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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 15 Mar 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार षय राम कृष्णाय ते नमः स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित श्री मां शारदा देवी की इस किताब का हम पाठ कर रहे हैं चैप्टर का नाम है अर्थात कि उस दिनों की घटनाएं जबकि मार् और ठाकुर का विवाह तो हो गया था किंतु मां ने दक्षिणेश्वर की यात्रा नहीं की थी प्रथम यात्रा नहीं की थी यह 13 साल का यह पीरियड इस चैप्टर में इसका विवरण है तो गंभीरानंद जी महाराज ने कल हमको बताया कि किस तरह से ठाकुर मां को शिक्षा और दीक्षा दे रहे थे एक तो है कि आध्यात्मिक जगत में कि ईश्वर साधना कैसे की जाए ईश्वर के साथ में किस तरह से एक संबंध बनाया जाए ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है यह बात बता रहे थे तो साथ-साथ में ही दूसरी और सिखा रहे थे कि संसार में किस तरह से रहना है संसार में जो भी कार्य है गुरुजनों की सेवा अपने बड़ों के प्रति आदर अपने से जो छोटे होते हैं उनके प्रति स्नेह और फिर साथ-साथ में ही संसार का सब कार्य तो सब यह सब ठाकुर ने उनको सिखाया था तो इसी सिलसिले में गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या कहते हैं हम पढ़ते हैं महाराज जी लिखते हैं ई काम गंध हीन स्वार्थो सुन्नो आनंदो मिश्र तो साग्रह उपदेश लाभे सरोला पूत चरित्र धर्म प्राणा पतिव्रता पल्ली बाला की रूपे आनंद बिभोर होया छिले ताहा तीनी परे स्वयं स्त्री भक्तो देर निकट प्रकाश कररिया लेन महाराज जी क्या कहते हैं ठाकुर का यह काम गंध हीन पति और पत्नी का संबंध होता है उसमें काम वासना का एक एलिमेंट तो होता ही होता है किंतु ठाकुर तो संपूर्ण रूप से सन्यासी थे इंद्रियों के विषयों के प्रति उनकी स्पृहा शून्य थी तो ठाकुर का मां का जो स्नेह था मां के प्रति वह संपूर्ण काम गंध विहीन था तो काम गंध विहीन स्वार्थ शून्य किसी भी तरह का स्वार्थ ठाकुर का मां के प्रति नहीं था काम गंध हीन स्वार्थ शून्य आनंद मिश्रित आनंद मिश्रित साग्रह उपदेश आनंद मिश्रित साग्रह उपदेश को प्राप्त करके सरला पूत चरित्र धर्म प्राणा सरल है जिसका चरित्र जिनका चरित्र पवित्र है पावन है और जो कि धर्म प्राणा है ऐसी पवित्रता एसी पवित्रता पल्ली बाला पतिव्रता पल्ली बाला मने पतिव्रता अर्थात की पति की ओर ही जिनका धर्म और आचरण सब है पल्ली बाला अर्थात की गांव की लड़की गांव की किशोरी की रूपे आनंद बिभोर होया छले किस तरह से नंद विभोर हो गई थी इसका विवरण उन्होंने बाद में स्त्री भक्तों के सामने किया है अभी देखिए एक ही सेंटेंस है जिसमें कि ठाकुर और मां का जो रिलेशन है उसके बारे में कितना सब कुछ कह दिया है ठाकुर का मां के साथ में संबंध कैसा था और मां का ठाकुर के साथ में संबंध कैसा था अर्थात ठाकुर मां को किस दृष्टिकोण से देखते थे और मां ठाकुर को किस दृष्टिकोण से देखती थी यह पूरा विवरण एक ही सेंटेंस में हमने को जानने को मिलता है क्या कहते हैं कि पहले तो ठाकुर का मां के प्रति क्या दृष्टिकोण था ठाकुर मां के प्रति किस तरह से संबंध था ठाकुर का काम गंध हीन था दूसरा की स्वार्थ शून्य था तीसरा की आनंद मिश्रित था माने और साग्रह से उपदेश देते थे बड़े ही आग्रह के साथ तो ये चार कैरेक्टरिस्टिक ठाकुर का मां के संबंध के साथ में था और मां का चरित्र और ठाकुर के साथ संबंध कैसा था तो सरल थी पूत चरित्र अर्थात की पावन चरित्रवान थी धर्म प्राणा थी और पतिव्रता थी तो चार कैरेक्टरिस्टिक मां की भी इन्होंने हमको कही है तो इस तरह से ठाकुर का प्रेम प्राप्त करके मां का हृदय किस तरह से आनंद से उत् फुल्ल हो गया था इसका विवरण माने अपने खुद के शब्दों में बाद में कहा है क्या कहा हृदय मध्य आनंदे पूर्ण घोट जैनो स्थापित रया छ हृदय में आनंद का पूर्ण घट जैसे कि स्थापित हो करर के रहा है ई काल होई ते सर्वदा रूप