मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय [गाना गाने की आवाज़] राम कृष्णाायते श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र हम पाठ कर रहे हैं। स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित चिर सीमंतिनी चिर सत्वा यह चैप्टर हमारा चल रहा है। इस चैप्टर में हमने देखा कि ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है। महासमाधि के बाद की जो कुछ घटनाएं हैं कि ठाकुर ने सर्वप्रथम मां को दर्शन दिया और फिर स्वामी जी को दर्शन दिया। तो वह कुछ घटनाएं भी हमने देख ली है और फिर ठाकुर की अस्थि को लेकर के जो विवाद हुआ था उसका भी कुछ वर्णन हमने देख लिया है। अभी कहानी आगे बढ़ती है मां
ठाकुर की महासमाधि के बाद: विरह-अग्नि शांत करने तीर्थयात्रा पर निकलीं माँ शारदा
की कि मां तीर्थ दर्शन के लिए जा रही है। और तीर्थ दर्शन करने के पीछे में जो लॉजिक है कि दो लॉजिक दो रीजन गंभीरानंद जी महाराज हमको यहां पर बताते हैं कि उस समय भक्तगणों ने क्या सोच के श्री मां के लिए तीर्थ यात्रा की व्यवस्था की थी। सर्वप्रथम तो जो पहले युग में भगवान ने विविध रूप धारण करके जो विभिन्न क्षेत्र को तीर्थ में परिणत किया था और जिस तीर्थ में उनकी अविस्मरणीय स्मृति चीर अंकित हो चुकी है। यह सब गंभीरानंद जी के गंभीर शब्द प्रयोग कि अवतार के आने से जब वह धरती जो है जो अवतार का लीला क्षेत्र है जिस गांव जिस शहर जिस तीर्थ में अवतार ने लीला की है उस तीर्थ की मिट्टी में अवतार की पवित्रता उनकी यह दिव्यता है चीर अंकित हो जाती है उस मिट्टी में मिल जाती है तो आप यदि वहां पर जाएंगे तो तो जब ध्यान मान लीजिए आप अपने घर में बैठकर के या तो फिर अपने घर के आसपास में कहीं पर भी बैठकर के जो जितना समय जप करने में बिताते हैं उतना उतना समय से आपके मन को जो शांति और दिव्यता प्रदान होगी उससे उतना ही समय आप तीर्थ क्षेत्र में बिताइए। देखिए कितना प्रचंड भीतर में अपना मन है शुद्ध पवित्र हो जाता है। अपने संस्कार कैसे कट जाते हैं। तो वह तीर्थ की महिमा तो एक है ही है। तो वो एक लॉजिक है। दूसरा एक है कि कोलकाता में श्री ठाकुर श्री श्री रामकृष्ण देव ने स्वयं जो लीलाएं की है तो मां को तो अल्टीमेटली वही सब जगह पर ही तो रहना है। यदि कामार पुकुर भी वापस जाएगी तो वह भी तो ठाकुर का लीला क्षेत्र था। फिर यह कोलकाता भी कोलकाता के घर भक्तों के घर ये बलराम बाबू के घर बलराम मंदिर में मां निवास कर रही है। तो वह भी तो ठाकुर का ही लीला क्षेत्र था। तो कोलकाता में कामारपुर में जहां पे भी मां जाएगी तो ठाकुर की तो वही याद उनको आएगी। तो अभी तो उनका जो उनसे जो प्रकट लीला है वो प्रकट लीला तो अभी समाप्त हुई है वो स्थूल देह तो अभी त्याग किया है तो इतना जल्दी फिर उस जगह पर रहना तो मां को बार-बार याद आता रहेगा कि ठाकुर के साथ में ऐसा वार्तालाप होता था ठाकुर के साथ में यह कार्य माने ठाकुर के लिए मां को यह कार्य करना था खाना पकाना था केयर करनी थी तो वो वह सब यदि मां को याद आएगा तो मां का शोक जो है वो कम नहीं होगा। तो यह दो रीजन की वजह से भक्तगण ने ठीक किया कि मां के साथ में तीर्थ यात्रा के लिए जाया जाए। तो मां के साथ में कौन-कौन चले थे? एक तो गोलापमा थी। लक्ष्मी दीदी थी। मास्टर महाशय की स्त्री थी। उनकी वाइफ थी। वही वाइफ जिसके बारे में मास्टर महाशय जब ठाकुर पूछते हैं उनको तुम्हारी पत्नी जो है तुम्हारा परिवार वो ज्ञानी है ना कि अज्ञानी है तो विद्या स्त्री है ना कि अविद्या स्त्री है तो मास्टर महाशय ये बात का अर्थ नहीं समझ पाए तो मास्टर महाशय कहते हैं वैसे तो वह अच्छी है किंतु अज्ञानी है तो ठाकुर नाराज होकर के पूछते हैं और तुम ज्ञानी हो तो वही विद्या स्त्री और अविद्या स्त्री इसका अर्थ क्या है? जो स्त्री अपने पति को धर्म के रास्ते पर आगे बढ़ने में सहाय करे उसको विद्या स्त्री कहेंगे। और जो स्त्री अपने पति को धर्म के रास्ते से वो उसको डिरेल कर दे दूसरे रास्ते पर अधर्म के रास्ते पर ले जाए या तो पति धर्म के रास्ते में आगे बढ़ना चाहता है। पत्नी अनुमति नहीं देती। झगड़ा करती है। कहती है कि अब जैसे कि यह सुरेश मित्र तो उन्होंने क्या किया था कि ठाकुर के घर में वो जो ठाकुर का कमरा था वहां पर आकर के मैं रात बिताऊंगा। ऐसा सोच कर के वहां पर कुछ बिस्तर वगैरह वो जो उनका यह जो पिलो है वह रख दिया था। किंतु उनकी पत्नी ने उनको धमकी दी कि दिन भर जहां पर भी जाना है जाओ। रात को तो तुमको घर में ही आना होगा। तो यह सुरेश बाबू भी बेचारे क्या करेंगे वो वहां पे ठाकुर के साथ में निवास करना उनसे हुआ नहीं तो क्या है ठाकुर खुद कहते हैं कि शबाय परिवार भो जाके जिज्ञास करी तुम्हार परिवार के मन शब भले है आगे हम परिवार भो अर्थात कि सभी लोगों जिसको भी मैं पूछता हूं अच्छा तुम्हारी पत्नी कैसी है तो वो कहता है अच्छी है वो तो बहुत अच्छी है अर्थात कि वो सब पत्नी के गुलाम है। ठाकुर ऐसा कहना चाहते थे। ऑफ कोर्स यहां पर जेंडर डिस्क्रिमिनेशन नहीं है। बात सिर्फ यह नहीं है कि ठाकुर पत्नी के बारे में ऐसा कहते हैं। ठाकुर पुरुषों के सामने ऐसा कहते हैं। बोल के पत्नी का उदाहरण दिया है। यदि स्त्रियों के साथ में ठाकुर बात करते हैं तो वही बात वो पुरुषों के बारे में कहेंगे कि विद्या जो है अविद्या वाले पति और विद्यापति और अविद्या पति यदि ऐसा तो कहीं लिखा नहीं है। मैं एक अनुमान करके शब्द बना रहा हूं कि ठाकुर ने स्त्रियों को ऐसा कहा होगा जो पति उनके धर्म मार्ग में आगे जाने से एनकरेज करे प्रोत्साहन दे तो वह विद्या उसके भीतर में है और जो पति पत्नी को धर्म मार्ग में आगे ना बढ़ने दे तो उसके भीतर में अविद्या है। तो यह दोनों ओर से चलता है। बिकॉज़ कि ठाकुर की जीवनी लिखने वाले मास्टर महाशय और यह शरद महाराज वह ज्यादातर लोग पुरुष ही थे बोल के स्त्रियों के बारे में ऐसा हमको पढ़ने को आता है। यदि स्त्रियों ने यदि ऐसा कुछ लिखा होता तो अवश्य ठाकुर पुरुषों के बारे में ऐसा कहते हैं। वह हमको पढ़ने में आता। सो एनीवे सो वही मास्टर महाशय की स्त्री और पूजनीय योगिन महाराज काली महाराज और लाटू महाराज यह इतने लोग मां के साथ में चले हैं तीर्थ यात्रा के लिए अभी तीर्थ यात्रा प्रारंभ होती है। क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी? पोथे तहारा देवघरे नामिया
माँ की तीर्थ यात्रा: देवघर
वैद्यनाथ दर्शनते पोरे गाड़ी ते काशी धामे चोली लेन रास्ते में यह सभी लोग वैद्यनाथ दर्शन करने के लिए देवघर में उन्होंने पदार्पण किया और फिर वैद्यनाथ दर्शन करके उसके बाद वाली गाड़ी में काशी धाम चले देखिए ठाकुर ने जो तीर्थ यात्रा की थी और मां जिस तरह से तीर्थ यात्रा कर रही है डिफरेंस कितना बड़ा है ठाकुर एकदम रॉयल उनको पूरा ट्रीटमेंट मिला था मथुर बाबू स्वयं तीर्थ यात्रा के लिए जा रहे हैं ठाकुर साथ में है तो ठाकुर के लिए सब व्यवस्था जो है एकदम पक्की कर दी गई है। मथुर बाबू ने दो तीन कैरेज रेलवे के तीन कैरेज उन्होंने कर लिए थे। भाड़े पे ले लिए थे और इस तरह से प्लान था कि जहां पे भी इच्छा हो अभी ये ट्रेन जा रही है तो यह तीन कैरेज है वो ट्रेन के साथ में जोड़ देंगे। फिर यहां से देवघर गए तो यह तीन कैरेजों को रिलीज करके सेपरेट करके एक सेपरेट रख दिया जाएगा। फिर जितना दिन देवघर रहना है रहो। इसके बाद वाली ट्रेन के साथ में यदि हमको जाना है आगे तो नेक्स्ट जो भी ट्रेन आएगी उसके साथ में यह तीन कैरेज को अटैच कर लेंगे। तो इस तरह से पूरा रॉयल एक अरेंजमेंट के साथ में ठाकुर ने यात्रा की थी और मथुर बाबू स्वयं कि ठाकुर को जो भी चाहिए जो भी व्यवस्था है ठाकुर के लिए सब करने को तत्पर थे और ये वो ठाकुर का तीर्थ यात्रा और यह मां की तीर्थ यात्रा बेचारी ट्रेन जो जनरल ट्रेन है उसमें जा रही है। पैसोंसों का तो इतना कोई सह नहीं था। हालांकि अह बलराम बाबू धनी व्यक्ति थे किंतु मथुर बाबू तो जमींदार थे। उस लेवल का जो धन उनके पास में नहीं था। सो दैट इज वन डिफरेंस। और यहां पर यह जो है देवघर की बात तो हमको याद है ठाकुर की वह कहानी कि देवघर जाने के रास्ते में एक जगह पर जब गाड़ी रोकी गई तो ठाकुर ने देखा कि गांव वालों को गांव वालों की जो अवस्था थी इतनी बुरी थी। इतने गरीब थे कि ठाकुर ने कहा कि पहले तो इनको भरपेट भोजन दो और बालों में डालने के लिए तेल दो। पहनने के लिए एक वस्त्र दो। वरना मैं यहां से नहीं जाऊंगा। तो मथुर बाबू बेचारा प्रोटेस्ट तो बहुत करता है कि अभी लंबा यात्रा लंबा पथ है। लंबी यात्रा करनी है। वह धन भले ही चाहे जितना ज्यादा हो अनलिमिटेड तो नहीं है। तो अभी से धन इतना खर्च करना शुरू करेंगे तो बाद में हो सकता है कि कम पड़ जाए। किंतु ठाकुर सुनने वाले नहीं। तो फिर मथुर बाबू ने ठाकुर की कहने के अनुसार सब अरेंजमेंट किया था। तो वह ठाकुर की देवघर यात्रा यहां पर भी मां देवघर आई है। वहां पर वैद्यनाथ दर्शन किया है और इसके बाद की गाड़ी में काशी धाम प्रयाण किया है। एक खाने अर्थात काशी धामे
माँ की तीर्थ यात्रा: काशी
8 10 दिन अवस्थान पूर्वक तारा प्राण भरिया विश्वनाथ अन्नपूर्णा एवं अन्नानो प्रसिद्ध देव देवी के दर्शन कर लेन काशी में आठ या 10 दिन अवस्थान करके उन्होंने प्राण भर के विश्वनाथ अन्नपूर्णा और अन्यान्य प्रसिद्ध देव देवियों का दर्शन किया था। श्री मां बेणी माधवेर ध्वजा आरोहण करिया विश्वनाथर सुवर्ण पूरी देखी लेन श्री मां ने वेणी माधव की ध्वजा है वहां पे उठकर के विश्वनाथ की सुवर्ण पूरी देखी थी विश्वनाथ आरती देखिया तहार भाबा बेश एतो ही वर्धित होइलो जे तनी अन्न मनुष्य को होइया ओ स्वभावी गुरु पदपे बासने फिरी ले विश्वनाथ की आरती देखकर के मां को इतना भावावेश हुआ भावावेश इतना बढ़ गया एतो ही वर्धित हो मां का भावावेश इतना बढ़ गया कि वह अन्य मनस्क होकर के अर्थात कि एब्सेंट माइंडेड होकर के अस्वाभाविक गुरु पदो विक्षिपे अर्थात कि बहुत ही झड़प से चलकर के वास स्थान में मां फिरी तो मां इस तरह से जब वापस चली आई तो फिर बाकी सब लोगों ने मां को पूछा होगा कि मां तुम इतनी जल्दी घर क्यों चली आई? तो फिर मां ने उसके उत्तर में कहा देखिए ठाकुर आमा के हाथ धोरे मंदिर थे के लिए एले ठाकुर मेरा हाथ पकड़ कर के मंदिर से मुझे ले आए जो ठाकुर के दर्शन की परंपरा
काशी धाम में माँ शारदा को मिला ठाकुर का साक्षात् दर्शन
जो प्रारंभ हो चुकी है अभी कंटिन्यूस रहने वाली है क्योंकि अदर वाइज कल भी हमने डिस्कस किया था एक हिंदू है यदि वह एक सिंसियर हिंदू होता है तो हमारा सबसे पहला वो जो टेंडेंसी है वह इंट्रोवर्ट होने का क्योंकि जगत को तो मिथ्या बोल के हमने त्याग कर दिया है। आत्मन ही सत्य है या तो फिर कहेंगे कि ईश्वर पर विश्वास है तो ईश्वर भी तो हृदय में ही विराजित है। जगत के साथ में जो मिनिमम एक कांटेक्ट रखना है उतना रखना है। उससे ज्यादा नहीं। यह तो एक बात है। दूसरा है कि देखिए कि उस समय जो विधवाओं के लिए विधि निषेध वगैरह की जो थी सब व्यवस्था वो इतना क्रूर था इतना कठिन था कि उससे होगा क्या कि यदि कोई इन जनरल मैं बताता हूं कोई भी स्त्री है बेचारी यदि विधवा हुई है तो उसको ना ही पहनने को अच्छे कपड़े मिलेंगे ना ही खाने को कुछ अच्छा मिलेगा ना ही किसी के साथ में वार्तालाप कर सकती है ना ही वह कहीं जा सकती है। चारों ओर से रिस्ट्रिक्ट करके उसको जैसे कि एक कैदी की तरह कैदी को कैसे जेल में पुर करके रखते हैं वैसे ही उसको एक घर के कोने में बिठा देंगे ना ही उसको कोई मंगल प्रसंग है तो उसमें पार्टिसिपेट करने का अधिकार है। तो एक विधवा का जो जीवन है पूरा अंधकारमय हो जाता है। अभी मां क्या है देखिए वैसे तो है जगत जननी अध्याशक्ति स्वयं अन्नपूर्णा स्वयं मां के लिए तो वैधव्य है ही नहीं मां तो चिर सद्वा है किंतु प्रॉब्लम यही है कि मां और ठाकुर दोनों के साथ में देखिए कि सामाजिक प्रथाओं को तोड़ने के लिए नहीं आए थे उसको ट्रांसेंड करने को आए थे इस अर्थ में कि प्रथा जो बनी सो बनी जिस पीरियड में जिस समय में जो परिस्थिति के भीतर में यह प्रथा बनी सो बनी। अभी सीधा उसके ऊपर आघात करने की वजह कि ऐसा कहने की वजह कि विधवा के लिए जो विधि निषेध है वह गलत है। ऐसा करने की वजह अपने जीवन को इतना उन्नत कीजिए। समुन्नत कीजिए आध्यात्मिक दृष्टि से कि फिर क्या है कि यह विधि निषेध ऑटोमेटिक वो पार्ट एंड पार्सल ऑफ लाइफ हो जाए। त्याग आप करेंगे आध्यात्मिकता के लिए ईश्वर के लिए सर्वस्व समर्पित कर देंगे तो यह जो विधवाओं के लिए जो नियम है ऑटोमेटिक ज्यादातर उसका पालन हो ही जाएगा तो मां आई थी इस सब को ट्रांसेंड करने के लिए नहीं कि उसको तोड़ने के लिए तो वो एक फैक्टर है और विधवाओं के बारे में कितनी ये सब क्रूर नियम थे उसका एक उदाहरण कि वहां पे मां के साथ में ही कोई एक कम उम्र की विधवा रहती होगी। तो एक डिवोटी आई तो उस लेडी डिवोटी उसने देखा कि यह विधवा लड़की है बेचारी कम उम्र की किंतु वह मछली भी खाती है। उसने बाल भी नहीं काटे हैं। तो वह मां को पूछती है कि मां हमारे यहां पे तो विधवाओं के ऐसे क्रूर नियम है। कठिन नियम है कि बाल को काट देना है। मछली नहीं खानी है। तो यहां पे हमारे यहां पे ऐसा है स्ट्रिक्ट सब। तो आपके यहां पे इतने लिबरल क्यों है? तो मां ने कहा देखो बेटा वह तो बेचारी उम्र में छोटी है। उसको पता ही नहीं है कि उसके साथ में भगवान ने ऐसी क्रूरता की है। तो अभी थोड़ा बहुत वह अपने मन का शोक पूरा कर ले। यदि तुम इतना रिस्ट्रिक्शन उसके ऊपर रखोगी तो क्या चोरी करके खाएगी। है ना? वह तो और भी बुरा है। फिर चरित्र पूरा नष्ट हो जाएगा। इससे बेटर है कि थोड़ा बहुत मन का शोक पूरा कर ले। उसके बाद में जैसे-जैसे वह बड़ी होगी उसी को पता चलता जाएगा कि विधवा के यह नियम है तो मैं ऑटोमेटिकली उसमें रहना प्रारंभ कर लेगी। किंतु खैर अभी यह उस समय के लिए मां का सॉल्यूशन था। हम परमानेंटली देखें तो स्त्रियों को ही क्यों ऐसा नियम पालन करना है? पुरुषों को क्यों नहीं? आज के युग में तो ये जो स्त्री और पुरुष दोनों को तो एक समान अधिकार होने चाहिए। स्त्री यदि विधवा होती है तो उसके साथ में समाज इतनी क्रूरता करता है। पुरुष यदि उसकी स्त्री का मृत्यु होता है तो पुरुष के ऊपर में तो ऐसा कोई क्रूरता ऐसा कोई बंधन खाने-पीने में इस तरह का रिस्ट्रिक्शन क्यों नहीं होता? सो आज के समाज में आज के युग में आज हम इतिहास देखेंगे तो हमको बड़ी ही क्रूरता भारतीय समाज में देखने को मिलेगी। बस यही याद रखना है कि वी हैव टू ट्रांसेंड इट रेदर देन टू ब्रेक इट। ये ठाकुर है, मां है, स्वामी जी है। उन्होंने यह जो रिफॉर्म सोसाइटी ये स्वामी जी ने बार-बार कहा है कि यह जो रिफॉर्म सोसाइटीज थी उस समय की कि जो सब समय भारत के यह जो प्रथा है भारत की कुप्रथाएं हैं या तो फिर भारत की यह जो अंधश्रद्धाएं हैं उसके ऊपर में आघात करती रहती है। स्वामी जी कहते हैं कि आप उनको एक बेटर रास्ता दिखाइए। यह मत कहिए कि पुराना है सब त्याग कर दो। कहिए कि यह बेटर रास्ता है। आप गलत थे। अभी आपको सही करना है। ऐसा नहीं आप सही ही कर रहे थे। उस समय की परिस्थिति को अनुसार अभी आपको और भी बेटर करना है। मैन ट्रैवल्स फ्रॉम लोअर ट्रुथ टू हायर ट्रुथ। मैन नेवर ट्रेवल्स फ्रॉम एरर टू ट्रुथ। यह हमेशा जो लोग रिफॉर्म लाना चाहते हैं, जो लोग समाज को परिवर्तित करना चाहते हैं, उनको यह बात याद रखनी है। तो यहां पे भी देखिए कि दर्शन परंपरा प्रारंभ हुई थी। उसका यही रीजन था कि मां कहीं एक ट्रेडिशन वो उसमें बंध करके ऐसी एक रिट्रीट हो जाए। ऐसी अंतर्मुखी हो जाए कि मां के लिए जो एक महत कार्य ठाकुर रख के गए थे। पूरे समाज में मां को अपना मातृत्व भाव जो है उसका प्रचार करना है। उसको स्प्रेड करना है। प्रत्येक स्त्री के भीतर में मां की तरह वात्सल्य भाव होना चाहिए। प्रत्येक पुरुष के भीतर में ठाकुर की तरह त्याग और संतान भाव होना चाहिए। यह तो उद्देश्य है ठाकुर और मां के पृथ्वी पर अवतरित होने का। तो मां कहीं यह उद्देश्य भूल ना जाए और एक ट्रेडिशनल विधवा की तरह अंतर्मुखी होती ही जाए होती ही जाए तो ऐसा ना हो जाए बोल के ठाकुर ने यह दर्शन परंपरा प्रारंभ की थी। तो इसलिए यहां पे मां कहती है कि ठाकुर मेरा हाथ पकड़ करके मंदिर से मुझे ले आए। क्या का कॉन्टेक्स्ट क्या था? विश्वनाथ में विश्वनाथ की आरती जब देख रही थी मां दर्शन कर रही थी तो मां का भावावेश इतना बढ़ गया कि मां एब्सेंट माइंडेड होकर के इतना जल्दी से मंदिर छोड़कर के जहां पे इन लोगों का निवास स्थान था इतनी जल्दी से वहां पर चली आई कि लोगों को आश्चर्य हुआ कि मां इतना जल्दी वहां से यहां क्यों चली आई? तो इसके उत्तर में मां कहती है कि ठाकुर मेरा हाथ पकड़ कर के मंदिर से मुझे ले आए। अभी ठाकुर ने ऐसा क्यों किया वह तो वही जानेंगे। वो जाने और मां जाने। मां ने इससे ज्यादा कोई एक्सप्लेनेशन नहीं दी। किंतु यह एक है। हो सकता है कि ठाकुर चाहते होंगे कि अभी आरती का दर्शन किया है तो अभी जल्दी से बैठकर के जप प्रारंभ कर दिए जाए। हमारे बेलूर मठ में ऐसा ही है कि संध्या आरती होती है। उसके बाद में जब मैं ब्रह्मचारी था ट्रेनिंग सेंटर में तो हमारा ऐसा नियम था कि आरती समाप्त होने के साथ-साथ ही हमको ट्रेनिंग सेंटर में जाकर के वहां पर हमारा एक प्रेयर हॉल था सेपरेट। वहां पर सिर्फ ट्रेनिंग सेंटर के ब्रह्मचारी ही प्रवेश कर सकते हैं। तो हम ब्रह्मचारियों को एक साथ में उस हॉल में बैठकर के जप ध्यान करना था। तो नियम ऐसा है आरती समाप्त होने से इमीडिएटली बाद में आपको जप ध्यान प्रारंभ कर देना है। क्यों? क्योंकि एक पवित्र वातावरण की सृष्टि हुई है। तो एक सर्जना हुई है। तो अभी आप मंदिर से बाहर आकर के 10 लोगों के साथ में 10 गप लगाएंगे कि अच्छा तुम कैसे हो? वहां पर क्या हुआ? यह कैसा है? वगैरह-वगैरह यदि गप लगाते रहेंगे तो फिर क्या है कि एक जो पवित्र वातावरण अपना मन का संस्कार शुद्धि जो उस क्षण भर के लिए हुआ था आरती दर्शन करके वह क्या है? वही सांसारिकता फिर से चली आएगी। दिन भर हम कर्म करते हैं। 10 लोगों के साथ में डीएल करते हैं। तो क्या है? जप करने के समय इमीडिएटली मन जो है स्थिर नहीं होता है। जप करने के समय मन चंचल ही बना रहेगा। 10 चीजों के पीछे दौड़ेगा। अभी ये लोग यात्रा कर रहे हैं तो यात्रा के लिए जो 10 तरह की तो व्यवस्था करनी है वो मथुर बाबू स्वयं वो तो वहां पर उपस्थित नहीं यात्रा की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने ले ली है और ठाकुर की सेवा की पूरी जिम्मेदारी हृदय ने ले ली है। तो ठाकुर अपने निश्चिंत होकर के ब्रह्म भाव में विभोर होकर के यात्रा कर सकते थे। यहां पर मां के साथ में तो ऐसा नहीं है। जब हर छोटी-छोटी चीजों में मां का ओपिनियन पूछा जाएगा और मां को भी क्या है कि अपने संतान गणों को गाइड करना होगा। देखिए हृदय और मथुर बाबू वो अपने आप में महा महारथी हस्तियां थी। उनको ठाकुर को उनको गाइड करने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपने आप में महारथी थे। जगत को पूरा जैसे कि भैरव के अवतार की तरह थे। जगत को जैसे कि उन्होंने खा लिया था। वह जो चाहे कर सकते थे जगत में ठाकुर से ऐसा कोई व्यावहारिक विषयों में गाइडेंस नहीं चाहिए था। जबकि मां के साथ में कौन है? वही यह मास्टर महाशय की स्त्री जो कि सुसाइडल थिंकिंग था उसका वो पता ही है कि कथामृत के आखिरी चैप्टर में हमने देखा कि मास्टर महाशय अपनी स्त्री को लेकर ठाकुर के पास आए हैं। उसकी एक कन्या का मृत्यु हो गया है और मास्टर महाशय ठाकुर को कहते हैं कि अभी ये आत्महत्या करने की बात कर रही है। तो बिल्कुल आखिरी चैप्टर में कथामृत का जो बिल्कुल आखिरी चैप्टर है। ठाकुर के साथ में मास्टर महाशय का जो बिल्कुल आखिरी वार्तालाप है। इसके बाद में फिर वराह नगर मठ की घटनाएं स्टार्ट हो जाती है। तो बिल्कुल आखिरी वार्तालाप जो कि मास्टर महाशय ने नोट किया है। उसमें यह बात है कि यह उनकी स्त्री उसका जो वर्तन उसका बिहेवियर पागलिनी की तरह हो गया है। सुसाइड करने का उसके मन में आता है। उसके जो दूसरे बच्चे हैं उसको वह मारती है। तो क्योंकि संतान की मृत्यु होने से तो मां के साथ में ऐसा एक आघात तो पहुंचेगा ही। तो ठाकुर थोड़े से चिंतित हो जाते हैं। चिंतित होकर के कुछ सोचने के बाद में दो सॉल्यूशन देते हैं। पहला तो सॉल्यूशन है कि देखो इसको खाना मत बनाने देना। क्यों? खाना बनाएगी तो आज की तरह तो वो एलपीजी ना कि ऐसा वो गैस के ऊपर में तो बनता नहीं था। चूल्हे के ऊपर में बनता था। उसमें लकड़ी या गोबर ना कोयला ऐसा ही यूज़ होता था। तो उससे प्रॉब्लम क्या होगा? उसका जो धुआ है, उसकी अग्नि है, उसका ताप जो है सतत उसके साथ में खड़ा रहना तो उसका पागलपन और भी बिगड़े और भी बढ़ेगा। तो ठाकुर ने कहा वो चूल्हे की अग्नि जो है उसके सामने उसको मत खड़े रखना। खड़े रहने देना। खाना मत बनाने देना। यह एक पहला सॉल्यूशन दिया। दूसरा सॉल्यूशन दिया कि जाओ उसको मां के पास में ले जाओ। तो ये दो सॉल्यूशन यही मास्टर महाशय की स्त्री के बारे में ठाकुर ने दिए थे। यह गोलाप मां का और लक्ष्मी दीदी तो वैसे ही एक बच्ची जैसी ही थी मां के सामने गोलाप मां का कुछ ठिकाना नहीं है। कब क्या बोलेगी कब क्या करेगी यह फिर और यह योगिन महाराज काली महाराज और लाटू महाराज वह थे तो बच्चे ही तो भले ही चाहे म त्यागी थे सन्यासी थे वर्ल्डली वाइज भी होंगे किंतु थे तो मां के संतान जैसे ही अर्थात कि मां ही सबसे सीनियर थी और हर छोटी-छोटी चीजों में लगता है कि उनको मां की सलाह लेनी पड़ती होगी या तो फिर मां की सलाह लेने की अभी इनको हैबिट हो गई तो इसलिए मां अपने को संपूर्ण कट ऑफ करके जिस तरह से ठाकुर ने तीर्थ यात्रा की थी कि व्यावहारिक जो भी रिस्पांसिबिलिटी है हृदय और मथुर बाबू को दे दी। अपने निश्चिंत होकर के ब्रह्म भाव में विभोर होकर के जो यात्रा किए हैं ठाकुर वो हो सकता है कि मां से ऐसा होगा नहीं। वो हर छोटी-छोटी चीजों में यह तो योगिन महाराज है, लाटू महाराज है, गुलाब मां है। मां को कुछ ना कुछ पूछते रहते होंगे। तो हो सकता है कि ठाकुर चाहते होंगे यह रूल एस्टैब्लिश करना। बाद में टीसी में वही रूल था। हो सकता है यह रूल ठाकुर ने उसी समय एस्टैब्लिश करवा दिया है कि जैसे ही आरती समाप्त होती है सीधा अपने घर चले जाओ और फिर बैठकर के तन्मय चित्त होकर के ईश्वर का नाम जप करो वो आरती और जप इन दोनों के बीच में सांसारिकता को प्रवेश ना करवाने दो यह व्यवहारिक जीवन जो कुछ भी है दिन के समय में रखो या तो फिर रात को जब जप समाप्त हो गया है उस समय करो किंतु आरती और जप इन दोनों के बीच में किसी भी तरह का इंटरप्शन मत आने दो। यह जो हमारा टीसी का रूल है लगता है यही रूल ठाकुर ने वहां पर एस्टैब्लिश कर दिया है। तो यह मेरा अनुमान है। ऑफ कोर्स मां ने तो कोई इंटरप्रिटेशन दिया नहीं कि ठाकुर क्यों आरती समाप्त होने से ही उनका हाथ पकड़ कर के ध्रुत गति से बहुत ही झड़प से घर वापस ले आए।
काशी में माँ शारदा ने भास्करानन्दजी से भेंट की
