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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 29 Sept 2023

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्वधर्म अवतार वष राम कृष्णाय नमः श्री मां शारदा देवी जीवन चरित्र अवतरण का में से हम लोग पाठ कर रहे थे कल हमने देखा कि किस तरह से महाराज जी हमको कहते हैं देवी गुरु मातृशक्ति इन तीनों का समन्वय लेकर के मां आध्या शक्ति का पृथ्वी पर अवतरण हुआ और क्यों हुआ एक ऐसे समाज की भित्ति तैयार करने के लिए एक इस तरह का एक फर्टाइल लैंड मास तैयार करने के लिए कि जहां पर यह मल्टी कल्चरलिज्म मल्टी रिलीज निज्म मल्टी आइडियाज मल्टीपल आइडियाज इट डाइवर्सिटी ऑल ऑफ दैट कैन बी नर्चरड एंड नरिच एंड ग्रो इन अ वेरी एफिशिएंट वेरी वेल मैनर्ड मैनर सो टू इस तरह से भारत की पुण्यभूमि को सिंचित करने के लिए भारत की पुण्यभूमि हमको हमने देखा है कि स्वामी जी जब विदेश से कोलंबो में उतरे हालांकि वोह कोलंबो की बात थी भारत अभी कोलंबो तो वैसे अभी श्रीलंका दूसरा एक कंट्री हो गया है किंतु यदि एंसेट इंडिया हम प्राचीन भारत की कल्पना करें तो यहां पर यह म्यानमार और यह बर्मा वहां से लेकर के जिसको कि हम साउथ ईस्ट एशिया कहते हैं वहां से लेकर के यह तिबेट होते हुए यह अफगानिस्तान यहां तक का नॉर्थ में और साउथ में ये श्रीलंका वगैरह सब भारतीय संस्कृति से परि पोषित यह भारतीय भूखंड जिसको बोलते हैं इंडियन सबकॉन्टिनेंट इसका पार्ट रहा है इसलिए स्वामी जी गलत नहीं है जब श्रीलंका की भूमि को अपनी मातृभूमि के साथ में मातृभूमि गिनते हैं वो धूल में मिट्टी में वो वो गिरने गिर गए और फिर क्या कहा कि अभी तक तो मैं अपने इस देश को मातृभूमि समझता था किंतु अब पता चला कि यह देश सिर्फ मातृभूमि नहीं यह मेरी पुण्य भूमि है इस जगत में कहां पर भी लोग हो जीवात्मा इस जगत में जहां कहीं भी जन्म ले उसको यदि मुक्ति प्राप्त करनी है निर्वाण प्राप्त करना है ईश्वर दर्शन करना है तो उसको भारत की भूमि पर आना ही पड़ेगा और ये देखिए कि भारत एज अ स्पिरिचुअल डेस्टिनेशन ये आइडिया वैसे बड़ा ही पॉपुलर है आपको पता होगा कि इजराइल में इतना सारा टेंशन सब समय रहता है कभी ना कभी वो व बम ब्लास्ट होते हैं कभी ना कभी अटैक होते हैं ये इजराइल के आर्मी के जो सोल्जर है व 24 * 7 इनको ड्यूटी पर रहना पड़ता है कब कहीं जाकर के कहीं से ना कुछ ना कुछ वह हमला ना हो जाए तो ये इजराइल आर्मी के जो सोल्जर है हमारी इंडिया की बॉर्डर्स क्या है बहुत हद तक शांत है ज्यादातर कंट्रीज की बॉर्डर्स वैसे शांत रहती है बहुत बड़ा झमेला जब होगा तो युद्ध होगा तो अलग बात है व ना डे टू डे वहां पर ऐसा कोई खास एक्टिविटी नहीं होता हमला नहीं होता किंतु इजराइल में सब समय इस तरह के हमले होते रहते हैं और इजराइल के सोल्जर्स जो है