मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार [गाना गाने की आवाज़] वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित चीर सिमंतिनी चीर सधवा इस चैप्टर का पाठ कर रहे हैं। ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है और महासमाधि के बाद की जो कुछ घटनावली है अस्थि को लेकर के जो विवाद हुआ है और फिर ठाकुर ने जो सर्वप्रथम मां को दर्शन देकर के जो दर्शन परंपरा प्रारंभ की है जो गुरु परंपरा प्रारंभ की है उसके बारे में हमारा चर्चा ऑलमोस्ट काफी काफी कुछ हो चुका है। कल आखिरी हमने देखा था कि अस्थि को लेकर के जो विवाद हुआ उसको उसके बारे में मां ने जो कहा था कि ऐमन सोनार मानुष ही चले चले ग छायनीय झगड़ा कर छे इस तरह का सुवर्ण का मनुष्य चला गया सुवर्णमय मनुष्य सुवर्णमय जिनका संस्कार जिनका जीवन जिनका उत्पत्ति और जिनका महासमाधि था वो चले गए है। अभी यह राख लेकर के झगड़ा कर रहे हैं। तो मां का यह जो इतने दुख के भीतर में भी एक जागतिक संसार के ऊपर में उठकर के उर्ध्व उठकर के एक निरपेक्ष दृष्टि बनाए रखना। यह जो मां की क्षमता थी, इसके बारे में कल हमने बात की थी। अभी इसके आगे गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? हम देखते हैं। क्या कहते हैं महाराज? श्री मां
ठाकुर की महासमाधि के बाद माँ स्वयं को असहाय अनुभव कर रही थीं
काशीपुर त्यागे जनो प्रस्तुत होइया छिले श्री मां काशीपुर त्याग के लिए प्रस्तुत हुई है भक्त प्रवर बलराम बाबू सादर आह्वाने त छ भाद्रो बकाले तहार गहे गमन कर ले भक्त प्रवर बलराम बाबू के सादर आह्वान से उन्होंने छो भाद्र दोपहर को शाम को उनके घर में उनके गृह में गमन किया बलराम मंदिर में पधारी ठाकुर अदर्शन एवं निज निह निह सहायता अवस्थार कथा भाबिया तखन अत्यंत कातर होइया पिया छिले इहा सहजे बुझते पारा जाए ठाकुर के अदर्शन से अर्थात कि ठाकुर की महासमाधि से और अपनी स्वयं की निसहाय अवस्था की बात सोच कर के बात के बारे में सोच करके वह उस समय अत्यंत कातर हो पड़ी होगी। यह हमको सहज से ही समझ में आता है। हम सहज रूप से अनुमान कर सकते हैं। देखिए कातर होने का क्या अर्थ है? हमको तो पता ही है जब हमारे सामने कोई बड़ी चैलेंज आ जाती है और फिर हम इसका मुकाबला कैसे करें या तो फिर इसके सामने कैसे टिके रहे यह जब उत्तर नहीं मिलता है तब मनुष्य एक दयनीय परिस्थिति में आ जाता है। तब उसे लगता है कि मेरा कोई नहीं है। मैं अकेला हूं जिसको डिसएंपावरमेंट कहते हैं इंग्लिश में। कि मेरी सहाय करने वाला कोई नहीं। मैं तो कमजोर हूं। तो इतनी बड़ी आप के सामने विपद के सामने मैं कैसे टिकूंगा? मृत्यु ही है शायद। इसका एकमात्र बचाव इससे यदि निकलना है तो मृत्यु ही है। बहुत सारे लोग जो आत्महत्या करते हैं तो इसके पीछे का यही कारण है कि उनको ऐसा लगता है कि वे अकेले हैं और जो सामने मुसीबत आन पड़ी है उसके सामने ना ही वह अपने से कुछ खुद कुछ कर सकते हैं ना ही उनको सहाय करने के लिए कोई
पहले भक्त भगवान का हाथ पकड़ता है; फिर ऐसी घड़ी आती है जब भगवान स्वयं भक्त का हाथ थाम लेते हैं, और तब उसके गिरने का भय नहीं रहता
है। किंतु देखिए हमको तो यह भी पता है कि कुछ क्षण भर के लिए श्री श्री मां यदि कातर हुई भी होंगी यदि इस तरह की एक दयनीय अवस्था में वो आई भी होंगी किंतु फिर जिस तरह दो चीज है एक तो ठाकुर ने दर्शन परंपरा प्रारंभ कर दी है वह एक भरोसा है दूसरा है कि देखिए आध्यात्मिक जीवन यदि आप लीड करते हैं तो मोमेंटरीली आपको ऐसा लगेगा कि अरे मैं अकेला हूं। अरे मैं असहाय हूं। अरे मैं हेल्पलेस हूं। कुछ समय के लिए ऐसा लगेगा। किंतु यदि आप प्रतिदिन जब ध्यान करते जाते हैं तो देखिए कि धीरे-धीरे करके ईश्वर है। यह बात हमको पक्का कन्विक्शन हो जाएगा। ईश्वर सिर्फ मुंह से बोलने के लिए, किताबों में पढ़ने के लिए, सत्संग में सुनने के लिए मात्र नहीं है। ईश्वर हमारा हाथ पकड़ कर के हमारे जीवन में हमारे साथ-साथ चल रहे हैं। हमको आत्मश्रद्धा और हमको भरोसा दिलवाते हैं। ठाकुर की वह बात कि बच्चा यदि पिताजी का हाथ पकड़ करके चलता है तो बच्चे की ग्रिप तो कमजोर होती है तो हो सकता है कि उसकी ग्रिप खुल जाए उसका हाथ खुल जाए और वह गिर जाए किंतु पिताजी स्वयं बच्चे का हाथ पकड़ करके चलते हैं तो पिताजी की ग्रिप तो स्ट्रांग होती है। वह खुलने वाली नहीं है। बच्चा गिरने वाला नहीं है। तो देखिए कि अपनी साधना में भी दो स्टेजेस आते हैं। प्रथम स्टेज में है कि हमने ईश्वर का हाथ पकड़ा है। इस अर्थ में कि हम अभी प्रवर्तक ही है। अभी तो हम साधक ही हैं। हम आराधना कर रहे हैं। हम यह स्वीकार कर रहे हैं। मुंह से तो बातोंब बातों में तो आचरण में भी लाने का प्रयास कर रहे हैं कि हां ईश्वर है और ईश्वर प्राप्ति जीवन का सर्वस्व है। किंतु देखिए साथ-साथ में ही क्या होता है कि जीवन में और भी तो 10 रिस्पांसिबिलिटीज है और भी तो 10 चीजें हमारा अटेंशन खाने को बैठी है। तो सब समय थोड़ा सा भी मैं ईश्वर का नाम लेने का प्रयास करूंगा। अभी मोबाइल में कुछ नोटिफिकेशन आ रहा है। फिर से मैं ईश्वर का नाम लेने का प्रयास करूंगा। बाहर से कोई चिल्लाएगा। यह दूध आ गया है ना कि न्यूज़ पेपर आ गया है ना कि कोई काम वाली बाई आ गई है और थोड़ा सा मैं बैठने को प्रयास करूंगा। कोई अपना रिलेटिव है वो बच्चा है कोई चिल्लाएगा तो क्या है कि सब समय हमारा अटेंशन भले ही चाहे हम बैठे हैं ध्यान करने को 10 चीजों में लगा रहता है। तो अभी बात ऐसा है कि संसार ले बैठे हैं तो