<Untitled Chapter 1>
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः इतने दिन हमारा यह समर कैंप चला यहां
आश्रम में विद्यार्थियों के लिए समर कैंप (summer camp) का एक विवरण
पे और नियरली 105 स्टूडेंट्स वो पार्टिसिपेट किया 15 दिन बहुत कुछ हमने उनको सिखाया ड्राइंग है, भजन है, योगा, फिर मेडिटेशन, फिर वैदिक चटिंग, उसके बाद में गीता चटिंग और फिर मैं कहानियां बताता था ठाकुर मां स्वामी जी की और फिर बीच-बीच में कोई ना कोई स्पेशल क्लास करते थे। जैसे कि एक बार यहां पे एक डॉक्टर है डिवोटी हमारे तो उनको हमने रिक्वेस्ट किया तो फिर किस तरह से एक पॉजिटिव लाइफस्टाइल लीड की जाए। किस तरह से हेल्दी फूड खाया जाए और किस तरह से अपने हेल्थ के बारे में थोड़ा सा अलर्ट हुआ जाए वह सब के बारे में उन्होंने बताया। सो ऑल इन ऑल बहुत अच्छे दिन गए और सुबह को 8:30 को स्टार्ट होता था कैंप और 11:30 तक चलता था 3 घंटे बीच में 20 मिनट का रिसेस तो और रिसेस में जो कुछ स्नेक्स वगैरह है हम उनको देते थे फल देते थे कभी मिठाई देते थे तो कभी यह बाहर से कुछ खरीद करके जैसे कि समोसा है वगैरह तो कुछ हेल्थ फूड भी नरिशमेंट भी उनको मिले। इसके बारे में भी ध्यान रखा। ऑल इन ऑल वेरी पॉजिटिव एक्सपीरियंस फॉर एवरीवन ऑफ अस। और आखिरी लास्ट डे स्टूडेंट्स ने जो सीखा जैसे कि योगासन, चटिंग वगैरह। तो सब पेरेंट्स को बुलाया था। तो पहले तो मातृपितृ पूजन हुआ। सभी पेरेंट्स को सामने कुर्सी पर बिठा दिया। एक लाइन में उनके सामने में यह बच्चे बैठे थे और फिर यहां पे वह एक के बाद एक मंत्र का पाठ करते गए। वैसे ही बच्चे अपने पेरेंट्स के पैरों में वो फूल अर्पण करते हैं। तो यह अपनी एक परंपरागत भारतीय एक है परंपरा। तो कि मातृ देवो भव पितृ देवो भव तो बच्चों को भी इसका थोड़ा सा एक अंडरस्टैंडिंग हो उनका एक ओरिएंटेशन हो और प्रतिदिन क्लास समाप्त होने के बाद में ठाकुर की आरती करते थे तीन प्रदीप जलाते थे और एक प्रदीप दो बच्चों के हाथ में देते थे थाले में तो छह बच्चे ठाकुर की आरती करेंगे और एक बच्चा वो घंटी बजाएगा तो सात सात लड़के चाहिए वॉलंटियर तो सभी लोग एक साथ में आकर के खड़े हो जाते हमको भी चांस दीजिए हम भी आरती करेंगे तो प्रतिदिन अलग-अलग लड़कों को हम चांस देते थे और साथ में ही यह नमो नमो उससे जो स्टार्ट होता है धे लंग रंग वो पूरा हम आरती साथ में गाते थे तो 5 मिनट जितना आरती चलता था 3-4 मिनट जितना सो वेरी पॉजिटिव एक्सपीरियंस मैंने जो कुछ अपना एक एनालिसिस किया वह थोड़ा सा मैं शेयर करता हूं। एक तो मेरे सामने एक इंपॉर्टेंट
Happiness Yoga: बच्चों को ध्यान कैसे सिखाएं
क्वेश्चन था। मैं मेडिटेशन का क्लास लेता था। तो हाउ टू टीच देम मेडिटेशन? एक्चुअली मेडिटेशन का क्लास अलॉट किया था हमारे सेक्रेटरी महाराज को किंतु बीच में उनको बुखार हो गया। तो फिर उसकी वजह से मुझे लेना पड़ा था। तो हाउ टू टीच मेडिटेशन टू चिल्ड्रन। देखिए कि हम ध्यान जप या तो फिर एक आंतरिक आध्यात्मिक साधना इसके बारे में जब हम बात करते हैं तो भारतीय सनातन साहित्य में इसका कोई अभाव नहीं है। आपको हजारों हजारों पेज इसके बारे में लिखे गए हैं। इसके बारे में चिंतन हुआ है। इसके बारे में सोचा गया है। किंतु यहां पे जो एक टिपिकल प्रॉब्लम है कि बच्चों को सिखाना है। ये फिफ्थ स्टैंडर्ड से स्टार्ट करके नाइंथ स्टैंडर्ड के बच्चों को हमने रखा था। किंतु जैसे होता है कि जो एक लड़का आता है जॉइ करने के लिए उसका छोटा भाई या बहन है फर्स्ट स्टैंडर्ड में, सेकंड स्टैंडर्ड में, थर्ड स्टैंडर्ड में तो वह पेरेंट्स आके कहेंगे कि हमारा बड़ा लड़का तो आ रहा है तो छोटा लड़का घर में अकेला रहेगा। वह दुखी हो जाएगा। उसको भी आप रखिए। तो हम लोगों ने कुछ रूल्स में रिलैक्सेशन किए थे। तो 15 16 बच्चे ऐसे थे जो कि सेकंड स्टैंडर्ड थर्ड स्टैंडर्ड में थे। तो और मैंने देखा कि पहले तो हमको थोड़ा सा यह लगता था कि ये छोटे बच्चे हैं वो गीता चेंटिंग है। वैदिक चेंटिंग वगैरह हम जब सिखाएंगे तो वे लोग ग्रेस कर पाएंगे कि नहीं। किंतु उन्हीं का एंथूजियाज्म ज्यादा मैंने देखा। लड़के थोड़े से बड़े हो जाते हैं तो थोड़े से मैच्योर हो जाते हैं। वो प्रश्न पूछेंगे हम लोग कि अच्छा बताओ तुमको यह बात कैसी लगी या वो बात कैसा लगा? तो फिर क्या है कि एक एंबरेसमेंट एक सेल्फ अवेयरनेस सेल्फ कॉन्शियस हो जाते हैं ये लड़के और सेल्फ कॉन्शियस होने की वजह से सबके सामने बोलना नहीं चाहते। किंतु ये छोटे बच्चे इमीडिएटली खड़े हो जाएंगे। इमीडिएटली स्टेज पे आ जाएंगे। जो बुलाएंगे वो जो बोलना चाहते हैं वह बोल लेंगे। उनके मन में वह लज्जा, घृणा, भय, यह सेल्फ कॉन्शियसनेस यह सब नहीं होता। सो जब मैं मेडिटेशन ध्यान सिखाने की शुरुआत की। सो दिस वाज़ बिग क्वेश्चन बिफोर मी कि इज़ अ होल रेंज ऑफ पीपल ये जो एज ग्रुप है वो थर्ड स्टैंडर्ड से लेकर के नाइंथ स्टैंडर्ड तक का। तो अभी किस तरह से इन लोगों को अपने उपनिषदों में या तो फिर रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में जो कोर कांसेप्ट है ईश्वर प्राप्ति के लिए जो डायरेक्ट साधना है जप ध्यान इसके बारे में इनको कैसे बताया जाए हमारे लिए यदि जप करना है तो कैसे करना है जिन लोगों ने रामकृष्ण संघ से दीक्षा ली है रामकृष्ण संघ के परमाध्यक्ष के पास में से उनको तो पता है कि हां भगवान श्री रामकृष्ण के ऊपर में अपनी श्रद्धा होनी चाहिए और फिर उनका एक मंत्र हमको मिलता है। मंत्र में फिर प्रणव होता है, बीज होता है, नाम होता है वगैरह-वगैरह। तो यह पूरा थ्यरी हमको तो पता है जब हम लोग एक मैच्योरिटी के लेवल पर पहुंच जाते हैं। दीक्षा जो लोग लेते हैं उन लोगों को रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के साथ में एक अच्छा संपर्क होता है। ठाकुर के प्रति श्रद्धा भी होती है। और सिर्फ रामकृष्ण संघ में ही नहीं बाहर में भी कहीं पर भी जाएंगे मंत्र दीक्षा लेंगे तो जिस इष्ट का मंत्र आप ग्रहण करते हैं स्वीकार करते हैं उस इष्ट के ऊपर में श्रद्धा तो होगी ही होगी किंतु यह तो एडल्ट्स के बारे में हो गया बच्चों के बारे में क्या बच्चों को आप कहेंगे कि हां यह भगवान विष्णु है उनको प्रणाम करो उनको प्रार्थना करो वे लोग कर लेंगे किंतु उनके माइंड में क्या एक जो एक होता है ना कि इसका अर्थ क्या है वह अर्थ समझना गुढार्थ समझना भक्ति का शरणागति का श्रद्धा का वह हम कैसे बिठाएंगे और हम लोग जो साधना करते हैं जनरली एडल्ट होने के बाद में उस साधना में शरणागति और भक्ति एक बहुत बड़ा भाग उसका रहता है। बहुत बड़ा रोल रहता है। हां, हम वेदांत के अनुसार भी आत्मश्रद्धा है। या तो फिर यह जिस तरह से अद्वैत वेदांत में स्मरण मनन निधिसन आत्म तत्व चिंतन ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति ब्रह्म तत्व चिंतन ये महावाक्य विचार ये जितनी भी आप मेथड बोल लीजिए अद्वैत की यह महावाक्य विचार या तो फिर द्वैत का शरणागति श्रद्धा प्रार्थना या तो फिर यह ठाकुर का जिस तरह से ठाकुर ने हमको भाव साधनाएं सिखाई जो कि वैष्णव परंपरा से चली आ रही थी तो यह वैष्णव परंपरा की यह भाव साधना हो ना कि यह भक्ति शास्त्र की यह शरणागति श्रद्धा प्रार्थना हो ना कि अद्वैत वेदांत का यह महावाक्य विचार हो स्मरण मनन निध्यासन हो यह सब कुछ समझने के लिए आपको एक अच्छा खासा बैकग्राउंड चाहिए स्पिरिचुअलिटी में आध्यात्मिक साहित्य में आध्यात्मिक भावधारा में बिना कोई बैकग्राउंड के किसी को मेडिटेशन सिखाना किस तरह से संभव है। उसमें भी इन बच्चों को जिनको कि इस तरह का बैकग्राउंड देना और भी थोड़ा सा डिफिकल्ट है क्योंकि इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी अभी तक उनकी इतनी डेवलप नहीं हुई है। जो बड़े लड़के हैं सेवंथ, एट्थ या तो नाइंथ स्टैंडर्ड में है उनको तो आप फिर भी थोड़ा बहुत कुछ समझा सकते हैं। किंतु जैसे मैंने कहा कि हमारे सामने जो रेंज था थर्ड स्टैंडर्ड, सेकंड स्टैंडर्ड वहां से स्टार्ट होते थे कुछ बच्चे। तो फिर सबको इंक्लूड करके किस तरह से मेडिटेशन सिखाए इन द टर्म्स दैट दे अंडरस्टैंड। तो फिर उसके बारे में मैं सोच रहा था। फिर मैंने एक उपाय निकाला। एक्चुअली यह जो हमने इसके बारे में ऑलरेडी काफी डिस्कशन किया ही है जो कि हमने कंस्ट्रक्ट है, भाव है इसके बारे में जब डिस्कस किया था तो मैंने अभी कंस्ट्रक्ट और भाव इतने बड़े शब्द है कि बच्चों को तो सिखाने से होगा नहीं। तो मैंने इनको इस तरह से समझाया कि देखिए कि लेट अस मेडिटेट अपॉन आवर हैप्पीएस्ट मेमोरी। हमारी जो सबसे आनंद पूर्वक हमारी यादें हैं उसके ऊपर में ध्यान करते हैं। यहां पे होता क्या है कि सबसे पहले तो ध्यान की डेफिनेशन क्या है? पतंजलि योग सूत्र हम देखेंगे तो अष्टांग योग के बारे में कहा गया है। उसमें जो पहले पांच अंग है उसको बहिरंग योग कहते हैं। जैसे कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, प्रत्याहार। यह जो पांच है इसको बहिरंग साधना कहते हैं। और फिर अंतरंग साधना है धरणा, ध्यान, समाधि। तो यह धरणा ध्यान समाधि है। सही-सही में हम आंख बंद करके या एक जगह पर बैठ के जो साधन भजन करते हैं वो। तो उसमें सबसे पहले आता है धारणा। उसका अर्थ क्या है? तो देश बंध चित्तस्य धारणा यानी कि आप किसी एक उपदेश यानी कि ऑब्जेक्ट बंध चित्तस्य अपने चित्त को उसके ऊपर में बांध के रखना। उसको कहते हैं धारणा। फिर ध्यान तो फिर तदैव अर्थ मात्र निर्भाषसम तत प्रत्यय एकतानता ध्यानम यानी कि देखिए सर्वप्रथम धारणा ध्यान से धारणा में हम क्या करते हैं अपने मन को एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में बांधते हैं ध्यान में क्या करते हैं एक एक ही ल में उसके ऊपर में हमारा मन जाता है बिना किसी उसके ऊपर हमारे मन का जो फोकस है हमारे मन का जो प्रवाह है उसमें उसके भीतर में थोड़ा सा भी विक्षेप नहीं होता तत प्रत्यय एकानता यह जो एकानता शब्द है कितना सुंदर शब्द है कि एक तान होकर के एक टाना बांग्ला ते जाकर बोले या तो फिर एक धार में जो जैसे कि कभी-कभी ध्यान की उपमा देते हैं तो किस तरह से कहते हैं जे एक डिब्बे में से आप घी ढाल रहे हैं या तो तेल ढाल रहे हैं तो तेल की जो धारा है उसमें थोड़ा सा भी विच्छेद नहीं होता है। तेल तेल का जो विस्कोसिटी जिसको कहते हैं क्वालिटी उसकी फिजिक्स की लैंग्वेज में तो तेल की विस्कोसिटी इतनी है कि आप पतली तेल की धारा आप प्रवाहित करेंगे तो एक धारा में वह चलती आएगी। जबकि पानी आप इस तरह से डालेंगे पतली धारा में तो बीच-बीच में ब्रेक हो जाएगा। क्यों? क्योंकि पानी की विस्कोसिटी इतनी ज्यादा नहीं है। तो तेल की जो पतली धारा है वो एक सतत रूप से बहती आएगी। तो एक धारा में जो एक बहता रहता है तत प्रत्यय एक तानता वह हो गया ध्यान और फिर समाधि तो पता है कि स्वरूप शून्यव तदैव अर्थ मात्र निर्भासम स्वरूप शून्यव समाधि यानी कि जिस ऑब्जेक्ट के ऊपर में ध्यान करते हैं बस वही एक रह जाएगा मेरा खुद का इंडिपेंडेंट अस्तित्व मिट जाएगा तब वह हो गया समाधि तो बेसिकली बात यह है टेक्निकल डेफिनेशन तो हमको सिर्फ इतना ही कहता है कि किसी भी देश बंध चित्तस्य धारणा किसी भी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपने मन को बांधो तो आप ये अंतरंग योग में प्रवेश कर चुके हैं। अंतरंग ये जो एस्पेक्ट है अष्टांग योग का उसमें प्रवेश कर चुके हैं। तो जनरली हम किस तरह से ध्यान करते हैं? या तो फिर धारणा ये अंतरंग त्रयम एकत्र संयम फिर यह तीन शब्द जो है धारणा ध्यान समाधि तो फिर पतंजलि कहते हैं यदि एक शब्द यूज करना है तीनों के बारे में तो वह है संयम तो यह संयम हम किस तरह से करते हैं तो हम गुरु के प्रदत्त जो मंत्र है उसके ऊपर में मन को एकाग्र करते हैं या तो फिर दीप शिखा के ऊपर में मन को एकाग्र करते हैं या तो फिर अपने हृदय में ईश्वर की चिंतन करके हृदय में ईश्वर के पाद पद्म स्थापित है या तो हृदय सिंहासन में ठाकुर स्वयं विराजमान है। इस तरह से हृदय के ऊपर ध्यान करते हैं। या तो फिर यह टट चक्र है उसके ऊपर में ध्यान करते हैं। टट चक्रों में भी जो तीन सबसे इंपॉर्टेंट है अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। उसमें भी जो हृदय हार्ट चक्र है अनाहत उसी के ऊपर में जनरली ध्यान किया जाता है। वीरानंद जी की एक कहानी है कि
