री दूसरी विधवा और फिर यह बाद में बाद में यह जो बच्चों के बारे में जो उल्लेख आता है कि यह मां भी सुना सोच किसी किसी ने मां को कहा था कि तुम्हारा तो बच्चा हुआ नहीं है और समाज की जो प्रथा है कि जो जिस स्त्री का बच्चा नहीं हुआ है या तो जिस स्त्री ने बच्चे को जन्म नहीं दिया है यह स्त्रियां कुछ-कुछ शुभ कार्यों में हिस्सा नहीं ले सकती है। यानी कि तीनों तरह से देखिए कि समाज के जितने भी बंधन जितने भी रिस्ट्रिक्शन एक ऑर्थोडॉक्स हिंदू फैमिली किसी एक स्त्री पर डाल सकता है। वह सब मां शारदा देवी को अप्लाई होते थे। पहले तो वह स्त्री थी। दूसरा कि वह विधवा थी। तीसरा कि उनका कोई संतान नहीं था। तो यह समाज में इस तरह की स्त्रियों को खास करके उस समय के समाज में जो परिस्थिति थी उस परिस्थिति में से यदि यह त्यागी संतान सन्यासी शिष्य जाकर के उनको गुरु और इष्ट की पदवी देना शुरू करें तो फिर वह जो सामान्य भक्त थे बाकी सब ठाकुर के वह लोग यह सोच सकते हैं कि अच्छा इनका तो जितना भी अशुभ हो सकता है जिस किसी को लग सकता है वो वो सब अशुभ मां को लगे हुए हैं। तो फिर इनको इतना सम्मान देने की क्या जरूरत है? तो श्री रामकृष्ण देव उनके पति थे। बोलकर के ही जो थोड़ा बहुत सम्मान की वह अधिकारिणी है। तो हो सकता है कि किसी के भीतर में यह सब चिंतन चल रहा होगा बोलकर के ही। हालांकि यह किताब लिखी गई है 1950 के आसपास में। तो फिर उस समय तो भारत इंडिपेंडेंट हो गया था। किंतु क्या है कि रूढ़ चुस्त समाज की यह जो प्रथाएं हैं वह बड़े लंबे समय तक टिकती रहती है। टिकी होती है। आजकल यदि हम लोग ऐसा दावा तो भले चाहे कहे कि इंडिया अभी 21 सेंचुरी में आ गया है। फिर यह कंप्यूटर साइंस वगैरह आईआईटी, स्पेस साइंस वगैरह में हम बड़ा ही एडवांस होते रहे हैं। किंतु आए दिन आप न्यूज़ पेपर में पढ़ेंगे कि स्त्रियों पे किस तरह के अत्याचार हो रहे हैं। और म समाज के भीतर में स्त्री की क्या परिस्थिति है वो सब वो अभी भी बहुत सारी जगह पे यह सब कुछ है। तो इसीलिए पहले से ही अलर्ट होकर के गंभीरानंद जी ने यह कहा है कि हम जैसे कि इस महाभ्रह में पतित ना हो जाए कि ठाकुर की शिक्षा की वजह से ही भविष्य में मां जगत की पूजिता हुई थी। अध्यापना शास्त्र इहा एक मौलिक कथा जे शिष्य शुभ संस्कार ना थाकिले गुरु शतो चेष्टा सत्यो ताहार अंतर्निहितो शक्ति जागरितो ओ कार्यखम होय ना अध्यापन शास्त्र का एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है कि शिष्य के शुभ शुभ संस्कार ना हो तो गुरु चाहे 1000 बार भी प्रयत्न करें उसके बावजूद जो शिष्य की जो अंतर्निहित शक्ति है वह ना जागृत होगी ना कार्यक्षम होगी। तो जिसने भी यह क्लास में बच्चों को पढ़ाया है उनको पता ही होगा कि टीचर जैसे अभी कल ही मैं मेरी किसी के साथ में बात हो रही थी तो वो पूछ रहा था कि अभी यह जैसे संस्कार है तो सभी के अलग-अलग है। ऐसा क्यों? यदि एक ही एनवायरमेंट में सभी को रखें तो इक्वल डेवलपमेंट क्या नहीं होना चाहिए? तो देखिए कि आप इक्वल डेवलपमेंट एक क्लास में 10 बच्चे मान लीजिए 50 बच्चे पढ़ते हैं। एक ही टीचर सबको एक समान रूप से सिखाते हैं तो उसमें भी देखेंगे कि कोई-कोई वो फर्स्ट क्लास से पास होते हैं। कोई सेकंड क्लास से, कोई थर्ड क्लास से और कोई फेल होता है। तो टीचर यदि फेवरेटिज्म ना भी करें सबको इक्वल वह अटेंशन दे अपना पूरा शक्ति वह सिखाने के लिए लगा भी दे तो भी चाहे सर्वश्रेष्ठ शिक्षक क्यों ना हो इस जगत का वो सभी को तो वो इक्वल अटेंशन दे उन्हें इक्वल लेवल पर नहीं ले आ पाएगा ठाकुर को ठाकुर को ही देखिए ठाकुर जैसे अवतार वरिष्ठ स्वयं जहां पर गुरु थे तो यह जो जितने भी शिष्य ठाकुर जितने भी भक्त उनके पास में आते थे। उनमें भी देखिए कि कैटेगरी होना शुरू हो गया था। यहां पे वह गृहस्थ भक्त है। फिर गृहस्थ भक्तों में भी एक बहिरंग और अंतरंग इस तरह से डिवीजन हुए हैं। अंतरंग में भी दो डिवीजन हुए हैं। त्यागी संतान और गृहस्थ संतान। तो इस तरह से तीन डिवीजन तो ठाकुर के रहते-रहते ही हो चुके थे। और यह त्यागी संतानों में भी एक था नरेंद्रनाथ। नरेंद्रनाथ और राजा महाराज हमारे राखाल स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज जिन दोनों का सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक उपलब्धि था। तो चार डिवीजन यदि कहे कि एक सर्वश्रेष्ठ आते हैं यह स्वामी जी और राजा महाराज उसके बाद में यदि कैटेगरी कहे तो बाकी सब त्यागी संतान उसके बाद में कहे कि अंतरंग गृहस्थ भक्त और फिर चौथी कैटेगरी में कहेंगे बाकी सब कोई जो कि जितने भी भक्त ठाकुर के पास में आए तो ऑलरेडी ऐसा क्या ठाकुर में इतनी शक्ति नहीं थी यदि स्पर्श मात्र से वह आध्यात्मिक शक्ति प्रदान कर दे सकते थे तो वो वो नरेंद्र को ही इतनी शक्ति उन्होंने क्यों प्रदान की? राजा महाराज को ही उन्होंने इतनी शक्ति क्यों दी? बाकी सब त्यागी संतानों को क्यों नहीं दी? देखिए त्यागी संतानों में स्वामी जी राजा महाराज तो है ही है। ऊपर से फिर ईश्वर कोटि वाली एक कैटेगरी है जिसमें कि छह उनके संतान आते हैं। यह स्वामी जी है, राजा महाराज है, बाबूराम महाराज है, योगेन महाराज है, निरंजनानंद जी है और एक था पूर्णम। तो अभी पूर्ण तो गृहस्थ हो गया था। उसको खींच के क्यों नहीं सन्यासी बना दिया और यदि बाकी सबको भी उन्होंने जी ईश्वर कोटि क्यों नहीं बना दिया हालांकि महापुरुष महाराज ने बाद में कहा है कि हम लोग तो थे वैसे ईश्वर कोटि नहीं थे ईश्वर कोटि होकर के जन्मे नहीं है किंतु ठाकुर ने हमको ईश्वर कोटि बना दिया है तो चलो ठाकुर के पास वह शक्ति थी तो यह शक्ति का प्रयोग उन्होंने वहीं पर दक्षिणेश्वर में ही क्यों नहीं किया तो इसका उत्तर वही है कि जो विद्यार्थी है उसका क्या पोटेंशियल है वह देखना पड़ता है। विद्यार्थी के पोटेंशियल के अनुसार ही जितना ही चाहे उत्तम शिक्षक क्यों ना हो वो इसी तरह से शिक्षा दे सकता है कि उसका अंतर्निहित पोटेंशियल बाहर आए। या तो फिर मैं थोड़ा सा इसको चेंज करके कहूंगा शब्दों को कि पोटेंशियली तो हम सभी लोग इक्वल ही है। डिवाइन ही है। हम सभी में वही ब्राह्मण है। किंतु वही है कि मैनिफेस्ट करने की जो शक्ति है वह हम सब लोगों की अलग-अलग होती है। जैसे विद्यासागर को ठाकुर कहते हैं कि हम तुमको देखने के लिए क्यों आए हैं? तुम्हारे क्या दो सिंह निकले हैं कि हम तुमको देखने को आए। जनरली ऐसे फ्रिक शो होता है ना फ्रिक फ्रिक यानी कि ऐसा विचित्र ढंग का आदमी जिसको कि यह लोग सर्कस में रखते हैं। कोई बहुत छोटा होगा हाइट में उसको सर्कस में रखेंगे। कोई बहुत लंबा होगा तो उसको सर्कस में रखेंगे। तो इस तरह से कोई अद्भुत विचित्रताएं या तो फिर शारीरिक विकार किसी में होता है तो ऐसे लोगों को सर्कस में रखा जाता है और ऐसे लोगों को देखने के लिए लोग भी आते हैं तो यह क्या उसके सर पर सिंह थोड़ी ना उगे हैं इस तरह का कोई शारीरिक विकार थोड़ी ना है उनमें कि उनको सर्कस में रखा जाए विद्यासागर को और वैसे उनको देखने को आए नहीं उनकी विद्या शक्ति है दया शक्ति है बोलकर के ही तो ठाकुर उनको देखने के लिए गए हैं तो यह शक्ति का तारतम्य है या तो फिर यह डिवीजन है वह तो होगा ही होगा। अभी