यह सब चीजों की रिस्पांसिबिलिटी तो लेनी ही होगी। किंतु ठाकुर क्या कहते हैं? जब दांत का दर्द होता है तब आप काम दुनिया भर का करते हैं किंतु अटेंशन है दांत की ओर। तो वैसे ही वह काम वाली बाई वह शहर में आकर के अपने जो जिसके घर काम करती है उसके लड़के को मेरा राम मेरा हरि कह करके उसका जतन तो करती है किंतु हृदय में उसको पक्का पता है कि उसका खुद का लड़का वही गांव में रह रहा है। वही उसका लड़का है और वह उसी की मां है। ये शहर में जो जिसके घर काम करती है उसके बच्चे को जतन लालनपालन कर तो रही है किंतु उसको पक्का पता है कि यह बच्चा थोड़ा सा बड़ा हो जाएगा तो फिर मैं कौन और तुम कौन ऐसा बोल के उसके साथ में पूरा नाता कट कर देगा तो क्या है कि यह संसार में भी रहना है भले किंतु ईश्वर के प्रति जो एक संपूर्ण रूप से अपना मन धावित होना चाहिए एक कन्विक्शन होनी चाहिए। वह इजीली आती नहीं है और वह जब आएगी तब वह फेस चेंज हो जाएगा। अभी तक हमने ईश्वर का हाथ पकड़ा था। हम साधन भजन कर रहे हैं। हम ईश्वर को पुकार रहे हैं। हम अपने को कन्विंस कर रहे हैं कि हां मैं अकेला नहीं हूं। हां, मैं हेल्पलेस नहीं हूं। हां, मैं कमजोर नहीं हूं। ईश्वर है मुझे सहायता करने के लिए। यह सोच तो रहे हैं किंतु हमने ईश्वर का हाथ पकड़ा है। फिर एक क्रिटिकल मास एक ऐसा आएगा, एक ऐसा टर्निंग पॉइंट आएगा अपनी साधना में कि फिर ईश्वर हमारा हाथ पकड़ेंगे। अपनी ईश्वर के ऊपर में जो श्रद्धा है या तो फिर ईश्वर के अस्तित्व के बारे में अपना जो कन्विक्शन है वह इतना कंप्लीट हो जाएगा कि हमको लगेगा कि अभी ईश्वर ने मेरे हाथ पकड़े हैं। इसके बाद का जो जीवन है वह देखेंगे कि हृदय में हमेशा सुख शांति बनी रहेगी। क्योंकि हां ईश्वर के सानिध्य में रहते हैं। ईश्वर की गोद में खेलते हैं। ईश्वर के ईश्वर का आशीर्वाद हमारे पे है। तो वो कन्विक्शन आ जाएगी। देखिए यह पूरा जो यात्रा है अपना यह कन्विक्शन की ओर ही जाने का है। कन्विक्शन नहीं है तो फिर आध्यात्मिक जगत के जो उच्च आयाम है यह भाव होना समाधि होना ज्ञान प्राप्त होना मन में से संपूर्ण वासनाओं का क्षय होना मन के भीतर में चित्त प्रसाद मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा का उदय होना मन के भीतर में जो पंच कक्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश वो दग्ध बीज हो जाना यह जो सब साधना के उच्च आयाम है वह तभी सार्थक होंगे जब कि ईश्वर है। यह कन्विक्शन हमको हो जाएगा। यदि साकार मार्ग फॉलो करते हैं तो ईश्वर है यह कन्विक्शन और यदि निराकार मार्ग फॉलो करते हैं तो [गला साफ़ करने की आवाज़] आत्मन है ब्राह्मण है वो कन्विक्शन कि मेरा सही नेचर यह कामना वासनाओं से गिरा यह भय आहार निद्रा भय मैथुन यह जो फिजिकल जो प्रॉपर्टीज है हमारी इससे बंधा हुआ इस बाउंड्री से बंधा हुआ एक छोटा सा जीव नहीं मैं महेश्वर स्वयं हूं। कैलाश पर्वत के ऊपर में निर्विकल्प समाधि में मैं ही विराज कर रहा हूं। तो वो जो कन्विक्शन है कि आत्मन है मेरा सही स्वभाव मेरा ट्रू नेचर। ब्राह्मण है मेरा ट्रू नेचर। वो कन्विक्शन आइदर साकार साधना कर रहे हैं ना कि निराकार साधना कर रहे हैं। दोनों क्षेत्र में यह कन्विक्शन चाहिए। उसके बाद में क्या होगा? यदि महाशोक आन पड़ता है पति का मृत्यु पत्नी के लिए कितना बड़ा शोक है पत्नी का या फिर संतान का मृत्यु पुरुष के लिए कितना बड़ा शोक है तो इस शोक से हो सकता है कि कुछ दिन वह कातर रहे उस शोक से हो सकता है कि कुछ दिन वे लोग हेल्पलेस फील करें किंतु बाद में ही भीतर से यह जो कन्विक्शन है इट विल किक इन वह फिर अवेक हो जाएगी, जागृत हो जाएगी और अपना जो सही स्वभाव है वह फिर देखिए कि किस तरह से हमारे जीवन को सुख और शांति से भरपूर कर देता है। यह आई थिंक अक्षय के मृत्यु के समय ना कि वही मोस्ट प्रोबेबबली ठाकुर के भाई का जो पुत्र था अक्षय दक्षिण दक्षिणेश्वर में ही उसका देहांत हुआ था। तो ठाकुर पहले तो हंसते हैं और फिर रोते हैं और फिर कहते भी हैं कि हृदय को जैसे गीले कपड़े को गीले गमछे को आप इस तरह से स्क्वीज़ करते हैं पानी निकालने के लिए तो कैसा होगा गमछे को क्या फील होता होगा? एग्जजेक्टली ऐसा लगा जैसे मेरे हृदय को कोई स्क्वीज़ कर रहा है। इतना पेन मुझे हो रहा था। तो ठीक है। इसके बाद में ठाकुर अपनी मां चंद्रामणि देवी उनको सांत्वना देने को गए। किंतु देखा कि चंद्रामणि देवी एकदम शांत होकर के बैठी है। वो ऊपर से अपने बच्चे अपने लड़के रामकृष्ण को सांत्वना दे रही है। तो क्या है कि चंद्रामणि देवी का यह जो शोक और ताप से अतीत उर्ध्व उठ जाना। क्योंकि अभी उनके मन में कन्विक्शन हो गया है कि ईश्वर ही जीवन सर्वस्व है। ईश्वर म सही सही में वो अस्तित्व ही एकिस्ट उनका सही-सही में अस्तित्व है। ये अब जैसे देखिए दक्षिणेश्वर में आप रहेंगे तो दक्षिणेश्वर का जो व्यवस्थापक कहो कि मालिक कहो प्रैक्टिकली स्पीकिंग मथुर बाबू ही था। अभी मथुर बाबू आपको नहीं भी दिख रहे हैं। उनका जो प्रेजेंस है सब जगह पर फील होगा। यदि आप कुछ गलत कार्य करना चाहते हैं ये मंदिर में से गहनों की चोरी करना चाहते हैं तो भय यह रहेगा कि मथुर बाबू को पता चलेगा को तो हमको दंड देगा। यदि किसी के साथ में झगड़ा करना चाहते हैं, कोई अनैतिक कार्य करना चाहते हैं, सब समय यह डर रहता है कि अरे यह मथुर बाबू आएंगे तो ऐसा कहेंगे। अभी भी देखिए हमारे जीवन में पुलिस के साथ में हमारा ऐसा कोई नाता नहीं है। किंतु यदि हमने कुछ गड़बड़ किया तो मन के भीतर