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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते मां के जीवन के बारे में हम पाठ कर रहे थे देखा कि बड़ा ही शुभ प्रसंग ठाकुर और मां का विवाह जैसे कि शिव और पार्वती का और एक बड़ा ही सुंदर प्रसंग देखा कि आजकल जैसे कन्या पक्ष से वर पक्ष को दहेज दिया जाता है उस समय की जो प्रथा थी उसके अनुसार वर पक्ष से कन्या पक्ष को दहेज दिया जाता था तो 00 दहेज देकर के ठाकुर ने ठाकुर के परिवार ने मां के परिवार के साथ में यह संबंध स्थापित किया था अभी इसके बाद में हम थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं महाराज जी मां के बारे में लिखते हैं विवाह समय संबंध श्री मां बोलते विवाह के समय के बारे में श्री मां ने कहा था अभी यह जो पूरा पैसेज है श्री मां अपने मुह से जो बात बता रही है वह किसी ने रिकॉर्ड किया है जो कि गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं मां क्या कहती है खेजूर दिने अमार बीए हुई खिजर खिजर यानी किय डेट्स जिसको कि इंग्लिश में कहते हैं उस के दिन मेरा विवाह हुआ था अब यह खजूर का दिन क्या है मुझे पता नहीं किंतु मास मने नहीं माने खुद कहा है कि मैं कौन सा महीना था वो मुझे याद नहीं है 10 दिनर मध्य जखन कामर पुकुर गेल तो खन शेखाने खेजूर कुड़िए छी 10 दिन के बाद में जब मैं कामर पुकुर गई थी वहां पर मैंने खजूर को चुना था अब ये कुड़िए जीी अर्थात की कहीं पर गिरा होगा तो उन्होंने एक कहीं कटोरी में या तो बास्केट में कलेक्ट किया होगा जो कि वहां पर जो एग्रीकल्चरल एग्रोनॉमी जो सब ट्रेडिशनल पुकुरे जमीदार धर्मदास लाहा ऐसे बोलले कामर पुकुर के जमींदार थे धर्मदास लाहा उन्होंने आकर के कहा अभी यह वही लाहा बाबू है जिनकी पाठशाला में ठाकुर पढ़ने के लिए जाते थे जो आपने जद कामर पुकुर की मुलाकात ली होगी कामर पुकुर यात्रा की होगी तो लाहा बाबू देर धर्मशाला पाठशाला ऐसा करके वो वहां पर आपने अवश्य गए होंगे व लक लकड़ी के कुछ पिलर से उसके ऊपर में खड़ से बनाया हुआ छत है एक छोटी सी पाठशाला है वहां पर ठाकुर जाया करते थे तो वही लाहा बाबू आ करर के बोले ई मेटी संगे विवाह हुए कहा कि क्या इसी लड़की के साथ में विवाह हुआ है ज्ञाती भाई सुज्जू बाप अर्थात ईश्वर मुखोपाध्याय कोले कोरे आमा के कामर पुकर निए गए लेन ईश्वर मुख उपाध्याय जो कि उनके रिलेटिव थे अपनी गोद में उठा कर के बच्ची मां शारदा को कामर पुकुर लेकर के गए थे तो यह मां की रेमसंस है ठाकुर के बारे में अभी कुछ नहीं बोली है मां तो ठाकुर का एक सुंदर एक कोटेशन है कथामृत में एक जगह पर कहते हैं विवाह जब होता है वर्टी बोकाटर मत होए बोसे थाके किंतु कन्या निशंक अर्थात की जब शादी होती है विवाह होता है जो वर है वह मूर्ख की तरह बैठा रहता है किंतु कन्या होती है निशंक अर्थात की नारी शक्ति के बारे में ठाकुर की देखिए कि कैसी उच्च धारणा है अभी ठाकुर ने अपने खुद के विवाह के बारे में तो कहा नहीं कि मां निशंक थी कि नहीं किंतु देखिए कि जितना भी ठाकुर और मां के बारे में पढ़ते हैं हमको पता है कि ठाकुर ने एक बार साधना समाप्त करके जब उन्होंने उनका मन बहिर्मुखी बा ने आदेश दिया तो भावो मुखे थाक अर्थात