वो उनका जो ड्यूटी है वन ऑफ द मोस्ट स्ट्रेसफुल ड्यूटीज इन द वर्ल्ड इस जगत में सबसे ज्यादा स्ट्रेसफुल ड्यूटी कहा जाए ना जैसे यह एयर फ्लाइट कंट्रोलर है वो सब समय अलर्ट रहना पड़ता है और ऐसे लोगों को अल्सर भी बहुत जल्दी हो जाता है यह मेंटल स्ट्रेस की वजह जैसे तो वन ऑफ इजराइल के सोल्जर का ड्यूटी इस तरह का है सब समय स्ट्रेस में रहना पड़ता है वे लोग पसंद भी करते हैं ऐसे लोग माने यंग होते हैं फिजिकली फिट होते हैं उनको यह टेंशन ये एडवेंचर चाहिए तो जो भी है किंतु जब वोह रिटायर होते हैं तब वह बहुत सारे इजराइल के सोल्जर आपको देखेंगे काशी में वाराणसी में फिर यह वृंदावन ना ये हरिद्वार यह हिमालय यह सब जगह पे ये इजराइल के सोल्जर वो रिटायर होने के बाद में या तो फिर छुट्टी लेकर वह भ्रमण करने के लिए आते हैं क्यों क्योंकि इतना हाइपर स्ट्रेस एनवायरमेंट में से निकले हैं तो उनको इस तरह का एनवायरमेंट चाहिए जो कि मेंटली एंड स्पिरिचुअली नरिंगरे एनवायरमेंट उनको कहां मिलेगा तो यह हरिद्वार है यह हिमालय के एक के बाद एक तीर्थक्षेत्र है वहां पे उनको सबसे ज्यादा मानसिक शांति मिलती है इसीलिए ये इजराइल के सोल्जर मैंने जब जब पढ़ा था मुझे भी आश्चर्य हुआ कि वे लोग क्यों भारत बार-बार आते हैं या तो क्यों बहुत सारे सोल्जर्स इस तरह से छुट्टी लेकर के या रिटायर होने के बाद आते हैं किंतु दिस इज अ फैक्ट आप चेक कर सकते हैं तो यह देखिए कि भारत की पुण्यभूमि वह हमेशा से इस तरह के लोगों को आकर्षित करती रही है जिनको मानसिक शांति चाहिए जिनका एक मुमुक्षु तोव है मनुष्य का मृत्यु के बाद में क्या होता है जीवन और मृत्यु के परे भी कोई अस् वव है कि नहीं इस तरह के हायर आइडियाज डेवलप जो जिनके मन में होते हैं उनको भारत में आना ही पड़ेगा तो इस मिट्टी को परिपोक करने के लिए फड़ द्रुप बनाने के लिए फिर से फर्टाइल करने के लिए फिर से इसको रिचार्ज करने के लिए आध्या शक्ति का अवतरण हुआ और किस रूप में देवी गुरु और मातृशक्ति तीनों आधार एक एक देह में एक शरी अंग में वो आधार होकर के इस पृथ्वी पर भारत में अवतरे अभी क कल हमने यह भी देखा कि मां में जिस तरह से एक अत्य उच्च आध्यात्मिक आदर्श परिलक्षित होता था तो कभी-कभी मां का बचपना भी वो दिख जाता था मां का मातृ भाव भी दिखता था और मातृ भाव यानी कि इतना मातृ भाव एक सुंदर कहानी मैंने पहले भी कही थी कि एक औरत अभी शादी अभी हुई है किंतु उस हस्बैंड और चार पांच लड़के उसके हुए थे उस समय तो वो लेकर के वो जयराम बाटी आई है वो देखा कि ऑलरेडी जयराम बाटी का घर मां का यदि आपने देखा होगा वो कैंपस छोटा सा जगह है यहां पे मां का कमरा है यहां पे वो साइड में पागली मामी वगैरह रहते हैं और फिर यहां पे वो किचन इस साइड में वो मंदिर में जाने का जो रास्ता है वो वहां पे आप देखेंगे कि लेफ्ट लेफ्ट साइड