विरजानंदजी और माँ सारदा की कहानी : ध्यान कैसे करे
मां को जाकर के मिले कहता है मां को कहते हैं कि मां मैं बहुत ध्यान करता हूं किंतु फिर मुझे सिर दर्द बहुत होता है। हेडेक बहुत होता है। तो इसका क्या कारण है? इसका क्या उपाय है? तो मां ने पूछा बाबा मां का जो बात करने का स्टाइल था तुम कहां पे ध्यान करते हो? किस चीज के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करते हो? तो वीरजानंद जी ने कहा जो कपाल में जो आज्ञा चक्र है दो आंखों के बीच में उस भ्रूमध्य जिसको कहते हैं वहां पर मैं ध्यान करता हूं। साथ-साथ में ही मां ने एकदम चौक करके कहा कि देखो इस तरह से कभी वहां पर ध्यान मत करो। ध्यान यदि करना है तो हृदय पर ही हमेशा ध्यान करना है। वो ठाकुर ने कहा है ना कि स्वामी जी ने कहा हृदय हो आतार केला अर्थात कि हार्ट इज द फोर्ट ऑफ दी आत्मन। हार्ट है आत्मा का आत्मन का किला यानी कि फोर्ट। तो जब भी ध्यान करते हैं तो हृदय के ऊपर में ही करते हैं। यदि इष्ट को अपने हृदय में विजुअलाइज करें ना कि किसी अनाहत चक्र को अपने हृदय में विजुअलाइज करें तो जो भी है यहां पे मैंने बच्चों को कहा कि आप एक अपने जीवन की
बच्चों के लिए सरल ध्यान विधि: अपनी सबसे आनंद देने वाली यादों पर ध्यान लगाएं
सबसे इस तरह की मेमोरी को आप डिस्कवर कीजिए जो कि आपके जीवन का सबसे खुशी भरा हुआ क्षण हो। जैसे कि मैंने कहा मेरी जो हैप्पीएस्ट मेमोरीज है बहुत सारी है ठाकुर की कृपा से तो उसमें से एक बहुत ही एक पॉजिटिव मेमोरी है कि मैं बेलूर मठ में ध्यान किया करता था तो बेलूर मठ में मंगल आरती तो होती है सुबह को 4:00 बजे तो 4:00 बजे मंदिर में बैठे हैं वहां सामने में भगवान श्री रामकृष्ण की मूर्ति है यहां पे बगल में एक गार्डन है बड़ा सा गार्डन के परे देखेंगे तो गंगा है और यदि 5 बजते हैं तो गंगा में सामने के किनारे सूर्योदय होता है। दिस इज द वन ऑफ द बेस्ट मेमोरीज ऑफ माय लाइफ। तो मैं जब ध्यान करता हूं तो मैं क्या करता हूं? अपने माइंड में यही वो बेलूर मठ को फिर से क्रिएट करता हूं। फिर से मैं मेन टेंपल में बैठा हुआ हूं। फिर से वह सूर्योदय हो रहा है। सूर्योदय की किरणें और मैं क्या करता था? हमेशा ध्यान करने बैठने के लिए यदि आप बेलूर मठ के मंदिर का दर्शन किया होगा तो आपको पता होगा साइड में डोर है एक तो मेन डोर है मेन गेट है जिसमें से मंदिर में आया जाता है किंतु साइड डोर भी है तो साइड डोर में से आप देखेंगे कि साइड वाला जो दरवाजा है कि आपको सीधा वो गार्डन गंगा और मंदिर दिखते हैं तो वो जो दरवाजा है साइड वाला उसके सामने ही मैं बैठता था तो तो यहां पे वो जब भी सूर्योदय होता है तो ऐसा लगता था कि सूर्य की प्रथम किरणें सर्वप्रथम तो वो जो गंगा के किनारे सब मंदिर है वो जो समाधि मंदिर मां का है राजा महाराज का है स्वामी जी का है सर्वप्रथम तो उनके ऊपर में प्रसारित होती है। फिर धीरे-धीरे आकर के मंदिर के ऊपर में ठाकुर के मंदिर के ऊपर में और भीतर में फिर प्रवेश करके मेरे पर आती है। और सामने देखेंगे यदि ठाकुर की जो मूर्ति है उसमें भी ये लोग सुबह में साइड का दरवाजा है थोड़ा सा खुला रख देते हैं तो ठाकुर के ऊपर में भी थोड़ा सा सुबह-सुबह का सूर्य प्रकाश आता है तो यह इतना सुहाना और साथ में ठाकुर का नाम ले रहे हैं बेलूर मठ है जहां ठाकुर ने स्वामी जी को कहा था तू तोर कांधे बोशिए जे खाने निय जाबी शेखाने आमी जाओ तुम अपने कंधे पे मुझे बिठा के जहां पे भी ले जाओगे मैं वहां वहां पर जाऊंगा। वो काशीपुर में वह पैसों को लेकर के यह जो सब कुछ विवाद हुआ था तो ठाकुर ने कहा कि गृहस्थों के पैसों से नहीं रहना। नरेंद्र को कहा तुम मुझे ले जाओ यहां से भिक्षा करके खिलाना मैं इस तरह से खाऊंगा। तो वह जो प्रॉमिस ठाकुर ने स्वामी जी को दिया। स्वामी जी को यही बात याद थी। अपने कंधे पर ठाकुर की अस्थि लाकर के अस्थि कलश रखकर के उन्होंने बेलूर मठ में उन्होंने प्रथित किया था। उसमें उन्होंने रखा था। स्थापित किया था। तो हमको पता है बेलूर मठ में ठाकुर की उपस्थिति है। बेलूर मठ जब पहली पहली बार परचे वो जमीन जब पहली पहली बार परचेस की गई थी और मां को जब बताया गया था उस जमीन के बारे में तो मां वहां पे आई थी जमीन देखने के लिए उस समय नीलांबर गार्डन में अपना मठ था तो पहले तो मां वहां गई। फिर वहां से जमीन देखने के लिए आई। जमीन देख कर के बड़ी खुश हो गई। फिर बाद में उसी टाइम ना कि और फिर कभी यह मुझे एग्जैक्ट याद नहीं है किंतु मां ने कहा था आमी किंतु बराबर देख तुम जे गंगा ओदी के ओधारे ठाकुर घुरे बेड़ा छे मैंने हमेशा देखा था कि गंगा के उस किनारे यानी कि दक्षिणेश्वर के सामने के किनारे इसी जमीन के ऊपर में ठाकुर चल रहे हैं पायचारी कर रहे हैं पादण कर रहे हैं टहल रहे हैं तो यह मां का विज़न था तो हमको सबको पता है कि बेलूर मठ में ठाकुर स्वयं वर्तमान है। तो देखिए कि बेलूर मठ के मेन टेंपल में बैठकर के ध्यान करना वन ऑफ द ग्रेटेस्ट फॉर्च्यून इन आवर लाइफ। वन ऑफ़ द ग्रेटेस्ट इवेंट इन माय लाइफ। तो मैं जब ध्यान करता हूं तो दिस इज़ अ वेरी हैप्पी मेमोरी ऑफ़ माय लाइफ। मैं अपने माइंड में इसको कंस्ट्रक्ट करता हूं। इसके ऊपर मैं ध्यान करता हूं। और साथ में दो चीज यहां पे है। एक तो कंस्ट्रक्ट है कि हम इसको विजुअलाइज करते हैं। सेकंड है भाव। इसके साथ में एसोसिएटेड हैप्पीनेस वाला जो भाव है वह होना चाहिए। तभी यह भाव जो है मल्टीप्लाई होगा। तो इस तरह से मैंने बच्चों को बताया। फिर कहा कि चलो तुम लोग अपनी एक हैप्पीएस्ट मेमोरी है उसको खोज निकालो। उसके ऊपर में ध्यान करो। तो 5 मिनट ध्यान करवाया। बच्चों को 5 मिनट से ज्यादा ध्यान करवाने से फिर होगा। कुछ-कुछ बच्चे किंतु बड़े स्थिर होकर के ध्यान करते थे। किंतु जैसे प्रॉब्लम है 100 बच्चों के साथ में आप डीएल कर रहे हैं तो आपको क्या है कि सबको माने जो एक मिनिमम जो एवरेज है उसको ले चलना है तो 5 मिनट के बाद में फिर मैंने कहा अच्छा ठीक है अभी यदि आप में से किसी की इच्छा है तो यहां पे आकर के सबके सामने आकर के माइक के ऊपर में बताइए कि व्हाट इज योर हैप्पीएस्ट मेमोरी आपने किस मेमोरी के ऊपर में ध्यान किया तो मैंने तो सोचा कि हो सकता देखिए कि सब लोग तो इतना सब कुछ पर्सनल शेयर नहीं करना चाहते हैं ना। मेरी बहुत सारी एपी मेमोरी है किंतु उसमें से मैं वही बताऊंगा जो कि मैं सबके सामने शेयर कर सकता हूं। अष्टपाश से हम लोग बंधे हुए हैं। लज्जा है। फिर लोग क्या कहेंगे वह सब है तो हम लोग तो सब कुछ अपने मन का शेयर नहीं करते। किंतु बच्चे देखिए इतने इनोसेंट है। वो फटाफट करके एकदम लाइन लग गया पूरा मेरे सामने में। हम भी बोलेंगे। हम भी बोलेंगे अच्छा ठीक है। मैंने एक के बाद एक सबको माइक दिया। एक बच्चा बोलता है कि मैंने क्रिकेट में सेंचुरी लगाया था। मेरे गांव में एक ग्राउंड है क्रिकेट का। वहां पे मैंने पहला सेंचुरी लगाया था। दैट इज द हैप्पीएस्ट मेमोरी ऑफ माय लाइफ। मैंने कहा अच्छा यह तो बड़ी अच्छी बात है। किंतु फिर मैंने कहा कि देखो दिस इज अ वैलिड मेमोरी कि जिसके ऊपर में तुम ध्यान कर सकते हो। तुमको बहुत आनंद आया होगा। और ध्यान का अर्थ ही है कि इस आनंद को मल्टीप्लाई करना है। किंतु एक बात को ख्याल में रखना कि यदि तुम इस मेमोरी के ऊपर में ध्यान करते हो तो अपने माइंड में क्रिकेट खेलने को मत बैठ जाना। वहां पे पिच के ऊपर में जो क्रिकेट की पिच होती है, क्रिकेट ग्राउंड होता है, उसके एक कोने में बैठकर के तुम देखना सब कुछ। दिस इज हाउ यू मेडिटेट। क्योंकि क्या है? यदि हम किसी एक कंस्ट्रक्ट को बनाते हैं, उसके ऊपर में माइंड को फोकस करते हैं, ध्यान करते हैं, तो वो कंस्ट्रक्ट में फिर रजस नहीं खड़ा होना चाहिए। यह आप जैसे देखिए दिस इज़ अ वेरी टिपिकल सेंचुरी किया उसका आनंद आया तो आनंद को ग्रहण करना है नहीं कि उसके साथ में जो एसोसिएटेड कर्म है रजस है उसको ग्रहण करना है यानी कि इस मेमोरी पे अब जैसे मेरी जो मेमोरी है मैं बेलूर मठ में बैठकर के ठाकुर के मंदिर में ध्यान कर वहां रजस है ही नहीं इस मेमोरी में सिर्फ हैप्पीनेस है तो ओके उसमें कोई इशू नहीं है किंतु क्रिकेट में सेंचुरी लगाना आप में दो चीजें हैं रजस भी है और हैप्पीनेस भी है। तो रजस को हटाओ। हैप्पीनेस को ले लो। यह बात ख्याल में रखो कि वहां पे अपने माइंड में तुम क्रिकेट खेलने को मत बैठ जाना कि हां मैंने इस तरह से बॉल आया तो इस तरह से बैट घुमाया। उस तरह से बॉल आया तो उस तरह से बैट को घुमाया। ऐसा मत करना। एक जगह पर बैठ के ध्यान करना। तो ठीक है। फिर और एक लड़का आता है। कहता है कि मेरी एक मेरी एक बहन का जन्म होने वाला है। तो कल होने वाला है। तो आई एम वेरी एक्साइटेड अबाउट दैट। सो दिस इज माय हैप्पीएस्ट मेमोरी। मैंने कहा अच्छा। तो फिर वो सोच कहता है कि इस तरह से वो छोटी बच्ची उसकी बहन है। उसका जन्म होगा तो कल होने वाला था नेक्स्ट डे। बट ही सो एक्साइटेड कि वह इस तरह से ध्यान करता है कि उसकी छोटी बच्ची अभी सत्य जात इनफेंट जिसको कहते हैं वह अपने गोद में लेकर के बैठा है और वो उसका ध्यान का सब्जेक्ट है एंड ही इज वेरी हैप्पी। अरे वाह मैंने कहा कि देखिए बच्चों की इमेजिनेशन कैसे काम करती है। एक लड़का आया थोड़ा सा बड़ा था। सेवंथ एट्थ स्टैंडर्ड में था। तो वह कहता है कि मेरे गांव में एक बारिश हो रहा था और मैं बारिश में साइकिल लेकर के घूम रहा था। चारों ओर ग्रीनरी था और इतना खुशनुमा वातावरण था। दिस इज माय हैप्पीएस्ट मेमोरी। तो मैंने कहा यह तो बहुत अच्छी बात है। तो देखिए कि एक के बाद एक बहुत सारी मेमोरीज थी। मेरे को भूल भी गया अभी तो। किंतु दीज़ आर व्हाट चिल्ड्रंस लर्न सो इजीली दे लर्न। एंड उसके बाद में आप कहेंगे कि अच्छा मेडिटेट ऑन दिस हैप्पी मेमोरी। तो एकदम स्थिर होकर के बैठे रहेंगे। कुछ-कुछ बच्चे हैं इधर-उधर करेंगे। थोड़ा सा आंख खोल के चारों ओर देखेंगे। किंतु काफी बच्चों को मैंने देखा कि एकदम स्थिर होकर के उसके ऊपर में ध्यान करते थे। सो मैंने कहा कि दिस इज हैप्पीनेस योगा। माने यदि आपको योग करना ही है तो देयर आर मेनी टाइप्स ऑफ योगास। दिस इज हैप्पीनेस योगा। तो दिस इज वन लर्निंग कि मैंने यह सीखा अपने मैंने ये इसको कि किस तरह से बच्चों को आप मेडिटेशन करवा सकते हैं। नो डाउट देयर आर मेनी अदर मेथड्स। किंतु यहां पर क्या है ना कि देखिए सेकंड थिंग जो एक मैंने देखा
Fun Yoga : संस्कार सिखाने की सहज पद्धति
कि इट इज फन समर कैंप है तो वो कोई स्कूल नहीं है। अभी हमने जो हमारे पास में जो कुछ वॉलंटियर्स थे बच्चों के साथ में काम करने के लिए बच्चों को हेल्प करने मतलब पूरे समर कैंप में हेल्प करने के लिए 100 लड़के हैं एक हॉल में बैठे हैं तो कुछ ना कुछ प्रॉब्लम खड़े होंगे ही होंगे। तो बच्चों को हमने ग्रुप में बांट दिया था सात ग्रुप में और सभी ग्रुप में एक ग्रुप लीडर थे हमारी ओर से वॉलंटियर और बच्चों के भीतर में से एक ग्रुप लीडर को रखा था तो इस तरह से दो जो थे जो कि एक ग्रुप को संचालित करते थे तो कैसे बैठना चालू क्लास में यदि कुछ चल रहा है स्टेज के ऊपर में तो आपको कोई परेशानी है तो इमीडिएटली ग्रुप लीडर को बोलना वो जो सब टेक्निकल जो डेट रनिंग इश्यूज जो होते हैं उसके लिए उसमें में से कभी-कभी देखा कि कोई वॉलंटियर था एकदम बहुत ज्यादा डिसिप्लिन के बारे में कि बिल्कुल आवाज नहीं करना है। बिल्कुल कुछ भी बातें नहीं करनी है। एकदम चुपचाप शांत हो के बैठना है। और क्लास में तो ठीक है। चलिए मैं आपको ध्यान सिखा रहा हूं। उस समय आप चुपचाप शांत होकर के सुनेंगे। किंतु फिर जैसे यह योगासन का क्लास है या तो फिर गेम्स गेम्स वाज़ बिग पार्ट बिग सक्सेस। शुरू-शुर में मैंने गेम्स का पार्ट नहीं रखा था। तो फिर कुछ पेरेंट्स आकर के बोले कि पिछले साल तो आप इस तरह से खेल खिलाते थे इन लोगों को अच्छी-अच्छी गेम्स उनको करते थे कंडक्ट इस बार क्यों नहीं? तो फिर मैंने सोचा चलो गेम्स भी रखी जाए। तो ये संगीत कुर्सी है वगैरह-वगैरह थोड़ा सा नेट के ऊपर सर्च करके और हमारे वालंटियर्स बहुत अच्छे हैं। सब इनोवेटिव गेम्स हमने खोज निकाली थी। तो बच्चों को इतना आनंद आता था। किंतु कभी-कभी मैंने देखा कि कोई ऐसा करता है बिल्कुल आवाज मत करो। बिल्कुल चुपचाप शांति से बैठे रहो। 