कि तुम भाव मुख में रहो उसके बाद का जितना भी कार्य है वह मां की सहायता से ही पार हुआ है इवन देखिए कि एक जगह पर मैंने पढ़ा था कि र के जीवन में नारी शक्ति का या तो स्त्री शक्ति का महात्म्य एक तो उन्होंने एक स्त्री देवता की उपासना की मां काली की उन्होंने एक स्त्री गुरु को किए भैरवी ब्राह्मणी और अपनी धर्म पत्नी की सहाय से उन्होंने रामकृष्ण संघ की स्थापना की अर्थात कि बाकी सब अवतार है उनके जीवन में देखिए कि त्याग अभी एक पैराडॉक्स है कोई भी अवतार होगा वह तो साधना करके सिद्धि प्राप्त किए हैं या तो फिर लोगों को दिखाते हैं कि साधना करने की जरूरत क्या है किंतु जब पुरुष साधना करता है तो स्त्री संग संपूर्ण रूप से उसके लिए वर्जित है भगवान बुद्ध के जीवन में देखिए कि वह तो सन्यासी ही थे उन्होंने अपना परिवार त्याग करके वन में जाकर के साधना की थी चैतन्य महाप्रभु के जीवन में भी देखिए कि अपने परिवार का त्याग किया था भगवान राम और भगवान कृष्ण ही एक अपनी वैदिक परंपरा से जो अवतार हुए हैं उनके जीवन में है कि स शक्तिक उन्होंने अपनी लीला की है तो ठाकुर यह भगवान बुद्ध या चैतन्य महाप्रभु की ट्रेडिशनल वैदिक ट्रेडिशनल की उस ट्रेडिशनल हुए हैं इसीलिए अभी इवन जीसस के जीवन में भी देखिए कि शक्ति का महात्म बड़ा ही लिमिटेड है मां मेरी का विवरण अवश्य है माता मेरी की प्राधान्य भी बाइबल में देखिए या तो फिर क्रिश्चियन थियोलॉजी में देखिए बहुत सारा है किंतु जीसस के खुद के जीवन में एक बार उन्होंने प्रीचिंग स्टार्ट किया उसके बाद में स्त्रियों का ऐसा कोई महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं है उनके जितने भी अपोस्ट थे व भी सब पुरुष थे मेरी मैगडेलीन के बारे में बहुत सारी बातें बताई जाती है किंतु वो सब क्या है अनुमान के ऊपर में निर्भर है एक्चुअली क्रिश्चियन चर्च ने जो बाइबल ऑथराइज किया है उसमें उसकी बात बड़ी ही मिनिमम है तो अपनी वैदिक ट्रेडीशन में ठाकुर अवतार ग्रहण किए हैं तो इसीलिए जितना शक्ति का प्राधान्य भगवान राम और भगवान कृष्ण के जीवन में था उतना ही भगवान राम कृष्ण के जीवन में है तो यह देखिए कि राम कृष्णा और राम कृष्णा इस ये तीनों के बीच में जितने भी अवतार आए उनमें और इन तीनों में क्या डिफरेंस है तो शक्ति का प्राधान्य तो भारतीय धर्म में भारतीय संस्कृति में अपने हिंदू धर्म में जिस अवतार को सर्वश्रेष्ठ जिनको की श्रद्धा की जाती है सर्वश्रेष्ठ सबसे ज्यादा मान्यता मिलती है वह वह अवतार है जो कि शक्ति की सहाय से धर्म चक्र प्रवर्तन करते हैं यही एक वन ऑफ द मेजर रीजन स्वामी जी ने अपने जीवन के अंत समय में एक बार कहा था अभी हमको पता है कि स्वामी जी का भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रति काफी आकर्षण था जब छोटे थे अपने घर में अपने कमरे में ध्यान कर रहे थे भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ था इसके बाद में भी ठाकुर जब काशीपुर में थे कैंसर से पीड़ित थे आखिरी समय था उस समय भी स्वामी जी भाग कर के बोध गया चले गए थे एक बार और वहां पर वोह जिस वृक्ष बोधि वृक्ष के नीचे में बैठ कर के भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था वहां पर उन्होंने