में वो किचन है वो माने रान ग्रह और बाहर में एक एक छोटा सा कमरा है जहां पर वो गेस्ट वगैरह रहते हैं यह शरद महाराज वगैरा जब जाते थे वहां पर रहते थे इतना छोटा सा आंगन है तो इसमें अभी ऑलरेडी मां का घर लोगों से भरती है अभी यह बिल्कुल अनजाने भक्त कहां इतने दूर से आ गए मां के पास में और आकर के अभी क्या करें वह बच्चे रो रहे हैं उनका भी कुछ विश्राम की व्यवस्था खाने पीने की व्यवस्था कौन करेगा यह सब घर भरती है और मां की सेवा करें ना कि इस तरह से कोई रैंडम कोई आ गया है मां को मिलने के लिए उसका ख्याल करें तो अभी क्या करें तो मां को समाचार मिला जहां पे मां थी कमरे के भीतर में कि मां इस तरह से एक औरत आई है अपने हस्बैंड और बच्चों के साथ में तो क्या करें तो फिर मां ने उसको भीतर में बुलाया कितना स्नेह और प्रेम से उसको बिठाया बच्चों के लिए जो दूध खाने की व्यवस्था हो गई हस्बैंड के लिए विश्राम की व्यवस्था हो गई और कुछ समय के बाद में देखा गया कि वह औरत अपने एक हाथ में घड़ा लेकर के वो मां के घर की जो दूसरी औरतें थी उनके साथ में वह घड़ा लेकर के पानी भरने के लिए पुण्य पुकुर ना की और कहीं पर जा रही थी जैसे एगजैक्टली ऐसा कि जैसे कोई लड़की अपने मां के घर में व वापिस माइका मने माइके हिंदी में कहते हैं माई का तो मां का घर तो वो अपने मां के घर आई है और घड़ा लेकर के पानी भरने के लिए अपनी बहनों के साथ में जा रही है जैसे कि वो कितने सालों साल का पहचान है मां के साथ में कितने सालों साल की वह मां और पुत्री बेटी का संबंध है इन दोनों में तो इस तरह से पहली ही मुलाकात में ऐसा और फिर जब वह लड़की जब वापस गई जिस दिन उस दिन थोड़ी देर के बाद में पता चला कि उसने अपनी जो साड़ी थी वह धो कर के वहां पर पुकुर जो था उसके किनारे सुखाने के लिए सुखाने के लिए रखी थी वो ड्राई होने के लिए गर्मी में सूरज की प्रकाश में तो जब मां को पता चला तो एकदम बेचारी परेशान हो गई अरे मेरी लड़की वो अपने घर जाएगी वो फिर वो देखेगी कि पहनने के लिए साड़ी नहीं है तो वो सोचेगी अरे वो तो मैं मां के घर छोड़ाई अरे क्या होगा मेरी लड़की को बेचारी को साड़ी से वंचित हो जाना पड़ेगा ऐसा करके मां इतना दुख प्रकाश करने लगी कि मां के साथ में जो सेवक महाराज थे मोस्ट प्रोबेबली वरदा महाराज तो उन्होंने कहा कि मां क्या मैं जाकर के साड़ी उनको दे आऊ क्या तो मां ने तो एकदम मां बड़ी खुश हो गई कि हां हां जाओ जाकर के दे आओ और साथ में छाता ले जाना धूप बहुत है अबी यह जब मां ने ऐसा कहा तो यह नलिनी दी थी तो उन्होंने बड़े ही रुक्ष स्वर में कहा अरे क्या वह पागल औरत वह अपने खुद के बच्चों को संभाल नहीं पाती है अपने क्या छोटी सी उम्र में शादी की है खुद का कुछ ठिका ना नहीं है यहां पर आकर के सबको परेशान कर दिया अभी साड़ी भूल कर के गई है तो गई है तो