100% डिसिप्लिन यह एक्चुअली क्या है कि डिसिप्लिन होना चाहिए। उस बात में कोई प्रश्न ही नहीं है। 100 बच्चे आपके सामने एक होल में बैठे हैं और यदि डिसिप्लिन नहीं रहेगा तो पूरा इस तरह का केओस फैलेगा कि कोई कुछ सिखा नहीं पाएगा। कोई कोई सीख नहीं पाएगा तो उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु एक एक्सेसिव डिसिप्लिन एक एक्सेसिव लोगों के ऊपर में शासन करना बांग्ला ते जेवन बोले एक्सेसिव लोगों को डांटना कि एकदम चुपचाप बैठे रहो कुछ भी बोलो मत किसी के साथ बात मत करो तो यह भी ठीक नहीं है। देयर शुड बी फन इन एवरीथिंग दैट चिल्ड्रन डू। मैंने मेरे एक
ध्यान करने का सरल तरीका: आनंद पर ध्यान करना
किसी के साथ में मेरी बात हो रही थी ध्यान के विषय में ही तो किसी ने मुझे कहा वलंटियर अपना कि मैं जब ध्यान करता हूं तो मेरा मन जो है जिस ऑब्जेक्ट के ऊपर में मैं ध्यान करता हूं वहां पे एकाग्र नहीं हो रहा है तो क्या करूं मैंने कहा देखिए अपना जो माइंड है इट जो माइंड का जो बेसिक प्रिंसिपल है उसको आप समझ लीजिए पहले तो आपको ध्यान करने में कुछ भी कार्य करने में सुविधा होगी अच्छा होगा। क्या है कि माइंड ऑलवेज वांट्स समथिंग श्रेय और प्रेय जैसे कहते हैं श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यम एत जो मनुष्य के सामने दो बातें आती है। एक है श्रेय एक है प्रेय। एक चीज हमको बहुत अच्छी लगती है। और एक चीज करना हमारे लिए बहुत अच्छा है। मेरे भविष्य के लिए अच्छा है। और उसका बहुत ही सिंपल एग्जांपल है कि परीक्षा आ गई है नजर के सामने। अभी उसके अगले दिन मैं क्या करूं? मैं बैठकर के पढ़ाई लिखाई करूं। परीक्षा पास करूंगा। भले ही चाहे पढ़ाई लिखाई करने में जितना ही कष्ट हो आज कर आज के दिन बैठकर के सब भूल करके मुझे कैसे भी करके स्टडी कर लेने दो। कल फिर जो भी आनंद करना है, मूवीज देखने को जाना है, मित्र के साथ में बात करना है, मैं बाद में करूंगा। परीक्षा खत्म होने के बाद में तो यह श्रेय का मार्ग हो गया। प्रेय का मार्ग है कि नहीं मुझे तो मेरे मित्रों के साथ में गप ही लगाने हैं। मुझे तो बाहर घूमने के लिए ही जाना है। मुझे तो सिनेमा, टीवी और आजकल यह मोबाइल, सोशल मीडिया उसी में इंटरेस्ट है। तो मेरे मन को जो भाया वह मैंने किया किंतु फिर परीक्षा में या तो फेल हो गया या तो फिर इतने कम परसेंटेज आए इतना लो ग्रेड आया कि फिर मैं भविष्य में कैरियर बनाने में वो वो काम हेल्प नहीं करेगा। तो अभी हम लोग कहते हैं कि प्रेय को छोड़ो श्रेय को वरण करो। अच्छी बात है। यदि हमारे भीतर में वह विल पावर होता है। एक मिडिल ग्राउंड यह है कि श्रेय को प्रेय बना दीजिए। आपका जो आपके लिए जो उचित है करना आपके लिए जो श्रेष्ठ है करना उसमें थोड़ा सा आनंद मिलाइए उसमें थोड़ा सा रस मिलाइए उसके भीतर में थोड़ा सा फन ऐड कीजिए तो क्या है कि आपका माइंड ऑटोमेटिक जाएगा। वो जो एक रिवर्स एग्जांपल यदि देते हैं वो जो समाध्याय बोलकर के ठाकुर कहते हैं एक पंडित था वो कहता है कि ईश्वर नीरस है उसमें आप रस डाल के सरस कर दीजिए। तो ठाकुर कहते हैं कि वेद में जिसको रसोवई सः कहा गया है उसको यह पगला नीरस कहता है। तो इस एग्जांपल को रिवर्स करके हम कह सकते हैं कि ध्यान का विषय है कि पढ़ाई लिखाई है या तो जो वैल्यू्यूज या संस्कार है जिसको हम ग्रहण करते हैं उसमें यदि थोड़ा वह सब नीरस है। पहले म ऊपर ऊपर से देखा जाए तो उपलक दृष्टि से सरफेस लेवल पर देखा जाए तो यह सब नीरस लगते हैं। तो इन सब चीजों में थोड़ा सा रस मिला देने से थोड़ा सा फन ऐड कर देने से क्या होगा कि उसमें आपको आनंद आएगा। आप ऑटोमेटिक उसको ज्यादा समय देंगे उसको करने में और ज्यादा मन लगा करके करेंगे। तो अभी समर कैंप है बच्चों को संस्कार देने के लिए। नहीं कि यह एक स्कूल का एक्सटेंशन है। स्कूल में तो बच्चों को वैसे ही एक्सेसिव डिसिप्लिन में रखा जाता है। कभी-कभी मैंने देखा है तो इस तरह का एक्सेसिव डिसिप्लिन यदि हम यहां पे भी डालना शुरू कर देंगे तो यह जो संस्कार ग्रहण करने की जो बात है उसके ऊपर में से ना बच्चों का मन जैसे कि यह हो जाएगा चला जाएगा। अभी समर कैंप में आने का डिसीजन तो पेरेंट्स का होता है। वो बच्चों का खुद का तो डिसीजन होता नहीं है। बहुत बार ऐसा होता है। तो पेरेंट्स बोलेंगे जाओ तुम वहां पे वो लेके आते हैं। ड्रॉप कर देते हैं। फिर वो लेने को आते हैं रिसीव करने को तो बच्चे आते हैं। तो कभी-कभी उनका इच्छा नहीं होने पर भी उनको आना पड़ता है। तो अभी क्या है कि बिना इच्छा के आए हैं तो फिर आ तो गए हैं। फिजिकली तो प्रेजेंट है किंतु मेंटली एब्सेंट हो जाएंगे। तो मेंटली भी प्रेजेंट रहे। फिजिकल प्रेजेंस के साथ-साथ में उसके लिए आवश्यक है कि जितनी भी एक्टिविटीज हम कराएं इट शुड बी फन बेस्ड एक्टिविटी। जो भी हम करते हैं यदि हम उनको गीता चेंटिंग भी सिखाते हैं तो छोटा-मोटा कंपटीशन जैसा रख सकते हैं कि हां ये ग्रुप है यह सेकंड ग्रुप है जैसे हम भजन में जो सुभाषित हम सिखाते थे संस्कृत सुभाषित उसमें ऐसा किया था कि दो ग्रुप है वो सुभाषित का प्रथम लाइन बोलेगा एक ग्रुप दूसरा ग्रुप बोलेगा सेकंड लाइन तो क्या होगा कि कंपटीशन होती है कौन सा ग्रुप सुभाषित संस्कृत सुभाषित तो डिफिकल्ट होते हैं मेमोराइज करने में तो कौन सा ग्रुप आगे आगे मेमोराइज कर लेता है। कौन सा ग्रुप सही-सही में वह बोलता है सामने की वजह और योगासन है तो योगासन में जैसे कि ध्रुवासन है एक पैर पर खड़े रहने का तो कंपटीशन कि कौन सबसे ज्यादा एक पैर के ऊपर में खड़ा रह सकता है तो इस तरह से थोड़ा सा कंपटीशन थोड़ा सा कुछ फन ऐसा