ध्यान किया था और बाद में भी अमेरिका में और भारत में उन्होंने जो प्रवचन दिए जो पत्र लिखे जो वार्तालाप किए अपने मित्रों अपने शिष्यों के साथ में भगवान बुद्ध के बारे में या तो फिर बुद्ध धर्म के बारे में उन्होंने बहुत सारी बातें की है किंतु आखिरी समय में बड़े ही आखिरी समय में उन्होंने कहा था कि भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में मेरी जितनी अवधारणा थी वो सब संपूर्ण रूप से बदल गई है अभी आखिरी कुछ दिनों में तो हम अनुमान कर कर सकते हैं स्वामी जी ने मेरा किसी एक सीनियर साधु के साथ में वार्तालाप हो रहा था तो उन्होंने कहा था कि ये जो सब रिसर्च के मने मने एक मिस्ट्री होती है ना सभी धर्म में कोई ना कोई मिस्ट्री होती है य मिस्ट्री के ऊपर में धर्म चलता है वैसे आप बोल देंगे कि हां वो ठाकुर के सामने बैठ कर के प्रार्थना करो जब ध्यान करो तो मैंने कल्याण तो कुछ होने वाला नहीं है ऐसे ठाकुर तो सन्यासियों के सरदार है तो किंतु एटलीस्ट तुम्हारे मन में शांति मिलेगी कोई पैसा धन वगैरह ना भी मिले तो ऐसी बातें करने से लोग बोलेंगे अरे अच्छा वो तो मैं कहीं वो शिवलिंग के सामने बैठ कर के ये सब कर दूंगा वो भी मिल जाएगा तो ठाकुर की विशेषता यानी कोई भी धर्म की विशेषता क्या है वहां पर रहस्यमय तत्व क्या है कोई भी रहस्यमय तत्व आप एक्सप्लेन करेंगे लोग बड़े ही आकर्षित हो जाते हैं अच्छा ऐसा कुछ रहस्य है तो रहस्यों का उद्घाटन करना चाहिए रहस्य को भेद करना चाहिए रामकृष्ण संघ में अनफॉर्चूनेटली ऐसा कोई रहस्य नहीं है किंतु यह जो सब फिलोसॉफिकल कोई कुछ नोटी क्वेश्चन है अर्थात कि कोई डिफिकल्ट कहेंगे कि उलझे हुए प्रश्न है उसमें से यह एक है कि स्वामी जी ने ऐसा तो अपने जीवन के आखिरी समय में क्या अनुभूति हुई या तो फिर क्या एक फिलोसॉफिकल इनसाइट प्राप्त हुई जिसकी वजह से भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म उनका भार भारतीय जीवन में भारतीय अपने हिंदू धर्म के इतिहास में जो अवदान था जो रोल था उसके बारे में उनकी धारणा का संपूर्ण परिवर्तन हुआ ऐसा आखिरी आखिरी दिनों में ऐसा तो क्या हुआ था तो हम किंतु अभी जैसे हमारे कुछ कुछ साधु कहते हैं कि जो जो ऐसे कोई रहस्य के विषय है जिनके ऊपर में हमको रिसर्च करना चाहिए दिस इज वन ऑफ दोस टॉपिक स्वामी जी हैज गिवन एपल हिंट्स ये स्वामी शिष्य संवाद वगैरह जो टेक्स्ट अपने पास में अवेलेबल है स्वामी जी ने हिंट भी दिया है सब की क्या उनका विचार था वगैरह तो हम उसको एक्सप्लोर करके बिल्कुल शुरू से लेकर के आखिरी तक स्वामी जी के जो विचार इवोल्व हुए उसका एक हिस्टोरिकल डायग्राम बना कर के हम थोड़ा सा अटेंप्ट कर सकते हैं कि स्वामी जी के मन में एक्चुअली बुद्ध धर्म का क्या स्थान था भारत के डेवलपमेंट में बौद्ध धर्म का क्या रोल था इसके बारे में स्वामी जी क्या कहते हैं तो वो एक पूरा रिसर्च का सब्जेक्ट है कि किंतु मेरी ये जो मेरा खुद का जो इस तरह से जो रीडिंग जाता है स्वामी जी को भी पढ़ कर के और इन जनरल भी यह शक्ति का महात्म्य यह भगवान बुद्ध के जीवन में नहीं था और यदि आपको कोई भी धर्म की स्थापना करनी है और समाज के सभी लोगों में इसका प्रचार प्रसार करना है जो सामाजिक