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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 27 Nov 2024

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः कल हमने एक टॉपिक देखा था क्वेश्चन आंसर में कि ठाकुर मां और स्वामी जी यह जो तीन है वैसे तो हम कहते हैं एक तीन तीन एक किंतु यह तीनों एक एक एस्पेक्ट को एमप्लीफाई करते हैं एक एक एस्पेक्ट जो है इन जो मैसेज का रामकृष्ण धर्म चक्र प्रवर्तन का उसको वह जैसे कि पसो निफा करते हैं तो अपना एक जो इंडिविजुअल धार्मिक साधना है अपनी आध्यात्मिक साधना ईश्वर प्राप्ति की वह अपनी इंडिविजुअल साधना को पर्स निफा एमप्लीफाई करते हैं श्री राम कृष्णा फिर यह ह्यूमन या तो हम एक इंडिविजुअल व्यक्ति हम अकेले तो नहीं है हम इस सोसाइटी में रहते हैं और सोसाइटी में कई बार देखते हैं हम लोग कि कोई लोग फॉर्चूनेटली में बचपन से ही ईश्वर के प्रति श्रद्धा होती है और कोई व्यक्ति देखते हैं कि छोटी-छोटी चीजों में क्रोधित हो जाता है लोलुप मय हो जाता है भोग वाद के पीछे में और ईश्वर के ऊपर में हो सकता है कि श्रद्धा है ऐसा वह मुंह से बोलता है किंतु भीतर में से तो वह पूरा मटेरियल है या तो फिर वह भौतिकवादी है तो यह जो डिफरेंस हमको जो सोसाइटी में दिखता है कई बार हम लोगों को लगता है कि ईश्वर ने इस तरह की सृष्टि की रचना क्यों की कि जिसमें कोई लोग फॉर्चूनेटली अनफॉर्चूनेटली अच्छे घर में जन्म लेता है और अच्छा खाता है पीता है बड़ा होता है किसी के साथ में बचपन से ही गरीबी और यह तो व्यक्तियों का हो गया सोसाइट देश को देखिए अभी जैसे कि अपने पड़ोस में जो कुछ-कुछ देश है उनके बारे में हम न्यूज़पेपर में पढ़ते हैं तो लगता है कि अरे इस तरह की परिस्थिति उन लोगों के साथ में क्यों होती है फिर हम कुछ यूरोप के देशों को देखते हैं ऐसा नहीं है कि वहां पर ट्रबल नहीं है या तो फिर वहां पर कोई क्राइसिस नहीं होता किंतु कंपेयर टू अपने पड़ोस के कुछ देशों के कंपेयर में यूरोप और अमेरिका कितने एडवांस दिखते हैं सिविलाइजेशनल सोसाइटल इकोनॉमिकली पॉलिटिकली तो यह जो सिविलाइजेशनल क्वेश्चन है कि व्हाई सिविलाइजेशन राइज वाई सिविलाइजेशन फॉल्स व्हाई सम नेशंस आर मोर फॉर्चूनेटली स्केल स्टडी तो स्वामी जी ने इसके बारे में काफी आलोक पात किया है काफी डिस्कशन किया है और आखिर में हो गया फैमिली लाइफ मैं मैं इस देश का नागरिक हूं और मैं साधना भी करता हूं किंतु सबसे ज्यादा मेरा इंटरेक्शन मेरा वार्तालाप या मेरी जो मेंटल हेल्थ है उसके ऊपर में यदि कोई एक एंटिटी है कोई एक ग्रुप है जिसका सबसे ज्यादा असर होता है तो वह है मेरा फैमिली ऐसे कितने ही साइकोलॉजी में स्टडीज की गई है कि जो एक हेल्दी फैमिली में से एक लविंग फैमिली में से जो बच्चा आता है भविष्य में उसका विद्या शक्ति उसकी संकल्प शक्ति यह सब काफी कुछ वो डेवलप कर सकता है और जो बच्चे इस तरह के फैमिली में से आए हैं जहां पर डाइवोर्स हुए हो ना कि फिर वहां पर झगड़ा होता हो ना कि फिर वहां पर किसी ना किसी तरह की ट्रबल चल रही हो तो यह बच्चे बड़े होकर के किसी या तो डिप्रेशन का भोग बन जाते हैं या तो फिर इनके भीतर में किसी ना किसी तरह की क्रिमिनल टेंडेंसीज आ जाती है तो यह सब फैमिली जो है यह फैमिली ही हमारे ऊपर में सबसे ज्यादा असर करता है तो यह फैमिली लाइफ कैसे लीड की जाए गृहस्थ जीवन के आदर्श क्या है यह हमको बताया है मां ने अपने खुद के जीवन में जी कर के तो यह तीन आदर्श है एक तो एक व्यक्तिगत ईश्वर को प्राप्त करने की साधना एक फैमिली लाइफ एक गृहस्थ जीवन हमारा एक विद्या का संसार जिसमें रहकर के हमारा पालन पोषण होता है और हम बढ़कर के बड़े होकर के एक अच्छे नागरिक हो सकते हैं और तीसरा है यह देश या यह समाज या तो फिर ये सिविलाइजेशन तो ये तीन एस्पेक्ट को तीनों लोग एमप्लीफाई करते हैं इन देयर ओन वे इसका अर्थ यह नहीं है कि मां ने व्यक्तिगत साधना नहीं की या तो फिर यह सिविलाइजेशन के बारे में अपनी जो अंडरस्टैंडिंग है उसके ऊपर में मां का कोई मंतव्य नहीं है या तो फिर इंडिविजुअल साधना या फैमिली लाइफ के बारे में स्वामी जी को कुछ नहीं कहना इट इज नॉट लाइक दैट इट इज नॉट लाइक कि यह लोग एक्सक्लूसिवली वही एस्पेक्ट के ऊपर में फोकस करते हैं ओनली थिंग इज दे एमप्लीफाई दोज एस्पेक्ट्स और यह जो हम जब यह सोचते हैं कि सिर्फ ठाकुर नहीं आए उन्होंने सिर्फ इंडिविजुअल साधना नहीं की उन्होंने सिर्फ ईश्वर प्राप्ति के बारे में नहीं बोला राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन स्वामी जी जी के माध्यम से हमको बताया है एक परफेक्ट एक फैमिली लाइफ या गृहस्थाश्रम कैसा होना चाहिए मां के माध्यम से बताया है तो यह क्या बताता है पता है यह वेदांत जो है बहुत बार वेदांत को एक वर्ल्ड नेगेटिंग वेदांत कहा जाता है कि यह जो पूरा जगत संसार है उसी को वह जैसे कि मिथ्या बोलकर के छोड़ देता है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या यह जो शब्द वाक्य है उसका इस तरह से कभी-कभी एक अर्थ घटन किया जाता है इंटरप्रिटेशन किया जाता है कि जगत में क्या हो रहा है इस सब चीजों से हमको कोई लेना देना नहीं है यदि मैं बड़ा ही निष्ठावान साधक हूं यदि मैं एक बड़ा ही सिंसियर एस्पायरेंट हूं तो मुझे जगत को छोड़ कर के वन में चले जाना चाहिए सन्यास ग्रहण करके मेरे जितने भी परिवार जन है उन सबको त्याग करके मेरी जितनी भी यह करियर और फैमिली ये दो चीजें होती है किसी भी व्यक्ति के मन में सबसे ज्यादा वह मन को अधिकार करके बैठती है किसी भी की एंबिशन होती है तो कैरियर और फैमिली यह दो एंबिशन सबसे बड़ी होती है तो यह कैरियर को भी और फैमिली को भी छोड़ कर के आपको फिर अपने ईश्वर इष्ट देवता या तो फिर ब्रह्मण या तो आत्मन जिसमें आपकी निष्ठा है उसको प्राप्त करने के लिए जो साधन पद्धति का आप अनुसरण करते हैं उसमें डूब जाना चाहिए दिस वर्ल्ड नेगेटिंग वेदांत ऐसा कभी-कभी ऐसा इंटरप्रिटेशन होता है किंतु देखिए कि ठाकुर का जो वेदांत था यह यदि वर्ल्ड नेगेटिंग वेदांत होता तो स्वामी जी ना ही सिविलाइजेशनल स्टडी करते ना ही मां गृहस्थ आश्रम में रह कर के हमको गृहस्थ का आदर्श दिखाती दैट मींस कि ठाकुर के साथ में मां और स्वामी जी आए हैं और उन्होंने गृहस्थाश्रम और सिविलाइजेशन या तो फिर समाज इन दोनों के ऊपर में स्टडी किया है इनका आदर्श दिखाया है दैट मींस कि स्वामी ठाकुर का जो वेदांत है दैट इज अ वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांत यह जगत को साथ में लेकर के यह वेदांत चलता है ठाकुर ने कहा ना कि ये बेल का फल है फ्रूट है उसमें से जद आप भीतर का सार ही लोंगे ऊपर का यह जो शेल है हार्ड शेल उसको जद आप फेंक देंगे तो फिर वो वजन में कम पड़ जाएगा यदि बेल फूल का जयदिश है ऊपर का जो कवरिंग है और भीतर का यह जो सार है इन दोनों को लेकर के उसका वजन करना पड़ेगा यदि सार ही लोंगे ऊपर का कवरिंग हटा दोगे तो वो वजन में कम पड़ जाएगा यह ठाकुर कहते हैं