में वह भय रहेगा कि पुलिस वाले आएंगे पकड़ करके ले जाएंगे। तो यह भय जो है यह भय हमको हमेशा सीधे रास्ते से चलाता है। अभी भय क्यों है? क्योंकि हमको पता है कि यह पुलिस वाले हैं। हमको पता है कि यह मथुर बाबू है। हम जिस ऑर्गेनाइजेशन में जिस जगह पर रहते हैं वहां पे एक ऑथॉरिटी फिगर है। भले ही उस ऑथॉरिटी फिगर के साथ में हमारा कोई लेनदेन ना होता हो। रेयरली उनके साथ में वार्तालाप होता हो। रेयरली उनका कोई एनकाउंटर उनके साथ में कोई मुलाकात होती हो। किंतु वह है वह दृढ़ हमको धारणा है। हमको पक्का पता है। बोलकर के हम लोग भय के मारे सीधे रास्ते से चलते हैं। तो ईश्वर है वो कन्विक्शन यदि हमको हो जाएगी तो देखेंगे कि अपना पूरा जीवन बदल जाएगा। अदरवाइज देखिए कि मान लीजिए आप ऐसा कीजिए कि भारत में कल से पुलिस वाले नहीं रहेंगे। ऐसा डिक्लेअ कर दीजिए। तो देखिए कि विदिन वन वीक इस समाज में किस तरह की अराजकता फैल जाती है। किस तरह का केओस फैल जाता है। यह अमेरिका जिसको हम इतना एडवांस कंट्री समझते हैं तो वहां पे दो-तीन बार आई थिंक 30 40 इयर्स एगो ना कि ऐसा ही कुछ हुआ है कि माने बिजली चली गई है। पूरे गांव में पूरे शहर में ऐसा इलेक्ट्रिक आउटेज हो गया है। कोई फौल्ट हुआ होगा पावर जनरेशन में तो पूरे शहर में बिजली चली गई। तो जैसे ही बिजली गई है साथ-साथ में ही लूटफाट प्रारंभ हो गई है। यह जो स्टोर है यह जितने भी यह शॉप्स है, वेयर हाउस है, सब जगह पे लोग जाकर के लूट कर रहे हैं। तो माने जैसे ही बिजली गई, जैसे ही अंधेरा हुआ, साथ-साथ में ही भीतर का जो हैवान है, भीतर का जो पिशाच है, वह जग उठा और फिर उसने यह अनैतिक कार्य करना शुरू कर दिया। तो वो कंट्रोल में कैसे रहता है? इलेक्ट्रिसिटी है। एक सिविल लाइफ जो है वह नॉर्मल रूप से चल रही है। तो हम भय के मारे तो सीधे रास्ते पर चलते हैं। किंतु जिस क्षण यह सिविल लाइफ ऐसा लगा कि वह नहीं है तो साथ में ही भीतर का जितना भी कचरा है फट करके वह बाहर आ जाएगा। तो देखिए कि आप उसका रिवर्स सोच लीजिए। ईश्वर है। यह कन्विक्शन है। यदि पुलिस है इस कन्विक्शन से ज्यादातर लोग भय के मारे सीधे रास्ते पर चलते हैं। तो उसका रिवर्स कन्विक्शन जो है ईश्वर है। यह कन्विक्शन यदि हो जाएगा तो हमारा जीवन कितना शांति और आनंद से भर जाएगा। किस तरह के संतोष से भर जाएगा। किस तरह की आत्मश्रद्धा शरणागति से भर जाएगा। सो वो कन्विक्शन है। वो कन्विक्शन की ओर जाना ही जैसे कि आध्यात्मिक जीवन का गेटवे है। दो फेज साधक
माँ शुरू से जानती थी कि वह वास्तव में कौन है
के जीवन में ठाकुर ने कहा ना कि एक तो है प्रवर्तक जो कि यह सोचता है कि ईश्वर है। किसी को सलाह मांगता है किसी से कि महाशय आपने ईश्वर को देखा है कि नहीं। तो वह हो गया प्रवर्तक का लक्षण। किंतु फिर एक बार शिक्षक मिल जाते हैं, गुरु मिल जाते हैं। नरेंद्र दक्षिणेश्वर में आकर के ठाकुर के सुपरविजन के नीचे ठाकुर के मार्गदर्शन हेठ वो साधना करना शुरू कर देता है। तो फिर वह साधक हो जाता है। फिर जब इसी नरन को निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है तो वह सिद्ध हो जाता है। और फिर वही जगतगुरु स्वामी विवेकानंद कि वह वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में खड़े होकर यह कहते हैं कि सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका तो वो सिद्धों के सिद्ध हो जाते। किस हिसाब से कि जीवन के जितने भी पहलू है कर्म साधना के जितने भी आयाम है कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान चारों में उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर दी है तो सिद्ध हो के सिद्ध हो जाते हैं किंतु स्वामी जी के जीवन में वो टर्निंग पॉइंट कहां पर आया जिस दिन उन्होंने मां काली को स्वीकार किया था ठाकुर की खुशी उस दिन जैसे कि वो छलक उठती थी कि नरन काली मैंने छे न काली मैनेज नरन ने मां काली को स्वीकार किया है। नरेंद्र ने मां काली को माना है। तो वह जो कन्विक्शन जिस दिन हो गया पहले देखिए नरेंद्र के भीतर में स्वामी विवेकानंद के भीतर में युवावस्था से ही बचपन से ही धर्म के जो बीज थे वह तो थे ही थे। वो उनका जो सत चरित्र है, उनकी जो उदार हृदयता है, उनकी इंद्रियों के विषयों के प्रति जो एक विराग है, वह तो पहले से ही था। उन सब में कोई प्रॉब्लम नहीं है। किंतु जिस जब तक उन्होंने मां काली को स्वीकार नहीं किया था तब तक क्या होता था कि उनको वो जो उच्च आयाम तक जाना है एक के बाद एक शिखर सर करना है वह तब तक नहीं होंगे जब तक वह मां काली को स्वीकार नहीं करेंगे। ये हम लोगों को सबके जीवन में देखिए कि वो टर्निंग पॉइंट को आना है। हमको यह भीतर से कन्विक्शन होना है कि ईश्वर है या आत्मन है या ब्रह्मन है। व्हाटएवर आवर बिलीफ इज यह बिलीफ है। यह कन्विक्शन जब तक नहीं होगा तब तक हम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। यहां पर देखिए भले ही चाहे ठाकुर की महासमाधि ठाकुर का अदर्शन ठाकुर की लीला प्रकट लीला अवसान ये एक ऐसी इस तरह की शोक जनित घटना है कि मां कुछ दिनों तक तो कातर हो जाएगी किंतु पता है कि मां का जो कन्विक्शन है कि हां ईश्वर है यह इतना दृढ़ है कि धीरे-धीरे करके देखेंगे कि वो भीतर से जो असहायता जो महसूस हुई थी उनको जो हेल्पलेसनेस उनको महसूस हुई थी वह ज्यादा दिन तक नहीं टिकने वाली। इसके बाद में वही सब विवरण आता है कि वह जो क्रिटिकल पीरियड था मां के जीवन का कि जब वह असहाय महसूस करती थी प्रारंभ से और फिर