जीवन को जद परिवर्तन करना है जदिया तो फिलोसोफी या दर्शन शास्त्र मात्र सिर्फ साधक तक सीमित रह जाए तो बात अलग है साधकों तक उसको सीमित रखना है कोई भी साधक है उसको प्रेरणा देने के लिए इस धर्म की या तो फिर इस विचारधारा की इस भावधारानी किया जा रहा है तो एक बात हो गई किंतु जन साधारण को जन समाज के प्रत्येक अंग में प्रत्येक शाखा प्रशाखा में पुरुष स्त्री बच्चे बूढ़े सभी के भीतर में यदि इस धर्म का भावधारानी इसको मैंने रिवाइज करने की शुरुआत की है कि देखिए कि ठाकुर ने कितने लोगों को सन्यास दिया वोह 11 वस्त्र जो बड़ो गोपाल अद्वैतानंद जी महाराज लाए थे उसमें भी एक तो रहे दि रखने रखा दिया था वो 10 वस्त्र दिए थे एक रखा था शायद गिरीश घोष के लिए ऐसा कहा जाता है स्वामी जी का जब महासमाधि हुई स्वामी जी की 1902 में उस समय यह बेलूर मठ में कितने सन्यासी थे मुझे नहीं लगता कि 30 40 से ज्यादा हो ऐसा कोई रिकॉर्ड है वैसे ऑफकोर्स है मेरे पास में नहीं है किंतु हमने रिकॉर्ड तो मेंटेन किया है कि कौन से साल में किसका सन्यास हुआ वगैरह तो मुझे लगता है कि वह रिकॉर्ड देखेंगे तो मुझे नहीं लगता कि स्वामी जी की समाधि के समय महासमाधि के समय 30 40 से ज्यादा साधु होंगे आज जो 20100 के आसपास साधु है इनका आगमन और इनका यहां संग में रहना मां की कृपा से ही संभव है क्योंकि देखिए कि बड़ा एक इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है पहले भी मैंने एक बार कहा था कि स्वामी जी का कैसा क्रोध भरा नेचर था एक बार एक उड़िया नौकर उड़ीसा देश का निवासी एक नौकर वहां पर काम कर रहा था बिलुर मठ में उसने चोरी की तो स्वामी जी बड़े नाराज हो गए डाट करके उसको भगा दिया अभी वो नौकर भी बड़ा चालाक था मां उद्बोधन में थी मां के पास जाकर के कंप्लेन किया तो मां तो बेचारी मातृ हृदय एकदम द्रवित हो गया मां का हृदय और प्रसाद वगैरह दिया उतनी देर में बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद जी बेलूर मठ से मां का दर्शन करने के लिए उद्बोधन में उपस्थित हुए तो जैसे ही मां ने बाबूराम महाराज को देखा तो मां ने उनको कहा कि अरे देखो इस बेचारे ने तो चोरी ही की है और इसी में नरेंद्र ने इसको डांट करके भगा दिया नरेण को क्या समझ में आएगा कि संसार का क्या दुख है और इस दुख के मारे लोग क्या से क्या नहीं करते वो तो सन्यासी है वो इन लोगों की कष्ट इन लोगों का दुख थोड़ी ना समझेगा जाओ तुम इसको वापस ले जाओ और नरेंद्र को कहो कि फिर से उसको मठ में नौकरी करने दे तो बाबूराम महाराज तो बेचारे क्या बोलेंगे वो नौकर को लेकर के बेलर मठ आए वापस अभी स्वामी जी वहां पर खड़े थे जैसे ही बाबूराम महाराज को नौकर के साथ में मठ के गेट के भीतर में प्रवेश करता हुआ देखा वो क्रोध से चिल्ला उठे देखो बाबूराम कांडो माने देखो ये बाबूराम ने क्या मैंने किया है व जिस नौकर को मैंने भगा दिया उसको लेकर के वापस आ रहा है ऐसा स्वामी जी तो तो शेर की तरह चला है धाड़ उठे तो बाबूराम महाराज ने आकर के कहा अरे भाई मैं क्या करूं मां ने ही इसको वापस भेजा है तो जैसे मां का नाम आया स्वामी जी एकदम शांत फिर एक शब्द मां के आदेश के सामने उनका नहीं बोलने का रहा तो देखिए कि मां है कि