वो उसकी गलती है हमको क्या है उसमें तुम क्यों जाओगे इतना धूप में वो साड़ी देने के लिए तो अभी मां अभी उसने इतने रुक्ष स्वर में कहा तो मां भी आगे कुछ नहीं बोली किंतु महाराज जी जो ये रेमसंस लिखते हैं उन्होंने देखा कि मां की इच्छा है भीतर में हृदय में कि वो साड़ी उनको पहुंचा दी जाए तो फिर वो महाराज मां की इच्छा का पालन करने के लिए वो साड़ी लेकर वो कितना रास्ता वे लोग तो कितने आगे चले गए थे विदाई लेकर के सुबह को मां के पास से धूप में चलते चलते गए और वे लोग तो आश्चर्यचकित हो गए अरे महाराज जी क्या हुआ हमको मिलने के लिए क्यों आ रहे हैं तो महाराज जी ने वो अच्छे से फोल्ड की हुई साड़ी वस्त्र उसके हाथ में दिया कहा कि आप ये भूल गई थी तो मां ने आपको भेजा है तो वो औरत बेचारी वो लड़की वो एकदम रोने लगी कि अरे मां का मेरे पर इतना प्रेम है इतना भालोबासा स्नेह है कि पहली बार मिले हैं मैं जब मैं वहां पर थी तब इतना प्रेम करती थी और जब मैं निकल गई तो साड़ी के लिए एक महाराज जी को भेजा इतने धूप में मैं हमारे पीछे में तो कितना आभार व्यक्त किया ऐसा करके महाराज जी जब वापस आए तो देखा कि वोह औरत ने फिर अपना एक गमछा भी वहां पर छोड़ दिया तो अभी तो मां ने जब पता चला कि वो उसने गमछा छोड़ दिया तो मां एकदम रोना शुरू कर दिया अरे बाप रे मेरी लड़की बेचारी हमार में जब सुबह को देखेगी कि उसको गमछा और नहीं मिलेगा तो बेचारी बड़े ही परेशान हो जाएगी सोचे कि मां के घर गमछा छोड़ दिया है तो यह सुनकर के अभी वोह महाराज जी का हृदय तो बड़ा ही विगलिंक मैं क्या गमछा भी दे आऊ क्या तो मां ने बोला हां हां बेटा जाओ जाओ अभी ये नलिनी दी माखू दी वगैरह आप इमेजिन कर सकते हैं कि उनका गुस्सा कितना हो जाएगा कि एक तो जो आई है वो गेस्ट होकर के औरत वो अपने को खुद को नहीं संभाल पा रही है उसके बच्चों को भी नहीं और यहां पे आने के समय तो मां को इस तरह से कष्ट दिया और फिर व जब जा रही है तब भी वह मां के पास में बार बार वो मां के थ्रू वो महाराज जी के थ्रू यह सब वापस भिजवा तो उनका गुस्सा भी हम समझ सकते हैं किंतु मा महाराज जी ने देखा कि मां की इच्छा है कि गमछा जाकर के उनको दे आए तो फिर से वही धूप में जाकर के वो उन जो दंपति था वो जा रहा था उनको फिर से मिले जाकर के फिर से कहा कि आप अपना गमछा भूल रई है तो मां ने भेजा है तो यह देख कर के वो लड़की तो पूरा रोना ही शुरू कर दी कि अरे यह तो मेरी खुद की मां का मेरे पर जितना प्रेम नहीं था उतना प्रेम तो मां का है ये मां शारदा देवी का है ये किस तरह का अद्भुत अमानवीय देवी प्रेम तो देखिए ऑन वन हैंड देवी और गुरु ये आधार जिसमें है उसी देह में उसी मां के भीतर में मातृ शक्ति का भी अवतरण है और तीनों आधार को लेकर के मां का जीवन है और यह क्यों करने की जरूरत पड़ गई कि यह इस भारत देश की