ठाकुर की शिक्षा और माँ की अद्भुत संकल्प शक्ति के समन्वय से माँ बनती है जगत-गुरु
प्रश्न है कि यह इस तरह का डिवीजन क्यों होता है? तो इसके पीछे में जो रूट कॉज है वह है विल पावर। यह विल पावर जिसका जितना स्ट्रांग होगा, उतना ही वह अपने को इस तरह से अह अपनी शक्ति को इतना ज्यादा मैनिफेस्ट कर पाएगा। देखिए कि यह जो ठाकुर जो सिखाते हैं और मां अपने खुद के प्रयास से करती है। यह जो एक उदाहरण यदि हम देखेंगे तो नो डाउट हमको यह तो पता ही होना चाहिए कि जब अर्ली मॉर्निंग को उठकर के जब वह ठाकुर झाऊला में शौच के लिए जाते थे तो कभी-कभी देखते थे कि यह अभी भी लक्ष्मी दीदी और मां जो नहबत में रह रही है वहां पर दिया नहीं जल रहा है। यानी कि क्या इसका अर्थ है कि दरवाजा तो बंद रहता था जब रात को शयन के समय अभी यदि यह लोग उठ जाते तो दिया जलाते। यदि दिया जलता तो दरवाजे के नीचे में जो पतली सी जो छोटी सी जगह होती है, वहां से दिए का प्रकाश दिखाई देता। तो दिए का प्रकाश दिखाई देता है। इसका अर्थ है कि मां और लक्ष्मी दीदी उठ गए हैं। उठकर के प्रातः कर्म समाप्त करके जप करने का प्रारंभ कर दिया है या तो उसकी तैयारी कर रहे हैं। किंतु यदि वह दिए का प्रकाश नहीं दिखता तो उसका अर्थ है कि यह लोग अभी भी सोए हुए हैं। तो ठाकुर क्या करते हैं कि यह गंगा में से एक बालती जल भर करके उस दरवाजे के नीचे में जो जगह होती है वहां से वह ढाल देते हैं। पहले तो एक दो बार चिल्लाते और फिर पता है कि मां कहती है लक्ष्मी दीदी को कि अरे तुम चुपचाप सोती रहो। उनकी आंखों में तो नींद नहीं है। उनको तो वैसे ही नींद नहीं आती है। और अभी तो यह कोयल, कोकिल वगैरह ने वह पुकारना शुरू नहीं किया है। सुबह होती है तो चिड़िया कैसा अपना संगीत सुमधुर प्रारंभ कर देती है। जो कि जो लोग नेचुरल एटमॉस्फियर में रहते होंगे उनको यह पता होगा। तो इसलिए वो मां कहती थी लक्ष्मी दीदी को वह तो चिल्लाते रहेंगे। अभी चिंता मत करो और थोड़ा सा सोलो तुम। तो ठाकुर क्या करते कि वह दरवाजे के नीचे में से वह पानी ढाल देते हैं। अभी वह वैसे ही छोटा सा जगह है और उसमें वह बिस्तर वगैरह तो जमीन पे ही लगाया हुआ है। चटाई वगैरह और यदि वह भीग जाएगी तो तो सूखना मुश्किल है उसको तो ये लोगों को जोर एकदम फटाफट करके खड़े हो जाना पड़ता था और बिस्तर को समेट लेना पड़ता था। तो ठाकुर ने यह शिक्षा मां को दी तो है किंतु साथ-साथ में ही हमारे पास में मां का भी एक प्रसंग है। मां के खुद के मुंह से हमने यह बात सुनी है। मां क्या कहती है कि एक बार मैं बीमार हो गई थी। बुखार जैसा था तो एक दिन मैंने सोचा कि मैं आज सुबह को नहीं अर्ली मॉर्निंग नहीं उठती हूं। तो ठीक है। अभी पहले दिन ना उठी शरीर खराब था। अस्वस्थ थी। अभी दूसरे दिन भी शायद ऐसा कुछ हुआ होगा। तीसरे दिन भी देखा कि शरीर धीरे-धीरे तो ठीक हो रहा है। किंतु अभी यह क्या है कि यह शरीर खराब है। मैं बीमार हूं। यह बात मन में जो घर कर गई है। तो अभी वो यह क्या है ना सेल्फ हिप्नोसिस इसको कहते हैं। या तो कहते हैं सेल्फ कंडीशनिंग। हम लोग इस भ्रम में यह जो गमीरानंद जी कहते हैं ना महाभ्रह में पतित नहीं होना है कि ठाकुर की शिक्षा की वजह से श्री मां आज जगत में पूजनीय हुई है तो वही महाभ्रह में हम अपने को डाल देते हैं। हम अपने को सेल्फ हिप्नोटाइज कर देते हैं कि हां मैं बीमार हूं। मेरा शरीर खराब नहीं है। आज सुबह को छोड़ दो कल जाएंगे मंगल आरती में। या तो फिर कल अर्ली मॉर्निंग उठकर के जप करने के लिए बैठेंगे। ऐसा हम अपने को सेल्फ हिप्नोटाइज कर लेते हैं। तो मां ने कहा कि देखो कि मेरे साथ में सही सही में ऐसा हुआ। कुछ दिनों तक तो मैं सुबह को उठना ही बंद कर दिया। एकाएक मुझे एक दिन ख्याल आया कि अरे यह मैं क्या कर रही हूं? शरीर बीमार था। वह जो एक्सक्यूज था वह तो चला गया। अभी तो शरीर ठीक है। तो अभी मैं क्यों नहीं उठ पा रही हूं सुबह को? तो यह जो सेल्फ हिप्नोटिज्म का जो पावर है मां को उस समय पता चला और इमीडिएटली मां ने कहा कि अभी उसके दिन दूसरे ही दिन मैं दृढ़ संकल्प लेकर के जो भी यह मन की जो मन का तमस है, शारीरिक यदि वो पेन है, सफरिंग है, सब भूल करके अर्ली मॉर्निंग उठकर के फिर से जप करना मैंने प्रारंभ कर दिया। तो यह विल पावर था कि जो कि मां को एक के बाद एक प्रतिदिन दिन प्रतिदिन अर्ली मॉर्निंग उठाकर के जप के लिए बिठाता था। तो देखिए कि मां सुबह को उठकर के जप करती थी। उसके पीछे दो कारण हमको पता है। एक तो है कि ठाकुर झाऊला जाने के समय चिल्लाते थे और चिल्लाने से काम नहीं होता था तो पानी डाल देते थे वहां पे जिससे कि उनकी चटाई वगैरह भीग जाए और वे लोगों को जबरदस्ती कंपलसरी खड़े होना पड़े। तो वह भी एक कारण था। यदि वह एक कारण था तो दूसरा यह भी था कि मां का दृढ़ संकल्प अपने को सेल्फ हिप्नोटाइज नहीं होने देना है। अपने को इस तरह से मैं बीमार हूं। मैं अस्वस्थ हूं। मेरा मन एकाग्र नहीं है। आज मेरा मूड खराब है। आज मैं मूड में नहीं हूं। कल मैंने रात को बहुत देरी तक पढ़ा था। या तो दिन में बहुत सारा काम किया था। इसके लिए चलो आज मैं छुट्टी ले लेता हूं। इस तरह से हमारा मन सतत हमको हिप्नोटाइज करता रहेगा। यह जो मां कहती है कि मन शांत क्यों नहीं होता है? ये जो सब लोग कंप्लेन करते हैं पत्र लिख के मन अशांत है। मन में शांति कैसे आए? मां ने कहा रोज एक बार 1 लाख जप करके देखे तो देखो कैसे मन में शांति नहीं आती है। तो यह जो मां ने 1 लाख जप करना प्रारंभ किया था वह वैसे ही तो नहीं हुआ होगा। कितना वो मानसिक शारीरिक संघर्ष से मां को गुजरना पड़ा होगा। तब कहीं जाकर के मां उस परिस्थिति में आ पाई थी कि प्रतिदिन 1 लाख जप करती थी। तो अभी देखिए
माँ सारदा सिर्फ देवी नहीं थी, वे एक मानवी भी थी और उन्होंने दृढ संकल्प शक्ति के साथ तपस्या भी की थी