हम लोगों को हमारी कितनी ही गलतियां हो कौन परफेक्ट है इस जीवन में वो उड़िया नौकर भी परफेक्ट नहीं था मैं भी परफेक्ट नहीं हूं कौन है परफेक्ट इस जीवन में रामकृष्ण संग में रहने की औकात किसकी है किसी की भी नहीं हम लोगों को तो दया करके कृपा करके यहां पर बुलाया है रहने को दिया है सेवा करने का मौका दिया है यह ये हमारे लिए कितना बड़ा सद् भाग्य है मेरा बिल मट में पोस्टिंग हुआ था तो सुबह को मंगलारती के बाद में वो मेन टेंपल में वहां जो ये जो है सामने खड़े रह करर के मैं देखता था वहां पर गंगा नदी और गंगा नदी के किनारे मां का समाधि मंदिर है स्वामी ब्रह्मानंद जी का समाधि मंदिर है यह फिर यहां पर स्वामी जी का समाधि मंदिर और फिर सुंदर गंगा नदी और गंगा नदी के सामने के किनारे कहां सुदूर सूर्योदय होता है तो वोह ऐसा सुंदर दृश्य प्रतिदिन मैं मंगलारथी के बाद में मेरा नियम था कि जैसे ही सूर्योदय होता है मैं वहीं पर बैठता था यदि आपने बेलून मट गए होंगे मेन टेंपल देखा होगा तो आपको पता होगा कि मेन टेंपल में एक तो सामने से प्रवेश करने के लिए तो एक मुख्य द्वार है ही है किंतु साइड में से प्रवेश करने के लिए भी दो दरवाजे हैं तो जिस दरवाजे से सीधा गंगा का दर्शन होता है और सामने सूरज दिखता है सूर्योदय दिखता है वही दरवाजे के सामने में सुबह को बैठा करता था जप करने के लिए मेन टेंपल में मंगलारती के बाद और जैसे ही सूर्योदय होता था उसकी पहली किरण जैसे मंदिर पर आएगी व मंदिर में प्रवेश करेगी यह खिड़की और दरवाजे के माध्यम से मैं खड़ा होकर के बाहर में निकल कर के वो भगवान सूर्यदेव का प्रणाम करता था दर्शन करता और जितने दिन दर्शन किए हैं प्रणाम किए हैं मन में वही बात आ रही है कि ऐसे तो मेरा कौन सा सद्भाव है कौन सा पुण्य है कि यह पवित्रतम दृश्य दर्शन करने का मुझे मौका मिल रहा है यहां पर रहने का मुझे सद भाग्य मिला है अपना ऐसा कोई संस्कार है ही नहीं कि वहां पर बेलूरमठ में जाकर के रहे यह इतना पवित्र दृश्य इतना पवित्र साधु समाज इसमें रहे यह तो माने कृपा करके दया करके हमको यहां पर बुला कर के रखा है इसलिए हम लोग रह रहे हैं तो यह संघ राम कृष्ण संघ मां की दया से चलता है ठाकुर और स्वामी जी को आप प्रार्थना करेंगे तो ज्यादा से ज्यादा क्या मिलेगा साधना में सिद्धि मिलेगी समाधि प्राप्त होगी स्वामी जी को पढ़ोगे तो फिर दर्शन शास्त्र बौद्धिक डेवलपमेंट होगा बहुत सारा आप कर्म कर लेंगे स्कूल चला लेंगे हॉस्पिटल चला लेंगे सब कुछ होगा किंतु मन को जब शांति की बात आती है तो मां के पास से ही मिलती है वो जैसे व्यास देव के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने सभी वेदों का विश्लेषण किया उसके बाद में ब्रह्मसूत्र भाष्य की रचना की यह सब कुछ उन्होंने कर दिया सॉरी ब्रह्मसूत्र की रचना की पाश की रचना तो शंकराचार्य ने की थी तो उन्होंने ब्रह्मसूत्र की रचना की पुराण इतने सारे लिख दिए किंतु फिर भी उनके मन को शांति नहीं मिल रही थी आखिर में उन्होंने श्रीमद् भागवत की रचना की भगवान कृष्ण के वह वृंदावन की जो लीला है जो वृंदावन के दिन है उसके बारे में उन्होंने लिखा उसके बारे में उन्होंने हमको बताया तब कहीं जाकर के उनके मन को शांति मिली थी तो वैसे ही राम कृष्ण संघ में भी आप यदि साधना करना चाहते हैं ईश्वर के आशी आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं तो ठाकुर है उसके लिए यदि बहुत सारा कर्म करने की इच्छा है फिर इंटेलेक्चुअल डेवलपमेंट करना है अंग्रेजी संस्कृत सब कुछ सीख लेना है तो उसके लिए स्वामी जी है किंतु यदि अपने मन को सही सही शांति चाहिए तो मां को छोड़ कर के और कोई नहीं दे सकता ऐसा मेरा खुद का अनुभव है तो यहां पर मां का ये माने अपने खुद के मुंह से जो कहा है कि इस तरह से खजूर के दिन में कामर पुकुर गई थी और खजूर बटोरे थे और धर्मदास लाहा आकर के बोले थे कि क्या इसी लड़की के साथ में विवाह हुआ है और यह है मां की उस दिनों की स्मृति आगे में गंभीरानंद जी क्या लिखते हैं विवाह पोर दिवस बई काले बोर पख बरो बधु के लैया कामर पुकुर जात्रा कोरी लेन विवाह के दूसरे दिन शाम को वर पक्ष अर्थात की ठाकुर के ठाकुर अपने मझले भाई तीन भाई थे रामकुमार रामेश्वर और रामकृष्ण एक्चुअली राम कृष्ण नाम कहां से आया यह एक प्रश्न है ज्यादातर हम लोगों को बताया जाता था कि गदाधर घर का नाम था किंतु फिर प्रभानंद जी महाराज ने काफी कुछ रिसर्च करके ऐसा एस्टेब्लिश करने का प्रयास किया है कि घर में जब सभी का नाम राम के नाम से जुड़ा था तो राम कृष्ण का भी यह घर का ही नाम होना चाहिए किंतु बहुत सारी बार ऐसा होता है कि मां अपना अपने बच्चे को एक लाडला नाम देती है तो इस तरह से उनका नाम शायद गदाधर इस तरह से हुआ होगा तो जो भी है तो रामेश्वर उनको लेकर के अपने छोटे भाई गदाधर को राम कृष्ण को लेकर के जयराम बाटी गए थे विवाह करने के लिए और फिर दूसरे दिन अपने भाई और भाई की वधु को लेकर के कामर पुकुर वापस आए तहरा ग्राम उपनीत होले वे लोग जैसे ही कामर पुकुर पधारे श्री जुक्ता चंद्रमणि देवी पुत्र और पुत्र बधु के जथा रीति बर कोरिया लेले श्री जुक्ता चंद्रमणि देवी वर और कन्या को अपना पुत्र और पुत्र वधु को रीति के अनुसार वहां का जो स्थानिक रिवाज है उसके अनुसार उनका स्वागत किया उनका वर्ण किया अन स्त्री आचार फूल सैया और बहु भाते सहीत दरिद्र गृहे विवाहों पन्न होलो इसके बाद में स्त्री आचार फूल सैया और बहु भात इसके साथ में दरिद्र के गृह में विवाह उत्सव संपन्न हुआ यह सब वहां के स्थानिक रिवाज है अभी हमको एक बात पता है और इन जनरल भी वहां पर उस दिनों में ऐसा होता था हमको पता है कि बालिका वधु जब घर में आती है तो शारीरिक संबंध उसी दिन नहीं होता वो लड़की जब बड़ी हो जाती है तभी व शारीरिक संबंध होता है ये हम भारत में जो परिस्थिति थी कि बार-बार विदेशों के आक्रमण होने की वजह से यह कुप्रथा बालिका वधु प्रथा भारत में प्रवेश की थी किंतु ये कन्या को सुरक्षित रखने के लिए ही उसका विवाह करा दिया जाता था किंतु बाकी के जो विवाह के बाद में जो होना है वह सब बालिका जब बड़ी होती थी तब होता था तो यहां पर भी जो वहां के रीति रिवाज नियम के अनुसार जो विधि करनी है वह की गई ऑफकोर्स ठाकुर और मां का संबंध तो दैवी संबंध था वहां के नियम आचार कानून वगैरह के साथ में रीति रिवाज के साथ में यह विवाह का कोई रिलेशन नहीं था जब अभी हमार हमारे पास में भी देखिए कि ठाकुर को स्टूडियो में ले गए थे फोटो पढ़ाने के लिए तो जब फोटो पढ़ने के लिए बात आई तो ठाकुर वहीं पर समाधि स्त हो गए थे ठाकुर के हाथ समाधि तो उनकी सिद्ध हस्त थी तो विवाह के समय ठाकुर को क्या दर्शन हुआ होगा ठाकुर के साथ में क्या हुआ होगा वह बात का कोई उल्लेख हमको नहीं मिल रहा है मुझे पता नहीं क्यों क्योंकि बहुत सारे लोग वहां पर उपस्थित थे मां थी ठाकुर के बड़े भाई थे और इतने सारे गांव वाले थे किसी ना किसी ने तो कुछ ना कुछ बोला और लिखा होना चाहिए पता नहीं क्यों कुछ अपने पास में नहीं है किंतु अभी ठाकुर का बाकी का जीवन देखिए बात-बात में समाधि स्त हो जाते थे तो फिर यह विवाह जैसा जगदंबा के साथ में अवतार वरिष्ट का मिलन जो हो रहा है वो शुभ क्षण में ठाकुर के क्या-क्या दर्शन हुए होंगे ठाकुर और मां के मन में क्या-क्या आध्यात्मिक भाव तरंग बही होगी इसका वर्णन यदि होता तो कितना सुंदर होता अनफॉर्चूनेटली नहीं है तो जो भी है किंतु यह जो सब कामर पुकुर वापस आकर के वहां के स्थानिक रिवाज के अनुसार स्त्री शैया वगैरह की जो बात है यह स्थानिक बाह्य रिवाजों का पालन किया गया है किंतु मां और ठाकुर के मन में जो आध्यात्मिक तरंग फैल रही होगी उनका मन किस उच्च आध्यात्मिक अवस्था में स्थित होगा इसका तो हम अनुमान ही कर सकते हैं इसके बाद में किंतु एक बड़ा ही सुंदर प्रसंग है महाराज जी लिखते हैं ई आनंद शेष ईते ना ईते एक निदु चिंता चंद्रा देवीर मातृ हृदय के व्यथित तो कोरीते लागलो यह आनंद की पल समाप्त होते ना होते एक बड़ी चिंता मां चंद्रा मणि के देवी के हृदय को काट ने लगी व्यथित करने लगी विवाह जौतुक देवा होया छलो विवाह में दहेज देना हुआ था तद उपरी सामाजिक संभ्रम र कार्थ लाहा बाबू दे निकट होते को एक खाना अलंकार आनिया बालिका बधु बधु के विवाह दिने सजाते होया लो इसके अलावा भी 00 रप दहेज भी दिया था कन्या पक्ष को और इसके अलावा सामाजिक प्रथा की रक्षा करने के लिए दरिद्र गृह में तो कोई अलंकार जवाहरात कुछ नहीं था तो लाहा बाबू के घर में से कुछ जवाहरात लाकर के अलंकार लाकर के बालिका वधु को सजाया गया था विवाह के दिन किंतु उच बांधते अबोध और दु हित्र सदृश बालिका अंगो होई ते कौन प्राण अलंकार उन्म चन करी विवाह के बाद में पुत्रवधू और अपनी खुद की बच्ची के समान मां शारदा के श्री अंग से देह से किस तरह से इन अलंकारों को वापस ले ले इहा भाभिया चंद्रा मणि देवी दुख भारा क्रांता होई लेन यह सोच कर के चंद्रा मणि देवी बड़ी ही दुखित हो गई बुद्धिमान श्री रामकृष्ण अचरे माता समस्या जानी ते पारले एवं आश्वासन दले बुद्धिमान श्री राम कृष्णा वैसे तो सभी चीजों में इंप्रैक्टिकल है किंतु हमने पहले भी कहा था ठाकुर कहते हैं ना मास्टर महाशय को अर वस्त्र थाके ना किंतु तब अमी छाता टा आता भुले आश ना माने वो कहीं वो मेरे वस्त्र भी नहीं रहते किंतु फिर भी मैं छाता वगैरह कभी भूल के नहीं आता वो वहां पंचवटी में गए थे कीर्तन वगैरह हुआ था छाता लेकर के मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में गए थे वापस आए तो छाता भूल गया तो छाता यानी या की छत्री अंब्रेला तो वह छाता भूल कर के आए थे तो ठाकुर ने कहा था इस तरह से बोलना पड़ा कि मैं जब समाधि में चला जाता