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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः तो इस सप्ताह हम मां का लाइफ देखते हैं हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर और मां दक्षिणेश्वर में रह रहे हैं और हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर और अ मां को एक के बाद एक अ जैसे ही ठाकुर ने अपनी साधना समाप्त करके धर्मचक्र प्रवर्तन अर्थात कि उनको जो आदेश मिला था मां जगदंबा से निर्विकल्प समाधि में स्थित होने के समय मां जगदंबा ने उनको कहा था कि तई भाव मुखे थाक तो उन्होंने वही जो बॉर्डर लाइन है सुपरकॉन्शियस और उसकी जो निर्विकल्प समाधि की वहां से नीचे आकर के इस जगत में रहे और उन्होंने जो मां जगदंबा से प्राप्त किया था या तो मां जगदंबा की जो वाणी है उन्होंने जगत को सुनाना शुरू किया था और ठाकुर के पास में यही सब यंग लड़के आना शुरू कर दिए थे तो वह जो गोल्ड सुवर्ण युग है रामकृष्ण संघ का कि रामकृष्ण संघ में एक समय था कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर भी रहते थे मां शारदा भी रहती थी और एक के बाद एक सभी ये सन्यासी त्यागी संतान ठाकुर के यह लड़के त्यागी लड़के और यह गृहस्थ संतान दोनों ने ठाकुर के पास में आना शुरू कर दिया था तो उन दिनों की जो कहानियां है वो कहानियों को हम यदि अपने मन में उसका चिंतन करेंगे अपने मन में ही उस कहानी को रिपीट करेंगे या तो फिर उसका पाठ करेंगे या तो श्रवण करेंगे उससे जो अपनी चित्त शुद्धि होगी उसके बारे में हम मने यह एक बहुत ही सहज सरल उपाय है जैसे मैं कहता हूं कि राम कृष्ण संघ के जो भी भक्त है साधु है उन लोगों के लिए जब ध्यान करना मेडिटेशन करना आध्यात्मिक साधना करना यह सब चीजें बहुत ही सहज सरल है क्यों है सहज क्योंकि आपको पता है कि हमको कोई बैठ कर के इस तरह के किसी ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को केंद्रित नहीं करना जिससे कि मन को वहां पर एकाग्र करने में तकलीफ हो हम जद यहां पर ओमकार का मैं यहां पर कुछ स्टूडेंट्स को यहां पर कंप्यूटर क्लासेस वगैरह चलते हैं शाम को तो कुछ स्टूडेंट्स आते हैं तो उनको मैं मेडिटेशन सिखाता हूं कभी-कभी तो मैं कहता हूं कि ओमकार के ऊपर में मन को एकाग्र करो इनको तो मैं ऐसा नहीं कह पाऊंगा कि ठाकुर है मां है स्वामी जी है क्योंकि उनको इतना सब कुछ पता नहीं है धीरे-धीरे करके मुझे स्टेज बाय स्टेज उनको ठाकुर मां स्वामी जी तक ले आना होगा होगा किंतु शुरुआत मुझे इस तरह से कोई वैदिक या तो अपने वेदांत के या तो फिर जनरल आध्यात्मिकता के जो टॉपिक है उसी से प्रारंभ करना होगा तो उनको यदि ध्यान करना सीखना है इन स्टूडेंट्स को तो उनको ओमकार पर ध्यान करना है प्रारंभ में तो वह थोड़ा सा कठिन होता है क्योंकि अपना मन 10 दिशाओं में 10 बार दिन में दौड़ता है दिन में क्या एक मिनट में 10 जगह पर जाकर के अपना मन आता है 10 जगह के विचार करता है तो यह जो अपना मन है मन को पकड़ कर के केंद्रित करने का सबसे सहज समम सबसे सरलतम उपाय क्या है तो वह उपाय है अपने संघ की यह जो सब छोटी-छोटी स्मृति कथाएं हैं जीवनी है वाणी है उनका पाठ श्रवण और मनन जितना आप यह करते जाएंगे उतना ही देखेंगे कि अपना अं मन शुद्ध होता जाएगा तो इसी सिलसिले में हम श्री मां शारदा देवी की इस किताब का पाठ कर रहे हैं इस किताब के लेखक है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज आने वाले पांच जो क्लास होंगे इस सप्ताह के उस सभी क्लास में मां का यह जीवन इसका पाठ करेंगे और इसके ऊपर में थोड़ी सी चर्चा करेंगे चैप्टर का नाम है बिंदु वासिनी हम लोग कहां तक आए हैं कि मां क कती है हमको अपने श्री मुख से हमको कहती है उनकी वाणी ही उनके डिसाइल्स ने नोंद करके रखी है मां कहती है कि ठाकुर ने मुझे कभी फूल से भी आघात नहीं किया तुम छाड़ कखन तई बोलेनी ये आप तुम और तई यह तीन तरह के संबोधन होते हैं इसके बारे में पिछले क्लास में हमने बड़ा विषद डिस्कशन किया था तो यहां से अभी हम आगे पढ़ते हैं स यह कौन सा समय है जबकि ठाकुर और मां दोनों दक्षिणेश्वर में रह रहे हैं उस दिनों की यह बात है और हमको पता है कि यह समय कहां से कहां तक चला था यह 73 के प्रारंभ से लेकर के 85 18735 यहां तक 1885 के 1885 के आखिर में ठाकुर को कैंसर का प्रारंभ हो गया था उनको कैंसर गले में दर्द होना शुरू हो गया था और फिर उसी को लेकर के फिर ठाकुर की लीला अस्ताचल की ओर बढ़ती है क्योंकि इस जगत में अपनी लीला उनकी समाप्त हुई स्थूल देह से उनकी लीला समाप्त हुई उसके बाद में सूक्ष्म देह से उनकी लीला चलने वाली है कंटिन्यू रहने वाली है स्थूल देह में लीला अर्थात की ठाकुर सदेव वर्तमान थे दक्षिणेश्वर में उन दिनों की लीला और सूक्ष्म देह से लीला अर्थात कि ठाकुर ने अपने जो गृही और सन्यासी संतान है उनके हृदय में प्रवेश करके रामकृष्ण संघ का यह जो फाउंडेशन डाला और रामकृष्ण संघ रूपी जो विराट शरीर में वह निवास कर रहे हैं वह हो गई सूक्ष्म लीला वह जो एक दिन की बात है ना ठाकुर ने कहा कि आमी खेते पार चना ठाकुर ने मां को प्रार्थना की गले में इतना कष्ट हो रहा था इतना दर्द हो रहा था भी नहीं पाते थे तो ठाकुर ने मां को कहा एटलीस्ट थोड़ा सा मैं खा पाऊं ऐसा कुछ कर दो तो मां ने इमीडिएट यह सब जो उनके संतान है शिष्य है उनको दिखा कर के मां जगदंबा ने कह दिया कि देखो तुम इतने इतने मुंह से खाते हो तो अर्थात कि ठाकुर को उस समय यह मांगने में लज्जा भी हुई क्यों उन्होंने अपने लिए कुछ मांग लिया किंतु साथ-साथ में ही देखिए कि ये जो आने वाला भविष्य है उस उसका यह एक तरह से भविष्यवाणी थी कि हम लोगों के हृदय में प्रवेश करके ठाकुर अभी भी जीवित है हम लोगों के हृदय में प्रवेश करके मां शारदा देवी अभी भी जीवित है तो व जो सुवर्ण युग में जो सब घटना परंपराएं एक के बाद एक सुंदर मधुर प्रेरक प्रसंग दक्षिणेश्वर में हुए थे वही प्रसंग आज अपने हृदय में हो रहे हैं मैं यहां पर जैसे मैंने कहा कि मैं मॉर्निंग वॉक करता हूं हूं तो मॉर्निंग वॉक के समय में यह जो सूरज की लालिमा आकाश में छा जाती है उस समय ऐसा लगता है कि चलो हम भी पंखी बन कर के आकाश में उड़ रहे हैं या तो फिर हम फिर वही दक्षिणेश्वर में चले जाते हैं वहां पर सुबह सुबह ही वहां पर मां की आरती होगी यहां पर ठाकुर उठकर के अपने कमरे में वह मां जगदंबा का नाम ले रहे हैं यहां पे नबत में मां है वह अपना मेडिटेशन वगैरह आध्यात्मिक जो उनको साधना करने की जरूरत नहीं है उनको जो वो जो ठाकुर और मां करते हैं वो साधना नहीं कहा जाएगा इसको कहा जाएगा कि वह आत्म स्वरूप में लीन हो जाते हैं अभी ये दिन प्रतिदिन जो कार्य करते हैं तो उसमें ऐसा लगता है कि जैसे कि उन लोगों का मन हमारी ही तरह अभी क्या खाना बनाना है मां को खास करके क्या खाना बनाना है किसको क्या खिलाना है कौन बाहर से आता है तो उसको किस तरह से उसको देखना है कि क्या कहां पर गया था कब आएगा वगैरह वगैरह किंतु जब यह लोग सुबह और शाम को आत्म स्वरूप में लीन हो जाते हैं उस समय उनके भीतर का दैव भाव जो है वह प्रकट हो जाता है तो वही उसी को यदि हम चिंतन करेंगे तो अपने लिए जो आध्यात्मिकता का रास्ता इतना सहज रूप से खुल जाएगा हमको किसी भी तरह का कष्ट नहीं करना है कि कोई मन को एकाग्र करने की चिंता नहीं करनी है बस यह जो इनकी लीला है लीला माधुर्य मय प्रसंग है उसमें हमको रस होना चाहिए यदि एक बार इसमें हमको रस आना शुरू हो गया तो साथ-साथ में ही सहज आध्यात्मिकता के रास्ते हमारे लिए उन्मुक्त हो जाएंगे तो इसी सिलसिले में देखिए कि बिंदु वासिनी प्रकरण में गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या लिखते हैं लिखते हैं ए रूपे श्री मां के सर्वदा सन्मान चोखे देखी लेओ एवं त प्रति तद अनुरूप व्यवहार करी लेओ ठाकुर जानी तेन जे उभर मध्य बय ओ अभिज्ञता पार्थ को अनेक अभी हमने देखा कि ठाकुर मां को कितना सम्मान देते थे किंतु इसके आगे फिर महाराज जी लिखते हैं कि भले ही चाहे ठाकुर मां को अति सम्मान देते हो मां को कभी भी फूल से भी आघात ना करते हो किंतु साथ में ही ठाकुर को यह पता था कि इन दोनों में एज गैप जो है उम्र का जो तफावत है वह बहुत बड़ा है मां की उम्र 5 साल थी ठाकुर की उम्र 23 साल थी जब इनका विवाह 1800 18582 में 58 59 के आसपास में तो अभी देखिए कि एटलीस्ट उन दोनों के बीच में 2021 साल का एज गैप है उम्र का तफावत है और मां तो फिर अभी भी जब दक्षिणेश्वर आई थी तो फिर उनकी उम्र भी तो ज्यादा नहीं थी मां का बर्थ ईयर है 18530 दक्षिणेश्वर में आई है 18735 3 टू 52 52 टू अ 62 72 ऑलमोस्ट 2021 साल की उम्र होगी जब यह सब मां दक्षिणेश्वर में प्रथम बार आई थी तो ठाकुर को यह पता था कि इन दोनों के बीच में उमर का तफावत बहुत ज्यादा है इसलिए उनको खास करके जो एक्सपीरियंस और नॉलेज का डिफरेंस है वह भी इतना बड़ा है ठाकुर ने इतनी सारी साधनाएं की थी इतने गुरुओं से शिक्षा ली थी और मां तो कोई ऐसा फॉर्मल एजुकेशन कहे तो मां ने तो ऐसा कुछ नहीं किया था ठाकुर से विवाह होने के बाद में मां जयराम बाटी कामर पुकुर आती जाती रहती थी और वहां पर घर का जो काम है उस समय की जो प्रथा थी कि स्त्रियों को और या तो फिर लड़कियों को स्कूल में ना भेजा जाए उनको एजुकेट ना किया जाए यह जो एक छोटी छोटा सा एक जो प्रसंग है कि कामर पुकुर जाने के समय मां कभी-कभी लक्ष्मी दीदी के साथ में बैठ कर के थोड़ा बहुत अंक यह थोड़ा बहुत लिख पढ़ना सीख रही थी तो उस समय वह पढ़ रही थी कुछ जो अल्फाबेट से अल्फाबेट जो पढ़ रही थी सीख रही थी उस समय उनके पास में यह पढ़ाई की किताब देख करके यह हृदय ठाकुर का भांजा और ठाकुर का सेवक उसने क्या किया मां के हाथ में से किताब छीन ली और कहा कि पढ़ाई लिखाई करके क्या नाटक नोवल पढ़ना है क्या तो उस समय एक ऐसी एक चिंता थी लोगों के मन में कि स्त्रियां या तो लड़कियां बहुत ज्यादा पढ़ाई लिखाई कर देगी तो यह सब क्या सब चित्र विचित्र चीजें वह पढ़े गी उनका चरित्र मलीन हो जाएगा खराब हो जाएगा वगैरह वगैरह वो सब सोचा जाता था जिस तरह से एक और थोड़ो समाज में होता है तो ठाकुर को यह पता था कि मां को कोई फॉर्मल एजुकेशन तो मिला नहीं है और दोनों के बीच में एज और एक्सपीरियंस और नॉलेज तीनों का बहुत बड़ा गैप है से जनन विशेष तो श्री मां के लोको व्यवहार और साधन भजना आदि शिखा दवार अन्न के हो ना थाका ठाकुर स्वयं से कर्तव्य निजो हस्ते तुल लते बात होन मां को लोक व्यवहार किस तरह से करना है और साधन भजन किस तरह से करना है वह सिखाने के लिए और कोई वहां पर उपस्थित नहीं रहने की वजह से यह कर्तव्य ठाकुर ने अपने सिर पर उठा लिया इस कर्तव्य का भार ठाकुर ने अपने हाथों में ले लिया देखिए ठाकुर को यह चिंता नहीं है कि मां को अक्षर ज्ञान है कि नहीं है किंतु यह चिंता अवश्य है कि लोगों के साथ में व्यवहार किस तरह से किया जाए और साधन भजन किस तरह से किया जाए देखिए अपनी यह जो मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम है जिसको कहते हैं 3 आर इसके ऊपर में बनी हुई है रीडिंग राइटिंग एंड एरिथ मेे िक ये 3 आर वाली जो अपनी सिस्टम और या फिर आज के मॉडर्न थोड़े से आइडियाज ले तो यह क्रिएटिव थिंकिंग है ना कि फिर यह आपका कम्युनिकेशन स्किल है ना कि पर्सनालिटी डेवलपमेंट है यह सब एजुकेशन की आज की थिरी है ठाकुर की एजुकेशन थिरी क्या कहती है कोई भी मनुष्य है खास करके स्त्रियां है तो दो चीजें जानने की सबसे ज्यादा जरूरत है एक तो है लोक व्यवहार देखिए हमको हमेशा समाज में रहना है और समाज में रहने की वजह से लोगों के साथ में हमको किस तरह से डील करना है वह सीखना पड़ेगा इसी टॉपिक को आजकल यह टीमवर्क और लीडरशिप कहते हैं लीडरशिप मैनेजमेंट या तो फिर लीडरशिप की ट्रेनिंग और टीम वर्क क्योंकि आपको कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट होता है आपके यदि कंपनी में या तो आपको इसको एग्जीक्यूट करना है तो आपको टीम में ही काम करना पड़ेगा 10 लोगों की टीम होगी कोई कम्युनिकेशन एक्सपर्ट है कोई एड एक्सपर्ट है कोई टेक्निकल एक्सपर्ट है वगैरह वगैरह वह सब एक टीम बनती है डिफरेंट टाइप की एक्सपर्टाइज्ड को एग्जीक्यूट करती है उस जॉब को वो करती है तो यहां पे भी देखिए कि सोसाइटी में हम यदि रहते हैं तो आप आपको फैमिली में रहना है अभी यह फैमिली आपका घर हो ना किय आश्रम हो दोनों तो एक तरह से फैमिली ही है आश्रम में भी देखिए कि हम यहां पर साधु ब्रह्मचारी लोग मिलकर के रहते हैं भक्त है वॉलंटिली में दबा कर के यह अपने ईगो को सप्रे करके यहां पर ना रह पाऊं तो मैं आश्रम में टिक ही नहीं पाऊंगा ऐसा कभी-कभी होता है कि मैं एक आश्रम में गया किसी साधु के साथ में मेरा ईगो क्लेश हो गया होता है कभी-कभी मनुष्य है हम सभी तो तो इसकी वजह से हमको ऐसा लगा कि मैं यहां से चला जाता हूं और दूसरे आश्रम में चला जाता हूं किंतु ऐसा बार-बार आप करेंगे एक आश्रम से दूसरे आश्रम तो एक जगह पे टिक करके बैठ कर के मन को शांत रख कर के कभी भी साधन भजन नहीं होगा और हमारे पास में तो एटलीस्ट ये ऑप्शन है कि एक आश्रम में नहीं अच्छा लगता तो चलो दूसरे आश्रम में चले जाते हैं गृहस्थ जो होते हैं उनके साथ में तो यह संभव नहीं या तो फिर बड़ा मुश्किल है कि एक फैमिली में नहीं अच्छा लगता तो चलो दूसरा एक फैमिली बनाते हैं यह मास्टर महाशय थे उनका उनके पिताजी के साथ में नहीं पट रहा था तो पिताजी को छोड़ कर के उन्होंने अपनी पत्नी के साथ में नया घर बसाया था तो ठाकुर बार-बार उनको पूछते हैं कि अच्छा तुम अपने पिताजी के घर कब वापस जा रहे हो तो मास्टर महाशय कहते हैं कि उस घर में मुझे बहुत कष्ट मिला है उस घर में वापस जाने की मुझे थोड़ी सी भी इच्छा नहीं है तो ठाकुर उनको डांट कर के कहते हैं कि अरे तुम अपने पिताजी को तुम प्रणाम नहीं कर सकते अपने पिताजी के सामने तुम अपने अहंकार को काबू में करके अपने अहंकार को तुम विसर्जन दे कर के क्या अपने पिताजी की बात नहीं मान सकते वो रामचंद्र दत्त ठाकुर के दूसरे शिष्य उनके पिताजी ने दूसरी शादी की थी अभी वह दूसरी शादी करके अभी रामचंद्र की जो मां थी उनका शायद देहांत हो गया हो कि कुछ भी हो दूसरी शादी अर्थात कि सौतेली मां वो घर में आती है तो साथ में ही झगड़ा होना शुरू हो जाता है तो यह राम बाबू आकर के ठाकुर को कहते हैं कि वह सौतेली मां जब भी मेरे घर में आती है घर में झगड़ा ही होता रहता है वो क्यों नहीं अपने पिताजी के घर में जाकर के रहती तो और कहते हैं साथ-साथ में कि बूढ़ो वय बाब और बुद्धि गोलाई गछ अर्थात कि उम्र ज्यादा हो गई है तो पिताजी की इसलिए उनकी बुद्धि जो है काम करनी बंद हो गई है इमीडिएट ठाकुर ने नाराज होकर के कहा कि देखो देखो यह क्या कहता है कि बाबा और बुद्धि गोल लाई गछ बाबा की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है क्यों तुम अपनी बीवी को जाकर के अपने उसके पिताजी के घर में रख के आओ ना जाओ ना तो सभी लोग हंसना शुरू कर दिए यदि आप यह चाहते हैं कि आपके के पिताजी की जो दूसरी बीवी है वह अपने पिताजी के घर में जाकर रहे तो आप अपनी बीवी को क्यों अपने घर में रखते हैं उसको भी उसके पिताजी के घर रख के आइए तो ठाकुर यह सब चीजों में बड़ा मानते थे कि यह जो फैमिली वैल्यूज जिसको आज हम