यहां पे वो बात याद रखनी है कि मानवीय स्वरूप और दैवी स्वरूप इन लोगों के भीतर में दिव्यता तो थी ही थी किंतु साथ-साथ में मानवत्व भी था, मनुष्यत्व भी था। और जब हम इनके संघर्ष के बारे में, आध्यात्मिक स्ट्रगल के बारे में सोचते हैं या तो पढ़ते हैं। हमको यह याद रखना है कि आध्यात्मिक स्ट्रगल मनुष्यत्व वाला जो उनका एस्पेक्ट था उसी के माध्यम से हुई है। और यदि हम कहें कि इनके भीतर में डिनिटी ऑलरेडी थी। जगत धात्री जगदंबा स्वयं थी। तो फिर हमको वो शारदानंद जी महाराज द्वारा यह लीला प्रसंग में जो ट्रिक हमको समझाई गई है उसको याद कर लेना है कि जब यह शारदानंद जी महाराज यह कहते हैं कि ठाकुर के मनुष्यत्व के बारे में ठाकुर की साधनाओं के बारे में ठाकुर की अपूर्णताओं के बारे में चिंतन करने की आवश्यकता है तो फिर यह प्रश्न उत्तर प्रारंभ होते हैं। प्रश्न होता है कि ठाकुर तो अवतार ही थे तो फिर अपूर्णता कहां पे? अवतार ही थे। साधना का आवश्यकता कहां पे? साधना की आवश्यकता कहां पे? तो वो इसीलिए क्योंकि और दूसरी बात है कि शंकराचार्य ने स्वयं गीता की भूमिका में लिखा है देहवान इव जात इव देहवान इव अर्थात कि ईश्वर जैसे कि उन्होंने जन्म लिया है स्वयं पृथ्वी पे यह तो शंकराचार्य स्वयं स्वीकार करते हैं। तो ऐसा नहीं है कि आप यह कह दें कि हम सबके भीतर में ब्राह्मण है ही है। तो इसकी वजह से ठाकुर ने जो तपस्या की वह हमको करनी है। ठाकुर तो स्पेशल कैटेगरी थे। यह बात अद्वैताचार्य शंकराचार्य स्वयं कहते हैं। तो फिर इसी आर्गुममेंट को वह शरद महाराज घुमा देते हैं। यदि यह कहा जाए कि वह ठाकुर के भीतर में दिव्यता थी तो शंकराचार्य कहते हैं कि हम सबके भीतर में वही दिव्यता है। वही ब्राह्मण है। वह अलग ब्राह्मण में तो कैटेगरी अलग-अलग नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि अवतार के भीतर में दूसरा ब्राह्मण है और हमारे भीतर में दूसरा ब्राह्मण है। एक ही तो ब्रह्मन है। एक ही तो आत्मन है। एक ही तो डिविनिटी है। वो उनके भीतर में है। हमारे ही भीतर में है। हां उनको यह जन्म जन्मांतर का जो सद्गुण राशि यह जो सब होगा शुभ संस्कार इसका उनको जो बाय बर्थ एक बेनिफिट मिल रहा है। बाय बर्थ एक रिजर्वेशन मिल रहा है। तो हम इसी जन्म से तपस्या करना प्रारंभ कर दें। तो नेक्स्ट जन्म में हम भी एक तरह से कहेंगे कि वह मिलियनर होकर के ही जन्म लेंगे। फिर नेक्स्ट जन्म में और तपस्या करें तो उसके नेक्स्ट जन्म में बिलियनर होकर के जन्म लेंगे। फिर उस जन्म में और तपस्या करें तो उसके नेक्स्ट जन्म में ट्रिलियनर होकर के जन्म ग्रहण करेंगे। यानी कि वो बिलियन जब किया हुआ है बैंक में पड़ा हुआ है तो वही संपत्ति आध्यात्मिक संपत लेकर के हम फिर से जन्म ग्रहण करेंगे। तो वह तो हमारे पास में भी है। यानी कि इन लोगों की जो आध्यात्मिक स्ट्रगल है, इन लोगों का जो शुभ संकल्प शक्ति है, प्रचंड इन लोगों का विल पावर है, वह हमको ग्रहण करना है। ऐसा हम ना मान ले कि इन लोगों को विल पावर कल्टीवेट करने की जरूरत ही नहीं थी। इन लोगों का हॉट लाइन था कि स्विच ऑन कर देने से ही जो सूरज की शक्ति है सीधी यहां पर प्रकाशित होती है। जबकि हम लोग को कितने अंधेरे घर में रह रहे हैं। हमको यह अंधेरा घर धीरे-धीरे क्लीन करके 1000 साल लगेंगे कि जब खिड़की खोलेंगे तो सूरज का प्रकाश भीतर में आएगा। ऐसा बिल्कुल नहीं है। जिस क्षण हमने भी खिड़की खोली उसी क्षण यह जो हजार साल का अंधेरा घर है वह भी प्रकाशित हो जाएगा। तो यह विल पावर जो है वह विल पावर हम सभी के भीतर में होना ही चाहिए। जितनी दृढ़ संकल्प शक्ति होगी उतना ही हम हमारे भीतर की डिविनिटी को मैनिफेस्ट कर पाएंगे। तो यहां पर भी जिस तरह से यह बात हमको याद रखनी है, यही बात गंभीरानंद जी कहते हैं कि बाकी सब भक्तों को मां के बारे में याद रखनी है। कहीं यह ना सोच लो कि अरे वह तो जगदंबा ही थी। क्या कौन सा फर्क पड़ता है? उनको यह सब भविष्य में यदि उनका आध्यात्मिक यह जो प्रागट्यकरण हुआ स्पिरिचुअल मैनिफेस्टेशन हुआ तो वह तो आइदर आप कह सकते हैं कि अरे वह तो जगदंबा ही थी। या तो आप कहेंगे कि अरे वह तो ठाकुर के शिक्षा दीक्षा उद्दीपना की वजह से ही हुआ। तो यहां पर हमको महाराज कहते हैं कि इस महाभ्रह में पतित मत होना। यदि स्टूडेंट का विद्यार्थी का खुद का पोटेंशियल नहीं है तो टीचर चाहे श्री रामकृष्ण जैसे अवतार वरिष्ठाय भी क्यों ना हो वह भी ज्यादा कुछ नहीं करने वाले हैं। गुरु की 100 प्रयास होगा। उसके बावजूद उसकी अंतर्निहित शक्ति जागरित और कार्यक्षम हो ना शिष्य का शुभ संस्कार ना हो तो इसके बावजूद कि गुरु की 100 प्रयास के बाद में भी उसकी जो अंतर की शक्ति है वह जागृत नहीं होगी। आ से शुभ संस्कार सहित प्रयोजन होए शिष्य स्वतः प्रवृत्त सहजिता और उस शुभ संस्कार के साथ में आवश्यक होता है शिष्य का कोऑपरेशन स्वतः प्रवृत्त सहयोगिता स्वतः प्रवृत्त अपने से प्रारंभ हुई सहयोगिता यानी कि कोऑपरेशन अपने से यदि वह कोऑपरेट नहीं करेगा तो वह चाहे उसके भीतर में यह जो शुभ संस्कार हो तो वह भी कार्यक्षम नहीं होगा। तो यानी कि यहां पे दो कंडीशन है। यदि एकदम आपको बेस्ट स्टूडेंट होना है परफेक्ट आपको स्टूडेंट होना है तो पहले है कि आपके भीतर में शुभ संस्कार होने चाहिए। दूसरा है कि आपके भीतर में वह शुभ संस्कार को मैनिफेस्ट करने के लिए विलिंगनेस होनी चाहिए। विल पावर और विलिंगनेस यह दोनों है। विलिंगनेस देखिए कि बहुत सारे लोग बोलते हैं कि मेरे में विल पावर ही नहीं है। इसका अर्थ मैंने देखा है कि इन लोगों में विलिंगनेस ही नहीं है। विलिंगनेस अर्थात कि यह स्वतः प्रवृत्त होकर के सामने से आगे बढ़कर के उसको प्राप्त करने की इच्छा या तो फिर आज की ग्रॉस लैंग्वेज में कहेंगे तो एक तरह की एंबिशन एक तरह कीत्वाकांक्षा। यहत्वाकांक्षा हो एक सात्विकत्वाकांक्षा एक सात्विक एंबिशन अपने जीवन में एक पवित्र एंबिशन वो कोई गलत बात बिल्कुल नहीं है। मैं अपने जीवन में प्रतिदिन 1 लाख जप करना चाहता हूं। यह एंबिशन होना बहुत अच्छी बात है। यदि यह एंबिशन नहीं होगी तो फिर हम लोगों के पास में पोटेंशियल भी है। हम लोगों को सब कुछ पता भी है। किंतु उसके बावजूद हम उसको फिर कर नहीं पाएंगे। उसको अप्लाई नहीं कर पाएंगे नॉलेज को। तो यह स्वतः प्रवृत्त सहयोगिता अपने से प्रारंभ हुआ कोऑपरेशन यह बड़ा ही आवश्यक है। आमरा क्रमे देखी ते पाइबो जे ठाकुर जुगत धर्म प्रवर्तन चेष्टा के फलवती करब जनो श्री माता ठाकुरानी से दक्षिणेश्वरे दक्षिणेश्वर जीवन काले आग्रहितो छिले हम लोग धीरे-धीरे देखेंगे क्रमशः देखेंगे कि ठाकुर का युग धर्म प्रवर्तन चेष्टा यानी कि युग धर्म प्रवर्तन प्रयास में उसको फलवती करिबार्जन उसको फल प्रसु उसको उसको प्रैक्टिकल अप्लाई करने के लिए उसको एक्चुअली मैनिफेस्ट करने के लिए श्री श्री माता ठाकुरानी उसी दक्षिणेश्वर के जीवन काल से ही आग्रहान भी तो छी लेन माने सिर्फ वो उसमें विलिंगनेस वो नहीं थी उनमें आग्रह भी था आग्रहवान थी ये क्यों किस तरह से कि वही वो जो महिला की कहानी कि जो मां के पास में आई ठाकुर के खाने का थाली लेकर के ठाकुर को देकर के आई तो मां को पता था कि यह बात ठाकुर को नहीं पसंद है कि अन्य तरह के चरित्र की स्त्री उनके जो खाने का थाला उनके पास में लाए। ऑलरेडी मां को यह बात पता थी। ऑलरेडी मां को यह भी पता था कि ठाकुर आकर के वह नाराज भी होंगे। वो कंप्लेन भी करेंगे। इसके बावजूद मां ने यह होने दिया। क्यों? क्योंकि मां सिर्फ वो विलिंग नहीं थी। मां में भीतर में वह आग्रह भी था कि जो कोई भी मां बोलकर के उनके सामने आकर के यदि कुछ भी मांगेगा तो मां उनको वह दे देती। मां अपने स्नेह पाश में मां अपने आंचल में उनको उनको प्रवेश करवा करके उनको एक तरह से आलिंगनबद्ध कर लेती। यानी