एक दिन त अपर महिला दे शहीद भास्करानंद स्वामी के दर्शन करते छिले एक दिन मां अन्य महिलाओं के साथ में भास्करानंद स्वामी के दर्शन करने को गई थी देख त उलंगो अब जाकर के देखा वह दिगंबर अवस्था में थे श्री मां ओ अपर शोकले उपस्थित होले त बोलीले श्री मां और अन्य सब स्त्रियां उपस्थित होने से उन्होंने कहा शंका मत करो माई हिंदी में कहते हैं शंका मत करो मैया तुम सब जगदंबा हो तुम सब जगदंबा हो शर्म क्या ये पूरा हिंदी है शंका मत करो माई तुम सब जगदंबा हो शर्म क्या देखिया शूनिया श्री माय जहां बोध होया छिलो देख के सुनकर के श्री मां को जो महसूस हुआ था तत संबंध पर बोलिया छिलेन उसके बाद में उन्होंने बाद में कहा था आहा की निर्विकार महापुरुष कैसे निर्विकार महापुरुष है शीत ग्रीष्म में समान उलंग होए बसे छेन ठंडी में गर्मी में शीत में ग्रीष्म में एक समान रूप से दिगंबर होकर के बैठे हैं यह दिगंबर महापुरुष को देखना माने कोई पहली पहली बार तो देखा नहीं है। ठाकुर की जितनी भी कहानियां पढ़ेंगे सब में है। जैसे ही ठाकुर को भाव हुआ साथ में ही वह वस्त्र कहां रह जाते हैं पता नहीं चलता। वो आखिरी आखिरी दिनों में ठाकुर वही काशीपुर में ही थे। वो हिरानंद सिंधु देश का निवासी ठाकुर का परम भक्त ठाकुर का दर्शन करने को आया है। साथ में एक दो ब्राह्म समाजी भक्त है। तो ठाकुर बीच-बीच वैसे तो उ दिगंबर ही थे। किंतु बीच-बीच में अपनी धोती अपनी कमर पर बांधने की चेष्टा करते हैं। और फिर हीरानंद को कहते हैं कि अरे मैं यदि दिगंबर रहता हूं तो ये तुम लोगों को असभ्य लगता है ना। तो हीरानंद कहता है नहीं जी नहीं महाशय आप तो दिव्य शिशु है। आप दिगंबर होंगे। उसमें असभ्यता किस बात की है? तो मास्टर ठाकुर यह जो अन्य ब्राह्म भक्त थे उनकी ओर इशारा करके कहते हैं कि तुमको नहीं लगता होगा असभ्यता किंतु इनको लगती है तो क्या है एक बार गौर दासी तो गौर दासी उस समय बहुत भावावेश में रहती थी गौरी मां एक बार दक्षिणेश्वर आई है आकर के ठाकुर को खोज रही है और देखा कि ठाकुर है नहीं तो वहां नहबत में मां के पास में आई और भावावेश में थी तो कहा कि मेरा गोपाल कहां है ऐसा ही कुछ कहा होगा तो मां ने कहा मुझे क्या पता देखो गंगा के किनारे उ दिगंबर होकर बैठा होगा तो [हंसी] बैठे होंगे देखिए मां भी कभी-कभी क्या है कि थोड़ा सा एशियस हो जाती थी थोड़ी सी परेशान हो जाती थी ठाकुर की यह सब हरकतों से किंतु देखिए और इसीलिए वो एक दिगंबर महापुरुष को देखना मां के लिए नया कुछ नहीं था। इसलिए मां कहती है कि आहा कि निर्विकार महापुरुष शीत में ग्रीष्म में समान दिगंबर होकर के बैठे हैं। काशी हुई अच्छा यहां पे किंतु एक बात है गंभीरानंद जी स्किप कर देते हैं। गंभीरानंद जी का थोड़ा एक स्टैंडर्ड मेंटेन करना है ना तो यहां पे और एक बात यही भास्करानंद जी वो मां को कहते हैं जो कि उन्होंने स्किप कर दिया है। अह भास्करानंद जी कहते हैं कि अरे जैसे तुम्हारी उंगलियां है आप लोगों की उंगलियां है वैसे ही यह इंद्रिय है तो उसमें शर्म किस बात की है तो यह भी भास्करानंद जी उस समय मां को कहते हैं किंतु यह यहां पर स्किप कर दिया है उन्होंने
माँ की तीर्थ यात्रा: अयोध्या
काशी होते शकले अयोध्या उपस्थित होले काशी से सभी अयोध्या उपस्थित हुए एवं तथाय एक दिन थाक्या श्री रामचंद्र लीला भूमि सुंदर कोरले और वहां पे एक दिन निवास करके श्री राम श्री रामचंद्र की लीला भूमि संदर्शन किया
वृन्दावन जाते समय रेलगाड़ी में माँ को हुआ ठाकुर का दर्शन
अयोध्या हते वृंदावन यात्रा पोथे श्री मां अभावनीय रूपे ठाकुर शाखा तो पया छिले अयोध्या से वृंदावन यात्रा के रास्ते में श्री मां ने अभावनीय रूपे अर्थात कि कल्पनातीत रूप से आशा नहीं रखी होगी। इस तरह से आशातीत रूप से ठाकुर का दर्शन प्राप्त किया। श्री माय बाहुते ठाकुर सुवर्णो निर्मितो इष्ट कोबिलो मां के बाहू में हाथ में ठाकुर के लिए जो निर्मित सुवर्ण कवच था सुवर्ण से निर्मित जो इष्ट कवच था वो मां ने अपने बाहू में धारण किया था। हाथ में धारण किया था। त उहा शोजत ने राखी तेन ओ पूजा कर ते मां वैसे तो इष्ट कवच को यत्न पूर्वक सयत्न यत्न पूर्वक रखती ओ पूजा करती रेलगाड़ी ते तनी ओई बाहु जानालार पारश्व ऊपर दिके राखिया शयन करिया छिले रेलगाड़ी में मां ने यही हाथ को इसी बाहू को खिड़की के पास में ऊपर की ओर रखकर के शय शयन किया था ठाकुर गबा पथे मुख बाइया बोली लेन ठाकुर ने वो वही खिड़की के बाहर से ही मुख अपना चेहरा बढ़ा करके कहा कवच टीजे शंगेशंगे रोए छे देखो जेनो ना हराए कवच जो साथ-साथ में रहा है देखो कि तुम उसको हार ना बैठो तुम कहीं उसको गवा ना बैठो मां तत खणात उहा खुलिया या जे टीनेर बा ठाकुर नित्य पूजितो फोटो का रख तो छिलो ताहार मध्य रा माने ततक्षणात कवच को खोल के जिस टिन के बक्से में ठाकुर का नित्य पूजित फोटो रखा था उसके भीतर में रख दिया तदबधी उहा आर बाहुते धारण करेना उसके बाद में कवच को फिर से उन्होंने अपने हाथ में पहना नहीं था तो यह हो गया वृंदावन से पहले का वर्णन जो है वह दो-तीन पैसेज में ही समाप्त हो गया है। इसके बाद में किंतु वृंदावन का काफी लंबा विवरण चलता है। क्या कहते हैं
माँ की तीर्थ यात्रा: वृन्दावन
गंभीरानंद जी? जो था काले वृंदावन पहुंचिया तारा बलराम बाबू दे जमुना पुली नो ठाकुर बाड़ी काला बाबू कुंजे उठ लेन यथा समय वृंदावन पहुंच करके पूरा भक्त मंडली बलराम बाबू के यमुना पुलिनस्थ यमुना के किनारे ठाकुरवाड़ी जो है काला बाबूर कुंज वहां पे सबने आश्रय ग्रहण किया तखन भाद्र मास समाप्त पाय उस प्राय उस समय भाद्र महीना समाप्त होने को आया था वर्षा शेषे वृंदावन बनोरा जी अपूर्व श्री धारण करिया छे वर्षा के आखिर में वृंदावन की वनराज जी ने अपूर्व श्री अर्थात कि अपूर्व रूप धारण किया है वृक्षे वृक्षे श्यामल शोभा वृक्ष वृक्ष में श्यामल शोभा समस्त भूमि नवो तणादते आच्छादित समस्त भूमि अभी अभी नवोदत नवोदगत अर्थात कि अभी-अभी जो उगा है निकला है इस तरह के तण से आच्छादित है बाताशय विभीभतो कुशुमेर मनोहर सुभाष हवा में विभिन्न फूलों की मनोहर खुशबू फैल रही है दिके दिके मयूरे केका ओ गांभीर हम बार रब उम चारों ओर मयूर का यह जो मयूर अर्थात कि मोर उसकी उसका जो संगीत और गाभ अर्थात कि गायों का हांबा रव हांबा हांबा करती है तो गाय तो वृंदावन तो भगवान कृष्ण की लीला भूमि वहां पर तो गायों को तो रहना ही है मयूर को तो रहना ही है वही मयूर पिच भगवान कृष्ण अपने जटाओं में धारण करते थे और यही गाभियों को चराने के लिए वो वन में मैदान में ले जाया करते थे। निहशंक मृग समूह पथपश्व शष्पाहार करते करते अकस्मात मनुष्य पदस्पर्श उत्करर्ण होइया ध्रुतो पोलाइ छे निहिशंक मृग समूह मृग अर्थात कि हिरण डियर तो यह जो मृग समूह है निहिशंक है अर्थात कि उनको किसी भी तरह का डर नहीं बिना डर के पथ के पारश्व में वह आहार करते करते एकाएक यदि मनुष्य का जो पैरों का आवाज सुन पाएंगे तो वहां से ध्रुत पालते छे एकदम स्पीडीली वहां से भागेंगे आर पुण्य शलीला कालिंदी को निनादे चंचल गति ते आपन मने चलिया छे और पुण्य सलीला कालिंदी कल कल निनानादे चंचल गति से अपने मन से चल रही है से वृंदावन शोभा से निकुंज कान श्री राधिका बिरहा श्रुति ते सुशित धुलिकणा वही वृंदावन की शोभा वही निकुंज कानन वही श्री राधिका के विरह अश्रु से सिक्त अर्थात कि विरह अश्रु से वो जिस सिक्त विरह अश्रु जहां पे गिरे हैं वह धुलिकणा श्री ब्रज गोपी शत्रष्ण दृष्टि निशणात ब्रजभूमि वही ब्रज गोपियों की शत्रुष्ट दृष्टि शत्रुष्ण तृष्णा के साथ में गोपियां जिसकी राह देख रही है भगवान कृष्ण की तो वही शत्रुष्ण दृष्टि से जो भरी हुई है ब्रजभूमि सब रहा है शबोई रोहिया छे सर्वत्रई ब्रजराज स्मृति जजमान ताकिया प्राण ताहार दर्शन लालसा जागा छे किंतु नानी सर्वत्र ब्रजराज की स्मृति ब्रजराज अर्थात भगवान कृष्ण ब्रजराज की स्मृति जाज्वल्यमान रहकर के प्राण में उनके दर्शन की लालसा जगा रही है। किंतु ना तिनी किंतु ब्रजराज स्वयं वहां पर उपस्थित नहीं है। कितना सुंदर पूरा संस्कृत वर्णन अह एक जैसे कि संस्कृत स्तोत्र की ही रचना की हो। इस तरह से यह वर्णन है। वृंदावन आशिया विरह विधुरा श्री माय मने हाहाकार उठिलो वृंदावन में आकर के विरह विधुरा विरह से विधुर श्री मां के मन में हाहाकार प्रकट हुआ। इहार पूर्व तनी श्री रामकृष्ण अत्यंत अंतत तो तीन बार चाकुश प्रत्यक्ष लाभ करिया छे यहां आने से पहले श्री मां ने अंततः तीन बार भगवान श्री रामकृष्ण का अपनी नजरों से दर्शन किया है। तीन बार कौन से सर्वप्रथम तो महासमाधि की ही महासमाधि के ही दिन मां जब अपनी चूड़ियां निकाल रही थी ठाकुर ने उनका हाथ पकड़ के कहा था कि अरे मैं गया कहां हूं यही तो एक कमरे से दूसरे कमरे की ओर तो वो एक था दूसरा कि वही जो विश्वनाथ की आरती दर्शन करते-करते ठाकुर मां का हाथ पकड़ करके उनको निवास स्थान पर ले आए वो दूसरा और तीसरा यही गाड़ी में जो मां ने कवच धारण किया था वहीं खिड़की से गिर ना जाए उसके बारे में ठाकुर ने उनको जो सावत किया था तो मां ने अपने मुंह से जो स्वीकृत किया है तीन दर्शन तो मिनिमम तीन दर्शन तो मां को हुए थे जो मां ने कहे नहीं ऐसे तो कितने दर्शन होंगे पता नहीं किंतु देखिए कि वृंदावन में आकर के विरह विधुरा श्री मां के मन में जो हाहाकार उठा वो तो वहां का वो कल वो पूरा एक मिट्टी मिट्टी में वो जो गोपियां थी श्रीमती राधा रानी थी श्री राधिका थी उनकी विरह से सिक्त विरह अश्रुओं से सिक्त है ना प्रत्येक धुली कणा उनके विरह अश्रु अश्रु अर्थात कि आंसू विरह अश्रु अर्थात कि भगवान कृष्ण का विरह भगवान चले गए हैं वृंदावन त्याग करके मथुरा तो विरह के मारे उनके जो अश्रु निर्गत हुए थे। उस अश्रुओं से प्रत्येक धुली कणा भीगा हुआ है। वहां पे सिक्त है, भीगा हुआ है। तो इस तरह के वृंदावन में आकर के मां को भी तो भगवान श्री रामकृष्ण का जो विरह है वह तो याद आने ही वाला है। तो इसलिए पहले तो भले ही चाहे मां ने एटलीस्ट तीन बार अपनी ही नजरों से ठाकुर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया तो था। किंतु चिरवाछित जीनी किंतु जो चिरवांछित है वांछित अर्थात कि प्राप्त करने योग्य चिरवांछित हमेशा जो प्राप्त करने योग्य है जहां श्री चरण मनोप्राण प्रतिशूत्र दृढ़ संबद्ध अर्थात कि जिनके श्री चरण में श्री चरण में मन प्राण का प्रत्येक सूत्र प्रतिसूत्र दृढ़ संबद्ध है तहार नियत प्रत्यक्ष अभाव प्रति मुहूर्ते मोर्मो के मथ तो कोरिया प्रश्न जागा थाकी लो जिनका नियत प्रत्यक्ष अभाव प्रत्यक्ष अर्थात कि सामने रहना सब समय नियत प्रत्यक्ष अर्थात कि सब समय सामने रहना दक्षिणेश्वर में पता है मां यहां नहबत में रहती है ठाकुर अपने कमरे में रहते हैं तो वह वैसे तो ठाकुर के साथ में कभी-कभी महीने चले जाते थे। ठाकुर के साथ में वार्तालाप करने का मौका नहीं मिलता था। किंतु फिर भी ठाकुर हमेशा तो सामने तो थे। नियत प्रत्यक्ष थे। हमेशा सामने थे। तो वह नियत प्रत्यक्ष अभाव वो जो हमेशा सामने रहते थे वह अभी नहीं रहे। तो नियत प्रत्यक्ष का अभाव प्रति मुहूर्त मर्म के मथित करिया। प्रत्येक मुहूर्त में हृदय को मथित करके प्रश्न जागा थाकि लो प्रश्न जागृत करता रहा कोथायतिनी कहां पे है वो देखिए दक्षिणेश्वर में भी मां को सब समय तो पुरुष भक्त ठाकुर के कमरे में बैठे रहते थे और मां तो पुरुषों के सामने जाती नहीं थी लज्जाशीला थी तो पुरुषों के सामने जाती नहीं थी सब समय नबत में रहेगी जब ठाकुर का सानिध्य प्राप्त करने के जो एक दो मौके थे मां के पास में अपॉर्चुनिटीज कि ठाकुर का आहार प्रस्तुत करके आहार का जो थाला है वह लेकर के मां घुमटा टान करके ठाकुर के कमरे में आएगी तो जैसे ही मां का आने का समय हुआ है सभी पुरुष भक्तों को कहा कह दिया जाएगा कि मां आ रही है तो सभी पुरुष भक्त ठाकुर का कमरा छोड़कर चले जाएंगे फिर मां आएगी ठाकुर के सामने आहार का थाला रखेगी ठाकुर आहार करेंगे और यहां पर मां का उपस्थिति क्यों आवश्यक था? ठाकुर तो बीच-बीच में भाव में चले जाते थे। समाधि में चले जाते थे। अभी खाना खाते-खाते यदि समाधि में चले गए तो बस तो खाना तो पड़ा रहा। तो ऐसा यदि बार-बार होगा देह को अन्न प्राप्त नहीं होगा। पोषक तत्व प्राप्त नहीं होंगे। तो देह तो टूट जाएगा। तो इसलिए मां ठाकुर के साथ में ये पूरे जगत का वार्तालाप करके सब सांसारिक वार्तालाप करके सब व्यवहारिक वार्तालाप करके ठाकुर के मन को पृथ्वी पर बांध के रखती थी कि उतना समय एटलीस्ट ठाकुर बाह्य अवस्था में रहे तो एटलीस्ट वो आहार कर पाए। माने रिवर्स मां का रोल पूरा रिवर्स ठाकुर से वो ठाकुर मां का हाथ पकड़ के मंदिर से बिल्कुल निवास स्थान की ओर ले आए। क्यों? क्योंकि बस अभी सांसारिक बातें समाप्त करके अभी ईश्वर के जप में मन बिठाना है। यहां पर मां का रोल है कि ठाकुर के मन को कैसे भी करके इस जागतिक जगत के साथ में जोड़ के रखना है। जो कुछ मिनट हो सके जो थोड़ा बहुत आहार ठाकुर के पेट में गया अन्न ठाकुर के भीतर में गया तो ठाकुर को कुछ पोषक तत्व मिले तो और कुछ दिन पृथ्वी पर रहेंगे भक्तों के कल्याण के लिए और कोई आएगा खाना लेके तो ठाकुर थोड़ा सा खाना खाएंगे फिर उनको तो पता नहीं है ठाकुर के साथ में डीएल कैसे करना है तो वह तो बेचारे ठाकुर का आध्यात्मिक वार्तालाप सुनते रहेंगे ठाकुर को आध्यात्मिक प्रश्न भी कर देंगे अच्छा महाशय जप कैसे करना है वगैरह वगैरह और ठाकुर फिर वह भाव में मग्न हो जाएंगे। खाना वैसे का वैसे पड़ा रहेगा। और ऐसा होता भी था। एक बार ठाकुर ने गुलाब मां को कहा होगा कि तुम मेरे लिए खाना ले आना। तो फिर उसके बाद में जितनी भी बार वो गुलाब मां दक्षिणेश्वर रहती थी मां के हाथ में से खाने का थाली लेके वही ठाकुर के कमरे में चली जाती थी। तो ऐसा महीनों महीनों होता था कि वह जो एकमात्र रीजन था मां को ठाकुर का सानिध्य प्राप्त करने का वो भी रीजन उनको नहीं मिलता था। तो यहां पर देखिए कि प्रत्यक्ष तो है किंतु सानिध्य प्राप्त नहीं है। तो माने इस तरह का विरह दक्षिणेश्वर में ऑलरेडी वो उस विरह से पसार हो के आई है। ठाकुर के सानिध्य के अभाव का विरह किंतु ठाकुर एटलीस्ट प्रत्यक्ष तो थे। तो यहां पे किंतु अभी देखिए ठाकुर की महासमाधि के बाद में वह प्रत्यक्षता भी चली गई। तो नियत प्रत्यक्ष का अभाव प्रत्येक मुहूर्त में मर्म को मथित कर करके यह प्रश्न उठाता रहता है। कोथायतिनी कहां पे है वो वृंदावन आशिया अच्छा अभी एक पूरा लंबा एक पैराग्राफ है जिसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
नीलांबर गार्डन, बेलूर मठ, जहां माँ ने निवास किया था
बेलूर मठ में जो मां रही थी ना वो नीलांबर गार्डन बगल में ही है बेलूर मठ के तो वहां पर कोई नहीं जाता था मैं जब बेलूर मठ में था मैं हमेशा यदि दिन इनके समय कहीं पर जाकर बैठना है ना तो वहां पर जाकर बैठा रहता था। अभी इस लास्ट टाइम मैं गया तो देखा चार पांच डिवोटी बैठे हैं कमरे में। मैंने कहा इन लोगों को कहां से पता चल गया कि यहां पे मां रही थी और [हंसी] यूजुअली बेलूर मठ इतना बड़ा है और इतना सब कुछ है देखने को कि वहां पे कोई जाता नहीं है। उन्हें कोई एक दो लोग जाएंगे आके चले आएंगे। वहां बैठेंगे कोई नहीं भीतर में। हां हां हां वो आउट ऑफ ये है आपका वो मेन साइट के सेपरेट है अंटिल एंड अनलेस आपको पर्टिकुलरली नहीं पता है कि यहां पे है आप नहीं जाएंगे तो नहीं पहुंच सकते हां हां हां हां [हंसी] हां हां हां सो इस बार देखा तीन चार डिवोटी भीतर में बैठे थे फिर मैंने क्या किया बाहर में वो जो वरांडा है वैसे तो सबके लिए बंद है हमारे लिए खुला है तो मैं दूसरे दरवाजे से वो बाहर वाले वरांडा में जाकर के बैठा था गंगा के सामने
प्रश्न: ठाकुर 'अविद्या स्त्री' के बारे में कहते तो है, किन्तु 'अविद्या स्त्री' से अधिक 'अविद्या पुरुष' ही दिखाई देते हैं!
वो वो था ना वो दाना काली दाना काली और उसकी पत्नी बहुत बार क्या होता है ना अपना ये मॉडर्न दृष्टि से इतिहास को देखते हैं ना तो हम उनके ऊपर में लांछन लगाना शुरू कर देते हैं कि यह लोग प्रोग्रेसिव नहीं थे। अभी मास्टर महाशय की दो लड़कियां थी तो उनको उन्होंने गाना सिखाया। अब ठाकुर है काशीपुर में मास्टर महाशय दोनों लड़कियों को ले आए। तो उन्होंने ठाकुर के सामने गाना गाया। ठाकुर को बहुत अच्छा लगा। इसके बाद में जब ये पता है काशीपुर में तो ठाकुर फर्स्ट फ्लोर पे थे। ग्राउंड फ्लोर पे सब डिवोटीज रहा करते थे। तो जब यह दो लड़कियां नीचे गई तो डिवोटी ने कहा अच्छा हमारे सामने भी गाओ हमको भी पता चले। तो उन्होंने वहां पर गाना गाया। ठाकुर सुन रहे थे। फिर उन्होंने मास्टर महाशय को कहा देखो बहुत ज्यादा इनको गाना मत सिखाना। जिसके सामने गाना गाएगी तो लज्जा टूट जाएगी। तो अभी क्या है आज की दृष्टि से यदि हम इस बात को देखते हैं हमको लगता है ठाकुर इज अननेसेसरीली कंजर्वेटिव। आप स्त्रियों को ऐसा क्यों कहेंगे कि भाई तुम गाना मत गाओ। पुरुष लोग जब स्त्रियों के सामने गाएंगे तो वो दैट इज ओके। स्त्रियां पुरुषों के सामने गाएगी दैट इज नॉट ओके। सो अब ये जेंडर डिस्क्रिमिनेशन क्यों है? बट यू सी दैट समाज ही ऐसा था उस समय का। सो दैट कंपनसेशन वी हैव टू गिव देम। मैं बहुत बार सोचता हूं कि दे ठाकुर मां स्वामी जी रिप्रेजेंट वेदता वि इज वन ऑफ द मोस्ट रेडिकल फिलॉसोफी इन द वर्ल्ड। तो इतनी रेडिकल फिलॉसोफी को उन्होंने इतने कंजर्वेटिव तरीके में रिप्रेजेंट किया है कि हमको ना कभी-कभी उसका रेडिकलनेस समझ में ही नहीं आता। जैसे वो पूरा सनातन प्रथा चली आ रही है। वो घुमटा प्रथा भी है। सती प्रथा भी है। वैसा ही एक अद्वैत वेदांत है। ऐसा ही हम मिक्स कब कर देते हैं। अपना जब तक खुद का एक म एक इंसाइट नहीं डेवलप होगा ना वी विल नॉट बी एबल टू अंडरस्टैंड हाउ रेडिकल दे आर।