अनुभव करता उस समय से हमेशा यह अनुभव करती कि मेरा हृदय जिसके भीतर में आनंद का पूर्ण घट विराज मान है देखिए कि किस तरह से हमको देखिए हम लोग इनका बाह्य जीवन जब एनालाइज करेंगे तो हमको क्या पता चलेगा कि जितना भी संघर्ष है जितना भी स्ट्रगल है सब इनके जीवन में है पैसों का अभाव तो हमेशा ही यह शिव के संसार में पैसों का अभाव तो हमेशा से र रहा ही है इनके जीवन में साथ में ही वह मां को तो पता है कि यह श्यामा सुंदरी देवी ने कहा था कि मां को सब सब लोग कुछ ना कुछ कटाक्ष भरी वाणी सुना देते थे क्यों क्योंकि उनका जो पति है वह पागल है वोह निव स्त्र हो करके घूमता रहता है गंगा के किनारे और मा मां करके चिल्लाता रहता है तो इस तरह से वो किस पगले के साथ में अपनी बेटी का विवाह कर दिया यह बात श्यामा सुंदरी देवी को भी सुननी पड़ती थी और मां को भी सुननी पड़ती थी कि हां तुम्हारा पति पागल है तो इस तरह से एक तो एक सोशल प्रेशर दूसरा की धन का अभाव कोई एक प्रॉपर एक रहने खाने पीने की एक बहुत अच्छी व्यवस्था होने से कई बार ऐसा होता है कि बाकी सब चीजों को हम नजरअंदाज कर सकते हैं किंतु एक तो आर्थिक अभाव दूसरी ओर से सामाजिक प्रेशर सामाजिक निंदा दोनों के बीच में मां को रहना पड़ता था इसके बावजूद यह देखिए कि वो हो गया मां का बाह्य जीवन किंतु आंतरिक जीवन देखिए कि ठाकुर का स्नेह प्रत करके अवतार वरिष्ठ का स्नेह और आदर प्राप्त करके जगदंबा का हृदय पूर्ण घट से आनंद के पूर्ण घट से भरा हुआ है और यहां पर देखिए कि अगेन हम लोगों का जो डाकोटार है कि मां एक र तो है जगदंबा दूसरी ओर है एक सहज सरल ग्राम्य किशोरी तो अभी यदि एक गांव की एक लड़की को इस तरह से र में डाला जाए इस तरह से उसके साथ में अन्याय हो तो नेचरली है कि उसकी जो स्ट्रगल होगी मानसिक संघर्ष उसके प्रति हमारी बहुत सहानुभूति होगी किंतु हम यदि मां को यहां पर जगदंबा के रूप में देखेंगे तो हमको लगेगा कि अरे जिन्होंने सिर्फ अपने अस्त्र शस्त्र से यह शुंभ निशुंभ और यह महिषासुर ऐसे कितने ही राक्षसों का जिन्होंने वध कर दिया इस तरह की मां के लिए सा सामाजिक निंदा सहन करना कौन सी बड़ी बात है ऐसा एक प्रश्न हो सकता है किंतु देखिए कि मैंने वो प्रश्न का अगेन वही है कि यहां पर मां को एक ग्राम्य किशोरी के रूप में देखना है नहीं कि जगदंबा के रूप में जहां पर जगदंबा के रूप में देखना है वहां वोह और जहां ग्राम की एक लड़की के रूप में देखना है वहां पर मनुष्य के रूप में देख कर के इस पूरी घटना का आनंद लेना है तो मां ने कहा कि हृदय के भीतर में हमें आनंद का एक पूर्ण घट भरा हुआ रहता था श धीर स्थिर दिव्य उल्लासे अंतर कतो दूर कीरू पूर्ण थाकी तो ताहा बोलिया बुझाई बार नहे वो धीर स्थिर दिव्य उल्लास से अंतर अर्थात कि हृदय कितना परिपूर्ण रहता था वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते एक तो है कि बाह्य समाज बाह्य आर्थिक अवस्था और साथ में ही एक छोटी सी लड़की जब अपने पति के घर में जाती है तो उस तरह की जो रूढ़ चुस्त प्रथाएं होती थी उनका जो रहना खाना सब कुछ कितना ही संयम और संकोच से के साथ में करना पड़ता था और ठाकुर तो वैसे कमार पुकुर ज्यादातर तो रहते ही नहीं थे कभी बहुत बार ऐसा होता था कि मां आती थी तो फिर चंद्रा मणि देवी रहते थे उनके ससुर खुदीराम रहते थे तो उन्हीं की सेवा करके अपना उनका मन तृप्त होता था ठाकुर तो कभी कभार आए और मां के साथ में बात किया तो इसके बावजूद भी मां कहती है कि मेरे हृदय में जिस तरह का देखिए महाराज की जो ये शरत महाराज की लैंग्वेज है धीर स्थिर दिव्य उल्लास अंतर में कितना पूर्ण परिपूर्ण होकर के रहता था वो हम शब्दों में उसका वर्णन नहीं कर सकते सदा रमय श्री रामकृष्ण श्री मा के की भावे उच्च तत्व शिक्षा दते तहर एक खानी छवि ठाकुरे भ्रात पुत्री लक्षमी दीदी एकदा जनक साधुर निकट भावे आक छले सदा रंगम ठाकुर मैंने ठाकुर के बारे में शब्द यूज किया है सदा रंगम अर्थात की हमेशा से हस्य रंग से परिपूर्ण ठाकुर मां को किस तरह से उच्च तत्व की शिक्षा देते थे उसकी एक बहुत ही सुंदर छवि लक्ष्मी दीदी ने इस तरह से हमारे सामने अंकित की है क्या कहती है लक्ष्मी दीदी ठाकुर सदा सर्वदा मां के संसारे अनित्ता दुख कोटर कोथा बोले बुझाते ठाकुर हमेशा मां को संसार की अनित्य और दुख कष्ट की बात बोल करके समझाते थे क्या कहते थे वैराग्य और भगवत भक्ति ई शार वैराग्य और भगवत भक्ति ही सार है बोलते कहते श्याल कुकुरे मतो कत गुली काचा बाचा बी की होवे मने शियाल और कुकुर शियाल अर्थात की फॉक्स और कुकुर अर्थात की कुत्ता यह जो शियाल और कुत्ते की तरह बच्चे पैदा करने से क्या होने वाला है इस तरह से कहते थे फिर आगे में अभी लक्ष्मी दीदी कहती है ठाकुर ने तो ऐसा कह दिया अभी दीदी क्या कहती है मायर मार अनेक छले मेले होए छलो कटी मारा गए लन मा की मा के अर्थात की श्यामा सुंदरी देवी के बहुत सारे बच्चे और लड़कियां भी हुए थे और उनमें से किसी किसी का मृत्यु भी हो गया था मां तार सेही छोटो छोटो भाई बोनर कोले काख करे छन और ता देर मृत्यु ते तार मां बापे शोक कष्ट देखे छ माने वही छोटे-छोटे बच्चों को अपनी गोद में उठा कर के उनको स्नेह आदर किया था उनकी केयर भी की थी उनकी संभाल भी रखी थी और उनके मृत्यु से उनके पिताजी और माताजी का शोक और संताप है वह भी देखा था ए शकल उल्लेख करे ठाकुर बोलते इस सब का उल्लेख करके ठाकुर कहते तुम्हारो तो अनेक घाटा घाटी होए छ मने तुमने भी तो बहुत सारा कष्ट दुख लोगों की विदाय मृत्यु देख लिए हैं देख छो तो देखे तोतो दुख कष्ट देख रही हो तो कितना दुख कष्ट है हंगामे दरकार की यह सब हंगामा खड़ा करने की दरकार क्या है यह सब झंझट खड़ी करने की जरूरत क्या है ई सब ना होले आछो ठाकुर उटी थाक ठाकर यह सब नहीं रहने से ठाकुर उटी अर्थात की तुम मजे में रह रही हो और हमेशा आनंद में रहोगी मां ठाकुर सर्वदा काजे वस्त था अच्छा इतना तो ठाकुर ने कह दिया फिर लक्ष्मी दीदी कहती है कि मां हमेशा काम में व्यस्त रहती थी कामर पुकुरर संसारे जाब दियो काज निजो हाथे कोते कामर पुकुर के संसार का सब कार्य अपने हाथों से करती एक दिन सकाल बेला मां बाड़ी भीतरे नता दिन एक दिन सुबह सुबह मां घर के भीतर में नता अर्थात की गोबर का लेप है वो दे रही थी ठाकुर बायरे दतन कोन ठाकुर बाहर में खड़े खड़े अपने दांत साफ कर रहे हैं आर नाना रूप रंगो रोशर कोथा बोले शकल के हाशा छन और विभिन्न तरह के रंग रस की बात करके सबको हसा रहे हैं मां ठाकुर के लखो कोरे बोलन व मां को लक्ष करके मां के उद्देश करके कह रहे हैं छले अनन प्रास जे कोमरे गोट परे नाच बे गाई बे सेही छले परे मोरे गले सेही कोमर भुए आछे काते हो गए माने छले बच्चे का अन्न प्राशन अर्थात कि यह जो विधि होती है ना छोटे बच्चे की गुजराती में वह बाधा जिसको कहते हैं छोटा बच्चा होता है तो उसको सबसे पहली बार अन्न खिलाते हैं उसको अन्न प्राशन कहते हैं तो इस तरह व वो बड़ा ही आनंद का दिन है और उस दिन सब नृत्य कीर्तन वगैरह हसी भजन वगैरह होता है बहुत सारे संबंधियों को आमंत्रित किया जाता है सब विधि पूजा वगैरह होती है तो ठाकुर कहते हैं बच्चे का अन्न प्रास जब करते हैं उस समय जिस कमर में तुम जवाहरात पहन कर के नाचती हो उसी कमर को आड़ देक के रोना पड़ेगा जब उसी बच्चे का मृत्यु हो जाएगा तो अभी ये देखिए कि जो त्यागी है उन लोगों के लिए इस तरह की बातें करना सहज है किंतु मां का हृदय उनको यह बार-बार इस तरह की बातें करना तो मां के हृदय प कैसा आघात लगेगा और देखिए कि ठाकुर जब वैसे तो रंग रस की बातें करते हैं किंतु ये बातों में तीक्षण होता भी कितनी है माने थोड़ा सा भी सोच के देखिए कि जो मां अभी अपने बच्चे के लिए जो नृत्य कीर्तन कर रही है आनंद में कमर में वो जो गोट होती है ना वो एक सोने का एक एक रहता है वो कड़े जैसा वो जिनको कि पहना जाता है कमर में नृत्य कीर्तन करते समय उसी कमर को पछाड़ पछाड़ करके रोना होगा