वह अंत आया जबकि यह असहायता जो है वह ईश्वर पे संपूर्ण श्रद्धा में परिणत हुई। अब कहने का यह आशय नहीं है कि मां को ईश्वर जिस तरह से नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया था वह एक टर्निंग पॉइंट था नरेंद्र के जीवन में। मां के जीवन में इस तरह का कोई टर्निंग पॉइंट हमको नहीं दिखता। अ मैं इस तरह से कभी एनालिसिस नहीं करूंगा कि मां के जीवन में आध्यात्मिक जगत में ऐसे कोई टर्निंग पॉइंट आए हैं। क्योंकि मुझे तो ऐसा लगता है कि मां की ई मां काली पर श्रद्धा मां काली का अस्तित्व है। यह दृढ़ धारणा वो बिल्कुल ही बचपन से ही थी। या तो कहेंगे कि जब से होश संभाला जब से श्री रामकृष्ण देव के साथ में उनका विवाह हुआ पांच छ साल की उम्र में तभी से थी तो मां के जीवन में वो टर्निंग पॉइंट नहीं है कि हां पहले वो स्किप्टिक थी और अभी उन्होंने स्वीकार किया है। बस उनके जीवन में जो गहराई जिस गहराई में वह पहुंच गई थी साधना की आध्यात्मिकता की उससे और ज्यादा गहन गहराई में जाना है। जिस शिखर पर वो ऑलरेडी विराजमान थी उससे उच्च से उच्चतर शिखरों की ओर उनको जाना है। तो वह थी मां की जर्नी नहीं कि पहले स्केप्टिसिज्म था और फिर कन्विक्शन हुआ। कन्विक्शन पहले ही पहले से ही था। कन्विक्शन दृढ़ से दृढ़ दृढ़तर से दृढ़तम होता गया है। डीपर एंड डीपर होता गया है। फर्मर एंड फर्मर होता गया है। स्ट्रंगर एंड स्ट्रंगर होता गया है। दैट इज मदर्स जर्नी। तो और ऑफकोर्स सबस्ट्रेटम तो वही है कि मां स्वयं जगदंबा है। वही मां काली जिनकी ठाकुर आराधना करते थे काली मंदिर में वो मां काली स्वयं मां शारदा का देह धारण करके अवतरण किया है। वही आध्या शक्ति वही जगदंबा वही दुर्गा वही काली वही बगला वही शक्ति तत्व जो है मां का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। किंतु हमको यह भी पता है लीला प्रसंग पढ़कर के भी मां के खुद के जीवन के प्रसंगों को देख कर के भी कि सब समय यह अनुभूति रहना कि मेरा वो देखिए सही नेचर क्या है वह भी तो दो लेयर है ना हमारे लिए एक ही लेयर है यह तो एक मेरा छोटा सा देह है काम कांचन में आबद्ध मेरा मन है और इसके परे है मेरा सही स्वरूप कि मैं आत्मन हूं ब्राह्मण हूं हूं या तो फिर ईश्वर ईश्वर का अस्तित्व है। यह तो मेरे दो ही लेयर हैं। मां के जीवन में देखेंगे कि तीन लेयर है। एक तो है कि यह पंचमहाभूत का देह है जिसकी लिमिटेशंस है। बार-बार व्याधिग्रस्त मां हो जाती है और इसके लिए सिंह वाहिनी के सामने हत्या देकर के पड़ी रहती है। वो एक पंचमहाभूत का देह का एक लेयर है। इसके परे जिस तरह से हम लोगों के साथ में है कि आत्मन या तो ईश्वर है यह कन्विक्शन है और फिर एक डीपर लेयर यह है कि वो स्वयं वही आत्मन वही जगदंबा आध्या शक्ति वो स्वयं है तो मां के जीवन का और ठाकुर के जीवन में हमको डीपर एंड डीपर लेयर्स दिखते हैं जो कि हम सामान्य जीव के भीतर में नहीं होते। और यहीं पर द्वैत और अद्वैत का यह जो एक डिलीशियस कंट्रास्ट कंपेयर कहो ठाकुर ने जो स्वामी जी को अपनी मृत्यु शैया पे कहा था कि जय राम जय कृष्ण से राम कृष्ण किंतु तोर वेदांते दिख दिए ना तो जो राम है जो कृष्ण है वही यह राम कृष्ण है किंतु इस अर्थ में नहीं कि वेदांत क्या कहता है कि सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन अहम ब्रह्मास्मि तत्व मसी या तो फिर अह यह जो वेदांत का जो महा वेदांत का जो प्रतिपादित सिद्धांत है जीव ब्रह्म ऐक्य जीव ब्रह्मण ही है। इसके अलावा और कुछ नहीं। तो वेदांत कहता है कि इवन जो कोई भी व्यक्ति इस जगत में है मनुष्य का देह धारण किया है तो उसके भीतर में ब्रह्म भाव छुपा हुआ है। बस वह माया का आवरण दूर कर दे। अज्ञान के आवरण को हटा दे। भीतर का जो ब्राह्मण है जागृत हो जाएगा। इस अर्थ में नहीं कहते दूसरे अर्थ में कहते हैं कि जो एक एंटिटी है जिसने कि श्री राम का देह धारण किया था। वही एंटिटी कि जिसने यह श्री कृष्ण का देह धारण किया था। वही एंटिटी इस टाइम श्री रामकृष्ण का देह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुई है। सो वी डू नॉट नो राइट कि जैसे ठाकुर कहते हैं ना साकार निराकार और आरोकत्व की ईश्वर कैसे हैं तो ईश्वर साकार भी है ईश्वर निराकार भी है और भी क्या-क्या है वो हमारी बुद्धि के परे है तो ये अवतार तत्व एक ऐसा है कि उसको लेकर के हम एंडलेस डिबेट कर सकते हैं। अवतार को आप ईश्वर के रूप में देखें तो क्या है? उनका अवतारत्व जो है मनुष्य देह धारण करना वो सार्थक नहीं होगा। वो जैसे भगवान शिव भगवान है, भगवान विष्णु भगवान है, मां दुर्गा है, वो वो भी एक ईश्वर है। जिनको कि हम गॉड या गॉडेस कहते हैं। तो क्या है कि वे लोग कोई मनुष्य की लिमिटेशन से मनुष्य की पंच ज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय वो वाली पंचमहाभूत का देह उस लिमिटेशन से वह बंधे नहीं है। वह कॉस्मिक पावर है। उनकी उपस्थिति पृथ्वी पे भी वे लोग अपना कार्य कर सकते हैं और वो जो एंड्रोमडा गैलेक्सी है वहां पर यदि जीवन होगा किसी ग्रह पे तो वहां पे भी वो एक्ट कर एक्शन ले सकते हैं। ये पूरे ब्रह्मांड को छोड़कर के जैसे साइंटिस्ट कभी-कभी कहते हैं पैरेलल यूनिवर्स है तो इस यूनिवर्स में भी एक्शन ले सकते हैं। इसके परे वाले यूनिवर्स में भी एक्शन ले सकते हैं। पैरेलल यूनिवर्स में। सो दे आर कॉस्मिक पावर्स। किंतु अवतार जो है अवतार मनुष्य का देह धारण करके आते हैं। तो हम उनको ईश्वर के रूप में देखेंगे तो मनुष्य का देह धारण करने का कोई प्रयोजन नहीं रहता और मनुष्य के रूप में देखेंगे तो उनके भीतर की वो जो स्पेशल एक शक्ति है उसको हम नजरअंदाज करना शुरू कर देंगे। जैसे कि मां को ही किसी किसी ने कहा गुरु पत्नी है तो इतना सम्मान उनको क्यों देना है? तो वो दोनों ओर से अवतार ना ही मनुष्य है ना ही ईश्वर है। इट्स अ थर्ड कैटेगरी ऑल टुगेदर जिसमें कि ईश्वर और मनुष्य दोनों के गुणों का संयम है। दोनों के गुणों का संगम है। सो देखिए कि यह मां