कहते हैं यह जो जॉइंट फैमिली है इसका वैल्यू क्या है पता है अपने ये जो इंडियन कंप्यूटर इंजीनियर जब विदेश में जाते हैं तो बड़ा ही इजली यह मल्टीनेशनल कंपनी में इन लोगों को सीईओ बना दिया जाता है मल्टीनेशनल कंपनी में क्या होता है कोई जापानीज वर्कर है तो कोई ये कोरियन एंप्लॉई है कोई क कहां यूरोप से कोई किसी को एंप्लॉय किया है किसी को अफ्रीका से किसी को कैनेडा से किसी को मेक्सिको से ऐसा पूरा पचरंगी वहां पर रहता है लोगों का दल अभी सभी की इच्छा सभी का मन सभी की टेंडेंसी उसको समझ करके उसको टीम में एक आबद्ध करना और उनके पास में काम करवाना एक बड़ा ही क्या कहेंगे कि सोशल स्किल आपका ले लेता है और यह सोशल स्किल अपने इंडियन लड़कों में बचपन से ही होती है क्योंकि एक समय था हम लोग जॉइंट फैमिली में रहते थे संयुक्त कुटुंब में रहते थे तो अभी आजकल तो सब जगह पर जैसा हो रहा है ये संयुक्त कुटुंब टूटना शुरू हो गए हैं किंतु एक समय था कि बच्चा जन्म लेगा साथ में ही वह अपने घर में किसको देखेगा मां और बाबा तो है ही है साथ में चाचा है चाची है दादा है दादी है नाना है नानी है मामा है मामी है पोई है फुआ है सभी लोग बहुत सारे लोग एक घर में रहते हैं तो बच्चा पहले से ही वह समझ जाएगा कि चाचा और चाची के साथ में इस तरह से व्यवहार करना है नाना नानी दादा दादी के साथ में इस तरह से अपनी बड़ी बहन या बड़ा भाई है छोटा भाई है तो उसको प्रेम से उसके साथ में व्यवहार करना है ये बच्चा जो है बचपन से ही वह समझना शुरू कर देता है तो यह अपने लड़कों में खास करके भारतीयों में सोशल स्किल बहुत होता है तो यहां पर देखिए कि ठाकुर किस चीज के बारे में सोचते थे कि मां को आना चाहिए एक तो हो गया लोक व्यवहार बड़े फैमिली में रहते हैं ठाकुर के पास में जो कोई भी आएंगे सभी तो ठाकुर के संतान है वो मां की मां श्यामा सुंदरी देवी वह बेचारी पश्चाताप वो बेचारी बड़ी ही दुखी होकर के कहती थी कि मेरी बिटिया शारदा को मां करके पुकारने वाला कोई नहीं मिला बेचारी को क्यों ठाकुर तो थे त्यागी शवर उनका तो कभी संतान होने वाला नहीं था तो मां शारदा को संतान मां बोल कर के कौन पुकारेगा तो उस समय ठाकुर ने उनको क्या कहा था अपनी सास को मदरिन लो को कि इतने एक समय आएगा इतने बच्चे इकट्ठा हो जाएंगे मां श शारदा को मां मा करके पुकारते पुकारते कि वोह बेचारी मां मां पुकार सुन करर के वो परेशान हो जाएगी इत कितने बच्चे यहां पर इकट्ठा होने वाले हैं उसके पास में तो देखिए कि सही में इतने सारे बच्चे मां के पास में इकट्ठा हुए थे जयराम बाटी हो ना कि कोलकात्ता हो वो एक बड़ी सुंदर कहानी है कि एक बार ऐसा हुआ कि एक फैमिली था वो मां को जयराम बाटी में मिलने के लिए आया बिल्कुल पहली बार आया है किसी को पहचानते नहीं है कुछ नहीं अभी मां का तो छोटा सा घर जयराम बाटी में यदि जाकर देखा होगा यह बहुत दिनों के बाद की बात है यह ठाकुर की म समाधि के बाद में मां जब जयराम बाटी में रहती थी उन दिनों की यह बात है तो मां के पास में यह त्यागी संतान भी रहते थे फिर मां का अपना एक बड़ा सा फैमिली मां के जो छोटे भाई थे काली मामा वगैरह फिर उनका फैमिली फिर यह जो राधू माकू नलिनी ये मने पूरा एक फेमस संसार को लेकर के मां रहती थी छोटा सा घर है उसमें यह बड़ा एक फैमिली आ गया तो अभी इनको कहां प बिठाए क्या खिलाए कुछ ठीक नहीं ऊपर में से देखने में आया कि छोटे बच्चे को बुखार है तो बेचारे बच्चे को सुलाना है कहीं पे औषध की व्यवस्था करनी है लोग जर्नी करके आए हैं तो भूखे हैं प्यासे हैं खाना देना है पानी देना है किंतु देखिए कि मां का संसार और अपने घर में यदि ऐसा बिन बुलाया मेहमान आ जाएगा तो अपना मन बिगड़ जाएगा मुंह भी बिगड़ जाएगा हम लोग सोचेंगे अरे भाई यहां पे हम ही लोग तकलीफ में है ऊपर में से यह लोग कहां सर पे आकर के बैठ गए किंतु देखिए मां का संसार था विद्या का संसार जैसे कि मां की खुद की बच्ची अपने मां के घर आई हो इस तरह से वो जो महिला भक्त थी उसने मां के साथ में उस इसी तरह से मा मां ने उस लड़की के साथ में इसी तरह से व्यवहार करना शुरू किया और उसका भी संकोच था संकोच तो होगा ही उसको समझ में आ गया कि अरे इतने सारे लोग हैं यहां पे और एकाएक हम लोग आ गए हैं दो-तीन बच्चे हैं फिर बच्चों को बुखार भी हो रहा है तो फिर मल मां को तकलीफ हो रही है वो लड़की को भी बेचारी को पता है किंतु क्या करें मां का दर्शन करने की जो प्यास है भीतर में से उसको तो किसी भी कर से कैसे भी करके उसको तो पिपासा को यह तो करना है शांत करना है तो मां के पास में आ तो गए हैं किंतु मां ने इतना प्रेम से जैसे कि अपनी खुद की बच्ची आई हो पहली बार देखा है पहली बार मिले हैं किंतु इतना प्रेम कि वोह लड़की को लगने लगा कि वह अपने घर में ही आई है अपने पिता जी माता जी के घर में ही आई है कुछ समय के बाद में देखने में आया कि जैसे वह घर की सब बहुएं जैसे जिस तरह से वो गांव में तो होता है ना वो एक घड़ा लेकर के पानी भरने को जाते हैं जलाशय के जलाशय पर तो वैसे ही वो देखने में आया कि जैसे घर की ही लड़की हो घड़ा लेकर के वो पानी भरने के लिए जा रही है किचन में सबको हेल्प कर रही है और इस तरह से रह रही है जैसे कि वो जन्म जन्मांतर से मां शारदा उनकी मां हो हो और जयराम बाटी उसका पियर हो अर्थात कि अपनी मां का घर इसी तरह से वह जैसे कि वहां पर रह रही है और फिर जब जाने की बारी आई तो मां की आंखों में भी आंसू इस लड़की की आंखों में भी आंसू अभी वह कैसे भी करके मां से विदाई लेकर के जा तो रहे हैं अभी किंतु यहां पे देखिए कि यह जो मां के जो दूसरे एक त्यागी संतान थे उनके एक सेवक महाराज थे उन्होंने देखा कि यह जो लड़की है उसका एक गमछा जो होता है टवेल वो वहां पे सुखाने को दिया था तो वह वहां पे रह गया है तो ऐसा ही एक वस्त्र कुछ रह गया होगा तो इस उन्होंने इमीडिएट मां को कहा कि मां देखिए वो तो चले गए उनका एक वस्त्र यहां पे रह गया है तो मां अभी अपने मुंह से तो बेचारी कुछ नहीं बोलेगी किंतु वह मन में मन में बड़ा ही संताप कर रही है और मुंह पे बोल रही है अरे यह बेचारी कब कल उसको इस वस्त्र की जरूरत होगी तो वस्त्र नहीं मिलेगा सोचेगी बेचारी के मां के यहां पे छोड़ के आई है अभी देखिए मां अपने त्यागी संतान को यह नहीं कहना चाहती कि तुम जाओ वस्त्र लेकर के उसको रास्ते में देके आओ लंबा रास्ता है धूप में जाना पड़ेगा मां बेचारी अपने संतान को किस तरह से ऐसा कहे एक संतान वस्त्र छोड़ के चला गया है दूसरे संतान को यह कहना धूप में जाओ वस्त्र देने के लिए उसको कष्ट होगा मां को समझ में आ रहा है तो किस मुंह से कहे तो मां किंतु संताप कर रही है बोल रही है कि अरे मेरी बच्ची वो जब कल उसको यह वस्त्र की जरूरत होगी उसको नहीं मिलेगा तो फिर महाराज ने सामने से कहा मां क्या मैं यह वस्त्र देक के आऊं तो अभी जैसे ही महाराज ने ऐसा कहा तो नलिनी मांक वो जो सब मां की भतीज आं थी ना उन्होंने एकदम रूढ़ वाक्य में कह दिया बड़ी नाराजगी के साथ में कि उसके इतने बच्चे हैं उस लड़की के जो भक्त दंपति आया था इतने बच्चों को लेकर के आया है बच्चों को संभला नहीं जाता बच्चों को पैदा कर दिया है अभी गए हैं तो यह भूल के गए हैं वस्त्र कोई जरूरत नहीं है धूप में जाने की और कष्ट करके उसको यह वस्त्र देने आने की व अपने खुद के बच्चों को नहीं संभाल पाती अपने फैमिली को नहीं संभाल पाती उसके लिए हम थोड़ी ना इतना कष्ट करेंगे घर में रख दिया दो-तीन दिन खाना खिला दिया बहुत हो गया अभ ये उनका अभिप्राय है मां का अभिप्राय तो किंतु ऐसा नहीं महाराज समझ गए इमीडिएट वह वस्त्र लेकर के दौड़ कर के गए वे लोग रास्ते में थे धूप था इतना तो इतने धूप में जाकर के उनके हाथ में जब वस्त्र दिया तो एक भक्त दंपति आश्चर्य चकित हो गया कि अरे हमने इसको छोड़ सामान्य चीज हम छोड़ कर के आए हैं उसके लिए मां ने एक साधु को भेजा हमको देने के लिए तो इतना आश्चर्य फिर बड़ा ही आभार प्रदर्शित करके विनम्रता पूर्वक उनकी विदाय ग्रहण की लोग जा रहे हैं महाराज जी वापस आ गए जयराम बाटी अपने घर में आकर के देखा कि वह लड़की एक साड़ी छोड़ कर के गई है वहां पर देखिए संसार भी तो ऐसा है ना संसार के कष्ट जिसने झेले हैं उन्हीं को पता है कि हम लोग जो परफेक्शन चाहते हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक हो वो ठीक-ठाक संसार में तो होने वाला नहीं पहले एक गमछा छोड़ के गई फिर साड़ी भी पता चला यह भी रह गई है तो जैसे ही मां ने साड़ी को देखा तो मां एकदम जोर से रोना शुरू कर दी कि अरे मेरी बच्ची बेचारी इसको छोड़ के गई है कल उसको जरूरत पड़ेगी तो बेचारी क्या करेगी तो इमीडिएट वह महाराज जी ने फिर से कहा महाराज महाराज जी ने मां को कहा कि मां क्या यह भी मैं देके आऊं तो अभी देखिए कि वह नलिनी है मांक है वे लोग तो बड़ी नाराज हो रही है एक साधु को दौड़ना पड़ रहा है एक भक्त के पीछे में वोह कपड़े छोड़ के गए हैं तो उनकी गलती है हमको उससे क्या है किंतु जैसे ही महाराज जी ने कहा कि मैं क्या वस्त्र देक आऊ मां के चेहरे पर फिर से वही हासी हास्य करुणामय हस्य कहा कि हां बेटा जाकर के दे के आओ तो फिर से महाराज वो वस्त्र को लेकर के जो दूसरा कुछ छोड़ के गए थे उसको लेकर के दौड़ते दौड़ते जा रहे हैं इतनी धूप में दोपहर में मैदान में देखा भक्त दम पति दूर से जा रहे हैं तो चिल्ला चिल्ला करके उनको खड़ा रखा तो यह दोनों लोग बड़े आश्चर्य चकित होकर के सोच रहे कि महाराज जी फिर से क्यों मिलने को आ रहे हैं तो महाराज जी पास में आए कहा किय दूसरा वस्त्र छूट गया था तो देने के लिए मां ने आपके पास में भेजा है अब जैसे ही यह महाराज जी ने कहा वह लड़की ने रोना शुरू कर दिया वह सोचती है कि देखिए मेरी खुद की मां होती तो भी वह मेरी इतनी केयर नहीं करती जितनी की मां शारदा करती है तो देखिए कि यह था मातृ प्रेम तो ठाकुर को यह था कि अक्षर ज्ञान मिले ना मिले मां को किस तरह से है वो पढ़ना लिखना यह सब आए ना आए दो चीजें तो अवश्य सीखनी है उसमें सर्वप्रथम है लोक व्यवहार यह पूरा फैमिली मां के आसपास में आने वाला है ठाकुर का यह विद्या का संसार मां के आसपास में प्रकट होने वाला है मां के आसपास में इकट्ठा होने वाला है और इसीलिए तो को संघ जननी कहा जाता है यह रामकृष्ण संघ है यदि सिर्फ ठाकुर और स्वामी जी आए होते तो हो सकता है कि कई साधक बहुत सारे साधक ठाकुर के पास में आए होते ठाकुर के चले जाने के बाद में स्वामी जी की किताब पढ़ करर के कई साधक यह सब साधनाएं भी करते होते किंतु मुझे ये डाउट है कि ये संघ का गठन होता कि नहीं होता और वैसे तो संघ का गठन करके ठाकुर स्वयं गए हैं यह संघ टिकता कि नहीं टिकता क्योंकि देखिए कि कई कहानियां हमने इस तरह से सुनी है कि मां ने कहा है कि प्रेम या तो भालोबासा बंगोली शब्द यह स्नेह ही है अपने संघ का सही सही फाउंडेशन यदि यह स्नेह और प्रेम चला जाएगा तो संग रहेगा कैसे जैसे वह केदार बाबू की वह फेमस कहानी है कि वह जाकर के क्वाल पाड़ा के अध्यक्ष वह टीचर थे और उनके स्टूडेंट वह सब साधु हुए थे और वही क्वाल पाड़ा में ही उन्हो उन्होंने आश्रम की स्थापना की थी तो मां के पास जाकर के क्या कहते हैं कि मां यह सब आजकल के साधु सब मेरे जब तक मेरे स्टूडेंट थे तो मेरी बात बिल्कुल बिना किसी आर्गुमेंट के सुन लिया करते थे अभी वे लोगों आपके पास में आते हैं शरद महाराज के पास में जाते हैं और आप इनको प्रेम से इतना आवकारो हैं तो अभी ये लोग मेरी बात नहीं मानते हैं तो आप एक काम कीजिएगा कि वो जब भी आए आप उनको वापस भेज दीजिएगा जैसे कि ये लोग जबर फोर्सफुली मेरे पास में आने को वह मजबूर हो जाए और मेरी बात उनको सुननी पड़े तो जैसे ही केदार बाबू ने ऐसा कहा इमीडिएट मां बड़ी नाराज होकर के बोलती है कि केदार तुम यह सब क्या कहलवान चाहते हो मेरे मुंह से मेरे बच्चों को क्या तुम यह कहना चाहते हो मेरे से ये कलवाना चाहते हो कि बच्चे ना आए यहां पे ऐसा मैं उनको कह दूं यह कौन सी बात हो गई तो जैसे ही मां ने नाराज होकर के ऐसा कहा केदार बाबू मां के पैरों में लेट पड़े और क्षमा मांगने लगे फिर मां ने क्या कहा कि भालो भाषाई अमा देरा शल यह जो प्रेम है यही है राम कृष्ण संघ का सही सही फाउंडेशन तो यह थी मां की बात और यही बात वैसे ऐसा नहीं है कि मां को मातृत्व सिखाना है कोई प्रश्न ही नहीं आता मां के मातृत्व के सामने ठाकुर खुद झुक कर के खड़े हो जाएंगे किंतु किस तरह से जो इसको व्यवहार में लाना है जगत है बड़ा क्रूअल है ये जग ये लोगों को निंदा बहुत सारे लोग लोग ऐसे होते हैं कि उनको सब समय निंदा करने की हैबिट होती है तो जैसे कि वो बात थी ना कि वोह पानी हाटी महोत्सव है तो ये लोग सब नौका में जाने वाले थे ठाकुर अपने भक्त के साथ में सुबह-सुबह निकल रहे हैं स्त्री भक्त भी साथ में थी और मां ने पूछ वाया ठाकुर को किसी के थ्रू मैसेज भेजा है माने मां को भी इच्छा होगी ना सभी लोग जा रहे हैं ठाकुर ने मां को नहीं कहा बाकी स्त्री भक्तों को कहा है बहुत सारे भक्त जा रहे हैं कितना नृत्य कीर्तन होगा कितना आनंद होगा आनंद आध्यात्मिकता का एक जैसे कि विराट प्रवाह बहेगा और मां बेचा ली अकेली रहेगी दक्षिणेश्वर में तो मां को भी तो मन होगा कि मैं जाऊं किसी के थ्रू ठाकुर के पास में मैसेज पहुंचाया कहा कि उसने जाकर के कहा मैसेंजर ने कि मां आना चाहती है क्या वो आए साथ में तो ठाकुर ने क्या कहा उसकी जद इच्छा है तो वो आए तो जैसे ये मैसेंजर था उसने जाकर के मां को कहा कि ठाकुर ने ऐसा कहा है कि आपकी जद इच्छा हो तो आओ तो इमीडिएट मां ने मना कर दिया कि ठीक है तो फिर मैं नहीं जाती हूं क्यों क्योंकि यदि ठाकुर की इच्छा होती कि मां सही सही जाए उनके साथ में तो क्या कहते कि हां हां वो निश्चय आए उसको आना ही पड़ेगा ऐसा कुछ कहते बड़ा ही आग्रह पूर्वक आमंत्रण देते इसकी वजह ठाकुर ने क्या किया कि मां के ऊपर में यह निर्णय छोड़ दिया कि तुम्हारी इच्छा है तो तुम आओ इमीडिएट मां समझ गई कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं ना जाऊं कि मैं जाऊं इसलिए फिर मां ने कहा कि ठीक है मैं नहीं जाती अभी ठाकुर को जैसे यह पता चला कि मां ने ठीक किया है कि वह नहीं जाएगी तो साथ-साथ में बड़े खुश होकर के कहे देखिए हम दोनों यदि साथ में जाते ना तो लोग निंदा करते क्या कहते कि हंस और हंसी आए हैं ठाकुर है परमहंस और यदि उनकी धर्म पत्नी भी साथ में जाएगी तो लोग कहेंगे यह हंस है यह हंसी है लोगों को तो चाहिए यह सब तो संसार में किस तरह से व्यवहार किया जाए कि जैसे आप संसार में घुलमिल भी जाए और आपकी निंदा भी बहुत ज्यादा ना हो थोड़ी बहुत निंदा तो होने ही वाली है किंतु ये बहुत ज्यादा निंदा ना हो इसके लिए ठाकुर को कुछ लोक व्यवहार मां को सिखाना था तो वह ठाकुर मां को सिखाएंगे और साथ में ही दूसरा क्या सीखना है तो है आध्यात्मिकता देखिए कि ये योग और वेदांत हिंदू धर्म के सर्वश्रेष्ठ अवदान है मनुष्य सभ्यता को इस अवदान को आज हमारा हिंदू भारत देश ही भूल गया है यह ठाकुर और स्वामी जी ने आकर के आज की ये जो नई जनरेशन है यंग बंगोल ठाकुर ज पाणी हाटी जा रहे थे तो ठाकुर कहते थे आजकल के तुम यंग बंगोल को पता नहीं है कि यह सब पुराने उत्सव में कितना आनंद आता था कितनी आध्यात्मिकता थी चलो हम जा करर के देख के आते हैं तो ठाकुर इंग्लिश में कभी-कभी बोलते हैं तो यह भी एक इंग्लिश शब्द ठाकुर कहते हैं यंग बंगोल तो ये यंग बंगोल कहो ना कि यंग इंडिया कहो कि यंग वर्ल्ड कहो एक समय था कि जब कि आध्यात्मिकता साधु संत ये धर्म यह दिन प्रतिदिन के अंगत थे किंतु आखिरी जो 200 300 साल में एक सेक्युलर साइंस ने इतना डेवलपमेंट कर दिया है कि उसकी सफलता से चका चंद होकर के हमने यह सोचना शुरू कर दिया है कि विज्ञान जद इतना सर्वश्रेष्ठ है ट्रेन है ये फिर ये स्टीम इंजन है फिर ये आग ये है जहाज है ये इतना सब कुछ है टेलीग्राम है यह सब कुछ जद विज्ञान ने करके रख दिया है उसका अर्थ है कि भगवान नहीं है यह ईश्वर नहीं है देयर इज नो गॉड तो यह जो अथम जो है नास्तिक वाद नास्तिक वाद बड़ा ही उस समय यूरोप में चल रहा था और यूरोप में से भारत में आया था तो ये यंग बंगोल है इसको सिखाने के लिए ठाकुर को हम ये योग और वेदांत इन दोनों का फिर से प्रचलन करना था अभी बात यह नहीं है कि मां शारदा को कोई आध्यात्मिक साधना करनी है जैसे ठाकुर को साधना की जरूरत नहीं है किंतु यह लोक शिक्षा देने के लिए मां और ठाकुर दोनों को साधना करनी पड़ेगी जिससे कि यह सब प्रसंग पढ़ कर के अभी जैसे काली पाणी हाटी जाना मां को पता ही है कि ठाकुर क्या कहने वाले थे ना पता हो यह बात पॉसिबल ही नहीं है किंतु फिर भी यदि यह प्रसंग ना हुआ होता तो आज इस प्रसंग के बारे में हम चर्चा ना करते हम इसके बारे में कुछ शिक्षा ग्रहण ना करते सीधे-सीधे ठाकुर ने वो यदि अपने जो पॉइंट बाय पॉइंट उपदेश दे दिए होते पॉइंट वन कि सत्य का पालन करो पॉइंट टू कि लोगों को कष्ट मत दो पंट थ जहां तक हो सके लोगों को सहाय करो इस तरह से पॉइंट बाय पॉइंट उपदेश अपने शास्त्रों में भरे पड़े हैं कौन शास्त्र को पढ़ता है कौन इस उपदेश को सीरियसली लेता है अपना स्वार्थ जब आ गया तो असत्य वचन कहना लोगों को हानि पहुंचाना लोगों को कष्ट देकर के उनकी धन संपत्ति हड़प लेना यह सब सब चीजें तो आम है इस जगत में तो ऐसा तो नहीं है कि उपदेश की कोई कमी है बात ऐसी है कि हृदय को स्पर्श कर जाए इस तरह से उपदेश देने वाले लोगों की कमी है यह उपदेश तो है शास्त्र कोई भी अच्छी किताब खोलेंगे सब आपको लिखा हुआ मिल जाएगा किंतु उस किताब में से उस लिखी हुई वाणी को उठा कर के अपने हृदय में प्रवेश करवा दे वह सही सही गुरु है तो यह लोगों को शिक्षा देने के लिए मां को कुछ ना कुछ तो साधना करनी पड़ेगी जैसे कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां के मन में बड़ा संताप था तो वृंदावन वगैरह नॉर्थ इंडिया के जो तीर्थ क्षेत्र है वहां पर भ्रमण करते-करते माने कितना जब ध्यान साधन भजन किया था और फिर उससे भी यदि नहीं हुआ या तो फिर इससे भी ज्यादा साधन करने की जरूरत थी तो नीलांबर मुखर्जी गार्डन बेलून मठ जब सबसे पहले वहां पर था तो बेलून मठ स्टार्ट होने वाला था उस समय नीलांबर गार्डन में वो वहां पर एक बिल्डिंग हमने भाड़े पर लिया था उसकी छत पर बैठ कर के मां ने पंच तपा साधना की थी पंच तपा क्या है पांच और पांच अग्नि जलाए जाते हैं उसमें बैठ कर के सुबह से शाम तक आपको जप करना है तो ये एक तो पांच अग चार अग्नि है ऊपर में से एक ऊपर में से एक सूर्य है तो ये पांच तप पांच तप के भीतर में बैठ कर के आपको य पांच अग्नि के बीच में बैठ कर के आपको तपस्या करनी है इसको कहते हैं पंच तपा तो ये तपस्या तक माने की थी तो ठाकुर की ये सबसे बड़ी चिंता थी सबसे बड़ी चिंता कि ये पढ़ाई लिखाई यह सब यदि मां ना सीखे तो वो ठीक है किंतु एटलीस्ट कि वो लोक व्यवहार सीखे और दूसरा की आध्यात्मिकता सीखे और दूसरा कि लिखना शायद मां को इतना नहीं आता था मां मां ने अपने हाथों से मां लिखा है एक जगह पे वो मने एकदम छोटा बच्चा पहली पहली बार लिख रहा हो तो कैसा उसका अक्षर होगा इस तरह से वह मां का दिख रहा है और मां पढ़ना जानती थी पढ़ना एटलीस्ट सीख लिया था बाद में कहती है रामायण महाभारत वगैरह ग्रंथ है वो मां पढ़ा करती थी धार्मिक ग्रंथ मां कभी-कभी पढ़ा करती थी और ज्यादातर मां किसी को कहती थी जैसे कि कथामृत मास्टर महाशय ने पब्लिश किया तो मां किसी को कहेगी दोपहर को अच्छा चलो पढ़ कर के सुना हो तो तो कोई भी डिवटी वहां पे होगा स्त्री भक्त मां के साथ में होगी तो कथामृत पढ़कर मां को सुनाएगी तो मां यह सब जानती थी किंतु सही सही शिक्षा जिसको कहा जाता है लोक व्यवहार और आध्यात्मिकता यह ठाकुर की इच्छा थी कि मां सीखे और सिखाने के लिए कोई नहीं था तो यह जिम्मा ठाकुर ने अपने हाथों में ले लिया था निज हस्ते तुलते बाध्य होन अपने हाथों में यह जिम्मा लेने को ठाकुर मजबूर हुए थे एक बार मां जखन देश जाते छिले तोख ठाकुर बलिया देन एक बार मां जब देश में जा रही थी अर्थात कामर पुकुर जयराम बाटी जा रही थी दक्षिणेश्वर से तब ठाकुर ने कह दिया था देखिए शिक्षा की कैसे शुरुआत होती है ठाकुर ने क्या कहा पाड़ लोक देर संगे भाव राखे यह जो अपने आसपास में जो पड़ोसी लोग जो रहते हैं उनके साथ में सहृदय व्यवहार करना है अशोक करले काव के दिए खबर नेवे यदि कोई बीमार है आपको पता चलता है तो खुद जाकर के उनकी खबर लेनी है या तो फिर किसी के माध्यम से उनकी खबर लेवानी है कि हां आप बीमार है सुनने में आया तो भी आप कैसे हैं श्री मां के तीनी शेखा तेन और साथ-साथ में ही वह सिखाते कर्म करते होए में लो केर बसे थकते नहीं कर्म करना होगा कर्म करना पड़ेगा स्त्रियों को बैठ कर के चलेगा नहीं स्त्रियों को सिर्फ बैठे नहीं रहना है कर्म करते रहना है बसे थाक ले नाना रकम बाजे चिंता कु चिंता सब आश वैसे ही बिना काम के बैठे रहने से मन में बिना मतलब की चिंताएं प्रवेश कर जाएगी बड़ी चिंताओं से कु चिंताओं से मन भर जाएगा इसलिए बिना काम के बैठे नहीं रहना इंग्लिश में कहते हैं ना एमटी माइंड इज द फैक्ट्री ऑफ डेविल द डेविल्स फैक्ट्री उसके जैसा है जब खाली दिमाग होता है वह शैतान का घर होता है तो दिमाग को खाली रख कर के हाथ पैर को बिना किसी काम करवाने के बैठे रहने से अपना तो शरीर और मन दोनों खराब होता है साथ में हम दूसरों को भी कितना कष्ट देते हैं यह जो मां की भतीज आं थी ना नलिनी माकू और राधू इन तीनों के साथ में ऐसा ही थोड़ा बहुत प्रॉब्लम था ऐसा नहीं था वे लोग काम नहीं करते थे काम तो करते थे किंतु फिर यह बिना काम के बैठ कर के गप लगाना एक जो एक हैबिट हो जाता है ना कभी-कभी कि दोप हुई है काम धाम छोड़ो या तो फिर सोते रहो या तो फिर 10 लोग बैठ कर के गप लगाओ बाजे के जितना भी लोगों की निंदा यह जो भी करना है उस समय यह सब चलता है बहुत जगह पर ऐसा देखने में आता है थोड़ा सा भी दोपहर है शाम है चार-पांच लोग इकट्ठा होकर के लोगों की निंदा करना शुरू कर देते हैं तो यह ठाकुर कहते हैं कि बिना मतलब बैठ कर के लोगों की निंदा करना या तो फिर दूसरों के दोष देखना यह सब कभी नहीं करना है हमेशा कुछ ना कुछ कर्म करते रहना है मां ने कहा था ना कि मेरा भी एक समय ऐसा स्वभाव हो गया था कि मैं भी लोगों के दोष देखना शुरू कर दिया था मैंने भी तो मा फिर मां कहती है फिर मैं चांदा मामा अर्थात कि यह मून ये चांद के सामने देख कर के मैं प्रार्थना करती थी कि तुम्हारी रोशनी यह शीतल है जितनी पवित्र है शुभ्र है वैसा ही शुभ्र मेरा मन कर दो तो यह चांद की तरह चांद की रोशनी की तरह शुभ्र शीतल मां का मन हो गया था तो यह कभी भी बैठ कर के गप लगाना दूसरों की निंदा करना ऐसा कभी नहीं करना है एक दिनर कथा श्री मा बोलिया छ एक दिन की बात मां कहती है ठाकुर कतक गुली पाठ ने अमाई दिए बोलेन ठाकुर ने कुछ यह झूठ होता है ना झूठ ये जो उससे वो जो सब चीजें बनती है तो झूठ लाकर के ठाकुर ने मां को दिया और क्या कहा एक गोली दिए आमाई सीके पाके दाओ आमी संदेश राख लुची राखब छले देर जन्नो यह झूठ में से मेरे लिए एक झोला बना दो यह जो पता है ना यह जो चूहे है या तो फिर ये प ये जो है एंट है ये यह सब आ जाता है मिठाई यदि आप किसी चीज में रखेंगे और मिठाई का पात्र आप जमीन के ऊपर में या टेबल के ऊपर में रखेंगे तो चीटी आ जाएगी चीटी आ जाएगा आ जाएगी या तो चूहा आ जाएगा तो फिर क्या करते हैं एक झोला जैसा होता है उसमें यह हांडी को रखा जाता है फिर यह हांडी को ऊपर में टांग दिया जाता है छत के ऊपर में झोले के माध्यम से फिर उसमें सब मिठाई रखी जाती है तो छत से टांगा हुआ है तो उसमें ना ही चीटी आएगी ना ही चूहा आएगा ना ही और कोई जाकर के उसमें पशु पक्षी प्राणी उसमें मुंह मारेगा तो ऐसे ही यह झूठ होता है ये झूठ में से ठाकुर ने कहा कि ऐसा एक झोला जैसा बना दो जिसके भीतर में मैं यह संदेश है मिठाई है यह सब रखूंगा एक हांडी में और ंडी य झोले में रखूंगा झोला छत के ऊपर टांगू और यह जितने भी यह सब बच्चे आते हैं यह नरेण है राखल है बाबूराम है लाटू है इन सबके लिए लुची और संदेश लुची अर्थात की पूरी और संदेश अर्थात की एक तरह की बंगाली मिठाई यह हांडी में रख कर के छत के ऊपर में से सीलिंग के ऊपर में से मैं झुला कर के रखूंगा तुम मेरे लिए झोली जैसा बना दो तो मां क्या कहती है आमी सीके पाख दिल और फैसो गली दिए थान बालि करलो मैंने वो जो झूट दिया था उसका इस तरह से झोला जैसा बना दिया ठाकुर के लिए और दूसरा थोड़ा सा बचा था उसमें से कापड़ी करके उसके ऊपर में मैंने अपना एक सोने के लिए जिसको कहते हैं पिलो ये पिलो मैंने अपने लिए तैयार किया सोने के लिए चोटे ऊपर पट पटे मादुर पा तुम आर से फेशर बालिस माथा दी तुम यह जमीन के ऊपर में यह चटाई बिछा करके उसके ऊपर में मैं सोती और सर के नीचे में यही य बालिस जो था यह जो पिलो था झूठ का बनाया हुआ अपने सर के नीचे में रखती और में सोती तखन ताते सुए जेमन घूम होतो एमन खन ए शबे अर्थात खाट बिछाना सुयो तमनी घुमाई कोनो तफा बोध होए ना मा उस समय वहां पर नबत के अल्प परिसर जगह में जहां पर कितना सब चीजें रखी जाती थी ठाकुर के लिए खाने की व्यवस्था था जब कलकाता से कोई स्त्री भक्त आए हैं व भी इतनी सी जगह में पाच बाय 5 फुट बाय 5 फुट के आसपास का होगा वो वहां का नौबत यदि फोटोग्राफ्स में देखा होगा या यदि दक्षिणेश्वर का दर्शन किया होगा तो इतनी छोटी सी जगह में मां जमीन पर सोती थी कारपेट प कारपेट लगा कर के यह जो झूठ का जो पिलो है अपने सर के नीचे में देक के और फिर मां क्या कहती है हमको लगेगा अरे इतना कष्ट का दिन है तो मां इन दिनों की बात है जबकि यह जो उद्बोधन था जहां पर मां के लिए सुंदर बिछाने वगैरह की व्यवस्था मां के जो त्यागी संतान है उन्होंने की थी ठाकुर के स्वामी जी के अमेरिका से वापस आने के बाद में रामकृष्ण मिशन की स्थापना होने के बाद में अपने पास में जब पैसों वगैरह की पैसों की सुविधा हुई डोनेशन विदेश से आना शुरू हो गया मां के लिए सब सुंदर व्यवस्था की गई है तो मां उस समय कहती है यह जो खाट है बिछाना है उसको दिखा कर के कि इस सबके ऊपर में सो कर के मुझे जितना सुकून मिलता है उतना ही सुकून वो नबत की जमीन पर सो कर के यह झूठ का बनाया हुआ जो पिलो है अपने सर प सर के नीचे में रख कर के जितना सुकून से मैं सोती थी उतना ही सुकून मुझे आज मिल रहा है या तो फिर आज जितना सुकून मिलता है उतना ही उन दिनों मिलता था कौनो तफावत बोध ना होए ना मां कोई भी तफावत मुझे समझ में नहीं आता किसी भी तरह का डिफरेंस मुझे नहीं लगता कि किसी भी तरह का डिफरेंस है इन दोनों में तो देखिए ये मां की सरलता और तपस्या दोनों का यह प्रभाव है कि इतने अच्छे खाट और बिछाने के ऊपर में सो कर के भी मां देखती है कि उस समय ठाकुर के साथ में रहकर के जितने सुंदर वो मने कष्ट सीधा सादा सरल जीवन वो जी कर के जो संतोष मिलता था उतना ही संतोष आज भी मिल रहा है आज अर्थात कौन सा दिन ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी के अमेरिका से लौटने के बाद में रामकृष्ण मिशन की स्थापना के बाद में जब मां के संतान पूरे विदेश में भारतवर्ष में फैले हुए हैं अमेरिका से यह सारा ओली बुल निवेदिता जोसेफाइन मैक्लाउड यह सब आकर के मां को प्रणाम करते हैं भारत में कहां-कहां से लोग मां के पास में आते हैं य आयंगर बोलकर के एक साउथ इंडिया बेंगलोर के आसपास का एक डिवटी था वो आकर के मां को कहता है मां आपको खाने के पीने के पानी की असुविधा है जयराम बाटी में तो मैं आपके लिए यहां पे कुआ बना देता हूं देखिए कुआ बनाना गांव में कितना खर्च का यह सब है तो डिवोटा आ करर के मां को कहता है एक उस उस समय ऐसा हुआ कि एक दरोगा अर्थात कि ये पुलिस वाले जो होते थे प्रतिदिन जयराम बाटी आकर के कुछ ना कुछ खबर लेकर जाएंगे उस समय तो था ना ये क्रांतिकारियों का डर था पुलिस वाले सभी पे नजर रखते थे गुप्तचर लोग जो सब है वे लोग चारों ओर फैले हुए थे बेलूरमठ मां का घर यह सब पे नजर रखी जाती थी कि कहीं एक कोई क्रांतिकारी यहां पे ना हो तो इस तरह से एक दरोगा आने वाला था एक इंस्पेक्टर उसी समय मां का एक डिवोटा एक वकील वहां पे पास के किसी शहर से आ गया तो यह दरोगा ने इनको देखा तो एकदम आश्चर्य चकित हो गया कहां ये छोटा सा गांव ये कहां बड़े शहर का सम्मानित जो ये धनी ये वकील तो अभी ये ये जो पुलिस वाले गांव में जाते हैं ना तो बड़ा ही ये अपना घमंड दिखाते हैं लोगों को इस तरह से ट्रीट करते हैं जैसे कि उनका कोई ह्यूमन राइट ही नहीं है किंतु अभी इतना बड़ा शहर का इतना बड़ा वकील उसके सामने वो पुलिस वालों को भी डर करके चलना पड़ेगा कहीं केस कर देगा तो हम फंस जाएंगे तो वो बेचारा सीधा होकर के इस अपने वकील के साथ में बात करता है देखिए ऐसे लोग सब मां के पास में आते थे और मां कहती है कि वो रामई महाराज रामई महाराज कहते हैं कि ये सब बड़े-बड़े शहर के बड़े-बड़े विद्वान लोग यह कोई स्कूल का प्रोफ स्कूल का टीचर है कोई कॉलेज का प्रोफेसर है कोई वकील है ना कि कोई डॉक्टर है यह लोग सब मां को आकर के प्रणाम करके विनम्रता से प्रश्न करते हैं कि मां हमारी यह आध्यात्मिक समस्या है आप उसका कुछ निकाल कीजिए कुछ यह सांसारिक समस्या है उसका क्या उपाय किया जाए तो महाराज जी जो स्मृति कथा लिखते हैं वह कहते हैं कि यह सब वकील है डॉक्टर है यहां पे आकर के मां को क्यों पूछते हैं यह सब जाओ बेलूर मठ जाओ शरत महाराज है महापुरुष महाराज है जाकर के उनको प्रश्न करो मां के पास में आकर के इतने जटिल प्रश्न करते हैं समझ में नहीं आता कि मां को तो यह सब जटिलता मैंने मां ने कहा फिलोसोफी वेदांत सब पढा है किंतु महाराज जी साथ-साथ में ही लिखते हैं कि यह जो प्रश्न करने वाले थे सब बड़े-बड़े विद्वान लोग गणय मान्य लोग मां के उत्तर प्राप्त करके खुशी खुशी माने हृदय से भर कर के वह संतोष लेकर के वहां से जा रहे हैं और महाराज कहते हैं कि मुझे इतना आश्चर्य हो रहा है माने तो उनको ऐसा क्या कह दिया इतने मने बुद्धिशाली लोगों को शहर के बड़े-बड़े लोगों को कि ये लोगों का हृदय तृप्त हो जा रहा है तो ये उस समय की उस दिनों की बात है मां कहती है कि इतना सब है मेरे पास में आज इसमें सो कर के इसमें रह कर के मुझे जितना संतोष मिलता है उतना ही संतोष उस समय ठाकुर जब थे मैं दक्षिणेश्वर में नबत में रहती थी उसी समय इतना ही संतोष मिलता था कोनो तफा बोध होए ना मां किसी भी तरह का का डिफरेंस मुझे समझ में नहीं आता मुझे महसूस नहीं होता तो यह थी सरलता की प्रतिमूर्ति अपनी आगे महाराज जी लिखते हैं स्वभाव गुण एवन एवं श्री रामकृष्ण शिखा प्रभाव श्री मा सत्त सतई जोखन जेमोन खन ते मोन जेखाने जेमोन सेखाने ते मोन जहा के जेमोन तहा के ते मन उक्ति जीवन प्रति कातो प्रति फलित करिया ज श्री श्री ठाकुरो एक दिन श विश् भगने हदय के बोलिया चलन रे रिदु हमार बड़ो भावना लो ज पाड़ा ग में के जाने खाने पताई सचे जावे और लोके निंद करब तखन लज्जा पते होवे ता व किंतु एमन ज कखन की को के टेर पाई ना बायरे जते आयो कखन देख ना पूरा पैराग्राफ के जितना बड़ा सेंटेंस है ठाकुर की शिक्षा के प्रभाव से माने अपने जीवन को इतना सुंदर रूप से गठित किया था कि जिस परिस्थिति में रहते हैं तब उस परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करना है जिस व्यक्ति के साथ में हम व्यवहार कर रहे हैं तो व्यक्ति को देख कर के व्यक्ति के अनुसार व्यवहार करना है जिस जगह पर रहते हैं उस जगह का जिस तरह का नियम है उस तरह जगह का जिस तरह का कन्वेंशन है उसी तरह उस जगह पर व्यवहार करना है जखन जेमोन तखन ते मन जिस परिस्थिति में जब है उस परिस्थिति के अर्थात व अनुसार वर्तन करना है जेखाने जे मोन शेखाने ते मोन जिस जगह पर हम है उस जगह के अनुसार वर्तन करना है जहा के जेमोन तहा के ते मोन जिस व्यक्ति के साथ में व्यवहार कर रहे हैं उस व्यक्ति को देख कर के व्यक्ति के साथ में व्यवहार करना है यह जो बात थी उसको इतना यथार्थ रूप से मां ने अपने जीवन में पालन किया था कि मां जैसे कि रह कर के भी किसी की नजर में नहीं आती उस समय की जो स्त्रियों की थी अ स्त्रियों के बारे में जो सब प्रथाएं थी कि घर के बाहर नहीं निकलना है पर्दा प्रथा जिसको कहते हैं पुरुषों के साथ में बात नहीं करनी है वोह जो एक ऑर्थोडॉक्सी चली आ रही थी किसी भी अपने हिंदू धर्म को इसके लिए क्रिटिसाइज करना उचित नहीं क्योंकि स्वामी जी ने ही कहा था कि भारत में जो मुसलमान आक्रमण प्रारंभ हुए उस समय स्त्रियों की रक्षा करने के लिए ये सब पर्दा प्रथाओं का डेवलपमेंट हुआ था स्त्रियों की रक्षा करने के लिए तो अभी वह सब ठाकुर और मां से तोड़ने के लिए तो नहीं आए ऐसा तो नहीं है कि नया बनाना है तो पुराना तोड़ दो पुरानी जितनी भी प्रथाएं हैं सब तोड़ दो नई प्रथाएं चालू करो ऐसा नहीं जो है व पुराने समय के लिए थी आज नए समय के अनुसार नया करना है किंतु पुरानी प्रथाओं के भीतर में रह कर के सक्सेस होने के बाद में यह नया चालू करना है वैसे मां ने खुद भी कुछ भी पढ़ाई लिखाई नहीं की ज्यादा किंतु जब निवेदिता ने कोलकात्ता में स्त्रियों के लिए लड़कियों के लिए स्कूल चालू की तब मां सभी महिला भक्तों को कहती थी कि अपनी बच्ची को निवेदिता स्कूल में पढ़ाई के लिए भेजिए तो यह मां मॉडर्निटी और यह ट्रेडीशन इन दोनों का बड़ा ही अद्भुत संगम मां के जीवन में देखने को मिलता है तो मां इस तरह से रहती थी नौबत में दक्षिणेश्वर काली मंदिर में कि किसी की नजर के सामने नहीं आती थी तो ठाकुर एक दिन बड़े ही आश्चर्य चकित होकर के हृदय को कहते हैं कि अरे हृदय यह कहां छोटे से गांव की यह लड़की है मां शारदा और यहां पर बड़े शहर में रहने को आई है यहां के नीति नियम यदि उसको नहीं पता होंगे गांव में जिस तरह से वह स्वतंत्र सा स्वतंत्रता से रहने को वह अभ्यस्त थी उस तरह की स्वतंत्रता से वह यहां पर रहेगी कभी भी जब भी इच्छा घर नबत के बाहर में निकल आएगी शौच जाना है तो बाहर में जाना है इंडोर प्लंबिंग तो उस समय था नहीं तो कहां व नदी के किनारे बैठ करके शौच जाएगी लोग जदी देखेंगे तो लोग निंदा करेंगे कि अरे देखिए ठाकुर की जो पत्नी है वह इस तरह से स्वच्छंद व्यवहार करती है तो यह हमको यदि यह सुनना पड़ेगा पड़ता तो हमको बड़ा ही कष्ट होता कितनी लज्जा होती किंतु देखिए कि मां कब नौबत से बाहर निकलती है कब स्नान करती है कब शोच करती है कब वस्त्र धोती है व हमको कुछ पता नहीं चलता तो इस तरह इतना सुंदर रूप से तुम देखो कि मां यहां पर रह रही है अभी देख देखिए कि ठाकुर तो ई कोथा प्रशंसा छोले बोली लेन किंतु सोना अवधि श्री मा ई भावना पड़ी लेन ठाकुर ने तो यह बात प्रशंसा करके ही की थी किंतु मां को पता चल गया कि ठाकुर ने ऐसा कहा है तब से मां चिंता में पड़ गई क्यों ओ मां तिनी तो जा चान ताई माओ के देखिए देन एक बार बायरे गले और चोखे पड़ते होवे देख मा ने सोचा कि मा ठाकुर जो देखना चाहते हैं मां जगदंबा उनको दिखा देती है अर्थात कि जब भी वो ठाकुर एक बार बोल दिया है कि मैंने तो मां शारदा को कभी नबत से बाहर निकलते नहीं देखा इसका अर्थ यह हुआ कि ठाकुर ने एक बार जब यह बोल दिया है तो मां जगदंबा उनको सही सही यह दिखा देगी कि मैं नबत से बाहर निकल रही हूं और ठाकुर वहीं पर खड़े हैं तो यह तो बड़ी ही लज्जा में पड़ने वाली बात होगी बड़ी ही मेरे लिए लज्जा की बात होगी ताई तिनी व्याकुल होईया जगदंबा के डाकी ते लागी लेन की बोले मां आर लज्जा रखा करो इसीलिए मां शारदा होकर ग जगदंबा को पुकारने लगी यह कह के कि मां मेरी लज्जा की रक्षा करना मेरी लज्जा जो है उसको तुम बचाए रखना जगदंबा शी प्रार्थना सुनिया ताके एमन संत पने रखते दीर्घ काल दक्षिणेश्वर बास कोरि आओ तिनी कहारो दृष्टि पथे पति तो हो नाई और मां की यह बात सुनकर के मां जगदंबा उनको इस तरह से बचा करके रखती इस तरह से उनको सेफ रखती कि जब भी मां अब नबत से बाहर आएगी किसी की दृष्टि के सामने वह नहीं आएगी ताई मंदिर खजांची एक दिन तहर संबंध जिज्ञास तो होया बोलिया लेन तिनी आन सुने छ किंतु कखन देखते पाई नहीं इसलिए मंदिर के खजांची अर्थात की मंदिर का जो एडमिनिस्ट्रेटर उसने विस्मय उसने एक बार कहा था मां के बारे में कि मैंने सुना है कि मां यहां पर रहती है किंतु मैंने कभी मां को देखा नहीं तो आज जहित अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु यह जो मशीन लेवल डेफिनेशन क्या है आईटी में कहते हैं वो हायर लेवल डेफिनेशन होती है एक मशीन लेवल डेफिनेशन होती है ब्रेन लेवल प कॉन्शियस लेवल पर कैसे काम करता है यह देखिए योग का जो दूसरा ही सूत्र है प्रथम अथ योगा अशास लेट अस स्टार्ट द डिसिप्लिन कोल्ड योगा सेकंड सूत्र इज योगस चित्तवृत्ति निरोध योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध तो एक्चुअली य चित्त की वृत्ति क्या है चित्त की वृत्ति अर्थात कि मेरा जो सही स्वरूप है प्योर अवेयरनेस यह प्योर अवेयरनेस एक सब्जेक्ट है और यह जितने भी बाकी जो सब विषय है मन के भीतर में जो उदित होते हैं कोई व्यक्ति का रिफ्लेक्शन मेरे माइंड में पड़ता है मैं उसके साथ में मन में ही मन में झगड़ा करता हूं तो क्या होता है यह जो मेरी जो प्योर अवेयरनेस है और वह जो सामने वाला व्यक्ति का जो एक रिफ्लेक्शन मेरे माइंड में आता है उस उसके साथ में यह मिक्स अप हो जाती है और मिक्स अप होकर के यह सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट मिक्स होकर के इन दोनों के बीच में कर्म होता है जो इंटरेक्शन होता है इसको हम कहते हैं कर्म या तो फिर चित्तवृत्ति तो यह कर्म को काट देना यह चित्तवृत्ति को काट देना यह जो रिफ्लेक्शन है वह समझना कि यह ऑब्जेक्ट है यह मैं नहीं हूं इट जज थिंग टू डू विथ मी आई एम प्योर अवेयरनेस तो यह प्योर अवेयरनेस को विड्रॉ कर देना यह मेंटल ऑब्जेक्ट है दैट इज कॉल्ड चित्त शुद्धि एक्चुअली कि किसी भी तरह की प्योरिटी है जिस तरह से यम और नियम बताए गए हैं सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष ईश्वर प्रधान यह जो सब 10 यम नियम बताए गए हैं तो यह 10 यम नियमों का बेसिक मशीन लेवल डेफिनेशन यही है कि ये इंटरेक्शन तभी प्रकट होंगे कि जब का अपना प्योर अवेयरनेस है वह सब किसी बाह्य ऑब्जेक्ट को