जभी वही बच्चा मर जाएगा यह देखिए कि कितनी कठोर बात है कितनी रुक्ष बात है यदि ठाकुर भले ही चाहे हंसते हस्ते कहते होंगे किंतु किसी भी मां को कहिए वो मां बेचारी बड़ी ही दुखित हो जाएगी अपने बच्चे के बारे में इस तरह से सोच करके कि हां यह ठाकुर क्या कह रहे हैं अभी मां के बच्चे का प्रसव नहीं हुआ था किंतु मां का हृदय तो है ऐसा सुन करर के मां के हृदय पर क्या आघात लगेगा हम लोग अनुमान करके सोच सकते हैं तो फिर देख कि लज्जा शलाला मां रवे शब शन छिले अभी लज्जा शलाला मां रवे अर्थात की चुपचाप सब सुन रही थी किंतु ठाकुर तो थम ही नहीं रहे हैं ठाकुर बारंबार छले मृत्यु कथा बोलते थाक ले तीनी अशेष आस्ते आस्ते बोलले किंतु ठाकुर बार-बार लड़के की मृत्यु की बात कर रहे हैं यह देख कर के मां ने आखिर में बड़े ही आस्ते आस्ते बड़े ही मृद शब्दों में कहा सब बलो की आर मोरे जाबे क्या सभी बच्चे मर जाएंगे क्या सभी बच्चे जद मर जाएंगे तो संसार कैसे चलेगा आप भी जीवित है मैं भी जीवित हूं गांव पूरा भरा हुआ है शहर के शहर भरे हुए हैं लोगों से क्या सब बच्चे मर जाएंगे क्या मार कथा बेर होते ना होते ठाकुर चचे च बोलले माने माने जैसे ही यह बात कहीं ना कहीं ठाकुर चिल्ला करके बोल उठे रे जात शपर नजे पा पड़े छे रे जा छापे नजे पा पड़े छ अरे एक साप की पूछ पे पैर पड़ा है रे साप की पूछ पे पैर पड़ा है साप की पूंछ प पैर पड़ेगा तो साप फट करके आपको सामने देख कर के आपको काटने के लिए आएगा तो देखिए कि मां की भी तो सहनशीलता की एक सीमा है ठाकुर बार-बार जब इस तरह से रुक्ष शब्दों में इस तरह से कठोर शब्दों में कह रहे हैं मैंने किस तरह की बात है यह तो पढ़ कर के भी मुझे यह जो कम्युनिस्ट लोगों का कहना है ना कि ठाकुर मां के साथ में अन्याय करते थे ठाकुर मां को अपना राइट्स नहीं देते थे व यह बात पढ़ कर के सही में लगता है कि उन लोगों की बात में कुछ तो मने सत्यता है कोई भी किसी भी मां को इस तरह से कहना कितना मां को दुख होगा किंतु मां ने जैसे ही कहा ठाकुर चिल्ला उठे अरे साथ की पैर पे प पूछ पे पैर पड़ा है ओ मां आमी बोली सादा सीदे भलो मानुष किछु जाने ना ठाकुर बोल रहे हैं मैं तो सोच रहा था कि एक सीधी सादी बहुत अच्छी लड़की है जिसको कुछ नहीं पता है किंतु देखिए पेटर बेहतर शब आछ पेट के भीतर में सब भरा हुआ है बोले कि ना सब गलो कियार मोरे जावे कहती क्या है सुनो कि क्या सब मर जाएंगे ठाकुर भी सामने इस तरह से बोल रहे हैं मां छूटे पालिए गले मां लज्जा होने से वहां से दौड़ कर के चली गई तो देखिए कि एक तरह से यह संबंध यह ठाकुर और मां की बातें सुनक के हमको आनंद भी होता है यह भी पता चलता है कि आध्यात्मिक जीवन में ये बहुत सारी बार हम लोग यह कहते हैं ना कि जब ठाकुर के पास में दक्षिणेश्वर में यह लड़के लोग जब आते थे तो ठाकुर पहले तो दो तरह के उपदेश देते थे सबको जद गृहस्थ लोग बैठे हुए हैं जबकि यह मास्टर महाशय वगैरह बैठे हैं तो एक तरह की बातें करते थे और जब यह गृहस्थ लोग चले जाते ते थे रात को जब त्यागी लड़के रहते थे ठाकुर त्यागियो को छोड़कर ज्यादातर रात को किसी को रहने नहीं देते थे तो यह ठाकुर के त्यागी लड़के त्यागी संतान जब रहते थे रात को तब पहले तो अपने घर के बाहर में निकल कर के ठाकुर देख लेते थे कि आसपास में कहीं कोई गृहस्थ तो नहीं है तो उसके बाद में अपने घर में प्रवेश करके कमरे का दरवाजा बंद करके इन त्यागी लड़कों को दूसरी ही तरह की शिक्षा देते थे जहां पे त्याग और वैराग्य की चरम सीमा उस शिक्षा में उस उपदेशों में होती थी तो उस समय हमको कभी-कभी एक आश्चर्य हो सकता है एक क्यूरियोसिटी हो सकती है कि ऐसी तो चरम त्याग की बात ठाकुर क्या करते थे और इसका कुछ कुछ कहीं कहीं पर हमको यह अंदाज कहीं कहीं पर हिंट भी मिलती है कि ठाकुर इस तरह से य जो संसार के सुख भोग है वो कितने असार है इसके बारे में कहते थे तो यह देखिए कि इस अभी यह जो मां को कहा है और जो कि उद्बोधन से