ठाकुर की महासमाधि के बाद माँ का विरह-शोक
शारदा कुछ समय के लिए तो कातर हो पड़ी थी। असहाय हेल्पलेस फील कर रही थी। किंतु फिर इसीलिए तो यह डायरेक्ट डिसाइपल त्यागी संतान ठाकुर के उनको लेकर के मां को लेकर के तीर्थ यात्रा के लिए जाते हैं। तो कुछ समय के लिए अत्यंत कातर हो पड़ी थी। यह बात हम सहज रूप से समझ पाते हैं। अनंतर श्री श्री ठाकुर शाश्वत चिन्मयो विग्रह साक्षात्कार पया एवं संतान गणे मुखे मा डाक शूनिया तनी किंचित शांतना पया छ किंतु इसके बाद में ही कुछ समय के बाद में ही श्री श्री ठाकुर के शाश्वत चिन्मय विग्रह का साक्षात्कार प्राप्त करके शाश्वत और चिन्मय विग्रह अर्थात कि वही पंचमहाभूत का देह नहीं शाश्वत और चिन्मय इस तरह का जो देह है उसका साक्षात्कार पाकर करके एवं और संतान गण के मुंह से मां पुकार सुनकर के उन्होंने थोड़ा थोड़ी सी सांत्वना प्राप्त की थी। किंतु से दुरबी दुरबी दुर्बिश बिरह तो सहजे भूली बार ना किंतु यह जो इस तरह का विरह जो कि इतना डीप था इतना पावरफुल था वह तो सहज रूप से आप भूल नहीं पाएंगे प्रति मुहूर्ते प्रति कारजे प्रति चिंताय श्री माय केवल ही मने पड़ते छिलो जे ठाकुर प्रकट विग्रह आर नाई प्रत्येक मुहूर्त में प्रत्येक कार्य में प्रत्येक चिंता में अर्थात कि प्रत्येक विचार में श्री मां को बस यही मन में आ रहा था कि ठाकुर का प्रगट विग्रह अभी नहीं है। देखिए यह हो गया प्रगट विग्रह और वो था शाश्वत चिन्मय विग्रह। ये जो वैष्णव परंपरा के सब शब्द यहां पर गंभीरानंद जी ये ले आते हैं। प्रगट विग्रह अर्थात कि यही पंचमहाभूत का स्थूल मटेरियल मटेरियल बॉडी और शाश्वत चिन्मय विग्रह अर्थात कि स्थूल देह धारण करके चिन्मय शाश्वत देह से ठाकुर भक्तों के हृदय में विराजित होकर के नित्य लीला कर रहे हैं। वो विग्रह तो यहां पे पहले तो दोनों ओर से शोक भीतर में जो शोक है इतना तीव्र है इतना गहन है कि वह शोक मां को सहज रूप से छोड़ने वाला नहीं। यहां पे आध्यात्मिक जिस ऊंचाई पर मां पहुंची है, उसका जो एक आध्यात्मिक आनंद जो है, आध्यात्मिक शांति है, वह भी पैरेलली विराज कर रही है। कितना कि इस समय के मां के मन को यदि हम समझने का प्रयास करें कितना कॉम्प्लिकेटेड इमोशंस हमको दिखता है। दोनों इमोशंस पैरेलली चल रही है। पैरेलली उनका समांतर अस्तित्व है। एक तो गहन शांति पूर्ण आनंद आध्यात्मिक जीवन का और दूसरी ओर है ठाकुर के अदर्शन का शोक प्रत्येक कार्य में कि हां ठाकुर जब थे तो वह इस तरह से बात करते थे ठाकुर जब थे तो मैं यह समय हो गया है ठाकुर के लिए आहार बनाने खाना बनाने का वही जगदात्री पूजा जब तो श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा की मां उन वो जब तक जीविता थी तब तक वह जगधात्री पूजा का सब आयोजन करती थी। किंतु जब उनका देहांत हुआ फिर मां शारदा याद करती है कि अच्छा यह जगत धात्री पूजा का समय आ रहा है। अभी तो एक दो महीने तीन महीने बाकी है। तो इस समय मेरी मां ऐसा करती थी। क्या करती थी? तो वह जो चावल वगैरह है धान जो है उसकी व्यवस्था करती थी। फिर जब एकद सप्ताह जाएंगे फिर से मां शारदा यह बात याद करेगी कि हां जब मेरी मां थी जीवित तब इस समय वह दिए की वाट बनाती थी। बोलकर के वह खुद दिए की वाट बनाना शुरू करेंगे। यानी कि उनकी माता उनकी माताजी का तो देहांत हो चुका है। किंतु मां शारदा को प्रत्येक दिन प्रत्येक सप्ताह यह बात याद आती है कि मेरी मां जब जीवित थी तो इस समय पूजा के लिए यह तैयारी प्रारंभ कर देती थी। तो यहां पे भी कि ठाकुर की महासमाधि तो हो चुकी है। किंतु इस समाधि के बाद के जो कुछ दिन है अभी मां सुबह से ही तो मां का जीवन तो ठाकुर को ही समर्पित है। सुबह को उठकर के ही सबसे पहली चिंता ठाकुर की करनी है। सोने से पहले आखिरी चिंता ठाकुर की करनी है कि यह ठाकुर के लिए पथ्य बनाने का डाइट फूड बनाने का समय हुआ है। ठाकुर अभी शौच के लिए जाएंगे तो नहबत के सामने से पसार होंगे। वह उस समय हो सकता है ठाकुर मां को कुछ कहे कि अरे यह गेस्ट आए उनके लिए खाना बना दो या हो सकता है मां को यदि ठाकुर को कुछ मैसेज देना होगा। फिर जब खाना प्रस्तुत हो जाता है तो वह आहार का थाला लेकर के मां ठाकुर के कमरे में जाती है। ठाकुर के साथ बात करती है। तो पूरा दिन प्रत्येक सेकंड जो है प्रत्येक घड़ी जो है प्रत्येक क्षण है वो ठाकुर की चिंता करने में, ठाकुर की संभाल लेने में, ठाकुर के लिए कार्य करने में, ठाकुर की केयर करने में मां बिताती थी। तो अभी ठाकुर चले गए हैं। चल बसे हैं। तो फिर वह तो वही मां को याद आता होगा। अभी यह ठाकुर के लिए खाना बनाने का समय हुआ। अभी यह ठाकुर के लिए खाना थाले में सजा करके उनके कमरे में जाकर उनको खिलाने का समय हुआ। अभी यह ठाकुर के लिए यह काम करना है। अभी ठाकुर के लिए यह काम करना है। प्रत्येक क्षण जिनके साथ में आपने पूरा जीवन बिताया है, वह यदि नहीं रहते, प्रत्येक क्षण आपको यही तो विचार आते रहेंगे कि हां अभी यह करना है। हां, अभी यह करना है। तो क्या है कि देखिए कि यह जो शोक है मां के मन का वैसे तो एक ओर है ईश्वरीय स्वभाव मां का गहन आध्यात्मिक अनंत प्रशांति और दूसरी ओर प्रत्येक क्षण पे यह शोक प्रगटित होता रहता है।
ठाकुर-वियोग के गहन शोक से माँ को उबारने के लिए उन्हें तीर्थयात्रा पर ले जाने का निर्णय लिया गया
इहा भक्तों देरो अविदितो छिलोना यह बात भक्तों को भी पता नहीं थी ऐसा नहीं अविित विदित अर्थात कि पता होना जानकारी होना अविदित अर्थात कि नहीं पता होना तो नहीं पता थी ऐसा नहीं है भक्तों को अत ए जुगेज जुगे भगवान विविध रूप धारण पूर्वक जे विभिन्न क्षेत्र के तीर्थ परिणत करिया छे एवं जे शकल स्थले शय अभिस्मरणी चकि चंकितो कोरिया गया छ तथा ता नित्या भाव भाबेर निदर्शन पायले व्यक्ति को तो विच्छेद दुखेर अनेकटा लाघव होते पारे ये पूरा जो सेंटेंस है इससे भी और भी लंबा है पहले इतना पढ़ लेते हैं पूरा दो पैराग्राफ जितना लंबा सेंटेंस है भक्तों को ऑलरेडी पता था कि श्री मां के हृदय में यह शोक गंभीर रूप से बैठा हुआ है। इसलिए युग युग में भगवान विविध रूप धारण करके जिस विभिन्न क्षेत्र को तीर्थ में परिणत किया है और जो सभी स्थानों में अपनी अविस्मरणीय स्मृति चीर अंकित करके गए हैं। वहां पे उनके ईश्वर के नित्य आविर्भाव का निदर्शन यदि पाएगा कोई व्यक्ति तो यह व्यक्तिगत विच्छेद दुख बहुत हद तक लाघव होगा कम होगा कॉम्प्लिकेटेड संस्कृत किंतु अर्थ बड़ा सहज है। युग युग में ईश्वर जन्म ग्रहण करते हैं। युग युग में ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। पृथ्वी पर अवतरित होने के बाद में जहां-जहां उन्होंने लीला की है, वह स्थान लीला क्षेत्र तीर्थक्षेत्र में रूपांतरित होते हैं। उस तीर्थ क्षेत्र में उस अवतार की लीला जैसे कि वहां की भूमि में वहां की मिट्टी में चीर अंकित हो चुकी है। हमेशा के लिए वहां की मिट्टी के भीतर में ईश्वर की वह लीला अवतार की वह लीला उस भूमि में समाहित हो चुकी है। यदि भक्त उस तीर्थ क्षेत्र गमन करता है, तीर्थ निवास करता है, तीर्थ वास यदि करता है, तो उस भक्त के हृदय का जो शोक है, ताप है, दुख है, वह धीरे-धीरे करके कम होता है। क्योंकि अभी मैं अपने घर में बैठकर ईश्वर को पुकारूं तो क्या है कि मेरी जितनी शक्ति है उतना ही मैं पुकार पाऊंगा। किंतु यदि मैं बेलूर मठ जाकर के यह जो श्री श्री रामकृष्ण देव का जो यूनिवर्सल टेंपल है मेन टेंपल जो है वहां पर बैठकर के मैं ठाकुर को पुकारूंगा तो वो तो फर्क जो है वो हमको एकदम क्लियरली दिखाई देगा। वहां पे जो जमझमाहट आध्यात्मिकता वो बैठी हुई है जमझमाहट आध्यात्मिकता जो केंद्रीभूत हुई है वो आध्यात्मिकता इजीली मेरे हृदय में प्रवेश करेगी। यहां पर मुझे जितनी जोर लगाना पड़ता है मेरे घर में बैठकर के उससे 10वें भाग का जोर लगा करके मैं उतना ही क्षमता आध्यात्मिक क्षमता प्राप्त कर सकता हूं। तो वह क्या है? तीर्थ का प्रभाव तो है ही है। दक्षिणेश्वर जाएंगे, वृंदावन जाएंगे, काशी जाएंगे, तिरुपति जाएंगे। यह मीनाक्षी मंदिर है। वहां जाएंगे। कन्याकुमारी यह राजा महाराज की यह जो भ्रमण की कहानियां है वह तो हमने एक बार देखा भी था कि किस तरह से मां कन्याकुमारी के मंदिर में मां मीनाक्षी के मंदिर में राजा महाराज जैसे ही प्रवेश करते हैं उनका देह जैसे कि कंपित हो रहा है और कुछ ही समय के बाद में वह समाधि में मग्न हो जाते हैं और राजा महाराज के साथ में जो साधु वगैरह गए थे वह राजा महाराज को घेर करके खड़े रह जाते हैं जिससे कि भीड़ में कहीं पर उनको धक्का ना लग जाए। तो जैसे ही इस तरह के मंदिर में राजा महाराज प्रवेश करते थे साथ-साथ में ही उनको उद्दीपना होती थी और वह समाधि मग्न हो जाते थे। श्री श्री ठाकुर स्वयं उन्होंने तीर्थ यात्रा की थी और ठाकुर की तीर्थ यात्राओं का वर्णन हमको लीला प्रसंग में पढ़ने को मिलता है कि किस तरह से सुवर्ण वो अन्नपूर्णा का दर्शन हुआ था। किस तरह से वह जो समाधि घाट है गंगा गंगा के किनारे काशी में उन्होंने देखा कि महादेव स्वयं जो मृत व्यक्ति है उसकी आत्मा को वहां कैलाश में ले जाते हैं। वो जो पूरा जो वर्णन है कि किस तरह से ठाकुर ने तीर्थ क्षेत्र में उद्दीपना होती है। वो एक बार वहां नदियां गए थे तो नदियां के आसपास में वहां पर मंदिर है। वह देखकर के ठाकुर को ऐसा कोई उद्दीपना नहीं हुई। तो ठाकुर कहते हैं लगता नहीं है कि यह महाप्रभु की लीला भूमि है। तो जो भी है वो थोड़ा सा डिसअपॉइंट होकर के नौका में बैठने को तो जाते हैं किंतु ये जगह थोड़ी सी परिवर्तित होती है। साथ में ही फट करके उनको उद्दीपन हो उठता है और फिर वो देखते हैं आकाश मार्ग से दो सुंदर बालक ऐसा दो हाथ उठाकर के जिस तरह से वैष्णव नृत्य करते हैं। चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन में जिस तरह से नृत्य करते हैं। दोनों हाथ ऊपर उठाकर के दो सुंदर बालक आकाश मार्ग से उनकी ओर धावित हो रहे हैं। और ठाकुर एलो रे एलो रे माने आया रे आया रे ऐसा चित्कार करके समाधि में मग्न हो जाते हैं। तो क्या है तीर्थक्षेत्र का जो पावर है हमको तो पता ही है मां और ठाकुर दोनों को तीर्थक्षेत्र में जाकर के कितना राजा महाराज तीर्थक्षेत्र में जाकर के कितना उद्दीपना होती थी। किस तरह की भाव समाधि में मग्न हो जाते थे। तो यहां पर भी गंभीरानंद जी कहते हैं कि युगे युगे भगवान विविध रूप धारण करके जिस विभिन्न क्षेत्र को तीर्थ में परिणत करते हैं और वह जब जगहों पे उनकी अविस्मरणीय स्मृति चिर अंकित करके गए हैं वहां पे उनके नित्य आविर्भाव का निदर्शन जब प्राप्त करता है भक्त तो वह विच्छेद दुख विच्छेद दुख कौन सा दुख विच्छेद दुख अर्थात कि अपना जो प्रिय पात्र है उनसे विच्छेद होना से उनका उनसे दूर होने से जो दुख होता है वो प्रिय पात्र से विच्छेद का जो दुख है बहुत हद तक कम हो सकता है लाघव हो सकता है एवं और ठाकुर व्यक्त लीलार शही तो घनिष्ठ भावे जित तो स्थान गुली होते किु दिन दूरश्वरिया थाकिले दुरजे शोको कििंचित उपशम होइते पारे और साथ में ही ठाकुर की व्यक्त लीला वह प्रकट लीला फिर यह जो प्रकट विग्रह और यह व्यक्त लीला सब वैष्णव शब्द अर्थात कि व्यक्त लीला अर्थात कि ठाकुर ने स्थूल देह में जो लीला की है वो लीला के साथ में जो घनिष्ठ रूप से जड़ित घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए जो स्थान है उस स्थानों से कुछ दिन दूर जाकर के रहने से उस दुर्जय शोक कैसा शोक दुर्जय जिस जय नहीं कर सकते हैं जिसको जय करना बड़ा ही मुश्किल है इसको कहते हैं दुर्जय शोक तो उस दुर्जय शोक का कुछ किंचित कुछ उपशम हो सकता है यह जिस शोक के ऊपर में विजय प्राप्त करना बहुत ही मुश्किल है इस तरह तरह के शोक का थोड़ा सा उपशम हो सकता है। थोड़ा कम हो सकता है। या ठाकुर की लीला के साथ में जुड़े हुए स्थान कौन से? तो वही दक्षिणेश्वर यही बलराम मंदिर यही बाग बाजार यही सिमुलिया स्ट्रीट यही तो सब कोलकाता की गलियों में ठाकुर वो घोड़ा गाड़ी में बैठकर के जाते थे। यही तो पूरा कोलकाता कि जहां की कण-कण में अवतार की चरण रज मिली हुई है। तो उसी कोलकाता से जहां पे कि ठाकुर की यह जो व्यक्त लीला है इतनी घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है कि यदि मां कोलकाता में रहेगी बलराम मंदिर में रहेगी दक्षिणेश्वर में रहेगी। काशीपुर में तो रहने का प्रश्न नहीं। वह तो भाड़ा मिट जाने से वह तो भाड़ा जैसे ही खत्म हो गया। वो तो उद्यान वाड़ी दे दी गई वापस। तो वहां पर तो रहने का प्रश्न नहीं किंतु जिस भी भक्त घती है दक्षिणेश्वर में रहती है सब तो ठाकुर की लीला के साथ में घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए स्थान है तो जब तक मां वहां पर रहेगी तब तक यह जो दुर्ज शोक है उसका उपश्रम होना मुश्किल है। तो दो तरह से विचार करके कि अ पूर्व अवतार का आगमन होने से उन्होंने जो दिव्य लीला करके गए हैं विभिन्न क्षेत्र में जिनको कि तीर्थ में परिणत करके गए हैं। उस तीर्थ क्षेत्र में उन अवतारों की अविस्मरणीय स्मृति चीर अंकित हुई है। उस स्मृति का आस्वादन करके उस तीर्थ क्षेत्र में निवास करके मां का जो यह विच्छेद दुख है थोड़ा सा कम होगा। वह तो एक पॉइंट है। दूसरा कि यदि मां कोलकाता से दूर जाएगी तो जैसे वो भगवान राम की ये जो जन्मभूमि है अयोध्या या तो फिर भगवान कृष्ण की यह जो लीला भूमि है लीला क्षेत्र वृंदावन वगैरह वहां पे जो यदि मां रहती है तो वहां का जो आनंद उनको प्राप्त होता है उन उन अवतारों की लीला का तो ठाकुर रूपी अवतार की लीला का जो आनंद कोलकाता की मिट्टी कण-कण में जो जुड़ा हुआ है उससे थोड़ा सा दूर जाएगी तो ठाकुर के अदर्शन का जो दुख है वह थोड़ा सा कम होगा इत्यादि कथा विवेचना कोरिया तहारा श्री श्री माता ठाकुरानी के तीर्थ दोषों ने पाठते मनोस्थ कोरिले यह सब सोच करके यह सब बातें सोच करके उन्होंने श्री श्री माता ठाकुरानी को तीर्थ दर्शन में भेजने का निश्चय किया निर्णय किया तदनुसार बलराम भवन आठ दिन था श्री मां पनेरोई भद्रो श्री वृंदावन यात्रा को लेन इसके अनुसार बलराम भवन में आठ दिन रहकर के श्री मां ने 15 भद्र को श्री वृंदावन दर्शन के लिए यात्रा प्रारंभ की शंगे चोली लेन श्री जुक्ता गोलापमा लक्ष्मी दीदी ओ मास्टर महाशय स्त्री एवंम पूजनीय जोगिन महाराज काली महाराज और लाटू महाराज महाराज साथ में ही चले श्रीक्ता गोलापमा लक्ष्मी दीदी और मास्टर महाशय की स्त्री और पूजनीय योगिन महाराज काली महाराज और लाटू महाराज अभी इसके बाद में तीर्थ यात्रा का पूरा वर्णन प्रारंभ होता है। देवघर, काशी, अयोध्या, इसके बाद में वृंदावन और इसके बाद में वही जो सब जयपुर वगैरह वृंदावन का वर्णन जो है सबसे लंबा वर्णन है। और फिर आखिर में हरिद्वार और हरिद्वार से जयपुर, जयपुर से प्रयाग और प्रयाग से वापस। तो यह जो पूरा वर्णन है अभी हम नेक्स्ट क्लास से प्रारंभ करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु
प्रश्न: विश्वास (conviction) से साधना होती है, पर साधना से ही तो विश्वास भी गहरा होता है। यदि प्रारम्भ में विश्वास न हो, तो साधना शुरू कैसे की जाए?
ना वो पहले तो हमको भगवान पिताजी का हाथ पकड़ना होगा बाद में तो पिताजी अपना हाथ पकड़ेंगे सो जब तक हम अपने आराम से बैठे हैं तो मां भी सोचेगी बच्चा खेल रहा है तो खेलने दो बच्चा जब खिलौना फेंक के मां के लिए रोता है ठाकुर की [गला साफ़ करने की आवाज़] कहा म उपमा बच्चा जब खिलौना फेंक फेंक करके मां के लिए रोता है तो मां फिर अपना जो काम करती थी छोड़कर के दौड़ी हुई चली आएगी सो वो पहले तो जब तक हम खिलौने लेकर के खेलते हैं तब तक तो मां बोधर नहीं करेगी हमको वो पहले तो रोना होगा पहले तो पिताजी का हाथ पकड़ना होगा बाद में फिर वह हमारा हाथ पकड़ेंगे माने हमको गिल्ट फीलिंग नहीं होनी चाहिए कि मुझे क्यों कन्विक्शन नहीं हो रही है? क्योंकि गिल्ट फीलिंग इज इवन मोर डेंजरस। कन्विक्शन नहीं होने से भी ज्यादा डेंजरस है कि कन्विक्शन नहीं होने का गिल्ट फीलिंग।
प्रश्न: मन में हर समय संदेह बना रहता है, ईश्वर पर भरोसा नहीं होता—ऐसी स्थिति में साधना कैसे की जाए?
इसके लिए दो बात है। सबसे पहले तो जैसे एजुकेशन सिस्टम ही अपना गलत है। वो जो गुरुकुल सिस्टम था जहां पे यह वेद और विज्ञान दोनों साथ में पढ़ाते थे। वि वाज मच बेटर। और भविष्य में ऐसा होना चाहिए। वेद और विज्ञान दोनों हैंड इन हैंड जाने चाहिए। सो दैट इज वन सॉल्यूशन। दूसरा है कि जो रामकृष्ण संघ के साथ में जुड़े हैं उन लोगों के लिए यह इतना कन्विक्शन परहप्स इट विल बी डिफिकल्ट। किंतु मन का जो यह डिस्टरबेंस है उससे डीएल करना बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं होना चाहिए। अपनी ये जो स्मृति कथाएं हैं दे आर माइन ऑफ गोल्ड स्पिरिचुअल गोल्ड। माने सहज रूप से कथामृत है। मां की सब स्मृति कथाएं हैं। डायरेक्ट डिसाइपल की स्मृति कथाएं हैं। मैंने वो आपके साथ में वो शेयर किया कि जितनी भी स्मृति कथाएं लिखी गई है वो सबका एक पूरा लिस्ट अनफॉर्चूनेटली बहुत कुछ बेंगली में है। किंतु अभी क्या है कि आप फोटो लेके उसको आप एआई में डाल देंगे। कहो ट्रांसलेट इन हिंदी गुजराती तो इंस्टेंटली कर देगा। सो दैट वन बेनिफिट वी हैव गॉट टुडे। सो क्या है? कि इनका पाठ करना मैंने अपने खुद के पाया है कि कितना ही ना मैं एजिटेटेड हूं। कितना ही मैं डिस्टर्ब हूं। जैसे ही मैं श्रुति कथा पाठ करता हूं ना विदिन 10 टू 20 मिनट एकदम ठीक हो जाता है। दैट गोल्डन पावर वी हैव गॉट। सो दैट वी कैन ऑलवेज यूज़। मैं हमेशा कहता हूं कथामृत और जप दोनों साथ में करो। अकेले जप करना अपनी पूरी शक्ति लगा देने के बराबर है। कथामृत पढ़ के जप करोगे ना तो ठाकुर स्वयं हमारे साथ में जप करने को बैठे हैं। ऐसा होगा
प्रश्न: जिन्हें ठाकुर के अस्तित्व पर तनिक भी संदेह नहीं था, उन्हीं माँ और स्वामी विवेकानन्द को महासमाधि के बाद प्रथम दर्शन क्यों मिले? क्या उन दर्शनों का उद्देश्य केवल उनकी व्यक्तिगत सांत्वना था, या उसके पीछे कोई व्यापक आध्यात्मिक प्रयोजन था?
मोर देन कन्विक्शन लाना यह जो गुरु परंपरा का जो कंटिन्यूटी है क्योंकि मां के साथ में हमेशा था मां रिट्रीट कर जाती थी। ठाकुर को सब समय मां को रिमाइंड करना पड़ता था दैट यू हैव ए लार्जर रोल। मां अब जैसे हमने वो किताब में भी पढ़ा गंभीरानंद जी कहते हैं कि मां कहती है कि आमी मैं मानुशामी की कोरेने वो मैं स्त्री हूं मैं क्या कर लूंगी उस समय के जो स्त्रियों की अवस्था थी ठाकुर कहते हैं एकने ए जेटा को जतोटा करे से तार्थ के अनेक बेश तोमा के करते हुए अपनी ओर इशारा करके कहते हैं इसने जितना किया है उससे बहुत ज्यादा कहीं कहीं ज्यादा तुमको करना है सो वो मां के लिए कन्विक्शन दूसरे प्रकार से लानी है कि ईश्वर पे भरोसा दैट वो तो उनके डीएनए में ही है। किंतु जगत में उनका एक लार्जर रोल जो है वो वो मां को बार-बार रिमाइंड करवाना पड़ता है। तो उस अर्थ में ठाकुर का दर्शन परंपरा कि ये ये ठाकुर के साथ में यह समाप्त नहीं हो गया। संघ प्रारंभ हुआ है। लीला कंटिन्यूटी बनी रहती है। गुरु परंपरा एस्टैब्लिश हुई है। मदर इज नाउ नेक्स्ट इन द लाइन। शी हैज़ टू टेक अप द रिस्पांसिबिलिटी। यह ठाकुर की अंत्य लीला का देखिए दो उद्देश्य है। एक तो है कि नरेंद्र को ट्रेन करना उसके लार्जर रोल के लिए और मां को भी ट्रेन करना। मां को कन्विंस करवाना फॉर हर लार्जर रोल। सो दैट वाज़ वन मेजर रीजन कि ठाकुर ने उनको दर्शन देना प्रारंभ किया। वरना देखिए मां को ठाकुर का दर्शन नहीं होता तो होता क्या? माने आध्यात्मिक कोई नुकसान नहीं होने वाला था। ठाकुर ने एक बार शोडशी पूजा की बात खत्म हो गई। अपनी संपूर्ण ठाकुर ने दो बार अपनी शक्ति ट्रांसफर की है ना आखिर में नरेंद्र को की तो प्रथम में मां को भी तो कर दी है। सो अवतार वरिष्ठ ने जिनके भीतर में शक्ति ट्रांसफर की उनको वो फिर वो उसके लिए कातर नहीं बैठे हैं। उसके लिए वो भिखारी बनके नहीं बैठे हैं। उनके लिए अभी लार्जर रोल के लिए उनको कन्विक्शन लाना है। नरेंद्र का भी सेम नरेंद्र बार-बार रिट्रीट करना चाहता है। वही अल्मोड़ा की गुफा वही लास्ट रिट्रीट स्वामी जी ने करने का प्रयास किया कि बस अभी गुफा में जप ध्यान करके समाधि प्राप्त करके मैं प्राण त्याग कर दूंगा। सो एवरी टाइम दे वांटेड टू रिट्रीट अवे ठाकुर को उनको रिमाइंड करवाना है कि नो यू हैव अ लार्जर रोल रिटर्न टू द सोसाइटी। डोंट गो इन अ ट्रेडिशनल साधना का रास्ता पे। द मोमेंट यू ट्राई टू बिकम अ सिंसियर हिंदू यू आर गोइंग टू रिट्रीट। द मोमेंट यू ट्राइंग टू बिकम अ सिंसियर मुस्लिम और सिंसियर क्रिश्चियन यू आर गोइंग टू एक्सपंड डीएनए लेवल पर ही ये सब पहुंचा हुआ है [हंसी] गॉड नोज़ ठाकुर को वापस आना है और क्या [हंसी] इसीलिए तो यहां पे उनका आना होता है ना वहां पे जरूरत नहीं है वे लोग बोलते हैं हम ही लोग सब संभाल लेंगे वो जो ठाकुर की कहानी है दो मित्र जंगल में से जा रहे हैं शेर आ गया तो एक मित्र बोलता है चलो भगवान को बुलाते हैं। दूसरा बोलता है अरे चलो पेड़ पे चढ़ जाते हैं भगवान को क्या कष्ट देना प्रॉब्लम इज देयर प्रॉब्लम इज देयर कि आपको ट्रेन मैन पावर मिलना बहुत मुश्किल है आजकल ऑलवेज देयर इज अ फाइट बिटवीन क्वालिटी एंड क्वांटिटी देयर इज नो सच अ थिंग एज परफेक्ट रूल कि आपको इतना क्वांटिटी मेंटेन करना है इतना क्वालिटी मेंटेन करना 100% क्वालिटी मेंटेन करने को जाएंगे तो डायरेक्ट डिसाइपल के बाद में और कोई क्वालीिफाइड नहीं है जॉइ करने के लिए बाद में जितने भी आए सबके साथ में कंप्रोमाइज हुआ है एक आई थिंक कौन वीजानंद जी ने ही शायद कंप्लेंट किया होगा शरद महाराज को कि आजकल के साधु तपस्या नहीं करते हैं। तो शरद महाराज ने कहा देखो जितनी तपस्या तुमने की ना वह नेक्स्ट जनरेशन अभी नई जनरेशन वाले नहीं कर पाएंगे और जितनी तपस्या हमने की है ना ऐसे तुम नहीं कर पाओगे और जितनी तपस्या ठाकुर ने की है उतनी हम नहीं कर पाएंगे तो ये कब की बात थी 1920 की बात है [हंसी] दिस इज 2020 [हंसी] देयर इज नो गोल्डन रेशियो कि इतनी तपस्या होनी चाहिए इतना प्रचार होना चाहिए चाहिए। सो दैट डिबेट इज ऑलवेज ओपन। ओम जय