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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 26 Sept 2023

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ओम स्थापकााय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी कल हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज कह रहे हैं कि 19वीं 19वीं सदी के मध्य भाग में इन द मिडिल ऑफ द 19th सेंचुरी देयर वाज ए इवेंटफुल एक घटना हुई थी और वो थी कि पश्चिमी संस्कृति का भारत के ऊपर में आक्रमण अभी पश्चिमी सेनाओं ने तो भारत पर आक्रमण किया था किंतु संस्कृति का जो आक्रमण है वो और भी ज्यादा इससे खतरनाक था। इससे पहले जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तब इस्लाम की संस्कृति के बारे में हमको इतना डरने की जरूरत नहीं थी क्योंकि भारतीय संस्कृति इस्लामिक संस्कृति से और कहीं ज्यादा सोफिस्टिकेटेड थी, कहीं ज्यादा एडवांस थी। एक्चुअली इस्लामिक राजाओं ने नवाबों ने एक्चुअली हमारी संस्कृति अपनाई थी। भारतीय संस्कृति उन्होंने अपनाई थी। तो वो रिवर्स केस था कि इस्लामिक आक्रमण तो हुआ किंतु भारतीय संस्कृति यह हमारे इस्लामिक जो हमारे विजेता थे उन्होंने अपनाई। किंतु ब्रिटेन के साथ में एक दूसरी ही परिस्थिति हुई। क्योंकि रेनेसा के समय में जो साइंस एंड टेक्नोलॉजी का एक एक्सप्लोजन जब विदेश में हुआ और उनका इकोनॉमिक्स या तो फिर उनका ये इंजीनियरिंग उनकी टेक्नोलॉजी भारत से कहीं ज्यादा एडवांस हो गई तब कहीं जाके हमको यह प्रश्न होने लगा कि हम लोग जो टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग में इतने पीछे पड़ गए हैं तो इसका कारण यह तो नहीं कि हमारी सामान सामाजिक व्यवस्था जो है या तो फिर हमारा धर्म है या तो फिर हमारी अर्थनीति है ये सब चीजों में प्रॉब्लम हो एक्चुअली उत्तर है नहीं भारत का धर्म है या तो भारत की सामाजिक व्यवस्था या तो फिर भारत की अर्थनीति प्रॉब्लम इन सब में नहीं था प्रॉब्लम वास मच डीपर वो जो एक पुरानी फेनेटिसिज्म जो है इस्लामिक आक्रमण के बाद में भारतीय समाज में एक कंजर्वेटिविज्म एक ऑर्थोडॉक्सी जो प्रवेश कर गया था जो एक कुछ कुसंस्कार जो कि अरेबिया से आकर के भारत में प्रवेश कर गए थे। स्त्रियों को सम्मान नहीं देना, स्त्रियों को अपमानित करना, ईश्वर के प्रति उनको एक सिंबल के रूप में मात्र देखना, ईश्वर प्राप्ति के लिए जीवन सर्वस्व अपना समर्पित नहीं करना, वो सब रीजन थे नहीं कि हमारी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था। किंतु वो तो धीरे-धीरे करके संदेह का भंजन होगा ओवर अ पीरियड ऑफ 200 इयर्स। किंतु उस समय यह 1800 80 एंड 70 एंड 90 जबकि स्वामी जी का जन्म हुआ था। स्वामी जी की तरह वो जितने भी कॉलेज में जाते हुए लड़के थे उन सबके मन में तो यह बैठ गया था कि हां यह हम लोग जिस तरह से जीते हैं जिस तरह से खाते हैं जिस तरह से हम लोग सोचते हैं वो सब कुछ हमारी दुराव्यस्था के लिए दाई है। और इसीलिए वो एक दल था लड़कों का कि जो कि हिंदू धर्म में जिसको अखाद्य खा कहा जाता है वह सब खाता था जानबूझकर के कि जिससे कि वे लोग ब्रिटिशर्स जैसे हो सके एक बार नरेंद्र ने खुद जाकर के ठाकुर को बोला था कि उसको क्या है कि एक बड़ा मारने का एक शौक था ब्रेगिंग जिसको कहते हैं। तो ठाकुर को जाकर के नरेंद्र ने कहा महाशय आज मैं ऐसा कुछ खा के आया हूं जिसको कि अखाद्य कहते हैं हिंदू धर्म में तो फिर अभी क्या है कि ठाकुर ने बाद में