पब्लिश हुई किताब में और गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है एक ही सेंटेंस उसी को पढ़कर हमको लगता है कि अरे ठाकुर ये कैसे कठोर है ठाकुर के भीतर में हृदय ही नहीं है क्या सहानुभूति ही नहीं है क्या किसी भी मां को किसी भी स्त्री को इस तरह से क्या बात की जाती है कि आपके बच्चे के अन्न प्राशन में जिस कमर में गहने पहन के नाचोग्राफी तुम्हारा बच्चा मृत्यु हो जाएगा ज तुम्हारे बच्चे की मृत्यु हो जाएगी क्या किसी स्त्री को ऐसा कह सकते हैं मैं तो कभी सोच नहीं सकता कि किसी को भी त्याग और वैराग्य की शिक्षा देते देते मैं इस तरह के कठोर शब्दों का यूज करूं मैं सोच भी नहीं सकता किंतु ठाकुर देखिए उनके हृदय में जब त्याग और वैराग्य की बात करते हैं तो कितने कठोर हो जाते हैं फिर वो जो कहते हैं ना इंग्लिश में कहावत है कि ग्लोज आर ऑफ अर्थात कि जब आपके वो जो किसी को पंच करना है किसी को एक किसी को पिटाई करनी है अपने हाथों से तो कभी-कभी क्या है कि हम हाथ में ये बॉक्सिंग होती है ना बॉक्सिंग बॉक्सिंग में वो ग्लोस पहन करके वो हैंड ग्लोस पहन करके बॉक्सिंग करते हैं जिससे कि किसी को सामने वाले को सही सही लग ना जाए वो तो एक टूर्नामेंट है ना किंतु सही सही मने फाइट होती है तो हम अपने वो जो ग्लोज है वो निकाल देते हैं और खुले हाथों से मारते हैं जिससे कि सामने वाले को सही सही में इजा हो सामने वाले को इ हो तो इसको कहते हैं ग्लोज आर ऑफ अर्थात कि अभी जो फाइट होगी उसमें इंजरी होने की पूरी संभावना है तो ठाकुर भी जब त्याग और वैराग्य की बात करते हैं तो वह जो उनका अच्छा पन है वो उनका रंग रस है उनका सुमधुर स्वभाव है वह सब छोड़ कर के बड़ी ही कठोर बातें करना शुरू कर देते हैं वो सुनकर के किसी के भी हृदय को आघात लग सकता है तो ये एक हमको हिंट मिलता है कि ठाकुर अपने त्यागी संतानों के साथ में ये किस तरह की कठोर बातें किया करते होंगे जिसको कि सब लोगों को सुनाना उचित नहीं है क्योंकि इस तरह की बात सुन करर के जो लोगों का मन इस तरह के प्रचंड त्याग और वैराग्य के पथ पर नहीं चल रहा है उनको बड़ा ही कष्ट होगा बाकी तो हम लोग कहते हैं कि देखिए कि धर्म और अध्यात्म सन्यास के रास्ते पे और संसार के रास्ते पे दोनों जगह पर हो सकता है धर्म अर्थ काम मोक्ष यह जो चार पुरुषार्थ है तो मोक्ष पुरुषार्थ सन्यासी के लिए है किंतु गृहस्थ के लिए तो धर्म अर्थ काम है ही है तो ऐसा कौन कहता है कि भाई गृहस्थाश्रम में रहकर के ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी धर्म नहीं होगा ऐसा तो कोई नहीं कहता अपने वेद पुराणों में ऐसी बात कहीं प नहीं है तो सन्यासी का एक बिल्कुल ही भिन्न रास्ता है और सन्यासी के रास्ते को वो जगत के हित के लिए वह सन्यास धारण करता है सिर्फ अपने हित के लिए नहीं सन्यासी व्यष्टि साधना नहीं करता समष्टि साधना करता है पूरे जगत के कल्याण के लिए वह ईश्वर के सा पास में प्रार्थना करता है सिर्फ अपने खुद की मुक्ति के लिए नहीं तो वह संन्यास का रास्ता ही अलग है अभी जो लोग संन्यास के रास्ते पर कदम जिन्होंने नहीं बढ़ा लिए हैं ऑलरेडी या तो फिर जिनका मन संन्यास के रास्ते पर जाने के लिए उत्सुक नहीं है ऐसे लोगों को इस तरह के कठोर त्याग के भाव के बारे में बात करने से उनको तो मन में कष्ट होगा ही होगा तो देखिए कि अभी मां का तो हृदय है मां का अभी ठाकुर इस तरह की बेतुकी बातें कभी-कभी कर दिया करेंगे तो मां तो वैसे बेचारी सब कुछ चुपचाप सहन कर लेती थी किंतु सन सहन शक्ति की भी तो एक सीमा है तो एक बार मां ने इस तरह से ठाकुर को बता ही दिया मुंह पर बोल ही दिया कि सब सब लोग क्या मर जाएंगे क्या सभी बच्चे मर जाएंगे क्या तो ये देखिए कि इतने एक ही प्रसंग से हमको कितना सब कुछ जानने को मिलता है ठाकुर की शिक्षा और दीक्षा के बारे में गृहस्थ लोगों के प्रति एक तरह से ठाकुर बात करते थे सन्यासियों के प्रति भी दूसरी तरह से और मां को ठाकुर गिनते थे सन्यासी के रूप में हालांकि मां का गृहस्थ मां का मातृत्व मय हृदय था घर में सबको लेके मां को रहना था ठाकुर की तरह नहीं कि वो त्रैलोक्य नाथ ने कहा कि अपनी उसके किसी ने कहा कि आपको भी जाने को कहा है कालीबाड़ी से तो ठाकुर ने गमछा अपने कंधे पर डाला और निकल गए उनको कुछ चिंता नहीं है कि क्या कौन सी चीज कहां पर है किसी को नोटिफाई करना है किसी को पत्र लिख कर के बताना है किसी को इंफॉर्मेशन देना है कुछ नहीं जैसे ही बोला दक्षिणेश्वर से निकलो काली मंदिर से तो सीधा निकलाना शुरू हो गए तो मां का तो ऐसा नहीं है मां की एक बार है कि ये जयराम बाटी की बहुत दिनों के बाद की बात है ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी के अमेरिका से लौट आने के बाद में मां कभी-कभी जयराम बाटी में रहती थी तो मां के साथ में यह सन्यासी शिष्य भी रहा करते थे और एक दिन की बात है वो कभी-कभी मां जयराम बाटी से कोलकात्ता आएगी तो कभी-कभी कोलकात्ता से जयराम बाटी जाएगी तो एक समय ऐसा था कि जयराम बाटी में थी मां और कोलकात्ता जाने की बात चल रही थी तो मां के जो त्यागी लड़के हैं वरदा महाराज या तो फिर ये गौरी स्वरानंद जी महाराज ये राममय महाराज ऐसा किसी ने बोला होगा कि चलो मां चलते हैं जद जाने का तो है ही है तो अभी ये अच्छा दिन है चलो चलते हैं तो माने उनको मुंह पर तो कुछ नहीं कहा उनको तो ऐसा कुछ अच्छी बात करके टाल दी होगी बात की अच्छा अभी नहीं मैं देख कर के बताती हूं ऐसा कुछ बाद में किंतु मां अपने और किसी एक औरत मने एक लेडी डिवटी को मा क्या कहती है पता है ओरा होलो नेटो सन्नासी उठ बोलले उठ लो बस बोलले बस लो आमा के तो सबाए चिंता को बेरते हो माने वे लोग है नंगे सन्यासी उनको उठ खड़े हो से खड़े हो जाएंगे वो बैठो कहने से बैठ जाएंगे उनको तो कुछ नहीं है मुझे तो सबके साथ में सबको देख कर के चलना है वो पागली मामी क्या कहती है यह पागली राधू क्या कहती है मां के भाई क्या है उनका ओपिनियन कब उनको सबको राधू मांक सबको लेकर के मां कब निकल पाएगी यह सब तो मां को चिंता करके बाद में तो सब ठीक करना है व बच्चों की तरह थोड़ी ना है कि आज बोलो शरत महाराज ने बोला जाओ रिलीफ करने के लिए चले जाओ तो सीधे खड़े हुए एक झोले में दो तीन वस्त्र डाले और झोला ले निकल गए व चलो रिलीफ करते हैं तो मां का तो ऐसा नहीं है तो अभी देखिए कि मां के जीवन में यह भी तो एक डाकोटार है कि है सन्यासिनी का हृदय किंतु रहती है गृहस्थाश्रम में सबको एक साथ में साथ में रह कर के तो यह पैराडॉक्स यह जो कंट्रा इक्ट पुल जो है मां के हृदय के ऊपर में ये कैसे एक दूसरी मने बिल्कुल अपोजिट डायरेक्शन में मां के हृदय को खींचते होंगे यह अनुमान करके के हमको भी एक देखिए कि कितना स्ट्रगल करना होगा अभी मैं सन्यासी हूं तो ठीक है चलो यहां पर किसी का मृत्यु हुआ तो वैसे तो हम लोग बड़े ही सहानुभूति दिखाएंगे अच्छा अच्छा अरे चलो तो अच्छे डिवोटा थे अच्छे वॉलंटस देहांत हो गया बहुत अच्छा यहां पर काम किया था मुंह पे सहानुभूति है किंतु हृदय में ऐसा कुछ नहीं है क्यों क्योंकि ऑलरेडी हमने हमारा श्राद्ध कर दिया है अच्छा और यह श्राद्ध करके यह सब करके माया से मुक्त होकर के हम यह ठाकुर मा स्वामी जी की बातें दिन रात पढ़ते रहते हैं अभी गृहस्थ है वह इस तरह से किसी का भी मृत्यु होता है यदि अपने परिवार जन का मृत्यु होता है तो उससे तो कष्ट होता ही है दूसरों के परिवार जनों के मृत्यु की बात सुनते हैं तो भी कष्ट होता है क्यों क्योंकि यह गृहस्थ का हृदय ही है बड़ा ही प्रेम और स्नेह से भरपूर इस संबंध जो है गृहस्थाश्रम का प्राण है सभी के साथ में आपको तो रिलेशन रखना है और रिलेशन ही जाएंगे और किसी के भी मृत्यु से वह कष्ट तो होना ही होना है अभी किंतु देखिए कि जो सन्यासिनी भी है और मां भी है यह दोनों हृदय एक साथ में मां के भीतर में थे उनको किस तरह से यह सब कुछ होता होगा किस तरह से फील होता होगा ठाकुर का था कि ठाकुर के भतीजे का देहांत हुआ अभी ये रिलेशन है तो ठाकुर को रोना भी आ रहा है तो ठाकुर कभी-कभी जोर-जोर से अट हास्य भी कर रहे हैं क्या देख रहे हैं कि ये कराल महाकाल है जो कि सबको मृत्यु के ग्रास में सबको भक्षी कर रहा है और हमारा जीवन तो एक नगण्य तुच्छ एक एक यह है जिसका कि कोई अर्थ नहीं है बस सब कुछ जैसे कि मृत्यु की ओर जा रहा है जैसे कि वो भगवान कृष्ण ने अपना विश्वरूप जो दिखाया था अर्जुन को कि उनके विकराल मुंह में जितने भी सैन्य है जितने भी उनके रिलेटिव्स है सब उनके मुंह के भीतर में वो काल के मुंह के भीतर में जा रहे हैं अर्जुन को तो सिर्फ निमित्त होना है उनके वध के बारे में निमित्त मात्रमो सव्य साचीन यह कृष्ण अर्जुन को कहते हैं तो यह जो एक कराल काल का एक यह है माने ब्लैक होल यदि आज की लैंग्वेज यूज की जाए सभी को उसके भीतर में जाना ही है तो जन्म मृत्यु जरा व्याधि क्या है तो एक तरह से ठाकुर यह सोच रहे हैं तो दूसरी ओर कभी रो भी रहे हैं हंस रहे हैं रो रहे हैं तो ये हृदय भी बोल रहा है कि मामा ये क्या कर रहे हो यह बच्चा म मर गया आपका भतीजा आपका इतना प्रेम था आप हंस रहे हैं तो ये तो ठाकुर थे ठाकुर हसेंगे रोएंगे भी कभी हसेंगे भी कभी कुछ ठीक नहीं है उनका किंतु मां को तो ऐसा नहीं है मां का हृदय है सबके प्रति कितनी सहानुभूति है अरे किसी के मृत्यु की बात तो छोड़ ही दीजिए ये काली कृष्ण महाराज विरजानंद जी महाराज जयराम बाटी गए हैं वो शरत महाराज वगैरह के साथ में और फिर अभी जाने का समय आ रहा है सब लोग बेलगाड़ी में बैठे हुए हैं तो मां मां के आंखों में से आंसू निकल रहे हैं और मां इनके पीछे पीछे जा रही है बेलगाड़ी भी जा रही है मां भी जा रही है जैसे कि उनको छोड़ना नहीं चाहती ये काली कृष्ण महाराज वगैरह कहते हैं मां आप वापस चली जाइए आप हमारे साथ में कितनी और कितनी दूर तक आएगी किंतु फिर भी आंखों से आंसू निकलते ही रहते हैं और बेलगाड़ी के पीछे चलती ही रहती है चलती ही रहती है कहां तक कि गांव के बाहर में आ गए खेत वगैरह शुरू हो गए खेत के ऊपर में से गाड़ी जा रही है तब कहीं जाकर के मां अटकी और महाराज जी लिखते हैं कि वही मां का अश्रु भरा चेहरा देखते देखते जब तक हम लोगों की गाड़ी नजर के सामने थी तब तक मां वहां पर खड़ी थी तो यह है मातृ हृदय और इस मातृ हृदय के सामने ठाकुर इस तरह की कठोर बात करेंगे कि तुम्हारा बच्चा मर जाएगा यह वो क्या मने मां के हृदय पर किस तरह से क्या बीती होगी वोह हम अनुमान ही कर सकते मने अनुमान भी नहीं कर सकते अपना अनुमान भी वहां पर शॉर्ट हो जाता है शॉर्ट फॉल हो जाता है तो यह था मां और ठाकुर का रिलेशन आगे में गंभीरानंद जी लिखते हैं कोलकातार शो संकोच व्यवहार होते मुक्तो श्री श्री ठाकुर कामर पुकुरे बेश एकटा स्वच्छंद अनुभव करते कलकत्ता में स संकोच व्यवहार करना पड़ता है सबके सामने थोड़ा सा देख करके सुन कर के बात करनी पड़ती है लोगों की सेंसिटिविटी शहरों में ज्यादा होती है किसी को सम्मान देकर के नहीं बुलाया किसी को कुछ उसका इंपॉर्टेंस नहीं दिया उसकी आदर सत्कार नहीं किया तो इमीडिएट बुरा मान लेते हैं तो वह स संकोच वातावरण में से निकल कर के गांव में आकर के ठाकुर बड़ा ही स्वच्छंद अनुभव करते थे बड़ा ही फ्रीडम अनुभव करते थे एवं अपरे सहीतो तद अनुरूप व्यवहार करते दूसरों के साथ में भी ऐसा कोई बहुत ज्यादा चिंता किए बिना कि अरे मैं क्या कहूंगा सामने वाला क्या मानेगा वो सोच बिना सोचे वह आराम से सबके साथ में अनुरूप व्यवहार करते थे एक बार निकटवर्ती कोनो ग्रा में जात्रा भिनय होते छे शनिया श्री मा परिवार अननो एक महिला सही थाई जाते चाहिले श्री राम कृष्ण अनुमति दिले ना एक बार क्या हुआ कि पास के किसी गांव में यात्रा अभिनय हो रहा था यह यात्रा अभिनय के बारे में हमने पहले भी डिस्कस किया है कि गांव के व बंगोल के गांव में और बाकी भारत के भी सभी गांव में इस तरह से पौराणिक घटनाएं नाटक के रूप