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Meditation ·

Guided Meditation || श्रीरामकृष्ण ध्यान || 10 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

Method of meditation

पिछली बार हमारा मेडिटेशन का जो क्लास हुआ था इसके बाद में यह जो फीडबैक आता है उसमें एक फीडबैक यह था कि कि दो बार गीता चटिंग करने से जैसे हमने एक बार प्रारंभ में किया गीता का पाठ करके उस एक्चुअली हमारा जो मेथड है कैसा है कि हम लोग एक मेडिटेशन सेशन को दो सेशन में बांट देते हैं कि माने दोनों इक्वल मेडिटेशन मेडिटेशन सेशंस है। फर्स्ट सेशन में भी हम सेम करते हैं मेथड का प्रयोग वैसे ही सेकंड सेशन में भी करते हैं। हमारा मेथड कैसा है? अभी तो आपको पता ही है कि सर्वप्रथम तो आंखों को सर्वप्रथम तो हम गीता चटिंग करेंगे। इसका फायदा क्या है? इसका पर्पस क्या है? कि गीता का पाठ करने से क्या होगा? कि अपना यह जो मन दिन भर का यह जो सब हम संसार का कार्य करते हैं। घर का कार्य करते हैं। यदि जॉब करते हैं तो वह सब काम है। तो अपना मन बिखरा जो पड़ा हुआ है उस बिखरे हुए मन को कंसंट्रेट करने के लिए गीता चटिंग है। तो यह हमारा सर्वप्रथम स्टेप है। उसके बाद में सेकंड स्टेप है आंखों को झुकाना। बंद नहीं करना झुकाना। या तो आप आंखों को झुकाइए या तो फिर सेकंड मेथड है। पहले एक बार बंद कर दीजिए आंख को और फिर थोड़ा सा हल्का सा उसको ओपन कीजिए। आंख थोड़ी सी तो खुली रहनी ही चाहिए। संपूर्ण रूप से आप आंख बंद कर देंगे तो क्या होगा कि आपका जो मन है, आपका जो कंसंट्रेशन है, सर के भीतर में चला जाएगा। और अपना सर है। यह जितना ही यह दुनिया भर का कचरा है इस जगत में उसका यह घर है। तो कंसंट्रेट करना है हृदय के ऊपर में। तो अपना मन हृदय के ऊपर में लगा रहे, फिक्स रहे। इसलिए हम आंखों को झुकाते हैं। आंखों को कभी बंद नहीं करते। आप जितने भी स्वामी जी का जो फेमस वरशिप पोज है स्वामी जी ध्यान मुद्रा में बैठे हैं अपने सभी सेंटर में सभी मंदिरों में जिनकी पूजा होती है आप ध्यान से देखिए स्वामी जी की आंखें खुली है ठाकुर का वही कल्पतरु पोज़ इस तरह से जो ठाकुर खड़े हैं आप ध्यान से देखिए ठाकुर की आंखें खुली है जो लोग अच्छे से चित्रकारी करते हैं वे लोग यदि भगवान शिव या भगवान बुद्ध का ध्यान मग्न चित्र यदि दोेंगे आप ध्यान से देखेंगे आंखें हमेशा खुली रहेगी आंखें बंद करके ध्यान करना वह थोड़ा सा कठिन है हो सकता है किंतु जैसे हमने पिछली बार भी देखा था ठाकुर ने कहा है कि दो योग है। एक तो है विष्णु योग दूसरा है शिव योग। विष्णु योग में हृदय में ईश्वर पर ध्यान करते हैं और शिव योग में हम अपना जो स्वरूप है अपना आत्म स्वरूप है उस पर ध्यान करते हैं तो शिव योग में आप आंख बंद करने से चलेगा विष्णु योग में आंख खुली रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि आप विष्णु योग का शिव योग का प्रैक्टिस कर सकते हैं सो दैट इज वेरी गुड। किंतु आई विल एडवाइस अगेंस्ट