तो अर्थात कि ठाकुर का ये वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांत है संसार का त्याग करना है किंतु संसार के साथ में भी रहना है किस तरह से वो देखेंगे किंतु संसार मिथ्या है इस तरह से ठाकुर कभी नहीं कहते ठाकुर कहते हैं कि संसार के प्रति अपनी वासना जो है संसार में अपनी जो लोलुपता है इसको आपको त्याग करना है संसार त्याग करके आप कहां जाएंगे संसार के भीतर में ही रहना है संसार भी वही ब्रह्मण का ही बना हुआ है जैसे ठाकुर कहते हैं सीढ़ी पर चढ़ के हम छत के ऊपर में गए एक मकान की यह सोच करके कि यह जो जगत है उसको मैं त्याग कर रहा हूं छत के ऊपर में जाकर के रहूंगा तो नेती नेती करके ऊपर गए ऊपर में जाकर के देखा छत के ऊपर में कि जिस चीज की ये छत बनी है वही ईट वही रेती वही सैंड वही सीमेंट उसी चीज का यह पूरा जगत बना है अब कहां पर किसको छोड़ के कहां पर जाएंगे तो फिर इती इती करके इस जगत में वापस आना है अर्थात कि जिस ब्रह्मण जिस पदार्थ का बना है या तो फिर ब्रह्मण का जो स्वरूप है वही स्वरूप इस संसार का भी है या तो कहेंगे ब्रह्मण ही अपना स्वरूप परिवर्तन करके संसार में संसार के रूप में हमको दिखाई दे रहे हैं तो ये हो गया कि ठाकुर का वेदांत देखिए कि शंकराचार्य का वेदांत आपको समझना है तो वो जो उपमा दी जाती है हमेशा सर्प और रस्सी की आप आप अंधेरे रास्ते पर जा रहे हैं एकाएक आपको रास्ते में एक सर्प दिखाई दिया साप दिखाई दिया स्नेक तो स्नेक को देख कर के आप कहेंगे कि अरे यह साप है रास्ते में उसको देख कर के आप डर गए आपका हार्ट पल्पिटेटिंग दक होने लगा किंतु फिर आपने जैसे ही इस सर्प के ऊपर में प्रकाश फेंका मोबाइल में आजकल तो सभी के पास में वह मोबाइल टॉर्च होता है मोबाइल के भीतर में टॉर्च का फशन होता है तो वह टॉर्च ऑन किया तो पता चला कि यह सांप नहीं है यह तो एक रस्सी है रस्सी भी अंधेरे में आपको सांप जैसी ही दिखेगी रस्सी के ऊपर में आपको साप का भ्रम हुआ है तो वैसे ही ब्रह्मण के ऊपर में यह जगत आरोप होता है उसको अध्यारोपण के ऊपर में हमको जगत दिखाई देता है तो और यह अपवाद की क्रिया है अध्यारोपण के ऊपर में जगत दिखाई देता है और फिर अपवाद रूपी उपासना करके यह जगत जो है उससे मुक्ति पा कर के इसके पीछे का जो ब्रह्मण है उसको प्राप्त करना है किंतु यदि ठाकुर का उदाहरण देखेंगे ठाकुर कैसे ब्रह्मण और शक्ति या तो जगत को समझाते हैं ठाकुर कहते हैं यह जित ये समुंदर है समुंदर में बहुत सारे एक के बाद एक वेव्स हमको दिखा दिखाई दे रहे हैं यह उदाहरण एक्चुअली स्वामी जी ने राजयुग में इस्तेमाल किया है अभी कुछ दिनों पहले इसको हमने पढ़ा था तो स्वामी जी क्या कहते हैं कि यह जो समुंदर के ऊपर में हमको बहुत सारे वेव्स दिखाई देते हैं कोई छोटा वेव है यानी कि तरंग है कोई छोटी लहर है कोई बड़ी लहर है कभी-कभी उसमें बबल्स भी दिखाई देते हैं समुंदर में किंतु यह सब कुछ समुंदर के पानी का ही बना हुआ है कोई भी यह नहीं कह पाएगा कि समुंद र को यदि देखेंगे तो एक सपाट दिखता है फ्लैट दिखता है और वेव्स होता है वह हमको उसका हाइट ज्यादा दिखता है तो दोनों का शेप अलग है तो दोनों का प्रकृति या गठन अलग है नहीं दोनों का गठन जो है दोनों के भीतर का जो कांस्टीट्यूएंट एलिमेंट है वाटर या तो h2o वो एक ही है समुंदर के रूप में हमको फ्लैट दिखाई देता है तरंगा का में हमको वह उसका टोल दिखाई देता है बस इतना ही डि से कांस्टीट्यूएंट एलिमेंट इज सेम तो यह हो गया ठाकुर का वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांत कि ठाकुर सिर्फ ईश्वर साधना के बारे में ही नहीं किंतु इस सोसाइटी के बारे में किस तरह से सोसाइटी में कोई फॉर्चूनेटली करता है कोई देश है जो कि यह सिविलाइजेशनल रेस में पीछे रह जाता है यह तो बताते हैं साथ में ही गृहस्थाश्रम आदर्श कैसा होना चाहिए चाहिए वो भी दिखाते हैं तो यह ठाकुर और मां का आना ट इट सेल्फ इज अ बिगेस्ट आर्गुमेंट इन फेवर ऑफ दिस वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांता कोई कहेगा थियोरेटिकल बैठ कर के आप कितनी ही आर्गुमेंट कर लीजिए कोई कहेगा शंकराचार्य ने जो कहा है वही ठाकुर ने कहा है आप कर सकते हैं यदि आपके पास में वह कैपेसिटी है शास्त्र और रामकृष्ण दोनों को पढ़ने की तो आप इस तरह की बहुत बातें कर सकते हैं किंतु ठाकुर के साथ में मां और स्वामी जी का आगमन ही बताता है कि ठाकुर शंकराचार्य से कितने भिन्न है देखिए दोनों ने संन्यास ग्रहण किया ठाकुर ने भी संन्यास ग्रहण किया था शंकराचार्य ने भी किया था किंतु ठाकुर का कैसा था कि मां जद चंद्रा मणि देवी उस समय दक्षिणेश्वर में रहती थी तो ठाकुर ने तोतापुरी अपने सन्यास गुरु को कहा कि देखो मां यहां पर रहती है उनको जद पता चल जाएगा कि मैंने सन्यास लिया है तो वह बड़ी ही दुख हो जाएगी तो मुझे चोरी चुप के सन्यास यदि ले सकता हूं तो मैं लूंगा तो तोतापुरी एग्री हो गए कि अच्छा ठीक है चलो अभी सन्यास साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेने के बाद में अद्वैत वेदांत में अद्वैत स्टेट में वो स्थित हो जाने के बाद में फिर तोतापुरी ने ही ठाकुर को क्या कहा तुम्हारा तो विवाह हो गया है तो यदि अपनी पत्नी के साथ में रहते हो और मन में किसी भी तरह की कामना वासना नहीं जागृत होती है तो ट इज द वो दैट इज अ साइन कि तुमने जो अद्वैत सिद्धि प्राप्त की है वह सही सही है उसमें किसी भी तरह की भेल सेल नहीं है या किसी भी तरह की मिलावट नहीं है तो ठाकुर फिर मां के साथ में रहे थे किंतु मन में वासना का एक परसेंटेज भी उदय नहीं हुआ था तो ट इज के सही सही अद्वैत वेदांत में या तो फिर अद्वैत साधना में उन्होंने सिद्धि प्राप्त की थी तो ये देर इज अ डिफरेंस शंकराचार्य का है कि मां को रुलाकर के मां के मां को छोड़ कर के मां को त्याग करके वह चले गए थे वन में हालांकि मां ने प्रॉमिस किया था कि जब मेरा मृत्यु होता है तब तुम वापस आना मुझे मुझे आखिरी दर्शन देने के लिए क्योंकि मृत्यु क्या है कि मृत्यु वैसे भी जितने भी वावस होती है अपनी जितनी भी यह होती है वह सबको वो एक तरह से वोह यह कर देता है उसको नेगेट कर देता है तो मृत्यु के समय शंकराचार्य अपनी मां को दर्शन देने के लिए वापस आए थे तो यह एक बात है किंतु इन जनरल देखिए कि डिफरेंस कितना बड़ा है एक तो है कि हार्डकोर वेदांती शंकराचार्य को कहेंगे त्यागियो के महाराजा मतलब जो जिसको कि फॉर्मल एक संन्यास कहते हैं विधिवत संन्यास उसका उन्होंने एक एमप्लीफाई किया ठाकुर के भीतर में सन्यास के सभी गुण थे किंतु रहते थे मां शारदा देवी के साथ में तो दैट इज वन डिफरेंस कि यदि आप कहेंगे कि त्याग करना है त्याग कैसे करना है मन से त्याग करना है आप संसार को इट सेल्फ त्याग नहीं कर पाएंगे हां जैसे कि हम लोग हैं ठाकुर ने खुद ने स्वामी जी को कहा कि घर छोड़ कर के आपको संघ बद्ध होकर के रहना है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु इवन हम लोग भी देखिए कि संघ बद्ध होने के बाद में ऐसा नहीं है कि बस शास्त्र अभ्यास करेंगे और साधना करेंगे जगत के कल्याण के लिए जितना हो सके उतना कार्य हम लोग करते हैं इवन हम लोग भी नहीं कहते कि जगत मिथ्या है यदि जगत मिथ्या हो जाता तो इतनी रिलीफ एक्टिविटी इतनी हॉस्पिटल इतनी स्कूल यह सब कौन चलाता तो हम भी जगत को इस तरह से स्वीकार करते हैं कि द वर्ल्ड इज अ पार्ट ऑफ ब्राह्मण और वर्ल्ड अपीयर्स ब्राह्मण इन वन वे अपीयर्स और रिफॉर्म्स इट सेल्फ ट्रांसफॉर्म्स इट सेल्फ इनटू द वर्ल्ड तो इतना तो हम लोग भी स्वीकार करते हैं तो ये एक बात हो गई किंतु इसके बाद में दूसरा पॉइंट आप देखिए कि क्या फिर इस तरह से जो आप सन्यास लेते हैं विधिवत सन्यास क्या इसके भीतर में ज्यादा कुछ सार नहीं है यदि मैं सन्यास नहीं लूंगा या तो फिर त्याग नहीं करूंगा जगत में ही जयदिश प्राप्ति नहीं होगी तो यहां पे एक बात किंतु याद रखनी है ठाकुर ने क्या कहा कि एक बार तो हमको सीढ़ी पर चढ़ना होगा सीढ़ी चढ़ कर के छत के ऊपर में पहुंचना होगा अर्थात कि नेति नेति करके त्याग करना होगा यह नेती नेती करके त्याग करेंगे तभी यह पता चलेगा कि जगत और ब्राह्मण एक है तभी आप इती इती करके जगत में वापस आ पाएंगे तभी अभी से स्टार्टिंग से ही मैं कहना शुरू कर दूं कि यही जगत है यही ब्रह्मण है और यह ब्रह्मण ही तो जगत है तो फिर मेरे मन में वही कामनाएं वासना वैसी की वैसी ही रह जाएगी वो जो फेमस कहानी है ना वो बहुत बार हमने इसको डि किया है कि एक किसी साधु को एक मैजिस्ट्रेट के पास में ले आया गया तो जज ने पूछा क्यों रे तुम साधु होकर के इस तरह का दुष्कर्म क्यों करते हो तो यह साधु वेदांती था उसने कहा कि महाशय मैंने कहां दुष्कर्म किया है मेरे शरीर ने किया है मैं तो यह शरीर थोड़ी ना हूं तो यह जज थे वह भी वेदांती थे तो उन्होंने क्या उत्तर दिया कि ठीक है तुम्हारे शरीर को फांसी दे देते हैं तुमको छोड़ देते हैं एक्चुअली ये शरीर मैं नहीं हूं यह मुंह से बोल ने से तो नहीं होगा इसको अपने प्रत्येक कोष में प्रत्येक अणु परमाणु में उसको हमको साक्षात का करना पड़ेगा तभी तो कहीं जाकर के हम कह पाएंगे कि यह जगत सिर्फ ईश्वर ही नहीं यह मतलब सिर्फ ईश्वर ही नहीं यह जगत भी सही है ब्रह्म सत्य जगत सत्य यह जो रयान जी महाराज अपने जो आखिरी समय में जो उनका मृत्यु का समय आ रहा था उस समय उन्होंने कहा था तुर नंद जी जैसा वेदांत कौन जानता है अपने ऑर्डर में तो दर्यान जी ने आखिरी समय में कहा था कि इतना पूरा जीवन का जो अनुभव है उससे मैंने क्या सीखा ब्रह्म भी सत्य जगत भी सत्य किंतु यह ब्रह्म भी सत्य जगत भी सत्य ये यह कब कह पाए पूरा जीवन उन्होंने कठोर साधना की कठोर त्याग किया तब कहीं जाकर के आखिर में यह अनुभूति हुई कि ब्रह्म भी सत्य और जगत भी सत्य अर्थात कि आपको एक बार तो त्याग कर लेना पड़ेगा एक बार तो आपके मन को इस भट्ठी के भीतर में डालना पड़ेगा यह जो ये होता है ना कुंभार जो होता है जो पोट मेंक पोटर जो होता है वो उसको यह पोट बनाना है यह मिट्टी की सब चीजें बनानी है तो वह क्या करेगा उसको बना कर के फिर भट्ठी में डालेगा भट्ठी में वो गर्म होगा वो तपे तब कहीं जाकर के वो शक्त होगा वो यह होगा उसका प्रॉपर शेप उसका मेंटेन होगा घड़े को भट्ठी में नहीं तपाए उसको नहीं जलाएंगे तो घड़ा टूट जाएगा वह नरम का नरम ही रहेगा उसको आप पानी भरने के लिए उसका व्यवहार नहीं कर सकते तो वैसे ही अपना जो मन है उसको यह साधन भजन रूपी उपासना रूपी भट्ठी में फेंक करके उसको आपको यह करना है उसको स्ट्रांग करना है उसको आपको यह यह करना है अ सोवियत यूनियन का जब निर्माण हुआ था उस समय बहुत कष्ट उनको झेलना पड़ा था तो एक किताब लिखी गई हाउ द स्टील वाज टेंपर्ड वो बहुत फेमस हुई थी नॉवेल है और नोवल में इस तरह से है कि किस तरह से कुछ लोगों ने मेहनत करके रेलवे लाइन वगैरह जो है उसको तैयार किया था जिससे कि वॉर के लिए यह आपके इक्विपमेंट्स भेजे जा सके तो वोह भयानक उनको जो कष्ट करना पड़ा किंतु जब देश प्रेम जब जागृत हो जाता है तब यह नहीं होता कि मेरा फैमिली मेरा हेल्थ यह सब छोड़ कर के सब भूल कर के आपको देश के लिए कार्य करना है युद्ध होता है तो क्या होता है सरहद के ऊपर में सैनिक अपने जान की बाजी लगा कर के दुश्मनों के साथ में युद्ध करते हैं फिर देश के भीतर में क्या होता है स्त्रियां जो होती है अपने गहने सब वह गवर्नमेंट को दे देती है क्योंकि वह जो खर्च होगा व एम्युनिशन वगैरह जो लानी पड़ेगी गवर्नमेंट के पास में पैसा कहां से आएगा तो महिलाएं अपने अच्छे वस्त्र अपने गहने यह सब डोनेट कर देती है कितने देशों में ऐसा होता है और जिस देश में ऐसा नहीं होता कि वह सैनिक जो है जी जान लगा कर के फाइट करें या तो स्त्रियां अपने से जो हो सके उतना कार्य करें देखिए ये जो वीमेन एंपावरमेंट आज का जो है मॉडर्न वीमेन एंपावरमेंट वो पता है कहां से आया है सेकंड वर्ल्ड वॉर में फैक्ट्री में काम करने के लिए पुरुष लोग नहीं थे क्योंकि ज्यादातर पुरुष तो सरहद के ऊपर में युद्ध करते थे तो फैक्ट्री भी चलानी है वरना टैंक कौन बनाएगा एरोप्लेन कौन बनाएगा गन कौन बनाएगा एम्युनिशन कौन बनाएगा तो स्त्रियों ने फैक्ट्री में काम करना शुरू किया तो वो एक पूरा एक ब्रेक हो गया ट्रेडिशनल स्त्रियां सिर्फ घर में रहती थी पुरुष बाहर में जाकर कार्य करते थे अभी पुरुष यदि सरहद प युद्ध कर रहे हैं तो तो स्त्रियों को तो फैक्ट्री में जाकर के काम करना ही पड़ेगा यह जो पूरा हार्ड वर्क हुआ उसकी वजह से कुछ देशों की जीत हुई और जो देश इतना नहीं कर पाए उनकी हार हुई तो यहां पे भी जैसे युद्ध होता है तो पूरा सोसाइटी को अपना कंट्रीब्यूशन करना है कोई एक सोल्जर ही करेगा पॉलिटिशियन नहीं करेंगे टीचर नहीं करेंगे फैमिली नहीं करेगा कंट्रीब्यूशन तो युद्ध नहीं जीता जाएगा उसमें हमको शिकस्त प्राप्त होगी हमको हार प्राप्त होगी तो यहां पर भी आध्यात्मिक युद्ध जब कामना वासनाओं के साथ में युद्ध करते हैं तो अपना सब कुछ डाल कर के हमको युद्ध करना है पूरा जीवन मन प्राण हमको समर्पित कर देना है काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर यह जितने भी ड़ रिपु है उसको हमको पहचानना है प्रत्येक छोटी-छोटी चीजों में कि यह कहां से प्रकट होता है कहां से उसके ऊपर में अटैक करें कैसे उसको हराए कैसे उसको पराजय दे तब तो कहीं जाकर के यह आध्यात्मिक जीवन में विजय प्राप्त होगी तो यह वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांत है किंतु उसमें केविएट है उसमें एक कंडीशन है कि आपको सर्वप्रथम तो जगत का त्याग करना होगा सर्वप्रथम तो आपका विल पावर जो है उसको आपको एकदम सॉलिड बना देना होगा कि भी किसी भी तरह के प्रलोभन से व उसके सामने झुक ना जाए उसके भीतर में वह आबद्ध ना हो जाए उससे आकर्षित होकर के अपनी तपस्या को छोड़ कर के उसके पीछे में दौड़ना शुरू ना कर दे तो ये विल पावर को प्रचंड मजबूत करना होगा उसको प्रचंड शक्तिशाली करना होगा फिर आप कहिए कि हां इति इती करके जगत में वापस आइए और कहिए कि यह ईश्वर और यह जगत दोनों एक ही है और फिर यहां पर जैसे ठाकुर मां को कहते हैं कि कोई बीमार होता है तो उनकी खबर लेनी है और मां के पास में यदि ऐसी स्त्री आती है जिसका जिसका चरित्र अच्छा नहीं है फिर भी मां कहती है कि मेरे पास में आकर के मां बोल कर के कोई मुझसे कुछ मांगेगा तो मैं बिना दिए नहीं रह पाऊंगी यह जो मातृत्व शक्ति या तो फिर यह करुणा शक्ति कंपेज भगवान बुद्ध व उन्होने देखा कि वह जो एक पारधी है एक पक्षी को मारने वाला वह पक्षी को मार रहा है तो उन्होंने क्या किया अपने पैरों में से पक्षी के जितना वजन है उतना यह जो मांस काट करके उसको दे दिया यह जो कंपेरिजन है जीवन में सभी के प्रति पशु हो पक्षी हो मनुष्य हो स्त्री पुरुष बूढ़ा बच्चा जो भी हो सबके प्रति मन में से यह करुणा कंपेज या तो फिर मातृत्व वह कब प्रकट होगा जबकि एक बार हमने नेति नेति करके जगत को त्याग कर दिया है और फिर ब्रह्म भाव में या तो ईश्वर दर्शन में स्थित हो गए हैं तब कहीं जाकर के यह सेकंड फेज स्टार्ट होगा अपनी साधना का या तो अपने आध्यात्मिक जीवन का इति इती फेज अर्थात कि वही ईश्वर और यही जगत और मैं यह एक ही तीन है तीन ही एक तरह से एक हुए हैं तो यह अपना जो कल डिस्कशन हो रहा था उसके ऊपर में एक थोड़ा सा यह अच्छा दूसरी एक बात हमने कल देखी थी कि ठाकुर ने मां को कहा था कि यदि कोई बीमार होता है तो बीमार व्यक्ति को जाकर के थोड़ा सा उसकी खबर लेनी होती है यदि तुम खबर नहीं लोगे तो फिर क्या होगा पता है ना कि ऐसा लगेगा कि जैसे कि हम लोग किसी की के भी नहीं करते हैं तो वह ठाकुर जैसे कि हमने सोचा था ना कि ठाकुर दो तरह से मां को शिक्षा देते हैं एक तो लोक व्यवहार दूसरी है आध्यात्मिकता तो लोक व्यवहार में लोगों के प्रति करुणा लोगों के प्रति मातृत्व का प्रदर्शन या तो फिर जो बीमार है उसकी केयर करना यह सब चीजें आ जाता है मां को यह सब सीखने की जरूरत नहीं थी मातृत्व के राज्य में तो मां ही सर्वोपरि है ठाकुर से भी ज्यादा किंतु फिर भी अभी यह जो समाज में रहते हैं तो समाज के जो कुछ प्रैक्टिकल जो बातें हैं ठाकुर को पता थी मां एक प्रोटेक्टेड लाइफ में उनका प्रोटेक्टेड उनका जीवन था मां का समाज का इतना अनुभव नहीं था इसलिए ठाकुर को मां को समझाना पड़ा अभी यह सब मैं जब पहली पहली बार पढ़ रहा था कि हां कोई बीमार है तो जाकर के उसकी केयर करनी है या तो फिर यह जो अपने ऑर्डर में जब मैं पहली बार आया था मैं अपना खुद का कुछ पर्सनल अनुभव शेयर करता हूं कि उस समय देखिए कि यह तो एक बात है कि राइज फॉल ऑफ सिविलाइजेशन क्या है कंपेज क्या है किस तरह से अपना जीवन हमको लोगों के कल्याण के लिए समर्पित करना है यह सब तो मैंने समझा समझ कर के ही मैं यहां पर आया था किंतु यहां पर आकर के देखा कि एक जो एक कॉस्मिक लेवल जो एक कंपेरिजन होता है ना अपना कि गरीबों प्रति अपनी दया है जो पिछड़े हैं उनके प्रति दया है और उनके लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं वो एक हो गया मैंने सिविलाइजेशनल लेवल कंपेज एक फैमिली लेवल कंपेरिजन है जो कि मैंने कभी मेरे जीवन में इतना कभी नहीं था क्योंकि मैं बहुत ही ज्यादा इंट्रोवर्ट हूं बहुत कम बातें करता हूं ज्यादातर मुझे पढ़ाई लिखाई या तो काम करने में ही ज्यादा इंटरेस्ट है कोई व्यक्ति कहां पे है क्या कर रहा है उसके साथ में फ्रेंडशिप रखना उसकी कोई फिक्र करना यह जो एक फैमिली लेवल पे जो होता है वह इतना मेरा नहीं था अभी भी नहीं है तो शुरुआत में तो बिल्कुल नहीं था मैं बहुत ही ज्यादा लोगों को अवॉइड करता था लोगों के साथ में बात करने पे और किंतु मैंने यहां पे आके देखा कि ये जो जिसको फैमिली कहते हैं ना उसका ये वैल्यू इतना स्ट्रांग है सभी लोगों के भीतर में हमारा ट्रेनिंग सेंटर है बेलूरमठ में तो दो तरह के ट्रेनिंग सेंटर एक तो प्री प्रोबेशनर एक प्रोबेशनर दोनों में मैं रह चुका हूं तो सब समय और फिर आश्रम में भी देखिए कि साधु लोग दूसरे साधुओं की उनकी संभाल रखेंगे या तो पूछते रहेंगे अच्छा तुम कैसे हो फिर उनके साथ में सहज वार्तालाप करना ऐसा नहीं है कि अ उसको कुछ जरूरत है और जाकर के हेल्प कर रहा है ऐसा कुछ नहीं जस्ट उसके साथ में गप लगाना तो ये साधुओं के साथ में गप लगाना दिन भर के अपने जो अनुभव है वगैरह शेयर करना मुझे लगता था कि ये लोग आलस है और बिना मतलब समय वेस्ट कर रहे हैं इतना गप लगाया आपने एक घंटा बैठ कर के चाय पीते पीते तो आप उतना कुछ स्टडी कर सकते थे या तो उतना आपका काम कर दे सकते थे यह गप लगाने से इस तरह से बातें करने से क्या लाभ है ऐसा मेरे मन में बड़ा ही स्ट्रांग था और बहुत इजली मैं लोगों के साथ में मिक्स नहीं होता था किंतु ओवर ए लॉन्ग पीरियड ऑफ टाइम मैंने देखा कि लोग मेरे मन में जो भी भाव हो लोग किस तरह से इसको देखते हैं कि यह बड़ा ही घमंडी है या तो बड़ा ही एगोइस्ट है वह हमारे से बात नहीं करना चाहता और मेरे मन में दूसरों के प्रति एक ऐसा हो गया था कि यह सभी लोग तामसिक है तामसिक है आलसी है काम नहीं करना है गप लगा कर के टाइम वेस्ट कर रहा है तो दोनों ओर से एक नेगे नेगेटिव फीलिंग को प्रारंभ हुई थी उनके मन में मेरे प्रति और मेरे मन में उनके प्रति और धीरे-धीरे करके अभी जब नेगेटिव फीलिंग प्रकट होती है तो आपके मन में वह तो कष्ट तो होगा ही क्योंकि यदि आपको एक हेल्दी एनवायरमेंट ना मिले रहने के लिए काम करने के लिए तो फिर आपका जो क्रिएटिविटी है प्रोडक्टिविटी है आपकी साधना है वो इवेंचर होगा और मेरे साथ में वो होना शुरू हो गया कि जब भी मैं आंख बंद करके बैठता हूं तो वही किसी के बारे में याद मने किसी की बात याद आती है अरे वो बिना मतलब टाइम वेस्ट कर रहा था किसकी निंदा कर रहा है यह कर रहा है और मैंने देखा कि मेरा जो एक एटीट्यूड हो गया था दूसरों के प्रति नेगेटिव दूसरों के मन में भी मेरे प्रति एक नेगेटिव एटीट्यूड डेवलप होना शुरू हुआ तो मैंने फिर सोचा कि नहीं देखिए ऐसा होना तो ठीक नहीं है मुझे अपने को सेल्फ एनालाइज करना होगा क्योंकि यह तो वेदांत यही कहता है कि जो समस्याएं हैं वह बाहर में नहीं है अल्टीमेटली एट द एंड ऑफ द डे दो तरह से देखिए कि मेरे भीतर में वही आत्मन है वही उसके भीतर में है यदि आप वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांत की दृष्टि से देखेंगे तो फिर वो कैसे गलत हो सकता है यदि वो गलत है तो मैं भी गलत हूं मैं तो ऐसा नहीं कह सकता मैं सही हूं वो गलत है और यदि वर्ल्ड नेगेटिव वेदांत की दृष्टि से देखेंगे तो ब्रह्म में ही मेरे भीतर में जो आत्मा है वही सत्य है उसका जो बाह्य रिफ्लेक्शन जो है दूसरे व्यक्तियों के रूप में में वो तो मिथ्या है दोनों दृष्टि से देखिए कि जो प्रॉब्लम है उसका सोर्स मेरे ही भीतर में है मुझे ही अपने को सेल्फ एनालाइज करना होगा फिर मैंने यह जो मां को समझ समझना जो सही सही प्रारंभ किया कि हां मां का यह जो फैमिली वैल्यू है कि जितने भी लोग अपने आसपास में रहते हैं उनकी केयर करनी है उनके साथ में आप बात करते हैं तो आप टाइम वेस्ट नहीं करते हैं आप एक एक इमोशनल कनेक्ट उनके साथ में डेवलप करते हैं सोता था कि मैं काम करता हूं तो अपनी ऑफिस में जाकर के मेरा तो यह सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन है और क्या इनको कंट्रीब्यूशन चाहिए किंतु देखिए कि दिस इज नॉट इनफ संसार में जद रहते हैं तो हम सभी का एक ना एक फैमिली होता ही है कोईकोई लोग जदी जिसका फैमिली नहीं भी होता है अनमैरिड है और अकेले रहते हैं मान लीजिए किसी महानगर में बंबे बेंगलोर यहां पर देखेंगे कि ये लड़के लड़कियां अकेले रहते हैं जॉब करते हैं तो इवन जो जॉब करते हैं आपके जो टीममेट्स जो है टीम मेंबर्स जो है आपकी टीम के दैट इज योर फैमिली और सिर्फ काम करना है काम निकाल लेना है लोगों का एक्सप्लोइटेशन कर लेना है यह भावना नहीं रखनी वी हैव टू कनेक्ट विद देम ऑन ह्यूमन लेवल यह जो रियल लीडरशिप है ना उसका यही तात्पर्य है कि आपके जो टीम मेंबर्स जो है टीम वर्कर्स जो है आपके साथ में कलीग्स जो है उनके साथ में आपको एज अ फैमिली मेंबर है इस तरह से आपको कनेक्ट करना है जो ग्रेटेस्ट लीडर जो होता हैं हालांकि हमने यह स्टीव जॉब्स जैसे लीडर्स को भी देखा है आज की दुनिया की जो मोस्ट वैल्युएबल कंपनी है ही यूज टू ट्रीट हिज एंप्लॉयज मने सो बेडली अ स्टीव जॉब्स की बहुत सारी कहानियां है कि उसके जितने भी एंप्लॉयज थे इतना डांटता था इतना इंसल्ट करता था वगैरह वगैरह किंतु क्या है पता है कभी-कभी किसी एक पार्टिकुलर परिस्थिति में यह सब कर सकते हैं यदि आप इसको कंटिन्यू करना चाहे तो इस तरह की पलिस हमेशा के लिए सक्सेसफुल नहीं होगी एक समय ऐसा आएगा कि जो टैलेंट है आपको छोड़ कर के जाना शुरू कर देगी आप इ कितना ही रुपया दे वे लोग आपके साथ में नहीं रहेंगे क्योंकि एट वन पॉइंट यह जो पीस ऑफ माइंड जो है सबको प्यारी है आप लाखों करोड़ों रुपया मिल जाए किंतु वर्क प्लेस में सतत एक तरह का टेंशन बना रहेगा तो फिर मैं सोचूंगा भले भैया बहुत हो गया जितना रुपया हो गया हो गया अभी निकल लो यहां से तो वो फिर ट्रेशन रेट बढ़ जाएगा एंप्लॉयज का यानी कि आपका वर्क प्लेस हो ना कि ये आश्रम हो ना कि यह फैमिली हो आपको ह्यूमन लेवल पे आप जिनके साथ में रहते हैं जिनके साथ में नियमित कार्य करते हैं यू विल हैव टू कनेक्ट विद देम यदि आप ह्यूमन लेवल प कनेक्ट ना हो पाए जब दिन प्रतिदिन की बात उनसे ना कर पाए उनके खुशी और गम को शेयर ना कर पाए तो फिर क्या होगा कि यह लोग धीरे-धीरे करके आपसे बिछड़ते जाएंगे फिर आपके पास में पावर है पोजीशन है पैसा है तो आपका सम्मान है जिस दिन आपका मिसफॉर्चून स्टार्ट हुआ लोग भी उसी क्षण आपको छोड़ कर के चले जाएंगे सो दैट इज अ वेरी वैल्युएबल लेसन आई माइसेल्फ लर्न अभी ये सीखने के बाद में ऐसा नहीं है कि मैं अपना इंट्रोवर्ट नेचर को ओवरनाइट चेंज कर पाऊंगा या तो फिर यह गप लगाना वेस्ट ऑफ टाइम है यह जो एकदम स्ट्रांग मेरे मन में जो बैठा हुआ है ओवरनाइट या एक ही साल में दो साल में मैं इससे मुक्त हो पाऊंगा नो इट इज नॉट गोइंग टू बी लाइक दैट किंतु एटलीस्ट मुझे अभी पता है कि आदर्श क्या है और मैं हमेशा एक प्रयास अभी करता हूं कॉन्शियसली करता हूं कि लोगों के साथ में बिना मतलब की बात करना है जिसको स्मॉल टॉक कहते हैं ना मैं स्टडी करता था जिनको यह स्मॉल टॉक करते देखता था तो मुझे लगता था यह लोग निकम में है पढ़ाई लिखाई के नाम पर यहां पर आते हैं स्कूल में कोचिंग क्लास में किंतु टाइम वेस्ट करते हैं है वो एक बड़ा ही स्ट्रांग मेरे मन में प्रेजुड बैठा हुआ था तो अभी आई आई कॉन्शियसली ट्राई टू डू सम स्मॉल टॉक कि अच्छा आप कैसे हैं क्या है कहां से आए हैं वगैरह वगैरह सो दिस इज अ री लर्निंग इवन फॉर मी तो देखिए कि ये जो ठाकुर का जो वेदांत है मां और स्वामी जी की प्रेजेंस से ही इट शोज अस दैट दिस इज अ वर्ल्ड एफर्मिंग वेदांता दिस इज नॉट अ वर्ल्ड नेगेटिंग वेदांता आप कहीं जंगल में चले जाइए गुफा में रहते हैं कोई आपके साथ में बात करने को आता है तो आप उसको भगा देते हैं वो जो एक पागल आदमी आया था काली मंदिर में वो जाकर के काली मंदिर में स्तोत्र पाठ करने लगा च जोर-जोर से पूरा मंदिर जैसे कि कांप गया था और व खजांची वगैरह ने देखा कि ये मतलब फटे हुए कपड़े पहने हैं लंबे-लंबे बाल हो गए हैं तो फिर जब वहां पर जब कंगाल और भिखारियों को बिठा कर के खाना खिलाते थे वहां पर भी उसको नहीं बैठने दिया कहा निकलो यहां से तो उसने क्या किया जहां पे कुत्ते के लिए जो भिक्षा फेंकी जाती है जो बचा हुआ खाना उच्छिष्ट जहां प फेंका जाता है जहां पर कुत्ते बिल्ली आकर के खाते हैं वहां प जाकर के खाने लगा और कुत्तों ने भी उसका विरोध नहीं किया वरना तो उसके पास कुत्ते का खाना छील लेंगे तो जोर-जोर से भोंकना शुरू करेगा कुत्तों ने भी जैसे कि उसको अपना ही एक मित्र है ऐसा करके उसको खाने दिया तो ठाकुर बेचारे बड़े डर गए थे कि क्या ये पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि कंप्लीट एंटी सोशल हो जाएगा आपका बिहेवियर फिर वो जा रहा है तो फिर वह हलधार वो उसके पीछे-पीछे जा रहा है बहुत पीछे गया पूछा कि यह पूर्ण ज्ञान किस तरह से प्राप्त होता है पूर्ण ज्ञान का लक्षण क्या है तो उसने कहा कि देखिए कि यह जो गंदा पानी है यह जो कादवनद कीचड़ के भीतर का जो पानी है और यह गंगा का पानी है दोनों एक समान आपको प्रतीत होने लगे तब समझना पूर्ण ज्ञान हो गया है और फिर यह और भी पीछे जाता था हलधार तो इसने क्या किया इस साधु ने पत्थर फेंक करके उसके ऊपर में उसको भगा दिया तो देखिए कि एक एंटी सोशल स्ट्रांग एंटी सोशल हे ब्रह्मज्ञानी किंतु सोसाइटी के साथ में जैसे कि उसका कोई लेना देना नहीं तोतापुरी थे वह दिगंबर रहते थे वह अग्नि प्रकट करके वह अग्नि जला करके उसके सामने बैठ कर के ध्यान करते रहते थे और पूरा मुक्त मन से विचरण करते रहते थे कहीं प एक जगह प रुकेंगे नहीं किसी के साथ में प्रेम का संबंध बनाएंगे नहीं और सतत भ्रमण करते रहना ब्रह्मज्ञान में मत रहना यह भी एक है यदि आप कहेंगे कि जगत संपूर्ण रूप से मिथ्या है जगत के साथ में किसी क तरह का कनेक्शन नहीं रखना सिर्फ ब्रह्म भाव में ही रहना है दिस आल्सो इज अ वे ऑफ वेदांत किंतु ठाकुर के वेदांत में और तो उनके गुरु तोतापुरी के वेदांत में कहो ना कि ये शंकराचार्य के वेदांत में यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस है सब्सटेंशियल डिफरेंस नहीं है किंतु इसका जो मेनिफेस्टेड डिफरेंस है वो तो है तो यह हो गए कि थोड़ा सा डिस्कशन अच्छा अभी हम आज बात को थोड़ा सा आगे बढ़ाते हैं कल हमने देखा कि ठाकुर ने मां को कहा कि अरे इतना खर्च बढ़ जाएगा तो कैसे घर चलेगा अभी ये ठाकुर कह रहे हैं ठाकुर खुद कितने मुक्त हस्त थे ठाकुर को खुद को पैसों के साथ में कोई लेना देना नहीं किंतु ऐसे ठाकुर को बोलना पड़ा तो अभी मान लीजिए कि मां किस तरह से मुक्त हस्त होगी किस हद तक उदार हृदय होगी तो मां को जैसे से ही ठाकुर ने कहा मां बिना कुछ बोले कमरे से निकल गई नबत में वापस चली गई तो फिर ठाकुर ने चिल्ला करके रामलाल को बुलाया कहा कि जा जाकर के अपनी चाची को शांत कर वह यदि रुष्ट हो जाएगी नाराज हो जाएगी तो यहां का सब कुछ नष्ट हो जाएगा आध्यात्मिक जीवन जो है ठाकुर का आध्यात्मिक उपलब्धि वह सब कहां पर विलीन हो जाएगी तो देखिए कि बात-बात में पता चलता है कि सिर्फ मां की प्रेजेंस नहीं मां की उपस्थिति मां के प्रति ठाकुर का जो प्रेम है दैट शोज दैट ये मां जिस एस्पेक्ट को एमप्लीफाई करती है वह ठाकुर को कितना प्रिय था भले ही ठाकुर ने उसके बारे में बात इतनी ना की हो अच्छा अभी आगे पढ़ते हैं श सब पुरातन दिनर कथा एक दिन श्रीमा जोगिन मा प्रवृति के सुनाते छिने वही सब पुराने दिनों की बातें एक बार मां योगिन मां को सुना रही थी योगिन मां अर्थात की मां शारदा देवी की एक जिसको कहेंगे ना जया और विजया मां दुर्गा के साथ में होती है तो मां की भी दो संगी नियां थी यह योगिन मां और गोलाप मां तो यह योगिन मां को मां यह सब बता रही थी सुनते सुनते जोगिन मार इहा जानी बार उत्सुक जागलो श्रीमा ठाकुर एकांतो अनुग तो ले ओ कौनो कोनो खेत्र तहर कथा माने ना केनो जब ये योगी मा सब सुन रही थी कि ठाकुर ने ऐसा कहा फिर भी मैं ठाकुर की बात नहीं सुन कर के मेरे मन में जो आया वही मैंने किया ऐसा जो मां एक बार कह रही थी तो फिर योगिन मां के मन में यह प्रश्न हुआ कि मां तो सब समय ठाकुर की बात मान लेती है तो फिर इस एक विषय में क्यों मां ठाकुर की बात नहीं मानती है ताले मां एकट हस्या बोली ले मां ने थोड़ा सा हंस करके उत्तर दिया ता जोगन मानुष की शप को थाई मैंने चलते प े तो योगेन कोई भी व्यक्ति क्या किसी और व्यक्ति की सब बात मान कर के चल सकता है क्या यानी कि इवन ठाकुर और मां इन दोनों के भीतर में किसी भी तरह का क्या कहेंगे पार्थ क्य नहीं होने के बावजूद मां को ऐसा कहना पड़ा कि कोई भी व्यक्ति दूसरे किसी व्यक्ति की सब बात मान कर के नहीं चल सकता पर एक टू भाभिया बोली लेन बाद में थोड़ा सा चिंतन करके कहा ता बापू जाई बोलो तो भाई जो भी कहो कव मां बोले ऐसे दाना ले ताके फहराते पार मोना कोई मां बोल कर के आके जदी खड़ा हो जाएगा तो मैं उसको फिर से फिरा नहीं पाऊंगी मैं उसको वहां से भगा दे नहीं पाऊंगी देखिए यह जैसे कि एक महामंत्र की तरह है बापू जाई बोलो क्यों मां बोले ऐसे दाड़ा ले ताके फहराते पार बोना कोई मां आ मां बोल कर के आके खड़ा रहेगा तो मैं उसको विदाई नहीं दे पाऊंगी मैं वो जो मांगेगा वह मैं उसको दूंगी ही दूंगी श्री श्री ठाकुर के व श्री मां एक दिन तहर मनोभाव परिष्कार जनाया दिया छिले ठाकुर को भी मां ने अपना मन का भाव एकदम स्पष्ट शब्दों में बता दिया था ए शेष दृष्टांत एक दिके जेमन स्वार्थ गं सुनो से बार चरम आदर्श अपर दिके ते मनी शुद्ध मुकुली तो मातृ शे सौरभ भरपूर यह जो आखिरी दृष्टांत है वो जैसे जितना स्वार्थ गंध शून्य सेवा का चरम आदर्श है दूसरी र इतना ही अभी एकदम फ्रेश जो ब्लूम हुआ है सद्य मुकुली अभी-अभी जो प्रस्फुटित हुआ है वैसे मातृ स्नेह सौरभ से मातृ स्नेह रूपी सुवास से भरपूर है तखन भक्त समागम में ठाकुरे प्रकोष्ठ प्राय पूर्ण थाकी तो उस समय भक्त समागम से ठाकुर का जो आंगन है वह हमेशा परिपूर्ण रहता था ठाकुर का आंगन यानी कि कालीवाड़ा कुर का कमरा और मां का नबत यह हमेशा लोगों की आने जाने से मुखर रहता था य तो लोकर सम्मुख लज्जा शीला माता ठाकुरानीर जावा संभव होतो ना बोलिया रात्रे आहार समय सकल के सराइया देवा होतो इतने सब लोग आते हैं जाते हैं तो मां तो इतनी लज्जा शलाला है सबके सामने तो जाएगी नहीं तो फिर ठाकुर का आहार करवाने के लिए मां जब थाला लेकर आती तो सबको वहां से जाने को कहा जाता श्री मां हाथे थाला लया श घोरे आश तेन एवं खावा शेष ना होहुआ पर जंतो बसिया थाकी तेन मां अपने हाथ में थाली लेकर आती ठाकुर के सामने बैठती और जब तक ठाकुर का आहार शेष ना होता तब तक बैठी रहती और फिर बैठे रहना पड़ता क्योंकि ठाकुर तो बात-बात में समाधि स्त हो जाते भाव में चले जाते तो मां सब सब सामान्य बातें करके करके दिन प्रतिदिन की बातें करके करके कैसे भी करके ठाकुर का मन जो है वह एक जगत में रखे रहती एक नॉर्मल भाव में रखे रहती तब कहीं जाकर ठाकुर का खाना होता वरना यदि मां नहीं जाके और कोई जाएगा और यदि बात-बात में ठाकुर को समाधि हो गई तो फिर खाना कौन खाएगा वैसे का वैसा खाना पड़ा रहेगा ठाकुर का खाना उस दिन होगा नहीं तो इसलिए मां को जाना पड़ता था एक दिन जथा समय श्री मां भज हस्ते आशिया सबे ठाकुरर घरे सी होते बंदा पा दिया छन एमन समय सहसा एक महिला भक्तो आशिया दिन मा अमाई दिन ई बोलिया माता ठाकुरानी हस्त होते थाला खानी लया ठाकुरे सम्मुख राखी लेन एवं खोने चलिया गले एक बार अपने समय के अनुसार मां अपने हाथ में खाने का थाला लेकर के ठाकुर के कमरों की सीढ़ी के ऊपर में पैर ही रखा है कि उसी समय एक महिला ने आकर के कहा मां यह थाला मुझे दीजिए ऐसा करके थाली लेकर के ठाकुर के सामने रखा और फिर वो वहां से चली गई ठाकुर आसन ग्रहण करी लेन श्री माओ पार्श्व बसी लेन ठाकुर ने आसन ग्रहण किया खाने के लिए और मां तो वही सामने ही खड़ी थी थाला उस स्त्री ने आकर के रख दिया और चली गई फिर मां भी आकर के ठाकुर के पास में बैठी किंतु ठाकुर सेही अनन स्पर्श करते पारले ना किंतु ठाकुर अन्न को स्पर्श न कर पाए श्री मायर द के चाहिया बोली लेन तुम एकही को ले और हाथ दिले केनो ओ की जानो ना मां की ओर देख कर के ठाकुर ने कहा तुमने यह क्या किया उसके हाथ में क्यों खाना दिया क्या तुम उसको पहचानते नहीं हो वोह अमु केर भाज देवर के निय था के वह किसी के साथ में रहती है उसका जो देवर है उसके साथ में उसके अवैध संबंध है एको नामी और छया खाई की कोरे अभी मैं उसके पश हुआ खाना किस तरह से खाऊंगा श्री मां बोली लेता जानी मां ने कहा वोह मुझे पता है आज खाओ आज खालो ठाकुर किंतु तखन छते पारी लेना ठाकुर किंतु तभी भी खाना स्पर्श ना कर पाए श्री मायर मिनती उत्तरे अवशेष बोली लेन जब मां किंतु बार-बार विनती करती है तब ठाकुर ने आखिर में कहा आर कोनो दिन कारो हाथे देब ना बोलो बोलो तुम यह स्वीकार करो कि और कभी भी और कि किसी के हाथ में खाना नहीं दोगी श्री मां कर जोड़े बोली लेन तब मां ने दोनों हाथ जोड़ कर के कहा तातो आमी पार्बोना ठाकुर ठाकुर यह तो मैं नहीं बोल पाऊंगी तुम्हार खाबा अमी निज नहीं आशो आपका खाना मैं खुद लेकर आऊंगी किंतु आमाई मां बोले चाहिले आमी तो थकते पार बो ना किंतु जद कोई मां बोल कर के मेरे पास में से मांगेगा तो मैं रह नहीं पाऊंगी और तुम तो शद हमार ठाकुर नो तुम कोलेर और तुम सिर्फ मेरे ठाकुर नहीं हो आप तो सभी के ठाकुर है तखन ठाकुर प्रसन्न होया आहारे बोशी लेन मां ने जब ऐसा कहा तब ठाकुर ने प्रसन्न होकर के फिर से आहार ग्रहण करना शुरू किया अभी इसके ऊपर में काफी कुछ डिस्कशन कर सकते हैं किंतु आज समय समाप्त हो गया है कल करेंगे ओ शांति शांति शांति हरि ओम त श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु इसको मैं कहता हूं सोशल टेक्स ये क्योंकि मेरा भी तो इतना एक्सट्रीमली इंट्रोवर्ट नेचर है तो लोगों की बात सुननी पड़ेगी अच्छा देखिए अभी मैं अपनी बात करता हूं वहां तक तो ठीक है या तो फिर जैसे आपने कहा कि जब ठाकुर म स्वामी जी की बातें चलती है वहां तक भी ठीक है किंतु फिर संसार में तो सभी लोग इसके बारे में बात नहीं करते विभिन्न तरह की मानसिकता होती है फिर कई लोग क्या होते हैं कि जब बात करेंगे ना तो बातों के साथ में उनके भीतर का स्ट्रेस है ना वो भी कम्युनिकेट करते हैं और उनका स्ट्रेस अपने पे आ जाता है तो अभी उस समय क्या करें मने टॉक्सिक हो जाता है इस तरह का रिलेशनशिप तो मन में होता है कि कभी इस फ्रेंडशिप को अभी छोड़े या तो इसकी कंपनी में से जाए यहां पे किंतु क्या है कि देखिए इसी को कहते हैं सोशल टैक्स आपको यह सोसाइटी में रहना है तो यह टैक्स देना पड़ेगा अभी नॉट नेसेसरी कि आप यू गो आउट ऑफ योर वे टू मने इनके साथ में बात करने के लिए किंतु यदि आप इनके साथ में नियमित रूप से किसी व्यवहार करते हैं देन यू विल हैव टू पे दिस टैक्स मने इनके साथ में बात करके उनके भीतर का जो भी है स्ट्रेस है टेंशन है एंजाइटी है वह अपना थोड़ा सा शेयर करना पड़ेगा सोसाइटी में रहना इसी को कहते हैं और दूसरी बात है कि देखिए कि एक बार तो आपको मन को शक्त मतलब सशक्त करके आपको नेती नेती करके कोई एक लेवल पर चले जाना है यानी ऐसा नहीं है कि सोसाइटी में आपको फ्रॉम द डे वन आपको यह सब मिलना लोगों के साथ में बात करना यह सब करना है एक समय आपका खुद का होना चाहिए कि जिस समय आप पूरे जगत से दूर होकर के सिर्फ ईश्वर चिंतन ही करते हैं मां को ही देखिए ना ठाकुर की महा ये बिंदु वासिनी नाम क्यों दिया है कि उस समय मां बहुत कम लोगों से मिलती थी यह साधन भजन का समय था ठाकुर की महास माध के बाद में भी मां जब वृंदावन काशी वगैरह गई थी फिर बाद में कामर पुकुर में रही थी बहुत ही कम लोग मां के पास में आते थे बाद बाद में स्वामी जी की महासमाधि के बाद में और यह जो उद्बोधन भवन का निर्माण हुआ मां क्वाल पाड़ा जाना शुरू किया तब से तो यह लोग ज्यादातर मां के पास में आते गए सो एक मी टाइम जिसको कहते हैं ना वो आपका होना चाहिए आप पूरे जगत को छोड़ कर के सिर्फ आपके खुद की ये जो मेंटल हेल्थ है उसके बारे में फिक्र करें देन यू विल हैव टू पे सम सोशल टैक्स एंड यू सेकंड पॉइंट इज यू कैन नॉट अवॉइड इट इफ यू आर लिविंग विद दिस पीपल रेगुलरली देन यू कैन नॉट अव यू शुड नॉट अवॉइड इट वह जो मां की कहानी है ना कि वृद्धा ई जिसका संतान जिसका लड़का उसका मृत्यु हो गया था मां भी रो रही है वह भी रो रही है तो सभी लोग आश्चर्य चकित हो गए मां चित्कार करके क्यों रो रही है देखिए यह चित्कार करके रोना इसका भी यह जो था ना निवेदिता स्कूल उसमें यह सुधीरा देवी करके एक टीचर थी तो उनके भाई का नाम था देवव्रत कि ऐसा ही कुछ वो अपने ऑर्डर में साधु थे तो अभी क्या हुआ कि ये उनके जो भाई का एक दिन मृत्यु हो गया और सुधीरा आदी तो फिर मां उस समय जयराम बाटी में थी और यह सब घटना हुई थी कोलकात्ता में तो मां ने जिसने मां को यह समाचार दिया कि सुधीरा दी के भाई का मृत्यु हो गया था और सुधीरा दी स्वयं उस समय उनकी मृत्यु शैया के पास में बैठी हुई थी थी तब मां ने कहा कि क्या फिर मां प्रश्न करती है देखिए मां का प्रश्न कितना रिलेवेंट है पहली बार जब मैंने पढ़ा था मुझे वो समझ में नहीं आया किंतु बाद बाद में मुझे समझ में आया मां का जो प्रश्न है कितना पावरफुल है मां पूछती है क्या सुधीरा रोई थी तो जिसने ये मैसेज लाकर के दिया वो उसने कहा नहीं मां सुधीरा आदी तो एकदम शांत रूप से बैठी थी और उन्होंने अपने भाई का मृत्यु देखा और फिर एकदम शांत रूप से अभी यह बात जबी आप सुनेंगे तो आपको लगेगा कि हां कितना त्याग है कितना एक स्पिरिचुअल मैच्योरिटी है कि नजर के सामने भाई का मृत्यु होता है और बहन एकदम शांति से उसको देखती है किंतु मां क्या कहती है पता है वो जद डाक छेड़े कां ले ताले भालो होतो यदि वो चित्कार करके रोती ना तो उसके लिए अच्छा होता वैसे ही उसको हार्ट का असु है मां कहती है कि वैसे ही यह सुधीरा को हार्ट का प्रॉब्लम है अभी ये उसने ये जो गम है उसको छुपा करके उसको सप्रे करके रखा है देखना उसको कहीं हार्ट का प्रॉब्लम बढ़ ना जाए तो ये मैंने चित्कार करके रोना जद यह तो एक दो डिफरेंट उदाहरण है किंतु जस्ट मैं कहना चाहता हूं कि चित्कार करके रोने का इंपॉर्टेंस कितना है और यदि आप इस तरह से दूसरों के लिए रोएंगे तो दूसरों के मन को कितना शांति पहुंचेगा ना किंतु देखिए यह एक नेगेटिव भाव हो गया कि मुझे करना है इसलिए मैं कर रहा हूं यह आपको हेल्प स्पिरिचुअली हेल्पफुल नहीं होगा सोशली हेल्पफुल होहुआ स्पिरिचुअली हेल्पफुल कब होगा कि करुणा भीतर में से प्रकट हो रही है और ये यू वांट टू शेयर दिस कंपेज राइट मने उस स्पिरिचुअल स्टेटस पर हमको पहुंचना होगा देखिए यह रास्ता जो है ना यह आसान नहीं है इसमें शॉर्टकट्स नहीं है भले ही चाहे हम शुरुआत इसलिए करें मैंने ऐसे साधुओं को देखा ये जो मातृभारती हैं ना मैं अपना एक उदा अपना खुद का एक अनुभव बताता हूं मैं उस समय ट्रेनिंग सेंटर में था एक ब्रह्मचारी के साथ में मेरी अच्छी मित्रता थी मैंने यह नोट किया कि वो बीच-बीच में आकर के मुझे पूछता है तुम कैसे हो अच्छे हो कि नहीं हो कुछ हेल्प चाहिए तो बताना मुझे बड़ा अच्छा लगता था कि अरे वाह ऐसा सामने से पूछ करके कोई आता है कि तुमको कुछ हेल्प चाहिए तो बताना सही सही है बड़ा ही स्पिरिचुअली मैच्योरिटी पर पहुंच गया है फिर एक दिन क्या हुआ अभी रात का अंधेरा है और हमारा ट्रेनिंग सेंटर में जो वरांडा होता है ना बहुत लंबा है बहुत बड़ा ट्रेनिंग सेंटर है तो मैं अंधेरे में वो कहीं से आ रहा था मैं अपने कमरे में नहीं था कमरे की ओर जा रहा था इस समय मैंने देखा जो ब्रह्मचारी जो मेरे साथ में इतना फ्रेंडली था वहां पर क्या है कि हमारा कौन से कमरे में इतने सारे ब्रह्मचारी हैं तो कौन से कमरे में कौन रहता है वो एक लिस्ट रखा था सभी जो विंग होती है ना सभी रांडे में एक लिस्ट रखा हुआ है वो लिस्ट में देख कर के आप देखेंगे कि कौन से कमरे में कौन रह रहा है तो ये जो मेरा फ्रेंड जैसा ब्रह्मचारी था उसको मैंने देखा अंधेरे में उसने तो देखा नहीं कि मैं अंधेरे में आ रहा हूं तो फिर उसने क्या किया जो लाइट का बल्ब जल रहा रहा था उसके नीचे जो लिस्ट था लिस्ट में उसने देखा कि मैं कौन से कमरे में रह रहा हूं वो देख कर के फिर वोह मेरे कमरे के सामने जाकर के वह भीतर में देख रहा है कि मैं हूं कि नहीं वहां पर देखा कि मैं नहीं हूं तो वह चला गया तब मुझे क्या पता चला पता है देखो कि यह ब्रह्मचारी एक्चुअली प्लान करता है वह लिस्ट में देखता है कि वह कौन ब्रह्मचारी कौन से कमरे में रह रहा है फिर व वहां जाकर के उसको पूछेगा तो शुरू उस समय मुझे बड़ा ही मैं थोड़ा सा नाराज हो गया मैंने कहा मैं तो सोचता था इस टेनियस होगा यह अपने हार्ट से वह यह सब उसके भीतर में से आता है लोगों को हेल्पफुल करना नहीं यह स्कीमिंग कर रहा है वोह प्लान कर रहा है कि कौन से कमरे में कौन रहता है वहां जाकर के वह पूछेगा और दिखाएगा ऐसा कि वह रास्ते से जा रहा था कैजुअली उसने मुझे बैठा हुआ देखा तो वो आ कर के पूछ रहा है ट देर इज नथिंग कैजुअल अबाउट इट एवरीथिंग इज प्री पलान तो उस समय मुझे थोड़ा सा उसके ऊपर नाराजगी आ गया था किंतु फिर बाद में मैंने क्या सोचा पता है इवन आप यदि प्री प्लान करके भी करते हो इवेंचर इ यू आर इफ यू परसिस्ट देन दिस विल कन्वर्ट इनटू समथिंग स्पॉन्टेनियस तो देखिए कि शुरू शुरू में आपको शायद प्री प्लान करके करना पड़े यह सब बट आइडियल दिस हैज टू बिकम स्पॉन्टेनियस किंतु देखिए उदाहरण के बाद में उदाहरण है एग्जांपल्स आर एग्जांपल्स आर देर कि कितने लोग मां के पास में आते हैं अपनी पूरी राम कहानी सुनाते हैं मां चुपचाप शांति से सुनती है कुछ ना कुछ बोलती रहती है और फिर यह लोगों का जो हृदय है हल्का होता है और वहां से जाते इतनी कितनी कहानियां है ऐसी तो यह तो एक सिर्फ एक वन पार्टिकुलर उदाहरण हो गया जिसमें ठाकुर बीमार लोगों की बात करने को कह रहे हैं किंतु इतने हजारों उदाहरण है कि मां सबकी बात सुनती है यह जो ट्रेडिशनल रिलीजन कहते हैं ना कि हम मिन्नत मांगने के लिए वहां पर एक मंदिर में जाते हैं और फिर वो जद यह हो जाए काम बन जाए तो वहां जाकर के श्रीफल ऑफर करते हैं ना ऐसा कुछ और यहां पे मां है यहां पे वो मांगना है कुछ और वह मिल जाएगा ऐसा नहीं है वो ल देर इज अ भलो भाष देर इज लव तो देर इज अ ट्रांजैक्शन ऑफ लव और दूसरी जगह पे होंगे कि ट्रांजैक्शन ऑफ समथिंग मच मोर मटेरियल िक कि बीमार है तो बीमारी दूर हो जाए या कष्ट है तो कष्ट दूर हो जाए यह अंगूठी पहन लो या तो फिर यह कवच पहन लो या तो फिर यह विधि कर दो तो यह हो जाएगा बहुत सारे मंदिर में ट्रेडिशनल ऐसा होता है सो य ये जो पार्थ क्य है कि एक मटेरियल ट्रांजैक्शन और एक ट्रांजैक्शन ऑफ लव आप स्पिरिचुअल मैच्योरिटी के एक लेवल पर पहुंचे हैं तभी आपको यह समझ में आएगा भले ही आप चाहे यह कहे कि मुझे समझ में नहीं आ रहा बट योर हार्ट एक्चुअली अंडरस्टैंड्स यो ब्रेन मे नॉट अंडरस्टैंड योर हार्ट अंडरस्टैंड दैट इज व्हाई यू हैव कम हियर अदर वाइज वो किसी एक मंदिर में जाके वो जो वो होता है ना पीपल का पेड़ उसके आसपास में धागा लगा दो ये ये जो कल्पतरु दिन में वो काशीपुर में होता है मैंने पहले भी एक दो बार बताया था हम लोगों का ड्यूटी रहता है कि उस दिन क्लीनिंग वगैरह करना तो बहुत सारे लोग आकर के वो धागा बांधते हैं कल्पतरु दीन को काशीपुर में ठाकुर ने आशीर्वाद दिया था तो मादर चैतन्य होग तो फिर वो धागे में कुछ ना कुछ अपनी मन की बात लिख देते हैं तो हम लोग जब क्लीन करते थे तो ये सब पेपर जो छोटी-छोटी चिट्ठियां होती थी खोल के पढ़ते थे कोई किसी लड़की ने कहा है कि मेरे पिताजी बीमार है भाई का मृत्यु हो गया मां बीमार है जॉब नहीं मिल रही क्या करूं मैंने ऐसी सब दुख दर्द पूर्ण कहानियां कि पढ़ कर के हमको लगेगा अरे बाप रे हम लोग कितने फॉर्चूनेटली िक फ्रॉम द गॉड सो उस लेवल से ऊपर उठ कर के वी ऑल वी आस्क फॉर इज ट्रांजेक्शन ऑफ लव जब आप य यहां पर आ गए हैं दैट मींस योर हार्ट अंडरस्टैंड्स योर ब्रेन ब्रेन मे नॉट बी एबल टू अंडरस्टैंड हां मैंने जद देखिए फैमिल लाइफ का वैल्यू या तो फिर यह सिविलाइजेशनल यह जो जगत का कल्याण करने के लिए स्कूल हॉस्पिटल चलाना यह सबका वैल्यू तभी होगा ना ज कि जगत का कुछ वैल्यू होगा इट सेल्फ इहरें वैल्यू होगा यदि आप कहेंगे जगत मिथ्या तो फिर आप वई फैमिली वई यह मातृत्व वई कंपेज यह तो एक प्रश्न खड़ा हो जाता है या तो फिर कहेंगे कि यह सब एक साधन के रूप में माने एक इसका एक ट्रांजैक्शनल वैल्यू है कि कंपेरिजन करुणा होगी तो मुझे चित्त शुद्धि में सहाय होगी चित्त शुद्धि के बाद में मुझे निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी यहां पर किंतु यह करुणा है वो चित्त शुद्धि का साधन मात्र नहीं है दैट इज एन एंड एंड एम इन इट सेल्फ ब बहुत बार कहा जाता है कि कर्म जो करते हैं चित्त शुद्धि होती है नहीं यह तो इती इती करके जब जगत में आएंगे तब एक करुणा इतनी आपके भीतर में छलो छल उठ जाएगी क्या आप बिना किसी को सहाय किए बिना आप रह नहीं पाएंगे यू विल हैव टू शेयर दिस लव यह जो प्रदा दस और स्वामी जी का जो रिलेशन था ना उसका एक पूरा एक आर्क है पूरा एक उसका ट्रेजे क्टर है शुरू में स्वामी जी का प्रम दादास पर काफी श्रद्धा था फिर प्रम ददा स्वामी जी को प्रश्न करना शुरू कर देते हैं ये जो बलराम बाबू का मृत्यु हुआ तो काशी छोड़ कर के क्यों आप उसके मिलने को जा रहे हो उसके परिवार को सांत्वना देने वो तो गृहस्थ था आप सन्यासी थे ऐसा क्यों कर रहे हो फिर यह स्वामी जी कहते हैं जगत का कल्याण करना है तो उसके बारे में भी जगत है नहीं तो कल्याण क्यों करना है बोलकर के आखिरी आखिर में यह प्रम दादास और स्वामी जी का यह हो गया था विच्छेद हो गया था संबंध का और आखिरी आखिर में जो लेटर लिखा है ना स्वामी जी ने प्रम दादास को बड़ा ही यह कटाक्ष पूर्ण लेटर लिखा है कि आपने मेरे बारे में सोचना आपके जैसे बड़े आदमी मेरे जैसे छोटे आदमी के बारे में सोच रहे हैं बड़ा कृपा कर रहे हैं ऐसा करके काफी कटाक्ष पूर्ण लेटर स्वामी जी ने प्रम द दस को लिखा है अभी वो कंटेंट मुझे याद नहीं आ रही है इतनी सारी किंतु दैट इज जिट क्या था कि देखिए कि आप जिसको ट्रेडिशनल वेदांत समझते हैं और स्वामी जी का या तो फिर ठाकुर का जो वेदांत है उसमें यही बड़ा डिफरेंस है कि आपको जगत को छोड़ नहीं देना है जगत के साथ में पॉजिटिवली एंगेज होना है यह तो एक चीज है दूसरा जैसे हमने अभी डिस्कस किया कि यह जो जगत के साथ में एंगेज होना है उसको एक व्यापारी बुद्धि से नहीं कि मैं थोड़ा सा सेवा करूंगा मेरी चित्त शुद्धि हो जाएगी या ऐसा भी नहीं यू हैव टू डू इट बिकॉज यू फील फ्रॉम द बॉटम ऑफ योर हार्ट दैट इज व्हाई यू हैव टू पीपल मने आप इकोन वगैरह की क्या बात करते उनका तो कोई ट्रेडिशनल यह नहीं है शंकराचार्य जैसे शंकराचार्य का मठ हम लोग कांचीपुरम गए थे मैं तो आश्चर्य चकित हो गया बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हैं कि हमने इस गांव में तालाब खुदवा दिया यहां पर पानी का व्यवस्था कर दिया यहां पर अस्पताल चला रहे हैं शंकराचार्य के मठ में मैं तो देख कर के ही आवा मैंने कहा ऐसा क्यों भाई यह कौन सा चमत्कार हो गया ठाकुर ने शंकराचार्य को कन्वर्ट कर दिया तो फिर वो जो प्रैक्टिकल लोग होते हैं ना उन्होंने मुझे समझाया कि भैया ऐसा है कि ऐसा सेवा करने से वो टैक्स में रिबेट मिलता है इसलिए ये सब होता है तो अभी ऐसा नहीं तो ऐसा कान तो पकड़ वाया हम ऐसा इंटरप्रेट कर सकते हैं जो टैक्स पॉलिसी आई उसके पीछे की प्रेरणा स्वामी जी है