मिट्टी को पुनः धर्म से पुनः आध्यात्मिकता से सिंचित करनी है इसलिए अभी महाराज जी आगे लिखते हैं जे दिख दिया धरा जाऊ ना के जिस पॉइंट ऑफ व्यू से भी हम लोग देखते हैं जिस रास्ते से भी हम लोग देखें क्यों क्यों ना देखे वर्तमान जुगे ई देशर आदर्श के संजीवी तो कोरार और उ हार पराकाष्ठा प्रदर्शन एकटा विशेष प्रयोजन छलो वर्तमान युग में इस देश के आदर्श को संजीविया पुनर्जीवित करना और उसकी पराकाष्ठा का प्र दर्शन करने का एक विशेष प्रयोजन था भारत गुलाम था इस गुलामी में से हमको निकलना था असुर यह बाह्य असुर नहीं भीतर के असुरों का उनके ऊपर में आक्रमण करके उनको विनाश करना था दूसरा और तीसरा कि विदेशी सभ्यता का एक महा आक्रमण उसके सामने हमारे आदर्श को बचाए रखना था यह सब पॉइंट्स महाराज ने दिए कि जिस की वजह से आध्या शक्ति का अवतार के साथ में अवतरण हुआ अभी महाराज जी लिखते हैं कि यह कोई भी पॉइंट से आप देखें कोई भी कोई भी पॉइंट ऑफ व्यू से आप इसको निहाल कि कोई भी पॉइंट ऑफ व्यू से आप इसका चिंतन करें भारत का जो आदर्श है उसका पुनर्जीवन और उसकी पराकाष्ठा का प्रदर्शन अ भारत का जो आदर्श है सीता सावित्री दमयंती गुरु देवी मानवी मां यह सबका कोई ना कोई आदर्श तो भारत की स्त्रियों में देखने को मिलेगा ही ठाकुर की खुद की मां चंद्रावली देवी को देखिए स्वामी जी की मां भुवनेश्वरी देवी को देखिए हमारी खुद की मां आप आपकी मेरी हम सबके जीवन में हम देखेंगे कि मां जो भी होती है भारतीय स्त्री कोई भी होती है किसी ना किसी तरह से उन लोगों में दिव्यता मातृत्व का वो एक एक आविर्भाव होता ही होता है कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु इस आदर्श का जो चरम है इसकी जो पराकाष्ठा है वह किसी एक आदर्श में स्थापित करनी है तो जिसको कि हम जिनको हम अपने नजर के सामने रख सके जिनको कि हम स्टैंडर्ड मेजर गिन कर के जिनके ये है मतलब यह आदर्श है यह सर्वोच्च आदर्श है और उस आदर्श को नजर के सामने रख कर के हम हमारी स्त्रियां अपने जीवन का गठन कर सके तो आदर्श की पराकाष्ठा दिखानी है भारत की सभी स्त्रियों में यह आदर्श है विद्यमान कुछ ना कुछ अंश में किसी में ज्यादा होगा किसी में कम होगा किंतु है तो सही स्वामी जी ने कहा है जितने भी पुरुष है भारत में सब भगवान राम के वंशज है जितनी भी स्त्रियां है उन सब में मां सीता का अंश विराजित है तो पुरुष और स्त्री भारत के उसमें कोई ना कोई एक अंश तो भगवान राम मां सीता का है ही है किंतु एक इस तरह का सर्वोच्च आदर्श दिखा देना है इस युग में फिर से कि हां हम कह पाए कि वो थी मां सीता और यह है मां शारदा और हमको पता है कि दोनों में मने एक ही शक्ति जिनका की आविर्भव मां सीता के रूप में हुआ था उन्हीं का आविर्भव मां के शारदा के रूप में हुआ ये केदार बाबू वहां पर गए हैं कलकत्ता और मां के साथ में बात कर रहे हैं पूछ रहे हैं कि मां यह रामेश्वरम वगैरा दर्शन किया तो कैसा रहा आपका अनुभव हमको कुछ बताइए तो वो रामेश्वर रामेश्वर जो शिवलिंग है तो मां ने कहा अच्छा जेमन रखेगी लाम तमनी देखला य सब बात बात में मां ने बोल दिया कि जैसा मैं रख कर के गई थी वैसा ही मुझे दिखा तो अभी गोलाप मा वहां से जा रही तो उन्होंने इमीडिएट पकड़ लिया कि अरे मां आपने क्या कहा बोलिए तो फिर से तो माने कहा नहीं अरे मैंने तो कुछ नहीं कहा क्या कहा मैंने तो मैंने देखिए कि इस तरह से वह एक अनजान रूप से मने एक सबकॉन्शियसली माने अपना स्वरूप प्रकट कर दिया था जो मां सीता ने वहां पर रामेश्वर माण लिंग की स्थापना की थी उसी मां सीता ने यहां पर इस सॉरी उसी मां सीता ने फिर से इस वही शिवलिंग का दर्शन किया तो ये सर्वोच्च आदर्श व फिर से स्थापित करके जाने की आवश्यकता थी आर सेही प्रयोजन संपादन एकमात्र जगदंब पखे संभव छलो और उस प्रयोजन का वास्तविक सिर्फ जगदंबा ही जगदंबा के पक्ष में ही संभव था सिर्फ ज जगदंबा के द्वारा ही संभव था माने सर्वोच्च आदर्श कौन रख पाएगा जिसमें सभी गुण सभी आधार जिसमें पूरे विश्व की शक्ति निहित है वो आध्या शक्ति जगदंबा ही इस तरह का आदर्श स्थापित कर सकती है देखिए हम लोग बहुत बार सोचते हैं मैं खुद जब यहां पर आया तो मैंने तो बुद्धिज्म और जैनिज्म के बारे में खास करके भगवान बुद्ध और महावीर की बायोग्राफी पड़ी हुई थी तो मैंने ऐसा सोच लिया था कि ये भगवान बुद्ध की बायोग्राफी में लिखा है कि 12 साल तपस्या करने से उनको निर्वाण प्राप्ति हुई फिर ठाकुर की बायोग्राफी में लीला प्रसंग में भी देखते हैं कि वही इतने सालों की ही कुछ प्लस और माइनस कुछ साल तपस्या करने से इनको भी यह अद्वैत साधना की जो सर्वोच्च निर्विकल्प समाधि है वो प्राप्त हुई तो मैं भी यहां पर आकर के इतनी तपस्या करूंगा 12 साल कि बस मुझे समाधि मिल ही जाएगी तो अभी देखिए कि उस साल को मैंने जवाइन किया था 20005 में 2006 के एंड में और आज कितने साल हो गए ऑलमोस्ट 20 साल होने को आए हैं समाधि वगैरह तो बहुत दूर की बात है ऐसा भी नहीं है कि मैं प्रतिदिन ध्यान करने को बैठूं तो ठीक से ध्यान जप हो ऐसा भी नहीं होता है समाधि तो बहुत दूर की बात है तो जब हम आध्यात्मिक रास्ते पर चलने की शुरुआत करते हैं और और अपने सामने एक अत्युक्ति जिन्होंने यह ठीक कर लिया कि हा सु में शरीर तुस्ती मासम प्रलय चया अर्थात इस आसन पर मैं विराजित होंगा और जब तक मेरे शरीर में अस्थि मांस मज्जा यह सब गल ना जाए किंतु भले ही गल जाए किंतु जब तक निर्वाण प्राप्त नहीं होगा तब तक मैं इस आसन से फिर से खड़ा नहीं होऊंगा तो यह भगवान बुद्ध हो ना कि ये श्री राम कृष्ण हो ठाकुर की साधना के बारे में हमने लीला प्रसंग में वर्णन पढ़ा है कि ठाकुर जिस वृक्ष के नीचे में बैठ कर के ध्यान करते थे वो जो शरीर में जो प्रचंड गर्मी उत्पन्न होती थी उससे उस पेड़ के पत्ते तक झुलस जाते थे पत्ते तक जल जाते थे और अपने भैरवी ब्राह्मणी उनको गंगा में स्नान करने के लिए ले जा रही है उनके शरीर को स्पर्श नहीं कर पाएगी एक ब्लैंकेट से उनके शरीर को आवृत कर देना होगा और उस तब जाकर के उनको पकड़ कर के गंगा में स्नान करने के लिए ले जाएंगे तो इस हद तक ठाकुर ने तपस्या की है और ठाकुर की तपस्या साधना की एक के बाद एक बातें सुने तो हम आश्चर्य में मतलब इवोल्यूशन के नियम को चेंज कर देता है जब हनुमान भाव की दस्य भाव की साधना करते थे तो जैसे भगवान महावीर को पूंछ थी तो वैसे ही उनकी स्पाइनल कोड के आखिर के वह जो एक रहता है वहां से पूंछ की तरह उनकी स्पाइनल कोड बढ़ना शुरू हो गई थी ठाकुर की एक इंच तक बढ़ ब गई थी ठाकुर ने खुद ऐसा कहा मधुर भाव की साधना करते थे तो स्त्रियों को जिस तरह से वह मासिक आता है वह भी उनको आना शुरू हो गया था लीला प्रसंग में जब हम इस तरह के वर्णन पढ़ते हैं तो हम लोग आश्चर्य चकित हो जाते हैं कि किस तरह से इवोल्यूशन माने ये इवोल्यूशन हम सोचते हैं कि डार्विन कहता है कि यह इवोल्यूशन होता है उस उसके बेस पर यह बंदर में से मनुष्य हुए हैं यहां पर तो ठाकुर ने इवोल्यूशन को उल्टा दिया लशन के परे वह चला गया आत्मन जो है वह इवोल्यूशन के परे है देह शायद ऐसा हो सकता है कि यह जेनेटिक म्यूटेशन और सर्वाइवल ऑफ द फटेस्ट और य ये सब वो जो मॉडर्न थिरी जो सब है बायोलॉजी की उसकी मदद से डेवलप हुआ हो किंतु आत्मन और आत्मन का प्रकाश यह सिर्फ साधना के ऊपर में डिपेंड करता है ईश्वर निष्ठा के ऊपर में तपस्या के ऊपर में डिपेंड करता है और यह तपस्या साधना आदर्श का सर्वोच्च एक अ स्थित करना एक आदर्श को पर स्थित करना भारत में यह आध्या शक्ति जगदंबा और भगवान विष्णु के जो अवतार है उन्हीं के लिए यह संभव है इसीलिए महाराज जी ने यहां पे लिखा है कि पराकाष्ठा प्रदर्शन एकटा विशेष प्रयोजन छेलो आर सेही प्रयोजन संपादन यह प्रयोजन का जीवन सिर्फ एकमात्र जगदंबा के पक्ष में ही संभव था एकमात्र जगदंबा ही इस पराकाष्ठा स्वरूप उदाहरण को पृथ्वी पर स्थापित कर पाएगी कारण उन बंश शताब्दी ते अन्य कोनो उपाय पराधीन भारत के आत्म संस् करा क्यों उन शताब्दी 19 सेंचुरी में और कोई उपाय से पिम भारत को अपने खुद की स्व महिमा में स्थापित कर करना आत्म संस् करा स्व महिमा में स्थापित करना एवं समस्त विश्व के एई प्राण प्रदो आदर्श संबंध अहित कोरा और समग्र विश्व को इस प्राण प्रद आदर्श यह प्राण प्रद आदर्श क्या है हमारे उपनिषदों में कथित वर्णित आत्मन और ब्रह्मण के एकत्व का यह संदेश महावाक्य अहम ब्रह्मास्मि इस आदर्श से इस पुण्य संदेश से पूरे जगत को अहित करना पहले तो भारत को स्व महिमा में प्रतिष्ठित करना दूसरा कि पूरे जगत में भारत का यह