ऐड कर दिया तो बच्चे कितना आनंद से यह सब कुछ सीखते हैं। तो यह ध्यान करना इट इज़ आल्सो अ सॉर्ट ऑफ यदि हम उसको ट्रेडिशनल मेथड बताएंगे हृदय के भीतर में ध्यान करो यदि द्वैत वाली मेथड बताएंगे कहेंगे कि ठाकुर है या तो फिर कोई इष्ट है आप लोगों का शिव दुर्गा गणेश व्हाटएवर उसको अपने हृदय में बिठा के ध्यान करो या तो फिर अद्वैतिक मेथड बताएंगे कि अपना हृदय वो आत्मन की प्रकाश से प्रकाशित हो रहा है अनाहत चक्र है उसके ऊपर में ध्यान करो इट विल बिकम वेरी बोरिंग वेरी क्विकली। तो उसकी वजह जैसे कि यह हैप्पीनेस हैप्पीएस्ट मेमोरी सबसे ऐसी याद हमारी जो कि हमारे जीवन में सबसे ज्यादा खुशी लाई हो उस याद ने। तो फोकस अपॉन दैट तो ऑटोमेटिकली अपना माइंड उसके ऊपर में फोकस होगा। यानी कि श्रेय और प्रेय दोनों वैसे तो लगते हैं ऑोजिट है। किंतु श्रेय के भीतर में थोड़ा सा हल्का सा प्रेय यदि मिक्स कर दिया तो क्या है? शुरू-शुर के स्टेजेस में जबकि अपना विल पावर इतना स्ट्रांग नहीं होता है। वह श्रेय के पाथ को फॉलो करने में सुविधा होती है। तो इसको मैंने नाम दिया है फन योगा। यानी कि जो भी एक्टिविटी करवाते हैं, फन शुड बी एडेड इन एव्री एक्टिविटी। अदरवाइज चिल्ड्रन विल ऑटोमेटिकली अपने माइंड से एब्सेंट हो जाएंगे। फिजिकली प्रेजेंट रहेंगे। मेंटली यह लोग एब्सेंट रहेंगे। तो, यह एक और एक पॉइंट हो गया।
Friendship Yoga: सहृदयता और सहानुभूति सीखना
फिर एक पॉइंट जो कि मुझे मैंने यह सब बच्चों को देख के एक ऑब्जर्व किया फ्रेंडशिप। अब अभी देखिए कि हम लोग जो ओल्डर जनरेशन है अभी 50 क्रॉस हो गए हैं हम में से ज्यादातर मेरा भी तो अभी 50 के अपनी जो जनरेशन थी हम लोग जब स्टूडेंट थे हम लोग जब बच्चे थे तो ये मित्र होना एक सहज बात थी। जहां स्कूल में जाते हैं, ट्यूशन क्लासेस में जाते हैं तो हमेशा मित्रों के साथ में जाते हैं, मित्रों के साथ में गप लगाते हैं। मित्रों के साथ में वार्तालाप करते हैं। तो फ्रेंडशिप इज समथिंग सो इजी फॉर अस, समथिंग सो ऑब्वियस फॉर अस। किंतु इन बच्चों को मैंने देखा कि अभी यह जो आइसोलेशन का युग चला है ना कि पहले तो आप जॉइंट फैमिली में रहते नहीं है। अब माता-पिता और बच्चे यही एक न्यूक्लियर फैमिली हो गया है। उसमें भी पहले तो मां पूरा दिन अपने बच्चों के साथ बिताती थी। हाउसवाइफ। अभी बहुत सारे जो मॉडर्न जनरेशन है स्त्रियां तो जॉब करती है और करनी ही चाहिए वो समय के अनुसार। तो यह एक बात है कि इन लोगों को जो एक फैमिली सपोर्ट है या तो सिबलिंग सपोर्ट है या तो पीियर एक ग्रुप है। सिबलिंग यानी कि भाई-बहन पीियर यानी कि अपनी उम्र के जितने भी बच्चे-बच्चियां हैं उनके साथ में ना जैसे इतना टाइम घर में नहीं बिताते। मैं मेरे खुद के घर में मेरे पिताजी के घर में भी और मां के घर में वेकेशन में जाया करता था। दोनों और हम लोग जॉइंट फैमिली में रहते थे। तो मेरी उम्र के बहुत सारे लड़के लड़कियां थे। कजिन थे, भाई-बहन वगैरह-वगैरह। तो उन लोगों के साथ में बात करके ना एक हमारा एक ओरिएंटेशन हो जाता है कि हमारी उम्र के लड़के लड़कियों के साथ में किस तरह से बात करना है। किंतु आज की यह जो आइसोलेशन जनरेशन आई है मॉडर्न जनरेशन उनके बच्चों को भी जैसे कि अपनी उम्र के जो दूसरे लड़के लड़कियां हैं उन लोगों के साथ में बात करना उनके साथ में एक मित्रता का संबंध बनाना उनको हेल्पफुल होना देखिए कि व्हाट इज द कोर कांसेप्ट ऑफ फ्रेंडशिप आप किसी के साथ में मित्रता करते हैं तो उसका सबसे एक एक कहेंगे कि कोर कांसेप्ट सबसे इंपॉर्टेंट उसका एक पॉइंट क्या है? तो वह है एंपैथी। एंपैथी यानी कि सह हृदयता। अभी मेरा मित्र यदि दुखी है तो उसका दुख मुझे अफेक्ट कर रहा है। मैं समझ पा रहा हूं कि वह दुखी है। तो उसका दुख मैं किस तरह से दूर कर सकता हूं? हाउ कैन आई हेल्प हिम? और हर इन व्हाटएवर द थिंग इज पेनिंग हिम। उसको उसके मन को जो कष्ट दे रहा है, उस कष्ट को मैं निवारण कैसे कर पाऊं? और उसके फिर साथ-साथ में ही बच्चों अपने मित्रों के साथ में खेलते हुए साथ में पढ़ाई करते हुए साथ में वार्तालाप करते हुए हमको पता चल जाता है कि ऐसी कौन सी बात है या तो फिर ऐसा कौन सी कोई सिचुएशन है जो कि इसको कष्ट देती है और ऐसी कौन सी बात है कौन सी सिचुएशन है जिससे इसको आनंद आता है तो वी विल ऑलवेज ट्राई टू अवॉयड हम हमेशा उस बात को नहीं करेंगे जिससे उसको कष्ट होता है। ऐसा ना ही कुछ कहेंगे ना ही कुछ करेंगे जिससे कि उसको कष्ट होता है। और एक कॉन्शियसली प्रयास करेंगे जिससे उसको अच्छा लगता है। उसको आनंद आता है। ऐसा हम करें और यह म्यूचुअल होता है कि मुझे क्या अच्छा लगता है? वह मेरा मित्र जानता है। मुझे क्या खुशी मुझे क्या खुशी देता है? वह मेरा मित्र जानता है। तो यह एक म्यूचुअल एंपैथी होता है कि मेरे मित्र के मन में क्या चल रहा है? उसका साइकोलॉजी कैसे कार्य करता है? क्या उसको कष्ट देता है? क्या उसको खुशी देता है? तो आई विल चेंज माय बिहेवियर अकॉर्डिंगली। तो यह म्यूचुअल एंपैथी है जो कि फ्रेंडशिप का कॉर्नर स्टोन है। किंतु बहुत बार यह जो बच्चे आइसोलेशन में बड़े होते हैं तो उनके भीतर में यह एंपैथी नहीं होती है। वे लोग समझ नहीं पाते कि उनकी उनकी कही हुई छोटी-छोटी बातें या तो फिर उनके द्वारा किए गए छोटे-छोटे कार्य बाकी उनके जो साथ में जो लड़के लड़कियां पढ़ाई कर रहे हैं या तो कोई ग्रुप एक्टिविटी कर रहे हैं तो उनको कितना कष्ट देते हैं यह बात ना जैसे कि उनको समझ में ही नहीं आती। जैसे कि वे लोग इमोशनली ब्लाइंड इंटेलेक्चुअली हो सकता है कि बड़े शार्प हो एक्टिविटी करने में आजकल तो क्या है पेरेंट्स को पता है कि यदि आईवीली कॉलेज में एडमिशन दिलवाना है तो आपको एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटी करवानी होगी उनके पास में से इसके भी परसेंटेज कंसीडर किए जाते हैं जब एडमिशन प्रोसेस में तो अपने बच्चों को ना वायोलिन सिखाएंगे ना कि फिर यह नृत्य सिखाएंगे ना म्यूजिक सिखाएंगे ना बहुत सारी एक्टिविटी आज पेरेंट्स करते हैं। मार्शल आर्ट सिखाएंगे। तो जहां तक कि इंटेलेक्ट और स्किल का प्रश्न है, आजकल के बच्चे काफी तेज होते हैं। किंतु जो मैंने ऑब्जर्व किया, कभी-कभी ना यह इमोशनल ब्लाइंडनेस चली जाती है। यह हम लोग समझ नहीं पाते कि मेरी कोई बात या तो मेरी कोई मेरा कोई कार्य सामने वाले को कष्ट दे रहा है। तो, यह इमोशनल ब्लाइंडनेस ना रहे। इसके लिए हमको कॉन्शियसली ट्राई करना होगा कि बच्चों के भीतर में मित्रता बने और यह मित्रता एक बार प्रारंभ हो तो फिर अभी जैसे कि यह जो कपल काउंसिलिंग होता है ना मैरिड कपल होता है तो फिर छोटी-छोटी बातों को लेकर के झगड़ा होता है। अभी यहां पे अपने भारत में तो क्या है? यह मम्मी पापा है, नाना नानी है, दादा-दादी है, चाचा-चाची है, फई फुआ है, मामामी है। इतना सारा एक जॉइंट फैमिली होता है। तो वो जो यदि पत्नी को कोई प्रॉब्लम है तो इसमें से किसी को कुछ कहेगी तो वे लोग सॉल्यूशन दे देंगे। पति को कुछ प्रॉब्लम है तो माने क्या है कि विद इन दैट जॉइंट फैमिली आपका डोमेस्टिक जो प्रॉब्लम होता है कपल्स का दंपति का वो सॉल्व हो जाता है। विदेश में क्या है? जॉइंट फैमिली का कोई कांसेप्ट ही नहीं है। तो वह कपल थेरेपी कपल काउंसलिंग चलता है। हस्बैंड वाइफ में यदि झगड़ा हो जाता है तो सॉल्व नहीं कर पाते तो यह काउंसलर के पास में जाता है। और फिर वो काउंसलर समझाता है कि हस्बैंड को किस तरह से अपना बिहेवियर मॉडिफाई करना। दोनों की बात सुनता है। दोनों के प्रति वो सहानुभूति दिखाता है यह काउंसलर। और फिर दोनों को गाइड करता है। हस्बैंड को कहेगा तुम अपना बिहेवियर इस तरह से थोड़ा सा मॉडिफाई करो। वाइफ को कहेगा कि तुम अपना बिहेवियर थोड़ा सा मॉडिफाई करो। तो मॉडिफाई अपने दोनों को थोड़ा बहुत यह क्या है कि वह लेनदेन करनी पड़ेगी। मैं जो कहूंगा सब कुछ वैसा ही चलेगा। सामने वाले का मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करूंगा। ऐसा नहीं म्यूचुअल सैक्रिफाइस के ऊपर में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग म्यूचुअल एडजस्टमेंट के ऊपर में कोई भी सोशल सिस्टम है। वह टिका हुआ है। वो चाहे फैमिली हो ना कि यह मैरिड लाइफ हो ना कि कुछ भी हो। तो यह बच्चों के भीतर में भी यह जो फ्रेंडशिप है तो फ्रेंडशिप के कांसेप्ट क्या है कि सैक्रिफाइस करना होगा। मैं जो कहूंगा कि वही मेरे सभी मित्र करेंगे। मैं जो कुछ भी उल्टी-पुल्टी बातें करूंगा वो चलेगा। किंतु मेरा मित्र मुझे यदि कुछ ऐसा कुछ कह दे जिससे कि मुझे आघात लगे तो मैं इमीडिएटली उसके साथ में नाराज हो जाऊंगा या तो फिर उसके साथ में जो मेरी फ्रेंडशिप है उसको तोड़ दूंगा। ऐसा नहीं यू ऑलवेज हैव सम म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग, म्यूचुअल रिस्पेक्ट एंड म्यूचुअल सैक्रिफाइस। तभी यह लाइफ टाइम के लिए यह सब फ्रेंडशिप बनती है। और अभी आजकल देखिए विदेश में जो स्टडी हो रहा है वे लोग कहते हैं कि जो लोग कम्युनिटी में एक्टिव है उन लोगों के भीतर में यह लाइफस्टाइल डिसीज का परसेंटेज बड़ा कम पाया जाता है। और जो लोग किसी भी तरह की कम्युनिटी सर्विस नहीं करते। जिनका कि यह फ्रेंड सर्कल नहीं होता, जिनका एक हेल्दी फैमिली लाइफ नहीं होता, जिनका एक हेल्दी रिलीजियस कम्युनिटी में पार्टिसिपेट नहीं करते हैं। उन लोगों के भीतर में यह स्ट्रेस है, हार्ट डिसीज है, डायबिटीज है, क्वालिटी ऑफ लाइफ है। ये सब तरह से यह लोग सफर करते हैं। सो, देयर आर इनफ एग्जांपल्स कि यह जो ह्यूमन वार्मथ है, यह फ्रेंडशिप जो है, यह म्यूचुअल लव, एडमिरेशन है। इट हैज अ वेरी ग्रेट साइकोलॉजिकल बेनिफिट फॉर अस ह्यूमंस। हम मनुष्यों के लिए यह प्रेम है। यह अपने मन को स्वस्थ रखने का सबसे बड़ी दवाई है। लव इज द ग्रेटेस्ट मेडिसिन। वो जो कहते हैं ना लाफ्टर इज द बेस्ट मेडिसिन। तो उसके ऊपर में कहेंगे लव इज द बेस्ट मेडिसिन। क्योंकि क्या है कि लव माने नॉट जस्ट कि वो सेक्सुअल लव। सब तरह का कि मित्रों के भीतर में जो एक प्रेम होता है, भाई-बहन के भीतर में जो प्रेम होता है, मां और बच्चों के भीतर में जो प्रेम होता है, दिस प्रेम, लव, भालो भाषा दैट इज व्हाट कीप्स अस फिजिकली एंड मेंटली फिट। तो यह एक बात मैंने देखी कि यह जो फ्रेंडशिप है जैसे मैंने कहा कि हम लोगों की जनरेशन जो थी जो लोग फिर भी यह जॉइंट फैमिली में हम लोग बड़े हुए हैं। हम लोगों ने पहले से ही सीख लिया है कि थोड़ा बहुत सैक्रिफाइस करना पड़ेगा। मैं जो चाहूंगा एग्जैक्टली सभी लोगों को उसके अनुसार करना होगा। ऐसा करने से नहीं चलेगा। किंतु जैसे अभी सिंगल फैमिलीज है मदर एंड फादर एंड बच्चे सिर्फ इतने ही है बच्चों को क्या है बचपन से ही बहुत ज्यादा लाड लड़ा करके बहुत ज्यादा उनकोेंस देकर के बहुत ज्यादा लव नहीं कहेंगे फिर इसको कहेंगे कि एक तरह का उसके साथ में ऑब्सेशन हो जाता है मां को कि मेरे बच्चे को सब कुछ एकदम बेस्ट देना चाहिए। फिर बच्चे स्पोइल हो जाते हैं। तो यह स्पोइल बच्चे जब पहली बार स्कूल में जाते हैं तो उनको इतना शौक लगता है कि मैं जो कहता हूं मुझे यह खिलौना चाहिए। मेरे पिताजी मेरी मां यह खिलौना नहीं देंगी तो मैं इतना जोर-जोर से चिल्लाऊंगा, रोऊंगा इस तरह का कुछ नाटक खड़ा करूंगा जिसको टेंट्रम कहते हैं। तो इस तरह का कुछ टेंटम करूंगा तो यह मेरे मां-बाप मुझे खिलौना दे ही देंगे। जो मेरी जो विश है किसी भी तरह से फुलफिल करनी होगी। तो घर में तो ये प्रिंस या प्रिंसेस की तरह रहते हैं। चलो ठीक है। स्कूल में देखेंगे जितने भी लड़के लड़कियां हैं सब अपने को प्रिंस या प्रिंसेस समझते हैं। तो हाउ टू डील विद देम। सो दिस म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग, सैक्रिफाइस, म्यूचुअल एडमिरेशन, लव, फ्रेंडशिप। दिस इज़ समथिंग दैट हमको एक कॉन्शियसली इंकल्केट करना होगा। आज के जनरेशन में। कुछ-कुछ बच्चे बच्चियों को देखा कि वह इंस्टिंक्टिवली उनके भीतर में है कि एमैथी जिसको कहते हैं इक्यू एमथिक कोशंट हमें आईक्यू कहते हैं इमोशनल कोशंट कि हमारी बुद्धिमत्ता कितनी तीव्र है। फिर वो जो एक इमोशनल कोशंट होता है। दिस इज़ एमैथिक कोशंट ईक्यू कि हमारी जो सहानुभूति की क्षमता कितनी है। कुछ-कुछ बच्चों में इंस्टिंक्टिवली देखी मैंने कि हां इमीडिएटली समझ जाते हैं कि आसपास में जो चल रहा है तो उसमें मुझे किस तरह से एडजस्ट करना है। मेरी कोई वाणी या वर्तन से दूसरों को कष्ट ना हो। यह मुझे किस तरह से करना है। उनके भीतर में इंस्टिंक्टिव देखा और कुछ-कुछ बच्चों में देखा कि उनका जो बिहेवियर है इट ट्रबल्स एवरीवन। एक लड़की थी शुरू-शुर में आती थी तो अभी चालू क्लास में खड़ी होकर के इधर-उधर दौड़ना शुरू कर देगी। छोटी बच्ची आई थिंक थर्ड फोर्थ स्टैंडर्ड में थी। तो फिर उसके फादर को बुलाया गया। कहा कि देखिए ये तो चालू क्लास में इस तरह से ट्रबल खड़ी करती है। तो व्हाट इज द प्रॉब्लम एक्चुअली? तो फादर ने कहा शी इज़ अ प्रीमेच्योर बर्थ है उसका और मेंटली कुछ हो गया है उस समय में। तो शी इज़ लाइक दिस ओनली। तो हम हमको कहना पड़ा कि इस तरह से चालू क्लास में सबको डिस्टर्ब करेगी तो नहीं चलेगा। उसको आप ले जाइए। हम उसका जो फी है रिफंड कर देंगे। तो समथिंग लाइक दिस और भी दो-तीन बच्चों को देखा कि सबको तो इस तरह से हमने आना बंद नहीं करवा दिया बट हमने देखा कि कुछ-कुछ बच्चों के ऊपर में आपको बहुत ज्यादा फोकस करना पड़ता है जिससे कि वो दूसरों को ट्रबल ना करें। दूसरों को कोई कष्ट ना पहुंचाए और कुछ-कुछ बच्चे होते हैं इतने मैच्योर होते हैं इंस्टिटक्टिवली कि आप इजीली उनको लीडर बना करके दूसरे बच्चों को गाइड करने के लिए लगा दे सकते हैं। सो दिस इज वन मोर फैक्टर मैं कहूंगा फ्रेंडशिप योगा। सो दिस वी हैव टू म कॉन्शियसली कल्टीवेट। हमको ठीक-ठीक उनको समझाना होगा, बताना होगा कि मित्रता कैसे की जाए और किस तरह से मित्रता को निभाया जाए। फॉर लाइफ टाइम। यह सब फ्रेंडशिप एक बार बनती है तो लाइफ टाइम तक रहती है। ऐसा नहीं है कि आप जब भी आपके मित्र के साथ में कोई क्राइसिस हो जाता है। आप अपना सब काम छोड़ के दौड़ के जाए। उसको हेल्प करें। नॉट नेसेसरी। एक जो इमोशनल सपोर्ट होता है, कोई आकर के अपना दुखड़ा हमको कहता है, हम लोग सहानुभूति पूर्वक उसको सुनते हैं। दैट इटसेल्फ इज अ ग्रेट सर्विस। सो ये कुछ-कुछ लर्निंग्स फ्रॉम वर्किंग विद चिल्ड्रन। तो मैंने सोचा आपके साथ में शेयर करूं। तो आज यहीं तक कल से फिर अपना स्टार्ट करेंगे अपना रूटीन जो है सिलेबस। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: चूंकि संयुक्त परिवार लुप्त हो रहे हैं, तो बच्चों को संस्कार कैसे सिखाएं?
कृष्णपणमस्तु एक्चुअली ऑल दिस आइडिया शुड बी टेकन अप बाय स्कूल्स देमसेल्व्स बिकॉज़ द पार्ट दैट जॉइंट फैमिली इज़ यूज्ड टू प्ले इन द कैरेक्टर बिल्डिंग ऑफ़ चिल्ड्रन। नाउ दिस पार्ट हैज़ बीन टेकन अप बाई इंस्टीटशंस। बिकॉज़ जॉइंट फैमिली डिफिकल्ट टू सस्टेन नाउ डज़ यू आर राइट इन सेइंग्स दैट। सो दिस एस्पेक्ट शुड बी टेकन अप बाय इंस्टीट्यूशन। सो इंस्टीट्यूशन ऑफ़ स्कूल, कॉलेज और द रिलीजियस इंस्टीटशंस लाइक अस। सो वी शुड टेक अप दिस पार्ट एंड वी शुड ट्राई टू फिल दिस गैप व्हिच वाज़ लेफ्ट बाय दिस जॉइंट फैमिलीज़। आइडियली स्पीकिंग एज़ वी नो दिस डज़ंट हैपन ऑलवेज। इवन आवर समर कैंप स्टार्टेड कंटिन्यूड ओनली फॉर 15 डेज व्हिच इज नॉट इनफ। एक्चुअली वी हैव डिसाइडेड टू कंटिन्यू दिस एव्री संडे। एव्री संडे वी विल हैव बाल संस्कार वर्ग। सो एंड दिस संडे नियरली 57 स्टूडेंट केम यस्टरडे। सो इट्स अ गुड साइन एक्चुअली कि पेरेंट्स आल्सो अंडरस्टैंड कि वी नीड टू कंटिन्यू दिस एक्टिविटी। दिस इज नॉट अ परफेक्ट सॉल्यूशन बट दिस इज द ओनली वन आई कैन ऑफर राइट
प्रश्न: मेरा बेटा ऐसी किसी भी संस्कार देने वाली प्रवृत्तिओं में भाग नहीं लेना चाहता। मुझे क्या करना चाहिए?
नाउ यू आर राइट एक्चुअली दिस इज़ आल्सो वन इशू दैट वेदर द चाइल्ड डजंट वांट टू गो कैन यू फोर्स हिम टू गो ऑर नॉट अगेन सो वी हैव टू अंडरस्टैंड नाउ इट इज़ अप टू द पेरेंट सी चिल्ड्रन मेनी चिल्ड्रन डोंट वांट टु गो टु स्कूल अह बट पेरेंट्स सेंड देम एनीवे बिकॉज़ दे नो दैट देयर फ्यूचर डिपेंड्स अपॉन द स्कूल। सो बट वन एस्पेक्ट व्हिच इज़ जनरली इग्नर्ड बाय स्कूल इज़ आवर इमोशनल स्पिरिचुअल डेवलपमेंट आवर सोशल डेवलपमेंट आवर इंट आवर विज़डम व्हिच इज़ कॉल्ड द डेवलपमेंट ऑफ एंपैथी एटसेट्रा सो फॉर दिस दिस इज़ आल्सो ए स्कूल इफ द समर कैंप और एनी चिल्ड्रंस एक्टिविटी कंडक्टेड करेक्टली इट विल अह इंकल्केट ऑल दिस एक्स्ट्रा वैल्यूज़ व्हिच इज़ वैल्यू एजुकेशन इट इज़ कॉल्ड द वैल्यू ऑफ़ एंपैथी, वैल्यू ऑफ़ फ्रेंडशिप, वैल्यू ऑफ़ सिंपैथी, वैल्यू ऑफ़ हेल्पफुलनेस, अह थिंग्स लाइक दिस। सो दिस वैल्यूज़ आल्सो नीड्स टू बी इंकल्केटेड एंड चिल्ड्रंस कैंप और चिल्ड्रंस एक्टिविटी कंडक्टेड करेक्टली। इट विल इंकलकेट दिस वैल्यूज़ आल्सो। सो दिस इज़ अ चिल्ड्रन अ डिसीजन टू बी मेड बाय पेरेंट्स दैट ओबे द चिल्ड्रन डोंट सेंड देम और फोर्स देम टू सी गो एंड लर्न दिस वैल्यूज़ देयर इज़ नो यूनिवर्सल सॉल्यूशन बिकॉज़ समटाइ्स इट हैप्स सी स्कूल्स आर गुड एंड बैड वी ऑल नो सम स्कूल्स आर वेरी गुड सम स्कूल्स आर नॉट दैट गुड सम स्कूल्स चिल्ड्रन गो देयर दे लर्न वेरी वेल सम स्कूल्स चिल्ड्रन गो दे डू नॉट लर्न वेरी वेल सो इट्स नॉट लाइक दैट चिल्ड्रन एक्टिविटी िटी व्हेयरवर इट इज़ कंडक्टेड इट इज़ अप टू द मार्क और अप टू द स्टैंडर्ड इट इज़ नॉट नेसेसरी। सो मेनी फैक्टर्स यू विल हैव टू कंसीडर इफ यू ट्रस्ट दैट द समर कैंप और एनी संस्कार वर्ग व्हेयर यू सेंड योर चाइल्ड इट इज़ कंडक्टेड वेल विथ स्टैंडर्ड मेंटेनेंस ऑफ़ स्टैंडर्ड। देन यू कैन फोर्स। अदरवाइज इफ द चाइल्ड कम्स समटाइ्स एंड कंप्लेंट इट माइट आल्सो हैपन दैट सम टाइप ऑफ अब्यूज इज टेकिंग प्लेस आइदर इन द स्कूल और इन सच एक्टिविटीज सो यू शुड आल्सो लिसन टू दैट केयरफुली आल्सो वी रीड न्यूज़पेपर्स वी रीड सो मेनी इंसिडेंट्स हैपन सो इट डिपेंड्स ऑन द विज़डम ऑफ पेरेंट्स अल्टीमेटली