Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Agamani Songs ·

आगमनी गीतों का अर्थ || माँ पार्वती और माँ सारदा || दो युग - एक लीला || 20 Sep 2025

देवी स्तुति

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः देवी स्तुति से आज फिर से प्रारंभ करते हैं। लाली दी को मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि वह देवी स्तुति करें। ब्रह्म देवी स्तुति स्वाहा ही बस स्वरापा सुधा मात्रा िका ज्ञान विशेषतः तमे सावित्री तम देवा जननी पते विश्वम तते जगत देवी नम्याते सर्वदा सृष्टि रूपातम रूप च पालने तथा संते जगतस जगनमय महा विद्या महा माया महा महा मोह भवती महादेवी महासुरी सर्वस्य विभानी काल महत्री मोहना श्री स्वेश्वरी तम जी बुद्ध बोध लक्षणा लज्जा पुष्टि सदा दुष्ट संवारा कली चिनी लथा शंख चार मांडरी परिहार सम्या समंदरी नाम परमा तमे परमेश्वरी य वस्तु सदिक तस सर्वस शक्ति साया दया दया जगत सष्टा जगत यत सो त महेश्वर विष्णु शहरम का शक्तिमान भवे प्रव संता को दुरा जगत स्वामी नीता मोस प्रियतास अंत महासुर प्रभु कंच जगत स्वामी प्रियता कोस प्रियता मसता प्रणाम महाराज वाह खूब वेरी गुड लालिनी तो आगमनी गीत का और एक पर्व

यह सोचकर अब और चिंता मत करो कि माँ के दर्शन होंगे या नहीं। वह सिर्फ तुम्हारी और मेरी ही माँ नहीं हैं, वह तो पूरे जगत की माँ हैं

आज जो पहला गीत हम देखेंगे वह स्ट्रिक्टली आगमनी नहीं है किंतु मातृ संगीत का एक बड़ा ही सुंदर यह एक एग्जांपल है। यह गीत मैंने हमारी चर्चा में इसलिए शामिल किया है क्योंकि एक बड़ा ही सुंदर इंसिडेंट इसके साथ में जुड़ा हुआ है। वर्दा महाराज द्वारा लिखित जयराम भाटी में यह घटना हुई। जबकि जगत धात्री पूजा का उत्सव वहां पे संपन्न हो रहा था। हमको तो पता है कि किस तरह से श्यामा सुंदरी देवी श्री मां शारदा देवी की जननी उन्होंने इस जगति पूजा का प्रारंभ किया। इसके बाद में 12 साल जगत धात्री पूजा हुई। चार बार मां श्यामा सुंदरी के नाम से संकल्प लिया गया। उसके बाद में चार साल मां शारदा देवी के नाम से संकल्प लिया गया। और फिर चार साल है जो उनके चाचा है उनके नाम से संकल्प लिया गया मां के। किंतु जब 12 साल समाप्त हुए उसके बाद में फिर यह सोच चल रही थी कि अभी और पूजा करनी है कि नहीं। उस समय जगत धात्री ने मां शारदा को स्वप्न में आकर के कहा कि अच्छा तो यह दूसरे लोग भी हैं जिनके यहां पर जगत धात्री पूजा करने की बात चल रही है तो मैं क्या वहां पर जाऊं कि नहीं? तो जैसे ही मां जगदात्री ने ऐसा पूछा वैसे ही मां शारदा ने उनके श्री चरण पकड़ कर के कहा कि नहीं आप यहीं पर रहिए। प्रति वर्ष प्रत्येक साल हम आपकी पूजा करेंगे। तो इस तरह से देखिए कि जगत धात्री पूजा उस समय से नियमित जय राम बाटी में चलती आ रही है। हो सकता है आप में से बहुत सारे लोगों ने इस पूजा में उपस्थित रहने का आपको गुड फॉर्च्यून अपॉर्चुनिटी मिला होगा। तो आज एक्चुअली मैंने जो दो गीत सिलेलेक्ट किए हैं दोनों वैसे जगत धात्री पूजा के साथ में ही रिलेटेड है। सर्वप्रथम घटना हमको वरदा महाराज बताते हैं। मां के सेवक क्वालपाड़ा के थे ओरिजिनली। उसके बाद में जयराम भाटी जाकर के नियमित मां की सेवा करते थे। और फिर वहां पे ही मां के साथ में ही आखिर तक वह रह गए थे। तो उस घटना में ऐसा है कि जगत धात्री पूजा के समय वह कुवालपाड़ा से जयराम भाटी जाते हैं। वह सब सहाय करने के लिए एकाएक होता ऐसा है कि उनको बुखार आ जाता है। तो फिर मां ने कहा कि ठीक है तुम यहां पर भंडार गृह में ही एक ओर तुम शयन करो। यह जितने दिन तुमको बुखार है, मैं ही सब कार्य समाप्त करती हूं। ऐसा करके जितने दिन महाराज को बुखार था वह मां ने ही उस दिन कार्य समाप्त किया। दूसरे दिन से किंतु मां को मलेरिया का जो बुखार है महाराज को ठीक हो गया और फिर उस दिन संध्या आरती के बाद में यदि मां का मां के घर का दर्शन करने का मौका मिला हो जय राम भाटी में तो आपको पता होगा कि यहां पर मां का घर है फिर एक वरांडा जैसा है और फिर नीचे में एक चौगान जैसा है एक ओपन स्पेस है तो फिर जगत धात्री पूजा के बाद में संध्या आरती के बाद में जितने भी साधु और भक्त वहां पर उपस्थित थे उन सब ने मिलकर के एक गान गाने की शुरुआत की मां के देखो भले भावना के करो ना आर सेजे तो अमार मां शुध न जगत मां शबाकार मां को देखना है मां का दर्शन करना है इसके लिए तुम लोग चिंता मत करो क्यों क्योंकि वह सिर्फ आपकी और मेरी मां नहीं है। जगत में सबकी मां है। तोमार आार मां शुद्ध सिर्फ मेरी और तुम्हारी मां नहीं है। जगो तेर मां शबाकार जगत में सबकी मां है। अस्पृश्यो चंडाल होते ब्राह्मण आदि शकल जेते एक बार मां बोले जे डाके कबु होई ना निष्फलता। तो इसका लाइन बाय लाइन हम देखेंगे मीनिंग। पहले मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि इस गान को गाने के लिए महाश्वेता दी हां प्लीज गाइए मां बाकी हो ना मां के देखो बोले हा के मां सुध ना ज मा देखो बोले ना क्यों कोरोना मां जो दया हो तो पिया प्रो खुदा तो पृथ्वी विश तो पृथ्वी विश उठा ना मां के दुख को मोया अस चंद होके ब्राह्मण नदी शान होते ब्रह्म नदी जैसे मां बोले दाने को मां बोले दाने को हो ना निष्फो झरे जग से बिंदु छेड़े अंग दारो दारो झरे जग से बिंदु झरे वायु रूप के तुम्हारे बायो रूपे ये तुम्हारे पाका बार वायु रूप तुम्हारे बाकाश पर बार मा के देखो बोले भागो ना की कोरोना छ मामा म मामा बानी सुन बोले भानी छ मामा बानी सुन बोले भानी आके सुने पाके सो पा देखी ना डाके यार मां के देख वो बोले खाना ये कोरोना या से हम मां सुध माजे तुम्हारा मन मा सुरे मा शार मा के देखो बोले खा नारायण वाह खूब भो मां श्वता वेरी गुड देखिए यह कितना सुंदर गीत है कि मां के देखो भले भावना क्यों करो ना आर मां का दर्शन करना है मां को देखना है इस यह सोच के आपको कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है क्यों क्योंकि शेजे तोमार आार मां सुधय जगो तेर मां शभाकार सिर्फ तुम्हारी और मेरी मां नहीं है जगत में सबकी मां है मां का दर्शन करना है मां के पास में खाना मांगना है मां के सामने कुछ मान अभि अभिमान करना है तो हम हमारी मां के सामने किस तरह से यह सब करते हैं। कितना आपन का माने एक अपनेपन का भाव रहता है अपनी मां के साथ में। तो वैसे ही जिस तरह से हम अपनी खुद की मां के साथ में इतना स्नेह का रिश्ता रखते हैं, वैसा ही रिश्ता हमारा जगदंबा के साथ में होना चाहिए। हम क्यों यह सोचे कि जगदंबा कहीं रहती है बादलों में कहीं स्वर्ग में रहती है। कहीं गिरी शिखर पर रहती है। उसके साथ में हमारा दूर का संपर्क है। जब ठाकुर पहली बार भाव के आवेग में आकर के मां की पूजा करना दक्षिणेश्वर काली मंदिर में प्रारंभ किया था। उस दिनों की घटनाएं तो हमको पता है कि ठाकुर मां के साथ में वार्तालाप इस तरह से करते हैं कि जैसे कि वह स्वयं उनके सामने साक्षात उपस्थित है। ठाकुर मां के साथ में वार्तालाप करते-करते कहते हैं मां को शयन करवाने को ले जाते हैं। शयन कक्ष में मां का यह जो शयन के लिए जो बेड़ रखा है तो वहां पर जाकर के ठाकुर मां को पूछते हैं कि अच्छा मां तुम कहती हो कि मैं भी तुम्हारे साथ में शयन करूं। अच्छा ठीक है। जैसे कि मां अपने बच्चे को कहती है कि तुम भी मेरे साथ में शयन करो। वैसे ही ठाकुर भी मां के साथ में उसी बेड पे एक साथ में शयन करते हैं। मां जगद काली के साथ में जगद धात्री के साथ में जगदंबा के साथ में। तो देखिए कि इतना जो क्लोज रिलेशन हम क्यों अपनी मां को पराई माने? यह तो अपनी खुद की मां है। अरूपानंद जी की स्मृति कथा में है कि अ मां के सेवक थे रास बिहारी महाराज। तो रास बिहारी महाराज कहते हैं कि मां को मां के साथ में वार्तालाप हो रहा है। उन्होंने मां को कहा कि मां मैं तुमको आप नहीं कह पाया। मैं तुमको तुम ही कहता हूं। तो मां ने कहा कि अच्छा है तो बेटा यह जैसे एटा जेनो कतो अपना अपनीपनी भाव यह जैसे कि कितना परस्पर स्नेह का भाव है अपना अपनी भाव यह कितना परस्पर अपनेपन का भाव है परायापन नहीं है अपनापन है मां यदि निदया होतो तबे की आर प्रसवितो मां यदि निर्दय होती तो वह क्या जगत को प्रसव करती वह क्या प्रसव करती पृथ्वी सुकाए तो अन्न बिना हाहाकार मां यदि निर्दया होती मां यदि निर्दया होती तो वह क्या प्रसव करती पृथ्वी सूख जाती बिना अन्न के हाहाकार मच जाता जिस क्षण मां ने पृथ्वी को इस समग्र मनुष्य प्रजा को प्रसव किया है उस क्षण हमारा मां के ऊपर में हक है। ठाकुर कहते हैं ना पिताजी की संपत्ति है उसमें हमारा हक है। हम हक मांग करके छीन सकते हैं उनके पास में से। तो यहां पे भी अस्पृश्य चंडाल होते ब्राह्मण आदि शकल जेते जो अस्पृश्य है और चंडाल है वहां से प्रारंभ करके ब्राह्मण आदि ब्राह्मण वगैरह सभी जात का मां बोले डाकिले कब हो ना निष्फलता। यह चंडाल और अस्पृश्य से प्रारंभ करके ब्राह्मण आदि जितनी भी जाति है वह यदि मां बोल के पुकारेंगे कब होए ना निष्फलतार वे लोग कभी भी निष्फलता प्राप्त नहीं करेंगे अंगे दरोद धारे जबबे श्वेद बिंदु झरे अंग से अपने ये जो पसीना जैसे ही टपकता जाता है गिरता जाता है वायु रूप के तुम्हारे बातश कोरे आनी बार जब अपना देह परिश्रम करके पसीने से भरपूर हो जाता है उस समय वायु के रूप में कौन हमको हवा देता है कौन हमको शीतलता देता है तो वह तो मां जगदंबा स्वयं करती है छेलेर मुखे मामा वाणी सुनबेन बोले भबो रानी अपने पुत्र के अपने संतान के मुंह से मां मां वाणी सुनना चाहती है बोलकर के यह भवरानी यह भवरानी है आडाल थेके सुनेन पाछे देखी लेना डाके आर छुप छुप करके सुनती है यदि सामने आ जाएगी तो यह बच्चे लोग मां मां पुकारना बंद कर देंगे तो इसीलिए अपने बच्चों के मुंह से मां मां वाणी सुनना उनको अच्छा लगता है बोलकर के ही भवरानी छुप के हमारी वाणी सुनती है यदि नजर के सामने आ गई तो हम मां पुकारना बंद कर देंगे ठाकुर ठाकुर कहते हैं ना कि यह घड़ा है। घड़े में आप पानी भरते हैं तो आवाज कब तक आएगा? जब तक पानी भरता रहा है, भरा जा रहा है तब तक जैसे ही घट पानी से पूर्ण हो गया तब पूर्ण। उसके बाद में किसी भी तरह का आवाज नहीं आएगा। यह मधुमक्खी है। यह जो गुनगुन करके गान कब तक गुनगुनाती है? जब तक कि ना वह पुष्प के ऊपर में बैठकर के मधुपान करें। जैसे ही उसने पुष्प पे बैठकर मधुपान करना शुरू कर दिया, उस समय उसका गान यह थम जाता है। किंतु फिर ठाकुर कहते हैं किंतु एक बार जब यह मधुपान यह समाप्त हो गया उसके बाद में मन के आनंद से वह फिर से यदि गुनगुन करके गीत गुनाए तो वह ठीक है। वह ऐसा कर भी सकती है। तो यहां पर देखिए नेति नेति के समय भी हम मां मां करके मां का मां को पुकारते हैं। जबकि हम ब्रह्म ज्ञान की ओर जाते हैं और ब्रह्म ज्ञान या तो फिर मां का साक्षात्कार हो जाएगा। उसके बाद में एक स्टेप नीचे आकर के यह साधक है, सिद्ध है, मां का भक्त है, वो फिर से वही मां का गान प्रारंभ कर देगा। यह यह जो भक्त और भगवान यह रिलेशन वो बना के रखना चाहता है। ठाकुर क्या कहते हैं? आमी चीनी होते चाइना मां चीनी खेते चाय मैं शुगर होना नहीं चाहता हूं मां मैं शुगर खाना चाहता हूं तो यह भक्त और भगवान का मधुर संबंध मां और जननी का यह जो मधुर जो नाता है रिश्ता है वही तो है यह शक्ति साधना का हारद शक्ति शक्ति साधना का हृदय या तो फिर कहेंगे हार्ट तो यहां पे भी और यह जो एक लाइन है मैंने हाईलाइट की है इतना सुंदर है मां यदि निदया हो तो तबे की आर प्रसवितो मां यदि निर्दय होती तो वह क्या प्रसव करती पृथ्वी भी सुखाए जे तो अन्न बिना हाहाकार पृथ्वी सूख जाती अन्न के बिना हाहाकार हो जाता तो यह गान उस दिन रात को संध्या आरती के बाद में होने लगा और फिर महाराज कहते हैं यह जो दो लाइन है बार-बार सभी भक्त लोग सभी संतान लोग गाने गाने लगे और मां भी अपने कमरे के बाहर में बैठकर के पूरे गान का आनंद ले रही है। और जब यह दो लाइन है छेलेर मुखे मामा वाणी सुनबेन बोले भबोानी अपने संतान के मुंह से मां मां वाणी सुनने के लिए भवरानी आल थे के सुनेन पाछे देखी लेना डाके आर छुप छुप करके सुनती है यदि दिखने में आ जाएगी तो बच्चे लोग मां का नाम देना बंद कर देंगे तो यह दो लाइन है वह बार-बार भक्त लोग गाने लगे और गातेगाते आनंद के नशे में ऐसे मत्त हो गए। मां भी जैसे कि एकित होकर के यह गान सुन रही है। जस्ट कल्पना करके देखिए कि कितना सुंदर आध्यात्मिक वातावरण वहां पर बना होगा। अपने को हमको यदि जप करना है, ध्यान करना है, एक कंस्ट्रक्ट खड़ा करना है मेडिटेशन करने के लिए तो इससे सुंदर एक सीन कहां मिल सकता है? हम भी इमेजिन कर सकते हैं कि वहीं मां के सामने वह वरांडा में हम भी बैठे हैं। हम भी इन भक्तों के साथ में मां के त्यागी संतानों के साथ में उच्च स्वर से भाव में आकर के बार-बार इसी कड़ी का फिर से हम लोग गान कर रहे हैं कि मां अपने मुंह के संतानों के मुंह से मां-मांहा वाणी सुनना चाहती है। इसीलिए वो छुप कर के सुन रही है। यदि नजर के सामने आ जाएगी तो हम मां मां बोलना बंद कर देंगे। यही दो कड़ियां हम बार-बार रिपीट कर रहे हैं और मां भी है जैसे कि बड़े आनंद से सुन रही है। तो यह सुंदर एक प्रसंग अभी हुआ ऐसा कि दूसरे दिन दूसरे दिन जब मां ने कहा इन सब लोगों को कि अच्छा देखो कि तुम लोग तो यह जो गीत की जो कड़ी है ब्राह्मण आदि शकुल जेते ब्राह्मण और अस्पृश्य चंडाल होते ब्राह्मण आदि शकुल जेते अर्थात कि अस्पृश्य और चंडाल से लेकर के ब्राह्मण आदि जितनी भी जात है मां बोले डाकिले कबु हो ना निष्फलता जो लोग वे लोग यदि मां बोल के पुकारते हैं तो वे कभी भी निष्फल नहीं होंगे तो मां कहती है कि देखो सही में यह कौन ब्राह्मण है कौन अस्पृश्य है कौन चंडाल है यही तो सब नाटक है यहां पे इस गांव देहात में मैं तो चाहती हूं कि मेरे जितने भी संतान है सबको एक साथ में बिठा के एक थाले में भोजन करवाऊं किंतु यहां पर देखिए गांव की प्रथा ऐसी है कि यह कोई ब्राह्मण है ब्रह ब्रह्मचारी कोई अब्राह्मण है, शूद्र है, शूद्र तो शायद नहीं किंतु अब्राह्मण है वगैरह। तो इस तरह के जो मां के संतान है एक थाली में खाएंगे तो गांव में सब बातें उठेगी। उस समय की ये जो फेनेटिसिज्म नाथ जात को लेकर के इतना स्ट्रांग था। तो मां कहती है मैं तो चाहती हूं मेरे सभी संतान एक साथ में मिलकर के एक थाले में खाए। किंतु फिर यहां पर नात जात का बहुत यह सब है और हमको तो पता है ठाकुर और मां और स्वामी जी का तो बताना मुश्किल है किंतु ठाकुर और मां एकदम पक्का है कि ये लोग भांगने के लिए नहीं आए हैं तोड़ने के लिए नहीं आए हैं गढ़ने के लिए कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं। तो पुरानी प्रथा सब गलत है। उसको हटा दो। यह नई प्रथाएं ले आओ। ऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा। उन्होंने कहा कि ठीक है चलो पुरानी प्रथाएं भी जो थी उसका एक आवश्यकता थी उसका एक समय था जबकि वह सब का कोई रिलेवेंस रहा होगा किंतु आज के युग में हमको बेटर प्रथाएं चाहिए तो वो बेटर प्रथाएं यह है। तो स्वामी जी कहते हैं ना कि मैन नेवर ट्रेवल्स फ्रॉम एरर टू ट्रुथ। मैन ऑलवेज ट्रेवल्स फ्रॉम लोअर ट्रुथ टू हायर ट्रुथ। मनुष्य कभी भी गलती से सही की ओर यात्रा जर्नी नहीं करता। हमेशा जो निम्न सत्य है वहां से लेकर के उच्च सत्य तक की उसकी यात्रा रहती है। सब कुछ सत्य ही है। यदि सत्य नहीं होता तो समाज में वह कभी इंप्लीमेंट ही नहीं होता। तो जो भी है इस तरह से मां कहते मां कहती है कि मैं चाहती हूं कि सभी संतानों को एक थाले में बिठा के खिलाऊं। किंतु क्या है कि भात खाएंगे एक थाले में बैठ के तो अन्न खाना। अन्न का एकेंस है। ठाकुर कहते हैं ना मैं कोलकाता में जगन्नाथ का अन्न बलराम का अन्न शुद्ध है। क्यों? क्योंकि वहां पर जगन्नाथ महाप्रभु की सेवा है। वो बलराम भवन में जाकर के बलराम बाबू का वो अन्न खाते थे और कहां पर अन्न तो नहीं खाते थे। किंतु ठाकुर के खाने के शोक बहुत थे। तो हमको पता है कि वो फागगू की वो एक कचोरी की दुकान थी। तो ठाकुर जब भी जाएंगे तो फागगू की दुकान से कचोरी है, जलेबी है वह सब मंगवाते थे। एक बार ठाकुर वो गाड़ी में बैठकर के कहीं पर जा रहे थे तो उन्होंने कहा कि मुझे खाना भूख लगी है। तो रामलाल दादा साथ में थे। उन्होंने गाड़ी खड़ी रखवाई। वो फागगू की दुकान में गए और कहते हैं कि यह जो था वह भी तो ठाकुर का भक्त था। पता चला ठाकुर के लिए ले जाना है तो गरमगरम कचौरी यह गरम जलेबी और फिर खाने के लिए पान और हुक्का ठाकुर को तो यह सब शौक था ना ठाकुर शौकीन थे तो हुक्का पीने के लिए वो जो ये होता है कोयला वो कोयला गरम कोयला यह सब अच्छे से बांध करके वो देता था तो ठाकुर के शौक थे किंतु क्या है कि अन्न नहीं खाना है अन्न के बारे में बहुत सारे नीति नियम है तो यहां पे भी देखिए कि मां ने ठीक किया मां ने वरदा महाराज को कहा कि अच्छा तुम एक काम करो तुम सुबह-सुबह कामार पुकुर जाना और सत्यमरा सत्य बोलकर के कोई एक यह था मिठाई बनाने वाला उसके यहां से जलेबी लेकर आना तो गरमगरम जलेबी तो दूसरे ही दिन अपने वरदा महाराज गए कामरारपुक सत्यमेहरा के वहां से यह जलेबी लेकर के आए फिर मां ने क्या कर किया एक बड़े से थाले में सब जलेबी रख दिया और साथ में यह मुड़ी है अर्थात कि मुरमुरा ये पार्श राइस उसको रख दिया सब चारों ओर सजा करके और फिर सभी संतानों को कहा कि तुम सब लोग बैठकर के खाओ मैं देखती हूं तो लगभग महाराज जी लिखते हैं कि साधु ब्रह्मचारी गृहस्थ कोई भेदभाव नहीं सब मिलकर के प्राय 10 से 11 लोग होंगे एक ही वो थाली में साथ में पास में बैठकर के महा आनंद से यह मुड़ी और जलेबी खाने लगे लगे और पास ही में ही पास में ही मां खड़ी-खड़ी देखकर के आनंद से देखने लगी। तो देखिए कि यह है मां का हृदय कि किस तरह से मां अपने संतानों के ऊपर में कृपा करती है। देखिए मां की कृपा की बातें मां यदि निदया होती तबे की आर प्रसवती अर्थात कि मां यदि निर्दया होती तो वह क्या प्रसव करती पृथ्वी भी सुखाए जे तो अन्न बिना हाहाकार पृथ्वी सूख जाती बिना अन्न के हाहाकार हो जाता तो एक और मां है सहृदया प्रेम से परिपूर्ण दूसरी ई और है यह अन्नदात्री या तो फिर शुभ मंगल वर अभय भय दात्री तो इसी तरह का एक उदाहरण फेमस उदाहरण हमको पता है कि कालीपदो घोष की पत्नी ठाकुर के पास में आई ठाकुर को कहा कि मेरे पति जो है मध्यपान करते हैं शराब पीते हैं और दुर्व्यवहार करते हैं तो उनका व्यवहार ठीक हो उनकी मति ठीक हो शुद्ध हो उसके लिए आप कुछ कीजिए तो पता नहीं ठाकुर उस समय कौन से मूड में थे उन्होंने हंसते-हंसते कहा यहां पास में ही एक स्त्री रहती है। तुम जाओ उसके पास में। उसको यह सब औषध है। औषधि है, मंत्र है। यह सब जो कुछ भी है उसको पता है। तुम जाकर के उसके पास में विनती करो। तो फिर यह घोष पत्नी बेचारी गई वहां पे। वहां पे नौबत में ही मां बैठी हुई थी और पूजा कर रही थी। मां का मन जो है पता नहीं के कौन से उच्च राज्य में विचरण कर रहा था। कहां उर्ध्व कहां वो उच्च आध्यात्मिक राज्य में आध्यात्मिक शिखर पर विचरण कर रहा था। उस समय यह गई घोष की पत्नी और उसने कहा कि मेरे पति की ऐसी अवस्था है। तो वहां पर ठाकुर बैठे हैं। उन्होंने आपके पास भेजा है। कहा कि आपको यह सब जादू टोना मंत्र औषध वगैरह आता है। मुझे कुछ दीजिए। तो मां ने कहा बेटा मुझे क्या पता है उन्हीं के पास जाओ उन्हीं को सब पता है। ऐसा बोलकर के मां ने बेचारी को ठाकुर के पास में भेजा। ठाकुर ने देखा कि रंग रस मचा है अभी तो और ज्यादा आनंद करने के लिए घोष पत्नी को फिर से मां के पास में भेजा। मां ने फिर से ठाकुर के पास भेजा। तीन बार इधरउधर उनको भेजा गया। तब आखिर में मां को लगा कि नहीं यह बेचारी को ठाकुर इस तरह से यह करते हैं। तो क्यों नहीं मैं ही दया करके उस पर आशीर्वाद करती हूं। बोलकर के मां ने एक बिल पत्र दिया पूजा के थाले में से और कहा कि बेटा यह बिल पत्र ले जाओ। इसी से तुम्हारी मनोवांछा सफल होगी। तो वह फिर घोष पत्नी भी यह बिल पत्र लेकर के बड़ी खुशी होकर के वहां से गई और फिर हमको पता है कि किस तरह से मां का आशीर्वाद जो है सही-सही में सफल हुआ और फिर यह दाना काली आखिर में ठाकुर के भक्तों में परिणत हुआ। ठाकुर की जो भक्त मंडली है उसमें वह शामिल हुआ। तो यहां पर देखिए कि मां दोनों ओर से शुभ और लाभ आध्यात्मिक जीवन में जो उन्नति है उसका तो रास्ता मुक्त कर ही देती है हमारे लिए। किंतु साथ-साथ में ही सांसारिक जीवन में जो समस्याएं हैं, सांसारिक जीवन में हमारी उन्नति है, मंगल कामना है, वह भी मां करती है। तो इसका यह एक उदाहरण।

हे उमा, यह कितने आनंद की बात है! लोगों से सुनती हूँ, शिवानी, सच कहना, क्या काशी धाम में तुम्हारा नाम अन्नपूर्णा है?

इसके बाद में और एक सुंदर गीत है। इस गीत का जो रिलेवेंस है वह है हमारे काली कृष्ण महाराज ने इसको लिपिबद्ध किया है। काली कृष्ण महाराज अर्थात कि स्वामी विजानंद जी शुद्धानंद जी के बाद में वही रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट हुए थे। तो वो जब ब्रह्मचारी थे उनको शरद महाराज के साथ में जयराम भाटी जाने का एक मौका मिला था अपॉर्चुनिटी मिला था और जयराम भाटी जाकर के फिर मां का स्नेह जो प्राप्त किया उसकी पूरी घटना उसकी पूरी जो यह स्मृति कथा उसमें उन्होंने लिखी है कहते हैं कि जितने मां जननी जब अपने संतानों को प्राप्त करती है तब मां का आनंद कितना है वह आनंद जैसे कि उनका धरा नहीं समाता वह कितना प्रेम करती है कितना केयर के केयर करती है कितना यत्न करती है क्या खिलाएगी कहां बिठाएगी कैसे उनको रखेगी वो जैसे कि सोच नहीं सकती सब समय संतानों की सुविधा देखने के लिए मां अधीर होकर के रहती है दोनों समय अपने हाथों से खाना बनाएगी अपने पास में बिठा के खिलाएगी और तो फिर आग्रह करेगी कि और ज्यादा खाओ और ज्यादा खाओ। और महाराज लिखते भी है कि मां के हाथ का यह जो अन्न है वो अमृत की तरह लगता है। अपने घर में मां पास में बिठा के गरमगरम रोटी है, गरमगरम चावल है, गरमगरम तरकारी है, वो बना के किस तरह से हमको खिलाती है। बिल्कुल वैसे ही अमृत की तरह मां के हाथ का यह खाना मूर्ति करुणा और प्रेम रूपणी यह मां का अपरिसिम स्नेह। उस समय यह ब्रह्मचारी काली कृष्ण महाराज के हृदय को जैसे कि अभिभूत कर दिया था। तो और फिर क्या है कि मां के वहां पर गए हैं। कामधाम तो और कुछ है नहीं। बस मिलकर के गप लगाना है और मां के प्रेम का आस्वादन करना है। मां के जो आहार है मां अन्न प्रस्तुत करती है। वह बड़े आनंद से खाना है। और फिर उसमें भी शरद महाराज थे। उनको तो हुक्का पीने का बड़ा आनंद आता था। तो फिर हुक्के के लिए जो गर्म कोयला चाहिए तो फिर यह ब्रह्मचारी थे काली कृष्ण वो मां के वो किचन में जाते थे और कहते थे मां कोयला दो तो फिर मां क्या करेगी पता है जो गरमगरम कोयला है उसको जमीन पर रख देगी क्यों क्योंकि नियम ऐसा है कि अपने संतान के हाथ में गर्म कोयला कभी नहीं देते हैं तो फिर वह जमीन पर रखेगी और काली कृष्ण महाराज वह जमीन पर रखा हुआ गर्म कोयला जो है वह लेकर लेकर के फिर शरद महाराज के पास में आएंगे। जो कुछ भी छोटा-मोटा काम है शरद महाराज का मां का वह सब काम वह दौड़ते दौड़ते करेंगे। देखिए सोच करके देखिए शुद्ध मती बालक ब्रह्मचारी मां के पास में आया है और मां भी जैसे कि अपने ही संतान की तरह उनको कितना स्नेह करती है और ये जितना भी छोटा-मोटा है ध्यान करना है जप करना है गप लगाना है खाना है घूमना फिरना है आमोदर नदी के तीर में वो घूमने के लिए जाना है यही तो सब काम है और तो कुछ काम नहीं है और फिर साथ-साथ में ही दीदी मां के बारे में काली कृष्ण कहते हैं। दीदी मां कौन? तो श्यामा सुंदरी देवी। श्यामा सुंदरी मां की जननी। तो दीदी मां के बारे में काली कृष्ण महाराज कहते हैं कि देखिए कि इतना सारा दिन भर सतत कर्म करके रहती है कि कभी भी बिना काम के आप दीदी मां को बैठे हुए नहीं देखेंगे। यहां पर गाय वगैरह है तो उनकी संभाल रखनी है। यह गाय घर है जो उसको परिष्कार करना है। उसको क्लीन करना है। वो खेत में जो मजदूर वगैरह काम करते हैं उनके लिए खाने की व्यवस्था करनी है। धान जो है उसके ऊपर में कुछ काम करना है। जो कुछ भी है गांव में एक देहात में जो कार्य होता है एक घर में सब मां दीदी मां करती जाती है। किंतु चेहरे पे हमेशा हां हास्य कभी भी उनको आप निराश उदास ऐसा नहीं देखेंगे हमेशा वो चीयरफुल रहेगी कभी भी उनको क्रोध करते हुए कि इतने सारे लोग जो काम करते हैं उनको धमकाते काली कृष्ण महाराज कहते हैं कभी नहीं देखा और श्री श्री मां शारदा देवी भी जितना हो सके अपनी जननी श्यामा सुंदरी की सेवा करती थी और उस समय की यह एक बात है कि एक भिखारी वहां पे जयराम बाटी में आया और एक उसने गान गाया। तो यह गान इतना सुंदर कि दीदी मां अर्थात कि श्यामा सुंदरी मां यह जितने भी साधु गए थे कोलकाता से सब लोग एकचित्त होकर के गान का श्रवण कर रहे हैं। यह गान है जैसे कि मां शारदा देवी की जीवनी की हूबहू छवि। एग्जैक्टली मां शारदा देवी का जीवन यह मां ये शिव और शक्ति के जीवन में जिस तरह से डाल दिया हो वैसा ही भाव इस गान में है। की आनंदेर कथा उमे गो मां की आनंदेर कथा उमे तो यह गान करने को पहले मैं रिक्वेस्ट करूंगा। इसके बाद में गान के प्रत्येक लाइन की हम आलोचना करेंगे। किया पाणी लोगो ओ मुख सुनी सुंदर से अनो पूर्ण दुर्मी की आं की आंदे कथा में अपुर ने तुम्हारा जब अर्पण गोरी भोला नाथ छले मुर्ना मुके दारी ना तार दारी देखा इंद्र चंद्र जंदे तुम हो की आंदे म नेपाल तो दीप ना के राजा काशी पुरे राजा का मोरे विशेष बा में आंदे हो आंदे अथा में हिमा दिनो दिनो कैसे कुबेर कानाथ होए कुबेर से आशी विषय बुद्धिला मुनि ताना मोरा प्रांगाना के अपो संतानी ना अपो संतानी ो रे मुके दश नाम में आंदो की आं मुख सुनी सुानी मुख सुनी सुन से आना काशी धानी आंद हो की आंद वाह खूब भो लाली दी देखिए कितना सुंदर गीत है कि आनंदे कथा उमे लोको मुखे शनी शतो बोल शिवानी अन्नपूर्णा नाम तोर की काशी धामे यह किस कितने आनंद की बात है उमा हमने मैंने तो लोग के लोगों के मुंह से सुना है कि क्या लोगों के मुंह से सुना है सत्य बताओ शिवानी कि तुम्हारा नाम क्या काशी धाम में अन्नपूर्णा है क्या क्योंकि क्या है कि देखिए पहले तो कंट्रास्ट देखिए मां उमा के जीवन में विवाह हुआ है भगवान शिव के साथ में घर में खाने को भी कुछ नहीं है किंतु इसके बावजूद काशी धाम में क्या उनको अन्नपूर्णा कह के पुकार रहे हैं यह किस तरह का विरोधाभास दिख रहा है अप अर्पण तोमाए जोखन अर्पण करी भोाना छिलेन मुष्टि रो भिखारी जब तुम्हारा विवाह हुआ था उस समय यह भोाना थे वो तो एक मुष्टि भिक्षा करते थे उसके लिए भी वो उनको भिक्षा करनी पड़ती थी एक मुष्टि अन्न प्राप्त करने के लिए एक नाकी तार भरे आ द्वारी देखा पना तार इंद्र चंद्र जमे एक समय था कि एक मुष्टि भिक्षा करने के लिए भी इनको निकलना पड़ता था भगवान को शिव जी को भोना को आज किंतु परिस्थिति इस तरह से परिवर्तित हो गई है कि उनके घर के सामने एक दरवान खड़ा रहता है घर के द्वार में एक द्वारी खड़ा रहता है। दरवान खड़ा रहता है और इतने इंपॉर्टेंट हो गए हैं कि इंद्र चंद्र यम भी उनका दर्शन नहीं कर पाते थे। खेपा खेपा आबाई बल तो दिगंबरे गोंजोना शची कतो गरे पर लोग इनको दिगंबर खेपा अर्थात कि पागल इस तरह से बुलाते थे और इस तरह के टाने कितने वो यह मैंने सुने थे लोगों की कटाक्ष पूर्ण बातें मैंने कितनी सुनी थी एक नाकी तीनी राजा काशी पुरे विश्वेश्वरी तूई विश्वेश्वर बा में एक वह समय था कि लोग मेरी उमा के पति को पागल है। वह दिगंबर होकर घूमता है। इस तरह के टाने मारते थे। और आज ऐसा समय है कि वही भगवान शिव काशी में राजा बनकर के बैठे हैं। और तुम विश्वेश्वर के साथ में विश्वेश्वरी बनकर के बैठी हो। हिमालय बास होरो करिया छे पिखाई दिनो रखा एमोन दिनो ग छे हिमालय में निवास हर ने किया है भगवान शिव ने किया है और ऐसे भी दिन गए हैं कि खाने के लिए भिक्षा करनी पड़ती है किंतु देखिए कैसा अभी यह परिवर्तन आ गया है। एकोन कुबेरो धनेते काशीनाथ होए छे फिरे छे कि कपाल तोर कपाल क्रमे अभी कुबेर का जो धन है इससे भी ज्यादा धनवान वो काशीनाथ हो गए हैं। क्या तुम्हारा कपाल जो है वह संपूर्ण रूप से फिर गया है। अर्थात कि तुम्हारा जो गुड फॉर्च्यून है वो क्या इस तरह से इंप्रूव हुआ है। देखिए कि एक समय जबकि यही उमा का विवाह भगवान शिव के साथ में हुआ था। लोग टाने मारते थे। लोग पीछे-पीछे बातें करते थे। पीछे कटाक्ष करते थे कि कैसी इतनी सोना सुवर्ण वर्ण की इतनी सुंदरी इतने लाड प्रेम में बड़ी हुई उमा का विवाह यह कहां वो श्मशान में रहने वाले यह भूत पिशाच से घिरे भोाना के साथ में किया है। किंतु अभी परिस्थिति ऐसी हो गई है कि वह काशी में अन्नपूर्णा नाम से यही उमा प्रख्यात है। यही भगवान शिव कि भिक्षा करके खाते थे। अभी उनके वहां पर द्वार पे द्वारी खड़ा है। इतने इंपॉर्टेंट हो गए हैं कि वह विश्वेश्वर है। उनके साथ में उमा विश्वेश्वरी होकर के विराज कर रही है। अभी वह काशी में राजा बन गए हैं और यह इंद्र चंद्र यम यह भी उनका दर्शन नहीं पाते हैं। तो यह जो नसीब जो है फॉर्च्यून है। किस किस तरह से यह फॉर्च्यून ने पलटा मार दिया? यह बात कितना आश्चर्यजनक है। देखिए फॉर्च्यून जो है गुड फॉर्च्यून बैड फॉर्च्यून में से जब होता है तो इसके पीछे का कारण क्या है? वो है आध्यात्मिक जो जो भीतर में जो रियलाइजेशन के रूप में थी वो अभी मैनिफेस्ट हो रही है। ठाकुर के जीवन में मां के जीवन में एग्जैक्टली आप यही देखेंगे कि जब मां जयराम भाटी में थी। विवाह के बाद में अपने पिताजी के घर रह रही थी। सब पूरे गांव के लोग यह कहते थे कि यह पागल की पत्नी है। कहते थे कि श्यामा सुंदरी की लड़की का विवाह एक पागल जमाई के साथ में हुआ है। वो दिगंबर होकर के घूमता है। नगटा खेपा नंगा पागल ऐसा लोग सब उनको कहते थे। किंतु यही जब आप देखिए कि मां शारदा देवी वहां पर गई दक्षिणेश्वर में और ठाकुर ने मां की जब यह शोडशी पूजा की और शक्ति का आवाहन किया शक्ति को जागृत किया और इसी की इसी शक्ति से शक्तिमान होकर के कोलकाता में ठाकुर ने घर-घर जाकर के धर्म चक्र प्रवर्तन करना प्रारंभ किया। तब आप देखिए कि कोलकाता के जितने भी धनी मानी गणयमान व्यक्ति थे ज्यादातर लोग या तो ठाकुर से प्रभावित हुए थे या तो फिर ठाकुर के शिष्य हो गए थे। इसमें सर्वप्रथम नाम आता है केशव सेन का। केशवसेन ब्रिटेन जाकर के वहां की रानी के साथ में उसने मुलाकात की थी। वही केशव सेन चुपचाप ठाकुर के पैरों के सामने बैठा रहता है। यह जितने भी धनी गणियमान मान्य व्यक्ति हैं कोलकाता के यह रामचंद्र है ना कि फिर यह सुरेश मित्र है। यह बलराम बसु है, गिरीश घोष है। यह सभी लोग ठाकुर के पास में आते थे और सिर्फ आते नहीं थे। उनको अवतार बोलकर के उनका प्रचार करने की शुरुआत कर दी थी। और फिर यह स्वामी जी कहते हैं ना कि यह यूनिवर्सिटी के जितने भी ब्रह्मदैत्य है वो जीसस को तो यह जो मछुआरे हैं किसान है उन्होंने जीसस को स्वीकार किया था। ठाकुर को स्वीकार किया था यूनिवर्सिटी के ब्रह्म दैत्यों ने तो यही सब स्वामी जी, राजा महाराज, बाबूराम महाराज, शशि महाराज, काली महाराज उन सब का भी ठाकुर के पास में आगमन होने लगा। तो यह जो एक फ़ॉर्च्यून फिर गया फॉर्च्यून ने पलटा लगाया। कहां वह एक समय था कि ठाकुर अपनी साधना में मग्न रहते थे। क्या खाना क्या पीना कुछ भी होश नहीं था। उनके सेवक यदि उनकी सेवा जिस तरह से करें वैसे ही उनको रहना होता था। और कहां एक समय आ गया कि ठाकुर कल ठाकुर के पास में कोलकाता के सब गण्यमान लोग आकर के उनके सामने बैठकर के या तो फिर अवतार या ईश्वर बोलकर के उनकी आराधना करते हैं या तो फिर अपने गुरु के रूप में उनको स्वीकार करते हैं। तो यह जो फ़र्च्यून ने पलटा मारा है, वही मां शारदा के जीवन में भी वही वह दीदी मां कहती है कि देखिए कि एक समय था मैं सोचती थी कि मेरी बिटिया को कोई मां बोलकर के पुकारने वाला भी नहीं मिलेगा। आज देखिए कोलकाता से इतने सारे भक्त आते हैं। यह ख्वालपाड़ा के सब त्यागी संतान सब मां मां बोलकर के मां को घेरते रहते हैं। तो यह मां के एक भी संतान नहीं था। वहां से लेकर के मां के इतने सारे संतान हुए हैं। तो यह पूरा जो मां के जीवन का यह भाव है दीदी मां कहती है कि देखिए हुबहू इस गान में मां का जीवन हमको देखने को मिलता है। और इसके बाद में देखिए इसी प्रसंग में फिर विजानंद जी महाराज आगे लिखते हैं कि ये श्यामा सुंदरी देवी एक्चुअली क्या कहती है? कहती है हांगो तखन शकली जामाई के खेपा बोलतो शारदार अदृष्ट के धिक्कार दी हांगो सही में उस समय जबकि ठाकुर दक्षिणेश्वर में तपस्या कर रहे थे मां जय राम बाटी में थी सभी लोग जमाई को अर्थात कि ठाकुर को पागल कहते थे और शारदा का जो नसीब है उसको धिक्कार देते थे आमाए कथो कतो कथा शोना तो मनेर दुखे मरे जे तू मुझे कितनी बात सुनाते कि कहां इस पागल के साथ में तुम्हारी पुत्री का विवाह किया। तो दीदी मां कहती है मैं अपने मन के दुख के मारे मर जाती थी। आर आज देखो किंतु अभी आज देखिए कतो सम्रांत तो घरे छले मेरा देवी ज्ञाने शारदार पाप पू जोकर छे कितने अच्छे घर के स्त्री और ये बच्चे बच्चियां पुत्र और कन्याएं देवी के ज्ञान से देवी के रूप में मेरी बच्ची शारदा के पैरों की पूजा करते हैं। तो देखिए ये श्यामा सुंदरी देवी इस तरह से यह अपने मन का भाव व्यक्त करती है। तो यह घटना तो हुई यह गीत भी गाया गया उसके बाद के दिनों की जैसे इतने कुछ-कुछ सुंदर प्रसंग है वीजानंद जी महाराज काली कृष्ण महाराज हमारे सामने रखते हैं कहते हैं कि ये जगत धात्री पूजा उस समय हुई थी महासमारोह से जगत धात्री पूजा भी समाप्त हो गई दुर्गा पूजा के तीन दिन वो पूजा हुई थी वो भी समाप्त हुई किंतु फिर यह जो ये जो जितने भी लड़के थे उनको क्या है कि वहां पे गांव में रहने की ऐसी कोई हैबिट नहीं थी। तो गांव में मच्छर होते हैं। गांव का पानी भी थोड़ा सा उस टाइप का होता है। तो फिर इन सबको यह वीरजानंद जी महाराज है। सानियाल महाशय गए थे। शरद महाराज थे। सबको आ गया। बुखार मलेरिया हो गया। उस समय मां बेचारी कितनी अधीर रहती थी। वहां पे यह जिस कमरे में सभी लोग लेटे हुए हैं वहां पे दरवाजे के पास में आकर के मां वहां पर खड़ी रहती और बोलती रहती मांगो की होबे छेलेरा शकले पड़ेपड़े भुगचे हे मां अभी क्या होगा मेरे मेरे सभी पुत्र पड़ेपड़े भुगत रहे हैं और फिर जितना भी हो सके उनकी सेवा करती थी क्या करती थी अभी बीमार व्यक्ति है तो उसको तो दूध है साबूदाना मिक्स करके करके उनको खिलाना चाहिए। किंतु छोटा सा गांव है कहां दूध मिलेगा? तो फिर मां अपने हाथों में एक पात्र लेकर के गांव में दूध की भिक्षा करने के लिए घरघर जाती और कहती कि मेरे बच्चे बीमार है। थोड़ा सा दूध दीजिए तो दूध पिएंगे तो उनके शरीर में स्वास्थ्य वापस आएगा। देखिए ये हम कल्पना भी कर सकते हैं क्या कि मां हम लोग बीमार है। मां अपने हाथ में पात्र लेके दूध की भिक्षा कर रही है। अपने ही गांव में घरघर जाकर के तो ऐसे करके मां ने दूध संग्रह किया था। फिर इन लोगों को धीरे-धीरे करके दूध पिलाती थी। और फिर जैसे ही दूध पीकर के मां की सेवा से मां के केयर करके मां के यत्न से इन लोगों की सेहत धीरे-धीरे करके ठीक हुई तो उन्होंने ठीक किया कि अभी और ज्यादा यहां पर रहेंगे तो मां को कष्ट ही होगा। तो चलो अभी कोलकाता वापस जाना चले जाए। तो फिर अभी जाने के लिए वह बैलगाड़ी में बैठे हैं। मां वहां पर खड़ी है। मां की आंखों में से अविराम अश्रुधारा और काली कृष्ण महाराज की आंखों में भी अश्रु बह रहे हैं। ये बैलगाड़ी चल रही है और मां पीछेछे आ रही है। तो इन्होंने कहा कि मां आप वापस जाइए। आप कितना हमारे पीछे में आएंगी। किंतु इसके बावजूद कितनी देर तक मां पीछे-पीछे आई। गांव का जो किनारा था वहां पे एक तालाब था। वहां तक मां पीछेछे में आई और फिर वहीं पर मां खड़ी रही। यह बैलगाड़ी जा रही है और मां वहां पर खड़ी-खड़ी एक दृष्टि से अपने संतानों की ओर देख रही है। काली कृष्ण महाराज जब वापस आते हैं तो कहते हैं लिखते हैं अपनी स्मृति कथा में कहते हैं कि मां के बारे में सुना तो था किंतु मां यह इस तरह की मां होगी। मन प्राण से अपने संतानों को स्नेह करेगी। यह बात तो हमने सपने में भी नहीं सोची थी। तो यह देखिए एक प्रसंग काली कृष्ण महाराज का और किस तरह से यह जो गीत है एक इतना सुंदर रूप से मैच होता है। तो अभी और दो गीत बचे हैं। आठ नौ और 10 आई थिंक तीन बचे हैं। तो यह गीतों को अभी हम मंडे से जो क्लास होगा उसमें देखेंगे। आ जाएंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु वो एक्चुअली हुआ ऐसा कि मां के पास में वो सब जो आते हैं तो मां को तो प्रणाम ही देंगे ना तो साड़ी है फिर फल है मिठाई है पूरा पड़ा हुआ था पास में तो वो कृष्ण भानी देवी मोस्ट प्रोबेब्ली उनका नाम था। वो पास में बैठे थे। तो उन्होंने कहा कि देखिए परमहंस महाशय के साथ में तो मेरा ही विवाह होना था। किंतु मेरे पिताजी ने कहा वो तो पागल है। उसके साथ में कहां लड़की का विवाह करेंगे बोलकर के विवाह नहीं हुआ। यदि विवाह हो जाता तो यह सब चीजें मेरे पास में आती। तो मां कहती अरे तुम लो ना तुमको क्या चाहिए? फिर अपने वो [हंसी] वो त्यागी संतान को कहते अरे ये मिठाई है। यह फल है दो इनको। तो बात यह नहीं है कि वो ठाकुर के साथ में विवाह नहीं हुआ उसका दुख है। प्रॉब्लम है कि वो मिठाई फल नहीं मिला उनको इसका दुख है। [हंसी] और दैट इज अ डिफरेंस बिटवीन हर एंड मदर। [हंसी]

माँ सारदा की शक्ति : ठाकुर के भावमुख में रहने का तात्पर्य : कर्म - भाव - ज्ञान

अब जैसे देखिए ये जो मां की शक्ति के बारे में रियली कि डिफाइन करना मुश्किल है। मां दक्षिणेश्वर में जो भी आते हैं ना मुक्त हस्त से खाना खिलाती। मुक्त हस्त से उनके पीछे पैसा खर्च करती। तो ठाकुर को यह सब वो ठाकुर थोड़े से थे अपने शिव के स्वभाव के तो एक बार मां उनके कमरे में आई है खाना लेके तो ठाकुर कहते इतना खर्चा थोड़ी ना करना होता है फिर रहेगा क्या फिर अपने पास में [हंसी] तो जैसा ही ठाकुर ने ऐसा कहा मां वहां से चुपचाप चली गई वहां से कुछ बोली नहीं नाराज भी नहीं हुई किंतु बिना कोई रिप्लाई दिए वहां से चली गई जैसे ही चली गई ठाकुर टेंशन में आ गए वो रामलाल को बुला करके कहते अरे रामलाल जाकर के तुम्हारी चाची को मनाओ वो नाराज होगी तो यहां का सब सत्यानाश हो जाएगा। ऐसा [हंसी] [हंसी] तो क्या है कि मां का किस तरह से रियली अब जैसे कि ठाकुर को कहा गया भाव मुखे रहो। राइट? तो अभी व्हाट इज भाव? देखिए अपेरेंटली दो स्टेट होते हैं। एक तो हमारा मन संसार में लगा है, कर्म में लगा है। शंकराचार्य जिसको कहते हैं कर्म और दूसरा है ज्ञान। अर्थात कि हमारा मन कर्म के राज्य से पार होकर के संस्कार जितने भी है उसको काट करके ब्रह्म ज्ञान में स्थित हो गया है। यानी कि एक और है कि हम कर्म करते हैं। कर्म अच्छा हो, बुरा हो व्हाटएवर किंतु कर्म करते हैं। संस्कार बनते रहते हैं। दूसरा है कि कर्म और संस्कार को पार करके ज्ञान में स्थित हुए हैं। किंतु बीच में जो इलाका है वह भाव का इलाका है। भक्ति का इलाका है। शंकराचार्य माया बोलकर के जिस चीज का त्याग कर देते हैं शक्ति साधना में इसी को शक्ति या देवी स्वरूप गण गिन करके हमको उनकी आराधना करने को कहा है। त्याग नहीं करना है। आराधना करनी है। ठाकुर जिस तरह से हमको एग्जांपल देते हैं कि भगवान राम आगे जा रहे हैं। बीच में मां सीता है, पीछे में लक्ष्मण है। तो लक्ष्मण क्या करते हैं? मां सीता को आराधना करके कहते हैं कि मां आप रास्ता छोड़े तो मुझे भगवान राम का दर्शन होगा। यानी कि माया को काटना नहीं है। माया की आराधना करनी है। दिस एक भाव रूपी जो एलिमेंट है वि इज अ पार्ट ऑफ वैष्णव साधना कहो ना कि शक्ति साधना कहो। शक्ति साधना खास करके शक्ति साधना में यह जो भक्ति जो है उसको देवी के प्रति फेमिनाइन प्रिंसिपल के प्रति उनको यह डायरेक्ट किया गया है। ठाकुर इसको अल्टीमेटली लेते हैं। भारतीय आध्यात्मिक जितना भी पूरा हिस्ट्री है उसका कलमिनेशन जैसे कि शक्ति साधना के रूप में ठाकुर हमारे सामने रखते हैं। ठाकुर बोलकर के हमको क्या लगता है कि क्या ठाकुर ने वेदांत साधना की थी? यह ठाकुर का एक अल्टीमेटली वन लाइन में यदि कहेंगे ठाकुर की साधना तो आप वेदांत साधना भी नहीं कहेंगे। यह वैष्णव भाव साधना है। इवन मधुर भाव साधना है वो भी नहीं कहेंगे। वो अल्टीमेटली ठाकुर की साधना जो है एट द एंड ऑफ द डे शक्ति साधना पर आकर के बात अटक जाती है। ठाकुर ने कहा सब तरह की साधना करके जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई और उनको जो आदेश प्राप्त हुआ भाव मुख में रहो। इसके बाद में जब वापस आए ठाकुर कहते हैं संतान भाव लेकर के मैं वापस आया हूं। पहले तो ठाकुर कहते हैं शंक शंकराचार्य ने भी निर्विकल्प समाधि के बाद वापस आए तो क्या भाव ले तो ज्ञान का भाव लेकर के कि लोगों को यह शिक्षा देनी है। यह नारद या सुखदेव है तो भक्ति का भाव लेकर के शरणागति का भाव लेकर के क्योंकि वह भागवत सुनाना है। ठाकुर आए हैं संतान भाव लेकर के। यानी कि एक और है जबकि इनपुट जो है इनपुट में सब तरह की साधना है। किंतु प्रोसेस हो के जब आउटपुट आता है तो आउटपुट में संतान भाव सर्वोपरि है। बाद में ठाकुर के जीवन में देखेंगे ठाकुर ना ही मधुर भाव में रहते थे ना ही वैसे कोई अद्वैत के भाव में रहते थे। बार-बार कहते हैं कि चीनी खाना चाहता हूं। चीनी होना नहीं चाहता। सो अल्टीमेटली ठाकुर का संतान भाव था। सो दिस इज व्हाट कि मां हमारे मन में क्या करती है? तो संतान भाव को जागृत कर देती है। यानी कि ठाकुर की साधना का जो अल्टीमेट कलमिनेशन है वो हमको मां के कृपा से फटाक करके मिल जाता है। हमको ना ही वो तंत्र साधना करने की आवश्यकता है ना ही वह वेदांत साधना करनी है ना ही वैष्णव भाव साधना मधुर भाव साधना ये वो सब सब स्किप करके अल्टीमेट कंक्लूजन जो है ठाकुर का संतान भाव वो हमको मां दे देती है। सो जस्ट इमेजिन कि जो ठाकुर के लिए अल्टीमेट अह जो स्टेशन है वह हमको ईजीली मिल जाता है। सो व्हाट इज़ बेटर देन दिस?

भारत में शक्ति-साधना और ठाकुर का बालक-भाव

ना एक्चुअली देखिए कि वेदांत में ईश्वर की वैसे तो कांसेप्ट है। अह ब्रह्मण के ऊपर में दो तरह के अज्ञान का आवरण होता है। व्यष्टि अज्ञान और समष्टि अज्ञान। तो व्यष्टि अज्ञान से जीव जगत सब कुछ होता है। समष्टि अज्ञान जिसमें कि सत्वगुण मिला हुआ है उसमें से ईश्वर बनते हैं। वो ईश्वर अभी बनना जन्म ग्रहण करना दीज़ आर ऑल द वर्ड्स। म वो यूज़ करना मुश्किल है। तो एनीवे शब्दों का हमेशा यहां पे प्रॉब्लम रहेगा। अद्वैत वेदांत के साथ में क्वांटम डायनामिक्स के बारे में जो लोगों ने क्वांटम डायनामिक्स इनिशियली डेवलप किया था उन लोगों का कहना था यदि आप ऐसा समझते हैं कि आपको क्वांटम डायनेमिक्स समझ में आ गया तो आपको कुछ समझ में नहीं आया। सो अद्वैत [हंसी] क्योंकि वो इतना विचित्र है क्वांटम डायनेमिक्स। तो अद्वैत वेदांत भी ऐसा विचित्र है। आप समझते हैं कि आपको शब्द मिल गए हैं तो समझ में सही में कुछ नहीं समझ में आया। बट एनीवे आउट ऑफ समष्टि अज्ञान जिसमें कि सत्व का मेजरिटी रहता है ईश्वर प्रकट होते हैं। सो दैट ईश्वर इज़ देयर ओनली थिंग इज दैट दैट ईश्वर की आराधना कोई साधना का पार्ट नहीं है। थ्योरेटिकली वो ईश्वर को लेके आए हैं। बट ईश्वर की आराधना को वैसे कोई प्रोमिनेंस नहीं मिलता है। जबकि ये भक्ति मूवमेंट है उसमें ईश्वर की आराधना इस मुख्य साधना है। ज्ञान मार्ग की जो बाकी साधनाएं हैं एकाग्रता या तो फिर त्याग वह गौण साधनाएं हैं और शक्ति साधना में भी ईश्वर को ईश्वरी में परिणत कर दिया। एक्चुअली फेमिनिन प्रिंसिपल जो है बहुत पुराना है। मोहनजोदड़ो सिविलाइजेशन में भी आप देखेंगे आपको फर्टिलिटी फिगर्स मिल जाएगी। सो प्री वैदिक एज से और सिर्फ प्री वैदिक ही कहां एक्चुअली यह फेमिनाइन प्रिंसिपल की आराधना एज अ सिंबल ऑफ फर्टिलिटी वो तो अपने बिल्कुल प्री हिस्टोरिक टाइम से चली आ रही है। एव्री सिविलाइजेशन हैज़ दिस नॉट ओनली आवर वैदिक सिविलाइजेशन आर सिविलाइजेशन। सो दैट इज़ एन ओल्ड थिंग। बाद में एक्चुअली हुआ ऐसा कि एक्चुअली पुरुष रूपी ईश्वर की आराधना दैट इज़ अ इंटरपोशन इंटरपोलेशन। यह बाद में स्टार्ट हुआ है। जब पुरुष प्रधान होने लगा पहले क्या था? मैट्रिय्किस थी कि मां के नाम से यह लीनिएज गिनी जाती थी। बाद में यह पेट्रियर्की स्टार्ट हुआ। ये युद्ध है वगैरह जो मार्शल जो एलिमेंट्स ऐड हुए तब से यह पेट्रियाकी स्टार्ट हुआ और पिताजी के नाम से यह लीनिएज गिनी जाती है कि यह इस पिता का पुत्र है। उस पिता का पुत्र। वरना प्री हिस्टोरिक टाइम से मैट्रियर्की थी कि इस मां का पुत्र है। उसकी मां यह है। लाइक दैट। सो वो लीनिएज इस तरह से थी। सो फर्टिलिटी फिगर की आराधना, देवी की आराधना, शक्ति की आराधना, मनुष्य समाज जितनी ही पुरानी है। ओनली थिंग इज कि बादबाद में यह जो हायर भाव जैसे डेवलप हुआ ना वे वीर भाव से साधना करना वगैरह-वगैरह गौण होते गए और यह संतान भाव मुख्य होता गया। तो दैट इज द थिंग कि ठाकुर के जीवन का अल्टीमेट यदि आप संदेश देखें तो हमारे लिए संतान भाव है। मां की आराधना करने से मां शारदा देवी की आराधना करने से हम सीधा संतान भाव तक पहुंच जाते हैं। सो दैट इज वन थिंग। दूसरा कि आपने जैसे कहा है उसमें एक तो दम है कि जहां से स्टार्ट किया वहां पे अटक गए। क्योंकि अल्टीमेटली ठाकुर की साधना के दो पार्ट है। एक तो है कि विवाह के पहले जब जय दक्षिणेश्वर में थे तो मन के आवेग से उन्होंने जो प्रार्थना करके मां का ही तो दर्शन प्राप्त किया था वो केनाराम भट्टाचार्य उनके प्रथम गुरु जो कि हम भूल जाते हैं। बाकी सब गुरुओं का जब लिस्ट बताते हैं भैरवी ब्राह्मणी जटाधारी वगैरह तो केनाराम भट्टाचार्य को भूल जाते हैं। बट ही इस ठाकुर के पहले गुरु है और वहां से उन्होंने शक्ति मंत्र प्राप्त किया था और मां काली की पूजा उन्होंने प्रारंभ की थी। तो उसमें आप देखेंगे ना लीला प्रसंग में बड़े सुंदर-सुंदर वर्णन है। मां के साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहा है। बिल्कुल बच्चे की तरह बिहेव कर रहा है। सो इन अ वे यू आर राइट आल्सो दैट वे कि निर्विकल्प समाधि के बाद में ठाकुर फिर से उसी स्टेज में चले गए। जबकि जिसके पहले मतलब कॉम्प्लिकेटेड साधना करने से पहले हृदय के आवेश से उन्होंने जो साधना की थी उस स्टेज में वो वापस चले गए हैं।

प्रश्न: वेदान्त साधना में हम माया से भयभीत होकर उससे दूर भागने का प्रयास करते हैं, पर भक्ति साधना में उसी माया को शक्ति रूप में पूजकर माया से परे हो जाते हैं।

ना ठाकुर एग्जैक्टली इसी टाइप का उदाहरण देते हैं ना कहते हैं सांप के मुंह में जहर है। सांप जिसको दसता है उसको जहर लगेगा किंतु सांप को कुछ नहीं होगा। उसी मुंह से आहार भी करेगा फिर भी सांप को कुछ नहीं होगा। वो शेर को देखा है ना कि शेर शेरनी जो है अपने बच्चे को अपने दांतों से उठा के इधर-उधर ले जाती है। वही दांतों से वह शिकार भी करती है। तो शिकार को पकड़ेगी तो पूरा उसका हड्डी पसली तोड़ देगी। अपने बच्चे को उठाएगी उसी दांतों से। इतना सहजता पूर्वक प्रेम से उठाएगी। बच्चे को कुछ नहीं होगा। सो यू आर राइट। यहां पर क्या है कि माया की जो शक्तियां है तामसिक शक्ति है फिर यह सात्विक शक्ति है तामसिक शक्ति यानी यह काम कांचन की शक्ति तो है ही है मतलब उसके प्रति आकर्षण की और ठाकुर एक बार अपने कमरे के सामने टहलते टहलते वो जब माया आती है मन को लुभाने के लिए तो उसको तिरस्कार करके कहते हैं तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी ऐसा करके उसके साथ में तिरस्कार करते हैं झगड़ा करते हैं तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि क्या माया उनको प्रलोभन दे ले देने के लिए आई है क्या सो वो वो एक तामसिक शक्ति भी है किंतु देवी शक्ति भी है। सो दो तरह की साधना हो गई। एक तो त्याग की साधना दूसरी है शरणागति की साधना। तो अपने संघ में साधना यानी कि ज्ञान मिश्रा भक्ति ये इसको स्टैंडर्ड माना जाता है कि त्याग और शरणागति दोनों का मिश्रण होना चाहिए। आप यदि कहेंगे कि सिर्फ सात्विक शक्ति ही है। तामसिक शक्ति नहीं है। मैं सिर्फ शरणागति की ही साधना करूंगा। त्याग की ऐसी कोई चिंता नहीं है। तो फिर क्या है ना कि वह फिर वो नृत्य नृत्य गोपाल वगैरह जो थे ना कि भाव में आकर के नृत्य तो बड़ा करते थे किंतु बाद में ही वो किसी स्त्री के चक्कर में फंस गए थे। ठाकुर ने कहा साधु सावधान। सो दोनों शक्तियां है। तामसिक शक्ति भी है, सात्विक शक्ति भी है। ओम