हूं मेरे देह पर अंग पर वस्त्र तक नहीं रहते दिगंबर हो जाता हूं किंतु फिर भी यह सब चीजों में मैं भूल नहीं करता बाबूराम महाराज वो कहां गए थे बाजार में कोई पात्र खरीदने लिए के लिए जब वापस आकर देखा तो उसमें दरार पड़ी हुई थी तो ठाकुर ने क्या कहा था भक्त हो भी बोका हो भी कहना भक्त होना है मूर्ख थ ना होना है तो ठाकुर भक्त थे किंतु मूर्ख नहीं थे तो इसीलिए यहां पर महाराज ने क्या लिखा है बुद्धिमान श्री राम कृष्ण ठाकुर को कहा है बुद्धिमान यह सब चीजों में किंतु ठाकुर बड़े बुद्धिमान थे बुद्धिमान ठाकुर ने इमीडिएट मां की समस्या समझ ली और आश्वासन दिया कि इस जन चिंता कोरा निष्प्रभ बधु नित्र सु जोगे तीनी कौशल अलंकार कोई खानी खु जाती जब मां शारदा सोई हुई होंगी बच्ची तब उनके अंग से वह गहने लेकर के मां चंद्रमण देवी को दे देंगे कार्ज तो ताहा होलो और वही वास्तव में वही हुआ श्री रामकृष्ण एमन साबूदाने वहा उन्म चित करले श्री रामकृष्ण ने इतनी सावधानी से गहने निकाले कि श्री मां जानी पारले ना मां को पता भी नहीं चला किंतु सज्जा त्यागा तीनी जोख निजो अंगो भूषण हीन देखि लेन जब किंतु सज्जा त्यागा अर्थात की निद्रा के बाद में उठ कर के बच्ची ने देखा कि उनके अंग पर गहने नहीं है तो खन तीनी होतो ग्रीबा बाहू इत्यादि दिखाया बोली लेन तब उन्होंने अपने छोटे-छोटे हाथ अपनी गर्दन और अपनी यह कलाई इसको दिखा कर के कहा आमार एखाने खाने जे गहना छलो ता को थाई गलो मेरे यहां पे यहां पे जो आभूषण थे वह कहां गए छोटी बच्ची है उसको तो बेचारी को कुछ पता भी नहीं है कि गहनों का नाम क्या इसको हार कहते हैं इसको चूड़ी कहते हैं यह भी शायद मां को नहीं पता होगा इसके लिए उन्होंने क्या किया अपनी कलाई अपनी थैली अपनी अपनी गर्दन ऐसा सब दिखा करके पूछा कि यहां पर यहां पर जो मैंने गहने पहने थे वोह कहां गए सोरोला बालिक मुखे ई रूप कथा सुनिया चंद्रा देवी सासु नयने ताहा के कोले तुल ले लेन सरला बालिका बेचारी सरल बालिका है और अपनी बच्ची जैसी ही है उनके मुंह से जब यह बात सुनी तब चंद्रा मणि देवी की आंखों में आंसू आ गए और बच्ची को अपनी गोद में उठा के लिया और सांत्वना देते हुए कहा मां गदाई तो मां के रचयो भलो भलो अलंकार परे कतो देवे मां गदाई तुमको बाद में इससे भी अच्छे-अच्छे अलंकार कितने देगा देखिए आज रामकृष्ण मिशन के पास में राम कृष्ण संघ के भक्तों के पास में इतनी संपत्ति है हम लोग कोटि कोटि अलंकार लाकर के के चरणों में हम लोग दे सकते हैं इतना पावर आज रामकृष्ण मिशन के पास में है इ हाते बालिका शांत हैले से दिने तहर खुलता कामर पुकुरे आशिया स्नेहो पुतली भ्रात पुत्री के नीरा भावना देखीते पायले नीरा भरणा देखीते पायले एवं क्रोध भरे ताहा के कड़े तुलिया जयराम बाटी चलिया गले यह बात सुनकर के मां तो शांत हो गई किंतु मां के घर से जो आए थे मां को मिलने के लिए उन्होंने देखा कि मां के शरीर पर गहने नहीं है तो वे लोग नाराज हो गए और मां को लेकर के जयराम बाटी वापस चले गए इस घटना को लेकर के हम इतना सारा डिस्कशन कर सकते हैं किंतु आज समय समाप्त हो गया है कल इसके बारे में थोड़ा सा और ज्यादा चिंतन करेंगे आज यही ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु