प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण जो श्री रामकृष्ण देव मां को आध्यात्मिक कल्याण का जिम्मा मां सुप्रत करना चाहते थे इस जगत का उसके बारे में किस तरह से ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं। इसके कुछ उदाहरण भी देखे ठाकुर और मां का वार्तालाप भी देखा। इसी इसी थ्रेड
ठाकुर माँ को जगत कल्याण का उत्तरदायित्व स्वीकार करने को अनुरोध कर रहे है
में इसी सिलसिले में ठाकुर एक गीत गा करके मां को कभी-कभी सुनाते थे। क्या कहते थे? के किस तरह से गीत गाते थे ठाकुर यह श्री श्री रामकृष्ण पंथी से गंभीरानंद जी महाराज इसको कोट कर रहे हैं। क्या कहते थे ठाकुर ऐसे पड़े छ जे दाए से दाए बलबो का यह दाय अर्थात की जवाबदारी जिम्मा ऐसे पड़े छी जे दाए जो जिम्मा मेरे सर पर आ गया है शे दाए बोलबो का उस जिम्मे के बारे में मैं किसको बताऊं जार दाए से अपनी जाने पर की जाने परेर दाय जिसका जो जिम्मा है वही वह समझ सकता है दूसरों का जिम्मा फिर भला कौन समझ सकता है? अर्थात कि क्या है? जगत कल्याण का यह जो कार्य है ठाकुर जैसे कि मां को कह रहे हैं कि मेरे सर पर तो आ गया है। मैं तो इसको इसका निर्वाह कर रहा हूं। किंतु फिर तुम क्या समझ नहीं पा रहे हो कि मेरे सर पर यह जिम्मा है। इसको तुमको भी शेयर करना है। तुमको भी इसमें हिस्सा बटाना है। होए विदेशिनी नारी लाजे मुख दिखाते नारी। मैं विदेशिनी नारी होकर के लज्जा से अपना चेहरा नहीं दिखा पा रही हूं। यहां पर क्या कहना चाहते हैं? विदेशिनी नारी अर्थात कि अभी यह यहां पर मैं मेरा खुद का अनुमान करके कह रहा हूं क्योंकि महाराज जी ने अपने से तो इसका ट्रांसलेशन किया नहीं है। मुझे ऐसा लग रहा है कि यह जो हम इस जगत संसार में आए हैं। यह जगत संसार तो इसके साथ में तो हमारा वैसे कोई नाता नहीं है। मैं तो हूं आत्मन अर्थात कि यह जगत तो मेरे लिए बस दो दिन का यह जिम मात्र है। अखाड़ा मात्र है। यहां पर मुझे माया के साथ में कुश्ती करके माया के ऊपर में विजय प्राप्त करके फिर से अपने घर चले जाना है। जैसे कि एक बहू एक बहू अपने पति के घर पर आती है। किंतु उसका मन पड़ा रहता है। जैसे कि अपने पिता के घर में जैसे ठाकुर उदाहरण देते हैं कि एक गांव से एक स्त्री शहर में कार्य करने के लिए आई है। किसी बड़े आदमी के वहां पर धनवान व्यक्ति के वहां पर नौकरानी का कार्य कर रही है। किंतु उसका मन पड़ा है गांव में जहां पर उसका खुद का लड़का रह रहा है। वह जो जिसके घर में वह काम कर रही है उसके लड़के का वह लालनपालन तो कर रही है। उसको मेरा बेटा ऐसा करके पुकार भी तो रही है किंतु उसको यह पता है कि वह शहर में विदेशिनी है। वह सिर्फ यहां पे आई है काम करने के लिए और उसको फिर अपने गांव चले जाना है अपने सही लड़के के पास में और यह जो शेठ है जिसके घर में वह काम कर रही है उसका लड़का तो वहीं पर रहेगा। वो जब यह बेचारी घर जाएगी यह नौकरानी तो वह शायद उसको थोड़ा बहुत रुपया देकर के उससे जान छुड़ा लेंगे। उसके बाद में उसकी कोई खबर भी नहीं रखेंगे। उसका सही घर तो गांव में है। सही लड़का भी गांव में है। यहां पर वह विदेशिनी मात्र है शहर में। तो यहां पर ठाकुर क्या कहते हैं? मैं विदेशिनी नारी होकर के लज्जा से अपना चेहरा नहीं दिखा पा रही हूं। बोलते नारी कोईते नारी नारी होवा एक ही दाय मैं नहीं बोल पा रही हूं नहीं कह पा रही हूं नारी होना यह कितनी बड़ी जवाबदारी है कितना बड़ा जिम्मा है अर्थात कि यह जो नारी होकर के संतान का लालनपालन जिसको करना है वो कितना जिम्मा बड़ा इसके ऊपर में है सर के ऊपर में यह परफेक्ट नहीं है ट्रांसलेशन या तो एक्सप्लेनेशन किंतु मैंने हिंदी में देखा किताब में तो इसका ट्रांसलेशन दिया ही नहीं है। इसलिए मैं अपने हिसाब से इसको करके दे रहा हूं। आभार शंगेशंगे श्री मां के सजाग कोरिया देते। साथ-साथ में ही ठाकुर मां को सजाग कर देते। शुद्ध की आारो ही दाए तुम्हारो दाए। यह क्या सिर्फ मेरा जिम्मा है? तुम्हारा भी जिम्मा है। देखिए यहां पर बेसिकली जो ठाकुर कहना चाहते हैं वह वही है जो कि हमने कल देखा था। परसों भी देखा था। जिस प्रसंग के बारे में ठाकुर मां को कह रहे हैं कि मैंने तो और ऐसा क्या किया है? तुमको तो इससे और कहीं अधिक करना होगा। यदि तुम यह जवाबदारी नहीं लोगी तो फिर और कौन लेगा? देखिए यह जो
कहानी: वीर भक्त ब्रह्मचारी जदुनाथ आंधी-तूफान में माँ सारदा के लिए 108 पद्म-फूल संग्रह करता है
भक्तों की जवाबदारी लेने के बारे में एक सुंदर प्रसंग है। मैंने जब पहली बार इस प्रसंग को पढ़ा था मुझे थोड़ा सा आश्चर्य हुआ था। इसका जो अंत है वह थोड़ा सा करुण है। तो मैंने सोचा कि क्या मां अपने भक्तों के पास में से यह सब भी करवाती है? किंतु देखिए कि यह जन्म जन्मांतर का जो हमारा सफर है उस सफर में कभी-कभी ऐसा होता है कि हम जब इष्ट के पास में या तो गुरु के पास में आ जाते हैं तो जितने भी हमारे कर्म है कर्म के ये जो बोझा है अपने सर पे वह जैसे कि एक ही साथ में वर्कउ हो जाता है और उस समय कष्ट तो हमको बहुत होगा किंतु साथ-साथ में ही मुक्ति भी उस जन्म में मिल जाएगी। तो ऐसी ही एक कहानी जयराम बाटी की है। उस समय राधु का विवाह था। अभी वह वहां पर एक जमींदार के लड़के के साथ में राधु का विवाह ठीक किया है। तो अभी मां के भाइयों की तो परिस्थिति ऐसी कोई अच्छी नहीं है। और वे लोग तो जमींदार थे। तो उस समय की प्रथा के अनुसार यह लेनदेन का व्यवहार जो है वहीवट जो है वो बड़ा ही एक क्या कहेंगे कि डिस्टरबेंस खड़ा करता था। यदि यह कन्या पक्ष है। उन्होंने वर पक्ष की अपेक्षा से कम पैसा दिया या तो फिर यह कम पैसा खर्च किया तो यह वर पक्ष को लगेगा कि यह कन्या जो है वह हमारे समतुल्य नहीं है। कन्या पक्ष वाले को भी वही वह फेमस घटना है कि वह मां शारदा देवी का जब विवाह होकर के ठाकुर के पास में आने वाली थी उस समय ठाकुर की मां चंद्रामणि देवी ने क्या किया उनका तो घर गरीब था तो घर में तो ऐसा कुछ था नहीं शिव का संसार था गहने वगैरह छोटी बहू को कैसे पहनाएंगे और फिर नहीं पहनाएंगे तो कन्या पक्ष वाले सोचेंगे कि अरे अपनी लड़की को वहां पर दे रहे हैं किंतु यह लोग क्या उसकी संभाल में रख पाएंगे कि नहीं? तो यह जो सब सामाजिक द्वंद खड़ा होता है कभी-कभी यह जब गोसिप चलना शुरू होता है, रूमर चल चलना शुरू होता है तो बेटर है कि और फिर क्या है कि विवाह जैसे शुभ प्रसंग में यदि वधू को गहने नहीं पहनाएंगे तो कैसे चलेगा? तो फिर क्या है कि मां चंद्रामणि देवी ने लाहा बाबू जो वहां के जमींदार थे उनसे कुछ गहने मांग करके उधार के लेकर के मां शारदा को यह बच्ची शारदा जो है उसको पहनाए थे। इसके बाद में वह सुंदर गहनों से सज करके मां शारदा जब कामार पुुर आई ठाकुर के पास में उस दिन फिर मां चंद्रामणि देवी ठाकुर को कहते हैं श्री रामकृष्ण देव को कि देखो यह बच्ची तो गहने पहन करके कितनी सुंदर दिख रही है। शारदा सरस्वती स्वयं ठाकुर ने कहा ना कि वह सजना धजना पसंद क्यों करती है? क्योंकि वह शारदा सरस्वती स्वयं है। तो इतनी सुंदर दिख रही है। छोटी सी बहू है। बच्ची सी तो है। अभी छ साल की गहने पहने हुए हैं। तो अभी यह गहने तो वापस भी देने होंगे लाहा बाबू को। किंतु उसके पास में से यह गहने मांगने में मुझे बड़ी ही लज्जा हो रही है। तो ठाकुर ने कहा कि अच्छा ठीक है तुम चिंता मत करो। जब ये जो शारदा जब सो रही होगी तब उसके अंग से श्री अंग से मैं इस तरह से गहने निकाल लूंगा कि उसको पता भी नहीं चलेगा। तो हुआ भी ऐसा मां शारदा जब सोई हुई थी उस समय ठाकुर ने इतने हल्के से वो गहने निकाल लिए वो बच्ची को बेचारी को पता भी नहीं चला। किंतु जैसे ही वह सुबह को उठी अभी क्या है? बोलना तो उसको इतना अच्छे से आता नहीं है। तो अपने शरीर पर वह इशारा करके दिखा रही है मां चंद्रामणि देवी को कि मैंने यह जो गहने पहने थे यहां यहां पे वो सब कहां पे गए। तो यह बात सुनकर के चंद्रामणि देवी की आंखों में आंसू आ गए और कहा कि बिटिया तुम आज तो मेरे पास में ऐसा कुछ है नहीं तुमको पहनाने के लिए। किंतु एक समय ऐसा आएगा जब कि मेरा बेटा रामकृष्ण तुमको दुनिया भर के गहनों से सजाएगा। तो देखिए कि एग्जजेक्टली यही हुआ जब मां की मां शारदा की बच्ची यह राधु का विवाह था। तो अभी देखिए कि वैसे तो मां के भाइयों का संसार वही शिव का संसार जैसे कामार पुकुर में था वही जय राम बाटी में था। किंतु इस समय तो पूरा वर्ल्ड वाइड रामकृष्ण मिशन मां के पीछे में खड़ा है। मां को सहाय करने के लिए तो अभी राधु का विवाह है। तो वहां से कोलकाता से भक्त लोग इतने सारे गहने ले आए थे। वहां पे जय राम भाटी जो शरद महाराज स्वयं वहां पर उपस्थित थे और राधु का विवाह पूरा ठीक-ठाक से हो वह सब देख वो अपने से पर्सनली सुपरवाइज कर रहे थे। तो राधु को जब विवाह के समय ले जाया गया अपने घर पर पति के घर पर इतने सारे उसने सोने के गहने पहने हुए थे सर के ऊपर में एक सोने का मुकुट पहना हुआ था। वो इतना सारा वेट हो गया था सोने के गहने का कि राधु बेचारी ठीक से चल नहीं पा रही है। उस वेट की वजह से सोने के गहनों के यह भार की वजह से राधु चल नहीं पा रही है। इतना सुंदर रूप से यह शरद महाराज ने पूरा विवाह संपन्न किया था। तो देखिए कि एक तरह से चंद्रामणि देवी की जो भविष्यवाणी थी वो यहां पर सही-सही वो समाप्त हुई। यहां पर सही-सही वह प्रतिफलित हुई। अभी किंतु देखिए उस समय विवाह के समय जितने भी साधु ब्रह्मचारी थे उन्होंने इतना कष्ट करके इतना मेहनत करके पूरे विवाह को संपन्न करवाया है कि जब विवाह समाप्त हो गया और जब शाम के समय में शरद महाराज मां के घर का जो वरांडा है वहां पर बैठे हुए थे सब भक्तों के साथ में और हंसी मजाक कर रहे थे एकाएक देखा कि आकाश में से प्रचंड तूफान के साथ में बारिश प्रारंभ हो गई है। काले बादल पूरे आकाश में छा गए जैसे कि पूरे जगत को अंधेरामय बना दिया और फिर भयानक बिजली की वह जो गर्जन तर्जन सुनाई दे रहा है और पानी तो इस तरह से बह रहा है जैसे कि फ्लड आ जाएगा। तो यह भयानक अवस्था प्रकृति का यह तांडव स्वरूप देखकर के रुद्र स्वरूप देखकर के यह सब लोगों को किंतु खुशी यह हुई कि विवाह अपने से समाप्त हो गया है बिना किसी विघ्न के अभी चाहे भले हजार में बारिश आ जाए तांडव नृत्य कर ले प्रकृति कोई चिंता नहीं है तो शांति से सब लोग बैठे थे उस समय मां के वहां पर एक सेवक था उसका नाम था जदुनाथ वो था यह आज का जो बांग्लादेश है। वहां से वो आया था। उस समय तो खैर भारत का ही भाग था। किंतु यह जो उन लोगों की जो लैंग्वेज होती है वैसे तो बंगाली ही होती है किंतु उसके बोलने का ये जो डायलेक्ट होता है वो थोड़ा सा डिफरेंट होता है। जैसे हम सभी को पता है मैं गुजरात की भी बात करूं तो गुजरात में वैसे लैंग्वेज तो एक ही है गुजराती किंतु जितने भी एरियाज में आप जाएंगे आपको हर जगह का अपना एक डायलेक्ट सुनने को मिलेगा। आप दो गुजराती आपस में बात आराम से कर पाएंगे किंतु बोलने का जो ढंग है थोड़ा सा डिफरेंट होगा। हिंदी की कितनी डायलेक्ट्स है वो तो हमको पता है। तो यहां पे भी ये बंगाल उसको कोलकाता में या तो यह जो आज का हमारा जो बंगाल है वहां पे यह जो पूर्व जो बांग्लादेश से जो लोग आते थे उनको ये लोग कहते थे बंगाल। तो यह जो यदुनाथ था वह भी वहां से आया था। उसका जो बंगाली था बोलने का ढंग भी थोड़ा सा अलग था। तो यह शरद महाराज उसको थोड़ा सा मजाक करके कहते हैं। अभी सब लोग शांति से बैठे हुए हैं तो इतना बड़ा जिम्मा समाप्त हो गया है। तो जब भार इतना बड़ा सर के ऊपर में से जाता है तो आदमी किस तरह से रिलैक्स हो जाता है। हंसी मजाक करता है मित्रों के साथ में बैठकर के। यहां पर भी शरद महाराज जैसे कि हंसी मजाक करते-करते इस जदुनाथ को कह रहे हैं कि जो अर्थात कि यह जदुनाथ को सब लोग अभी ये बोलने का किसी का यह नाम है उसको थोड़ा सा शॉर्ट करके पुकारते हैं तो तो जदुनाथ को बोलते थे जोदो अभी ये जोदो अर्थात कि यह वो उस समय के बांग्लादेश की लैंग्वेज में बंगाल उस समय की लैंग्वेज में तो कहते हैं जोदो तुम इस समय यदि इस तूफान में यदि तुम 108 पद्म फूल यदि इकट्ठा करके लाओ मां शारदा के लिए तुम्हारी इष्ट देवी के लिए तो मैं जानू कि तुम्हारी मां के ऊपर में कैसी भक्ति है। अभी जैसे ही शरद महाराज ने कहा यहां पर यह जदुनाथ एक हुंकार लगा के वो जो भयानक बारिश हो रही थी उसमें कूद पड़ा और वहां पर दौड़ना शुरू कर दिया कि कहां से यह पद्म फूल इकट्ठा हो। अभी देखिए कि उसने दिन भर मेहनत किया है। पूरा थक गया है। कहां वह थोड़ा सा विश्राम करेगा तो वह नहीं जैसे ही शरद महाराज ने हंसी मजाक के स्वर में भी भले चाहे कहां हो किंतु है तो यह गुरु का ही तो आदेश और जिसकी आराधना करनी है 108 पद्म फूलों से वह तो है तो उसकी इष्ट देवी शारदा स्वयं तो तो फिर ना इधर देखा ना उधर देखा भयानक बारिश हो रही है तूफान प्रकृति ने जैसे कि रुद्र स्वरूप धारण किया है लगता है जैसे कि आज भगवान शिव कैलाश में तांडव कर रहे हैं और ठीक करके रखा है कि सृष्टि का प्रलय तो आज करके ही रहेंगे। ऐसी भयानक परिस्थिति में आंख बंद करके कूद पड़ा और जा रहा है इधर से उधर यह दिख नहीं रहा है नजर के सामने बारिश की वजह से कि कहां पे क्या जा रहा है। वह हो सकता है कि पानी में बह जाएगा। हो सकता है कि कुछ भी हो जाए उसके साथ में किंतु कोई डर नहीं है। बस 108 पद्म फूल इकट्ठा करके इस बारिश में यदि वह मां को श्री चरण में अर्पण करेगा तो शरद महाराज ने कहा मजाक में यदि तुम इस समय इस बारिश में 108 फूल अर्पण करके ले आओगे सिलेलेक्ट करके मां के श्री चरणों में अर्पण करोगे तब मैं देखूंगा कि तुम्हारी सही-सही भक्ति है। तो अभी यह यदुनाथ जो है जदो जो है वह दौड़ रहा है और यहां पर शरद महाराज तो एकदम आश्चर्यचकित हो गए अवाक हो गए कि यह क्या मैंने तो हंसी मजाक में उसको कहा था इसने तो सीरियसली ले लिया तो वह वहां पर वरांडे में खड़े रह के चिल्ला रहा है अरे जदो वापस आ जाओ वापस आ जाओ मैं तो मजाक कर रहा था क्या तुम इसको इतना सीरियसली ले रहे हो किंतु उस समय शरद महाराज की बात और कौन सुनेगा तो फिर वह तो गया यहां पर शरद महाराज एकदम हंसी मजाक का जो वातावरण था तो वहां पर अभी एकदम गंभीरता छा गई। किसी को किसी ने अंदाज नहीं किया था कि जदुनाथ इस तरह का कुछ कर सकता है पराक्रम तो सब लोग सब लोग एकदम गंभीर होकर के बैठे रहे। यहां पर यह जदुनाथ है। इधर से उधर कहां से भी जाकर के वो अभी देखिए कि सरोवर में पद्म फूल तो निकल उगते हैं सरोवर में। तो सरोवर में प्रवेश करना वह भी इस तांडव रूप प्रकृति के रुद्र स्वरूप में कितना भयानक है। कब वह पानी में बह जाएगा, कब कहां पे पैर फिसल जाएगा, कब कहां पे क्या हो जाएगा कुछ ठीक नहीं है। फिर भी उसकी जो मां के ऊपर श्रद्धा थी, कहां से भी करके उसने 108 पद्म फूल इकट्ठा किए और कितनी देर के बाद में भयानक बारिश में भीगते भीगते वो घर पे वापस आया। जय राम भाटी में और फिर जाकर के मां के पास में गया और कहा कि मां मैं आपके लिए 108 पद्म फूल लाया हूं। अब मां को तो एकदम आश्चर्यचकित ही हो गई इस भयानक बारिश में यह कहां पागल जाकर के 108 पद्म फूल लाया। किंतु फिर मां ने पूरी कहानी सुनी किसी से तो मां भी एकदम गंभीर हो गई। और फिर जदुनाथ को एकदम प्राण के आवेश में आकर के हृदय के अंतः स्थल से उसको आशीर्वाद दिए। यहां पर शरद महाराज पूरा यह मामला देख रहे हैं कि जदुनाथ आया है 108 पद्म फूल लेकर के तो वह मां के पास में जा रहा है। शरद महाराज तो कुछ बोल नहीं रहे हैं। उन्हीं की वजह से तो यह पूरा पराक्रम उसने किया है। तो गंभीर होकर के बैठे हैं। यहां पर जदुनाथ ने मां को प्रणाम किया। पद्म फूल ऑफर कर रहा है। उस समय किंतु शरद महाराज बोलते हैं कि देखो इसका नसीब कितना अच्छा है। अभी बस ठाकुर से यही प्रार्थना कि कहीं इसके साथ में और कोई बीमारी ना लग जाए क्योंकि इस बारिश में पहले तो उसने बेचारे ने दिन भर परिश्रम किया था। शरीर तोड़ परिश्रम किया था। ऊपर में से इस तरह की बारिश में घंटों घंटों भर तक यह जो पद्म फूल खोजते रहना यह तो कोई किसी के भी शरीर को तोड़ देगा। तो यहां पर शरद महाराज गंभीर होकर बैठे हैं। ठाकुर को प्रार्थना कर रहे हैं। मां को प्रार्थना कर रहे हैं कि देखिए इसके साथ में कहीं कुछ हो ना जाए। किंतु आखिर में हुआ वही जिसका डर था। कुछ ही दिनों के बाद में उसको मलेरिया हो गया और मलेरिया ने इतना भयानक स्वरूप धारण किया कि उसको कनखल में अपना सेवाश्रम था वहां पर भेजना पड़ा और वहां पे कनखल सेवाश्रम में कुछ ही दिन के बाद में सज्ञान अर्थात कि वह होश में है। मुंह पे होठों पे श्री मां का नाम है। इस तरह की अवस्था में उसने देह त्याग किया। अभी देखिए कि आप किस तरह से इस पूरी कहानी की व्याख्या करेंगे। यहां पर हम लोग इस संसार में आते हैं। पता नहीं कितने जन्म जन्मांतर के अपने सर के ऊपर में यह सब लेकर के जिम्मा बोझा यह जो कर्म है, संस्कार है उसका कितना बड़ा भार लेकर के हम लोग इस संसार में आते हैं। हमको यहां पर आकर के किस तरह से साधना करें? साधना करने की भी तो हमारे में क्षमता नहीं है। संस्कार ही नहीं है कि हम लोग कोई प्रचंड साधना करके संस्कारों से मुक्ति पाए। तो फिर हमारे लिए एक ही रास्ता खुला बचता है कि जो कोई भी अवतार है जिनके श्री चरणों में हमने अपने जीवन को समर्पित किया है। उन अवतार के लिए अपने इष्ट के लिए अपने गुरु के लिए इस तरह से परिश्रम करें। इस तरह से उनकी सेवा करें कि अपने उस सेवा के माध्यम से ही जैसे कि हमारे सब संस्कार धुल जाए। तो यहां पर भी यह जदुनाथ ने कनखल सेवा आश्रम में मां का नाम लेते लेते शरीर त्याग किया और हमको एकदम पक्का यह पता है इस बात से कि यह उसका आखिरी जन्म था। इसके बाद में उसकी मुक्ति निश्चित है। तो यह जो जिम्मा है इस तरह के कितने अनगित भक्तों का जिसका कि नाम भी आज कोई नहीं पहचानता है। ठाकुर के जो शिष्य थे उनका नाम प्रत्येक का नाम जग जाहिर है। वह 16 डायरेक्ट डिसाइपल और जो भी यह गृहस्थ भक्त थे बलराम बाबू गौर दासी या तो फिर यह योगिन मां या तो फिर यह गिरीश बाबू ना कि यह फिर साधु नाग महाशय ठाकुर के शिष्यों का वो गृहस्थ हो ना कि सन्यासी उनके शिष्यों का नाम आज जग जाहिर है। स्वामी जी के भी जितने भी शिष्य थे वह चाहे अमेरिकन हो, ब्रिटिश हो कि भारतीय हो उनके बारे में भी आज हमारे पास में विस्तृत माहती है। किंतु मां के इस तरह के कितने ही अनजान शिष्य थे जिनका नाम भी आज कोई नहीं ले रहा है। किंतु फिर भी उन्होंने मां को अपना जीवन अर्पण करके इस इसी जन्म में उन्होंने मुक्ति प्राप्त की है। तो ऐसे हजारों हजारों शिष्य ऐसे हजारों हजारों यंग मैन एंड वीमेन कि जिनके जीवन में मां की आशा और मां का आशीर्वाद इसके अलावा और कुछ नहीं है। ऐसे कितने भक्तों का मां ने उन्होंने उन इस संसार यह जो समुद्र है उसमें से पार करवाया है। भवसागर पार करवाया है। तो यह देखिए कि एक छोटी सी कहानी कि जिससे हमको यह पता चलता है कि मां का हमारे ऊपर में जो यह है हमारे ऊपर में करुणा है। इस करुणा के माध्यम से हम लोग इस जगत में इस भवसागर को पार कर लेंगे।
श्रीरामकृष्ण माँ सारदा के शक्ति-विकास की भूमि रचना करते है
गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या लिखते हैं? शुद्ध स्वरूप स्मरण करया बाको द्वारा भार्पण कर कोई ठाकुर निरस्त तो होना ना सिर्फ स्वरूप स्मरण करवा करके या तो फिर वाक्य के द्वारा शब्दों के द्वारा भार अर्पण करके ही ठाकुर निरस्त नहीं होते थे शांत नहीं होते थे तीन भक्तो दिग के मायर चरण उपनित कोरिया तहार शक्ति विकाश भूमि रचना परीतेन वह भक्तों को मां के श्री चरण के पास में ले आकर के उनके शक्ति विकास की भूमि रचना करते अर्थात कि मां के शक्ति विकास का यह जो रंगमंच है वह तैयार कर रहे हैं। देखिए कि यह शक्ति विकास की भूमि रचना करना। ये कितना सुंदर यह शब्द प्रयोग है। वाक्य प्रयोग है। यहां पे महाराज ने किया है। क्योंकि ठाकुर सिर्फ यहां पे क्योंकि हमारे पास में अभी आज हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट है। हम लोग यह कह सकते हैं जिम्मेदारी के साथ में कि ठाकुर ने सिर्फ भक्तों को मां के पास में ही नहीं लाया है। साथ-साथ में ही भक्तों का एक संघ भी रचित किया है। रामकृष्ण संघ रामकृष्ण मिशन की भी रचना की है। इस रचना करके एक भूमि तैयार की है। एक रंगमंच तैयार किया है। एक सिंहासन तैयार किया है। किस लिए? जिससे कि मां का शक्ति विकास हो। अर्थात कि शक्ति का विकास इस अर्थ में नहीं कि मां को आध्यात्मिकता बढ़ानी है। इस जो आध्यात्मिकता ऑलरेडी है मां के भीतर में उसका बाह्य प्रकाश करना है। यह शक्ति विकास अर्थात कि आध्यात्मिकता का प्रदर्शन। तो इसलिए ठाकुर सिर्फ मां को यह बात स्मरण नहीं करवा देते थे कि तुम्हारा सही स्वरूप क्या है या तो फिर सिर्फ यह नहीं करते थे कि हां तुमको यह पूरे जगत का जिम्मा लेना है किंतु साथ-साथ में ही रामकृष्ण संघ की रचना करके मां के लिए एक सिंहासन तैयार किया था जिसके ऊपर में मां विराजिता हो और जगत कल्याण के लिए वो बाह्य प्रकाश अपनी शक्ति का करें। देखिए यहां पर देयर इज वन
कहानी: स्वामी योगानंद स्वामी विवेकानंद को चेतावनी देते है की कही माँ सारदा को अपना स्वरूप स्मरण न हो जाए
इंटरेस्टिंग स्टोरी। स्वामी जी जब भारत वापस आए थे अमेरिका से फर्स्ट विजिट के बाद में तो उस समय ये जैसे रामकृष्ण मिशन की स्थापना यह जो सब पूरे भारत में यह जो कार्य का यह जो प्लानिंग है वह सब स्वामी जी बैठकर के कर रहे थे। उस समय योगेंद्र महाराज के साथ में उनका एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग वार्तालाप हुआ था। योगेन महाराज को कह रहे हैं कि भाई देखो मैं चाहता हूं कि एक स्त्रियों के संघ की भी रचना हो। जिस तरह से हम यह लड़कों के संघ की पुरुष के संघ की रचना कर रहे हैं। साथ-साथ में ही स्त्रियों के भी संघ की रचना हो और वहां पे यह जो बाल विधवा है या तो कुमारी है इस तरह की लड़कियां और जो साधिकाएं हैं वह सब एक साथ में इकट्ठा होकर के रहे। मां के मार्गदर्शन में मां शारदा देवी के दिशा निर्देश अनुसार उनके उपदेश अनुसार साधन भजन करें। अपने जीवन का गठन करें। तो यह मेरा एक प्लान है। तो यह योगेन महाराज इससे आनंदित तो बहुत हो जाते हैं। वो कंपेयर टू कि वो स्वामी जी ने यह शिव्ञान जीव सेवा का जो कहा था और उसके बारे में योगेन महाराज का जो थोड़ा सा मतांतर था एक अन्य मत था। किंतु इस मत यह जो स्वामी जी का प्लान है उसके साथ में अगेन योगेंद्र महाराज का एक ऑोजिशन है। वह बताएंगे किंतु पहले तो वह एग्री होते हैं कि हां यह जो आईडिया है तुम्हारा नरेंद्र को कहते हैं कि तुम्हारा यह जो आईडिया है बहुत अच्छा है और ऐसा होना चाहिए। ठाकुर ने तो हमको सबको कहा है कि ब्रह्म ही सत्य है। जगत मिथ्या है। ब्रह्म साक्षात्कार या तो फिर इष्ट दर्शन ही तो जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। इसके लिए और स्त्रियों में भी यह तो भाव प्रचारित होना चाहिए। इस बात में कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु मैं तुमको यह सजेशन दूंगा कि तुम इस तरह की स्त्रियों को इस मठ का संचालन करने के लिए इकट्ठा करो। जिन लोगों में यह सब करने की क्षमता हो, पुरुषों की सहाय के बिना यह लोग अपने से कार्य कर पाए। जो लड़कियां वहां पर आती है ट्रेनिंग लेने के लिए उनको यह लोग शिक्षा दे पाए और उनका जो भविष्य का कल्याण है इसके बारे में यह लोग सोच पाए। किंतु तुम मां को अभी बिल्कुल डिस्टर्ब मत करो। मां शारदा देवी को तुम इस कार्य में बिल्कुल ही यह तुम मत लगाओ। क्यों? क्योंकि तुमको पता है ना ठाकुर ने क्या कहा था? जिस दिन उसको अपना स्वरूप समझ में आ जाएगा उस दिन वह सीधी दौड़ लगाएगी वैुंठ में। यह जो कहानी गंभीरानंद जी महाराज ही हमको कहते हैं कि यह कामार पुकुर में ठाकुर गए हुए हैं। उस समय तो मां उस समय दक्षिणेश्वर आई नहीं थी। शोडशी पूजा हुई नहीं थी। उसके पहले की बात है कि वह अपनी साधना समाप्त करके ठाकुर जाते थे कामुर। तो फिर मां शारदा देवी को भी जय राम बाटी से बुलाते थे। तो यहां पर वह सब गांव की स्त्रियां बैठी हुई है ठाकुर के घर के सामने और ठाकुर उनके साथ में धर्म प्रसंग कर रहे हैं और मां भी वहां पर बैठी है किंतु वह बीच-बीच में सो पड़ती है। क्यों? वैसे तो उम्र छोटी है। घर का काम करना है और फिर यहां पर शांति से बैठी है ठाकुर की। इतनी यह जो हृदय को शांति देने वाली वाणी है। तो सुनकर के बेचारी को नींद आ जाती होगी। तो वह सब बाकी स्त्रियां मां को उठाने का प्रयास कर रही है कि अरे उठो उठो देखो ठाकुर कितनी सुंदर बातें कर रहे हैं। सुनना नहीं चाहती क्या? उस समय ठाकुर उनको रोक करके कहते कि नहीं उसको सोने दो। यदि वह अपना स्वरूप पहचान लेगी ताले चोचा दौड़ मारवे। सीधी दौड़ लगाएगी। कहां पे? वैुंठ में कैलाश पे जहां पे वो भगवान शिव भगवान विष्णु के साथ में विराजिता है। उनकी शक्ति रूप में। तो यह बात थी कि सबको पता थी। गुरु भाइयों को भी पता थी। इसलिए योगेन महाराज यहां पर ठाकुर नरेंद्र को कहते हैं कि देखो भाई तुम स्त्रियों का मठ स्थापित करना चाहते हो तुम करो और साथ में ही तुम्हारी तो यह जो शिष्याएं हैं निवेदिता वगैरह जो कि काफी इंटेलिजेंट है और काफी स्पिरिचुअल भी है ऐसे किसी को तुम इस मठ का जिम्मा दो मां को अभी इस कार्य में तुम मत इनवॉल्व करो क्यों जिस क्षण मां को अपने स्वरूप का यह जो मां की महिमा का प्रचार होना जिस समय शुरू होगा और मां को जिस समय अपना स्वरूप सही-सही क्या है वह समझ में आने लगेगा उसी समय से मां की भी अंत्य लीला प्रारंभ हो जाएगी। तो जैसे ही योगेन महाराज ने स्वामी जी को यह बात कही स्वामी जी बड़े ही खुश हो गए और कहा कि मंत्री तुमने मुझे ठीक-ठीक सलाह दी है। ठाकुर की यह जो चेतावनी तुमने मुझे याद करवा करके बहुत अच्छा कार्य किया है और जो तुम कह रहे हो वही होगा। तो देखिए कि शायद हमको सबको पता है कि स्वामी जी बार-बार अपने पत्रों में लिखते हैं कि लड़कों का मठ बाद में होगा। स्त्रियों का मठ पहले होना चाहिए। मां के लिए मठ पहले होना चाहिए। ऐसा स्वामी जी बार-बार लिखते तो हैं। किंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं होता है। हमको पता है कि मां शारदा देवी की 100वीं जन्म जयंती 1953 के आसपास में ही यह शारदा मठ की स्थापना हुई थी। और जबकि स्वामी जी यह सब बातें कर रहे थे 1895 96 97 उस समय में तो क्यों नहीं स्वामी जी ने मां का मठ प्रथम स्थापित किया तो उसके अनुमान करके हम लोग काफी बार यह सोचते हैं कि हां शायद हो सकता है कि उस समय की सामाजिक जो प्रथाएं थी जो रूढ़िवादी उस समय था उसकी वजह से शायद स्वामी जी ने ऐसा ना किया हो किंतु मुझे अभी ऐसा लग रहा है कि यह भी एक प्रश्न प्रश्न उसमें होगा क्योंकि स्वामी जी का भी वही कि वो मां को इस एक बार एक दर्शन हुआ कि वह ठाकुर जो है कि वो जल में समाहित हो गए। गंगा के जल में गंगा के पानी में समाहित हो गए। मां का यह दर्शन है पूरा। बाद में उसी कहां से यह नरेंद्र आया और नरेंद्र ने यह जल लेकर के आसपास में जितने भी लोग खड़े थे सबके ऊपर में छिड़कना शुरू कर दिया। अर्थात कि यह ठाकुर की आध्यात्मिकता है। जनसाधारण में फैलाने का कार्य नरेंद्र को करना था। अभी यह दर्शन मां ने किसी को कहा और यह वो जो जैसे होता है ना यह सब ये कैसे वो कानों में बात चलती है वो म वो जैसे रूमर किस तरह से फटाफट करके फैलती है। न्यूज़ कैसे फैलता है? कैसे सब वायरल हो जाता है। तो यह बात भी वायरल हो गई और स्वामी जी के कानों में यह बात गई। तब स्वामी जी ने कहा कि देखो मुझे यह बात ना याद करवाते तो अच्छा रहता। क्यों? क्योंकि यह दर्शन इस तरह के हो इसकी वजह से स्वामी जी को उनका सही स्वरूप क्या है वह पता चल जाता और इसकी वजह से फिर वह अपना शरीर त्याग करेंगे। तो यह है हमारे संघ में ठाकुर के बारे में भी स्वामी जी के बारे में भी मां के बारे में भी जब उनका नाम बहुत फैलने लगेगा जब उनको अपना स्वरूप स्मरण हो जाएगा तब उनकी अंत्य लीला का प्रारंभ हो जाएगा तो इसलिए हालांकि यहां पर ठाकुर मां का स्वरूप स्मरण करवा देते थे वाक्य के द्वारा भार अर्पण करने के लिए कहते थे किंतु हमको पता है कि यह 1886 की यह जो घटना है वास्तविकता में तभी रूपांतरित हुई जबकि स्वामी जी ने खुद ने महासमाधि ग्रहण की 1902 में। इसके पहले मां आशीर्वाद देती थी किंतु मां का स्वरूप था जनसाधारण से छुपा हुआ था। जनरली जो श्री रामकृष्ण या स्वामी जी के भक्त थे वही लोग मां के पास में आते थे। किंतु फिर यह उद्बोधन भवन की रचना फिर यह जो राधु का जन्म और राधु को योग माया के रूप में मां ने अपनी खुद की बच्ची के रूप में ग्रहण करना यह जो सब कुछ घटनाएं हुई और स्वामी जी जब चले गए तो फिर जो संघ का एक जो जिम्मा है वो राजा महाराज शरद महाराज मां को तो बिना पूछे एक स्टेप भी आगे नहीं बढ़ेंगे। तो यह जो सब घटनावली प्रारंभ हुई और फिर यह जो बंग भंग की मूवमेंट थी कि यह ब्रिटिश गवर्नमेंट ने ठीक किया कि बंगाल के दो टुकड़े किए जाए तो उसकी वजह से जो पॉलिटिकल एक माहौल खड़ा हुआ था अवेयरनेस फैली थी बोलकर के बहुत सारे यंग लड़के लोग इस तरह से एक उच्च आदर्श को लेकर के जीवन निर्वाह करना चाहते थे। यह जो क्वालपाड़ा का आश्रम इसीलिए बना था। आज जो मां के जो भक्त हैं जो त्यागी संतान है उसमें क्वालपाड़ा के लड़कों का सर्वप्रथम नाम आएगा। तो यह क्वालपाड़ा आश्रम बना क्यों था कि यह जो केदार बाबू वगैरह कुछ लोग थे उनको ऐसा लगा कि स्वदेशी आंदोलन करना चाहिए। स्वदेशी चीजें इस्तेमाल करनी चाहिए। बोल कर के वहां पर एक स्कूल एक घर जैसा उन्होंने भाड़े लिया और फिर वहां पर वैसे ठाकुर का फोटो वगैरह तो था। किंतु यह चरखा जो है वह भी वहां पर रखे हुए थे। चरखा काटना है। यह सूते का कपड़ा बनाना है। अपने से सूता धागा बनाना है और यह स्वदेशी कपड़े इस्तेमाल करने हैं। विदेशी मिल का कपड़ा जो है उसका बहिष्कार करना है। यह सब चल रहा था और जब पहली पहली बार मां ने क्वालपाड़ा आना प्रारंभ किया। उस समय वहां के लोगों के मन में वही था कि यह स्वदेशी करना ही हमारे जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। बाद में जब मां ने स्वयं वहां पर ठाकुर के फोटो की स्थापना की और साथ में देखिए सुंदर प्रसंग
कहानी: माँ सारदा अपने हाथों से अपनी प्रतिमा स्थापित करती है
कि जब मां ने ठीक किया कि मैं क्वालपाड़ा आऊंगी ठाकुर के फोटो की स्थापना करूंगी। जो तो यह जो ईशानंद जी है मां के सेवक वो लिखते हैं कि देखिए हमको तो पता है कि सशक्तिक प्रभु की आराधना करना ही भारतीय प्रथा है। हिंदू शास्त्र में इसी तरह से लिखा गया है। तो जिस दिन मां आई थी क्वालपाड़ा में पदार्पण किया था ठाकुर के फोटो को वहां पर स्थापित करने का देखा कि उनका खुद का फोटो साथ में है। तो मां ने बिना किसी द्विधा के दोनों फोटो को अपने हाथों से स्थापित किया। अर्थात कि शक्ति ने अपना स्वयं वहां पे एक जो शक्ति का एक क्षेत्र है, वह वहां पर स्थापित किया था। तो देखिए कि यह आध्यात्मिकता का एक जवाहर उस समय भारत में उठा था। ये जितने लोग इस तरह से उच्च आदर्श के लिए उन्होंने एक सोचा था। धीरे-धीरे सबको यह पता लगने लगा। यह अरोबिंदो है। ऐसे कितने ही यह आदर्शवान यह यंग मैन थे। उनको ऐसा लगा कि यदि आध्यात्मिकता साथ-साथ में नहीं रहेगी तो सिर्फ यह क्रांतिकारी होकर के गवर्नमेंट के साथ में फाइट करना इससे ज्यादा कुछ लाभ नहीं होने वाला है। बोल कर के यह आध्यात्मिकता का जवाहर प्रारंभ हुआ। यह यंग लड़के यहां पर रामकृष्ण मिशन में आने लगे। तब उनको यह जो एक डायरेक्शन देना था वह डायरेक्शन आध्यात्मिक मार्गदर्शन करना था। उसके लिए मां से ज्यादा उपयुक्त और कोई नहीं हो सकता। स्वामी जी होते तो क्या
कहानी: माँ सारदा की दृष्टि से ब्रिटिश राज और स्वामी विवेकानंद
होते? मां को किसी ने कहा कि मां आज जिस तरह से यह हमारा स्वदेशी का आंदोलन चल रहा है। हो सकता है कि आज स्वामी जी हमारे बीच में होते तो हमको और कितनी प्रेरणा देते। साथ-साथ में ही मां ने कहा अरे तुम क्या बात कर रहे हो स्वामी जी मेरा नरेंद्र यदि अभी रहता तो यह कंपनी सीधा उसको जेल में डाल देती कंपनी अर्थात कि ईस्ट इंडिया कंपनी अभी उस समय तो ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं थी ब्रिटिश राज था किंतु मां का जो कहना था कि यह कंपनी सीधा स्वामी मेरे नरेन को जेल में डाल देती वो बात भी सही है यह ईस्ट ये जो ब्रिटिश राज का इनटोलरेंस था हमारे यह जो फ्रीडम मूवमेंट के प्रति जितने भी प्रोमिनेंट फ्रीडम फाइटर को जेल में डाल देते थे। कान काला पानी में भेज देते थे। जिस तरह से उनके ऊपर अत्याचार करते थे। फांसी पर चढ़ा देते थे। पता नहीं स्वामी जी के साथ में और क्या होता और स्वामी जी स्वयं जिस समय स्वामी जी भारत में वापस आए थे। यह जो भारत के नवजागरण का संदेश जो फैला रहे थे यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा पूरे भारत में भ्रमण करके 1897 की साल में 1897 1898 ये जो दो साल उन्होंने भारत का भ्रमण किया और ये फिर उन्होंने यह जो नवजागरण का यह संदेश फैलाया उस समय क्या था कि भारत की ये जो पॉलिटिकल फ्रीडम मूवमेंट थी वो अभी भी प्राथमिक कक्षा में थी। यह इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना तो वैसे हो गई थी। किंतु यह सब एक पिटीशनिंग बॉडी जैसा था कि कुछ ये जो लॉयर लोग हैं वे लोग इकट्ठा होकर के ब्रिटिश गवर्नमेंट के सामने एक आवेदन प्रस्तुत करेंगे जिसको कि यह ब्रिटिश वायसराॉय इग्नोर करेगा। वहीं तक का एक था एक पॉलिटिकल मूवमेंट जैसा। किंतु फिर यह जैसे कि यह 1902 1905 के बाद में एक जो भयानक एक प्रचंड एक ये जो जवाहर आया एक वेव प्रारंभ हुआ देशभक्ति का पेट्रियोटिज्म का ये जो भारत के नव युवानों के बीच में उस समय यदि स्वामी जी होते तो स्वामी जी कोई पॉलिटिकल स्टेटमेंट ना दे देते या तो फिर उनके साथ में साथ मिला करके उनको सहाय करने के लिए आगे ना आते यह तो सोचना थोड़ा सा मुश्किल है तो उस समय अभी स्वामी जी ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि रामकृष्ण मिशन किसी भी तरह की पॉलिटिकल एक्टिविटी में पार्टिसिपेट नहीं करेगा। किंतु फिर भी यह जो ब्रिटिश गवर्नमेंट की हमारे ऊपर में जो कुदृष्टि थी वो कोई भी एक एक्सक्यूज निकाल करके कोई भी एक झूठमठ का बहाना बना करके स्वामी जी को उठा ले जाती। जैसे जीसस के साथ में वही हुआ। जीसस तो बेचारे थे आध्यात्मिक। किंतु वह जो रोमन गवर्नर था वहां का उसने यह ठीक कर लिया कि यह लोगों के भीतर में यह एक तरह का रेवोल्यूशन फैलाने का प्रयास करता है तो फिर उसको ले जाकर के जीसस को पकड़ के क्रुसिफाई कर दिया था झूठ-मूठ का आक्षेप लगा के तो स्वामी जी जो नहीं भी कहे होंगे जो नहीं भी करना चाहते होंगे किंतु उसके बावजूद स्वामी जी पर झूठा आक्षेप लगा करके उनको जेल में डाल देना फांसी दे देना यह कोई ब्रिटिश गवर्नमेंट के लिए असंभव कार्य नहीं था। तो इसलिए मां कहती है कि मेरा नरेंद्र यदि अभी रहता तो कंपनी उनको उसको पकड़ करके जेल में ही भर करके रखती। तो वो जो स्वामी जी का जो ये था एक चरित्र और स्वामी जी ने कहा भी था। फिर यह बात ऐसी नहीं है कि फिर स्वामी जी को पकड़ के जेल में डाल दिया तो वहीं पर मामला खत्म हो जाएगा। स्वामी जी ने कहा कि गोली मारना चाहते हो मुझे मारो मुझे गोली। चलाओ मेरे सीने पर गोली। बाद में देखो क्या रेवोल्यूशन आता है भारत में क्योंकि भारत का एक भी युवान उसके बाद में शांति से नहीं बैठता। एक ब्लडी रेवोल्यूशन भयानक रक्तपात भारत में प्रारंभ हो जाता कि किस तरह से हमारे स्वामी जी को जेल में डाला है। किस तरह से हमारे स्वामी जी के साथ में आप अत्याचार कर रहे हैं। तो फिर क्या होता कि एक जो स्टेडी एक स्प्रेड होना है। स्पिरिचुअलिटी को भारत की यह जो भूमि के अंतः भीतर में जाना है। ग्रास रूट में जाना है। हमारी भूमि के एकदम गंभीर प्रवेश करना है। आध्यात्मिकता को वह नहीं होकर के झूठमठ का रक्तपात होता रेवोल्यूशन आता हो सकता है कि भारत को फ्रीडम मिल भी जाए उस तरह के रक्तपात से किंतु फिर वह फ्रीडम जो है वो लंबा टिकेगा नहीं ठाकुर ने स्वयं कहा था ना कि हृदय को कि तुम्हारे कामार कुकुर को मैं पूरा सोने से मढ़ करके जा सकता हूं। पूरे सोने से लिप करके जा सकता हूं। जैसे वह गोबर लिपते हैं ना घर के ऊपर में सोने से लिप करके जा सकता हूं। किंतु इससे ज्यादा कुछ होने वाला नहीं है लोगों का। यदि लोगों का सही-सही कल्याण करना है तो एक लंबी प्रोसेस है। यह अपने संस्कारों को संस्कृत करने की अपने संस्कारों को सुसंस्कृत करने की एक लंबी प्रोसेस है। उसमें से जाना पड़ता है। यही जदुनाथ वो कहीं वो बारिश में यह रुद्र स्वरूप जो धारण किया है प्रकृति ने भगवान शिव का तांडव नृत्य जहां पे चल रहा है। बिजली गरज रही है। बादल पूरे जगत पे छाए हुए हैं। अंधेरा छाया हुआ है। उस समय वह जिस तरह से पद्म फूल संग्रह करता है। माने वह जदुनाथ का वह जो भाव था भीतर का एक वीर पराक्रमी का वही भाव उसने यदि ब्रिटिश गवर्नमेंट के साथ में लगा दिया होता तो फिर क्या होता? खूनामरकी वो कर सकता था। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। दूसरे दूसरे देशों में आप जाकर के देखिए जो सब बड़े-बड़े फ्रीडम फाइटर होते हैं। उसने इतने लोगों को मार दिया। इसने इतने शत्रुओं की हत्या की। तो इस तरह का पराक्रम और साहस हम भारतीयों में नहीं था। ऐसा कुछ कहने का और ऐसा कुछ कुछ लोग कहते भी है कि इस तरह का पराक्रम इस तरह का साहस यह जॉर्ज वाशिंगटन है ना कि ऐसा कोई सेनापति हमारे पास में होता तो हम ब्रिटिश राज्य से हम मुक्ति पा लेते। तो ऐसे जदुनाथ जैसे 1000 सेनापति आपको मिल जाते। किंतु वह खूना मरकी से प्राप्त किया हुआ स्वतंत्रता वह हमारे किसी काम की रहती नहीं क्योंकि स्वतंत्रता सिर्फ राजकीय नहीं होती है। स्वतंत्रता होती है आत्मन की। माया के यह फंदे से हमको मुक्ति प्राप्त करनी है। माया की गुलामी से मुक्ति प्राप्त करनी है। नहीं कि यह ब्रिटिश राज से माया से यदि मुक्ति प्राप्त कर ले तो बाकी सब ऑटोमेटिक हो जाएगा। तो यह है हमारा पूरा भाव और इसीलिए गंभीरानंद जी महाराज इतना सुंदर यह वाक्य लिखते हैं। क्या कहते हैं? सिर्फ स्वरूप स्मरण करा करके या तो फिर शब्दों के द्वारा भार अर्पण करके ही ठाकुर शांत नहीं होते थे। वह भक्तों को मां के चरण के पास में ले आ करके मां के शक्ति विकास की भूमि की रचना करते थे। अच्छा इसके बाद में और भी बहुत है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: राष्ट्र निर्माण की व्यापक योजना में आध्यात्मिकता की क्या भूमिका है?
किंतु यहां पर देखिए कि स्वामी जी वाज अ स्टूडेंट ऑफ हिस्ट्री हमको ओवर ली रिलीजियस होना है ऐसा भी नहीं है। स्वामी जी बड़े क्लियर है। बुद्धिज्म की जो गलती थी कि मतलब इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी और यह सोसाइटल एस्पेक्ट उसको रिलीजियस करना इस तरह का कभी नहीं करना है। अब जैसे क्षत्रियों को साधु बनाना। प्रॉब्लम यह है जब बाहर से आक्रमण होगा तो हमारी रक्षा कौन करेगा? अभी आज के युग में देखेंगे तो हमको ड्रोन भी चाहिए, एआईवी चाहिए। यह मैकेनाइज्ड वॉरफेयर के जितने भी इक्विपमेंट है वह सब भी चाहिए। अदर देन बीइंग स्पिरिचुअल। तो क्या है कि स्वामी जी ने कहा कि इंडियन स्पिरिचुअलिटी एंड वेस्टर्न साइंस इन दोनों को फ्यूज करेंगे तब एक श्रेष्ठ सिविलाइजेशन बनेगी। हम यदि यह अपेक्षा रखें कि स्पिरिचुअलिटी वी कैन बी लुक एट अ सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट। वो बड़ा ही एक गलती होगा। माने अंडरस्टैंडिंग ऑफ सिविलाइजेशन। उससे होता क्या है? अब जैसे कि मोहनजोदड़ो के बारे में मैंने ऐसा पढ़ा है कि मोहनजोदड़ो सिविलाइजेशन जो थी वह काफी लंबे समय तक टिकी थी। 4000 साल ना कि ऐसा कुछ किंतु उन्होंने ये जो लेयर आफ्टर लेयर एक्सकेवेट करना शुरू किया तो मिला क्या पता है? सालों सालों तक 100-100 ब 200ज़ साल तक एक ही तरह का वह नगर का प्लानिंग है। उसमें कोई चेंज नहीं हुआ है। तो ये लोग कहते हैं कि इस तरह का स्टैटिक हो जाना डेवलप अदरवाइज तो क्या है कुछ डेवलपमेंट होगा कम होगा ज्यादा होगा। ये स्टैटिक हो जाना डेवलपमेंट ये यही बताता है कि यहां पे कोई रिलीजियस थियोलॉजी रूल करती होगी। अभी ये रिलीजियस थियोलॉजी जब रूल करती है। अब जैसे यूरोप में हुआ चर्च के हाथ में पूरा कंट्रोल आ गया। रोमन एंपायर का डिसी इंटीग्रेशन जब हुआ चर्च के हाथ में यह पावर आया तो चर्च ने अपना आईडिया है वो साइंस के ऊपर में थोप के बिठा दिया कि यह पृथ्वी की रचना हुई है 4000 साल पहले वगैरह-वगैरह ये गैलीलियो फैलीलियो पे उसको नजरबंद करने का प्रयास किया। तो रीजन यह हुआ, रिजल्ट यह हुआ कि शुरू में तो बिकॉज़ के रोमन एंपायर डिसइीग्रेट हो गया था। यह चर्च की आगेवानी में यूरोप ने एक स्टेबिलिटी तो प्राप्त कर ली। वो बार्बेरियन जो अटैक होते थे उसके सामने बच भी गए। किंतु बाद में ये जो स्टेबिलिटी जो प्राप्त हुई ना, फिर ये चर्च का क्या है? स्टेटस को वाला एक रहता है। कोई भी रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन है। ये स्टेटस को चेंज नहीं करना चाहता। तो फिर ये इवोल्यूशन होना था वो अटक गया। 1000 म वो 300 400 साल का वो डार्क एजेस चला और फिर जब चर्च की अथॉरिटी को उठा के फेंक दिया तब कहीं जाकर के फिर से इवोल्यूशन स्टार्ट हुआ। अभी ये साइंटिफिक इवोल्यूशन जैसे ही स्टार्ट हुआ साथ में ही यह वॉरफेयर भी स्टार्ट हो गई। यानी कि इवोल्यूशन जो है इट्स अ वेरी वलाटाइल अफेयर। यहां पे आप एक और लिप्स एंड बाउंड्स प्रोग्रेस करते हैं। साथ-साथ में ही आपके सामने भयानक क्राइसिस आती जाती है। रिलीजियस ऑथॉरिटी जो जनरली होती है उन लोगों का कहना है कि इस तरह की क्राइसिस ना आए इसलिए सिचुएशन को एक लेवल पर ले आकर स्टेबल कर दो। तो ये स्टेबिलिटी की वजह से क्राइसिस तो नहीं आएगी किंतु इवोल्यूशन भी स्टैटिक हो जाएगा। और फिर प्रॉब्लम यह होगा कि इवेंचुअल डाउनफॉल जब होगा तब यह कंप्लीट डाउनफॉल हो जाएगा। अब इजिप्ट का भी उदाहरण वही है। वो रिलीजियस थियोक्रेसी वहां पे रूल कर रही थी। तो आपने देखा कि हजार साल तक वहां पर स्टेबिलिटी बनी हुई है। किंतु जिस क्षण यह स्टेबिलिटी गई उस क्षण संपूर्ण रूप से विनाश हो गया। क्योंकि इवोल्यूशन तो अटक गया था साइंस टेक्नोलॉजी में, लर्निंग में, नॉलेज में। तो कोई भी रिलीजियस अथॉरिटी जो होती है या तो फिर रिलीजियस का यह जो एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन होता है सिविलाइजेशनल लेवल पे वह टेंपरेरी बेनिफिट दे सकता है इस अर्थ में कि यह वॉर है, फेमिन है, रेवोल्यूशन है। इन सब से वह शायद हमको बचा दे। किंतु अदर देन दैट कि वो एक इवोल्यूशन को स्टॉप करके रख देगा। और फिर जब प्रॉब्लम स्टार्ट होंगे तो ऐसे भयानक एक्यूमुलेट हो रहे हैं तो प्रॉब्लम ऐसे भयानक आएंगे कि फिर आप कुछ नहीं कर पाएंगे। प्रोग्रेस बाय इट्स वेरी नेचर इज वलाटाइल। अभी आप भयानक प्रोग्रेस कर रहे हैं। कहां पे हम यह घोड़ा गाड़ी में बैठ रहे थे। उसके 50 साल के बाद में आदमी चांद के ऊपर चल रहा है। विदिन 50 इयर्स से रेवोल्यूशन आया है। तो साथ में ये सेकंड वर्ल्ड वॉर फर्स्ट वर्ल्ड वॉर भी आ गया। इतना भयानक खुनामरकी कभी नहीं हुआ है। यदि रिलीजियस ऑथॉरिटी होता तो ना ही वह भयानक खुनामरकी होता फर्स्ट सेकंड वर्ल्ड वॉर जैसा ना ही फिर यह आदमी चांद पे चलता। सो दिस वी हैव टू अंडरस्टैंड द स्पिरिचुअलिटी बाय इट्स वेरी डेफिनेशन इज़ इंडिविजुअलिस्टिक पर्स। हमारा ईश्वर के साथ में क्या रिलेशन है? दैट इज द थिंग दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड। सिविलाइजेशन लेट इट रन अलोंग इट्स ओन प्रिंसिपल। ये विज़डम जो है ये हिंदू धर्म में ट्रेडिशनली था। इसीलिए ब्राह्मी क्षत्रिय सेपरेट कर दिया था कि जो विद्या ये जो उसकी आराधना करते हैं आध्यात्मिकता की वो अलग जो देश को चलाए वो अलग। जैसे ही आपने क्षत्रिय ब्राह्मण को इकट्ठा कर दिया। जैसे कि ये चर्च ने किया था। जैसे यह इजिप्ट में हुआ था। जैसे यह मोहनजोदड़ो सिविलाइजेशन में हुआ था। जैसे इस्लाम में हुआ कि रिलीजियस अथॉरिटी इज़ आल्सो द सेम एस पॉलिटिकल अथॉरिटी तो अगेन स्टैटिक तो हुआ सिविलाइजेशन लंबे समय तक बच गया बहुत सारे प्रॉब्लम से किंतु इवेंचुअल जब ये मोंगोल लोगों ने अटैक किया बगदाद के ऊपर में वहां के खलीफा को उन्होंने मृत्यु के घाट उतार दिया और तब से ये जो इस्लाम का गोल्डन एज उसका जो पतन हुआ है फिर से वो राइज नहीं हुआ।
प्रश्न: आपके अनुसार, स्वामीजी के सपनो का भारत (vision of india) और आज के भारत के बीच क्या अंतर (gap) है?
मैं गैप है ऐसा नहीं कहूंगा। मैं कहूंगा कि हमारा रेट ऑफ प्रोग्रेस जो है वो शायद हमको सेटिस्फेक्टरी नहीं लग रहा है क्योंकि देखिए विज़न बाय इट्स वेरी नेचर लार्ज होता है। हाई होता है और वास्तविकता बाय इट्स वेरी नेचर वो उससे दूर ही होती है। बात यहां पे ऐसा है कि हम क्या देख रहे हैं अपनी नजर के सामने। यह जो रेट ऑफ प्रोग्रेस है वो सेटिस्फेक्टरी है कि नहीं वो हम देखते हैं जनरली। मुझे नेचर एवरीबडी विल एग्री कि रेट ऑफ प्रोग्रेस इज नॉट सेटिस्फेक्टरी। ये तो सभी लोग एग्री करेंगे। किंतु फिर देखिए कि आप हिस्ट्री जब स्टडी करेंगे तो आपको पता चलेगा कि 10000 साल के ये जो ड्यूरेशन रहता है किसी भी वो फेस ट्रांजिशन में। तो अभी तो स्वामी जी को गए हुए 150 साल कितने 1902 से ये इतना ज्यादा तो कुछ है नहीं सवा5 साल। तो वी हैव टू मॉडरेट आवर एक्सपेक्टेशन। होना क्या चाहिए? देखिए यदि मुझे कहेंगे कि व्हाट इज आइडियल अकॉर्डिंग टू मी तो मैं कहूंगा कि स्कूल में योग मेडिटेशन सिखाना चाहिए। दिस इज द मोस्टेंट थिंग। और दूसरा कि हमको इंडियन गवर्नमेंट को ये चाइनीस गवर्नमेंट जिस तरह से अभी जस्ट मैं न्यूयॉर्क टाइम्स में एक आर्टिकल पढ़ रहा था कि चाइना की गवर्नमेंट बिलियंस ऑफ डॉलर डाल रही है। ये एआई और चिप प्रोसेसिंग प्लांट बनाने के लिए। तो कटिंग एज और यह सोलर टेक्नोलॉजी बैटरी टेक्नोलॉजी उसमें ऑलरेडी वे लोग वर्ल्ड क्लास हो चुके हैं। रेयर अर्थ मिनरल्स है वगैरह में। तो हमको यह दो फ्रंट पे काम करना है। ऑन वन हैंड जो कटिंग एज साइंस डेवलपमेंट टेक्नोलॉजी है। बिलियंस ऑफ डॉलर डालने पड़ेंगे। अदरवाइज हम फिर से 1000 साल की गुलामी नजर के सामने खड़ी है। एक और दूसरा ऑन अदर हैंड हमारी स्कूलों में योग और मेडिटेशन का प्रचार मतलब रेगुलर क्लासेस होने चाहिए।
प्रश्न: आजकल हमारे आदर्श पश्चिमी हैं। हम उनकी संस्कृति की अंधी नकल करते हैं। चीनी या जापानी अपने स्वयं के सांस्कृतिक मूल्यों का विकास कर रहे हैं।
एक्चुअली यह जो 1970 में एक जो भयानक चीज हुआ ना हम लोगों ने देखिए चाइना ने राइट चॉइस किया हमने गलत चॉइस किया प्रॉब्लम क्या हुआ सोवियत यूनियन और अमेरिका का कंपटीशन चल रहा है तो हम लोगों ने सो अब वैसे तो हम लोग हैं नॉन एलाइन किंतु सोवियत यूनियन को ज्यादा फेवर कर रहा है व्हिच इज कंप्लीटली रॉन्ग कि सोवियत यूनियन इज अ ऑथोरिटेरियन सिस्टम अमेरिका से तो फार मोर उसका यह जो क्रुअल्टी था अपने नागरिकों के प्रति दूसरों के प्रति हजार गुना ज्यादा था। किंतु एक आइडियोलॉजिकल ब्लाइंडनेस हमारे सर पर सवार हो गई कि एक कॉलोनाइज्ड कंट्रीज है ब्रिटेन। तो वैसे अमेरिका भी कॉलोनाइज्ड कंट्री है। उससे दूर जाकर के सोवियत यूनियन के पास जाना है। और चाइना मेड ए राइट चॉइस। चाइना एक्चुअली इज़ अ कम्युनिस्ट कंट्री। किंतु सोवियत यूनियन के साथ में जो झगड़ा हुआ तो उन्होंने जाकर के अमेरिका के साथ में फ्रेंडशिप कर लिया। अभी अमेरिका के साथ फ्रेंडशिप करने का इतना बेनिफिट उनको मिला है। आज यह फटाफट करके यह टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अमेरिका खुद चाहता था कि चाइना को हम सपोर्ट करें जिससे कि सोवियत यूनियन के सामने खड़ा रहे और हम लोग एक महामूर्ख बनकर के सोवियत यूनियन के कैंप में बैठ गए। अमेरिका के साथ में हर बात पे हम ये कर रहे हैं। वाद-विवाद कर रहे हैं। बोलकर के ये टेक्नोलॉजिकल ट्रांसफर भी अटक गया। यह अमेरिका का मार्केट है। उसका भी बेनिफिट नहीं ले पाए। एक जो फ्रीडम था अमेरिका में वो यहां पे नहीं आया। सोवियत क्लोज सिस्टम थी। इंटेलेक्चुअल ब्लाइंडनेस एक हमारे सर पे सवार हो गई। सो दिस इज अ वर्स्ट थिंग हमने आज तक में किया है। आज देखिए कि ये डब्ल्यूटीओ में चाइना को एंट्री मिला और यह जो अमेरिका में सेल करना शुरू किया वही तो दैट इज अ फाउंडेशन ऑफ़ चाइनास प्रोस्पेरिटी। 1980 तक हम दोनों साथ-साथ में थे पर कैपिटा जीडीपी में। आज हमारे से पांच गुना ज्यादा है। तो यह जो ट्रेन हमने एक आईडियोलॉजिकल ब्लाइंडनेस की वजह से मिस कर दी। आज हम जितना भी हिस्ट्री पढ़ेंगे ना ये सोवियत यूनियन के साथ में जो अपना रिलेशन डेवलप हुआ था ये इंदिरा गांधी वगैरह ने सेकुलरिज्म कहां से आया? सोवियत यूनियन ने हमारे सर पर बिठा दिया है। अमेरिका कभी ऐसा नहीं कहेगा कि आप सेकुलर होइए। वो तो अच्छा है किंतु हम बिठाना नहीं चाहते हैं। इट वाज़ सोवियत यूनियन। उसके साथ में फ्रेंडशिप करनी है तो हमको सेकुलर होना है। तो एक ब्लाइंड कम्युनिज्म जो भारत में घुसा है ना वहां से उसने पूरा एक जनरेशन को बर्बाद करके रख दिया।
प्रश्न: माँ या स्वामीजी को अपना सही स्वरूप पता चल जाता तो वे शरीर त्याग कर देते. किन्तु ठाकुर को तो अपना सही स्वरूप पता था. क्यों उन्होंने देहत्याग नहीं किया?
नहीं डिफरेंट नहीं है। देखिए ठाकुर से ही यह प्रारंभ हुआ है। जब निर्विकल्प समाधि की बॉर्डर लाइन पर ठाकुर खड़े थे। देह जाने वाला था। जैसे शास्त्र में कहा है कि 21 दिन निर्विकल्प समाधि में रहेंगे तो देह जाएगा। तो वह उस लेवल पर जब खड़े थे तब मां कहीं से वह जो अशरीरी वाणी सुनाई दी मां काली ने वहां पर आकर कहा तू भाव मुखे था। दैट इज द रिवर्सल प्रोसेस कि पता है कि सही स्वरूप क्या है किंतु फिर भी ठाकुर भाव मुख में रह रहे हैं। इसलिए ठाकुर जो बार-बार जो कहते हैं ना कि चीनी होते चाय ना मां चीनी खेते चाय। मैं चीनी होना नहीं चाह रहा। मैं निराकार में मग्न नहीं हो जाना चाहता हूं क्योंकि पता है कि फिर देह नहीं रहेगा। भक्ति भक्तों ने ये थकते चाहिए। भक्ति भक्त को लेकर के रहना चाहता हूं। चीनी खाना चाहता हूं। उसका आस्वादन करना चाहता हूं। मां तू यामा के बेहोश करे राखेश नहीं। मां तुम मुझे बेहोश करके मत रखना। ठाकुर बार-बार यह प्रार्थना करते हैं। जब ठाकुर समाधि में चले जाते हैं तो एक दिन की बात वहीं पर दक्षिणेश्वर में ठाकुर ऐसी समाधि में मग्न हो गए। वापस ही नहीं आ रहे। फिर मां ने चिल्लाना शुरू किया। फिर यह हृदय वगैरह आकर के ठाकुर को नाम सुना रहे। तब कहीं जाकर के ठाकुर का मन वापस आया। तो ठाकुर को पता है कि यह निर्विकल्प लेवल पर जाने का निर्विकल्प समाधि में जाने का डेंजर क्या है? इज वेरी कॉन्शियसली अपने को इस लोक पे रखना चाहते थे। मां के बारे में सेम है कि वो किसी ने मां को पूछा मां तुमको अपना सही स्वरूप क्या सब समय स्मरण रहता है? मां ने कहा बेटा ऐसा होगा तो यह सब काम कौन करेगा? किंतु जब मैं चाहती हूं तब मैं अपने सही स्वरूप में मिलित हो सकती हूं। सो दे हैड दिस कॉन्शियस चॉइस दे हैव मेड। स्वामी जी का तो वर्ल्ड फेमस निर्विकल्प समाधि में थे। ठाकुर ने ताला लगा दिया। कहा कि चाबी मेरे पास में है। अभी कहां जाओगे? ऑल दिस चॉइससेस आर कॉन्शियसली मेड कि पता है कि सही स्वरूप क्या है? किंतु फिर भी ये लोग इस यहां पे रह रहे हैं। वो चाहे ठाकुर ने ताला लगाया हो ना कि मां जगदंबा ने ताला लगाया हो। जितनी बार प्रयास किया है उतनी बार कुछ ना कुछ हुआ है। वह पवारी बाबा के पास गए तो ठाकुर दिखाई दे रहे हैं। अल्मोड़ा में गए तो बहन ने सुसाइड कर लिया। लेक मिशिगन के किनारे बैठकर के वह ध्यान में मग्न हो रहे थे। तो फिर वही बातें उनको वापस ले आई। ऐसा बार-बार स्वामी जी के साथ हुआ है। किंतु ये लोग इस लेवल पर चले गए थे कि मुक्ति उनके हाथ में है। यह बंधन मुक्ति वह सब जो डलिटीज है उसके परे चले गए हैं। वह पृथ्वी पर भी आते हैं तो करुणा से परवश होकर के आते हैं हमारे लिए।
प्रश्न: वैसे तो माया हमारे लिए हानिकारक है, किन्तु यही माया ने माँ को अपना स्वरूप भुला कर हमारे कल्याण के लिए पृथ्वी पर रखा था!
ये जो मां वो कहानी कहती है ना कि ब्रह्मा ने पहले तो चार कुमारों की रचना की सृष्टि करने के लिए। किंतु कुमारों को तो पता था यह सनत कुमार, सनंदन वगैरह कि यह जगत तो माया है। तो उन्होंने ध्यान में मग्न होकर के फिर वह ब्रह्मा के पास में चले गए। तो ब्रह्मा ने सोचा ऐसे तो चलेगा नहीं। फिर बाहर प्रजापतियों की रचना की तो उनके भीतर में थोड़ी सी माया प्रवेश की तो उन्होंने जगत संसार किया और जगत संसार करके फिर यह जगत चला। तो प्रश्न यही है कि ये जगत की रचना हुई ही क्यों है? यदि ब्राह्मण ही सब कुछ है तो फिर यह सिविलाइजेशन, ये सोसाइटी, यह इंडिविजुअल एस्पेक्ट जो है हमारा इस तरह से क्यों आप डिवीजन कर रहे हैं? सब कुछ बंद ही कर दीजिए ना। ब्रह्म में ही स्थित होकर के रहने दीजिए ना। तो इस प्रश्न का सही में हिंदू शास्त्र कोई उत्तर नहीं देते हैं। वो ठाकुर कहते हैं ना कि बूढ़ी की इच्छा है थोड़ा सा खेल चले। वो जो उसको स्पर्श करेंगे तो आपका आप पास हो जाएंगे और निकल जाएंगे खेल से। किंतु यह वो चाहती नहीं है। वो घड़ी लखर एकटा लटो केटे हसे दाव मा हाथ चाबड़ी वो जो मां काली वो पतंग चगाती है। उसमें से एक दो को काट डालती है। वो जो एक दो कट जाती है तो मां हंसती हंसती ताली बजाती है। किंतु बाकी लाखों करोड़ों पतंगों को वो पकड़ती है। उनका जो धागा है उनके हाथ में ही है। वो वही चलाती है। जैसे वो चलाएगी वैसे ही आपको चलना है कठपुतली की तरह। तो वो ऐसा क्यों? तो ठाकुर कहते हैं मां की इच्छा। इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। या तो फिर उत्तर मिलेगा जब हम उस लेवल पर चले जाएंगे। यह जो सफर जो कर रहा है जो भुगत रहा है वह भी तो मां ही तो है। वो भी तो मां के अलावा जो कष्ट देता है वह भी जगदंबा है। जिसको कष्ट मिल रहा है वह भी जगदंबा है। ऐसा तो ऑफकोर्स नहीं है कि
प्रश्न: स्वामी ब्रह्मानंद (राजा महाराज) यदि अपना सही स्वरूप जान ले तो देह त्याग कर देंगे. क्या उनको सही में अपना स्वरूप पता नहीं था?
वह अननोन थे। पता ही है किंतु दया से परवश होकर के उन्होंने एक जैसे ठाकुर कहते हैं ना एक बार आप नेति नेति करके निर्विकल्प समाधि में जाइए। उसके बाद में क्या होता है? इति इति करके वापस आइए। अब जब आप इति इति करके वापस आते हैं तो जैसे शंकराचार्य ने विद्या का अहम रख दिया था। यह नारद मुनि ने भक्ति का अहम रख दिया था। ऐसा एक अहम अभी अहम तो बुरा है। राइट? अहम का त्याग करना ही तो साधना है। किंतु वो अहम यानी कि कच्चा आमी काचा आमी जा के बांग्ला ते बोले कच्चा अहम तो अनराइव अविद्या से जो ग्रस्त अहंकार है उसका त्याग करना है। निर्विकल्प समाधि के बाद में यदि आप वापस आते हैं जगत कल्याण के लिए तो फिर एक सात्विक अहम एक पर्दा एक रहता है जिसके माध्यम से आप यह सब लीला कर सकते हैं। राजा महाराज के बारे में देखिए एक सुंदर कहानी है। उस समय काशी में काशी आश्रम की स्थापना तो सेवा आश्रम की स्थापना तो स्वामी जी की प्रेरणा से ही हुई थी। वो चंद्रबाबू चारू बाबू ने कि ऐसे वो जो कुछ थे वहां के स्थापक ओरिजिनल तो अभी एक समय ऐसा आया कि उन लोगों के भीतर में कुछ मतभेद ऐसा सीरियस हो गया कि वह मामला सुलझ नहीं रहा है। तो फिर शरद महाराज को बुलाया गया वहां पे। शरद महाराज खुद काशी में रहे। सेवाश्रम का मामला सुलझाने का प्रयास करते हैं तो हो ही नहीं रहा है। दो पक्ष है थे वहां पर वह बड़े ही एक खड़े थे अपनेप इसके ऊपर में कि ऐसा ही होना चाहिए ऐसा ही होना चाहिए तो फिर आखिर में उन्होंने कहा स्यूशन नहीं आ रहा है तो एक बार राजा महाराज को बुलाया जाए तो देखिए यहां पे शरद महाराज मीटिंग के बाद मीटिंग कर रहे हैं। दोनों पक्षों को सामने बुला बिठा रहे हैं। कंप्रोमाइज करवा रहे हैं। कुछ नहीं हो रहा है। यहां पे राजा महाराज आकर के वहां पर सिर्फ रहे। कुछ नहीं सिर्फ रहना है। साधन भजन करना है। ये आध्यात्मिक वार्तालाप करना है। उसी में जो उनकी आध्यात्मिकता थी वातावरण इस तरह से बदल गया कि सब लोगों ने वो जो झगड़ा था वो पूरा वहीं पर मिट गया। तो अभी देखिए कि यह जो आध्यात्मिकता थी राजा महाराज के भीतर में इतनी नहीं थी कि वह उनका स्वरूप याद करके देह त्याग कर दे और इतनी कम नहीं थी कि इससे कोई फर्क ना पड़े। इनफेक्टिव ना हो जाए। वो एक एक क्रिटिकल लेवल पर वो थी आध्यात्मिकता राजा महाराज की कि जो जगत का काम है वह भी चलता रहे और उनका देह त्याग भी ना हो जाए। तो यह क्रिटिकल लेवल मेंटेन करना दैट इज अ मेन थिंग कि वो ये जो विद्या का अहम यह क्या करता है? क्रिटिकल लेवल ऑफ स्पिरिचुअलिटी मेंटेन करके रखता है। जिससे कि आपकी प्रेजेंस से चारों ओर स्पिरिचुअलिटी फैले भी सही। साथ-साथ में आपका देह त्याग भी ना हो जाए।