प्राण प्रद संदेश फैलाना यह दोनों कार्य अपर कहारो साध्या यत छलो ना और किसी के काम बस का नहीं था साध्य आयत साध्य अर्थात उनका सामर्थ्य आयत सामर्थ्य से परे था और किसी कि के बस में नहीं था और किसी के सामर्थ्य से परे था इसीलिए मां को अवतरित होना पड़ा भारत मर्म कथा जगत समाजे प्रचार इहा चिरंतन पंथा भारत की मर्म कथा भारत की जो एसेंशियल आइडियल है जो कोर आइडियल है उसका जगत समाज में प्रचार का यही है चिरंतन पंथा जगत समाज में प्रचार की यही है प्राचीन रीति और सभी देश अपने आदर्श को किस तरह से फैलाते हैं यह ग्रीस कहो ना कि यह ब्रिटेन कहो ना कि ये अमेरिका कहो ना कि रोमन एंपायर कहो वे लोग डेमोक्रेसी का प्रचार किस तरह से करते हैं पहले आर्मी जाएगी लोकल गवर्नमेंट को तोड़ देगी लोकल जो सब यह राज्य है उसके ऊपर में आक्रमण करके अपनी सत्ता स्थापित करेगी फिर बोलेगी हम आपको डेमोक्रेसी दे रहे हैं माने ये भी एक विचित्र बात है कि डेमोक्रेसी का प्रचार आर्मी के थ्रू करना पड़ता है और भारत का है कि भारत के जो प्राण प्रद आदर्श है उसकी चिरंतन पंथा उसको स्प्रेड करने की उसका प्रचार करने की चिरंतन पंथा क्या है तो वह आशीर्वाद अवतार का आशीर्वाद यह एकमात्र हमारे आदर्श को फैलाने का हमेशा का एक रास्ता है सत कथा बोलते गेले उन शताब्दी मध्य भाग होते ए शताब्दी प्रथम भाग पर जंतो सही सही कहे तो उन शताब्दी यानी कि 19 सेंचुरी के मध्य भाग से मिडल से लेकर के ए शताब्दी यानी कि महाराज जी तो ये 1950 60 के दशक में लिख रहे हैं यानी कि 20वीं शताब्दी के मध्य भाग यानी कि यह कौन सा टाइम पीरियड हुआ 1850 से लेकर के 1950 यह एक 100 ईयर का टाइम पीरियड महाराज जी इसके बारे में कह रहे हैं पर्यंत इस समय तक इस समय में धर्मर अधोगति जेमन शरबा पेखा अधिक होया छ यह जो 100 साल का पीरियड है 1850 से आसपास से लेकर के 1950 तक का इस 100 साल में पहले के समय के अपेक्षा कहीं अधिक धर्म की अवनति जैसे हुई है शक्ति अवतरण तमनी सर्वोत्तम हुईया शक्ति का अवतरण वैसे ही सर्वोत्तम हुआ है जितना धर्म की अधोगति मानव समाज में बाहर में हुई है उतनी ही सर्वोच्च शक्ति का अवतरण मां के द्वारा इस पृथ्वी पर भारत देश में हुआ है देवी गुरु मातृ ज्ञाने ई शक्ति पुजार भीतर दयाई नवीन सभ्यता और भित्ति पतन होई बे देवी गुरु और मातृ ज्ञान करके देवी गुरु और मातृ का मातृत्व का आदर्श हमारे नजर के सामने रख कर के शक्ति की पूजा के द्वारा ही नवीन सभ्यता की भित्ति पत्तन होई ब नवीन सभ्यता का फाउंडेशन स्टोन लगाया जाएगा नवीन सभ्यता का यह नीव है वह डाली जाएगी देवी गुरु और मां य एक आधार में तीनों का गुण हमारे नजर में रहेगा उसकी जब हम पूजा करेंगे तब कहीं जाकर के नवी सभ्यता की नवीन सभ्यता का फाउंडेशन स्टोन वो स्थापित होगा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा m