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ओ स्काय धर्मस्य सर्वधर्म स्व अवतार षय राम कृष्णा यते नमः तो आज फल हारिणी काली पूजा भी है और मां के हमने देखिए अभी तक दो स्वरूप देखे एक तो स्वरूप है कि वही बालिका के रूप में जगत धत्री के सामने जब ध्यान करती है तो लोग अवाक होकर के रह जाते हैं कि जगत धात्री कौन है वह मूर्ति में मां जगत धात्री है न कि इस बालिका में मां जगत धात्री है श्री राम कृष्ण स्वयं युगा वतार स्वयं उनको पूजा करते हैं उनकी पूजा करते हैं और मां भी भावा उनकी पूजा ग्रहण करती है मां वैसे जिस तरह से मां का एक भाव था कि अपने पति के प्रति अपनी जो एक भारतीय परंपरा है कि सहधर्मिणी जिनको कहते हैं पत्नी को वह अपने पति के प्रति कितना आदर और श्रद्धा रखती है तो मां कभी ऐसा होने देती कि ठाकुर को उनकी पूजा करने देती ऐसा तो होगा नहीं किंतु जब ठाकुर ने मां की पूजा का प्रारंभ किया तब मां जैसे कि बावा विष हो गई उनका मन एक सुपर कॉन्शियस लेवल पर चला गया जहां पर भी जहां पर जाकर के उनको अपना जो सही स्वरूप था उसका दर्शन होने लगा उसके साथ में उनका तादात्म्य हो गया तो उस लेवल पर जाकर के उन्होंने ठाकुर की पूजा ग्रहण की तो तो यह एक स्वरूप हो गया कि वो उनके भीतर का जो दिव्य जगन माता स्वरूप है उसके साथ में उनका तादात्म्य है और दूसरा स्वरूप कि डा जेंटर से भुगत करके उनके शरीर की अस्थि चर्म सार मात्र गंभीरानंद जी महाराज जिस तरह से वर्णन करते हैं सिर्फ उनके शरीर में यह चमड़ी और हड्डिया यही रह गए हैं और कुछ रहा नहीं ऐसा शरीर लेकर के जलाशय के किनारे पड़ी हुई है जलाशय में पानी के भीतर में अपना प्रतिबिंब देखती है और कहती है कि अरे यह कुरूप चेहरा यह कुरूप शरीर और इस तरह का बीमारी लेकर के रहने का क्या लाभ है क्या प्रयोजन है चलो मैं देह त्याग कर देती हूं अपने स्वधा चली जाती हूं तो वह एक दूसरा स्वरूप है मां का यह सुनकर के हमारे मन में अवश्य प्रश्न होगा कि यह कंट्रक्शन क्यों मां के जीवन में यदि व पृथ्वी पर आई है जगत का कल्याण करने के लिए तो उनके पास में यह सब दिव्य शक्तियां नहीं होगी क्या जिसके माध्यम से वह एक सुखी जीवन जी सके फिजिकली फिट हो जिससे कि उनका मन उनका समय लोगों के कल्याण के लिए बीते नहीं कि अपने खुद के शरीर की फिक्र करते हुए यह दाना काली का उदाहरण हमको सबको पता है वो जैसा गिरीश घोष था तो वैसे ही गिरीश घोष का मित्र दाना काली जुगाड़ी था शराब पीता था घर आकर के अपनी बीवी की पिटाई करता था उसका अपमान करता था तो उसकी पत्नी दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास आई ठाकुर को आकर के कहने लगी मेरे पति मुझे मारते भी हैं और शराब भी पीते हैं और सब कु कार्य करते हैं जो कि उस समय के वोह उस सर्कल में वह प्रचलित थे तो उससे आप मेरी रक्षा करवाइए मेरे पति को सद्बुद्धि दीजिए तो ठाकुर ने उसको मां के पास में भेज दिया जाओ मां के पास में जाओ मां को छिला करेगी वो बेचारी आई मां के पास में बड़ी ही आशा लेकर के व अपनी कहानी का वर्णन करने लगी कि मेरे पति ऐसे हैं और फिर मैं ठाकुर को प्रार्थना किया तो ठाकुर ने मुझे आपके पास में भेजा है तो मां कहने लगी अरे मेरे पास में आकर के क्या होने वाला है जाओ ठाकुर को ही कहो वही तो मैंने साधन भजन ईश्वर का दर्शन समाधि वगैरह तो उनको हुए है मुझे क्या है मुझे मुझे पास तो कुछ नहीं है तो बेचारी गई वो दाना काली की पत्नी फिर से ठाकुर के पास में तो ठाकुर ने कहा नहीं नहीं उसी के पास में जाओ जो कि नबत में रहती है नबत में अर्थात की मां तो जाओ वापस तो फिर से मां के पास में आई तो मां ने फिर से ठाकुर के पास भेजा मुझे क्या पता मैं क्या कर सकती हूं ऐसा करके जैसा तीन चार बार हुआ फिर मां ने देखा कि ठाकुर भी पीछा नहीं छोड़ रहा है और यह भी पीछा नहीं छोड़ रही दोनों देखिए कि पहले तो है कि ठाकुर चाहते थे कि मां अपना स्वरूप धीरे-धीरे प्रकट करें तो यह तो एक बात हो गई दूसरा क्या है यहां पर फैक्टर कि दाना काली की पत्नी की श्रद्धा को भी देखिए 8 वन पॉइंट ऐसा हो सकता है कि वो बेचारी सोचेगी कि ठाकुर वैसे ही मेरे साथ में ऐसा कोई मजाक कर रहे हैं कटाक्ष कर रहे हैं बेटर है कि मैं अपने घर चली जाऊं इनकी इच्छा नहीं है मुझे आशीर्वाद देने की या मेरी समस्या का समाधान करने की य सब सोच कर के हो सकता है कि वह घर वापस भी चली जा सकती थी किंतु नहीं ठाकुर के ऊपर में भी भरोसा है मां के ऊपर में भी भरोसा है ठाकुर के ऊपर में भरोसा इसलिए क्योंकि ठाकुर ने मां को पास भेजा है तो फिर भी तो उस ठाकुर के ऊपर में विश्वास से मां के पास में आती है और बार-बार मां के पास में इसलिए आती है कि अल्टीमेटली मां के ऊपर में भी भरोसा है कि हां मां सही में कोई इलाज करेगी तो आखिर में फिर मां ने देखा कि बार-बार ठाकुर मेरे ही पास में भेज रहे हैं तो फिर मां ने क्या किया एक बिल्व पत्र पर ईश्वर का नाम लिख कर के वो उसको दिया और वह उस पत्र को ले जा जा करके अपने घर में कहा कि यह नाम जप वगैरह थोड़ा सा करना तो करते-करते कितने साल बीत गए फिर आखिर में दाना काली के जीवन में सही में परिवर्तन आया और वैसे तो शराब पीता था वैसे तो जुआ भी खेलता था किंतु पत्नी के प्रति उसका जो व्यवहार है वो धीरे-धीरे करके वो माने जो एब्यूजिंग उसका रिलेशन था वो धीरे-धीरे करके नॉर्मल होने लगा पत्नी के ऊपर में अत्याचार बंद कर दिया उसने और आखिर में एक एक दिन वो ठाकुर के पास में आया तो ठाकुर के पास में जैसे ही आया ठाकुर ने इमीडिएट कहा देखो इसको 12 साल अपनी पत्नी को त्रास देकर के आखिर में उसके मन में परिवर्तन हुआ है और वह मेरे पास में आया है तो यह बात सुनकर के दाना काली तो एकदम आश्चर्य चकित हो गया अरे कि मने उसको तो पता ही नहीं कि उसकी पत्नी 12 साल पहले ठाकुर के पास आई थी ठाकुर ने कुछ इलाज दिया है उसके परिणाम से उसके खुद के जीवन में कुछ परिवर्तन आया और वो आखिर में ठाकुर के उसको तो पता ही नहीं यह सब कुछ तो देखिए कि यह तो मां का असली कार्य था कि कलकत्ता में इस जगत में जो लोग संसार यातना से भुगत रहे हैं उनके जीवन में अमृतम उपदेशों का ईश्वर की वाणी का प्रचार करना तो यह तो मां का कार्य है व वो नहीं करके मां अपनी ही बीमारी से त्रस्त होकर के अपने ही वो जलाशय के किनारे शरीर त्याग करने के लिए तैयार हो गई है तो उन के जीवन का प्रयोजन क्या रहेगा ठाकुर ने कहा जब हृदय को कि यह आती है और जाती है जीवन में जो करना है वो वो कब करेगी तो हमको इस बात को हम कितने तरीकों से इंटरप्रेट कर सकते हैं एक तो है तरीका कि हां मनुष्य जन्म का कर्तव्य है ईश्वर दर्शन साधन भजन व कब करेगी यह भी तो एक इंटरप्रिटेशन है किंतु साथ में इसका तो हम कह सकते हैं काउंटर करके कि अरे भाई मां तो जगत जननी स्वयं है जिनकी साधना हम लोग करते हैं जिनके दर्शन करने के लिए हम जन्म जन्मांतर भटकते हैं वह स्वयं देह धारण करके पृथ्वी पर आई है उनको साधना करने की उनको क्या जरूरत है उनका खुद का चेहरा देखना है क्या उनको हमको तो मां का चेहरा देखना है जगन माता का चेहरा देखना है जगन माता को साधना साधन वजन करके किसका चेहरा देखना है खुद का चेहरा यदि देखना है तो आईने में देख ले जलाशय में पानी में प्रतिप देख ले अपना उनको क्या साधन भजन करने की जरूरत है तो दूसरा भी तो एक इंटरप्रिटेशन है कि उनका कर्तव्य देह धारण करने के बाद में हम लोगों को आशीर्वाद देना हम लोगों को आध्यात्मिक उपदेश देना हम लोगों के जीवन में आध्यात्मिक उन्नति कैसे हो वह बताना यह उनके जीवन का कर्तव्य है खुद बार-बार बीमार रहेगी तो हमको किस तरह से हमारी रक्षा किस तरह से करेगी ठाकुर की खुद की बीमारी के समय में ठाकुर के भक्तों के दो गण दो पार्ट हो गए दो ग्रुप बन गए एक ग्रुप कहने लगा कि ठाकुर तो देह धारण करके आए हैं तो देह के जितने भी धर्म है जन्म मृत्यु जरा व्याधि वह सब उनको पालन करने पड़ेंगे जैसे कि हम लोग करते हैं और इसके अनुसार उनके शरीर में जब व्याधि प्रवेश की है तो सही सही में कष्ट हो रहा है और हमारा कर्तव्य है संसार त्याग करके उनकी सेवा करने का तो यह तो एक ग्रुप हो गया दूसरा ग्रुप सोचता है कि ठाकुर ने ये किस तरह से एक माया का खेल किया है जिसकी वजह से वह ऐसा दिखाते हैं कि मुझे हां कठिन व्याधि हुई है किंतु इसका प्रयोजन एक ही है कि हम सब भक्तों को काशीपुर में इकट्ठा करना हम सबकी सेवा लेना जिससे कि क्या है कि हमको आशीर्वाद मिलने का एक सुंदर मौका उनको मिल जाए तो ठीक है तीसरा एक ग्रुप था किंतु वो ग्रुप क्या सोचता था जिसमें कि यह भवनाथ था ये भवनाथ जैसा उच्च कोटि का एक साधक था वो क्या सोचता है कि ठाकुर जद अपनी ही कुछ रक्षा नहीं कर पाते हैं तो हमारे जीवन में हमारे लिए क्या करेंगे ऐसा सोच कर के कुछ लोगों ने उनके पास में आना बंद कर दिया तो जैसे बीमारी होती है तो सभी लोग सोचते हैं कि भाई वो अपनी खुद की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं तो हमारे लिए क्या करेंगे तो मां के जीवन में भी जब बीमारी आई मां बार-बार ऐसा भुगत रही है इसके बाद में भी बीमारी का वर्णन है और भी वर्णन है बहुत सारे वर्णन है आखिरी तक ये कुवाल पाड़ा जयराम बाटी कलकत्ता बार-बार मां को काला ज्वर हो जा रहा है डायेंट हो जा रही है क्या सब कुछ मां के साथ में होता है पूरा जीवन ही तो जैसे कि बीमारी से एक के बाद एक बीमारी आती जाती रहती है उनके शरीर में कभी भी ऐसा हम नहीं कह पाएंगे कि मां का शरीर थोड़ा सा सुस्त था एक पीरियड है मां के जीवन में यदि हम कहेंगे कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जो यह वृंदावन वगैरह जो तीर्थ यात्रा के लिए गई पुष्कर सरोवर वगैरह तो उस पीरियड को हम कह सकते हैं जब कामर पुकुर में वो रही थी उस पीरियड को हम थो थोड़ा सा बीमारी से फ्री हम शायद गिन सकते हैं कि उस समय में ऐसा कोई वर्णन नहीं है कि वह बार-बार बीमार हो जा रही है किंतु बाकी जितने भी वर्णन है सब समय यही राम कहानी मां के नसीब में जैसे कि लिखी हुई है तो एक और है जगत जननी जगदंबा स्वयं जिनकी पूजा श्री राम कृष्ण देव करते हैं जिनकी पूजा से जिनकी शक्ति के आधार से श्री राम कृष्ण जगत में धर्म चक्र प्रवर्तन करने का प्रारंभ करते हैं वो शक्ति जो है स्वयं आध्या शक्ति और एक दूसरी और वो स्वरूप है मानवीय स्वरूप कि कहां राधु के पीछे मार दौड़ी दौड़ी घूमती है किसी ने बोल ही दिया कि मां आपके जीवन में राधु के प्रति इतना आकर्षण ठाकुर के जीवन में तो देखा है कोई भी आसक्ति नहीं है बिना बिल्कुल अनासक्त होकर के बैठे हैं और आप रात दिन राधु राधू करते रहते हैं यह कैसी विडंबना है तो पहले एक दो बार तो कोई मां को ऐसा कुछ कहता था तो मां बड़ी ही दीनता से उत्तर देती थी आमरा तो में मानुष हमरा तो र कमी हम लोग तो स्त्री है हम लोग तो मां है मातृ हृदय है हमारा हम लोग तो ऐसे ही है कोई भी स्त्री होगी उसका तो मातृ हृदय होगा ही संतान के प्रति उसका स्नेह प्रेम होगा ही तो हम लोग तो ऐसे ही है ऐसा बोलकर के मां ज्यादातर समय यह सब बातें काट देती थी किंतु आख खिर में एक दिन ऐसा आ गया कि जब किसी ने ऐसी बात की तो मां बड़ी ही नाराज हो गई मां ने कहा मेरे जैसा त्याग तपस्या ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति मेरे जैसा इस त्रिभुवन में दूसरा दिखा दो दूसरा हमार मत आर एक जन के बेर करो देखिए मेरे जैसा और कोई होगा इस जगत में इस त्रिभुवन में तो दिखा दो जो लोग साधन भजन करते हैं उनका मन सूक्ष्म हो जाता है और इस सूक्ष्म मन वो जिस बात के ऊपर में एकाग्र करते हैं केंद्रित करते हैं तो ऐसा ही लगता है कि उस बात के ऊपर में उस चीज के ऊपर में या उस व्यक्ति के ऊपर में उनकी माया हो गई है किंतु ऐसा नहीं है सूक्ष्म मन से किसी भी चीज को एकाग्र करने से ऐसा ही होता है तो मां का दो स्वरूप है यह दोनों स्वरूप यदि हम यह कहेंगे कि मां का आगमन ही हुआ है जगत कल्याण के लिए यह हम स्थिर सिद्धांत रखते हैं तो हमको यह स्वीकार करना होगा कि जिस तरह से वह जगत जननी होकर के आद्याशक्ति जगदंबा होकर के श्री श्री ठाकुर की श्री श्री रामकृष्ण देव की पूजा ग्रहण करती है तो उसके पीछे जो प्रयोजन है जगत कल्याण का वही प्रयोजन से माने अपने जीवन में इस बीमारी को प्रवेश होने दिया है इस बारबार बीमार होकर के भी मां ने एक यही एक संदेश दिया है हमारे आध्यात्मिक जीवन के कल्याण के लिए अभी हमारे ऊपर में है कि यह संदेश क्या है इसको किस तरह से एनालाइज करें इसको किस तरह से अपने जीवन में उतारे मैं जब पहली पहली बार ठाकुर और मां का यह जीवन पढ़ रहा था तो मैं भी सोचता था अच्छा ठीक है यह तो स्टेटस्ट आपको तो बीमार होना ही है ठाकुर और मां बीमार हुए तो इसमें कौन सी बड़ी बात है उस समय का जो युग देखें तो हमको पता है कि एवरेज लाइफ स्पान था भारतीयों का मुश्किल से 30 से 35 साल अर्थात कि ऑन एन एवरेज प्रत्येक इंडियन 30 से 35 साल जीता था और इससे यदि ज्यादा जीते तो बार-बार बीमार हो जाते थे वोह तो युग ही है ऐसा हमारे खुद के उस पुरखों को देखें उस पूर्वजों को देखें उस समय की परिस्थिति को देखें तो पूरा भारत ही ऐसे ता था और भारत कहां पूरा जगत यह जो लाइफ स्पान आज 70 साल 60 साल 75 साल हमको जो दिख रहा है इवन भारत में भी एवरेज लाइफ स्पान आज मोर देन 65 70 के आसपास है वह जो दिख रहा है यह तो आखिर में 15-20 सालों के मेडिकल साइंस के एडवांसमेंट का परिणाम है वरना तो अभी कोई भी एक जैसे कि यह बीमारी है पडेम है ये प्लेग है ऐसा कुछ फैले और आधे लोग मर जाएंगे यह तो बार-बार हमारी हिस्ट्री में होता रहा है ये जो यूरोप में ब्लैक प्लेक बोल कर के एक बड़ी ही भयावह घटना हुई थी यूरोप की वन थर्ड पॉपुलेशन का उसने विनाश कर दिया था तो ऐसी तो घटनाएं हमारे इतिहास में कितनी लिखी हुई है यह 1905 ना कि उसके आसपास में ये स्पेनिश फ्लू चला था स्पेनिश फ्लू की वजह से भारत की वन थड पॉपुलेशन साफ हो गई थी तो ऐसा तो इतिहास में कितनी बार हुआ है तो ऐसा ठाकुर और मां बीमार हो जाए तो उसमें कौन सी बड़ी बात है स्टेटिस्टिक्स समय ज्यादातर लोग गरीब थे उस समय के ज्यादातर लोग बीमार हो जाते थे बार-बार तो जनसाधारण में जब उन्होंने देह धारण किया है तो जनसाधारण का जो स्टेटिस्टिक्स तो यह तो देह का धर्म है उस समय के सभी को जैसे यह धर्म का पालन करना पड़ता था सभी के साथ में जो होता था वह भी उनके साथ में होता है कौन सी बड़ी बात है तो ऐसा मेरा एक समय मानना था किंतु अभी क्या है कि मेरा भाव थोड़ा सा बदला है अभी प्रत्येक छोटी-छोटी चीजों में कुछ ना कुछ में साइन देखता हूं कुछ ना कुछ एक गुड तात्पर्य देखने का प्रयास करता हूं यह सही कितना है गलत कितना है वह तो ठाकुर ही जान किंतु देखिए सब कुछ छोड़ कर के ठाकुर के पास आने का यही तो एक आनंद है ना कि मैं चाहे जितना टाइम मेरा जितना समय मैक्सिमम समय में ठाकुर और मां के जीवन और उपदेशों के ऊपर में चिंतन करने में बिठा बिता सकता हूं और यह चिंतन करते-करते शायद जो नहीं भी है वह भी मुझे दिखता है कि मन का भ्रम भी हो सकता है यह मन की कल्पनाएं भी हो सकती है किंतु इस तरह के गुढा यह सब विश्लेषण करने में एक बड़ा ही उसका खुद का एक आनंद है तो मैं जिस तरह से इस बात का विश्लेषण किया है कि बार-बार बीमार क्यों हो रहे हैं इस बीमारी का क्या तात्पर्य है तो ठाकुर की बीमारी का एक तात्पर्य है जो कि हमको शरत महाराज वगैरह सभी लोग कहते हैं कि जगत के पाप ग्रहण करके उनके शरीर में बीमारी का प्रवेश हुआ है यह गिरीश घोष है स्वामी जी भी कम नहीं थे जब एक समय आया जब लोग ठाकुर के साथ में आर्गुमेंट वो पागली पागली ठाकुर बार-बार आ जा रही है वहां काशीपुर वगैरह में तो यह लोग राजा महाराज राजा ये जो निरंजन महाराज वगैरह है वे लोग कहते हैं कि यह पागली को भगाओ यहां से उसकी मारपीट करके भगा दो और बाद बाद में ऐसा भी कह देते हैं कि हम लोग तो इस पागली का बलि भी दे सकते हैं राजा महाराज को थोड़ा दुख हुआ कहा कि अरे भाई वो तो बेचारी त्रता से है संसार से वो तो बेचारी उसके जो प्रॉब्लम्स है उसके उससे बेचारी इतनी परेशान है कि ठाकुर के पास में आती है कुछ सांत्वना पाने के लिए हालांकि प्रॉब्लम यह था कि ठाकुर को उस समय कैंसर था काशीपुर में ट्रीटमेंट ले रहे थे और यह पागली का ऊपर से मधुर भाव था तो ठाकुर तो मधुर भाव पसंद नहीं करते थे एक बार वोह पागली ने आकर के ठाकुर के सामने मधुर भाव का कोई गीत गाना कि ऐसी कोई बातें करना शुरू कर दिया तो ठाकुर के उनके ऊपर में बिल्कुल बाल्पन का बालक भाव का वो आवेश हो गया वह खड़े हो गए उनके वस्त्र सब चले गए एक साथ में वस्त्र उनके श्री अंग के ऊपर में से गिर गए दिगंबर हो गए और दिगंबर होकर पूरे कमरे में टहल रहे हैं और वह चिल्ला करके बुला रहे हैं अरे देखो यह पागली कैसी बातें कर रही है मधुर भाव की बातें तो ठाकुर के लिए तो यह भाव बिल्कुल हालांकि ठाकुर ने मधुर भाव की साधना की है ठाकुर ने खुद राधा होकर के भगवान कृष्ण को पुकारा है तो ये उन्होंने भगवान के साथ में नाता बनाया है मधुर भाव का किंतु किसी व्यक्ति के साथ में मधुर भाव की बातें उन्होंने कभी नहीं की पाग भैरवी ब्राह्मणी भैरवी ब्राह्मणी के साथ में ठाकुर का बालक भाव और मातृ भाव का संबंध था जनरली भैरवी ब्राह्मणी के मन में ठाकुर के प्रति मातृभासा हुआ कि भैरवी ने ठाकुर के प्रति मधुर भाव का आरोप करके मधुर भाव की बातें करना उस तरह के गीत गा प्रारंभ कर दिया इमीडिएट ठाकुर नाराज हो गए कहा कि इस तरह का भाव मेरा नहीं है इस तरह के भाव का स्वरण करो और भैरवी ब्राह्मण ने भी इमीडिएट इस भव का स्वरण कर लिया देखा कि ठाकुर को यह पसंद नहीं है तो ये पागली पागली ठाकुर के पास में आकर के वो स्वीकार करती है कि मेरा आपके प्रति मधुर भाव है तो ठाकुर कैसे चला लेंगे तो अभी जब ये यह सब करती थी और काशीपुर में आती थी तो बाकी के निरंजन महाराज वगैरह है तो वे तो कहते थे इसको भगाओ और इसको जद अपने से ना जाए तो इसको मारो उससे वो भागेगी तो राजा महाराज को थोड़ा सा दुख हो गया कहा कि अरे भाई इसका बेचारी का तो क्या है कि त्रता से दग्ध है ठाकुर के पास में शांतला लेने के लिए आती है इसको मारने की बात क्यों करते हो तो निरंजन महाराज तो बड़े ही स्ट्रांग थे ना तो कहा कि अरे तुमने शादी किया है इसलिए तुम्हारा स्त्रियों के प्रति कोमल भाव है हमारा ऐसा नहीं है हम चाहे तो इसको बलि भी दे सकते हैं राजा महाराज तो शादीशुदा थे उनका तो एक लड़का भी भी हुआ था तो राजा महाराज इस बात सुनकर के बड़े दुखित हो गए बोला कि देखो भाई तुमने इस तरह की बात जो कही है उस बात का क्या अर्थ है माने ठाकुर के पास में जो कोई भी आता है उस सबका ठाकुर के ऊपर में समान अधिकार है तो बात यह है कि ठाकुर को जो बीमारी हुई है उसके लिए हमारे पास में एक रीजन अवेलेबल है वो रीजन क्या है कि जगत के पाप लेकर के उनके शरीर में यह व्याधि प्रवेश किया और यह बात उन के जीवन में पहले भी हुई थी वो जगदंबा दासी मथुर बाबू की बात मैंने पहले भी कही थी कि मथुर बाबू की पत्नी इतनी बीमार हो गई और मथुर बाबू का कालीवाड़ा कालीवाड़ा था उनकी बीवी की वजह से ही था क्योंकि उनकी बीवी रास मणि की पुत्री थी और जमीन जायदाद तो रास मणि की थी मथुर बाबू तो एक गरीब मछुआरे थे तो उसको कहां से उनकी ये जो प्रैक्टिकल सेंस है एक कॉमन सेंस है वो देख कर के रास माण ने को अपनाया था अपनी लड़की का उनके साथ में विवाह किया था तो जद मथुर बाबू की पत्नी का ही जद देहांत हो जाए तो कालीवाड़ा तो ठाकुर के पास में आए ठाकुर को कहा कि यदि मेरी पत्नी का देहांत होता है और कालीवाड़ा चला जाता है तो मुझे इस बात का इतना गम नहीं है जितना गम है कि मैं आपकी सेवा नहीं कर पाऊंगा तो उसकी यह विनती सुनकर के ठाकुर ने उनकी पत्नी की बीमारी अपने सर पर ले ली छ महीने बहुत भुगते किंतु मथुर बाबू की पत्नी उस समय बच गई तो यह भक्त की आरती सुन कर के भक्त की प्रार्थना सुन कर के ठाकुर उनकी उनके पाप उनके कर्म अपने पर ग्रहण करते थे तो यह तो हो गया कि ठाकुर की बीमारी का रहस्य मां की बीमारी का क्या रहस्य है अच्छा अल्टीमेटली जब मां उद्बोधन में गई है सब तरह के पागल लोग आकर के मां को परेशान कर रहे हैं एक बार की घटना तो हमको पता है बड़ी ही फेमस है एक लड़का जोर-जोर से चिल्ला कर के उद्बोधन में कहने लगा जब मां बीमार है और यह सब मां के सन्यासी संतान उन्होंने प्रणाम वगैरह सब कुछ बंद करके रखा है तो एक लड़का आया कहता है मां के पास में दीक्षा लेनी है तो सब सन्यासी संतानों ने कहा मां बीमार है आखिरी समय चल रहा है 1920 के आसपास की बात है तो उस समय अभी तो दर्शन बंद है आप दर्शन नहीं कर पाए तो यह लड़का जोर-जोर से चिल्लाने लगा मां क्या आपकी अकेले की है क्या मां तो हमारी भी है आपके पास में क्या अधिकार है मां के दर्शन बंद कर देने का मां मृत्यु शैया पर सोई हुई है सुना यह सब हल्लागुल्ला तो बैठ कर के इतनी कष्ट से बैठ कर के बैठी अपने बिस्तर में और उन्होंने कहा कि क्या बात है तो लोगों ने कहा उनके पास में जो थे कि यह जो सन्यासी संतान है आपके वो एक लड़के को नहीं आना देना चाहते आपके पास में वो आपके पास में दीक्षा लेना चाहता है तो मां ने क्या कहा कि अरे उसको आने दो हम लोगों का जन्म क्या रसगुल्ला खाने के लिए हुआ है मां ने कितनी बड़ी बात कह दी रसगुल्ला खाने के लिए जन्म नहीं हुआ अर्थात कि पृथ्वी पर आकर के क्या हम आनंद करेंगे क्या हमारे खुद के सुख सुविधा की चिंता करेंगे ना कि भक्तों की सुख सुविधा की चिंता करेंगे भक्तों को आध्यात्मिक कल्याण की चिंता करेंगे तो आखिरी आखिर में यह बात सही है कि भक्तों के आध्यात्मिक कल्याण के लिए उन्होंने अपने स्वास्थ्य की बलि दे दी तो वो तो उस समय की बात है किंतु यह जब शरू शुरू की बीमारियों का जो सिलसिला है उसको आप किस तरह से डिफाइन करेंगे क्या उसी तरह से डिफाइन करेंगे कि जगत के पाप लेकर के उन्होंने अपने शरीर में व्याधि का प्रवेश होना दिया है यह क्या डेफिनेशन है कि जब ठाकुर ने मां की आराधना की शोड़ी के रूप में जगत कल्याण का जो धर्म चक्र प्रवर्तन का जिस जिस शक्ति के आधार पर प्रारंभ किया तो क्या जगत के जितने भी पाप थे क्या उन्होंने मां के श्री चरणों में अर्पित कर दिए जिस तरह से ठाकुर ने अपने जप का फल अपनी जपमाला मां के श्री चरणों में अर्पित की थी क्या ठाकुर ने जगत के पाप भी मां के श्री चरणों में अर्पित कर दिए क्या यह एक डेफिनेशन हो सकती है यह एक एक्सप्लेनेशन हो सकती है मुझे नहीं लगता कि ठाकुर ऐसा करेंगे ठाकुर को यदि जगत के पाप किसी के सर पर डालने ही थे तो वह अपने खुद के सर पर डालते मुझे नहीं लगता कि मां के चरणों में डालते तो वो डेफिनेशन मुझे नहीं लगता कि यहां पर अप्लाई होगी मुझे लगता है कि हम लोगों को प्रेरणा देने के लिए कि हम लोगों के जीवन में यह व्याधि आधि व्याधि उपाधि जब बार-बार प्रवेश करेगी तो यह जो ट्रीटमेंट यह वह जो हम सब थेरेपी वगैरह ले रहे हैं साथ-साथ में ही ईश्वर के ऊपर में भरोसा करें ईश्वर को हम संपूर्ण रूप से शरणागत हो ईश्वर के ऊपर में निर्भर हो यह शरणागति और निर्भरता की कहानी निर्भरता और शरणागति की यात्रा उसमें हम आगे बढ़े यह सिखाने के लिए मां ने यह सब किया कि बीमारी को आने दिया और सिंहवाहिनी के सामने में धरना दिया यह मेरा विश्लेषण है या तो फिर यह मेरा कंक्लूजन है कि ये निर्भर किसी भी तरह से अपने जीवन में से ना चली जाए अदर वाइज इतना सब कुछ सेफ और सिक्योर आज का जीवन है कि हमको लगता ही नहीं कि ईश्वर के ऊपर में निर्भर हो कर के क्या होगा जो लोग इस तरह से भगवान के पास जाते हैं वो लोग कब जाएंगे पता है कि एक तो डर गए हैं कि भाई सर्जरी करनी पड़ेगी या तो कोई सीरियस ट्रीटमेंट लेनी पड़ेगी जिसका कि फिर कोई मतलब कोई शरिंग नहीं है गारंटी नहीं है कि कैंसर वगैरह जैसा रोग है कि आप ट्रीटमेंट भी ले ले सर्जरी भी कर दे फिर भी कोई गारंटी नहीं है कि आप ठीक हो जाएंगे तो ऐसी बड़ी बीमारी के समय डर करके हम किसी भगवान के पास में जाएंगे वगैरह कुछ करेंगे मैं इस अभी एक भक्त को पहचानता हूं अ पिछले साल कि ऐसा कुछ उनकी लड़की के साथ में बार-बार बीमार हो जा रही है तो क्या करेंगे अभी पेडियाट्रिशियंस भी दवाई लेते लेते कितनी दवाई लेंगे तो किसी ने बताया कि यहां पर कोई दरगाह है वहां पर कोई इस तरह से भूत उतारता है ना झाड़ फूंक करता है तो वह बेचारा अपनी लड़की को लेकर के वहां पर गया और वह झाड़ फूक भी करवाया यदि इससे कोई इलाज हो जाए तो यह है कि आप ईश्वर के पास जाते हैं ईश्वर कहो कि भूत कहो भुआ कहो तांत्रिक कहो कुछ भी है एक दिव्य सत्ता एक हायर पावर हायर अथॉरिटी इसके पास में जाते हैं परेशान होकर के भय के मारे कि यदि यही आखिरी जैसे कि हमने एक जनरल प्रैक्टिशनर को दिखाया उससे नहीं ट्रीटमेंट ठीक हुई तो हम स्पेशलिस्ट को दिखाते हैं स्पेशलिस्ट के पास में नहीं हुआ तो हम बंबई कलकाता जैसे मेट्रो सिटी में जाकर के सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाते हैं तो यह भुवा तांत्रिक ये कोई सुपर स्पेशलिस्ट है कि डॉक्टर के पास में जाकर के ठीक नहीं हो रहा है तो मैं य यह दिव्य मने हायर अथॉरिटी सुपर स्पेशलिस्ट के पास मैं जाता हूं इस तरह से जाते हैं ना कि हम अपने जीवन में ईश्वर को प्रवेश करवाने देना चा चाहते हैं हम चाहते हैं कि ईश्वर हमारे प्रत्येक क्षण में प्रत्येक सांस में प्रत्येक पक्षे में प्रत्येक क्षण में ईश्वर हमारे साथ हो हमारे भीतर में वह समाहित हो यह चाहने के लिए ऐसा करने के लिए हम ईश्वर के ऊपर में निर्भर रहते हैं किस उद्देश्य से हम मंदिर में जाते हैं किस उद्देश्य से हम ईश्वर को प्रार्थना करते हैं किस उद्देश्य से हम इनको कहते हैं कि मेरा जीवन आपके श्री चरणों में समर्पित है मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण आप ही के लिए है प्रत्येक सांस में आपके लिए जी रहा हूं प्रत्येक सांस में आप ही का नाम चल रहा है आप ही का नाम जप चल रहा है जिसको कि हम अजपा जप कहते हैं कि प्रत्येक सांस के साथ में जप चलता हो तो जीवन ईश्वर को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में पुकारने के लिए आमंत्रण देने के लिए हम ईश्वर के पास जाते हैं ना कि डर के मारे कि डॉक्टर से तो ट्रीटमेंट होने वाला नहीं है इससे तो सुपर स्पेशलिस्ट के पास में जाकर के बहुत सारा पैसा खर्च हो जाएगा और मेरे पास में इतना रुपया है भी नहीं तो चलो किसी मंदिर में जाकर के श्रीफल ऑफर करके पैसा प्रणामी ऑफर करके मैं कुछ मेरी ट्रीटमेंट हो जाए इसके लिए प्रार्थना करूं उस उद्देश्य को लेकर जाते हैं यह सही उद्देश्य क्या है ईश्वर के ऊपर में निर्भर होने का मुझे लगता है कि वह उद्देश्य सिखाने के लिए मां ने यह सब पूरा जो लीला है पूरा जो नाटक है वह मां ने किया है उनका देह तो शुद्ध सत्व पवित्र था व बीमारी आने का प्रश्न ही नहीं है बीमारी को आने दिया जिससे कि हम लोग यह सब सीखे यह मेरा लगता है कि यह इसके पीछे रीजन हो सकता है
Questions & Answers
लो यहां पर देखिए बहुत बार ऐसा आज जो जिसको मॉडर्न फेमिनिज म कहते हैं ना स्त्रियों के राइट उसमें कि पुरुष के पास में जो राइट है वह स्त्री के पास में होने चाहिए बात बहुत अच्छी है अभी इसके साथ-साथ में यह भी एक है कि यदि मैरिज काम नहीं कर रहा है तो डाइवोर्स ले लो हम लोग क्यों इस पागल पुरुष के पीछे अपना जीवन बर्बाद करेगी तो विदेश में तो आप देखते ही है कि डाइवोर्स का सिलसिला कितना एक सीरियसली चला है जिनको कि सिंगल पेरेंट फैमिली कहते हैं इस तरह के फैमिली कि जहां या तो फादर ही अकेले हैं या तो मां ही अकेली है फिर बच्चों की कस्टडी को लेकर के वह कोर्ट केस वगैरह चलता रहता है और फिर जो कि साइकोलॉजिकल स्टडी हुए हैं बच्चों के जीवन पर इस बात का जो पेरेंट्स के सेपरेशन का जो असर होता है व बड़ा ही डिवा पेटिंग होता है तो यह प्रश्न है कि बहुत अच्छी बात है कि वीमेंस के राइट किंतु ये जो फैमिली छोटी-छोटी तकरार में टूट जाएंगे तो इसका आप क्या सोल्यूशन देंगे ऑन वन हैंड है कि भारतीय परंपरा स्त्री जितना चाहे पति अत्याचार करता रहे बेचारी चुपचाप सहन करती रहे वो एक मॉडल है एक मॉडर्न मॉडल है कि जद पुरुष अत्याचार करने का प्रारंभ करता है तो स्त्री का पत्नी कहेगी कि रखो तुम्हारा अपने पास में मैं तो डाइवोर्स लेकर चली और यह कानून है कि पति को जो पत्नी की संभाल रखनी पड़ेगी यानी कि ऐसा भी नहीं है कि पत्नी चले जाएगी तो कोई फाइनेंशियल डिफिकल्टी होगी पति का जो 50 पर ना कि जो भी कुछ नियम के अनुसार वो एसेट इनकम वगैरह पत्नी को देना पड़ेगा तो विदेश में तो बड़े-बड़े वो धनपति लोग होते हैं ना बिलियनर्स उनके जब डाइवोर्स होते हैं तो न्यूज़पेपर वालों को बड़ा आनंद आ जाता है कि अभी बिलियरटी कितनी संपत्ति उसकी पत्नी के हाथ में जाएगी तो ये दो मॉडल है अपने पास में ये स्त्रियों को पूरा जीवन क्या अत्याचार ही सहन करना पड़ेगा ये एक है और दूसरा की स्त्री बेचारी अपने अत्याचार के सामने बोलेगी किंतु फिर फैमिली टूट जाएगा तो उपाय क्या है आइडियल स्पीकिंग देखिए हम लोगों को उपदेश देना तो बड़ा सरल है कि भाई स्त्रियां सहन करें जिससे कि मैं खुद तो एक जॉइंट फैमिली में बड़ा हुआ हूं और जॉइंट फैमिली में बच्चे होकर के हमको जो बेनिफिट मिलता है काका मामा चाचा चाची नाना नानी मामा मामी दादा दादी सब लोगों का प्रेम हमको मिलता है तो जॉइंट फैमिली का सबसे बड़ा बेनिफिट बच्चों को मिलता है किंतु सबसे ज्यादा सफर करती है उस जॉइंट फैमिली की स्त्रियां मैंने नजरों से देखा है उस समय पता नहीं चलता था किंतु आज मैं जो देखता हूं कि वह मुझे सही में लगता है मेरी एक काकी थी उनके बारे में मैंने देखा कि सही में उनको थोड़ा सफर करना पड़ रहा है मेरी मां के बारे में भी मैंने देखा कि जॉइंट फैमिली में सही में स्त्रियों को रहना थोड़ा मुश्किल तो होता ही है तो हम किस परिप्रेक्ष्य से यह विवाह संबंध जो है यह जो फैमिली लाइफ है उसको एनाला करें आईडियली स्पीकिंग फैमिली लाइफ यदि बनी रहती है तो बहुत अच्छी बात है आईडियली स्पीकिंग बच्चे जदी जॉइंट फैमिली में बड़े होते हैं तो उसके साइकोलॉजिकल बेनिफिट बहुत सारे हैं आज ऐसा जो विदेश में स्टडी जो होता है ना उन लोगों का सभी बातों में स्टडी चलता है तो इंडियन सीईओ इतने सक्सेसफुल क्यों है क्योंकि इंडियन जो बच्चे हैं वो जॉइंट फैमिली में रहने को सीखे हैं और सभी के साथ में नेगोशिएट कर सकते हैं और कजीन वगैरह भी इतने सारे होते हैं तो कि नेगोशिएट करके साथ में रहने की कला हमको आती है अमेरिका में क्या है थोड़ा सा भी कुछ मने आर्गुमेंट हुआ वो उठा कर के दो झापड़ मार दिए मने सीधा फिजिकल वायलेंस प ही आ जाते हैं और ये गन वायलेंस वहां की कहते हैं कि अफगानिस्तान की स्कूले जितनी सेफ जितनी डेंजरस है अफगानिस्तान की स्कूलों में पढ़ना उतना ही उससे ज्यादा डेंजरस अमेरिका की स्कूल में पढ़ना है आए दिन वो फायरिंग होती रहती है वो छ साल का बच्चा ना कि 10 साल का बच्चा घर में झगड़ा हुआ तो बंदूक लेकर के आया और स्कूल में टीचर और अपने मित्रों को शूटिंग उसको फायर करना शुरू कर दिया तो अपने जो लड़के हैं वो माथा ठंडा रख के सबके साथ में नेगोशिएशन करके कंप्रोमाइज करके एडजस्टमेंट करके रह सकते हैं दैट इज व्हाई वी आर मच मोर सक्सेसफुल एज द सीईओ ऑफ मल्टीनेशनल कंपनीज तो ये भी एक स्टडी है तो बच्चों की दृष्टि से हेल्दी फैमिली लाइफ एक जॉइंट फैमिली लाइफ बहुत ही अच्छा है किंतु स्त्रियों की दृष्टि से यह जॉइंट फैमिली लाइफ और यह कंटीन्यूअस एब्यूज जब चलता है तब रिलेशनशिप में रहना बड़ा ही मुश्किल है अब विदेश में जैसे ही मैरेज होता है वो बीवी कहेगी पत्नी कहेगी कि चलो अपना अलग से घर बनाते हैं मैं तुम्हारी मां के साथ में नहीं रहूंगी तो एकदम सीधा कह देती है और वो लड़का भी वो शादी करके तो घर छोड़ के चला ही जाता है शादी तो क्या और 171 साल की उम्र में ही वो घर छोड़ के चला जाता है वहां पर तो ऐसा ही है टीनेजर हुए घर छोड़ के निकलो टीनेजर होने के बाद में यदि आप घर में रहते हैं तो सभी लोग मजाक करेंगे कि ये किस तरह का मां के ऊपर में इतना ये अट्रैक्शन है इसका तो वो है कि वहां प जो इंडिपेंडेंस है स्त्रियों के राइट की जो मूवमेंट चल रही और अपने यहां पे लड़का हो सकता है कि पूरा जीवन माताजी पिताजी के साथ में रहेगा बीवी भी होगी तो उसके घर में आएगी बीवी को अपनी सास के साथ में एडजस्ट करना है ससुर के साथ में एडजस्ट करना है ये दो मॉडल है और जैसे दाना काली का आपने उदाहरण दिया कि उसकी पत्नी ने 12 साल अत्याचार सहन करके मां ने बताए हुए रास्ते पर जब ध्यान करके ईश्वर को प्रार्थना करके अपने पति की मति को सुधारा च इज बेटर इजी उत्तर नहीं है उपदेश देना बड़ा ही सरल है इजी वो नहीं है जो उस सहन कर रहे हैं उसकी शक्ति कितनी है उसको ईश्वर ने कितना यह दिया है अन शक्ति उसके ऊपर में है और पुरुष होकर के स्त्रियों को इस तरह का उपदेश देना व तो बिल्कुल गलत है स्वामी जी ने कहा था हैंड्स ऑफ मने स्त्रियों के राइट्स के बारे में बात करने वाले आप कौन होते हैं उनको फ्रीडम दो उनको नॉलेज दो उनको एजुकेशन दो दे विल फाइंड देर ओन पाथ तो लेट देम फाइंड देर ओन पाथ कि कौन सा पाथ उनके लिए सही है हम लोग तो सिर्फ वो बता करके छूट जाएंगे कि हां ये ये आइडियल है अभी आपको देखना है कि कौन से रास्ते पर चलना है एक्चुअली रिजल्ट ही है शरणागति जब ईश्वर को प्रार्थना करते हैं मेरा पति बीमार है मैं ईश्वर को जो प्रार्थना करता हूं मेरे पति का स्वास्थ्य सुधर जाए दैट इज नॉट द ऑब्जेक्टिव इस बीमारी में मैं ईश्वर के शरणागत होता हूं रदर देन के मैं डूइंग एनीथिंग एल्स दैट इट सेल्फ इज समथिंग सिग्निफिकेंट कि शरणागति ही शरणागति का ऑब्जेक्टिव है जीवन की बड़ी-बड़ी घटनाओं के समय में अब जैसे कि एक उदाहरण है हमारे ऑर्डर में बड़ा ही फेमस है एक महाराज जी अपने उनका नाम अभी मैं भूल गया हूं किसी रिलीफ के लिए जा रहे थे तो रिलीफ में जाते-जाते वह जीप थी उनकी वो सडन उलट गई और पानी में गिर गई वहां पर कोई तालाब वगैरह होगा उसमें गिर गई अभी जीप में तो दरवाजे वगैरह बंद होते हैं ना और जीप जब पानी में गिरती है तो दरवाजा खोलना बड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि ऊपर से चारों ओ से प्रेशर आता है तो कुछ क्षण के लिए तो ऐसा हो गया कि बस अब जी प्राण जाएगा प्राण जाने की बारी आ गई किंतु ठाकुर की कृपा से कैसे भी करके बच कर के निकल आए फिर उन्होंने हेड क्वार्टर में आकर के कहा कि मैं थोड़ा सा रिटायर होना चाहता हूं और यह जो सब रिलीफ वगैरह सब बंद करके मैं एक जगह पर जाकर के बैठ कर के ठाकुर का नाम लेना चाहता हूं तो पूछा कि क्यों भाई इतना अच्छा काम कर रहे थे ये एक्सीडेंट फ एक्सीडेंट तो होता है उसमें कौन स बड़ी बात है इससे डर गए क्या साधु होकर के डर गए तो बोलते ऐसा नहीं जब मृत्यु सामने आ गया था ठाकुर का नाम लेने की बजाय मैं पूरा भय से बिल्कुल पैरालाइज हो गया था तो फिर यह जीवन साधु जीवन का क्या अर्थ है कि मृत्यु सामने और ठाकुर का नाम याद ना आए इसलिए मुझे लगता है कि साधना में कमी रह गई है जाकर के मैं साधना करता हूं जिससे कि मृत्यु समय ठाकुर का नाम याद आए रदर देन कि मैं हाथ पैर पछाड़ और वो अपने बचाव का उपाय करूं वो आप कीजिए उसमें कोई तो अपने बचाव का उपाय करना ही है किंतु ठाकुर का नाम भी तो साथ में याद आना चाहिए उसके लिए जिनके लिए जीवन छोड़ा तो शरणागति इज एन एम एंड ऑब्जेक्टिव इन इट्स ओन सेल्फ यही प्रश्न आपने पहले भी पूछा था और हमारा यही डिस्कशन हुआ था कि कर्म के जो रिजल्ट है उससे उसको कैसे काटे तो एक्चुअली जो कर्म हमारे हाथ से निकल गए हैं प्रारब्ध कर्म या तो आरब कर्म उसमें क्या होता है कि उसका फल तो हमको भुगतना ही है साधना करके लाभ क्या होता है कि वो विवेक बुद्धि आती है वो विल पावर आता है कि भविष्य के जितने कर्म है वो मैं शुभ कर्म करूं रदर देन अशुभ कर्मा जैसे ठाकुर कहते हैं मिर्च खाया है तो तीखा लगने ही वाला है उसका फिर कोई उपाय नहीं है आप एंट एसिड लेते रहिए वो एक बात है तो तीखा तो लगना ही लगना है उस तीखे पन को आप काटने नहीं वाले हैं तो वैसा ही जैसा आपने कहा कि लॉ ऑफ द कं सर्वेशन ऑफ कर्मा वो पक्का है अभी देखिए दिव्य कृपा एक दूसरी चीज है ठाकुर ने खुद ने कहा है कि कृपा के राज्य में नियम नहीं चलते बड़ा वर्ल्ड फेमस एग्जांपल कि मथुर बाबू को जाकर के बताते हैं कि देखो एक ही पेड़ के ऊपर में जवाब जास्वंद के फूल के दो कलर के फूल आए हैं तो व कृपा के राज्य में नियम नहीं चलता तो वो बात यदि छोड़ दे जनरली नियम तो पक्का है कि जो किया है उसको तो भुगतना ही है किंतु जिस क्षण मुझे होश आ गए उस जिस ण मैंने साधना चालू कर दी तो उसके बाद के कर्म मेरे हाथ में है कर्म में ऐसा अच्छा करूं कि भविष्य के फल मुझे अच्छे मिलने लगे किंतु जद वो भूतकाल के जो दुष्कर्म किए वह तो भुगत नहीं है हां अब ठाकुर जैसा गिरीश घोष ने खुद कहा था कि ठाकुर जैसा मेरे पाप का भार लेने वाला कोई मुझे मिल जाता ऐसा बड़ा गड्ढा कि जिसके भीतर में मैं मेरे सब पाप डाल दे सकता था तो मैं और जाने पता नहीं कितने पाप कर देता हा वो जो जी का वो जो फेमस वो जो है कि हां है ना वो पोयम है तो हम लोगों का मिसफॉर्चून वही है कि हमारे पास में ठाकुर नहीं आने वाले है यह कह के बच्चा तुम पाप करो मैं लेने को तैयार हूं हां माने यह भी एक है कि पैर कटने वाला था तो पैर में सुई लग गई और इससे काम हो गया किंतु उसके लिए भयानक साधना चाहिए फिर मैंने भयानक जैसे कि गिरीश घोष ने ठाकुर को ठाकुर ने बाद बाद में कहा कि जिस कटोरी में लहसुन रखते हैं ना उस कटोरी में से लहसुन की गंध जाएगी नहीं तो गिरीश बेचारा बड़ा टेंशन में है सब भक्त चले गए वो बैठा है और जब चले गए ठाकुर अकेले पूछा कि महाशय रसने गंदो जावे ना कि महाशय वो लहसुन की गंद कटोरी में से क्या नहीं जाएगी तो ठाकुर ने क्या उपाय दिया कटोरी को व आगन में जलाओ तो जाएगी तो किंतु वह कटोरी को आगन में जलाना पड़ेगा तब तो जाएगी वो आगन में जलाना आसान बात नहीं है पागली मामी को देखिए कि मां ने खुद ने श्राप दे दिया था जब वो मां को मारने के लिए गई थी तो मां ने श्राप दे दिया कि तोर हाथ टा से पड़ अर्थात कि तुम्हारा हाथ जो है वो गल के गिर जाएगा तो पागली मामी को सही में कुष्ठ रोग हो गया था तो मैंने पाप का बदला तो मिला ही और राधु को देखिए आखिर आखिर में उसको ज्ञान हो गया था उस ताओ बटे कि संसार सब कुछु सहन करे सो सो सो जे सोय से रोए ज ना सोय से ना रोए जो सहन करता है वो है रह पाएगा नहीं सहन करेगा नहीं रह पाएगा तो नेचरली सहन शक्ति की तो एक शिक्षा देने के लिए और दूसरा है कि देखिए कि यह आक माया ना रहती मां के जीवन में यह माया का एक बंधन ना रहता तो शरीर धारण करना ही मुश्किल हो जाता तो इस माया का आवरण करके माने शरीर धारण करके रखा जिससे कि जगत का कल्याण कर पाए दोनों ओर से आप दे अब इसका उत्तर दे सकते हैं राधु या पागली मामी के भीतर में कोई देवी शक्ति है ऐसा तो ठाकुर ने खुद कह दिया था कि राधु है योग माया और इस योग माया का आश्रय करके तुमको रहना है ऐसा तो ठाकुर ने कह दिया था तो राधु के बारे में हम कह सकते हैं कि वह योग माया थी जिसका आश्रय लेकर के मार रही थी पागली मामी के बारे में तो ऐसा कहीं पर वर्णन नहीं है यह मथुर बाबू का बड़ा ही सुंदर एग्जांपल कहा कि मथुर बाबू ने ठाकुर की इतनी सेवा की आखिर में किंतु जब मथुर बाबू बीमार हुए ठाकुर ने क्या कहा कि सेजो बाबु अनेक भुगते हुए लो बय अनेक किलेन की ना अर्थात की सेजो बाबू अर्थात कीय मथुर बाबू मथुर बाबू को बहुत भुगतना पड़ा था क्यों क्योंकि युवान अवस्था में बहुत भोग किए थे तो उसका तो शरीर पर जो कर्म के अनुसार असर होना है वह तो होना ही होना है तो ठाकुर उनको मिलने के लिए भी नहीं गए थे सूक्ष्म शरीर में जाकर के दर्शन दिए थे तो बिल्कुल ठीक आपने कहा कि कर्म जो है कर्म का परिणाम तो भुगतना ही भुगतना है साधना हमारे मन को सशक्त करती है जिससे कि भविष्य के कर्म हम अच्छे करें पहले के कर्म जो है उसको शायद थोड़ा सा काटे गी शायद थोड़ा सा कम करेगी या तो फिर हो सकता है कि ईश्वर कृपा करके हमारे पास में आए और अपने कर्म ले ले अपने सर पर किंतु वो भुगतने से तो बाज नहीं आने वाले हैं हम लोग बिल्कुल ठीक कहा मधुर भाव से उन्होंने ईश्वर के साथ में रिश्ता बांधा था किंतु किसी व्यक्ति के साथ में मधुर भाव का रिश्ता बड़ा ही डेंजरस होता है उसमें पतन की हमेशा संभावना रहती है मधुर भाव किंतु देखिए हमेशा याद रखिए कि ठाकुर का मधुर भाव का रिश्ता भगवान के साथ में था खुद राधा सोचते थे अपने को और भगवान कृष्ण को अपने पति के रूप में सोचते थे किसी व्यक्ति के साथ में मधुर भाव का संबंध रखना वह बड़ा ही डेंजरस है शारीरिक पतन की संभावना हमेशा रहती है तो इस बात को हम कभी कंफ्यूज ना करें ईश्वर के साथ में मैं भी मधुर भाव रख सकता हूं वह मेरे और ईश्वर के प्रति है किसी व्यक्ति के साथ में रखा तो भयानक डेंजर हु उस भयानक डेंजर है व्यक्ति के साथ में ऐसा कभी नहीं कर वोह बात है बिल्कुल सही बात है कि मां और ठाकुर का जो रिश्ता था यह प्रश्न भी पहले एक बार हुआ था कि क्या ठाकुर और मां का मधुर भाव का रिश्ता था तो नहीं मैंने ऐसा नहीं देखा है और ऐसा देखने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि ठाकुर ने खुद कहा है कि वो मैं मां काली के रूप में मां को देखता हूं और मां ने भी कहा कि मां काली मुझे छोड़ कर के क्यों चली गई ठाकुर के मृत्यु के समय तो ये एक्चुअली ये मैरेज रिलेशनशिप में दो नहीं थे तीन थे ठाकुर और मां का जो मैरेज जद देखे विवाह तो इस दांपत्य जीवन तीन लोगों का था ठाकुर मां और माहाकाली का और तीनों का ही दांपत्य जीवन की तरह था कि ठाकुर मां के भीतर में माहाकाली देखते हैं मां ठाकुर के भीतर में माहाकाली देखती थी तो व्यक्ति के साथ में मधुर भाव का संबंध ठाकुर के जीवन में नहीं देखने में आया