कहा था कि जो पान मां या तो शुक्र मांस भी यदि वो खाए किंतु यदि जिसका मन ईश्वर के ऊपर में रहता है तो उसको कोई दोष स्पर्श नहीं करता। ठाकुर जैसे ठाकुर जो कि इतने सब चीजों में मानते थे उनका खुद का क्लियर बड़ा कांसेप्ट था कि जब तक ईश्वर में भरोसा है तब तक हम क्या खाते हैं क्या पहनते हैं कहां जाते हैं किसके साथ बात करते हैं वो सब चीजों से इतना फर्क नहीं पड़ता तो वो ठाकुर की बात थी यहां पे गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं मातृ जाति प्रगति पथे उनबिंश शताब्दी मध्यभाग भाग एक जटिल समस्या उपस्थित होया छिलो मातृजि की प्रगति के पथ में उनस शताब्दी यानी कि 19थ सेंचुरी के मध्य भाग में एक जटिल समस्या उपस्थित हुई थी अंग्रेज विजित भारत तखन पाश्चात्य भावधए प्लावितो अंग्रेजों द्वारा विजयित भारत उस समय पाश्चात्य की भावधारा में प्लावित था बह रहा था बह गया था पाश्चात प्रति विद्या बुद्धि शक्ति और संपदे दुरनी बारज जो मोहे पराधीन भारत तखन यूरोपीय भाव गुली के ग्रहण कोते लालायत उन लोगों की विद्या बुद्धि शक्ति और संपद की दुर्निवार्य मोह दू जो अनिवार्य जो इस तरह का मोह जिससे आप छूट नहीं सकते। एक बड़ा ही प्रचंड मोह उसमें ग्रसित होकर उसका भोग बन करके उसका शिकार बन करके भारत पराधीन भारत उस समय यूरोपियन भाव को ग्रहण करने के लिए लालायित था। यूरोपियन विचारधारा को ग्रहण करने के लिए वो बेचारा परेशान सा हो गया था। यूरोपीय भावधारा को ग्रहण करने के लिए उत्सुक हो गया था। 1854 ख्रिस्ताब्दे 19 जुलाई सर चार्ल्स वुड भारतीय शिक्षा पद्धति जे परिकल्पना रचना करिया छिले ताे ए लालशार परिणति कोथाए ताहार एकटा स्पष्टो आभास पाबािया छिलो 1854 ख्रिस्ताद की 19 जुलाई को सर चार्ल्स वुड भारतीय शिक्षा पद्धति के बारे में जो उन्होंने उन्होंने कल्पना की थी वो देखकर के हमको पता चलता है कि हमारी ये उत्सुकता है वो कहां जाकर के अटकेगी उसकी परिणति कोथा है उसका ट्रांसफॉर्मेशन अल्टीमेटली कहां होने वाला है उसका रिजल्ट क्या होने वाला है तहार एक स्पष्ट आभास पावा गया छिलो उसका एक स्पष्ट आभास मिला था हमको ए वैदेशिक पद्धति और प्रभाव के स्वीकार कोरिया भारत निश्चय संपूर्ण भूल कोरे नाई किंतु महाराज देखिए बड़े ही लिबरल है। कहते क्या है कि पश्चिमी सभ्यता और पश्चिमी पद्धति प्रभाव को स्वीकार करके भारत ठीक निश्चय रूप से संपूर्ण भूल नहीं की है। माने थोड़ा सा जो ग्रहण हमने किया है वह आवश्यक था। उसका एक अंश आवश्यक था। नहीं कि उसको संपूर्ण रूप से लेना। इसलिए यहां पे महाराज कह रहे हैं उसका पूरे-पूरा गलती हमने नहीं किया उसको ग्रहण कर ग्रहण करना भारतीय संस्कृति बरम इहाई रीति जे आत्मसस्थिया था इहाई रीति जे आत्मसस्थ थाकिया अपरे भाव राशि के ग्रहण पूर्वक निजे चिंता राज्य समृद्धि साधन कोरे आत्मसो थाकिया अर्थात कि अपने में स्थित हो के दूसरों की जो भाव राशि है उसको ग्रहण करके खुद की चिंता राज्य का समृद्धि साधन करें। भारत की जो रीति रही है वो यह है कि आत्म संस्थ देखिए कितना ही सुंदर शब्द है। आत्मा य अर्थात कि अपने खुद में संस्थ यानी स्थित होकर के यानी कि ऐसा नहीं है कि अपना सब छोड़कर के अपनी जो ओरिजिनल वैदिक या तो वेदांतिक विचार सरणी है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जो कि महावाक्य में ठीक-ठीक रूप से प्रकट होती है। प्रस्थानत्रय में जिसका कि संपूर्ण रूप से उसका विवरण दिया गया है। उसको बजाए रखकर के दूसरों की यानी कि यदि वह इष्ट से भी आती है या तो वेस्ट से भी आती है। जो भी नईनई चिंता राशि है, चिंताधारा है, विचार सरणी जो है, उसको ग्रहण करके अपने को समृद्ध करना। देखिए पुराने समय में पहले दो ट्रेड रूट थे। ट्रेड रूट का अर्थ क्या होता है कि ये जो ये होता था कैरेवेंस जो जाते थे कैरेवान कैरेन अर्थात कि ये ऊंटों का पूरा कैमल्स का पूरा यह एक ग्रुप जिसको कि सिल्क रूट कहते हैं। चीन में से वह सिल्क लेकर के वह भारत सेंट्रल एशिया होते-होते अपने यह कश्मीर को कहीं पे छूते-छूते वे लोग मिडिल ईस्ट यह बगदाद है, यह ईरान है, बगदाद है। ये सबको स्पर्श करते यूरोप तक जाते थे और यह भारत के सिल्क वहां पे बेचते थे। भारत के नहीं एशिया के। तो यह एक सिल्क रूट था। फिर यह एक स्पाइस रूट था कि यह जो स्पाइस आइलैंड जिसको कहा जाता था उस समय यह साउथ ईस्ट एशिया साउथ ईस्ट एशिया यानी कि ये इंडोनेशिया थाईलैंड म्यांमार या तो फिर वियतनाम ये सिंगापुर ये ये मलेशिया ये पूरा यहां पे स्पाइसेस उगते थे। स्पाइस यानी कि यह मसाला। तो यह स्पाइस को लेकर के एक स्पाइस रूठ जाता था समुंदर के मार्ग से। वो यह मलाका स्ट्रेट से पार होकर के साउथ इंडिया को स्पर्श करके यह बॉम्बे को टच करके ये अरेबियन सी में से ये नाइल ये जो डेल्टा है नाइल का डेल्टा जहां पे नाइल नदी समुंदर में निकलती है। जैसे गंगा सागर है। गंगा नदी समुंदर में वो समुद्र के साथ में जिसका संगम होता है वैसे ही नाइल डेल्टा नाइल का समुंदर मेडिटेरियनियन सी के साथ में संगम होता है। वहां से गुजर करके जो पूरा मेडिटेरेनियन वर्ल्ड है यानी कि ग्रीस, रोम, स्पेन, पोर्तगल यहां पे नॉर्थ अफ्रीका पूरा यहां पे एशिया माइनर यानी कि पेलेस्टाइन, सऊदी अरेबिया ये सब। तो पूरे मेडिटेरानियन में मेडिटेरनियन वर्ल्ड जो है वो वहां पे स्पाइसेस बेचते थे। यानी कि नॉर्थ में था ये सिल्क रूट। ये समुंदर के थ्रू जाता था स्पाइस रूट। तो ये सिल्क रूट और स्पाइस रूट ये दोनों पूरे ऐतिहासिक रूट थे। जहां पे भी ये पश्चिम की विचार सरणी या तो पश्चिम की ये जो थोड़ा बहुत भी थिंकिंग उस समय उन्होंने डेवलप किया था। यूरोप में तो इतना नहीं था। किंतु ये मिसर यानी कि इजिप्ट है या तो फिर यह युफ्रेटिस टाइगरिस्ट डेल्टा है जिसको कि मेसोपोटीमिया कहते थे। आजकल के ईरान और इराक और ये पेलेस्टाइन ये सऊदी अरेबिया सऊदी अरेबिया तो फिर भी उसका डेवलपमेंट बाद में हुआ। पुरानी जो संस्कृतियां थी जो चार संस्कृतियां एक तो हवांगहो रिवर वैली सिविलाइजेशन जो कि चाइना में थी सिंधु या तो फिर गंगा रिवर वैली सिविलाइजेशन जो कि भारत में थी और फिर ये यूफ्रेटिस टाइगरिस रिवर वैली सिविलाइजेशन जो कि इराक में थी और ये नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन जो कि इजिप्ट में थी। तो इन सबके बीच में अच्छे से ट्रेड चलता था और ये ट्रेड के माध्यम से पश्चिम की विचार सरणी पूर्व में जाती थी। पूर्व की विचार सरणी पश्चिम में आती थी और बाद में जब यूरोप डेवलप हुआ सबसे पहले ग्रीस के नगर राज्य सिटी स्टेट डेवलप हुए और उसके बाद में ये रोमन एंपायर का इवोल्यूशन स्टार्ट हुआ और रोमन एंपायर का इवोल्यूशन होते-होते धीरे-धीरे करके जिसको कि नॉर्दर्न यूरोप और वेस्टर्न यूरोप करते हैं। खास करके ये फ्रांस, जर्मेनिक ट्राइब्स, ब्रिटेन और ये आपका स्पेन और पोर्तगल ये सबका डेवलपमेंट जैसे-जैसे होता गया तो इसी स्पाइस रूट और इसी सिल्क रूट के द्वारा चीन, जापान और भारत की चिंताधारा फिलॉसोफी रिलीजन यूरोप में प्रवेश हुआ। और यूरोप की जो कुछ की उस समय की आईडियो फिलॉसोफी थी ये एरिस्टोटलल सोक्रेटिस वगैरह ने जो डेवलप की थी वो भारत में आना शुरू हुआ। तो ये हजारों सालों की भारत की परंपरा रही है कि हमेशा अपने को इंडिया स्टूड एट द क्रॉस रोड्स ऑफ द वर्ल्ड ऐसा कहा जाता था। विश्व का यह जो चौराहा है वहां पर भारत खड़ा है। वहां पर भारत की स्थिति है। और इस चौराहे पे इस क्रॉस रोड पे जहां से भी कोई भी अच्छा विचार आता है भारत ने ग्रहण किया है। बुरे विचारों को तजा है। अच्छे को ग्रहण किया है। ये विचारों का फिल्टरिंग कि अच्छे को ग्रहण करना बुरे का त्याग करना यह कैसे संभव हो पाया? तो महाराज जी लिखते हैं आत्मसंस्थ होकर के यानी कि अपना खुद का गुरूर अपना खुद का प्राइड अपनी खुद की कल्चर अपनी खुद की संस्कृति उसको छोड़ नहीं देना है विदेश के मोह में कि हां अरे ये चाइना से ये एक नया मतलब टेोइज़्म आया है या तो फिर जापान से ये नया शंटोइज़्म आया है तो चलो इसको लेकर के हम लोग वेद के धर्म को छोड़ देते हैं। ऐसा हमने कभी नहीं किया। ये टेइज्म हो ना कि कन्फ्यूशियनिज्म हो ना कि ये शंटोइज्म हो ना कि ये साउथ ईस्ट एशिया से जहां से भी जो कुछ भी अच्छा ग्रहण करने योग्य आया वो सब हमने ग्रहण किया और अपने यहां से बुद्धिज्म रामायण महाभारत की कहानियां इसी सब देशों में प्रसरी। इसीलिए देखिए कि बुद्धिज्म आज पूरे ईस्ट एशिया का मेजर रिलीजन है। रामायण, महाभारत की कहानियां आपको इंडोनेशिया में, मलेशिया में, थाईलैंड में, वियतनाम में सब जगह पे आपको मिल जाएगी। तो ये आदान प्रदान संस्कृति धर्म दर्शन ये जीवन प्रणाली का भारत में हमेशा होता रहा है। यदि कोई यह कहता है कि हिंदूइज़्म इज नॉट ए मिशनरी रिलीजन। जिस तरह से जुड़ाइज़्म है वे लोग ऐसा नहीं कहते कि आप ज हो। आपको जुडाइज़्म में कन्वर्ट होना है। हम लोग भी हिंदूइज़्म हिंदू लोग भी ऐसा नहीं कहते कि आप लोग हिंदू धर्म में कन्वर्ट हो। तो इस तरह से हिंदूइज़्म मिशनरी रिलीजन नहीं है। इसलिए हिंदू धर्म के ऊपर में इतने आक्रमण हुए मिशनरी धर्मों के द्वारा। मिशनरी रिलीजन और नॉन मिशनरी रिलीजन में क्या डिफरेंस है? जो नॉन मिशनरी रिलीजन है हिंदू धर्म वे लोग हम जाकर के कई लोगों को पक गला पकड़ कर के ये नहीं कहते कि आप सबको हिंदू हो जाना है। यह विधि करो। इस तरह के कपड़े पहनो। इस तरह का तिलक पहनो। इस तरह की माला पहनो। ये गंगाजल अपने सर को स्पर्श कराओ। आप हिंदू हो गए। बस आपका काम तमाम अभी अभी आपको जो स्वर्ग की प्राप्ति होना निश्चित है। आपको इमीडिएटली स्वर्ग की प्राप्ति हो जाएगी। इस तरह से हम लोग हिंदू लोग दूसरों को ठगते नहीं है कभी भी। यह किंतु अभी ठगना नहीं हुआ। ये ठगना शब्द भी ठीक नहीं है। कभी-कभी दूसरे मिशनरी धर्मों को देखकर के हमको ऐसा लगता है कि क्यों हम लोग जोर जबरदस्ती इस तरह से लोगों को करें। उन लोगों को देख के ऐसा कभी लगता है। किंतु क्या है कि यह तो इनबिल्ट फिचर है धर्म का। जैसे इस्लाम और क्रिश्चियनिटी का है कि यह मिशनरी रिलीजन है। यह बुद्धिज्म का है। बुद्धिज्म वास द ओरिजिनल मिशनरी रिलीजन। तो हिंदूइज़्म किंतु इस तरह से नहीं है। हिंदूइज़्म के ऊपर में हमने क्या किया है कि सभी तरह से सब तरह के प्रभाव को हमने ग्रहण किया है। किंतु हमारा जो सेंट्रल कोर है वो इंटेक्ट रहा है। इसीलिए देखिए कि जहांजहां पे भी ये मिशनरी रिलीजन गए वहां वहां के ओरिजिनल रिलीजन धीरे-धीरे करके समाप्त हो गए। या तो फिर यह नए आए हुए धर्म में सब्सम हो गए। निहित हो गए। उसके भीतर में जहां पे भी इस्लाम गया, जहां पे भी क्रिश्चियनिटी गई, जहां पे भी बुद्धिज्म गया, ये ईस्ट एशिया देखिए, या तो नॉर्दन यूरोप देखिए या तो नॉर्दन अफ्रीका देखिए, या तो फिर मिडिल ईस्ट देखिए। वहां के ओरिजिनल धर्म थे। प्री हिस्टोरिक रिलीजन थे वहां पे। फेरोज़ ने तो इतने बड़े-बड़े पिरामिड बना दिए थे इजिप्ट में। तो ऐसा नहीं था कि वहां पे धर्म नहीं था। और फिर पूरे नए-नए कॉन्टिनेंट्स को देखिए जो कि जैसे कि ऑस्ट्रेलिया है जैसे कि नॉर्दन अमेरिका है, सदर्न अमेरिका है जहां पे भी उनके इंडीजीनियस रिलीजन थे। किंतु यूरोपियंस ने जाकर के उनके ऊपर में क्रिश्चियनिटी का इस तरह से उनके ऊपर में फोर्सफुली डाल दिया कि उनके इंडीजीनियस रिलीजन पूरी तरह से उनका खात्मा हो गया। तो इस तरह का काम हम हिंदुओं ने नहीं किया है। हम लोगों का रिवर्स है। इन लोगों का क्या है कि बाहर में दूसरी जगह पर जाएंगे अपना धर्म इन लोगों के ऊपर में फोर्सफुली डाल देंगे। और हमारा है कि हमने उदार हृदय रखा है। सभी जितने भी पूरे विश्व में से अच्छे इनफ्लुएंस है उनको हमने ग्रहण किया है। हमको इवॉल्व किया है। सतत कंटीन्यूअसली अपने को इवॉल्व करते हुए गए हैं। किंतु एट द सेम टाइम अपना जो कोर जो है अपना ये जो केंद्र बिंदु है महावाक्य उसको हमने इंटेक्ट रखा है। जितने भी बाद में स्कूल्स डेवलप हुई ये सांख्य है, योग है, वेद की ही इतनी सारी शाखा प्रशाखाएं हैं कि जिसको कि हम द्वैत वेदांत कहते हैं, अद्वैत वेदांत कहते हैं। विशिष्ट अद्वैत वेदांत कहते हैं। द्वैताद्वैत वेदांत कहते हैं। या तो फिर जिसको कहते हैं अजातवाद, ऐसे कितनी ही स्कूल्स वेदांत के खुद के भीतर में यह डेवलप हुई, कोई भी यह हमारे मूल सिद्धांत है। उसके सामने उंगली नहीं उठाता कि यह हम जब तक यह ट्रांस माइग्रेशन ऑफ दिस सोल जिसको कहते हैं जन्म जन्मांतर का हमारा सफर है। जब तक हमको मुक्ति नहीं मिल जाएगी तब तक हमारी यह सफर जारी रहेगी और हमारे कर्मों के अनुसार अच्छा या बुरा फल हमको इसी जन्म में भुगतना पड़ता है। जैसा कि अब्राहमिक रिलीजन है। वे लोग कहते हैं अब्राहमिक यानी कि इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और जुडाइज्म। यह लोग कहते हैं कि आपका एक ही जन्म है। एक जन्म खत्म हो गया तो एक ही जन्म के आपके जितने पाप और पुण्य है वह तो जजमेंट डे जब होगा वो जिस दिन ये जितने भी मरे हुए जीवित होंगे उस दिन ईश्वर भगवान सबको उनके अच्छे और बुरे कर्म के अनुसार स्वर्ग में भेजेंगे ना कि नर्क में भेजेंगे। ऐसा एक ही जन्म में आपका पूरा वो हिसाब किताब समाप्त हो जाता है। अपना ऐसा नहीं है। स्वर्ग या नरक भी हमारे लिए एक पनिशमेंट है। स्वामी जी खुद कहते हैं कि हिंदू धर्म का उद्देश्य स्वर्ग में जाना नहीं है। हिंदू लोग मानते हैं कि स्वर्ग में जाना इट्स अ सीन टू गो टू हेवन। तो मतलब ये विदेशी लोग जब इस तरह का अभी ऐसा नहीं है कि स्वर्ग में जाना पाप है। किंतु स्वामी जी चाबुक मारना चाहते थे उनको। उनकी ये जो माने इस तरह के जो विचार थे जो कि जड़ बनकर के उनके सर में बैठ गए थे उसको तोड़ने के लिए स्वामी जी कभी-कभी इस तरह की एकदम माने सरप्राइजिंग कहो ना कि एक चाबुक मारने वाली भाषा का प्रयत्न प्रयोग करते हैं। इसलिए कभी-कभी स्वामी जी कहते हैं कि हिंदू धर्म का उद्देश्य स्वर्ग में जाना नहीं है। हिंदू धर्म का उद्देश्य है मुक्ति। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि की ये जो साइकिल है उससे मुक्ति यह हमारा उद्देश्य है नहीं कि स्वर्ग में जाना। तो जब स्वामी जी वहां पर जाकर के यह सब आइडियाज देख देते हैं तो उनको लगता है कि दिस इज अ कंप्लीटली फ्रेश एयर ऑफ फ्रीडम। क्योंकि उन्होंने हमेशा अपने समाज को बंद रखा है। यह लोग बोलते हैं ना कि हम लोग बड़े लिबरल है और ये हिंदू बड़े ऑर्थोडॉक्स है। हिंदू धर्म ही एक ऐसा धर्म है जिसने कि सभी धर्मों से अच्छे-अच्छे विचारों को अपने भीतर में ग्रहण किया है। हम लोग क्रिसमस को भी सेलिब्रेट करते हैं। हम लोग हेलोवन को भी सेलिब्रेट करते हैं। उन लोगों के वहां पर जाकर के देख लीजिए। अभी ठीक है कि अमेरिका वगैरह में दीपावली सेलिब्रेट करते हैं। किंतु वह क्या है कि एक सोशल लिबरलिज्म आया है। नहीं कि रिलीजियस लिबरलिज्म आया है। अपने यहां पे सोशल ऑर्थोडॉक्स ही है। किंतु रिलीजियसली हम लोग संपूर्ण रूप से लिबरल है। यह बात स्वामी जी ने कही है। थोड़े से देखिए स्वामी जी का भी जो अंदाज था कहने का वो थोड़ा सा डिफिकल्ट था हमको समझने के लिए। स्वामी जी कहते हैं कि हिंदू धर्म जैसा मुक्त हिंदू धर्म जितना लिबरल हिंदू धर्म जितना आत्मा की गुणगान का महिमा करने वाला दूसरा धर्म आपको पृथ्वी पर नहीं मिलेगा। किंतु यही हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसने कि अपनी भाइयों की गर्दन के ऊपर में अपना पैर रख के अपने भाइयों को कुचड़ा है। क्यों? यह जातिवाद के बारे में कहते थे। तो स्वामी जी का जो ऑब्जरवेशन था उन्होंने कहा कि विदेश में ये पूरा उल्टा है। वहां पर धर्म आपका इतना इलिबरल इतना ऑर्थोडॉक्स और इतना फनेटिक है कि वे लोग आपस में ही कितने लोगों को मार दिए हैं। ये जो विच ट्रायल्स या तो इंक्विजिशन ऐसा करके इन लोगों ने हजारों अपने ही भाई क्रिश्चियनों को मार दिया है। किंतु यही विदेश में यह पॉलिटिकल लिबरलिज्म, इकोनॉमिक लिबरलिज्म, यह स्टेट, एडमिनिस्ट्रेशन, गवर्नेंस, साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग ये सब का डेवलपमेंट इसी वेस्ट में हुआ है। तो स्वामी जी का कहना है कि टेक द लिबरलिज्म ऑफ हिंदू धर्म। धर्म में हिंदू जैसा लिबरल हो और सामाजिक व्यवस्था में पश्चिम की तरह हमको लिबरल होना है। जब हम यह दोनों बेस्ट एलिमेंट ईस्ट का बेस्ट एलिमेंट है धर्म में स्वतंत्रता और वेस्ट का बेस्ट एलिमेंट है विचारों की स्वतंत्रता। इन दोनों को जब हम फ्यूज करेंगे इन दोनों का हम जब संगम करेंगे तब कहीं जाकर के एक सर्वश्रेष्ठ सभ्यता का अभ्युदय होगा। तो इसीलिए महाराज जी जो यहां पे लिखते हैं वो कहते हैं कि हमने यह पूरा गलत नहीं किया। जबकि यह विदेशी सभ्यता, संस्कृति, लर्निंग उन सबको जब हमने स्वीकार किया तो हमारे लिए बहुत बड़ी गलती नहीं थी। थोड़ी सी गलती थी उस समय कि अभी भी आज भी देखिए कि हमारे लड़कों में यह हिंदू धर्म का ठीक-ठीक से वो उपदेश नहीं जाने से कुछ-कुछ यंगर जनरेशन में ऐसे हैं कि धर्म के ऊपर में संपूर्ण रूप से निराशावादी हो गए हैं। आज कोई ऐसा नहीं कहेगा कि मैं धर्म को स्वीकार नहीं करता हूं। धर्म को लिप सर्विस सभी लोग देंगे। शाब्दिक रूप से सभी लोग स्वीकार करेंगे। किंतु अपना जीवन गठन धर्म के आधार पर नहीं करेंगे। तो एक तरह का एक पूरा ग्रुप है हमारे ही यंगर जनरेशन में जो कि सिर्फ लिप सर्विस देता है। हां शाब्दिक रूप से स्वीकार करता है। किंतु अपने जीवन में उसको बुन नहीं देता। दे डू नॉट वीव हिंदूइज़्म इन देयर लाइफ। दे डू नॉट बिल्ड देयर लाइफ अपॉन दी सॉलिड फाउंडेशन ऑफ दी महावाक्यास। ऐसा नहीं होता। और एक ग्रुप है जो कि आउटराइट एक कम्युनिस्ट टाइप का एक लेफ्टिस्ट टाइप की विचार सरणी का हो गया है। जो लोग कहते हैं कि हिंदू धर्म में सिर्फ नकारात्मक चीजें ही देखते हैं। जो भी जाति प्रथा है यही हिंदू धर्म है। ये जो लोगों के ऊपर में लोगों को आउटकास्ट कर देना यही हिंदू धर्म है। अरे भाई हिंदू धर्म गोज़ मच डीपर देन व्हाट यू सी ऑन द सरफेस। ये अपने ये गरीबी है, पॉवर्टी है। ये ये आपको ओवरपुलेशन है। ये सब देखकर के ये लोग बोलते हैं कि ये हिंदू धर्म का परिणाम है। यानी कि ये लोग जो कि एक अपने लिप सर्विस देते हैं हिंदू धर्म को कि हां हमने स्वीकार किया है किंतु उसमें डीप में नहीं जाते और एक है कि जिस आउटराइट रिजेक्ट कर दिया है। जितने भी दुर्गुण है, जितने भी इसके दुष्परिणाम है, उसको देखकर के कहते हैं यही है हिंदू धर्म। तीसरा एक तबका है जिस तरह जैसे कि स्वामी जी से यह आरंभ हुआ। जैसे कि एक गोल्डन थ्रेड इन इंडियन सोसाइटी उस समय से एक आरंभ हुआ, जिन्होंने जेनुइनली सोचना शुरू किया कि हां, यह दर्शन शास्त्र क्या है? यह मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मेरा जन्म सिर्फ इसीलिए हुआ है कि मैं खाऊं, पीूं, नौकरी करूं या बिजनेस करूं, बच्चे को पैदा करूं और फिर एक दिन वृद्ध होकर के मैं शरीर त्याग कर दूं। क्या यह जो एक रूटीन लाइफ है, यही क्या मेरा गति है? क्या यही मेरे जीवन का उद्देश्य है? आई वांट समथिंग ग्रेटर देन दिस डे टू डे लाइफ। आई वांट टू अटेन सम ग्रेटर एक्सपीरियंस। मुझे यह दिन प्रतिदिन का यह जो जीवन है यह दिन प्रतिदिन की ये जो चक्की पिसती है हम लोगों की संसार चक्र में इस सबसे ऊपर जाकर के मुझे ऐसा कुछ प्राप्त करना है। ऐसी कोई अनुभूति करनी है जो कि मुझे मनुष्य में से महामानव बना दे। एक आम आदमी में से मुझे सुपरमैन बना दे। तो यह एक इनेट डिजायर भीतर में होता है टू एक्सप्लोर दी अनएक्सप्लोर टू एक्सप्लोर दी अननोन एक एक रहस्यमय जगत में प्रवेश करके हृदय के चेतना के उच्चतर स्तरों को अनलॉक करना उच्चतर स्तरों में सुपरकॉन्शियस लेवल को प्राप्त करना उसको एक्सप्लोर करना ऐसे एक 1% 2% कोई भी समाज में कोई भी सोसाइटी में होते हैं और वे लोग जब यह सोचना शुरू करेंगे कि यस यह जो मृत्यु के बाद में क्या होता है जैसे कि नचिकेता ने पूछा या तो फिर ऐसा क्या है जिसको जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। अपने उपनिषद में एक दूसरा प्रश्न है। तो इस तरह के हायर क्वेश्चन करना जब हम शुरू करते हैं तब हमको पता चलता है कि हम कहीं भी जाकर के मैं खुद मैं एक तरह से नास्तिक था। धर्म वगैरह को थोड़ा सा भी मैं स्वीकार नहीं करता था। किंतु हालांकि मैं तो मेरा पूर्वाश्रम जैन था। तो हिंदू धर्म के बारे में वैसे ही मुझे इतना कुछ नहीं पता था। जैन धर्म के बारे में भी नहीं पता था। किंतु जैसे-जैसे मैंने एक्सप्लोरेशन स्टार्ट किया वैसे-वैसे इनएविटेबली माने जैसे कि हमारा कान पकड़ करके वो हम हमारे यह जो महावाक्य है इसकी ओर अपने मन को अपनी चेतना को लेकर आता है। कोई एक हायर पावर कोई एक उच्च शक्ति जो है हमको इसी यह रेजोल्यूशन जो है उपनिषद में जो पाया गया इसकी ओर हमको कैसे भी तरह के खींच के ले आता है यदि हम सिंसियर है और यह जो रामकृष्ण विचारधारा है उसका उद्देश्य ही यही है जो लोग लिप सर्विस देते हैं उन लोगों को बहुत ज्यादा कुछ समझाने से क्या लाभ है अभी जिन ये और दूसरा है कि जिन लोगों ने अभी हिंदू धर्म यानी कि जितने भी दुर्गुण है, जितने भी ये दुर्गति है भारत की ये हिंदू धर्म से ही हुई है। ऐसे लोगों को भी समझाने से एनर्जी वेस्ट करने से क्या लाभ है? हमारा एफर्ट होना चाहिए जो कि सही-सही मुमुक्षु है। जिनका हृदय खुला है कि हां मुझे नए भाव ग्रहण करने हैं और साथ में ही बड़े ही शार्प उनका बुद्धि और इंटेलेक्ट है कि जो जो कोई भी कचरा आएगा हमारे सामने वो हम बिना सोचे समझे ग्रहण कर लेंगे। ऐसा नहीं होगा। जितनी भी अंधश्रद्धा आएगी, जितनी भी ऑर्थोडॉक्सी आएगी, जितने भी ये कुरीतियां जो कि हमारे धर्म के नाम पर चलती है, वह सब आएगी। उसको हम बिना आंख आंख बंद करे बिना सोचे समझे ग्रहण कर लेंगे। ऐसा नहीं होगा। आई विल यूज़ माय इंटेलेक्ट टू फिल्टर व्हाट इज गुड एंड व्हाट इज बेड। ये परमहंस क्या है? वो पत्थर को छोड़कर के मोती खा लेता है। तो वो परमहंस जैसा फिल्टर वो मेरे माइंड में है। ये नरेंद्र को हाजरा क्यों पसंद था? ये हाजरा ठाकुर सब समय हाजरा के बारे में कुछ ना कुछ नाराज होकर के बोलते रहते हैं कि अरे देखो ये हाजरा वहां पर बैठा है और मेरे पास में जो लड़के आते हैं उनके मन में वो कुछ ना कुछ कुमति डाल देता है उनके मन में कुछ ना कुछ संदेह डाल देता है किंतु नरेंद्र था सब समय हाजरा के पास जाकर के बैठता था गप लगाता था क्यों हाजरा का ऐसा एक मेंटल एक था स्टेट कि वो जो कुछ भी उसको कहा जाएगा बिना उसके ऊपर में सोचे समझे ग्रहण नहीं कर लेगा उसका एक संदेह एक एक ऐसा फिल्टर एक विवेक बुद्धि उसमें था। अभी वो विवेक ठीक दिशा में चलता हो ना कि वैसे ही कोई गलत दिशा में चलता हो। उसके लिए नरेंद्र ने ठाकुर के पास में प्रार्थना की थी कि हां हाजरा के ऊपर में भी आपका आशीर्वाद हो और नरेंद्र की बात सुनकर के ठाकुर ने हाजरा को आशीर्वाद दिया था। हाजरा को चैतन्य दिया था। तो यह नरेंद्र का सब समय था स्वामी जी का कि हमारे भीतर में यह फिल्टर होना चाहिए। परमहंस फिल्टर जो कि हम लोग जो कुरीतियां है जो जिसको ऑर्थोडॉक्सी कहते हैं वो सबको छोड़कर के जो लिबरल आइडियाज है जो कि वि गिव्स फ्रीडम टू आवर सोल हमारी आत्मन को मुक्ति और बंधन के परे ले जाता है। इस तरह के ये जो महावाक्य है महावाक्य को ग्रहण करने का यह फिल्टर हमारे भीतर में हो। यह स्वामी जी ये फिल्टर डेवलप करना चाहते थे। और यह फिल्टर श्रुति और स्मृति हमेशा हिंदू धर्म में कहा गया है। स्वामी जी ने कहा है कि यह श्रुति अर्थात कि ईश्वर के पास से अपने डायरेक्ट सुना है सुपरकॉन्शियस स्टेट में ऋषि मुनियों ने वही सही सही हिंदू धर्म है। फिर इस श्रुति को सामाजिक लेवल पर कार्यरत बनाने के लिए मनुस्मृति है या तो फिर पुराण है। यह सब क्या है कि धर्म के उच्चतर आदर्श है। वह उस पर्टिकुलर समय के समाज में किस तरह से एप्लीकेबल किए जाए उसका वह सिर्फ निर्देश मात्र है। तो वह इटरनल नहीं है। स्मृतियां इटरनल नहीं है। इटरनल है वो है श्रुति। तो यह फिल्टर कि क्या हमारा कोर है और क्या ऊपर ऊपर से समय काल और पात्र के अनुसार वो नई-नई सामाजिक व्यवस्था बनाई गई है। यह फिल्टर स्वामी जी ने हमको दिया है और इसीलिए हम जब हिंदू धर्म के बारे में सोचते हैं तो हमको देखना है कि हम कितने लिबरल है। सभी लोगों से कुछ पॉजिटिव ग्रहण करने के लिए रेडी है। एट द सेम टाइम आत्मनिष्ठ है। आत्मसंस्था है। हमारा खुद का कोर है धर्म का उसको हमको कभी नहीं भूलना है। तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।