प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः इस सप्ताह हम सबका फेवरेट टॉपिक श्री मां शारदा देवी का जीवन और उनके उपदेश [गला साफ़ करने की आवाज़] स्वामी गंभीरानंद जी महाराज महाराज द्वारा लिपिबद्ध श्री मां शारदा देवी पुस्तक का हम पाठ कर रहे थे। चैप्टर जो चल रहा है भार समर्पण।
ठाकुर के दो आध्यात्मिक उत्तराधिकारी : माँ सारदा और स्वामी विवेकानन्द
अपनी महासमाधि से पहले ठाकुर मां शारदा को तैयार करके रखना चाहते हैं। ऑलरेडी एक्चुअली बात यह नहीं है कि मां की मां के भीतर में शक्ति को पूर्ण करना है। मां के भीतर में मातृत्व शक्ति है ही है। जगत के कल्याण के लिए ही उनका अवत अवतरण हुआ है। बस वही बात है कि ठाकुर को उस मातृत्व शक्ति का आवाहन करके उनको फिर से जागृत करना है। तो यही एक कार्य ठाकुर की महासमाधि से पहले हम लोग देखते हैं कि ठाकुर ने दो लोगों को तैयार किया है। उनकी महासमाधि से पहले यह जो राम भविष्य का रामकृष्ण संघ है उसकी यह लीडरशिप है। वह जिनको देना चाहते थे दो लोगों को ठाकुर ने तैयार किया। सर्वप्रथम तो जग विख्यात है स्वामी विवेकानंद और दूसरी है मां शारदा। इन दोनों की आप ट्रेजेक्टरी देखिए कि किस तरह से ठाकुर इन दोनों को प्रिपेयर करते हैं। यहां पर स्वामी जी को जिस तरह से ठाकुर उपदेश देते हैं स्वामी जी के मन में ईश्वर प्राप्ति के लिए जो विरह वेदना प्रारंभ होती है प्रगटित होती है और इस ईश्वर प्राप्ति या ब्रह्म साक्षात्कार के लिए मुमुक्षुत्व या तो फिर व्याकुलता वो उनको किस तरह से एक के बाद एक कठिन से कठिनतर तपस्याओं के दौर से स्वामी जी को पसार करती है और आखिर में काशीपुर उद्यान में स्वामी जी को निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है। अभी यह जो पूरा जो स्वामी जी के जीवन की ट्रेजजेक्टरी है वो नरेंद्र से लेकर के स्वामी विवेकानंद की उनकी जो यात्रा है वही जो युवक ठाकुर के पास में आया था प्रश्न करने के लिए कि महाशय क्या आपको ईश्वर का दर्शन हुआ है? वह नरेंद्र से प्रारंभ करके ईश्वरमय स्वामी विवेकानंद ईश्वरमय निर्विकल्प समाधि में स्थित महापुरुष युगनायक यह जो जर्नी है वो सबकी नजर के सामने से गुजरी है। इतने सारी टेस्टीिमोनीस है आज हमारे सामने कि हां ठाकुर का नरेंद्र के साथ में यह वार्तालाप हुआ। नरेंद्र ने ठाकुर को यह प्रश्न किया। ठाकुर ने उसका यह उत्तर दिया। आप कथामृत पढ़ेंगे। आप गुरु भाइयों की स्मृति कथाएं पढ़ेंगे। ठाकुर के खुद के जो वाक्याला उनकी जो वार्तालाप है उसमें भी ठाकुर बार-बार यह मेंशन करते हैं कि किस तरह से नरेंद्र प्रथम उनके पास में आया था। किस तरह से नरेंद्र मां काली को स्वीकार करने में उसको यह जो एक इंटेलेक्चुअल स्ट्रगल का सामना करना पड़ा था। किस तरह से नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया था और आखिर में किस तरह से सबके सामने काशीपुर में वहां पर ग्राउंड फ्लोर में ठाकुर फर्स्ट फ्लोर में थे और ग्राउंड फ्लोर पर नरेंद्र है। नरेंद्र को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई है। सभी गुरु भाइयों ने उसका दर्शन भी किया और जाकर के ठाकुर को समाचार भी दिया कि नरेंद्र डर गया है। पूछ रहा है मेरे हाथ कहां है? मेरे पैर कहां है? तो ठाकुर कहते हैं वही जििद कर रहा था तो अभी भुगते वो अभी उसको भी समझ में आए कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त होने से क्या होता है तो यह तो सबकी नजर के सामने एक पूरा ट्रेजजेक्टरी पूरा जो कहानी है स्वामी विवेकानंद का वो पार हुआ है किंतु जो मां शारदा की कहानी है सबकी नजरों से दूर इस तरह से नहबत में रहकर के मां ने साधना की किस तरह से ठाकुर मां की यह जो सूप्त मातृत्व शक्ति है उसको जागृत करवाते हैं। किस तरह से मां ठाकुर एक के बाद एक सभी भक्तों खास करके लेडी डिवोटी जो है और यह त्यागी संतान है। इन दोनों को मां के पास में भेजते हैं। तो वह जो मां की जो कहानी है बहुत हद तक लोगों की नजर से दूर यह पूरा जो लीला है मां शारदा की वह संपन्न हुई है। तो यह एक बहुत बड़ा डिफरेंस हमको देखने को मिलता है। दूसरा एक डिफरेंस हमको जो देखने को मिलता है कि स्वामी जी ने समाधि प्राप्त करने के लिए तपस्या जो की इस तरह की कोई तपस्या का मां के जीवन में आप देखेंगे कि इस तरह से ज्यादा कुछ नहीं दिखता। मां का जो डोमेस्टिक लाइफ था, मां का जो एक कम्युनिटी लाइफ था, जिस तरह से मां वहां पर नहबत में रहती थी, वह एक अपने आप में एक बहुत बड़ी तपस्या थी। किंतु एक अलग से मां ने तपस्या की हो ईश्वर प्राप्ति के लिए इस तरह का हमको ज्यादा नहीं दिखता है। जिस तरह से ठाकुर ने विभिन्न तरह की साधनाएं की वैष्णव साधना भाव साधना है। फिर यह शक्ति साधना है। फिर यह वेदांत साधना है। इस तरह की पर्टिकुलर साधन पद्धति को पकड़ कर के माने साधना की हो। इस तरह का विवरण हमको नहीं मिलता। हमको यही एक जानने को मिलता है कि ठाकुर ने मां को एक मंत्र दिया। मां फिर उस मंत्र का जाप कर रही है। सतत कर रही है। इवन मां ठाकुर की महासमाधि के बहुत सालों के बाद में भी जय राम भाटी कोलकाता में मां आती है। जब मां के पास में सब भक्तों का आगमन होता है। तो मां क्या कहती है कि दिन में 1 लाख जप करके देखो। यदि 1 लाख नहीं होते हैं तो एटलीस्ट 10,000 जप करके देखो। क्यों नहीं मिलती है मन को शांति? क्यों नहीं होता है ठाकुर का दर्शन? तो मां के जीवन में जप का ही प्राधान्य था। एक तो था जप। दूसरा था कि किस तरह से वो जो डोमेस्टिक सिचुएशन है यह कम्युनिटी लाइफ जो है उसमें किस तरह से मां एडजस्ट होती है। किस तरह से मां के भीतर में जो करुणा है सहन शक्ति है उसका प्रति एव्री स्टेप प्रत्येक पदक्षेप पे उसकी परीक्षा होती रहती है। तो वह हमने देखा जबकि हम नरेंद्र के बारे में देखेंगे कि ठाकुर नरेंद्र को एक पर्टिकुलर साधन पद्धति वेदांतिक साधन पद्धति का उपदेश देते हैं और उस साधन पद्धति को पकड़ कर के नरेंद्र को निर्विकल्प समाधि होती है। तो यह एक दूसरा एक डिफरेंस देखने को मिलता है। किंतु यह सरफेस लेवल डिफरेंस को यदि हम छोड़ दें, तो हमको इतना तो स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि ठाकुर ने अपनी महासमाधि के बाद में रामकृष्ण संघ के साथ में उन्होंने यह जो धर्मचक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया है, उसके साथ में क्या होने वाला था? क्या होने वाला है भविष्य में? उसकी बहुत लंबी चिंता की है। अब ठाकुर ने ऐसा कोई प्लान नहीं किया कि इतने साल के बाद में इतने सेंटर हम ओपन करेंगे। इतने साल के बाद में इतने साधु यहां पर ज्वॉइ करने के लिए