दैट क्योंकि क्या है कि सभी लोगों के पास में यह एडवांस देखिए बहुत सारे लोग मुझे कहते हैं कि हम तो ध्यान का प्रैक्टिस करते हैं ना चारप साल से कर रहे हैं तो फिर मैं पूछता हूं कितना मिनट ध्यान करते हैं तो उत्तर मिलता है 10 12 15 20 मिनट आधा घंटा एट द मोस्ट तो फिर यदि आप 10 15 मिनट ध्यान करते हैं तो गलत तरीके से करेंगे आपको कोई नुकसान नहीं होगा। किंतु समझिए हमेशा ध्यान का फायदा या ध्यान का नुकसान गलत तरीके से ध्यान किया तो उसका नुकसान और सही तरीके से किया तो उसका फायदा तभी समझ में आता है यदि आप एक घंटे से ज्यादा ध्यान करेंगे। सो विद दिस अंडरस्टैंडिंग हम लोग ध्यान करते हैं। सर्वप्रथम गीता चेंटिंग उसका पपस है बिखरे हुए मन को एकाग्र करना। दूसरा स्टेप है आंखों को झुकाना। सर्वप्रथम बंद करके हल्का सा खोलना, ओपन करना। तीसरा स्टेप है अपने मन को हृदय पर एकाग्र करना। और चतुर्थ स्टेप है हम [नाक से की जाने वाली आवाज़] जिस इष्ट देवता की आराधना करते हैं उनका हृदय में उनकी मूर्ति को स्थापित करके हृदय मन मंदिर को हृदय को मंदिर में परिणत करना। सो ठाकुर विराजमान है मेरे हृदय में और वही जैसा मेरा एक फेवरेट जो सीन है कि वही ठाकुर का चिर परिचित कमरा ठाकुर अपनी खाट पर बैठे हैं। पास में ही मां बैठी है। सभी गुरु भाई जो है जमीन पर बैठे हैं। और मैं भी गुरु भाइयों में से ही एक हूं। मैं भी ठाकुर का वही स्नेह का संतान हूं। मैं भी ठाकुर का वही प्रेम का पात्र हूं। मेरी ठाकुर पे इतनी ही श्रद्धा भक्ति है जितनी कि नरेंद्र की है, राखाल की है, तारक की है। यह जितने भी गुरु भाई वो यंग अवस्था में युवा अवस्था में जो आते थे मैं भी फिर से युवा हो गया हूं। मैं भी वो गुरु भाइयों के साथ में फिर से ठाकुर के पास में नियमित रूप से आता हूं। जितनी गुरु भाइयों के ऊपर में त्यागी संतानों के ऊपर में मां और ठाकुर का आशीर्वाद था उतना ही मुझ पे है। तो यह इमेजिन करके इस सीन को अपने हृदय में विजुअलाइज करना अपने हृदय में फिक्स कर देना। तो यह है अपना स्टैंडर्ड मेथड। और जैसे हमने आज सुबह को भी थोड़ा सा डिस्कस किया था। देखिए आध्यात्मिक जीवन के जितनी भी साधनाएं हैं वह चाहे जप कहे ना कि यह स्वाध्याय कहे ना कि पूजा पाठ कहे कर्म योग कहे जितनी भी आप देखेंगे कि पद्धतियां है उन सब में ध्यान जो है वह यूनिक है। क्यों यूनिक है? क्योंकि यह ध्यान जो है ईश्वर साक्षात्कार का आत्मज्ञान का सीधा रास्ता है। इसीलिए इसको राजयोग कहते हैं। सभी योगों में सर्वश्रेष्ठ योग है। इसके लिए इसको कहते हैं राजयोग। देखिए ज्ञान योग को भी राजयोग का उपमा नहीं मिला है। ध्यान को मिला है। सो ध्यान में हम और फिर क्या है कि ध्यान जब हम करेंगे हमको सीधासीधी यह स्वीकार कर लेना है कि मैं वही आत्म तत्व आत्म तत्व से जो प्रकट हुआ अनंत आनंद चीर शांति वह सबका मैं अधिकारी हो चुका हूं। ध्यान हम पूर्णता प्राप्ति के लिए नहीं करते हैं। पूर्ण होकर के ध्यान करते हैं। पूर्ण होकर के पूर्ण में समाहित होने के लिए हम ध्यान करते हैं। यानी कि एक्सट्रीमली पॉजिटिव माइंडसेट ध्यान प्रारंभ करने से पहले ही होना चाहिए। तो हमारा जो मेथड है इसी जो मेथड को मैंने दो मॉड्यूल में बांट दिया है। पहले भी गीता चेंटिंग फिर ध्यान और फिर सेकंड मॉड्यूल में भी गीता चेंटिंग फिर से ध्यान। अभी एक जो फीडबैक मेरे पास में आया है उसमें किसी ने मुझे कहा कि हम जब सेकंड टाइम गीता चेंटिंग करते हैं तो उसकी आवश्यकता नहीं। एक बार किया तो हुआ। अभी मैं दो मॉड्यूल में दो दो बार मैं इसको क्यों करता हूं कि सभी का कैपेसिटी नहीं कि इतना लंबा ध्यान करने का यदि आप प्रारंभ करते हैं तो फिर होगा क्या कि थोड़ा सा ध्यान किया उसके बाद में मन भटकने लगता है। तो ऐसा ना हो इसलिए मैंने दो हिस्सों में इसको बांटा है। पहली बार भी गीता चेंटिंग करके मन को एकाग्र करेंगे और ध्यान करने फर्स्ट टाइम ध्यान करने के बाद में जब सेकंड टाइम ध्यान करने को बैठते हैं उस समय भी मन एकाग्र हो इसके लिए गीता चेंटिंग करते हैं। किंतु यदि आपको ऐसा लगता है कि आप लंबे समय तक ध्यान कर सकते हैं तो मैं जब सेकंड टाइम गीता चेंटिंग करवाऊंगा वो नहीं करके यदि आप कंटीन्यूअस मेडिटेशन करना चाहे तो आप कर सकते हैं। इससे मुझे कोई आपत्ति नहीं। किंतु ज्यादातर लोग जो लोगों ने ध्यान में अभी प्रवेश ही किया है या तो फिर जिनका मन एकाग्र होने में थोड़ा सा प्रॉब्लम खड़ा करता है उन लोगों को दो बार ध्यान गीता चेंटिंग करने से क्या होगा कि बिखरे हुए मन को एकाग्र करने में बड़ी सुविधा होगी तो यह तो एक हुआ दूसरा कि आज जैसे मैं करूंगा एक बार हम ध्यान का प्रारंभ करेंगे उसके बाद में मैं कथामृत में से थोड़ा सा पाठ करूंगा। कथामृत का पाठ इसलिए क्योंकि ठाकुर का ही ध्यान, ठाकुर का ही नाम स्मरण और ठाकुर की ही वाणी का श्रवण। तो आप ध्यान करेंगे। मैं बीच में थोड़ा सा कथामृत का पाठ करूंगा। आप ऐसा आप मान आप विजुअलाइज कीजिए कि आप वही हृदय दक्षिणेश्वर में वही ठाकुर के कमरे में विराजमान है और वही ठाकुर ही जैसे कि यह सब बोल रहे हैं कर रहे हैं। तो ऐसा मैं पाठ करूंगा आप ध्यान करते रहिएगा। जब मैं कहूंगा हरि ओम उसका अर्थ यह हुआ कि अभी सेकंड पार्ट चालू होगा। अभी आप सेकंड पार्ट में गीता चटिंग ना करके कंटीन्यूस ध्यान करना चाहते हैं तो आपकी मर्जी है। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। ओके तो अभी हम

Gita Chanting

गीता चेंटिंग से प्रारंभ करेंगे। 12वां अध्याय 12th चैप्टर पिछली बार भी किया था। इस बार भी करेंगे क्योंकि सभी को नहीं आता। तो क्या है कि तीन-चार बार करने से सभी का एक अच्छे से उसको चटिंग करने का हैबिट हो जाएगा। सेम मेथड मैं दो बार चटिंग करूंगा। यदि आपको आता है आप दोनों बार मेरे साथ में दोहराइए। यदि नहीं आता है तो एक बार सुनिए। दूसरी बार मेरे साथ में रिपीट कीजिए। आवाज आपकी स्पष्ट होनी चाहिए। आवाज क्लियर होनी चाहिए। मन का यह जो तमस है उसको भगाना है चाबुक मार करके मन भटकता है उसको कान पकड़ करके उसको मंदिर में लाकर बिठाना है मां जैसे बच्चे को करती है तो इसलिए आवाज स्पष्ट रहेगी तो फिर मन भी अपने वश में रहेगा ओके [गला साफ़ करने की आवाज़] अर्जुन उवाच एवं सतत सतत युक्ताय एवं सतत युक्ताय भक्तम परपासते भक्तम पर्यपासते ये चाप्यक्षम व्यक्तम ये चाप्यक्षरमव्यक्तम तेशाम के योग वित्तमा श्री भगवान वाच श्री भगवान वाच मैयावेश मनो ये माम मैयावेश मनो येमा नित्य युक्ता उपासते श्रद्धया परयोपता ते युक्त तमामता येतक्षरम निर्देश्यम येत त्वक्षरम निर्देश्यम अव्यक्तम पर्युपासते सर्वत्र गम चिंत्यम च सर्वत्र गम चिंत्यम च कूटस्थ मचलम ध्रुवम कूटस्थ मचलम ध्रुवंम सनयम्येंद्रिय ग्रामम सनयम्द्रिय ग्रामम सर्वत्र समबुद्धय ते प्राप्तवती मामेव सर्वभूत तेता सर्वभहतेता क्लेशो दिक तरस्तेशाम अव्यक्त चेतसाम अव्यक्त चेतसाम अव्यक्त ही गत दुखम अव्यक्त गतिर दुखम देहव वाप्यते देहव वाप्यते येत सर्वाण कर्माण म सन्यस्य मत परा अनन्य न योगन माध्यायंत उपासते माध्यायंत उपासते तेशामहम समुदता तेेशामहम समुद्धता मृत्यु संसार सागरात मृत्यु संसार सागरात भवामी न चरात पार्थ मैयावेशित चेतसाम मैयावेशित चेतसाम मव मन आधस्त्व मव मन आधस्त्व म बुद्धिम निवेशय निवशिष्य सिमव निवसव अत उर्ध्वम न संशयः अत उर्ध्वंम न संशयः अथितम समाधान धातु अथ चित्तम समाधानातुम न शकनो शम स्थिरम न शकनो शम स्थिरम अभ्यास योग ततो अभ्यास योगन ततो मामच्छा तुम धनंजय अभ्यासेप्य समर्थोसी अभ्यासेप्य समर्थोसी मत कर्म परमो भव मत कर्म परमो भव मदमप कर्माण मदथमप कर्माण कुर्व सिद्धि मवाप्ससीसी [संगीत][गाना गाने की आवाज़] वेरी गुड

Practice of Meditation

अभी जैसे [संगीत] कि अपना मेथड है नयन को सबसे पहले बंद करके हल्का सा उसको ओपन कीजिए। अपने मन को अपने हृदय में केंद्रित कीजिए। और भगवान श्री रामकृष्ण देव स्वयं विराजमान है। वह विजुअलाइज [संगीत] कीजिए। ओम मैं कथामृत में से थोड़ा सा पाठ करता हूं। आप ध्यान करते रहिए। मास्टर महाशय लिखते हैं [संगीत] शोभा भंगो हो सभा भंग हुई भोतेरा वैदिक पाईचारी कोते छ भक्तगण इधरउधर टहल रहे हैं मास्टरों पंचवटी इत्यादि स्थाने बेइते छ मास्टर भी पंचवटी वग स्थानों में घूम रहे बेला अंदाज पांचटा समय 5 बजे का है कित खण परे तनी श्री रामकृष्ण घरे दिके आशिया देख लेन घरे उत्तर दिके छो बारदार मध्य अद्भुत व्यापार होते छे कुछ समय समय के बाद में उन्होंने श्री रामकृष्ण के घर के पास में आकर देखा घर के उत्तर तरफ के छोटे वरांडे में अद्भुत घटना चल रही है। श्री रामकृष्ण स्थिर होइया दांडाइया रोहिया छे श्री राम कृष्ण स्थिर होकर के खड़े हैं नरेंद्र गान कोते छे नरेंद्र गान कर रहा है दुई चार जन भक्तो दाड़ाइया आन दो चार भक्त पास में खड़े हैं। मास्टर आशिया गान सुनीते छ मास्टर आकर के गान सुन रहे हैं। गान शून्या आकृष्ट होइया रही। गान सुनकर के आकृष्ट होकर के रहे ठाकुर गान छाड़ा एमो मधुर गान तेनी कनो कोथाऊ सुने नहीं ठाकुर के गीत को छोड़कर के ऐसा मधुर गान उन्होंने कभी भी कहां भी सुना नहीं था अर्थात ठाकुर दिके दृष्टिपात कोरिया ओबाक होया रोहिले एकाएक ठाकुर की ओर नजर पड़ने से अवाक होकर के रह गए ठाकुर दाड़ाइया निष्पंदो चखुर पाता पड़ते छेना ना निश्वास प्रवास बहते छे कि ना बही छे ठाकुर खड़े हैं निष्पंद है आंखों की पाप ये जो झलके हैं वह पड़ रही है कि नहीं आंख मिटमिट रही है कि नहीं निश्वास प्रवास चल रहा है कि नहीं चल रहा जिज्ञासा कराते एक जो भक्त बोलले ए नाम समाधि जिज्ञासा करने से एक भक्त ने कहा इसका नाम है समाधि मास्टर ए रूप कनो देखे नहीं सुने नहीं मास्टर ने इस तरह से कभी देखा नहीं था सुना नहीं था ओबा होया तनी भाभीते छ अवाक होकर के वह सोच रहे हैं भगवान के चिंता कोरिया मानुष की ये तो बाज ज्ञान शून्य होए भगवान का चिंतन करने से मनुष्य का इतना बाह्य ज्ञान शून्य हो सकता है ना जानी कतो दूर विश्वास भक्ति थाकले ए रूप हो पता नहीं कितना विश्वास और भक्ति रहने से ऐसा होता है गटी ए गान यही है चिंतोयो मोमो मानोष होरी चिद घनो निरंजन किबा अनुपम भाति मोहन मूरति भत हृदय रंजन नरागे रंजितो कोटि शशि बिंदित किबा बिजली चमके शेप आलोके पुलके शहरे जीवनो गाने ए चरण टी गाही बार समय ठाकुर श्री रामकृष्ण श्री हरि ते लागी लेन गान का इस चरण गाने के समय ठाकुर श्री रामकृष्ण रोमांचित होने लगे कंपित होने लगे देह रोमांचित चखु हो ते आनंद आश्रू बिगलित होते छे नयनों से आनंद आश्रू विगलित हो रहे हैं माझे माझे जेनु की देखिया हशते छ बीचबीच में जैसे कि क्या देखकर के हंस रहे हैं ना जानी कोटि शशि विनंदित तो की अनुपम रूप दर्शन करते छ पता नहीं कोटि शशि विनिंदित क्या अनुपम रूप दर्शन कर रहे हैं ए नाम की भगवान चिन्मय रूप दर्शन क्या इसी का नाम है भगवान का चिन्मय रूप दर्शन कतो साधन को ले कतो तपस्या फले कतो खानी भक्ति विश्वास बोले ए रूप ईश्वर दर्शन हो कितना साधन करने से कितनी तपस्या के फल स्वरूप कितना भक्ति विश्वास होने से इस तरह ईश्वर दर्शन होता है। आभार गान चलीते छे फिर से गान चल रहा है रदी कमलाशने भजो तार चरण देखो शांत मने प्रेम नयने अपरूप प्रिय दर्शन आश भुवन मोहन हास्य फिर से वही भुवन मोहन हास्य शरीर श रूप निष्पंदो शरीर उसी तरह निस्पंद तिमित लोचन झुके हुए लोचन किंतु की जेनो अपरूप रूप दर्शन करते छ किंतु जैसे कि कौन सा अपरूप रूप दर्शन कर रहे हैं आर से अपूप रूप दर्शन करिया जेनो महानंद भाषेते छ और वही अपरूप रूप दर्शन करके जैसे महानंद में तेर रहे हैं ए बार गानेर शेष हो इस बार गान का अंत हुआ नरेंद्र गाय ले नरेंद्र ने गाया चिदानंद रसे भक्ति योगावेशे हो रे चीर गमनो चिदानंद रसे प्रेमानंद रसे समाधि ओ प्रेमानंदे ए अद्भुत छपी हृदय मध्य ग्रहण कोरिया मास्टर गहे हे प्रत्यावर्तन करते लागी ले समाधि और प्रेमानंद की यह अद्भुत छवि हृदय के भीतर में ग्रहण करके हृदय मध्य ग्रहण करके मास्टर घरे प्रत्यावर्तन करने लगे माझे माझे हृदय मध्य से हृदयत्तकारी मधुर संगीते फूट उठी ते लागीो बीचबीच में हृदय के भीतर में वही हृदय उन्मत्तकारी मधुर संगीत की ध्वनि उठने लगी प्रेमानंद रसे होरे चीर मगनो हरि प्रेमे मत होए हो चीर मगनो हरि ओम।

Gita chanting

हम फिर से गीता चटिंग करेंगे। जिसको ध्यान कंटिन्यू रखना है, वह ध्यान कंटिन्यू रख सकते हैं। जो गीता चटिंग करना चाहते हैं, श्लोक नंबर 11 से प्रारंभ करेंगे। 11 से 20 तक। अथ तदप्य शक्तोसी करतुम मध्य माशितः करतुम मध्यग माश्रितः सर्व कर्म फलत्यागम ततः कुरु यतात्मवान श्रेयो ही ज्ञानमभ्यासात श्रेय ज्ञानम अभ्यासात ज्ञाना ध्यानम विशिष्यते ध्याना कर्म फल त्याग ध्यानात कर्म फल त्याग त्यागा रनंतरम त्यागा रनंतरम अध्वष्टा सर्वभता नाम अध्वष्टा सर्वभता नाम मैत्र करुण एवच निर्ममो निरहंकार सम दुख सुखक्षमी संतुष्ट सततम योगी यतात्मा दृढ़ निश्चयः मर्पी मनो बुद्धि मर्पित मनो बुद्धि योत भक्त समे प्रिय यस्मानो द्विजते लोको लो द्विजते चयः लोनो द्विजते चयः हर्षम भयो द्वेग हर्षमर्ष भयो द्वेगै मुक्तो यह सच में प्रिय मुक्तो यह सचमे प्रिय अनपेक्ष सुचिर दक्ष अनपेक्ष सुचि दक्ष उदासीनो गतव्यथः उदासीनो गतव्यथः सर्वारंभ परिित सर्वारंभ परित्यागी योम भक्त समे प्रिय प्रिय यो भक्त समे प्रिय यो न हश्यति नष्टि यो न हृषति नष्टि न शो चितन्य न शोचति न काक्षति न शोचति न काक्षति शुभा शुभ परित्यागी भक्तिमान्य समे प्रिय भक्तिमान्य समय प्रिय समह शत्रो चमित्रे च समह शत्रो चमित्रे च तथा मानापमानयो शीतोष्ण सुख सुख दुखेशु शीतोष्ण सुख दुखेशु समह संग विवर्जितः तुल्य निंदा स्तुति मौनी संतुष्टो ये न के न चेत संतुष्टो ये केन चेत अकेत स्थिर मति अकेत स्थिर मति भक्तिमान में प्रियो नरह येत धर्म्या मृतमदम यथोक्तम परपा उपासते यथोक्तम परपासते श्रद्धा मत परमा श्रद्धा मत परमा भक्ते तव में प्रिया भक्ते तव में प्रिया अभी लास्ट वाला एक ही बार में गाऊंगा आप साथ-साथ साथ में कर सकते हैं। इति श्रीमद् भगवत गीता सु उपनिषद [संगीत] सु ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण संवादे भक्ति योगो नाम दशोध्याय वेरी गुड

Practice of meditation

फिर से ध्यान करेंगे फिर से अपने मन को एकाग्र करेंगे अपने हृदय में। ओम ओम [संगीत] मैं कथामृत का पाठ करता हूं। आप सभी ध्यान में ही रहिए। ए बार संकीर्तन आरंभ होईबे [संगीत] अभी संकीर्तन प्रारंभ होगा। खोल बाजीते छे मृदंग बज रहा है गोश्त खोल बाजाईते छे गोष्ठ मृदंग बजा रहे हैं एको गान आरंभ होए नहीं अभी भी गान प्रारंभ नहीं हुआ खोले मधुर बाज ना गौरांग मंडल ओ तहादेर नाम संकीर्तन कथा उद्दीपन करें मृदंग का मधुर शब्द गौरांग मंडल और उनके नाम संकीर्तन की बात का उद्दीपन करता है। ठाकुर भाबे मग्न होइते छ ठाकुर भाव में मग्न हो रहे हैं माझे माझे खुली दिखे दृष्टि निक्षेप कोरिया बोलीते चैन बीचबीच में मृदंग बजाने वाले की ओर दृष्टि निक्षेप करके बोल रहे हैं आरी आरी आमा रोमांच ांच हो मुझे रोमांच हो रहा है गायकरा जिज्ञासा को लेन किु पद गायबेन गायक ने प्रश्न किया किस तरह का पद गाए ठाकुर श्री रामकृष्ण विनीतो भावे बोली लेन ठाकुर श्री रामकृष्ण ने विनीत भाव से कहा एक टू गौरांग कथा गाओ थोड़ी गौरांग की बातें गाइए कीर्तन आरंभ होलो कीर्तन आरंभ हुआ प्रथम गौर चंद्रिका पहले ही गौर चंद्रिका तत्पर अन्न गीत उसके बाद में अन्य गीत लाखवान कांचन जीनी रोश ढोरो ढोरो गोरा मुंजा छनी कि काज शरत कोटि शशी जोगत कोरिले आलो गोरा मुखेर हसी कीर्तने गौरांगे रूप वर्णना हो ते छे कीर्तन में गौ गौरांग की रूप वर्णना हो रही है। कीर्तनिया आकर देते छे कीर्तनिया आकर दे रहे हैं। शखी देखिलाम पूर्ण शशि रास नाय मृगां को नाई हृदय आलो करे कीर्तन्य आभार बोलचे कोटि शशिर अमृते मुख माजा ए कथा सुनीते सुनीते ठाकुर समाधस्त होले गान चलीते लाो गान चलने लगा कितण पर ठाकुर श्री रामकृष्ण समाधि भंग होइलो कुछ समय के बाद ठाकुर श्री रामकृष्ण की समाधि भंग हुई तत् विभोर होइया हठात दंडायमान होले ओ प्रेमत्त गोपिकार न्याय श्री कृष्ण रूपे वर्णना कोते कोते कीर्तन यार शंगेशंगे आखर दते छे वो भाव में विभोर होकर के एकाएक उठ पड़े और प्रेमोन्मत गोपिका की तरह श्री कृष्ण के रूप की वर्णना करते करते कीर्तनिया के साथ में कीर्तन गालने वालों के साथ में आकर दे रहे हैं सखी रूपे दोष ना मनेर दोष आन हेरीते श्याम मोह हेरी त्रिभुवनो ठाकुर नृत्य करते आर दीते छ ठाकुर नृत्य करते करते आर दे रहे हैं भक्तरा अबक होया देखते छ भक्तगण अवाक होकर के देख रहे कीर्तनिया आभार बोल छ कीर्तन्या कीर्तन गाने वाले फिर से कह रहे हैं गोपिकार उक्ति गोपिका की बात बांसी बाजाशना तोर की निद्रा नहीं को बंसी बजाना मत तुमको क्या नींद नहीं आती आखोर दिया बोल आर देकर के बोल रहे हैं आर निद्रा होबे बा के कोरे शजा तो करो पल्लभ आहार तो श्री मुखेर अमृत ताते अंगुलीर सेवा ठाकुर श्री रामकृष्ण आसन पुनर्बार ग्रहण करिया छे कीर्तन चलिते लालो श्रीमती बोल छेन ठाकुर श्री रामकृष्ण ने आसन फिर से ग्रहण किया है। कीर्तन चलने लगा। श्रीमती कहती है चखु गो श्रवण गोण गो इंद्रियों शकोले चले गो आमी एकला पा केनो रलामो आंख गई श्रवण गया घण गया इंद्रिय सब चली गई मैं अकेली क्यों रह गई को शेष श्री राधा कृष्ण मिलन गान होलो आखिर में श्री राधा राधा कृष्ण का मिलन गान हुआ धनी माला गाथे श्याम गले दुलाईते एमन समय आईलो सम्मुखे श्याम गुण मनी कीर्तन थामिलो ठाकुर भागवत भक्त भगवान ए मंत्र उच्चारण करिया बार-बार भूमिष् होया प्रणाम करते छ ठाकुर भागवत भक्त भगवान इस मंत्र का उच्चारण करके बारंबार भूमिष्ट होकर के प्रणाम कर रहे हैं। चतुर्थदी के भक्त को भक्तों दे उद्देश्य करिया प्रणाम करते छ चारों ओर भक्तों को उद्देश करके प्रणाम कर रहे हैं ओ संकीर्तन भूमि धुली ग्रहण करिया मस्तके दते छ और संकीर्तन भूमि की धुली ग्रहण करके मस्तक पे दे रहे हैं तो यहीं पे करते हैं समाप्त। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। यदि कोई प्रश्न है तो आप सुबह के क्लास में कर सकते हैं। ओम