कि अपना जो यह आशीर्वाद है वह उनके ऊपर में उनका अवश्य आता। तो यह जो जो पूरा जो कार्य प्रारंभ हुआ है। जो सब प्रसंग और घटनाएं प्रारंभ हुई है, वह सब दक्षिणेश्वर में ही इन सब का प्रारंभ हो चुका था। और यह प्रारंभ करने के पीछे में मां का आग्रह भी इतना ही दाई था। एवं श्री रामकृष्ण ताहार विकासमुख असीम शक्ति सहित परिचितो थाकाय निज कार्यभार ए शक्ति रूपणी हस्ते तुल्यादिते अतिबो व्यस्त होइया छिलेन और ठाकुर भी इनकी विकास उन्मुख यानी कि विकसित हो रही विकस विकास उन्मुख यानी कि जो विकसित हो रही है इस तरह की असीम शक्ति के साथ में परिचित होकर करके अपना कार्यभार इस शक्ति रूपणी के हाथ में शक्ति रूपणी जो शक्ति स्वयं है मूर्तिमंत शक्ति है उस शक्ति रूपणी के हाथ में वह तुल्यादिते हाथ में आप देने के लिए अति व्यस्त हो या छिलेन अत्यंत आग्रहान्वित हुए थे अत्यंत वह व्यस्त हो चुके थे कि अभी यह कार्यभार है वह मां के हाथ में देना है शक्ति शक्ति स्वरूपिणी के हाथ में शक्ति स्वरूपिणी के श्री चरणों में यह भविष्य के संघ के घड़ का जिम्मा उनको अर्पण करना है। क्योंकि मां की यह जो विकासोन्मुख यह जो क्रमशः विकसित हो रही शक्ति थी असीम शक्ति थी। ऐसी वैसी शक्ति नहीं असीम शक्ति थी। उसके साथ में ठाकुर परिचित हो चुके थे।
स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गई षोडशी पूजा: शिकागो में सरस्वती का आह्वान
श्रीक्ता गोलाप मां के ठाकुर एक दिन बोलिया छिले गोलाप मां को श्रीक्ता गोलाप मां को ठाकुर ने एक बार कहा था एक दिन कहा था ओ शारदा सरस्वती ज्ञान देते ऐसे छे वह यानी कि श्री मां शारदा है सरस्वती है ज्ञान देने के लिए आई है रूप थाकले पाछे अशुद्ध मने देखे लोकेर अकल्याण होय ताई ए बार रूप ठेके ऐसे छे यदि रूप रहता, शारीरिक सौंदर्य रहता और यदि लोग अशुद्ध मन से मां को देखते तो फिर लोगों का अकल्याण होता। इसीलिए वह रूप ढक करके आई है। अभी यह क्यों कहना पड़ा? यदि आप यह कहते हैं कि मां यदि शारदा सरस्वती स्वयं है तो आप तो फिर इस तरह से अनुमान करेंगे ना कि वह कितनी रूपमती होगी। कितना उनका भव्य ऐश्वर्य होगा। कितने गहने पहने होंगे। कहां एक छोटे से गांव में एक गरीब के घर में एक उन्होंने जन्म ग्रहण किया और किस तरह से छोटे से नहबत में रहकर के ठाकुर की सेवा कर रही है। चुपचाप रह रही है। नीरव साधना कर रही है। पिछले चैप्टर का टाइटल नीरव साधना। तो यह नीरव साधना करती हुई यह जो एक छोटे से गांव की यह स्त्री वो शारदा सरस्वती कैसे हो सकती है? जो कि यह पूरे भुवन मंडल में विद्या की जो देवी है वह स्वयं है। स्वयं स्वामी विवेकानंद ने शारदा सरस्वती का नाम लेकर के शिकागो प्रवचन का प्रारंभ किया था। तो वो यह कैसे हो सकती है? वो जो मैं पहली बार वो पढ़ा था शिकागो प्रवचन में स्वामी जी सरस्वती का नाम लेकर के प्रारंभ करते हैं। पहला प्रवचन मुझे यह आश्चर्य हुआ था कि ठाकुर का नाम लेकर के क्यों नहीं किया उन्होंने प्रारंभ? उनके देवता तो यानी कि उनके इष्ट तो वही थे, गुरु तो वही थे और उस समय मुझे मां के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। वरना फिर मैं यह भी सोचता कि हो सकता है चलो ठाकुर का नाम ले ना किया हो तो एटलीस्ट मां का भी नाम ले कर सकते हैं। मां का भी नाम नहीं लिया। क्यों ऐसा किया? किंतु बाद बात बाद में पता चला कि देखिए ठाकुर ही मां को सरस्वती के साथ में इक्वेट करते हैं। और जब स्वामी जी सरस्वती का नाम लेकर के प्रवचन का प्रारंभ करते हैं तो इनफैक्ट स्वामी जी मां शारदा को ही जैसे कि इनवोक करते हैं। मां शारदा को ही आवाहन करते हैं कि यह वर्ल्ड पार्लियामेंट में यह जो हजारों लोग बैठे हुए हैं उनके सामने वो अपनी शक्ति को मैनिफेस्ट करें। तो यह जो विकासोन्मुख असीम शक्ति यह जो उस समय दक्षिणेश्वर में सोडसी पूजा करके जिस शक्ति का प्रारंभ हुआ था उस शक्ति का सही मैनिफेस्टेशन यदि देखना है जो तो वो मैनिफेस्टेशन होगा वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन कि जबकि स्वामी जी ने प्रवचन दिया प्रत्येक उनके शब्द के प्रत्येक वाक्य के ऊपर में उनको स्टैंडिंग ओवेशन मिल रहा था ये हजारों नर नारी अमेरिका के नर नारी हरी वो खड़े होकर के तालियों के गड़गड़ाहट से स्वामी जी को वो जिस तरह से वो उनके प्रति यह उनकी श्रद्धा व्यक्त कर रहे थे वो मां मां का शक्ति का सही मैनिफेस्टेशन तो वहां पे हुआ है तो वो ये माने यदि यह कहा जाए इंटरेस्टिंग कंट्रास्ट कि यदि ठाकुर ने मां की शोडशी पूजा की है तो स्वामी जी ने मां की पूजा शोडशी पूजा का इक्विवेलेंट जो देवी को आवाहन देना है वह स्वामी जी का क्या था तो यह वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीज जन में सरस्वती को आवाहन देना। तो यह शोडशी पूजा और यह पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में मां सरस्वती का एक तरह से उनके प्रति श्रद्धा उनको आवाहन। यह दोनों घटनाएं देखिए कि किस तरह से सिमिलर भी है वो कंट्रास्टिंग भी किस तरह से है। यह हो गई जैसे कि यह वो स्वामी विवेकानंद की मां की हुई शोडश्री पूजा। तो यह देखिए कि ये इसके लिए यहां पर ठाकुर को यह कंडीशन यहां पर रखनी पड़ती है कि क्यों उनका स्वरूप या तो ढक करके क्यों आई है जो भव्य उनका ऐश्वर्य है विद्वत्ता है उनकी जो शक्ति है डिवाइन पावर्स है वो क्यों नहीं दिख रहे ठाकुर के भीतर में तो फिर भी समाधि का ईश्वर दर्शन का ऐश्वर्य था स्वामी जी के भीतर में फिर भी विद्या का ऐश्वर्य था पांडित्य का ऐश्वर्य था मां के भीतर में आपको कोई ऐश्वर्य नहीं दिखेगा। तो यह प्रश्न अवश्य होगा कि क्यों इस तरह से? तो फिर ठाकुर ने कहा कि अशुद्ध मन से यदि लोग उनको देखें तो वह लोग पाप में पड़ेंगे। इसलिए यह अपने रूप को जिस तरह से ढक करके आई है, वैसे ही मुझे लगता है कि उनका जो ऐश्वर्य है, वह भी ढक करके आई है। क्योंकि क्या है कि बाद में देखिए कि जो प्रॉब्लम के बारे में ठाकुर ने खुद ने कहा था कि मैं यदि यहां पर वह औषधि देना शुरू कर दूं, लोगों के रोग मिटाना शुरू कर दूं तो फिर यहां पर एक बहुत बड़ा अस्पताल हो जाएगा। लोग आध्यात्मिक शिक्षा लेने की वजह यही सब करने के लिए उनके पास में आएंगे। तो भविष्य में भी देखिए कि मां जब जयराम बाटी में अकेली रहती थी तो वह कितने 10 तरह के निकम्मे लोग आकर के मां को परेशान ना करें कि चलो औषध वगैरह तो मां नहीं देती है किंतु जिस तरह से ठाकुर की तरह बार-बार समाधि में चली जाती थी या तो फिर स्वामी जी की तरह वो विद्या का ऐश्वर्य यदि दिखाना शुरू कर देती तो इस तरह के लोग आकर के मां के पास में इकट्ठा हो जाते जिनका कि वहां पर कोई प्रयोजन नहीं है जय राम भाटी में जयराम बाटी में सिर्फ उन्हीं लोगों को जाना था जो कि मां को अपनी मां के रूप से देखते उनका जिनका भीतर में संतान भाव था तो वह शुद्ध सात्विक भक्त ही जय राम बाटी में जाए उन्हीं को यह प्रिविलेज मिले इसके लिए लगता है कि रूप तो ढक करके आई ही है मां किंतु साथ में यह समाधि का या तो ईश्वर दर्शन का ऐश्वर्य और यह विद्या का ऐश्वर्य इसको भी ढक करके आई है जिससे कि मां की जो सही शक्ति है उसको हम समझ पाए तो यह उनकी सही शक्ति थी उनका मातृत्व और हमारे भीतर में संतान भाव प्रकट हो उसके लिए यह आवश्यक था तो इसलिए यहां पर कहते हैं फिर आगे क्या कहते हैं
सरस्वती स्वरूपिणी माँ को श्रृंगार बहुत पसंद है
अन्य समय बोलिया छिलेन ज्ञानदा दायिनी महा बुद्धिमती ओ की जे ओ अमार शक्ति और अन्य समय कहा था वो ज्ञानदायिनी है महा बुद्धिमती है वो की ऐसी वैसी है वह मेरी शक्ति है आर भागी ने हृदय के बोलिया छिलेन ओरे और नाम शारदा और सरस्वती ताई साजते भालो बासे उसका नाम है शारदा वो सरस्वती है इसके लिए उनको श्रृंगार करना अच्छा लगता है साजना अर्थात कि श्रृंगार करना तो वो यह वो बड़ा सुंदर वर्णन भी है मां के घने लंबे बाल थे फिर वह लाल कलर की साड़ी पहना करती थी वो हाथों में वो वो जो ठाकुर ने सोने का वो जो कंगन वगैरह बना दिया था बाला वो भी पहनती थी। फिर नाक में वह जो नथ होती है वो नथ भी पहनती थी। और ठाकुर कभी-कभी इस तरह से इशारा करके वो जब मां वहां पे काशीपुर में मां जब गिर गई थी सीढ़ी के ऊपर में से चक्कर आकर के तो फिर मां को वो जो पैरों में जो दर्द हो रहा था कुछ दिन तक मां ठाकुर को वो खाना लेकर के ना जा पाई। तो फिर वह ठाकुर बाबूराम वगैरह को कहते हैं कि अरे वह ऐसा करके वह अपने वह उंगली ऐसा गोल करके अपने नाक की ओर ले जाकर के इशारा करके कहते हैं। यानी कि इंगित है श्री मां की ओर क्योंकि मां इस तरह से नथ पहना करती थी। तो इस तरह से इशारा करके अपनी उंगली को गोल करके इस तरह से नाक के पास में ले आकर के ठाकुर कहते हैं कि अरे तुम एक काम करो उसको झुड़ी में बिठा करके ले आओ। एक बास्केट में बिठा करके वो स्टेप्स के ऊपर में उनको चढ़ा करके यहां पे ले आओ। तो यह सब बाबूराम और जो बाकी सब त्यागी संतान थे वह हंसहंस करके उनके पेटों में दर्द होने लगा। यह प्रसंग का वर्णन मां स्वयं करती है। तो ये ठाकुर कभी-कभी इस तरह से वो हंसी मजाक भी किया करते थे कि हां वो उनको श्रृंगार करना बड़ा पसंद है। क्यों पसंद है? क्योंकि वह शारदा सरस्वती स्वयं है। अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल आगे देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करने की अपनी क्षमता को कैसे बढ़ाया जाए
वह जो ठाकुर की कहानी है ना कि वह एक आदमी वह सुबह से लेकर दो आदमी है वहां पर वो खेत के भीतर में पानी आए इसके लिए वो नाला काट रहे हैं तो एक आदमी ने क्या किया दोपहर हो गया वो सर सूरज सर के ऊपर चढ़ गया तो वो बोलता है चलो अभी खाने का टाइम हुआ है घर में जाकर के खाना खा के बढ़िया मजे से सो गया दूसरा आदमी है वो सोचा कि आज तो कैसे भी करके पानी लाना ही है खेत में जो नाला काट रहा है तो जो जलाशय होगा वहां से खेत तक काटता ही गया काटता ही गया। जब तक पानी नहीं आया तब तक संतुष्ट नहीं हुआ। फिर आखिर में घर में जाकर के अपनी बीवियों को कहता है कि अच्छा अभी खाना बनाओ। मैं अभी खाना खा के तेल लगा करके फिर मैं सोऊंगा। तो यह जो है कि हार्ड वर्क कैसे करें? तो देयर इज आई डोंट नो कि वो हार्ड वर्क करना है हार्ड वर्क करके। इज देयर एनी अदर आंसर टू दैट?
प्रश्न: मेरा एक मित्र था जो टॉपर था। मैंने उससे पढ़ाई में सफलता का राज पूछा। उसने उत्तर दिया कि वह परीक्षा को लेकर बहुत चिंतित रहता है। परीक्षा के प्रति अपने डर को कैसे बढ़ाएं ताकि हम भी मन लगाकर पढ़ाई कर सकें।
यह जो अभी वह कल कल ना ऐसा न्यूज़ चल रहा है ना कि बिहार ना कि कहां की वह बोर्ड की एग्जाम का रिजल्ट आया तो ऑटो रिक्शा वाले की लड़की वो टॉपर हुई है। तो अभी देखिए कि वो कितने अच्छे-अच्छे घर के लड़के लड़कियां होंगी। उसके पेरेंट्स उनको कितना म मेहनत कितना पैसा देकर के ट्यूशन करवाते होंगे। वो कितनी महंगी स्कूलों में पढ़ाते भी होंगे। किंतु वो जो नीड होता है भीतर से जो फियर जो एक होता है कि यदि मैं पास नहीं होऊंगा तो भविष्य अंधकारमय है। अभी क्या है वो ऑलरेडी मां-पिता का पास में जो वो धन संपत्ति है तो लगता है कि चलो वैसे जिस तरह से उन्होंने निकाल दिया हम भी निकाल देंगे। लोग स्मार्ट थिंकिंग तो करते नहीं है कि मां पिताजी पूरा जीवन भर तो रहने वाले नहीं है देखने के लिए और पैसा आज है कल उड़ जाएगा। कुछ ठीक नहीं है। जबकि वह ऑटो रिक्शा वाली की जो लड़की है उसने वह गरीबी है, भूख मरा है। दिन प्रतिदिन उसने वह देखा है। बोलकर के शी इज सो विलिंग टू पुट इन सो मच हार्ड वर्क। और इसीलिए जो पहले के जीवन में यह जो गुरुकुल प्रथा थी कि घर छोड़कर के आप गुरुकुल में चले जाइए। वहां पे सबको समान हार्डशिप करनी पड़ेगी और सबके भीतर में यह नीड भी प्रकट होगी। जब तक आप घर में है तब तक इतना प्रेम और इतना वह कंफर्ट में रहते हैं कि आपको वह नीड ही जनरेट नहीं होती। खास करके यह जो अपने इंडियन बच्चों में है कि वो बूढ़े हो जाते हैं तब तक वो मां-पिताजी के साथ में रहते हैं। वो अमेरिका में देखिए वो जैसे टीनएजर हुए कॉलेज में गए वो लड़का लड़की जो भी हो घर छोड़ के चले जाते हैं। स्ट्रगल करके वो कॉलेज भी करते हैं जदी तो वह अपने पैसों से कि वह कहां पे वो रेस्टोरेंट में वह वेटर का जॉब करेंगे, वेट्रेस का जॉब करेंगे। ऐसा जॉब करके पैसा कमा के अपनी कॉलेज का ट्यूशन वो ये करते हैं। हम लोग तो अपने यहां पे यह सब सोच ही नहीं सकते। मां-बाप का बच्चों पे इतना प्रेम है। सब तरह से उनको कंफर्ट में रखना चाहते हैं। तो यह कंफर्ट में रहने से होता क्या है कि एक जो रियलाइज होना चाहिए कि जीवन में एक स्ट्रगल है। जीवन में एक भयानक एक यदि हम लोग स्टेप अप नहीं होंगे तो हमको फेस करना पड़ सकता है। वो रियलिटी से शायद अपने बच्चे थोड़े से दूर हो जाते हैं। बोल करके ना एक मोलीिकोडल इंग्लिश में इसको कहते हैं कि वह बहुत ज्यादा उसको माने वह जैसे वह बच उसको दिखा करके प्रेम दिखा दिखा करके थोड़ा सा मूर्ख बना देते हैं ना ऐसा कभी-कभी हो जाता है। सो सॉल्यूशन इज आई थिंक ए गुरुकुल प्रथा कि गुरु के वहां पे जाओ बचपन से ही गुरु डांटेंगे गुरु काम करवाएंगे और सबके साथ में अभी जो भगवान कृष्ण और सुदामा दोनों एक साथ में पढ़ाई करते थे। अभी सुदामा को जो स्ट्रगल करना है गरीब ब्राह्मण को वही एक राजकुमार को स्ट्रगल करना है। तो सी कि आपका वैभव धन फिर वहां पे काम नहीं करेगा। आपको कॉमपीट करना है इक्वलिटी के बेसिस पे तब कहीं जाके ये पोटेंशियल मैनिफेस्ट होगा। वरना यदि अपने राजमहल में वापस आ गए तो लगेगा अरे भाई सब कुछ तो कंफर्टेबल है। क्या जरूरत है कल परीक्षा है उसके लिए मेहनत करने की? जिसको ये जो आग के ऊपर से एक ही
The phrase "Stay hungry. Stay foolish" is most famously associated with Steve Jobs, the co-founder of Apple, who used it in his 2005 commencement speech at Stanford University.
इंटरप्रिटेशन करता हूं। वो स्टीव जॉब्स का था एक फेवरेट कि स्टे स्टे हंग्री हां यस यस
प्रश्न: सफल होने के लिए हंगर - भूख - चाहिए
यस ये जो क्रिकेट की दुनिया में देखिए वो जो धोनी है वो छोटे से गांव में वो स्टेशन मास्टर करने के ऐसा कोई काम करता था उसके भीतर में हंगर थी कि उसको सक्सेसफुल होना है। जबकि ये सचिन तेंदुलकर का लड़का है वो इतना अभी वो अर्जुन वो तेंदुलकर वो इतना सक्सेसफुल नहीं हो पाया है। क्यों? अभी ऐसा नहीं है कि जेनेटिकली उसको कोई प्रॉब्लम है। ही हैज़ गॉट द बेस्ट डीएनए व्हिच कैन क्रिकेट बेस्ट क्रिकेट डीएनए दैट वर्ल्ड कैन गिव। उसके बावजूद वो हंगर नहीं है एक्सेल होने की। क्यों? पिताजी है, लखपति है, करोड़पति है, लाइफ पूरा एकदम मजे से निकाला है। वो भविष्य का भी निकल जाएगा। क्या चिंता है? पिताजी पैसा तो अपन को ही देकर जाने वाले हैं ना। और को तो किसी को देने नहीं
प्रश्न: हम कभी-कभी गरीब लोगों में आकांक्षा या महत्वाकांक्षा की कमी देखते हैं।
है। ये जो मैंने कहा ना कि ये जो रांची में मैं बहुत बार फ्रस्ट्रेट हो जाता था। मैं जब पहली बार गया था मैं सोचता था हम लोग जैसे ही गांव में जाएंगे लोग अपने खुले हाथों से बधाएंगे कहेंगे अच्छा हमको यह चाहिए वो चाहिए हमको यह हेल्प कर दो एंड वी आर विलिंग टू हेल्प दैट इज व्हाई वी हैव गॉन देयर किंतु वो जो एक लैक ऑफ एंबिशन या तो फिर ये होप फॉर द फ्यूचर ये पता नहीं इन लोगों में दूसरा क्या है पता है ये होप ही खत्म हो गई आशा ही खत्म हो गई है क्यों क्योंकि एक हजारों हजारों सालों की उनकी ये जो इसमें जो वो पिसते रहे हैं ना तो उनको ऐसा एक बैठ गया है मन में कि हम यदि हार्ड वर्क भी करेंगे तो कुछ मिलने वाला नहीं क्योंकि क्या है कि यह समाज ही क्रूअर है माने क्रूल है तो फिर हार्ड वर्क से कोई फायदा नहीं है तो फिर कुछ भी नहीं करें वैसे ही भूखे रहना है तो फिर हार्ड वर्क करके क्यों भूखे रहे बिना काम के भूखे रहते हैं तो आशा ही जैसे कि उनकी खत्म हो गई है जबकि यह जो ऑटो रिक्शा वाले की लड़की जो हमने वह पढ़ रहे हैं अभी आजकल न्यूज़पेपर में एटलीस्ट उसके भीतर में वह आशा होगी कि यदि मैं हार्ड वर्क करती हूं तो देन आई विल हैव अ स्कोप ऑफ ऑफ़ प्रोग्रेसिंग अहेड इन दिस वर्ल्ड। सो एक एस्पिरेशन एंड होप और देयर आर जो साइकोलॉजी समथिंग सो कॉम्प्लिकेटेड। यू कैन नेवर पिन पॉइंट टू वन फैक्टर। वो सभी को बहुत सारे विभिन्न सिचुएशन में विभिन्न फैक्टर्स अप्लाई होते हैं। अभी ऐसा नहीं है कि जो लोग अच्छे घर से आते हैं, वे लोग कभी टॉपर नहीं होते। ऐसा भी नहीं है। तो दोस्तों इन वेरियस सिचुएशन वेरियस लोकलाइज़्ड फैक्टर्स वर्क इन सच ए वे एस टू बिल्ड अ कैरेक्टर ऑफ दैट पर्सन।
आज के भारत में गरीबी के कई ऐतिहासिक कारण हैं
आज के भारत में जो लोग गरीब है या रिच है उसके पीछे में हिस्ट्री एक बहुत बड़ा रीजन है। क्योंकि जिस तरह से भारत का 1000 साल से शोषण हुआ है। बहुत सारे लोगों की वो जो आमदानी माने एंप्लॉयमेंट वगैरह ब्रिटिश लोगों के द्वारा छीन लिया गया है। तो आज के भारत में ऐसा कहना मुश्किल है कि किसके साइकोलॉजिकल प्रोफाइल की वजह से वह गरीब है। ऐसा कहना मुश्किल है। किंतु यदि अमेरिका जैसे किसी देश में जाए जो कि रिसोर्स रिच है। वहां पे ऑलरेडी यदि आप आपके पास में यदि थोड़ी भी कैपेसिटी है तो आप हार्ड वर्क करके एक्सेल हो सकते हैं। तो वहां का स्टडी करके हम कह सकते हैं कि इनकी पर्सनल साइकोलॉजी कारण भूत है। माने ऐसा देश जहां पे इक्वल ओपोरर्चुनिटी है। ऐसी जगह जहां पे बाय बर्थ आपको इक्वल रिसोर्सेज मिलते हैं डेवलपमेंट के लिए। तब यह सब फैक्टर हम कैलकुलेट कर सकते हैं। भारत में साउथ एशिया में, ईस्ट एशिया में यहां पर ऑलरेडी हिस्टोरिकल मार हमको इतना पड़ा है कि वो आदमी गरीब है तो उसके पीछे उसकी खुद के प्रोफाइल के अलावा और भी बहुत सारे रीजन हैं।
कई युवक और युवतियां सफल क्यों नहीं हो पाते? क्योंकि उन्हें अपनी प्रतिभा प्रकट करने का क्षेत्र नहीं मिल पाता।
यहां पे और एक फैक्टर क्या है पता है कि हमको अपना पसंद का एक क्षेत्र मिलना। जैसे वह एक बहुत सारी मूवीज में होता है ना कि मां-बाप बच्चे को प्रेशर करते हैं डॉक्टर हो जाओ, इंजीनियर हो जाओ, बच्चे की इच्छा नहीं है। किंतु फिर अभी वो स्टैंड अप कॉमेडी में देखिए कि वो बड़ा सक्सेसफुल हो जाता है। वो एक हसन मिनाज बोल के एक कॉमेडियन है आजकल। अमेरिकन है वो। तो वह कहता है कि वह अमेरिकन वो वो वैसे तो मुस्लिम है किंतु पेरेंट्स तो इंडिया से गए हैं। तो एक इंडियन पेरेंट्स का एक जो ट्रेडिशन होता है ना कि बच्चे को पढ़ा लिखा करके इंजीनियर डॉक्टर बनाना है। तो वो कहता है कि वो जब मैंने यह कहा कि मुझे स्टैंड अप कॉमेडी करनी है तो वो उसके पेरेंट्स तो एकदम पहले तो समझ ही नहीं पा रहे कि वो क्या कहना चाहता है। ऐसा इंडियन पेरेंट्स को यदि आप ऐसा कहेंगे मैं कॉमेडियन होना चाहता हूं। वो कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे। उनको लगेगा यह बच्चा अपना जीवन को पूरा फेंक दे रहा है। या तो फिर वह मूर्ख है उसको इंजीनियरिंग या तो फिर यह जो टेक्निकल सब्जेक्ट है समझ नहीं आ रहा है। तो वो कहता है कि वो बिकॉज़ कि ये जो अपना इंडियन ट्रेडिशन है उसके अगेंस्ट में मैंने इतना स्ट्रगल करना पड़ा है अपना फैमिली में। अभी उसके पेरेंट्स ने उसको एज ए स्वीकार किया हो। उसका लाइफ चॉइस ना किया हो। ही इज़ अ वेरी सक्सेसफुल स्टैंड अप कॉमेडियन। तो आज यदि अभी ऐसा नहीं है कि जो बिकॉज़ के वो टेक्निकल मैथमेटिक्स साइंस नहीं पढ़ पा रहा था बोलकर के वो स्टैंड अप कॉमेडी में सक्सेस नहीं होगा। उसका तो अपना एक हार्ड वर्क है। कॉमेडी यदि करना है तो उसका तो आपको एक सीखना पड़ेगा। उसका जो साइंस है वगैरह उसको समझना पड़ेगा। सो यहां पे क्या है ना कि आपको अपना एक फील्ड मिलना जिसमें कि यू कैन एक्सेल दैट इटसेल्फ इज समथिंग दैट वी विल हैव टू वर्क। बहुत बार हम सोचते हैं कि बिकॉज़ कि ये लड़का मैथमेटिक्स नहीं पढ़ सकता। 12th में इसके अच्छे मार्क्स नहीं आए हैं। बोलकर के ये लड़का मूर्ख है। बट इट्स नॉट लाइक दैट। उसका जो फील्ड है जहां पे वो अपने को रियल मैनिफेस्टेशन मैनिफेस्ट कर सकता है। ही माइट नॉट हैव फाउंड दैट फील्ड आल्सो। अभी स्वामी जी को ही देखिए ना ठाकुर को बहुत सारे लोग कहते भी थे कि वो लड़का है नरन। उसके पीछे में आप क्यों पड़े हैं? है वो कोई पढ़ाई लिखाई में कोई इतना एक्सीलेंट नहीं है। जबकि देखिए कि ठाकुर के पास में दूसरे जो कुछ-कुछ लड़के आते थे। अब ये श्रीश बोल के एक था। तो वो आज के श्रीश महाराज की तरह ही वो काफी वो विद्वान था। वो वो मास्टर वहां से कथामृत में लिखते हैं कि वो श्रीश का विद्वत्ता और विनय यह दोनों देखकर के ठाकुर बड़े ही प्रभावित हो गए थे। तो अभी बात है कि स्वामी जी उसके जितने विद्वान नहीं थे। बट स्टिल ही इज़ कंसीडर्ड टू बी वन ऑफ़ द ग्रेटेस्ट यू कैन से दैट स्कॉलर इन द वर्ल्ड। बात वही है कि अभी जो एकेडेमिक नैरो सब्जेक्ट है उसकी बजाय स्वामी जी का जो व्याप्त था जो माने वो पूरे से डिफरेंट लेवल पे वो मैनिफेस्ट होता था। तो हम लोग क्या है कि असेसमेंट और इनका जो ट्रेनिंग का जो प्रॉपर यह सिस्टम भी तो नहीं है ना। इंडिया में हमारा एक नैरो थिंकिंग है कि उसको यह टेक्निकल या कमर्शियल स्ट्रीम में जाना है। कैसे भी करके अच्छी जॉब मिल जाए। वह सक्सेसफुल हो जाए। आज कोई लड़का जाकर कहेगा मुझे क्रिकेटर होना है। एक्टर होना है, सिंगर होना है, स्टैंड अप कॉमेडियन होना है। तो मां-बाप को तो ऐसा ही लगेगा कि अपने सर के ऊपर में पहाड़ टूट पड़ा है। बच्चे को इतना मेहनत करके पढ़ाया लिखाया। आजकल यह अपना जीवन फेंक देने को कह रहा है। दिस इज कि बहुत बार हम यह कहते हैं ना कि इसका मैनिफेस्टेशन नहीं हो रहा है या तो फिर इसमें एस्पिरेशन नहीं है। तो वहां पे वह भी है कि उसका मैनिफेस्टेशन होने का फील्ड इज डिफरेंट जो कि उसको मिल नहीं रहा है। और रेदर हम कहेंगे कि देखिए इसके लिए ना प्रॉपर काउंसलिंग चाहिए। एक जो एजुकेशन काउंसिलिंग का सिस्टम जिस तरह से फॉरेन कंट्रीज में है वहां पे आप ग्रेज आपका जो यह हाई स्कूल पास कर देंगे ना उसके बाद में ना आपको आपके मार्क्स के अनुसार पोटेंशियल के अनुसार ना यूनिवर्सिटी के रिप्रेजेंटेटिव आपको खुद को मिलने को आएंगे वे लोग पिच करेंगे कि हमारी यूनिवर्सिटी में यह फैसिलिटी है। इतने सारे कोर्सेज है। यह स्पोर्ट्समैन के लिए यहां पे यह कहेंगे कि यह रिजर्वेशन है वगैरह। अपने यहां पर ना वो जो एक कैरियर के लिए जो स्कोप मिलना चाहिए ना वाइड स्कोप वो बड़ा ही लिमिटेड है क्योंकि फिर भारत में वो भी है ना कि अभी इकोनॉमिकली जो भारत इतना तो एडवांस नहीं है वो जो पर कैपिटा उनका 80000 अपना 2500 वो तो मैनिफेस्टो होता है ना यह सब चीजों से कि यदि आपका पर कैपिटा 88000 डॉलर का जो होगा इनकम एवरेज अमेरिकन का तो फिर क्या है कि एवरेज अमेरिकन यह सब को स्किल को ना वह एप्रिशिएट कर सकता है। अभी जैसे वह अकबर के दरबार में नवरत्न थे। अभी नवरत्न रखना यानी कि अकबर को कितना वह पैसा मतलब वो धन संपत्ति चाहिए होगा। तभी वह नवरत्न को अफोर्ड कर सकता है। अभी ये गांव का पंचायत है। वह थोड़ी ना नवरत्न को अफोर्ड कर कर पाएगा। तो यहां पर भी देखिए कि भारत में आपके पास में जनरल पब्लिक के पास में इतना एक्स्ट्रा मनी ही नहीं है कि फिर वो इस तरह से वीकेंड में कहीं वो चलो कि स्टैंड अप कॉमेडी देखने को जाए ना कि फिर अभी चलिए क्रिकेट और बॉलीवुड यह दोनों तो अपने पैशन है। किंतु इसके अलावा भी कितना सब कुछ है इस जगत में जो आर्टिस्ट होते हैं जिनको कि एप्रिशिएट यदि हम करें तो अपना आर्ट फॉर्म डेवलप कर पाएंगे। स्वामी जी जैसे स्वामी जी को एप्रिशिएट होने के लिए अमेरिका जाना पड़ा। भारत में वो इकोनॉमिकल मेंटल स्पेस ही नहीं है कि जो कि स्वामी जी को एप्रिशिएट करें और स्वामी जी को एक्सेल होने में वो हेल्प करें। सोसाइटल स्पेस जो होना चाहिए व्हिच कैन प्रमोट एंड मेंटेन मल्टीफेरियस टैलेंट्स वो भी तो भारत में नहीं है। तो उसे यूरोप में जितने भी अपने टैलेंटेड लोग हैं व्हाई दे आर अट्रैक्टेड टुवर्ड्स यूरोप एंड अमेरिका। क्योंकि वहां का सोसाइटी आपको वह प्रमोट कर सकता है, सस्टेन कर सकता है। यहां पे आपको एक नैरो फील्ड में यदि आपको सक्सेस मिलती है, तभी आप एक स्टेडी जॉब एक बिजनेस कर सकते हैं। नो डाउट धीरे-धीरे करके इंडिया भी उसमें से ऊपर आ रहा है। अपना यह जो आर्ट है, स्पोर्ट्स है, लिटरेचर है। अभी ऑथर ही देखिए ना यह जो जेके रोलिंग थी वो एक कहां पे वो सिंगल मदर थी। तो पहली किताब लिखने के बाद में अपने वो एजेंट को मिलने के लिए गई। तो उसका एजेंट लिटरेरी एजेंट जो कि किताब छपवाने में मदद करता है। तो वह जेके रोलिंग को क्या कहता है कि यह बच्चों की किताब तो ऐसी कुछ चलती नहीं है। तो तुम्हारी जॉब तुम छोड़ना मत वरना तो तुम तो सिंगल वाइफ सिंगल मदर हो। बच्चों को खिलाओगी क्या? तो जेके रोलिंग सही में वो कहती है कि वो मुझे इस तरह से उसने सलाह दी। अभी देखिए हैरीपॉटर इज सच अ वर्ल्ड वाइड सक्सेस फिनोमिना कि उसको जॉब करने की जरूरत नहीं है। अभी भारत में देखिए कितने ऑथर है जो कि अच्छी-अच्छी किताबें लिखते हैं। किंतु पढ़ने वाला कोई नहीं है। आज भारत में जो लिटरेचर का सीन है इट्स वेरी पैथेटिक। जैसे कि मैं क्योंकि मैंने खुद ने किताब छापने का वो सब प्रयास किया है। मैंने ये सब स्टडी किया है। मैंने देखा है। ना ही कोई पढ़ता है ना ही ऑथर को ऐसा कोई सपोर्ट मिलता है। सोसाइटल स्पेस होता है व्हिच कैन सस्टेन मल्टीफेरियस टैलेंट। सो इट इज़ हम लोग बहुत बार ना बच्चों के ऊपर में गिल्ट फीलिंग बिठा देते हैं कि तुम पढ़ाई लिखाई नहीं करते हो। तुम्हारा करियर नहीं बन रहा है क्योंकि तुम मूर्ख हो। अब ये गिल्ट फीलिंग जो है ना रिइंफोर्स होती रहती है। नेगेटिव रिइंफोर्समेंट मैंने एट्थ स्टैंडर्ड में आपने जैसे कहा कि अब वो 10थ स्टैंडर्ड में बोर्ड में अच्छे नंबर नहीं आए। मैं इंजीनियर नहीं बन पाया। यह गिल्ट या सोरो हमेशा बना रहेगा। बट विथ योर टैलेंट ईच ऑफ अस हैज़ दैट सम टाइप ऑफ टैलेंट इज देयर। वही है कि वी डू नॉट नो इन विच वे वी कैन मैनिफेस्ट। यानी कि तमस तो है ही है हमारे भीतर में। दैट इज़ वन फैक्टर बट अनदर फैक्टर इज़ दैट कि एक स्पेस नहीं मिलता है जिसके भीतर में अभी जैसे कि यह मोंगोल मैं वो चंगेज़ खान का बायोग्राफी पढ़ रहा था तो मोंगोल कल्चर जो है वहां पे देखिए कि ये हॉर्स राइडिंग जो है इट्स सम वेरीेंट क्योंकि एक मोंगोल लड़का जो होता है जैसे कि बचपन से ही वह घोड़े पे ही सवार होकर के अपना जीवन निकालता है। बड़े-बड़े ये जो मैदान होते हैं वहां पे घोड़ेस्वारी ही उसका जैसे कि लाइफ ब्लड है। अभी वह टैलेंट लेकर के कोई बच्चा भारत में जन्म लेगा कि वह घोड़ेस्वार बहुत अच्छा बन सकता है। बट इन इंडिया देयर इज़ नो स्पेस फॉर दिस टैलेंट। अब कहां पे घोड़े पे चढ़ के घूमने वाले हैं? नैरो तो रास्ते छोटे-छोटे रास्ते हैं। अब क्या करेंगे घोड़े का? सो हां बिकॉज़ दिस इज़ दिस इज़ नॉट एन इंडिविजुअल प्रॉब्लम। वी हैव टू अंडरस्टैंड। दिस आर सो इसीलिए ना ये ब्रह्मशक्ति अभेद क्यों कहा गया है? यदि आप किसी एक इंडिविजुअल को देखेंगे कहेंगे कि उसका डिविनिटी मैनिफेस्ट नहीं हो रहा है या मैनिफेस्ट होने में प्रॉब्लम हो रहा है देन वी हैव टू अंडरस्टैंड दैट इट इज़ नॉट जस्ट एन इंडिविजुअल हु इज़ अनेबल टू मैनिफेस्ट इज़ डिविनिटी बट देयर आर मेनी अदर सोसाइटल फैक्टर्स आल्सो व्हिच वर्क्स इन
प्रश्न: एक स्टैंडअप कॉमेडियन समाज में क्या कंट्रीब्यूट करता है?