आएंगे। इस इस तरह की मेथोडोलॉजी है। यह कार्य पद्धति है। उसका हम प्रारंभ करेंगे। इस तरह का ठाकुर ने प्लान नहीं बनाया। ठाकुर ने प्लान किया है मनुष्य के चरित्र के घड़ करने का। एक बार जब यह मां शारदा है और स्वामी विवेकानंद है। इनका चरित्र का गढ़तर हो गया। इसके बाद में ठाकुर ने यह जो बागडोर है, यह जो लगाम है, उन्होंने अपने हाथों से छोड़ दी और इन दोनों के हाथ में सब सुप्रद कर दी। ऑफ कोर्स यदि हम जब हम यह कहते हैं कि ठाकुर ने मां और स्वामी जी के चरित्र का घड़ किया तो एक उपल से ही है। सुपरफिशियल ही है। हमको तो पता है कि ठाकुर ने मां और नरेंद्र दोनों को उनके जीवन के प्रत्येक स्टेप पर गाइडेंस तो दिया है। किंतु साथ में ही जब हम गंभीरानंद जी का विवरण पढ़ते हैं मां के जीवन का तो वहां पर महाराज जी स्पष्ट लिखते हैं कि जब तक शिष्य के भीतर में सुकृति नहीं होती है। जब तक शिष्य के भीतर में सुसंस्कार नहीं होते हैं तब तक कितना ही चाहे बड़ा गुरु कितना ही चाहे सिद्ध गुरु मिल जाए उनको वो बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हैं। हालांकि स्वामी जी ने कहा है ठाकुर चाहे तो मेरे जैसे लाखों लाखों विवेकानंद प्रकट कर सकते हैं। किंतु ठाकुर ने ऐसा किया नहीं है। भले ही चाहे स्वामी जी ने ऐसा कहा हो इन प्रैक्टिस इन रियल लाइफ हम यदि देखेंगे तो ठाकुर ने सिर्फ एक ही मात्र विवेकानंद का गठन किया है। सिर्फ एक ही मात्र मां शारदा का गठन किया है। तो यहां पे दोनों ओर से है लीला प्रसंग युगनायक और मां का जीवनी। यह तीनों बायोग्राफी का स्टडी करने से हमको यह स्पष्ट समझ में आता है कि जितना ठाकुर ने इन दोनों के चरित्र का गठन करने में अपनी प्राण शक्ति अपनी दिव्य शक्ति उन्होंने लगाई है उतना ही इक्वलेंस है। मां का खुद का जो उनका जो असली भगवती स्वरूप है उनका जो नारायणी स्वरूप है उसने भी उतनी ही सहायता की है। और स्वामी जी के भीतर में जो शिव स्वरूप है उनका असली स्वरूप रियल नेचर उसने भी उतनी ही सहायता की है। तो यहां पे है कि ठाकुर उनकी है 50% एनर्जी और यहां पे है मां और यहां पे नरेंद्र इन दोनों की 50-50% एनर्जी। यह तीनों मिलकर के जब ठाकुर की महासमाधि हुई ठाकुर ने अपने पंचमहाभूत से बने हुए देह का जब त्याग किया तब यह दोनों संघ की बागडोर संभालने के लिए संघ की लगाम संभालने के लिए तैयार हो चुके थे। किंतु यह भी हमको पता है कि किस तरह से ठाकुर के रहते-रहते इन दोनों की ट्रेजेक्टरी डिफरेंट थी। तो वैसे ही ठाकुर की महासमाधि के बाद में भी इन दोनों की ट्रेजजेक्टरी काफी डिफरेंट रही। महासमाधि के फौरन बाद मां को कामार पुकुर जाना पड़ा। माने वो तीर्थ यात्रा तो मां ने की थी। किंतु अल्टीमेटली तो ठाकुर ने मां को कहा था कि कामार पुकुर का अपना घर है। सब समय उसको बनाए रखना और वहीं पर रहना। वहीं साग सब्जी वगैरह उगा करके वहीं पर तुम एक विधवा का एक आदर्श विधवा का जीवन यापन करना। इस तरह से एक इंगित ठाकुर ने मां को दिया था। तो मां ने इसका पालन करते हुए ठाकुर की महासमाधि के बाद में वह कामार पुकुर चली गई। यहां पे नरेंद्र के सर के ऊपर में जो इमीडिएट रिस्पांसिबिलिटी है यह जो त्यागी संतान है इनका इनको इकट्ठा करके उनको एकजुट करके एक मठ की स्थापना करके साधन भजन तपस्या का एक प्रवाह बहा देना जो कि भविष्य की आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श स्वरूप हो जाए वह जिम्मा स्वामी जी के सर के ऊपर में आन पड़ा था। तो यहां पर है जगत जननी कामारपुर में रह रही है। ऊपर ऊपर से देखेंगे तो कुछ नहीं कर रही। [गला साफ़ करने की आवाज़] किंतु उनके भीतर में जो यह संतानों की कल्याण इच्छा जो है संतानों के प्रति उनका जो आशीर्वाद है वो आशीर्वाद एक सबलाइम रूप से सटल रूप से कार्य कर रहा है। वो छुप करके कार्य कर रहा है। जबकि यह स्वामी जी की यह जो प्रचंड क्षात्रवीर्य जो है वो क्षात्रवीर्य सबकी नजर के सामने प्रकाशीय रूप से कार्य कर रहा है। तो यह पूरा दोनों का ट्रेजजेक्टरी चला। कब तक? जब तक कि स्वामी जी की खुद की महासमाधि नहीं हुई। उसके बाद में हम देखते हैं मां ने अपना जो भगवती स्वरूप है उसको धीरे-धीरे करके सबके सामने प्रकट करने का प्रारंभ किया। तो, यह देखिए, यह जो बाद के यह जो जितने भी स्टेजेस है, उस सभी स्टेजेस को प्रारंभ किंतु ठाकुर ने ही कर दिया था। शोडशी पूजा के बाद में तो यह जो भार समर्पण चैप्टर है उसमें ठाकुर मां को किस तरह से तैयार करते हैं कि हां उनके भीतर में जो सुप्त मातृत्व ऑलरेडी है उनका जो भगवती स्वरूप जो ऑलरेडी छुपा हुआ है धीरे-धीरे करके मैनिफेस्ट हो और इस तरह से मैनिफेस्ट हो कि यह जो हिंदू ट्रेडिशनल सोसाइटी है उसमें किसी तरह का एक खलबली ना मच बच जाए क्योंकि ठाकुर का और मां का जीवन आप देखेंगे स्वामी जी का यहां पर थोड़ा सा छोड़ दें स्वामी जी एकदम स्टार्टलिंग स्टेटमेंट देने के लिए बड़े ही प्रसिद्ध है। कहते हैं कि यदि ब्राह्मण के लड़के को एक टीचर चाहिए तो परिया के लड़के को 10 टीचर चाहिए। तो यह जो हथौड़ा मारने वाले स्टेटमेंट जो है उसके लिए स्वामी जी प्रख्यात है। किंतु जहां तक मां और ठाकुर का प्रश्न है देखेंगे कि ये हिंदू ट्रेडिशनल सोसाइटी जो है हमारा हिंदू सनातन धर्म उसकी ये जो चार कॉर्नर है विद इन दिस फोर कॉर्नर इन दोनों ने कार्य किया है। एक सुंदर कहानी है। एक बागदी लड़का अभी एक बागदी बोलकर के जात उस समय की थी जिसको कि निम्न जाति का उस समय माना जाता था। अभी आधुनिक भारत में तो यह सब चलता नहीं किंतु उस समय की बात है। तो अभी यह बागडी लड़का है तो वह मां के पास में दीक्षा लेने के लिए जयराम भाटी आया। तो मां ने कहा कि देखो बेटा अभी यह तो ब्राह्मण का घर है। फिर यह जो यह पागल जो सब रहते हैं ना मां के साथ में यह नलिनी माकू फिर ये पागली मामी वगैरह और यह फिर काली मामा भी थे उस समय तो यह सब लोगों का क्या है कि नाथ जात को लेकर के बहुत ज्यादा बढ़-चढ़ के इनके सर के ऊपर में सवार था। वैसे तो घर है शिव का संसार आने को भी तो जुड़ता नहीं है ठीक से किंतु ब्राह्मणत्व का जो अभिमान है ब्राह्मण समाज में जो रहना है और ब्राह्मण समाज के जो आगेवान है उन लोगों की ये जो मंतव्य को बड़ा सम्मान देकर चलना है वगैरह वगैरह तो मां ने कहा कि देखो यहां पर तो मैं सब घर लेकर के रह रही हूं। सब तरह के वो ओपिनियन वाले लोग रहते हैं। मैं तुमको यहां पे गांव में मेरे ही घर में दीक्षा दूंगी। तो लोग क्या कहेंगे? तुम एक काम करो तुम कोलकाता जाओ। कोलकाता में यह जो थोड़ा बहुत नाथ जात का जो है कॉस्मोपॉलिटन सिटी है बोल के नाथ जात का थोड़ा सा कम है। तो वहां पे जाना वहां पे मैं तुमको दीक्षा दूंगी। तो यह जो बागदी लड़का था वह भी बड़ा चालाक था। वो फट करके मां के मुंह पे उसने उत्तर दे दिया कि मां जब आपको आवश्यकता हुई थी तब एक बागदी को पिताजी बोलने में आपको संकोच नहीं हुआ। किंतु अब जब आपको कोई आवश्यकता नहीं है तो एक बागदी को अपना लड़का अपना जो संतान बनाने में आपको हिचकिचाहट हो रही है। ऐसा करके जो उसने बोल दिया अभी मां के मुंह पे बोल दिया तो मां भी थोड़ा सा चुप हो गई। अभी क्या उत्तर दे बात भी तो सही है। जय राम भाटी से कोलकाता आ रही थी। तेलो भेलो जो मैदान है वहां पे वो जो एक डकैत के साथ में मुलाकात हो गई थी। तो डकैत के साथ जैसे ही वह एकदम लंबा चौड़ा मस्कुलर काले कलर का वो डकैत एक बड़ा सा लाठी लेकर के आधी रात में जब आकर अपने सामने खड़ा हो जाएगा किसी के भी तो पसीने निकल जाएंगे। किंतु यह तो मां शारदा फट करके मां ने उत्तर दिया कि पिताजी मैं आप ही की पुत्री हूं। आप ही की कन्या हूं। मेरे जो साथी हैं मुझे छोड़कर के चले गए हैं। बोलकर के इस वीरान अंधेरे में मुझे अकेला जाना पड़ रहा है। तो जिस इतना सरल रूप से जैसे कि वो सही में उस राक्षसी महापुरुष की कन्या ही हो। इतना सुंदर रूप से मधुरता पूर्वक मां ने जो कहा यह जो डकैत था पता नहीं कितने लोगों की हत्या की होगी। कितना लूटपाट किया होगा। उसका भी हृदय पिघल गया और इमीडिएटली उसने कहा कि बेटी तुम डरो मत। मेरी जो पत्नी है वह पीछे आ रही है। हम तुम्हारी संभाल लेंगे। तो देखिए कि वो जो डकैत था वह भी बागदी था। वो भी यह नीची जाति का तथाकथित नीची जाति का था। तो अब मां को जब जरूरत पड़ी तो उनको पिताजी बोलकर के वह संबोधन कर दिया। यहां पे अब समाज के डर के वजह से एक बागदी को अपना संतान बनाने में संकोच हो रहा है। यह कैसी बात हो गई? तब जैसे ही इस लड़के ने ऐसा कहा तो फिर मां ने भी थोड़ा सोच करके देखा कि लड़का ठीक तो कह रहा है। फिर मां ने कहा तुम एक काम करो यह जो नलिनी वगैरह जो है यह काली मामा जो है वो कहीं काम के लिए जाने वाले हैं सुबह को स्नान करने के लिए वगैरह तुम अर्ली मॉर्निंग को आ जाना। जब घर में कोई नहीं होता है मैं तुमको दीक्षा दूंगी। तो यह लड़का भी नेक्स्ट डे इसी तरह आ गया। जब घर में यह सो हल्लागुल्ला करने वाले लोग नहीं थे। उस समय आकर के मां से दीक्षा लेके बड़ा खुशी-खुशी चला गया। तो क्या है कि मां का जीवन ठाकुर ने इस तरह से गठित किया था कि यह जो अपना हिंदू सनातन धर्म की जितनी ही चाहे अंधश्रद्धा हो जितनी ही चाहे रिस्ट्रेंट हो जितनी ही चाहे कंस्ट्रेंट हो इसके भीतर में भी रहकर के मां अपनी दिव्यता की पंख जो है उसको पसार सकती है। तो यह मां का जीवन किंतु यह
माँ सारदा अपना जगत-कल्याण-रूपी दायित्व स्वीकार करती है
जो पूरी घटनावली है कि ठाकुर मां को तैयार करते हैं स्टेप बाय स्टेप उस सभी घटनावलियों का एक तरह से आलेखन जो है यह भार समर्पण चैप्टर में गंभीरानंद जी महाराज कर रहे हैं। ऑलरेडी हमने काफी घटनाएं देख ली है। शोडशी पूजा हो गई है। उसके बाद में ही ठाकुर अभी भी प्रसिद्ध नहीं हुए हैं। ठाकुर क्ता में प्रसिद्धि कब से प्राप्त की है? जब से कि वो केशव सेन के साथ में उनकी पहली मुलाकात हुई और केशव इतना चार्ड हो गया ठाकुर को मिलकर के इतना प्रभावित हो गया इतना मेस्मराइज हो गया कि उसने फिर अपने जो न्यूज़ पेपर है ब्राह्म समाज के मैगजीन जो है वहां पर उसने ठाकुर की प्रशंसा करते हुए आर्टिकल लिखना शुरू किया और टाउन हॉल में जो प्रवचन देता था उसमें भी उसने ठाकुर की प्रशंसा प्रारंभ कर दी। अभी इस प्रशंसा को पढ़कर के सुनकर के फिर यह जितने भी यह बात बाद बात के ठाकुर के अंतरंग शिष्य है यह रामचंद्र दत्त है। फिर यह मास्टर महाशय है। फिर यह राखाल है। उसके बाद में नरेंद्र है। उसके बाद में यह बलराम बाबू है। वह सब धीरे-धीरे करके ये ठाकुर के पास में आना शुरू हुए। किंतु यह जो घटना है दाना काली की पत्नी ठाकुर के पास में आती है। अपने पति जो नशा करते हैं, हल्लागुल्ला करते हैं, जुगाड़ वगैरह खेलते हैं तो उससे सहाय प्राप्त करने के लिए जब यह दाना काली की पत्नी ठाकुर के पास में आई थी तो वह वो वाला पीरियड था। जबकि ठाकुर ने मां की शोडशी पूजा कर भी दी थी और अभी तक वह व्यापक रूप से कोलकाता में प्रख्यात नहीं हुए थे। तो जैसे ही वह दाना काली की पत्नी ठाकुर के पास में आई ठाकुर ने सोचा कि अभी रंग जमा है। मां का जो मातृत्व है सुप्त शक्तियां है मातृत्व रूपी उसको जागृत करने की घड़ी आन पहुंची है। बोलकर के ठाकुर ने यह घोष पत्नी यह कालीपदो घोष उसकी पत्नी को मां के पास में भेजा। कहा कि मेरे पास में तो यह मैजिकल पावर है नहीं। तुम एक काम करो। वहां पर नहबत में एक औरत रहती है। उसको यह सब जादुई का जो मंत्र शक्ति है, औषधि वगैरह है, जड़ी बूटियां जो है वो उसको पता है। उसके पास में तुम हेल्प मांगो अपने पति के लिए। तो यह औरत बेचारी आई मां के पास में मां पूजा कर रही थी। मां का मन कहां उर्ध्व उच्च राज्य में विचरण कर रहा था। अभी यह आई बेचारी घोष पत्नी मांग रही है इस तरह से कोई सहाय कि आप कोई मंत्र वगैरह दे दीजिए जड़ी बूटी दे दीजिए जैसे कि मेरे पति का जो मिस बिहेवियर है वह ठीक हो जाए तो मां ने सोचा ठाकुर ने उसको मेरे पास में क्यों भेजा है ठाकुर के पास में ही तो दुनिया भर की शक्तियां है तो मां ने ये घोष पत्नी को ठाकुर के पास में वापस भेजा ठाकुर ने फिर से उसको मां के पास में भेजा ऐसा तीन बार जब बेचारी को इधर से उधर जाना पड़ा तब कहीं मां को आ गई दया और कहा कि यह जो पूजा के थाले में बिल्व पत्र पड़ा था लेकर के उसको दिया कहा कि बिटिया इसको ले जाओ इसी से तुम्हारी मनोवांछा समाप्त होगी तो यह घोष पत्नी यह बिल पत्र लेकर के गई और सही में मां का आशीर्वाद देखिए कि कुछ ही सालों के बाद में यह दाना काली है वह ठाकुर के अंतरंग भक्तों में परिगणित हुआ। तो उस घटना से लेकर के हम देखते हैं कि धीरे-धीरे करके एक के बाद एक घटनावली के माध्यम से ठाकुर जैसे कि मां को फोर्स करते हैं कि मां के पास में यह सब लेडी डिवोटीज को भेजेंगे। मां के पास में यह त्यागी संतानों को भेजेंगे। मां के पास में यह जितने भी जटिल केस है वह ठाकुर के पास में आते थे। वो मां के पास में भेजेंगे। ऐसा करके मां की जो शक्ति थी उसको व्यापक रूप से जागृत करने का ठाकुर ने प्रयास किया था। तो यह सब घटनावली इस चैप्टर में गंभीरानंद जी महाराज हमको कह रहे हैं और इसी सिलसिले में अभी इस चैप्टर में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं। क्या कहा क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज?
माँ सारदा की संतान प्राप्ति की इच्छा
भोग स्पहा मुक्त मातृत्व प्रथम आकृति की भाबे कोखन श्री माय ज्ञान गोचर होइया छिलो भोग स्पहा मुक्त मातृत्व की प्रथम आकांक्षा किस तरह और कब श्री मां के भीतर में उसको जागृत हुई थी। ज्ञान गोचर हुई थी। देखिए अभी यहां पे गंभीरानंद जी महाराज एक-एक शब्द की व्याख्या करनी पड़ती है। कभी वो इस तरह से लिखते हैं कि जैसे कि शंकराचार्य की टीका पढ़ रहे हैं। भोग स्प्रूहा मुक्त मातृत्व कैसा मातृत्व अभी यह मातृत्व के कितने प्रकार है। यह गंभीरानंद जी महाराज ने इससे पहले हमको कहे थे। हमने तीन चार क्लासेस में काफी डिटेल में उसका डिस्कशन किया था। जनरली एक मां होती है, एक जननी होती है। उसका प्रेम जो होता है, उसकी करुणा होती है। अपने ही संतान के ऊपर में वह आबद्ध रहती है। अब जैसे कि यह ध्रुतराष्ट्र का अपने संतानों के प्रति प्रेम था। यह कौरवों के प्रति तो यह कौरव जब पांडवों के साथ में अत्याचार कर भी रहे थे तो वह पुत्र प्रेम में अंध होकर के इनको कुछ बोल नहीं रहे हैं। कौरवों को यह नहीं कह रहे हैं कि तुम लोग अधर्म का आचरण करते हो। तो इसको अंधा प्रेम या तो फिर यह सेल्फिश लव कहा जाएगा जो कि आपके ही संतानों के प्रति वह लिमिटेड है और वह धर्म अधर्म को नहीं देखता है। तो वह एक तरह का प्रेम हो गया। फिर उससे भी थोड़ा सा ऊपर जाएंगे कैटेगरी में तो देखेंगे कि हां अपने संतानों के प्रति तो प्रेम है किंतु साथ-साथ में ही दूसरों के संतान है उनके प्रति भी वह प्रेम जाता है। इससे भी उच्च कैटेगरी देखेंगे तो एक जननी ऐसी है। अपने संतानों के प्रति भी प्रेम है। और यह जगत जो है इन जनरल इनके प्रति भी उस जननी का प्रेम है। और फिर सर्वोच्च अवस्था आप देखेंगे कि इस तरह की जननी का प्रेम जो कि यह जो मन बुद्धि चित्त अहंकार पंचकर्मेंद्रिय ज्ञानेंद्रिय पंचमहाभूत का यह जो जगत है उससे उर्ध्व जाकर के अचिंतनीय जो कि चिंता राज्य के परे का जो राज्य है अर्थात कि ब्रह्म राज्य या तो फिर ईश्वरीय राज्य वहां पर विराजमान होकर के पूरे जगत के प्रति जिनका का संतान भाव है या तो फिर मातृ भाव है। इस तरह का एक प्रेम। तो यह पूरी कैटेगरीज ऑलरेडी गंभीरानंद जी ने हमको समझा दी है। तो अभी उसी कैटेगरीज को एक ही शब्द में रेफर करके यहां पे गंभीरानंद जी कहते हैं भोग स्पूहा मुक्त मातृत्व। इस तरह का मातृत्व जो कि सिर्फ अपने संतानों के प्रति अंध प्रेम की ब तरह वह बंधित नहीं है। पूरे एक ईश्वरीय जगत में विराज करके दिव्य मातृत्व पूरे जगत के प्रति जिनका फैला हुआ है उसको कहते हैं भोग स्पूहा मुक्त। भोग अर्थात कि भोग की इच्छा स्पूहा अर्थात कि इच्छा और मुक्त अर्थात कि भोग की इच्छा से मुक्त मातृत्व का प्रथम प्रारंभ प्रथम आकांक्षा मां के हृदय में कब प्रकट हुई थी? यह प्रश्न गंभीरानंद जी करते हैं। फिर क्या कहते हैं? संभवत ए विषय अबोहित हो बार पूर्वे तनी मातृत्व अधिरूठ होया छिले हो सकता है कि इस विषय से वाकिफ अवहित अर्थात कि वाकिफ होने के पहले ही मां मातृत्व के राज्य पे सिंहासन पे आरूढ़ हो चुकी थी। अब क्या होता है कि जनरली आप देखेंगे छोटी बच्चियां होती है गुड़िया को लेकर के खेलती है वो छोटी बच्ची को यह तो पता नहीं घर क्या है संसार क्या है जननी होने का क्या अर्थ है मातृत्व का क्या अर्थ है यह सब छोटी बच्ची को पता नहीं किंतु इसके बावजूद छोटी बच्ची में कभी-कभी इस तरह की करुणा देखने में आती है जो उसके छोटे-छोटे भाई हैं उसकी संभाल लेती है उसकी जो सहेलियां है। उसके साथ में वह बड़ा ही सुंदर रूप से फ्रेंडली मित्रता पूर्ण सह हृदयता पूर्ण वह वर्तन करती है। मां-पिताजी को सहाय करने में हमेशा तत्पर रहती है। इस तरह की जब बच्ची का हम दर्शन करेंगे तो हमको पहले से ही पता चल जाएगा कि भले ही चाहे इस बच्ची को अभी यह नहीं पता है कि मां होने का क्या अर्थ है। किंतु उसके हृदय में करुणा का जो दरवाजा है मातृत्व रूपी जो कंपैशन उसका जो दरवाजा है वह खुल चुका है। तो यहां पे भी गंभीरानंद जी कहते हैं कि मां होने का क्या अर्थ है? यह समझने के पहले ही उस उम्र को पहुंचे। जनरली 18 19 20 साल की उम्र पे यह विचार सब पहली बार एक लड़की के मन में आता है कि हां मुझे भी पुत्र संतान या कन्या संतान चाहिए। किंतु वह विचार आने के पहले ही बाल्यावस्था में ही मां के हृदय की करुणा का दरवाजा खुल चुका था। मातृत्व अधिरूढ़ हो चुकी थी। मातृत्व रूपी सिंहासन है उसके ऊपर में मां आरूढ़ हो चुकी थी। मनोराज्य इहाई स्वाभाविक गोती मनोराज्य अर्थात कि मानसिक जगत है यह माइंड वर्ल्ड जो है ये अपना कॉन्शियसनेस जो है उसमें यूजुअली ऐसा ही होता है कि कोई भी लड़की हो उसके भीतर में यदि उसका एक हेल्दी डेवलपमेंट है यदि उसका एक हेल्दी डेवलपमेंट है तो छोटी उम्र में ही करुणा का दरवाजा उसके हृदय का खुल ही जाएगा बस वही है कि उसका प्रॉपर मैनिफेस्टेशन जो है आर्टिकुलेशन जो है वह एडल्ट होने के बाद में होगा आमरा देखिया छ जे बाल्य श्री मा खुद्रो भाई भगिनी देर लालन भार सोहस्ते लिया छे एवं बुभ देर पात्रे परिशितो तप्त अन्न जुड़ाई बार जन पाखा कोते छे हमने भी देखा है कि बाल्य अवस्था में श्री मां अपने छोटे भाई बहनों के लालनपालन का भार अपने हाथ हाथ में लिया है और साथ में ही यह भूखे लोग थे। दुष्काल के समय खुद ही राम ने रामचंद्र ने ठीक किया था कि जो जो भी लोग वहां पर आएंगे उनके घर पे उन सबको वो गरमगरम खिचड़ी खिलाएंगे। तो उसको रेफर करके कहते हैं कि जो भूखे हैं जो दुष्काल के भोग बने हुए उनके पात्र में यह जो गर्म अन्न जो परोसा गया है तो गर्म अन्न को ठंडा करने के लिए मां शारदा अपने छोटे हाथों से हवा डाल रही है। पंखा डाल रही है। तो वह हमने ऑलरेडी ही देख लिया है कि छोटी बच्ची है वह अभी आर्टिकुलेट नहीं कर पाती है कि मातृत्व का क्या अर्थ है या तो फिर उसके हृदय में पुत्र संतान की वासना का प्रारंभ हो इच्छा जागृत हो इससे पहले ही उनके हृदय की करुणा जो है वह उन्मुक्त हो चुकी है और अपने छोटे भाइयों की वह संभाल भी रखती है और जो भूखे लोग हैं उनका जल्दी से उनको खाना मिले बोलकर के गर्म अन्न को ठंडा करने में भी हेल्प करती है। दक्षिणेश्वरे भक्तग सहित व्यवहारे ओ ए प्रकार घटना आमादे दृष्टि गोचर होइया छे दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ में जो मां व्यवहार करती थी उसमें भी इसी तरह की घटना हमारी आंखों के सामने आई है। इस घटना में से एक घटना का यदि उल्लेख करें कि मां के हृदय में करुणा कितनी थी। देखिए कि देखिए पुत्र संतान हो इस तरह की आकांक्षा हो यह तो एक स्वाभाविक है किंतु पुत्र संतान के बारे में सोचना प्रारंभ किया है उससे पहले ही जब करुणा का दरवाजा मातृत्व का जो यह जो पूर जो है मातृत्व का जो फवारा जो है वह जब खुल जाता है तो किस तरह से बिहेवियर उनका होता है तो उसका एक सुंदर उदाहरण है कि यह चंद्रामणि देवी वैसे तो है मां शारदा की सास मदर इन लॉ किंतु क्या है कि वह नहबत में रह रही है और वह वृद्धा हो चुकी है और क्या है कि हाथ पैर भी अभी चल नहीं रहे हैं। इतनी वृद्ध हो गई है कि अपने हाथों से ज्यादा कुछ कर नहीं पा रही। पथारी वश हो गई है। बेड रिडन हो चुकी है। तो अभी कुछ भी बेचारी को कार्य होगा कोई भी काम होगा तो वह मां शारदा को पुकारेगी कि बिटिया शारदा कहां हो? तुम आओ मुझे यह हेल्प करो और जैसे ही मां भी जैसे ही यह चंद्रामणि देवी की पुकार सुनेगी वैसे ही दौड़ करके जाएगी वहां पे वो नौबत में भीतर में किंतु यहां पे प्रॉब्लम क्या था नौबत का जो दरवाजा है वह ऑलमोस्ट 4 1/2 फीट की हाइट का ही है। उससे ज्यादा का हाइट नहीं है। तो होता क्या है कि आप भीतर में प्रवेश करने के समय जो आप यह याद नहीं रखेंगे कि आपको सर झुकाना है यह याद नहीं रखेंगे दौड़कर के भीतर में प्रवेश करना जाएंगे तो आपका जो सर जो है वह दरवाजे की चौखट के साथ में टकराएगा। अभी आप इमेजिन करके देख सकते हैं कि आप दौड़े-दौड़े कमरे के भीतर में जा रहे हैं और आपने सर झुकाना भूल गया और दरवाजे की चौखट के ऊपर में सर टकराया तो कितना पेन होगा। तो यहां पर मां के साथ में बार-बार ऐसा होता है कि जैसे ही चंद्रामणि पुकारती है मां आंख बंद करके दौड़ लगाती है कि कैसे भी करके उनकी पुकार जो है उनकी जो आवश्यकता है उसको हेल्प करने के लिए एस सून एस पॉसिबल वहां पर जाए और ऐसा करने से ही बार-बार ऐसा होता है सर वो चौखट के साथ में टकराता है और बहुत पेन होता है तो किसी ने मां को कहा कि मां आप इतना दौड़ के क्यों जाती है चंद्रामणि के पास में आप जाइए वो तो सास की हेल्प करना मदर इन लॉ को हेल्प करना वो तो आपका कर्तव्य है किंतु इस तरह से दौड़ कर के जाती है बोल के आप सर झुकाना भूल जाती है और चौखट के साथ में सर टकराता है आपको कष्ट होता है देखकर के हमको भी कष्ट होता है आप ऐसा मत कीजिए तो मां ने कहा कि देखो वो बेचारी तो वृद्धा है। मेरी हेल्प के बिना वो अपने से तो कुछ कर नहीं पाएगी बोलकर के मैं जितना हो सके उतना जल्दी दौड़ कर के उनके पास में जाना चाहती हूं। भले ही चाहे अपना चौखट के ऊपर में सर टकराए। यह पीड़ा मैं सहन करने को तैयार हूं किंतु मैं यह सहन करने को तैयार नहीं कि यह जो वृद्धा है उसको एक सेकंड भी एक्स्ट्रा मेरे लिए वेट करना पड़े। तो देखिए कि यह मातृत्व शक्ति जब जागृत होगी तभी तो इतनी करुणा जो है इतनी यह जो हेल्पफुलनेस है वह जागृत होगी। अदरवाइज कौन है इस तरह से बार-बार अपना सर दीवार के साथ में टकराएगा। तो देखिए कि यहां पर गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि पुत्र संतान की वासना पुत्र संतान की इच्छा मां के हृदय में जागृत होने से पहले ही यह जो करुणा का प्रवाह है वह जागृत हो चुका है और विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न घटनाओं के माध्यम से हमको इसका दर्शन होता है। किंतु अधना आमराश आकांक्षा श्ञाने उदय और तदनुयाई आचरण कथाई भाविते किंतु अभी हम जो विवरण देंगे उस विवरण में यह पुत्र संतान की कॉन्शियस इच्छा माने एक्टिव डिजायर आकांक्षा सज्ञाने उदय सज्ञान अर्थात कि कॉन्शियस उसका जो उदय होता है और उसके बाद में माने ने किस तरह का आचरण किया उसी के बारे में अभी हम बात करेंगे। एक तो हो गया कि मातृत्व मुझे संतान चाहिए। यह इच्छा होने से पहले का मातृत्व और मुझे संतान चाहिए। सबके तो संतान है। सबके तो पुत्र पुत्रियां है। मेरे क्यों नहीं है? वो एक इच्छा जागृत हुई मां के हृदय में। उसके बाद में क्या होता है? उसका विवरण अभी गंभीरानंद जी महाराज हमको दे रहे हैं। अल्टीमेटली हमको पता है कि ठाकुर ने मां की जो संतान के बारे में जो इच्छा थी उसको सबलाइम करके पूरे संसार को मां के पास में ऐसे कि संतान के रूप में प्रस्तुत किया था। किंतु किस तरह से यह जर्नी जाती है उसका विवरण थोड़ा सा गंभीरानंद जी देते हैं। क्या कहते हैं? सहानुभूति संपन्न प्रतििष दग के तनी दुख कोते सुनते जे विवाहित जीवन संसार संतान हित थाका एक अति दुर्भाग्यो बा अलखणर कथा सहानुभूति संपन्न जो नेबर्स थे उनके जो पड़ोसी थे उनके सामने उनको उन्होंने दुख करतेकरते कहते हुए सुना था कि विवाहित जीवन में संतानहीन रहना एक अति दुर्भाग्य या तो फिर अलक्षण की बात है। अभी देखिए कि यह जो पड़ोसी भी होते हैं इस तरह के यदि अपने साथ में कहीं कुछ मिसफर्च्यून होता है तो इनको भीतर भीतर से एक तरह का आनंद भी आता है। किंतु मुंह पे आकर के वह बड़े ही दुख दुखित होकर के जैसे कि दुख का दिखावा करते-करते बोलेंगे अरे तुम्हारे साथ में इतना बुरा हुआ मुझे भी बहुत बुरा लगा वगैरह-वगैरह किंतु हम लोग स्पष्ट देख पाते हैं कि हमारा कष्ट देखकर के उनको आनंद हो रहा है। तो इसी तरह अभी कोई-कोई लोग होते हैं जेन्युइन उनको कष्ट होता है। कोई-कोई लोग होते हैं कि कष्ट का दिखावा करते हैं। जो भी है हमने दोनों तरह के लोगों का विवरण जयराम भाटी में पढ़ा था कि जब जय राम भाटी के दिनों के विवरण के समय पढ़ा था कि मां जब दक्ष जय राम भाटी में थी ठाकुर कोलकाता में थे दक्षिणेश्वर में और उनके बारे में सब तरह की कहानियां वो फैल रही थी गांव में कि वह पागल है दिगंबर होकर के पेड़ के ऊपर में बैठ जाते हैं और क्या-क्या नहीं करते बंदर के तरह का आचरण करते हैं कभी तो कभी वह पागल पागल के तरह का आचरण करते हैं। कभी जड़वत तो कभी बालकवत। तो ये बालकवत पिशाचवत जड़वत ये परमहंस के जो लक्षण है ना तो सब तरह के आचरण वो करते हैं बैठकर के। तो इस तरह की कहानियां जब जय राम बाटी में फैलनी शुरू हुई तो कोई-कोई लोग बड़े ही मुखौटा पहन के यह जो दुख का मुखौटा पहन के सहानुभूति का मुखौटा पहन के मां के पास में आकर के कहते थे अरे बाप रे हमको तो बड़ा दुख हुआ यह सुनकर के कि तुम्हारा एक पागल के साथ में विवाह हुआ है। एक सिर्फ वो भानु पीसी थी कि जो कि मां के प्रति सही-सही सद्भाव जिनका था। तो यहां पर भी महाराज कहते हैं कि कोई कोई लोग थे जो कि सहानुभूति संपन्न पड़ोसी अभी यह सहानुभूति जेनुइन है कि सहानुभूति का मुखौटा पहना है जो भी है किंतु इस तरह से सहानुभूति वाले पड़ोसी मां के पास में आकर के कहते थे कि विवाह हो गया है किंतु संतान यदि नहीं हुआ है तो यह बड़े दुर्भाग्य की बात है और साथ-साथ में ही यह कुल लक्षण का यह मैनिफेस्टेशन है। यह अशुभ चिन्ह माना जाता है। यह एक तरह का कहेंगे कि यह नेगेटिव साइन है। यह इन ऑस्पिशियस साइन है। कुलक्षण है या तो अशुभ निशानी है। एमन की श्री माय गर्भधारिणी प्राय अनुसोचना कर तेन यहां तक कि श्री मां की गर्भधारिणी अर्थात कि श्यामा सुंदरी देवी वो भी दुख करके कहती एमोन पागल जमा शंगे अमर शारदार बेदिलूम इस तरह के पागल जमाई के साथ में मेरी बिटिया शारदा का विवाह दिया आहा घर संसारो को लेना छेले पीले होना मां बुलाओ सुन लेना घर संसारो किया नहीं बच्चे बच्चियां भी हुए नहीं और मां की पुकार भी सुनी नहीं। तो बेचारी श्यामा सुंदरी भी इस तरह से दुख करती है। पड़ोसी लोग जो है वह भी आकर के कहते हैं कि बड़ा ही अशुभ लक्षण है। बड़ी ही इनऑस्पिशियस साइन है कि आपको बच्चा नहीं हुआ है। ठाकुर अभी यह श्यामा सुंदरी की जब यह बात थी। यह सुनकर के ठाकुर ने एक बार कहा था। ठाकुर एक दिन यहां शून्य बोली लेन। ठाकुर ने एक दिन इसको सुनकर के कहा सासुडी ठाकुर से जनना अपनी दुख करवना सासुडी सासुडी ठाकुर अर्थात कि मदर इन लॉ आप यह इस इस बात के लिए आप दुख मत कीजिए कि आपनार मे ये तो छेले में होवे शेष देख मां डाके ज्वालाए आार अस्थिर होए उठवेन आपकी कन्या जो है उसको इतने सारे पुत्र पुत्रियां होगी कि आखिर में देखेंगे मां की पुकार सुनकर के वह बेचारे अस्थिर हो जाएगी। इतने लोग जो है मां मां कहते पुकारते आपकी बिटिया के पास में आने वाले हैं। और हमने देखा भी सही ये जय राम बाटी में कोलकाता में किस-किस तरह के पागल भक्त मां के पास में आते थे। मां कहती है कि देखिए कि कोई कोई भक्त संतान होता है जब आकर के चरणों का स्पर्श करता है तो उससे पूरे देह को पूरे मन को आत्मा को शीतलता प्राप्त होती है। क्यों? क्योंकि यह जो पुत्र संतान है यह जो यह जो भक्त है जो कि उनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चरण स्पर्श करते हैं उनमें अच्छे संस्कार होते हैं सुकृति होती है अच्छे लक्षण होते हैं बोलकर के यह लोग जब मां को स्पर्श करेंगे मां को भी शीतलता प्राप्त होगी और कोई कोई होता है जो कि आकर के मां को चरण स्पर्श करेगा तो फिर मां के भी पैरों में इस तरह की ज्वाला कला प्रकट होगी। इस तरह का बर्निंग सेंसेशन प्रकट होगा। एक दिन की घटना है। एक मोस्ट प्रोबेबबली वर्दा महाराज ने ही इस घटना का उल्लेख करके कहा है। वर्दा महाराज मां के त्यागी संतान जयराम बाटी में मां के साथ में रहते थे। मां का सब कार्य करते थे। एक दिन वह बाहर गए थे। किसी कार्य की वजह से वापस आकर देखा तो मां बार-बार अपना जो पैर है वह धो रही है। तो यह उन्होंने आकर के पूछा त्यागी संतान ने कि मां आप बार-बार पैर क्यों धो रहे हैं कि ठंडे पानी से पैर धोने से ठंड ना लग जाए। कहीं बुखार ना हो जाए। तब मां ने कहा देखो बेटा एक बूढ़ा आदमी यहां पर आया था। वो उसको देखकर के ही मां को मुझे समझ में आ गया कि इसके ऊपर में तमस का लक्षण सब है। तो मैं साथ में ही अपने कमरे में चली गई और बैठ अपने वो जो चादर वो जो अपने वो जो चद्दर जो होती है उससे अपना पूरा देह को आवरत कर दिया। चेहरा भी टाक दिया और कहा कि आपको यदि प्रणाम करना है बाहर से ही कीजिए। किंतु इस आदमी ने मेरी बात ना सुनी। जोर जबरदस्ती घर में प्रवेश कर दिया और जोर जबरदस्ती करके मेरे चरणों को स्पर्श करके प्रणाम किया। अभी मेरे पैरों में इतना बर्निंग सेंसेशन हो रहा है। इतना ज्वलन हो रहा है कि इसलिए मुझे बार-बार अपने पैर धोने पड़ रहा है। तो यह बात सुनकर के यह त्यागी संतान है। बड़ा ही आश्चर्यचकित हो गया कि कोई अशुद्ध व्यक्ति है। उसके स्पर्श करने से क्या ऐसा भी होता है क्या? किंतु यह भी होता है। देखिए इन लोगों का जो देह और मन इतना पवित्र था कि जैसे ही कोई अशुद्ध मन का व्यक्ति उनको स्पर्श करेगा साथ में ही इनके पाप जो है यह लोग हरण कर लेंगे। एक स्वप्न अगेन मोस्ट प्रोबेबबली वर्दा महाराज ने ही यह स्वप्न देखा है। तो वह स्वप्न में उन्होंने उन्होंने बाद में मां को कहा भी सही कि मां मैंने इस तरह का स्वप्न देखा कि आप एक एक पुरुष है जो कि आपके सामने आकर के आपको बड़ी विनती कर रहा है कि आप मुझे स्पर्श करके मुझे दीक्षा दीजिए। मुझे आशीर्वाद दीजिए। तो और आप यह बोल रही है पूरा स्वप्न में चल रहा है। यह पुरुष जब ऐसा कहता है मुझे आशीर्वाद दीजिए, दीक्षा दीजिए तो मां कहती है कि मैं यदि इसको स्पर्श करूंगी तो इसका तो कल्याण हो जाएगा किंतु मेरे साथ में बहुत ही बुरा होगा। तो मां बोल रही है अपने साथ में ही अपने आप में वह वार्तालाप कर रही है। और डिबेट कर रही है अपने ही साथ में। क्या मैं उसको स्पर्श करूं कि ना करूं? क्या मैं उसको आशीर्वाद दे दूं कि ना दूं? क्या मैं इसको कुछ कर दूं कि ना कर दूं? और यह पुरुष जो है वह विनती करता ही जा रहा है और मां सोच रही है। अपने साथ में ही बात कर रही है। मैं इसको यदि कुछ करूंगी तो इसका तो कल्याण हो जाएगा किंतु फिर मेरे साथ में बहुत बुरा होगा। ऐसा करके मां बोल रही है। और यह जो त्यागी संतान है वह पास में खड़े हैं और जोर-जोर से चित्कार करके कह रहे हैं। मां आप कुछ उसको स्पर्श मत कीजिए। उसको आशीर्वाद मत दीजिए। क्यों उसके पाप आप अपने सर पर लेने को जाएगी? जाने दीजिए उसको। तो उसको तो साधन भजन करने की क्षमता नहीं है। झूठ-मूठ का उसका पाप आप क्यों लेंगी? तो यह चल रहा है। उसी समय मां ने उसको स्पर्श कर दिया इस पुरुष को और जैसे ही स्पर्श किया यह त्यागी संतान जो यह सपना देख रहा था यह सपना उसका भंग हो गया। तो यह मां को कहता है अभी देखिए हुआ है घटना सपने में। किंतु क्या है कि मां के जीवन दिस इज़ अ डिस्टिल्ड मदर्स लाइफ। माने आप पूरे जीवन का एसेंस देखेंगे तो इतने लोगों के पाप ताप माने हरण किए हैं कि ये डिस्टिल होकर के सभी घटनाएं एक ही स्वप्न में हमको एक दिखती है। एकदम स्पष्ट रूप से हमको दिखती है। तो यहां पे भी देखिए कि ठाकुर जब यह कहते हैं कि इतने सारे उनके जो पुत्र पुत्रियां होंगे कि आखिर में यह मां मां की पुकार सुनकर के वह अस्थिर हो जाएगी। तो यह बात भी सही है। इस तरह के त्यागी संतान भी थे जिनका स्पर्श जिनको आशीर्वाद देना जिनका यह जो भक्ति है वह मां के हृदय को शीतलता देता था। मां को आनंद देता था और ऐसे भी लोग आते थे कि जिनका पाप हर करके मां को खुद को इतना कष्ट सहन करना पड़ता था। लोक कथा सुनीते सुनीते मा मने की भा संतान लाभ जागरितो होइलो ता त स्वयं बोलिया छे लोगों की बात सुनते-सुनते मां के मन में किस तरह से संतान प्राप्ति की आकांक्षा जागृत हुई यह बात उन्होंने स्वयं कही है। अभी देखिए कि यह जब एक उम्र हो जाती है। एक जब एज हो जाती है तब एक लड़की जो है एक्टिवली माने वह स कॉन्शियसली यह सोचना शुरू करती है कि हां मुझे भी एक संतान हो तो मां की भी वह उम्र आ चुकी है। अभी तक तो वह जो करुणा का द्वार जो था करुणा जो उनकी थी वह वैसे ही प्रवाहित हो रही थी। किंतु अभी इस करुणा को एक टारगेट मिला है। एक लक्ष्य मिला है कि हां मुझे भी पुत्र संतान चाहिए। तो भीतर से भी एक कोई भी स्त्री है उनके हृदय की यह आकांक्षा है। फिर लोग 10 लोग आकर के इस तरह की बातें करते हैं। तो मां कहती है कि किस तरह से उनके हृदय में भी संतान की इच्छा जागृत हुई। क्या कहती है मां स्वयं मैं देर का काम पुरे आर एकने खाली सुन तुम छले मां ना होले कोनो काज से में मानुष करते पारे ना जो सब स्त्रियां है दूसरी स्त्रियां उनके पास में से मैं कामार पुकुर में भी और यहां पे भी मैं सुनती थी कि पुत्र संतान की कोई भी पुत्र हो ना कि कन्या संतान की मां ना होने से कोई भी काम में यह स्त्री नहीं कर पाएगी। अर्थात कि यदि आपका पुत्र संतान नहीं है पुत्र या कन्या संतान तो इस तरह की स्त्री शुभ कार्य नहीं कर पाएगी। जा बांझा कोनो शुभ काजे एो होते पारेना बांझा अर्थात कि जिसको संतान नहीं हुआ है इस तरह की स्त्री वह कोई भी शुभ कार्य में आगे बढ़कर के कार्य नहीं कर पाएगी। आमी तो में मानुष छले मानुष छिलू उस समय में उम्र में छोटी थी बच्ची ही थी ए सब कथा सुनते सुनुनते अमार मने दुखो होतो यह सब बातें सुनसुन के मेरे मन में दुख होता ताई तो तभी तो एकटा छेले अमरार होबे ना एक संतान भी क्या मेरा नहीं होगा देखिए अभी यहां पर मां ने इस तरह से नहीं कहा कि मुझे संतान चाहिए बोलकर के यह मेरे मन में वासना जागृत हुई है या तो फिर आकांक्षा जागृत हुई है। मां दूसरी तरह से कहती है कि दूसरी स्त्रियों के पास में यह बार-बार मैं सुन रही थी कि आपको यदि संतान नहीं होता है संतान विहीना जो स्त्री है वह कोई भी शुभ कार्य में आगे बढ़कर के हिस्सा नहीं ले पाएगी। अर्थात कि स्त्री के लिए मातृत्व ही जैसे कि उसकी एक तरह की पहचान है। तो यह मातृत्व प्राप्त नहीं किया है तो यह तो संतान विहीना स्त्री इस तरह की स्त्री उसमें निश्चय कुछ ना कुछ कमी होगी बोलकर के ही तो पुत्र संतान को जन्म नहीं दे पा रही। इसके ये जो सत्कर्म है ना कि उसके ये जो कर्म का यह जो फल है वह सब बुरा होगा। संस्कार बुरे होंगे। बोल करके ही वह बच्चे की मां नहीं हो पा रही। बोल कर के हिंदू सनातन वो उस समय का जो हिंदू धर्म था उस समय का जो समाज था उसमें इस तरह का था कि संतान विहीना स्त्री शुभ कार्य में आगे आकर के हिस्सा नहीं ले पाएगी। तो मां कहती है यह सब सुनकर के मेरे हृदय में भी एक इच्छा जागृत हुई कि तभी तो मेरे मुझे क्या एक भी संतान नहीं होगा। तो मां इस तरह से कहती तो है किंतु हमको यह स्पष्ट समझना है कि मां सिर्फ लोगों को शुभ कार्य में आगे बढ़ने के लिए या तो लोगों के मुंह बंद करवाने के लिए लोगों के टाने वगैरह जो है कटाक्ष वगैरह जो है उसको शांत करवाने के लिए ही सिर्फ पुत्र संतान की आशा नहीं रखती पुत्र या कन्या संतान की किंतु जो मातृत्व शक्ति है वह अभी पूर्ण रूप से जागृत हो रही है बोलकर के मां मां के हृदय में संतान की आकांक्षा जागृत हुई है। इसके बाद में मां जो कहती है वो अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। आइए ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: यह देखने के बाद भी कि माँ को तकलीफ़ हो रही है, कुछ लोग सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए उनसे दीक्षा मांग रहे थे!