में उसका यह वो होता था जिससे कि बहुत सारे गांव वासी जिनको कि संस्कृत वगैरह नहीं आता है पौराणिक घटनाएं सबको बड़े ही अच्छे से वो उसके साथ में फैमिलियर रहते थे तो वैसे ही कोई पौराणिक यात्रा अभी भी नहीं हो रहा था पास के गांव में और मां ने कहा कि ठाकुर के ही परिवार की कोई एक स्त्री के साथ में वह चाहती है कि जा वहां जाकर के यात्रा और अभिनय देखे तो ठाकुर ने मना कर दिया अनुमति नहीं दी इ हाते तहा देर मनोह कष्ट होया छ बुजिया ती नियो दुखी तो होले किंतु ठाकुर ने देखा कि उन्होंने अनुमति नहीं दी तो मां को बड़ा ही मन में दुख हुआ है तो मां का दुख देख कर के ठाकुर को भी बड़ा दुख हुआ एवं शांतोना छोले बोलेन तिनी स्वयं समस्त अभिनय ताहा द के देई बन और मा को शांतोना देते हुए बोले कि ठाकुर खुद मां को पूरा अभिनय करके दिखाएंगे ई अभिनय तिनी एक बार मात्र देख्या ले वो अभिनय ठाकुर ने सिर्फ एक बार देखा था किंतु अपूर्व श्रुति शक्ति और नाट्य कौशल सहाय सूर ताल सकारे तीनी समस्त पाला एमन सुंदर भावे अभिनय करले जो महिला रा जात्रा ना देखर दुख भुलिया गया मुक्त चित्ते तहर अंग वाक्या लाभ और संगीत देखीते और सुनीत लागले किंतु अपूर्व स्मृति शक्ति और नाट्य कौशल की मदद से सूर और ताल के साथ में ठाकुर ने समस्त अभिनय इतना सुंदर भाव से करके दिखाया कि दोनों महिलाएं यात्रा ना देखने का दुख भूल गई और मुग्ध चित्त से ठाकुर की अंग वाक्य और वाक्या लाप और संगीत देखीते और सुनी ते लागले देखने लगी और सुनने लगी जैसे अपने साहित्य में इतनी सारी घटनाएं हैं कि कभी-कभी कोई घटना पढ़ते हैं तो अभी लगता है कि अरे यह तो मैं बिल्कुल पहली बार पढ़ रहा हूं भले ही चाहे दो-तीन बार इस किताब को पढ़ा हो किंतु यह घटना तो याद ही नहीं आ रही है तो यह घटना उन घटनाओं में से है आज मैं सुबह को पढ़ रहा था देखा कि अरे मुझे यह तो याद ही नहीं आ रहा है कि मैंने इसको कब पढ़ा है फिर किताब तो पढ़ी है कई बार पढ़ी है किंतु इतनी घटनाए है इतनी घटनाए और अपना दिमाग है इतना छोटा सा मेमोरी शक्ति है इतनी सी तो उसमें कितना रहेगा और कितना नहीं रहेगा तो यह उस घटनाओ में से सुंदर घटना है इसके बारे में और थोड़ा सा विस्तार में हम कल बात करते हैं तो आज यही तक ओम शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण

Question Answer

मस्तु किंतु उसमें क्या है देखिए मैंने यह सब चीजों में अभी जैसे ठाकुर पुरुषों के साथ बात करते हैं तो स्त्रियों के बारे में कुछ नेगेटिव कहेंगे और स्त्रियों के साथ में बात करते हैं तो पुरुषों के बारे में कुछ नेगेटिव कहेंगे तो यह किसी को किसी के लक्षणों के बारे में कुछ ऐसा कहना तो नेचुरली कि फिर उसको और कोई रिपीट नहीं करेगा हमने सुना है कुछ कुछ चीजें किंतु वह सब चीजें ऐसे ही है कि शरीर में क्या रखा है यह क्रूमी मूत्र शोच यही तो सब कुछ है ऐसा करके इस तरह का एक नेगेटिव पिक्चर खड़ा करेंगे कि आपको इस पूरी चीज की ओर घृणा हो जाएगी कि अरे शरीर के प्रति इतना मोह क्यों है आखिर में शरीर में क्या है तो उस तरह से माने कठोर ही है सुनकर के वो जो एक्चुअल सन्यासी नहीं है उनको बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा देखिए करना चाहिए मेरा खुद का इतना सारा प्लानिंग है कि मैं यह टॉपिक को लेकर कंपाइल करूंगा उस टॉपिक को लेके करूंगा कुछ कुछ मैंने किया भी है एक कंपाइलेशन मैंने ठाकुर के इंग्लिश शब्दों का किया था कि ठाकुर इंग्लिश शब्द कथामृत में कहां कहा बोलते हैं तो मैंने वो कंपाइलेशन एक्चुअली इतना लंबा चला मैं जत में सीरियल के रूप में देता था वो सब प्रसंग किंतु फिर आखिर में मुझे उसको बंद कर देना पड़ा क्योंकि वो बहुत सारे शब्द है एक्चुअली बहुत सारे शब्द वो ज्योत में कुछ पूरे सीरियल के रूप में मैंने चलाए थे वह सब आर्टिकल जितने जितने प्रसंग है वोह सब कंपाइल करके ऐसे ठाकुर की गालियों का कंपाइलेशन ऐसे बहुत सारे कंपाइलेशन कर सकते हैं मैंने शुड बी डन