देम इट्स अ गुड क्वेश्चन इन अ वे के व्हाट डस इट कंट्रीब्यूट टू द सोसाइटी किंतु यहां पे हम सोसाइटल कंट्रीब्यूशन को नहीं देख कर के जो इंडिविजुअल जो अपना टैलेंट है उसके मैनिफेस्टेशन के बारे में सोच रहे हैं। अभी जैसे कि एंटरटेनमेंट है, क्रिकेट है। व्हाट डस क्रिकेट कंट्रीब्यूट टू द सोसाइटी? नथिंग व्हाट डस मूवीस कंट्रीब्यूट टू द सोसाइटी इन अ वे नथिंग। राइट? इन दिस वे यदि हम देखें तो जो कुछ कोर साइंस है, जो टीचर है या सोल्जर है या तो फिर यह पॉलिटिशियन है उनके अलावा हम कहेंगे कि ज्यादातर लोगों का ऐसा कोई कंट्रीब्यूशन नहीं रहेगा। सो रेदर देन थिंकिंग अबाउट दिस इज अनदर यदि हम कहें कि लोगों के ऊपर में एक यह और एक टरनी ना आ जाए कि मतलब इस तरह से ना हो जाए कि बिकॉज़ के तुम कुछ कंट्रीब्यूट नहीं कर रहे हो बोलकर के यू आर नॉट वैल्यूुएबल ऐसा भी एक ना हो जाए। एनी टैलेंट राइट अभी ओलंपिक्स है ओलंपिक स्पोर्ट्स है अभी उसमें से वह जो तीर वो जो तीरंदाजी का स्पोर्ट है या तो फिर वो जो वो भाला फेंकने वाला वो जो कहते हैं ना वो वाला स्पॉट है या तो स्विमिंग का स्पोर्ट है व्हाट डू दे कंट्रीब्यूट टू सोसाइटी एस सच वी विल से नथिंग सो अंटिल एंड अनलेस अ पर्सन इज़ अ क्रिमिनल व्हिच इज़ एक्चुअली हार्मिंग द सोसाइटी एनी अदर टाइप ऑफ़ टैलेंट वी मे से इफ यू कैन मैनिफेस्ट इट देन इट इज़ ओके अभी कहेंगे कि मेरे में क्रिमिनल टैलेंट चोरी करने की टैलेंट है। नेचुरली इस तरह की टैलेंट को हमको रोकना पड़ेगा। नॉट नेसेसरीली देखो इंजीनियर भी अपनी टैलेंट से सोसाइटी को हार्म करता है। जब वो बम बनाता है। तो टैलेंट इटसेल्फ आप कहेंगे इट्स हार्मफुल। अभी जैसे कुछ-कुछ स्टैंड अप कॉमेडियंस होते हैं वे लोग जो सोसाइटी के जो ऐसे कुछ प्रॉब्लम होते हैं उनको उनके बारे में बड़े अच्छे से बोल सकते हैं। जो कि इसके बारे में अवेयरनेस फैलेगी। राइट? अगेन मैं ऐसा नहीं कह रहा हूं कि इसका अच्छा बुरा यह जो एक लिमिटेड उदाहरण है, वह लिमिटेड उदाहरण मैं इसलिए दिया कि वह आपका मैनिफेस्टेशन जो होता है आपके पोटेंशियल का वो किसी भी फील्ड में हो सकता है। बट हाउ यू आर गोइंग टू यूज़ दैट एंप्लॉय दैट मैनिफेस्टेशन फॉर द गुड और फॉर द वर्क यू कैन से दैट डेट्रीमेंट ऑफ सोसाइटी इट इज़ अप टू यू। अभी ताला तोड़ने का टैलेंट है। तो अभी वह टैलेंट को आप अच्छे यूज़ में भी लगा सकते हैं। जहां पर फायर अग्नि जल रहा है। आग लग गई है। दो-तीन बच्चे फंस गए हैं कमरे में तो आपको वो ताला तोड़ के बच्चों को निकालना है। ताला ताला तोड़ने का टैलेंट आपने अच्छा यूज़ किया। अभी वो चोरी करेंगे तो गलत यूज़ किया। वो चाकू चलाना आता है तो आप मर्डर करने के लिए भी यूज़ कर सकते हैं। सर्जरी करने के लिए भी यूज़ कर सकते हैं। टैलेंट इज टैलेंट। टैलेंट इटसेल्फ इज नॉट गुड और बैड। हाउ यू आर यूजिंग दैट टैलेंट दैट डिटरमाइंस वेदर इट इज गुड और बैड। वेदर आई एम यूजिंग माय टैलेंट टू हार्म द सोसाइटी दैट इज बैड। इफ आई एम यूजिंग द सेम टैलेंट टू हेल्प द सोसाइटी देन इट इज गुड। एक्चुअली क्या है?
प्रश्न: माता-पिता बच्चों पर डॉक्टर या इंजीनियर बनने का दबाव डालते हैं
पेरेंट्स को भी तो थोड़ा सा गारंटी चाहिए ना लाइफ में। उन्होंने जीवन देखा है। आप डिफरेंट टाइप की टैलेंट है तो भारत में वो इतना स्कोप नहीं है पैसा कमाने का। विदेश में जितना स्कोप है ऑथर बनके आप अपना करियर बना सकते हैं। भारत में वह स्कोप बड़ा लिमिटेड है। यू हैव टू बी एक्सट्रीमली गुड इन ऑर्डर टू अर्न मनी फ्रॉम राइटिंग बुक्स। तो उन्होंने जगत देखा है। तो कभी-कभी बच्चों का एक जो भावेश में आकर के कहते हैं ना मैं बहुत बड़ा ऑथर बनूंगा। मुझे इंजीनियर नहीं होना है। तो मां-बाप उसको थोड़ा सा समझाते हैं। देखो वो किताब लिख के पैसे कमाने वालों की संख्या चंद मुट्ठी भर लोगों की है। जबकि इंजीनियरिंग होकर के पैसा कमाने की संख्या बहुत बड़ी है। तो जो लॉ ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स है, जो फ्यूचर गारंटी है, उसके अनुसार तुम इंजीनियर बनो तो अच्छा है। तो मां-बाप तो उसका भले के लिए ही कहते हैं। तो उसमें उनका दोष भी नहीं है। तो क्या है कि दिस फैक्टर्स आर देयर। प्रत्येक फैमिली प्रत्येक इंडिविजुअल का एक प्रोफाइल होता है। तो विदिन अभी कंसलटेंट जो होते हैं ना अगेन वो जो अभी अपने सोसाइटी में यह सब अभी डेवलप नहीं हुआ। विदेश में जाएंगे तो वो जो कैरियर कंसलटेंट आपको बड़े म क्वाइट टैलेंटेड मिलेंगे। मैं खुद मैंने देखा है कि यहां पे करियर कंसलटेंसी के नाम पे वो मिलते तो है किंतु आपको इतना प्रॉपर स्टडी नहीं कर पाएंगे। इसको एज अ प्रॉपर साइंस डेवलप नहीं हुआ है। जबकि वहां पर ना काफी एक डेवलप हुआ है। आपको अच्छे से आपको समझ करके उसका जो बैकग्राउंड है समझ करके साइकोलॉजी समझ करके दे विल गाइड। बट दीज़ आर नॉट एग्जैक्ट साइंसेस। मेनी थिंग डिपेंड्स अपॉन द चांस मेनी थिंग डिपेंड्स अपॉन द लक आल्सो। सो दोज़ फैक्टर्स आर देयर।