प्रश्न: हमारा ध्येय सदैव सोशल सर्विस रहा है, सोशल रिफार्म नहीं
ना यह आपने जो सोशल सर्विस और सोशल रिफॉर्म का डिफरशिएशन किया परफेक्ट किया है। यह प्लेग जब अह स्टार्ट हुआ था कोलकाता में अपना फ़ेमस प्लेग रिलीफ पहला ही रामकृष्ण मिशन का तो उस समय वह जो हमने पमलेट बनाए हैं तो प्रॉब्लम क्या था उस समय कि गवर्नमेंट जो वैक्सीनेशन करवाना चाहती थी बहुत लोगों को यह डर लग गया कि इससे हमारा और कुछ प्रॉब्लम हो जाएगा वैक्सीनेशन करके या फिर दूसरा है कि गवर्नमेंट का तो वो नाथ का तो कुछ है नहीं ब्रिटिश गवर्नमेंट का कोई भी किसी को भी वैक्सीन दे सकता है वगैरह-वगैरह तो स्वामी स्वामी जी ने जब बेलून मठ की ओर से वो जो प्लेट बनाए थे उसमें लिखा है कि देखो आपकी जो नात है आपकी जो जाति है उसके अनुसार उसको अकबंद रख के हम आपकी सेवा करेंगे यदि आप पेशेंट है और हमारे ट्रीटमेंट कैंप में आइए प्लेग कैंप में आपकी जाति के अनुसार आपको खाना बना के देंगे उसके अनुसार आपकी सेवा करेंगे। सो मैंने जब पहली बार पढ़ा मुझे थोड़ा आश्चर्य तो हुआ कि व्हाट इज द पर्पस ऑफ म इतनी महामारी बड़ी फैली है। प्लेग मींस कि आपका 50 60% पॉपुलेशन साफ हो जाएगा जैसे यूरोप में होता था। थैंकफुली इस समय इतना नहीं हुआ था। किंतु फिर भी इतनी भयानक महामारी है। उसमें आपकी जाति को बनाए रख के आपकी सेवा करेंगे। व्हाट इज अ पर्पस ऑफ़ एंटरिंग दिस वर्ल्ड। राइट? किंतु दिस फॉलोस विद इन आवर ट्रेडिशन कि जाति प्रथा तोड़नी नहीं वी हैव टू ट्रांस वही जो वो स्वामी जी का वो करप्शन वाला कहानी था ना कि वो साउथ इंडिया के एक राजा स्वामी जी को कहते हैं स्वामी जी कंप्लेन करते हैं कि उनके राजा के वो जो रिलेटिव्स है वो चोरी कर रहे हैं खजाने की तो राजा बुला करके स्वामी जी को कहते हैं कि संभाल के रहिएगा आपका एक्सीडेंट एक्सीडेंट हो जाएगा अर्थात कि ये लोग आपका [हंसी] मर्डर कर देंगे नो नो नीड टू फाइट ऑल दिस बैटल्स। आपको बहुत बड़ा काम करना है। विश्व में वेदांत का प्रचार करना है। ये करप्शन वगैरह को आप टेंशन मत लीजिए इतना ज्यादा वरना ये लोग आपकी हत्या कर देंगे। [हंसी] सो यू आर राइट। वी हैव टू चूज़ आवर बैटल्स।
प्रश्न: वृन्दावन के विरह-रस को गम्भीरानन्दजी ने शब्दों में जैसे सजीव कर दिया है!
यह जो वैष्णव भाव है ना इसमें इस तरह की कितनी ही पदावलियां है कि जो कि यह विरह व्यथा को यह एड्रेस करती है। तो ठाकुर कितना प्रेम से यह सब गीत गाते भी थे। वो विदुर जब भगवान कृष्ण को लेने को आया है तो ठाकुर का वह प्रिय गीत धरोना धरोना रथ चक्र चक्र की रथ की चक्र चले माने जिस रथ को रथ में बिठा के विदुर भगवान कृष्ण को ले जा रहा है गोपियां गाती है कि इस रथ के चक्र को धरो पकड़ो यह रथ जो है क्या चक्र से थोड़ी ना चलता है पूरा गीत अभी मुझे एक समय था मुझे कथामृत के गाने बहुत सब याद थे अभी याद नहीं रहते तो एनीवे बट ये जो भाव जो है ना वृंदावन का यह पदावलियों में इतना सुंदर रूप से व्यक्त हुआ है। देखिए प्रोज़ का ना हमेशा एक लिमिट रहेगा। कितना ही पॉलिश्ड प्रोज़ हो उसमें आप मन के जो सबसे गहन भाव है ना वो व्यक्त नहीं कर पाएंगे। बिय्ड वन लेवल आपको फिर पदावली में जाना होगा। प्रोज़ वर्स में जाना होगा। प्रोस टू वर्स इज अ ट्रांसेंडेंस फ्रॉम नॉर्मल इमोशन टू हायर इमोशन। सो यह जो आप बता रहे हैं ना विरह व्यथा वो आप कथामृत में देखेंगे वो भरपूर गीतों से भरी हुई है इस तरह के गोपियों के विरह जनित गीतों से और वही ठीक ठीक ये भाव को एक्सप्रेस कर सकता है। देयर इज नो प्रोज़ कि वह एक्सप्रेस कर पाए इसको। रास लीला इज लाइक अ फ्लेश। विरह व्यथा इज इटरनल। वो जो इंद्रेश जी है ना कथाकार उसकी एक कथा मैं सुन रहा था। राधा रानी 100 साल के बाद में भगवान कृष्ण से मिलती है। तो भगवान उनको मिलने के लिए आते हैं तो राधा रानी कहती है कि एक वरदान दो। तो भगवान कृष्ण कहते हैं क्या? एक्चुअली वृंदावन त्याग करने के समय भगवान कृष्ण ने राधा रानी से एक वरदान मांगा था। आप एक वरदान दीजिए कि आप कभी भी एक भी अश्रु मेरे लिए नहीं बहाएंगे। तो राधा रानी कहती है ठीक है। अभी 100 साल के बाद में फिर मिलन हो रहा है। राधा रानी कहती है कि आप मुझे एक वरदान दीजिए। आप मुझे अश्रु बहाने का आप मुझे परवानगी दीजिए। सो से वेरी पावरफुल भाव मां के साथ में देखिए ना देखिए विरह मां का कैसा चला है? हालांकि पांच छ साल की उम्र में विवाह हुआ है। ठाकुर के साथ में रहने का मौका तो 16 साल के बाद में ही तो आया। जबकि मां वो दक्षिणेश्वर आई। राइट? तो उसके बाद में ठाकुर के साथ में रही है। कितना रही? 72 में मां का आगमन हुआ दक्षिणेश्वर। वहां से 86 आप समझ लीजिए कि 14 इयर्स एट द मोस्ट मां ठाकुर के सानिध्य में रही है। और मां का जीवन देखिए 53 53 से लेकर के अह माने 67 हुए ऑलमोस्ट 67 ना 67 में से ऑलमोस्ट 14 इयर्स ठाकुर का सानिध्य प्राप्त हुआ है। राइट? बाकी का पूरा जीवन उन्होंने फिर विरह में ही बिताया है। माने पहले भी विरह बाद में भी विरह कि पहले भी वहां पर थी जय राम बाटी में मां तो ठाकुर का सानिध्य प्राप्त नहीं था और फिर ठाकुर का महासमाधि हुआ तो फिर से वही विरह ना इसीलिए ये सब वैष्णव पदावलियां आप सुनेंगे गाना सीखेंगे तो इतना भाव उसमें से प्रकट होता है वि इज इंक्रेडिबल यह संगीत जो पूरी यह है ना ट्रेडिशन यह भाव को पकड़ने के लिए बनी है क्योंकि बियों्ड वन पॉइंट आपके शब्द जो है नहीं जा पाएंगे। फिर संगीत के माध्यम से ही उसको व्यक्त करना है। यह गंभीरानंद जी इतना प्रयास करते हैं वि इज ग्रेट। [हंसी]