यह जर्नी है ना देखिए वो जो ठाकुर के पास में वो पागली आती थी तो उसका था मधुर भाव तो उसने बात बाद बात में एक बार ठाकुर को बोल दिया कि मेरा आपके प्रति मधुर भाव है तो ठाकुर बड़े नाराज हो गए थे उसके बाद में भी जब ठाकुर काशीपुर में थे कैंसर से पीड़ित थे वह आती थी और उत्पात मचाती थी। वह हल्लागुल्ला करती थी। तो बोल कर के बाकी सब भक्त बड़े नाराज हो जाते थे। अभी देखिए यह डिस्कशन चल रहा है अह ठाकुर के सामने ही राखाल राजा महाराज बैठे हैं। निरंजन महाराज वगैरह है तो निरंजन महाराज कहते हैं वह पागली जब आएगी ना तो उसको हम मारेंगे। तो माने उसको यहां से कैसे भी करके भगा देंगे। तो राजा महाराज बोलते हैं अरे तुमको थोड़ा सा भी तो उनके प्रति करुणा रखो। पागल है बेचारी औरत है। क्या करें? ठाकुर के प्रति मधुर भाव है। उत्पात मचाती है। हमारा थोड़ा उसके प्रति करुणा होनी चाहिए। तो निरंजन महाराज नाराज होकर के कहते हैं नाराज होकर के ना कि किसी भी तरह से कहते हैं कि तुम्हारी पत्नी है ना इसलिए तुमको इसके ऊपर में बहुत ज्यादा दया आती है। हम तो उसका बलिदान भी दे सकते हैं। तो माने ये नेचुरली कि राजा महाराज की वाइफ थी बोलकर के एक करुणा का भाव उनमें होगा। तो राजा महाराज कहते हैं तुमको शर्म नहीं आती। ठाकुर के सामने इस तरह की बात करते हो। फिर राजा महाराज कहते हैं देखो कि नरेंद्र वगैरह भी किस तरह से ठाकुर को परेशान करते थे। आज तो हम लोग बड़े शरीफ होकर के घूम रहे हैं। किंतु नरेंद्र ने प्रारंभ से ठाकुर को कितना परेशान किया है। किस तरह से ठाकुर को टेस्ट किया है। किस तरह से ठाकुर के साथ में आर्गुममेंट की है। तो हमको अपना भी तो ख्याल रखना अपने खुद के सामने भी तो देखना चाहिए। आज हम एक लंबा जर्नी पार करके एक स्टेज पे आकर खड़े हुए हैं कि हमको अभी ठाकुर की चिंता है। किंतु जब हम लोग प्रारंभ में आते थे तो हम लोग भी ठाकुर को इतना ही सताते थे। तो पहले तो अपने सामने देखो बाद में तुम दूसरों की बात करो। तो राजा महाराज जब यह कहते हैं तो देखेंगे कि दिस इज ट्रू फॉर एवरीवन ऑफ अस। अब गिरीश घोष है। बाद में तो तो बाद की बात हुई ना कि मां के सामने जाते डरता है। पहले तो ठाकुर को कितना परेशान कर दिया है। ठाकुर को कितनी गालागाली दी है। कितना मिस बिहेव किया है। सो दिस इज आवर जर्नी। जर्नी का प्रारंभ होता है। हमको पता ही नहीं है कि इन लोगों की इतनी क्षमता है कि हमारा पाप लेके उनको कष्ट होगा। उस समय तो हम संसार के ताप के मारे कैसे भी करके सॉल्यूशन खोजने को आते हैं। एक बार हमारे हृदय में शीतलता प्राप्त हो फिर तो हमको दूसरों की एक आती है अकल कि हां हमारा पाप लेके इनको कितना कष्ट हो रहा है। सो वो तो जर्नी है। इनिशियली देखिए हम लोग लिप सर्विस पे कर सकते हैं कि मैं उनसे दूर रहूं या तो मेरे कष्ट वो ना ले। हम लोग लिप सर्विस देंगे। किंतु हृदय में तो वही होगा कि कैसे भी करके संसार का ताप जो है वह हल्का हो। बाद में तो सब बात आएगी। देखिए वो भीतर से वो ये था ना आ अग्नि प्रज्वलित हो रहा था। कैसे भी करके अग्नि को शीतल करना है। बाद में तो वो फिर मां के बारे में सोचेगा। हम हम मां के पास में क्या चाहते हैं वह दिखाता है कि हमारी आध्यात्मिक जर्नी के कौन से लेवल पर हम पहुंचे हैं। यदि हम यह सोचना शुरू कर दें कि कैसे भी करके मां मां से तो आशीर्वाद प्राप्त करना ही है। दैट मींस कि हम प्रारंभिक अवस्था में हैं और यदि हम यह सोचना शुरू करें कि नहीं हमारी वजह से मां को कष्ट नहीं होना चाहिए। भले ही हमको चाहे कितना कष्ट हो। दैट मींस कि हम जर्नी के उच्च सोपान तक पहुंच गए हैं। सो दैट इज असेसमेंट फॉर अस कि हम कहां पे हैं इस यात्रा में। बिल्कुल ठीक कि हमको यदि पाप में पड़ना पड़े, नरक में जाना पड़े चलेगा। किंतु भगवान कृष्ण को कैसे भी करके हमको बचाना है। तो हमारे अपने चरणों की रज देने के लिए हम तैयार हैं। तो सेल्फ सैक्रिफाइस जहां से प्रारंभ होता है ना तब से हमको सोचना है कि हम लोग अभी भक्ति के उच्च आयाम में पहुंचना प्रारंभ कर दिए हैं।
प्रश्न : भले ही स्वामीजी को एक महान ज्ञानी माना जाता है, लेकिन जब वे माँ शारदा को प्रणाम करने जा रहे थे, तो वे बार-बार अपने ऊपर गंगाजल छिड़कते थे। इससे पता चलता है कि वे एक महान भक्त भी थे।
किंतु देखिए इवन फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ़ प्योर ज्ञाना स्वामी जी के इस बिहेवियर की व्याख्या कर ही सकते हैं। इफ यू विश कि भक्ति को नहीं लाकर के भी जो प्योर ज्ञानी है वह तो पूरे जगत का दर्द समझता है ना ठाकुर की वह फेमस कहानी कि वो घास माने ग्रीन ग्रास है उसको ठाकुर दर्शन कर रहे थे किसी ने उसके ऊपर पैर रख दिया तो ठाकुर को ऐसा लगा जैसे कि कोई उनके देह पर पैर रख दिया है वो जो दो ये जो नाविक थे ये जो खलासी वो जो गंगा में नौका चलाते जा रहे थे एक ने दूसरे को चांटा मार दिया तो ठाकुर को लगा जैसे कि किसी ने उनको चांटा मारा है दैट मींस जगत के साथ में तादात्म एकरूपता अद्वैत भाव इतना हो गया है कि दूसरों का कष्ट उनको महसूस होता है। तो यहां पे भी उस व्याख्या करके हम लिख सकते हैं कि मां का कष्ट स्वामी जी को अनुभूत हो रहा है। जैसे ठाकुर कहते हैं ना शुद्ध ज्ञान शुद्ध भक्ति एक यानी कि उस लेवल पर फिर आप डिफरेंशिएशन नहीं कर पाएंगे। वहां पर सब मर्ज हो जाएगा।