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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 11 jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित

साधक जगद्धात्री को जननी के रूप में दर्शन करना चाहता है

भार समर्पण इस चैप्टर में हम इस चैप्टर की चर्चा कर रहे थे किस इस तरह से ठाकुर मां को धीरे-धीरे करके तैयार कर रहे हैं कि भविष्य का जो रामकृष्ण संघ होगा उसमें इष्ट और गुरु की पदवी मां को स्वीकार करनी है। किस तरह से ठाकुर के पास में मां के पास में भविष्य में हजारों हजारों भक्त आएंगे। उनके आध्यात्मिक जीवन का गठन करना है। इसी चैप्टर की आलोचना में गंभीरानंद जी महाराज एक बड़ा ही सुंदर पैसेज हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। वन ऑफ द बेस्ट मोस्ट वेल रिटन पैसेज इन रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। वह कहते हैं कि स्वर्ग की देवी को मनुष्य अपनी जननी के रूप में देखना चाहता है। वह मंदिर में बैठी है, स्वर्ग में बैठी है या वैुंठ में है कि फिर कैलाश पे है ना कि रणक्षेत्र में वह असुर का संहार कर रही है। इस तरह की देवी नहीं हमको चाहिए अपनी खुद की जननी के रूप में मातु के रूप में। बालक जब जन्म ग्रहण करता है तभी से मां उसका लालनपालन करती आ रही है और उसको स्नेह करती आ रही है। यह जो जननी का स्नेह है, बच्चा चाहे कितनी भी नटखट क्यों ना कर ले, चाहे कितना ही अपनी मां को परेशान क्यों ना कर ले, मां का प्रेम बच्चे के ऊपर में अनकंडीशनल वो बच्चे का बिहेवियर कैसा है उसके ऊपर में मां का प्रेम निर्भर नहीं है। मां बच्चा है तो मां उसको प्रेम करने वाली है। तो इस तरह से वह जननी का जो शुद्ध पवित्र प्रेम उसको देवी के पास में से चाहिए। तो यह पूर्ण करने के लिए हमारी आशा को मां शारदा देवी के रूप में जगत जननी ने जन्म लिया। यह पैसेज की आलोचना करतेकरते हमने यह भी देखा कि देखिए कि ठाकुर ने मां काली के साथ में ऐसा ही एक लीला की लीला अभिनय किया था। हमने देखा कि आध्यात्मिक जगत का एक बहुत बड़ा सरप्राइज एक बहुत बड़ी आश्चर्यजनक घटना कि किस तरह से भयंकरा काली जननी काली के रूप में परिणत हुई और उसमें भी हमने देखा कि राम प्रसाद की जो पदावली है उसने इसमें एक महत्व का कंट्रीब्यूशन किया है। ईश्वर के साथ में भाव से संबंध बनाना यह वैष्णव साधना में तो ऑलरेडी प्रारंभ हो ही गया था। अवतार के साथ में यह ऑलरेडी चैतन्य महाप्रभु की आप परंपरा देखें। वैष्णव परंपरा गौडीय वैष्णव परंपरा उसमें ऑलरेडी यह प्रारंभ हो चुका था। ईश्वर के साथ में किसी एक भाव से आप संबंध बनाते हैं तो वह भाव का आसरा लेकर के आप बड़े ही सहज रूप से ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं। तो जो कुछ भावों का वर्णन गौड़ीय वैष्णव परंपरा में किया गया है। उसमें से सर्वश्रेष्ठ भाव है मधुर भाव। शांत दास्य सख्य वात्सल्य और मधुर। यह मधुर भाव है सर्व भावों की पराकाष्ठा जिसमें कि साधक अपने को राधा रानी या तो फिर वृंदावन की गोपी मानकर के ईश्वर अपने प्रियतम है। इस तरह से वह ईश्वर के साथ में रिश्ता जोड़ता है। तो यह साधक की मनोवांछा पूर्ण करने के लिए भगवान कृष्ण स्वयं उसके प्रियतम के रूप में उनको दर्शन देंगे। उनकी मनोवांछा पूर्ण करेंगे। उनको आशीर्वाद देंगे। तो गौड़ीय वैष्णव परंपरा में यह भाव ऑलरेडी चला आ रहा था। शाक्त परंपरा में देवी के साथ में एक भाव का रिश्ता बना करके कोई एक साधक साधना करें। यह बात शक्ति परंपरा में वैसे थे तो सही। उसमें भी देखिए कि जो एक भाव जो है वीर भाव वीर भाव जैसे कि यहां पर आप वैष्णव परंपरा में मधुर भाव है वैसे ही शक्ति परंपरा में एक वीर भाव है। वीर भाव में पुरुष फिर स्त्री को ग्रहण करता है। किंतु उसके साथ में काम संबंध नहीं बनना चाहिए। रमणी शंगे थाके ना कोरे रोमण जिस तरह से शरद महाराज हमको लीला प्रसंग में कहते हैं स्त्री के साथ में रहेगा साधक किंतु स्त्री का संभोग नहीं करेगा रमण नहीं करेगा काम संबंध उसके साथ में नहीं रखेगा तो यह हो गया वीर भाव ठाकुर ने वीर भाव की भी साधना की थी सर्व भावों में ठाकुर माहिर थे सर्व भावों में उन्होंने विजय प्राप्त की थी। किंतु ठाकुर फिर आखिर में हमको कहते हैं कि देखिए वीर भाव जो है वह हम जैसे सामान्य साधकों के लिए नहीं है। जैसे कि वह फेमस घटना कि भैरवी ब्राह्मणी एक युवती स्त्री को ठाकुर के पास में ले आई और कहा उस स्त्री को दिगंबर होने को कहा और ठाकुर को कहा कि उसकी गोद में बैठकर के आप जप कीजिए। अभी इस तरह से इस तरह के प्रलोभन में यदि आप स्त्री के ऊपर में से काम भाव के ऊपर में से अपने मन को हटा करके ईश्वर पर लगाए तो यह सही सही में आपकी जो संकल्प शक्ति है, ईश्वर के प्रति आपका प्रेम है या तो फिर ईश्वर के प्रति शरणागति है, उसकी सर्वोच्च कसौटी होगी। उसकी सर्वोच्च परीक्षा होगी। तो वो वो भी ठाकुर ने जैसे ही उसकी गोद में बैठे और जैसे ही जप करना प्रारंभ किया वैसे ही ठाकुर चले गए निर्विकल्प समाधि में। तो ऐसा तो बार-बार ठाकुर के जीवन में हुआ है कि सब तरह के जो आकर्षण है दैहिक आकर्षण इंद्रियों के आकर्षण इन सबके ऊपर में उन्होंने विजय प्राप्त की थी। मथुर बाबू जब ठाकुर जो पहली पहली बार यह उन्माद अवस्था हुई और यह जो सब नाटक उन्होंने चालू किया था कल हम देख रहे थे कि जब भी यह हृदय वहां काली मंदिर में जाता है तो क्या देखता है भोग का समय बीता जा रहा है वहां पर वह ऑफिस में से बार-बार बुलावा आता है कि अरे भोग लाओ तो यदि फिर यह साधु लोग हैं कांगाली है ब्राह्मण लोग खाने को बैठे हैं वह मां का प्रसाद प्राप्त करें किंतु यहां यहां पर भोग लगाने वाला जो है वह खुद तो समाधि में चला गया है। वह खुद तो अनंत आनंद का भोग लगन का भोग कर रहा है। अपने मन में मन में विलास हो रहा है। मां काली के साथ में वो एकदम स्थिर होकर के ध्यान करने को बैठे हैं। कभी-कभी हृदय देखता कि मां काली को शयन करवाने के लिए ठाकुर जाते हैं। मां काली के शयन कक्ष में मां काली का खाट पड़ा हुआ है। तो साथ-साथ में मां का मां के साथ में वार्तालाप भी चल रहा है ठाकुर का। ठाकुर मां को पूछ रहा है अच्छा तुम कहती हो कि मैं तुम्हारे साथ में सोऊं? अच्छा मैं सोता हूं। बोल के वही मां काली के वह जो खाट है उसी पर ठाकुर भी शयं कर लेते हैं। तो इस फिर यह जो मां का जो मां को जो पुष्प अर्पण करना है अर्घ्य अर्पण करना है। अर्घ्य यानी कि जवा पुष्प और बिल्व ये दोनों को मिलाकर के उसमें फिर यह दुर्वा घास रखते हैं और यह चंदन लगाते हैं। चंदन और अक्षत अक्षत यानी कि राइस इसको भी इकट्ठा करने से अर्घ्य होता है। तो यह अर्घ्य मां को प्रदान करने के प्रदान करने से पहले अपने चर अपने मस्तिष्क के ऊपर में अपनी छाती के ऊपर में यहां तक कि अपने पैर के ऊपर में स्पर्श करवा करके बाद में मां को ऑफर करते हैं। अभी देखिए कि छोटा बच्चा जब होता है मां शारदा देवी का है कि जय वही उद्बोधन की ही घटना एक स्त्री भक्त मां का दर्शन करने के लिए आई तो फिर उसका छोटा बच्चा था तो उसने अभी वह छोटा बच्चा को तो शौच कहां जाना वह सब तो होता नहीं है। वहीं पर शौच कर दिया तो फिर मां ने कहा कि अच्छा मैं ही उसको साफ करती हूं। तो यह देखिए कि मां कहती है कि बच्चा जो होता है छोटा वह मां की गोद में बैठकर के वह शोच भी करता है। कुछ भी करता है। मां थोड़ी ना उससे बच्चे पर नाराज होगी क्योंकि बच्चा असमझ है। बच्चे को पता नहीं है और बच्चा और मां का जो प्रेम है उसमें यह छोटी-मोटी चीज कोई बाधा नहीं होती। तो वैसे ही यहां पे यह साधक का सर, साधक का मस्तक या तो फिर उसका पैर यह सब मां के लिए जननी जगत जननी के लिए एक समान है। तो इस तरह से ठाकुर मां को अर्घ्य देते थे। कभी-कभी देखते थे कि मां को जो भोग लगाना है वह बिल्ली वहां पर आ जाती है। तो ठाकुर बिल्ली के भीतर में वही मां काली का जगत जननी का दर्शन करते हैं। बिल्ली को वह खाना खिलाना खिलाने लगते हैं। तो यह सब देखकर के हृदय डर जाता था। किंतु ठाकुर को पता था कि मां के साथ में ऐसा ही आत्मीय संबंध बनाना है। जैसे कि मां अपनी सही-सही में मां है। वो कुछ भी करेंगे मां कभी नाराज नहीं होगी। क्यों? क्योंकि मां को पता है कि ठाकुर का उनके ऊपर में 100% शरणागति 100% प्रेम है। उनका मन मां के प्रेम के अलावा और किसी चीज पर जाता नहीं है। दैहिक सुख भोग रमण सुख की इच्छा इंद्रियों के वासना के विषय उन सबके ऊपर में से ठाकुर का मन संपूर्ण रूप से मां के ऊपर में आ गया है। तो देखिए कि जिस तरह से वैष्णव भाव साधना का डेवलपमेंट हुआ और उसकी परम चरम उसकी जो परिणति है उसका सर्वोच्च शिखर है वो आया मधुर भाव में शक्ति साधना में भी पहले वीर भाव तो था किंतु यह वीर भाव सर्वोच्च भाव नहीं है शक्ति साधना में शक्ति साधना में सर्वोच्च भाव है मातृ भाव मातृ भाव और संतान भाव और इसका जो प्रारंभ या तो फिर इसको पॉपुलराइज करने वाले बंगाल के जो राम प्रसाद थे उनकी पदावली राम प्रसाद का श्यामा संगीत तो राम प्रसाद के जो संगीत थी पदावली थी उसका भी हमने थोड़ा सा देखा कि क्या कहते हैं कि आमी ओई खेद खेद करी तुम माता थकाते हमार जागा घरे चुरी किस तरह से राम प्रसाद मां के साथ में जगत जननी के साथ में एक महान और अभी अभिमान का ना रिश्ता बनाते हैं। मान और अभिमान का नाता जोड़ते हैं। जैसे कि छोटा बच्चा मां के ऊपर में नाराज हो जाता है। हमने घरघर में ऐसा देखा होगा। मुझे मेरे खुद के बचपन के दिन याद है कि मां खाना बनाती है और मुझे यह सब सिंपल सिंपल खाना नहीं चाहिए। फैंसी कुछ चाहिए। रोटी दाल नहीं खाऊंगा और कुछ अच्छे से बना दो। ऐसी बच्चों की डिमांड रहती है। तो हम कैसे मां के साथ में झगड़ा करते हैं? मां के साथ में अभिमान करते हैं, मान करते हैं। आदार बांग्ला में शब्द है आबदार। तो किस तरह से मां के साथ में यह आप चलता है। तो इसी भाव में यह सब बहुत सारी पदावली राम प्रसाद ने रचित की है जिसका कि गान ठाकुर स्वयं किया करते थे कि मैं इस खेद से खेद कर रहा हूं कि तुम जागृत माता हो फिर भी मेरे घर में चोरी हो रही है। मने करी तुम्हार नाम करी किंतु शमोए पाशरी मैं सोच तो रहा हूं कि मैं बैठकर के तुम्हारा नाम करूंगा तुम्हारा जप करूंगा तुम्हारा स्मरण मनन कीर्तन करूंगा किंतु मन ऐसा पाजी है कि थोड़ी ही क्षणों के बाद में 10 जगह पर जाकर के दौड़ता है। संसार की 10 तरह की चिंताएं दुविधाएं आकर के मेरे सर पर सवार हो जाती है। तो अभी तक तो मैं यही सोचता था कि यह मेरी कमजोरी है। मेरा संस्कार, मेरे कर्मों का फल, पूर्व जन्म के कर्मों का फल या तो फिर मेरी संकल्प शक्ति, विल पावर का अभाव या तो फिर मेरी शरणागति, यही सब में कुछ कमी है। जैसा कि हम एक स्टैंडर्ड कर्म की थ्यरी है हिंदू धर्म की, वह हम समझते आ रहे हैं। कर्म की थिरी के ऊपर में ही पूरा वेदांत बना है। वेदांत क्या कहता है? यह जो डरिपु है यह अष्टपाश है पंच कक्लेश है यह काम कांचन है उसके ऊपर में से अपना मन हटाओ ईश्वर के ऊपर में मन को लगाओ स्मरण मनन निध्यासन या तो फिर यह यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार या तो फिर यह निष्काम सेवा या तो फिर यह पूजा पाठ यह वैधि भक्ति यह सब करो तो फिर तो ईश्वर प्राप्त होगे तो मैं भी अभी तक यही सोच रहा था कि मैं यदि तुम्हारा नाम नहीं ले पा रहा हूं इसका अर्थ है कि मेरा मन विषय वासनाओं में डूबा हुआ है। किंतु आखिर में अभी मुझे अकल आ गई है। आखिर में मुझे समझ में आ गया है क्या? आमी बुझे छ जेने छ आशय पे छ ए तोार चातुर मैं समझता हूं मैं मुझे अंदेशा हो गया है मुझे अंदाज आ गया है कि यह सब तुम्हारी चतुराई है तुम ही चतुराई करके जैसे कि मेरे मन को भटका देती हो जिससे कि मैं तुम्हारे शरण में मुझे तुम्हारा दर्शन ना हो वो ठाकुर कहते हैं ना मां लाल चुसी दिए भूले राखे अर्थात की लाल चुशी अर्थात कि लाल कलर की लॉलीपॉप जो बच्चे चूसते हैं ना वो लाल कलर का उसका कैंडी का रंग होता है उसमें एक वो छोटी सी लकड़ी लगाई होती है प्लास्टिक की ना ऐसी कोई तो उसमें मुंह में डालकर के बच्चे चूसते रहते हैं लॉलीपॉप तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि मां क्या करती है एक लाल चुसी दिए अर्थात कि संसार के प्रति हमारा आकर्षण बना करके हमको भुला के रखती है जैसे कि वह ठाकुर की कहानी है कि जहां पर बहुत एक अन्न का गोदाम है, गोडाउन है जहां पे यह राइस वगैरह अन्न रखा हुआ है। किंतु वहां पर चूहे यदि आ जाए इसको चूहों से बचाने के लिए क्या करेंगे? दरवाजे के पास में एक छोटी बाटी रखते हैं। वहां पर शुगर वगैरह कुछ रख देंगे। जिससे कि चूहे लोभित होकर के मोह में आकर के वही खाते रहेंगे। भीतर में गोडाउन में जाकर के इतना बड़ा अन्न का ढेर लगा हुआ है। उसको नहीं खाएंगे। तो यह जो मेरे मन को जो भुला करके रखा है वह तो तुमने ही रखा है। तुम्हारी ही यह सब गलती है। मेरी गलती नहीं है। देखिए कि कर्म का जो सिद्धांत है उसको पूरा ऊपर नीचे कर दिया। उसको अपने सर पर लाकर के खड़ा कर दिया। किंतु यह बात भी हमको समझने की आवश्यकता है। जैसे कल भी हमारा डिस्कशन हुआ था। यह सब बातें पढ़ने में तो बड़ी आसान लगती है। मां के ऊपर में भरोसा करके मां को ही सब दोष देकर के हम शांति से बैठे रहे। किंतु फिर जैसे वह गिरीश घोष वाली अवस्था गिरीश घोष जाकर ठाकुर को कहता है कि अच्छा मैं तो ना ही सुबह शाम मां का ईश्वर का नाम ले पाऊंगा ना ही खाने से पहले ले पाऊंगा। मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगा। जो कुछ आप कहते हैं उसमें से कुछ भी मुझे मेरे से होगा नहीं। तब ठाकुर ने क्या कहा कि ठीक है मुझे आम मुक्तारी दिए दामा के मुझे यह पावर ऑफ एटर्नी दे दो तो यह गिरीश घोष बड़ा खुशख होकर के सोचता है कि हां ठाकुर को पावर ऑफ एटर्नी दे दिया है ठाकुर पे सब मेरा पाप है वो ठाकुर के सर पर लाकर डाल दिया है बीच पीछे बाद बात में वह कभी हंसते-हंसते कहता भी था कि यदि मुझे पता होता कि मेरे पाप डालने का इतना बड़ा गड्ढा मुझे मिल जाएगा तो मैं और भी बहुत सारा पाप कर लेता। यानी कि मेरे पाप खाने वाले इतने बड़े अवतार मुझे मिल जाते तो और भी कुछ पाप कर लेता। क्या फर्क पड़ता है? ठाकुर तो सब मेरे पाप खाने ही वाले हैं। किंतु वही लीला प्रसंग में शरद महाराज क्या कहते हैं कि आखिर आखिर में यह गिरीश घोष कहता है कि देखो यह शरणागत होने से मेरा जो है मेरे जीवन के ऊपर में थोड़ा सा भी कंट्रोल नहीं रहा। मेरा जो जीवन है संपूर्ण रूप से कि जैसे कि ईश्वर के आधीन हो गया है। मेरा जीवन जैसे कि ईश्वर के द्वारा ठाकुर के द्वारा चालित हो रहा है। वो जैसे कि मुझे कठपुतली की तरह नचाते हैं। क्यों? क्योंकि यदि उनके परिवार में किसी का मृत्यु भी होता है तो वो शोक करने का भी उनके पास में अधिकार नहीं है। शोक किसके किसका मृत्यु हुआ है? परिवारजन का किसका परिवार है? परिवार तो मेरा नहीं है। परिवार तो ठाकुर का है। मैंने तो ठाकुर पे सब कुछ वो मेरे दे दिया है। पाप भी दे दिए हैं। पुण्य भी दे दिए हैं। ये इस इस जीवन के पूर्व जीवन के जितने भी कर्म है, कर्मों का फल है, सब कुछ दे दिया है। मेरा अधिकारित्व कहीं पर रहा ही नहीं। कर्तृत्व तो रहा ही नहीं। तो यह कर्तृत्व की भावना संपूर्ण रूप से जब लुप्त हो जाएगी तब किंतु वो ठीक है अच्छी बात है कि आप आप आराम से ईश्वर के पास में पहुंच जाएंगे किंतु यह कर्तृत्व की भावना अपने मन में से निकालना वो जो तपस्या है वो कितनी बड़ी तपस्या है कथामृत में ही एक जगह पे है। ठाकुर बार-बार कहते हैं कि जो पाप करेंगे तो पाप का कर्म है। उसका जो फल है आपको भुगतना होगा। जैसे कि एक कटोरी है। कटोरी में आपने लहसुन रखा है। गार्लिक रखा है। अभी क्या होगा कि एक कटोरी इस कटोरी को आप चाहे जितना भी धो दीजिए। उसमें से यह गार्लिक की गंध लहसुन की गंध जाएगी नहीं। तो यह बात सुनकर के गिरीश बेचारा बड़ा परेशान हो गया कि वह सोच रहा है कि अरे मैंने इतने पाप किए हैं तो क्या यह पाप का फल कभी जाएगा नहीं। मुझे कभी ईश्वर दर्शन नहीं होगा। तो फिर वह जब बाकी सब भक्त चले जाते हैं तो ठाकुर के पास में जाकर पूछता है क्या महाशय लहसुन की गंध बिल्कुल जाएगी नहीं? तो ठाकुर उसके मन का भाव समझ गए। तो साथ-साथ में ठाकुर ने उपाय भी बता दिया। क्यों नहीं जाएगी? आगुने पुिए दाव अग्नि जो होता है अग्नि में इस कटोरी को तपा दो अग्नि से जब कटोरी जलेगी तो उसमें से लहसुन की गंध भी चली जाएगी तब कहीं जाकर के गिरीश को भरोसा तो हुआ किंतु शायद उसको यह अंदाज नहीं था कि वह अग्नि में तपना किसको कहते हैं तो देखिए कि

दो साधनाएं: कष्ट करके तपस्या करना और जगदम्बा से माँ-सन्तान का रिश्ता जोड़ना

आध्यात्मिक जगत में देयर इज नो फ्री विल फ्री मिल माने मुफ्त में खाना यहां पर नहीं है मैं कुछ काम नहीं करूंगा खा लूंगा। ऐसा नहीं है। किंतु बात यह है कि देखिए कि वह एक विधिवादी यह भक्ति है। साधन भजन करके ईश्वर की आराधना करके इंद्रिय संयम करके भी एक रास्ता है। किंतु यह जो रास्ता है शरणागति का यह आत्मीयता का वो रास्ता शायद उससे सहज है। तो इसीलिए यह सहज रास्ता जैसे ठाकुर ने कहा ना कि कली में अन्नगत प्राण वह ध्रुव की तरह 1000 साल एक पैर के ऊपर में खड़े रह के तपस्या करना विश्वामित्र की तरह तपस्या करना ऋषि मुनियों की तरह तपस्या करना यह सब कुछ अब हमारे से कहां होने वाला है तो कुछ तो सहज उपाय चाहिए तो सहज उपाय है नाम जप यह ईश्वर के ऊपर में शरणागति भक्ति कलिते नारदीय भक्ति ठाकुर कहते हैं कली में यदि सहज सिद्धि प्राप्त करनी है तो नारदीय भक्ति है। तो यह जो आध्यात्मिक जगत का रास्ता थोड़ा सा सहज होता है। थोड़ा सा कहां मैं कहूंगा कि काफी सहज हो जाता है। मेरे खुद के अनुभव से कह रहा हूं कि काफी सहज हो जाता है। यदि जगत जननी के साथ में हम संतान और मातृभाव से उनके साथ में हम नाता जोड़े जननी के साथ में ईश्वरी के साथ में हम अपना रिश्ता बनाएं। तो इसीलिए यह जो राम प्रसाद के जो भजन है, पदावली है, ठाकुर इसका बार-बार गान करते हैं। बार-बार जैसे कि हमको सिखाते हैं। वो एक घटना भी है। वो डॉक्टर सरकार वो बड़ा ही रैशनलिस्टिक था, बड़ा ही इग्नोस्टिक था, बड़ा ही स्केप्टिकल था कि यह ठाकुर को भाव हो रहा है, दर्शन हो रहे हैं या इसकी कोई सत्यता है कि भी नहीं। उस समय जब डॉक्टर सरकार का ब्रेन वाश ठाकुर कर रहे थे आखिरी आखिरी दिनों की यह सब बातें उस समय यह ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं कि राम प्रसाद के भजनों की एक किताब खरीद करके डॉक्टर सरकार को दे दो और फिर उसमें भी कुछ-कुछ भजन है उसको मार्क करके ठाकुर कहते हैं कि यह सब भाव उसके मन में घुसा देने हैं। तो यदि किसी का ब्रेन वाश भी करना है, हाइली रेशनालिस्टिक जो है, उसके लिए भी ठाकुर यह भाव साधना वाला मार्ग पसंद करते थे। यही अ राम प्रसाद की भजनावली को उसके माध्यम से इतने रैशनालिस्टिक जो दीवार एक बैरियर जो खड़ी की है डॉक्टर ने अपने आसपास उसको तोड़ना चाहते थे। ये डॉक्टर सरकार तो फिर भी ठीक है छोटा-मोटा वो तो है यहां पर स्वामी जी जैसे स्वामी जी नरेंद्र जैसा नरेंद्र उसकी जो रैशनलिटी उसका जो ये स्केप्टिसिज्म उसका ये जो साइंटिफिक टेंपरामेंट इतना स्ट्रांग था ठाकुर की स्वयं परीक्षा करता था ऐसे ठाकुर के ठाकुर जो नरेंद्र को शायद न समझा सके वो वही गोपाल की मां अघोर मणि देवी उन्होंने नरेंद्र को समझा दिया और ठाकुर के पास आई है अघोरमणि देवी गोपाल की मां नरेंद्र भी वहां पर बैठा है और यह अघोरमणि देवी बता रही है नरेंद्र को अपना अनुभव रोती-रोती कहती है कि यह जो बाल कृष्ण है वह बच्चे की तरह मेरे पास में रहता है। नटखट की तरह यह सब तूफान भी करता है। कुछ ना कुछ मुझे परेशान भी करता रहता है। मैं उसको डांटती हूं। मैं उसको स्नेह करती हूं। मैं अपनी गोद में उठा के उसको प्रेम करती हूं। यह सब गोपाल की मां रोती-रोती नरेंद्र को कह रही है और बार-बार पूछ रही है कि बेटा मैंने तो सुना है कि तुम्हारा इतना साइंटिफिक और रैशनलिस्टिक टेंपरामेंट है। यह मेरे शब्द है उनके नहीं। तो इस तरह का टेंपरामेंट होने के बाद में अब तुम मुझे बताओ कि क्या मेरे जो विजन है मेरे यह जो दर्शन है वह सही है ना कि मैं पागल हो गई हूं। मेरे मन का भ्रम है। यहां पर गोपाल की मां रो रही है। और यहां पे सामने नरेंद्र सुनते-सुनते उसकी आंखों में से दरदर करके अश्रुओं की धारा बह रही है। और नरेंद्र कहता है कि नहीं मां आप जिस आपने जो कुछ देखा है वह सब सही है। तो देखिए कि जो भाव का प्रचंड प्रवाह शायद ठाकुर नरेंद्र को इतना नहीं समझा पाते जो कि गोपाल की मां ने नरेंद्र को समझा दिया। तो यह जो भाव जो है भाव अपने मन को अपने हृदय को सीधा स्पर्श जाते हैं और भाव साधना के माध्यम से यदि हम ईश्वरी को जगत जननी को प्राप्त करने का प्रयास करेंगे तो वह हमारे लिए सहज हो

रामप्रसाद के कुछ गानों में अद्भुत काली-माहात्म्य

जाएगा और भी कितने भी सारे गाने हैं कल हमने देखा था कि राम प्रसाद के साथ में ठाकुर क्या गाते हैं आमी की आटा छेले आमी भोई कोरी ने चोख रांगा ले मैं क्या कोई प्रीमेच्योर बच्चा हूं? आठ मास में क्या आठ महीने में मेरा जन्म हुआ है? इंटेलेक्चुअली फिजिकली मैं क्या कमजोर हूं कि तुम आंख निकालोगी तुम आंख लाल करोगी तो मैं डर जाऊंगा। माए पोए मुकदमा धूम होबे राम प्रसाद बोले आमी खंतो होबो जखन आमा शांत कोरे लोबे कोले मां और बच्चे में जब मुकदमा होगा तब धूम मच जाएगी मैं तभी रुकूंगा जब तुम मुझे शांत करके अपनी गोद में उठाओगी तो यह सब भजन हमने कल देखे थे आज हम और भी कुछ भजन देखते हैं कल जो भजन देखे थे वह हमने देखे थे इसमें से कथामृत में से आज जो और भी कुछ है जिसको कि मैंने कथामृत में नहीं पाया किंतु यह जो राम प्रसाद की जीवनी है उसमें है। मैं पूरे-पूरे भजन का अर्थ आई डोंट नो कि मुझे आएगा क्योंकि कथामृत के जो भजन है उसका ट्रांसलेशन तो मिलना आसान है। मुझे हिंदी या इंग्लिश या गुजराती में देख लेना है। किंतु यह जो किताब है यह जो भजन है इसका ट्रांसलेशन मुझे नहीं मिला। और एक-एक शब्द ट्रांसलेट करके उसका अर्थ निकालना वह भी बड़ा एक जटिल कार्य है। तो मैं सिर्फ भजन बताता हूं और जो व्याख्या मैं हिंदी में करूंगा आई डोंट नो कि कितनी सही है किंतु जस्ट यह एक आपके साथ में मैं शेयर करना चाहता हूं क्योंकि मुझे इतना अच्छा लगे यह सब भजन क्या है आर काज किया मार काशी और क्या मुझे काशी का काम है काशी अर्थात कि वाराणसी वाराणसी जाकर के क्या मुझे वो भगवान शिव की स्तुति करने की जरूरत है मा पद तोले पड़े छे गोया गंगा वाराणसी मां के पद तले चरण तले पड़े हैं। गया गंगा और वाराणसी हृद कमले ध्यान काले आनंदो सागररे भासी जब मैं मां के मैं अपने हृद कमल में जब मैं मां का ध्यान करता हूं तो मैं आनंद सागर में बहता रहता हूं। ओ रे काली पदो कोकोन दो तीर्थो राशि राशि अरे जब काली पद के काली के पद में हजार तीर्थ है काली नाम में पाप को था माथा नहीं था और माथा भी था कितना सुंदर काली के नाम पर पाप कहां है जिसका सर नहीं है उसको सर की पीड़ा कहां से होने वाली है सर सर दर्द कब होगा जब सर होगा सर ही नहीं होगा सर दर्द कैसे होगा कालीना में पाप को था माथा नहीं माथा व्यथा काली का नाम लिया तो पाप कहां से होने वाले हैं? जब सूरज का प्रकाश जब आ रहा है तो यह अंधेरा कहां पर रहने वाला है? जिसका सर ही नहीं है उसको सर दर्द कहां पर होने वाला है? ओरे अनल दाहन जथा करे तुला राशि गंगाय करे पिंडोदान पितु रुण जाए प्राण ओरे जे कोरे काली ध्यान गया तार गया सुने हाशी जो काली का ध्यान करता है वो यह गया जैसे तीर्थ स्थान का नाम सुनकर के ही हंसता है काशी ते मोले मुक्ति एबोटे शिबेर उक्ति काशी ते यदि हम मृत्यु होगा तो यह काशी काशी में मरने से मुक्ति होगी यह है शिव की उक्ति ओरे शकले मूल भक्ति मुक्ति होए तार दासी किंतु जो मुक्ति की जहां पर मूल है वो सब जो मुक्ति उक्ति वो सब किसकी दासी है तो वो मां काली की निर्वाण की आ फल जले ते मिाए झोल निर्वाण में क्या फल है पानी में पानी डालना है इतना ही तो और चीनी होबा भालो नोए चीनी खेते भालो बासी ये ठाकुर का वो वर्ल्ड फेमस सेंटेंस इस गान में है। इस गीत में है। अरे चीनी होना अच्छा नहीं है। चीनी खाना अच्छा है। मैं चीनी खाना ज्यादा पसंद करता हूं। ओरे चीनी होवा भलो न चीनी खेते भालो बाशी। कौतुके प्रसाद बोले करुणा रिधिर बोले ओरे चतुर वर्ग करत तले भाभी ले रे जे एलोकेशी चतुर वर्ग करतले यह जितने भी यह आपका भक्ति मुक्ति यह जो कुछ भी है ज्ञान वैराग्य सब कुछ वो मेरे हाथों में है भाभी ले रे एलोकेशी मैं यदि एलोकेशी को मैं चिंता करूंगा उसका स्मरण मनन करूंगा तो यह जितने भी आध्यात्मिक जगत के फल है मेरे सिद्ध हस्त हो जाएंगे। एलोकेसी का अर्थ क्या है? जिसके बाल लंबे हैं और बिखरे हुए हैं और खुले बाल हैं। खुले लंबे बिखरे हुए बालों वाली जो है वो है एलोकेशी। तो देखिए कि मां के ऊपर में किस तरह का भरोसा है कि यदि मैंने मां का एक बार नाम लिया। यह जो आम मुक्तारी दाऊ वाला कांसेप्ट जो है ना वो कभी-कभी हम सोचते हैं कि ठाकुर का यूनिक है। किंतु देखिए कि यह राम प्रसाद के गीतों में कितना स्पष्ट रूप से छलक करके आता है कि मां के ऊपर में यदि आप पावर ऑफ एटर्नी दे देंगे मां को तो यह सब कुछ आपके हाथ में आ जाएगा। मन केनो रे भाभीिश एतो जेनो मातृहीन बालक मतो मन तुम क्यों इतनी चिंता कर रहे हो? क्या तुम मातृहीन बच्चा हो? क्या तुम अनाथ बच्चे हो? जिसकी मां नहीं है भवे ऐसे भापो बोशे काले भोए होए भीत क्या भव में आकर के इस संसार में जन्म लेकर के तुम बैठे-बैठे चिंता कर रहे हो काले भोए होए भीत काल अर्थात कि मृत्यु मृत्यु के भय से तुम भयभीत होकर के बैठे हो और कालेरो काल जे महाकाल से काल मायर पदानो अरे काल का काल महाकाल है वो मां के पद तले प्रण प्रणत होकर के बैठा है। यदि मेरी मां स्वयं काली है तो फिर उस काल का मुझे क्या डर है? काल खुद मां के चरण के नीचे में पड़ा हुआ है। फणी होए भके रे भो ए जे बो अद्भुत ओरे तू कोरिश की काले रे भय होए ब्रह्ममयर शूत अरे तुम क्या काल का भय क्यों कर रहे हो? ब्रह्ममई का संतान होकर के काल का भय तुम क्यों कर रहे हो? एक ही भ्रांतो नितांतो तू होली रे पागल मतो यह भ्रांत हो गए हो क्यों तुम पागल की तरह क्यों तुम हो गए हो क्यों मृत्यु का भय करते हो ब्रह्ममयर शूत होए ब्रह्ममय शूत यदि ब्रह्ममई का संतान हो तो इस सब चीजों से तुमको डर किस बात का है अमन मा आ ज ब्रह्ममई जार भय से होए रे भीत मीछे केनो भावो दुखे दुर्गा दुर्गा बोलो अभीरतो क्यों बिना मतलब के तुम दुख कर रहे हो दुर्गा नाम अविरत करते रहो ओ मन दुर्गा नाम में भय था कि ना घुचे जाए भावना जतो अरे मन दुर्गा नाम से भय रहेगा नहीं जितनी भी भावना है सब चली जाएगी देखिए यह सब राम प्रसाद के गीत इन सब में मां को आप यदि शरणागत हो जाएंगे मां को यदि आप पावर ऑफ एटर्नी दे देंगे तो यह सब मन का जो विकार है, भय है, सब चला जाएगा। अच्छा इतना तो हमने राम प्रसाद के बारे में सोचा। किंतु पता है यह जैसे कि वेदांत में है ना एक अद्वैत वेदांत है। कहा जाता है कि वेदांत की सर्वोच्च जो एक है फिलॉसोफिकल इवोल्यूशन वो है अद्वैत वेदांत। किंतु फिर पता है कि वह अद्वैत वेदांत का भी एक बाप है। वह है कि अजातवाद। अजातवाद कहता है कि सृष्टि की रचना हुई ही नहीं है। यह जो कुछ भी है यह सब आपके मन का भ्रम ही नहीं है। वह भ्रम भी गलत है। जिस क्षण आपने यह सोच लिया सृष्टि नहीं है उस समय यह सृष्टि चली जाएगी। तो यह जो सर्वोच्च जैसे कि भय भी क्यों है? भय है ही नहीं। मां का नाम क्यों लेना है? मां का नाम ऑलरेडी है। हमको बस एक चपटी बजा करके ना कि ऐसा करके उसको भगा देना है। तो वह जो एक सर्वोच्च भाव है ना वो भी एक पागल था। यह राम प्रसाद का ही एक समवय उसी के समय में एक दूसरा था। उसकी बात करने से पहले थोड़ी सी पूर्व भूमिका बांधते हैं। किस तरह की कि देखिए कि बंगाल में यह जो वैष्णव और शाक्त यह दोनों परंपराएं काफी लंबे समय से रही है और जो वैष्णव पदावली या शाक्त पदावली की रचना करते हैं। जिन्होंने इसका अभ्यास किया है। पता है कि कितनी सर्वोच्च फिलॉसोफिकल सिद्धि इन सब चीजों में है। इन सब पदावलियों में है। किंतु साथ-साथ में और भी एक खास प्रकार के कवियों का जन्म हुआ था। उन्होंने सिर्फ अपनी परंपरा में पदावलियों की रचना अपनी परंपरा में भजन संगीत की रचना ही नहीं की। सामने वाली जो परंपरा है उसके ऊपर में कटाक्ष पूर्ण व्यंग पूर्ण विनोद पूर्ण उपहास पूर्ण पदावलियों की रचना की है। एक समय था कि यह शाक्त और वैष्णव यह दोनों कवि सामने-सामने बैठते थे और एक कवि जो बोलेगा सामने वाला उसको काटेगा और बड़ा ही कटाक्ष पूर्ण व्यंग बाण मार करके उसको काटेगा और वह जो कवियों का युद्ध होता था वह जो जो म बुद्धि का क्रिएटिविटी का वह जो चमकारा होता था वह सुनने के लिए लोग कितना बैठे रहते थे कितने आतुर रहते थे तो ऐसा इसका एक अंश एक घटना अपने संघ में भी ऐसी हुई है। कवियों का तो युद्ध नहीं किंतु मैं कहूंगा कि किस तरह से यह जो आपस में ये वैष्णव और शाक्य का इन दोनों के बीच में ये मीठा झगड़ा होता रहता था। देखिए यह झगड़ा जो है वो सब स्नेह और प्रेम का झगड़ा है। ये जो क्रिश्चियनिटी की तरह ना कि दूसरे धर्मों की तरह कि जो मेरे मत को फॉलो नहीं करता है उसको जिंदा जला डालो। यह सब नहीं था। प्रेम का यह झगड़ा था। तो यह दोनों थे। एक थे बलराम बसु और दूसरे थे

कहानी: शाक्त और वैष्णवों के बिच मीठा झगड़ा

सुरेश मित्र। अभी देखिए कि बलराम बसु थे एकदम पक्के वैष्णव और कितने धीरू और भीरू थे। ठाकुर के ऊपर में स्वामी जी के ऊपर में कितनी श्रद्धा थी। कितने शांत स्वभाव के थे और यहां पर सुरेश बाबू थे। तो वह थे अग्रेसिव नेचर था। शाक्त थे। ठाकुर के ऊपर में भक्ति थी। किंतु वीर की भक्ति थी। देखिए एक-एक उदाहरण दूंगा दोनों की भक्ति का कि यह बलराम बाबू ठाकुर के ऊपर में तो भक्ति है। वह तो छोड़ ही दीजिए। मास्टर महाशय कथामृत में लिखते हैं। पहली बार बलराम मंदिर में गए थे तो देखा कि बलराम बाबू इस तरह से दोनों हाथ जोड़कर के ठाकुर के सामने विनीत रूप से खड़े हैं कि देखकर के लगता नहीं है कि वह इस घर के मालिक है। ऐसा लगता है कि घर में एक दास है। दास की तरह नौकर की तरह ठाकुर के सामने खड़े हैं। वह विनम्र भाव था उनका। तो वह तो छोड़ ही दीजिए कि ठाकुर के साथ में। यहां तक कि नरेंद्र के साथ में स्वयं नरेंद्र ठाकुर की महासमाधि के बाद की मोस्ट प्रोबेबबली यह घटना है। नरेंद्र जाता था बीच-बीच में यह बलराम मंदिर में और वहां पर बैठकर के गप लगाता था और नरेंद्र का ऐसा था कहां पे भी थूकता रहेगा। वो उसके घर की दीवार सब उसने ऐसे ही थूकते थूकते लाल कर दी थी। तो यहां पे भी वो बलराम बाबू के घर में जाता है और इधर-उधर थूकेगा। तो बलराम बाबू क्या करते थे? वह थूकदानी है। तो वो एक पात्र होता है। एक इस तरह का वो लोटे जैसा तो उसको लेकर के नरेंद्र के सामने खड़े रहते थे। नरेंद्र जब भी थूकने का वो उद्योग करता तभी वो उसके सामने यह थूकदानी लाकर के कहते हैं कि नरेंद्र तुम इसमें थूको और कहीं मत थूको। तो देखिए कि इतना नरेंद्र के प्रति भक्ति वो थूकता है तो वो थूकने के लिए वो लोटा जो है ना कि यह जो यह बाटी जो है वो उसके सामने लाकर वो खड़े रह जाते हैं अपने हाथों से। तो यह विनम्रता उनमें थी और यहां पर है सुरेश मित्र एक तो था कि शाक्त थे और बड़ा ही घमंड भी था शाक्तों का तो एक होता ही है और ये मान अभिमान यह सब सीखे तो मां काली के साथ में तो वो घटना है कि वो उन्होंने ठाकुर उनके घर आए थे एक बड़ा ही महंगा वो जो हार है गले का फूलों का ठाकुर को पहनाने का प्रयास किया तो ठाकुर ने उस हार को फेंक दिया क्यों उसका उसके भीतर में जो अभिमान हो गया होगा उसको तोड़ने की आवश्यकता ता थी। तो यह जो है सुरेश मित्र बड़ा ही अभिमान करके एक जगह पर बैठा है कोने में और रोते-रोते कहता है राठ देश बामून राठ देश अर्थात कि वह जगह का नामार पुकुर वाली वहां का यह ब्राह्मण है। उसको तो पता नहीं यह सब चीजों का मूल्य क्या है। इतना पैसा खर्च करके मैं लाया हूं उनके गले में पहनाने के लिए हार और उन्होंने हार को फेंक दिया। ऐसा बोलकर के बड़े नाराज होकर के दुखी होकर बैठे हैं। किंतु साथ-साथ में ही कह रहे हैं देखो कि मेरे मन में जो अहंकार हुआ था, उस अहंकार को तोड़ने के लिए ठाकुर ने ऐसा किया। यहां पर ठाकुर वहां पर कीर्तन चल रहा है। कीर्तन करते-करते एकाएक जो हार पड़ा था, वह हार उन्होंने अपने से अपने गले में पहन लिया। और क्या करके नृत्य करते हैं? जगत चंद्र हार परे छी। यह जगत चंद्र रूपी हार मैंने पहना है। ऐसा एक नृत्य एक गीत की कड़ी है। वह गातेगाते नृत्य कर रहा है। तब कहीं जाकर के सुरेश के हृदय को सांत्वना मिली कि नहीं उनकी यह जो ऑफरिंग है गिफ्ट है भेंट है ठाकुर ने स्वीकार की है। तो यह दोनों का इस तरह का भाव था। तो अभी ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब यह सुरेश बाबू या और ये बलराम बाबू वहां पे वराह नगर मठ में इकट्ठा हो जाते तो इन दोनों के बीच में यह मीठा झगड़ा चलता तो सुरेश बाबू क्या कहते हैं माने सुरेश बाबू ये बलराम बाबू के सामने बलराम बाबू तो कुछ बोलेंगे नहीं बड़े विनम्र बड़े शांत स्वभाव के हैं किंतु सुरेश का ऐसा था क्या बोलेंगे बलरामशाला बोस्टोम तो राधा केस्टो एकटा गाज तलाई दांडिए पीपी आवाज को छे बलराम साला बोस्टम बोस्टम अर्थात कि वैष्णव वैष्णव का एक अपभ्रंश तो बलरामशाला वैष्णव है बोस्टम है तुम्हारा राधा कृष्ण जो है राधा केस्टो एक पेड़ के नीचे में खड़े रहकर के पीपी आवाज करते हैं सात जन्मे सुखनो उपोषी सात जन्म का सूखा हुआ रुखा सूखा म दुर्बल हो गया हुआ उपवासी है पापी तुम लोग पापी हो ची और ची माने देखिए कि यह वैष्णव भाव जो है पूरा इस तरह का है कि वे लोग उपवास करेंगे। मैं पापी हूं। मैं पापी हूं। बोलकर के भगवान से प्रार्थना करेंगे। मेरी रक्षा करो। मुझे मुक्ति दे दो। तो ये जो भयभीत भाव है उनका फिर ये उपवास करते-करते तपस्या करते-करते दुर्बल हो गए हैं। विषय वासनाओं से मन को हटा हटा करके मन कमजोर हो गया है और राधा कृष्ण बंसी बजा रहे हैं। ऐसा वो सब समय वो इमेजिनेशन करते रहते हैं। तो किस तरह से यह शाक्त जो है वह वैष्णव लोगों की इस तरह से मजाक उड़ाते हैं। व्यंग विनोद करते हैं कि तुम्हारा राधा कृष्ण एक पेड़ के नीचे में खड़े रहकर के पी पी आवाज करता है। सात जन्म का उपवासी है। पापी है। ची करता रहता है। और एक बासी ते फूं पाड से और एक बंसी में फूं फूं करते रहते हैं। आर अमार मां केन जानिश और मेरी मां कैसी है पता है? लाख चढ़ लाख चढ़ा चढ़ आवाज को शाला तोर बोस्टम के धर छ आर अमरार मार खड़ा दिए बोली को भड़ा भड़ करके आवाज हो रहा है तुम्हारे जितने भी वैष्णव है पकड़ पकड़ करके मां का जो खड़ग है उससे उसकी बलि देते हैं तो ये दोनों के बीच में चलता रहता था कथामृत में भी है तो एक वैष्णव कहता है कि यह यदि भवसागर पार करना है तो कृष्ण ही है जो कि कृष्ण रूपी नौका में बैठकर भवसागर पार करोगे गए तो यह शक्ति वाले कहते हैं शक्ति साधना वाले कि यह जो हमारी मां तो राजराजेश्वरी है वह थोड़ी ना नौका खुद चला के भक्तों को पार करवाएगी वो कृष्ण को उन्होंने ही रख दिया है नौकरी में नौकर की तरह कृष्ण ही मां की आज्ञा का पालन करके लोगों को इस पार से उस पार ले जाता है तो क्या है कि एक मीठा झगड़ा चलता रहता था तो यह राम प्रसाद जो है राम प्रसाद के साथ में ही उनके एक समवय एक थे उनका नाम था

आजु गोसाईं और रामप्रसाद का कवित्वमय टकराव

आजू गोस्वामी स्वामी अभी यह आजू गोस्वामी की कहानियां बड़ी प्रसिद्ध है। उनके बारे में बहुत कुछ लिखा भी गया है। किंतु सही में देखें तो ही वाज अ मिस्ट्री। लोग कहते हैं कि वह एक पागल है। पागल की तरह यह जो व्यंग उपहास पूर्ण पदावलियों की रचना करते रहते हैं और लोग उसको सुनने के लिए आते हैं सिर्फ और सिर्फ मात्र बिकॉज़ क्योंकि यह इस तरह की वो पदावलियों की रचना करते हैं। तो यह उनके बारे में था। किंतु पता है कि हमको खास करके देखिए इनको किसने फेमस किया? रामप्रसाद को किसने फेमस किया? तो कृष्ण चंद्र महाराज कृष्ण चंद्र थे। वह नदिया के राजा थे। तो एक बार वहीं वो राम प्रसाद वो नदी के किनारे बैठकर के इस तरह से अपनी मां की पदावली गा रहे थे। उस समय यह कृष्णचंद्र राय नदिया के महाराजा उन्होंने उनको सुन लिया। तो वे उन्होंने उनको कहा कि मैं तुमको जमीन भी देता हूं। तुमको मैं पैसा भी देता हूं और क्योंकि तुम्हारी पदावलियों से मैं बड़ा ही अभिभूत हो गया हूं। और यह कृष्ण चंद्र राय जो थे उनका ऐसा था कि वो इतने भी जिनके पास में विद्या होती है विद्या को एप्रिशिएट करते थे। तो ये तो भारत चंद्र बोलकर के एक बड़ा फेमस कवि बंगाल में हुआ है। उसने विद्यासागर बोलकर के बड़ा ही सुंदर कविता ये तो एक ग्रंथ की रचना की है। तो वह भी यह कृष्णचंद्र राय ही उसका भरण पोषण करते थे। पेट्रोन जिसको कि कहा जाता है ही वाज़ ए आर्ट पेट्रोन जिसके पास में विद्या है उस सबका वह सम्मान करते थे उनको पैसा देते थे जिससे कि यह लोग अपना संसार का चिंता छोड़कर के ईश्वर में या तो जो भी विद्या है उसमें कुशल होने में वह समय बिताए तो यह राम प्रसाद को भी इसी तरह से कृष्ण चंद्र महाराज जो थे उनको सुनने के लिए आते थे उन पर खुश होते थे उनको बखशीश देते रहते थे उस समय समय राम प्रसाद को लोग पागल समझते थे। वह पंचमुंडी आसन बनाकर के मां मां बोलकर के पागल की तरह रोते रहते थे। वो खाना पीना नहीं खाते थे। पत्नी बच्चों की संभाल नहीं लेते थे। बोल के ऐसा चल गया था वहां आसपास में कि यह तो पागल है। किंतु पागल के पीछे में जो टैलेंट थी वो टैलेंट समझने की ये महाराज में शक्ति थी कृष्ण चंद्र में। तो अभी होता ऐसा था कि जब भी महाराज कृष्ण चंद्र वो राम प्रसाद के भजन सुनने के लिए पदावली सुनने के लिए आते थे तो यह जो आजू गोसाई है गोसाई ये गोस्वामी का अपभ्रंश है। तो ये आजू गोसाई उनका ओरिजिनल नाम शायद था अयोध्या चंद्र गोसाई गोस्वामी जो भी है वो जो अपभ्रंश हो करके सभी लोग उनको आजू कहते थे। तो यह आजू गोसाई को जैसे ही पता चला कि वह कृष्ण चंद्र राय आए हैं उसकी पदावली सुनने के लिए राम प्रसाद की तो वह भी दौड़ा चला आता था आकर के सामने जो पदावली का गान यह करेगा राम प्रसाद उसके सामने वो कटाक्ष पूर्ण व्यंग विनोद पूर्ण पदावली वो सामने सामने ही बैठकर के रचना करके वो महाराज को सुनाएगा। अभी आजू गोसाई के बारे में ऐसा लोगों का मानना था कि वह सहीसही में पागल है। रामप्रसाद पागल है तो आजू गोसाई है उससे भी बड़ा पागल है। अभी आप सोच लीजिए। तो किंतु देखिए कि महाराजा में वो जो टैलेंट थी ना वो जो एक टैलेंट टैलेंट को रिकॉग्नाइज करने की टैलेंट थी। हम लोगों में अपनी टैलेंट तो होती है किंतु दूसरों में टैलेंट है यह रिकॉग्नाइज करने की टैलेंट शायद हम में नहीं होती। किंतु इनमें वो टैलेंट थी कि वो दूसरों के भीतर में जो टैलेंट है वो वो समझ लेते थे। तो इसी तरह से यह जो इसकी जो टैलेंट थी आजू गोसाई की महाराज समझ गए थे तो वो बड़े खुश होकर के उसकी भी पदावली सुनते थे और इसकी भी सुनते थे। अभी सोच लीजिए किस तरह का वो हास्य परिहासमय माहौल बनेगा। आपको ऐसा लगता है कि यह कटाक्ष कर रहा है किंतु थोड़ा सा डीप में जाएंगे ना तो पता चलेगा इसमें क्या पावर है। किंतु यहां पर राम प्रसाद है। रामप्रसाद बड़ा नाराज हो जाता था कि मैं गा रहा हूं इतना सुंदर मां का भजन और मेरे सामने बैठकर के महाराजा के सामने बैठकर के मेरा ही अपमान कर रहा है। तो फिर यह राम प्रसाद एक छड़ा जिसको कहते हैं काव्य की एक दो पंक्तियां होती है ना इसको कहते हैं छड़ा। तो यह वो एक उन्होंने रचना की कर्मेर घाट तैलेर काट आर पागलर छांट मले जाइना कर्म का घाट यानी कि कर्म का जो फल है तेलर काट जिसमें तेल डाला है वो तेल और पागलर छांट जिसके मन के भीतर में पागलपन का एक कीड़ा है पागलपन की एक छांट है वो मर के भी जाएगा नहीं यहां पर कटाक्ष करके इस आजू गोसाई को राम प्रसाद कहते हैं पागल कि पागल की छांट है वह मर के भी जाएगी नहीं तो आजू गोसाई तो चुपचाप सुनने वाला नहीं है वो क्या कहता है कर्मे डोर स्वभाव चोर मदेर घोर मले घुचेना कर्म की डोर माने कर्म का जो यह है प्रवाह स्वभाव चोर जिसके स्वभाव में चोरी है यानी कि अपवित्रता है वो या तो फिर जिसके स्वभाव में लुच्चाई है वो और मदेर घोर मद यानी कि शराब घोर अर्थात कि नशा यह शराब का नशा मले घुचेना मरने से भी जाएगा नहीं। यहां पे यह मदिर घोर राम प्रसाद को उपदेश करके कहते हैं क्योंकि रामप्रसाद है मद्यपान करते थे। तो यह जैसे ही यह एक छड़ा बनाएंगे तो सामने यह दूसरा बनाएंगे। यह एक पदावली की रचना करेंगे तो सामने दूसरी पदावली की। कभी-कभी हास्य विनोदमय हो जाती। कभी-कभी जो फिलॉसोफिकल पावर था वह किस तरह से था वह अभी हम थोड़ा सा उदाहरण लेके देखेंगे। क्या कहते हैं राम प्रसाद डूब दे रे मन काली बोले हृद रत्ना करे अगाध जले। ये ठाकुर के वो गाना है। ठाकुर इसको गाते थे। कथामृत में है कि डूब ले डूब देव मन काली का नाम लेकर के हृदय हृदय के रत्नाकर में अगाध जल है। देखिए हृदय के भीतर में सागर है। रत्नाकर अर्थात कि सागर जो रत्न को धारण करता है उसको कहते हैं रत्नाकर। यह बहुत सारी किमदंतिया या लेजेंड्स प्रसिद्ध है कि समुंदर में आप डूब देंगे तो यह जो मोती है वगैरह आपको मिलेंगे। तो हृदय रूपी रत्नाकर है उसमें तुम मां काली का नाम लेकर के हृदय रूपी रत्नाकर के अगाध जल में डूब लगाओ। डूब दे रे मोन काली बोले रदी रत्नाकरे अगाध जले रत्नाकर नो शून्य को खोन रत्नाकर कभी भी शून्य नहीं है खाली नहीं है दो चार डूबे धन ना पेले यदि दो-तीन डूब लगाओ और धन ना मिले तो फिर तुम ही दमो सामर्थ्य एक डूबे जाओ कुल कुंडलिनी कुले तुम जितना भी गहरा सांस ले सकते हो जितनी भी साहस जुटा सकते हो उसमें एक ऐसी गहन डुबकी के लगाओ कि कुल कुंडलिनी का कुल है वहां तक तुम चले जाओगे। यह बड़ा सुंदर है। ज्ञान समुद्र माझे रे मौन शक्ति रूपा मुक्ता फले ज्ञान समुद्र के मध्य में शक्ति रूपा मुक्ता यानी कि मोती वगैरह होता है। वो मिलता है वगैरह-वगैरह वो बड़ा सुंदर है। किंतु जब ये वो पदावली की वो रचना करते हैं। वो सुनाते हैं। सामने ही वो आजू गोसाई बैठा है। वह भी चलाता है। क्या कहता है? हास्य कटाक्षमय है किंतु इसका पावर देखिए डूबिने रे मोहन घड़ी घड़ी मैं घड़ी घड़ी यानी कि पल पल तुम डूब मत लगाओ दम अटके जावे ताड़ाती फटाफट ताड़ाती यानी कि जल्दी-जल्दी फटाफट करके तुम्हारा दम अटक जाएगा एक तो कफ नाड़ी डूब दाओ ना बाड़ा बाड़ी एक तो तुम्हारी कफ की नाड़ी है तुमको कफ का यह है बीच-बीच में तुमको कफ हो जाता है तो तुम बाड़ा बाड़ी करके ज्यादा ज्यादा पैदा करके डुबकी मत लगाओ तोार होले पोरे जोरो जाड़ी मोन जेते होवे जमेर बाड़ी तुमको यह कंपन के साथ में धुजारी के साथ में तुमको ज्वर हो जाएगा बुखार हो जाएगा और यम के घर जाना पड़ेगा अति लोभ ताती नष्टो मीछे कष्टो केनो करी यह अति लोभ बड़ा लोभ करतेकरते तुम यह जो हृदय रूपी रत्नाकर में डुबकी लगाते रहते हो ज्वर भी हो जाएगा बुखार भी हो जाएगा यम के घर में चले जाओगे मीछे कष्टो केो करी झूठमुठ का कष्ट क्यों कर रहे हो ओ तूई डूबिसने मोन धर गए भे श्याम की श्यामार चरण तरी ओ तुम डूबना मत मन बस तैरते रहो श्याम की श्यामा का चरण पकड़ करके ओ तू डूबिनेमोन धोरगे भषे धर भषे अर्थात कि तैरते रहना पकड़ करके क्या पकड़ के श्याम की श्यामा की चरण तरी श्याम या तो श्यामा की चरण रूपी नौका है। उसको पकड़ करके तुम तैरते रहो। देखिए कितना सुंदर यह साम सामने कटाक्ष भी है, आनंद भी है और साथ में यह फिलॉसोफिकल डेप्थ की भी कितनी है। यहां पे वैसे तो है राम प्रसाद का खुद का कि यदि मां श्यामा का चरण प्राप्त कर ले। यदि महाकाल खुद जिसके ये है चरण तले उसको महाकाल का क्या डर है? किंतु यही राम प्रसाद फिर वो कर्म के सिद्धांत वाला यह सब गीत जब रचना करते हैं तब यह आजू गोसाई आकर के उनको समझा देते हैं कि यह जो हृदय रत्नाकर में डूब लगाने की जरूरत नहीं। इतना मेहनत करने की जरूरत नहीं। वैसे भी तो तुमको कफ हो जाता है। पानी में गिरोगे बुखार आ जाएगा। बेटर है कि ये श्यामा का जो चरण है उसको पकड़ कर के तुम तैरते रहो। यानी कि ये राम प्रसाद के भी एक स्टेप ऊपर चला जाता है शरणागति में। देखिए और एक है राम प्रसाद का मन रे आर ए मिनती हे मन मेरी यही मिनती है तुम्ही पड़ा पाखी होवो को स्तुति तुम पड़ा पाखी पड़ा पाखी अर्थात पाखी अर्थात कि पंखी और पड़ा अर्थात कि जो तोता जो रटता है ना मां के पास में वो गंगाराम तोता था वो क्या करता रहता था वो वो भगवान का नाम रटता रहता था तो यहां पे उसको कहते हैं पड़ा पाखी जो रटने वाला तोता है वो तो यहां पे क्या कहते हैं तुम रटने वाले तोते होकर के स्तुति करते रहो। ईश्वर की स्तुति रटते रहो। जा पढ़ाई ताई पढ़ो मन पढ़ ले सुन ले दूधी भाती। जो सिखाता हूं वही सीखते रहो। दूध भात भी मिलेंगे सीखते सीखते वगैरह वगैरह। ऐसा करके वो लंबा उसने बनाया है। अभी उसका उत्तर आजू गोसाई क्या देता है? होयो ना मन पड़ा पाखी तुम। अरे मन तुम यह रटने वाला तोता मत हो। ओरे बंदी होले हो ना सुखी। अरे बंदी होकर के तुम सुखी कभी नहीं होगे। तो तुम रटने वाला तोता रहोगे तो तुम पिंजरे में बैठे रहोगे। और पिंजरे में रहने वाला तोता कभी सुखी नहीं होता है। पाखी होले तत्व भूले दीन जावे पिंजरे थाकी। पंखी होगे तो यह तत्व कथा जो है असली फिलॉसोफी है। वो भूल जाओगे और पिंजरे में बंद होकर के रहोगे। तुम ही मुखे बोलवे परेर बुली परम तत्व जानीबे की। दूसरे जो सिखाते हैं वो तुम बोलते रहोगे। तो असली परम तत्व है तुम कब सीखोगे भक्ति गाछ मुक्ति फले से फल उड़े खाओगे देखी भक्ति रूपी पेड़ है उसके ऊपर में यह मुक्ति रूपी फल है उड़तेउड़ते उस पर बैठो और उसके खाओ खेले मायर फांदे पड़वे ना आर शमन ब्याघे दिगवे फाकी जो यह मुक्ति फल पेड़ के ऊपर में मुक्त पंखी बनकर के घूमोगे तो यह मुक्ति फल खाओगे और यह खाओगे तो माया का फंदा है उसमें उसमें पड़ोगे नहीं खेले माया फंदे पड़वे ना आर खाओगे तो माया के फंदे में पड़ोगे नहीं शमन बाघे दीबे फांकी यह शमन अर्थात कि मृत्यु रूपी वाघ है शेर है उसको तुम फांकी दोगे उसके शिकंजे में से तुम बच जाओगे तो यह देखिए कि यह दोनों भाव है भाव और प्रतिभाव कैसा सामने सामने चलता है ऐसे और भी काफी है बहुत सारा इसमें नहीं जाकर के जो आखिरी जो भजन है जो कि माने पूरा इस पूरे क्लास का जो हाईलाइट है वह है क्या है राम प्रसाद कहता है ए संसार धोकार टाटी यह संसार है वह धोखा का यह जगत है धोखा अर्थात कि यहां पे आपको सब समय बिट्रेयल ही मिलता रहेगा पति पत्नी भाई बहन पिता माता यह संतान पुत्र जो भी है यह सब जब अंतिम प्रयाण की बारी आएगी अंतिम प्रयाण की घड़ी आएगी तो यह संबंध सब यहीं पर पड़े रहेंगे। ईश्वर के साथ में जो हमारा नाता है वही हमको यह भवसागर पार कराएगा। इसलिए यह कहता है संसार धोकार टाटी यह संसार है धोखे का जगत ओ भाई आनंद बाजारे लूटी हम आनंद बाजार में चले जाते हैं वहां पर मजा लूटते हैं तो ऐसा करके पूरा गीत है इसका क्या आजू गोसाई उत्तर देता है यह संसार धोखा टाटी जो कहा है उसका उत्तर क्या है ये संसार रशेर कुटी यह संसार है रस की कुटिया हेथा खाई दाई आई आर मजा लूटी यहां पर खाऊंगा पऊंगा और मजा लूटूंगा। देखिए यही जो बात कि यदि आप नेति नेति करके संसार त्याग तो करते हैं किंतु जब आखिर में निर्विकल्प समाधि मिल जाएगी तब पता चलेगा कि जिस ब्राह्मण को मैं आकाश में खोज रहा था, हृदय में खोज रहा था, इंद्रियों के विषय के परे जाकर के खोज रहा था, वही ब्रह्म पूरे संसार में फैला हुआ है। इन इवन कि इंद्रियों के विषय भी यह ब्रह्म से ही भरपूर है। बस मैं उनको गलत नजरों से देख रहा था। अपनी नजरों को सही कर दो तो यह संसार हो जाएगा रस की कुटिया। अच्छा यह बात जैसे ही मैंने पढ़ी तो जिन लोगों ने कथामृत पढ़ा है उसको वो ठाकुर की वही फेमस बात याद आ जाएगी जो ठाकुर कहते हैं कि संसार में ईश्वर लाभ होगा क्यों नहीं जनक का हुआ था यह संसार फिर मैं ठाकुर को कोट कर रहा हूं। क्या कहते हैं ठाकुर ए संसार धोकार टाटी प्रसाद बोले छिलो प्रसाद ने कहा था यह संसार है धोखा की टाटी धोकार टाटी अर्थात कि धोखे का जगत तार पादो पद भक्ति कर ले किंतु यदि ईश्वर के पाद पद्म में भक्ति करोगे तो क्या होगा ए संसार मजार कुटी यही संसार है मजा की कुटिया आमी खाईदा यार मजा लुटी मैं खाऊंगा पऊंगा और मजा लूटूंगा जनक राजा महातेजा तार की शेर छिलो त्रुटी जनक राजा थे महातेजा जा उसको किस बात की थी त्रुटि से एदिक ओदिक दुईदिक रेखे खेलो दुधेर बाटी उन्होंने इस ओर और उस ओर दोनों ओर रखकर के खाई थी दूध की बाटी तो यह जो मैं अभी तक पढ़ रहा था तो सोच रहा था ठाकुर ने खुद की इसकी रचना की है किंतु अभी पता चला कि यह आजू गोसाई की रचना है और सोच लीजिए जिनको ठाकुर कोट करते हैं उनको हम पागल कैसे कहेंगे तो राजा कृष्ण चंद्र राय उन्होंने भी ये इसकी टैलेंट को पहचाना था। तो यह एक पूरा कि पदावली के माध्यम से किस तरह से ईश्वरीय खास करके शक्ति तत्व बंगाल में प्रसिद्ध हुआ है। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु वि इज वेरी स्ट्रेंज। मैं यह बोलने वाला था कि ठाकुर

प्रश्न: यह आश्चर्य की बात है कि ठाकुर ने आजु गोसाईं का नाम नहीं लिया

सबको वैसे एट्रिब्यूट करते हैं। मतलब यहां तक कि वो देखिए कि राजा महाराज वो ठाकुर की जो उपदेशावली है ना छोटी किताब है श्री रामकृष्ण देव उपदेश बोल के उसकी रचना कर रहे थे। तो एक बार वो ऐसे उपदेशों का संग्रह करके रात को सोए हुए थे। ठाकुर ने रात को सपने में आकर के कहा कि अरे वह जो बात तुमने जो मेरे नाम से लिखी है उसको मैंने नहीं कहा मैंने रिपीट किया है किंतु उसने कहा है तुम प्रॉपर एट्रिब्यूट करो तो यहां तक जो ठाकुर का था उन्होंने ठाकुर ने कभी आजू गोसाई का नाम क्यों नहीं दिया आई डू नॉट नो राजू गोसाई की जो रचना मैंने उसमें पढ़ी ना इसके साथ में ठाकुर का एग्जैक्ट मैच नहीं होता किंतु भाव मैच हो जाता है भाव एग्जैक्ट जनक राजा की बात है दूध की बाटी की बात है। किंतु जिस सेंटेंस में ठाकुर ने फॉर्मुलेट किया था वह नहीं है। किंतु यहां पे देखिए ये स्वामी वामदेवानंद जी ने किस किताब लिखी है। वह पहले ही कह देते हैं कि इट्स अ वेरी अनफॉर्चूनेट कि रामप्रसाद के एक भी गीत ना हमको लिखित नहीं मिले हैं। रामप्रसाद का जब देहांत हुआ तो उनके परिवार जनों से बहुत सारे कागजात मिले तो सही पेपर किंतु एक भी लिखा हुआ गीत नहीं मिला। गीत जितने भी है ना वो सब सुनसुन के इकट्ठा किए गए हैं। तो हजारों गीत हो गए। अभी शायद 250 के आसपास कलेक्ट हुए हैं। तो इस किताब में और कथामृत में देखेंगे कि गीतों के शब्दों के बीच में डिफरेंस है। तो अभी राम प्रसाद के ही लिखित गीत नहीं अवेलेबल है। तो अभी आजू गोसाई के कहां से मिलने वाले हैं। सो ये सब सालों से 18th सेंचुरी की बात है ना 200 सालों से सब वो म वर्ड वर्ड ऑफ माउथ ये चले आ रहे हैं। अभी उसका ओरिजिन क्या है? सत्य असत्य क्या है? कौन बता पाएगा? माने इधरउधर शब्द फेयर हुए होंगे। गीतों का भाव कभी ठाकुर फेयर नहीं करते। ठाकुर बीच-बीच में कथामृत में है कि आजकल के जो गीत है ना वो बड़े नीरस लगते हैं। वो पुराने जो गीत थे ना राम प्रसाद के उन सब में कैसा भाव था वो ऐसा ठाकुर खुद बोलते हैं। माने ठाकुर जिसको कोट करेंगे अभी आप समझ लीजिए वो किस लेवल पे होगा। मैं भी जब पढ़ रहा था ना, मेरे मन में भी यही था कि अननेसेसरी यह बढ़ा रहे हैं पेज किताब के पन्ने। किंतु जब आखिरी जब बात आई तब इमीडिएटली स्ट्राइक हुआ कि अरे बाप रे यह तो ठाकुर ने इसको कोट किया है। शब्द अलग है किंतु भाव तो वही है। माने एक्चुअली राम प्रसाद भी इति करता है। किंतु जो संस्कार जो है ना भीतर वाले जो अपने कर्म वाले कि बचपन से ही तो ऐसा सुनते आए हैं कि कर्म का जो फल है वह मिलेगा ही। बुरा कर्म करेंगे तो बुरा तपस्या करेंगे तो तपस्या का फल मिलेगा। तो वह संस्कार बीच-बीच में बाहर आ जाता है। तो आजू गोसाई आकर करके वह रिमाइंड करवा देते हैं कि तुम्हारा असली भाव नहीं है। तुम्हारा असली भाव दूसरा है। इसमें तो नहीं है। इस किताब में नहीं है। मुझे देखना पड़ेगा।

प्रश्न: क्या आजु गोसाईं की और भी कहानियाँ उपलब्ध हैं?

देखिए ये आध्यात्मिक जो जगत है ना उसमें ऐसे ऐसे सब रत्न पड़े हैं। ये रत्नाकर अघाद जल है। ये जो माने आध्यात्म रूपी जो रत्नाकर है उसकी गहराई में जितना जाएंगे ऐसे ऐसे पागल लोग मिल जाएंगे। माने ऐसे ऐसे सिद्ध लोग मिल जाएंगे कि जिनके बारे में बहुत कम जानते हैं हम लोग। किंतु उनका जो कंट्रीब्यूशन है माने ठाकुर खुद तक जब बात जाएगी तो फिर समझ लीजिए क्या कंट्रीब्यूशन होगा उनका। दिस इज अ ब्यूटी ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर ना कि आपको यह सरफेस के ऊपर में से डीप में जाना है।

प्रश्न: यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि स्वामीजी पान खाते थे और जगह-जगह थूकते थे?

यह जो किसी ने आकर के राजा महाराज को कंप्लेन किया कि आजकल के लड़के हैं ना सब धूम्रपान करते हैं, हुका पीते हैं, बीड़ी पीते हैं। राजा महाराज उस समय प्रेसिडेंट है तो सोचा कि राजा महाराज के पास में जाकर कंप्लेन करते हैं। बाबूराम महाराज ही शायद बाबूराम महाराज का था ऐसा भाव थोड़ा तपस्या वाला वैष्णव भाव। तो राजा महाराज शांति से कहते हैं बाबूराम भाई मैंने तो खुद ने 5 साल की उम्र में से धूम्रपान चालू किया है। मैं इन लड़कों को किस मुंह से कहूं कि तुम मत करो। बाबूराम महाराज का एक था बड़े तपस्वी वैष्णव भावापन्न तो ये लोग मछली खाते हैं ना सब वरा नगर मठ की घटना ये सब लोग मछली खाते हैं। तो उनके मन में यह है कि मैं मछली नहीं खाता। मैं तपस्वी हूं। ऐसा ऐसा करके एक दिन रात को सोए थे। ठाकुर ने आकर के सपने में धक्का मार के उठाया उनको कि अरे साले मेरे बच्चे मछली खाते हैं। तुमको ईर्ष्या किस बात की होती है? ऐसा करके ऐसी धमक दी कि बाबूराम महाराज उसी समय नींद से खड़े होकर के जहां पे यह मछली काटते थे उसका वो जो थोड़ा सा पड़ा होगा उसको लेकर के अपने मुंह में डाल के खा लिया कि यह घमंड टूट जाए कि मैं मछली नहीं खाता हूं। यानी कि क्या है कि वी हैव टू गो बियों्ड यह जो सरफेस लेवल पर है कि अल्टीमेटली तो आपको काम कांचन त्याग ही तो आध्यात्मिक जगत है और उससे भी परे जाए यदि ये राम प्रसाद की बात सुन ले तो संपूर्ण शरणागति संपूर्ण निष्ठा यही तो आध्यात्मिक जगत है। फिर आप धूम बीड़ी पिए ना कि फिर थोड़ा बहुत गाली गलौज कर दे, झगड़ा-वगड़ा कर दे। यह सब चीजों से कोई आध्यात्मिक जगत में आपको कोई बहुत बड़ी क्षति नहीं होने वाली है। ना करें तो अच्छा है। कर ले तो कोई ऐसा नहीं है कि कोई भी 100% परफेक्ट है। अवतार के जीवन में भी दोष निकालने वाले आपको हजार मिल जाएंगे। तो ऐसा दोष निकाल करके मनुष्य का वो जो ये करना कि यह ऐसा है यह ऐसा है बोल के तुच्छ पूर्ण वर्तन व्हिच इज कंप्लीटली रोंग। देखिए खास करके आज के जो मिडिल क्लास एजुकेटेड यूथ है उनको क्या है कि बचपन से एक तरह के कंफर्ट में रहे हैं। अभी उनको आप सडनली कंफर्ट छोड़कर के तपस्या करने को कहेंगे तो वो शरीर को लेकर के ही बेचारे का पूरा टाइम जाएगा। मेरे साथ में ऐसा ही हुआ था। मैं

प्रश्न: शारीरिक तपस्या करते-करते ही हमारी सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है, और हमारे पास ध्यान के लिए ज्यादा ऊर्जा नहीं बचती।

बेलूर मठ में गया था। अभी देखिए कि गुजरात है बड़ा ड्राई क्लाइमेट। खास करके मैं जहां पे रहता था और यह बेलूर मठ है गंगा के किनारे ह्यूमिड क्लाइमेट। तो वह ड्राई क्लाइमेट टू ह्यूमिड क्लाइमेट जो ट्रांजिशन था मेरे लिए इतना कष्टकर था। इतना कष्टकर था। ना ही नींद आती थी ना ही वह डाइजेशन का मुझे प्रॉब्लम हो गया था। चालू ऐसा बहुत मुझे कष्ट हुआ। शारीरिक कष्ट ठाकुर की कृपा से वो सब कर लिया। यंग था तो चल गया। किंतु पूरा जीवन वहां पे नहीं रह सकते। वो दैट इज वी हैव टू रिमेंबर। मैं बाद में मेरा जब पोस्टिंग हुआ था कंप्लीट वर्क्स के लिए उस समय बिकॉज़ कि मैं ऑलरेडी वहां पे रहा हूं। ऑलरेडी फिर वो जो धीरे-धीरे करके हम लोग एंटीडोट खोज निकालते हैं ना इसका यह एंटीडोट है। इसका यह एंटीडोट है। तो वह चार साल मेरे अच्छे से बीते थे। किंतु फर्स्ट जो टीसी के जो दो साल थे बड़े कष्ट में गए थे। हालांकि इनको जाना पड़ा था राम प्रसाद को। एक दिन हुआ ऐसा कि वो अपने घर में थे स्नान करने को जा रहे थे। तो एक बड़ी सुंदर युवती लड़की आई। उसने कहा कि मैं आपके भजन सुनना चाहती हूं। सुना आपका बड़ा

रामप्रसाद को अन्नपूर्णा का दर्शन

नाम सुना है। तो राम प्रसाद कहता है अच्छा मां तुम एक काम करो थोड़ा सा बैठो यहां पे मैं स्नान करके आता हूं। तो वो युवती ने कहा ठीक है। फिर वो जब स्नान करके आए तो वो लड़की गायब हो गई है। वहां पर चंडी मंडप ने ऐसा कुछ था। वहां पर दीवार पर लिखा हुआ था कि मैं अन्नपूर्णा हूं ना कि ऐसा ही कोई देवी का नाम लिखा है और तुम अभी मैं तुम्हारा भजन सुनने के लिए आई। किंतु तुम्हारे पास में समय नहीं है तो अभी मैं अपेक्षा नहीं कर पाऊंगी। मुझे जाना होगा। किंतु तुम काशी आकर के मुझे तुम अपने भजन सुनाना। काशी ना कि गया जो भी है एक तीर्थ स्थान का उसने नाम लिया। तो यह तो बेचारा बड़ा ही यह हो गया कि अरे मुझे यह जो इतना सुंदर मौका मेरे हाथ से चला गया। फिर ऐसा करके उन्होंने सोचा अभी मां ने बुलाया है तो मुझे जाना ही पड़ेगा। तो उन्होंने यात्रा करनी शुरुआत की। काशी तक जाना नहीं हुआ। वो बीच में ही कहीं पे वो मां ने दर्शन देकर के कहा कि यहीं पर तुम मुझे अपना भजन सुना दो। तो फिर उन्होंने सुनाया। फिर वहां से वो वापस आते हैं। राम राम प्रसाद का ये बड़ा सुंदर गान है। उसमें एग्जैक्टली यह भाव है। यह जो राम प्रसाद को खुद को यह सब पसंद नहीं था। इसलिए वो आजू गोसाई को बड़ा गाली देता रहता था कि उनके मन में था कि सभी एक जैसे

प्रश्न: विभिन्न देवता कहाँ एकत्रित होकर एक हो जाते हैं?

ही है। देखिए वो वो क्या कहते हैं। मन करो ना द्वेषाद्वेषी मन तुम द्वेषाद्वेषी मत करो। झगड़ा झाटी मत करो। यदि हबीरे वैकुंठवासी यदि वैुंठवासी होना है तो द्वेषाद्वेषी मत करो। आमी वेदागम पुराण कोरिलाम कतो खोज तलाशी मैं वेद आगम और पुराण में कितना किया खोज तलाशी एज काली कृष्ण शिव राम शकुल अमार एलोकेशी ये जो काली कृष्ण शिव राम जो है सब है मेरी एलोकेशी एलोकेशी यानी लंबे बिखरे बाल वाली महिला यानी कि मां काली काली कृष्ण शिव राम शकुल अमार एलोकेशी शिव रूपे धरे शृंगा शिव शिव के रूप में श्रृंगा धरती धरते हैं। कृष्ण रूपे बाजाओ बासी कृष्ण के रूप में बजाते हैं बांसी। ओमा रामचंद्र राम रूपे धरे धनु धरोधनु काली रूपे करे अ राम के रूप में धनु को धारण करते हैं धनुष्य को धारण करते हैं और काली रूप में अ को धारण करते हैं। दिगंबरी दिगंबरो पितार चरण विलाशी लंबा है। किंतु देखिए कि यह भाव जो है यह जो सिद्ध साधक होते हैं उनको यह बड़ा स्पष्ट रूप से पता है कि जो है काली कृष्ण शिव राम शोलामर एलोकेशी वो एक ही ईश्वर है उनके विभिन्न स्वरूप है देखिए ईश्वर देखिए ईश्वर तो रहते हैं भक्त के हृदय में ही हमेशा यदि आपकी सही में श्रद्धा है तो आप गलती करेंगे तो हाथ दौड़ करके आपको ठिकाने लगा देंगे माने ठीक रास्ते पर ले जाएंगे यदि आपको श्रद्धा है तो उनके ऊपर में जैसे आपने ठाकुर का उदाहरण दिया ना तो ठाकुर अब जैसे हम लोग क्या कहते हैं कि पहले ही दिन जिस दिन ठाकुर की महासमाधि हुई सभी लोग बड़े ही ये हो गए थे दुखी हो गए थे निराश हो गए थे ठाकुर हमको छोड़ के चले गए ऐसा कहते थे किंतु फिर उसी दिन रात को मां को ठाकुर ने आकर के मां जब अपनी चूड़ियां खोल रही थी ठाकुर ने आकर के उनका हाथ पकड़ करके कहा कि मैं गया कहां कहां हूं इस कमरे से उस कमरे में अर्थात कि स्थूल देह से भक्त के हृदय में तुम विधवा के यह जो वेश है वो क्यों धारण करती हो तो मां को भी सांत्वना मिली फिर वो स्वामी जी का हाईली रशलिस्टिक है सब कुछ है किंतु वहां पर टहल रहे थे वो काशीपुर गार्डन में वो सामने से एक प्रकाशित मूर्ति एक आई और वहां पे वो जो जुई फूल है वहां झाड़ियों में मिल गई तो उसी समय स्वामी जी को इतना सुंदर एक एक्सपीरियंस हुआ समझ में आया कि ठाकुर अभी अभी भी जीवित है। तो ठाकुर स्थूल देह में से भक्तों के हृदय में गए हैं। बिल्कुल। और गुरु भाइयों की तो बात ही अलग है। वो जो हमने डिस्कस किया था वो स्वामी जी का जीवन पढ़ रहे थे कि स्वामी जी ने कहा वो जो ठाकुर के ये जो अस्थि थे कि उन्होंने कहा कि हम ही लोग तो है ठाकुर की जीवन समाधि। तो आओ हम अस्थि का छोटा-छोटा कण जो है हम उसको खा लेते हैं।

प्रश्न: ठाकुर हमारा मार्गदर्शन कैसे करते हैं?

तो ये जो ठाकुर की अस्थियां वो गुरु भाइयों के देह में थी। यानी कि यह सिर्फ सूक्ष्म देह में नहीं वह स्थूल देह में भी जैसे कि वो डायरेक्ट डिसाइपल गुरु भाइयों के हृदय में थे। यह जो आत्मीयता है यह जो आत्मीयता है वही तो यह भाव साधना का सर्वोच्च परिणति है। यदि ईश्वर के साथ में मैं आत्मीयता का संबंध बनाता हूं। ईश्वर के ऊपर मैं संपूर्ण निर्भर होकर के रहता हूं। तो फिर यह तपस्या फपस्या छोटा भाव हो जाता है। वो तपस्या करना वह सब किसके लिए है? ईश्वर पे संपूर्ण जिसका यह शरणागति संपूर्ण आशरा नहीं है वो तपस्या करेगा। शरणागति आ गई आत्मीयता बन गई तो तपस्या तो अपने से हो जाएगी। फिर आपको मेहनत करके इंद्रियों के विषयों को छोड़ना नहीं है। वह अपने से निरस हो जाएंगे। यह स्वामी जी जब अमेरिका थे तो बीच-बीच में सोचते थे कि मुझे जो बोलना है वह तो सब तो बोल दिया मैंने किंतु यह तो सतत डिमांड है लेक्चर की मुझे सतत नया-नया कुछ बोलना पड़ेगा तो मैं कहां से कुछ नया लाऊंगा तो जैसे वो ठाकुर ने कहा है ना कि

कहानी: स्वामीजी का दिव्य ज्ञान

जीहवा के ऊपर में सरस्वती का वास होता है वैसे ही स्वामी जी कहते कहां से बोलने से पहले लेक्चर स्टार्ट होने से पहले कहां से मेरे मन में यह सब नए-नए विचार नए-नए भाव आना शुरू हो जाते है एक दिन की घटना है कि एक स्वामी जी का जो जो उनके साथ में कलीग्स थे उनके फ्रेंड वगैरह लेक्चर का आयोजन किया है। स्वामी जी वो जो बैक स्टेज में एक कमरे में बैठे हुए थे और वहां से स्वामी जी किसी के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। तो स्वामी जी के गले की भी आवाज आ रही है। जिसके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं उसके भी गले की आवाज आ रही है। उसके भी आवाज आ रही है। तो यह जो स्वामी जी का फ्रेंड था वह कमरे में जाकर के देखा स्वामी जी अकेले हैं। तो वह पूछता है कि स्वामी जी आप जिसके साथ में बात कर रहे थे तो वह कहां है? तो स्वामी जी कहते कहां मैं तो किसी के साथ बात नहीं कर रहा। माने कि स्वामी जी बात कर रहे थे जिस दिव्य शक्ति के साथ में बात कर रहे थे वो दिव्य शक्ति उनको नए-नए विचार दे रही थी। किंतु वो दिव्य शक्ति दूसरों तो नहीं देख पाएंगे और कोई तो देखिए कि यदि आपको ठाकुर का काम कर रहे हैं। ठाकुर पर भरोसा है तो इस तरह से नए विचार भी स्वामी जी को मिल जाते थे। सो अपना रास्ता खोल देते हैं ठाकुर। नहीं बहुत बाय द वे इस बात से मैं पिछले पिछले पुराने वीडियोस देख रहा था पुराने जितने वीडियो है वैसे मैंने हाइड करके रखे हैं वो अब देख नहीं पाएंगे

हमारे क्लास को ३ साल समाप्त हुए

किंतु जो सबसे पहला वीडियो है 30 में 30 में 2022 को रिकॉर्ड किया गया है ऑलमोस्ट हमारे क्लास को 3 साल हुए कंप्लीट तो मैं वो वीडियो देख रहा अभी मैं शेयर भी किया बीच में दो-ती दिन पहले वो अपने WhatsApp में तो उसमें लिखा है मैंने कि 3 साल हुए अपने क्लास को यह सबसे पहला रिकॉर्डेड वीडियो है। उसमें मैं कहता हूं आखिर में वो बंद करने से म कंप्लीट करने से पहले कि गॉड विलिंग कि कल भी क्लास करेंगे। वो मुझे डाउट था कि वो कल क्लास होगा कि नहीं। नहीं किंतु देखिए सुनने वाले तो मिलने चाहिए। वो भी एक बड़ी बात है। मैं सिर्फ बोलूंगा वो तो चलेगा नहीं। तो आप लोगों का जो साथ है इतना लंबा सो दिस इज रियली ग्रेट कि देखिए 3 साल में ऐसा कभी नहीं हुआ। मैं मुझे शुरू शुरू में थोड़ा डर लगता था इस बात का किंतु कभी नहीं हुआ कि मैं ये Google मीट ऑन करूंगा और सामने कोई बैठेगा नहीं। मैं अकेला रहूंगा। ऐसा आज तक नहीं हुआ। मैंने एटलीस्ट एक तो एक शुरू में एक तो रहता है। लिटरली नहीं हुआ। ठाकुर की बहुत बड़ी कृपा है। वरना शुरू शुरू के क्लासेस में मैं हमेशा डरता रहता। अभी मैं ऑन करूंगा। सामने कोई नहीं होगा। मैं ही अकेला बैठा रहूंगा। गीता में भगवान कहते हैं ना जहां पे लोग इकट्ठा होकर मेरा नाम लेते हैं जानना कि उनके बीच में मैं उपस्थित हूं। यह जो किताब है ना उद्बोधन से पब्लिश हुई है। साधक राम प्रसाद स्वामी वामदेवंद यह किताब आप पढ़िएगा जभी मिलते हैं। म बड़ा छोटी सी किताब है किंतु बहुत सॉलिड एक्शन पैक किताब है। इसके बाद में और भी एक

किताबों के बारे में

किताब है। इसकी हम चर्चा करेंगे। म यह भी जो किताब है मैं सॉलिड छोटी है किंतु सॉलिड एक्शन पैक है। देखिए शरद महाराज ने ठाकुर की जीवनी लिखी। राइट? किंतु शरद महाराज की भक्ति सबसे ज्यादा किसके ऊपर में थी? ठाकुर के ऊपर में थी कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु शरद महाराज तो थे मां के ध्वारी, मां के सेवक, मां के संतान, मां के ऊपर में जो भक्ति उनकी थी, मां की जो उन्होंने सेवा की है, माने उसका कोई ये नहीं है। दूसरा कोई इसका कंपैरिजन नहीं है। तो हमको प्रश्न होगा कि शरद महाराज ने मां के ऊपर में क्यों कोई किताब नहीं लिखी? एक्चुअली उन्होंने लिखी है। लिखी है, छोटी सी है। मां का नाम लेकर के नहीं लिखी। लिखा है भारत में शक्ति साधना का इतिहास। वो अभी जैसे देखिए यह भारत में शक्ति साधना है। उसी की परिणति तो मां की भक्ति है। मां की पूजा है। तो शरद महाराज का शक्ति साधना के ऊपर में क्या विचार है वो सब उस किताब में है सॉलिड जो फिलॉसोफिकल पावर है उसमें जबरदस्त और उसमें से ही बहुत सारा गंभीरानंद जी ने अपनी मां की किताब की रचना करने के लिए लिया है। तो वह शरद महाराज की किताब में से ही बीच-बीच में हम थोड़ा सा देखेंगे। मैं जब बेलूर मठ में ज्वाइन करने के लिए गया था ना तो सुहित आनंद जी उस समय हमारे इंचार्ज थे तो वह हमको बताते थे देखो अपने संघ में जो कुछ भी सीखने के लिए है ना उसका सभी का एक ट्रेलर आपको हम यहां पे बेलूर मठ में बता देंगे उस माने संगीत भी सिखाएंगे संस्कृत भी सिखाएंगे व्याकरण भी सिखाएंगे वेदांत भी सिखाएंगे रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर सब सिखाएंगे फिर आपको ठीक करना है कि आपको भविष्य में कौन से क्षेत्र में आगे बढ़ना है तो उस समय मेरे पास में यह ऑप्शन था कि संस्कृत सीख के शास्त्र में जाऊं ना कि बंगाली सीख के रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर में जाऊं। उस समय मैंने सोचा कि शास्त्र वगैरह के ऊपर में अच्छा है। ऐसा कोई बुरा कुछ नहीं है। संस्कृत सीखना चाहिए। किंतु उस समय ऑलरेडी मेरा संस्कृत अच्छा था क्योंकि मैंने स्कूल में संस्कृत लिया था और मैं उस समय अभी तो नहीं किंतु जब मैं स्कूल में संस्कृत सीखता था। मैं छंद वगैरह की रचना भी कर पाता था। वो मात्रा वगैरह सब कुछ सीख लिया था। तो मैंने सोचा कि यदि अभी नया बिल्कुल सीखना है कुछ तो बंगाली लैंग्वेज पकड़ते हैं। तो उस समय मैंने बंगाली सीखना शुरू किया था। किसको पता कि इसका यह जो स्पिरिचुअल बेनिफिट है इतना ज्यादा मुझे भविष्य में मिलेगा। नहीं देखिए अभी यह मेरे लिए भी एक स्वार्थ का बात हो गया है। जब तक मैं पब्लिकेशन में था तब क्या था? किताबों के साथ में रहता ही था मेरा रिलेशन। अभी पब्लिकेशन नहीं है मेरे पास में। तो दिस इज वन मीडियम। यह क्लास करके मुझे नई-नई किताबें पढ़ने का अभी आजू गोस्वामी के बारे में कौन पढ़ता यह साधक राम प्रसाद को कौन पढ़ता कोई प्रश्न ही नहीं है कि मेरे पास में वो किताब मेरे लिस्ट में भी कभी नहीं थी। किंतु अभी जब प्रसंग चल रहा है मैं राजकोट में यदि होता ना आज तो मैं इस किताब को कभी नहीं पढ़ता। मैं इतना रिसर्च भी शायद नहीं करता। वो ऊपर ऊपर से ही चला देता जो सीखा है ऑलरेडी। किंतु अभी मेरे पास में समय है तो फिर दिस इज एडेड बेनिफिट कि कि मुझे नया-नया पढ़ने को भी सीखने को भी मिल रहा है। यहां पे देखिए यह तो बात सही है कि अल्टीमेट रियलिटी इज वन। अपना यह जो घमंड है कि एक छोटी सी पृथ्वी के एक छोटे से कोने में चींटी जैसे हम बैठे हुए हैं और हम सोचते हैं जितने भी ग्रुप है उन सबकी एक अलग-अलग अल्टीमेट रियलिटी होगी। किंतु

प्रश्न: सभी इष्टों के मिलन बिंदु के बारे में - अद्वैत अनुभव में सभी इष्ट विलीन हो जाते हैं, है ना?

पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ द कॉस्मोस आज की जो मॉडर्न कॉस्मोलॉजी है देखिए कि कॉस्मोस इज सो वास्ट। इसमें से यह मिल्की वे गैलेक्सी जो है अपनी वो एक छोटे से कीड़े के समान है। वो मिल्की वे गैलेक्सी में एक छोटा सा सोलर सिस्टम उसमें से एक छोटा सा अर्थ उसमें एक छोटे कीड़े जैसे हम कीड़ों के भी कीड़े। तो फिर हमारे बीच में ट्राइब्स है। हमारे बीच में डिवीजन है। सभी डिवीजन यह कहेगा कि मेरी जो रियलिटी है व्हिच इज अल्टीमेट। ये तो एकदम माने इग्नोरेंस एज वेल एज एोगेंस ये दोनों का कॉम्बिनेशन करके यह बात होती है। अल्टीमेट रियलिटी इज वन। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु साथ-साथ में हमको यह भी बात रखनी है याद जैसे मास्टर महाशय को ठाकुर ने कहा मास्टर महाशय कहते हैं कि जो साकार है वह निराकार कैसे हो सकती है? दूध जो सफेद होता है वह काला कैसे हो सकता है? तो ठाकुर ने फड़ा करके उत्तर दे दिया। वह साकार भी है, निराकार भी है और भी कितना कुछ है। हम जो अपनी बुद्धि है उससे उनको कभी समझने नहीं वाले हैं। तो वन थिंग के फर्स्ट पॉइंट इज कि अल्टीमेट रियलिटी इज वन बट सेकंड पॉइंट जो है कि दैट अल्टीमेट रियलिटी इज अद्वैत। तो फिर तो वही बात होगी कि हम अपनी मन और बुद्धि से उनको एक लिमिट लिमिटेड फिलॉसोफी में बांट रहे हैं। सो ऐसा नहीं कह के कि अल्टीमेट रियलिटी इज अद्वैत। हम कहेंगे कि अल्टीमेट रियलिटी इज वन। किंतु वह क्या है? जब तक अनुभव नहीं होगा तब तक हम नहीं समझ पाएंगे। सो सब कुछ झूठा हो गया है। ब्रह्म ज्ञान झूठा नहीं हुआ। सो इवन टू कॉल अल्टीमेट रियलिटी इज अद्वैत इट इज टू लिमिटेट अल्टीमेट रियलिटी। नहीं नहीं सुनिए सुनिए सुनिए ठाकुर क्या कहते हैं वो समझिए। ब्रह्मा सत्य जगत मिथ्या या तो फिर जितना भी फॉर्मुलेशन है अहम ब्रह्मास्म वगैरह वो सब कुछ शब्द और मन के जगत में यह सब फॉर्मुलेशन हुआ है और ब्रह्मा इज बाय इट्स वेरी नेचर बिय्ड माइंड एंड वर्ड्स तो माइंड और वर्ड मन और शब्द इसके द्वारा जो महावाक्य स्वयं जो है कि अहम ब्रह्मास्मि वो भी तो ब्रह्म को लिमिट करने के बराबर है। राइट? अद्वैत वेदांत क्या है? मन और शब्द मन और वाणी और वचन और उसके द्वारा रचित किया गया है। दैट इटसेल्फ इज लिमिटिंग द ब्रह्मन। जब वो ब्रह्म एक साक्षात्कार होगा, एक्सपीरियंस होगा, इट विल सो मच मोर ग्रेटर देन व्हाट वी आर रीडिंग इन स्क्रिप्चर्स। सो इस दृष्टि से कि अद्वैत वेदांत की फिलॉसोफी है। वह बिकॉज़ कि मन और वाणी के द्वारा रचित की गई है। ब्रह्मन का सही स्वरूप कभी भी नहीं वह ग्रेस कर पाएगी। ठाकुर एग्जैक्ट उदाहरण देते हैं ना कि वह जो नमक की पुतली नमक की गुड़िया समुंदर में डालोगे तो तो गल जाएगी फिर वो वहां कहां से वापस आएगी बताने के लिए देखिए जैसे अभी ठाकुर है अभी ठाकुर वापस आए हैं ओके मां ने कहा कि तू ही भाव मुखे था भाव मुख में रहकर के वापस आए किंतु ठाकुर को स्वयं देखिए कथामृत में ठाकुर कहते हैं कि मैं जब ब्राह्मण के बारे में बोलने का प्रयास करता हूं तो कोई जैसे कि मेरा मुंह बंद करके करके रखता है क्यों जेनो हमार मुख चेपे धरचे कोई जैसे कि जोर करके मेरे मुंह को बंद करके रखता है। यह स्वयं ठाकुर ने कहा है। यानी कि वो वहां से वापस आए हैं। एलोकेसी का गुणगान गा रहे हैं। सब कुछ कर रहे हैं। तो अल्टीमेट रियलिटी के बारे में ठाकुर खुद नहीं बोल पा रहे हैं। चाह के भी नहीं बोल पा रहे हैं। देखिए सिंपल चीज है कि अभी देखिए छोटा बच्चा है तो वो उसको बोलना आता नहीं है लिखना आता नहीं है वो मेडिकल साइंस पढ़ने को जाएगा वो कैसे सीख पाएगा कंप्लीटली बियों्ड हिज कैपेसिटी राइट तो ये जो विदिन आवर माइंड और वर्ड्स वाणी और वचन और मन इसकी सीमाओं के जो बाहर है उसको आप वाणी वचन मन से कैसे आप प्रकाशित कर पाएंगे यह तो वह जो है ना वह ट्यूबलाइट होती है ना ट्यूबलाइट लेकर के वह जो टॉर्च होती है ना टॉर्च टॉर्च से अब सूरज को प्रकाशित करने वाली बात हो गई। यह देखिए आध्यात्मिक जगत जो है आध्यात्मिक जगत में एक बात याद रखनी है जैसे ठाकुर खुद कहते हैं तारेबाड़ा तारेबाड़ा माने उससे भी ऊपर है उससे भी ऊपर है यानी कि सिद्धियों का शिखर है एक के बाद एक शिखर आप सर करते जाइए इसका कभी अंत नहीं आने

प्रश्न: सिद्ध महापुरुषों को देखने से ही लगता है की उनका चेहरा चमक रहा है. ऐसी कौनसी शक्ति उन्हें प्राप्त हुई है?

वाला निर्विकल्प समाधि एक ऐसी चीज है जिसको कि शायद आप अल्टीमेट कह सकते हैं अगेन वी डू नॉट नो राइट ठाकुर खुद जब यह कहते हैं कि अंतिम अंतिम सत्य क्या है? वह मैं बता नहीं पाऊंगा। मैं बोलना चाहता हूं। फिर भी कोई मेरा मुंह बंद करके रखता है। ठाकुर ने खुद कहां तक गए हैं। ठाकुर खुद उदाहरण देते हैं ना कि यह शिव है। एक गंडूष पान करके वो बूंद हो गए थे नशे में। यह नारद वगैरह यह जो चीनी का पहाड़ है उसमें से एक चीनी एक एक खाकर के वह सोचते हैं। उन्होंने ज्यादा से जैसे माने एग्जैक्टली यही बात ये उसके साथ में गिरीश घोष के साथ में बात हो रही थी कि नारद वगैरह ने अमृत सागर का हो सकता है कि एक घूंट पान किया हो और उसी में वे लोग बूंद होकर के रह गए हैं। तो यह बात सुनकर के गिरीश कहता है महाशय यह जो आप बातें कर रहे हैं ऐसी उच्च कक्षा की मेरा माथा टन टन कर रहा है। मेरा माथा जैसे कि ऊपर घूम घूम जा रहा है। तो ये आध्यात्मिक जगत की जो सर्वोच्च सिद्धियां है वो इतनी गहन है। एक के बाद एक इतने सारे स्टेजेस है कि शब्दों में हम उनको कभी वर्णन नहीं कर पाएंगे। एट द सेम टाइम वी हैव टू अंडरस्टैंड कि जो विभिन्न सेक्ट है उनकी अलग-अलग अंतिम सत्ताएं कभी नहीं होगी। अल्टीमेट रियलिटी इज वन। इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। बट व्हाट दैट अल्टीमेट रियलिटी इज दैट वी डू नॉट नो। बट किंतु हम जैसे-जैसे जितना देखिए इसमें क्या है ना कि ऐसा ऐसा नहीं है कि निर्विकल्प समाधि मिली तभी मैं आध्यात्मिक होऊंगा या तो तभी मेरे चेहरे पर तेज आएगा। जितना-जितना हम साधना में आगे बढ़ते जाएंगे उतनी उतनी हमको उस तरह की आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त होती जाएगी। बस वही है कि जो भी उपलब्धि प्राप्त करता है खास जो सही सही जिसने प्राप्त की है वह ऐसा कभी दावा नहीं करेगा कि मैं अंतिम सत्ता को पकड़ करके उसको स्पर्श करके आ गया हूं हमेशा कि इसके भी ऊपर कुछ है। इसके भी ऊपर कुछ है। ये ठाकुर खुद बाकी सबको छोड़ ही दीजिए। ठाकुर को जब हाथ फ्रैक्चर हुआ था हाथ में तब ठाकुर कहते हैं कि देखी भीतरे शुद्ध दुईजन आ मेरे भीतर में सिर्फ दो लोग हैं। मैं हूं मां है और मां का संतान है और कुछ अभी भीतर में नहीं है। तो माने उस अवस्था तक ठाकुर के भीतर में शायद थोड़ा बहुत अहंकार होगा। माने लोक शिक्षा देनी है वगैरह का। किंतु उस अवस्था में उस अवस्था आने के बाद में ठाकुर कहते हैं कि अभी देखता हूं भीतर में कोई नहीं है। और यह अवस्था कब आई निर्विकल्प समाधि तो हो गई थी 1868 में और ये ठाकुर बात कर रहे हैं 1885 के आसपास में। सो वहां तक उनका ये जो है सफर उर्ध्वगति चलता रहता है। किंतु एक बात ख्याल में रखना है जो मैं कहता हूं सब कुछ सत्य है या तो सही है ऐसा मत मान लीजिए क्योंकि मैं भी तो सब कुछ पढ़ रहा हूं सीख रहा हूं। सो मैं जो कहता हूं इट इज अ गाइड मैप फॉर यू कि ऐसा है कुछ। फिर यू डू योर ओन रिसर्च। हो सकता है

हमारे क्लास के बारे में

कि यू कैन गो आपका जो उत्तर होगा वह मेरे से बड़ा डिफरेंट होगा। बट दिस इज इन अ स्पिरिट ऑफ एक्सप्लोरेशन। रेदर देन अ स्टूडेंट टीचर देखिए मैं आयन के साथ आयन वो यूनिवर्सिटी में था उस समय। अभी तो हॉलीवुड में है। तो मैं उसके साथ में गप लगाता था। उसके ऑफिस में जाकर के बैठता था। अभी वो पीएचडी कैंडिडेट्स को वो सिखा रहा है। तो मुझे बार-बार कहता था ये जो इंडिया का एजुकेशन सिस्टम है ना आप रट लो जो टीचर बोलता है सुन लो मानो सब पूरा स्वीकार कर लो। किंतु मेरा ऐसा नहीं है। मैं तो अमेरिका में क्या सिखाऊं? पीएचडी कैंडिडेट जो होते हैं उनके जो गाइड प्रोफेसर होते हैं उनके साथ में डिबेट करते हैं। और डिबेट में कौन सही कौन गलत ऐसा नहीं। आपको प्रूफ लेकर के स्टडी करके रिसर्च करके डिबेट करना है। दिस इज़ हाउ यू लर्न। एक्सप्लोर स्टडी एंड डिबेट। यहां पर कौन सही, कौन गलत, कौन सीनियर, कौन जूनियर ऐसा नहीं। वी आर ऑल डिबेटिंग, वी आर ऑल इंक्रीजिंग आवर नॉलेज। दिस इज अ प्रॉपर मेथड ऑफ एजुकेशन। वह मुझे कहता था। सो आई आल्सो टेक दिस क्लास इन द सेम स्पिरिट कि हम लोग वार्तालाप करते हैं। एंड वी ऑल आर गेटिंग एनरिच। इंटेलेक्चुअली एनरिच होते हैं हम सभी लोग।