रिफ्लेक्शन जो माइंड में आता है उसके साथ में एंटेंगल हो जाता है सत्या अनुत मिथुन कृतम भवती इति सत्य और अनत जो सत्य है और मिथ्या है इन दोनों के बीच में मिक्स अप हो जाता है तब यह कर्म खड़ा होता है या चित्त की वृत्ति खड़ी होती है इसको काटना य प्योर अवेयरनेस में फिर से स्थित होना ट इज कॉल्ड शुद्धि मन की शुद्धि दो तरह के ऑब्जेक्ट होते हैं एक ऑब्जेक्ट यानी कि इस तरह का ऑब्जेक्ट जो हमारे मन में स्ट्रेस प्रकट करता है दूसरा ऑब्जेक्ट है अपने मन में प्रेम प्रकट करता है जद मेरा किसी के साथ में अच्छा नहीं पट रहा उसके बारे में सोचूंगा मैं टेंशन में आ जाऊंगा मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा और यदि जिसको मैं प्रेम करता हूं उसके बारे में सोचूंगा तो मन में बड़ा ही सुख और शांति प्राप्त होगा तो यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि काम और क्रोध तो जाने वाला नहीं है उसको आपको बस डायरेक्शन चेंज कर दे ना है तो ये डायरेक्शन चेंज करने वाली बात है कि ऑब्जेक्ट और सब्जेक्ट का जो यह जो कॉमिनेशन है जन्म जन्मांतर से चल रहा है इजली तो जाएगा नहीं तो ऑब्जेक्ट को चेंज कर दो एक स्वामी जी की बड़ी सुंदर छोटी सी कहानी है पहले भी एक बार कही है मैंने वो न्यूयॉर्क में एक डॉक्टर के वहां पर बैठे थे डॉक्टर उनका पल्स ले रहा है और वह लियोन लैंडसबर्ग था ना स्वामी जी ने उसको संन्यास देकर कृपानंद नाम दिया था फिर स्वामी जी पहली बार अमेरिका से भारत लौट गए तो इसने क्या कि न्यूजपेपर में इतना सब कचरा उसने छापा स्वामी जी के विरोध में पता नहीं स्वामी जी के साथ में क्या उसका प्रॉब्लम हो गया था तो सेकंड टाइम स्वामी जी अमेरिका आए थे तो जो लियोन लैंड्स पर उनसे दूरी रहता था योगायोग ऐसा हुआ कि स्वामी जी डॉक्टर के वहां बैठे हैं डॉक्टर उनका पल्स ले रहा है और उसी समय वो लेंस बर्ग ने वो कमरे में प्रवेश किया तो स्वामी जी का पल्स एकदम फटाक करके उछल उठा और डॉक्टर भी जोर से हस पड़ा पकड़ लिया आपको [हंसी] यि स्वामी जी के साथ में ऐसा होगा तो हम किस खेत की मूली है तो यह स्मृति कथा क्या है अभी दुश्मन के बारे में सोचे बेटर है मां के बारे में सोचे तो कुछ देखिए यह जो कहानी के भीतर में ही इस पहले प्रश्न का उत्तर है कि जो लड़की आई थी वह पहली बार मां को मिल रही है तो मां के घर में उसने वह प्रेम प्राप्त किया उसकी खुद की मां के घर में शायद उसको नहीं मिला होगा या तो फिर उसकी खुद की मां के घर में मिलता तो खुद की मां और यह मां शारदा डिफरेंस क्या है मां के साथ में पूरे 20 30 40 जितना भी साल का उसका रिलेशन है उसकी गर्भ से उसने जन्म ग्रहण किया है जबकि मां शारदा को बिल्कुल पहली बार मिल रही है सो दिस इज द की डिफरेंस कि आप जद अपने मां को मिलेंगे तो वही प्रेम मिलेगा कोई प्रश्न नहीं है किंतु मां शारदा को आप पहली बार मिल रहे हैं आपको वही प्रेम वहां पर मिल लेगा अभी मान लीजिए कि आप दूसरे की किसी मां को मिलते हैं तो इतना प्रेम वहां पर नहीं मिलेगा मां अपने बच्चे को ही सबसे ज्यादा प्रेम करेगी उसका प्रेम का 90 पर अपने बच्चे के लिए रिजर्व रहेगा 10 पर से बाकी दूसरों के बच्चों के साथ में वह व्यवहार करेगी जबकि मां 100% प्रेम सबको देती है व्हाई बिकॉज मदर जज इफाइन अमाउंट ऑफ प्रे प्रेम ऐसा नहीं है कि इ लिमिटेड टू 100% इ इंफाइटिंग लव तो सभी को 100% दे पाती है दैट इज द की डिफरेंस और दूसरा कि हाउ टू ट्रांसफॉर्म फैमिली मेरा जो खुद का जो अनुभव मैं बताता हूं छोटा सा यह पहले भी हमने इसको डिस्कस किया था कि काफी फैमिली होते हैं अपने भक्त के देखिए कि वहां पर रात को कथामृत पढ़ा जाता है अब घर में कथामृत पढ़ेंगे ना तो यह शब्द जो है उसके जो वाइब्रेशन फैलेंग आई थिंक पूरे फैमिली को उसको क्या है कि फैमिली को ट्रांसफॉर्म करेंगे क्योंकि घर गृहस्थ को यदि अब घर को ट्रांसफॉर्म करना है तो एक व्यक्ति साधना करने से नहीं होगा सभी को साधना करनी पड़ेगी अभी प्रश्न है कि सभी साधना करनी है बोलकर के सभी लोग रेडी भी नहीं होते साधना करने के लिए जो यह चाहिए अनुकूल परिस्थिति वह भी शायद सबको प्राप्त नहीं होती सो देयर आर सम लिमिटेशंस किंतु पूरे परिवार को उन्नत करना है इजस्ट वे क्या है कि एक तो घर में जद रेगुलर पूजा आरती होती है जो छोटा सा श्राइन बना करके वो घंटी लगा कर के हम लोग करते ना व घी का आरती घी के दिए का आरती वह बड़ा ही सुंदर वाइब्रेशन व स्प्रेड करती है यह तो एक है प्रति दिन जद नियमित हो पाए घर का एक फैमिली कोई ना कोई करे रोटेशन से तो सभी को मौका मिले तो यह एक है धूप दीप वह जो वगैरह पुष्प वगैरह जद घर में आते हैं तो पूरा ट्रांसफॉर्म हो जाता है घर य एक चीज दूसरा की कथामृत का पाठ यह दोनों जद नियमित हो तो सबको बेनिफिट होगा यदि किसी के पास में यंग लड़ ड़ हैं उनके पास में हो सकता है समय है गृहिणी के पास में इतना समय नहीं है वृद्ध है उनके पास में समय है तो फिर शारीरिक सब अनु कुलता नहीं है प्रतिकूलता हैं तो यह दोनों करने से किंतु पूरे घर में वाइब्रेशन फैलेंग फिर अब इंडिविजुअल लेवल पर तो जो करना है कीजिए ही मने आप इंडिविजुअल लेवल पर तो कितना ही आगे जा सकते हैं किंतु यदि फैमिली लेवल पर करना है दिस टू आर द इजस्ट एक्चुअली डिजायरेबल थॉट और अनडिजायरेबल थॉट का जो डिफरेंस है ना इट इज नॉट के वि विचार वाणी और वर्तन में ट्रांसफॉर्म हो ट इज नॉट एक्चुअली द क्राइटेरिया दैट दिस इज अ डिजायरेबल थॉट एंड दिस इज एन अनडिजायरेबल थॉट दैट थॉट शुड बी एबल टू कन्वर्ट और ट्रांसफॉर्म इनटू स्पीच और एक्शन रदर देन द थॉट बाइंड्स अस इनटू कर्मा और नॉट दैट इज दैट डिजायरेबिलिटी क्राइटेरिया वेदर यू थिंक समथिंग एंड इट मे इवेंट बी क ड इनटू योर एक्शन और इट मे नॉट गेट कन्वर्टेड दैट डज नॉट मैटर बट वेदर द थॉट एक्चुअली बाइंड्स अस इन टू दैट कर्मा और नॉट दैट इज द क्राइटेरिया एंड हाउ टू रिड्यूस दैट कर्मा व्हिच कीप्स अस बाइंडिंग इन टू दिस माया ऑफ संसारा इनटू दिस साइकल ऑफ संसार जन्म मृत्यु जरा व्याधि डेथ बर्थ ओल्ड एज एंड डिसीज इन दिस विशय साइकल दैट हाउ टू रिड्यूस दैट थॉट व्हिच स्टॉप्स अस बीइंग अ स्लेव और बीइंग अ प्रिजनर ऑफ दिस विशय साइकल दैट फॉर दैट अ यू हैव इजस्ट वे एज आई डिस्कस अर्लिया इजस्ट वे इज टू कीप ऑन रीडिंग दिस इंस्पायरिंग इंसिडेंट फ्रॉम द लाइव्स ऑफ ठाकुर माइंड स्वामी जी वंस वी थिंक अबाउट इट आवर माइंड विल बी फुल ट स्वामी ठाकुर सेड टू मदर दैट वीमेन शुड नॉट सीट डूइंग नथिंग दिस डूइंग नथिंग एम्टी माइंड इज अ फैक्ट्री ऑफ डेविल दिस ऑलवेज वी हैव टू रिमेंबर सो रदर देन डूइंग नथिंग और व्हेन एवर वी हैव टाइम लेट अस रीड समथिंग पॉजिटिव दिस रीडिंग ऑफ शास्त्रास रीडिंग ऑफ ठाकुर मा एंड स्वामी जी दैट इज द इजस्ट वे आउट ऑफकोर्स देर आर मेनी अदर साधनास एज वी गो एडवांस फर्द एंड फर्द मेडिटेशन इज देयर ज्ञान योगा इज देयर कर्म योगा ऑल दिस फोर योगा आर देयर बेसिकली ऑल फोर योगा हैव ओनली वन फंक्शन टू स्टॉप अस गेटिंग माइंड गेटिंग बाउंड इनटू दिस माया दिस संसार ऑफ अविद्या दैट इज दैट प्राइमरी फंक्शन ऑफ दिस फोर योगा बट इजस्ट वे आउट इज टू रीड ऑल दिस इंसिडेंट ऑफ द लाइफ ऑफ ठाकुर म स्वामी जी एंड टू थिंक ओवर इट द स्मल स्मल इंसिडेंट आर देयर रीड देम एंड थिंक अबाउट इट इट विल इमीडिएट गिव यू दिस विटामिन बूस्ट दिस दिस एनर्जी बूस्ट दिस एनर्जी ड्रिंक्स आर देयर ग्लूकोन डी एटस यू थिंक ल दिस थॉट्स एंड इमीडिएट ल गेट एनर्जी बूस्ट योर माइंड विल स्टॉप वांडरिंग सो योर माइंड विल स्टॉप वंडरिंग ट्स ल द माइंड वि स्टॉप वांडरिंग एंड इट विल सेटल डाउन सम वेयर